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423

  • grid
  • Brahm Kamal
    Swati Tiwari
    300 270

    Item Code: #KGP-497

    Availability: In stock


  • Shesh Parichay (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    200

    Item Code: #KGP-155

    Availability: In stock


  • Aazaadi Ke Geet
    Maitreyi Pushpa
    30

    Item Code: #KGP-938

    Availability: In stock


  • Saadat Hasan Manto Ke Natak
    Narendra Mohan
    400 360

    Item Code: #KGP-3

    Availability: In stock

    सआदत हसन मंटो के नाटक
    सआदत हसन मंटो के नाटकों से हिंदी पाठकों का उतना परिचय नहीं है जितना उनकी कहानियों से, जब कि उन्होंने उच्चकोटि के नाटक लिखे हैं । उनके नाटकों में विडम्बनापूर्ण  स्थितियों के दृश्यात्मक संयोजन के आधार पर चरमबिंदु  की रचना की गई है और फिर उसी में से उभरता है एंटी क्लाइमेक्स । कार्य-व्यापार को आलोकित करने की यह पद्धति, चरमबिंदु के साथ इस ढंग का सलूक मंटो के नाटय-कर्म का अहम हिस्सा है ।
    मंटो के नाटकों में व्यंग्य-दृष्टि और फार्स के साथ-साथ हास्य और क्रीडा का भी विधान हुआ है । इनमें मंटो की संवेदना और सोच का दायरा काफी विस्तृत है-वैयक्तिक कुंठाओं, आकांक्षाओं और सरोकारों से लेकर सामाजिक- राजनीतिक चिंताओं और विदूपताओं तक । ये नाटक श्रव्य माध्यम द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, अत: उर्दू हिंदी भाषाओं की साँझी विरासत हैं ।
    सआदत हसन मंटो के नाटक पुस्तक से मंटो के नाटकों को, उनके नाटककार रूप को पहली बार हिंदी पाठकों के सामने लाने का महत्त्वपूर्ग कार्य किया है हिंदी के जाने-माने नाटककार, कवि और आलोचक डॉ० नरेन्द्र मोहन ने । संपादकीय दृष्टि की वजह से यह मंटो के नाटकों का एक संकलन भर नहीं है, यह एक ऐसा दस्तावेज बन गया है जो पीढियों के फासले को पाटता हुआ हमसे आ जुड़ता है ।
    मंटो ने न आघुनिक्तावादी सांचा कबूल किया, न प्रगतिवादी । यह जिंदगी की जुराब के धागे को एक सिरे से पकड़कर उघेड़ता रहा और उसके साथ हम सब उधड़ते चले गए ।
  • Panchtantra Ke Natak (Paperback)
    Shri Prasad
    50

    Item Code: #KGP-1363

    Availability: In stock


  • The Mother Of All Books (Humour)
    Rajni Arun Kumar
    295 266

    Item Code: #KGP-352

    Availability: In stock

    From baby bump troubles to nappy changing woes, follow Sense’s humorous look at modern motherhood in India. From “Are you throwing up yet?” and “Where’s the belly? I want to see a belly!” to “Do you have milk?” and “No leaking?”, Sense has to grapple with not just her new found feelings with pregnancy and motherhood, but the barrage of oddly disturbing questions and advice from friends, family and so-called well-wishers.
    This book traces the journey of a young Indian couple through the eyes of the mother. As she goes through a myriad of ‘first time’ experiences, with often hilarious results, she hopes to get though motherhood with her sense of humour (and sanity) intact, all the while hoping she hasn’t permanently scarred the baby.

  • Hindi Ki Pratinidhi Kahaniyan Taatvik Vivechan
    Jayanti Prasad Nautiyal
    215 194

    Item Code: #KGP-542

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य पर अनुशीलन, साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कम ही हुआ है । कहानी साहित्य जहाँ एक ओर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है  वहीं दूसरी ओर कहानी  पाठक वर्ग बहुत विस्तीर्ण है, परंतु इतने विराट और व्यापक साहित्य पर आलोचना, समालोचना तथा तात्त्विक विवेचनपरक साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है । 
    इस पुस्तक में कथा तत्त्वों का विश्लेषण, शब्दार्थ एवं टिप्पणी खंड तथा व्याख्या खंड आदि का अनुशीलन उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम के बोर्डों, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किया गया है । 
    संक्षेप में कहें तो कह सकते हैं कि यह पुस्तक सम्पूर्ण भारत में विश्वविद्यालयों, बोर्डों, महाविद्यालयों आदि के प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, साथ ही यह पुस्तक शोधार्थियों, कथा साहित्य के गंभीर अध्येताओं, समालोचकों, समीक्षकों के लिए भी उपादेय सिद्ध होगी ।  इस पुस्तक को इस प्रकार लिखा गया है कि यदि सामान्य पाठक भी इसे पढ़ना चाहे तो उसे हिंदी कथा साहित्य की पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shaani
    Shaani
    200 180

    Item Code: #KGP-29

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार शानी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दोज़खी', 'जहाँपनाह जंगल', 'जली हुई रस्सी', 'जगह दो, रहमत के फरिश्ते आएंगे', डाली नहीं फूलती', 'बिरादरी', 'बोलने वाले जानवर', 'एक नाव के यात्री', 'चहल्लुम' तथा 'युद्ध'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक शानी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Antrang Saakshatkar
    Krishna Dutt Paliwal
    200 180

    Item Code: #KGP-621

    Availability: In stock


  • Rassakashi
    Nisha Bhargva
    300 270

    Item Code: #KGP-9220

    Availability: In stock

    निशा भार्गव हिन्दी की उल्लेखनीय हास्य व्यंग्य कवयित्रियों में अपना मुकाम रखती हैं। कुछ ही कवयित्रियां है जो मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर हास्य व्यंग्य की सृष्टि करती हैं। मेरा मानना है कि उन्होंने काव्य मंचों के माध्यम से और दूरदर्शन, आकाशवाणी में अपने काव्य पाठ से असंख्य श्रोताओं को आनंदित, उल्लसित किया है। इधर उनका नया काव्य संकलन 'रस्साकशी’ के शीर्षक से प्रकाशित हो रहा है जिसमें उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज और गहन गम्भीर शैली में आज के जीवन में व्याप्त विसंगतियों द्वंद्व को रेखांकित किया है।  जीवन में न्याय और अन्याय के बिच, सत्य और असत्य के बीच सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच जो द्वंद्व चल रहा है उसके बीच रस्साकशी जैसा माहौल बना हुआ है । रस्साकशी के इस माहोल में उत्पन्न तनाव से बचते हुए निशा भार्गव ने सरस, सारगर्भित और जनप्रिय रचनाएं लिखने का उद्यम जिया है उनके इस प्रयास से सदैव सकारात्मक प्रवृतियों की विजय के संकेत मिलते हैं। कविता का उद्देश्य भी लगभग यही है। तमाम निराशाओं-दुराशाओं के बीच आशा की किरण खोज लेना कवि कर्म का सबसे बडा उद्देश्य माना गया है । निशा भार्गव अपने इस प्रयत्न में पूर्णत: सफल हैं। उनमें एक संवेदनशील मन को सकारात्मक भाव से पेश करने का जज्बा हर कोण से दिखाई देता है। मैं उनक लेखन की सफ़लता की कानना करता हू ।
  • Samay Mein Vichar
    Prabhakar Shrotiya
    575 518

    Item Code: #KGP-830

    Availability: In stock

    समय में विचार
    ऐसी यथार्थपूर्ण, गहन, तर्कपुष्ट एवं झकझोरकर रख देने वाली अभिव्यक्ति हिंदी में कम ही हुई है। यह आश्चर्यचकित कर देने वाला तथ्य है कि शायद श्रोत्रिय जी का साहित्यिक पाठक इन आलेखों को पढ़ने के बाद सहसा विश्वास न कर सकेगा कि एक आलोचक अपने काल के प्रवहमान विचार-बिंदुओं पर भी इतनी गहराई, तन्मयता एवं राग से लिख सकता है। हमारे राष्ट्रीय जीवन की विडंबनाएं यदि यहां रेखांकित हैं तो सामाजिक जीवन की विसंगतियां भी उद्घाटित हैं। एक ओर अंतर्राष्ट्रीय जीवन की धड़कनों पर नज़र है तो दूसरी ओर वैश्वीकरण के छल-छद्म एवं राजनीतिक बिसात पर बिछे कूटनीतिक मोहरों की चालें भी लेखक की दृष्टि से नहीं बची हैं।...वर्तमान के अंतर्विरोध पर गहरी नज़र के साथ-साथ भविष्य की चिंताकुलता इन आलेखों का वैशिष्ट्य है।
    –पश्यंती
    ये निबंध जहां एक ओर पाठकों की कसौटी पर पहले से ही परीक्षित हैं, वहीं अपने समय के फलक पर वस्तुनिष्ठ चिंतन की एक ऐसी निर्मिति हैं, जिन्हें अपने समय, समाज और साहित्य के प्रति सजग एक लेखक का तत्त्व-चिंतन माना जाना चाहिए और यदि हम सुपरिचित लेखक शुकदेव सिंह के मत का आश्रय लें तो ‘ये निबंध (आज व्यक्तिवादी चित्तवृत्ति को केंद्र में लेकर लिखे जा रहे संपादकीयों के सापेक्ष) निबंधों के विकल्प के रूप में एक सात्त्विक विधा का आविष्कार हैं।’  
    –जनसत्ता, सबरंग
    श्रोत्रिय जी अकेले दम पर सच लिख रहे हैं, एक भारतीय मनुष्य के नैतिक विजन के साथ। उनकी निर्भीकता तीसरी दुनिया की मनीषा की निर्भीकता है, प्रदत्त स्थितियों और प्रयोजन की परिस्थितियों से मुठभेड़ की यह मनीषा उम्मीद जगाती है।...संरचना में आश्चर्यजनक अनुशासन का परिचय देते हुए कथ्यगत क्रांतिकारी आशय भर देना कोई श्रोत्रिय जी से सीखे। यह गद्यकला का नागर स्वभाव उन्होंने बड़ी साधना से अर्जित किया है।...यह उन रचनाकारों-आलोचकों का पथ है, जो स्वतंत्रता की बात करते हैं, आत्मा और विवेक को गिरवी नहीं रखना चाहते।...श्रोत्रिय जी जड़ सूत्रवादियों और अंध मतवादियों के उन तमाम विभ्रमों का खंडन करते हैं, जो स्वाधीनता को विचारहीनता मानते हैं। स्वाधीनता का तर्क विचारहीनता का पर्याय नहीं है, न ही हर बार अचूक अवसरवाद। स्वाधीनता व्यक्ति हो, समाज हो, राष्ट्र हो, सबसे अपना मूल्य मांगती है।...                      
    –समीक्षा
  • Videshi Mahilaon Ka Bharatprem (Paperback)
    M.A. Sameer
    160

    Item Code: #KGP-7082

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक ‘विदेशी महिलाओं का भारतप्रेम’ उन महिलाओं के विषय में लिखी गई है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारतभूमि की तथा भारत के लोगों की तन मन धन से सेवा एवं सहायता की। चाहे वे कोक्को सोमा हों या उनकी बेटी तोशिको, उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से भारत की सेवा की। इसी क्रम में आगे श्रीमती एनीबेसेंट, मारग्रेट कजिंस और एमिली शैंकल के नाम भी उल्लेखनीय हैं। इन महिलाओं ने जन्म भले ही भारतभूमि पर न लिया हो, लेकिन उनके भारतप्रेम को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनका भारत से घनिष्ठ संबंध है। उनके द्वारा दिए गए अविस्मरणीय योगदान को इस पुस्तक में सरल, सरस और रोचक शैली में उल्लिखित किया गया है। 
  • Das Pranidhini Kahaniyan : Akhilesh (Paperback)
    Sushil Sidharth
    250

    Item Code: #KGP-7191

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : अखिलेश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, श्रृंखला तथा अँधेरा।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अखिलेश   की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Andhere Ke Deep
    Shanta Kumar
    450 405

    Item Code: #KGP-661

    Availability: In stock

    अंधेरे के दीप प्रखर राष्ट्रवादी सोच के धनी राजनेता व लेखक शान्ता कुमार के लेखों का संग्रह है। इन लेखों के केंद्र में वर्ष 2008 से अक्टूबर 2014 के मध्य की वे घटनाएं/सक्रियताएं हैं जिन्होंने लेखक को उद्वेलित किया। लेखक ने अपनी हार्दिकता व बौद्धिकता के आलोक में इस उद्वेलन को विश्लेषित किया है। ये लेख आठ खंडों में संयोजित हैं--भ्रष्टाचार और राजनीति, गरीब और सामाजिक न्याय, आर्थिक परिदृश्य, न्यायपालिका, व्यक्ति-विशेष, संस्कृति, विविध एवं विदेशी निवेश। इनमें भी ‘भ्रष्टाचार और राजनीति’ पर सर्वाधिक लेख हैं। यह बात समझी जा सकती है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की घटनाएं देख-सुनकर कोई भी संवेदनशील मन व्यथित हो जाएगा। लेखक ने सक्रिय राजनीति में रहकर व्यवस्था, प्रशासन और सामान्यजन को बखूबी जाना-समझा है। यही अनुभव अब लेखों में व्यक्त हो रहा है। शान्ता कुमार कोई एक ज्वलंत घटना उदाहरणार्थ चुन लेते हैं और उसके बहाने स्वतंत्रता, समता, मानवाधिकार, सामाजिक मूल्य, मानवीय गरिमा, सामाजिक समरसता, विकास आदि पर सार्थक बहस छेड़ देते हैं। जैसे लोकतंत्र में बढ़ते परिवारतंत्र पर वे टिप्पणी करते हैं, ‘सत्ता की महत्त्वाकांक्षा और व्यक्तिगत स्वार्थ इतने बढ़ गए हैं कि परिवारवाद की इस प्रवृत्ति से अधिकांश कार्यकर्ता अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं, परंतु बोलते नहीं। राजनीति में आंतरिक लोकतंत्र किसी कारण समाप्त होता जा रहा है। ऐसा लगता है कि अधिकतर जगह धृतराष्ट्र का दरबार बन गया है जहां शुचिता और पवित्राता की द्रोपदी का चीरहरण हो रहा है...।’
    शान्ता कुमार की दृष्टि देश की अर्थव्यवस्था, न्याय-व्यवस्था, संस्कृति, पर्यावरण, ग्रामीण संरचना आदि पर भी गई है। अटल बिहारी वाजपेयी, स्वामी विवेकानंद, नरेन्द्र मोदी और वीर सावरकर पर लिखते हुए लेखक ने उन कारणों की तलाश की है जिन्होंने इनमें नेतृत्व की क्षमता विकसित की। सारे लेख सक्रिय आत्मीयता से भरे हैं। देशहित की चिंता ही इन लेखों का प्रेरक बिंदु है। इनको पढ़ते हुए पाठक अपने देश-परिवेश से रूबरू होता है। प्रामाणिकता व तार्किकता इन लेखों की विशेष शक्ति है। भाषा पारदर्शी है और शैली भावानुकूल।
  • Yug Nirmata Swami Dayanand
    Jagat Ram Arya
    140 126

    Item Code: #KGP-1005

    Availability: In stock

    युग-निर्माता स्वामी दयानन्द
    यह सचमुच बड़े दुःख और ग्लानि का विषय है कि जिस महान् ऋषि ने अपना जीवन आर्यों की एकता और आर्यावर्त के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया अपनी आवाज की सारी बुलंदी क्रांति घोष करने में लगा दी अपनी समस्त भावनाओं और कल्पनाओं को क्रांति-बीणा के सुर में मिला दिया, उन्हें ही काज लोग धमं-प्रचारक और समाज-सुधारक का दर्जा दिए हुए हैं । इससे यही सिद्ध होता है कि आने वाली आर्य-पीढी को उनकी क्रांतिकारी भावनाओं से परिचित नहीं कराया गया, राष्ट्र-निर्माता के रूप में उनके स्वरुप को उभारा नहीं गया । जबकि सच्चाई यह है कि अगर भारतवासी उनके बताए मार्ग पर चलते तो इसमें संदेह नहीं कि भारत को सी वर्ष पूर्व ही गुलामी से मुक्ति मिल जाती ।

  • Maharishi Dayanand Saraswati Aur Stree-Vimarsh
    Dr. Meena Sharma
    165 149

    Item Code: #KGP-1243

    Availability: In stock

    महर्षि दयानंद सरस्वती और स्त्री-विमर्श
    महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श में वैचारिकता से अधिक रचनात्मकता है। अपनी रचनात्मकता के कारण उसकी मूल्यवत्ता एवं सार्थकता है। मूल्य और सार्थकता की तलाश हर युग में होती है। आज के स्त्री-विमर्श की दिशाहीनता की स्थिति एवं चुनौतियों के आलोक में दिशा-निर्देशक के रूप में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श, बल्कि यूँ कहें कि स्त्री के दयानंदीय विमर्श की आवश्यकता कल से अधिक आज है। इतिहास में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श की जो भूमिका थी, वर्तमान में स्त्री-विमर्श की उस भूमिका को इतिहास-बोध के साथ युगानुरूप विस्तार दिया जा सकता है।
  • Himalaya Gaatha (2) Parv-Utsav
    Sudarshan Vashishath
    300 270

    Item Code: #KGP-167

    Availability: In stock


  • Sahachar Hai Samay
    Ramdarash Mishra
    800 640

    Item Code: #KGP-124

    Availability: In stock

    सहचर है समय
    रामदरश मिश्र का समय को सहचर मानना प्रकारांतर से 'स्व' और 'समय' के संबंधों की द्वंद्वात्मकता और सामंजस्य की ओर संकेत करता है । इस आत्मवृत्त से एक ओर कछार के अंचल में बीते बचपन से लेकर वाराणसी में उच्च शिक्षा, जीविका-संघर्ष, गुजरात-प्रवास, दिल्ली- आगमन, बहुआयामी रचनाशीलता और दिल्ली के साहित्यिक परिवेश से जुड़े मार्मिक प्रसंगों का जुलूस उमड़ पड़ा है, दूसरी ओर इसी के समानांतर स्वतंत्रता-पूर्व का ग्रामीण परिवेश, स्वतंत्रता और जनतांत्रिक आकांक्षाएँ, व्यवस्था के अंतर्विरोध, अध्यापन-जगत की राजनीति, भारत-पाक युद्ध, आपातकाल, इंदिरा गाँधी का निधन, सिख-विरोधी हिंसा यानी कि पचास वर्षों का जीवंत इतिहास अपनी अनेक विशेषताओं और कुरूपताओं के साथ उभरा है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक रचनाकारों और कलाकारों ने आत्मकथाएँ लिखी हैं। अधिकतर चर्चित आत्मकथाओं में काम-संबंधों की सनसनी परोसने या स्वयं को 'अतिविशिष्ट' सिद्ध करने की जो प्रवृत्ति मुखर है, 'सहचर है समय' से उसका अभाव है । अत: यह आकस्मिक नहीं कि रामदरश मिश्र का प्रस्तुत आत्मवृत्त अमृता प्रीतम, हंसा वाडेकर, दुर्गा छोटे, कमला दास और पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' आदि की आत्मकथाओं से अलग किस्म का बन पडा है ।
    'सहचर है समय' का प्रस्थान बिंदु जीवन के प्रति गहरी आस्था है । मिश्र जी ने अपने जन्म लेते ही कीड़े-मकोडों के चलते मौत के मुँह में चले जाने और पडोस की एक बुआ के हाथों बनाए जाने का उल्लेख क्रिया है। इस घटना को अर्थविस्तार देते हुए उन्होंने लिखा है :
    'मेरी जीवन-यात्रा से कीड़े-मकोड़े भी खूब मिले, लेकिन मुझे उनसे बचाने वाली शक्तियां भी मिलती ही गईं । कीड़े-मकोड़े तो सभी को मिलते हैं, किसी-किसी को तो साफ ही कर जाते हैं, उनकी जिजीविषा, उनके जीवन- मूल्य सभी को चट कर जाते हैं, लेकिन मुझे जिजीविषा मिली है । जीवन के प्रति अगाध विश्वास, निष्ठा और मूल्य मिला है इसीलिए कि कीड़े-मकोडों के बावजूद जीवनदायक कोई न कोई शक्ति, रस मुझे देर-सबेर मिलता ही रहा है ।'
    प्रारंभ से ही स्वप्नदर्शिता का जिक्र भी हैं :
    'तब कुत्ता पाला था, अब सपने पालता हूँ अपने लिए, समाज के लिए, देश के लिए । वे छीन लिए जाते हैं, छीनकर किसी और को दे दिए जाते है, या तोड़ दिए जाते हैं—अपनों द्वारा भी और दूसरों द्वारा भी। ...लेकिन न जाने क्या है कि मैं टूटा नहीं, बिखरा नहीं, मिट-मिटकर बनता हूँ। गिर-गिरकर उठता गया हूँ, भटक-भटककर रास्ते पर आ गया हूँ।'
    सपने पालना, सपनों का टूटना-बिखरना, स्वयं के टूटने की स्थिति, लेकिन जीवनदायक शक्तियों और दृढ़ आस्था के फलस्वरूप आखिरकार सँभल जाना-यही मिश्र जी की अब तक की जीवन-यात्रा है। आज के स्वार्थ-संकुल परिवेश में टूटना-बिखरना किसी संवेदनशील बुद्धिजीवी की अनिवार्य नियति है । लेकिन बिना कुंठित  और निराश हुए अंतत: परिवार के भरेपूरेपन का संतोष महसूसना सबका सौभाग्य नहीं होता ।
    मिश्र जी ने अपने आत्मवृत्त का समापन करते हुए लिखा है : 'अनेक सांसारिक अनुपलब्धियों के बावजूद परिवार का यह भरापूरापन हमें मिला है, उससे हम बहुत प्यार करते हैं । जिस किसी शक्ति के कारण हमें यह वरदान मिला है, उसके प्रति हम गहरा आभार व्यक्त करते हैं...।'
  • Andher Nagari : Srijan-Vishleshan Aur Paath
    Ramesh Gautam
    80 72

    Item Code: #KGP-9131

    Availability: In stock


  • Rajbhasha Hindi Aur Uska Vikas
    Hiralal Bachhotia
    200 180

    Item Code: #KGP-116

    Availability: In stock

    राजभाषा हिंदी और उसका विकास
    हिंदी भाषा की बात करते हुए आम तौर पर हिंदी साहित्य का अर्थ लिया जाता है, किंतु आज हिंदी के क्षेत्र में बड़ा विस्तार हुआ है। उसके सरोकारों में भी विस्तार हुआ है। हिंदी के निर्माण में साधु-संतों के साथ-साथ सूफी फकीरों का भी योगदान रहा है। खड़ी बोली, दकिनी किस प्रकार साहित्यिक हिंदी बनी यह भी इसके विकास-आयाम हैं। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में हिंदी को राष्ट्रभाषा का गौरवपूर्ण स्थान मिला। हिंदी-प्रचार राष्ट्रीय कार्यक्रम माना गया। उसकी विविध भूमिकाएं राजभाषा, संपर्क भाषा, राष्ट्रभाषा के रूप मंे विकसित हुईं। संविधान में हिंदी को राजभाषा की गरिमा प्रदान की गई।
    संविधान में राजभाषा हिंदी के प्रावधानों के संदर्भ में विस्तार में जाएं तो कार्य करने की इच्छा, क्रियान्वयन के लिए हिंदी में कार्य करने का ज्ञान अवश्यंभावी है। इस दृष्टि से व्यावहारिक व्याकरण, वर्तनी, शब्द-प्रयोग और सबसे बढ़कर कार्यालयीन पत्र-व्यवहार आदि की सोदाहरण प्रस्तुति और भाषा संबंधी जागरूकता निर्माण इस पुस्तक की अपनी विशेषता है। 
  • Chintan Karen Chintamukt Rahen (Paperback)
    Swed Marten
    80

    Item Code: #KGP-1248

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं । 
  • Aarsa Sahitya Mein Moolbhoot Vigyan
    Vishnu Dutt Sharma
    220 198

