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  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar
    Ramdhari Singh Diwakar
    250 225

    Item Code: #KGP-8006

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    रामधारी सिंह दिवाकर

    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिछड़ेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न होता है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भी दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।

    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।

    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार', 'खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानी', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पुल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।

    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal (Paperback)
    Bhagwan Das Morwal
    150

    Item Code: #KGP-476

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भगवानदास मोरवाल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jeevanopayogi Jari-Bootiyan (Paperback)
    Dr. Rajiv Sharma
    180

    Item Code: #KGP-7069

    Availability: In stock

    जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियाँ 
    जड़ी-बूटियाँ शब्द सुनते ही हमें लगना है कि सुदूर जंगल में पहुँचकर कुछ पेड़-पौधों की खोज करनी पडेगी, जबकि हमारे आसपास दैनिक उपयोग की इतनी वनस्पतियां  मौजूद है कि उनके द्वारा सामान्य रोगों का उपनार हम स्वयं घर पर ही आसानी से कर सकते है ।
    तुलसी, लहसुन, अश्वगंधा, अशोक, अर्जुन. हींग, बिल्व (बेल), कनेर, मुलहठी, त्रिफला, सौंठ, कुकरौंदा, शिलाजीत, आँवला नीम, महुआ, हुरहुर, अरण्ड, सर्पगंधा, अमलतास आदि सैकडों जड़ी-बूटियाँ हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी हैं और आसानी ये उपलब्ध भी ।
    प्रस्तुत पुस्तक में प्रख्यात चिकित्साविज्ञ ने लगभग ढाई सौ उपयोगी जड़ी-बूटियों के गुणों, उपयोग तथा उनकी प्रकृति आदि के बारे में विस्तार से बताया है । पुस्तक को संपूर्ण सूचनाप्रद बनाते हुए सैकड़ों जड़ी-बूटियाँ के चित्र भी पुस्तक में ममाहित किए गए है ।
    निस्संदेह, यह पुस्तक आम पाठक के लिए तो स्वास्थ्य-रक्षा व घरेलू नुस्खों को जानने की दृष्टि से उपयोगी है ही, जिज्ञासु पाठकों की ज्ञान-पिपासा को संतुष्ट करने में भी सक्षम है, क्योंकि इसमें ज़डी-बूटियों के बारे में अत्यंत  सरल भाषा में विस्तृत जानकारी दी गई है । कहना न होगा कि निजी एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए तो यह अनिवार्य ग्रंथ है ।
  • Kambakht Nindar
    Narendra Mohan
    350 315

    Item Code: #KGP-793

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sanjeev
    Sanjeev
    200 180

    Item Code: #KGP-665

    Availability: In stock

    कहानियों सें विषयों के व्यापक शोध, अनुभव के संदर्भ, समसामयिक प्रसंग और प्रश्न तथा पठनीय वृत्तांतों का संयुक्त एव सार्वजनिक संसार ही संजीव की कहानियाँ चुनता-बुनता है। इन कथाओं की सविस्तार प्रस्तुति से अभिव्यक्त समाहार का अवदान इस कथाकार को उल्लेख्य बनाता है। घटनाओं की क्रीड़ास्थली बनाकर कहानी को पठनीय बनाने में इस कहानीकार की विशेष रुचि नहीं होती बल्कि यह ऐसे सारपूर्ण कथानक की सुसज्जा में पाठक को ले जाता है, जहाँ समकालीन जीवन का जटिल और क्रूर यथार्थ है तथा पारंपरिक कथाभूमि की निरूपणता और अतिक्रमणता भी । यथार्थ के अमंगल ग्रह को, पढ़वा लेने की साहिबी इस कथाकार को सहज ही प्राप्त है, जिसे इस संग्रह की कहानियों में साक्षात् अनुभव किया जा सकता है ।
    प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।
    संजीव द्वारा स्वयं चुनी गई ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं- 'अपराध', 'टीस', 'प्रेत-मुक्ति' 'पुन्नी माटी', 'ऑपरेशन जोनाकी', 'प्रेरणास्रोत', 'सागर सीमांत', 'आरोहण', 'नस्ल' तथा 'मानपत्र' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रहीं 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कया-संग्रह को दसवें 'आर्य स्मृति साहित्य सम्मान' (16 दिसंबर, 2003) के अवसर पर विशेष सम्मान के साथ प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन से कभी भी तलाशा जा सकेगा।
  • Nau Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    120 108

    Item Code: #KGP-2088

    Availability: In stock

    नौ लघु नाटक
    हिंदी में नाट्य-लेखन संस्कृत नाटय-परंपरा और लोक-नाट्य के विविध रूपों से जुड़कर विकसित हुआ हैं । बाद में उस पर ग्रीक त्रासदी, पारसी शैली  और पश्चिमी रंग-शैलियों का असर भी दिखाई देता है ।  मंचीय नाटक बनाम पाठ्य नाटक की बहस भी हिंदी  में होती रही है । इधर हिंदी नाटय-लेखक और हिंदी  रंगमंच अपनी-अपनी दर्पमंडित घोषणाओं के वावजूद एक-दूसरे के पास ही आया है। एकांकी नाटकों-लेखन के विकास के पाशर्व में जहाँ रेडियो की  भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है, वहीं स्कूलों एवं कॉलेजों की नाट्य-संस्थाओं द्वारा महसूस की जाने वाली एकांकी नाटकों की ज़रूरत भी एक कारण रही है ।
    अजब बात है कि इधर एकांकी-लेखन कम हुआ है, पर उसकी जगह लघु नाटक एव नुक्कड़ नाटक ने ली है ।
    प्रताप सहगल रंगमंच से जुड़े हुए नाटककार के रूप में विख्यात हैं । उनके नाटक 'रंग बसंती', 'मौत को रात भर नहीं जाती' तथा 'अँधेरे में' आदि के मंचन बार-बार हुए हैं। अपने पिछले नाटक 'अन्वेषक' से उन्हें विशेष ख्याति मिली है ।
    'नौ लघु नाटक' में समय-समय पर लिखे गए नौ लघु नाटक संग्रह के रूप में आ रहे हैं । प्रताप सहगल का नाट्य-लेखन परंपरा एवं प्रयोगशीलता के संतुलन बिंदु पर खडा नजर आता है । अपनी इसी छवि के अनुरूप उनके इन लघु नाटकों में भी कहीं परंपरा की गंध मिलेगी तो कहीं प्रयोगशीलता की ललक । कहीं मूल्यों का भंजक रूप मिलेगा तो कहीं चरित्रों कै भीतर सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पेठ। इनमें से अनेक नाटक कई-कई बार मंचित हुए हैं और कई एक प्रकाशित होकर अपना पाठक वर्ग बना चुके हैं ।
    छोटे-छोटे शहरों, कस्बों तथा कॉलेजों एवं स्कूलों की नाट्य-मंडलियों को अच्छे लघु नाटकों की प्राय: तलाश रहती है। इस दृष्टि से भी यह संकलन महत्त्वपूर्ण है और लघु नाटकों के विकास की दृष्टि से भी ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sanjiv (Paperback)
    Sanjeev
    80

    Item Code: #KGP-1271

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : संजीव
    कहानियों सें विषयों के व्यापक शोध, अनुभव के संदर्भ, समसामयिक प्रसंग और प्रश्न तथा पठनीय वृत्तांतों का संयुक्त एव सार्वजनिक संसार ही संजीव की कहानियाँ चुनता-बुनता है। इन कथाओं की सविस्तार प्रस्तुति से अभिव्यक्त समाहार का अवदान इस कथाकार को उल्लेख्य बनाता है। घटनाओं की क्रीड़ास्थली बनाकर कहानी को पठनीय बनाने में इस कहानीकार की विशेष रुचि नहीं होती बल्कि यह ऐसे सारपूर्ण कथानक की सुसज्जा में पाठक को ले जाता है, जहाँ समकालीन जीवन का जटिल और क्रूर यथार्थ है तथा पारंपरिक कथाभूमि की निरूपणता और अतिक्रमणता भी । यथार्थ के अमंगल ग्रह को, पढ़वा लेने की साहिबी इस कथाकार को सहज ही प्राप्त है, जिसे इस संग्रह की कहानियों में साक्षात् अनुभव किया जा सकता है ।
    प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।
    सजीव द्वारा स्वयं चुनी गई ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं- 'अपराध', 'टीस', 'प्रेत-मुक्ति' 'पुन्नी माटी', 'ऑपरेशन जोनाकी', 'प्रेरणास्रोत', 'सागर सीमांत', 'आरोहण', 'नस्ल' तथा 'मानपत्र' ।
  • Parvatiye Lokkathayen
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1935

    Availability: In stock


  • Bhaasaa Vigyan Pravesh Evam Hindi Bhaasaa
    Bholanath Tiwari
    230 207

    Item Code: #KGP-274

    Availability: In stock


  • Prem Anant
    Bholanath Tiwari
    450 405

    Item Code: #KGP-1962

    Availability: In stock

    प्रेम अनंत
    ०  लेखक-पात्र-पाठक को समक्ष रखकर एक त्रिभंगिमा बननी है इस तिहरे उपन्यास में।
    ०  एक नायक के जीवन में तीन नायिकाएँ विभिन्न नाम-काम-धाम-रूपों में देखी-पहचानी जाएं, किंतु वस्तु-केंद्र  में ये एक ही देह के तीन मन हो जाते हैं और एक ही मन की तीन देहें भी । प्रेम इन तीनों के प्रति अनंत पुरुष में प्राणतत्त्व-सा व्याप्त है ।
    ०  'सिन्धु' सागर की तरह उन्मुक्त और लावण्यमय है तो 'रीति' भीतर से रीती-रीती महसूस करती है, जबकि 'रुचि' ? वह पसंद से जुडी है तो बेरुखी से भी। इन तीन तरह के स्त्री-पात्रों का निमित्त बना हुआ 'अनंत' कथा-लेखक है, जो अपने तौर पर द्विधाभाव में रहना-जीना चाहता है, किंतु उसे मात्र लेखक के खोल से विद्यमान अपनी कमजोरियों के साथ जुड़े मनुष्य के तौर से अनपेक्षित मान लिया जाता है ।
    ०  लेखक को स्रष्टा-सा अकेला क्यों मान लिया जाता है ?
    ० यदि हर स्त्री-पात्र पुरुष-लेखक से अथवा इससे उलट पुरुष-पात्र स्त्री-लेखिका से अपेक्षा रखे कि वह स्रष्टा होने तक सीमित रहे, अपनी ऐन्द्रिय इच्छाओं को न परोसे, पात्रों की निजी जिंदगी में न प्रवेश करे, खुद को न प्रस्तावित करे, तो रचना प्रेमिल और प्रभावी कैसे हो पाएगी ?
    ० लेखक में ही तो आकांक्षाएँ-अपेक्षाएँ या सपने लिए हुए अनर्गल पात्र प्रादुर्भुत होते है, प्रतिरूपित होते हैं, खलबली करते है । एक तरह से स्रष्टा लेखक के भीतर अनंन पात्रों के जीवाणु सक्रिय होते रहते हैं ।
    ० 'ऐकोहम बहु स्याम'---ऐसे नहीं चाहा होगा आदि अकेले स्रष्टा ने । स्रष्टा -रचयिता-लेखक-कलाकार-रंगकर्मी जैसी सभी विभूतियाँ एक ही रूप के सहस्त्र नाम है ।
    ०  ढाई आखर प्रेम के पढ़ै सौ पंडित होय !' यहाँ नायक अनंत कितने पांडित्य में है यह जाँच इस उपन्यास को पढ़कर सामने आएगी-फलित होगी ।

  • Chhuttiyan
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-2095

    Availability: In stock

    छुट्टियाँ
    पूरी मनाली एक अनपढी पुस्तक की भांति सामने खुली थी । इसे कितनी ही बार पढ़ो, हर बार यह बिलकुल ताजी, अनछुई-सी जान पड़ेगी, विद्रोही जी ने सोचा । फिर मीरा को इशारे से बताया, “वह देख रही हो—नीचे, सामने, उधर दूर पर, वो पतली-सी सड़क । हाँ, हाँ, वही, जिस पर अभी एक मोटर आती दिखाई दी थी । वह कुल्लू-मनाली सड़क है । उसी से होकर कल शाम हम यहीं पहुँचे थे... " 
    सफ़रनामे, कहानी, कविता, फंतासी, रपट और व्यंग्य आदि विधाओं को अपने  में घुलाती-मिलाती अजितकुमार की यह प्रथम औपन्यासिक रचना 'छुट्टियाँ' उसी अर्थ में एक उपन्यास है, जिसमें अजितकुमार के लिए 'कविता के रूप में प्रस्तुत प्रत्येक रचना कविता है और वह भी कविता है जो भले ही उस रूप में न प्रस्तुत की गई हो पर किसी को कविता प्रतीत हो ।'
    साहित्यिक विधाओं की परस्पर घुसपैठ के इस युग में, जब उपन्यास की अलग पहचान गुम हो चली हो और वह ऐतिहासिक, सामाजिक, जासूसी, फुटपाथी आदि शिकंजों में फाँस दिया गया हो. 'छुट्टियां' प्रमुखत: कुतूहल पर आधारित है, बावजूद इस भय के कि हिंदी के अतिवृद्ध और अकालवृद्ध परिवेश में, उसे बालोपयोगी या किशोरोपयोगी समझ लिया जाएगा ।
  • Kachche Resham Si Larki
    Amrita Pritam
    250 225

    Item Code: #KGP-9079

    Availability: In stock


  • Vishwa Ke Mahaan Shikshavid
    M.A. Sameer
    395 356

    Item Code: #KGP-9330

    Availability: In stock

    जीवन में सफलता व अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था और अपेक्षा–इन तीन शक्तियों को भलीभांति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित कर लेना चाहिए।
    यह विचार एक ऐसे शिक्षक का है, जिसके एक शिष्य ने इन विचारों को न केवल आयुध बनाकर अपने जीवनयुद्ध में प्रयोग किया, अपितु इनसे जीवनयुद्ध का विजेता बनकर संसार के सर्वश्रेष्ठ आयुध्-निर्माताओं में से एक बना। जी हां, यह विचार है इयादुराई सोलोमन नाम के दक्षिण भारतीय शिक्षक और उनका यह शिष्य भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का, जिन्होंने वैज्ञानिकी में स्वयं को समर्पित करके ‘मिसाइलमैन’ की उपाधि प्राप्त की।
    पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद डाॅ. अब्दुल कलाम भारत के ऐसे पहले राजनेता थे, जिन्हें बच्चों का स्नेह प्राप्त था और ‘काका कलाम’ कहकर संबोधित किया जाता था। बच्चों को देश का भविष्य मानने वाले डाॅ. अब्दुल कलाम अकसर समय निकालकर छात्रों के बीच जाते और बच्चों के प्रश्नों के उत्तर बड़ी सहजता से देते और उन्हें भविष्य में कुछ करने के लिए प्रेरित करते। जीवन के मूल्य, आदर्श और सफलता के मंत्र बड़ी रोचक वाणी में बताते। उनके द्वारा लिखित आत्मकथा ‘विंग्स आॅफ फायर’ में उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने विचारों और दृष्टिकोण से मार्ग दिखाया है। उनकी एक-एक बात प्रेरणादायी है। उनका समूचा जीवन ही प्रेरणादायी है।
    आज तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं की बढ़ती संख्या का कारण डाॅ. अब्दुल कलाम की वह प्रेरणा ही है, जिसने देश को आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में सक्षम किया है। डाॅ. कलाम भारतीय तकनीकी विकास को विज्ञान के हर क्षेत्र में लाने का समर्थन करते थे। उनका कहना था कि साॅफ्टवेयर का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए, जिससे अधिक संख्या में लोग इसकी उपयोगिता का लाभ उठा सकें। इसी से सूचना तकनीक का विकास तीव्र गति से हो सकेगा। डाॅ. कलाम का राष्ट्रपति काल भारत के स्वर्णिम काल में से एक है। बिना किसी राजनीतिक विवाद के उन्होंने यूरोपीय देशों और पड़ोसी देशों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे और देश की विकास गति को थमने नहीं दिया। 25 जुलाई, 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ और वे फिर से वैज्ञानिकी एवं तकनीक के क्षेत्र में आ गए।
    ऐसा कहा जाता है कि जब डाॅ. कलाम राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के रूप में प्रवेश कर रहे थे तो उनके एक हाथ में एक थैला था, जो पांच वर्ष बाद जब वे वहां से कार्यमुक्त हुए तो उनके साथ ही था। वे शाकाहारी थे और अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे। समय का उनकी दृष्टि में बड़ा महत्त्व था और इसके सदुपयोग के लिए वे व्यवस्थित चर्या का पालन करते थे।
    –इसी पुस्तक से
  • Hindi Ghazal, Yaani…
    Dixit Dankauri
    190 171

    Item Code: #KGP-9086

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti (Paperback)
    Hemant Kukreti
    140

    Item Code: #KGP-7019

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Anuvaad Vigyan
    Bholanath Tiwari
    250 225

    Item Code: #KGP-735

    Availability: In stock

    अनुवादविज्ञान
    अनुवाद को उसके पूरे परिप्रेक्ष्य में लें तो वह मूलतः अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है। साथ ही अनुवाद करने में व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से भी हमें बड़ी सहायता मिलती है। इस तरह अनुवाद भाषाविज्ञान से बहुत अधिक संबद्ध है।...
    जहाँ तक अनुवाद का प्रश्न है, विद्यार्थी-जीवन में पाठ्यक्रमीय अनुवाद की बात छोड़ दें तो सबसे पहले अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘नेहरू अभिनंदन ग्रंथ’ में मुझे अनुवाद करने का अवसर मिला। उसी समय कुछ भाषा-संबंधी लेखों के मैंने अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किए। ‘गुलनार और नज़ल’ नाम से एक अंग्रेज़ी पुस्तक का संक्षिप्तानुवाद 1952 में पुस्तकाकार भी छपा था। 1962-64 में रूस में अपने प्रवास-काल में कुछ उज़्बेक, रूसी तथा इस्तोनियन कविताओं का भी मैंने हिंदी-अनुवाद किया था। ताशकंद रेडियो में 1962 में मेरे सहयोग से हिंदी विभाग खुला था। वहाँ प्रतिदिन आध घंटे के कार्यक्रम के लिए रूसी, उज़्बेक, अंग्रेज़ी आदि से हिंदी में अनुवाद किया जाता था, जिसका पुनरीक्षण मुझे करना पड़ता था। 1968 में भारतीय अनुवाद परिषद् ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका ‘अनुवाद’ के संपादन का भार मुझे सौंपा और समयाभाव के कारण, न चाहते हुए भी, कई मित्रों के आग्रह से मुझे यह दायित्व लेना पड़ा।
    प्रस्तुत पुस्तक की सामग्री के लेखन का प्रारंभ मूलतः ‘अनुवाद’ पत्रिका का सिद्धांत विशेषांक निकालने के लिए कुछ लेखों के रूप में हुआ था। विशेषांक के लिए कहीं और से अपेक्षित सामग्री न मिलने पर धीरे-धीरे मुझे अपनी सामग्री बढ़ानी पड़ी, किंतु अंत में सामग्री इतनी हो गई कि विशेषांक में पूरी न जा सकी। वह पूरी सामग्री कुछ अतिरिक्त लेखों के साथ प्रस्तुत पुस्तक के रूप में प्रकाशित की जा रही है।  -भोलानाथ तिवारी
  • Head Office Ke Girgit
    Arvind Tiwari
    300 255

    Item Code: #KGP-463

    Availability: In stock


  • Comprehensive English-Hindi Dictionary_495
    Bholanath Tiwari
    495 446

    Item Code: #KGP-32

    Availability: In stock

    COMPREHENSIVE ENGLISH-HINDI DICTIONARY

     The present comprehensive English-Hindi Dictionary stands as the crowning work of the four decade long effort of the well known Hindi linguist-cuin-lexicographer Dr. Bhola Nath Tiwari and Dr. Amar Nath Kapoor, a distinguished scholar of English language studies.

     The main merit of the present dictionary is its practical and explanatory character. The editors have illustrated the proper and contextual usage of each and every word, phrase, idiom and expression through sentences and this goes to make the lexicon a work of tremendous relevance for the entire gamut of bilingual activity being undertaken in the country at almost all levels of our social system, educational institutions and government departments.

     Basically meant for the average Indian reader who goes to a dictionary to find correct spelling, correct usage and the most common present meaning of all the live words of English usage, the chief function of die present dictionary is to present not only comprehensiveness, accuracy and simplicity but also to record usage as pan of a perfect language.

     Simple form and the most pragmatic approach as far as the spelling and pronunciation of words is concerned has been adopted wit‘: 2 view to make the average educated Indian use English—both written and spoken word—in such a way that the listener or the reader is able to under- stand and appreciate what is being said in its correct parlance.

