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375

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  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-2
    Kamal Kishore Goyenka
    800 720

    Item Code: #KGP-58

    Availability: In stock


  • Mere Saakshaatkaar : Nasera Sharma
    Nasera Sharma
    350 315

    Item Code: #KGP-664

    Availability: In stock


  • Asia Ke Durgam Bhukhandon Mein
    Rahul Sankrityayan
    300 270

    Item Code: #KGP-1924

    Availability: In stock

    एशिया के दुर्गम भूखंडों में
    'एशिया के दुर्गम भूखंडों में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की महत्त्वपूर्ण यात्रा-पुस्तक है, जिसमें  लेखक ने मध्य एशिया के कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, अक्षुनदी की उपत्यका तथा अफगानिस्तान का भ्रमण-वृत्तान्त दिया है । अपनी कठिन यात्राओं एवं इन यात्राओं की उपलब्धियों के बारे में भी राहुल जी ने सविस्तार वर्णन किया है ।
    राहुल जी के यात्रा-साहित्यकी विशेषता है उनकी वर्णन-शैली, जो इतनी आकर्षक है कि पाठक पुस्तक पढते समय यही अनुभव करता है कि वह भी लेखक के साथ-साथ भ्रमण कर रहा है । लेखक की दूसरी विशेषता है उनकी सूक्ष्म पर्यवेक्षकीय दृष्टि, जिससे पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है ।
    'एशिया दुर्गम भूखंडों में' की अपनी ऐतिहासिक विशेषता भी है, क्योंकि राहुल जी के देखे हुए कई देशों का इतिहास अब बदल चुका है, इसलिए भी इस पुस्तक का दस्तावेज महत्व बढ़ जाता है। राहुल-साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह एक अनिवार्य कृति है ।
    --कमला सांकृत्यायन
  • Ardhavritt
    Mudra Rakshes
    795 716

    Item Code: #KGP-883

    Availability: In stock


  • Aakash Ke Deeye
    Sharan
    30 27

    Item Code: #KGP-9148

    Availability: In stock

    हिंदी में ज्ञान-विज्ञान का विविध साहित्य उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय पुस्तक प्रस्थान की अनेक योजनाओं पर कार्य कर रहा है । इनमें से एक योजना प्रकाशकों के सहयोग से हिंदी से लोकप्रिय पुस्तको के प्रकाशन की है । सन् 1961 से कार्यान्वित की जा रही इस योजना का मुख्य उद्देश्य जनसाधारण में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार करना और साथ ही हिंदीतर भाषाओ के भी साहित्य की लोकप्रिय पुस्तकों को हिंदी में सुलभ कराना है ताकि ज्ञान-विज्ञान की जानकारी पाठकों को सुबोध शैली में मिल सके । इस योजना के अधीन प्रकाशित पुस्तकों में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार द्वारा निर्मित शब्दावली का प्रयोग किया जाता है ताकि हिंदी के विकास में ऐसी पुस्तकें उपयोगी सिद्ध हो सके । इन पुस्तकों में व्यक्त विचार लेखक के अपने होते है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramesh Bakshi
    Ramesh Bakshi
    200 180

    Item Code: #KGP-66

    Availability: In stock

    हिंदी के विवादास्पद एवं विख्यात कथाकार रमेश बक्षी की दस प्रतिनिधि कहानियों का यह संचयन कथाकार की उस दुनिया का साक्ष्य भी है, जिससे पैठकर वह असंभव कथ्यों को पाठक वर्ग के समक्ष उदघाटित एवं प्रकाशित करता है । आत्मबोध से उपजी इन कहानियों से लेखक का जो आत्मज्ञान झसता है, वह समकालीन स्त्री-पुरुष संबंधों के संसार को नई परिभाषा, व्याख्या और नैतिकता में रूपायित करने का समुन्नत कथा-उपक्रम है, जिसे सम्यक अर्थों में हम प्रगतिशील कथाक्रम के वर्ग से रख सकते हैं ।
    ये कहानियाँ किसी विरक्त, त्यागी या सन्यासी व्यक्तित्व के विषयमुक्त होने के कथा-चित्र, नहीं है, बल्कि संबंधों के बीच पनपते उपद्रवों का सामना करते चरित्रों की सच्चाइयां है । समकालीन समाज ने अपने जीने के लिए जिस परिवेश की सृष्टि कर ली है, उसमें क्या ठोस है, क्या खोखला तथा क्या मान्य और क्या त्याज्य है-इन विषयों पर बेधक संकेत और संदेश इन कहानियों के मूल में समाहित और प्रवाहित हैं ।
    रमेश बक्षी की सजग कथाकार-दृष्टि को समेटे जिन दस कहानियों को यहीं प्रस्तुत किया जा रहा है, वे हैं- 'मेज़ पर टिकी हुई कुहनियाँ', 'जिनके स्थान ढहते हैं....', 'एक अमूर्त तकसीफ', 'राख', 'खाली', 'आम-नीम-बरगद', 'पैरोडी', 'थर्मस  में कैद कुनकुना पानी', 'अगले मुहर्रम की तैयारी' और 'उतर' । संकलन के प्रस्तोता डॉ. बलदेव वंशी ने अपने इस समकालीन लेखक की कहानियों पर विस्तृत एवं आत्मीय टिप्पणी भी प्रस्तुत की है ।
    आशा है हिंदी कथा-जगत का संवेदनशील पाठक-समाज अपने समय के इस महत्त्वपूर्ण कथाकार को किताबघर प्रकाशन की महत्त्वाकांक्षी  कथा-श्रृंखला 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' की एक कड़ी के रूप में पाकर निश्चय ही संतुष्ट होगा ।
  • Facebook Ke Janak : Mark Zuckerberg (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7081

    Availability: In stock

    अमरीकी युवा मार्क जुकरबर्ग ने किस प्रकार अपनी विलक्षण प्रतिभा से आधुनिक जगत में लोगों को सरलता से आपस में जुड़ने का अवसर दिया, यह एक अत्यंत रोचक विषय है। प्रस्तुत पुस्तक ‘फेसबुक के जनक: मार्क जुकरबर्ग’ उनके विलक्षण मस्तिष्क के अद्भुत कारनामे को प्रेरक रूप में सामने लाने का प्रयास है। यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठकों के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होगी और उन्हें अनेक रोचक तथ्यों से अवगत भी कराएगी।
  • Mere Saakshatkaar : Kamleshwar
    Kamleshwar
    400 360

    Item Code: #KGP-777

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Naresh Saxena (Paperback)
    Naresh Saxena
    90

    Item Code: #KGP-1241

    Availability: In stock

    नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के ऐसे कवि हैं, जिनकी गिनती बिना कविता-संग्रह के ही अपने समय के प्रमुख कवियों में की जाने लगी।
    एक संग्रह प्रकाशित होते-होते उच्च माध्यमिक कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाए जाने लगे। पेशे से इंजीनियर और फिल्म निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही संगीत, नाटक आदि विधाओं में गहरा हस्तक्षेप। संभवतः यही कारण है कि उनकी कविताएँ अपनी लय, ध्वन्यात्मकता और भाषा की सहजता के कारण अनगिनत श्रोताओं, पाठकों की शुबान पर चढ़ गई हैं। वैज्ञानिक संदर्भों ने न सिर्फ उनकी कविताओं को मौलिकता प्रदान की है बल्कि बोलचाल की भाषा में उनके मार्मिक कथन, अभूतपूर्व संवेदना जगाने में सपफल होते हैं। निम्न उद्धरण इसका प्रमाण है--
    पुल पार करने से, पुल पार होता है
    नदी पार नहीं होती
    या 
    शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है
    बाद में सीखेगा भाषा
    अभी वह अर्थ समझता है
    या 
    बहते हुए पानी ने पत्थरों पर, निशान छोड़े हैं
    अजीब बात है
    पत्थरों ने, पानी पर
    कोई निशान नहीं छोड़ा
    या 
    दीमकों को पढ़ना नहीं आता 
    वे चाट जाती हैं / पूरी किताब 

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shekhar Joshi
    Shekhar Joshi
    70 63

    Item Code: #KGP-1420

    Availability: In stock


  • Vah Chhathavan Tattva
    Om Bharti
    125 113

    Item Code: #KGP-1861

    Availability: In stock

    वह छठवाँ तत्त्व 
    जिसे मेरी कविताएँ पसंद नहीं
    उसकी भी कोई कविता
    पसंद है ज़रूर मुझे—
    ओम भारती के नए संग्रह की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ विनम्रता नहीं, उसकी रचनात्मक सचाई की सूचक हैं। इन कविताओं से गुज़रने के बाद मुझे लगा कि यह एक ऐसे वयस्क कवि का संग्रह है, जिसमें चीज़ों को निकट से जानने, चुनने और अपनी संवेदना का हिस्सा बनाने की एक उत्कट इच्छा है और अपने आज़माए हुए नुस्ख़ों और औज़ारों को फिर से जाँचने-परखने की एक सच्ची ललक भी। यही बात संग्रह की कविताओं को पठनीय बनाती है। इस कवि के अनुसार– कविता वह होती है, जिसमें भेद छुपे हेते हैं, जो भेद खोल देते हैं। इसका सबसे विश्वसनीय उदाहरण है इस संग्रह की वह कविता, जिसका शीर्षक है ‘इस संशय के समय में’। विक्रम सेठ के ‘सुटेबुल ब्वाय’ की तरह यह बहन के लिए एक अच्छे वर की तलाश की कविता है—
    अच्छे लड़के नहीं हैं कहीं भी
    हों भी तो शायद खुद उन्होंने
    असंभव कर रखा है ढूँढ़ लिया जाना अपना।
    और फिर कविता के उत्तरार्द्ध में निष्कर्षतः यह कि—
    इस संशय के समय में
    क्या अच्छाई खो चुकी तमाम आकर्षण?
    इस कविता का अंत दिलचस्प है और थोड़ा विडंबनापूर्ण भी, क्योंकि कवि को लगता है—‘अच्छे लड़के नहीं हैं अथवा हैं तो वे इस कवि से कहेंगे—बेवकूफ़, हमसे तो मिला होता लिखने से पहले।’ यह एक गंभीर विषय को हलके-फुलके ढंग से कहने का अंदाज़ है, जो कविता को एक नया तेवर देता है।
    इस संग्रह की अनेक कविताओं में एक चुभता हुआ व्यंग्य है और कवि के पास उसे व्यक्त करने का चुहलभरा कौशल भी। इस दृष्टि से कई और कविताओं के साथ-साथ ‘निरापद’ कविता ख़ास तौर से पठनीय है, जो इस प्रगतिकामी कवि की लगभग एक आत्मव्यंग्य जैसी कविता है। कवि की यह खेल जैसी शैली एक तरह से इस पूरे संग्रह के चरित्र-लक्षण को निर्धारित करती है। ‘इस तरह भोपाल’ कविता इसका एक प्रतिनिधि नमूना है, जिसकी शुरू की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
    जहाँ भोपाल—
    वहाँ अब संख्या और किलोमीटर नहीं हैं
    मगर वहाँ भी एक तीर की नोक से,
    आगे है भोपाल
    उस जगह न कोई खंभा,
    न कोई तख़्ती और न ही संकेत
    कि यह है, क़सम हुज़ूर, यही तो है—
    भोपाल!
    मध्यप्रदेश की कहन-शैली के रंग में ढली हुई ये कतिवाएँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करेंगी और बेशक काव्य-मर्मज्ञों का भी।
  • Antim Pankti Mein
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1900

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी की ये कविताएँ गवाह हैं कि इधर वे कविता की प्रगीतात्मक संरचना से आगे बढ़कर उसके आख्यानात्मक शिल्प की ओर आई हैं । इस प्रक्रिया में दोनों तरह की संरचनाओं के द्वंद्व और सहकार, उनकी अंत:क्रिया से ऐसा शिल्प विकसित करने में वे कामयाब हुई हैं, जो दोनों की प्रमुख विशेषताओं का सारभूत और संशिलष्ट रूप है । कविता के ढाँचे में लगातार चलती तोड़-फोड़, कुछ नया सिरज सकने की उनकी बेचैनी, प्रयोगधर्मिता के साहस और शिल्प को लेकर उनके जेहन में जारी बहस का समेकित नतीजा है ! बहुत-से कवियों की लगता है कि जीवन में जोखिम उठाना पर्याप्त है और कविता बिना जोखिम के लिखी जा अकती है। मगर नीलेश से हम कला की दुनिया का यह अनिवार्य सबक सीख सकते हैं कि जीवन से भी ज्यादा जोखिम है कला में । इसलिए वे आत्म-तत्त्व की कीमत पर साज-सज्जा में नहीं जाना चाहतीं। वह तो सच का अन्यथाकरण और अवमूल्यन है ! मानो वे स्वयं कहती हैं-जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को अरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते।
    विगत वर्षों में कुछ युवा कवियों के आख्यान की बनावट चेतना और प्रतिबद्धता के विस्तार के रूप में आकृष्ट करती रही है ! दरअसल या शिल्प कविता को चीजों का महज़ भावुक, एकांगी और सरल पाठ बन जाने से रोकता है और उसे भरसक वस्तुनिष्ठ, बहुआयामी और जटिल यथार्थ में ले जाता है ।  कवियों को 'पूरा वाक्य' लिखने की त्रिलोचन को सलाह पर अमल तो यहाँ है ही, कार्य-कारण-संबंध का विवेक भी और एक किस्म के गद्य की प्रचुरता वास्तविकता के काफी हद तक शुष्क और दारुण होने की साक्ष्य है! इसलिए रोजमर्रा की बातचीत की लय, व्याख्या और किस्सागोई का अंदाज और अनुभव का विषम धरातल-ये तत्व मिलकर इस कविता का निर्माण करते हैँ। यहाँ किसी अप्रत्याशित  सौंदर्य-लोक, कल्पना के नायाब उत्कर्ष या संवेदना की सजल पृष्ठभूमि की उम्मीद करना बेमानी है; क्योंकि इस शिल्प के चुनाव में ही कविता की पारंपरिक भूमि और भूमिका से एक प्रस्थान निहित है ! यह भी नहीं कि वह स्वप्नशील नहीं है! नीलेश रघुवंशी इस बदरंग और ऊबड़-खाबड़ दुनिया को एक खेत में बदलने और उसमें मनुष्यता को रोपने का सपना देखती हैं, मगर उसी समय यथार्थ की जटिल समस्या उन्हें घेर लेती है-एक स्वप्न है जाती हूँ जिसमें बार-बार/लौटती हूँ हर बार/मकडी के  जाले-सी बुनी इस दुनिया के भीतर !
    सच्चाई से सचेत और उसके प्रति ईमानदार होने की बुनियादी प्रतिश्रुति की बदौलत कविता किसी स्वप्निल, कोमल, वायवीय संसार में नहीं भटकती, बल्कि इच्छा और परिस्थिति के विकट द्वंद्व को साकार करती है ! नीलेश की नजर में अपने लिए किसी स्वप्न क्रो स्वायत्त करना और उसकी वैयक्तिक साधना करना गुनाह है ! उनके यहाँ सामान्य जन-जीवन ही स्वप्न की कसौटी है ! यही इस कविता का साम्यवाद है, जिसके चलते वे अपनी ही उत्साहित वस्तु से श्रमिक-वर्ग की चेतना के अलगाव और अपरिचय की विडंबना को पहचान पाती हैं-वे जो घर बनाते हैं उसके स्वप्न भी नहीं आते उन्हें !
    सवाल है कि प्रेमचंद के जिस होरी को किसान से भूमिहीन मजदुर बनने को विवश होना पड़ा और जिसकी एक दिन लू लगने से अकाल मृत्यु हुई, वह आज कहाँ है ? यह जानना हो तो नीलेश की अत्यंत मार्मिक और सांद्र कविता किसान पढ़नी चाहिए, जिसके किसी एक अंशा को उद्धृत करना कविता से अन्याय होगा ? फिर भी सारे ब्यौरे की प्रामाणिक लहजे में इस निष्कर्ष तक ले आते हैं-ये हमारे समय का किसान है न कि किसान का समय है ये । कोई पूछ सकता है कि किसान का समय था ही कब, पर कहने की जरूरत नहीं कि यह समय उसके लिए ज्यादा क्रूर और कठिन है । नीलेश साधारण जन-समाज से आवयविक रिश्ता कायम करती हैं, क्योंकि वे काव्य-वस्तु के लिए ही नहीं, भाषा और भाव के लिए भी उसके पास जाती हैं। सच है कि जो लोग सबसे अरक्षित और साधनहीन हैं, वे ही हँसते-हँसते मृत्यु की कामना कर सकते हैं । कबीर ने जिसे आकाश से अमृत निचोड़ना कहा था, उस तरह ये मृत्यु के हाथों से जिन्दगी छीन  लेते हैं । लेकिन जो मौत से डरते हैं, वे अपना सब कुछ बचाने की फिराक में जिन्दगी से ही कतराकर निकल जाते हैं । नीलेश की कविता प्रश्न करती है-क्यों खुटने से डरते हो ? हम तो रोज़ खुटते हैं ।
  • Thus Spake Lord Krishna (Paperback)
    Shiv K. Kumar
    99

    Item Code: #KGP-1182

    Availability: In stock

    Only he whose hands are steady on the steering wheel of his mind and body and is in full control of his desires, can carry the wisdom's mark on his forehead. To such an enlightened mind, the darkness of the night glows like a sunlit day, dark ignorance yielding to bright knowledge. Nothing can hoodwink his all-perceiving eyes. A genuine saint is such a man blessed by the Gods.
    Like the deep sea, he absorbs an insurgent flood but does not let its shore-line be deflected. It welcomes rivers from all directions but is not overwhelmed by them—its underworld remains undisturbed because its centre can always hold.
    So, O blessed Prince, throw away the yoke of your impulses, their oppressive burden, regaining your suzerainty over them. Disengage yourself from man's prime infirmities—his ego and passion.
    This, O Prince, is the only way to merge into God, the individual soul's union with the Oversoul. Once you are up there on the heights, you will never slide down to the dark valley below. It will then be the same for you—living or dying, waking or dreaming, gaining or losing.
    This is what the sages call Moksha—release from the bondage of birth and death—basking forever in the sunshine of Life Divine, of peace eternal.
  • 20-Best Stories From Italy (Classics)
    GLOBAL VISION PRESS
    395 356

    Item Code: #KGP-365

    Availability: In stock

    Imagine reading a 20-page introduction about an author and their times before we even start reading a story. Wait… do not imagine… just pick up any classic available, and the imagination will transform into reality. In all possibility, we 'reject' these classics outright but our grandparents still swear by their narrations and their plots. They say a good story can never be put down… what happened to these? Younger generation, wrong choices—is it?
    A good story lives and touches our hearts but only in the form the author wrote it, and not with editorial notes. What is an enjoyable tale today is a classic tomorrow. Over generations, each piece of literary classic has received newer interpretations, perceptions and proportions. The 21st century world too needs a dollop of the classics of the yesteryears, which still stand relevant to our present conditions, even though the times have changed, be it only historically.
    Keeping this thought in mind, each classic in this collection comes to the reader just as the original piece; meaning, neither the publisher nor the editor have tampered with the authors' original writings. Each classic stands untouched and unabridged—just like it was years back, fresh from the author, fresh from the press!
  • Naamdev Rachanavali
    Govind Rajnish
    240 204

    Item Code: #KGP-146

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • Pahli Gustakhi
    Ramesh Dutt
    190 171

    Item Code: #KGP-772

    Availability: In stock

    पहली गुस्ताखी
    संग्रह की कविताएं अत्यंत सहज, सरल और सीधे-सीधे पाठकों तक संप्रेषित होने वाली हैं । उनमें प्रायः एक अनगढ़पन भी है, लेकिन कवि अपने सामाजिक एवं मानवीय सरोकारों के प्रति अत्यंत गंभीर है । आज जबकि पूरी दुनिया समूची धरती को बचाने के लिए चिंतित है, डॉ. शर्मा की ग़ज़लनुमा कविताओं में पर्यावरणीय चिंताओं के बिंब, संग्रह को उल्लेखनीय बनाते हैं ।
    वर्तमान समय की शायद ही कोई भी समस्या हो, जिस पर कवि ने अपनी कलम न चलाई हो । चाहे गरीबी हो या बेकारी, भ्रष्टाचार हो या सांप्रदायिकता, हिंसा हो या अपराध, राजनीति की गिरावट हो या नौकरशाही की सुविधापरस्ती, समाज में टूटते- बिखरते रिश्तों एवं मानवीय मूल्यों के क्षरण पर कवि का ध्यान बार-बार जाता है और वह बार-बार अपनी रचनाओं में उन्हें पिरोता है ।
  • Shalmali
    Nasera Sharma
    300 270

    Item Code: #KGP-2006

    Availability: In stock

    शाल्मली
    ० 'शाल्मली' नासिरा शर्मा का एक ऐसा विशिष्ट उपन्यास है, जिसकी जमीन पर नारी का एक अलग और नया ही रूप उभरा है । 'शाल्मली' इसमें परंपरागत नायिका नहीं है, बल्कि यह अपनी मौजूदगी से यह अहसास जगाती है कि परिस्थितियों के साथ व्यक्ति का सरोकार चाहे जितना गहरा हो, पर उसे तोड़ दिए जाने के प्रति मौन स्वीकार नहीं होना चाहिए । 
    ० 'शाल्मली' सेमल के दरख्त की तरह है, जिसका अंश-अंश संसर्ग में आने वाले को जीवन-दान करता है; लेकिन उसका पति नरेश इस सच को स्वीकार करने की जगह अपनी कुंठाओं में जीता है, अपने स्वार्थों को शाल्मली के यथार्थ आचरण से ऊपर समझता है । यह हिसाबी-किताबी जीव है; लेकिन जिंदगी की सच्चाई के साथ इसका समीकरण गलत है ।
    ० 'शाल्मली' एक बडी अफसर है। बावजूद इसके वह बेहद सामान्य है । पति, माता-पिता और सास के साथ उसके रिश्ते सच के नज़दीक है । यहीं उसकी खूबी है कि वह 'नौकरशाह' होते हुए भी, उस वर्ग से कटी हुई है और एक आम भारतीय नारी के यथार्थ को जीती है ।
    ० लेकिन 'शाल्मली' दया और करुणा से डूबी अश्रु बहाने वाली उस नारी का प्रतीक भी नहीं है, जिसे पुरुष-सत्ता की गुलामी में सब कुछ खो देना पड़ता है । वह सामान्य होते हुए भी असाधारण है और चुनौती के तेवर रखती है ।
    ० नासिरा शर्मा ने निश्चय ही यह उपन्यास बडी मेहनत से लिखा है । इसकी भाषा में कविता की लय और दिवार में निरंतरता को उन्होंने बडी खूबी से संवारा है ।
  • Abhang-Gaatha
    Narendra Mohan
    140 126

    Item Code: #KGP-9138

    Availability: In stock

    ‘खोए हुए शब्द को, अभंग को, सृजनशक्ति को पुनः पाने की तुकाराम की बेचैनी अभूतपूर्व है जो उसे हर युग के कवि की बेचैनी के मिथक के रूप में खड़ा कर देती है। शब्द, सृजन और जिंदगी उनके लिए अलग-थलक नहीं, एक ही हैं। शब्द की इस कैफियत के साथ तुकाराम का मुझ तक पहुंचना एक कवि के एक नए पाठ के खुलने के बराबर है जिसके लिए एक क्या, कई नाटक लिखे जा सकते हैं।’
    ये शब्द हैं डाॅ नरेन्द्र मोहन के जिन्होंने अभंग-गाथा नाटक में तुकाराम की जिंदगी और अभंग-रचना को आज के दहकते हुए संदर्भों से जोड़ दिया है। नाटक के निर्देशक सतीश दवे ने अपने वक्तव्य में ठीक ही कहा है ‘पहली बार जब मैंने अभंग-गाथा का नाट्य आलेख उनसे सुना तो मुझे महसूस हुआ जैसे तुकाराम का मानवीय व्यक्तित्व कई दृश्यों की श्रृंखला में मेरे सामने मूर्तिमान हो गया हो और एक साथ कई रूपाकारों ने मुझे घेर लिया हो। मुझे लगा तुकाराम अपने युग से बाहर आकर मेरे सामने आ खड़े हुए हों और उस वक्त की परिस्थिति, समय और इतिहास मेरी परिस्थिति, समय और इतिहास से जुड़ने-टकराने लगा हो।’
    अभंग-गाथा में शब्द और रंग साथ-साथ हैं। एक-दूसरे को प्रकाशित-स्पंदित करते हुए। इस नाटक को खेलना, इसीलिए, रंगकर्म का एक सांझा अनुभव बनता गया है। अभंग को यहां रंग-संगीत शैली का हिस्सा ही बना दिया गया है और यह शैली नाटक के भीतरी रंग-संयोजनों से मिलकर ही मंच पर आई है। 
  • Neend Se Pahale
    Soma Bharti
    195 176