    Item Code: #KGP-774

    Availability: In stock

    प्राचीन भारत में वैज्ञानिकों की कोई कमी नहीं थी। इनका विवरण अनेक आर्ष साहित्य में उपलब्ध है। वास्तव में भारतीय वैज्ञानिकों के धार्मिक एवं दार्शनिक पक्षों को देखकर ही उन्हें ऋषियों की श्रेणी में रखा तथा उनके वैज्ञानिक योगदान के महत्त्व को कम कर दिया गया और उसका समुचित रूप से मूल्यांकन भी नहीं किया गया। वैदिक काल से गुप्तकाल (400 ई. पूर्व) तक विज्ञान के सिद्धांत एवं वैज्ञानिक पद्धति के विषय में महत्त्वपूर्ण कार्य हुए किंतु दुर्भाग्य से प्राचीन भारतीय विज्ञान के विकास का समुचित विश्लेषणात्मक अध्ययन नहीं हो पाया है।
    प्रस्तुत शोध-ग्रंथ ‘आर्ष साहितय में मूलभूत विज्ञान’ के लेखक डाॅ. विष्णुदत्त शर्मा द्वारा प्राचीन भारतीय विद्वानों के सिद्धांतों की परिपुष्टि को प्रकाश में लाया गया है। आशा है, प्रबुद्ध पाठक प्रस्तुत ग्रंथ में वर्णित भारतीय परिव्राजकों द्वारा किए गए अनुसंधानों तथा कालांतर में ये ही शोध-कार्य पश्चिमी देशों की मोहर लगकर भारत मं आयातित विज्ञान के तथ्य को जानने का प्रयास करेंगे। आशा ही नहीं अपितु विश्वास है कि यह पुस्तक शोधकत्र्ताओं और विज्ञान एवं अध्यात्म में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए समान रूप से रोचक होगी।
  • Paanch Rang Naatak
    Pratap Sehgal
    495 446

    Item Code: #KGP-767

    Availability: In stock

    पाँच रंग नाटक
    हिंदी में अच्छे नाटकों की कमी की दुहाई हमेशा दी जाती है । अच्छे नाटकों की कमी विश्व की किस भाषा में नहीं है, इसलिए हिंदी को अपवाद मानना सही नहीं है । यह भी सच है कि हिंदी रंगमंच के विकास एवं विस्तार के साथ-साथ नाटकों की कमी गहरे  स्तर पर खलने लगी तो विदेशी एवं हिंदीतर भारतीय भाषाओँ के नाटकों के अनुवाद/रूपांतर का प्रचलन बढा । यह प्रक्रिया स्वस्भाविक  ही है । रंगमंच के विकास ने हिंदी के कई लेखकों को अपनी ओर आकृष्ट किया और साहित्य की अन्य विधाओं में लिखने वाले नाट्य-लेखन में प्रवृत्त हुए ।  इस तरह से हिंदी के नाटक भी हुए और हिंदीतर भाषाओं के भी । 
    प्रताप सहगल कविता से नाटक की और प्रवृत्त हुए है और उन्होंने
    नाट्य-लेखन को रंगमंच से जोड़कर ही देखा है, इसलिए उनके
    नाटकों में नाटकीय गत्यात्मकता, नाटकीय बिम्ब और नाटकीय
    शब्द भरपूर मिलता है । उनका मानना है कि नाटक के संवादों में
    अभिनय-कला को उजागर करने की जगह जरूर होनी चाहिए । 
    गत दो दशकों में उन्होंने नाटक के विविध रूपों को अपने 'संप्रेष्य' का माध्यम बनाया है । प्रस्तुत 'पाँच रंग नाटक' उनके विपुल नाट्य-लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । यहीं 'अन्वेषक' हैं 'रंग बसंतो', 'मौत क्यों रात भर नहीं आती', 'अँधेरे में’ तथा 'नहीं कोई अंत'--पाँच नाटक मौजूद हैं।
    'अन्वेषक' को जहाँ विज्ञान-नाटक नाम से एक नई नाट्य-धारा की शुरुआत माना जा रहा है, वहीं 'रंग बसंती' भगतसिंह के जीवन एवं समय को ब्रेख्तियन रंग-शैली की परंपरा में नाट्यांकित  करता है । 'मोत क्यों रात पर नहीं आती' फार्स और यथार्थ का मिला-जुला प्रारूप है तो 'नहीं कोई अंत’ यथार्थवादी नाटकों की श्रेणी में रखा जा सकता है । 'अँधेरे में' नाटक में तो ब्लैक कॉमेडी निहित है ही ।
    अपनी अलग-अलग भंगिमाओं एवं प्रस्तावनाओं के कारण ये सभी नाटक देश के विभिन्न छोटे-बड़े नगरों में बार-बार  खेले गए है और इन्होंने कई बहसों, विवादों और संवादों को जन्म दिया है । अब वे पांचों रंग नाटक एक ही जिल्द में, ताकि इधर-उधर भटना न पड़े ।
  • Sant Tiruvalluvar
    Hari Krishna Devsare
    120 108

    Item Code: #KGP-9325

    Availability: In stock

    संत वळ्ळूवर
    हे दरिद्रता के आराधक-
    सहज पुजारी
    दिव्य तुम्हारा, बंधा नहीं है उन शब्दों में
    कोई वाणी तुमको व्यक्त नहीं कर पाई अब तक-
    यह संसार, परिवर्तनशील हे, सभी मत्य हैं
    किंतु तुम्हारी सुकीर्ति अमर है
    क्योंकि तुम हो विश्व मानव के चारण
    वन प्रांतर के ताड़-पत्र सी
    निःसृत ध्वनि से
    भरा हुआ है जिसका अंतर, हे वळ्ळुवर
    इन कुरलों में भरा हुआ है
    आदि सत्य, पूरा भविष्य, पूरा आगत ही
    सुख का स्वप्नातीत सत्य सब
    जन्म जन्मांतर के रहस्य-क्रम बंदी है
    यह चिंतन को क्षेत्र
    तुम विराट हो, तुम व्यापक हो
    जो शाश्वत स्वर प्रतिगुंजित है
    सहज पदों में,
    वे उज्ज्वत हें, परिच्छेद सब
    सदा रहेंगे शाश्वत
    अनुगायक होकर मनुष्य के;
    जो रहस्य है, भरा कुरल में
    शब्द-रंध्र में भाव संधि में
    सागर का उद्वेलन जिसमें
    नभ में छाए श्यामल घन में (भी दिखते तुम)
    दूर-दूर तक तुम प्रतिगुंजित
    दूर-दूर तक, अणु-अणु क्रम में
    व्याप्त तुम्हारे गीतों के स्वर
    विश्व की मानवता के तुम पथबंधु,
    निष्कलंक आत्म-द्रष्टा!

    -डाॅ जी. यू. पोप (हिंदी अनुवाद: एन. सुंदरम)
  • Yajurveda : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-241

    Availability: In stock

    यजुर्वेद : युवाओं के लिए 
    'वेद : युवाओं के लिए' ग्रन्थमाला की तीसरी पुस्तक 'यजुर्वेद : युवाओं के लिए' प्रस्तुत है । इसमें यजुर्वेद के 112 मन्त्रों को ऋग्वेद की तरह दस शीर्षकों के अंतर्गत समाहित किया गया है । ज्ञान-शिक्षा, स्वास्थ्य-योग, मानसिक स्वास्थ्य, धर्म-नैतिकता, अर्थ-धनैश्वर्य, घर-परिवार, समाज, राष्ट्र, पर्यावरण तथा वैश्विकता जैसे विषयों पर इन मन्त्रों के माध्यम से चर्चा हुई है । यजुर्वेद मुख्यतः कर्म से सम्बद्ध है । यह 'कर्म' यज्ञ है, जिसे यहाँ श्रेष्ठतम बताया गया है । पारम्परिक दृष्टि से 'यज्ञ' का सीमित अर्थ होता है — अग्नि में आहुति देना । परन्तु 'यज्ञ' का व्यापक अर्थ भी है, जहाँ समर्पण भाव मुख्य रहता है । अतः समाजोपयोगी सभी कर्म यघ के अंतर्गत आ जाते हैं । 
    इन मन्त्रों ऐसा यघ, दीघार्यु व धन-सम्पति तथा सुरक्षादि पाने  प्रार्थनाएं हैं । क्रीड़ा, योगादि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं । धर्म कर्तव्य तथा नैतिकता से जुड़ा है । यह लोभ प्रवृत्ति ही है, जिससे संसार में उपभोक्तावाद के बढ़ावा मिलता है । बल्ह के कारन एक ओर भय व आतंक पनपते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण प्रदुषण होता है । आधुनिक युग में यज्ञपरक जीवन परोपकार भावना से युक्त मानव-जनों की अपेक्षा है । शांति, विश्रांति और आनंद की चाह है सबको । वह कैसे मिले ? यही मंत्र निर्देश करते हैं । 'विश्व-शांति' के लिए किया जाने वाला 'शांतिपाठ' इसी वेद की देन है । 
    यह पुस्तक उन सभी के लिए भी है, जो 'मन के युवा हैं' तथा प्राचीन ज्ञान को आधुनिक सन्दर्भों में समझना चाहते हैं । 
  • Sahitya Vimarsh
    Jayanti Prasad Nautiyal
    195 176

    Item Code: #KGP-9098

    Availability: In stock


  • Kaalaateet
    Mudra Rakshes
    160 144

    Item Code: #KGP-9093

    Availability: In stock


  • Baat Meri Kavita
    Trilochan
    325 293

    Item Code: #KGP-1907

    Availability: In stock

    बात मेरी कविता
    त्रिलोचन भले बोलते न दिख रहे हों, उनकी कविता बोल रही है और बोलती रहेगी--इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता।
    ऐसे सैकड़ों शब्द हैं, जिनका आधुनिक कविता में प्रयोग त्रिलोचन के अलावा किसी ने नहीं किया। हिंदी कविता इसलिए भी उनके प्रति हमेशा कृतज्ञ रहेगी कि एक ऐसे युग में, जिसमें कविता की शब्द-संपदा लगातार घटती गई है, वह उन बिरलों में से थे, जो इस संपदा में कुछ नया बराबर जोड़ते रहे और इस तरह हिंदी की प्राणधारा को पूर्णतया बनाए रखने की चेष्टा की।
    यह निरी भाषिक विविधता का मामला नहीं है। यह विविधता आती ही है जीवन की उस सहज विपुलता से, जिसके त्रिलोचन एक लगभग ज़िद्दी कवि हैं।
    --अशोक वाजपेयी
    ० 
    त्रिलोचन की कविता में आवेगों की रास तनी रहती है। वह उसे उन्मुक्त नहीं छोड़ते। कविता का स्वर सधा हुआ है। पिच बहुत ऊपर-नीचे नहीं जाता। रोमैंटिक कविता से बने पाठकीय संस्कार के साथ त्रिलोचन की कविता के करीब आना इसलिए कई बार बहुत कठिन होता है। उसे पढ़ने के लिए एक अभ्यास और कविता का एक अलग संस्कार चाहिए। उसमें एक क्लासिकीय काव्य-संयम है। --राजेश जोशी
  • Dharmkshetre Kurukshetre
    Shanker Shesh
    70 63

    Item Code: #KGP-2014

    Availability: In stock

    धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे 
    धृतराष्ट्र का विवाह! अंधे को चतुर्भुज बनाना ! कोण देगा अनंत अँधेरे को अपनी कन्या ? कौन करेगा अपंग जीवन का वरण ? प्रश्न टेढा था । सत्यवती दबाव डाल रही यी। लगातार पडी थी  मेरे पीछे ।
    माँ को तो एक बार समझा भी लो, दादी को समझाना कठिन होता है । पौत्र चाहे लूला हो, लँगडा हो, अपाहिज हो, लेकिन उसका ब्याह होना बहुत जरूरी है । आज़ तक समझ में नहीं आया, मौका पाते ही एक स्त्री दूसरी स्त्री पर अत्याचार क्यों करने लगती है । सत्यवती क्यों नहीं सोचती ।  अंधे से ब्याह करने वाली लड़की को आजन्म कारावास भोगना पडेगा । सारी जिदगी अंधे की पत्नी कहाना होया । राजघराने का आदमी हुआ तो क्या हुआ, अंधा तो अंधा है,  रहेगा । लेकिन सत्यवती को समझाता कौन ! मेरा पिता तो उसे समझा नहीं सका, फिर मैं किस खेत की मूली था !
    इच्छा  हुई अपना उदाहरण सामने क्यों न रखूँ। आखिर मैं भी पूरे जीवन बिना स्वी के रह सका या नहीं । सशक्त ददेवपुत्र-सा दिखाई देन वाला में । तो यह 'अंधा क्यों नहीं रह सकता । मेरे मामले में  सत्यवती इतनी कठोर क्यों हो गई थी और अब पौत्र  के मामले में। (इसी उपन्यास से)
  • Chhuttiyan
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-2095

    Availability: In stock

    छुट्टियाँ
    पूरी मनाली एक अनपढी पुस्तक की भांति सामने खुली थी । इसे कितनी ही बार पढ़ो, हर बार यह बिलकुल ताजी, अनछुई-सी जान पड़ेगी, विद्रोही जी ने सोचा । फिर मीरा को इशारे से बताया, “वह देख रही हो—नीचे, सामने, उधर दूर पर, वो पतली-सी सड़क । हाँ, हाँ, वही, जिस पर अभी एक मोटर आती दिखाई दी थी । वह कुल्लू-मनाली सड़क है । उसी से होकर कल शाम हम यहीं पहुँचे थे... " 
    सफ़रनामे, कहानी, कविता, फंतासी, रपट और व्यंग्य आदि विधाओं को अपने  में घुलाती-मिलाती अजितकुमार की यह प्रथम औपन्यासिक रचना 'छुट्टियाँ' उसी अर्थ में एक उपन्यास है, जिसमें अजितकुमार के लिए 'कविता के रूप में प्रस्तुत प्रत्येक रचना कविता है और वह भी कविता है जो भले ही उस रूप में न प्रस्तुत की गई हो पर किसी को कविता प्रतीत हो ।'
    साहित्यिक विधाओं की परस्पर घुसपैठ के इस युग में, जब उपन्यास की अलग पहचान गुम हो चली हो और वह ऐतिहासिक, सामाजिक, जासूसी, फुटपाथी आदि शिकंजों में फाँस दिया गया हो. 'छुट्टियां' प्रमुखत: कुतूहल पर आधारित है, बावजूद इस भय के कि हिंदी के अतिवृद्ध और अकालवृद्ध परिवेश में, उसे बालोपयोगी या किशोरोपयोगी समझ लिया जाएगा ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Jainendra Kumar
    Jainendra Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-2070

    Availability: In stock

    जैनेन्द्र कुमार

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फांसी', 'पाजेब, 'फोटोग्राफी', 'मास्टर जी', 'अपना-अपना भाग्य', 'जाह्नवी', 'एक रात', 'साधु की हठ', 'नीलम देश की राजकन्या' तथा 'चलित-चित'  ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक जैनेन्द्र कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jigyaasa
    Bhairppa
    250 225

    Item Code: #KGP-214

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nirmal Verma (Paperback)
    Nirmal Verma
    100

    Item Code: #KGP-1263

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : निर्मल वर्मा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार निर्मल वर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दहलीज', 'लवर्स', 'जलती झाडी', 'लंदन की एक रात', 'उनके कमरे'', 'डेढ़ इंच ऊपर', 'पिता और प्रेम', 'वीकएंड', जिंदगी यहाँ और वहाँ' तथा 'आदमी और लड़की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक निर्मल वर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mridula Garg (Paperback)
    Mridula Garg
    100

    Item Code: #KGP-7015

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मृदुला गर्ग
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मृदुला गर्ग  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'ग्लेशियर से', 'टोपी' , 'शहर के नाम', 'उधार की हवा', 'वह मैं ही थी', 'उर्फ सैम', 'मंजूर-नामंजूर', 'इक्कीसवीं सदी का पेड़', 'वो दूसरी' तथा 'जूते का जोड़', 'गोभी का तोड़' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मृदुला गर्ग की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Pracheen Tutan Kahaniyan
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-07

    Availability: In stock

    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
  • Kavi Ne Kaha : Jitendra Shrivastva (Paperback)
    Jitendra Shrivastva
    140

    Item Code: #KGP-7018

    Availability: In stock

    पिछली सदी के आखिरी दशक में एक धमक की तरह काव्य-परिदृश्य पर उपस्थित हुए कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव आज नयी सदी की कविता के सर्वाधिक प्रशंसित और अनिवार्य कवि हैं। बाजारू प्रलोभनों से बचाकर हिंदी कविता को विश्वसनीय बनाए रखने के प्रति सर्जनात्मक सजगता जितेन्द्र को अपने समकालीनों में अलग पहचान दिलाती है। हमेशा करुणा, प्रेम और उम्मीद का पक्ष लेती हुई जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने आसपास पसरी हुई त्रासदी, अन्याय और दुःख के राजनीतिक तात्पर्यों का साहसिक उद्घाटन भी करती चलती है। जैसा कि होना चाहिए--गहन रूप से राजनीतिक होकर भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने स्वभाव में मानवीय, मार्मिक और भावनात्मक रूप से आर्द्र बनी रहती है।
    जितेन्द्र के लिए, कविता मनुष्य की नैसर्गिक संवेदनाओं को परिमार्जित करने का माध्यम है। मानवीय जिजीविषा के बहुविधि संस्तरों से साक्षात्कार के क्रम में उनकी कविता को कलात्मक मेयार की कठिनतर ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए देखा जा सकता है। नयी सदी की कविता के भाषिक और संवेदनात्मक आचरण को उदाहरणीय बनाने में जिन थोड़े कवियों का योगदान है, उनमें जितेन्द्र श्रीवास्तव अलग से ध्यान खींचते हैं।
    स्त्री, दलित, उत्पीड़ित और मार्जिनलाइज्ड समाज के तमाम अंतरंग जीवन-प्रसंगों से निर्मित जितेन्द्र की कविता का वितान बहुआयामी तो है ही, इसकी हदें इतिहास से लेकर भविष्य के अनिश्चय भरे अँधेरों तक व्याप्त हैं। जहाँ तक विमर्शों का प्रश्न है कविता में कला का सौंदर्य बचाते हुए जितेन्द्र को पूरे काव्यात्मक संतुलन के साथ, विमर्शों में कारगर हस्तक्षेप करते हुए देखा जा सकता है।
    कविता के प्रति पाठकों की घटती हुई अभिरुचि के प्रतिकूल माहौल में भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अनेक तरह के सांस्कृतिक समूहों और आर्थिक-राजनीतिक रुझानों के पाठकों में समान प्रशंसा और प्रतिष्ठापूर्वक पढ़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि उनकी कविताओं का यह चयन पाठकों की संवेदना को स्पंदित करने में सफल रहेगा।
  • Tab Aur Ab
    Alok Mehta
    595 536

    Item Code: #KGP-656

    Availability: In stock

    तब और अब
    अखबार  के बारे  में सामान्यत यह धारणा होती है कि सुबह होने के दो घंटे बाद उसकी उपयोगिता नहीं रहती । खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के युग से छपे हुए शब्दों के महत्त्व पर भी सवाल उठने लगे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाए तो पता चलेगा कि छपे हुए शब्दों से हर दिन इतिहास का एक नया पन्ना बनता है । राजाओं के दरबार रहे हो या ब्रिटिश शासन अथवा आजादी के बाद बनी लोकतांत्रिक सरकारों ने पिछले 60 वर्षों से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक बदलाव पर विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करके रखा होगा । फिर भी ऐसी हजारों घटनाएं, तथ्य, अंतर्कथाएँ हैं, जो किसी सरकारी या गैरसरकारी दस्तावेजो से नहीं मिलेगी । इंटरनेट तो हाल के वर्षों में आया है और उसमें हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों या पत्रिकाओं में प्रकाशित महत्त्वपूर्ण बाते उपलब्ध नहीं होगी। 
    इस पुस्तक की टिप्पणियों तात्कातिक परिस्थितियों से प्रभावित रही हैं और आज के संदर्भ में संभव है, उन पर दूसरे ढंग से सोचने की स्थिति बनती है। तब भी पुरानी घटनाएँ और परिस्थितियाँ नई सुबह के लिए सबक देती हैं । इस पुस्तक की अधिकांश टिप्पणियाँ नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तानम दैनिक भास्कर और आउटलुक साप्ताहिक में रहते हुए लिखी गई हैं और कुछ टिप्पणियाँ संपादकीय रूप में होने के कारण संक्षिप्त हैं । इस दृष्टी से यह अपने पत्रकारीय कास का लेखा- जोखा भी है और पाठको के लिए अधिक उपयोगी संदर्भ सामग्री भी ।
  • Million Dollar Not Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    60

    Item Code: #KGP-1419

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात है ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Aapki Pratiksha
    Shyam Vimal
    270 243

    Item Code: #KGP-555

    Availability: In stock

    आपकी प्रतीक्षा
    सच भी कई बार कल्पना को ओढ़कर नई भंगिमा अपनाकर कागज की पीठ पर सवार होने को आतुर हो उठता है। अथवा यूं भी कहा जा सकता है कि कल्पना कभी-कभी सच-सी भ्रमित करने लगती है और रिश्ते बदनाम होने लगते हैं।
    जैसे होता है न, मरे हुए कीट-पतिंगे को, गिरे हुए मिठाई के टुकड़े को समग्रतः घेरे हुए लाल चींटियां आक्रांत वस्तु की पहचान को भ्रमित कर देती हैं। यदि ऐसा भ्रम मृत कीट या मिठाई-सा इस रचना से बने तो समझ लो आपने रचना का मज़ा लूट लिया।
    उपन्यासकार को आश्वासन दिया गया था पत्रा का सिलसिला जारी रहने का इस वाक्य के साथ--
    ‘यह वह धारा है जो क्षीण हो सकती है, पर टूटेगी नहीं।
    परंतु वह सारस्वत धारा तो लुप्त हो गई!
    क्या प्रतीक्षा में रहते रहा जाए?
    अंजना की दूसरी जिंदगी कैसे निभ रही होगी?’
  • Mandra
    Bhairppa
    600 480

    Item Code: #KGP-221

    Availability: In stock


  • Amar Ho Gaya Magar
    Ramesh Bedi
    50

    Item Code: #KGP-1197

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Shriprakash Shukla (Paperback)
    Shri Prakash Shukla
    140

    Item Code: #KGP-7017

    Availability: In stock

    रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि हैं। इनके पहले कविता संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ (1999) से लेकर पाँचवें कविता संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ (2014) तक की कविताओं से गुजरकर कविता प्रेमियों को काव्य स्वाद का सुखद अहसास होता है। अपनी कविताओं में ये बिना किसी नारेबाजी व आयातित विमर्श का हौवा खड़ा किए सधे हुए स्वर में सामाजिक  विसंगतियों, क्रूरताओं, धार्मिक ढकोसलों, आर्थिक पराभवों और सांस्कृतिक क्षरण पर सीधे वार करते हैं। इनकी कविता की दुनिया में राजनीति व विचारधारा की एक पक्षधर दुनिया गुँथी हुई होती है जिसमें गरीब, पीड़ित व उपेक्षित वर्ग के प्रति गहरी रागात्मक चेतना मौजूद है।
    लेकिन उपर्युक्त बातों के साथ-साथ जिस वैशिष्ट्य के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता में ज्यादा चर्चित हैं वह हैं इनकी विषयगत वैविध्यता और गहरी लोकोन्मुखता। अपनी कविताओं में वे महज लोक का चित्रण नहीं करते बल्कि लोक के क्षरण के कारणों की शिनाख्त भी करते हैं। नवउदारवाद और पूँजीवादी शक्तियों के आक्रमण, दमन, शोषण और चालाकियों का प्रतिरोध करने वाली इनकी कविता जनोन्मुखी व लोकोन्मुखी तो है ही, इसमें स्थानीयता के साथ वैश्विकता के तत्त्व भी समाहित हैं जहाँ पुराने के साथ परंपरा से रिश्ते रखने वाला नया समाज तो है ही, एक आधुनिक चेतना भी मौजूद है।
    इसी के साथ गौरतलब है कि प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के चित्रों से भरपूर कवि का कविता संसार विविध वर्णों से युक्त है जहाँ कविता की धार अपनी भाषिक व्यंजना के रेडिकल भावभूमि पर विकसित होती है। यहाँ कहते हुए ख़ुशी होती है कि इस कवि ने अपने को कहीं रिपीट नहीं किया है और इसी कारण इनकी कविता बहुवस्तुस्पर्शी उध्र्वमुखी चेतना से संपन्न है जो एक समर्थ कवि का लक्षण है। भाषा की सादगी और बिंबों की निजता इनके कवि- स्वभाव की विलक्षण विशेषता है। कह सकते हैं कि भाषा के लोक स्वीकृत विन्यास को चुनौती देती इनकी कविताओं में व्यंग्य व वक्रता का एक सघन संसार उपस्थित होता है जहाँ भाषायी मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर का औदात्य भी मिलता है जो इनकी कविताओं को रेडिकल बनाता है।
    उम्मीद की जानी चाहिए कि कविता का यह संचयन कवि की काव्य संपदा और उनकी सामर्थ्य से अपने पाठकों को परिचित कराने में समर्थ होगा।
  • Maut Kyoun Raat Bhar Nahin Aati
    Pratap Sehgal
    50 45