  • Hindu Sanskars (Paperback)
    M.L. Ahuja
    125

    Item Code: #KGP-357

    Availability: In stock

    The SANSKARAS are rites of passage finding varied acceptance among religious adherents of Hinduism, Jainism and some schools of thought in Buddhism. Hinduism prescribes norms to groom youngsters with values. The values as reflected in sanskaras facilitate the process of adaptation of the behaviour patterns of our children and the process of their socialization. These sanskaras should inculcate in our children the norms to purify, refine and adorn their inner conscience.
    The book, Hindu Sanskaras Sacraments and Rituals in Life’s Journey, is an exposition of the principles enunciated in the Hindu scriptures. This profusely illustrated book provides guidelines for young boys and girls on the threshold of conjugal life. It provides them lucid explanation of sanskaras and human life, Hindu beliefs and rituals, essence of Hindusanskaras, the Vedic and astrological concepts of garbadharan or conception of a child, naming of the baby, baby's first tonsure, importance of sacred thread ceremony, the process of conducting puja or veneration, the significance of idol worship, The underlying purpose of using bindi or tilak, the ritual of observing Karva Chaauth by married women  to pray for the longevity of their husbands, funeral rites and the system of ancestral worship yet form an essential ingredient of the book. The book also provides explanation of rituals like parikarma, ringing of bell, hovering of hands on lighted lamp after concluding prayer, the importance of 108 and breaking of coconut. 
    It is a useful book for all those wishing to know Indian culture, traditions and mythology. It needs to be read by parents for inculcating values among their children, and young boys and girls to carve an ideal approach in life. 
  • 101 Amar Kathayen
    Prem Kishore Patakha
    200 180

    Item Code: #KGP-278

    Availability: In stock

    हाँ, शब्द भी महकते हैं और महकते शब्दों की आयु भी अनंत काल तक रहती है । शब्द और फूलों में बस एक ही अंतर नज़र आता है — शब्द महकते हैं तो महकते रहते हैं और फूल कुछ समय के बाद कुम्हला जाते हैं और अपनी महक खो देते हैं । 
    कुछ ऐसे ही महापुरुषों, संतों के विचार-संस्मरण महकती फुलवारी के समान यहाँ संजोकर आपके लिए लाये हैं । शायद किसी शब्द की महक आपका जीवन महका दे । सुगंध बनकर आपके मन और प्राण की वंशी के स्वर फूट पड़ें । 

  • Dainik Jeevan Mein Ayurveda
    Vinod Verma
    500 450

    Item Code: #KGP-9149

    Availability: In stock

    दुर्भाग्य की बात है कि आयुर्वेद का असीमित ज्ञान इस देश की संचालन-व्यवस्था में समुचित प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आयुर्वेद के विकास तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। हमारी शासन-व्यवस्था भी इस ओर उदासीन रही। आयुर्वेद को ‘देशी’ कहकर उपेक्षित कर दिया गया। किंतु आज जिस नए युग का प्रारंभ हो रहा है उसमें हमारा पुनर्जागरण सुनिचित है जिसमें हमें आभास होगा कि जिसे हमारे देशवासियों ने ‘देशी’ कहकर त्याग दिया था उसी को विदेशी लोग अच्छे आवरण में डालकर हमें बेच रहे हैं। ‘दादी मां’ की परंपरा अर्थात् आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान, जो हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है, उसे हमारी शिक्षा-प्रणाली में सम्मिलित किया जाय। इस दृष्टि से स्कूलों तथा मेडिकल काॅलेजों के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के कुछ महत्वपूर्ण अंश पढ़ाए तथा सिखाए जाने चाहिए। आयुर्वेद के जिज्ञासुओं और अनुसंधित्सुओं के लिए उपयोगी जानकारी देने और तत्संबंधी अज्ञान को दूर करने में सहायक प्रस्तुत ग्रंथ इस विषय की विदुषी सुश्री विनोद वर्मा की अनूठी कृति है।
  • Mere Saakshaatkaar : Mannu Bhandari
    Mannu Bhandari
    350 315

    Item Code: #KGP-678

    Availability: In stock


  • Tiger Tantra (Novel)
    Ganga Prasad Vimal
    425 383

    Item Code: #KGP-872

    Availability: In stock

    A first ever Novel on an Untouched Subject
    The Tantra, its cults and practices have always attracted attention worldwide due to its strange disciplines and various hidden secrets. Chiefly because of its use of esoteric practices— in acquiring siddhis (supernatural powers), spiritual perfection and other material gains—Tantra came to be regarded as anti-social and unethical, forcing it to go underground.
    The present novel explores an unusual aspect of the tantric discipline, which makes it quite interesting. The author has taken up a subject inherent to the sub-culture of the Himalayan regions to which he belongs, and tried to weave it into a quite probable story, realistic as well as readable.
    ‘Tiger Tantra’ or the Tantra which changes the practitioner into a tiger or Bokshu and makes him immortal, lies buried under the ruins of a temple in the village of Jaled, the centre of an isolated Tantric Peeth in the Himalayan region.
    A scholar in search of the Tiger Tantra visits the village, to uncover the secret and to find the hidden mantra, finds a swami engaged in some strange practices . . . and the story unfolds in its fantastic dimensions . . . till the virgin offers herself to the scholar to corrupt the swami’s sadhana.
  • Prachin Unani Kahaniyan
    Rangey Raghav
    340 306

    Item Code: #KGP-06

    Availability: In stock

    प्राचीन यूनानी कहानियाँ
    यूनानी संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाली ऐसी कहानियों का संग्रह, जो वहाँ के अतीत जीवन की अत्यंत रोचक झाँकी प्रस्तुत करती हैं ।
  • Do Naatak (Paperback)
    Jaivardhan
    100

    Item Code: #KGP-1323

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 
  • Meethi Neem
    Jaivardhan
    550 495

    Item Code: #KGP-720

    Availability: In stock


  • Naani Amma Maan Jao
    Krishna Agnihotri
    495 446

    Item Code: #KGP-2053

    Availability: In stock

    नानी अम्मा मान जाओ
    इस उपन्यास  में चार पीढ़ियों को कहानी के माध्यम से बाल विवाह से लेकर आधुनिक दौर को स्थितियों का चित्रण है।  चूँकि उपन्यास का कालखंद बहुत बढा है, इसलिए बहुत सारी समम्याएँ टुकड़ों-टुकडों में देखने को मिलती हैं । इसमें पारिवारिक बिखराव, राजनितिक भ्रष्टाचार, सेक्स के प्रति खुलापन, विकृत सेक्स, अति आधुनिकता,  नई पीढ़ी के द्वंद्वआदि का  चित्रण है । 
    अगली पीढ़ी तथा पिछली पीढ़ी के टकराव के साथ कहानी आगे बढ़नी है । कहानी बातचीत की शैली में कही गई है तथा कहानी में सिनेमाई दृष्टिकोण लक्षित होती है । 
     इसमें बताया गया है कि एक पीढ़ी का सेक्स के प्रति खुला रवैया है तो एक पीढी सेक्स के प्रति शुचिता की बात करती हैं लेकिन भीतर ही भीतर वह घुटती है । बाद में उसे अपना यह रवैया बदलना पड़ता है । यह रवैया नानी अम्मा बदलती है।
  • Vansh Vriksha
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-103

    Availability: In stock


  • Khabar
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    1150 1035

    Item Code: #KGP-584

    Availability: In stock


  • The Hanuman Factor (Self-Help)
    Anand Krishna
    345 311

    Item Code: #KGP-593

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
  • Khabrein Aur Anya Kavitayen
    Ganga Prasad Vimal
    175 158

    Item Code: #KGP-546

    Availability: In stock

    "खबरें और अन्य कविताएँ' एक ऐसे प्रयोगधर्मी कवि का नया प्रधान है, जो हमारे सामने पाँच दृष्टियों से एक विषय को विस्तार देकर जनोन्मुखी विषादों की गहरी सच्चाइयों से परिचय कराता है । पाँच दृष्टियाँ ही क्यों? एक सहज सवाल उभरता है । हमारे पंचेंद्रिय ज्ञान की परिसीमाओं में उनका अलग-अलग रूप क्या हो--इसे जानना भी रोचक हो सकता है, परंतु इसका परिदर्शन हम कविताओं के स्वायत्तम संसार में जाकर ही कर पाएंगे । यह बोध का परिदर्शन है, परंतु आज के समय में पाँच के कई अर्थ हैं--हम किस-किस सोपान से क्या-क्या या सकते हैं यह बहुत हम पर निर्भर करता है और यहीं से बहस शुरू हो जाती है कि कवि के पास से कविता या सृजेता के पास से सृजन उसी क्षण दूसरों की सम्मति हो जाती है जिस क्षण वह स्वांत: सुखाय की निजता से मुक्त होता है ।
  • Mere Saakshatkaar : Kedar Nath Singh
    Kedarnath Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-2027

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के साक्षात्कारों की यह किताब कविता के ज़रिए समकालीन जीवन में झाँकने की एक कोशिश है । इनसे गुज़रना अपने समय की बदलती हुई सौंदर्य-चेतना के खुले-अधखुले गलियारों से गुज़रना है । विगत पच्चीस वर्षों के लंबे अंतराल में लिए गए ये इंटरव्यू कवि की विकास-यात्रा को समझने की कुंजी भी देते हैं और उन मोड़ों-घुमावों की प्रामाणिक जानकारी भी, जिनसे होकर उसकी सृजन-यात्रा अविराम चलती रही है । यह एक रचनाकार की विश्व-दुष्टि के बनने और आकार ग्रहण करने की लंबी प्रक्रिया का दस्तावेज़ है-एक ऐसा कच्चा माल, जिसमें समकालीन कविता के इतिहास के रंग-रेशे तलाशे जा सकते हैं ।
    कवि केदारनाथ सिंह की कविताएँ समय के साथ संवाद करती हुई कविताएं हैं। यही वजह है कि उनकी कविताओं में एक तरह की प्रश्नाकुलता दिखाई देती है। ऐसी प्रश्नाकुलता, जो कहीं गहरे पैठकर पाठक को बेचैन करती है। यह देखना भी एक दिलचस्प अनुभव होगा कि अपनी कविताओं में निरंतर प्रश्न उपस्थित करने वाला कवि स्वयं प्रश्नों का सामना कैसे करता है ।
    समकालीन सर्जन-परिवेश में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों के लिए एक संग्रहणीय दस्तावेज़ है यह किताब ।
  • Aakhet
    Jagdish Godbole
    125 113

    Item Code: #KGP-9072

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Spain & Portugal
    Prashant Kaushik
    395 356

    Item Code: #KGP-9311

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Spanish & Portuguese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories 
    open up a new world on each page.

    With stories like Vain Queen, Maid and the Negress, Three Citrons of Love, Daughter of the Witch, Pedro and the Prince, Tower of ill Luck, this book is a compilation of 20 famous Spanish & Portuguese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Spain & Portugal.
  • Mera Hamdam Mera Dost
    Kamleshwar
    75 68

    Item Code: #KGP-1878

    Availability: In stock

    मेरा हमदम मेरा दोस्त
    "मेरा हमदम मेरा दोस्त' में बारह भारतीय रचनाकारों के जीवन के बेहद निजी शब्द-चित्र प्रस्तुत किये गये है । अपने समय की उत्कृष्ट स्तंभ-श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित इन चर्चित साहित्यकारों के जीवन और कर्म का मार्मिक तथा यथार्थ चित्रण, पाठक इन संस्मरणों में पायेंगे ।
    प्रस्तुत: रचनाकार पाठकों की अदालत के कठघरे में अनवरत खड़े रहने वाला एक अभिशप्त जीव है । उसके अंतरतम जीवन और प्रकाशित लेखनादर्शो का आमना-सामना भी प्राय: कराया जाता रहा है । पाठक अपेक्षा रखते है कि जीवन में उदात्तता को भर देने वाले चरित्रों का यह जनक भी नितांत मैल-गर्द मुक्त हो । जबकि क्रूर सत्य यह है कि लेखक अंतत: मनुष्य है बल्कि कहें कि आदमी के समक्ष वहीं ज्यादा आम आदमी है जो दूसरों की व्यथा को अपनी (जीवन) कथा में जोड़ने और भोगने को विवश है । अपने श्रम से वह दूसरों का स्वेद बहाता है और अपनी आँख में, वंचित के नेत्र-मल को मणि की तरह संरक्षित करना चाहता है । इस दोहरे संघर्ष और जीवन की नियमित अनिवार्यताओ को पूरा कर पाने की महातड़प में लेखक के व्यक्तित्व में प्राय: फाड़ आ जाती है और स्वभावत: वह 'सामान्य' व्यक्ति नहीं रह पाता । यह एक लेखक की जिंदगी का 'कुदृश्य' है जो वर्षों तक स्फटिक बनकर साहित्य के शीर्ष पर कौंधा करता है । यह किताब  रचनाकार के ऐसे ही जीवन-संसार का प्रत्पक्ष अवलोकन है । और सबसे सर्जनात्मक तथ्य यह कि इन शब्द-चित्त्रों ने लेखक तथा मूल विषय (हमदम, दोस्त) के बीच की तिरछी चितवन भी है, टकटकी, त्योरी, आँखमारी भी है और साथ ही है परिदर्शन, निगहबानी और कई स्थलों पर अनवलोकन अर्थात् नज़रअंदाजी भी । वास्तव में ये लेख साहित्यिक मित्रता के साहस, दुस्साहस, धैर्य, मनोबल, अभय तथा खुलेपन के अनुपम उदाहरण है ।
    मित्रता के स्तर पर साहित्यिक दुनिया के समकालीन 'सांप्रदायिक' माहौल में यह किताब एक ऐसी तूलिका की भूमिका निभा सकती है जो किसी रचनाधर्मी के पोर्ट्रेट, लैंडस्केप, फोक पेटिंग, कार्टून-सभी कुछ के दक्षता के साथ एक ही कैनवस पर उतार सकती है । ऐसी साहित्यिक मित्रताओं को शायद ही कहीं कोई अन्य वर्णमाला मिली हो । इस दृष्टि से यह किताब योगदान नहीं, वरदान है ।
  • Vipradas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-852

    Availability: In stock


  • Nadi Phir Laut Aaee
    Rajjan Trivedi
    90 81

    Item Code: #KGP-2015

    Availability: In stock

    उपन्यास
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nanak Singh (Paperback)
    Nanak Singh
    80

    Item Code: #KGP-7003

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : नानक सिंह
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नानक सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कुचले हुए पुष्प', 'लक्ष्मी-पूजा', 'अंतर्ज्ञान', ‘अछूते आम', 'चक्षुहीन संत', 'जर्जर खपरैल की एक स्लेट', 'स्नोफॉल', 'इनसान-हैवान', 'लंबा सफ़र' तथा 'जब हम में 'इनसान' प्रकट होता है' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नानक सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Vinod Kumar Shukla
    Vinod Kumar Shukla
    190 171

    Item Code: #KGP-385

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विनोद कुमार शुक्ल
    यद्यपि कविताओं का चयन मैंने किया है, पर इसका आधार स्पष्ट नहीं है कि इन चुनी हुई कविताओं को बाकी कविताओं में मिला दूं और इन्हें फिर से पूरा चुन लूं । दुबारा चुनते समय कुछ कविताएं जरूर बदल जाएंगी । कूल सत्तावन, इतनी कविताएं हैं । कोई कविता वैसे पूरी नहीं होती पर उसके लिखने का अंत है । कुछ लिखना बचा हुआ प्रत्येक कविता के अंत के साथ रहता है । लिखने के इस छूटे रहने के साथ कविता पूरी होती है । प्रत्येक कविता का लिखना बचा हुआ, अभिव्यक्ति का बचा हुआ भी होता है जो पाठक की समझ से पूरा होता है । एक रचना की पूर्ति अलग-अलग पाठकों में अलग-अलग होती है । मैं दूसरों की कविता पढ़ने के बाद अपने लिए इसी तरह उसमें जगह पाता हूं। इस जगह मैं भटकता हूं। जहाँ पहुंचना था वहां पहुंच गए ऐसा कभी नहीं होता, परंतु भटकने की जगह जानी-पहचानी जरूर हो जाती है । भटकने की जगह का जाना-पहनाना हो जाना अच्छा लगता है, इसलिए भटकना भी । कविता मेरे लिए दुनियादारी है, और लिखना भी ।
  • Ramayan Bharantiyan Aur Samadhaan
    Swami Vidya Nand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1115

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के पढ़ने से पता चलेगा कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम राज्य पाने के इच्छुक थे, वे पिता के कहने से वन नहीं गए, राम दीपावली के दिन नहीं बल्कि चैत्र शुक्ला 6 को अयोध्या लौटे थे, सीता का स्वयंवर नहीं हुआ था, कौशल्या की स्थिति घर में दासियों से भी बुरी थी, राम ने धोबी या किसी के भी कहने से सीता को वनवास नहीं दिया था, उन्होंने तपस्या करते तथाकथित शुद्र शम्बूक का वध नहीं किया था, हनुमान बंदर नहीं बल्कि व्याकरणाचार्य तथा चारों वेदों के विद्वान् थे, बालि की पत्नी तारा वेदों के रहस्य को जानने वाली थी, उसका पुत्र अंगद बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ था और उसके श्वसुर सुषेण बड़े कुशल सर्जन और प्लास्टिक सर्जरी में निष्णात थे, हनुमान, जटायु, रावण आदि छोटे-छोटे निजी हेलीकाॅप्टरों में यात्रा करते थे, शबरी भीतनी नहीं, उच्च कुल की तपोनिष्ठ देवी थी, अयोध्या तथा लंका की राजभाषा संस्कृत थी इत्यादि...
  • Kucha E Kaatil
    Ram Lal
    175 158

    Item Code: #KGP-2067

    Availability: In stock

    कूचा-ए-कातिल

    यह एक बहुत ही मामूली आदमी की खुदनोश्त
    दास्तान है, जिसने काफी गुरबत देखी है
    और यह महरूमियों का भी शिकार हुआ है ।
    कौमी और समाजी सतह पर इसने
    बेशुमार मसायब का खामोशी से मशाहदा
    किया है और दर-बदरी इसके
    खुन में हमेशा मोजूद रहीं हे।

    मैं इस शख्स को बहुत करीब से जानता हूँ,
    क्योंकि वह मैं ही हूँ। मैंने 1943 से अब तक
    जितने अफ़साने, नावल, ड्रामे, सफरनामे,
    मजामीन वगैरह लिखे हैं, इनमें मेरी
    जाती कैफियतें मुख्तलिफ शक्लों और रवैयों 
    का रूप धारकर हमेशा मौजूद रही हैं ।
    मेरे नज़दीक खुदनोश्त भी एक तरह का
    तखलीकी इजहार है, लेकिन इसमें 
    बयान की गई सच्चाइयाँ
    दूसरी असनाफ़ के मुकाबले में कुछ
    ज्यादा ही खुरदरी और तकलीफदेह हैं।
    -रामलाल
  • Vigyan Navneet
    Dr. Ramesh Dutt Sharma
    290 261

    Item Code: #KGP-563

    Availability: In stock

    विज्ञान नवनीत
    लगभग आधी सदी पहले डा. रमेश दत्त शर्मा ने विज्ञान संबंधी विषयों पर लिखना शुरू किया था और जल्द ही वे विज्ञान से जुड़े हर महत्त्वपूर्ण विषय पर लिखने लगे। अब तक हिंदी की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में हजार से अधिक श्रेष्ठ रचनाएं उनकी छप चुकी हैं, लेकिन रचनाओं के छपने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण उन रचनाओं का पढ़ा जाना है। विज्ञान को अकसर नीरस विषय कहा जाता है, लेकिन डा. रमेश दत्त शर्मा का लेखन किसी भी दृष्टि से नीरस नहीं कहा जा सकता। छात्रा भले ही वे विज्ञान के थे, पर साहित्य से हमेशा जुड़े रहे। स्वभाव से कवि तो थे ही, इसलिए उनके लेखन में एक ऐसी रंजकता है, जिसमें पाठकों को भीतर तक छूने और उनका मन जीत लेने की अद्भुत विशेषता रही है। गंभीर वैज्ञानिक विषयों को रोचक कहानी की तरह परोसना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन रमेश जी ने यह काम प्रस्तुत पुस्तक में बड़ी आसानी से किया है। 
    ‘विज्ञान नवनीत’ ढंगदार लेखों का संकलन है, जो देश की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे। यह संयोग भी है कि पुस्तक के बहुत से लेख ‘नवनीत’ में छपे थे। अपनी इस पुस्तक के शीर्षक के साथ लेखक ने लिखा है—‘विज्ञान को मथकर निकाली गई लुभावनी लोनी। बड़ी स्वादिष्ट होती है लोनी। देर तक जीभ पर स्वाद बना रहता है। ऐसा ही स्वाद इन लेखों का भी है।’ 
    प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत लेखों से यह बात सहज ही समझ आ जाती है कि लेखक सिर्फ लिखना ही नहीं चाहता, कुछ सार्थक रचना चाहता है। सार्थकता की गंध इस पुस्तक के हर पन्ने पर अनुभव की जा सकती है। 
    —विश्वनाथ सचदेव
  • Rahiman Dhaaga Prem Ka
    Malti Joshi
    150 143

    Item Code: #KGP-1992

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]
  • Jalatarangon Ki Atmakatha
    Anupam
    50 45

    Item Code: #KGP-9037

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Anamika
    Anamika
    150 135

    Item Code: #KGP-223

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : अनामिका
    अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करतीं ।
    भारतीय स्त्रियों के जीवन-संघर्ष तथा हास-परिहास और गीत-अनुष्ठान आदि के जरिए पीड़ा को सह पाने की उनकी परंपरागत युक्तिहीन युक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर अनामिका की कविताओं के नए अर्थ खुलते हैं, जिन तक कविता को देखने-परखने के रूढ़ ढाँचे को तोड़कर ही पहुंचा जा सकता है ।
    उनकी संवेदना का फैलाव उन वंचित जनों तक है, जिनसे एक स्त्री की करुणा सहज रूप से जुड़ जाती है । लोकभाषा के शब्द उनके यहाँ किसी गुर की तरह नहीं आते, बल्कि वे उनके अनुभव का अनिवार्य हिस्सा हैं । 'जनमतुआ' बच्चे की 'चानी' की तरह 'पुलपुल' कविताओं में परिपक्व कठोरता की विपुल संभावनाएं अंतर्निहित हैं । हिंस्र  समय के प्रतिरोध का उनका अपना ढंग है, जो भारतीय स्त्रियों की प्रतिरोध की परंपरा की गहरी समझ और संवेदनात्मक जुड़ाव से उपजा है ।
    समस्याओं और घटनाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण एक ऐसी संवेदनशील स्त्री का दृष्टिकोण है, जिसके भीतर अभी भी निष्पाप बचपन बचा हुआ है ।
  • Anveshak : Ek Modern Classic (Paperback)
    Shashi Sahgal
    60

    Item Code: #KGP-1365

    Availability: In stock


  • Soochana Ka Adhikaar
    Vishv Nath Gupta
    140 126

    Item Code: #KGP-494

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Ekant Shrivastava
    Ekant Shrivastva
    240 216