    Item Code: #KGP-373

    Availability: In stock

    नींद से पहले
    सोमा भारती की कहानियां हमें उस जानी-पहचानी निम्न- मध्यमवर्गीय दुनिया में ले चलती हैं, जिनसे हम जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जिन्हें हम देखकर भी अनदेखा किए रहते हैं।
    इनके पात्र, चाहे वह ‘जस्सो मासी मर गई’ की जस्सो मासी हों या ‘नींद से पहले’ के रमापति, ‘किराये के मकान’ की पेइंग गेस्ट हो या कोई अन्य, मोमबत्तियों की तरह हवाओं में जूझते, जलते-गलते रहते हैं। वे आपसे दया की भीख नहीं मांगते, लेकिन समय, संयोग और नियति ने उन्हें जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, उसका दीदार जरूर कराती हैं कि देखो, यह मैं हूं, यह तुम भी हो सकते थे।
    सोमा ने अभिनय और एंकरिंग आदि अभिव्यक्ति के जिन मंचों पर काम किया है, उसका लाभ उनकी भाषा-भंगिमा, भाव और बोध को मिला है। कहानियों के रचाव-रसाव के लिए सोमा को किसी सायासता की जरूरत नहीं पड़ती, भाषा-शिल्प के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते, न ही चैंकाने वाले चमत्कारों के टोने-टोटके टटोलने की आवश्यकता होती है। कहानियों की सहज संवेदना ही उनकी शक्ति है, जिनकी तासीर खुद-ब-खुद आपको पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
    सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ! सोमा ने दूसरी कहानियां न भी लिखी होतीं, उनकी अकेली कहानी ‘जस्सो मासी मर गई’ ही उन्हें अमर बना सकती है।
    --संजीव
  • Vigyan Aur Dharmik Manyataayen
    Vinod Kumar Mishra
    130 117

    Item Code: #KGP-9043

    Availability: In stock


  • Honour Killing Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    80

    Item Code: #KGP-1269

    Availability: In stock


  • Shankar Shesh Ke Naatakon Mein Sangharsh Chetna
    Hemant Kukreti
    280 252

    Item Code: #KGP-9097

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    250 225

    Item Code: #KGP-861

    Availability: In stock


  • Bhaasha Vigyan Pravesh (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    50

    Item Code: #KGP-998

    Availability: In stock

    यदि यह कहा जाए कि सच्चे अर्थों में भाषाविज्ञान का प्रारंभ भारत में हुआ तो अत्युक्ति न होगी, किंतु आधुनिक काल में अपने देश में इसके प्रति रुचि बहुत बाद में जगी और वह भी यूरोपीय प्रभाव ओर प्रेरणा के फलस्वरूप। यह प्रसन्नता की बात है कि इधर लगभग तीन-चार दशकों से यह विषय यहां काफी लोकप्रिय हुआ है और होता जा रहा है।
    हिंदी में उच्चतम कक्षा के उपयुक्त इस विषय की कुछ पुस्तकें तो हैं किंतु ऐसी कोई प्रारंभिक पुस्तक नहीं थी जो इस विषय में रुचि रखने वाले सामान्य लोगों तथा विषय की प्रारंभिक जानकारी चाहने वाले छोटी या बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों आदि के लिए उपयोगी हो। इसी कमी की पूर्ति की दिशा में यह एक प्रयास है। 
    इस संस्करण में कुछ नई सामग्री भी जोड़ दी गई है तथा शेष का संशोधन कर दिया गया है, जिसके कारण यह पुस्तिका अधिक उपयोगी हो गई है।
    —भोलानाथ तिवारी
  • Kavi Ne Kaha : Leeladhar Mandloyi (Paperback)
    Leeladhar Mandloi
    80

    Item Code: #KGP-1265

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : लीलाधर मंडलोई
    लीलाधर मंडलोई अपनी पीढ़ी के उन थोड़े-से कवियों से अग्रणी हैं, जिन्होंने अपने समय के वैचारिक दिभ्रमों से जूझते हुए, कविता के वृहत्तर सरोकार को बचाए रखने का उपक्रम किया है । पिछले तीस-बत्तीस वर्षों की काव्ययात्रा में उनका एक अलग स्वर उभरकर आया है ।
    हिंदी कविता में किसान चेतना की व्यापकता तो देखी जा सकती है, मगर मज़दूरों, खासकर औद्योगिक मज़दूरों की उपस्थिति सांकेतिक ही रही है । मंडलोई शायद पहली बार उसके जीवन-संघर्ष को, उसकी 'सफ़रिंग' को, उसकी करुणा को अपनी कविता में दर्ज करने में सफल हुए हैं । वे अपने बचपन को याद करते हुए मध्यप्रदेश की कोयला खदानों के उस यथार्थ को सामने लाते हैं जो श्रमिक संगठनों के दस्तावेजो तक में शामिल नहीं है । अपने जीवन के सच को समय के सच से जोड़ देने की कला की व्याप्ति उनकी अन्य कविताओं में भी देखी जा सकती है । अंदमान की जनजातियों के जीवन संघर्ष को पहली बार कविता में लाने का श्रेय भी उन्हें जाता है ।
    लीलाधर मंडलोई की कविताओं में प्रकृति और स्त्री की अपनी खास जगह है । वे केवल नैसर्गिक सौंदर्य का ही उदघाटन नहीं करते हैं, बल्कि उन कठोर सच्चाइयों को भी सामने लाते है जिनसे उनके समकालीन कवि प्राय: बचना चाहते है । उन्होंने कुछ ऐसी मार्मिक कविताएं भी लिखी है जो हमारी संवेदना का विस्तार करती है । प्रसंग चाहे अपने कुत्ते के खो जाने का हो अथवा पत्नी द्वारा मोहल्ले की उस कुतिया को रोटी खिलने का, जो मां बनने वाली है-वे छीजती हुई संवेदना के इस कठिन दोर से भी मनुष्यता के बचे होने की गाथा ही नहीं रचते, अपनी कलात्मकता से पाठको को भी उसमें शामिल कर लेते है ।
    ध्यान देने की बात है कि उनकी मार्मिक कविताएं भी हमें हताश नहीं करती, बल्कि जीवन की जद्दोजहद से और डूबने की प्रेरणा देती है । वे निराशा और मृत्यु के कवि नहीं हैं । उनकी कविता जीने और जीतने की हमारी इच्छा को मज़बूत करती है, दुखों से लड़ते हुए जीवन की सुंदरता को पहचानने की दृष्टि देती है 
  • Soochana Ka Adhikaar
    Vishv Nath Gupta
    140 126

    Item Code: #KGP-494

    Availability: In stock


  • Vichaar Bindu
    Atal Bihari Vajpayee
    245 221

    Item Code: #KGP-9019

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।

    राष्ट्रीय जीवन में एक असहिष्णुता जाग रही है, दूसरे को सहन न करने की प्रवृत्ति । लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति नहीं चल सकती । हमने हमेशा चारों तरफ से आने वाली हवाओं का स्वागत किया । इस देश के द्वार सबके लिए खुले रहे है । जब और जगह आतंक था, शोषण था, भय था, मजहब के नाम पर उत्पीड़न था, तो लोग अपनी पवित्र अग्नि को जलाए हुए भारत में आए । और यहाँ भारतमाता के आँचल में उन्होंने विश्राम पाया । किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि यहाँ कैसे आए, क्यों आए, पराए हो । यह इस देश की मिट्टी का रंग है, यह इस देश की संस्कृति का गुण है ।
    -अटल  बिहारी वाजपेयी
  • Davanal
    Balshauri Reddy
    80 72

    Item Code: #KGP-2101

    Availability: In stock

    दावानल
    प्रस्तुत ऐतिहासिक उपन्यास पलनाडु-युद्ध पर आधारित है । पलनाडु जिला गुंटूर का एक प्रदेश है । यह युद्ध 12वी शती में पलनाडु के राजाओं के बीच राज्य बंटवारे का लेकर कारंपूडि रणक्षेत्र में हूआ था, जो आपस में भाई-भाई थे। इस युद्ध की तुलना महाभारत-युद्ध से की जाती है।  कुरुक्षेत्र की भाँति कारंपूडि रणक्षेत्र का भी सामरिक दृष्टि से उतना ही महत्त्व है । आंध्र के विद्वान् इसे 'पलनाडु महाभारत' की संज्ञा देने में संकोच नहीं करते । यद्यपि यह संग्राम आंध्र में घटित हुआ था, तथापि इसमें सार्वदेशिकता की झलक मिलती है। पलनाहु के इस युद्ध ने आंध्र के कवि, नाटककार, लेखक और इतिहासकारों पर ऐसा प्रभाव डाला कि इसे इतिवृत्त बनाकर उन्होंने दर्जनों काव्य,  नाटक, उपन्यास, वीर गीत, गद्य काव्य और गीति काव्य लिख डाले । साथ ही इस पर अनेक फिल्में भी बन गईं ।

    (उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत)
  • Kavi Ne Kaha : Manglesh Dabral
    Manglesh Dabral
    150 135

    Item Code: #KGP-1875

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: मंगलेश डबराल
    मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से अपनी सृजनात्मक प्रेरणा ग्रहण करती हुई हिंदी कविता की आज जो पीढ़ी उपस्थित है, उसमें मंगलेश डबराल जैसे समर्थ कवि इतने वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी होते जा रहे हैं कि उनके किसी एक या चुनिंदा पहलुओं को पकड़कर बैठ जाना अपनी समझ और संवेदना की सीमाएं उघाड़कर रख देना होगा। एक ऐसे संसार और समय में जहां ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्हीं भी शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को उसके हाशिये से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचोबीच लाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, ईषर्यालु अथवा आत्मदयाग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोज़ख़ को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इनकार करता है।
    मंगलेश की इन विचलित कर देने वाली कविताओं में गहरी, प्रतिबद्ध, अनुभूत करुणा है, जिसमें दैन्य, नैराश्य या पलायन कहीं नहीं है। करुणा, स्नेह, मानवीयता, प्रतिबद्धता--उसे आप किसी भी ऐसे नाम से पुकारें, लेकिन वही जज़्बा मंगलेश की कविता में अपने गांव, अंचल, वहां के लोगों, अपने कुटुंब और पैतृक घर और अंत में अपनी निजी गिरस्ती के अतीत और वर्तमान, स्मृतियों और स्वप्नों, आकांक्षाओं और वस्तुस्थितियों से ही उपजता है। उनकी सर्जना का पहला और ‘अंतिम प्रारूप’ वही है।
    आज की हिंदी कविता में मंगलेश डबराल की कलात्मक और नैतिक अद्वितीयता इस बात में भी है कि अपनी शीर्ष उपस्थिति और स्वीकृति के बावजूद उनकी आवाज़ में उन्हीं के ‘संगतकार’ की तरह एक हिचक है, अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की कोशिश है, लेकिन हम जानते हैं वे ऐसे विरल सर्जक हैं जिनकी कविताओं में उनकी आवाज़ें भी बोलती-गूंजती हैं जिनकी आवाज़ों की सुनवाई कम होती है।
    -विष्णु खरे
  • Nirogyogsadhna (Paperback)
    Manoj Kumar Chaturvedi
    180

    Item Code: #KGP-7070

    Availability: In stock

    निरोगयोगसाधना
    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और दिन-रात उसके लिए प्रयास करते रहते हैं। इस आपाधापी में व्यक्ति सबसे अहम चीज को जो नकार देता है वह है ‘स्वयं का स्वास्थ्य’। वह यह नहीं समझते कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु तभी आपके लिए उपयोगी होगी जब आप उसका आनंद लेने के लिए तैयार होंगे। व्यक्ति यदि स्वस्थ नहीं तो संसार की कीमती से कीमती वस्तु भी उसके लिए बेकार है। स्वस्थ जीवन है तो जहान है। 
    योग द्वारा कैसे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से संपूर्णतया स्वस्थ रह सकता है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन इस ‘निरोगयोगसाधना’ नामक पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
    योग दर्शनशास्त्र में वर्णित सूत्र षड्दर्शन का ही छठा अंग है। ये षड्दर्शन वेदों के उपांग माने गए हैं। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निशक्त, छंद, ज्योतिष आदि वेदों के अंग कहलाते हैं जिनके द्वारा वेद मंत्रों के अर्थ का ज्ञान होता है।
    योग ऐसी कला है जो प्रकृति और मनुष्य के बीच के अंतर को स्पष्ट कर व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत करती है। अर्थात् व्यक्ति योग के माध्यम से इंद्रियों को अपने वश में करने लायक बन जाता है और माया के बंधन से भी स्वयं को तोड़कर मुक्त हो जाता है। योग अनादिकाल से चला आ रहा है और इसकी उपयोगिता व्यक्ति तभी समझ सकता है जब वह योग को स्वयं पर लागू करे, उसमें रम जाए। योग करने वाला व्यक्ति कभी बूढ़ा या बीमारी से ग्रसित नहीं होता।
    —भूमिका से
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Om Prakash Valmiki
    Om Prakash Valmiki
    175 158

    Item Code: #KGP-432

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : ओमप्रकाश वाल्मीकि
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘बैल की खाल’, ‘अम्मा’, ‘बंधुआ लोकतंत्रा’, ‘पीटर मिश्रा’, ‘शवयात्रा’, ‘छतरी’, ‘घुसपैठिए’, ‘प्रमोशन’, ‘बपतिस्मा’ तथा ‘पच्चीस चैका डेढ़ सौ’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Raakshas (Paperback)
    Shanker Shesh
    125

    Item Code: #KGP-48

    Availability: In stock

    राक्षस
    राक्षस एक जातिवाचक शब्द ही नहीं, मानसिकता द्योतक शब्द भी है। राक्षस वह है, जो सामान्य मानवीय स्वरूप के विरोध में रहता है ।
    इस नाटक में शंकर शेष ने मनुष्य की इसी वृत्ति को उभारा है । यहाँ रणछोड़दास, सुकालू और दुकालू ऐसे चरित्र हैं जो मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम और द्वेष के संघर्ष को तीव्र करते है और फिर इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि–
    अब नहीं रुकेगा कमल फूल
    अब नहीं गिरेगी
    आने वाले कल की आँखों में धूल
    अब गाँव हमारा नहीं रहेगा
    जड़ पत्थर की नाँव 
    राक्षस अपनी पूरी अमानवीय स्थिति के साथ हमें इस आशा की स्थिति तक एहुंचाता है ।
    शकर शेष द्वारा लिखा गया एक सशक्त नाटक ।

  • 20-Best Stories From Africa
    Prashant Kaushik
    345 311

    Item Code: #KGP-9315

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. African short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Two Skin Woman, Slave Girl, South Winds, Apprentice, Allah’s Will, Green Leaves, this book is a compilation of 20 famous African short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Africa.
  • Manu Ko Banaati Manaii (Paperback)
    Gyanendrapati
    160

    Item Code: #KGP-415

    Availability: In stock


  • Mere Saakshaatkaar : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    190 171

    Item Code: #KGP-173

    Availability: In stock


  • Akkhar Kund
    Padma Sachdev
    125 113

    Item Code: #KGP-1989

    Availability: In stock

    अक्खर कुंड 
    यूँ तो पद्मा सचदेव डोगरी की कवयित्री हैं, पर अनुवाद के माध्यम से जब वह प्रकट होती हैं , तो उनकी कविता में पूरे हिंदुस्तान की महक आती है । इससे सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि वह संपूर्ण भारतीय समाज और संस्कृति को शब्द देने वाली कुशल कवियत्री हैं ।
    पद्मा जी की कविता प्रकृति की कविता है और मनुष्य की संवेदना और करुणा की भी...। इनकी कविता में मिथकों की बानगी अदभुत और अलग पहचान से समृद्ध है । यहाँ वह सूक्ष्म में जाती हैं और उसे रूहानी भावों से जोड़ते हुए जो चित्रांकन करती है, वह जीवंत तो है ही, बल्कि अपनी जड़ों से जोडने का वास्तविक अहसास कराती हैं । इसलिए इनमें आत्मिक आनंद की अनुभूति भी है ।
    पद्मा जी की कविताओं में कश्मीर का बेमिसाल सौंदर्य  तो है ही, वहाँ की जातीय संस्कृति का सबल रेखांकन  भी है, यानी इनमें कश्मीरियत समूचे आकार में यहीं होती है । इन्हें शब्द-चित्रों को बनाते हुए उन्हें घाटी में बारूद की गंध भी आती है । इससे उनका संवेदनशील मन विचलित होता है, लेकिन वह इसे यूँ ही नहीं छोड़ देतीं, पीड़ितों-वंचितों को आशा और विश्वास भेंटती है । उनमें 'एक दिन लौटने का अहसास' जगाती हैं ।
  • Amritlal Nagar Ki Babuji-Betaji And Compny
    Achla Nagar
    195 176

    Item Code: #KGP-1939

    Availability: In stock

    अमृतलाल नागर की बाबूजी-बेटाजी एंड कंपनी
    ‘निकाह’, ‘आख़ीर क्यों’, ‘बागबान’ और ‘बाबुल’ समेत कोई तीन दर्जन हिट फ़िल्मों व दो दर्जन धारावाहिकों की पटकथा तथा संवाद लेखिका एवं कथाकार साहित्य भूषण डॉ०  अचला नागर द्वारा बीसवीं शताब्दी के मूर्धन्य भारतीय उपन्यासकार और अपने पिता अमृतलाल नागर के संबंध में लिखे संस्मरणों की अनुपम कृति है---‘बाबूजी-बेटाजी एंड कंपनी’। इसमें उन्होंने पिता के संग जिए विविध काल-खंडों को अत्यंत सजीवता से उकेरा है।
    कथाकार, नाटककार, नाट्य-निर्देशक, मंच एवं रेडियो की प्रतिभाशाली अभिनेत्री अचला नागर विगत लगभग 30 वर्षों से बालीवुड से तो जुड़ी हैं ही, कदाचित् वह फ़िल्म-उद्योग की इनी-गिनी लेखिकाओं में हैं, जिन्होंने क़द्दावर पुरुषों द्वारा संचालित फ़िल्मोद्योग के दुर्ग को भेदकर वहाँ ‘निकाह’ के ज़रिए न केवल अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज़ कराई है वरन् साल दर साल क़ायम अपने सम्मानजनक स्थान को बरक़रार भी किए हुए हैं।
    ये संस्मरण शिल्प की दृष्टि से लीक से हटकर हैं। दरअसल ऐसा लगता है, मानो ये संस्मरण न होकर किसी फ़िल्म के ‘रश प्रिंट’ (रशेज़) हों। ज़ाहिर है, एक कुशल पटकथाकार होने के नाते इन संस्मरणों में उनकी क़लम कैमरे की आँख की तरह चली है; लिखने के बजाय उन्होंने सुंदर वृत्तचित्र शूट किए हैं। कहीं विहंगम दृश्य को अपना कैमरा ‘पैन’ करते हुए वे ‘लांग शॉट’ से ‘मिड शॉट’ और ‘क्लोज़अप’ में अंकित करती चली आती हैं, कहीं ‘मोन्ताज’ का प्रयोग करती हैं तो कहीं कुशलतापूर्वक ‘मिक्स’ और ‘डिज़ाल्व’ भी कर देती हैं। बतरस से पगी यह पुस्तक पाठक को आरंभ से अंत तक बाँधकर एक साँस में पढ़ जाने को विवश करती है।
  • Haadase Aur Hausle
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-8001

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार हैं । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती हैं कि कहानी पाठक को आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझतीं ।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हुई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानियां ।

  • Bharat Mein Panchayati Raaj (Paperback)
    Vishv Nath Gupta
    70

    Item Code: #KGP-1405

    Availability: In stock


  • Svasthya Evam Chikitsa (Paperback)
    Dr. Rakesh Singh
    160

    Item Code: #KGP-369

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य एवं चिकित्सा 
    पुस्तक में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर लगभग 41 लेख संकलित हैं। जो लोग यह कहते हैं कि चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम से ही पकाया जा सकता है, उनके लिए ये लेख चुनौती हैं और सिद्ध करते हैं कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा को उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को हिंदी माध्यम से पढाया जा सकता है।
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है। इन लेखों में अधिकांशत: इस बात की ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग कुछ दवाओं का नाम याद कर लेते हैं और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते हैं। उससे कितनी जानि हो सकती है, यह 'दवाओं के उपयोग में सावधानियाँ शीर्षक से स्पष्ट है। इसी प्रकार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारता से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है। 'हदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हृदय-रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इसमें अधुनातन चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है। अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-संपन्न है। कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्व एवं उनके सफ़ल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतीक है।
  • Kohare Se Lipe Chahre
    Suryakant Nagar
    130 117

    Item Code: #KGP-1802

    Availability: In stock

    कोहरे से लिपे चेहरे
    सूर्यकांत नागर उन कथाकारों से हैं जो आधुनिक संवेदना की जटिलता और उसकी सहज अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाते हैं। उनके रचनाकार की मार्मिकता मनुष्य के विशिष्ट स्वभाव र्ताक्वे स्थितियों में उतरकर उन्हें पहचानने के गुणों में निहित है । वे अपनी कहानियों में इनके अन्तर्सम्बंधों के प्रति व्यग्र दिखाई देने हैं ।
    उनको चिंता के केंद्र में मनुष्यता है । मानवीय मूल्यों में उनकी गहरी आस्था है । अपनी कहानियों में मनुष्य के दोहरे और दोगलेपन का उजागर करने का वे कोई अवसर नहीं छोडते । दूसरों  द्वारा अपमानित होने के बजाय जब  मनुष्य स्वयं की नजरों में लज्जित होता है तो अधिक ग्लानि का अनुभव करता है । संग्रह की 'तमाचा', 'अँधेरे से उजास', 'एक और विभाजन' तथा 'अब अब और नहीं' कहानियाँ इसी श्रेणी की हैं । नागर जी के पास एक सहज, प्रवाहमयी भाषा है, जिनमें कहीँ-कहीँ व्यंग्य का मार्मिक और अनायास स्पर्श है-वर्णन, संवाद और चरित्रांकन तीनों में ।
    सूर्यकांत नागर किसी विचारधारा से ज़कड़े लेखक नहीं है कि विचारधारा का सहारा लेकर वैतरणी पार कर लें । वे स्वाधीनता का मार्ग चुनते हुए अपनी राह स्वयं बनाते है । उनकी हर कहानी सौद्देश्य और उत्तरदायी है । कथा-कथन में वे सिद्ध हैं । कहानियों की नोकें भले उतनी उभरी दिखाई न दें, परंतु भीतरी चुभन प्राय: हर कहानी में मौजूद है । सादा तबियत र्वश्च अंतर्मुखी नागर जी ने विविध विषयों में खूब लिखा है, लेकिन वे अभी भी अपने विशिष्ट होने का मान नहीं होने देते ।
  • Sikhon Ka Itihaas (2 Vol.)
    Khushwant Singh
    1295 1166

    Item Code: #KGP-9302

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Saadat Hasan Manto Ki Kahaniyan
    Narendra Mohan
    490 441

    Item Code: #KGP-1953

    Availability: In stock

    सआदत हसल मंटो उर्दू के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, चर्चित और विवादास्पद लेखक हैं। इस एक लेखक को लेकर जितनी चर्चाएं उठी हैं, उतनी अन्य किसी लेखक को लेकर नहीं। मंटो की खासियत है कि उसने नये विषयों पर ही नहीं लिखा, नये अन्दाजेबयां और नजरिये से भी लिखा। इस एक बात ने उन्हें अपने समय का ही नहीं, आज के समय का भी एक बड़ा कहानीकार बना दिया है।
    मंटो की कहानियां पाठकों की अन्तश्चेतना को बुरी तरह झकझोरने वाली, तिलमिला देने वाले विचारों तक ले जाने वाली हैं। यह बेचैनी महज व्यक्तिगत नहीं है, मुल्क और कौम की बेचैनी से जुड़ी हुई है जो कहानियों की मार्फत पाठकों तक सीधे पहुंचती है। उनकी कहानियों में गहरी मानवीय दृष्टि के साथ-साथ तीव्र आक्रोश और प्रतिकार भी है। हरारत और रोशनी, स्वप्न और दुःस्वप्न उनकी सृजनात्मक प्रेरणा के हिस्से हैं। इन कहानियों के जरिये मंटो हमें विसंगति-भरी जिन्दगी में जीने की शर्त का गहरा एहसास कराते हैं।
    सआदत हसन मंटो की कहानियां पुस्तक में मंटो के कथा-संसार में झांकने का, उनकी कहानियों को चुनकर, एक परिप्रेक्ष्य देकर हमारे सामने पेश करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है हिन्दी के जाने-माने कवि, नाटककार और आलोचक डाॅ. नरेन्द्र मोहन ने। मंटो की सृजनात्मक प्रेरणा और संपादकीय दृष्टि में आश्चर्यजनक साम्य है-एक-दूसरी में खुलती गई हैं और उन्हें अलगाया नहीं जा सकता। इससे यह पुस्तक कहानियों का संकलन-भर नहीं रही है, एक दस्तावेज बन गई है।