    Item Code: #KGP-1815

    Availability: In stock

    मौत क्यों रात भर नहीं आती
    'मौत क्यों रात भर नहीं आती' की शुरुआत तो एक यथार्थवादी नाटक की तरह से होती है, लेकिन ज्यों-ज्यों यह आगे बढ़ता है, एक 'फार्स' की शक्ल अख्तियार कर लेता है । अपने पूरे घटनाक्रम में नाटक मध्य- वर्गीय मानसिकता एवं मूल्यों पर हलकी-हलकी चोट करता चलता है ।
    इस नाटक की दिलचस्प बात इसके दो अंत है । किसी भी घटनाक्रम का एक ही अंत हो सकता है, लेकिन संभावना के स्तर पर नाटककार कई तरह के 'अंत' सोच सकता है । यह भी एक तरह से 'फार्स' ही तो है । नाटक की भाषा धुर सिरे से धुर सिरे तक बोलचाल की ही भाषा है ।
    विभिन्न रंग-मंडलियों ने इसे अपने-जपने तरीके से खेला है, जिससे साफ जाहिर होता है कि इसमें खेले जाने की अनंत राहें मौजूद है ।
    हिंदी के प्रतिष्ठित नाटककार प्रताप सहगल का यह नाटक उनके लिए, जो खेलने के लिए किसी नाटक की तलाश में है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    160 144

    Item Code: #KGP-13

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', 'क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Saahasi Bachchon Ke Kaarnaame
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-52

    Availability: In stock

    जब मैं छोटा था तो दूसरे बच्चों की तरह खुद भी काॅमिक्स वगैर पढ़ने का शौक रखता था। कुछ बड़ा हुआ तो सोचा कि ये काॅमिक्स बच्चों का मनोरंजन भले ही करते हों, लेकिन न तो उनका चरित्र-निर्माण ही कर पाते हैं और न उन्हें सही राह ही दिखा पाते हैं। मुझे लगा कि बच्चों के लिए ऐसे साहित्य की रचना होनी चाहिए जो वास्तवित धरातल से जुड़ा हो, उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दे तथा एक अच्छा मनुष्य बनाए।
    पत्रकारिता से जुड़ा और प्रतिवर्ष राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों से बात करने, उनकी कवरेज करने का अवसर मिला तो मन में दबी यह इच्छा फिर से बलवती होने लगी।
    वर्ष 2003 के प्रारंभ में बहादुर बच्चों से मिलने का अवसर मिला तो सोचा कि इस बार उसी प्रयास को और बेहतर ढंग से अंजाम दिया जाए। इस बारमैंने कहानियों को बहादुर बच्चों से बातचीत की शैली में तैयार कियाताकि उनमें और अधिक वास्तविकता आ सके। कहानियों की संख्या भी दस से बढ़कर उन्नीस है और उनका प्रस्तुतिकरण भी अधिक आकर्षक हैं पहली पुस्तक की तुलना में यह पुस्तक और भी कई मायनों में बेहतर स्वरूप संजोए है। 
    —संजीव गुप्ता
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Saadat Hasan Manto (Paperback)
    Saadat Hasan Manto
    250

    Item Code: #KGP-7011

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सआदत हसन मंटो
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सआदत हसन मंटो ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'स्वराज्य के लिए', 'हतक' हैं 'मेरा नाम राधा हैं', 'बाबू गोपीनाथ', 'मम्मी', 'मम्मद भाई', 'जानकी', "मोजेल', 'सियाह हाशिए' तथा 'टोबा टेकसिंह'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सआदत हसन मंटो की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti (Paperback)
    Hemant Kukreti
    140

    Item Code: #KGP-7019

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Mool Chanakya Niti (Paperback)
    Vigyan Bhushan
    150

    Item Code: #KGP-7212

    Availability: In stock

    आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान् विभूति थे, जिन्होंने  अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री होने के साथ ही नीतिशास्त्रज्ञ के रूप में भी विश्वविख्यात हुए। इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवनानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह निःस्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया। 
    वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारु ढंग से संचालित करने के लिए चाणक्य द्वारा बताई गई नीतियाँ और सूत्रा अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। उनके सिद्धांतों में निहित अर्थों की महत्ता समझते हुए ही कई विश्वविद्यालयों और प्रबंधन संस्थानों में भी ‘चाणक्यनीति’ पर शोध और अध्ययन किया जा रहा है। ऐसे विलक्षण व्यक्ति के अमूल्य वचनों को सार-रूप में प्रस्तुत करती इस पुस्तक में ‘चाणक्य नीति’ और ‘चाणक्यसूत्र’ के साथ ही ‘अर्थशास्त्र’ को भी सम्मिलित किया गया है।
  • Vaigyanikon Ki Batein (Paperback)
    Shuk Deo Prasad
    50

    Item Code: #KGP-7085

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Hindu Sanskars (Paperback)
    M.L. Ahuja
    125

    Item Code: #KGP-357

    Availability: In stock

    The SANSKARAS are rites of passage finding varied acceptance among religious adherents of Hinduism, Jainism and some schools of thought in Buddhism. Hinduism prescribes norms to groom youngsters with values. The values as reflected in sanskaras facilitate the process of adaptation of the behaviour patterns of our children and the process of their socialization. These sanskaras should inculcate in our children the norms to purify, refine and adorn their inner conscience.
    The book, Hindu Sanskaras Sacraments and Rituals in Life’s Journey, is an exposition of the principles enunciated in the Hindu scriptures. This profusely illustrated book provides guidelines for young boys and girls on the threshold of conjugal life. It provides them lucid explanation of sanskaras and human life, Hindu beliefs and rituals, essence of Hindusanskaras, the Vedic and astrological concepts of garbadharan or conception of a child, naming of the baby, baby's first tonsure, importance of sacred thread ceremony, the process of conducting puja or veneration, the significance of idol worship, The underlying purpose of using bindi or tilak, the ritual of observing Karva Chaauth by married women  to pray for the longevity of their husbands, funeral rites and the system of ancestral worship yet form an essential ingredient of the book. The book also provides explanation of rituals like parikarma, ringing of bell, hovering of hands on lighted lamp after concluding prayer, the importance of 108 and breaking of coconut. 
    It is a useful book for all those wishing to know Indian culture, traditions and mythology. It needs to be read by parents for inculcating values among their children, and young boys and girls to carve an ideal approach in life. 
  • Svasthya Evam Chikitsa (Paperback)
    Dr. Rakesh Singh
    160

    Item Code: #KGP-369

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य एवं चिकित्सा 
    पुस्तक में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर लगभग 41 लेख संकलित हैं। जो लोग यह कहते हैं कि चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम से ही पकाया जा सकता है, उनके लिए ये लेख चुनौती हैं और सिद्ध करते हैं कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा को उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को हिंदी माध्यम से पढाया जा सकता है।
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है। इन लेखों में अधिकांशत: इस बात की ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग कुछ दवाओं का नाम याद कर लेते हैं और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते हैं। उससे कितनी जानि हो सकती है, यह 'दवाओं के उपयोग में सावधानियाँ शीर्षक से स्पष्ट है। इसी प्रकार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारता से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है। 'हदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हृदय-रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इसमें अधुनातन चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है। अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-संपन्न है। कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्व एवं उनके सफ़ल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतीक है।
  • Prerak Kathayen
    Shambhu Nath Panedy
    125 113

    Item Code: #KGP-145

    Availability: In stock


  • Priyakant
    Pratap Sehgal
    160 144

    Item Code: #KGP-2043

    Availability: In stock

    प्रियकांत
    प्रताप सहगल उन लेखकों में से हैं, जिन्होंने अपने लड़कपन से ही दिल्ली नगर को महानगर और महानगर को सर्वदेशीय नगर (Cosmopolitan City) बनते हुए देखा है। इस बदलाव के साथ जुड़े आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक पहलुओं के बदलते रंगों को भी महसूस किया है। इन बदलते रंगों के साथ बदलते वैयक्तिक संबंधों और मूल्य-मानों पर उनकी पैनी निगाह रहती है। इसीलिए उनके लेखन में निरा वर्णन नहीं होता, बल्कि उसके साथ समय के कई सवाल जुड़े रहते हैं। कभी यथार्थ के धरातल पर तो कभी दर्शन के स्तर पर ।
    उनका नया उपन्यास 'प्रियकांत' भी कोई अपवाद नहीं है। पिछले तीस-चालीस सालों में धर्म का व्यापारीकरण और बाजारीकरण हुआ है। इसके लिए आम-जन को अपने परोसने के लिए धर्म के नए-नए मंच बने और नए-नए धर्मगुरु तथा धर्माचार्य फिल्मी सितारों की तरह चमकने लगे।
    'प्रियकांत' एक ऐसे ही धर्माचार्य के उदय और उसके साथ जुड़ी महत्वाकांक्षाओं और विसंगतियों की कथा है। पात्र पौराणिक हो, ऐतिहासिक हों या समकालीन-प्रताप सहगल की नज़र हमेशा उनके माध्यम से समय के साथ मुठभेड़ मर ही रहती है। और इस उपन्यास में भी धर्म, धर्मगुरु, ज्ञान एवं अनुभव से जुड़े कुछ सवाल ही रेखांकित होते हैं...शेखर, नीहार और गुलशन के साथ...आप पढ़ेंगे तो आपको भी लगेगा कि इस कथा में आप भी कहीं न कहीं ज़रूर हैं।
  • Sant Ka Divya Sansaar
    Deep Shikha Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-1870

    Availability: In stock

    संत का दिव्य संसार
    पारलौकिक जगत् में विचरण करते भक्तों ने देखा-एक हरा-भरा प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त पर्वत-शिखर, जिस पर सूर्य-रश्मियां बिखरी पडी थीं, स्निग्ध पवन की स्निग्धता से विभोर पर्वत-शिखर परम शति में डूबा हुआ था ।
    उस शांत, एकांत, मानवीय पदचापों एवं कोलाहल से पूर्णत: मुक्त पर्वत के उत्तुंग शिखर पर एक जर्जर शरीर- धारी तपस्वी तपस्यारत था । स्वच्छ-सुगंधित-शीतल पवन उन्मुक्त हो बह रहा था । अवरोधरहित पवन तपस्वी के शरीर से टकरा तपस्वी को अपनी प्रशंसा करने के लिए बाध्य-सा करता प्रतीत हो रहा था ।
    किंतु, तपस्वी पवन के प्रफुल्लकारी स्पर्श से पूर्णत: प्रभावहीन था । उस पर पवन की स्निग्धता का, उसकी कोमलता का, उसकी प्रफुल्लता का और उसकी शीतलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था । वह पूर्णतया नि:संग था, तटस्थ था, निर्विकार था, अचल था, स्थिर था ।
    सूर्य-रशिमयों की गरिमामयी प्रखरता भी तपस्वी में किसी भी प्रकार का विक्षोभ उत्पन्न करने में असफल-सी जान पड़ रही थी । तपस्वी अविचल समाधिस्थ बैठा हुआ था ।
    तपस्वी की स्थिर अवस्था, तपस्वी के सैकडों वर्षों से निरंतर एक ही आसन में बैठे रहने का संकेत-सी करती प्रतीत हो रही थी । संभवत: तपस्वी सदियों से एक ही मुद्रा में, एक ही आसन में, एक ही स्थान पर बैठा प्रभु से एकात्म की स्थापना का प्रयास कर रहा था ।
    उसके मुखमंडल से झरती अपूर्व शांति उसके प्रयास की सफलता का जयघोष-सी करती प्रतीत हो रही थी । कदाचित् तपस्वी अपने प्रयास में सफल हो चुका था । तभी तो उसके मुखमंडल को चारों ओर से एक विशिष्ट आभा ने घेर रखा था । वह जितेन्द्रिय-सा लग रहा था ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sanjiv (Paperback)
    Sanjeev
    80

    Item Code: #KGP-1271

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : संजीव
    कहानियों सें विषयों के व्यापक शोध, अनुभव के संदर्भ, समसामयिक प्रसंग और प्रश्न तथा पठनीय वृत्तांतों का संयुक्त एव सार्वजनिक संसार ही संजीव की कहानियाँ चुनता-बुनता है। इन कथाओं की सविस्तार प्रस्तुति से अभिव्यक्त समाहार का अवदान इस कथाकार को उल्लेख्य बनाता है। घटनाओं की क्रीड़ास्थली बनाकर कहानी को पठनीय बनाने में इस कहानीकार की विशेष रुचि नहीं होती बल्कि यह ऐसे सारपूर्ण कथानक की सुसज्जा में पाठक को ले जाता है, जहाँ समकालीन जीवन का जटिल और क्रूर यथार्थ है तथा पारंपरिक कथाभूमि की निरूपणता और अतिक्रमणता भी । यथार्थ के अमंगल ग्रह को, पढ़वा लेने की साहिबी इस कथाकार को सहज ही प्राप्त है, जिसे इस संग्रह की कहानियों में साक्षात् अनुभव किया जा सकता है ।
    प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।
    सजीव द्वारा स्वयं चुनी गई ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं- 'अपराध', 'टीस', 'प्रेत-मुक्ति' 'पुन्नी माटी', 'ऑपरेशन जोनाकी', 'प्रेरणास्रोत', 'सागर सीमांत', 'आरोहण', 'नस्ल' तथा 'मानपत्र' ।
  • Vichaar-Yaatra : Lal Krishna Advani
    Lal Krishna Advani
    245 221

    Item Code: #KGP-860

    Availability: In stock


  • Jangal Se Shahar Tak
    Rajendra Avasthi
    260 234

    Item Code: #KGP-9099

    Availability: In stock

    जंगल से शहर तक
    अपने को मैं सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे मध्य प्रदेश और बस्तर से लेकर पूरे देश के आदिवासियों के बीच काम करने, रहने और उनके जीवन को गहराई से समझने का अवसर मिला है। मुझे बहुत ही सुखद आश्चर्य हुआ था कि आज की दुनिया से अलग इनकी अपनी जिंदगी है और उस जिंदगी के प्रति कभी उन्होंने शिकायत नहीं की। उनके लिए जो कुछ संभव था, कई तरह किया गया। बस्तर उस समय के मध्य प्रदेश का ही नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा जिला था। जगदलपुर इसका मुख्यालय आज भी है। इतने बड़े क्षेत्र को संभालना आसान नहीं है। मैं कृतज्ञता ज्ञापन करूंगा कि जगदलपुर अब ढाई जिलों में कंट गया है। धीरे-धीरे अब वहां सुधार हो रहा है और वहां के निवासियों की उन्नति के लिए सरकार प्रयत्नशील है। यही बात नागा, गोंड़, टोडा, कोरकू, उराव, खोंड इत्यादि क्षेत्रों की है। मुझे याद है कि एक समय इनके बीच में पहुंचना बहुत कठिन था। स्थिति अब बदल गई है और वे प्रसन्नतापूर्वक इस समूचे देश के अंग हैं। यह ज्ञान उन्हें हो रहा है।
    मैंने कुछ भी चीज कल्पना से नहीं लिखी। इनके बीच में इनका बनकर, रहकर मैंने काम किया है। सारी व्यस्तताओं के बावजूद मुझे जंगलों में घूमनो हमेशा पसंद रहा है। कहा जा सकता है कि मैं जंगली भी हूं और शहरी भी।
    इतिहास, साहितय-जीवन, देश और काल का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। वह अपने अतीत के माध्यम से आज का चित्र प्रस्तुत करता है।
    —राजेन्द्र अवस्थी
  • Face Your Fears (Self-Help)
    David Tolin
    695 626

    Item Code: #KGP-355

    Availability: In stock

    Everyone experiences fear and anxiety, but when fear begins to dominate your life, it can be devastating. You don’t have to live that way. Whether you suffer from moderate anxiety or debilitating fear, a specific phobia, obsessive- compulsive disorder, panic disorder, social anxiety, posttraumatic stress disorder, generalized anxiety disorder, or any other form of anxiety, Face Your Fears will change the way you think about fear and what to do about it.
    This up-to-date, evidence-based, user-friendly self-help guide to beating phobias and over-coming anxieties walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear. In Face Your Fears, celebrated therapist Dr. David Tolin introduces a highly effective and scientifically proven treatment called exposure therapy, in which you gradually confront your fears. Drawing on moving stories from the hundreds of patients he has treated successfully, Dr. Tolin defines the six different types of anxiety and helps you determine which type you need to overcome. He guides you step by step through the gradual exposure process as you learn how to eliminate crutches and safety behaviors, address scary thoughts, and examine the evidence. You’ll learn how to track your progress and you’ll feel yourself taking back control of your life one exposure at a time.
    With Dr. Tolin’s gentle, confident guidance, you will learn to face and beat:
    • Fears of specific situations or objects (such as animals, heights, and blood)
    • Fears of body sensations (including panic attacks and health anxieties)
    • Social and performance fears (fears of social interaction, public speaking, and asserting yourself)
    • Obsessive fears (including fears of contamination and imperfection as well as scary thoughts)
    • Excessive worries (such as worrying about everything and intolerance of uncertainty)
    • Post-traumatic fears (fears of trauma-related situations and painful memories)
    Once you feel better, Dr. Tolin helps you maintain your newfound freedom for years to come. By understanding and preparing for circumstances that might cause your fear to return, you can take practical steps to prevent it from coming back and to overcome it quickly if it does.
    You know what it feels like to live in fear. Now it’s time to rediscover what life feels like without it. Face Your Fears delivers the no-nonsense, scientifically proven tools you need to take control of your life and your future. Dr. Tolin walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam (Paperback)
    Amrita Pritam
    80

    Item Code: #KGP-1518

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अमृता प्रीतम
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार अमृता प्रीतम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बृहस्पतिवार का व्रत', 'उधड़ी हुई कहानियाँ', 'शाह की कंजरी', 'जंगली बूटी', 'गौ का मालिक', 'यह कहानी नहीं', 'नीचे के कपड़े', 'पाँच बरस लम्बी सड़क', 'और नदी बहती रही' तथा 'फैज की कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Asia Ke Durgam Bhukhandon Mein
    Rahul Sankrityayan
    300 270

    Item Code: #KGP-1924

    Availability: In stock

    एशिया के दुर्गम भूखंडों में
    'एशिया के दुर्गम भूखंडों में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की महत्त्वपूर्ण यात्रा-पुस्तक है, जिसमें  लेखक ने मध्य एशिया के कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, अक्षुनदी की उपत्यका तथा अफगानिस्तान का भ्रमण-वृत्तान्त दिया है । अपनी कठिन यात्राओं एवं इन यात्राओं की उपलब्धियों के बारे में भी राहुल जी ने सविस्तार वर्णन किया है ।
    राहुल जी के यात्रा-साहित्यकी विशेषता है उनकी वर्णन-शैली, जो इतनी आकर्षक है कि पाठक पुस्तक पढते समय यही अनुभव करता है कि वह भी लेखक के साथ-साथ भ्रमण कर रहा है । लेखक की दूसरी विशेषता है उनकी सूक्ष्म पर्यवेक्षकीय दृष्टि, जिससे पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है ।
    'एशिया दुर्गम भूखंडों में' की अपनी ऐतिहासिक विशेषता भी है, क्योंकि राहुल जी के देखे हुए कई देशों का इतिहास अब बदल चुका है, इसलिए भी इस पुस्तक का दस्तावेज महत्व बढ़ जाता है। राहुल-साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह एक अनिवार्य कृति है ।
    --कमला सांकृत्यायन
  • Mere Mitra : Kuchh Mahilayen, Kuchh Purush (Paperback)
    Khushwant Singh
    80

    Item Code: #KGP-1458

    Availability: In stock

    मेरे मित्र : कुछ महिलाएँ, कुछ पुरुष
    प्रस्तुत पुस्तक के विषय-व्यक्तित्व मैंने बिना कसी तरतीब के चुने है । इनमें भी वे महिलाएँ और पुरुष विशेष है, जिनसे कि 60 और 70 के दशकों में मेरी दोस्ती हुई । अपने बारे में मेरे इन उद्गारों को पाकर कुछ तो इतने नाराज हुए कि उनसे बोलचाल ही बंद हो गई, पर कुछ खुश भी हुए । उन्होंने माना के उनके प्रति मैंने अपने स्नेह का ही इजहार किया है । कुछ ऐसे भी है, जिन्होंने अपने बारे में मेरे लिखे को पढ़ने की जहमत उठाना भी गवारा नहीं किया और कहा कि मैं उनके बारे में चाहे जो सोचता रहूँ उससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं है । पर अब आप ही बताएं कि उनके बारे में मेरा यह लिखना किसी काम का है या नहीं । -खुशवंत सिंह
  • Ek Aur Chandrakanta (2nd Part)
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-900

    Availability: In stock


  • Chhor (Paperback)
    Bhairppa
    125

    Item Code: #KGP-7043

    Availability: In stock

    छोर
    कुशाग्र बुद्धि अमृता ने चाची के कुचक्र की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया और अपनी पढ़ाई-लिखाई में ही व्यस्त रही। कुछ समय उपरांत पिता भी स्वर्गवासी हुए और तब घर-परिवार तथा व्यापार पर चाची का वर्चस्व स्थापित हो गया। अमृता की संपत्ति धीरे-धीरे और भीतर ही भीतर चाची तथा उसके बच्चों की ओर खिसकने लगी। अमृता की संपत्ति पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चाची ने अमृता को बहला-फुसलाकर उसका ब्याह अपने छोटे भाई से करा दिया।
    हालात को स्वीकार करके मजबूर अमृता एक कॉलिज में अध्यापन करने लगी और अपने दो बच्चों के साथ बागान से दूर पिता की एक पुरानी कोठी में रहने लगी। वहीं उसकी मुलाकात वास्तुकार सोमशेखर से हुई जो बंबई छोड़कर मैसूर आ गया था। दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर आकृष्ट होने लगे। इस बीच अमृता को चाची के कुचक्रों का भी आभास होने लगा। परिस्थितियों ने उसके स्वभाव में अजीब चिड़चिड़ापन, जीवन के प्रति अरुचि, कुंठा और विकर्षण को जन्म दिया। उसे जीवन बेमानी लगने लगा किंतु बेटों के प्रति मोह और सोमशेखर के प्रति अस्पष्ट आकर्षण उसे बार-बार आत्महत्या की कगार से लौटा लाता। अमृता की जिंदगी में जीवन और मृत्यु की ऊहापोह, उसकी कुंठा ही उसकी जिंदगी के दो छोर हैं जिनके बीच वह बार-बार झोंटे खाती रहती है।
    यह उपन्यास रोचक होने के साथ-साथ एक विशेष मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ पैदा करता है। जो यथार्थ के साथ-साथ विचित्र भी हो गई हैं। यहाँ है भैरप्पा की कल्पनामय यथार्थ शैली का अद्भुत चमत्कार!
  • Metamorphosis (Novel)
    Franz Kafka
    395 356

    Item Code: #KGP-361

    Availability: In stock

    The Metamorphosis is one of Franz Kafka's most well-known works. It is the story of a young man, Gregor Samsa, who transformed overnight into a giant beetle-like insect, becomes an object of disgrace to his family, an outsider in his own home, a quintessentially alienated man. 
    A harrowing—though absurdly comic — meditation on human feelings of inadequacy, guilt, and isolation, The Metamorphosis has taken its place as one of the most widely read and influential works of twentieth-century fiction.
  • Saleem Ke Shanidev
    Pankaj Prashar
    100 90