    Item Code: #KGP-7817

    Availability: In stock

    एकान्त वस्तुतः छत्तीसगढ़ की ‘कन्हार’ के कवि हैं। एकान्त का काव्य-संसार एक ओर माँ-बाप, भाई-बहन का भरा-पूरा परिवार है तो दूसरी ओर अंधी लड़की, अपाहिज और बधिर जैसे असहाय लोगों का शरण्य भी और ‘कन्हार’ जैसी लंबी कविता तो एक तरह से नख-दर्पण में आज के भारत का छाया-चित्र ही है। ‘अन्न हैं मेरे शब्द’ से अपनी काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले एकान्त उन थोड़े से कवियों में हैं जो ‘शब्द’ को अपनी कविताओं से एक नया अर्थ दे रहे हैं। निश्चय ही एकान्त का काव्य एक लंबी छलाँग है और ऊँची उड़ान भी--कवि के ही शब्दों में एक भयानक शून्य की भरपाई। -नामवर सिंह

    काली मिट्टी से कपास की तरह उगने की आकांक्षा से उद्वेलित यह कवि अपनी हर अगली कविता में मानो पाठक को आश्वस्त करता है कि वह अपने भाव-लोक में चाहे जितनी भी दूर चला जाए, अंततः लौटकर वहीं आएगा जो उसके अनुभव की तपी हुई काली मिट्टी है। यह एक ऐसी दुनिया है जो एक किसानी परिवेश के चमकते हुए बिंबों और स्मृतियों से भरी है। एक अच्छी बात यह कि गहरे अर्थ में पर्यावरण-सजग इस कवि के पास एक ऐसी देखती-सुनती, छूती और चखती हुई भाषा है, जो पाठक की संवेदना से सीध संलाप करती है।   -केदारनाथ सिंह

    एकान्त की कविता और कवि-कर्म की खूबी है कि उन्होंने अपने को औपनिवेशिक आधुनिकता के पश्चिमी कुप्रभाव से बचाया है। यही कारण है कि उनकी कविता कलावादी और रूपवादी प्रभाव से मुक्त है। ऐसा इसलिए कि एकान्त अपने जनपद, अपनी जड़ों और अपनी ज़मीन को कभी नहीं छोड़ते। उनकी कविता हमें भारतीय समृद्ध काव्य-परंपरा की याद दिलाती है जो आज की अधिकांश कविता से विलुप्तप्राय है। एकान्त, निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा के सशक्त कवि हैं। एकान्त की कविता में कोई ठहराव नहीं है। वे आज भी नित नवीन और सारगर्भित कविताएँ बिना किसी विचलन या दोहराव के रच रहे हैं। क्योंकि उनका गहरा रिश्ता भारतीय लोक और जनमानस से बना हुआ है। सही अर्थों में वे लोकधर्मी कवि हैं। ‘नागकेसर का देश यह’ हिंदी में एकान्त की सर्वाधिक लंबी कविता है जिसके कई अर्थ-ध्वनिस्तर हैं और बड़ी संश्लिष्टता है।      -विजेन्द्र
  • Bazmey Ghazal
    Om Prakash Sharma
    200 180

    Item Code: #KGP-165

    Availability: In stock

    बज्मे-ग़ज़ल
    उर्दू अदब में ग़ज़ल का क्षेत्र जितना व्यापक है, उतनी ही बडी तादाद उन शाइरों की भी  जिन्होंने ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाया ।
    गजल शब्द के अर्थ से आज लगभग सभी परिचित है, लेकिन आज के परिवेश में ग़ज़ल की परिभाषा बदली हुई दिखाई दे रही है । इस संकलन को तैयार करते हुए यह प्रयास रहा है कि ग़ज़ल के शाब्दिक अर्थ के अतिरिक्त, इसके बदले हुए रूप को भी पाठकों के सन्मुख रखा जाये। इसीलिए 'बज्मे-गजल' में संगृहीत ग़ज़लें कभी परम्पराओं में बंधी नज़र आयेंगी, तो कभी इनका रूप आज़ के ज़माने को छूता हुआ दिखाई देगा ।
    उर्दू गजल आज जिस बुलन्दी पर पहुंच चुकी है, साहित्य की किसी दूसरी विधा का यहा तक पहुंच पाना शायद सम्भव नहीं; क्योंकि  गजल कहीं नहीँ जाती, बल्कि खुद-ब-खुद हो जाती है । ग़ज़ल सिर्फ इल्तिजा ही नहीं करती, ऐलान भी करती है, समझोता करना ही नहीं सिखाती, अधिकार प्राप्त करने के लिए लड़ना भी सिखाती है तथा सिर्फ फूल ही नहीं, अंगारे बरसाने का हौंसला भी देती है ।
    इस संकलन से जहां अनेक पुराने शाइरों की गज़लें दी जा रही हैं, वहीं कुछ नये शाइरों की ग़ज़लें भी मौजूद हैं, जो आज लोगों के दिलों में घर कर रहे हैं।
  • 20-Best Stories From Turkey
    Prashant Kaushik
    325 293

    Item Code: #KGP-9316

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folkstales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Turkish short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Prince Ahmed, Storm Fiend, Deceiver and the Thief, Fortuneteller, Shah Jussuf, Forlorn Princess, this book is a compilation of 20 famous Turkish short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Turkey.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vijay Dan Detha
    Vijaydan Detha
    200 180

    Item Code: #KGP-94

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ballabh Dobhal
    Ballabh Dobhal
    170 153

    Item Code: #KGP-451

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बल्लभ डोभाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उतरा हुआ', 'जय जगदीश हरे', 'चुनाव चक्रम्', 'काठ की टेबुल', 'दूर का दर्शन', 'दर्द अपनेपन का', 'तन का देश : मन का देश', 'खेड़ा गांव', 'बुलडोजर' तथा 'समाधान'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बल्लभ डोभाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Unheen Mein Palata Raha Prem
    Poonam Shukla
    200 180

    Item Code: #KGP-9329

    Availability: In stock

    उन्हीं में पलता रहा प्रेम 
    पूनम शुक्ला की कविताएँ एक ओर जहाँ स्त्री-विमर्श के दायरे को मजबूत करती हैं वहीं दूसरी ओर उसे विस्तार भी देती हैं। स्त्राी के दुःख और संघर्ष को ही नहीं, उसके अधिकार और ताकत को भी पहचानती हैं और उसे तर्क की ठोस भूमि पर निरूपित करती हैं। ऐसे में कविता के बयान बन जाने का खतरा बार-बार उपस्थित होता है, लेकिन भावात्मक लगाव और संवेदनात्मक स्पर्श से वे न सिर्फ ऐसे खतरों को टालने में सफल होती हैं बल्कि कई बार कविता की नई जमीन तोड़ने का उद्यम भी करती दिखती हैं। स्त्री कविता की प्रचलित अवधारणा से अलग एक संवेदनशील और विवेकशील मनुष्य की तरह समय के बीहड़ में प्रवेश करती हैं और समाज की उन विषमताओं और विसंगतियों को देखने में भी सफल होती हैं, जिन्हें देखने के लिए एक वर्गदृष्टि चाहिए। खास बात यह है कि उनकी कविताओं में यह वर्गदृष्टि आरोपित नहीं बल्कि जीवनानुभव के विस्तार और उत्पीड़ित जनों के साथ संवेदनात्मक जुड़ाव से पैदा हुई दृष्टि है।
    पूनम शुक्ला अपने समय के विमर्शों से प्रभावित तो हैं लेकिन वे ज्ञान और सूचनाओं का उपयोग, उन्हें अपने जीवनानुभव में शामिल करने के उपरांत ही करती हैं, इसलिए वे पाठकों को चैंकाती नहीं हैं बल्कि बेचैन कर देती हैं। यह उनका दूसरा संग्रह है, लेकिन इसे एक नई शुरुआत की तरह देखा जाना चाहिए। पहले संग्रह में काव्याभ्यास वाली कविताएँ अधिक थीं। उसके साथ इस संग्रह की कविताओं को देखकर लगता है कि यह विकास नहीं बल्कि छलाँग है, एक बिलकुल अलग तरह के काव्यलोक में। जाहिर है अपना मुहावरा पाने के लिए उन्होंने कठिन रचनात्मक संघर्ष किया है जिसकी झलक इन कविताओं में मिलती है।
    —मदन कश्यप 
  • Bhinsaar
    Gyanendrapati
    160 144

    Item Code: #KGP-1882

    Availability: In stock

    भिनसार
    'भिनसार' समकालीन कविता-परिदृश्य में अपनी तरह के अकेले कवि ज्ञानेन्द्रपति का अनूठा संकलन है । इससे कवि की बहुचर्चित कृतियाँ 'आँख हाथ बनते हुए' और 'शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है' तो सम्पूर्णता  शामिल हैं ही, अब तक आसंकलित-और अनेक तो अप्रकाशित-रही आयी कविताएँ भी पुस्तकाकार आ रही है । एक सघन बसा कविता-संसार पाठकों की यायावरी को आमंत्रित कर रहा है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की इन कविताओं से एक ओर तो तीव्र परिवर्तनकामिता से उपजा क्रान्तिकारी रोमान है, वर्ग- शत्रुओं को ललकारता युयुत्सु उदूघोष; तो दूसरी ओर सामाजिक आत्मालोचन का वह विरल स्वर है जो अपनी आत्मा को खराद पर चढाये बगैर नहीं उठता, अपने नैतिक विवेक के आगे वेध्य बने रहने पर ही जिसका स्फुटन संभव हो पाता है । यहीं, चेतना पारीक और बनानी बनर्जी से होने वाली अविस्मरणीय मुलाकातें हैं । रात से लगी भोर में भटक आया चमगादड़ का बच्चा भी इस कविता-दुनिया का बाशिन्दा है । परित्यक्त चीजें भी यहाँ निरर्थक नही, उनमें नये अर्थ अँखुआते है ।
    दरअस्ल, ज्ञानेन्द्रपति को पढ़ना बनते हुए इतिहास के बीच से गुजरना ही नहीं, युग के कोलाहल के भीतर से छन कर आते उस मन्द्र स्वर को सुनना है इतिहासों से जिसकी सुनवाई नहीं होती; यह नश्वरताओं की भाषा से शाश्वत का द्युति-लेख पढ़ना है । इसीलिए यहाँ एक तरह की अनगढ़ता काव्य-सौष्ठव की अविधि ठहरती है । उच्च-भ्रू आलोचकों की पर्वा किये बगैर यह मनुष्य की ओर बढा हुआ समव्ययी हाथ है ।
    ये वे कविताएँ हैं जिनकी जीवनधर्मिता अबूझ ढंग से मानवीय जिजीविषा को पुष्ट करती है ।
  • Nadi Ke Saath Bahate
    P.S. Ramanunj
    65 59

    Item Code: #KGP-1853

    Availability: In stock

    'नदी के साथ बहते' श्री पी०एस० रामानुजं की कन्नड़ कविताओं का हिन्दी में श्री टी०आर० भट्ट द्वारा प्रस्तुत हिन्दी काव्यान्तर है । प्रसन्नता की बात है कि काव्यांतर  की भाषा अनुवाद जैसी नहीं लगनी प्रत्युत मौलिक कविता लगती है। कहीं-कहीं कन्नड़ रग अवश्य है,  पर वह उचित ही है । उसमें कविता को मर्मस्पर्शिता बढ़ जानी है । श्री रामानुजं के काव्य में एक क्लासिक कविता का गुण है जिसमें भावोछवास संयत रूप में है।
  • Mere Saakshatkaar : Bhawani Prasad Mishra
    Bhawani Prasad Mishra
    280 252

    Item Code: #KGP-413

    Availability: In stock


  • Dena Paavna
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-71

    Availability: In stock


  • Panchtantra Ke Natak
    Shri Prasad
    125 113

    Item Code: #KGP-316

    Availability: In stock


  • Satya Ke Prayog
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    350 315

    Item Code: #KGP-9055

    Availability: In stock


  • Bhartiya Naitik Shiksha : 2
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-266

    Availability: In stock

    जीवन एक अनुपम उपहार है। इसमें आपत्तियों से घबराकर कायरों की भाँति पलायन करने की अपेक्षा समस्याओं का नीतिपूर्वक सामना करने से सुख-शांति व समृद्धि का सृजन होता है। नीतिपूर्वक व्यवहार करने की शिक्षा देने का कार्य नैतिक शिक्षा का है। नैतिक शिक्षा ही वास्तव से वह शिक्षा है, जो विद्यार्थी को समाज तथा राष्ट्र यहाँ तक कि संपूर्ण मानवता के लिए अपना जीवन उपयोगी बनाने की शिक्षा देती है, अर्जित ज्ञान को व्यावहारिक रूप प्रदान कर जीवन के संघर्षों को समझने और उनसे जूझने की क्षमता देती है । मूल्यों एवं संस्कृति की सुरक्षा के साथ वांछित ज्ञान प्रदान करने की दक्षता नैतिक शिक्षा में ही अंतर्निहित है।
    नैतिक शिक्षा की यह जो पुस्तक आपके हाथ में है, वह स्वाध्याय के लिए है, मनन के लिए है और बार-बार चिंतन करने के लिए है। केवल छात्र जीवन के लिए ही नहीं अपितु संपूर्ण जीवन के लिए है ।
    जीवन की समस्याओं और चुनौतियों का सामना महापुरुषों ने किस प्रकार किया, इस पुस्तक द्वारा आप उसका अध्ययन कर अपना हौसला बढा सकेंगे ताकि उनका समाधान करने में आप सशक्त हो सकें । इस पुस्तक का अध्ययन इस दृष्टि से आपको स्वयं करना है।
    अपने अन्तर्मन में झांककर देखने में हममें बहुत-सी कमियां और अच्छइयां देखने को मिलेंगी। इनके शोध से ही हम अपने व्यक्तित्व को पहचान सकते हैं । स्वयं को जानकर ही हम अपने लक्ष्य को जान सकते हैं ।
  • Sarak Durghatnon Se Kaise Bachen
    E.W. Saxbi
    40

    Item Code: #KGP-920

    Availability: In stock


  • Aalochna Ka Rahasyavaad
    Parmanand Shrivastva
    280 252

    Item Code: #KGP-709

    Availability: In stock

    ‘आलोचना का रहस्यवाद’ जाने-माने कवि आलोचक परमानंद श्रीवास्तव के इध्र के चुने हुए अट्ठाईस निबंधें का संग्रह है, जिनमें समय, साहित्य, रूप-वस्तु के तीखे सवाल उठाए गए हैं। अट्ठाइसवाँ निबंध रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‘लाल पान की बेगम’ का घनिष्ठ पाठ है। परमानंद श्रीवास्तव के लिए नए लेखक प्रेमचंद के बाद रेणु और अमरकांत से प्रेरणा लेते हैं। वे रूप और वस्तु में एक द्वंद्वात्मक रिश्ता मानते हैं।
    परमानंद श्रीवास्तव का प्रिय शब्द है--अँधेरा समय। एक कृति का नाम ही है ‘अँधेरे समय में शब्द’। नया लेखक इसी अँधेरे समय में रास्ता खोजता है। आज लिखने का अर्थ है--तीखे सवालों से मुठभेड़। आलोचना का भी अपना लोकतंत्रा है। मार्क्सवाद है तो उत्तरमार्क्सवाद भी है, प्रतिमार्क्सवाद भी है। ‘कफन’ का पाठ हर बार नए अर्थ देता है। कोई प्रतिमान (कैनन) काफी नहीं है। प्रतिमान धूल में शब्द की तरह है।
    आज अकादमिक आलोचना गूढ़ रहस्यात्मक है। रचना की गुत्थी तो सुलझ भी जाती है, आलोचना पल्ले नहीं पड़ती। प्रतिमान तो मुक्तिबोध् के यहाँ हैं, जैसे-- ज्ञानात्मक संवेदना, संवेदनात्मक ज्ञान। पर हर रचना, अपना प्रतिमान अपने साथ लाती है। बड़े आलोचक सवाल पूछते हैं, जैसे--कविता कौन पढ़ता है (आक्तोवियो पॉज़) या एक पृष्ठ को कैसे पढ़ें (आई.ए. रिचर्ड्स) उम्मीद है यह कृति भी आपको बेचैन व्यग्र छोड़ जाएगी।
  • Ritusamhaar
    Kaalidas
    395 356

    Item Code: #KGP-308

    Availability: In stock

    ऋतुसंहार
    प्रेम, सौंदर्य, भक्ति, मर्यादा, कला व संस्कृति के सम्मिश्रण का दूसरा नाम है—कालिदास। स्थान व काल के संदर्भ में अपने को अपरिचित रखकर जिसने अपनी कृतियों के माध्यम से, विषयवस्तु के साथ-साथ भारतवर्ष की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक गरिमा और भौगोलिक सौंदर्य से हमें सुपरिचित कराया, वह आज किसी एक काल व एक स्थान का कवि न होकर, सार्वकालिक विश्वकवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है।
    उसी महाकवि की एक छोटी-सी काव्यकृति है—‘ऋतुसंहार’। इसमें सचित्रा षड् ऋतु वर्णन के परिपार्श्व में तदनुरूप स्त्री-पुरुष के प्रेम और सौंदर्य-भोग का श्रृंगारिक चित्रण हुआ है।
    इस त्रैभाषिक पुस्तक की विशेषता एक तो यह है कि सामान्य हिंदी पाठक हिंदी रूपांतर द्वारा कालिदास के काव्य-सौंदर्य एवं प्रेम की अनुभूति प्राप्त करेंगे, दूसरी यह कि संस्कृत जानने वाले संस्कृत मूल का भी रसास्वादन कर सकेंगे। तीसरी विशेषता यह कि अंग्रेजी अनुवाद से आधुनिक पाश्चात्य प्रेमी भी भारत की संस्कृति की सरसता से परिचय पा लेंगे।
    इस चित्रात्मक कृति की सर्वोपरि विशेषता भी है। वह यह कि यह पुस्तक गृहस्थाश्रम में कदम रखने वाले युवक-युवतियों के लिए पठनीय है और मित्रों एवं सखियों को विवाहोत्सव पर भेंट करने के लिए इसे खास तौर से तैयार कराया गया है।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    160 144

    Item Code: #KGP-13

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', 'क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ramlubhaya Haazir Hai (Paperback)
    Raj Kumar Gautam
    120

    Item Code: #KGP-1175

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Khare (Paperback)
    Vishnu Khare
    80

    Item Code: #KGP-1322

    Availability: In stock

    मैंने जब विष्णु खरे की कविताओं को यह जानने के उद्देश्य से पढ़ना शुरू किया कि उनकी कविता का संसार किन तत्त्वों से बना है तो मुझे अत्यंत स्फूर्तिदायक अनुभव हुआ। एक के बाद एक काफ़ी दूर तक मुझे ऐसी कविताएँ मिलती रहीं जिन्होंने मुझे समकालीन जीवन के त्रासद से लेकर सुखद अनुभव तक से प्रकंपित किया। सबसे अधिक कविताएँ सांप्रदायिकता और फ़ासिस्ट मनोवृत्ति के जोर पकड़ते जाने को लेकर लिखी गई हैं। ‘शिविर में शिशु’ गुजरात के दंगे से संबंधित है, ‘चुनौती’ शीर्षक कविता में धर्म-भावना के ख़तरनाक रूप का संकेत है, ‘न हन्यते’ में दंगाइयों का रोंगटे खड़े कर देने वाला बयान है, ‘गुंग महल’ भी धार्मिक कट्टरता को ही सामने लाती है और ‘हिटलर की वापसी’ शीर्षक कविता जर्मनी की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। विष्णु खरे की ख़ूबी है कि उनकी कविताएँ अधिकांश वामपंथी कवियों की तरह सिर्फ़ जज़्बे का इज़हार नहीं करतीं बल्कि अपने साथ सोच को भी लेकर चलती हैं, जिससे उनमें स्थिति की जटिलता का चित्राण होता है और वे सपाट नहीं रह जातीं।...
    विष्णु खरे की असली कला और उनका तेवर ‘गुंग महल’ शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है, जिसका अंत जितना ही सशक्त है उतना ही कलात्मक--पाठकों को अनुभूति, सोच और कल्पना तीनों ही स्तर पर उत्तेजित करने वाला। ‘विनाशग्रस्त इलाके से एक सीधी टी.वी. रपट’ कविता में टी.वी. रपट शैली में अनुमानतः गुजरात के भूकंप का ज़िक्र है। अंतर्वस्तु की दृष्टि से इसमें भारत के नैतिक विनाश का ऐसा चित्रण है कि एक बार तो यह प्रतीति होती है कि विष्णु खरे हमारे नैतिक विनाश के ही कवि हैं।...
    विष्णु खरे का गहरा लगाव इस देश की साधारण जनता और साधारण जीवन से है, जिसे वे आधुनिक सभ्यता के बड़े परिप्रेक्ष्य में भी रखकर देखते हैं।...इन्हीं साधारण जनों में औरतों को भी गिनना चाहिए। आकस्मिक नहीं कि इस संग्रह में औरतों पर भी तीन-चार बहुत अच्छी कविताएँ हैं। विष्णु खरे का यथार्थ चित्रण इतना गहरा होता है कि उन्हें फैंटेसी में लिखने की कोई जरूरत नहीं। उन्होंने उस गद्य को आवश्यकतानुसार अनेक रूप प्रदान करके उसे ऐसा बना दिया है कि किसी काव्य और कला-मर्मज्ञ को उससे कोई शिकायत न हो।  
    -नंदकिशोर नवल
  • Suno Shefali (Paperback)
    Kusum Kumar
    40

    Item Code: #KGP-7083

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti
    Hemant Kukreti
    240 216

    Item Code: #KGP-7814

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Marxwadi Jeevan-Drishti Aur Rangey Raghav
    Madhuresh
    350 315