  • 1128 Mein Crime 27
    C. J. Thomas
    100

    Item Code: #KGP-1817

    Availability: In stock

    1128 में क्राइम 27
    '1128 में क्राइम 27' थॉमस का दूसरा नाटक है । उसकी समस्या सार्वदेशीय है । उन्होंने मौत को एक विशेष प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है । नाटक में जिंदगी और मृत्यु के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है । कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सिनिक है, क्योंकि उनका यह नाटक सिनिसिज्म की सृष्टि है।... 
    तत्कालीन रंगमंच पर जमी हुई हास्य रूढियों के प्रति विद्रोह, प्रबोधन की शक्ति पर विश्वास रखकर संसार का उद्धार करने की मूर्खता आदि पर भी उन्होंने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। असली जिंदगी और जीवन की व्याख्या करने वाले नाटक टेकनीक के वैभवों क द्वारा उनकी असली भिन्नताओं को उसी तरह रहने देकर रंगमंच पर प्रस्तुत करने का उनका कौशल आश्चर्यजनक ही है। जिंदगी मिथ्या है, यह दार्शनिक आशय दर्द-भरी हँसी के साथ वे मंच पर प्रस्तुत करते हैं। नाटक चलाने वाला और नाटक की व्याख्या करने वाला गुरु एक तरफ़, नाटक खेलने वाले, नेपथ्य, प्रोप्टर, स्टेज मैनेजर आदि का एक ढेर दूसरी तरफ, अखबार का दफ्तर, संपादक, चक्की आदि का एक ढेर तीसरी तरफ।  इन सबके सम्मुख गुरु के लिए जब चाहे तब इशारा कर सकने वाला एक प्रेक्षक समूह । इस प्रकार नाटक और जिंदगी को उनके असली रूप में अपने-अपने व्यक्तित्व से युक्त एक ही स्टेज पर एक साथ इस नाटक में प्रस्तुत करता है । नाटकीय प्रभाव एवं आंतरिक संघर्षों की दृष्टि से यह नाटक अत्यंत सफल है।
  • Prakarantar
    Roop Singh Chandel
    100 90

    Item Code: #KGP-9088

    Availability: In stock


  • Triya Hath (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    100

    Item Code: #KGP-7046

    Availability: In stock


  • Ek Thi Sara
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1978

    Availability: In stock

    एक थी सारा

    मेरी तहरीरों से कई घरों ने मुझे थूक दिया है
    लेकिन मैं उनका जायका नहीं बन सकती
    मैं टूटी दस्तकें झोली में भर रही हूँ
    ऐसा लगता है पानी में कील ठोक रही हूँ
    हर चीज़ बह जाएगी—मेरे लफ्ज, मेरी औरत
    यह मशकरी गोली किसने चलाई है अमृता !
    जुबान एक निवाला क्यूँ कुबूल करती है ?
    भूख एक और पकवान अलग-अलग
    देखने के लिए सिर्फ 'चाँद सितारा' क्यूँ देखूँ ?
    समुंदर के लिए लहर ज़रूरी है
    औरत के लिए जमीन जरूरी है
    अमृता ! यह ब्याहने वाले लोग कहाँ गए ?
    यह कोई घर है ?
    कि औरत और इजाजत में कोई फर्क नहीं रहा... 
    मैंने बगावत की है, अकेली ने,
    अब अकेली आंगण में रहती हूँ
    कि आजादी से बड़ा कोई पेशा नहीं
    देख ! मेरी मज़दूरी, चुन रही हूँ लूँचे मास
    लिख रहीं हूँ
    कभी मैं दीवारों में चिनी गई,
    कभी बिस्तर से चिनी जाती हूँ... 
    [इसी पुस्तक से]

  • Meri Romanchak Satyakathayen
    Kaviraj Om Prakash
    250 225

    Item Code: #KGP-648

    Availability: In stock

    मेरी रोमांचक सत्य-कथाएँ
    इस संग्रह की कहानियों के कथानक वर्तमान काल के अलावा वैदिक और पौराणिक काल के भी हैं और भारत के विभाजन से पहले के भी है । कई कहानियाँ साधु-संतों, महात्माओं और नाग आदि  देवी-देवताओं के संबंध में भी है । इनसे पता चलता है कि कविराज को भारतीय इतिहास, संस्कृति और जनजीवन की व्यापक और सही जानकारी है । यह भी पता चलता है कि वे आस्थावान हैं और भारतीय संस्कृति से बड़ी गहराई से जुडे हुए है । हस संग्रह की कहानियां कला की दृष्टि है भी उच्चकोटि की है । प्रत्येक कहानी का कथानक, विषयवस्तु और चरित्र-चित्रण मार्मिक एवं आकर्षक है । प्रत्येक कहानी  रोचक है, पाठक के मन को बाँधने वाली है और अच्छी शिक्षा देने वाली है ।
  • Kashmkash
    Manoj Singh
    520 468

    Item Code: #KGP-846

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Malti Joshi
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-55

    Availability: In stock


  • Yugdrashta Shivaji
    Shashi Bhushan Singhal
    280 252

    Item Code: #KGP-288

    Availability: In stock

    राष्ट्रकवि ने खूब कहा है—
    ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। 
    कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।।’ 
    महापुरुषों की हार्दिकता से गायी गई गाथा सदैव आनंददायी है। मध्ययुग में रूढि़वादिता और धर्मांधता के छाए घने अंधेरे के बीच शिवाजी ने मानव स्वतंत्रता का जो दीप जलाया था, वह आज भी प्रज्वलित है। हमें धीरज बंधता है कि देर है, अंधेर नहीं। सुहानी सुबह उजाला लाएगी और हम तन-मन से, बंधनमुक्त होंगे।
    आधुनिक युग को लें। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उद्घोष किया था—‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ उन्होंने शिवाजी जयंती पर बृहत् आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शिवाजी को, उचित ही, देश का महानायक कहा था।
    यह उपन्यास शिवाजी के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व की गाथा कहता है। कथा इतिहास पर आधरित है, इसे बयान करने में उपन्यासकार की कल्पना की उतनी ही भूमिका है, जितनी शुद्ध सोने में लगे टांके की, जो उसे गहने में ढालती है।
    उपन्यास पढ़ देखिए। रोचक कथा। गतिमय शैली।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-1)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1576

    Availability: In stock


  • Hindi Natya-Kavya : Punarmoolyankan
    Hukum Chand Rajpal
    95 86

    Item Code: #KGP-856

    Availability: In stock

    हिन्दी नाट्य-काव्य: पुनर्मूल्यांकन
    प्रस्तुत आलोचना-ग्रंथ में लेखक ने ‘अंधायुग’, ‘संशय की एक रात’, ‘एक कण्ठ विषपायी’ तथा ‘एक प्रश्न मृत्यु’ सरीखी कृतियों के रूपाकार-विधा की चर्चा सविस्तार की है। ऐसी रचनाओं को एक साथ प्रबंध-काव्य, नाटक, गीति नाट्य, पद्य नाटक, काव्य नाटक तथा नाट्य-काव्य आदि नामों से विवेचित-विश्लेषित करना विचित्र प्रतीत होता है। लेखक ने नाट्य-काव्य विधा की सैद्धान्तिक चर्चा करते हुए कविता और नाटक दोनों विधाओं के सुमेल पर आधारित इस नवीन एवं सार्थक विधा की प्रतिष्ठा करने का प्रयास किया है। उनका मानना है कि ऐसी रचनाएँ कोई स्थापित कवि ही कर सकता है, जिसे नाटकीय विधान की सही समझ हो। इसमें दोनों साहित्य-विधाओं की सम्यक् एवं सहज प्रस्तुति अपेक्षित है। यही कारण है कि धर्मवीर भारती को इस विशिष्ट विधा का प्रथम सफल रचनाकार स्वीकार किया गया है। लेखक की स्पष्ट धारणा है कि ऐसी कृतियाँ एक विशिष्ट मानसिकता पर आधारित होती हैं—इनकी रचना-प्रक्रिया के अनेक सोपान एवं पड़ाव होते हैं—काव्यात्मकता इसका मूलाधार है तथा नाटकीयता इसका बाह्य विधान। ये इसे अधिक ग्राह्य एवं प्रभावोत्पादक बनाते हैं। इस ग्रंथ में पहली बार नाट्य-काव्य, संश्लिष्ट नाट्य-काव्य (लम्बी कविता) और रंग-काव्य सरीखी रचनाओं के अन्तर्सम्बन्धों को सोदाहरण रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। अपनी धारणाओं-स्थापनाओं को प्रामाणिक-तार्किक आधार प्रदान करने हेतु शोध-प्रविधि के नियमों की सटीक प्रस्तुति के साथ ही इस विधा के सभी विद्वानों की चर्चा यथास्थान की गई है। लेखक की विशिष्टता इस बात में है कि वे स्थापित समीक्षकों के साथ ही नवोदित रचनाधर्मियों का उल्लेख एवं उन्हें महत्त्व प्रदान करने में उदार रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि इस ग्रंथ से इस विवादास्पद विधा को सही धरातल पर समझने का मार्ग प्रशस्त होगा। 
  • Arddhnaarishwar
    Vishnu Prabhakar
    495 446

    Item Code: #KGP-2002

    Availability: In stock

    अर्द्धनारीश्वर 
    'अर्द्धनारीश्वर ' व्यक्तिमन, समाजमन एवं अंतर्मन के विविध स्तरों पर नारी और नर थे इन्हीं के एकमएक सुर और स्वर-मिलन की प्राप्ति का प्रयास है यह उपन्यास । वही जाति-पाति और धर्म को समस्या, वही विवाह, तलाक, बलात्कार की समस्या, वही नारी-शोषण, उत्पीडन, वही टूटते-बिखरतें जीवन की कहानी, किन्तु मुक्ति के लिए 'कोई तो' की प्रतीक्षा नहीं है । यहीं लेखक ने समाधान के रूप में एक वृहत्तर रूपरेखा की सर्जना की है ।
    'अर्द्धनारीश्वर ' का अभिप्रेत नारी और नर की समान सहभागिता को प्राप्त करना है । इसके लिए जरूरी है, एक-दूसरे को अपनी-अपनी दुर्बलताओं व सबलताओं के साथ स्वीकार करना तथा मान लेना कि रचना के लिए प्रकृति व पुरुष का मिलन भी जरूरी है ।
    मूल समस्या तो पुरुष की है, उसके पौरुषिक अहम् की, जो उसे 'बेचारा' बना देती है । सहज तो इसे ही बनाना है । इसी की असहजता से स्त्री बहुत-से बंधन तोड़कर आगे निकल आई है । लेकिन बंधनहीन होकर किसी उच्छ्रंखल को रचना करना लेखक का अभिप्रेत नहीं है, बल्कि बंधनो की जकड़न को समाप्त कर प्रत्येक सुर को उसका यथोचित स्थान देकर जीवन-राग का निर्माण करना है । अजित के शब्दों में लेखक कहता है :
    "मैं सुमिता को अपनी दासता से मुक्त कर दूँगा । मैं उसकी दासता से मुक्त हो जाऊँगा। तभी हम सचमुच पति-पत्नी हो सकेंगे।"
    इसी स्वयं की दासता से मुक्ति का नाम है, 'अर्द्धनारीश्वर'।
  • Svadeshi Chikitsa Paddhati
    Om Prakash Sharma
    350 298

    Item Code: #KGP-531

    Availability: In stock

    स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति
    मनुष्य को परमेश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना माना गया है । किसी समय वह भी पूर्ण स्वस्थ और सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण रहा होगा, लेकिन आज स्थिति सर्वथा विपरीत है । आज पूरे विश्व में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसे कोई कष्ट न हो तथा जो शोक, सन्ताप और चिन्ता से मुक्त हो अथवा निराश न हो । इसका एकमात्र कारण है- प्रकृति की उपेक्षा ।  प्रकृति कभी अन्याय का पक्ष नहीं लेती । जो भी उसके नियमों को भंग करता है, वह उसे दपिडत करती है ।
    मनुष्य को हर प्रकार की व्याधि और रोग से मुक्त रहने का अधिकार प्राप्त है; लेकिन इसके लिए उसे प्रकृति के स्वभाव को समझना चाहिए । उसे अपने शरीर के स्वभाव के अनुकूल अपनी दिनचर्या का पालन करना चाहिए । बुहिमान् व्यक्ति वही होता है, जो किसी विपति में फंसने से पहले ही अपना बचाव कर ले । यदि फिर भी असावधानीवश अथवा किसी अन्य कारणवश वह बीमार हो जाये, तो प्रकृति-प्रदत्त पदार्थों के उपयोग से पुन : स्वस्थ व समान्य हो सकता है ।
    प्रकृति ने हमारे देश पर ऐसी कृपा की  है कि यहां अनेक प्रकार की उपयोगी ज़डी-बूटियां ( औषधियां) पैदा होती हैं, जो घर-घर में विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लायी जाती हैं ।
    आज साधारण व्यक्ति डॉक्टरों की ऊंची फीस व महंगी दवाओ का प्रयोग करने में असमर्थता अनुभव कर रहा है तथा अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव से ग्रसित है। तब स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति की उपयोगिता से कौन इनकार कर सकता है ? स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति के सहारे आप दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक वस्तुओ से नाना प्रकार के जटिल रोगों की अचूक चिकित्सा कर सकते हैं।
    'स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति' पुस्तक में प्रत्येक रोग के लिए अनेक अचूक इलाज बताये गये हैं, जिनकी सहायता से साधारण व्यक्ति भी कठिन से कठिन रोगों की चिकित्सा स्वय कर सकता है ।
    पुस्तक में रोगों के निदान और चिकित्सा के साथ ही उपयोगी योगासनों व प्राणायाम का भी समावेश किया गया है ।
  • Marxwadi Jeevan-Drishti Aur Rangey Raghav
    Madhuresh
    350 315

    Item Code: #KGP-700

    Availability: In stock

    श्री मधुरेश ने निःसंग मेध से रांगेय राघव के विषय में इस भ्रांति का भी निराकरण किया है कि रांगेय राघव ‘नस्लवादी’ थे। यह भयंकर आरोप डॉ. रामविलास शर्मा ने लगाया था। मधुरेश जी का यह मत मान्य है कि उस समय तक और आज तक, भारत के प्रागैतिहासिक युग (मोहन जोदड़ो) के विषय में निर्विवाद जानकारी उपलब्ध नहीं है और यह कि रांगेय राघव का ध्यान सर्वत्र ‘व्यवस्था’ पर केंद्रित रहता था और मानव शोषण और अत्याचार के विरोध पर तथा मानवतावादी प्रवाह की खोज पर। इसीलिए द्रविड़ों पर आर्य अत्याचार हो या मुसलमानों पर आंग्ल-आक्रमण हो, वह सर्वत्र हृदय से आक्रांत, शोषित, दमित के साथ रहते हैं और जालिमों का विरोध करते हैं, चाहे जुल्मी आर्य हो या अनार्य, यवन हो या ब्राह्मण, मुसलमान हो या कम्युनिस्ट। सर्वत्र राघव ने मानव-न्याय का परिचय दिया है। —डॉ. विश्वंभर नाथ उपाध्याय
    माकर्सवादी आलोचक के रूप में केवल मधुरेश ने उनके महत्त्व को रेखांकित किया, 1987 में जब उन्होंने साहित्य अकादेमी के लिए मोनोग्राफ लिखा ‘रांगेय राघव’। इस मोनोग्राफ में उन्होंने बाकायदे एक अध्याय लिखा ‘हिंदी की माकर्सवादी आलोचना और रांगेय राघव’। उनका मानना था कि ‘सन् ’45 से ’55 तक का काल हिंदी की माकर्सवादी आलोचना में प्रखर विवादों का काल रहा है और इन विवादों के आपसी अंतर्विरोध ही वस्तुतः हिंदी क्षेत्र में प्रगतिवादी आंदोलन के विघटन और माकर्सवादी आलोचना में भयंकर गतिरोध के कारण भी बने। यह दौर माकर्सवादी हिंदी आलोचना में ऐसी भयावह उग्रता और विनाशकारी उच्छेदवाद का दौर रहा है जिसमें अपने निकट वर्तमान में प्रगतिवादी साहित्य के निर्माण और विकास की संभावनाओं के प्रति पूरी तरह उदासीन रहकर बेहद गलत मुद्दों पर सारी बहस को केंद्रित कर दिया है।’
  • Jharkhand Ki Sanskritik Dharohar Saraikela Chhau
    Yogendra Prasad
    190 171

    Item Code: #KGP-398

    Availability: In stock

    झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर सरायकेला छऊ
    सरायकेला छऊ झारखंड की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है। इस नृत्य में मुखौटों का प्रयोग किया जाता है। इस नृत्य की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि बिना संवाद के ही नर्तक पूरी कथा समझा देते हैं। इसकी ताल और गति लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
    सरायकेला छऊ 1930 के दशक से ही कलाप्रेमियों के लिए जिज्ञासा और आकर्षण का केंद्र रहा है। चाहे कला संस्कृति से जुड़ी हस्ती हो, बुद्धिजीवी या फिर राजनीति से ताल्लुक रखने वाली शख्सियत–सभी इस छऊ नृत्य के कायल रहे हैं। इंदिरा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘इटरनल इंडिया’ में सरायकेला छऊ को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। सरायकेला राजपरिवार ने भी इस कला के संरक्षण और संवर्द्धन में अपनी विशेष भूमिका का निर्वाह किया है। इस अनमोल कला के महत्त्व को देखते हुए राज्य सरकार प्रत्येक वर्ष चैत्र पर्व के अवसर पर ‘छऊ महोत्सव’ का आयोजन करने लगी है।
    इस नृत्य ने अपने चारू प्रदर्शन से न सिर्फ देश के कोने-कोने में अपितु विदेशों में भी अपनी धाक जमाई है। 1938 में यहाँ के कलाकारों ने इंग्लैंड, इटली, फ्रांस आदि देशों में इस कला का प्रदर्शन किया और अब तो यह भारत सरकार के सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों का अभिन्न अंग बन चुकी है। इस कला से प्रभावित होकर विदेशों से भी लोग यहाँ प्रशिक्षण के लिए आते हैं।
    भारत सरकार ने भी इस कला का सम्मान किया है। अब तक इस नृत्य से जुड़े छह कलाकारों को ‘पद्मश्री’ से नवाजा जा चुका है। झारखंड की इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत के महत्त्व को देखते हुए सन् 2010 में यूनेस्को ने सरायकेला छऊ को ‘इंटेजिबल कल्चरल हैरिटेज’ की सूची में शामिल कर लिया है। झारखंड राज्य तथा भारतवर्ष की लोकसंस्कृति में सरायकेला छऊ नृत्य शैली गौरवमयी स्थान रखती है।                  
  • Rang Basanti
    Pratap Sehgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1913

    Availability: In stock

    रंग बसंत
    आजादी के आंदोलन के संभवत: ऐसे दो ही क्रांतिकारी महानायक है, जो सैक्टेरियन सोच से परे जाकर व्यापक स्तर पर सामाजिक एवं राजनीतिक विकास का स्वरूप सामने रखते है । किसी भी भारतीय से पूछिए, वह नेताजी सुभाषचंद्र बोस और भगतसिंह का नाम लेगा । प्रताप सहगल का ‘रंग बसंती' नाटक भगतसिंह के जीवन का आख्यान मात्र नहीं, बल्कि उसके समय को भी पूरी शक्ति एवं जीवंतता के साथ हमारे सामने रखता है । भगतसिंह अपने जीवनकाल में ही लीजेंड बन गया था । उसके क्रांतिकारी कृत्यों को तो बार-बार सामने लाया गया, लेकिन उसके समाजवादी चिंतन को हमेशा नेपथ्य में ही रखा गया । भगतसिंह न सिर्फ अपने एक्शन में, बल्कि अपनी सोच में भी एक रैडिकल व्यक्तिव के रूप में सामने आता है । प्रस्तुत नाटक भगतसिंह के इसी रूप को हमारे सामने रखता है ।
    नाटक का ढाँचा दृश्यों में बाँधा गया है, जो इसे बेहद लचीला बना देता है । मुक्ताकाशी रंगमंच हो या प्रेक्षागृह का मंच, शैली यथार्थवादी से या प्रतीकवादी- हर तरह से नाटक को खेलने की संभावनाएँ इसमें मौजूद हैं । बई बार मंचित होकर तथा साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख के रूप में समादृत हो चुका 'रंग बसंती' नए रंग में पाठकों के हाथ में देते हुए सार्थकता का ही अनुभव किया जा सकता है । वस्तुत: गंभीर रंग-कर्म करने वालों के लिए यह एक उपहार है ।
  • Manch Andhere Mein (Paperback)
    Narendra Mohan
    60

    Item Code: #KGP-1335

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Shivani Ka Katha Sahitya Yug-Parivesh-Sanskriti Ka Sandarbh
    Sushil Bala
    1100 990

    Item Code: #KGP-743

    Availability: In stock

    कोई भी सक्षम रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से युग-परिवेश-संस्कृति की विभिन्न व विशिष्ट छवियां निर्मित करता है। इन छवियों में उसकी वैचारिकी तथा भावसंपदा समाहित होती है। शिवानी के प्रचुर कथा साहित्य को पढ़ते हुए इस तथ्य का अनुभव शब्द-शब्द में किया जा सकता है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘शिवानी का कथा साहित्य: युग-परिवेश- संस्कृति का संदर्भ’ में सुशील बाला ने अत्यंत लोकप्रिय लेखिका शिवानी के कथा-संदर्भ रेखांकित किए हैं। शिवानी अपनी परिनिष्ठित अभिरुचियों के लिए जानी जाती हैं। विशद वैदुष्य की गरिमा से आलोकित उनकी रचना-शैली एक अलग मार्ग का अन्वेषण करती रही। वे भारतीयता को समझकर उसे व्यापक मानवता के हित में व्याख्यायित करती रहीं। सुशील बाला ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही लिखा है कि ‘वे क्षेत्रवाद, प्रांतवाद, जातिवाद, भाषावाद, सांप्रदायिकता जैसी देश को खंडित करने वाली नकारात्मक वृत्तियों का प्रबल विरोध कर सौहार्दपूर्ण वातावरण को उद्घाटित करती हैं।’ यह सच है कि शिवानी के कथा साहित्य में मानव मनोविज्ञान की उपस्थिति का विश्लेषण करते हुए उसमें सकारात्मक सोच के अनेक आयाम तलाशे जा सकते हैं। 
    चैदह अध्यायों में विभाजित प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका ने व्यवस्थित ढंग से शिवानी के व्यक्तित्व के नियामक तत्त्वों को रेखांकित करते हुए उनके रचना-परिवेश को उद्घाटित किया है। इसके पश्चात् उन्होंने शिवानी के कथा साहित्य (कहानी व उपन्यास) में पारिवारिक स्थिति, सामाजिक चेतना, नारी की स्थिति, राजनीतिक परिदृश्य, आर्थिक पक्ष, धर्मिक मान्यताएं और जीवन-दृष्टि, नैतिक मान्यताएं, कला साहित्य और ज्ञान-विज्ञान, प्राकृतिक परिवेश एवं भाषा का आलोचनात्मक अनुसंधन किया है। सुशील बाला के पास उपयुक्त भाषा है, जिस कारण पाठक तक उनका मंतव्य पहुंच जाता है। यह पुस्तक शिवानी पर केंद्रित आलोचनात्मक लेखन की नई संभावनाएं खोलती है। आज जब नए-नए संदर्भों में साहित्य का मूल्यांकन किया जा रहा है तब इस पुस्तक का विशेष महत्त्व है। यह निश्चित रूप से एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Anuvad Vigyan : Siddhant Evam Pravidhi (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    180

    Item Code: #KGP-230

    Availability: In stock

    अनुवाद विज्ञान : सिद्धांत एवं प्रविधि
    लंबे समय से अनुवाद पर एक ऐसी प्रामाणिक पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी जो सभी प्रकार के पाट्यक्रमों की ज़रूरत को तो पूरा करती ही हो, साथ ही शोधार्थियों, अनुवाद के शिक्षकों, प्राध्यापकों के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ अनुवाद कार्य से जुडे अनुवादकों तया अनुवाद व्यवसाय से जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए उपयोगी हो ।
    इस पुस्तक में अनुवाद विद्वान की समस्त प्रविधियों व सिद्धांतों का विवेचन-विशलेषण भी किया गया है तथा जुत्ताई, 2008 तक अनुवाद के क्षेत्र से हुए चिंतन एव शोधों को समाहित करते हुए इस अनुवाद पर अद्यतन एवं प्रामाणिक पुस्तक के रूप में तैयार किया गया है । इसलिए इसका पुराना नाम 'अनुवाद विज्ञान' न रखकर इसे अनुवाद विज्ञान : सिंद्धांत एवं प्रविधि' नाम दिया गया है, क्योंकि  यह पुस्तक नवीनतम उदभावनाओं व विचारों से युक्त है तथा  मेरे 30 वर्षों से भी अधिक के अनुवाद के अनुभवों को समेटे हुए है । मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफल होगी तथा विद्यार्थियों, प्राध्यापकों, अनुवादकों व अनुवाद के गंभीर अध्येताओं के लिए भी समान रूप से उपादेय सिद्ध होगी ।
    -डों० जयन्तीप्रसाद नौटियाल
    (संपादक)
  • Agale Saal December Mein
    Anat Ramesh
    50 45