    Item Code: #KGP-9100

    Availability: In stock


  • Tal-Ghar
    Deepak Sharma
    175 158

    Item Code: #KGP-1835

    Availability: In stock


  • Sarla : Ek Vidhva Ki Aatmjeevani
    Pragya Pathak
    100 90

    Item Code: #KGP-2062

    Availability: In stock


  • Mohan Rakesh Ke Jaane Par Doston Ki Yadein
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-681

    Availability: In stock


  • Jangli-Mangli
    Chang Tain-Pi
    180 162

    Item Code: #KGP-409

    Availability: In stock

    1963 में मैंने चांग तइन-यी के बाल-उपन्यास ‘करामाती कद्दू’ का रूपांतर किया था, जो धारावाहिक रूप से ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुआ।
    चांग तइन-यी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह बहुत ही सरल और रोचक ढंग से कहानी कहते हैं, जो मनोरंजक होने के साथ उपदेशपरक ही नहीं, कलात्मक ढंग से अच्छा रास्ता दिखाती है।
    ‘करामाती कद्दू’ की लोकप्रियता देखकर ही मैंने 1967 में लेखक की एक और रचना ‘जंगली-मंगली’ शीर्षक से रूपांतकर किया है। पाठकों की सुविधा के लिए मैंने कहानी के पात्रों और वातावरण को भारतीय रूप देना उचित समझा।
    चांग तइन-यी का जन्म 1906 में हुआ था। पच्चीस वर्ष की अवस्था में उन्होंने यह कहानी लिखी थी। निर्धनता के कारण उन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी। निर्वाह के लिए उन्होंने तरह-तरह की नौकरियां कीं। कभी-कभी दफ्तर में क्लर्की तो कभी अध्यापन। संघर्ष करते हुए भी उन्होंने लिखना सारी रखा और कई पुस्तकों की रचना की। चांग तइन-यी की बालोपयोगी और किशोरापेयोगी रचनाएं विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
    —द्रोणवीर कोहली
  • Shaam Ki Jhilmil
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-9309

    Availability: In stock

    बुढ़ापे में अकेले हो जाने पर, फिर जी भर जी लेने की उद्दाम इच्छा, उसे साकार करने के प्रयत्न, एक-पर-एक...कुछ हास्यास्पद, कुछ गंभीर, कुछ बेहद गंभीर कि जीवन इहलोक और परलोक में इस पार से उस पार बार-बार बह जाता हो....कोई सीमारेखा नहीं। हताशा, जीने की मजबूरी, कुछ नया लाने की कोशिश...दरम्यान उठते जीवन सम्बन्ध मूलभूत प्रश्न
    गोविन्द मिश्र का यह बारहवाँ उपन्यास वृद्धावस्था के अकेलेपन और जिजीविषा के द्वन्द और टकराहट पर लिखा गया संभवतः हिंदी का पहला उपन्यास है।
  • Jinavar
    Chitra Mudgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1998

    Availability: In stock


  • Sangharsha-Meemaansa
    Ravi Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9083

    Availability: In stock


  • Pracheen Prem Aur Neeti Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-01

    Availability: In stock

    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
  • Bhasha, Sahitya Aur Jaatiyata
    Ram Vilas Sharma
    640 576

    Item Code: #KGP-884

    Availability: In stock

    भाषा, साहित्य और जातीयता
    डॉ. रामविलास शर्मा की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनके लेखों और समीक्षाओं का यह संग्रह पाठकों के लिए प्रस्तुत है। डॉ.शर्मा द्वारा संपादित पत्रिका ‘समालोचक’ में प्रकाशित यह सामग्री पहली बार पुस्तक के रूप में आ रही है। सामग्री का प्रस्तुतिकरण तथा संपादन किया है डॉ. शर्मा के सुपुत्र विजय मोहन शर्मा ने।
    ज्ञात हो कि ‘समालोचक’ केवल दो वर्ष--फरवरी, 1958 से जनवरी, 1960 तक निकल पाया। कुल चैबीस अंकों में से दो विशेषांक थे--‘सौंदर्यशास्त्र विशेषांक’ और ‘यथार्थवाद विशेषांक’। जिनका उस समय बड़ा स्वागत हुआ और हिंदी साहित्य-जगत् के अनेक ‘सितारों’ ने उनकी सराहना की। ये विशेषांक साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए आज भी महत्त्व रखते हैं।
    ‘समालोचक’ में पुराने लेखकों के अलावा नए लेखक भी लिखते थे। इन लेखकों में हिंदी प्रदेश से बाहर के लेखक भी थे। इसका संपादकीय क्षितिज उदार था। संपादक डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, ”हमारा ध्येय हिंदी आलोचना के विकास में योग देना है, उसमें आमूल परिवर्तन करना अथवा युगांतर उपस्थित करना नहीं। हम विभिन्न विचारधाराओं और मतों के लेखकों की रचनाएं प्रकाशित करके परस्पर विचार-विनिमय द्वारा आलोचना-साहित्य के उत्तरोत्तर विकास का प्रयत्न करेंगे।“
    बीसवीं शताब्दी के हिंदी के सर्वमान्य महान् आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा की साहित्यिक समझ और प्रतिबद्धता का विस्तार इस ग्रंथ की संकलित सामग्री में आद्यंत दिखाई पड़ते हैं। शोध और समीक्षा के प्रतिमान स्थापित करता यह ग्रंथ प्रत्येक बुकशेल्फ की अनिवार्यता है।
  • Katha Ek Naami Gharaane Ki
    Hridyesh
    200 180

    Item Code: #KGP-769

    Availability: In stock

    हृदयेश की कहानियां जिंदगी से, खासकर उस जिंदगी से, जिसमें मुक्तिबोध के मुहावरे के अनुसार आदमी जमीन में धंसकर भी जीने की कोशिश करता है, पैदा हुई हैं। कुछ लेखक सीधे जमीन फोड़कर निकलते हैं। उसी में अपनी जड़ों का विस्तार करते हैं और नम्र भाव से अपने रेशे-रेशे से उस जमीन से ही अपनी शक्ति खाद-पानी लेकर बढ़ते हैं और अपने तथा जमीन के बीच आसमान को नहीं आने देते हैं। वे इस सत्य को बखूबी समझते हैं कि आसमान जितना भी ऊंचा हो, उस पर किसी के पांव नहीं टिकते। औंध लटका हुआ बिरवा तो किसी को छाया तक नहीं दे सकता। हृदयेश् कलम से लिखते हैं तो भी लगता है जैसे कोई जमीन पर धूल बिछाकर उसपर अपनी उंगली घुमाता हुआ कोई तस्वीर बना रहा है। उनकी उंगलियों के स्पर्श में ही कुछ होगा कि आंघियां तक वहां आकर विराम करने लगती हैं और उनकी लिखत, जिसने भाड लेख होने तक का भ्रम नहीं पाला था, शिलालेख बनने के करीब आ जाती है।
    हृदयेश ने बीच-बीच में आने वाले तमाम साहित्यिक आंदोलनों व फैशनों को गुजर जाने दिया बिना अपने लेखकीय तेवर या प्रकृति में बदलाव लाए हुए। वह चुनाव पूर्वक अपनी जमीन पर टिके रहे–न दैन्यं न पलायनम्। वह एक साथ कई परंपराओं से जुड़ते हैं क्योंकि प्रत्येक रचनाकार अपने वरिष्ठों, समवयस्कों, यहां तक कि अल्पवयस्कों की कृतियों के प्रभाव को अपनी अनवधनता में सोख लेता है, जैसे पौधें की जड़ें खाद के रस को सोख लेती हैं।
  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale (Paperback)
    Chanderkant Deotale
    90

    Item Code: #KGP-1492

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।

    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।

    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
    -चन्द्रकांत देवताले
  • 20-Best Stories From Europe
    Prashant Kaushik
    545 491

    Item Code: #KGP-9318

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. European short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Elsi, The Unusual Farm Maid by Jeremias Gotthelf, The Jews’ Beech-tree by Annette Von Droste-hülshoff, The Broommaker of Rychiswyl by Jeremias Gotthelf, Fair Eckbert by Ludwig Tieck, How Joggeli Finds A Wife by Jeremias Gotthelf, A Little Legend of the Dance by Gottfied Keller, this book is a compilation of 20 famous European short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Europe.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ganga Prasad Vimal
    Ganga Prasad Vimal
    200 180

    Item Code: #KGP-89

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार गंगाप्रसाद विमल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इंता-फिंता', 'बच्चा', 'अभिशाप', 'आत्महत्या', 'सन्नाटा', 'बाहर न भीतर', 'फूल कह रहे हैं', 'बदहवास, 'अतीत मेँ कुछ' तथा 'बीच की दरार'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक गंगाप्रसाद विमल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Manjhi Na Bajao Vanshi
    Om Bharti
    225 203

    Item Code: #KGP-1883

    Availability: In stock

    माँझी! न बजाओ वंशी
    केदारनाथ अग्रवाल के जीवन और कविता दोनों में एक अनिंद्य प्रेम का भाव विराजता है। जो जीवन में है वह कविता की परिधि से बाहर नहीं है। जहां लोग दांपत्य प्रेम को जीते हुए अपने उत्तरवर्ती जीवन तक आकर ऊब का अनुभव करने लगते हैं, वहीं केदार जी आजीवन इस प्यार से बँधे-बिंधे रहे। हिंदी की काव्य परंपरा में प्रेम का अनूठा और अद्वितीय स्थान है पर है वह परकीया प्रेम से बँधा हुआ। आधुनिक कवियों में  केदारनाथ अग्रवाल का एक विरल उदाहरण है जहाँ वे दांपत्य प्रेम में ही लौकिक-अलौकिक सुखों की अपूर्व व्यंजना कविताओं में संभव करते हैं। जमुन जल तुम जैसा संग्रह तथा अन्य संकलनों की प्रेम कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने प्रेम को दांपत्य की सुखद अनुभूतियों और संवेदना से भरा है। छायावादियों में जो प्रेम लौकिक धरातल से ऊपर उठकर दार्शनिक उपपत्तियों में पर्यवसित हो गया था, सूफी कवियों के यहाँ जो प्रेम ईश्वरीय सत्ता से लगन का पर्याय बन गया है, वह केदारनाथ अग्रवाल जैसे प्रगतिवादी कवि के यहाँ लोक में उपलब्ध प्रेम की कर्मठ जिजीविषा का पर्याय है।
    प्रेम केदारनाथ अग्रवाल की दिनचर्या का ही एक अंग रहा है। वह जीवन की मांसपेशियों में रुधिर की तरह प्रवाहित है। प्रेममय जीवन के सारे काम जीवन के काम हैं। कुरते में बटन नहीं लगी, ऊपर से वह फटा हुआ है, सारा घर अस्त-व्यस्त हो उठा है, न सोपकेस में साबुन, न तेल की एक बूँद, न खोजने से मिल पाता रूमाल, मेजपोश पर धूल, किताब पर प्याला, कॉपी पर औंधा रखा गिलास-कवि अधीर होकर संबोधित करता है पत्नी को कि घर सँवारने कब आओगी। घर की सारी शिष्ट सँवरन पत्नी की देन है-पत्नी जो प्रिय है, जिसके होने से जीवन है।
    कभी ठाकुर प्रसाद सिंह ने ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’ लिखकर रोमानी अनुभूतियों के प्रदेश में एक हलचल मचा दी थी। ‘वंशी और मादल’ के इस गीत को नवगीत के स्थापत्य में नवता के उन्मेष के रूप में देखा गया। गीत स्निग्धता के लिए जाने जाते रहे हैं, उनकी कोमल पदावलियों को केदारनाथ अग्रवाल ने अपने कवि-जीवन में एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में ग्रहण किया है। आज भी हम उनकी कविताएँ पढ़ते हैं तो लगता है, माँझी कहीं दूर वंशी बजा रहा है और उसकी टेर हमारे भीतर सुनाई दे रही है। वह किसी कान्हा की बाँसुरी से कम नहीं है। जीवन में प्रेम हो तो समूची कविता मानवीय प्रेम की व्यंजना में बदल जाती है। केदार जी ने कविता में यही किया है।
     यह संग्रह केदारनाथ अग्रवाल की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • 20-Best Stories From Europe (Paperback)
    Prashant Kaushik
    150

    Item Code: #KGP-7205

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. European short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Elsi, The Unusual Farm Maid by Jeremias Gotthelf, The Jews’ Beech-tree by Annette Von Droste-hülshoff, The Broommaker of Rychiswyl by Jeremias Gotthelf, Fair Eckbert by Ludwig Tieck, How Joggeli Finds A Wife by Jeremias Gotthelf, A Little Legend of the Dance by Gottfied Keller, this book is a compilation of 20 famous European short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Europe.
  • Jauhar Ke Akshar
    Santosh Shelja
    160 144

    Item Code: #KGP-9075

    Availability: In stock


  • Yah Ant Naheen
    Mithileshwar
    500 450

    Item Code: #KGP-812

    Availability: In stock


  • Manto Zinda Hai
    Narendra Mohan
    350 315

    Item Code: #KGP-805

    Availability: In stock

    मंटो जिन्दा है
    सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य का एक बड़ा लेखक होने के साथ-साथ, भाषाओं और देशों की सीमाओं को लाँघ लेखकों- पाठकों की विश्व बिरादरी का हिस्सा बन चुका है । गोर्की, चेखव और मोपासाँ जैसे कथाकारों के साथ विश्व के कथा-शीर्ष पर खड़ा मंटो एक अद्वितीय कथाकार तो है ही, एक अजब और आजाद शख्सीयत भी है । फीनिक्स पक्षी की तरह वह उड़ानें भरता रहा, अपनी ही राख से पुनर्जीवित होता रहा, जिन्दगी और लेखन के मोर्चों पर जीता-मरता रहा और भारतीय उपमहाद्वीप की साइकी में उतर गया । जाहिर हैं, ऐसे लेखक को 'पाकिस्तानी' या 'हिंदुस्तानी' कठघरों में रखकर नहीं देखा जा सकता । मंटो जैसे कालजयी लेखक की जिन्दगी को 'मंटो जिन्दा है' में जीवंतता, गतिशीलता और संपूर्णता से पकडा गया है ।
    'मंटो जिन्दा है' ऐसी जीवनकथा है जो वृतांत होते हुए भी, वृतांत को बाहर-भीतर से काटती-तोड़ती पाठकीय चेतना को झकझोरती जाती है । मंटो की जिन्दगी के कई केंद्रीय मोटिफ, प्रतीक और पेटॉफर पाठक को स्पन्दित करने लगते है और यह महसूस करता है जैसे वह मंटो को अपनी परिस्थिति, समय और साहित्य के साथ जीने लगा हो । लेखक ने जैसे मंटो को जिन्दा महसूस किया है, पाठक भी किताब पढ़ते हुए वैसी ही हरारत महसूस करने लगता है ।
    मंटो की जिन्दगी ययां टुकडों में नहीं, संपूर्ण जीवनानुभव और समग्र कला-आनुभव के रूप से आकार लेती गई है और एक कला-फार्म में ढलती गई है । इस चुनौतीपूर्ण कार्य का नरेन्द्र मोहन ने आत्मीयता और दायित्व से ही नहीं, निस्संगता और साहस से पूरा किया है । उपलब्ध स्रोतों की गहरी पश्चात करते हुए लेखक घटनाओँ और प्रसंगों की भीतरी तहों में दाखिल हुआ है और इस प्रकार मंटो के जीवन-आख्यान और कथा-पिथक को बडी कलात्मकता से डी-कोड किया है ।
    वृतांत और प्रयोग के निराले संयोजन में बँधी यह मंटो- कथा मंटो को उसके विविध रंगों और छवियों के साथ उसके प्रशंसकों-पाठकों के रू-ब-रू खडा कर देती है ।
  • Us Desh Ka Yaaron Kaya Kahana
    Manohar Shyam Joshi
    345 311

    Item Code: #KGP-554

    Availability: In stock

    उस देश का यारो क्या कहना
     हिंदी की तमाम अनसुलझी बहसों में से एक यह  भी रही है की व्यंग्य को विधा माना जाय कि वस्तु ? मनोहर जोशी के यहाँ व्यंग्य एक दृष्टि या दृष्टिकोण, एक धजा या अदा की शक्ल अख्तियार  करता है। वे किसी भी स्थिति और व्यक्ति को, विधा और वस्तु को, पवित्र या अस्पृश्य  नहीं मानते । जिस तरह वे अपने को, उसी तरह और सब कुछ को धो-धाकर ठिकाने लगा देने में यकीन करते है । यही उनका कथा है यहीं उनका शिल्प ।
    कोई गुब्बारा दिखा नहीं कि मश्जो उसमें पिन चुभोने के लिए बेताब हो उठते है, गोकि वे इसे बडी तरतीब और तरकीब से करते हैं-- कुछ इस तरह कि वह भड़ाक से न फूटे, हवा धीरे-धीरे फुस्स करती निकले । गुब्बारे को अच्छी बरह पिचकाकर ही मश्जो चैन पाते हैं, जो उनकी ममता का सूचक है या निर्ममता का, यह अपने-आप में विवाद का विषय हो सकता है ।
    हिन्दी व्यंग्य-लेखन के आरंभिक उदाहरण और प्रतिमान यदि शिवशंभु के चिट्ठों में देखे जा सकते हैं तो उनके लगभग सौ वर्षों बाद लिखित 'नेताजी-कक्काजी संवाद' हमें एक बार फिर समय और समाज के आमने-सामने लाते है । तब इस विडंबना की ओर ध्यान जाए बिना नहीँ रहता कि चीजे और स्थितियां जितनी बदलती है, उतनी ही वे पहले जैसी रहती है ।
    इसलिए, लार्ड कर्जन और नैताजी और मुंगेरीलाल एक ही सिक्के के अलग-अलग पहलू जैसे नजर आएँ नो क्या आश्चर्य ।
    यह समझ चुकने के बाद केवल जीना ही समझना बाकी बचना है कि तिथियों, नामों और प्रसंगों के बासीपन के बावजूद, उनके पीछे मौजूद बहुत कुछ तरोताजा बना रहता है । मश्जो उसे कई तरह से झलकाते हैं, यहाँ तक कि छद्म गंभीरता के आवरण में छिपाकर भी ।
    हिन्दी ये एक समय अनेक तात्कालिक कारणों से जिस तरह 'एकांकी' का विस्फोट हुआ था, उसी तरह पत्रकारिता के पिछले दौर में 'व्यंग्य' की भरपूऱ खेती हुई है । कोई चाहे तो इस 'बम्पर क्राप' को 'स्वाधीनता के पचास वर्षों की देन' भी कह सकता है और उम्मीद बाँधी जा सकती है कि जश्न के इस मौके पर संसद का जो विशेष अधिवेशन हुआ था, उसके अनन्तर 'शान्तं पापम्’ नामक एक नया सीरियल शुरु होगा । वह मात्र पचास दिनों का होकर न रह जाय,
    बल्कि आगामी पचास वर्षों तक चलता हुआ, स्वाधिनता का शतक भी धूमधाम से मना सके, इस गुन्ताड़े में हमारे सुपर स्क्रिप्ट-राइटर मश्जो  इन दिनों-बाकी सभी हास्य-व्यंग्यकारों सहित- लगे हुए है ।
    यही वह वजह है कि सूचना मुझ जैसे मुहर्रमी व्यक्ति को देनी पड़ रही है कि आत्मसाक्षात्कार से लेकर आत्मधिक्कार  क्या आत्मशोधन तक की तमाम संभावित छवियों को समेटने वाली उस अखंड राष्ट्रीय गाथा के एल धमाकेदार ट्रेलर की भाँति अब आपके सामने पेश है--'उस देश का यारो क्या कहना ।'
    -अजितकुमार
  • Meethi Neem (Paperback)
    Kusum Kumar
    240

    Item Code: #KGP-389

    Availability: In stock


  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah (Vol.-2)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    650 585

    Item Code: #KGP-603

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (2)
    (आजादी के नीतिकार)
    आँखों देखे ये वृत्तांत स्मृतियों के जीवत कालखंड भी है । इनमें राजनीतिक हलचलें हैं तो आत्मीयता यानी अपनेपन में पगी अविस्मरणीय, दुर्लभ घटनाएँ भी ।
    सूमित्रा जी साक्षी रहीं उस परिवर्तन के दौर की, इसलिए उनकी दृष्टि व्यापक एवं विस्तृत रही । उन्होंने सीमित दायरे के बावजूद असीमित परिधि को छुआ है । इसलिए गांधी जी को समझने में यह कृति हर अर्थ में सहायक सिद्ध होगी ।
    उस दौर में विश्व में क्या-क्या हुआ, उसका सहज आकलन भी इनमें दीखता है । 'जलियाँवाला बाग़' नरसंहार के दिल को दहला देने वाले दृश्य ! डेढ़ हजार से अधिक निर्दोष लोग भून दिए गए । जनरल डायर की इस दानवीय लीला ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया था ।
    'साबरमती आश्रम' गांधीवादी विचारों की प्रयोगशाला बना । चंद्रभागा और साबरमती नदी के बीच, बबूल की कँटीली झाडियों कै पार्श्व में एक नए संसार की साधना हुई-खुले आसमान के नीचे ।
    यह आश्रम कब तीर्थ बना, पता ही नहीं चला । 
    'चंपारण', 'खेड़ा सत्याग्रह', 'साइमन कमीशन’, 'नोआखली', 'बिहार को कौमी आग' अनेक प्रसंग हैं, जो अनेक अर्थों से उल्लेखनीय है ।
    सुमित्रा जी ने गांधी जी के उन पक्षों पर भी प्रकाश डाला, जो महत्त्वपूर्ण है, जिनके बारे में लोग अधिक नहीं जानते । क्योंकि उन्होंने यह सब स्वयं घटित होते देखा है, इसलिए प्रामाणिक भी कम नहीं ।
    हैदराबाद रियासत का भारत में विलय-प्रसंग भी कम रोचक नहीं । कासिम रिजवी का दिल्ली के लाल किले पर अपना झंडा फहराने का सपना सपना ही रह गया । हैदराबाद मुक्ति के पश्चात सरदार पटेल ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर दिल्ली बुलाया । लाल किले पर तो कासिम अपनी ध्वजा नहीं फहरा पाए, हाँ, लाल किले के तहखाने में कैद कर उसे अवश्य रखा गया । उन पर मुकदमा चला और आजीवन कैद की सजा मिली ।
    ऐसे अनेक प्रसंग, विचारोत्तेजक ।
    --हिमाशु जोशी
    15 अगस्त, 2009
  • Ghar Nikaasi
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1890

    Availability: In stock


  • Parda Beparda
    Yogendra Dutt Sharma
    180 162

    Item Code: #KGP-1561

    Availability: In stock

    पर्दा-बेपर्दा
    कहाँ है सभ्यता ? किधर है प्रगति ? कैसा है विकास ? इतिहास की लंबी यात्रा करने के बाद भी हम मानसिक रूप से शायद अब भी वहीं के वहीं हैं जहाँ से शुरू हुई थी हमारी यात्रा। सच पूछें, तो हम आज भी किसी आदिम अवस्था में ही जी रहे हैं। क्या सभ्यता का कोई विकास-क्रम हमारी बर्बरता को मिटा पाया है ?
    विश्व-मंच पर ही नहीं, देशीय परिवेश में भी सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित होने का हमारा दंभ निरर्थक और खोखला ही सिद्ध होता है।
    योगेन्द्र दत्त शर्मा की ये कहानियाँ बताती हैं कि कैसे हम आज अनेक विपरीत धु्रवों पर एक साथ जी रहे हैं। कहना ज़रूरी है कि ‘पर्दा-बेपर्दा’ की ये कहानियाँ फैशनपरस्त कहानियों की दुनिया से अलग मानवीय संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी सार्थक रचनाएँ हैं जो लंबे समय तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगी।
  • Gareeb Mahilayen Udhar Evam Rozgaar
    Indira Mishra
    250 225