    Item Code: #KGP-700

    Availability: In stock

    श्री मधुरेश ने निःसंग मेध से रांगेय राघव के विषय में इस भ्रांति का भी निराकरण किया है कि रांगेय राघव ‘नस्लवादी’ थे। यह भयंकर आरोप डॉ. रामविलास शर्मा ने लगाया था। मधुरेश जी का यह मत मान्य है कि उस समय तक और आज तक, भारत के प्रागैतिहासिक युग (मोहन जोदड़ो) के विषय में निर्विवाद जानकारी उपलब्ध नहीं है और यह कि रांगेय राघव का ध्यान सर्वत्र ‘व्यवस्था’ पर केंद्रित रहता था और मानव शोषण और अत्याचार के विरोध पर तथा मानवतावादी प्रवाह की खोज पर। इसीलिए द्रविड़ों पर आर्य अत्याचार हो या मुसलमानों पर आंग्ल-आक्रमण हो, वह सर्वत्र हृदय से आक्रांत, शोषित, दमित के साथ रहते हैं और जालिमों का विरोध करते हैं, चाहे जुल्मी आर्य हो या अनार्य, यवन हो या ब्राह्मण, मुसलमान हो या कम्युनिस्ट। सर्वत्र राघव ने मानव-न्याय का परिचय दिया है। —डॉ. विश्वंभर नाथ उपाध्याय
    माकर्सवादी आलोचक के रूप में केवल मधुरेश ने उनके महत्त्व को रेखांकित किया, 1987 में जब उन्होंने साहित्य अकादेमी के लिए मोनोग्राफ लिखा ‘रांगेय राघव’। इस मोनोग्राफ में उन्होंने बाकायदे एक अध्याय लिखा ‘हिंदी की माकर्सवादी आलोचना और रांगेय राघव’। उनका मानना था कि ‘सन् ’45 से ’55 तक का काल हिंदी की माकर्सवादी आलोचना में प्रखर विवादों का काल रहा है और इन विवादों के आपसी अंतर्विरोध ही वस्तुतः हिंदी क्षेत्र में प्रगतिवादी आंदोलन के विघटन और माकर्सवादी आलोचना में भयंकर गतिरोध के कारण भी बने। यह दौर माकर्सवादी हिंदी आलोचना में ऐसी भयावह उग्रता और विनाशकारी उच्छेदवाद का दौर रहा है जिसमें अपने निकट वर्तमान में प्रगतिवादी साहित्य के निर्माण और विकास की संभावनाओं के प्रति पूरी तरह उदासीन रहकर बेहद गलत मुद्दों पर सारी बहस को केंद्रित कर दिया है।’
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vijay Dan Detha (Paperback)
    Vijaydan Detha
    90

    Item Code: #KGP-7012

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : विजयदान देथा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार विजयदान देथा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'लजवन्ती', 'दूजौ कबीर', 'फितरती चोर', 'बडा कौन', 'दूरि, 'सिकन्दर और कौआ', 'राजीनामा', रैनादे का रूसना', 'अनेकों हिटलर' तथा 'हाथी-कांड' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक विजयदान देथा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Vaigyanikon Ki Batein (Paperback)
    Shuk Deo Prasad
    50

    Item Code: #KGP-7085

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Kashmkash (Paperback)
    Manoj Singh
    240

    Item Code: #KGP-378

    Availability: In stock


  • Antarmilan Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-754

    Availability: In stock

    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    ऐसी उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह, जिनमें भारतीय साहित्य के उन अमर पात्रों के चित्र उतारे गए हैं जिन्होंने सदियों से भारतीय आत्मा क्रो 'जियो और जीने दो' की प्रेरणा दी ।

  • Kucch Yaaden Bachpan Ki
    Ramdarash Mishra
    100 90

    Item Code: #KGP-9238

    Availability: In stock

    ये कहानियां बच्चों के लिए भी हैं और किशोरांे के लिए भी। अपनी जीवन-यात्रा में आए हुए कुछ मार्मिक प्रसंगों से मेंने ये कहानियां रची हैं। सभी के पात्र मनुष्य हैं। हां, दो कहानियां ऐसी हैं, जो शुद्ध काल्पनिक हैं और जिनके पात्र पशु हैं। मैंने चाहा है कि इन कहानियों से बच्चों का मनोरंजन तो हो ही, वे अपने वय की कुछ समस्याओं से रूबरू हों और उन्हें अच्छे जीवन-व्यवहार की सीख मिले।
    —रामदरश मिश्र
  • Jansampark : Avadharana Evam Badalata Svaroop
    Kri. Shi. Mehta
    250 225

    Item Code: #KGP-297

    Availability: In stock

    जनसंपर्क, जनसंचार का एक ऐसा घटक है जो एक ओर तो जनसंचार को जीवंत रखता है, वहीं दूसरी ओर उसके प्रभाव अथवा परिणाम के संबंध में विषय विशेषज्ञ भी कोई निश्चित दावा नहीं कर सकते। उसके इस अनिश्चित चरित्र का प्रमुख कारण जनसंपर्क के भागीदार त्रिमूर्ति के बीच विचित्र संगम, समन्वय एवं संप्रेक्षण के अभाव में निहित है। जनसंपर्क वह सूत्र है जो इस त्रिमूर्ति-यानी संदेश, माध्यम तथा हितग्राही को सक्रिय करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह करता है। आज तक किसी ऐसे नियम या मंत्र की खोज नहीं हो पाई है जो जनसंपर्क के प्रभाव ओर उसके परिणाम की सफलता अथवा असफलता का पूर्वानुमान लगा सके।
    जनसंपर्क निरंतर प्रवाहित होने वाली ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर उस देश की भौगोलिक संरचना, ऐतिहासिक परंपरा, संस्कृति, स्थानीय बोलियां एवं भाषा, सामाजिक एवं धार्मिक आचार-विचार, स्थानीय मान्यताओं इत्यादि अनेक बातों तथा घटनाओं का प्रभाव उस परिवेश की त्रिमूर्ति पर निरंतर प्रतिबिंबित होता रहता है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से यह जनसंपर्क के अनिश्चित चरित्र के कारण हो सकते हैं।
    आज एक ओर मीडिया के आधुनिक उपकरणों ने अनायास ही जनसंपर्क के सर्वथा नए द्वार खोल दिए हैं और भविष्य में भी ऐसे अनेक द्वार खुलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, वहीं दूसरी ओर भारत की तेजी से बढ़ती हुई आर्थिक एवं औद्योगिक प्रगति के साथ शैक्षणिक विकास ने हितग्राहियों की रुचि, सामाजिक जीवन एवं संस्कृति के क्षेत्र में उथल-पुथल मचा रखी है।
  • Naamdev Rachanavali (Paperback)
    Govind Rajnish
    90

    Item Code: #KGP-1493

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • Malviya Ji Ke Sapnon Ka Bharat
    Ishwar Prasad Verma
    395 356

    Item Code: #KGP-612

    Availability: In stock

    मैं मनुष्यता का पुजारी हूं। मनष्यत्व के आगे मैं जात-पांत नहीं जानता। कानपुर में जो दंगा हुआ, उसके लिए हिंदू या मुसलमान इनमें से एक ही जाति जवाबदेह नहीं है। जवाबदेही दोनोंजातियों पर समान है। मेरा आपसे आग्रहपूर्वक कहना है कि ऐसी प्रतिज्ञा कीजिए, अब भविष्य में अपने भाइयों से ऐसा युद्ध नहीं करेंगे, वृद्ध, बालक और स्त्रियों पर हाथ नहीं छोड़ेंगे। मंदिर अथवा मस्जिद नष्ट करने से धर्म की श्रेष्ठता नहीं बढ़ती। ऐसे दुष्कर्मों से परमेश्वर प्रसन्न नहीं होता। आज आप लोगों ने आपस में लड़कर जो अत्याचार किए हैं, उसका जवाब आपको ईश्वर के सामने देना होगा। हिंदू और मुसलमान इन दोनों में जब तक प्रेम-भाव नहीं उत्पन्न होगा, तब तक किसी का भी कल्याण नहीं होगा। एक-दूसरे के अपराध भूल जाइए और एक-दूसरे को क्षमा कीजिए। एक-दूसरे के प्रति सद्भाव और विश्वास बढ़ाइए। गरीबों की सेवा कीजिए, उनको प्रेम से आलिंगन कीजिए और अपने कृत्यों का पश्चात्ताप कीजिए। 
  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand (Paperback)
    Shanta Kumar
    180

    Item Code: #KGP-399

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापकविवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Ek Sur Mera-Ek Saarangi Ka
    Pandit Ram Narayan
    195 176

    Item Code: #KGP-2069

    Availability: In stock

    एक सुर मेरा-एक सारंगी का
    पंडित रामनारायण ऐसे पहले कलाकार हैं, जिनके माध्यम से सारंगी वाद्य का पुनर्जन्म हुआ, इस वाद्य को लंबे समय से खोई हुई अपनी सांस्कृतिक पहचान मिली ।
    सारंगी वाद्य को लेकर यदि इस महापुरुष की सही में किसी से तुलना की जा सकती है तो पाश्चात्य संगीत के महान् वॉयलिनवदक पागानीनी, जिन्होंने वॉयलिन की वादनशेली में आमूलचूल परिवर्तन कर नये सिरे से वादनशैली को स्थापित किया । दूसरे महान संगीतज्ञ रेस्ट्रो पस्वीज और तीसरे यहूदी मेनुहिन जैसे महारथी संगीतज्ञों से ही उनकी तुलना की जा सकती है । 
     यदि धनुर्वाद्य के इस महापंडित एवं आचार्य के बारे में  संक्षेप से कुछ कहा जाए तो उनकें वाद्य से जिस तरह की ध्वनि  (साउंड) संचारित हुई, वैसी आज तक किसी अन्य वादक के वाद्य में नहीं सुनी गई । गज के संचालन को लेकर सार्थक अनुसंधान करते हुए पंडित जी ने जो तकनीक विकसित की वो किसी अन्य वादक की क्षमता और कल्पना से बाहर की बात सिद्ध हुई । फिर आलाप की बात करें तो पंडित जी ने अपनी अद्भुत सोच से इसमें एक-एक स्वर का प्रयोग समझदारी के साथ करते हुए संपूर्ण आलाप में लय का समावेश करते हुए उसे नए ढंग से परिभाषित किया और विलक्षण जोड़ की परिकल्पना सारंगी जैसे वाद्य से साकार किया । पंडित जी ने जिस राग को छुआ, उसकी शुद्धता को कायम रखते हुए उसे नए आयाम दिए। इसके अतिरिक्त विलंबित 'गत' अथवा रचनाओं को बजाने का उन्होंने अपना अलग कौशल और इन रचनाओं से बजने वाले एक-एक 'बोल' का लय में कुशलता के साथ गुँथा होना, तानों की विविधता और उनमें विलक्षण द्रुतगति, जो आज तक न देखी, न सुनी गई और इस सब पर आत्मा को छू जाने वाले स्वरों जैसी कुछ चंद विशेषताओं ने उन्हें इस वाद्य का आचार्य एवं महापंडित बना दिया ।
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Nagar
    Vishnu Nagar
    150 135

    Item Code: #KGP-1872

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: विष्णु नागर
    कविता की दुनिया में तीन दशक से भी अधिक सक्रिय विष्णु नागर की प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में आपको उनकी कविताओं में समय के साथ आता बदलाव तो दिखाई देगा ही, यह भी दिखाई देगा कि वह सिर्फ व्यंग्य और विडंबना के कवि नहीं हैं। उनकी कविता में जीवन के अनेक पक्ष हैं, क्योंकि वह जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने का प्रयास करते हैं। वह अपने समय की राजनीति और समाज की विडंबनाओं को भी देखते हैं और जीवन के विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली करुणा, प्रेम, हताशा, विनोद को भी। उनके यहाँ जीवन की आपाधापी में लगे लोगों पर भी कविता है और अपने प्रिय की मृत्यु की एकांतिक वेदना को सहते लोगों पर भी। उनकी कविता से गुजरना छोटी कविता की ताकत से भी गुजरना है जो अपनी पीढ़ी में सबसे ज्यादा उन्होंने लिखी है। उनकी कविता से गुजरना कविता की सहजता को फिर से हासिल करना है। उनकी कविता से गुजरना व्यंग्य और करुणा की ताकत से गुजरना है। उनकी कविता से गुजरना अपने समय की राजनीति से साहसपूर्ण साक्षात्कार करना है। उनकी कविता से गुजरना विभिन्न शिल्पों, अनुभवों, संरचनाओं से गुजरना है और इस अहसास से गुजरना है कि विष्णु नागर सचमुच अपनी तरह के अलग कवि हैं। उनकी कविता को पढ़कर यह नहीं लगता कि यह किसी के अनुकरण या छाया में लिखी गई कविता है। यह मुक्ति के स्वप्न की कविता है, संसार के बदलने की आकांक्षा की कविता है। यह इतनी स्वाभाविक कविता है, जितनी कि हिंदी हमारे लिए है।
  • Bhartiya Sahitya Par Ramayan Ka Prabhav
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    275 248

    Item Code: #KGP-595

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य पर रामायण का प्रभाव
    रामकथा से संबद्ध काव्य-रचना की एक सुदीर्घ परंपरा है, जिसका उद्गम वैदिक वाङ्मय से माना जाता है। लौकिक संस्कृत में इस परंपरा का विधिवत् सूत्रपात आदिकवि वाल्मीकि से हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने रामकथा को जो व्यवस्था, उदात्तता, महनीयता और कालजयिता प्रदान की उसके लिए साहित्य जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। विश्व मानचित्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को रामकथा ने अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। भारत के अतिरिक्त आज भी मिस्र और रोम से लेकर वियतनाम, मंगोलिया, इग्नेशिया तक रामकथा की अमिट छाप देखी जा सकती है। भारत और भारतीय मूल के लोगों के लिए रामकथा शक्तिशाली सांस्कृतिक आधार है। भारतीय भाषाओं में रामकथा का स्वरूप अनेक रूपों में विद्यमान है जो भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता को सिद्ध करता है।
    रामकथा की नित्य-प्रवाही पुण्यसलिला की अजस्र धारा अनादि काल से भारतीय मनीषा को सम्मोहित और भारतीय जीवन को संस्कारित करती रही है।
    रामकथा के सार्वदेशिक स्वरूप को विभिन्न भारतीय भाषाओं में जांचना-परखना ही इस उपक्रम का अभीष्ट है।
    विश्वास है कि रामकथा और रामकथा से संबद्ध साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए इसमें प्रचुर सामग्री मिल सकेगी।
  • Anuvadvigyan (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    150

    Item Code: #KGP-174

    Availability: In stock

    अनुवादविज्ञान
    अनुवाद को उसके पूरे परिप्रेक्ष्य में लें तो वह मूलतः अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है। साथ ही अनुवाद करने में व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से भी हमें बड़ी सहायता मिलती है। इस तरह अनुवाद भाषाविज्ञान से बहुत अधिक संबद्ध है।...
    जहाँ तक अनुवाद का प्रश्न है, विद्यार्थी-जीवन में पाठ्यक्रमीय अनुवाद की बात छोड़ दें तो सबसे पहले अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘नेहरू अभिनंदन ग्रंथ’ में मुझे अनुवाद करने का अवसर मिला। उसी समय कुछ भाषा-संबंधी लेखों के मैंने अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किए। ‘गुलनार और नज़ल’ नाम से एक अंग्रेज़ी पुस्तक का संक्षिप्तानुवाद 1952 में पुस्तकाकार भी छपा था। 1962-64 में रूस में अपने प्रवास-काल में कुछ उज़्बेक, रूसी तथा इस्तोनियन कविताओं का भी मैंने हिंदी-अनुवाद किया था। ताशकंद रेडियो में 1962 में मेरे सहयोग से हिंदी विभाग खुला था। वहाँ प्रतिदिन आध घंटे के कार्यक्रम के लिए रूसी, उज़्बेक, अंग्रेज़ी आदि से हिंदी में अनुवाद किया जाता था, जिसका पुनरीक्षण मुझे करना पड़ता था। 1968 में भारतीय अनुवाद परिषद् ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका ‘अनुवाद’ के संपादन का भार मुझे सौंपा और समयाभाव के कारण, न चाहते हुए भी, कई मित्रों के आग्रह से मुझे यह दायित्व लेना पड़ा।
    प्रस्तुत पुस्तक की सामग्री के लेखन का प्रारंभ मूलतः ‘अनुवाद’ पत्रिका का सिद्धांत विशेषांक निकालने के लिए कुछ लेखों के रूप में हुआ था। विशेषांक के लिए कहीं और से अपेक्षित सामग्री न मिलने पर धीरे-धीरे मुझे अपनी सामग्री बढ़ानी पड़ी, किंतु अंत में सामग्री इतनी हो गई कि विशेषांक में पूरी न जा सकी। वह पूरी सामग्री कुछ अतिरिक्त लेखों के साथ प्रस्तुत पुस्तक के रूप में प्रकाशित की जा रही है।        
    --भोलानाथ तिवारी
  • The Growing Years (Self-Help) (Paperback)
    Ann Delorme
    195

    Item Code: #KGP-340

    Availability: In stock

    The Growing Years is a novel that deals with the life of a mother living in the shadow of death and, also the painful, exploratory years of adolescent children. It delves with a touch of humour into the complex psychology of children and adults as they age towards maturity and death, unwilling participants.
    The novel also traverses the depths of an Anglo Indian culture left behind by the colonials who quit India. A culture that has been nurtured and blossoms in the gardens of a hybrid race that still closet themselves in the bungalows of their minds.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghava (Paperback)
    Rangey Raghav
    140

    Item Code: #KGP-461

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रांगेय राघव 
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रांगेय राघव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'पंच परमेश्वर', 'नारी का विक्षोभ', 'देवदासी', 'तबेले का धुँधलका', 'ऊँट की करवट', 'भय', 'जाति और पेशा, 'गदल', 'बिल और दाना' तथा 'कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेकनीक्स'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रांगेय राघव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Nibandhkar Hazari Prasad Diwvedi
    Usha Singhal
    60 54

    Item Code: #KGP-1468

    Availability: In stock

    निबंधकार हजारीप्रसाद द्विवेदी
    शैली विज्ञान के संदर्भ में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध-साहित्य पर अभी तक कोई निरुपाधि या सोपाधि शोधकार्य संभवत: नहीं हुआ है । अत: शैली विज्ञान की दृष्टि से आचार्य द्विवेदी के निबंधों के सम्यक विश्लेषण का यह पहला प्रयास है ।
    शैलीवैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र में किसी कृति के सम्यक विश्लेषण के लिए, आज नानाविध प्रतिमान प्रचलित हैं, जिनमें 'चयन-प्रतिमान' को सभी प्रतिमानों का मूलाधार माना जाता है । प्रस्तुत अध्ययन इसी प्रतिमान को आधार बनाकर किया गया है ।
    आचार्य द्विवेदी ने अपने निबन्धों में किस प्रकार ध्वनि, शब्द, वाक्य, तथा विभिन्न व्याकरणिक कोटियों के सार्थक चयन से कथ्य का चयन किया है, इस पर भी विदुषी आलोचिका डा० उषा सिंहल ने अपनी विश्लेषणपरक दृष्टि केंद्रिय रखी है ।
    यह अध्ययन विद्वत् समाज के लिए आचार्य द्विवेदी के साहित्य के अध्ययन की नई दिशाएँ प्रशस्त करेगा ।
  • Bhakt Soordas
    Chandrika Prasad Sharma
    190 171

    Item Code: #KGP-140

    Availability: In stock


  • Kammi Or Nanda
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-7836

    Availability: In stock

    कम्मी और नन्दा
    नन्दा यूनिवर्सिटी की बाहरी दीवार के पास
    पहुँची ही थी कि उसने देखा कि दीवार
    के साथ  ढासना लगाकर खडी हुई एक
    औरत ने पैसे मांगने के लिए अपना हाथ
    आगे किया हुआ है—
    वह हाथ नन्दा की तरफ बढ़ता हुआ
    नन्दा की कमीज़ से छू गया... 
    नन्दा ने उस माँगने वाली औरत की तरफ
    देखा—उस औरत का चेहरा उजड़ा
    हुआ था, बाल खुश्क और माथे
    पर बिखरे हुए थे, सिर पर
    एक लीर-सा दुपट्टा थाµपर
    आँखों में एक अजीब सी चमक
    और हसरत थी-नक्श रुले हुए थे,
    बुरे नहीं थे—वह हाथ के नन्दा के
    आगे पसारकर-एकटक नन्दा के
    मुँह को देखे जा रही थी…
    नन्दा उकताई-सी तेज कदमों से घर
    जाने वाली बस क्रो तरफ़ चल दी ।
    लेकिन बस के पायदान पर
    एक पॉव रखा ही था कि
    अचानक नन्दा को खयाल आया—
    'कौन जाने यह माँगने वाली
    औरत ही मेरी माँ हो...'
    -नन्दा का एक सपना
  • Manu Ko Banaati Manaii (Paperback)
    Gyanendrapati
    160

    Item Code: #KGP-415

    Availability: In stock


  • Keral Ka Krantikari
    Vishnu Prabhakar
    120 108

    Item Code: #KGP-1195

    Availability: In stock


  • Main Jasdev Singh Bol Raha Hoon
    Jasdev Singh
    480 432

    Item Code: #KGP-40

    Availability: In stock


  • Apna Raag
    Pushpa Mehra
    140 126

    Item Code: #KGP-176

    Availability: In stock

    अपना राग
    जिस युग में सब अपना-अपना राग आलापना चाह रहे हों, श्रीमती पुष्पा मेहरा का ‘अपना राग’ जितना उनका, उतना ही मेरा-आपका, बल्कि हम सबका राग है। उसके इस लक्षण की ओर आपका ध्यान अवश्य जाएगा कि भले ही वह रग-रग में समाया प्रतीत न हो, पर वह घुन की तरह भीतर पैठा रोग कदापि नहीं। 
    पुष्पा मेहरा ने हिंदी कविता के समसामयिक मुहावरे को अपनाने या आधुनिकता की होड़ में शामिल होने की जगह अपने आसपास की दुनिया को ऐसी सीधी, सरल शैली में चित्रित किया है कि उनकी अनुभूति सहृदय पाठक को अपनी वह अनुभूति मालूम होगी, जिसे हम-आप व्यस्तता या लापरवाही के कारण भले लिपिबद्ध न कर पाएँ, किंतु पुष्पा मेहरा ने सँजोकर हमारे लिए सुलभ कर दिया है। यह कुछ-कुछ वैसा है, जैसे तड़क- भड़क-भरे माहौल में किसी का बिलकुल सीधे-सादे परिधान में प्रकट हो, कइयों को इस पछतावे से भर देना कि वे नाहक ही इतना सजे-सँवरे।
    वैसे तो कविता के बहुतेरे प्रयोजन होते हैं–उनमें से एक यह भी कि वह जहाँ उपजे, उससे कहीं अन्यत्र उसकी शोभा झलके। आशा करनी चाहिए कि पुष्पा मेहरा की कविताएँ अंधी दीवार से टकराकर लौट आने वाली बंद कविताएँ होने के बजाय विभिन्न हृदयों में खुलने-खिलने वाली कविताएँ सिद्ध होंगी।
  • Dr. Ambedkar : Chintan Aur Vichaar
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    250 225

