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  • Snehbandh Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    130

    Item Code: #KGP-7038

    Availability: In stock

    वरिष्ठ रचनाकार मालती जोशी असंख्य पाठकों की प्रिय कहानीकार हैं। आज जब अनेक तर्क देकर यह कहा जा रहा है कि साहित्य के पाठक सिमटते जा रहे हैं तब पाठकों को मालती जोशी की हृदयस्पर्शी कहानियों की प्रतीक्षा रहती है। ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ में उनकी ऐसी ही रचनाएं हैं। उनकी लोकप्रिय रचनाशीलता का रहस्य लेखन की सहजता में छिपा है। कथानक का चयन, भाषा, पात्रों का अंतरद्वंद्व और अभिव्यक्ति प्रणाली—सबमें एक सहजता अनुभव की जा सकती है। मालती जोशी छोटी-छोटी घटनाओं या अनुभूतियों से रचना का निर्माण करती हैं। उनका ध्यान व्यक्ति और समाज की मानसिकता पर रहता है। बाहरी हलचल से अधिक वे मन की सक्रियता अंकित करती हैं। उनकी कहानियों के पात्र भावुक, विचारशील, निर्णय संपन्न और व्यावहारिक होते हैं। आदर्श के मार्ग पर चलते हुए वे कोरी भावुकता में नहीं जीते। एक अजब पारिवारिकता उनकी रचनाओं में महकती रहती है। संवाद मालती जोशी की पहचान हैं। छोटे-छोटे वाक्य, संकेतों से भरे शब्द औरसंवेदना की अपार ध्वनियां—इन गुणों से भरे संवाद पाठक के मन में उतर जाते हैं। किस्सागोई और विवरणशीलता का बहुत अच्छा उपयोग इन कहानियों में मिलता है। परिस्थिति और संयोग के माध्यम से प्रसंगों को गति मिलती है।
    इस संग्रह की सारी कहानियां स्त्री-मन की गहराई व सच्चाई को पूरी विश्वसनीयता के साथ व्यक्त करती हैं। यहां प्रचलित विमर्श नहीं, जीवन की समझ से उत्पन्न विवेक है। निश्चित रूप से ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ की सभी कहानियां पाठकों की प्रशंसा प्राप्त करेंगी।
  • Uttar Ghaat Adhura
    Ramashankar Shrivastva
    65 59

    Item Code: #KGP-9069

    Availability: In stock


  • Comprehensive English-Hindi Dictionary_495
    Bholanath Tiwari
    495 446

    Item Code: #KGP-32

    Availability: In stock

    COMPREHENSIVE ENGLISH-HINDI DICTIONARY

     The present comprehensive English-Hindi Dictionary stands as the crowning work of the four decade long effort of the well known Hindi linguist-cuin-lexicographer Dr. Bhola Nath Tiwari and Dr. Amar Nath Kapoor, a distinguished scholar of English language studies.

     The main merit of the present dictionary is its practical and explanatory character. The editors have illustrated the proper and contextual usage of each and every word, phrase, idiom and expression through sentences and this goes to make the lexicon a work of tremendous relevance for the entire gamut of bilingual activity being undertaken in the country at almost all levels of our social system, educational institutions and government departments.

     Basically meant for the average Indian reader who goes to a dictionary to find correct spelling, correct usage and the most common present meaning of all the live words of English usage, the chief function of die present dictionary is to present not only comprehensiveness, accuracy and simplicity but also to record usage as pan of a perfect language.

     Simple form and the most pragmatic approach as far as the spelling and pronunciation of words is concerned has been adopted wit‘: 2 view to make the average educated Indian use English—both written and spoken word—in such a way that the listener or the reader is able to under- stand and appreciate what is being said in its correct parlance.