    Item Code: #KGP-37

    Availability: In stock

    भारत में गरीबी की समस्या प्रबल है और गरीबी की मार महिलाओं पर अधिक सीधी और तीखी होती है, क्योंकि महिलाएं परिवार के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार ठहराई जाती हैं। वे मातृत्व का भार वहन करते हुए शरीर से दुर्बल होती हैं, यद्यपि उनमें भावनात्मक इच्छाशक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। गरीबी को दूर करने के लिए केंद्रीय तथा प्रदेश सरकारें, स्वायत्त संस्थाएं तथा अन्य कई प्रकार की एजेंसियां कटिबद्ध हैं, किंतु यह समस्या अभी तक कारगर ढंग से सुलझाई नहीं जा सकी। गरीब तथा ग्रामीण महिलाएं अक्सर अचल संपत्ति-विहीन और शिक्षा के लाभ से वंचित होती हैं। फिर भी उनके अंदर रचनात्मकता तो होती ही है तथा अपनी मदद स्वयं करने के लिए भी वे सतत उत्सुक होती हैं।
    ऐसी महिलाओं की, जो स्वयं की छोटी सी दूकान खोलना या कोई अन्य छोटा-मोटा रोजगार करना चाहती हैं, कर्जे की आवश्यकता बहुत ज्यादा नहीं होती। दूसरी आजमाई हुई बात यह है कि महिला उतना ही ऋण लेना पसंद करती है जितने को किस्तों में लौटा भी सके। किंतु इस सबके बावजूद कोई भी वित्तीय संस्था एकाएक उसे कोई ऋण देने की स्थिति में नहीं होती।
    प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे विषय सामान्य नागरिकों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा बैंककर्मियों आदि के समक्ष स्पष्ट किए गए हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghav
    Rangey Raghav
    225 203

    Item Code: #KGP-92

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    200 180

    Item Code: #KGP-770

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकू' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Hindi Natya-Kavya : Punarmoolyankan
    Hukum Chand Rajpal
    95 86

    Item Code: #KGP-856

    Availability: In stock

    हिन्दी नाट्य-काव्य: पुनर्मूल्यांकन
    प्रस्तुत आलोचना-ग्रंथ में लेखक ने ‘अंधायुग’, ‘संशय की एक रात’, ‘एक कण्ठ विषपायी’ तथा ‘एक प्रश्न मृत्यु’ सरीखी कृतियों के रूपाकार-विधा की चर्चा सविस्तार की है। ऐसी रचनाओं को एक साथ प्रबंध-काव्य, नाटक, गीति नाट्य, पद्य नाटक, काव्य नाटक तथा नाट्य-काव्य आदि नामों से विवेचित-विश्लेषित करना विचित्र प्रतीत होता है। लेखक ने नाट्य-काव्य विधा की सैद्धान्तिक चर्चा करते हुए कविता और नाटक दोनों विधाओं के सुमेल पर आधारित इस नवीन एवं सार्थक विधा की प्रतिष्ठा करने का प्रयास किया है। उनका मानना है कि ऐसी रचनाएँ कोई स्थापित कवि ही कर सकता है, जिसे नाटकीय विधान की सही समझ हो। इसमें दोनों साहित्य-विधाओं की सम्यक् एवं सहज प्रस्तुति अपेक्षित है। यही कारण है कि धर्मवीर भारती को इस विशिष्ट विधा का प्रथम सफल रचनाकार स्वीकार किया गया है। लेखक की स्पष्ट धारणा है कि ऐसी कृतियाँ एक विशिष्ट मानसिकता पर आधारित होती हैं—इनकी रचना-प्रक्रिया के अनेक सोपान एवं पड़ाव होते हैं—काव्यात्मकता इसका मूलाधार है तथा नाटकीयता इसका बाह्य विधान। ये इसे अधिक ग्राह्य एवं प्रभावोत्पादक बनाते हैं। इस ग्रंथ में पहली बार नाट्य-काव्य, संश्लिष्ट नाट्य-काव्य (लम्बी कविता) और रंग-काव्य सरीखी रचनाओं के अन्तर्सम्बन्धों को सोदाहरण रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। अपनी धारणाओं-स्थापनाओं को प्रामाणिक-तार्किक आधार प्रदान करने हेतु शोध-प्रविधि के नियमों की सटीक प्रस्तुति के साथ ही इस विधा के सभी विद्वानों की चर्चा यथास्थान की गई है। लेखक की विशिष्टता इस बात में है कि वे स्थापित समीक्षकों के साथ ही नवोदित रचनाधर्मियों का उल्लेख एवं उन्हें महत्त्व प्रदान करने में उदार रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि इस ग्रंथ से इस विवादास्पद विधा को सही धरातल पर समझने का मार्ग प्रशस्त होगा। 
  • Kavi Ne Kaha : Ashok Vajpayee (Paperback)
    Ashok Vajpayee
    90

    Item Code: #KGP-1432

    Availability: In stock


  • Samkalin Sahitya Samachar March, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #March, 2017

    Availability: In stock

  • Facebook Ke Janak : Mark Zuckerberg
    M.A. Sameer
    240 216

    Item Code: #KGP-7806

    Availability: In stock

    अमरीकी युवा मार्क जुकरबर्ग ने किस प्रकार अपनी विलक्षण प्रतिभा से आधुनिक जगत में लोगों को सरलता से आपस में जुड़ने का अवसर दिया, यह एक अत्यंत रोचक विषय है। प्रस्तुत पुस्तक ‘फेसबुक के जनक: मार्क जुकरबर्ग’ उनके विलक्षण मस्तिष्क के अद्भुत कारनामे को प्रेरक रूप में सामने लाने का प्रयास है। यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठकों के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होगी और उन्हें अनेक रोचक तथ्यों से अवगत भी कराएगी।
  • Kavi Ne Kaha : Kedar Nath Singh
    Kedarnath Singh
    190 171

    Item Code: #KGP-445

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के अब तक प्रकाशित संपूर्ण कृतित्व से उनकी प्रतिनिधि कविताओं को छाँट निकालना एक कठिन काम है और चुनौती भरा भी। इस संकलन को तैयार करने में पहली कसौटी मेरी अपनी पसंद ही रही है। पचास वर्षों में फैले कृतित्व में से श्रेष्ठतर को छाँटकर यहाँ प्रस्तुत कर दिया है, ऐसा दावा मेरा बिलकुल नहीं है। हाँ, इतनी कोशिश अवश्य की है कि केदार जी की कविता के जितने रंग है, जितनी भगिमाएँ है उनकी थोडी-बहुत झलक और आस्वाद पाठक को मिल सके...यूँ चयन-दृष्टि का पता तो कविताएँ खुद देंगी ही।
    कविताओं को चुनने और उन्हें अनुक्रम देने में यह कोशिश जरूर रही है कि पाठकों को ऐसा न लगे कि कविताओं को यहाँ किसी विशिष्ट श्रेणीबद्ध क्रम में बाँटकर सजाया गया है। भिन्न भाव बोध, रंग और मूड्स की कविताओं को एक साथ रखकर बस घंघोल भर दिया है-एक निरायासज़न्य सहजता के साथ पाठकों को पढ़ते समय जिससे किसी क्रम विशेष में आबद्ध होकर पढने जैसी प्रतीति न हो, बल्कि तरतीब में बनावटी साज-सज्जा से दूर एक मुक्त विचरण जैसा प्रकृत आस्वाद मिल सके ।
  • Seedhi Qalam Sadhe Na
    Sunita Jain
    75 68

    Item Code: #KGP-9285

    Availability: In stock

    सुपरिचित कवयित्री सुनीता जैन की नव्यतम कविताओं के प्रस्तुत संकलन सीधी कलम सधे न की कविताओं का स्वभाव और स्वाद समकालीन हिंदी कविता की सामान्य छवि से थोड़ा अलग है। इन कविताओं में असंभव को संभव कर डालने का न तो बड़बोलापन है और न ही जीवनगत यथार्थ को चुनौती देती काव्य-पंक्तियों का बरबस ‘उत्पादन’ हैं कवयित्री ने समग्र प्रकृति और मन को स्वविवेक के अभिव्यक्त किया है। साथ ही जीवन की विराट अवधारणा को इन कविताओं में संबोधित भी किया गया है। कवयित्री जीवनपरक महाप्रश्नों से व्यक्तिगत स्तर पर जूझते हुए इन कविताओं को सरल, सहज, सुगम्य, पारदर्शी, तथा एक सीमा तक गेय बनाये रखती हैं। यहां ऐसी निजता है जो सार्वजनिकता भी है। इसीलिए इन कविताओं की खुशबू, समकालीन कविताओं की तत्सम खुशबू से थोड़ा अलग हे।
    इन कविताओं की एक काव्य-विशेषता और है-इनमें छिपा आत्मीय राग। संकलन की अनेक कविताएं ऐसी हैं जिनमें असंबोधित रागों की लय मिलती है। समकालीन हिंदी कविता का पाठक उत्कृष्ट काव्य के लिए मानो तरसा हुआ है। कविता में मनःभूमि की प्रतिच्छवियों के ऐसे समर्थ संकलन का प्रकाशन एक सुखद काव्य-घटना है।
  • Patra-Samvad : Ageya Aur Rameshchandra Shah
    Krishna Dutt Paliwal
    240 216

    Item Code: #KGP-698

    Availability: In stock


  • Jiyo Us Pyar Mein Jo Maine Tumhe Diya Hai
    A.M. Nayar
    200 180

    Item Code: #KGP-663

    Availability: In stock

    जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया है
    प्रेम कविता पर विचार करते हुए हमारे सामने सदियों की प्रेम कविता की परंपरा सम्मुख आ खड़ी होती है। एक आधुनिक कवि के लेखे तो वह जैसे ’स्थायी कवि समय’ ही रहा है। किंतु प्रेम की इस अनुभूति को शब्दबद्ध कर पाना सदैव कवियों के लिए चुनौती रहा है। प्रेम कविता का अधिकांश दैहिक मिलन और उसके बखान में अतिरंजित है। जबकि प्रेम के बीज तो प्रकृति में ही छितरे-बिखरे होते हैं; वही प्रेम करना सिखाती है। इसलिए मिलन की परिणति से गुजरना ही प्रेम नहीं है। यह मिलन, विरह, उत्कंठा, प्रतीक्षा, पीड़ा, अनुभूति, विकलता और उम्मीद का दूसरा नाम है। प्रेम का अनुभव देह होते हुए भी विदेह होने में है, भोगे जाते हुए या भोगते हुए भी अभुक्त होने में है, उस उदात्तता, प्रांजलता और सात्त्विकता को बचा लेने में है जो देहाभिभूत होते हुए भी अक्षुण्ण रहती है।
    हमारे समय की बड़ी प्रेम कविताओं के नेपथ्य में करुणा का आवेग भी कहीं न कहीं दिखता है क्योंकि कविता प्रेम के नेपथ्य में रची-बसी करुणा तक पहुँचती है। प्रेम में कुंठा नहीं, निर्बंधता होती है। इसलिए अच्छी प्रेम कविता हमें खोलती है, मुक्त  करती है, भौतिकता से पार ले जाने में मदद करती है। यह सुखद है कि आधुनिक हिंदी कविता प्रेम कविता की तमाम खूबियों का एक साथ वहन कर रही है। उसमें देह का संगीत भी है, आत्मिक सुख की निर्झरिणी भी। इसमें बहते हुए स्नेह-निर्झर को समेटने की शक्ति है तथा मुनष्य को प्रेयस् की अक्षुण्ण रासायनिकी से ओतप्रोत करने की ऊर्जा भी। प्रेम का क्षितिज उदात्त होता है तभी कोई कवि ’कनुप्रिया’ या ’गुनाह का गीत’ (धर्मवीर भारती) लिखता है, कोई ’टूटी हुई बिखरी हुई’ (शमशेर),’हे मेरी तुम’ (केदारनाथ अग्रवाल), ’देह का संगीत’ (सर्वेश्वर), ’नख-शिख’ (अज्ञेय), ’हरा जंगल’ (कुँवर नारायण), ’वह शतरूपा’ (लीलाधर जगूड़ी), ’उसके लिए शब्द’ (अशोक वाजपेयी) और ’ट्राम में एक याद’ (ज्ञानेन्द्रपति) आदि।
    अज्ञेय प्रेम कविता की लंबी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कवियों में हैं। वे प्रेम को दो मानव इकाइयों के मिलन के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वर के दो अंशों के पारस्परिक मिलन के रूप में देखते हैं। उनकी कविता में भाषा, कथ्य और भाव का जैसा क्लासिकी संयम और अनुशासन है, वैसा ही उनकी प्रेम कविताओं में लक्षित होता है। कदाचित् उन्हें देना श्रेयस्कर लगता है, इसलिए प्रेम में भी लेना उन्हें गवारा नहीं। उनके लेखे प्रेम लेने का नाम नहीं, देने का नाम है। देकर ही मानो पाने का अहसास गहरा होता है। इसे बेशक दाता का दर्प कहें, पर अज्ञेय के प्यार में देने का भाव है, आशीषों का स्वस्तिवाचन है, पथ बुहारने- सँवारने का उद्यम है और प्रिय को दुःख की गलियों में नहीं, स्नेह-सिक्त वीथियों, सरणियों में देखने की कामना निहित है। शायद यही वजह है कि एक बार जब मैंने उनसे एक लंबी बातचीत के बाद उनकी सर्वाधिक प्रिय कविता की पंक्तियों के लिए अपनी डायरी बढ़ाई तो उन्होंने यही लिखा ‘जियो उस प्यार में जो मंैने तुम्हें दिया है।‘
    यह संग्रह अज्ञेय की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Jeet Ki Raah
    Swed Marten
    200 180

    Item Code: #KGP-857

    Availability: In stock

    पुस्तक में स्वेट मार्डन जैसे महान् व्यक्तित्व के आधुनिक विचारों के साथ भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से प्रेरित विचारों का मिला-जुला संगम है, ठीक गंगा-यमुना की भाँति पावन व पवित्र । एक जोर से विद्धान् स्वेट मार्डेन की विचाररूपी गंगा एवं दूसरी ओर से भारतीय विचारों की सरिता यमुना का जल आकर मिल गया है इस 'जीत की राह' में।
    इस पुस्तक का वास्तविक शीर्षक है 'जीत की राह', परंतु इससे
    अधिक आकर्षक है 'स्वेट मार्डन : सूक्तियाँ व प्रेरक विचार'।  इस पुस्तक
    में स्वेट मार्डन की तीन पुस्तकों क्रमश 'The Conquest of Worry', 'He can who think he can', 'To succeed in Life' में से उनकी
    सूक्तियाँ व प्रेरक विचार संगृहीत किए गए हैं।
  • Dinkar : Vyaktitva Aur Rachana Ke Aayam
    Gopal Rai
    425 383

    Item Code: #KGP-259

    Availability: In stock

    दिनकर: व्यक्तित्व और रचना के आयाम
    प्रस्तुत पुस्तक दिनकर को नए परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करती है। दिनकर का काव्य-संसार लगभग पाँच दशकों, 1924 से 1974 तक फैला हुआ है। बीसवीं शती के आरंभिक दशक में राष्ट्रीय आंदोलन जुझारू रुख अख्तियार करने लगा था और गांधी जी के हाथों में नेतृत्व आने के बाद तो राष्ट्रीय आंदोलन जनांदोलन के रूप में परिणत होने लगा। दिनकर की काव्य-चेतना और काव्य-चिंतन के निर्माण में राष्ट्रवादी आंदोलन के जुझारूपन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उनकी कविताओं में भारतीय किसानों का श्रम, उनकी आशाएँ और अभिलाषाएँ लिपटी हुई हैं। 
     दिनकर साहित्य में समकालीनता और सामयिकता को वरेण्य मानते हैं। वही साहित्य दिनकर के लिए काम्य है, जो दलितों, उपेक्षितों और समाज के मान्य वर्ग की दृष्टि से असभ्य लोगों का पक्षधर बनकर खड़ा हो सके। दिनकर राजनीतिक विषयों को भी महत्त्व देते हैं और मानते हैं कि राजनीतिक कविता श्रेष्ठ कविता होती है। 
    दिनकर ने अकबर इलाहाबादी का एक शे’र उद्धृत किया है जो उनके काव्य-चिंतन का निचोड़ है:
    ‘‘मानी को छोड़कर जो हों नाजुक-बयानियाँ,
    वह शे’र नहीं, रंग है लफ़्ज़ों के ख़ून का।’’
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-869

    Availability: In stock

    कहानियां कहानियां होते हुए भी कहीं सच भी होती हैं । बल्कि सच से भी अधिक सच । हिमांशु जोशी की ये कहानियां उसी सच को रेखांकित करती अनाज के यथार्थ से साक्षात्कार कराती हुई कई प्रश्न जगाती हैं ।
    इन रचनाओं की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं, इनकी सरलता, सहजता एवं मार्मिकता। सरल शब्दों में बड़ी बात कह देना बड़ा कठिन कार्य है। परंतु हिमांशु जोशी की इस महारत ने आज के अनेक कथाकारों के बीच उनकी अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई हैं । शायद इसीलिए ये कहानियां कहानियां  होते हुए भी जिए हुए जीवन के जीवंत अंश-सी लगती हैं । इनमें स्पदित होता यथार्थ, इन्हें सच के इतने निकट ले जाता है कि ये सच का ही पर्याय बन जाती हैं । किसी की अपनी ही जीवन-गाथा के सजीव दृश्य !
    इनमें धुँधलाए गाँव हैं मैले कस्बे, भीड़-भरे महानगर ! दिन-रात हांफते-कांपते, यंत्रवत जीते लोग ! उनके दुःख-सुख । उनकी समस्याएं ! एक नन्हे-से संसार में समाए कई-कई संसार !
    गहन अनुभव एवं अनुभूतियों के ताने-बाने से बुनी  इन रचनाओं के कुछ अलग रंग हैं। अलग राग ।
  • The Great Horizon (Biography)
    Debabrata Dasgupta
    225 203

    Item Code: #KGP-342

    Availability: In stock

    The Great Horizon is a biographical novel on Sir Alexander Fleming, a Scottish biologist and pharmacologist. His best-known discoveries are the discovery of the enzyme lysozyme and the antibiotic substance penicillin from the mold Penicillium notatum, for which he shared the Nobel Prize in Physiology or Medicine in 1945 with Howard Florey and Ernst Chain.
    Discovery of penicillin has come naturally as a life-giver to mankind. Disease-torn distressed humans have got a means of longevity through this life-saver. It has contributed in no less measure, to the average human longevity crossing the figure of seventies. The bright rays of the antibiotics have dispersed the dark clouds of sickness and diseases, which overcast the sky of human destiny. All this has been made possible due to the physician named Alexander Fleming who discovered it in 1928 and unfolded a new horizon.
  • Vaya Pandepur Chauraha
    A.M. Nayar
    350 315

    Item Code: #KGP-249

    Availability: In stock

    डा. नीरजा माधव हिंदी कथा-साहित्य का एक जाना- पहचाना नाम है। अनेक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों तथा छोटी कक्षाओं में भी उनकी कहानियां, कविताएं और उपन्यास पढ़ाए जा रहे हैं। नित नई और अनछुई भूमि पर अपना कथानक रचने वाली डा. नीरजा माधव ‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’ के माध्यम से ‘इम्पोटेंट इन्टेलीजेंसिया’ का एक भीतरी चेहरा बेनकाब करती हैं। किस तरह आज का बुद्धिजीवी मुखौटा लगाए सामाजिक सरोकारों की बात करता है, किस प्रकार शस्त्र बने शब्दों का मुंह स्वयं अपनी ओर घूम जाता है और हम तिलमिला उठते हैं अपना ही असली चेहरा देख। मानव मन की कृत्रिमता और विवशता को परत दर परत उधेड़ने वाली अलग ढंग की कहानियों का अनूठा संग्रह है--‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’।
  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan (Paperback)
    Mannu Bhandari
    150

    Item Code: #KGP-1426

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है। 
  • Koi To
    Vishnu Prabhakar
    125 113

    Item Code: #KGP-9096

    Availability: In stock


  • Samkalin Sahitya Samachar April, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #April, 2017

    Availability: In stock

  • Chintan Karen Chintan Mukt Rahen
    Swed Marten
    150 128

    Item Code: #KGP-279

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं ।
  • Main Vahan Hoon
    Ganga Prasad Vimal
    75 68

    Item Code: #KGP-1889

    Availability: In stock

    बस कुछ उमर का

    बस कुछ ठहर का
    सब
    ठीक हो जाएगा

    वर्षा के बाद
    धुलती सड़क की तरह

    किस्मत के खुलने पर
    न ताप रहेगा
    न संताप
    न भूख
    न हड़कम्प

    अखबार
    बड़े-बड़े शीर्षक और गुणी लोग
    तेज़ घोडों पर सवार
    अदृश्य हो जाते है हवा में

    और फिर आमरण
    चिंताओं की तरह
    चिपके रहते है स्मृति में

    बस कुछ ठहर कर ।
    -(इसी पुस्तक से)
  • Boo Toon Raaji
    Padma Sachdev
    150 135

    Item Code: #KGP-60

    Availability: In stock

    बू तूँ राजी
    मैं मूलत: कवयित्री हूँ । जो बात कविता से बहुत बडी हो जाती है, वह कहानी बनकर मेरे हाथों में छोटे बच्चे की तरह कुलबुलाने लगती है । कहानी की यह मेरी दूसरी किताब है । कभी-कभी लिखती हूँ कहानियाँ, वह भी उस वक्त, जब कहानियों के पात्र मेरे आँचल का कोना पकडे-पकडे मेरी गरदन तक आकर मुझे दाब लेते है । और ये पात्र जब मेरे जीवन का हिस्सा हो जाते हैं तब में लफ्जों के दोने में इन्हें फूलों की तरह सजाकर अपने पाठकों की झोली में डाल देती हूँ फिर वे इसका हार बनाएँ, फूलों को मंदिर के आगे सजाएँ या अपनी आँखों की पतली काजल की लकीर से पिरोकर अपने गले में डालें-ये उनकी खुशी है । मेरी कहानियों के पात्र मेरे घर के सदस्यों की तरह हो जाते हैं । मैं चाहती हूँ, आप भी इन्हें अपनी बैठक में बैठने का स्वान दें ।
  • Vish Vansh
    Rajesh Jain
    40 36

    Item Code: #KGP-1916

    Availability: In stock

    विष वंश
    कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।
    हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार राजेश जैन के इस प्रस्तुत नाटक 'विष वंश' में राजा की यह कथा हमारे आसपास के भ्रष्टाचार के जिस गहन सचिंतन से नंगा करती है, उसमें प्रतिपक्ष के लिए कोई अवकाश नहीं है । राजा अटपटसिंह और महामंत्री चंटप्रताप सिंह के माध्यम से तंत्र के भ्रष्टीकरण को, आज की नारी की अस्मिता क्या राजनीति में पनप राही वंशवाद को प्रवृति के साथ जोड़कर नाटककार ने इस नाट्यकथा को समकालीन समय का एक टकसाली पाठ बना दिया है । प्रजातंत्र ये प्रजा ही सर्वाधिक शक्तिशाली और सत्ताधीश हो-अत्यंत रोचक ढंग का यह सत्यान्वेषण इस नाटक के सुलझी हुई पहेली है ।
    छठे 'आर्य स्मृति साहित्य समान' के निर्णायक मंडल- राम गोपाल बजाज, कन्हैयालाल नंदन तथा असग़र वजाहत जैसे नाट्यविदों के मूल्यांकन के आधार पर सम्मानित इस नाट्यकृति का प्रकाशन, नाटकों की दुनिया में एक सदाबहार खुशबू का आह्वान है, ऐसा विश्वास है ।

  • The Change Maker (Paperback)
    Subhash Chandra Agrawal
    325

    Item Code: #KGP-327

    Availability: In stock

    A New Smart Democratic Venture
    To Mahatma Gandhi goes the credit of starting Non-Violent political movements; to Justice Bhagwati goes the credit of starting Public Interest Litigation, and now comes Subhash Agrawal who brings about changes by writing letters—a very unusual method which has resulted in significant successes in various areas, apart from winning him awards.
    Here is a method which can be followed and used by others, and perhaps a regular movement can be organized for better results. We present the first ever study of this new smart democratic venture.