    Item Code: #KGP-1922

    Availability: In stock

    डॉ० अम्बेडकर : चिंतन और विचार
    प्रवंचित, दलित, विसंगठित, शोषित और पीडित जन-जन के जननायक निर्वासित और बहिष्कृत जनता के प्रणधन  महामहिम डॉ. अम्बेडकर की वैचारिक भूमिका ज्ञान-विज्ञान की अन्तश्वेतना और जीवन-व्यवहार की नैसर्गिक पृष्ठभूमि एक ऐसे दिव्य अध्याय का प्रारंभ है, जिससे सर्त्स समाज में नवजीवन का संचार हुआ और जिससे जीवन-धर्म की पृनर्स्थापना संभव हो सकी ।
    डॉ० अम्बेडकर की चिंतन पृष्ठभूमि सत्याहिंसा पर आधृत थी, और लोकतांत्रिक इयत्ताओँ एवं मर्यादाओं की संपोषक थी । यथार्थत: डॉ० अम्बेडकर एक ऐसी वैचारिक संस्था के रूप में सामने जाए जिससे लोकतंत्र की सहज प्रवृत्तियों की विविध धाराएं प्रस्फुटित होकर विकसित होती है और एक प्राणवान् तथा उदात्त समाज की संस्थापना करती हुई मांगलिक धर्म, अर्थ व काम नीति की त्रिवेणी के रूप में निर्बाध प्रवाहित होती हैं । इस ग्रंथ में इन्हीं मूल्यवान और सहजीवनीय अंतर्वत्तियों के संयोजन का दिशा-निर्देश प्राप्त करने का एक मिला-जुला प्रयास है जो महात्मा बुद्ध से डॉ० अम्बेडकर तक एक अबाध ज्योति-धारा के रूप में सहज सामने आया है ।
  • Vaya Pandepur Chauraha
    A.M. Nayar
    350 315

    Item Code: #KGP-249

    Availability: In stock

    डा. नीरजा माधव हिंदी कथा-साहित्य का एक जाना- पहचाना नाम है। अनेक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों तथा छोटी कक्षाओं में भी उनकी कहानियां, कविताएं और उपन्यास पढ़ाए जा रहे हैं। नित नई और अनछुई भूमि पर अपना कथानक रचने वाली डा. नीरजा माधव ‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’ के माध्यम से ‘इम्पोटेंट इन्टेलीजेंसिया’ का एक भीतरी चेहरा बेनकाब करती हैं। किस तरह आज का बुद्धिजीवी मुखौटा लगाए सामाजिक सरोकारों की बात करता है, किस प्रकार शस्त्र बने शब्दों का मुंह स्वयं अपनी ओर घूम जाता है और हम तिलमिला उठते हैं अपना ही असली चेहरा देख। मानव मन की कृत्रिमता और विवशता को परत दर परत उधेड़ने वाली अलग ढंग की कहानियों का अनूठा संग्रह है--‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’।
  • Vichardhara Naye Vimarsh Aur Samkaleen Kavita
    Jitendra Shrivastva
    500 450

    Item Code: #KGP-831

    Availability: In stock

    विचारधरा, नए विमर्श और समकालीन कविता
    इन दिनों भारतीय समाज अनेक संकटों से जूझ रहा है। आज समाज, राजनीति, साहित्य और नैतिकता को परिभाषित करने के लिए नवाचार की गंभीर जरूरत है। ऐसे में जितेन्द्र श्रीवास्तव का आलोचना-कर्म उफधर्वता और मूलगतता, दोनों ही स्तरों पर समकालीन प्रश्नों से सक्रिय व उफर्जस्वित मुठभेड़ करता है और वास्तविकता में इस कार्य की परिणति साहित्य की इयत्ता खोजने में होती है। संक्रमण के इस भयावह युग में जितेन्द्र अपने आलोचना-कर्म के माध्यम से उफधर्वता में कवियों के मूल्यांकन के साथ नई विचारधाराओं और विमर्शों के अंतर्द्वद्वों को चिन्हित करते हैं, तो दूसरी ओर अपनी मूलगामिता में साहित्य को नए मूल्यों और मौजूदा संकटों की धार पर परिभाषित भी करते हैं।
    कभी संकट और संशय के वक्त में निराला से लेकर मुक्तिबोध तक और विजयदेवनारायण साही से लेकर अस्सी के दशक तक हमारी भाषा के महत्त्वपूर्ण कवियों ने आलोचना-कर्म के लिए कलम उठाई थी। जितेन्द्र श्रीवास्तव का आलोचना-कर्म इसी परंपरा का विस्तार है। जितेन्द्र की आलोचना एक अच्छी कविता की तरह आत्मा की त्वचा का स्पर्श करती है। उसमें विद्वत्ता के प्रदर्शन की कहीं कोई अभिलाषा नहीं है। कह सकते हैं कि सृजन- विरोधी समय में यह सृजनधर्मी आलोचना का प्राणवान और विनम्र उदाहरण है। जितेन्द्र अपनी आलोचना में ‘रचना की अद्वितीयता’ का संधन करते हैं। वे ऊपर- झापर करके आगे बढ़ जाने वाले आलोचकों में नहीं हैं। रचना का गहन उत्खनन उनका अभीष्ट है।
    यहां यह कहने में कोई दुविध नहीं है कि यह पुस्तक काव्यालोचना के क्षेत्र में छाए हुए सन्नाटे को भंग करते हुए एक बड़ी कमी को पूरा करती है।
  • Meri Ekyavan Kavitayen (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    90

    Item Code: #KGP-1026

    Availability: In stock


  • Mahan Deshbhakt Swami Shraddhanand
    Jagat Ram Arya
    140 126

    Item Code: #KGP-9111

    Availability: In stock

    महान् देशभक्त स्वामी श्रद्धानन्द
    धर्मवीर, कर्मवीर, निर्भीक संन्यासी, जिनके नाम से अंग्रेज सरकार भी डरती थी, जिनको महात्मा गांधी ने अपना गुरु माना, उन्हीं स्वामी श्रद्धानन्द जी  के बारे में आज तकभारतीय जनता यही समझनी रही है कि वे आर्य संन्यासी थे— उन्होंने केवल आर्यसमाज का ही प्रचार किया, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है । स्वामी श्रद्धानन्द जी ने आर्यसमाज के प्रचार के साथ-साथ देश की एकता के लिए, देश को विदेशी सरकार की गुलामी से आजाद कराने के लिए, साम्प्रदायिकना का बीज नाश काने के लिए, देज्ञा का गौरव बढाने के लिए जो महान कार्य किए उसी के फलस्वरूप आज भारत स्वतंत्र  है। प्रस्तुत जीवनी में स्वामी जी  के राष्ट्रीय जीवन पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है ।

  • Pyar Botsavana Kee Baarish Jaisa Hey (African Stories)
    Urmila Jain
    350 315

    Item Code: #KGP-9028

    Availability: In stock

    ‘प्यार बोत्सवाना की बारिश जैसा है’ अत्यंत संवेदनशील अफ्रीकी कहानियों का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद और संपादन उर्मिला जैन ने किया है। वे देशी और विदेशी साहित्य की मर्मज्ञ हैं। पाठक के रूप में जिन रचनाओं ने उनके हृदय को छुआ उन्हें व्यापक पाठक वर्ग के लिए वे इस संकलन में प्रस्तुत कर रही हैं। अनूदित रचनाओं की लोकप्रियता के बावजूद हिंदी में अफ्रीकी कहानियां बहुत कम उपलब्ध हैं। विश्व का यह भाग अपनी संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए रेखांकित किया जाता है। केन्या, गांबिया, गिनी, नाइज़ीरिया, सेनेगल, बोत्सवाना आदि की रचनाशीलता से उर्मिला जैन ने बारह कहानियां चुनी हैं।
    ये कहानियां बताती हैं कि भाषा, देश, पहनावा, आचार, परंपरा आदि की भिन्नताओं के बाद भी मूलभूत समस्याएं और संवेदनाएं तो एक जैसी हैं। अभाव, उपेक्षा, गुलामी, अपमान, निराशा से हर जगह मनुष्य जूझ रहा है। व्यक्ति के भीतर छिपे पाखंड भी हर स्थान पर लगभग समान हैं। संकलन की शीर्षक कहानी के वाक्य हैं, ‘मैंने अपनी पोशाक सावधानी से चुनी थी। अपने भय को सम्मानित रूप में ढका था।’ अनुवाद करते समय उर्मिला जैन ने मूल भाषा के प्रवाह और आशय को भली-भांति संप्रेषित किया है। ‘काली लड़की’ कहानी की डिऔआना का संताप इन पंक्तियों में प्रकट हुआ है, ‘उस रात उसने अपना सूटकेस खोला। उसके अंदर की चीजों को देखा और रोई। किसी ने परवाह नहीं की। फिर भी वह उसी प्रवाह में बहती रही और दूसरों से वैसे ही दूर रही जैसे उसके गांव कासामांस में समुद्र किनारे घोंघे पड़े रहते हैं।’
    अपनी प्रखर कथाभूमि और मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण ये कहानियां पाठकों को खूब अच्छी लगेंगी। ऐसा लगेगा जैसे वे अपने ही समाज या देश का वृत्तांत पढ़ रहे हैं। ये रचनाएं विचार और संवेदना के वैश्विक सूत्र प्रदान करती हैं।
  • The Story Of My Experiments With Truth (Paperback)
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    199

    Item Code: #KGP-349

    Availability: In stock

    A face we see all around us… everyday, even if we do not visit government offices. Teachings people swear by and entertained to in films. We still see his style being imitated in the political circles—that is Mohandas Karamchand Gandhi. One of the influencers of the millennium, the ‘half naked’ Indian man who shook the mightiest empire of the modern world, has a story to tell—his story. 
    An autobiography of Gandhi, the book starts with his birth, and ends with his experiences till 1921. The original manuscript was written in weekly installments in Gujarati by Gandhi, and was published weekly in his journal Navjivan from 1925 to 1929. It was later translated by Mahadev Desai in English, which too was published in installments in his other journal Young India.
    Unlike most autobiographies or biographies, Gandhi’s autobiography speaks about his fears, regrets, failures, struggles, and all that went through his mind while initiating and going through the experiments he conducted, in his and his immediate family’s lives. Gandhi hides nothing from his readers; he wants his experiences and experiments to reach out to people so that their life becomes worth living.
    Gandhi, through his lucid and simple style of writing, honest opinions, and candid narrations, takes us to the man who was ‘mahatma’ in his thoughts and actions.    
  • Gehoon Ghar Aaya Hai
    Divik Ramesh
    175 158

    Item Code: #KGP-1893

    Availability: In stock

    गेहूँ घर आया है
    ‘रास्ते के बीच’ से चर्चित हो जाने वाले आज के सुप्रतिष्ठित हिंदी कवि दिविक रमेश बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। 38 वर्ष की आयु में ही ‘रास्ते के बीच’ और ‘खुली आँखों में आकाश’ कविता-संग्रहों पर सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिलना उनकी कविताओं की महत्ता को रेखांकित करता है। उनकी अब तक की कविता-यात्रा को इस संग्रह में हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ वरिष्ठ कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी ने अपनी रुचि के अनुसार चुनिंदा ढंग से प्रस्तुत किया है। निःसंदेह इससे पाठकों का एक बड़ा हित सधेगा।
    युवा कवि हेमंत कुकरेती की धारणा है कि दिविक रमेश की "कविताओं में हम जिंदगी से प्यार करने वाले मन को महसूस कर सकते हैं। वह सुख-दुःख से रची ज़िंदगी में डूबकर ही जीवन का वास्तविक अर्थ हासिल करता है। इसीलिए उसका संबोधन सीधे पृथ्वी, काल, हवा, रात, धूप और अंततः जीवन से है। आसानी से समझ में आने वाली ये कविताएँ किताबी अनुभववाद का भाषानुवाद नहीं हैं। सरलीकरण से बचते हुए दिविक रमेश जीवन की जटिलताओं को आसानी से कह देते हैं और उनका इतना सहज और स्वाभाविक होकर कहने में सफल होना कई बार हैरत में डालता है...।" (‘इंडिया टुडे’, 10 जनवरी, 2001)
    और ‘छोटा-सा हस्तक्षेप’ की कविताओं पर बोलते हुए प्रोफेसर नामवर सिंह ने कहा--इस संग्रह को पढ़कर उन्हें प्रीतिकर आश्चर्य हुआ। कवि दिविक रमेश ने बहुत लंबी छलाँग लगा दी है। कविताओं में कई तरह की आवाजें हैं। जो कविताएँ लिखी जा रही हैं, ये कविताएँ उनसे हटकर हैं। दिविक रमेश ने कविता की एक नई आवाज़ विकसित कर दी है। अशोक वाजपेयी और विष्णु खरे जैसे रचनाकारों ने इन कविताओं को सराहा है। ‘यात्रांत’ एक अद्भुत कविता है। रूस पर बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन रूस के अनुभव पर लिखी गई कविता बहुत ही बारीक है। हिंदी में पहली बार ऐसी कविता संभव हुई है। हिंदी में ‘भूत’ जैसी कविता नहीं है। फैंटेसी की बहुत बात की जाती है, लेकिन फैंटेसी यहाँ देखिए। यह एकमात्रा ऐसा संग्रह है, जिसमें एक साथ दर्जन से ऊपर उत्कृष्ट कविताएँ हैं।   
  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7210

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Mahayaatra Gaatha (3 & 4 Part)
    Rangey Raghav
    750 675

    Item Code: #KGP-2055

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)
    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Hi ! Handsome (Paperback)
    Jaivardhan
    50

    Item Code: #KGP-7056

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 
  • Sant Meeranbai Aur Unki Padaavali
    Baldev Vanshi
    200 180

    Item Code: #KGP-168

    Availability: In stock

    संत मीराँबाई और उनकी पदावली
    मीराँबाई  की गति अपने मूल की ओर है । बीज-भाव की ओर है । भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तित्व को, मूल को अर्जित किया है। आत्मिक, परम आत्त्मिक उत्स (कृष्ण) से जुड़कर जीवन को उत्सव बनाने में वह धन्य हुई । अस्तित्व की गति, लय, छंद को उसने निर्बंध के मंच पर गाया है। जीया है ।
    मीराँ उफनती आवेगी बरसाती नदी की भाँति वर्जनाओं की चटूटानें  राह बनाती अपने गंतव्य की ओर बे-रोक बढती चली गई । वर्जनाओं के टूटने की झंकार से मीराँ की कविता अपना श्रृंगार करती है। मीराँ हर स्तर पर लगातार वर्जनाओं को क्रम-क्रम तोड़ती चली गई । राजदरबार की, रनिवास की, सामंती मूल्यों की, पुरुष-प्रधान ममाज द्वारा थोपे गए नियमों की कितनी ही वर्जनाओं की श्रृंखलाएँ मीराँ ने तोड़ फेंकीं और मुक्त हो गई । इतना ही नहीं, तत्कालीन धर्म-संप्रदाय की वर्जनाओं को भी अस्वीकार कर दिया । तभी मीराँ, मीराँ बनी ।
  • Himalaya Gaatha-1 (Dev Parampara)
    Sudarshan Vashishath
    450 405

    Item Code: #KGP-166

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-1 (देव परंपरा)
    महापंडित राहुल सांकृत्यायन के बाद संस्कृति पर लेखन और यात्रा-वृत्तांत जैसे साहित्य की धीरे-धीरे कमी होती गई । बहुत ही कम ऐसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने आसपास की संस्कृति पर कलम चलाई । ऐसे बिरले साहित्यकारों में सुदर्शन वशिष्ठ एक ऐसा नाम है, जिसने सशक्त कथाकार और कवि होने के साथ-साथ संस्कृति-लेखन में भी बराबर पैठ बनाए रखी। आठवें दशक के आरंभ से लेकर इनके सांस्कृतिक लेख सामने आते रहे । 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी', 'संस्कृति', 'योजना' जैसी पत्रिकाओं तथा सभी समाचार-पत्रों के सांस्कृतिक पृष्ठों में ये बराबर लिखते रहे। कुल्लू के मलाणा गणतंत्र को यही सबसे पहले सामने लाए । 'धर्मयुग' के फागुन अंक में 'फागुन में मलाणा' लेख छपा ।
    ‘आँखिन देखी' और उसका कथात्मक शैली में वर्णन वशिष्ठ के संस्कृति-लेखन की विशिष्टता रही है । पढ़ते हुए ऐसा लगता है, आप यह उत्सव स्वयं देख रहे हैं । सरल और स्पष्ट भाषा से रोचकता के साथ संस्कृति के गंभीर पहलुओं का विश्लेषण, उनकी वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।  संस्कृति का कोई ऐसा पहलू अछूता नहीं रहा है, जिस पर वशिष्ठ ने लेखनी न चलाई हो। इतिहास और परंपरा, धर्म और संस्कृति, मंदिर और पुरातत्त्व, मेले और उत्सव, लोक-परंपरा और लोक-वार्ता कोई पक्ष ऐसा नहीं है, जो अछूता रहा हो । लेखक की यायावर प्रवृत्ति ने हिमाचल के दूरस्थ क्षेत्रों की यात्राएँ की ।
    यदि इनके अभी तक प्रकाशित हजारों लेखों और दर्जनों पुस्तकों को देखा जाए तो इन्हें दूसरा राहुल कहा जा सकता है । राहुल जी ने बहुत जगह पूरे के पूरे गजेटियर उतार डाले । वशिष्ठ ने ऐसा नहीं किया । इन्होंने संस्कृति को बहुत करीब से देखा । जो देखा, वह लिखा । संस्कृति को निष्पक्ष नजरिए से देखा, परखा, समझा है और फिर लेखनीबद्ध किया है । आशा है, यह संस्कृति श्रृंखला पाठकों, शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Sant Kabir
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-135

    Availability: In stock

    कबीरदास की वाणी वह लता है, जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पडने से अंकुरित हुई थी । उन दिनों उत्तर के हठयोगियों और दक्षिण के भक्तों में मौलिक अंतर था । एक टूट जाता था, पर झुकता न था; दूसरा झुक जाता, पर टूटता न था । एक के लिए समाज की ऊँच- नीच की भावना मजाक और आक्रमण का विषय थी, दूसरे के लिए मर्यादा और स्फूर्ति की । और फिर भी विरोधाभास यह कि एक जहाँ सामाजिक विषमताओं को अध्याय समझकर भी व्यक्ति को सबके ऊपर रखता था, वहाँ दूसरा सामाजिक उच्चता का अधिकारी होकर भी अपने को तृण से भी गया-गुजरा समझता था । ...एक के लिए पिंड ही ब्रह्माण्ड था तो  दूसरे के लिए समस्त ब्रह्माण्ड भी पिंड । एक का भरोसा अपने पर था, दूसरे का राम पर; एक प्रेम को दुर्बल समझता था, दूसरा ज्ञान को कठोर—एक योगी था, दूसरा भक्त ।
    -आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    120

    Item Code: #KGP-7108

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • The Change Maker (Paperback)
    Subhash Chandra Agrawal
    325

    Item Code: #KGP-327

    Availability: In stock

    A New Smart Democratic Venture
    To Mahatma Gandhi goes the credit of starting Non-Violent political movements; to Justice Bhagwati goes the credit of starting Public Interest Litigation, and now comes Subhash Agrawal who brings about changes by writing letters—a very unusual method which has resulted in significant successes in various areas, apart from winning him awards.
    Here is a method which can be followed and used by others, and perhaps a regular movement can be organized for better results. We present the first ever study of this new smart democratic venture.