  • Himalaya Gaatha-6 (Itihaas)
    Sudarshan Vashishath
    995 896

    Item Code: #KGP-788

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-6 (इतिहास)
    इधर इतिहास, परंपरा और संस्कृति में लेखन कम हो रहा है । सुदर्शन वशिष्ठ एक ऐसे साहित्यकार हैं जो सशक्त कहानीकार और कवि होने के साथ संस्कृति, इतिहास एवं पुरातत्त्व में भी बराबर की पैठ रखते हैं । सरकारी सेवा में रहने के कारण संस्कृति और पुरातत्त्व से वर्षों तक इनका जुड़ाव रहा जिसने इन्हें इस क्षेत्र में  कुछ करने के  लिए प्रेरित किया ।
    इतिहास, परंपरा और संस्कृति पर लिखने वाले बिरले लेखकों में हैं वशिष्ठ, जो अपनी यायावर प्रवृत्ति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते हैं । जहाँ इतिहास की बात आई है, वशिष्ठ ने निरपेक्ष होकर तथ्यों के आधार पर केवल ऐसी बात की है जो प्रामाणिक हो । यूरोपियन इतिहासकारों की टिप्पणियां ज्यों की त्यों न उतारकर उन पर तर्कसंगत विवेचन के साथ साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना  है ।
    बहुत बार तथाकथित किंवदंतियां या लोकवार्ता भी इतिहास बनती हैं । अत: पौराणिक आख्यान, स्थान विशेष के माहात्म्य, वीरगाथाओं तथा कथाओं को भी यर्थाचित स्थान देकर प्रस्तुत किया गया है ताकि आसानी शोधकर्ता कार्य कर सकें ।
    इस क्षेत्र के उपलब्ध इतिहास में आज तक मात्र यूरोपियन इतिहासकारों की पुस्तकों के ज्यों के त्यों उतारे रूपांतर मिलते हैं । प्रस्तुत इतिहास लेखन में वशिष्ठ न कई ऐसी पुरातन दुर्लभ पुस्तकों और 'पांडुलिपियों के संदर्भ दिए हैं जो आज तक किसी ने नहीं दिए । भारतीय विद्वानों द्धारा लिखी गई  वंशावलियां, ऐतिहासिक पुस्तकें, पांडुलिपियां इस इतिहास लेखन का आधार रही हैं जिस कारण इसमें नए-नए तथ्यों का उदघाटन हुआ।  यूरोपियन विद्वानों के अलावा मियां अक्षर सिंह, मियां रघुनाथ सिंह, दीवान सर्वदयाल, उगर सिंह, बिहारी लाल, मियां रणजोर सिंह, बालकराम शाद आदि भारतीय इतिहासकारों को समाविष्ट कर नए निष्कर्ष निकाले गए हैं । इस दृष्टि से यह इतिहास एक नई खोज हमारे सामने प्रस्तुत करता है । 
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत छठे खंड में पर्वतीय क्षेत्र के इतिहास पर ऐसी दुर्लभ सामग्री दी जा रही है, जो पहले कहीं उदघाटित नहीं हुई । 


  • Vishva-Kavita Ki Or
    Shyam Singh Shashi
    140 126

    Item Code: #KGP-9082

    Availability: In stock


  • Jangal Ke Jeev-Jantu
    Ramesh Bedi
    450 405

    Item Code: #KGP-820

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain (Paperback)
    Kunwar Narayan
    90