    Item Code: #KGP-9101

    Availability: In stock


  • Poster
    Shanker Shesh
    120 108

    Item Code: #KGP-1897

    Availability: In stock


  • Ek Jala Huaa Ghar
    Iqbal Mazeed
    140 126

    Item Code: #KGP-1837

    Availability: In stock

    एक जला हुआ घर
    आज के पाठक को जिन चीज़ों को दुनिया में, अपने आसपास या अपने भीतर भी देखकर जो हैरत-सी होती है, यह उन्हीं हैरतों की कहानियाँ हैं।
    साहित्य को इनसान से, समाज से, जीवन से, संस्कृति और राजनीति से नए संबंध स्थापित करने पर प्रगतिशील आंदोलन ने जो ज़ोर दिया था यह उन्हीं संबंधों द्वारा जीवन के सौंदर्य, उसकी उठान और उभार को समझने का एक प्रयास है।
    कहानी का यथार्थ समाचार-पत्रों और अदालतों में प्रस्तुत किए गए यथार्थ से कैसे अलग होता है उसके लिए यह अंतर जानना, जो फिक्शन से जुड़ाव नहीं रखता, मुश्किल है। इसके अतिरिक्त कोई दावा करना या कहानियों से यह उम्मीद करना कि वह गलत होने वाली चीजों को ठीक कर देंगी, मूर्खता है; क्योंकि हर चीज़ साहित्य से ठीक नहीं की जा सकती। देखना यह होगा कि साहित्य, जिसका आधार Joy of understanding होता है, ये कहानियाँ अपने पाठक को वह आनंद कितना दे पाने में समर्थ हैं और इस काम में लेखक की ओर से डंडी तो नहीं मारी गई है। अगर इन कहानियों में उस सुंदरता और शक्ति की खोज मिल जाए, जिनको नए सांस्कृतिक मूल्यों में स्थान मिल सके तो यह लेखन सफल है।
  • Saarth
    Bhairppa
    400 360

    Item Code: #KGP-835

    Availability: In stock

    सार्थ
    सार्थ अर्थात् व्यापारियों का काफिला । नागभट्ट नामक एक वैदिक अपने राजा द्वारा एक सार्थ के साथ उच्च अध्ययन के लिए भेजा जाता है । कथा के वाचक नागभट्ट द्वारा आठवीं शती के भारत का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया गया है । उस समय वैदिक धर्म पतनोन्मुख था, भले ही शकरचार्य, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, भारती देवी आदि जैसी विभूतियां उसके प्रचार-प्रसार में लगी थीं। दूसरी ओर बौद्ध धर्म अपने उत्कर्ष पर था । उसके आचार्य धर्म-प्रचार के लिए स्तूपों, चैत्यों और विहारों के निर्माण में जुटे थे । साथ ही, योग साधना और तंत्र साधना में भी आकर्षण बना हुआ था । भारत के पूर्वी भाग में इस्लाम धर्म तलवार की नोक से अपने धर्म और संस्कृति की लकीर खींच रहा था। डॉ. भैरप्पा ने तत्कालीन समाज और धर्म का सजीव चित्रण अपनी पैनी लेखनी से अपनी विशिष्ट शैली में इस उपन्यास में किया है । संभवत: साधारण जन उस समय भी ऊहापोह की उसी स्थिति में था, जिसमें आज अपने को पा रहा है । इसी कारण पाठक इस उपन्यास को एक बार प्रारंभ करके छोड़ नहीं पाएगा, जब तक कि इसे समाप्त न कर ले ।

    डॉ. भैरप्पा की यह विशिष्ट ऐतिहासिक कृति 'सार्थ' अब आपके सन्मुख प्रस्तुत है ।
  • Naachane Vaalee Aankhen
    Vibha Devsare
    100 90

    Item Code: #KGP-981

    Availability: In stock

    तीन-चार घंटे की बस यात्रा के बाद गीता और रमेश संतू काका के गांव रायगढ़ पहुंच गए। चारों ओर हरे लहराते खेत, बड़े-बड़े छायादार पेड़ों की छांव और अमराइयों के बीच से गुजरते हुए गीता और रमेश को बहुत अच्छा लग रहा था। खपरैल और मिट्टी के बने छोटे घर, कुएं और तालाब। गांव का ऐसा दृश्य उन्होंने सिर्फ किताबों में पढ़ा था, या फिर सिनेमा में देखा था। लेकिन जब गीता और रमेश साक्षात् गांव के उस मनोहारी दृश्य से गुजर रहे थे तो उन्हें बहुत आनंद आ रहा था। संतू काका के घर पहुंचकर तो उन्हें बहुत मजा आया। संतू काका भी गीता और रमेश को आया देखकर बहुत प्रसन्न हुए। काकी और संतू काका ने गीता और रमेश की बहुत आवभगत की। संतू काका बोले, ‘‘देखो बच्चों, हमारा छोटा सा गांव है। शहर जैसी सुख-सुविधा तो यहां मिलेगी नहीं, लेकिन हम कोशिश यही करेंगे कि तुम लोग यहां खूब खुश रहो।’’
    —इस पुस्तक ‘किस्सा हबूचंद की सफाई का’ कहानी से

  • Qalandar
    Narendra Mohan
    25 23

    Item Code: #KGP-9102

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    100

    Item Code: #KGP-7196

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    हरिशंकर परसाई

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित दिवंगत कथाकारों की कहानियों के चयन के लिए उनके कथा-साहित्य के प्रतिनिधि एवं अधिकारी विद्वानों तथा मर्मज्ञों को संपादन-प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया है। यह हर्ष का विषय है कि उन्होंने अपने प्रिय कथाकार की दस प्रतिनिधि कहानियों को चुनने का दायित्व गंभीरता से निबाहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Malviya Ji Ke Sapnon Ka Bharat
    Ishwar Prasad Verma
    395 356

    Item Code: #KGP-612

    Availability: In stock

    मैं मनुष्यता का पुजारी हूं। मनष्यत्व के आगे मैं जात-पांत नहीं जानता। कानपुर में जो दंगा हुआ, उसके लिए हिंदू या मुसलमान इनमें से एक ही जाति जवाबदेह नहीं है। जवाबदेही दोनोंजातियों पर समान है। मेरा आपसे आग्रहपूर्वक कहना है कि ऐसी प्रतिज्ञा कीजिए, अब भविष्य में अपने भाइयों से ऐसा युद्ध नहीं करेंगे, वृद्ध, बालक और स्त्रियों पर हाथ नहीं छोड़ेंगे। मंदिर अथवा मस्जिद नष्ट करने से धर्म की श्रेष्ठता नहीं बढ़ती। ऐसे दुष्कर्मों से परमेश्वर प्रसन्न नहीं होता। आज आप लोगों ने आपस में लड़कर जो अत्याचार किए हैं, उसका जवाब आपको ईश्वर के सामने देना होगा। हिंदू और मुसलमान इन दोनों में जब तक प्रेम-भाव नहीं उत्पन्न होगा, तब तक किसी का भी कल्याण नहीं होगा। एक-दूसरे के अपराध भूल जाइए और एक-दूसरे को क्षमा कीजिए। एक-दूसरे के प्रति सद्भाव और विश्वास बढ़ाइए। गरीबों की सेवा कीजिए, उनको प्रेम से आलिंगन कीजिए और अपने कृत्यों का पश्चात्ताप कीजिए। 
  • Mere Saakshatkaar : Shiv Murti
    Shivmurti
    380 342

    Item Code: #KGP-745

    Availability: In stock


  • Is Daur Mein Hamsafar
    Amar Goswami
    350 315

    Item Code: #KGP-1999

    Availability: In stock

    इस दौर में हमसफ़र
    अमर गोस्वामी उन थोड़े से कथाकारों में से है जिनकी कहानियों पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते है कि यह कहानी अमर गोस्वामी ही लिख सकते थे । आज के दौर में जबकि रचनाएँ ही नहीँ, लेखक भी एक-दूसरे की 'जेरोक्स कापियों' से तबदील हो रहे है, अमर गोस्वामी की यह पहचान और कूवत-या कहिए कि रचनात्मक सामर्थ्य काबिलेगौर है । इस सामर्थ्य के बूते ही अपनी लंबी कथा-यात्रा से कभी रचना पर उनका विश्वास डिगा नहीं और वे उन हड़बडिए लेखकों की पाँत में शामिल नहीं हुए, जो सिर्फ चर्चित होने के लिए लिखते है और अपने आसपास की हर चीज, हर संबंध को 'कैश' कर लेते के लिए उतावले दिखते है ।
    इन बातों की ओर ध्यान दिलाना इसलिए जरूरी लगा क्योंकि  अमर गोस्वामी का पहला उपन्यास ‘इस दौर में हमसफ़र' उनकी इस लंबी और धीरज-भरी यात्रा का ही स्वाभाविक फ़ल है-और  अमर जी का पहला उपन्यास होते हुए भी, गंभीर चर्चा और विश्लेषण की माँग करता है। ऊपर से देखने पर 'इस दौर में हमसफ़र' भले ही प्रेमचंदीय वर्णनात्पक शैली में लिखा उपन्यास नजर आए, पर थोडा भीतर उतरते ही समझ में आ जाता है फि यह सिर्फ एक उपन्यास ही नहीं, हमारे दौर की एक गहरी और स्तब्ध कर देने वाली 'एक्स-रे पड़ताल' भी है । यह दीगर बात है कि यह लिखा गया है इतनी जानदार भाषा और पुरलुत्फ अंदाज में कि जब तक आप इसे खत्म नहीं कर लेते, यह आपको चैन  नहीं लेने देता । बल्कि उपन्यास खत्म होने के बाद भी लंबे अरसे तक पाठकों का 'हमसफ़र' बना रहता है ।
    इसकी वजह शायद यह है कि एक उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी नई कथा-प्रविधियों के दास नहीं है और उन्हें उथले रूप से जैसे-तैसे जहाँ-तहाँ टाँक लेने को हरगिज पसंद नहीं करते । उनके यहाँ जो कुछ है, वह अपने ठेठ मौलिक अंदाज में है और अमर गोस्वामी का निहायत अपना है । इसीलिए वे बगैर दिखावटी स्त्री-विमर्श के शोर-शराबे के, अनन्या के रूप से हमें एक ऐसी विलक्षण और शक्तिशाली स्त्री से मिलवाते हैं जो अपनी बेबनाव शख्सियत से अति आधुनिक ही नहीं, 'नई पीढी की नई नारी’ लगती है, जिसकी धमक आगे आने वाले युगों में और ज्यादा साफ सुनी जा सकेगी । अनन्या के मित्र और सहयात्री के
    रूप में अनिरुद्ध बागची का 'विचलन' या हार, सिर्फ उसी की हार नहीं, आधुनिकता के उन तमाम नकली प्रत्ययों की हार भी है जो आधुनिकता को सिर्फ 'देह-भोग के सुख' तक सीमित कर देना चाहते हैं । अनन्या  के माई मधुसूदन के चेहरे में मुझे तो जगह-जगह स्वयं अमर गोस्वामी का दर्द से तिलपिलाता चेहरा नजर आया । यह दीगर बात है कि मधुसूदन की कहानी अपनी है, और वह अमर जी की नहीं, अपनी ही राह पर आगे बढ़ता दिखाई देता है ।
    ‘इस दौर में हमसफ़र' में आधुनिकता की 'विकृत' और 'रचनात्मक' दोनों ही शक्लें है और अपने पुरे विश्वसनीय रूप से है । इस लिहाज से यह एक ऐसा उपन्यास भी है जिसे कई किस्म के 'कंफ्यूज़न' और मतिभ्रम-भरे आज के समाज से सही दिशा की ओर  इशारा करने वाली एक पहल के रूप में भी देखा जा सकता है । हाँ, यह जरूर है कि अमर गोस्वामी कहीं-कहीं ज्यादा खुल गए है और जहाँ सिर्फ इशारों से काम चल सकता था, वहाँ भी 'रस' लेते नजर आते है । शायद महानगरीय समाज के 'रंगीन विकारों, की ओर ध्यानाकर्षण की यह उनकी अपनी शैली हो ।
    उपन्यास के अंत में मधुसूदन और हेमंती ही नहीं, शर्वाणी की चोट झेलकर अंतत: फिर से सागरिका की ओर मुड़ा शांतनु जिस नए समाज की नींव रखना चाहता है, उसमें मूल्यों के उपहास वाली 'मजावादी' दुष्टि नहीं, बल्कि विडंबनाओं को पहचानकर उनके  बीच से रास्ता खोजती 'मनुष्य की जय-यात्रा' का अगला पडाव नजर आ सकता है ।
    'इस दौर से हमसफ़र' में बेहद तीव्र गति और हलचल है तो विचारों का तेज संघर्ष भी । लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि ये तेज बहसें दिल्ली से मीरजापुर और चुनार तक फैली उपन्यास की प्रदीर्घ कथा का एक सहज हिस्सा बनकर आती हैं । दिल्ली जैसे महानगरों की बनिस्बत छोटे शहरों, कस्बों में अब भी इंसानी संवेदना और आर्द्रता कैसे बनी हुई है, इसकी परख उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी जगह-जगह करवाते हैं । कोई हैरत की बात नहीं कि इसी कोशिश में वे डॉ० प्रशांत सिन्हा जैसे बड़े कद के इंसान से हमें रू-ब-रू होने का मौका देते हैं, जिनके आगे सारी महानगरीय भभ्भड़ और चमक-दमक फीकी लगती है ।
    अलबता अमर गोस्वामी 'इस दौर में हमसफ़र' को एक उपन्यास के साथ-साथ सहज ही बहुरंगी छवियों और गतियों वाले हमारे दौर का 'एक विशद समाजशास्त्रीय अध्ययन' भी बना सके-यह एक बडी सफलता है । अपने पहले ही उपन्यास से अमर गोस्वामी आज के महत्वपूर्ण रचनाकारों की पाँत में आ गए हैं, यह बात उनकी रचनात्मक सामर्थ्य के प्रति मन में 'आश्वस्ति' के साथ-साथ आदर भी पैदा करती है ।
  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal (Paperback)
    Indira Mishra
    180

    Item Code: #KGP-410

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
    --राजेश जैन
  • Naye Sire Se
    Govind Mishra
    195 176

    Item Code: #KGP-723

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Devendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    200 180

    Item Code: #KGP-548

    Availability: In stock


  • Anaam Yatraayen
    Ashok Jairath
    300 270

    Item Code: #KGP-237

    Availability: In stock

    जीवन एक सफर और हमें निरंतर इस सफर में चलते रहना है । जो चलता रहा, वह जीता रहा और जो बैठ गया, सो बैठ गया । अकसर लोग यात्राओं से घबराते है । कई कारण हैं -आर्थिक अभाव साथ की कमी या वैसे ही मन नहीं करता, आलस्य में स्चा-बसा मन बस आराम करना चाहता है । हमारा शरीर 'हड्ड हराम' हैं, वह आराम चाहता है, पर जितना ही इसे माँजा जाए, उतना ही यह निखरता है ।
    हिमालयी श्रृंखलाएं, हिममंडित शिखर व्यक्ति को बार-बार बुलाते हैं । इनके ऊपर गूंजते संगीत के स्वर और लोककाथाएं आत्मविभोर कर देती हैं और इनके अजस्र जलस्रोत जहां नैसर्गिक परिवेश को जन्म देते है, वहीं पर थके हुए मन और शरीर को संबल देते है ।
    लेखक ने पश्चिमी हिमालयी सांस्कृतिक क्षेत्र व अनेक हिमानियों के साथ-साथ दूसरे दुर्गम इलाकों की साहसिक यात्राएं की हैं, जिनका विशद विवरण इस पुस्तक के रूप में पाठकों को सौंपा जा रहा है । ये यात्राएं कूमाऊं-गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय एव सांस्कृतिक क्षेत्रों से ही संबंधित हैं, मात्र द्वारकापुरी की यात्रा को छोड़कर । यात्राओं का निरंतर सिलसिला लेखक के अलमोड़ा में प्रवास के दौरान शुरू हुआ, जब सारे उत्तरांचल के साथ हिमानियों को भी ट्रेक किया गया, जहाँ हिमालियाई संस्कृति को बहुत करीब से देखकर स्वयं लेखक हिमालियाई हो आया था ।
    इन ब्योरों के साथ ही उन सभी साथियों-सहयोगियों और मार्गदर्शक का सीधा-सहज और बिना किसी लाग-लपेट के वर्णन भी दिया जा रहा है, जो इन संस्मरणों को और भी मनोरंजक और दिलचस्प बना देता है । आशा है, ये सभी संस्मरण/यात्राओं का वर्णन पाठकों को अच्छा लगेगा ।
  • Bharat Ke Pramukh Sahityakaron Se Antrang Baatcheet
    Ranvir Rangra
    450 405

    Item Code: #KGP-234

    Availability: In stock

    भारत के प्रमुख साहित्यकारों से अन्तरंग बातचीत
    किताबघर प्रकाशन श्रेष्ठ भारतीय साहित्य के आदान-प्रदान से भी सक्रिय रहा है । भारतीयता और भारतीय साहित्य की अंतर्धारा को समझने के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपनी भाषा की सीमारेखाओं से बाहर भी झाँकें । प्रमुख भारतीय साहित्यकारों को एक मंच पर लाने की दिशा में हमारा पहला अभिनव प्रयोग था 'भारतीय लेखिकाओं से साक्षात्कार' । प्रस्तुत प्रकाशन उसी की अगली कड़ी है जिससे भारत के पच्चीस साहित्यकारों से इस विधा के विशेषज्ञ डॉ० रणवीर रांग्रा की अन्तरंग बातचीत सम्मितित है, जिसके माध्यम से अनेक ऐसे रचना-रहस्य प्रकाश में आए हैं जिनसे अब तक हिंदी-जगत ही नहीं, भारतीय साहित्य-समाज भी अनभिज्ञ था ।
    इस प्रकार, यह पुस्तक मात्र एक और प्रकाशन नहीं, बल्कि एक दस्तावेज से जिसका उपयोग भारतीय साहित्य के संदर्भ-ग्रंथ के रूप में भी किया जा सकता है । आशा हैं, इससे प्रबुद्ध पाठको की अनेक जिज्ञासाओं का समाधान हो सकेगा और उन्हें एक ऐसी अंतर्दूष्टि प्राप्त होगी जिससे समकालीन भारतीय साहित्य की आत्मा तक पहुंचने में सहायता मिलेगी ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh (Paperback)
    Mohan Rakesh
    90

    Item Code: #KGP-1359

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मोहन राकेश
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकु' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aadhi Chutti Ka Itihas
    Raj Kumar Gautam
    140 126

    Item Code: #KGP-1844

    Availability: In stock

    आधी छुट्टी का इतिहास
    हिंदी के चर्चित कथाकार राजकुमार गौतम की कहानियाँ समकालीन जीवन-स्थितियों  का गहरी इमानदारी से  उकेरती हैं । शहरी और  कस्बाई निम्न-मध्यवर्ग उनकी कहानियों में विशेष रूप से चित्रिन हुआ है, जो न तो किताबी है और न आयातित, बल्कि ठेठ हिंदुस्तानी हैं । यही कारण है कि राजकुमार गौतम की प्राय प्रत्येक कहानी किसी भी साहित्यिक वाद-विवाद से परे सामाजिक यथार्थ के विभिन्न स्तरों की खरी पहचान कराने में समर्थ है ।
    आधी छुट्टी का इतिहास में राजकुमार गौतम की एक दर्जन कहानियाँ संगृहीत हैं । इनसे गुजरते हुए लगया कि इनका प्रत्येक कथा-चरित्र हमारे एकदम नजदीक है या शायद हमारा ही प्रतिरूप  है। इतना ही नहीं, इनमें उन निर्जीव  वस्तुओं को भी जुबान मिली है, जो हमारी रोज  की बुनियादी जरूरतों को पूरा करती  हैं और इसी बिंदु पर ये कहानियाँ मनुष्य की अभावग्रस्त जिंदगी, यातना और उसकी जिजीविषा को मार्मिक ढंग से उजागर करती  ।
    टुटे-अधटूटे पारिवारिक रिश्तों और दायित्वों का बोझ ढोते, घर-दफ्तर के बीच चक्कार काटते तथा छोटी-छोटी इच्छाओं, खुशियों और उम्मीदों की पूर्ति के  लिए दिन- दिन  कितने ही चरित्र इन कहानियों में हैं, जो हमने बोलना-बतियाना चाहते  हैं, ताकि अपने जीवन पर पड़ते विभिन्न दबावों के प्रतिरोध की ताकत बटोर और सौंप  सकें । संक्षेप में, अपने सामाजिक परिवेश, उसके यथार्थ और अपनी लडाई के निजी मोर्चों की पहचान के लिए इन कहानियों को लंबे समय तक याद किया जाएगा ।
  • Mohabbat Ka Per
    Priya Anand
    100 90

    Item Code: #KGP-1841

    Availability: In stock

    मोहब्बत का पेड़
    वैसे तो संग्रह की सभी कहानियां प्रेम-कथाएँ ही है, मगर 'मोहब्बत का पेड़' कहानी कई प्रेम-कथाओँ को जीवित कर देती है । इस कहानी में स्त्री का विद्रोही स्वर है, जो मोहब्बत की वकालत करता है और सामंती व्यवस्था को कटघरे में खडा करने की कोशिश करता है । यहाँ गौर करने वाली बात सिर्फ यह है कि जहाँ इस कहानी का अंत होता है, वहीं से एक नई कहानी की शुरुआत होती है । नारी के संघर्ष और यातना की कहानी । यह कहानी प्रिया आनंद की कहानियों का प्रस्थान बिंदु हो सकती है ।...
  • Boo Toon Raaji
    Padma Sachdev
    150 135

    Item Code: #KGP-60

    Availability: In stock

    बू तूँ राजी
    मैं मूलत: कवयित्री हूँ । जो बात कविता से बहुत बडी हो जाती है, वह कहानी बनकर मेरे हाथों में छोटे बच्चे की तरह कुलबुलाने लगती है । कहानी की यह मेरी दूसरी किताब है । कभी-कभी लिखती हूँ कहानियाँ, वह भी उस वक्त, जब कहानियों के पात्र मेरे आँचल का कोना पकडे-पकडे मेरी गरदन तक आकर मुझे दाब लेते है । और ये पात्र जब मेरे जीवन का हिस्सा हो जाते हैं तब में लफ्जों के दोने में इन्हें फूलों की तरह सजाकर अपने पाठकों की झोली में डाल देती हूँ फिर वे इसका हार बनाएँ, फूलों को मंदिर के आगे सजाएँ या अपनी आँखों की पतली काजल की लकीर से पिरोकर अपने गले में डालें-ये उनकी खुशी है । मेरी कहानियों के पात्र मेरे घर के सदस्यों की तरह हो जाते हैं । मैं चाहती हूँ, आप भी इन्हें अपनी बैठक में बैठने का स्वान दें ।
  • Kavi Ne Kaha : Vinod Kumar Shukla (Paperback)
    Vinod Kumar Shukla
    90

    Item Code: #KGP-7024

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विनोद कुमार शुक्ल
    यद्यपि कविताओं का चयन मैंने किया है, पर इसका आधार स्पष्ट नहीं है कि इन चुनी हुई कविताओं को बाकी कविताओं में मिला दूं और इन्हें फिर से पूरा चुन लूं । दुबारा चुनते समय कुछ कविताएं जरूर बदल जाएंगी । कूल सत्तावन, इतनी कविताएं हैं । कोई कविता वैसे पूरी नहीं होती पर उसके लिखने का अंत है । कुछ लिखना बचा हुआ प्रत्येक कविता के अंत के साथ रहता है । लिखने के इस छूटे रहने के साथ कविता पूरी होती है । प्रत्येक कविता का लिखना बचा हुआ, अभिव्यक्ति का बचा हुआ भी होता है जो पाठक की समझ से पूरा होता है । एक रचना की पूर्ति अलग-अलग पाठकों में अलग-अलग होती है । मैं दूसरों की कविता पढ़ने के बाद अपने लिए इसी तरह उसमें जगह पाता हूं। इस जगह मैं भटकता हूं। जहाँ पहुंचना था वहां पहुंच गए ऐसा कभी नहीं होता, परंतु भटकने की जगह जानी-पहचानी जरूर हो जाती है । भटकने की जगह का जाना-पहनाना हो जाना अच्छा लगता है, इसलिए भटकना भी । कविता मेरे लिए दुनियादारी है, और लिखना भी ।

  • Shishu Seekhen Achchhi Baaten-1
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1116

    Availability: In stock


  • Utho Annapoorna Saath Chalen
    Usha Mahajan
    100 90

    Item Code: #KGP-9127

    Availability: In stock

    दांपत्य दो समान व्यक्तियों एकीकरण का नाम है। दंपति का संधिविच्छेद करें तो बनता है दम् (घर) $ पति। अर्थात् दोनों ही घर के बराबर के पति हैं। लेकिन कितनी समानता है हमारे समाज में आज भी पति और पत्नी के स्तर में? किस प्रवृत्ति का प्रतीक है सत्तर के दशक से दहेज-हत्याएं कही जाने वाली शादीशुदा औरतों की अप्राकृतिक मौतों का दौर? क्या कारण हैं हिंदू समाज में दांपत्य-संबंधों में बढ़ती दरारों के? जिस समाज मंे स्त्री के लिए पति परमेश्वर के समान माना जाता है, वहीं दिल्ली-मद्रास जैसे महानगरों में डेढ़ से दो हजार कुंवारी लड़कियां हर माह डाॅक्टरों से गर्भपात करवाती हैं, सगे पिता अपनी मासूम बेटियों का यौन-शोषण करते हैं। सेक्स विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों से मिलंे, तो वे बताते हैं कि पहले पुरुषों के ही अवैध संबंध हुआ करते थे, पर अब औरतें भी उनके मुकाबले में विवाहेत्तर और विवाह-पूर्व संबंध रख रही हैं। अदालतों में जाकर देखें तो अनगिनत दंपति एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते, गाली-गलौज करते और यहां तक कि जूते-चप्पल चलाते भी आपको मिल जाएंगे।
  • Jama Poonji
    Dronvir Kohli
    160 144