    A Few of positive responses on Subhash's RTI Petitions:
    Wealth-declaration by judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Foreign trips of Judges: Restrictions now imposed by Union Government.
    - Immunity against retired judges: CBI and Income Tax authorities initiate enquiries.
    - Cases against retired judges: CBI and Income Tax authorities initiate enquiries.
    - Conduct-code for judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Disciplinary Authority for Judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Twisting RTI Act by rules framed by Delhi High Court: RTI rules at Delhi High Court get revised.
    - File-notings: Accepted by DoPT being under purview of RTI Act.
    - Wealth-declaration by Union Ministers: Disclosed by Rajya Sabha Secretariat.
    - Padma panel ignoring Olympics heroes: Authorities accept big lapse.
    - Not following deadline for Padma-awards nominations: 20th November now being strictly followed.
    - Flouting norms for issuing commemorative postal stamps: No violation reported after RTI petition.
    - Fees structure at private universities: UGC to regulate fees-structure at private universities.
    - RTI fees in various names: DoPT issues circular for uniform payee-name “Accounts Officer”- Merger of public sector oil-companies: Aspect gets momentum.
  • Mera Paigaam Muhabbat Hai Jahan Tak Pahunche (Paperback)
    Jigar Muradabadi
    150

    Item Code: #KGP-7111

    Availability: In stock

    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
    'जिगर' साहब इंसानियत और शेरियत दोनों का पैकर थे । उनकी शायराना अजमत का बडा राज उनकी मखसूस सज-धज, तर्जेअदा और तरन्नुम था । उनकी मासूम जोर दिलकश शखसियत ने उन्हें अपने दौर का महबूब-तरीन शायर बना दिया था । उनकी बड़ाई को इस पैमाने से भी नापा जा सकता है कि दौरे जदीद में कितनों ने जिगर बनने की कोशिश की, इसलिए कि शेर की दुनिया के वह एक तर्ज थे। असलूब थे, एक स्टाइल थे ।
    'जिगर' ने गजल को एक नई जिंदगी बख्शी । उनकी गजले मदहोशी व रंगीनी के छलकते हुए सागर  हैं, जिससे तरह-तरह के रंग मौजूद है और किस्म-किस्म के जजबात जलवागर हैं,
    जिनका मुताअला जिंदगी के नशे को गहरा कर देता है, कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और हयात नये रूप में जलवागर होकर दिल की धड़कन में जज्ब हो जाती है । खून को रवानी तेज हो जाती है और शायरी के तारों से आहंग हो जाती है। ये इंतेखाबे गजल के अशआर ऐसे है जिनमें नई जिंदगी और वक्त की धड़कनों की आवाजें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख 'जिगर' को कभी भुला नहीं सकेंगी ।
  • Amar Shaheed Bhagat Singh
    Vishnu Prabhakar
    150 135

    Item Code: #KGP-106

    Availability: In stock


  • Maalish Mahapuran (Paperback)
    Sushil Sidharth
    150

    Item Code: #KGP-514

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    -[इसी पुस्तक से]
  • Jangal Juhi
    Ramesh Chandra Shah
    320 288

    Item Code: #KGP-443

    Availability: In stock

    रमेशचन्द्र शाह के डायरी-लेखन की पहली कृति 'अकेला मेला' में सन् 1981 से 1985 तक की प्रविष्टियाँ शामिल थी तो दूसरी कृति 'इस खिड़की से' 1986 से 2004 तक की डायरी को समाहित किए हुए थी। तीसरी 'आज और अभी' का फलक 2004 से 2009 तक पाँच वर्षों को अंतः प्रक्रियाओं को समेटे हुए है और, अब यह चौथी डायरी 'जंगल जुही' अद्यावधि और 'अद्यतन' को। इस डायरी में लेखक ने अपने प्राग और हैदराबाद प्रवास के अत्यंत रोचक और मूल्यवान् यात्रानुभवों को भी सहज ही स्वत:स्फूर्त ढंग से पिरो दिया है, जिनसे-पाठक पाएँगे कि-उनके अपने ही जिये और भोगे हुए में एक नया और अप्रत्याशित आयाम आ जुड़ा है।
    जैसा कि एक सुधी समालोचक का मंतव्य है-"एक ही विधा में अनेक विधाओं का कायंतरण और अर्थांतस्या कैसे होता है, यह रमेशचन्द्र शाह की डायरियों को पढ़कर जाना जा सकता हैं।" यह भी कि-"एक सर्जक अपनी निर्विकार चेतना में कितना बहुविध हो जाता हैं। शाह की डायरी केवल तिथिक्रम में घटित जीवन-लीलाओं का बयान नहीं है, बल्कि भाव-विपुल सौंदर्य और अनुभूतियों में निहित मर्म का उदघाटन है। यहाँ दर्शन है-साहित्य की तरह; साहित्य है संस्मरणों की समृद्धि की तरह; संस्मरण है-जीवन के धड़कते हर पल की तरह डायरियाँ अनुभवों की जीवंत गाथाओं के समान होती हैँ।
    वे कल्पना-प्रसूत कविता-कहानी न होकर भी अगर उन्हीं की तरह आंदोलित और आनंदित करती है तो मानना पड़ेगा कि डायरी-लेखक एक कल्पनाशील-विचारशील व्यक्ति के साथ भाषा- शिल्पज्ञ भी है।" शाह की डायरियाँ अर्थान्वेषण की गंभीरता के साथ-साथ आलोचनात्मक अंतर्दूष्टि, 'विट' और 'ह्यूमर' से भी परिपूर्ण होती हैं। पाठक देख सकते हैं कि उनकी काल-चेतना कितनी प्रखर, प्रबुद्ध और संवेदनशील है।
    रमेशचन्द्र शाह की डायरी एक और रसिक मर्मज्ञ के शब्दों मे-"महज डायरी नहीं है; इसमें सही  में साहित्य का वैश्वीकरण हो गया है, जिसने मनुष्य की बनाई सारी सरहदों को तोड़कर सारी धरती को अपना घर-कूटुंब मान लिया है।' कुल मिलाकर शाह का डायरी-लेखन देश-काल की हदों को लाँघ  हमें उस लेकि में ले जाता है जहाँ हम खुद को सच के आईने के सामने खड़ा पाते है, जहाँ अपने से बचना मुरिकल ही नहीं, नामुमकिन होता है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya
    Ravindra Kalia
    180 162

    Item Code: #KGP-74

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Man Ki Baat
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    220 198

    Item Code: #KGP-724

    Availability: In stock

    मन की बात आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के निबंधों का संग्रह है, जिसे उन्होंने सहज भाव से ‘ललित निबंध’ कहा है। यद्यपि आलोचनात्मक एवं वैयक्तिक निबंधों के इस संग्रह में कई भाव-भूमियाँ हैं। शास्त्री जी अपने निबंधों में विधा की बंदिशों को स्वीकार नहीं करते, जिसकी अपेक्षा पेशेवर निबंध लेखकों से की जाती है। वैदुष्य और लालित्य के  रचनात्मक बिंदु पर खड़े उनके निबंधों का अपना रंग है। यह एक कवि का गद्य तो है ही, एक ऐसे साहित्य मनीषी की मनोभूमि का ललित विस्तार भी है, जो अपना उदाहरण स्वयं है।
    –गोपेश्वर सिंह
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nanak Singh
    Nanak Singh
    175 158

    Item Code: #KGP-437

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नानक सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कुचले हुए पुष्प', 'लक्ष्मी-पूजा', 'अंतर्ज्ञान', ‘अछूते आम', 'चक्षुहीन संत', 'जर्जर खपरैल की एक स्लेट', 'स्नोफॉल', 'इनसान-हैवान', 'लंबा सफ़र' तथा 'जब हम में 'इनसान' प्रकट होता है' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नानक सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Pracheen Bharat Ki Kathayen
    Mangal Dev Upadhyaya
    60 54

    Item Code: #KGP-9108

    Availability: In stock

    ऋषि ने अश्विनी कुमार की ओर देखते हुए कहा, ‘‘कहिये, आपको क्या चाहिए?’’
    अश्विनीकुमार ने निवेदन किया, ‘‘मधु-विद्या का रहस्य।’’
    ऋषि विस्मय-चकित हो उठे। उनके मुख से विस्मय भरे स्वर में अपने आप निकल पड़ा ‘‘मधु-विद्या का रहस्य!’’
    अश्विनीकुमार ने कहा, ‘‘हां ऋषिश्रेष्ठ, मधु-विद्या का रहस्य। मधु-विद्या के रहस्य से ही हमारा दैन्य दूर हो सकता है, हमारी व्यथाग्नि शान्त हो सकती है।’’
    ऋषि विचारों में डूब गए। उन्होंने सोचते हुए कहा, ‘‘पर मैं मधु-विद्या का रहस्य किसी अन्य पर प्रकट नहीं कर सकता। यदि मै। प्रकट करूंगा तो...।’’
    अश्विनी कुमार बीच में ही बोल उठे, ‘जानते हैं ऋषिश्रेष्इ! यदि आप प्रकट करेंगे, तो देवराज के द्वारा आपको शिरोच्छेद कर दिया जाएगा।’’
    ऋषि ने सोचते हुए कहा, ‘‘हां, यही बात है इस बात को जानते हुए भी आप मुझससे मधु-विद्या का रहस्य प्रकट करने के लिए कह रहे हैं?’’
    -इसी पुस्तक से
  • Nayi Chunouti : Naya Avasar (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    250

    Item Code: #KGP-458

    Availability: In stock

    नयी चुनौती : नया अवसर
    नयी शताब्दी युवकों की शताब्दी है । हजारों साल से चला आ रहा भारत आज युवा राष्ट्र बन गया है । हमारी कुल आबादी में लगभग सत्तर प्रतिशत लोग ऐसे है, जिनकी आयु पैंतीस वर्ष से क्रम है । ये युवक भी युवतियाँ पहले की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वाकांक्षी, जागरूक और सक्रिय है । वे न केवल बड़ी-बड़ी कल्पनाएँ ही करते हैं, बल्कि उन्हें साकार करने के लिए जी-तोड़ मेहनत भी करते हैं ।
    भारत की युवा पीढी से मुझे पूरा विश्वास है । हमारी यह जिम्मेदारी है कि हम अपने युवक-युवतियों की पूरी-पूरी सहायता करे, ताकि वे अपना भविष्य बनाने के साथ-साथ देश का भविष्य भी बना सके ।
    भारत आगे बढ़ रहा है । आत्मविश्वास से भरा भारत प्रगति की और अग्रसर है । एक ऐसा भाल, जो सभी तरह की विषम परिस्थितियों में उसी तरह विजयी होने के लिए कृतसंकल्प है, जिस तरह से हमरे बहादुर जवानों तथा वायु सैनिकों ने दुश्मन की फ़ौज़ को खदेड़ दिया था । कारगिल युद्ध तथा उससे पहले की सभी लड़ाइयों के वीर सेनानियों के प्रति हमारे हृदय में जो कृतज्ञता का भाव है, वह सदा प्रज्वलित रहेगा । देश उनका सदैव ऋणी रहेगा । -[इसी पुस्तक से]
  • Yatrayen (Paperback)
    Himanshu Joshi
    60

    Item Code: #KGP-7066

    Availability: In stock

    यात्राएँ
    कहानियों, उपन्यासों की तरह हिमांशु जोशी के यात्रा-वृत्तांतों  की भी अपनी विशेषता है। पढ़ते-पढ़ते पाठक को कहीं लगने लगता है कि इन यात्राओं में लेखक के साथ-साथ वह भी यात्रा कर रहा है । लेखक जिस तरह से इन सबको देख रहा है, जिस तरह की अनुभूति उसे हो रही है, कुछ-कुछ वैसी ही उसे भी होने लगती है । सरलता, सहजता, स्वाभाविकता हिमांशु जोशी की रचनाओं के सहज, स्वाभाविक गुण हैं । संभवत: ये ही मूल गुण किसी रचना को जीवंत बनाने में सफल होते है ।
    इन यात्राओं से कश्मीर के बर्फीले दुर्गम सीमा-क्षेत्र शामिल हैं तो पूर्व में बाँग्लादेश और भारत को विभाजित करती सुदूर हरित वंगा या इच्छामती के कूल-कगार भी । कहीं कन्याकुमारी तथा केरल की मनोरम हरित दुश्यावलियाँ हैं तो कुमाऊँ के पर्वतीय प्रदेश की अनेक अज्ञात, अछूती मनोरम झाँकियाँ भी। मॉरिशस का नीलवर्णी निर्मल स्वच्छ सागर है कहीं तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश की हिमशीतल सफेद हवाएँ भी अपने अस्तित्व का अहसास जताने लगती है । हिमांशु जोशी संभवत: वह हिंदी के पहले लेखक है, जिन्होंने विश्वविख्यात नाटककार हैनरिक इब्सन के घर सीयन की साहित्यिक यात्रा की थी । उसी तरह नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नार्वेजियन लेखक सीगरी उनसत तथा ब्यौर्नसन के घरों की तीर्थयात्राएँ भी।
    ये यात्रा-विवरण मात्र यात्रा के विवरण ही नहीं, कहीं इनमें  इतिहास भी है, भूगोल के साथ-साथ साहित्य भी । कला एवं संस्कृति की मार्मिक छुअन भी। इसीलिए ये वृतांत कहीं  दस्तावेज भी बन गए हैँ-जीए हुए अतीत के। पाठको को इनसे एक संपूर्ण जीवन का अहसास होने लगता है। एक साथ वह बहुत कुछ ग्रहण करने में सफल होता है-शायद यह भी इन वृत्तात्तों की एक सबसे बडी सफलता है ।
  • Das Pranidhini Kahaniyan : S.R. Harnot
    S. R. Harnot
    280 252

    Item Code: #KGP-9333

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Anuvaad Vigyan
    Bholanath Tiwari
    250 225

    Item Code: #KGP-735

    Availability: In stock

    अनुवादविज्ञान
    अनुवाद को उसके पूरे परिप्रेक्ष्य में लें तो वह मूलतः अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है। साथ ही अनुवाद करने में व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से भी हमें बड़ी सहायता मिलती है। इस तरह अनुवाद भाषाविज्ञान से बहुत अधिक संबद्ध है।...
    जहाँ तक अनुवाद का प्रश्न है, विद्यार्थी-जीवन में पाठ्यक्रमीय अनुवाद की बात छोड़ दें तो सबसे पहले अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘नेहरू अभिनंदन ग्रंथ’ में मुझे अनुवाद करने का अवसर मिला। उसी समय कुछ भाषा-संबंधी लेखों के मैंने अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किए। ‘गुलनार और नज़ल’ नाम से एक अंग्रेज़ी पुस्तक का संक्षिप्तानुवाद 1952 में पुस्तकाकार भी छपा था। 1962-64 में रूस में अपने प्रवास-काल में कुछ उज़्बेक, रूसी तथा इस्तोनियन कविताओं का भी मैंने हिंदी-अनुवाद किया था। ताशकंद रेडियो में 1962 में मेरे सहयोग से हिंदी विभाग खुला था। वहाँ प्रतिदिन आध घंटे के कार्यक्रम के लिए रूसी, उज़्बेक, अंग्रेज़ी आदि से हिंदी में अनुवाद किया जाता था, जिसका पुनरीक्षण मुझे करना पड़ता था। 1968 में भारतीय अनुवाद परिषद् ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका ‘अनुवाद’ के संपादन का भार मुझे सौंपा और समयाभाव के कारण, न चाहते हुए भी, कई मित्रों के आग्रह से मुझे यह दायित्व लेना पड़ा।
    प्रस्तुत पुस्तक की सामग्री के लेखन का प्रारंभ मूलतः ‘अनुवाद’ पत्रिका का सिद्धांत विशेषांक निकालने के लिए कुछ लेखों के रूप में हुआ था। विशेषांक के लिए कहीं और से अपेक्षित सामग्री न मिलने पर धीरे-धीरे मुझे अपनी सामग्री बढ़ानी पड़ी, किंतु अंत में सामग्री इतनी हो गई कि विशेषांक में पूरी न जा सकी। वह पूरी सामग्री कुछ अतिरिक्त लेखों के साथ प्रस्तुत पुस्तक के रूप में प्रकाशित की जा रही है।  -भोलानाथ तिवारी
  • Yathartha Se Samvad
    B.L. Gaur
    400 360

    Item Code: #KGP-449

    Availability: In stock

    बेख़ौफ अंगारे
    साहित्य को अब रास नहीं आता निरा रस 
    उससे भी ज़रूरी है कलमकार में साहस 
    ये काम अदब का है–अदब करना सिखाए 
    उनको जो बनाए हैं हरिक काम को सरकस
    दम घुट रहा अवाम का, फनकार बचा लो
    सब मूल्य तिरोहित हुए, दो-चार बचा लो
    सच्चे की शुबां पर हैं जहां शुल्म के ताले
    हर ओर लगा झूठ का दरबार, बचा लो
    संपादकीय ऐसे हैं ऐ दोस्त, तुम्हारे
    जैसे अंधेरी रात में दो-चार सितारे
    गुणगान में सत्ता के जहां रत हैं सुखनवर
    तुम ढाल रहे शब्द में बेख़ौफ अंगारे
    मैं ख़ुश हूं बड़े यत्न से धन, तुमने कमाया
    उससे भी अधिक ख़ुश हूं कि फन तुमने कमाया
    मेरी ये दुआ है कि सलामत रहो बरसों
    सदियों रहे ज़िंदा जो सृजन तुमने कमाया।
    —बालस्वरूप राही

  • Janmanmayi Subhadra Kumari Chauhan
    Rajendra Upadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-180

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Scandinavia
    Prashant Kaushik
    395 356

    Item Code: #KGP-9314

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics  from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Scandinavian short stories  are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious.  A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup  of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new  world on each page.

    With stories like Shortshanks, Priest and The Clerk, Golden Castle in the Air,  Two Stepsisters, Princess on the Glass Hill, Master-smith, this book is a compilation of 20 famous Scandinavian short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Scandinavia.
  • Kuchh Lekh Kuchh Bhaashan
    Atal Bihari Vajpayee
    400 360

    Item Code: #KGP-703

    Availability: In stock

    कुछ लेख, कुछ भाषण
    समूचा भारत हमारी निष्ठाओं का केंद्र और हमारा कार्यक्षेत्र है। भारत की जनता हमारा आराध्य है। हमें अपनी स्वाधीनता को अमर बनाना है, राष्ट्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखना है और विश्व में स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीवित रहना है। इसके लिए हमें भारत को सुदृढ़, शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बनाना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो साधन आवश्यक होगा, हम अपनाएंगे, जो नीति उपयोगी होगी, उसका अवलंबन लेंगे, जो कार्यक्रम हितावह होगा, उसका निर्धारण तथा कार्यान्वयन करेंगे।
    कंधे से कंधा लगाकर, कदम से कदम मिलाकर हमें अपनी जययात्रा को ध्येय-सिद्धि के शिखर तक ले जाना है। भावी भारत हमारे प्रयत्नों और परिश्रम पर निर्भर करता है। हम अपना कर्तव्य पालन करें, हमारी सफलता सुनिश्चित हैं।
    -इसी पुस्तक से
  • Apni Dharti Apne Log-3 Vols. (Paperback)
    Ram Vilas Sharma
    600

    Item Code: #KGP-7112

    Availability: In stock


  • Marxwadi Jeevan-Drishti Aur Rangey Raghav
    Madhuresh
    350 315

    Item Code: #KGP-700

    Availability: In stock

    श्री मधुरेश ने निःसंग मेध से रांगेय राघव के विषय में इस भ्रांति का भी निराकरण किया है कि रांगेय राघव ‘नस्लवादी’ थे। यह भयंकर आरोप डॉ. रामविलास शर्मा ने लगाया था। मधुरेश जी का यह मत मान्य है कि उस समय तक और आज तक, भारत के प्रागैतिहासिक युग (मोहन जोदड़ो) के विषय में निर्विवाद जानकारी उपलब्ध नहीं है और यह कि रांगेय राघव का ध्यान सर्वत्र ‘व्यवस्था’ पर केंद्रित रहता था और मानव शोषण और अत्याचार के विरोध पर तथा मानवतावादी प्रवाह की खोज पर। इसीलिए द्रविड़ों पर आर्य अत्याचार हो या मुसलमानों पर आंग्ल-आक्रमण हो, वह सर्वत्र हृदय से आक्रांत, शोषित, दमित के साथ रहते हैं और जालिमों का विरोध करते हैं, चाहे जुल्मी आर्य हो या अनार्य, यवन हो या ब्राह्मण, मुसलमान हो या कम्युनिस्ट। सर्वत्र राघव ने मानव-न्याय का परिचय दिया है। —डॉ. विश्वंभर नाथ उपाध्याय
    माकर्सवादी आलोचक के रूप में केवल मधुरेश ने उनके महत्त्व को रेखांकित किया, 1987 में जब उन्होंने साहित्य अकादेमी के लिए मोनोग्राफ लिखा ‘रांगेय राघव’। इस मोनोग्राफ में उन्होंने बाकायदे एक अध्याय लिखा ‘हिंदी की माकर्सवादी आलोचना और रांगेय राघव’। उनका मानना था कि ‘सन् ’45 से ’55 तक का काल हिंदी की माकर्सवादी आलोचना में प्रखर विवादों का काल रहा है और इन विवादों के आपसी अंतर्विरोध ही वस्तुतः हिंदी क्षेत्र में प्रगतिवादी आंदोलन के विघटन और माकर्सवादी आलोचना में भयंकर गतिरोध के कारण भी बने। यह दौर माकर्सवादी हिंदी आलोचना में ऐसी भयावह उग्रता और विनाशकारी उच्छेदवाद का दौर रहा है जिसमें अपने निकट वर्तमान में प्रगतिवादी साहित्य के निर्माण और विकास की संभावनाओं के प्रति पूरी तरह उदासीन रहकर बेहद गलत मुद्दों पर सारी बहस को केंद्रित कर दिया है।’
  • Kavi Ne Kaha : Ibbar Rabbi (Paperback)
    Ibaar Rabbi
    90

    Item Code: #KGP-1406

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : इब्बार रब्बी
    बचपन में महाभारत और प्रेमचंद होने का भ्रम, किशोर अवस्था में छंदों की कुंज गली में भटकने का भ्रम, फिर व्यक्तिवाद की दलदल में डुबकियां । लगातार भ्रमों और कल्पना-लोक में जीने का स्वभाव । क्या आज भी किसी स्वप्न-लोक के नए मायालोक में ही खड़ा हूं? यह मेरा नया भ्रम है या विचार और रचनात्मकता की विकास-यात्रा? क्या  पता । कितनी बार बदलूं।
    नया सपना है शमशेर और नागार्जुन दोनों  महाकवियों का महामिलन । इनकी काव्यदृष्टि और रचनात्मकता एक ही जगह संभव कर पाऊं । जटिल और सरल का समन्वय, कला और इतिवृत्तात्पकता एक साथ । ध्वनि का अभिधा के साथ पाणिग्रहण ।  नीम की छांह में उगे पीले गुलाबों की खुशबू से नाए रसायन, नए रंग और नई गंध जन्म लें । गुलाबों की शफ्फाक नभ-सी क्यारी में बीजों-सी दबी निबोलियां । इस नई मिट्टी और खाद से उगने वाले फूल, लताएं और वनस्पतियां बनें मेरी कविता ।
  • Kavi Ne Kaha : Ekant Shrivastava
    Ekant Shrivastva
    240 216

    Item Code: #KGP-7817

    Availability: In stock

    एकान्त वस्तुतः छत्तीसगढ़ की ‘कन्हार’ के कवि हैं। एकान्त का काव्य-संसार एक ओर माँ-बाप, भाई-बहन का भरा-पूरा परिवार है तो दूसरी ओर अंधी लड़की, अपाहिज और बधिर जैसे असहाय लोगों का शरण्य भी और ‘कन्हार’ जैसी लंबी कविता तो एक तरह से नख-दर्पण में आज के भारत का छाया-चित्र ही है। ‘अन्न हैं मेरे शब्द’ से अपनी काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले एकान्त उन थोड़े से कवियों में हैं जो ‘शब्द’ को अपनी कविताओं से एक नया अर्थ दे रहे हैं। निश्चय ही एकान्त का काव्य एक लंबी छलाँग है और ऊँची उड़ान भी--कवि के ही शब्दों में एक भयानक शून्य की भरपाई। -नामवर सिंह