    A Few of positive responses on Subhash's RTI Petitions:
    Wealth-declaration by judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Foreign trips of Judges: Restrictions now imposed by Union Government.
    - Immunity against retired judges: CBI and Income Tax authorities initiate enquiries.
    - Cases against retired judges: CBI and Income Tax authorities initiate enquiries.
    - Conduct-code for judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Disciplinary Authority for Judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Twisting RTI Act by rules framed by Delhi High Court: RTI rules at Delhi High Court get revised.
    - File-notings: Accepted by DoPT being under purview of RTI Act.
    - Wealth-declaration by Union Ministers: Disclosed by Rajya Sabha Secretariat.
    - Padma panel ignoring Olympics heroes: Authorities accept big lapse.
    - Not following deadline for Padma-awards nominations: 20th November now being strictly followed.
    - Flouting norms for issuing commemorative postal stamps: No violation reported after RTI petition.
    - Fees structure at private universities: UGC to regulate fees-structure at private universities.
    - RTI fees in various names: DoPT issues circular for uniform payee-name “Accounts Officer”- Merger of public sector oil-companies: Aspect gets momentum.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    200 180

    Item Code: #KGP-770

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकू' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Hashiye Par Harf
    Prem Bhardwaj
    400 360

    Item Code: #KGP-450

    Availability: In stock

    लक्ष्मण रेखा लांघने वाली बात मीडिया के साथ कैसे कुछ हद तक सही बैठती है, इसे भी समझने की जरूरत है। एक जमाने से पत्रकारिता को पवित्र पेशा या मिशन माना गया है। किसी लक्ष्मण ने नहीं, उससे पवित्रता की इसी जन-अपेक्षा ने लक्ष्मण रेखा न जाने कब, क्यों और कैसे खींच दी? सत्ता का यह चरित्र होता है कि वो अपने समय में पवित्र चीजों को भ्रष्ट करती है और मन को भाने वाली वस्तु या इंसान को भोग की चीज मानती है। सर्वत्र पर मालिकाना हक ही उसका स्वभाव है। लिहाजा उसे गवारा नहीं कि वो गलत है तो सामने वाला सही रहकर उसके लिए ‘गलत’ की परिधि को बरकरार रखे। खुद को इस परिधि से बाहर निकालने या अच्छाई की लकीर को मिटाने के मकसद से ही वो तरह-तरह का छल-प्रपंच करती है। कई दफा वो अपनी ताकत का जौहर दिखाकर जबरदस्ती भी करती है। जरूरत पड़ने पर ‘मायाजाल’ भी रचने से गुरेज नहीं करती। राडिया प्रकरण में कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने भी मायाजाल रचा। मीडियारूपी सीता के मन में ‘स्वर्णमृग’ (धन, संपन्नता और सुविधाएं) का लोभ जन्मा। और वह किसी को कुछ देने (एक राजा को मंत्रालय देने) की खातिर लक्ष्मण रेखा को लांघ गई। बदले में उसे क्या मिला, यह अभी सामने नहीं आया है। बहुत संभव है बाद में कुछ पता चले।
  • Vishva Ke Mahaan Aavishkaarak Aur Unke Aavishkaar (Paperback)
    Laxman Prasad
    260

    Item Code: #KGP-51

    Availability: In stock

    आज संसार का जो स्वरूप है, उसे बनाने में हजारों-लाखों आविष्कारकों ने अपना जीवन लगाया है। इनमें से कुछ का योगदान इतना ज्यादा है कि उनहें महान् कहा जाता है। इन आविष्कारकों ने कृषि, उद्योग, यातायात (जल, थल, नभ, अंतरिक्ष), दूरसंचार (टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेडियो, टी.वी.), उपयोगी उपकरण (कम्प्यूटर, कैमरा), चिकित्सा, युद्धक सामग्री, परमाणु ऊजा, विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक सिद्धांतों आदि को इस कदर विकसित किया कि संसार नए युग में प्रवेश कर गया। प्रस्तुत पुस्तक में पिछले ढाई हजार सालों के ऐसे 40-45 महान् आविष्कारकों का व्यक्तित्व व कृतित्व समाहित है।
  • Tiger Tantra (Paperback)
    Ganga Prasad Vimal
    245 221

    Item Code: #KGP-326

    Availability: In stock

    A first ever Novel on an Untouched Subject
    The Tantra, its cults and practices have always attracted attention worldwide due to its strange disciplines and various hidden secrets. Chiefly because of its use of esoteric practices— in acquiring siddhis (supernatural powers), spiritual perfection and other material gains—Tantra came to be regarded as anti-social and unethical, forcing it to go underground.
    The present novel explores an unusual aspect of the tantric discipline, which makes it quite interesting. The author has taken up a subject inherent to the sub-culture of the Himalayan regions to which he belongs, and tried to weave it into a quite probable story, realistic as well as readable.
    ‘Tiger Tantra’ or the Tantra which changes the practitioner into a tiger or Bokshu and makes him immortal, lies buried under the ruins of a temple in the village of Jaled, the centre of an isolated Tantric Peeth in the Himalayan region.
    A scholar in search of the Tiger Tantra visits the village, to uncover the secret and to find the hidden mantra, finds a swami engaged in some strange practices . . . and the story unfolds in its fantastic dimensions . . . till the virgin offers herself to the scholar to corrupt the swami’s sadhana.
  • Paani Ka Svaad
    Nilesh Raghuvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9089

    Availability: In stock


  • Antarctica Abhiyan (Paperback)
    Hridya Nath Dutta
    195

    Item Code: #KGP-366

    Availability: In stock

    अंटार्कटिका अभियान
    हमारी पृथ्वी असंख्य रत्नों और अनेक रहस्यों से भरी हुई है । प्रकृति ने भी इसे सजाने-सँवारने के लिए अनुपम सौंदर्य लुटाया है । इंसान हमेशा से ही पृथ्वी के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए प्रयत्नशील रहा है । अपने ज्ञान में वृद्धि के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का अपने हित में अधिक से अधिक दोहन भी इसका मूल कारण है । बरक्स इसके पृथ्वी का एक बहुत बड़ा भाग अब भी इंसान के द्वारा पूरी तरह जाना-समझा नहीं गया है । अंटार्कटिका क्षेत्र भी उन्हीं भागों में से एक है ।
    कहने की ज़रूरत नहीं कि अंटार्कटिका एक ऐसा भूभाग है, जो अपने अद्भुत सौंदर्य, स्वच्छ वातावरण, शुद्ध जल के अकूत  भंडार की वजह से हमेशा से वैज्ञानिको और पर्यावरणविदों के आकर्षण का केंद्र रहा है । समय-समय पर पूरे विश्व से वैज्ञानिको के दल वहां जाकर शोध और अध्ययन करते रहते है । कई देशों ने वहाँ अपने स्टेशन भी स्थापित किए हैं । गर्व की बात है कि इस मुहिम से भारत भी किसी से पीछे नहीं है ।
    भारतीय वैज्ञानिकों के अनेक दल कई बार अंटार्कटिका जाकर यहीं के वातावरण पर शोध करते रहे है । ऐसे ही अंटार्कटिका अभियान दलों में तीन बार डॉ० हृदयनाथ दत्ता और दो बार डॉ० जसवंत सिंह भी शामिल होकर कई शोध-कार्यों में हिस्सा ले चुके है । लगभग दो वर्ष पूर्व उन्होंने अपनी उन अद्भुत यात्राओं के संस्मरणों को पुस्तकाकार में प्रकाशित करने की इच्छा जाहिर की; लेकिन उनका कहना था कि वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यों और वहाँ की विशेषताओं को उन्होंने लिपिबद्ध तो कर दिया है, लेकिन पुस्तक के रूप में आने से पहले इसके संपादन की आवश्यकता है । फलस्वरूप यह जिम्मेदारी उन्होंने मुझे सोप दी । पुस्तक के संपादन के दौरान मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि इसमें वैज्ञानिकता के साथ ही रोचकता भी बनी रहे । इस प्रयत्न में मैं कहाँ तक सफल हुआ यह तो पाठक ही तय करेंगे, लेकिन इतना निश्चित है कि यह पुस्तक अंटार्कटिका को जानने-समझने और उससे जुडे असंख्य रोचक तथ्यों से परिचित कराएगी । साथ ही भविष्य में उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय खतरों के प्रति आगाह भी करेगी ।
    -विज्ञान भूषण
  • Vigyan Ka Itihaas
    Dyanand Pant
    300 270

    Item Code: #KGP-748

    Availability: In stock

    विज्ञान का इतिहास
    विज्ञान की अद्भुत प्रगति विश्व-भर के चिंतकों और कर्मठों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफलन है। धर्म, देश, जाति, भाषा आदि की सीमाएँ विज्ञान को बाँध न सकीं। प्रस्तुत पुस्तक में इसी सार्वभौम विज्ञान की समग्र गाथा का रोचक वर्णन है। आदि मानव से लेकर आधुनिक मानव की विलक्षण उपलब्धियों वाली इस विश्वव्यापी बौद्धिक यात्रा का लेखा-जोखा बिना पूर्वग्रहों के प्रस्तुत करने और पाश्चात्य लेखकों के पक्षपातपूर्ण प्रतिपादन का पर्दाफाश करने का लेखक का प्रयत्न सराहनीय है।
    जनसाधारण सुलभ भाषा और रोचक शैली में लिखी अपने विषय की हिंदी की यह प्रथम मौलिक पुस्तक ज्ञानवर्द्धक होने के साथ-साथ पाठक में चिंतन और तर्क की वैज्ञानिक विधि के विकास में भी सहायक होगी।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-4)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1579

    Availability: In stock


  • Saadat Hasan Manto Ke Natak
    Narendra Mohan
    400 360

    Item Code: #KGP-3

    Availability: In stock

    सआदत हसन मंटो के नाटक
    सआदत हसन मंटो के नाटकों से हिंदी पाठकों का उतना परिचय नहीं है जितना उनकी कहानियों से, जब कि उन्होंने उच्चकोटि के नाटक लिखे हैं । उनके नाटकों में विडम्बनापूर्ण  स्थितियों के दृश्यात्मक संयोजन के आधार पर चरमबिंदु  की रचना की गई है और फिर उसी में से उभरता है एंटी क्लाइमेक्स । कार्य-व्यापार को आलोकित करने की यह पद्धति, चरमबिंदु के साथ इस ढंग का सलूक मंटो के नाटय-कर्म का अहम हिस्सा है ।
    मंटो के नाटकों में व्यंग्य-दृष्टि और फार्स के साथ-साथ हास्य और क्रीडा का भी विधान हुआ है । इनमें मंटो की संवेदना और सोच का दायरा काफी विस्तृत है-वैयक्तिक कुंठाओं, आकांक्षाओं और सरोकारों से लेकर सामाजिक- राजनीतिक चिंताओं और विदूपताओं तक । ये नाटक श्रव्य माध्यम द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, अत: उर्दू हिंदी भाषाओं की साँझी विरासत हैं ।
    सआदत हसन मंटो के नाटक पुस्तक से मंटो के नाटकों को, उनके नाटककार रूप को पहली बार हिंदी पाठकों के सामने लाने का महत्त्वपूर्ग कार्य किया है हिंदी के जाने-माने नाटककार, कवि और आलोचक डॉ० नरेन्द्र मोहन ने । संपादकीय दृष्टि की वजह से यह मंटो के नाटकों का एक संकलन भर नहीं है, यह एक ऐसा दस्तावेज बन गया है जो पीढियों के फासले को पाटता हुआ हमसे आ जुड़ता है ।
    मंटो ने न आघुनिक्तावादी सांचा कबूल किया, न प्रगतिवादी । यह जिंदगी की जुराब के धागे को एक सिरे से पकड़कर उघेड़ता रहा और उसके साथ हम सब उधड़ते चले गए ।
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-2
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-832

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-2
    जैसी लघुकथाओं की कल्पनाएं और कामनाएं हम आठवें-नवें दशक में करते रहे, वैसी लघुकथाएं लिखते रहे हिमाचल प्रदेश के प्रतिष्ठित कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ, मध्य प्रदेश के पवन शर्मा और उन्नी, उत्तर प्रदेश के असग़र वजाहत, गंभीरसिंह पालनी, पंजाब के तरसेम गुजराल और कमलेश भारतीय, बिहार के चंद्रमोहन प्रधान, जम्मू के ओम गोस्वामी, राजस्थान के मोहरसिंह यादव, हसन जमाल और महाराष्ट्र के दामोदर खड़से, लेकिन कितना क्रूर मजाक हुआ हिंदी लघुकथा के साथ कि लघुकथा के स्वयंभू मसीहाओं ने इन तेजस्वी कथाकारों की लघुकथाओं पर प्रायः नजर ही नहीं डाली, डाली भी तो उन पर चर्चा नहीं की और चर्चा की भी तो निगेटिव। कई कथाकारों को ‘बाहरी’ कहकर उनके लघुकथा-लेखन को खारिज करने की कोशिश की। इन सशक्त लेखकों की लघुकथाओं के सामने उनकी लघुकथाएं रखते ही उनकी अल्पप्राणता उजागर हो गई, लेकिन अब अच्छे और सच्चे रचनाकारों की लघु- कथाओं के इस संकलन में आ जाने से उन पर चर्चा और समीक्षा के क्रम को रोका नहीं जा सकेगा। अब प्रेमचंद, प्रसाद एवं राजेंद्र यादव जैसे कहानीकारों की भी लघुकथाएं हमारे सामने हैं। उन अल्पप्राण प्रतिभाओं के कारण ही शायद कोई भला आदमी इधर आने और काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, लेकिन बीसवीं सदी के बीतते न बीतते प्रमुख कथाकारों की लघुकथाओं के प्रस्तुत संचयन को देखकर पाठक कह सकते हैं : कौन कहां कितने पानी में, सबकी है पहचान मुझे। ऐसी बातें कहने के लिए बाध्य कर देने वाले कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ की यादगार लघुकथा ‘पहाड़ पर कटहल’ पढ़कर एक पुरानी बात सही जान पड़ने लगी है कि महान् रचनाएं ही आलोचक को लुभाती हैं और वही उसे प्रेरित करती हैं कि वह उनका विश्लेषण करे, रचनात्मकता की हर संभव ऊंचाई के संदर्भ में उन्हें देखे-परखे और पाठकों को बताए कि कौन लेखक कितना बड़ा है, दूसरे उससे छोटे, और कितने छोटे, बल्कि नगण्य क्यों हैं? प्रस्तुत संचयन हिंदी लघुकथा की आलोचना के मान-प्रतिमान गढ़ने लायक बहुत-सी उत्तम रचनाओं का ऐसा दुर्लभ खजाना है, जो हिंदी में इससे पहले कभी भी और कहीं भी उपलब्ध नहीं था। उम्मीद है कि पाठक इसे संजोकर रखेंगे अपने पास, अपने साथ।
  • Vanya Jeevon Ki Romanchak Kahaniyan
    Shivani Chaturvedi
    80

    Item Code: #KGP-1057

    Availability: In stock


  • Science Ki Karamaat
    Maitreyi Pushpa
    100 90

    Item Code: #KGP-9204

    Availability: In stock

    यह युग विज्ञान का युग है अर्थात् साइंस की करामात का युग। विज्ञान की नवीनतम उपलब्धियों से सारा संसार चकित है और साथ ही चिंतित भी; क्योंकि आज का विज्ञान कल्याणकारी भी है और विनाशकारी भी। विश्व-भर में वैज्ञानिक अनुसंधानों-आविष्कारों की होड़ लगी हुई है। विज्ञान की इस प्रतिस्पद्र्धा ने मानव-कल्याण के बहुत-से आयाम प्रस्तुत किए हैं, लेकिन साथ ही संपूर्ण मानव जाति को विनाश के कगार पर भी ला खड़ा किया है। विनाशकारी अणु बमों, उद्जन बमों, प्रक्षेपास्त्रों, ध्वंसक राॅकेटों तथा समुद्री पनडुब्बियों का निर्माण वैज्ञानिकों की खोज का ही परिणाम है।
    इस पुस्तक में इन सभी की प्रारंभ से लेकर अब तक की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की गई है तथा विज्ञान-क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान और उपलब्धियों पर सरल एवं रोचक शैली में प्रकाश डाला गया है। अंतरिक्ष के बारे में जिज्ञासु पाठकों के लिए यह पुस्तक निःसंदेह उपयोगी सिद्ध होगी।
  • Grih Daah (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    100

    Item Code: #KGP-1370

    Availability: In stock


  • Rigveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    300 270

    Item Code: #KGP-115

    Availability: In stock

    ऋग्वेद : युवाओं के लिए यहाँ ऋग्वेद के मन्त्रों की व्याख्याएँ उसे सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं, जिनसे आज का 'कंप्यूटर-सेवी' युवा किसी भी स्थिति में निरपेक्ष नहीं रह सकेगा । पारंपरिक ज्ञान की अमूल्य धरोहर उसके हाथों में रखने का प्रयास है यह पुस्तक ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mamta Kaliya
    Mamta Kalia
    150 135

    Item Code: #KGP-75

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ममता कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आपकी छोटी लड़की', 'वसंत-सिर्फ एक तारीख', 'लड़के', 'दल्ली', 'लैला-मजनू', 'जितना तुम्हारा हूँ', 'सुलेमान', 'छुटकारा', 'पीठ' तथा 'बोहनी' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ममता कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi (Paperback)
    Manohar Shyam Joshi
    120

    Item Code: #KGP-462

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मनोहर श्याम जोशी
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका  में  यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुडिया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Chhotoo Ustaad
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-728

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में संकलित कथाकार स्वयं प्रकाश की कहानियां आकार में छोटी हैं लेकिन प्रभाव में ‘बड़ी’। ये लघुकथाएं नहीं हैं। लघुकथा अकसर एकायामी कथ्य की वाहक होती है और एक निश्चित बिंदु पर प्रहार करती है। जबकि ये कहानियां बहुपर्ती हैं और आपकी पूरी विचार प्रक्रिया को प्रभावित बल्कि परिवर्तित कर देती हैं। मसलन ‘हत्या’ एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो जंगल के राजा शेर को सर्कस में रिंग मास्टर के इशारे पर भीत गुलामों की तरह व्यवहार करते देख रो पड़ता है तो ‘बिछुड़ने से पहले’ सड़क और पगडंडी की बातचीत के बहाने विकास के पूंजीवादी मॉडल को प्रश्नांकित करती है। रेटोरिक का इस्तेमाल जिन बहुत ही कम कहानीकारों ने हथियार की तरह किया है उनमें स्वयं प्रकाश एक हैं। ‘सुलझा हुआ आदमी’ में बहुत बोलने वाले और व्यवहार में इससे उलट आचरण करने वाले लोगों पर ‘कहता है’ के माध्यम से बड़ी तीखी गुम चोट की गई है।
    ये कहानियां किसी बड़े कलाकार--मसलन--यामिनी रॉय या मकबूल फिदा हुसैन के रेखाचित्रों की याद दिलाती हैं जिनमें न डिटेल्स की पेशकश होती है, न रंगों का पसारा, लेकिन फिर भी जिनमें कम से कम रेखाओं के माध्यम से एक अभिभूत कर डालने वाली माया का सृजन हो जाता है! और यही इन रचनाओं की सबसे बड़ी खूबी है। पाठकों को इन कहानियों को पढ़ते समय परसाई जी की या आचार्य अत्रो की या पु. ल. देशपांडे की याद आए तो इसे अपनी परंपरा में सुरभित पारिजात के नन्हे फूलों की पावन सुगंध् ही समझना चाहिए। कथाकार स्वयं प्रकाश की ये अद्भुत कहानियां पहली बार किसी संकलन में प्रकाशित हो रही हैं।
  • Darshaniya Bharat : Atulya Bharat
    Hiralal Bachhotia
    270 230

    Item Code: #KGP-254

    Availability: In stock

    दर्शनीय भारत : अतुल्य भारत
    भारत दर्शनीय भी है, अतुलनीय भी।  उत्तर में हिमालय की सुंदरता इसके सीमांत स्थानों में अक्षुण्ण रूप में विद्यमान है । हिमाचल में स्थित 'नम्झा' तिब्बत-सीमा से लगा भारत का अंतिम गांव है तथा हिमाचल के दक्षिण-पूर्व का अंतिम गांव छितकुल से हिम-श्रृंगों और बस्पा का सौंदर्य भी अतुलनीय है । अलकनंदा घाटी की अपार सुंदरता सुविधायों के बावजूद खतरों से भरी हुई तो है ही । सिक्कम अरुणाचल, नगालैंड उत्तर-पूर्व के सीमांतों पर फैले सौंदर्य को आत्मसात् करने का अवसर देते हैं  और अनुभव कराते हैं-सौंदर्यानुभूति के साथ-साथ भारत की विशालता और विविधता की गौरवपूर्ण अनुभूति का और हममें होता है राष्ट्रभावना का उद्रेक भी ।
    भारत की दर्शनीयता से भारत का पूरा भू-भाग समाहित है। वह चाहे सतपुडा के घने जंगल हों, कोंकण का समुद्रीतट, केरल की अनुपम नारिकेल सुषमा या बांग्ला  का शांतिनिकेतन क्षेत्र । उधर महाबलीपुरम की समृद्ध सांस्कृतिक पुरा संपदा से लेकर मणिपुर की वैष्णवधर्मिता-सारा कुछ भारत की अतुल्यता का ही बखान है । विदा लेते सूर्य की अनुपम शोभा का साक्षी पचमढी का धूपगढ़ हो या मैदानों की झुलसाती गर्मी के बीच बादलों में खो जाने का अहसास जगाता ऊटी का डोडा-बेट्टा-सभी निसर्ग शोभा के अनछुए पृष्ठ है । यात्रा इन पृष्ठों के अनुभवों से गुजरने और यात्रा-सुख में खो जाने का निमंत्रण देती है । ये पृष्ठ पहले से, न जाने कब से फैले हुए हैं । कोई यायावर उन्हें जिस रूप में देखता और संजोता है, वही हैं - दर्शनीय भारत : अतुल्य भारत ।
  • Ratangarbha
    Shanker Shesh
    40 36

    Item Code: #KGP-2087

    Availability: In stock


  • Sangharsha-Meemaansa
    Ravi Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9083

    Availability: In stock


  • Ullanghan
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-810

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Mahaan Vyaktitva Jin Par Hamain Garv Hai
    Pravesh Chaturvedi
    480 432

    Item Code: #KGP-448

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hridayesh
    Hridyesh
    200 180

    Item Code: #KGP-90

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार हृदयेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'खेत', 'जो भटक रहे हैं', 'कोई एक दूसरा', 'मृगया', 'जीवन राग', 'उसकी कहानी', 'जहर', 'मनु', 'पूँजी'  तथा 'सत्तर पार का वह बूढ़ा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक हृदयेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Pracheen Prem Aur Neeti Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-01

    Availability: In stock

    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
  • Thank You Idi Amin (Paperback)
    Mohezin Tejani
    395

    Item Code: #KGP-324

    Availability: In stock

    Through adversity, a new life emerges
    Bouncing back from one of the horrific episodes of world history—Idi Amin’s expulsion of 80,000 Asians from Uganda— Mohezin Tejani presents a collection of true stories about being a global Muslim refugee.
    Liberated from the confines of his own culture by political realities, Tejani sets out to learn how to be rooted in the absence of a place to call home. His writing is a hypnotic bhangra dance through time and space where he deftly explores both geographical and psychological displacement. Yet it is precisely through such disorientation and a host of intercultural encounters that he eventually finds solace in being a ‘global village on two legs.’
    Thank You, Idi Amin portrays the intersecting points of congruence among humans that are neither from the East nor the West, nor the North or South, but are all part of a global compass navigating the new world of tomorrow.
  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 297

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Mathuradas Ki Diary
    Mudra Rakshes
    50 45

    Item Code: #KGP-2089

    Availability: In stock

    थुरादास की डायरी' शीर्षक से ही  कुछ बरस पहले एक अत्यन्त विवादास्पद लगभग विस्फोटक व्यंग्य लेख श्रृंखला छपी थी । पता यहीं वह इन लेखों की सफलता थी या असफलता कि लोगों ने इसे बंद कराकर ही दम लिया । इसके बाद एक दूसरी श्रृंखला छपी 'राक्षस उवाच' नाम से । इसके वैसे हो अन्त से पहले घर पर  पथराव हुए, कुछ धमकियाँ भी आई ।  बदमाशा मित्र इसे सौभाग्य बताते रहे पर संपादक नेक साबित हुए । श्रृंखला फिर बन्द हो गई ।
    मगर कुछ लोगों का शुभ विचार है कि श्रृंखलाएँ बंद करवाने की इतनी सफल कोशिशों कें बाद भी ये लेख गड़बड़ी  फैलाने में खासे कामयाब हुए ।