    Item Code: #KGP-1830

    Availability: In stock

    जसा-पूँजी
    हिंदी के प्रख्यात उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली के इस-प्रथम एवं एकमात्र कहानी-संग्रह 'जमा-पूँजी' की कहानियों को पढ़ते हुए लेखक की कथा-वर्णनात्मकता, भाषा-अनुशासन, संयम तथा इनमें पिरोई गई मार्मिक अनुभूतियों से सहज ही प्रभावित हुआ जा सकता है । अपने सामान्य मगर ठोस कथानकों के चलते पाठक इनकी प्रथम पंक्ति से ही बंध एवं बिंध जाता है तथा लेखक धीरे-धीरे कथा की परवरिश करते हुए उसे ऐसा विश्वसनीय बना देता है मानो यह अपने पाठक से एकमेक होकर विचार-विनिमय का रहा हो। पठनीयता को ऐंठकर, रोचक बनाने की चाह या पाठक को कथा के माध्यम से 'पट्टी पढाने' की अपेक्षा इस लेखक में नहीं पाई जाती है ।
    यद्यपि विभिन्न परिवेशों, पात्रों एवं परिस्थितियों के रंगों से कहानी की तस्वीर उकेरना इस कथाकार को आता है तथापि उनके अधिकांश पात्र उस वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते है जो अपनी अत्यंत सीमित दुनिया में अभावों-तले बिजबिजा रहे हैं, जहाँ दाना-पानी का जुगाड़ किसी मन्नत मांगने से कम नहीं, और जहाँ आर्थिक विषमताएं-विपदाएँ रक्त-संबंधों को भी प्रदूषित कर देती है । शोक, हास-विनोद और विषाद की अनबोली स्थितियों को ज़बान देना भी इस कहानीकार को खूब आता है ।
    विगत कुछ दशकों में ज़ब-तब लिखी गई ये कहानियों हमें निम्न-मध्यवर्गिय समाज के जिजीविषारत उस समय में भी ले जाती हैं जब अँगीठियों का धुआँ हमारे महानगरीय जीवन की कड़वाहट को तिक्त कर देता था और चिंताएँ अठन्नी-चवन्नी की हुआ करती थीं । इस प्रकार ये कहानियाँ अपने समय का कोरस हैं तथा हमारे विगत का स्वाभाविक सामाजिक चित्रण भी ।
    अपने समय, समाज और मनुष्य की संपूर्ण संघर्षमयी  जिजीविषा से सन्नद्ध ये कहानियाँ हमारा अपना भूत, वर्तमान और निश्चित ही भावी भी है । हिंदी कहानी की परिपाटी को जानने का अवसर भी इन कहानियों से मौजूद है ।
  • Kashmir : Raat Ke Baad (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    80

    Item Code: #KGP-7027

    Availability: In stock

    कश्मीर : रात के बाद
    हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर का कश्मीर से पुराना और गहरा लगाव रहा है । 'कश्मीर : रात के बाद' में लेखक के इस पुराने और गहरे कश्मीरी लगाव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । एक गल्पकार की नक्काशी, एक पत्रकार की निर्भीकता, एक चेतस इतिहास-द्रष्टा की पैनी नज़र तथा इन सबके मूल में जन सामान्य से प्रतिश्रुत मानवीय सरोकारों से लैस यह यात्रा-वृत्तांत लेखक कमलेश्वर का एक और अप्रतिम योगदान है ।
    'कशमीर : रात के बाद' संभवत: हिंदी में पहला ऐसा मानक प्रयास भी है जो कैमरा और कलम को एक साथ इस अंदाज़ से प्रस्तुत करता है ताकि दोनों की अस्मिता पूर्णतः मुक्त भी रहे । शायद इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा-रिपोर्ताज में कश्मीर के बर्फीले तूफानों और चट्टानों के खिसकी का शाब्दिक 'रोमांच' मात्र नहीं है बल्कि यहाँ है-इतिहास और धर्म (युद्ध) को अपनी एकल परिभाषा देने के मंसूबों को तर्क  और विवेक के बल पर ध्वस्त कर सको की सहमतिजन्य प्रतिभा । कशमीर की राजनीति में, बल्कि कहे कि अराजक 'अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिज्' में यह लेखक मात्र पत्रकार का तटस्थ और निष्फल बाना धारण करके प्रवेश नहीं करता बल्कि वह एक ऐसे सच्चे और खरे इंसान के रूप में हस्तक्षेप करता है जो भारतीयता को जानता है और कश्मीरियत को पहचानता है । वह प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य-पाशा में बँधा, प्रकृति के अप्रत्याशित रौद्र रूप को, जान की बाजी लगाकर देखता है, तो वह आतंकवादियों के विष-की ठिकानों को भी अपने कलम और कैमरे के माध्यम से उदघाटित करता है । वास्तव में यही साहस इस यात्रा-वृतांत को अविस्मरणीयता सौंपता है ।
    इस पुस्तक में कश्मीर की कुछ खंडित यात्राएँ भी हैं जिनमें जन सामान्य के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को शब्द-दर-शब्द पढ़ा  और महसूस किया जा सकता है । परवर्ती यात्रा के रूप में कमलेश्वर ने सुलगते कश्मीर की उस झुलसन को शब्द दिए है, जिसे तमाम तकनीकी विकास के बाबजूद कैमरा पकड नहीं पाता । यह किताब मुद्रित शब्द और कैमरे के आधुनिक युग की सामर्थ्य  और सीमा का भी संभवत: अनुपम दस्तावेज साबित होगी ।
  • Sahitya Vivechan
    Jayanti Prasad Nautiyal
    100 90

    Item Code: #KGP-1266

    Availability: In stock


  • Raag Viraag
    Shree Lal Shukla
    150 135

    Item Code: #KGP-42

    Availability: In stock


  • Keral Ka Krantikari (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    40

    Item Code: #KGP-1122

    Availability: In stock


  • Svadeshi Chikitsa Paddhati (Paperback)
    Om Prakash Sharma
    160

    Item Code: #KGP-7072

    Availability: In stock

    स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति
    मनुष्य को परमेश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना माना गया है । किसी समय वह भी पूर्ण स्वस्थ और सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण रहा होगा, लेकिन आज स्थिति सर्वथा विपरीत है । आज पूरे विश्व में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसे कोई कष्ट न हो तथा जो शोक, सन्ताप और चिन्ता से मुक्त हो अथवा निराश न हो । इसका एकमात्र कारण है- प्रकृति की उपेक्षा ।  प्रकृति कभी अन्याय का पक्ष नहीं लेती । जो भी उसके नियमों को भंग करता है, वह उसे दपिडत करती है ।
    मनुष्य को हर प्रकार की व्याधि और रोग से मुक्त रहने का अधिकार प्राप्त है; लेकिन इसके लिए उसे प्रकृति के स्वभाव को समझना चाहिए । उसे अपने शरीर के स्वभाव के अनुकूल अपनी दिनचर्या का पालन करना चाहिए । बुहिमान् व्यक्ति वही होता है, जो किसी विपति में फंसने से पहले ही अपना बचाव कर ले । यदि फिर भी असावधानीवश अथवा किसी अन्य कारणवश वह बीमार हो जाये, तो प्रकृति-प्रदत्त पदार्थों के उपयोग से पुन : स्वस्थ व समान्य हो सकता है ।
    प्रकृति ने हमारे देश पर ऐसी कृपा की  है कि यहां अनेक प्रकार की उपयोगी ज़डी-बूटियां ( औषधियां) पैदा होती हैं, जो घर-घर में विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लायी जाती हैं ।
    आज साधारण व्यक्ति डॉक्टरों की ऊंची फीस व महंगी दवाओ का प्रयोग करने में असमर्थता अनुभव कर रहा है तथा अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव से ग्रसित है। तब स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति की उपयोगिता से कौन इनकार कर सकता है ? स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति के सहारे आप दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक वस्तुओ से नाना प्रकार के जटिल रोगों की अचूक चिकित्सा कर सकते हैं।
    'स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति' पुस्तक में प्रत्येक रोग के लिए अनेक अचूक इलाज बताये गये हैं, जिनकी सहायता से साधारण व्यक्ति भी कठिन से कठिन रोगों की चिकित्सा स्वय कर सकता है ।
    पुस्तक में रोगों के निदान और चिकित्सा के साथ ही उपयोगी योगासनों व प्राणायाम का भी समावेश किया गया है ।
  • Indradhanush
    Vinod Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-992

    Availability: In stock

    सभ्यता के आदिकाल से ही बच्चे नानी या दादी से कहानियां सुनते आए हैं। छापेखाने के आविष्कार के बाद कहानियां पढ़ी जाने लगीं। इससे पहले कहानियां सिर्फ सुनी जाती थीं। टेलीविजन और सिनेता के जन्म के बाद तो वे देखी भी जाने लगीं। कहानी सुनने में अधिक मजा आता है या पढ़ने में या फिी देखने में; इसका फैसला तो आप स्वयं ही कीजिए। लेकिन एक बात तो निश्चित है कि कहानी पढ़ना सबसे अधिक सुविधाजनक है। दरअसल कहानी सुनने के लिए आपको दादी या नानी पर निर्भर रहना पड़ता है और देखने के लिए टी.वी. सेट पर। आप कहोगे कि यों तो पढ़ने के लिए भी पुस्तक पर निर्भर रहना पड़ता है। आपकी बात में दम तो है मगर, अगर दादी या नानी का स्वास्थ्य या मूड ठीक नहीं है तो आप तो गए काम से। और फिर उन्हें कितनी कहानियां याद रह सकती हैं? इसकी भी एक सीमा है और टी.वी. सेट तो टी.वी. सेट ठहरा। रुकावट के लिए खेद प्रकट कर देगा तो आप क्या कर लेंगे? और अगर बिजली गुल हो जाए तो? यही नहीं, अगर पिताजी खबरें सुन रहे हैं तो क्या होगा? और अगर आप किसी ऐसे गांव या हिल स्टेशन या गेस्ट हाउस में हों जहां टी.वी. में सभी या किसी एक चैनल के प्रोग्राम नहीं देखे जा सकते तो हो गया बंटाधार। और फिर टी.वी. के कार्यक्रमों की भी एक सीमा तो है ही। यों भी आजकल दूरदर्शन अधिसंख्य प्रोग्राम अमरीका, इंगलैंड या जर्मनी के ही दिखता है। मगर कहानियां तो हर देश में सुनी, पढ़ी या देखी जाती हैं।
    स्पष्ट है कि कहानी पढ़ना अधिक सुविधाजनक है। और फिर पुस्तकों में संचित ज्ञान की कोई सीमा भी नहीं है।
    —विनोद शर्मा
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Arora (Paperback)
    Sudha Arora
    180

    Item Code: #KGP-420

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सुधा अरोड़ा 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा अरोड़ा  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महानगर की मैथिली', 'सात सौ का कोट', 'दमनचक्र', 'दहलीज पर संवाद', 'रहोगी तुम वहीं', 'बिरादरी बाहर', 'जानकीनामा', 'यह रास्ता उसी अस्पताल को जाता है', ‘कांसे का गिलास' तथा 'कांच के इधर-उधर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सुधा अरोड़ा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Sharat Ka Katha Sahitya
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    595 536

    Item Code: #KGP-889

    Availability: In stock

    बाँग्ला के अमर कथाशिल्पी शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में पढ़े जाने वाले शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनके कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में भी हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उसके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की। सम्भवतः वह अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फिल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी। ‘देवदास’, ‘चरित्रहीन’ और ‘श्रीकान्त’ के साथ तो यह बारम्बार घटित हुआ है। 
    अपने विपुल लेखन के माध्यम से शरत् बाबू ने मनुष्य को उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित ‘परम्पराओं’ को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की बिलख-चीख और आर्तनाद को उन्होंने परखा तथा गहरे पैठकर यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। इस षड्यन्त्र के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक ‘आम सहमति’ पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों-करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्रण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। 
    हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। हमारा प्रयास रहेगा कि किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और प्रकाश्य शरत्-साहित्य को सर्वांग तथा सर्वश्रेष्ठ होने का प्रमाणपत्र आप जैसे सुधी
  • Sitaron Ke Sanket
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1970

    Availability: In stock

    अमृता प्रीतम द्वारा समय-समय पर देखे हुए सपनों की जो व्याख्याएँ प्रसिद्ध स्वप्न विज्ञानवेत्ता एवं ज्योतिषाचार्य श्री राज ने अमृता जी भेंटवार्त्ता के दौरान की थीं, उन्हीं का लेखा-जोखा प्रस्तुत पुस्तक 'सितारों के संकेत’ में दर्ज है। सितारों के हिसाब से और ग्रहचाल की गणनानुसार अमृता जी के सपनों 'से मम्बन्धित जन्म-कुंडलियाँ भी पुस्तक में अंकित हैं जिनमें आचार्य राज का विशाल ज्योतिष-ज्ञान उजागर होता है। अमृताजी ने आचार्य जी के साथ हुई समस्त भेंटवार्त्ताओं को अपनी चिर-परिचित भाषा-शैली में औपन्यासिक गति से लेखनीबद्ध किया है।
    भक्ति योग, साधना योग, ज्ञान योग और कर्म योग की व्याख्या में उतरते हुए आचार्य राज, सितारों के संकेत देखकर जो कहते रहे, अमृता प्रीतम की कलम से उसी का ब्योरा यह पुस्तक है। 
    साथ ही जन्म-जन्म के गाथा को भी कुछ पहचानने की कोशिश है । पूर्व जन्म को कुण्डली से भी जो संकेत मिलते हैं, वे किस तरह एक आधार-शिला बनते है, इस गहराई को लिए हुए यह पुस्तक अनंत शक्तियों के दर्शन में उतरती है।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    185 167

    Item Code: #KGP-2080

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार निर्मल वर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दहलीज', 'लवर्स', 'जलती झाड़ी', 'लंदन की एक रात', 'उनके कमरे'', 'डेढ़ इंच ऊपर', 'पिता और प्रेम', 'वीकएंड', जिंदगी यहाँ और वहाँ' तथा 'आदमी और लड़की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक निर्मल वर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Vish Vansh (Paperback)
    Rajesh Jain
    25

    Item Code: #KGP-1503

    Availability: In stock

    विष वंश
    कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।
    हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार राजेश जैन के इस प्रस्तुत नाटक 'विष वंश' में राजा की यह कथा हमारे आसपास के भ्रष्टाचार के जिस गहन सचिंतन से नंगा करती है, उसमें प्रतिपक्ष के लिए कोई अवकाश नहीं है । राजा अटपटसिंह और महामंत्री चंटप्रताप सिंह के माध्यम से तंत्र के भ्रष्टीकरण को, आज की नारी की अस्मिता क्या राजनीति में पनप राही वंशवाद को प्रवृति के साथ जोड़कर नाटककार ने इस नाट्यकथा को समकालीन समय का एक टकसाली पाठ बना दिया है । प्रजातंत्र ये प्रजा ही सर्वाधिक शक्तिशाली और सत्ताधीश हो-अत्यंत रोचक ढंग का यह सत्यान्वेषण इस नाटक के सुलझी हुई पहेली है ।
    छठे 'आर्य स्मृति साहित्य समान' के निर्णायक मंडल- राम गोपाल बजाज, कन्हैयालाल नंदन तथा असग़र वजाहत जैसे नाट्यविदों के मूल्यांकन के आधार पर सम्मानित इस नाट्यकृति का प्रकाशन, नाटकों की दुनिया में एक सदाबहार खुशबू का आह्वान है, ऐसा विश्वास है ।
  • Khoyi Huyi Dishaayen
    Kamleshwar
    120 108

    Item Code: #KGP-9060

    Availability: In stock


  • Soochana Ka Adhikaar (Paperback)
    Vishv Nath Gupta
    70

    Item Code: #KGP-1438

    Availability: In stock


  • Prachin Kavya Sudha (Paperback)
    Pushp Pal Singh
    30

    Item Code: #KGP-1287

    Availability: In stock


  • Gyarah Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    300 270

    Item Code: #KGP-9322

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ ठाकुर विश्व साहित्य में एक विशिष्ट पहचान रखने वाले कालजयी रचनाकार हैं। अभिव्यक्ति की अनेक विधओं में उन्होंने नवीन प्रस्थान निर्मित किए। भाषा, शैली, विचार और दर्शन को मानवता के विराट प्रांगण में अभिमंत्रित आमंत्रित किया। प्रस्तुत पुस्तक ग्यारह लघु नाटक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की अपूर्व प्रतिभा का प्रकाश एक नए शिल्प में देखा जा सकता है। सुप्रसिद्ध नाट्य लेखक और रंगमनीषी प्रताप सहगल ने ठाकुर की ग्यारह कहानियों को चुनकर उन्हें नाट्य रूप प्रदान किया है। उनके शब्दों में, ‘‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियों में 1940 से पहले के बंगाल का जीवन धडकता है। ...जब इन ग्यारह कहानियों को मैंने चुना तो स्पष्ट रूप से यह बात मन में काम कर रही थी कि मैं इन्हें नाट्य रूप में ऐसे प्रस्तुत करूं कि इनका मूल भाव एवं मूल परिवेश क्षरित हुए बिना ये हमारे समय में भी प्रासंगिक बनी रहें।’’
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ये सभी कहानियां बहुत प्रसिद्ध  हैं। कहना तो यह भी उचित होगा कि अनेक रचनाकारों ने इनके छाया-अर्थ से स्वयं को समृद्ध किया है। एक रात, काबुलीवाला, पोस्टमास्टर, क्षुधित पाषाण और समाप्ति आदि कहानियों के नाट्य रूपांतर से पाठकों और रंगकर्मियों को कुछ सार्थक विकल्प मिलेंगे। प्रताप सहगल ने कहानियों में निहित नाट्य स्थितियों और रंग- संभावनाओं को समझते हुए रूपांतर को समृद्ध किया है।
    पाठकों के लिए तो इन रूपांतरित रचनाओं से गुज़रना एक विलक्षण अनुभव है ही, उन लोगों को भी आनंद की अनुभूति होगी जो मंचन के लिए सुरुचिपूर्ण नाट्यालेखों की खोज में रहते हैं। एक तरह से प्रताप सहगल ने सार्थक नाट्यालेखों की संख्या में वृद्धि की है। यह करते समय उन्होंने मूल संवेदना को अक्षत रखा है। ‘ग्यारह लघु नाटक’ एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Paryavarneeya Pradushan
    Vishnu Dutt Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-111

    Availability: In stock

    पर्यावरणीय प्रदूषण
    बीसवीं शताब्दी के आरंभ से ही विज्ञान तथा टेक्नोलाॅजी ने मानव को प्राकृतिक स्रोतों के उपयोग के लिए अधिक संख्या में अपूर्व शक्ति के साधन उपलब्ध कराए हैं। इन साधनों के निरंतर उपयोग ने पर्यावरण में परिवर्तन कर दिया है। टेक्नोलाॅजी के बेलगाम प्रसारण तथा विकास ने परिस्थितिविज्ञान के संतुलन को खराब कर दिया। वे बड़े-बड़े उद्योग, जो हमें समृद्ध बनाते हैं, बोनस के रूप में हमें प्रदूषण देते हैं। किंतु हम अपने उद्योगधंधे तो बंद नहीं कर सकते। अतः आवश्यकता इस बात की है कि औद्योगिक व्यर्थों का समुचित उपचार करके या तो उसका पुनः उपयोग किया जाए अथवा सर्वथा अहानिकर बना दिया जाए।
    जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गई, मनुष्य का कार्यक्षेत्र भी बढ़ता गया और उसके साथ-साथ प्रदूषण भी बढ़ता गया। यह एक गंभीर समस्या है किंतु औद्योगिक क्रांति के बाद प्रदूषण अत्यधिक तेज हो गया। आज प्रदूषण इस सीमा तक पहुंच गया है कि सूर्य की प्रखर विकिरणों से हमारी रक्षा करने वाली ओजोन परत भी झीनी हो रही है, फलस्वरूप इस कवच में सूराख हो चुका है जो संपूर्ण प्राणी जगत् को न केवल विलुप्तिकरण की ओर ले जाएगा अपितु प्रलय का स्पष्ट संकेत देता है। अतः व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से मनुष्य अपने अस्तित्व के प्रत्येक खण के लिए स्वयं ही उत्तरदायी है।
    डाॅ. विष्णुदत्त शर्मा की कृति ‘पर्यावरणीय प्रदूषण’ समय की आवश्यकता के अनुरूप है तथा एक गंभीर समस्या की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। इसमें पर्यावरणीय प्रदूषण के कारणों, कारकों तथा तत्जनित समस्याओं के विषय में प्रकाश डाला गया है। सचित्र एवं सरल भाषा में लिखी यह पुस्तक प्रदूषण की समस्या को समझने और उसके समाधान में कार्यरत वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, उत्पादकों, जनस्वास्थ्य अधिकारियों, विधायकों तथा उद्योगपतियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। 
  • Kissa Maujpur Ka
    Jaivardhan
    160 144

    Item Code: #KGP-1819

    Availability: In stock

    'किस्सा मौजपुर का' नाटक को वर्ष 2012 के दस श्रेष्ठ नाटकों में से एक श्रेष्ठ नाटक चुना गया । 'भारतेंदु नाट्य उत्सव' के अंतर्गत 23 मार्च, 2013 को इसका पुनः जोरदार प्रदर्शन हुआ । नाटक देखकर लेखक और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रेवती सरन शर्मा ने कहा था कि इस विषय पर कोई नाटक ऐसे भी लिखा जा सकता है, कम से कम मैं नहीं सोच सकता ।
  • Grih Daah
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-753

    Availability: In stock


  • Khushboo Udhaar Le Aye
    Upendra Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-1902

    Availability: In stock

    खुशबू उधार ले आए
    उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लों का 'हिन्दीपन' एक ओर 'उर्दू' की फारसीयत से अलगाता है तो दूसरी ओर गजल के व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य को सबल बनाता है, जिसका अनुकरण पाकिस्तान के ग़ज़लकार भी करते है । डॉ० शेरजंग गर्ग ने ठीक ही कहा है कि उपेन्द्र की कहन में वैविध्य है जो उन्हें बहुत-से ग़ज़लकारों से सर्वथा अलग का देता है । 
    -डॉ० गंगाप्रसाद विमल
    हबीब जालिब की तरह उपेन्द्र कुमार भी व्यवस्था से लड़ते और कारावास में डाले गए इंसान की वेदना को शिद्दत से महसूस करते है :
    वो कैदी चुप था लेकिन गुनगुनाया
    बजी जंजीर की जब इक कड़ी थी
    उपेन्द्र के पास शे'र कहने का सलीका भी है और कल्पना को इस्तेमाल करने का फन भी । 
    -ज्ञानप्रकाश विवेक
    उपेन्द्र के पास शायद किसी चालाक अनुभवी कवि का शिल्प-कौशल नहीँ है, यह अच्छी बात है अन्यथा उनकी रचनाओं में कथ्य की प्रमुखता नहीं रह पाती । अनगढ़ यथार्थ का विशाल भंडार परोसती उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लें पाठकों को अपने आसपास को सतर्कता से देखने को मजबूर करेंगी, ऐसा विश्वास है ।
    - विजय किशोर मानव
    न तो उपेन्द्र जी उर्दू ग़ज़ल की रिवायतों की रौ में बहे है और ना ही उन्होंने अपनी ग़ज़लों पर हिन्दी का ‘कवितापन हावी होने दिया है । उनकी ग़ज़लों की बुनावट और उनकी प्रकृति गीतों से अलग है । इसीलिए उनमें गजलियत की मौजूदगी का अहसास बना रहता है । सोजो-साज़ (वेदना और संगीतात्मकता) हूँ तो कविता मात्र के आधार तत्त्व माने जाते है, मगर इनके बरौर तो ग़ज़ल का काम ही नहीं चल सकता । ग़ज़ल में रोमानिया की चाशनी भी ज़रूरी है । उपेन्द्र जी ने ग़ज़ल की इन खूबियों को न केवल समझा है, बल्कि इनसे अपनी ग़ज़लों को बखूबी सँवारा भी है ।
    - बालस्वरूप राही
  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 297

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Hausale Buland Hain (Paperback)
    Suraj Nagar
    100