    काली मिट्टी से कपास की तरह उगने की आकांक्षा से उद्वेलित यह कवि अपनी हर अगली कविता में मानो पाठक को आश्वस्त करता है कि वह अपने भाव-लोक में चाहे जितनी भी दूर चला जाए, अंततः लौटकर वहीं आएगा जो उसके अनुभव की तपी हुई काली मिट्टी है। यह एक ऐसी दुनिया है जो एक किसानी परिवेश के चमकते हुए बिंबों और स्मृतियों से भरी है। एक अच्छी बात यह कि गहरे अर्थ में पर्यावरण-सजग इस कवि के पास एक ऐसी देखती-सुनती, छूती और चखती हुई भाषा है, जो पाठक की संवेदना से सीध संलाप करती है।   -केदारनाथ सिंह

    एकान्त की कविता और कवि-कर्म की खूबी है कि उन्होंने अपने को औपनिवेशिक आधुनिकता के पश्चिमी कुप्रभाव से बचाया है। यही कारण है कि उनकी कविता कलावादी और रूपवादी प्रभाव से मुक्त है। ऐसा इसलिए कि एकान्त अपने जनपद, अपनी जड़ों और अपनी ज़मीन को कभी नहीं छोड़ते। उनकी कविता हमें भारतीय समृद्ध काव्य-परंपरा की याद दिलाती है जो आज की अधिकांश कविता से विलुप्तप्राय है। एकान्त, निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा के सशक्त कवि हैं। एकान्त की कविता में कोई ठहराव नहीं है। वे आज भी नित नवीन और सारगर्भित कविताएँ बिना किसी विचलन या दोहराव के रच रहे हैं। क्योंकि उनका गहरा रिश्ता भारतीय लोक और जनमानस से बना हुआ है। सही अर्थों में वे लोकधर्मी कवि हैं। ‘नागकेसर का देश यह’ हिंदी में एकान्त की सर्वाधिक लंबी कविता है जिसके कई अर्थ-ध्वनिस्तर हैं और बड़ी संश्लिष्टता है।      -विजेन्द्र
  • Apajas Apne Naam
    Ram Kumar Krishak
    190 171

    Item Code: #KGP-1895

    Availability: In stock

    कवि केदारनाथ अग्रवाल ने एक बार मुझसे कहा था—'जब लोग पैसे कमा रहे थे, तब मैं बदनामी कमा रहा था। ' ठीक यहीं भावार्थ देता है कृषक का यह नया ग़ज़ल-संग्रह—'अपजस अपने नाम' । केदार जी की 'बदनामी' और कृषक जी का 'अपजस' क्या है? रचना की खेती करनेवालों और रचना-कर्म में जीवन होमनेवालों को 'दुनियादार लोग' बेकार ही तो समझते है । कबीर और उनके समकालीनों के प्रति भी धन्नासेठों और श्रीमती का यही रवैया था।
    कृषक जी का साहित्य और उनका जीवन एक-दूजे से अलग नहीं है, इसीलिए उनकी ग़ज़लें विश्वसनीय हैं । उनमें वर्णित सच किसी भी तरह की पॉलिमिक्स नहीं है । तरह-तरह के अभावों में जीते, धारा के विरुद्ध संघर्ष करते उन्होंने एक लंबी और बहुस्तरीय रचना-यात्रा की है, जिसमें हमेशा ही उनके कथ्य ने नई और माकूल भाषा बरती है ।
    वर्तमान सामाजिक जीवन में व्यवस्थाजन्य अनेक जहरीली गुत्थियाँ हैं,  जिन्हें खोलते-खोलते रचनाकार बार-बार हँसा जाता है, लेकिन मरता नहीं और आत्यंतिक सच सामने रख देता है । सच कहने के एवज में हर युग, हर समय में कवियों-कलाकारों-विचारकों-जननायकों को अपार कष्ट झेलना पडा, लेकिन वे न झुके, न टूटे । यही कारण है कि कृषक जी की ग़ज़लें हमारे समय के रोज पैदा होनेवाले यक्ष प्रश्नों से गुत्थमगुत्था हैं। वे कहीं संकेतों में अपनी बात कहते है, कहीं सीधे-सीधे ।
    दरअसल कृषक उन कवियों में नहीं है, जो रचना और आलोचना के बने-बनाए खाँचों और ठप्पो में फिट बैठते हों। जन-प्रतिबद्ध कोई कवि ऐसा हो भी नहीं सकता। वे एक सजग और निडर सामाजिक कवि है । कवियों की उस जमात से कत्तई अलग, जहाँ सब कुछ ज़गमग-ज़गमग होता है। इसीलिए उनके यहीं अनुपयोगी सजावट, पच्चीकारी या कला-कोविदी नहीं है। इसीलिए वे 'अदबी नसीहतों' पर कुर्बान नहीं होते, बल्कि न्याय और इंसानियत के लिए लड़ रही जनता पर कुर्बान होते हैं ।
    उम्मीद है, 'नीम की पतियां' के बाद कृषक जी का यह ग़ज़ल-संग्रह पाठकों को ज़रूर कुछ नया देगा ।
    -कुबेरदत्त
  • Mataki Mataka Matkaina
    Dronvir Kohli
    100 90

    Item Code: #KGP-977

    Availability: In stock

    तुम यह जानना चाहोगे कि मैंने यह कहानी कैसे लिखी। वैसे, कुछ लेखक अपना भेद बताने से कतराते हैं। लेकिन मुझे कोई आपत्ति नहीं है सारी बात बताने में।
    मैं विदेश-भ्रमण करता रहता हूं। एक बार मैं एक देश के एक ऐसे नगर में गया जहां पतझड़ का मौसम था। सारे इलाके की शोभा देखते ही बनती थी। यह उस प्रदेश की विशेषता थी। पतझड़ के मौसम में वहां के गली-कूचे, सड़कें-पगडंडियों, घर-बाहर के लाॅन, पार्क और जंगल भांति-भांति के पेड़ों के झड़ते रंग-बिरंगे पत्तों से इस तरह ढक जाते थे कि सचमुच धरती दिखाई ही नहीं पड़ती थी। वहां के झड़ते सूखे पत्ते भी सुंदर लगते थे कि देख-देखकर हृदय बल्लियों उछलता था।
    इसके साथ ही वहां मैंने एक और अद्भुत बात देखी। वहां के रहने वाले लोग पतझड़ के पत्तों को जलाते नहीं थे क्योंकि इससे वायुमंडल दूषित होता है। वे करते यह थे कि सूखे पत्तों को बटोरकर सड़क के किनारे ढेर करते रहते थे। निश्चित दिन गाड़ी आती थी और पत्तों को समेटकर ले जाती थी।
    लेकिन इससे भी विचित्र बात वहां मैंने यह देखी कि ये सूखे पत्ते जब तक सड़क के किनारे पड़े रहते थे, तब तक बेचारी गिलहरियों की जान सांसत में आ जाती थी। सड़क के किनारे पड़े सूखे पत्तों के ऊंचे-ऊंचे अंबार फांदकर बेचारी गिहरियां आ-जा नहीं सकती थीं और गाड़ियों के नीचे आकर कुचली जाती थीं।
    संयोग से वहां मैं ऐसी बस्ती के एक घर में ठहरा था जो जंगल के सिरे पर स्थित था। मैं जब बाहर टहलने निकलता, तो सड़क पर दोनों तरफ टीलों की तरह लगे पत्तों के ढेर के साथ मरी हुई गिलहरियों को देखकर मन भारी हो जाता। बस, इन मृत गिलहरियों को देखकर ही मुझे यह कहानी लिखने की प्रेरणा मिली।
    सच पूछो तो, मैं उस शहर में न गया होता, और फिर जंगल के किनारे उस घर में न ठहरा होता, तो यह कहानी लिखी ही नहीं जा सकती थी। इसे लिखते समय मुझे अपार आनंद मिला।
    —द्रोणवीर कोहली
  • Kavi Ne Kaha : Neelesh Raghuvanshi (Paperback)
    Nilesh Raghuvanshi
    140

    Item Code: #KGP-7020

    Availability: In stock

    किसी कवि का कथन है कि कविता हमारे चारों ओर चीज़ों, घटनाओं, गतियों, स्थितियों, ध्वनियों, आहटों और अंतरालों में हर समय मौजूद होती है, वह हमारे आसपास तैरती रहती है और एक समर्थ कवि उसे पहचानकर एक परिचित शक्ल दे देता है। नीलेश रघुवंशी अपने दौर के पुरुष और महिला कवियों से इस रूप में अलग हैं कि उनके लिए कविता हमारे सामान्य निम्नमध्यवर्गीय जीवन से अलग, विभिन्न या उससे उच्चतर काम नहीं है बल्कि वह उसी जीवन के भीतर घटित होती है। उनकी कविता अपने समय के भौतिक और मानसिक द्वंद्वों को अनदेखा करके अभिव्यक्ति का कोई अपरिचित लोक नहीं रचती। वह जीवन को जारी रखने वाले कामों का निषेध नहीं करती बल्कि उन्हीं कामों में से अपने को उत्पन्न करती रहती है।
    जीने की उष्मा और ललक से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में नीलेश की नई पहचान को रेखांकित करती हैं। ‘पहली रुलाई तक की डायरी’ जैविक स्त्री-बोध का क्रमिक दस्तावेज है, जो शायद हिंदी में पहली बार इतनी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुआ है। इस काव्यात्मक डायरी को जो बात सबसे अधिक  विश्वसनीय बनाती है, वह अजन्मे शिशु के साथ माँ की वह चुहल है, जो प्रायः इसके हर टुकड़े में मिल जाएगी। ‘जन्म देना एक यातना से गुजरना है’--इस पंक्ति को लिखने वाली यह कवयित्री ही यह क्रीड़ाभरी पंक्ति भी लिख सकती है--‘मैं लिख रही हूँ डायरी और तुम बंदर बने हुए हो--तुमने तो मेरे पेट को खेल का मैदान बना रखा है।’ जन्म देने के सर्जनात्मक उल्लास से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में कुछ नया जोड़ती हैं।   
  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 297

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Aahang (Paperback)
    Majaz Lakhanawi
    150 135

    Item Code: #KGP-253

    Availability: In stock

    आहंग 
    फैज़, जज़्बी, अली सरदार जाफरी और मख़दूम मुहीउद्दीन जैसे जाने-माने शायरों में मजाज़ की गिनती की जाती है। साज़ो जाम का आशिक़ मजाज़ इनक़िलाब और शमशीर ज़नी की बातें भी करता है। मजाज़ के कलाम में न तो मौलवी के नतक़  की कड़क है, न बाग़ी के दिल की आग बल्कि इसके बरख़िलाफ़ नग़मा सुख़नी की वह अधिकता है जो सुनने वाले को उस दुनिया में ले जाता है जहां शबाब व जमाल की रंगीनियां हैं।
    मजाज़ सिर्फ़ शराब और शबनम की बातें ही नहीं करता वह आज के दौर की ज़रूरतों को पूरा करता हुआ इनक़िलाबी नौजवान भी बन जाता है जिसके सामने रहबरी और सुल्तानी मजबूर और बेकस नज़र आती है। मजाज़ वह शायर है जो सिर्फ़ इनलाब की बात ही नहीं करता, वह इनक़िलाब के तराने भी गाता है।
    मजाज़ ने नौजवानों के दिलों की धड़कन की आवाज़ को सुना भी और उस आवाज़ को अपने सीने में सिमोया और उसके हसीन अल्फ़ाज़ के पैकर में ढाला और फिर शायरी के आहंग में रचाकर यूँ पेश कर दिया कि नौजवानों के दिलों के तार झनझना उठे और वह इसकी लय पर अपने जज़्बात की परवरिश करने लगे।
  • Akela Mela
    Ramesh Chandra Shah
    225 203

    Item Code: #KGP-705

    Availability: In stock

    अकेला मेला
    ‘उसी एकांत में घर दो जहाँ पर सभी आवें/मैं न आऊँ’...इस प्रसिद्ध कविता के कवि की ही तरह हर लेखक की यही आकांक्षा होती होगी कि वह अपने लेखन में एक ऐसा निर्वैयक्तिक सुर साध सके, जिसमें हर आदमी को अपने ‘हृदय की बात’ सुनाई पड़े, और, साथ ही, पृष्ठभूमि का वह कलह-कोलाहल भी, जिसके बीचोबीच वह रहता है और जिसके कारण, जिसके फलस्वरूप ही उसे वह बात अपने हृदय की बात लगती है।
    कवि-कथाकार और आलोचक रमेशचन्द्र शाह की यह पुस्तक चूँकि उनकी डायरी है--उनके लेखकीय अंतर्जीवन का अंतरंग साक्ष्य--इसलिए यहाँ ‘सब’ के साथ ‘मैं’ अनिवार्यतः गुँथा हुआ है। बगै़र इस लेखकीय ‘मैं’ की निरंतर उपस्थिति और आवाजाही के, भला इस डायरी नाम की विधा का औचित्य ही क्या ! परंतु इसके पृष्ठों से गुज़रते हुए आप देखेंगे--खुद महसूस करेंगे कि किस क़दर यह लेखक आपके अपने जीवनानुभव में घुल-मिल सकता है, किस क़दर उसके घरेलू, सामाजिक और साहित्यिक अनुभवों में आपकी पैठ सहज ही बनती चलती है; यहाँ तक कि इस लेखक के जो अनुभव या सरोकार आपकी अपनी पसंद या जानकारी के दायरे से बाहर पड़ते होंगे, वे भी अपने आप में इतने उत्तेजक हैं कि आपको पता भी नहीं चलेगा, कब कैसे उन्होंने आपको अपने घेरे के भीतर खींच लिया।  
    बेशक, इसमें ज्ञान की बातें हैं, पर कितने आपके काम की, कितना आपको रमाने वाली ?---बशर्ते आप रमना चाहें इनमें। और, भला क्यों न रमेंगे आप इनमें भी बाक़ी जगहों की ही तरह ? क्या इस ज्ञान का भी अपना, बेहद अपना रस नहीं, जो आपके भी सिर पर चढ़कर बोल सके ? देस-बिदेस, अपना- पराया सब भुलाके रख दे--ऐसी माया है इन कुछ अध्ययन-प्रसंगों की भी कि वे आपको नितांत अपने लगेंगे।

  • Kaal Chetna
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1975

    Availability: In stock

    काल चेतना
    एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,
    लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं ।
    सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक है
    और चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का ।
    सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती है
    और चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति ।
    दोनों शक्तियां स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक है ।
    अन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,
    इंसान के भीतर पडी पनपती रहती है ।
    यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती है
    और पिता-पितामह के करमों से भी ।'
    हमारे अपने देश में, कई जातियों में
    एक बहीं रहस्यमय बात कही जाती है,
    हर बच्चे के जन्म के समय,
    कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना ।
    इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,
    किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रिय
    से रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती है
    और आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती 
    मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथा
    बहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मत
    की लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए ।
    पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,
    ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियों
    से न रूठने का संकेत है ।
    यह पुस्तक भी तेरहवीं थाली में कुछ परसने का यत्न है ।
    - अमृता प्रीतम
  • The 10-Pound Shred (Paperback)
    Tommy Europe
    295

    Item Code: #KGP-346

    Availability: In stock

    The 10-Pound Shred lets you bring Tommy Europe's tough-love, bootcamp-style workouts home. In just 31 days, Tommy will take you from flab to fit, helping you shed 10 poundsor more in the process. Each day has complete, easy-to- understand exercise instructions with step-by-step photos. There's no complicated flipping around to figure out what you need to be doing–and no free breaks, either! You don't need fancy equipment or even a gym membership–just a good pair of shoes and the willingness to get moving. There's also a nutritious, flexible meal plan designed to help you set a new, lifelong pattern of healthy eating. And through it all, Tommy's there with his signature blend of drill sergeant and inspiring friend, pushing you to reach higher, go faster and shred a little harder.
    Whether you have a wedding coming up, want to look great at the beach or just want to have more energy, Tommy will help you lose those 10 pounds. You're going to sweat, you're going to hurt–but you're going to love the results. So stop making excuses, put down that cupcake and pick up The 10-Pound Shred.
  • Malik Muhammad JaaysI
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-139

    Availability: In stock

    मलिक मुहम्मद जायसी एक कवि होने के साथ-साथ सिद्ध फकीर भी थे । उनकी काव्य-प्रतिभा अद्वितीय थी । उन्होंने आंचलिक भाषा अवधी में जितना सुंदर महाकाव्य रचा है, उतना हिंदी साहित्य के किसी दूसरे कवि ने नहीँ रचा । जायसी ने ठेठ अवधी की उच्चकोटि की शब्दावली का प्रयोग किया है ।
    अवध के रायबरेली जनपद के कस्बे 'जायस' का नाम उन्होंने अमर कर दिया । उनका महाकाव्य 'पदमावत' उच्च कक्षाओं के पाठयक्रम से पढाया जाता है । अनेक विद्वानों ने इस ग्रंथ पर शोध करके पी-एच०डी० और डी० लिट्० की उपाधियां प्राप्त की हैं ।
    देश के अतिरिक्त विदेशों के विभिन्न विश्वविद्यालयों में भी यह ग्रंथ पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाया जाता है । लोकभाषा का जितना मनोहारी रूप इस ग्रंथ में प्राप्त होता है, उतना अन्यत्र दुर्लभ है ।

  • Toro Kara Toro (All 6 Vols.) (Paperback)
    Narendra Kohli
    1780 1424

    Item Code: #KGP-TKTPB1

    Availability: In stock

     All 6 Vols. in Paperback.
  • Samkalin Sahitya Samachar October, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #October, 2017

    Availability: In stock

  • Chaak Par Charhi Maati
    Baldev Vanshi
    200 180

    Item Code: #KGP-631

    Availability: In stock

    धरती पर माटी का अम्बार, अनेकानेक रूपों में बढ़ता जा रहा है । माटी का विस्तार संवेदना-शून्य, मरी माटी का । पांवों तले बेदर्दी से कुचली-गूंधी माटी/खेतों की/नदी-नालों के बहते पानियों की/कहाँ-कहाँ से आई बहकर / रोते हुए भूखे कण/दुविधा में दुखते क्षण/अकाल के मारे । पानी-पानी जागने/पत्थर-पत्थर सोने के/उनींदे-विदीर्ण सपनों के/कैसा लेंगे रूप? यही वर्तमान इक्कीसवीं सदी की भयसनी, भयंकर त्रासदियों की नियति है । लगता है किन्हीं अलक्ष्य ग्रहों से पीड़ाएँ इस धरती पर मृत्यु, युद्ध, हिंसा, हत्या के रूप में बरस रही हैं या इस धरती की माटी से ही उग-उगकर बाहर निकल रही हैं ।
  • Rangon Ki Gandh-2
    Govind Mishra
    595 536

    Item Code: #KGP-9161

    Availability: In stock

    रंगों की गंध

    यात्रा जीवन के दूसरे अनुभवों से थोड़े अलग किस्म का अनुभव है। जहां दूसरे अनुभव हमें साफ-साफ जोड़ते-तोड़ते हैं, अपनी अंतरंगता में चरमरा डालते हैं या फिर सूखा-सूखा और दूर-दूर रखते हैं...वहां यात्रा दूसरी रखते हुए भी पास लाती हे, हम अपने खोल से बाहर निकलकर संसार की व्यापकता को छूते होते हैं। व्यापकता की यह छांह दुखी व्यक्ति को टूटने से बचाती है। स्वयं से थोड़ा वैराग्य और बाहर से जुड़ना दोनों एक साथ होता चलता है। मेरे लिए जो इससे बड़ी बात है, वह यह कि यात्रा में हम चलते हैं, हर हाल में चलते रहना-यह मेरी जिद दृढ़तर करती है यात्रा।
    -गोविन्द मिश्र
  • Bharat Mein Panchayati Raaj (Paperback)
    Vishv Nath Gupta
    70

    Item Code: #KGP-1405

    Availability: In stock


  • In Dinon Ve Udhas Hain
    Dinesh Pathak
    75 68

    Item Code: #KGP-1930

    Availability: In stock

    इम दिनों वे उदास हैं
    'इन दिनों वे उदास हैं ' दिनेश पाठक की नौ बहुचर्चित कहानियों का संकलन है । इस संकलन की कहानियों में जीवन के कई रंग, कईं अनुभव है । लेखक की विशेषता जीवनानुभवों को वस्तुगत रूप में प्रस्तुत करना नहीं, वरन उन्हें रचना के दायरे में लाकर उनका सामाजिक अर्थ पाने की स्पष्ट एवं सार्थक कोशिश करना है । कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ अनुभव-संबद्धता से पैदा हुई आत्मीय संस्पर्श की ऊष्मा से  परिपूर्ण कहानियाँ है । प्रस्तुति के स्तर पर इनमें न कोई बौद्धिक आडंबर है, न चमचमाता वाग्जाल । जो कुछ है, वह अनुभव के स्वायत्त वेग से उत्पन्न शिल्प है, भाषा है । एकदम सहज-सरल और स्वत स्फूर्त ।
  • Aadhi Chutti Ka Itihas
    Raj Kumar Gautam
    140 126

    Item Code: #KGP-1844

    Availability: In stock

    आधी छुट्टी का इतिहास
    हिंदी के चर्चित कथाकार राजकुमार गौतम की कहानियाँ समकालीन जीवन-स्थितियों  का गहरी इमानदारी से  उकेरती हैं । शहरी और  कस्बाई निम्न-मध्यवर्ग उनकी कहानियों में विशेष रूप से चित्रिन हुआ है, जो न तो किताबी है और न आयातित, बल्कि ठेठ हिंदुस्तानी हैं । यही कारण है कि राजकुमार गौतम की प्राय प्रत्येक कहानी किसी भी साहित्यिक वाद-विवाद से परे सामाजिक यथार्थ के विभिन्न स्तरों की खरी पहचान कराने में समर्थ है ।
    आधी छुट्टी का इतिहास में राजकुमार गौतम की एक दर्जन कहानियाँ संगृहीत हैं । इनसे गुजरते हुए लगया कि इनका प्रत्येक कथा-चरित्र हमारे एकदम नजदीक है या शायद हमारा ही प्रतिरूप  है। इतना ही नहीं, इनमें उन निर्जीव  वस्तुओं को भी जुबान मिली है, जो हमारी रोज  की बुनियादी जरूरतों को पूरा करती  हैं और इसी बिंदु पर ये कहानियाँ मनुष्य की अभावग्रस्त जिंदगी, यातना और उसकी जिजीविषा को मार्मिक ढंग से उजागर करती  ।
    टुटे-अधटूटे पारिवारिक रिश्तों और दायित्वों का बोझ ढोते, घर-दफ्तर के बीच चक्कार काटते तथा छोटी-छोटी इच्छाओं, खुशियों और उम्मीदों की पूर्ति के  लिए दिन- दिन  कितने ही चरित्र इन कहानियों में हैं, जो हमने बोलना-बतियाना चाहते  हैं, ताकि अपने जीवन पर पड़ते विभिन्न दबावों के प्रतिरोध की ताकत बटोर और सौंप  सकें । संक्षेप में, अपने सामाजिक परिवेश, उसके यथार्थ और अपनी लडाई के निजी मोर्चों की पहचान के लिए इन कहानियों को लंबे समय तक याद किया जाएगा ।
  • Navjaagran Aur Mahadevi Verma Ka Rachana-Karm Stri-Vimarsh Ke Svar
    Krishna Dutt Paliwal
    445 401

    Item Code: #KGP-624

    Availability: In stock

    नवजागरण और  महादेवी वर्मा का रचना-कर्म स्त्री-विमर्श के स्वर
    महादेवी वर्मा के जन्मशताब्दी वर्ष में यह सोचकर हृदय में  पीडा होती है कि उन जैसी भारतीय स्वाधीनता-आंदोलन की लय से निमग्न कवयित्री के साथ हिंदी-आलोचना के मर्दवाद ने ऐसा सलूक क्यों किया?
    उनके सृजन के नवजागरणवादी  पक्ष को अनदेखा करते हुए 'रहस्यवाद-अध्यात्मवाद' में लपेटकर उसे पूरी तरह छिपा दिया गया । आखिरकार क्यों?
    ऐसा क्यों हुआ कि देश और समाज के लिए किया गया उनका मौन-मुखर विद्रोह पूरी तरह 'विस्मृति' के अंधकार में धकेल दिया गया ?
    आज इस स्थिति पर दूर तक स्त्री-विमर्श की अवधारणाओं से सोचने की ज़रूरत है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Agyey
    Agyey
    260 221