    –मुद्राराक्षस
  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai
    Ubaid Siddqi
    300 270

    Item Code: #KGP-547

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
  • Mori Ki Int
    Madan Dikshit
    150 135

    Item Code: #KGP-9073

    Availability: In stock


  • Bharat : Tab Se Ab Tak
    Bhagwan Singh
    325 293

    Item Code: #KGP-9124

    Availability: In stock

    भगवान सिंह ने कविता, कहानी, व्यंग्य, आलोचना, उपन्यास, भाषा-समस्या जिस भी विषय पर लिखा है, उसमें उनका एक नया तेवर रहा है। उनका एक उपन्यास तो हिंदी के सबसे चर्चित और विवादित उपन्यासों में आता है। परंतु इतिहास पर उनका लेखन जितना विचारोत्तेजक और क्रांतिकारी माना गया है, उसकी तुलना उनके अन्य किसी विधा में किए गए लेखन से नहीं की जा सकती। व्यावसायिक इतिहासकार न होते हुए भी उन्होंने प्राचीन इतिहास की जड़ीभूत मान्यताओं को खंडित करते हुए इसकी गहनता, व्याप्ति और दिशा सभी को बदला है और इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों और मनस्वी पाठकों के बीच उसका स्वागत हुआ है।
    प्रस्तुत संग्रह में भी इतिहास पर लिखे गए उनके कुछ ऐसे लेख हैं, जिन्होंने पाठकों और श्रोताओं को उद्वेलित और प्रेरित किया है और उनको पुनर्विचार के लिए बाध्य किया है। साथ ही कुछ ऐसे नए लेख भी हैं, जो इससे पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुए हैं। इनके कारण निबंधों का समग्र फलक बहुत व्यापक हो गया है। जहां कुछ लेखक एक ऐसे अतीत में ले जाते हैं, जहां प्रकाश की कोई अन्य किरण आज तक पहुंच नहीं पाई थी और जिससे आज के दस-बीस हजार या इससे भी पहले की मानसिक ऊहापोह पर हलका और कुछ रंगीनी-भरा प्रकाश पड़ता है, वहीं ऐसे लेख भी हैं, जो ठीक आज की समस्याओं या वर्तमान के अतीत और वर्तमान दोनों की, तीखी पड़ताल करते हैं।
  • Mere Saakshatkaar : Mridula Garg
    Mridula Garg
    225 203

    Item Code: #KGP-870

    Availability: In stock


  • Lalachi Brahman
    Maitreyi Pushpa
    50

    Item Code: #KGP-1188

    Availability: In stock


  • Saryu Didi
    Manorma Jafa
    175 158

    Item Code: #KGP-1956

    Availability: In stock

    सरयू दीदी
    मैंने फोन मिलाया। गोपाल जोशी सुनाकर सदके में आ गए, 'यह नहीं हो सकता। मैं अभी पता लगाता हूँ।' उन्होंने फोन रख दिया।
    'क्या करूं मनु?' दीदी की आवाज में बेबसी थी। वही तो सदा समझदार रहीं। वही तो हर प्रश्न का उत्तर और हर समस्या का हल ढूंढ़ लेती थीं। पर यहां वह किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी थीं ।  वह उठकर कमरे में टहलने लगीं । 'अभी तो जीवन शुरू ही हुआ था मनु।' दीदी ने हाथ जोड़े ऊपर देखा, आंखें बंद कीं और जोर से बोली, 'हे ईश्वर आप ही माता है आप ही पिता हैं। हे ईश्वर आप ही सबकी रक्षा करने वाले हैं। हे ईश्वर मुझे ठीक सोचने-समझने की शक्ति दीजिए। मुझे बल दीजिए। हे ईश्वर मुझे बल दीजिए।' दो क्षण बाद दीदी की आंखें झरने लगीं। थोडी देर बाद दीदी में शक्ति लौटकर आ गई, 'मनु मैं यब कुछ सह लूंगी। भगवान महान हैं, दयालु हैं।' मेरी तरफ़ मुड़कर बोलीं, 'मनु। पापा से पूछो अजीत को लेकर प्लेन कब आ रहा है?' वह उठकर दराज़ में से कूछ खोजने लगीं।
    तभी फोन की घंटी बजी मैंने फ़ोन उठा लिया। उधर फोन पर मां थी, 'मनु अजीत को यहां अपने घर ले आते हैं। वही ठीक होगा। वहीं सरयूजी क्या करेंगी? '
    मैं दीदी से पूछती हूँ। हिम्मत करके मैंने दीदी से पूछा। दीदी ने कहा, 'मनु! अजीत का घर यहीं है, वह यहीं आयेंगे ।'
    मैंने जाकर मां को बता दिया।
    -(इसी उपन्यास से)
  • Saahsi Bachche : Anokhe Karname
    Sanjiv Gupta
    200 180

    Item Code: #KGP-243

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Kedarnath Agrawal
    Kedar Nath Agrawal
    200 180

    Item Code: #KGP-544

    Availability: In stock


  • Neeraj Ke Prem Geet (Paperback)
    Gopal Das Neeraj
    70

    Item Code: #KGP-7063

    Availability: In stock

    नीरज के प्रेमगीत
    लड़खड़ाते हो उमर के पांव,
    जब न कोई दे सफ़र में साथ,
    बुझ गए हो राह के चिराग़
    और सब तरफ़ हो काली रात,
    तब जो चुनता है डगर के खार-वह प्यार है ।
    ० 
    प्यार में गुजर गया जो पल वह
    पूरी एक सदी से कम नहीं है,
    जो विदा के क्षण नयन से छलका
    अश्रु वो नदी से कम नहीं है,
    ताज से न यूँ लजाओ
    आओं मेरे पास आओ
    मांग भरूं फूलों से तुम्हारी
    जितने पल हैं प्यार करो 
    हर तरह सिंगार करो,
    जाने कब हो कूच की तैयारी !
    ० 
    कौन श्रृंगार पूरा यहाँ कर सका ?
    सेज जो भी सजी सो अधूरी सजी,
    हार जो भी गुँथा सो अधूरा गुँथा,
    बीना जो भी बजी सो अधूरी बजी,
    हम अधुरे, अधूरा हमारा सृजन,
    पूर्ण तो एक बस प्रेम ही है यहाँ
    काँच से ही न नज़रें मिलाती रहो,
    बिंब का मूक प्रतिबिंब छल जाएगा ।
    [इसी पुस्तक से ]
  • Rajneeti Ki Shatranj
    Shanta Kumar
    375 338

    Item Code: #KGP-107

    Availability: In stock

    राजनीति की शतरंज
    मुख्यमंत्री-पद छोड़ने के बाद मेरा मन भरा हुआ था । ढाई साल की छोटी-सी अवधि में इतनी घटनाएं घटी थीं, इतने मीठे-कड़वे अनुभव प्राप्त किए थे कि वह एक अधूरे सफर की पूरी कहानी बन गई थी  ।
    लंबी सोच के बाद मैंने निर्णय किया कि मुझे पुस्तक लिखनी चाहिए । ढ़ाई साल में मैंने मूल्यवान अनुभव प्राप्त किए । एक असाधारण संघर्ष से गुजारा । कुछ अच्छे काम किए । गलतियां कीं । वे सारे अनुभव मेरे निजी नहीं हैं । वे समाज की संपत्ति हैं । एक राजनीतिक व्यक्ति उन्हें अपने तक रख सकता था, परंतु एक लेखक ऐसा नहीं कर सकता था । लेखक को ऐसा करने का अधिकार भी नहीं है ।
    इस पुस्तक को पाठक एक राजनीतिक व्यक्ति के संस्मरण ही न समझे । एक लेखक जीवन के लंबे  सफर में संयोग से या भूल से सत्ता की राजनीति की संकरी गली में चला गया था । वहीं जो देखा, पाया, खोया व अनुभव किया, वह उसके अंतर में उमड़ता-घुमड़ता रहा । मेरा लेखक उस सबको छिपा कर या दबाकर रख ही नहीं सकता था। मेरे ये संस्मरण-ये अनुभव समाज के हैं और मैं समाज को ही इन्हें अर्पित कर रहा हूँ।
  • Meri Ekyavan Kavitayen
    Atal Bihari Vajpayee
    160 144

    Item Code: #KGP-1849

    Availability: In stock


  • Aagaami Ateet (Paperback)
    Kamleshwar
    70

    Item Code: #KGP-7068

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-5 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-505

    Availability: In stock


  • Raakshas
    Shanker Shesh
    75 68

    Item Code: #KGP-9107

    Availability: In stock

    राक्षस
    राक्षस एक जातिवाचक शब्द ही नहीं, मानसिकता द्योतक शब्द भी है। राक्षस वह है, जो सामान्य मानवीय स्वरूप के विरोध में रहता है ।
    इस नाटक में शंकर शेष ने मनुष्य की इसी वृत्ति को उभारा है । यहाँ रणछोड़दास, सुकालू और दुकालू ऐसे चरित्र हैं जो मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम और द्वेष के संघर्ष को तीव्र करते है और फिर इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि–
    अब नहीं रुकेगा कमल फूल
    अब नहीं गिरेगी
    आने वाले कल की आँखों में धूल
    अब गाँव हमारा नहीं रहेगा
    जड़ पत्थर की नाँव 
    राक्षस अपनी पूरी अमानवीय स्थिति के साथ हमें इस आशा की स्थिति तक एहुंचाता है ।
    शकर शेष द्वारा लिखा गया एक सशक्त नाटक ।

  • Dohra Abhishaap
    Kaushlya Baisntari
    220 198

    Item Code: #KGP-2011

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
  • Kosh Vigyan (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    150

    Item Code: #KGP-7076

    Availability: In stock


  • Is Khirki Se
    Ramesh Chandra Shah
    425 383

    Item Code: #KGP-711

    Availability: In stock

    इस खिड़की से
    ‘इस खिड़की से’...यानी ‘अकेला मेला’ के ही नैरंतर्य में एक और मेला, एक और समय-संवादी आलाप...जो एकालाप भी है, संलाप भी, मंच भी, नेपथ्य भी...
    ‘अकेला मेला’ देखते-सुनते-गुनते...कुछ प्रतिध्वनियाँ ...कतिपय पाठक-समीक्षक मंचों से...अब इस खिड़की से जो दिखाई-सुनाई देने वाला है--मानो उसी की अगवानी में।
    ०० 
    डायरी-लेखन को साहित्य का गोपन कक्ष कहना अतिशयोक्ति न होगी।...काफ्का, वाल्टर बेन्यामिन जैसे कई लेखकों ने डायरी विधा के अंतर्गत श्रेष्ठ लेखन किया। मलयज या निर्मल वर्मा की डायरी उनके समस्त लेखन को समझने का उचित परिप्रेक्ष्य देती है। डायरी- लेखन की इसी परंपरा में नई प्रविष्टि है रमेशचन्द्र शाह की डायरी ‘अकेला मेला’। इस डायरी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि लेखक में कहीं भी दूसरों को बिदका देने वाली आत्मलिप्तता नहीं। 
    --हिंदुस्तान 
    शाह केवल डायरी नहीं लिखते, वे अपने समय से संवाद करते दिखाई देते हैं। उनकी डायरी की इबारतें ऐसी हैं कि एक उज्ज्वल, संस्कारी अंतरंगता मन को छूती हुई महसूस होती है।...यह डायरी एक ऐसा ‘ग्लोब’ भी बनकर सामने आती है, जो मनुष्य की बनाई सरहदों को तोड़ती हुई शब्द-सत्ता का संसार रचती है, जिसमें दुनिया के महान् रचनाकारों की मौजूदगी को भी परखा जा सकता है। डायरी में शाह ने अपने विषय में अपेक्षाकृत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है, वह एक विनम्र लेखक की शाइस्ता जीवन-शैली की ही अभिव्यक्ति है।
    --कादम्बिनी
    एक अकेला लेखक कितनी तरह के लोगों के मेले में एक साथ! कितनी विधाओं और कृतियों में एक साथ!...और कितनी आत्म-यंत्रणाओं और मंत्रणाओं में एक साथ!
    --जनसत्ता
  • Vishwa Ke Mahaan Shikshavid (Paperback)
    M.A. Sameer
    250

    Item Code: #KGP-7209

    Availability: In stock

    जीवन में सफलता व अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था और अपेक्षा–इन तीन शक्तियों को भलीभांति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित कर लेना चाहिए।
    यह विचार एक ऐसे शिक्षक का है, जिसके एक शिष्य ने इन विचारों को न केवल आयुध बनाकर अपने जीवनयुद्ध में प्रयोग किया, अपितु इनसे जीवनयुद्ध का विजेता बनकर संसार के सर्वश्रेष्ठ आयुध्-निर्माताओं में से एक बना। जी हां, यह विचार है इयादुराई सोलोमन नाम के दक्षिण भारतीय शिक्षक और उनका यह शिष्य भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का, जिन्होंने वैज्ञानिकी में स्वयं को समर्पित करके ‘मिसाइलमैन’ की उपाधि प्राप्त की।
    पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद डाॅ. अब्दुल कलाम भारत के ऐसे पहले राजनेता थे, जिन्हें बच्चों का स्नेह प्राप्त था और ‘काका कलाम’ कहकर संबोधित किया जाता था। बच्चों को देश का भविष्य मानने वाले डाॅ. अब्दुल कलाम अकसर समय निकालकर छात्रों के बीच जाते और बच्चों के प्रश्नों के उत्तर बड़ी सहजता से देते और उन्हें भविष्य में कुछ करने के लिए प्रेरित करते। जीवन के मूल्य, आदर्श और सफलता के मंत्र बड़ी रोचक वाणी में बताते। उनके द्वारा लिखित आत्मकथा ‘विंग्स आॅफ फायर’ में उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने विचारों और दृष्टिकोण से मार्ग दिखाया है। उनकी एक-एक बात प्रेरणादायी है। उनका समूचा जीवन ही प्रेरणादायी है।
    आज तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं की बढ़ती संख्या का कारण डाॅ. अब्दुल कलाम की वह प्रेरणा ही है, जिसने देश को आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में सक्षम किया है। डाॅ. कलाम भारतीय तकनीकी विकास को विज्ञान के हर क्षेत्र में लाने का समर्थन करते थे। उनका कहना था कि साॅफ्टवेयर का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए, जिससे अधिक संख्या में लोग इसकी उपयोगिता का लाभ उठा सकें। इसी से सूचना तकनीक का विकास तीव्र गति से हो सकेगा। डाॅ. कलाम का राष्ट्रपति काल भारत के स्वर्णिम काल में से एक है। बिना किसी राजनीतिक विवाद के उन्होंने यूरोपीय देशों और पड़ोसी देशों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे और देश की विकास गति को थमने नहीं दिया। 25 जुलाई, 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ और वे फिर से वैज्ञानिकी एवं तकनीक के क्षेत्र में आ गए।
    ऐसा कहा जाता है कि जब डाॅ. कलाम राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के रूप में प्रवेश कर रहे थे तो उनके एक हाथ में एक थैला था, जो पांच वर्ष बाद जब वे वहां से कार्यमुक्त हुए तो उनके साथ ही था। वे शाकाहारी थे और अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे। समय का उनकी दृष्टि में बड़ा महत्त्व था और इसके सदुपयोग के लिए वे व्यवस्थित चर्या का पालन करते थे।
    –इसी पुस्तक से
  • Kushti
    Sudhir Sen
    25

    Item Code: #KGP-7182

    Availability: In stock


  • Shakti Se Shanti
    Atal Bihari Vajpayee
    300 270

    Item Code: #KGP-9021

    Availability: In stock

    शक्ति से शान्ति

    हम सब जानते है कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है । एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आन्दोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएँ सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रान्तिकारियों ने हँसते-हँसते फाँसी का तख्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान  दिया । हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है ।

    जाइए, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े ।

    हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है । पचास वर्षों के इस छोटे-से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी । इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है—हमारे सेना के जवानों को । अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रखकर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते है । इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते है । सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियाँ हों  या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिंद महासागर का गहरा पानी, समी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खडा है । इन सभी जवानों की जो थलसेना, वायुसेना और जलसेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित है, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और इतना ही कहता हूँ कि हे भारत के वीर जवानों । हमें तुम पर नाज है, हमें तुम पर गर्व है । [इसी पुस्तक से]
  • Yugdhvani
    Bal Swaroop Raahi
    250 225

    Item Code: #KGP-807

    Availability: In stock

    लोकप्रियता की युगधवनि
    बालस्वरूप राही की ये कविताएं उस यादगार दौर की कविताए हैं, जब कविता के पाठक तथा श्रोता रसज्ञ तथा संवेदनशील हुआ करते थे और युवक-युवतियों में विशेष रूप से कविता के प्रति गहरा लगाव होता था। इन कविताओं को पढ़-पढ़ कर प्रौढ़ता की ओर अग्रसर हो रहे कविता-प्रेम भी पुन: युवा को जाया करते थे। आज को लगभग पांच दशक पहले भी राही की रुबाइयों, ग़ज़लों, गीतों तथा लम्बी कविताओं में यही खूबी थी। इन पंक्तियों के लेखक ने वह ज़माना देखा है, जब मंच से सुनाए जाने पर ये कविताएं श्रोताओं के मन-प्राण पर अंकित हो जाया करती थीं और उन की डायरियों में दर्ज हो जाती थीं। घनघोर रूप से पसन्द की जाने वाली उन की अनेक कविताएं देश- भर में काव्य-प्रेमियों को कंठस्थ है ।
    प्रसन्नता की बात है कि राही की ऐसी विविध आयामी परम लोकप्रिय कविताएं, जो अब तक उन के किसी संकलन में नहीं आई थीं और कविता-प्रेमियों  द्वारा जिन के प्रकाशन की मांग निरन्तर की जा रही थी, अब पुस्तकाकार प्रकाशित हो रही हैं।
    देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओँ में एक के बाद एक प्रकाशित होने वाली ये अविस्मरणीय कविताएं न केवल राही की लम्बी सार्थक काव्य-यात्रा में मील के पत्थर के समान हैं, वरन् पिछले पांच दशकों में हिन्दी-कविता के बदलते रूप-रंग तथा मिजाज़ की भी पुख्ता पहचान कराती हैं।
    राही का यह अनूठा काव्य-संकलन 'युगध्वनि' हिन्दी कविता की लोकप्रियता के इतिहास को समझने के इच्छाओं तथा काव्य-प्रेमियों के लिए सचमुच एक तोहफे के समान है।
  • Lalmaniyan
    Maitreyi Pushpa
    220 198

    Item Code: #KGP-20

    Availability: In stock

    ललमनियाँ
    अपने पहले कहानी-संग्रह के प्रकाशन के साथ ही न केवल चर्चित बल्कि वरिष्ठ रचनाकारों में शामिल होने का गौरव मैत्रयी पुष्पा से पहले संभवतः किसी रचनाकार को हासिल नहीं हुआ होगा।
    मैत्रयी पुष्पा का किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित पहला कहानी-संग्रह ‘चिन्हार’ न केवल चर्चित रहा, हिंदी अकादमी ने पुरस्कृत भी किया। इसके बाद आए दो उपन्यास ‘बेतवा बहती रही’ और ‘इदन्नमम’ भी चर्चित और पुरस्कृत हुए।
    आज कोई भी कथा-पत्रिका, कथा-संकलन बिना मैत्रयी पुष्पा के रचनात्मक योगदान के अधूरा माना जाता है और आज की कहानी का कोई भी सर्वेक्षण इनके जिक्र के बिना अपूर्ण। अपनी हर कथा-रचना के साथ विषय-वैविध्य और परिपक्वता का परिचय देता कथाकार का यह दूसरा कहानी-संग्रह पाठकों तक पहुँचाते हुए किताबघर प्रकाशन उम्मीद करता है कि इस संग्रह को भी वही चर्चा और प्रशंसा हासिल होगी जो इन कहानियों के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के दौरान हुई थी।
  • Andher Nagari : Srijan-Vishleshan Aur Paath
    Ramesh Gautam
    80 72

    Item Code: #KGP-9131

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rita Shukla
    Rita Shukla
    350 280

    Item Code: #KGP-657

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ऋता शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'प्रतीक्षा', 'छुटकारा', 'देस बिराना', 'विकल्प', 'जीवितोअस्मि…!', 'रामो गति देहु सुमति...', 'निष्कृति', 'सलीब पर चढे सूरज का सच', 'उबिठा बनाम उभयनिष्ठा...' तथा 'हबे, प्रभात हबे' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका ऋता शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Sapnon Ko Saakaar Kiya
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-578

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में ऐसे व्यक्तियों की सच्ची कहानियां हैं, जिन्होंने अपने जीवन में ऐसे काम किए, जिनसे आम आदमी को लाभ हुआ था, जिनसे आम आदमी को प्रेरणा मिल सकती है । इन व्यक्तियों ने अपने लक्ष्य की प्राप्ति में कठियाइयों का भी सामना किया, लेकिन उनका डटकर मुकाबला किया । इनमे से अधिकांश के पास सीमित साधन थे, फिर भी लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में उनके कदम रुके नहीं, बल्कि आगे ही बढ़ते गए । अंत में उन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त किया । साथ ही अपने सपनों को भी साकार किया । 
    जिन व्यक्तयों की ये जीवनियां हैं, उनके बारे में किशोर पाठक बहुत कम जानते होंगे । इनमे से कुछ को तो वे केवल उनके नाम या काम से ही जानते होंगे । लेकिन जब वे उनके बारे में पढ़ेंगे तो न केवल उन्होंने नई जानकारी मिलेगी, बल्कि कुछ वैसे ही लोकहितकारी काम करने की प्रेरणा भी मिलेगी । यही पुस्तक का उद्देश्य है । 
    —विश्वनाथ गुप्त 
  • Namaskar ! Bharat Mera Mahan ! (Paperback)
    Manohar Shyam Joshi
    90

    Item Code: #KGP-7030

    Availability: In stock

    नमस्कार! भारत मेरा महान!
    अमृतलाल नागर और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का शिष्य कहने में मनोहर श्याम जोशी बहुत गौरव का अनुभव करते थे। जोशी जी के निजी जीवन, साहित्य, पत्राकारिता और सिनेमा के पन्नों में उक्त दोनों आचार्यों की छाप देखी जा सकती है। 
    भारतीय राजनीति और समाज पर मनोहर श्याम जोशी की बेबाक टिप्पणियाँ हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। राजेंद्र माथुर की तरह उनके पत्रकारीय लेखन से लोग चकित और कुछ भ्रमित हो जाते थे, क्योंकि किसी टिप्पणी में वह मार्क्सवादी-समाजवादी, किसी लेख में हिंदूवादी, किसी विश्लेषण में कांग्रेसी विचारों से ओतप्रोत लगते थे। प्रगतिशील होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी या डॉ. कर्णसिंह से अच्छे संवाद और संबंध की क्षमता उनमें थी। 
    अमृतलाल नागर की तरह उनके व्यंग्य और कहानी- उपन्यास में सामाजिक कुप्रथाओं, बंधनों पर पैना प्रहार पढ़ने को मिलता है। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभ-लेखन में जोशी जी देश-विदेश के किसी नेता, पूँजीपति या बड़ी हस्ती की कमियों पर सीधे प्रहार करने में नहीं चूके। शरद जोशी की तरह मनोहर श्याम जोशी प्रतिदिन स्तंभ लिखने की क्षमता रखते थे। इसीलिए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने जोशी जी को एक नियमित स्तंभ लिखने का निमंत्रण दिया। सत्ता और प्रबंधन का भय इन संपादकों को कभी नहीं रहा। इसलिए जोशी जी ने भारत की सामाजिक-राजनीतिक दशा पर ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ लिखना शुरू किया। 
    ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ की विशेषता यह थी कि इस स्तंभ की टिप्पणियों पर पत्र आमंत्रित किए जाते थे और सैकड़ों पत्रों में से चुनिंदा छाँटकर अगली किस्त में स्तंभ के साथ छपते थे। यह स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुआ। जोशी जी ने जीवन की अंतिम साँस तक यह स्तंभ लिखा, जिसकी रचनाएँ दशकों तक कई पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
  • 20-Best Stories From Spain & Portugal (Paperback)
    Prashant Kaushik
    125

    Item Code: #KGP-7198

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics 
    from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Spanish & Portuguese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories 
    open up a new world on each page.