    Item Code: #KGP-372

    Availability: In stock

    संसार में जो कुछ भी अनूठे, अद्वितीय, अविस्मरणीय, अतुलनीय एवं अद्भुत काम हुए हैं, वे चाहे किसी भी क्षेत्र में क्यों न हों, जैसे- स्थापत्यकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, साहित्य-सृजन हो या कोई वैज्ञानिक आविष्कार, सब बुलंद हौसले का परिणाम है। हौसले की उड़ान से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, हर सपना साकार होता है। हौसले बुलंद होना जीवन में प्रसन्नता का सूर्योदय होने जैसा है और हौसले पस्त होना सूर्यास्त होने जैसा है। बचपन से ही मेरे मन में कविताओं की ऐसी पुस्तक लिखने की इच्छा थी, जो निराशा को आशा में बदल दे। गम के काँटों में खुशियों के फूल खिला दे। अमावस की काली रात को दीपावली की तरह जगमगा दे। देश के प्रतिष्ठित किताबघर प्रकाशन, दिल्ली ने मेरे गीतों को पुस्तक का आकार दिया है। जिसका नाम है-‘हौसले बुलंद हैं’।
    ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक के सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय गीतों को साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डा. अलका तोमर ने अपनी अनूठी शैली में अंग्रेजी भाषा में रूपांतरित कर सार्वदेशिक बनाकर चार चाँद नहीं चालीस चाँद लगा दिए हैं। नई ऊर्जा, नया जोश, नई उमंग का संचार करने वाली इस पुस्तक के पहले गीत की रचना मंदोदरी का मायका, कालिदास द्वारा रचित मेघदूत में वर्णित दशपुर, शिवना तट पर स्थित पशुपतिनाथ की नगरी मंदसोर में हुई। रचना का यह क्रम क्षिप्रा तट स्थित ज्योतिर्लिंग मृत्युंजय महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल, झारखंड की राजधानी राँची देश की राजधानी दिल्ली, शंकर के त्रिशूल पर बसी अविनाशी काशी, त्रिवेणी संगम प्रयागराज, यमुना तट स्थित मथुरा गोवर्धन, देवी अहल्या की नगरी इंदौर, नर्मदा तट स्थित ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर, सागर तट स्थित मायानगरी मुंबई से चलकर ऐतिहासिक एवं पुरातत्त्व संपदा से भरपूर सूर्य पुत्री ताप्ती तट स्थित बुरहानपुर में पूर्ण हुआ।
    ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक प्रेरणा का पथ पराक्रम का रथ प्रसन्नता की गंगा है। इस पुस्तक की रचना में मुझे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरणा, सहयोग एवं मार्गदर्शन देने वाले सभी बुलंद हौसले वालों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक पढ़ने वालों के हौसले अवश्य बुलंद होंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।
    -सूरज नागर
  • Yatrayen
    Himanshu Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-1928

    Availability: In stock

    यात्राएँ
    कहानियों, उपन्यासों की तरह हिमांशु जोशी के यात्रा-वृत्तांतों  की भी अपनी विशेषता है। पढ़ते-पढ़ते पाठक को कहीं लगने लगता है कि इन यात्राओं में लेखक के साथ-साथ वह भी यात्रा कर रहा है । लेखक जिस तरह से इन सबको देख रहा है, जिस तरह की अनुभूति उसे हो रही है, कुछ-कुछ वैसी ही उसे भी होने लगती है । सरलता, सहजता, स्वाभाविकता हिमांशु जोशी की रचनाओं के सहज, स्वाभाविक गुण हैं । संभवत: ये ही मूल गुण किसी रचना को जीवंत बनाने में सफल होते है ।
    इन यात्राओं से कश्मीर के बर्फीले दुर्गम सीमा-क्षेत्र शामिल हैं तो पूर्व में बाँग्लादेश और भारत को विभाजित करती सुदूर हरित वंगा या इच्छामती के कूल-कगार भी । कहीं कन्याकुमारी तथा केरल की मनोरम हरित दुश्यावलियाँ हैं तो कुमाऊँ के पर्वतीय प्रदेश की अनेक अज्ञात, अछूती मनोरम झाँकियाँ भी। मॉरिशस का नीलवर्णी निर्मल स्वच्छ सागर है कहीं तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश की हिमशीतल सफेद हवाएँ भी अपने अस्तित्व का अहसास जताने लगती है । हिमांशु जोशी संभवत: वह हिंदी के पहले लेखक है, जिन्होंने विश्वविख्यात नाटककार हैनरिक इब्सन के घर सीयन की साहित्यिक यात्रा की थी । उसी तरह नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नार्वेजियन लेखक सीगरी उनसत तथा ब्यौर्नसन के घरों की तीर्थयात्राएँ भी।
    ये यात्रा-विवरण मात्र यात्रा के विवरण ही नहीं, कहीं इनमें  इतिहास भी है, भूगोल के साथ-साथ साहित्य भी । कला एवं संस्कृति की मार्मिक छुअन भी। इसीलिए ये वृतांत कहीं  दस्तावेज भी बन गए हैँ-जीए हुए अतीत के। पाठको को इनसे एक संपूर्ण जीवन का अहसास होने लगता है। एक साथ वह बहुत कुछ ग्रहण करने में सफल होता है-शायद यह भी इन वृत्तात्तों की एक सबसे बडी सफलता है ।
  • Qissa Maujpur Ka (Paperback)
    Jaivardhan
    80

    Item Code: #KGP-1378

    Availability: In stock

    'किस्सा मौजपुर का' नाटक को वर्ष 2012 के दस श्रेष्ठ नाटकों में से एक श्रेष्ठ नाटक चुना गया । 'भारतेंदु नाट्य उत्सव' के अंतर्गत 23 मार्च, 2013 को इसका पुनः जोरदार प्रदर्शन हुआ । नाटक देखकर लेखक और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रेवती सरन शर्मा ने कहा था कि इस विषय पर कोई नाटक ऐसे भी लिखा जा सकता है, काम से काम मैं नहीं सोच सकता । 
  • Dekho Samjho Karo
    Jagat Ram Arya
    160 144

    Item Code: #KGP-105

    Availability: In stock

    बालकों, अपने चारों ओर की दुनिया को देखो। इसमें भगवान ने हजारों वस्तुएं बनाई हैं-हवा, पानी, सूर्य, पृथ्वी, अग्नि आदि। इनमें से हर एक में सैकड़ों-हजारों शक्तियां भरी पड़ी हैं जिनमें से कुछ एक को हम-तुम जानते हैं। कइयों को हम बिलकुल नहीं जानते। कुछेक को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। अपनी दुनिया के बारे में यह हमारा अधूरा ज्ञान है। इसीलिए हम उन शक्तियों से लाभ नहीं उठा पाते। जैसे किसी निर्धन की खाट के नीचे धरती में सोने-चांदी का खजाना दबा हो, किंतु जिसका उसे पता न हो और वह भूखा नंगा रहकर दिन-रात दुख सहता हो। काश, वह उस छिपे खजाने को जान पाता और उसका प्रयोग करके सुखी बन जाता। इसी प्रकार अपने आसपास की वस्तुओं के बारे में भी हम बहुत कम जानते हें। ओर उसका कम लाभ उठाते हें। उनका पूरा लाभ हम तभी उठा सकते हैं जब उनहें अच्छी तरह जान लें। इस प्रकार वस्तुओं के ‘विशेष ज्ञान’ को ही विद्या कहते हैं।
    आज हम मोटर, हवाई जहाज, राकेट आदि के अजब अनोखे आविष्कार देखते हैं, जो विज्ञान के सहारे ही बनाए गए। बड़े-बड़े आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक भी हमारे-तुम्हारे जैसे दो हाथ, दो पांव वाले मनुष्य होते हैं। उनमें केवल तीन विशेष गुण होते हैं। वे हर वस्तु को ध्यान से देखते हैं, गहराई से समझते हैं और हाथ से करके देखते हैं। यदि हम भी विज्ञान पढ़ना चाहते हैं तो हमें भी इनहीं तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए-
    1. हम अपने प्रयोग की वस्तुओं को ध्यान से देखें।
    2. हम वस्तुओं में छिपी शक्तियों और गुणों को समझें।
    3. हम उन वस्तुओं के नित्य नए प्रयोग करना सीखें।
    इस पुस्तक में वैज्ञानिकों की सच्ची और रोचक घटनाओं के आधार पर विज्ञान के इन्हीं तीन अंगों पर बल दिया गया है। इनका प्रयोग हर बालक अपने घर और विद्यालय में कर सकता है। 
    —लेखक
  • Bhinsaar
    Gyanendrapati
    160 144

    Item Code: #KGP-1882

    Availability: In stock

    भिनसार
    'भिनसार' समकालीन कविता-परिदृश्य में अपनी तरह के अकेले कवि ज्ञानेन्द्रपति का अनूठा संकलन है । इससे कवि की बहुचर्चित कृतियाँ 'आँख हाथ बनते हुए' और 'शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है' तो सम्पूर्णता  शामिल हैं ही, अब तक आसंकलित-और अनेक तो अप्रकाशित-रही आयी कविताएँ भी पुस्तकाकार आ रही है । एक सघन बसा कविता-संसार पाठकों की यायावरी को आमंत्रित कर रहा है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की इन कविताओं से एक ओर तो तीव्र परिवर्तनकामिता से उपजा क्रान्तिकारी रोमान है, वर्ग- शत्रुओं को ललकारता युयुत्सु उदूघोष; तो दूसरी ओर सामाजिक आत्मालोचन का वह विरल स्वर है जो अपनी आत्मा को खराद पर चढाये बगैर नहीं उठता, अपने नैतिक विवेक के आगे वेध्य बने रहने पर ही जिसका स्फुटन संभव हो पाता है । यहीं, चेतना पारीक और बनानी बनर्जी से होने वाली अविस्मरणीय मुलाकातें हैं । रात से लगी भोर में भटक आया चमगादड़ का बच्चा भी इस कविता-दुनिया का बाशिन्दा है । परित्यक्त चीजें भी यहाँ निरर्थक नही, उनमें नये अर्थ अँखुआते है ।
    दरअस्ल, ज्ञानेन्द्रपति को पढ़ना बनते हुए इतिहास के बीच से गुजरना ही नहीं, युग के कोलाहल के भीतर से छन कर आते उस मन्द्र स्वर को सुनना है इतिहासों से जिसकी सुनवाई नहीं होती; यह नश्वरताओं की भाषा से शाश्वत का द्युति-लेख पढ़ना है । इसीलिए यहाँ एक तरह की अनगढ़ता काव्य-सौष्ठव की अविधि ठहरती है । उच्च-भ्रू आलोचकों की पर्वा किये बगैर यह मनुष्य की ओर बढा हुआ समव्ययी हाथ है ।
    ये वे कविताएँ हैं जिनकी जीवनधर्मिता अबूझ ढंग से मानवीय जिजीविषा को पुष्ट करती है ।
  • Chune Huye Nibandh
    Hazari Prasad Dwivedi
    195 176

    Item Code: #KGP-850

    Availability: In stock


  • Tabdeel Nigahein
    Maitreyi Pushpa
    240 216

    Item Code: #KGP-396

    Availability: In stock

    तबदील निगाहें
    किसी भी व्यक्ति, विषय या कृति के संबंध में जो सिद्धांत, मान्यताएं और अवधारणाएं, वर्षों या सदियों पहले सही मान ली गई थीं, जरूरी नहीं कि हर युग में उनको उसी रूप में स्वीकार किया जाए। समय और परिस्थितियों से उपजे सवाल, उसे अपने मानकों पर कसते हैं। हालांकि सच यह भी है कि साहित्य और समाज में वर्षों से चली आ रही मान्यताओं और प्रतिमानों को खंडित करने का साहस यदा-कदा ही किया जाता है, क्योंकि बहुजन के दबाव और विरोध को सहकर अपनी बात कहने से प्रायः बुद्धिजीवी लोग बचने में ही अपनी भलाई समझते हैं। बावजूद इसके कुछ रचनाकार अपवाद रहे हैं।
    सच को पूरे साहस से कहने वाली रचनाकारों में सम्मिलित मैत्रेयी पुष्पा ने इस पुस्तक के संकलित लेखों में कुछ ऐसा ही प्रयास किया है। ‘उसने कहा था’, ‘गोदान’, ‘चित्रालेखा’, ‘धु्रवस्वामिनी’, ‘त्यागपत्र’, ‘मैला आंचल’ और ‘राग दरबारी’ जैसी अपने समय की कालजयी रचनाओं को बिलकुल अलग निगाह से देखतीं और उसके स्त्री-पात्रों के मन में सोए पड़े सवालों को उघाड़कर उन्होंने एक नई बहस को आधार प्रदान किया है। इन कृतियों के संदर्भ में लेखिका द्वारा उठाए गए सवाल, न केवल पढ़ने वाले को बेचैन कर सकते हैं बल्कि इन्हें नए तरह से तबदील निगाहों के जरिए पुनर्मूल्यांकित करने की मांग भी करते हैं। 
    कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके और कुछ अवसरों पर दिए गए इन वक्तव्यों में मैत्रेयी पुष्पा के भीतर की आलोचकीय दृष्टि भी सघन रूप से प्रकट हुई है। बनी-बनाई धारणाओं और अपनी कूपमंडूकता में आनंदित रहने वाले आलोचकों के लिए यह पुस्तक एक सबक की तरह हो सकती है।
    –विज्ञान भूषण
  • Aadarsh Saamaanya Hindi (Paperback)
    Vijay Agarwal
    40

    Item Code: #KGP-7105

    Availability: In stock


  • Kyon Tanaavgrast Hai Shiksha-Vyavastha
    Jagmohan Singh Rajput
    250 225

    Item Code: #KGP-218

    Availability: In stock


  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta
    Dr. Kripa Shanker Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-162

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Rang-Saakshatkaar
    Jai Dev Taneja
    650 585

    Item Code: #KGP-817

    Availability: In stock


  • Doobte Waqt (Paperback)
    Dixit Dankauri
    75

    Item Code: #KGP-7053

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।
    -मोईन अख्तर अंसारी
  • Jangli-Mangli
    Chang Tain-Pi
    180 162

    Item Code: #KGP-409

    Availability: In stock

    1963 में मैंने चांग तइन-यी के बाल-उपन्यास ‘करामाती कद्दू’ का रूपांतर किया था, जो धारावाहिक रूप से ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुआ।
    चांग तइन-यी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह बहुत ही सरल और रोचक ढंग से कहानी कहते हैं, जो मनोरंजक होने के साथ उपदेशपरक ही नहीं, कलात्मक ढंग से अच्छा रास्ता दिखाती है।
    ‘करामाती कद्दू’ की लोकप्रियता देखकर ही मैंने 1967 में लेखक की एक और रचना ‘जंगली-मंगली’ शीर्षक से रूपांतकर किया है। पाठकों की सुविधा के लिए मैंने कहानी के पात्रों और वातावरण को भारतीय रूप देना उचित समझा।
    चांग तइन-यी का जन्म 1906 में हुआ था। पच्चीस वर्ष की अवस्था में उन्होंने यह कहानी लिखी थी। निर्धनता के कारण उन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी। निर्वाह के लिए उन्होंने तरह-तरह की नौकरियां कीं। कभी-कभी दफ्तर में क्लर्की तो कभी अध्यापन। संघर्ष करते हुए भी उन्होंने लिखना सारी रखा और कई पुस्तकों की रचना की। चांग तइन-यी की बालोपयोगी और किशोरापेयोगी रचनाएं विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
    —द्रोणवीर कोहली
  • Vish-Beej
    Suryakant Nagar
    75 68

    Item Code: #KGP-1936

    Availability: In stock


  • Kosh Vigyan (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    150

    Item Code: #KGP-7076

    Availability: In stock


  • Gareeb Mahilayen Udhar Evam Rozgaar
    Indira Mishra
    250 225

    Item Code: #KGP-37

    Availability: In stock

    भारत में गरीबी की समस्या प्रबल है और गरीबी की मार महिलाओं पर अधिक सीधी और तीखी होती है, क्योंकि महिलाएं परिवार के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार ठहराई जाती हैं। वे मातृत्व का भार वहन करते हुए शरीर से दुर्बल होती हैं, यद्यपि उनमें भावनात्मक इच्छाशक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। गरीबी को दूर करने के लिए केंद्रीय तथा प्रदेश सरकारें, स्वायत्त संस्थाएं तथा अन्य कई प्रकार की एजेंसियां कटिबद्ध हैं, किंतु यह समस्या अभी तक कारगर ढंग से सुलझाई नहीं जा सकी। गरीब तथा ग्रामीण महिलाएं अक्सर अचल संपत्ति-विहीन और शिक्षा के लाभ से वंचित होती हैं। फिर भी उनके अंदर रचनात्मकता तो होती ही है तथा अपनी मदद स्वयं करने के लिए भी वे सतत उत्सुक होती हैं।
    ऐसी महिलाओं की, जो स्वयं की छोटी सी दूकान खोलना या कोई अन्य छोटा-मोटा रोजगार करना चाहती हैं, कर्जे की आवश्यकता बहुत ज्यादा नहीं होती। दूसरी आजमाई हुई बात यह है कि महिला उतना ही ऋण लेना पसंद करती है जितने को किस्तों में लौटा भी सके। किंतु इस सबके बावजूद कोई भी वित्तीय संस्था एकाएक उसे कोई ऋण देने की स्थिति में नहीं होती।
    प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे विषय सामान्य नागरिकों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा बैंककर्मियों आदि के समक्ष स्पष्ट किए गए हैं।
  • Parda Beparda
    Yogendra Dutt Sharma
    180 162

    Item Code: #KGP-1561

    Availability: In stock

    पर्दा-बेपर्दा
    कहाँ है सभ्यता ? किधर है प्रगति ? कैसा है विकास ? इतिहास की लंबी यात्रा करने के बाद भी हम मानसिक रूप से शायद अब भी वहीं के वहीं हैं जहाँ से शुरू हुई थी हमारी यात्रा। सच पूछें, तो हम आज भी किसी आदिम अवस्था में ही जी रहे हैं। क्या सभ्यता का कोई विकास-क्रम हमारी बर्बरता को मिटा पाया है ?
    विश्व-मंच पर ही नहीं, देशीय परिवेश में भी सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित होने का हमारा दंभ निरर्थक और खोखला ही सिद्ध होता है।
    योगेन्द्र दत्त शर्मा की ये कहानियाँ बताती हैं कि कैसे हम आज अनेक विपरीत धु्रवों पर एक साथ जी रहे हैं। कहना ज़रूरी है कि ‘पर्दा-बेपर्दा’ की ये कहानियाँ फैशनपरस्त कहानियों की दुनिया से अलग मानवीय संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी सार्थक रचनाएँ हैं जो लंबे समय तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगी।
  • Devtaon Ki Ghaati
    Dronvir Kohli
    60 54

    Item Code: #KGP-1919

    Availability: In stock

    परीक्षा की घड़ी
    कोई-कोई यही बडी मनहूस होती है । ऐसी ही एक घडी आई थी हिमाचल की 'देवताओं की घाटी' में, जब वहीं के सीधे-सादे, भाले-भाले, निरीह प्राणियों पर, सचमुच, मुसीबत के पहाड़ टूटे थे।
    यह डरावनी वेला भुलाए नहीं भूलेगी इस घाटी के लोगों को । और दुनिया भी याद करेगी कि इन असहाय लोगों ने कितने धीरज से इतनी बड़ी विपदा का सामना किया ।
    बड़े जीवट के लोग है 'देवताओं की घाटी' के निवासी ।
    'देवताओं की घाटी' और उस घाटी में आई उस भयंकर विपति से जूझने का यह अद्भुत सच्चा वृत्तांत मैंने  बालय-बालिकाओं के लिए विशेष रूप से लिखा है ।
    -द्रोणवीर कोहली

  • Mere Saakshatkaar : Ramdarash Mishra
    Ramdarash Mishra
    275 248

    Item Code: #KGP-217

    Availability: In stock


  • Vichaar-Bindu (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    190

    Item Code: #KGP-456

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।
    -अटल बिहारी वाजपेयी
  • Karmveer Pt. Sunderlal : Kuch Sansmaran
    Sudhir Vidyarthi
    125 113

    Item Code: #KGP-1964

    Availability: In stock


  • Samrat Chandragupta Mourya
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-257

    Availability: In stock


  • Doobte Waqt
    Dixit Dankauri
    150 135

    Item Code: #KGP-1901

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।

  • Vaigyanik Pura Kathayen
    Dr. Rajiv Ranjan Upadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-236

    Availability: In stock

    वैज्ञानिक पुरा कथाएँ
    भारत में विज्ञान के विकास के इस युग में पुराकालीन विज्ञान कथाओं पर विज्ञानसम्मत दृष्टि से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि अनेक कथाओं में भविष्यद्रष्टा ऋषियों की दृष्टि में रचा-बसा विज्ञान प्रत्यक्ष दिखाई देता है। इस संग्रह की विमान संबंधित त्रिपुर: अंतरिक्ष में तीन नगर, मनचालित विमान: सौभ, हिरण्यनगर नामक कथाएँ इनके पुराकालीन अस्तित्व की साक्षी हैं।
    भारत का आयुर्विज्ञान कितना विकसित था, सर्जरी कितनी विकसित थी, इसके प्रभाव चरक संहिता और सुश्रुत संहिता तथा आयुर्वेद संबंधित अन्य ग्रंथों में उपलब्ध हैं। संजीवनी, महर्षि भृगु का चमत्कार, महर्षि च्यवन, विशल्या, अश्विद्वय, गणेश, महर्षि दध्यङ तथा उपमन्यु नामक कथाएँ हमारे पुराकालीन आयुर्वेदीय ज्ञान की परिचायक हैं।
    बुढ़ापा एवं मृत्यु का भय मनुष्य को सदैव से सताता रहा है। दीर्घ और अमर जीवन तथा सदैव यौवनयुक्त रहने की मानव की अनादिकाल से कामना रही है। इसी प्रभाव का प्रतिबिंब समुद्र-मंथन और राजा ययाति नामक कथाओं में विद्यमान है। 
    लिंग-परिवर्तन की घटनाएँ पुराकाल में भी होती रही होंगी, इस तथ्य की ओर इंगित करती कथाएँ हैं शिखंडी तथा इला।
    द्रोणाचार्य, कौरवों तथा बेन से उत्पन्न पुत्र की कथा प्राचीन आख्यानों में सुरक्षित है, जो उस युग में भी मौजूद कृत्रिम गर्भाधान विधि की ओर संकेत करती है।
    पुरुष-शरीर में निहित स्तन-वृद्धि नियंत्राक और यौन-कार्य संपादन में प्रभावी जैव रसायनों के स्रोव में परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप, आधुनिक विज्ञान में उपलब्ध विवरणों के अनुसार, पुरुष में स्तन-वृद्धि ही नहीं होती वरन् उसके स्तनों से दुग्ध- स्रोव भी हो सकता है–राजा मांधाता की कथा इसी तथ्य को प्रदर्शित करती है।
    वैदिककाल के भारतीय गणितज्ञों में श्रेष्ठ महर्षि गृत्समद ने शून्य तथा संख्याओं का आविष्कार किया। गणित में निहित वैज्ञानिक तर्कशील पद्धति के उपयोग को प्रदर्शित करती कथाएँ हैं–धु्रव, राजा ककुघ्न, राजा त्रिशंकु और असुर-त्रित की ऋग्वेदिक कथा।                      
    यह निर्विवाद तथ्य है कि क्लोनिंग, विशेषकर मानवीय संदर्भ में, पुराकाल के चिंतकों, वैज्ञानिकों को अज्ञात थी, परंतु उनके उर्वर मस्तिष्क में संभवतः इस विधा के भविष्य में विकसित हो जाने के बिंब थे, जिसके कारण उन्होंने नृसिंह के रूप की कल्पना की थी। यह कथा एक प्रभावी, भविष्योन्मुखी विज्ञान कथा है।
    भारतीय ऋषियों के रसायन ज्ञान का दर्शन कराती कथा है महर्षि आरुणि उद्दालक की। बहुवर्णित मृत्यु के पूर्व अथवा मृत्यु के अवसर पर मानव-शरीर के रहस्य को तंत्रिका वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है। आधुनिक विज्ञान की संदेशवाहक बहुश्रुत कथा है सत्यवान की।
    एक वस्तु को अनेक स्वरूप प्रदान करना शिल्प है। वज्र के निर्माण में निहित शिल्प का प्रयोग वृत्रसुर-विनाश, सुदर्शन चक्र तथा महर्षि दधीचि की कथाओं में हुआ है।
    भारतीय ऋषि भूगर्भीय परिवर्तन, उनके परिणाम एवं प्रभाव से अछूते नहीं थे। उन्होंने पृथ्वी पर उभरते और पुनः धरा में लोप होते पर्वतों को देखा था। विंध्यगिरि, श्वेत वराह, खंड-प्रलय एवं और्व-अग्नि नामक कथाएँ भूगर्भ के विविध पक्षों को चित्रित करती हैं।
    नारद के ब्रह्मांड-भ्रमण में पदार्थ-पारण तथा परमाणु- विस्फोट का आश्चर्यजनक वर्णन, जो हमारे पुराणों, रामायण एवं महाभारत में उपलब्ध है, वह आँखों द्वारा देखा हुआ प्रतीत होता है। क्या यह ऋषियों की कल्पना-शक्ति का प्रतिबिंब है अथवा इस प्रकार के लघु परमाणु-विस्फोट करने की (ब्रह्मास्त्र के माध्यम से) विधि ज्ञात थी ? परीक्षित के जन्म की कथा इसी प्रकार के प्रभाव से संबद्ध है।
    वामन अवतार की कथा सूर्य के प्रकाशपुंज विवर्तन के प्रभाव से जुड़ी है। वास्तव में आलंकारिक वैदिक भाषा में उर्वशी-उषा का प्रतीक है, इस पक्ष में अहल्या, सरमा की कथाओं से कम लोग परिचित हैं। इनसे संबंधित भ्रांतियों के निराकरण तथा इनकी कथाओं में निहित तथ्यों के स्पष्टीकरण को ध्यान में रखकर ये कथाएँ संगृहीत की गई हैं।
    इस संग्रह की कथाओं का अनुशीलन करने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि ऋग्वेद में वर्णित असुर-त्रित की गणित संबंधी कथा प्राचीनतम विज्ञान कथा है जो निर्विवाद रूप से प्रमाणित करती है कि विज्ञान कथाओं का उद्गम-स्थल भारत है, न कि योरोप।
  • Kavi Ne Kaha : Jitendra Shrivastva (Paperback)
    Jitendra Shrivastva
    140