    Item Code: #KGP-662

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अज्ञेय ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मेजर चौधरी की वापसी', 'गैंग्रीन (रोज)', 'नगा पर्वत की एक घटना', 'हीली-बोन की बत्तखें', 'पठार का धीरज', 'जयदोल', 'विवेक से बढ़कर', 'साँप', 'शरणदाता' तथा 'कोठरी की बात'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अज्ञेय की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Himalaya Gaatha-5 (Lokvarta)
    Sudarshan Vashishath
    495 421

    Item Code: #KGP-693

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-5 (लोकवार्ता)
    अदभुत है लोक वाड्मय। यह जितना गहन है, उतना ही तर्कशील और विवेकशील है । इसके रचयिता वे अनाम रचनाकार रहे हैं, जिन्होंने कभी अपने नाम नहीं दिए । लोक की रचना जितनी मारक रही है, उतनी ही काव्यमयी । हालाँकि उन रचयिताओं ने कहीँ से छंदविधान नहीं सीखा, किसी काव्यशास्त्र की शिक्षा नहीं ली । सबसे बडी बात यह कि राजाओं के निरंकुश शासन के समय भी उन्होंने बड़ी से बडी बात अपने ढंग से निडर होकर कही । वे काल और स्थिति के अनुसार नए-नए छंद रचते रहे । लोक की रचना में अपनी परंपरा के वहन के साथ समाज- सुधार की एक धारा भी निखार बहती रही । अपनी संस्कृति का संरक्षण, अपने संस्कारों का समादर इनका अभीष्ट रहा ।
    हमारी लोकवार्ता लोकगीत, लोकसंगीत, लोकनाट्य, लोकोक्ति-मुहावरे, लोककथा और लोकगाथा के रूप में सुरक्षित रही है। यह मात्र मनोरंजन का साधन न होकर संस्कृति के संवाहक और संरक्षक के रूप में अधिक जानी गई । समाज के विश्वास, आस्थाएँ, धारणाएं और समस्त क्रियाकलाप लोकवार्ता में परोक्ष रूप से छिपे रहते हैं, जो हमारी थाती को बुढ़िया की गठडी की भाँति सिरहाने रखे रहते हैं।
    लेकिन आज हमारी यह संपदा लुप्त होने के कगार पर है । भौतिकवाद, बाजारवाद और समाज के बदलते परिवेश और मूल्यों ने पुरानी परंपराओं को धराशायी कर दिया । लोकगायकों, वादकों ने अपना कर्म छोड़ दिया । आज न किसी के पास कथा या गाथा सुनने का समय है और न सुनने का । दादी-नानी दूरदर्शन में सास-बहू की कहानी देखती हैं । हम अपनी भाषा, वेशभूषा से विमुख हुए । ऐसे अपसंस्कृति के कुसमय में इस दुर्लभ साहित्य का संग्रहण आवश्यक हो जाता है ।
    कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अमूल्य थाती का संग्रह कर एक अति महत्त्वपूर्ण काम किया है, जिसके लिए कल का इंतजार नहीं किया जा सकता था । लोकवार्ता की मात्र प्रस्तुति न देकर उसका सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण विषय को और भी गहनता प्रदान करता है । 'हिमालय गाथा' के पाँचवें खंड में दी गई दुर्लभ सामग्री हमारी परंपराओं के अध्ययन के लिए एक मील का पत्यर साबित होगी, ऐसा विश्वास है ।

  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand
    Shanta Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-1865

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापक विवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Arvacheen Kavya-Sudha (Paperback)
    Pushp Pal Singh
    30

    Item Code: #KGP-950

    Availability: In stock


  • Deevaar Ke Us Paar
    Shanta Kumar
    200 180

    Item Code: #KGP-1965

    Availability: In stock

    दीवार के उस पार
    इस पुस्तक से एक कैदी ने जेल से भोगे अपने मूक कष्टों को शब्द दिए हैँ। यह कैदी मेरे जीवन की आशा हैं- मेरे पति, जिन्होंने अपने जीवन से दो बार जेल की घोर यातनाएँ झेली है और अँधेरों के पार कुछ देखने की लगातार कोशिश की है । एक बार उन्हें 1953 में और दूसरी बार 1973 में जेल जाना पडा । उनका सहानुभूति-भरा हृदय और सृजनात्मक मानस उन्हें उन दिनो लिखने के लिए विवश करता रहा और उन्होंने कुछ कहानियों, उपन्यास, कविताएं  और जेल-संस्मरण लिखे ।
    ये संस्मरण जेल से उनके जीवन को दर्शन है-उसके लिए जो कभी जेल न गया हो-भगवान् ऐसा अवसर कभी दे भी न-ये अनुभव अत्यंत रोमांचक और हृदयविदारक होंगे ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash
    Uday Prakash
    395 356

    Item Code: #KGP-904

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand (Paperback)
    Shanta Kumar
    180

    Item Code: #KGP-399

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापकविवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Suryabala
    Suryabala
    230 207

    Item Code: #KGP-418

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सूर्यबाला ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रेस', 'बिन रोई लड़की', 'बाऊजी और बंदर', 'होगी जय, होगी जय...हे पुरुषोत्तम नवीन !', 'न किन्नी न', 'दादी और रिमोट', 'शहर की सबसे दर्दनाक खबर, 'सुमिन्तरा की बेटियां', 'माय नेम इश ताता' तथा 'सप्ताहांत का ब्रेकफास्ट'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सूर्यबाला की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Chunauti
    Sudrashan Kumar Chetan
    150 135

    Item Code: #KGP-177

    Availability: In stock


  • She (Stories)
    Dixy Gandhi
    425 383

    Item Code: #KGP-783

    Availability: In stock

    A first ever collection of stories centered around Women’s lives in Modern Times
    Society in modern times is changing very fast, and so is changing the situation and role of women in facing and dealing with them. With the expansion of education among them, they are taking things with gusto and intelligence, at times coming out with unexpected results. Their understanding is different, approach is different and what they present is also not only engrossing but also enlightening.
    It is time women wrote with themselves at the centre of happenings and here is perhaps the first such collection of exciting stories by the upcoming author Dixy Gandhi who shows great promise and quality.

  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    180

    Item Code: #KGP-7055

    Availability: In stock

    रांगेय राघव रचित  प्राचीन सांस्कृतिक कहानियों के छह बृहत संग्रह 
    प्राचीन यूनानी कहानियाँ
    यूनानी संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाली ऐसी कहानियों का संग्रह, जो वहाँ के अतीत जीवन की अत्यंत रोचक झाँकी प्रस्तुत करती हैं ।
    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।
    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    ऐसी उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह, जिनमें भारतीय साहित्य के उन अमर पात्रों के चित्र उतारे गए हैं जिन्होंने सदियों से भारतीय आत्मा क्रो 'जियो और जीने दो' की प्रेरणा दी ।

  • Chinhaar
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-110

    Availability: In stock

    चिन्हार 
    "माँ, लगाओ अँगूठा !" मँझले ने अँगूठे पर स्याही लगाने की तैयारी कर ली, लेकिन उन्होंने चीकू से पैन माँगकर टेढ़े-मेढे अक्षरों में बडे मनोयोग से लिख दिया-'कैलाशो  देवी"।  उन्हें क्या पता था कि यह लिखावट उनके नाम चढ़ी दस बीघे जमीन को भी छीन ले जाएगी और आज से उनका बुढापा रेहन चढ जाएगा ।
    रेहन में चढा बुढापा, बिकी हुई आस्थाएँ, कुचले हुए सपने, धुंधलाता भविष्य-इन्हीं दुख-दर्द की घटनाओं के ताने-बाने ने चुनी ये कहानियाँ इक्कीसवीं शताब्दी की देहरी पर दस्तक देते भारत के ग्रामीण समाज का आईना हैं । एक ओर आर्थिक प्रगति, दूसरी ओर शोषण का यह सनातन स्वरुप! चाहे 'अपना-अपना आकाश' की अम्मा हो, 'चिन्हार' की सरजू या 'आक्षेप' की रमिया, या 'भंवर' की विरमा-सबकी अपनी-अपनी व्यथाएँ हैं, अपनी-अपनी सीमाएँ ।
    इन्हीं सीमाओं से बँधी, इन मरणोन्मुखी मानव-प्रतिमाओं का स्पंदन सहज ही सर्वत्र अनुभव होता है--प्राय: हर कहानी में ।
    लेखिका ने अपने जिए हुए परिवेश को जिस सहजता से प्रस्तुत किया है, जिस स्वाभाविकता से, उससे अनेक रचनाएँ, मात्र रचनाएं न बनकर, अपने समय का, अपने समाज का एक दस्तावेज बन गई हैं।
  • Das Pranidhini Kahaniyan : Akhilesh
    Sushil Sidharth
    500 450

    Item Code: #KGP-9217

    Availability: In stock

    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है वे हैं-चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, शृंखला तथा अँधेरा । 
  • Anuvaad Vigyan : Siddhant Evam Pravidhi
    Bholanath Tiwari
    480 432

    Item Code: #KGP-539

    Availability: In stock

    अनुवाद विज्ञान : सिद्धांत एवं प्रविधि
    लंबे समय से अनुवाद पर एक ऐसी प्रामाणिक पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी जो सभी प्रकार के पाट्यक्रमों की ज़रूरत को तो पूरा करती ही हो, साथ ही शोधार्थियों, अनुवाद के शिक्षकों, प्राध्यापकों के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ अनुवाद कार्य से जुडे अनुवादकों तया अनुवाद व्यवसाय से जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए उपयोगी हो ।
    इस पुस्तक में अनुवाद विद्वान की समस्त प्रविधियों व सिद्धांतों का विवेचन-विशलेषण भी किया गया है तथा जुत्ताई, 2008 तक अनुवाद के क्षेत्र से हुए चिंतन एव शोधों को समाहित करते हुए इस अनुवाद पर अद्यतन एवं प्रामाणिक पुस्तक के रूप में तैयार किया गया है । इसलिए इसका पुराना नाम 'अनुवाद विज्ञान' न रखकर इसे अनुवाद विज्ञान : सिंद्धांत एवं प्रविधि' नाम दिया गया है, क्योंकि  यह पुस्तक नवीनतम उदभावनाओं व विचारों से युक्त है तथा  मेरे 30 वर्षों से भी अधिक के अनुवाद के अनुभवों को समेटे हुए है । मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफल होगी तथा विद्यार्थियों, प्राध्यापकों, अनुवादकों व अनुवाद के गंभीर अध्येताओं के लिए भी समान रूप से उपादेय सिद्ध होगी ।
  • Naya Vidhaan (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    120

    Item Code: #KGP-203

    Availability: In stock


  • Pride And Prejudice (Novel)
    Jane Austen
    495 446

    Item Code: #KGP-572

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • Chune Huye Nibandh
    Hazari Prasad Dwivedi
    195 176

    Item Code: #KGP-850

    Availability: In stock


  • Chaucer Ki Amar Kahaniyan
    Vishv Nath Gupta
    140 126

    Item Code: #KGP-322

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक ‘चैसर की अमर कहानियां’ ज्योफरी चैसर की विश्वप्रसिद्ध और कालजयी कृति ‘द कैंटरब्यूरी टेल्स’ का अनुवाद है। चैसर ने इस पुस्तक की रचना करीब 630 वर्ष पूर्व की थी।
    चैसर ने कहानियों के कुछ पात्र वास्तविक जीवन से भी लिए हैं। इसी तरह तीर्थयात्रियों में कुछ वास्तविक जीवन के लोगों से मेल खाते थे। लंदन की जो सराय तीर्थयात्रियों के रुकने की जगह बनी, एक वास्तविक सराय से प्रेरित थी।
    ‘द कैंटरब्यूरी टेल्स’ की सभी कहानियां रोचक और शिक्षाप्रद हैं। इन कहानियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कुछ संदेश भी मिलते हैं।
    -विश्वनाथ गुप्त
  • Rajani Din Nitya Chala Hi Kiya
    Hazari Prasad Dwivedi
    160 144

    Item Code: #KGP-1908

    Availability: In stock

    रजनी-दिन नित्य चला ही किया
    गुरुवर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक विधाओं में रचना की है। उनका कवि रूप अपेक्षाकृत अल्पज्ञात है ।  उनकी कविताओं में, उनके निबंधों की ही भाँति, सर्वत्र एक विनोद-भाव मिलता है। गंभीर चिंतन और व्यापक अध्ययन को सहज तौर पर हलके-फुलके ढंग से पाठक श्रोता पर बोझ डाले बिना प्रकट करना उनके व्यक्तित्व और लेखक की विशेषता और क्षमता है । द्विवेदी जी लोकवादी विशेषण को पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वे लौकवाद का संस्कृत में क्या अर्थ होता है, समझते थे । लेकिन वे महत्व सबसे अधिक लोक को देते थे । वे बोलियों, लोक-साहित्य, लोक-धुनों और जन-प्रचलित लोक-साहित्य रूपों पर अतीव गंभीरता से विचार करते थे । द्विवेदी जी ने संस्कृत और अपभ्रंश में भी कविता की है । उनकी काव्य-दृष्टि मनुष्य की उच्चता और नीचता दोनों को देखती है, इसीलिए उनकी कविताओं में संवेदना और समझ का संयोग है ।
  • Kushti
    Sudhir Sen
    25

    Item Code: #KGP-7182

    Availability: In stock


  • Anmol Vichaar (Paperback)
    Sudha Arora
    150

    Item Code: #KGP-7074

    Availability: In stock

    सुधा गौतम
    प्रस्तुत पुस्तक अनमोल विचार में सुश्री सुधा गौतम ने अनेक महापुरुषों और धार्मिक ग्रंथों से अनमोल विचार संकलित किए हैं । उदाहरण के लिए—
    जिसने अपनी इच्छाओं का दमन करके मन पर विजय और शांति पा ली है, वह राजा हो या रंक, उसे जगत् में सुख ही सुख है । —हितोपदेश 
    इच्छा से दु:ख आता  इच्छा से भय आता है । जो इच्छाओं से मुक्त है, वह न दु:ख जानता है, न भय । -महात्मा बुद्ध 
    यदि तुम सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने के आकाँक्षी हो तो सबसे नीचे से चढ़ना प्रारंभ करों । -साइरल
    अधूरा काम और अपराजित शत्रु—ये दोनों बिना बुझी आग की चिंगारियों की तरह हैं । वे मौका पाकर बैठ जाएँगे और उस लापरवाह आदमी को आ दबाएँगे । -चाणक्य
    कायर लोग अपनी मृत्यु के पहले भी कई बार मरते हैं, परंतु वीर पुरुष मृत्यु का एक बार ही अभिनंदन करते हैं। -शेक्सपियर
    जो मनुष्य अपनी निंदा सह लेता है, उसने मानो सारे जगत् पर विजय प्राप्त कर ली । -वेदव्यास 
    जो मनुष्य अपने क्रोध को अपने ही ऊपर झेल लेता है, वही दूसरों के क्रोध से बच सकता है । वही अपने जीवन को सुखी बना सकता है। -सुकरात 
    ज्यों-ज्यों मनुष्य बूढा होता जाता है, त्यों-त्यों जीवन से प्रेम और मृत्यु से भयभीत होता जाता है । -जवाहरलाल नेहरू 
    दयालु पुरुष धन्य हैं, क्योंकि वे ही भगवान की दया को प्राप्त कर सकेंगे । -ईसा मसीह
    परोपकार-रहित मनुष्य के जीवन को धिक्कार है, क्योंकि उससे तो पशु ही धन्य हैं, जिनका चमडा भी दूसरों के काम में आता है । -विनोबा भावे 
    किसी के गुणों की प्रशंसा करने में अपना समय मत खोओ, उसके गुणों को अपनाने का प्रयास करों । -कार्ल मार्क्स 
    जो मनुष्य निश्चित कार्यों को छोडकर अनिश्चित के पीछे दौड़ता है, उसके निश्चित कार्य भी नष्ट हो जाते है, अनिश्चित तो नष्ट ही हुआ रहता है । -चाणक्य 
    मनुष्य को अपने कमाए हुए धन से तब तक कोई तृप्ति नहीं होनी चाहिए, जब तक उनमें से कोई नेक काम करना न शुरु कर दे । -भगवन महावीर 
    वे राजा धन्य हैं जो पुत्रों के समान पुरवासियों को अपने सामने पूर्ण सुखी देखकर रात को चैन से सोते है । -राजतरंगिणी 
    कुटिल मत बनो, किसी भी व्यक्ति के साथ कुटिलता, धोखेबाजी और मक्कारी का व्यवहार मत करो । सभी के साथ सभ्यता, नम्रता, भद्रता और श्रेष्ठता का व्यवहार करो । -यजुर्वेद 
    माता के आँचल और घर के कोने से बड़ा ही अंतर होता है—एक तो शीतल जल का सागर होता है, दूसरा मरुभूमि । -प्रेमचंद 
    यह मानना कि हम कुछ नहीं कर सकते, सबसे बडी कायरता है । इसे त्यागो और पुरुषार्थ को जागृत करों । फिर देखोगे कि तुम्हारी उन्नति तुम्हारे हाथ में है । -मुनि गणेशवर्णी 
  • Rang Aakash Mein Shabd
    Narendra Mohan
    1500 1350

    Item Code: #KGP-674

    Availability: In stock

    रंग आकाश में शब्द नरेन्द्र मोहन और शामा की एक ऐसी अपूर्व संस्कृति है जिसमें रंग और शब्द, चित्र और कविता परस्पर जुडे होते हुए भी अपना एक मौलिक उत्कर्ष रचते है । यहीं एक साथ कई सौंदर्य-छवियां, रंग-रेखाएँ और शब्द प्रकाशमान हैं। हिंदी में, भारतीय कविता में इसे अपनी तरह का पहला और अनूठा प्रयोग माना जा सकता है ।
    कविता और चित्र यहाँ विंब-प्रतिबिंब रूप ने आमने-सामने नहीं हैं, साथ-साथ हैं । उनमें अनुपात बैठाना या अर्थों-आशयों की समांतरता दूँढ़ना दोनों कलाओं को कमतर आँकना होगा, हालाँकि दोनों ने छिपे रचना-सूत्रों की खोज की जा सकती है । दरअसल, कविता और कला संबंधी यह एक बिलकूल नई तरह का अंतरावलंबन है । चित्रों  के रंग-संकेत, छवियां और छायाएँ यहाँ कविता के अंतरंग का हिस्सा बनी हैं।
    चित्र के संवेदन धरातलों और सौंदर्य-रूपों को, अमूर्तन में लिपटी हुई रंग-रेखाओं के शिल्प को अपनी संवेदना में ढाल कवि ने यहाँ अपनी कल्पना शक्ति से कविता के शब्द में रचा है। चित्रों की रंग-गतियों में प्राकृतिक बिंबो और दृश्यावलियों में झाँकने की चित्रकार की ललक को, रंगों की कंपकंपाहट और थरथराहट को, दौड़ते भागते रंगों में लिपटी उदासी, पीड़ा, खामोशी और खोए हुए वजूद को कवि ने कविता की लय, बिंब-विधान और संरचना का हिस्सा बना दिया है । चित्रों के रंग कवि को अँधेरे ने लपटों की तरह उठते दिखे हैं । ऐसा भी लगा जैसे अँधेरे का एक उफनता समुद्र हो जिसकी उत्ताल तरंगें आग से दीप्त हों। ऐसे ही किसी क्षण में उसे महसूस हुआ :
    रंगों के पीछे आग है
    और रेखाएँ चुप नहीं है


  • Ek Rang Hota Hai Neela
    Meera Sikri
    180 162

    Item Code: #KGP-496

    Availability: In stock

    यात्राएं मनुष्यता का विस्तार करती है। सभ्यता और संस्कृति के जाने कितने सूत्र यात्राओं से जुड़े है। अनुभव, बोध और वैविध्य का सहज समावेश जीवन को प्रशस्त बनाता है; यात्राएं यह अवसर भी देती हैं। 'एक रग होता है नीला' मीरा सीकरी का यात्रा संस्मरण है।
    मीरा सीकरी एक संवेदनशील रचनाकार के रूप में जानी जाती है। स्वाभाविक है कि जब एक रचनात्मक व्यक्ति यात्रा करता है तो केवल भूगोल में प्रवेश या पदार्पण नहीं करता। वह जीवन के न जाने कितने व्यक्त अकथनीय आयामों में यात्रा कर आता है। इस यात्रा संस्मरण में केन्या, अमेरिका, मलेशिया, मॉरीशास के साथ पोर्ट ब्लेयर, लेह-लद्दाख, केरल, अमरकंटक, पांडिचेरी, बनारस आदि से जुड़ी बातें हैं। इन देशी-विदेशी स्थलों पर घूमते हुए वहीं के तमाम प्रसिद्ध प्राकृतिक वैभव का साक्षात्कार करते हुए और समय के कई सिरों को एक जगह मिलते देखते हुए लेखिका एक अनिर्वचनीय आनंद में खो जाती है। लेखिका का विचारशील मन जाने कहां-कहां घुम आता है। वह आलोचनात्मक मन भी है और सौंदर्य-प्रेमी भी। एक जगह मीरा सीकरी लिखती है, 'पोर्ट ब्लेयर की भूमि अपने जख्मों को लाख छिपाने की कोशिश करे, वे छिप नहीं पाते। यद्यपि वे जख्म सूख गए हैं, पर उनके दाग यह बता रहे हैं कि यहां को सांस तो सामान्य हो चुकी है, पर उसके साथ निकलती टीस की ध्वनि को सुने बिना आप रह नहीं सकते।' ये ध्वनियां  वही व्यक्ति सुन सकता है जिसके भीतर इतिहासबोध हो। कहना जरूरी है कि मीरा सीकरी ने देश और काल का तार्किक साक्षात्कार किया है।
    यह पुस्तक उस तरह की डायरी नहीं जिसमें अव्यर्थ और व्यर्थ सब टंका रहता है। इसमें वे अंश है जो भावनात्मक तीव्रता के कारणा स्मृति का हिस्सा बन गए हैँ।
  • Bazmey Ghazal
    Om Prakash Sharma
    200 180

    Item Code: #KGP-165

    Availability: In stock

    बज्मे-ग़ज़ल
    उर्दू अदब में ग़ज़ल का क्षेत्र जितना व्यापक है, उतनी ही बडी तादाद उन शाइरों की भी  जिन्होंने ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाया ।
    गजल शब्द के अर्थ से आज लगभग सभी परिचित है, लेकिन आज के परिवेश में ग़ज़ल की परिभाषा बदली हुई दिखाई दे रही है । इस संकलन को तैयार करते हुए यह प्रयास रहा है कि ग़ज़ल के शाब्दिक अर्थ के अतिरिक्त, इसके बदले हुए रूप को भी पाठकों के सन्मुख रखा जाये। इसीलिए 'बज्मे-गजल' में संगृहीत ग़ज़लें कभी परम्पराओं में बंधी नज़र आयेंगी, तो कभी इनका रूप आज़ के ज़माने को छूता हुआ दिखाई देगा ।
    उर्दू गजल आज जिस बुलन्दी पर पहुंच चुकी है, साहित्य की किसी दूसरी विधा का यहा तक पहुंच पाना शायद सम्भव नहीं; क्योंकि  गजल कहीं नहीँ जाती, बल्कि खुद-ब-खुद हो जाती है । ग़ज़ल सिर्फ इल्तिजा ही नहीं करती, ऐलान भी करती है, समझोता करना ही नहीं सिखाती, अधिकार प्राप्त करने के लिए लड़ना भी सिखाती है तथा सिर्फ फूल ही नहीं, अंगारे बरसाने का हौंसला भी देती है ।
    इस संकलन से जहां अनेक पुराने शाइरों की गज़लें दी जा रही हैं, वहीं कुछ नये शाइरों की ग़ज़लें भी मौजूद हैं, जो आज लोगों के दिलों में घर कर रहे हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mamta Kaliya (Paperback)
    Mamta Kalia
    80

    Item Code: #KGP-7002

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : ममता कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ममता कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आपकी छोटी लड़की', 'वसंत-सिर्फ एक तारीख', 'लड़के', 'दल्ली', 'लैला-मजनू', 'जितना तुम्हारा हूँ', 'सुलेमान', 'छुटकारा', 'पीठ' तथा 'बोहनी' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ममता कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।