    With stories like Vain Queen, Maid and the Negress, Three Citrons of Love, Daughter of the Witch, Pedro and the Prince, Tower of ill Luck, this book is a compilation of 20 famous Spanish & Portuguese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Spain & Portugal.
  • The Great Gatsby (Novel)
    F. Scott Fitzgerald
    295 266

    Item Code: #KGP-364

    Availability: In stock

    Nick Carraway, the narrator of the novel, takes us back to the spring in 1922, when Wall Street was booming, and bootleggers were in business due to the alcohol ban. Nick travels to New York from the mid-west in order to become a bondsman. He takes residence in West Egg, next to a huge mansion which belongs to a mysterious Mr. Gatsby.  Nick is reacquainted with Daisy and Tom Buchanan, a wealthy couple who lives across the bay from him. Nick befriends Gatsby, who is revealed to be infatuated with Daisy. Nick arranges for them to meet, and they began to have an affair.  Tom, who is also having an affair with a married woman, confronts Daisy and Tom, and Daisy is forced to return to Tom. As Daisy and Gatsby drive off afterwards, they run over and kill Myrtle Wilson, Tom's mistress. Tom lies to Myrtle's husband, and tells him that Gatsby was the driver, when in reality, Daisy was driving. Wilson shoots Gatsby at his home afterwards, and then commits suicide. Nick is disillusioned with the life he planned for in New York, and returns west to his home town.
    Nick reflects that just as Gatsby's dream of Daisy was corrupted by money and dishonesty, the American dream of happiness and individualism has disintegrated into the mere pursuit of wealth. Though Gatsby's power to transform his dreams into reality is what makes him “great,” Nick reflects that the era of dreaming—both Gatsby's dream and the American dream—is over.
  • Devdas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    180 162

    Item Code: #KGP-79

    Availability: In stock


  • Inqilaab Zindabad
    Manohar Kajal
    175 158

    Item Code: #KGP-9074

    Availability: In stock


  • Million Dollar Not Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    60

    Item Code: #KGP-1419

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात है ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Swami Punitachari
    Chandrika Prasad Sharma
    90 81

    Item Code: #KGP-1868

    Availability: In stock

    अचानक, सदगुरु भगवान दत्त के शरीर से एक तेजस्वी प्रकाश पुंज निकलकर पुनीताचारी जी के शरीर में समा गया । भगवान दत्तात्रेय ने अपना तेज, अपना ओज, अपनी आभा पुनीताचारी जी में प्रविष्ट कराकर पुनीताचारी जी को अपने समान ओजस्वी बना लिया । आज एक गुरु ने अपने शिष्य को सम आसन पर बैठा लिया । बारंबार नमनीय हैं ऐसे सदगुरु भगवान दतात्रेय महाराज और धन्य हैं ऐसे शिष्य पुनीताचारी जी महाराज ।
    ---
    बापूश्री इतना कहकर दो पल रुके और पुन: बोले, "फिर सत्य क्या है? स्वरुप तो कोई भी सत्य नहीं है, चाहे वह मानव का हो, दानव का हो, या कि ब्रह्मराक्षस का ही क्यों न हो। यह सभी स्वरूप जीवन का प्रतीक हैं । और यदि जीवन है तो मरण भी है । मरण का अर्थ किसी भी स्वरूप के अस्थायित्व से है, उसके मिट जाने से है । अमरत्व तो किसी भी स्वरूप में नहीं है । मिट जाना ही उसकी नियति है । यानी दृष्टि की परिधि में बँधे सभी स्वरूप अस्थायी हैं । अजरता और अमरता तो किसी में भी नहीं है ।"
  • Mere Saakshatkaar : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    350 280

    Item Code: #KGP-616

    Availability: In stock


  • Himalaya Gaatha (2) Parv-Utsav
    Sudarshan Vashishath
    300 270

    Item Code: #KGP-167

    Availability: In stock


  • Katha Ek Naami Gharaane Ki
    Hridyesh
    200 180

    Item Code: #KGP-769

    Availability: In stock

    हृदयेश की कहानियां जिंदगी से, खासकर उस जिंदगी से, जिसमें मुक्तिबोध के मुहावरे के अनुसार आदमी जमीन में धंसकर भी जीने की कोशिश करता है, पैदा हुई हैं। कुछ लेखक सीधे जमीन फोड़कर निकलते हैं। उसी में अपनी जड़ों का विस्तार करते हैं और नम्र भाव से अपने रेशे-रेशे से उस जमीन से ही अपनी शक्ति खाद-पानी लेकर बढ़ते हैं और अपने तथा जमीन के बीच आसमान को नहीं आने देते हैं। वे इस सत्य को बखूबी समझते हैं कि आसमान जितना भी ऊंचा हो, उस पर किसी के पांव नहीं टिकते। औंध लटका हुआ बिरवा तो किसी को छाया तक नहीं दे सकता। हृदयेश् कलम से लिखते हैं तो भी लगता है जैसे कोई जमीन पर धूल बिछाकर उसपर अपनी उंगली घुमाता हुआ कोई तस्वीर बना रहा है। उनकी उंगलियों के स्पर्श में ही कुछ होगा कि आंघियां तक वहां आकर विराम करने लगती हैं और उनकी लिखत, जिसने भाड लेख होने तक का भ्रम नहीं पाला था, शिलालेख बनने के करीब आ जाती है।
    हृदयेश ने बीच-बीच में आने वाले तमाम साहित्यिक आंदोलनों व फैशनों को गुजर जाने दिया बिना अपने लेखकीय तेवर या प्रकृति में बदलाव लाए हुए। वह चुनाव पूर्वक अपनी जमीन पर टिके रहे–न दैन्यं न पलायनम्। वह एक साथ कई परंपराओं से जुड़ते हैं क्योंकि प्रत्येक रचनाकार अपने वरिष्ठों, समवयस्कों, यहां तक कि अल्पवयस्कों की कृतियों के प्रभाव को अपनी अनवधनता में सोख लेता है, जैसे पौधें की जड़ें खाद के रस को सोख लेती हैं।
  • The Mother Of All Books (Humour)
    Rajni Arun Kumar
    295 266

    Item Code: #KGP-352

    Availability: In stock

    From baby bump troubles to nappy changing woes, follow Sense’s humorous look at modern motherhood in India. From “Are you throwing up yet?” and “Where’s the belly? I want to see a belly!” to “Do you have milk?” and “No leaking?”, Sense has to grapple with not just her new found feelings with pregnancy and motherhood, but the barrage of oddly disturbing questions and advice from friends, family and so-called well-wishers.
    This book traces the journey of a young Indian couple through the eyes of the mother. As she goes through a myriad of ‘first time’ experiences, with often hilarious results, she hopes to get though motherhood with her sense of humour (and sanity) intact, all the while hoping she hasn’t permanently scarred the baby.

  • Aalamgeer
    Rajni Arun Kumar
    150 135

    Item Code: #KGP-1903

    Availability: In stock

    [जहानारा के चले जाने पर औरंगजेब पुश्तैनी तलवार को उठाकर देर तक देखता रहता है।]
    औरंगजेब : दिल्ली के तख्त पर बादशाह सलामत मुझे खुद बिठा रहे  हैं ।  बादशाह सलामत समझ गए हैं कि मैं ही हुकूमत करने के काबिल हूँ । (उल्लास के साथ) एक ही झटके से पका-पकाया फल गोद में आ गिरा है । (ऊपर-नीचे टहलता है) पर नहीं, यह खुदावंदताला की बख्यिश है ।  यह बरकत  खुदावंदताला की ही हुई है, और किसी की नहीं । 
    [कहीं से हलकी-सी आवाज आती है ।]
    आवाज़ : जहानारा ने जो कुछ कहा, तुमने फ़ौरन ही मान लिया । 
    औरंगजेब : वह बादशाह सलामत की तरफ़ से पेशकश लाई थी ।
    आवाज़ : पर यह एक चाल भी तो हो सकती है ।
    औरंगजेब : चाल क्यों ? यब 'आलमगीर' तलवार, भी उसने साफ कहा हैं कि दिल्ली के तख़्त पर तुम बैठोगे ।
    आवाज़ : वह दिल्ली तृम्हारे दुश्मनों से घिरी  होगी । दारा शूकोह जो इस वक्त भागता फिर रहा है, वह फिर से पंजाब का सूबेदार बनकर लोट आएगा, मुरादबख्श गुजरात में और शुजा बंगाल में । क्या तुम भूल गए कि दारा को ज़हानारा ने ही वली अहद बनवाया था । दारा और जहानारा दो जिस्म एक जान है । दोनों सूफी मुल्लाशाह के शागिर्द।  दिल्ली मुल्लाशाह के मुरीदों का अड्डा बनेगी ।
    औरंगजेब : (स्वत:) सब बात वहीं को वहीं लौट आएगी । ...पर बादशाह सलामत ने मुझे दिल्ली का तख्त अता फर्माया है ।
    आवाज़ : नहीं, वह तुमने अपनी तलवार के जोर में हासिल किया है । वह तुम्हें खुदावंदताला के फजल से मिला है । यह नादर मौका है, औरंगजेब । फिर ऐसा नायाब मौका तुम्हारे हाथ नहीं आएगा । इस चाल को समझो, औरंगजेब । बादशाह सलामत तुम्हारे हाथ में बिल्ली के तख़्त  का झुनझुना पकड़ा देना चाहते है । दारा शुकोह  को बहाल करने का उनके पास यही एक तरीका है ।
    औरंगजेब : (स्वत:) न जाने कौन लोग बादशाह सलामत ने मिलने  आते है । उनके इरादे कौन जान सकता है ? किले की ऊंची दीवारों के पीछे न जाने साजिशें पक रही हैं।
    आवाज़ : दारा की सुबेदारी बहाल होगी तो वह फिर से फ़ौजें मुनज्जम कर सकता है । बादशाह सलामत उसकी पीठ पर हैं । वह अभी भी अपने आपको वली अहद समझे हुए है ।
    औरंगजेब : बादशाह सलामत दारा की पीठ पर है तो ख़ुदावंदताला  मेरे हक में है ।  ख़ुदावंदताला  ने मुझे दिल्ली के तख़्त का हकदार करार  दिया है । वरना मेरो फतह क्योंकर होती ? यह फतह नहीं एक करिश्मा था ।  ख़ुदावंदताला  में मुझे अपना एलची बनाकर भेजा है । उन्हें मुझ पर भरोसा है । पूरा एतमाद है । [इसी पुस्तक से]
  • Kavi Ne Kaha : Uday Prakash
    Uday Prakash
    240 216

    Item Code: #KGP-1954

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : उदय प्रकाश
    सादगी उदय प्रकाश की कविताओं की जान है जो हर उस आदमी से तुरंत रिश्ता कायम कर लेती है जो सामाजिक अन्याय और शोषण की मार उन लोगों के बीच बैठा सह रहा है, जिनके पास आंदोलन और नारे नहीं हैं, सिर्फ खाली अकेले न होने का अहसास भर है। ये कविताएँ पाठक की संवेदना में बहुत कुछ ऐसा तोड़फोड़ कर जाती हैं, जिनके सहारे वह फिर कुछ नया रचने की ज़रूरत महसूस करने लगता है । किसी भी यातना को कवि बिना उस यातना से मानसिक रुप से गुज़रे हुए प्रेषित नहीं कर सकता । उदय प्रकाश की कविताएँ काफी कुछ इसकी दुर्लभ मिसाल है । -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
    कविताओं में उदय प्रकाश की एक और कलात्मक विशेषता गौरतलब है । वे एक ओर वर्तमान के अलग-अलग संदर्भों और  स्थितियों को लेते हैं, पृथक और विच्छिन्न दुनियाओं को साथ-साथ रख देते हैं, ये पिघलकर एक इकाई बन जाते हैं । इनके 'फ्यूजन' से एक समग्र समय बनता है हम इन पृथक और विभिन्न दिखते संदर्भों और स्थितियों के भीतर की तारतम्यता तक पहुंचते हैं। यहीं कविता का अभीष्ट है। कुछ कविताओं में उदय प्रकाश ने बीज से वृक्ष बनने तक की पूरी प्रक्रिया को उलट दिया है । जैसे कोई विपरीत दिशा में चलती फ़िल्म हो । यह एक रचनाकार का नियति के क्रम में हस्तक्षेप है । -विजय कुमार 
    क्यों ऐसा नहीं हुआ कि उदय प्रकाश की कविताओं में छिपे उनके कथाकार और उनकी कहानियों में छिपी कविता पर सतर्क पाठको का ध्यान जाता और मूल्यांकन की कोई और नई समावेशी पद्धति जन्म लेती ! जिस जादुई यथार्थवाद के लिए …. उदय प्रकाश की कहानियों अनेकार्थी जान पड़ती हैं और एक से अधिक पाठ के लिए पाठकों को उत्युक बनाती हैं उससे मिलती-जुलती अपरिचयीकरण (डिफेमिलियराइजेशन) सरीखी काव्ययुक्ति का इस्तेमाल करके ही उनकी कविताएँ अधिक सार्थक बन सकी हैं । -परमानंद श्रीवास्तव
  • Alif Laila Hazar Dastan
    Amrita Pritam
    120 108

    Item Code: #KGP-7822

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Khushwant Singh
    Khushwant Singh
    215 194

    Item Code: #KGP-538

    Availability: In stock


  • Ritusamhaar (Paperback)
    Kaalidas
    195

    Item Code: #KGP-7035

    Availability: In stock

    ऋतुसंहार
    प्रेम, सौंदर्य, भक्ति, मर्यादा, कला व संस्कृति के सम्मिश्रण का दूसरा नाम है—कालिदास। स्थान व काल के संदर्भ में अपने को अपरिचित रखकर जिसने अपनी कृतियों के माध्यम से, विषयवस्तु के साथ-साथ भारतवर्ष की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक गरिमा और भौगोलिक सौंदर्य से हमें सुपरिचित कराया, वह आज किसी एक काल व एक स्थान का कवि न होकर, सार्वकालिक विश्वकवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है।
    उसी महाकवि की एक छोटी-सी काव्यकृति है—‘ऋतुसंहार’। इसमें सचित्रा षड् ऋतु वर्णन के परिपार्श्व में तदनुरूप स्त्री-पुरुष के प्रेम और सौंदर्य-भोग का श्रृंगारिक चित्रण हुआ है।
    इस त्रैभाषिक पुस्तक की विशेषता एक तो यह है कि सामान्य हिंदी पाठक हिंदी रूपांतर द्वारा कालिदास के काव्य-सौंदर्य एवं प्रेम की अनुभूति प्राप्त करेंगे, दूसरी यह कि संस्कृत जानने वाले संस्कृत मूल का भी रसास्वादन कर सकेंगे। तीसरी विशेषता यह कि अंग्रेजी अनुवाद से आधुनिक पाश्चात्य प्रेमी भी भारत की संस्कृति की सरसता से परिचय पा लेंगे।
    इस चित्रात्मक कृति की सर्वोपरि विशेषता भी है। वह यह कि यह पुस्तक गृहस्थाश्रम में कदम रखने वाले युवक-युवतियों के लिए पठनीय है और मित्रों एवं सखियों को विवाहोत्सव पर भेंट करने के लिए इसे खास तौर से तैयार कराया गया है।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    200 180

    Item Code: #KGP-0001

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार भीष्म साहनी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'वाङ्चू',  'साग-मीट', 'पाली', 'समाधि भाई रामसिंह', 'फूलां', 'सँभल के बाबू', 'आवाजें', 'तेंदुआ', 'ढोलक' तथा 'साये'।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार भीष्म साहनी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Om Prakash Valmiki
    Om Prakash Valmiki
    175 158

    Item Code: #KGP-432

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : ओमप्रकाश वाल्मीकि
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘बैल की खाल’, ‘अम्मा’, ‘बंधुआ लोकतंत्रा’, ‘पीटर मिश्रा’, ‘शवयात्रा’, ‘छतरी’, ‘घुसपैठिए’, ‘प्रमोशन’, ‘बपतिस्मा’ तथा ‘पच्चीस चैका डेढ़ सौ’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jangal Ke Jeev-Jantu
    Ramesh Bedi
    450 405

    Item Code: #KGP-820

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Main Vahan Hoon
    Ganga Prasad Vimal
    75 68

    Item Code: #KGP-1889

    Availability: In stock

    बस कुछ उमर का

    बस कुछ ठहर का
    सब
    ठीक हो जाएगा

    वर्षा के बाद
    धुलती सड़क की तरह

    किस्मत के खुलने पर
    न ताप रहेगा
    न संताप
    न भूख
    न हड़कम्प

    अखबार
    बड़े-बड़े शीर्षक और गुणी लोग
    तेज़ घोडों पर सवार
    अदृश्य हो जाते है हवा में

    और फिर आमरण
    चिंताओं की तरह
    चिपके रहते है स्मृति में

    बस कुछ ठहर कर ।
    -(इसी पुस्तक से)
  • Aadivasi Shourya Evam Vidroh (Jharkhand)
    Ramnika Gupta
    280 252

    Item Code: #KGP-751

    Availability: In stock

    इतिहास-लेखन को लेकर समय-समय पर सहमतियाँ व असहमतियाँ दर्ज की जाती रही हैं। कई बार वे व्यक्ति/समुदाय/संघर्ष/प्रतिवाद हाशिए पर रह जाते हैं या नेपथ्य में चले जाते हैं जिन्होंने समय के नुकीले प्रहार सहे होते हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में आदिवासियों को प्रायः नेपथ्य में रखा जाता रहा है। धीरे-धीरे उनके संघर्षों के मूल्यांकन का कार्य शुरू हुआ। यह एक तरह से असंख्य मनुष्यों के प्रति सभ्यता का आभार ज्ञापन भी है। रमणिका गुप्ता ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘आदिवासी: शौर्य एवं विद्रोह (झारखंड)’ उनका इस सिलसिले में नया हस्तक्षेप है। झारखंड के आदिवासियों पर केंद्रित इस पुस्तक में अनेक भूले-बिसरे वृत्तांत समाहित हैं।
    रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित प्रस्तुत पुस्तक में वीरांगना सिनती दई, पहाड़िया वीर, तिलका माँझी, रानी शिरोमणि, सिदो व कान्हू, पृथ्वी माँझी, बिरसा मुंडा तथा जतरा भगत आदि अविस्मरणीय चरित्रों के विषय में महत्त्वपूर्ण सामग्री सँजोई गई है। अनेक लेखकों ने झारखंड के आदिवासियों का योगदान रेखांकित किया है। भूमिका में रमणिका लिखती हैं, ‘झारखंड के शौर्य और विद्रोह की यह गाथा बूढ़े बुजुर्गों की स्मृतियों, उनके गीतों, बैलेड्स, लीजेंड्रियों, लोककथाओं व किंवदंतियों और अंग्रेजों द्वारा लिखे गए दस्तावेजों के ऐतिहासिक तथ्यों पर आधरित है।’ सचमुच, आदिवासियों का योगदान इतना विस्मयपूर्ण है कि वह लोककथाओं, लोकगीतों का अनिवार्य हिस्सा बन गया है। अपने देश और समाज के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने वाली विभूतियों का जीवन चरित पीढ़ियों को प्रेरणा दे रहा है। 
    आज के संदर्भ में ऐसी पुस्तकों का महत्त्व इस कारण बढ़ जाता है क्योंकि ‘जल-जंगल-जमीन’ को लेकर कई तरह के संघर्ष छिड़े हुए हैं। एक व्यापक सामाजिक न्याय की भूमिका बनाती यह सामग्री विस्मृतप्राय इतिहास का नया आख्यान है।