    Item Code: #KGP-7018

    Availability: In stock

    पिछली सदी के आखिरी दशक में एक धमक की तरह काव्य-परिदृश्य पर उपस्थित हुए कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव आज नयी सदी की कविता के सर्वाधिक प्रशंसित और अनिवार्य कवि हैं। बाजारू प्रलोभनों से बचाकर हिंदी कविता को विश्वसनीय बनाए रखने के प्रति सर्जनात्मक सजगता जितेन्द्र को अपने समकालीनों में अलग पहचान दिलाती है। हमेशा करुणा, प्रेम और उम्मीद का पक्ष लेती हुई जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने आसपास पसरी हुई त्रासदी, अन्याय और दुःख के राजनीतिक तात्पर्यों का साहसिक उद्घाटन भी करती चलती है। जैसा कि होना चाहिए--गहन रूप से राजनीतिक होकर भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने स्वभाव में मानवीय, मार्मिक और भावनात्मक रूप से आर्द्र बनी रहती है।
    जितेन्द्र के लिए, कविता मनुष्य की नैसर्गिक संवेदनाओं को परिमार्जित करने का माध्यम है। मानवीय जिजीविषा के बहुविधि संस्तरों से साक्षात्कार के क्रम में उनकी कविता को कलात्मक मेयार की कठिनतर ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए देखा जा सकता है। नयी सदी की कविता के भाषिक और संवेदनात्मक आचरण को उदाहरणीय बनाने में जिन थोड़े कवियों का योगदान है, उनमें जितेन्द्र श्रीवास्तव अलग से ध्यान खींचते हैं।
    स्त्री, दलित, उत्पीड़ित और मार्जिनलाइज्ड समाज के तमाम अंतरंग जीवन-प्रसंगों से निर्मित जितेन्द्र की कविता का वितान बहुआयामी तो है ही, इसकी हदें इतिहास से लेकर भविष्य के अनिश्चय भरे अँधेरों तक व्याप्त हैं। जहाँ तक विमर्शों का प्रश्न है कविता में कला का सौंदर्य बचाते हुए जितेन्द्र को पूरे काव्यात्मक संतुलन के साथ, विमर्शों में कारगर हस्तक्षेप करते हुए देखा जा सकता है।
    कविता के प्रति पाठकों की घटती हुई अभिरुचि के प्रतिकूल माहौल में भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अनेक तरह के सांस्कृतिक समूहों और आर्थिक-राजनीतिक रुझानों के पाठकों में समान प्रशंसा और प्रतिष्ठापूर्वक पढ़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि उनकी कविताओं का यह चयन पाठकों की संवेदना को स्पंदित करने में सफल रहेगा।
  • Arddhnaarishwar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    300

    Item Code: #KGP-215

    Availability: In stock


  • Yathartha Se Samvad
    B.L. Gaur
    400 360

    Item Code: #KGP-449

    Availability: In stock

    बेख़ौफ अंगारे
    साहित्य को अब रास नहीं आता निरा रस 
    उससे भी ज़रूरी है कलमकार में साहस 
    ये काम अदब का है–अदब करना सिखाए 
    उनको जो बनाए हैं हरिक काम को सरकस
    दम घुट रहा अवाम का, फनकार बचा लो
    सब मूल्य तिरोहित हुए, दो-चार बचा लो
    सच्चे की शुबां पर हैं जहां शुल्म के ताले
    हर ओर लगा झूठ का दरबार, बचा लो
    संपादकीय ऐसे हैं ऐ दोस्त, तुम्हारे
    जैसे अंधेरी रात में दो-चार सितारे
    गुणगान में सत्ता के जहां रत हैं सुखनवर
    तुम ढाल रहे शब्द में बेख़ौफ अंगारे
    मैं ख़ुश हूं बड़े यत्न से धन, तुमने कमाया
    उससे भी अधिक ख़ुश हूं कि फन तुमने कमाया
    मेरी ये दुआ है कि सलामत रहो बरसों
    सदियों रहे ज़िंदा जो सृजन तुमने कमाया।
    —बालस्वरूप राही

  • Das Pranidhini Kahaniyan : Akhilesh
    Sushil Sidharth
    500 450

    Item Code: #KGP-9217

    Availability: In stock

    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है वे हैं-चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, शृंखला तथा अँधेरा । 
  • Ek Nirvasit Maharaja
    Navtej Sarna
    425 383

    Item Code: #KGP-642

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Suraj Se Puchhen
    Neelam Kanvdia
    60 54

    Item Code: #KGP-9035

    Availability: In stock

    सूरज से पूछे
    रचना कब, क्यों, कहां, कैसे, कैसी जन्म लेती है,
    यह रचनाकार स्वयं भी नहीं जानता, न बता
    सकता है । लेकिन जीवन में कभी ऐसा पल, अवसर
    या प्रसंग आ जुटता है जो रचनारत करता है, तो
    कभी रचनाकर्म को एक नया आयाम,
    नए क्षितिज दे जाता है ।
    श्रीमती नीलम कावडिया के जीवन में ऐसा एक
    अवसर आया, रक्षाबंधन के दिन भानुजी के
    राखी बंधवाने के लिए घर आने पर ।
    राखी बाँधकर नीलमजी ने अपनी एक कविता
    भानुजी को सुनाई। उस पुरस्कृत कविता
    को सुनकर भानुजी गंभीर हो आए ।
    बाद को एक दिन वह प्रसंग उठाने पर भानुजी ने
    जो उत्तर दिया उसे सुनकर नीलमजी तत्काल
    तो मौन रह गई लेकिन वह मौन कहीं
    अंतरतम में बार-बार, लगातार गुंजित होता रहा,
    मथता रहा रचनाकार को,
    उनकी सोच, समझ और दृष्टि को ।
    अनंतर जब अंतरतम की वह गुँज बाहर मुखरित हुई
    तब सामने आई ये कविताएँ, जिन्होंने न केवल
    नीलमजी की दिशा ही बदल दी,
    साहित्य-जगत को मिली एक अनूठी काव्यकृति
    'सूरज से पूछें'। 
  • Har Baar Musaphir Hota Hoon
    Pratap Sehgal
    280 252

    Item Code: #KGP-611

    Availability: In stock

    हर बार मुसाफिर होता हूं' के यात्रा-वृत्तांत निरे वृतांत नहीं हैं। निरे वृतांत कभी भी यात्रा-साहित्य का हिस्सा नहीं बन सकते। यह यात्रा-वृतांत कभी इतिहास की गलियों से गुज़रते हुए आपको अतीत के किसी पन्ने से जोड़ देते हैं तो कभी भूगोल में प्रवेश करते हुए आपको उसी जगह ले जाकर खड़ा कर देते हैं, जिस जगह का जिक्र लेखक कर रहा है। कभी आप उस जगह के लोक के रीति-रिवाजों से रू-ब-रू होते हैं, कभी वहां के सांस्कृतिक घटकों का तो कभी वहीं की प्राकृतिक संपदा और सौंदर्य का हिस्सा बन जाते हैं।
    विविध विधाओं में लेखन करने वाले लेखक प्रताप सहगल एक घुमंतू जीव भी हैं, यह जानकारी इन यात्रा-वृतांतों को पढ़कर पुख्ता होती है। वन वृत्तातों में कहीं कविता, कहीं नाटक और कहीं कथा का रंग मिलने लगना कोई अजूबा नहीं बल्कि इसे लेखक का शैल्पिक वैशिष्टय ही मानना चाहिए।
    ये यात्रा-वृत्तात इसलिए भी विशिष्ट हो जाते है कि लेखक वर्णित स्थान, समय और वहीं समाहित सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का रूपांकन किनारे या किसी सिरे पर खडा होकर नहीं करता। यह सीधे-सीधे स्थान, समय और परिवेश में दाखिल होकर उसका हिस्सा बनकर जीता है और खुद की भी वहीं शामिल कर लेता है। अपने इन्हीं अनुभवों को पाठक के साथ साझा करने की इच्छा ही लेखक को शब्द का सहारा लेने के लिए विवश करती है। और इसी बहाने और तमाम सार्थक यात्रा-वृत्तांतों की तरह से यह यात्रा-वृत्तांत भी हिंदी के वृहद यात्रा-साहित्य के द्वार पर दस्तक देते हुए आपके हाथ में है।
  • Delhi (Paperback)
    Khushwant Singh
    290

    Item Code: #KGP-518

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nanak Singh
    Nanak Singh
    175 158

    Item Code: #KGP-437

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नानक सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कुचले हुए पुष्प', 'लक्ष्मी-पूजा', 'अंतर्ज्ञान', ‘अछूते आम', 'चक्षुहीन संत', 'जर्जर खपरैल की एक स्लेट', 'स्नोफॉल', 'इनसान-हैवान', 'लंबा सफ़र' तथा 'जब हम में 'इनसान' प्रकट होता है' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नानक सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Rao
    Rajendra Rao
    280 238

    Item Code: #KGP-655

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र राव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उत्तराधिकार', 'लौकी का तेल', 'अमर नहीं यह प्यार', 'वैदिक हिंसा', 'बाकी इतिहास', 'घुसपेट', 'छिन्नमस्ता', 'असत्य के प्रयोग', 'शिफ्ट' तथा 'नौसिखिया'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजेन्द्र राव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale
    Chanderkant Deotale
    190 171

    Item Code: #KGP-549

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।
    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।
    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
  • Arya, Rigved Aur Bhartiya Sabhyata
    Dr. Kripa Shanker Singh
    1100 990

    Item Code: #KGP-673

    Availability: In stock

    ऋग्वेद भारतीय संस्कृति, धर्म और सभ्यता, प्रकारान्तर से कहें तो हिन्दू संस्कृति, धर्म और दर्शन की पीठिका है। भारत आर्यों की मूलभूमि है, इस सत्य को झुठलाने की बहुत कोशिशें होती रही हैं। ‘आर्य, ऋग्वेद और भारतीय सभ्यता’ में ऋग्वेद के हर अंग की विस्तृत मीमांसा की गई है। ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ है। प्राचीनतम होते हुए भी इसकी सर्वांगीण पूर्णता और हर दृष्टि से सर्वोत्तमता को देखते हुए ऋग्वेद को अपौरुषेय भी माना जाता रहा है। अपौरुषेय मानने के पीछे धार्मिक कारण भी रहा हो सकता है। जो भी हो पर इसे मानवी मेधा की ही रचना कहना ठीक होगा।
    प्रस्तुत पुस्तक में ऋग्वेदिक संस्कृति और सभ्यता के नैरन्तर्य को दिखाया गया है। भारतीय समाज के ताने-बाने का जो ढाँचा आज है, वह ऋग्वेद से लेकर सिन्धु-सरस्वती सभ्यता से होता हुआ वर्तमान काल तक आया है। चाहे वह पारिवारिक और सामाजिक जीवन को दर्शाने वाला रूप हो या धार्मिक आस्था और विश्वास की मान्यता हो, या दार्शनिक चिन्तन-मनन की परम्परा हो, उन सभी के मूल में ऋग्वेद ही है।
    ऋग्वेद आर्यों के महान् और विलक्षण सांस्कृतिक ऋक्थ का प्राचीनतम और सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ है। वह न केवल हिन्दू दर्शन, धर्म और पारिवारिक, सामाजिक तथा शासकीय व्यवस्था को दर्शाने वाला आदि ग्रन्थ है बल्कि विश्व के प्राचीनतम और उत्कृष्टतम काव्य का गान भी है।
  • Kavi Ne Kaha : Ekant Shrivastava
    Ekant Shrivastva
    240 216

    Item Code: #KGP-7817

    Availability: In stock

    एकान्त वस्तुतः छत्तीसगढ़ की ‘कन्हार’ के कवि हैं। एकान्त का काव्य-संसार एक ओर माँ-बाप, भाई-बहन का भरा-पूरा परिवार है तो दूसरी ओर अंधी लड़की, अपाहिज और बधिर जैसे असहाय लोगों का शरण्य भी और ‘कन्हार’ जैसी लंबी कविता तो एक तरह से नख-दर्पण में आज के भारत का छाया-चित्र ही है। ‘अन्न हैं मेरे शब्द’ से अपनी काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले एकान्त उन थोड़े से कवियों में हैं जो ‘शब्द’ को अपनी कविताओं से एक नया अर्थ दे रहे हैं। निश्चय ही एकान्त का काव्य एक लंबी छलाँग है और ऊँची उड़ान भी--कवि के ही शब्दों में एक भयानक शून्य की भरपाई। -नामवर सिंह

    काली मिट्टी से कपास की तरह उगने की आकांक्षा से उद्वेलित यह कवि अपनी हर अगली कविता में मानो पाठक को आश्वस्त करता है कि वह अपने भाव-लोक में चाहे जितनी भी दूर चला जाए, अंततः लौटकर वहीं आएगा जो उसके अनुभव की तपी हुई काली मिट्टी है। यह एक ऐसी दुनिया है जो एक किसानी परिवेश के चमकते हुए बिंबों और स्मृतियों से भरी है। एक अच्छी बात यह कि गहरे अर्थ में पर्यावरण-सजग इस कवि के पास एक ऐसी देखती-सुनती, छूती और चखती हुई भाषा है, जो पाठक की संवेदना से सीध संलाप करती है।   -केदारनाथ सिंह

    एकान्त की कविता और कवि-कर्म की खूबी है कि उन्होंने अपने को औपनिवेशिक आधुनिकता के पश्चिमी कुप्रभाव से बचाया है। यही कारण है कि उनकी कविता कलावादी और रूपवादी प्रभाव से मुक्त है। ऐसा इसलिए कि एकान्त अपने जनपद, अपनी जड़ों और अपनी ज़मीन को कभी नहीं छोड़ते। उनकी कविता हमें भारतीय समृद्ध काव्य-परंपरा की याद दिलाती है जो आज की अधिकांश कविता से विलुप्तप्राय है। एकान्त, निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा के सशक्त कवि हैं। एकान्त की कविता में कोई ठहराव नहीं है। वे आज भी नित नवीन और सारगर्भित कविताएँ बिना किसी विचलन या दोहराव के रच रहे हैं। क्योंकि उनका गहरा रिश्ता भारतीय लोक और जनमानस से बना हुआ है। सही अर्थों में वे लोकधर्मी कवि हैं। ‘नागकेसर का देश यह’ हिंदी में एकान्त की सर्वाधिक लंबी कविता है जिसके कई अर्थ-ध्वनिस्तर हैं और बड़ी संश्लिष्टता है।      -विजेन्द्र
  • Shubhada (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150

    Item Code: #KGP-204

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है शुभदा और दूसरा है बड़ी दीदी।
  • Swami Ram Tirath Ki Shreshtha Kahaniyan
    Jagnnath Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9140

    Availability: In stock

    स्वामी रामतीर्थ की श्रेष्ठ कहानियां जहाँ अत्यंत रूचि-मोहक है, वहां उसका दामन उज्ज्वल प्रेरणाओं और सुनहले शिक्षा-तत्वों से जगमगा रहा है तथा ह्रदय व मन को आलोकित किये देता है । 
    प्रत्येक कहानी के अंत में कुछ शब्दों द्वारा कहानी में निहित शिक्षा-तत्त्व का संकेत दिया  गया है । यही ऐसा न किया जाता, तो इन कहानियों एवं स्वामी जी के उद्देश्य से न्याय नहीं हो सकता था । स्वामी जी ने प्रत्येक कहानी का उद्भावना केवल इसीलिए किया था की उसके रोचक माध्यम से अपने श्रोताओं एवं पाठकों के निकट विषय की गंभीरता तथा दुरूहता बोधगम्य व सरल हो जाये और साथ ही साथ शिक्षा के तत्त्व भी उजागर हो उठें । 
  • The Hanuman Factor (Paperback)
    Anand Krishna
    195

    Item Code: #KGP-336

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
    Let us explore together…..
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Balram
    Balram
    230 207

    Item Code: #KGP-692

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बलराम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'शुभ दिन', 'गोआ में तुम', 'शिक्षाकाल', 'पालनहारे', 'सामना', 'कलम हुए हाथ ', 'कामरेड का सपना ', 'मालिक के मित्र', 'अनचाहे सफर' तथा 'पहला सबक' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बलराम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kucha E Kaatil
    Ram Lal
    175 158

    Item Code: #KGP-2067

    Availability: In stock

    कूचा-ए-कातिल

    यह एक बहुत ही मामूली आदमी की खुदनोश्त
    दास्तान है, जिसने काफी गुरबत देखी है
    और यह महरूमियों का भी शिकार हुआ है ।
    कौमी और समाजी सतह पर इसने
    बेशुमार मसायब का खामोशी से मशाहदा
    किया है और दर-बदरी इसके
    खुन में हमेशा मोजूद रहीं हे।

    मैं इस शख्स को बहुत करीब से जानता हूँ,
    क्योंकि वह मैं ही हूँ। मैंने 1943 से अब तक
    जितने अफ़साने, नावल, ड्रामे, सफरनामे,
    मजामीन वगैरह लिखे हैं, इनमें मेरी
    जाती कैफियतें मुख्तलिफ शक्लों और रवैयों 
    का रूप धारकर हमेशा मौजूद रही हैं ।
    मेरे नज़दीक खुदनोश्त भी एक तरह का
    तखलीकी इजहार है, लेकिन इसमें 
    बयान की गई सच्चाइयाँ
    दूसरी असनाफ़ के मुकाबले में कुछ
    ज्यादा ही खुरदरी और तकलीफदेह हैं।
    -रामलाल
  • Da Se Dalaal
    Barsane Lal Chaturvedi
    40 36

    Item Code: #KGP-9095

    Availability: In stock


  • Doosara Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    200 160

    Item Code: #KGP-775

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Meri Priya Kahaniyan
    Jwahar Singh
    50 45

    Item Code: #KGP-9065

    Availability: In stock


  • Munna Ro Raha Hai
    Prahlad Shree Mali
    280 252

    Item Code: #KGP-590

    Availability: In stock

    "सच कहूं तो इन नेता-अफसरों के चरित्र और आचरण ने मेरा मनोबल बढ़ाया है। जैसे औलाद नालायक निकल जाए तो समझदार मां-बाप खुद में नई ताकत पैदा कर लेते हैं अपनी सार-संभाल की। वैसे ही जब मैंने यह देखा कि इन नेता-मंत्रियों, सरकारी कर्मचारियों से देश-समाज और नागरिक का भला होना मुश्किल है, तो बस अपना मनोबल ऊंचा कर लिया। रही बात आशा-चिंता की तो यदि आप आशा-अपेक्षा रखेंगे तो चिंता होगी ही। साथ ही दुःख भी मिलेगा। मेरे खयाल से पति-पत्नी या संतान से हमेशा किसी को मनचाहा सुख नहीं मिलता। इसके लिए तो मन को मनाकर संतोष रखना पड़ता है। मेरे दादा की छह संतानें थीं। चार लड़के, दो लड़कियां। बेचारे उनके पीछे अपना पूरा जीवन घिसते रहे। न बेटों ने सुख दिया, न बेटियों ने चैन। पर इसमें उनका भी क्या दोष! वे सब भी तो अपनी-अपनी गृहस्थी की गाड़ी चलाने की खींचतान में लगे हुए थे। यही हाल मेरे पिताजी का रहा। उन्हें न तो मैं कोई सुख दे पाया, न मेरा भाई। और यह अकेले मेरी नहीं, लगभग हर घर की कहानी है। फिर भला मैं अपने बेटे से कोई सुख पाने की अपेक्षा रखने की नादानी क्यों करूं!"
    -इसी पुस्तक से  
  • Aadivasi : Srijan Mithak Evam Anya Lokkathayen
    Ramnika Gupta
    500 400

    Item Code: #KGP-682

    Availability: In stock

    आदिवासी संस्कृति अब तक ज्ञात मानव सभ्यताओं में सबसे प्राचीन है। इस समाज की लोककथाओं-गाथाओं में मानव सभ्यता के शुरुआती दौर के सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यबोध की झलक तो मिलती ही है, साथ ही ये हमें आदिम मनुष्य को विस्मित कर देने वाली कल्पना की उड़ान और मनुष्य की आकांक्षाओं-अपेक्षाओं की मंत्र-मुग्ध करने वाली विरासत भी सौंपती हैं। ये कथाएँ--मिथक मानव सभ्यता के विकास की कथाएँ हैं--परिवर्तनों की दस्तकें दर्ज हैं इनमें--कल्पना और यथार्थ की भाषा में बोलती हैं ये कथाएँ। यदि हमने मौजूदा भूमंडलीकरण के दौर में मानव सभ्यता की इस विरासत को सुरक्षित नहीं रखा तो वर्तमान पीढ़ी के साथ ही ये विस्मृत हो जाएँगी।  
    इस संकलन में झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात और अंडमान-निकोबार की कथाओं को शामिल किया गया है। इन्हें पाठकों की सुविधा के लिए 12 खंडों में विभाजित किया गया है। पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित खंड में आदिवासी समूहों व समाजों में मौजूद आस्थाओं, विश्वासों व उनकी अपनी-अपनी अवधारणाओं पर आधारित लोककथाएँ शामिल की गई हैं।
    ‘पशु-पक्षी और जलचर खंड’ में संताली की ‘छोटी चिड़िया की कथा’ में छोटी चिड़िया की वीरोचित कथा का संवाद सुनकर मानव में एक संदेश पहुँचता है कि कैसे एक छोटी चिड़िया भी एक अन्यायी एवं अहंकार से भरे हाथी का दर्प-दलन कर सकती है। यह साहस तभी जुटने लगता है, जब कोई व्यक्ति अथवा प्राणी सत्य-पथ पर चलकर किसी अत्याचारी के विरुद्ध अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति एवं संकल्प के साथ सामना करने के लिए तैयार हो। इस खंड में मानव और अन्य जीवों के बीच भावनात्मक संबंधों की प्रेरणादायक कथाएँ संकलित हैं। 
    इसके अलावा ‘प्रेम-कथा’, ‘विवाह, गोत्र और रीति- रिवाज’, ‘रिश्तों का सच’, ‘कायांतरण’ और ‘लोकजन्य कथाएँ’ खंड की मिथ कथाओं में स्वैरागात्मक व संवेदनाओं, सामाजिक गतिविधियों के उद्भव व विकास, प्रकृति के सहयोग व संवाद और मनुष्य की विभिन्न अच्छी-बुरी प्रवृत्तियों को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
  • Ek Nirvasit Maharaja (Paperback)
    Navtej Sarna
    200 180

    Item Code: #KGP-311

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Satya Ke Prayog
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    350 315

    Item Code: #KGP-9055

    Availability: In stock


  • Ajit Kumar : Rachna-Sanchayan
    Ganga Prasad Vimal
    450 405

    Item Code: #KGP-9005

    Availability: In stock

    अजितकुमार: रचना-संचयन
    अजितकुमार अपने समय के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में अग्रणी हैं। उनके लेखन का वैविध्य साबित करता है कि वे अपनी पीढ़ी की सभी विधाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। कवियों के बीच कविता के साथ-साथ वे श्रेष्ठ कथाकार हैं। कथाकारों के बीच वे श्रेष्ठ कवि हैं। कवि और कथाकार होने के साथ-साथ वे गंभीर गद्य लेखक हैं। चिंतक, विवेचक और अद्भुत अनुवादक के रूप में उनकी ख्याति सर्वत्र व्याप्त है।
    प्रस्तुत संचयन उनके 80 वर्ष के होने के उपलक्ष्य में तैयार किया गया है। चिर शिशु, चिर किशोर, चिर युवा अजित- कुमार के सृजन में एक साथ कई गुण मिलते हैं। उनमें एक नैसर्गिक विनोदप्रियता है। इस अनोखी आदत के कारण वे सभी वर्गों में लोकप्रिय हैं। उनसे ईषर्या रखने वाले लोग तो उन्हें महिलाओं में ही लोकप्रिय मानते हैं। उनके शत्रुओं का कथन यहाँ ज़्यादा विश्वसनीय लगता है कि उन्होंने स्त्री-रिझावु साहित्य का प्रणयन किया है तथापि स्त्री और पुरुष समान रूप से उनकी रचनाओं के पाठक हैं। कल्पनाशीलता उनकी रचनाओं का आद्य गुण है, किंतु यथार्थ के वे उतने ही बड़े संस्थापक हैं, जितने बड़े वे भाषा के द्वारा वास्तविकता की सजीवता स्थापित करते हैं।
    अजितकुमार के लेखन में समता, असांप्रदायिकता, सौंदर्यवादिता और जनपक्षधरता मौलिक रूप से विद्यमान है। उनका इतिहास-बोध भारतीय उपमहाद्वीप को भौगोलिक और राजनीतिक परिसीमाओं से ज़्यादा उदार घोषित करता है। वे भारत की बहुलता के समर्थक हैं। उनकी रचनाएँ उनकी वैचारिक ऊष्मा की प्रतीक हैं। सृजन के सभी गुणधर्मों का स्पर्श करने वाला अजितकुमार का लेखन परंपरा और आधुनिकता व उत्तर-आधुनिकता के आदर्शों को संकेतित करते हुए सनातनता की अवधारणा को पुष्ट करता है।
  • Kavi Ne Kaha : Uday Prakash_120 (Paperback)
    Uday Prakash
    120

    Item Code: #KGP-226

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : उदय प्रकाश
    सादगी उदय प्रकाश की कविताओं की जान है जो हर उस आदमी से तुरंत रिश्ता कायम कर लेती है जो सामाजिक अन्याय और शोषण की मार उन लोगों के बीच बैठा सह रहा है, जिनके पास आंदोलन और नारे नहीं हैं, सिर्फ खाली अकेले न होने का अहसास भर है... । . . .ये कविताएँ पाठक की संवेदना में बहुत कुछ ऐसा तोड़फोड़ कर जाती हैं, जिनके सहारे वह फिर कुछ नया रचने की ज़रूरत महसूस करने लगता है । किसी भी यातना को कवि बिना उस यातना से मानसिक रुप से गुज़रे हुए प्रेषित नहीं कर सकता । उदय प्रकाश की कविताएँ काफी कुछ इसकी दुर्लभ मिसाल है । -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
    कविताओं में उदय प्रकाश की एक और कलात्मक विशेषता गौरतलब है । वे एक ओर वर्तमान के अलग-अलग संदर्भों और  स्थितियों को लेते हैं, पृथक और विच्छिन्न दुनियाओं को साथ-साथ रख देते हैं, ये पिघलकर एक इकाई बन जाते हैं । इनके 'फ्यूजन' से एक समग्र समय बनता है हम इन पृथक और विभिन्न दिखते संदर्भों और स्थितियों के भीतर की तारतम्यता तक पहुंचते हैं। यहीं कविता का अभीष्ट है। कुछ कविताओं में उदय प्रकाश ने बीज से वृक्ष बनने तक की पूरी प्रक्रिया को उलट दिया है । जैसे कोई विपरीत दिशा में चलती फ़िल्म हो । यह एक रचनाकार का नियति के क्रम में हस्तक्षेप है । -विजय कुमार 
    क्यों ऐसा नहीं हुआ कि उदय प्रकाश की कविताओं में छिपे उनके कथाकार और उनकी कहानियों में छिपी कविता पर सतर्क पाठको का ध्यान जाता और मूल्यांकन की कोई और नई समावेशी पद्धति जन्म लेती ! जिस जादुई यथार्थवाद के लिए …. उदय प्रकाश की कहानियों अनेकार्थी जान पड़ती हैं और एक से अधिक पाठ के लिए पाठकों को उत्युक बनाती हैं उससे मिलती-जुलती अपरिचयीकरण (डिफेमिलियराइजेशन) सरीखी काव्ययुक्ति का इस्तेमाल करके ही उनकी कविताएँ अधिक सार्थक बन सकी हैं । -परमानंद श्रीवास्तव
  • Kintu Parantu
    Sudrashan Kumar Chetan
    125 113

    Item Code: #KGP-1987

    Availability: In stock

    किन्तु-परन्तु
    कहाँ से चले, कहाँ ठिकाना है
    न देखा आदि न अंत जाना है
    हम न जान सके दुनिया को तो क्या 
    दुनिया ने कहाँ हमको पहचाना है

    प्रेम के नयनों ने मुझे आप निहारा
    अभिसार के अधरों ने कई बार पुकारा
    कब बांध के रखा किसी नाव को तट ने
    हर नाव को लहरों ने दिया आप सहारा
    ० 
    दूर हैं हमसे तो क्या हुआ अपने तो हैं 
    न हों ज़मीनी, हवाई सही, सपने तो हैं
    भले ही कहानी उनकी बेवफाई की हो
    बदनामी के वरक हमीं को ढकने तो हैं

    खुद साठ बरस के, दुल्हन बीस बरस की
    यहाँ ये तरसते, वहां वो तरसती
    जी तो चाहता है घटा झूम के बरसे
    मगर हाल यह है, इक बूँद न बरसती
    ० 
    सुचिता और व्यवस्था जोडे हाथ खड़ी 
    जैसे दोनों शासन की हो बाँदियाँ 
    मिल न सकी समता, वंचित जाग रहे
    बहुत दिनो से नाच रही हैं आँधियाँ 
    ० 
    शेष नहीं कुछ कहने को
    शेष नहीं कुछ सहने को
    मिट रहीं सब तीव्र गति से
    कहने - सहने की सीमाएं
  • Nashta Mantri Ka Gareeb Ke Ghar
    Prabha Shanker Upadhayaye
    90 81

    Item Code: #KGP-1863

    Availability: In stock

    नाश्ता मंत्री का गरीब के घर
    विषमताओं विसंगतियों और विद्रूपताओं  से अटी है आज के जिंदगी । ऐसे अनुभवों को अनुभूत का, प्रहारात्मक तरीके से प्रस्तुत करना, व्यंग्य कहा जाता है । साथ ही मानव को कुंठाओं एवं जीवन-मूल्यों में स्खलन के प्रति भी फिक्रमंद होता है व्यंग्यकार । उसकी सोच का पैनापन पाठक के मन को कभी कचोटता है तो कभी उसका फक्कड़ मिजाज पाठक के मन को गुदगुदा जाता है । इसीलिए व्यंग्य के साथ हास्य का जुडाव हो गया है ।
    प्रस्तुत संग्रह में नाना भाँति की महक सहेजे तीस व्यंग्य-पुष्प संकलित हैं, जिन्हें मैंने डेढ़ दशक की अवधि में लिखा है । समाज, व्यवस्था राजनीति, शिक्षा, विज्ञान, अर्थशास्त्र तथा दफ्तरी जिन्दगी इत्यादि विषयों पर कलम चलाने का प्रयास किया है । मैं अपनी लेखनी का तेवर दिखा पाने में कितना कामयाब हो सका हूँ इसका निर्णय तो प्रबुद्ध पाठक एवं सुधी समीक्षक ही करेंगे  ।
    ---प्रभा शंकर उपाध्याय 'प्रभा'
  • Spandit Pratibimb
    Amar Nath 'Amar'
    150 135

    Item Code: #KGP-1857

    Availability: In stock

    स्पन्दित प्रतिबिम्ब
    संघर्ष का चिराग
    जीवन के अंधेरे पलों में
    रोशनी के लिए
    संघर्ष
    जब बढ़ जाता है
    तब
    सन्नाटों को बुनते हुए
    खुद चिराग़ बन
    जल उठता हूँ मैं!
    हाँ
    यही परिभाषा
    बन गई है जिदंगी की !
    गंगा की धारा में
    मेरी खुशियों, उमंगों 
    और लक्ष्यों का
    प्रतिबिम्ब उभरता है
    अक्सर
    चाँदनी के बीच
    और फिर जीवन
    गीत बन जाता है
    लहरों के संग चलकर
    घुप अँधेरे के
    साए में भी !
    [इसी पुस्तक से]
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    160 144

    Item Code: #KGP-13

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', 'क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Chasing Maya (Paperback)
    Rohan Gagoi
    150

    Item Code: #KGP-335

    Availability: In stock

    Better jobs, bigger salaries, expensive cars, exclusive homes, exotic vacations, shopping abroad, admiration and jealousy of peers... What more can you expect from life! Or, may be, you can…! Come; explore your truth with ‘Chasing Maya’!
    ‘Chasing Maya’ is about thirty-two-year old Siddhartha Kumar, who in spite of his evident material success finds himself trapped in the grip of mediocrity – the distress and despair of being no different from millions of others in this world. Bemused, he sets on a quest to rediscover the zeal that once fuelled his dreams and passion and comes across with situations and people that lead him to astounding revelations.
    Share the anxiety, live the excitement and experience the magical transcendence as ‘Chasing Maya’ takes you on an incredible journey that every human soul instinctively seeks to undertake but only a negligible few truly succeed to accomplish!
  • Rigveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    300 270

    Item Code: #KGP-115

    Availability: In stock

    ऋग्वेद : युवाओं के लिए यहाँ ऋग्वेद के मन्त्रों की व्याख्याएँ उसे सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं, जिनसे आज का 'कंप्यूटर-सेवी' युवा किसी भी स्थिति में निरपेक्ष नहीं रह सकेगा । पारंपरिक ज्ञान की अमूल्य धरोहर उसके हाथों में रखने का प्रयास है यह पुस्तक ।
  • Namaskar Bharat Mera Mahan
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-314

    Availability: In stock

    नमस्कार! भारत मेरा महान!
    अमृतलाल नागर और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का शिष्य कहने में मनोहर श्याम जोशी बहुत गौरव का अनुभव करते थे। जोशी जी के निजी जीवन, साहित्य, पत्राकारिता और सिनेमा के पन्नों में उक्त दोनों आचार्यों की छाप देखी जा सकती है। 
    भारतीय राजनीति और समाज पर मनोहर श्याम जोशी की बेबाक टिप्पणियाँ हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। राजेंद्र माथुर की तरह उनके पत्रकारीय लेखन से लोग चकित और कुछ भ्रमित हो जाते थे, क्योंकि किसी टिप्पणी में वह मार्क्सवादी-समाजवादी, किसी लेख में हिंदूवादी, किसी विश्लेषण में कांग्रेसी विचारों से ओतप्रोत लगते थे। प्रगतिशील होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी या डॉ. कर्णसिंह से अच्छे संवाद और संबंध की क्षमता उनमें थी। 
    अमृतलाल नागर की तरह उनके व्यंग्य और कहानी- उपन्यास में सामाजिक कुप्रथाओं, बंधनों पर पैना प्रहार पढ़ने को मिलता है। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभ-लेखन में जोशी जी देश-विदेश के किसी नेता, पूँजीपति या बड़ी हस्ती की कमियों पर सीधे प्रहार करने में नहीं चूके। शरद जोशी की तरह मनोहर श्याम जोशी प्रतिदिन स्तंभ लिखने की क्षमता रखते थे। इसीलिए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने जोशी जी को एक नियमित स्तंभ लिखने का निमंत्रण दिया। सत्ता और प्रबंधन का भय इन संपादकों को कभी नहीं रहा। इसलिए जोशी जी ने भारत की सामाजिक-राजनीतिक दशा पर ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ लिखना शुरू किया। 
    ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ की विशेषता यह थी कि इस स्तंभ की टिप्पणियों पर पत्र आमंत्रित किए जाते थे और सैकड़ों पत्रों में से चुनिंदा छाँटकर अगली किस्त में स्तंभ के साथ छपते थे। यह स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुआ। जोशी जी ने जीवन की अंतिम साँस तक यह स्तंभ लिखा, जिसकी रचनाएँ दशकों तक कई पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
  • NATOHAM
    Meenakshi Swamy
    500 450

    Item Code: #KGP-1555

    Availability: In stock

    लब्धप्रतिष्ठ रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का बहुचर्चित उपन्यास 'नतोअहं ' भारतभूमि के वैभवशाली अतीत और वर्तमान गौरव के सम्मुख विश्व के नतमस्तक होने का साक्षी है। यह भारतीय संस्कृति की बाह्म जगत् से आंतरिक जगत् की विस्मयकारी यात्रा करवाने की सामर्थ्य के अनावरण का अद्भुत परिणाम है।
    भारतीय संस्कृति के विराटू वैभव का दर्शन होता है—संस्कृतिक नगरी उज्जयिनी में बारह वर्षों में होने वाले सिंहस्थ के विश्वस्तरीय आयोजन में। उज्जयिनी का केंद्र शिप्रा है। इसके किनारे होने वाले सिंहस्थ में देश भर के आध्यात्मिक रहस्य और सिद्धियां एकजुट हो जाती हैं। इन्हें देखने, जानने को विश्व भर के जिज्ञासु अपना दृष्टिकोण लिए यहां एकत्र हो जाते हैं। तब इस पवित्र धरती पर मन-प्राण में उपजने वाले सूक्ष्मतम भावों की सशक्त  अभिव्यक्ति है यह उपन्यास ।
    इसमें मंत्रमुग्ध करने वाली भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म के सभी पहलुओं पर वैज्ञानिक चिंतन  है, भारतीय अध्यात्म के विभिन्न पहलुओं को खरेपन के साथ उकेरा गया है।
    उज्जयिनी अनवरत सांस्कृतिक प्रवाह की साही है। यह केवल धर्म नहीं, समूची संस्कृति है, जिसमें कलाएं हैं, साहित्य है, ज्ञान है, विज्ञान है, आस्था है,  परंपरा है और भी बहुत कुछ है। यात्रा वृत्तांत शैली के इस उपन्यास में उज्जयिनी के बहाने भारतीय दर्शन, परंपराओं और संस्कृति की खोज है जो सुदूर विदेशियों को भी आकर्षित करती है। उज्जयिनी के लोक जीवन को झांकी के साथ भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का सतत आख्यान है जो पुरा मनीषियों की मेधा का महकता प्रतीक है।
    उपन्यास के विलक्षण कथा संसार को कुशल लेखिका ने अपनी लेखनी के संस्पर्श से अनन्य बना दिया है। नायक एल्विस के साथ पाठक शिप्रा के प्रवाह में प्रवाहित होता है, डुबकी लगाता है।
    'भूभल' जैसे सशक्त उपन्यास से कीर्ति पाने के बाद बहुचर्चित रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का नवीनतम उपन्यास 'नतोअहं ' तथाकथित आधुनिकता से आक्रांत भारतीय जनमानस की अपनी जडों की ओर आकृष्ट करता है। भारतीय संस्कृति व अध्यात्म की खोज में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अप्रतिम उपहार है।
  • Bhrashta Samaaj (Paperback)
    Chandan Mitra
    90

    Item Code: #KGP-7048

    Availability: In stock


  • Pakshi Avlokan
    Dr. Anand Saxena
    950 855

    Item Code: #KGP-562

    Availability: In stock

    पक्षियों के अवलोकन तथा उनकी पहचान करने के संबंध में हिंदी में पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। यह पुस्तक इस कमी को पूरा करने का प्रयास है। पक्षियों की स्पष्ट फोटो तथा पक्षी की जाति (species) पहचानने के विषय में संकेतों को देने पर विशेष ध्यान दिया गया है। अनेक पक्षियों के नर और मादा में काफी अंतर होता है। इसका उल्लेख करते हुए अकसर उनकी पफोटो भी दी गई है।
  • Ardhavritt (Paperback)
    Mudra Rakshes
    340

    Item Code: #KGP-388

    Availability: In stock


  • Door Van Mein Nikat Man Mein
    Ajit Kumar
    360 324

    Item Code: #KGP-868

    Availability: In stock

    दूर वन में निकट मन में
    मनुष्य एक-दूसरे को सुख-दुःख देते किन नातों के जाल में बँधते-जुड़ते रहते हैं? उनके संबंधों की आधारभूमि क्या है? एक-दूसरे के सारे मीठे-कड़वे अनुभव कालांतर में एक भाव, एक स्मृति, एक टीस बनकर रह जाते हैं! उस भाव का महत्त्व क्या है?
    ‘दूर वन में’ अजितकुमार द्वारा रचित कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरणों का संग्रह है। इसमें कुछ प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध विशेषकर ऐसे लोग हैं जो अब भूले से जा रहे हैं, पर अपने ज़माने के विशिष्ट व्यक्तित्व रहे हैं। अधिकांश संस्मरण पारिवारिक दायरे में आने वाले लोगों के हैं। 
    ‘निकट मन में’ भी अजितकुमार के संस्मरणों का संग्रह है।  इन पुस्तकों के शीर्षकों में तुक तो अनायास मिल गया है, उनकी तान, लय और समझ में भी पाठकगण उस निरंतरता का, तारतम्य का आभास पाएँगे, जो अजितकुमार की कविता और गद्य-रचना का स्वाभाविक गुण है।
    संस्मरणों के माध्यम से अजितकुमार अतीत को नहीं पगुराते, हिसाब-किताब भी बराबर नहीं करते, वे अनुभव तथा संवेदना का पथ प्रशस्त करते हैं। इस नाते, ये संस्मरण जितने उनके हैं, लगभग उतने ही या उससे भी अधिक औरों के अपने हो सकेंगे।
    अजितकुमार के संस्मरणों की ये दो पुस्तकें एक ही जिल्द में प्रस्तुत हैं। प्रसिद्ध कवि अजितकुमार एक समर्थ और सशक्त गद्यकार भी हैं। इनके गद्य की ताकत का नमूना तो ये संस्मरण हैं ही, उनके संवेदनशील, सजग, जागरूक व्यक्तित्व का भी परिचय देते हैं।
  • Kama Sutra (Paperback)
    Vatsyayana
    99

    Item Code: #KGP-1100

    Availability: In stock

    It is one of the three goals of Hindu life. It is what the west called ‘erotica’. It is the one we consider sacred. It is Kama. And this is its manual—The Kama Sutra.
    A compilation of seven books, starting with the description of general principles of mortal life that Brahma laid down when he created men and women—dharma (fulfillment of duty), artha (accumulation of wealth), and kama (pleasurable experience of the five senses, to moving forward about the ‘right’ way of life where it talks about many issues including the behaviour and actions during copulation between a man and a woman. A 4th century guide to a virtuous and gracious living, still valid in the 21 century and beyond.    
    Vatsyayana unbashingly talks scientifically and spiritually about what is a taboo today, and emphasises that this book is a must for both men and women. It lays more stress on the fact that women, especially, should be knowledgeable in the arts complimentary to Kama Sutra
    The physical beauty of Khajuraho is the manifestation of the beauty trapped in this book, which the west unknowingly calls the ‘manual of sex’. 
    Discover the knowledge of the gods translated for the mortals by the mortals.
  • Path Ke Daavedaar
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-866

    Availability: In stock


  • Vo Tera Ghar Ye Mera Ghar
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-181

    Availability: In stock

    वो तेरा घर, ये मेरा घर
    इस बंगले के गृह-प्रवेश पर मां-पिताजी दोनो आए थे । बंगले की भव्यता देखकर खुश भी बहुत हुए थे, पर माँ ने उसांस भरकर कहा था, 'सोचा था, कभी-कभार छुट्टियों में तुम लोग आकर रहोगे, पर अब यह महल छोड़कर तुम उस कुटिया में तो आने से रहे।'
    उन्होने कहा था, 'हम यहाँ भी कहाँ रह पाते है मां । नौकरी के चक्कर में रोज तो यहाँ से वहाँ भागते रहते हैं। यहाँ तो शायद पेंशन के बाद ही रह पाएंगे । मैं तो कहता हूँ आप लोग वह घर बेच दो । पैसे फिक्स डिपॉजिट में रख दो या लड़कियों को दे दो और ठाठ से यहाँ आकर रहो ।'
    'न बेटे! मेरे जीते-जी तो वह मकान नहीं बिकेगा,' पिताजी ने दृढ़ता के साथ कहा था, 'हमने बड़े अरमानों से यह घर बनाया था । इसे लेकर बहुत सपने संजोए थे । अब वे सारे सपने हवा हो गए, यह बात और है।'
    'ऐसा क्यों कह रहे है पिताजी । इस घर ने आपको क्या नहीं दिया ! हम सब इसी घर से पलकर बड़े हुए हैं। हम चारों की शादियां इसी घर से हुई हैं। बच्चों की शिक्षा- दीक्षा और शादियां—मां-बाप के यही तो सपने होते हैं ।'
    'हाँ, यह भी तुम ठीक ही कह रहे हो । मैं ही पागलों की तरह सोच बैठा था कि यह घर हमेशा इसी तरह गुलजार रहेगा। भूल ही गया था कि लडकियों को एक दिन ससुराल जाना है । लड़कों को रोजगार के लिए बाहर निकलना है । और एक बार उड़ना सीख जाते है तो पखेरू घोंसले में कहाँ लौटते हैं। अब मुझें अम्मा-बाबूजी की पीड़ा समझ में आ रही है ।'
    "कैसी पीडा?'
    ‘पाँच-पाँच बेटों के होते हुए अंत में अकेले ही रह गए थे दोनों । अम्मा तो हमेशा कहती थी, अगर मैं जानती कि पढ-लिखकर तुम लोग बेगाने हो जाओगे तो किसी को स्कूल नहीं भेजती । अपने आँचल से छुपाकर रखती ।'
    और अपने अम्मा-बाबूजी की याद में पिताजी की आँखें छलछला आई थी ।
    -[इसी संग्रह की कहानी 'साँझ की बेला, पंछी अकेला' से]

  • Krantikaariyon Ke Geet (Paperback)
    Chandrika Prasad Sharma
    120

    Item Code: #KGP-113

    Availability: In stock


  • Parv
    Bhairppa
    695 626

    Item Code: #kgp-147

    Availability: In stock

    पर्व
    भारतीय वाडमय में पंचम वेद के रूप में अधिष्टित महाभारत पर आधारित भैरप्पा की महान् औपन्यासिक कृति । इस उपन्यास में लेखक ने महाभारत के पात्रों, स्थितियों और घटनाओं का जो वस्तुनिष्ठ आलेखन प्रस्तुत किया है, वह अदभुत और अनुपम है । महापारतकालीन भारत की सामाजिक संरचना क्या तत्कालीन इतिहास और परंपराओं के लंबे अरसे तक अनुसंघान, व्यापक भ्रमण और अध्ययन पर आधारित यह उपन्यास भारतीय साहित्य की महान् उपलब्धि है । अतीतोन्मुखी भारतीय जनमानस के साथ जुडे महाभारत के पात्रों के अलंकरण और चमत्कारों एवं अतिशयोक्तियों की कैचुली उतारकर उन्हें मानवीय धरातल पर साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करने के कारण यह उपन्यास वस्तुत: एक क्रांतिकारी जाते है । संक्षेप में इतना कहना ही शायद पर्याप्त हो कि 'पर्व' आधुनिक संदर्मों से जुडा महाभास्त का पुनराख्यान है ।
    'पर्व' का फलक भले ही महाभारत पर आधारित हो, लेकिन यह एक साहित्यिक कृति है-एक उपन्यास । पाठक इसे एक उपन्यास के रूप में ही स्वीकार करेंगे-ऐसा लेखक का अनुरोध है । 

  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan (Paperback)
    Mukesh Parmar
    90

    Item Code: #KGP-1306

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधरस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • Nau Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    120 108

    Item Code: #KGP-2088

    Availability: In stock

    नौ लघु नाटक
    हिंदी में नाट्य-लेखन संस्कृत नाटय-परंपरा और लोक-नाट्य के विविध रूपों से जुड़कर विकसित हुआ हैं । बाद में उस पर ग्रीक त्रासदी, पारसी शैली  और पश्चिमी रंग-शैलियों का असर भी दिखाई देता है ।  मंचीय नाटक बनाम पाठ्य नाटक की बहस भी हिंदी  में होती रही है । इधर हिंदी नाटय-लेखक और हिंदी  रंगमंच अपनी-अपनी दर्पमंडित घोषणाओं के वावजूद एक-दूसरे के पास ही आया है। एकांकी नाटकों-लेखन के विकास के पाशर्व में जहाँ रेडियो की  भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है, वहीं स्कूलों एवं कॉलेजों की नाट्य-संस्थाओं द्वारा महसूस की जाने वाली एकांकी नाटकों की ज़रूरत भी एक कारण रही है ।
    अजब बात है कि इधर एकांकी-लेखन कम हुआ है, पर उसकी जगह लघु नाटक एव नुक्कड़ नाटक ने ली है ।
    प्रताप सहगल रंगमंच से जुड़े हुए नाटककार के रूप में विख्यात हैं । उनके नाटक 'रंग बसंती', 'मौत को रात भर नहीं जाती' तथा 'अँधेरे में' आदि के मंचन बार-बार हुए हैं। अपने पिछले नाटक 'अन्वेषक' से उन्हें विशेष ख्याति मिली है ।
    'नौ लघु नाटक' में समय-समय पर लिखे गए नौ लघु नाटक संग्रह के रूप में आ रहे हैं । प्रताप सहगल का नाट्य-लेखन परंपरा एवं प्रयोगशीलता के संतुलन बिंदु पर खडा नजर आता है । अपनी इसी छवि के अनुरूप उनके इन लघु नाटकों में भी कहीं परंपरा की गंध मिलेगी तो कहीं प्रयोगशीलता की ललक । कहीं मूल्यों का भंजक रूप मिलेगा तो कहीं चरित्रों कै भीतर सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पेठ। इनमें से अनेक नाटक कई-कई बार मंचित हुए हैं और कई एक प्रकाशित होकर अपना पाठक वर्ग बना चुके हैं ।
    छोटे-छोटे शहरों, कस्बों तथा कॉलेजों एवं स्कूलों की नाट्य-मंडलियों को अच्छे लघु नाटकों की प्राय: तलाश रहती है। इस दृष्टि से भी यह संकलन महत्त्वपूर्ण है और लघु नाटकों के विकास की दृष्टि से भी ।