    Item Code: #KGP-1217

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।

  • SWAPNAPAASH
    Manisha Kulshreshtha
    240 216

    Item Code: #KGP-1572

    Availability: In stock

    'स्वप्नपाश' नृत्य और अभिनय से आजीविका-स्तर तक संबद्ध माँ-बाप की संतान गुलनाज फरीबा के मानसिक विदलन और अनोखे सृजनात्मक विकास व उपलब्धियों की कथा है । समकालीन सनसनियों में से एक से शुरु हुई यह कथा हमें एक बालिका, एक किशोरी और एक युवती के उस आरिम अरण्य में ले जाती है जहाँ 'नर्म' और 'गर्म' डिल्युजंस और हैल्युसिनैशरेन का वास्तविक मायालोक है। मायालोक और वास्तविक? जी हाँ, वास्तविक क्योंकि स्वप्न-दु:स्वप्न जिस पर बीतते है उसके लिए कुछ भी 'वर्चुअल' नहीं-न सुकून , न सितम । उस पीडा को सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि खुली दुनिया में जीती-जागती काया की चेतना एक अमोघ पाश में आबद्ध हो जाए और अधिकांश अपने किसी सपने के पीछे भागते नज़र आएँ। पाश में बँधे व्यक्ति की मुक्ति तब तक संभव नहीं होती जब तक कोई और आकर खोल न दे। मगर जब एक सम-अनुभूति-संपन्न खोलने वाले की तलाशा त्रासद हो तो? दोतरफा यातना से गुज़रने के खाद अगर कोई मिले और वह भी हौलै-हौले एक नए पाश में बंध चले तो ? अनोखे रोमांसों से भरी इस कथा में एक नए तरह की रोमांचकता है जो एक ही बैठक में पढ़ जाने के लिए बाध्य कर देती है ।
    गुलनाज़ एक चित्रकार है और वह भी 'प्राडिजी'।  ऐसे  चरित्र का बाहरी और भीतरी संसार कला की चेतना और आलोचनात्मक समझ के बगैर नहीं रचा जा सकता था। कथा में पेंटिंग  की दुनिया के प्रासंगिक नमूने और ज्ञात-अल्पज्ञात नाम ऐसे आते हैं गोया वे रचनाकार के पुराने पड़ोसी हों। आश्चर्य तो तब होता है जब हम नायिका की सृजन-प्रविधि और उसको पेंटिग्स के चमत्कृत (कभी-कभी आतंकित) कर देने वाले विवरण से गुजरते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ मूलत: चित्रकार हैं। उनकी रचनात्मक शोधपरकता का आलम यह है कि वे इसी क्रम में यह वैज्ञानिक तथ्य भी संप्रेषित कर जाती है कि स्किजोफ्रेनिया किसी को ग्रस्त भर करता है, उसे एक व्यक्ति के रूप में पूरी तरह खारिज नहीं करता ।
    स्किजोफ्रेनिया पर केंद्रीय यह उपन्यास ऐसे समय में  आया है जब वैश्वीकरण की अदम्यता और अपरिहार्यता के नगाड़े बज रहे हैं। स्थापित तथ्य है कि वैश्वीकरण अपने दो अनिवार्य घटकों-शहरीकरण और विस्थापन- के द्वारा परिवारिक ढाँचे को ध्वस्त करता है। मनोचिकित्सकीय शोधों के अनुसार शहरीकरण स्किजोफ्रेनिया के होने की दर को बढ़ाता है और पारिवारिक ढाँचे में टूट रोग से मुक्ति में बाधा पहुँचाती है। ध्यातव्य है कि गुलनाज पिछले ढाई दशकों में बने ग्लोबल गाँव की बेटी है । अस्तु, इस कथा को एक गंभीर चेतावनी की तरह भी पढे जाने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन, कला और मनोविज्ञान-मनोचिकित्सा की बारीरिज्यों को सहजता से चित्रित करती समर्थ और प्रवहमान भाया में लिखा यह उपन्यास बाध्यकारी विखंडनों से ग्रस्त समय में हर सजग पाठक के लिए एक अनिवार्य पाठ है ।
  • Himalaya : Aitihaasik Evam Pauranik Kathayen
    Padamchandra Kashyap
    200 180

    Item Code: #KGP-1932

    Availability: In stock

    हिमालय ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाएँ
    एक समय आया जब भारतीय संस्कृति के अजस खोट स्त्रोत  देवात्मा पुण्यात्मा नगाधिराज़ हिमालय के मानव को  असंस्कृत, प्लेच्छ, वृषल कहकर मुख्य धारा से बाहर हाशिये पर ला बिठा दिया गया । वह सच्चाई जानता था, अविचल रहा । पाषाण युग से आरंभिक वैविध्यपूर्ण अतीत के इस उत्तराधिकारी का सच और झूठ मापने का निजी पैमाना था । वह न कभी विजेता से भयभीत हो उसके आगे नतमस्तक हुआ और न पराजित को दुत्कारा, भुलाया । उसने इंद्र का सम्मान किया किंतु सहानुभूति वृत्र को दी और उसे भी देवता माना । पांडवों की जीत स्वीकार की, पर 'उद्दंड’ कहकर उन्हें दुर्दैव के हवाले कर दिया । 'शालीन' कौरवों को सराहा तथा 'मामा विष्णु' का प्यार दिलाया । महाभारत का कारण साग-सब्जी की वाटिका थी, तो सीता-हरण के पीछे उसका पकाया हुआ बड़ा' । सनुद्र-मंथन से निकला अमृत कहीं छलका, महाप्रलय के बाद मनु की नाव कहाँ उतरी और पुनः कृषि के लिए बीज कौन लाया, इसकी नई जानकारी दी । उसने मनुष्य को देवता बनते देखा और स्वयं देवता को मनुष्य बना, उसे खिलाव-पिलाया, नचवाया, साथ चलाया, चाकरी करवाई और दंडित भी किया, भले ही वह बडा देव विष्णु हो या महादेव शिव । महात्मा बुद्ध को देवराज इंद्र, अनाम राज्य की एक सनाम रानी को  परशुराम माता रेणुका तथा यमुना नदी को द्रोहणी घोषित किया ।
    सहज, सरल, बातचीत की भाषा में, हलके-फुलके रोचक ढंग से हिमालय संतति की देखी-सुनी बताता है लघु कथाओं का यह संग्रह, जिसमें वेद है, इतिहास-पुराण भी । इसमें तथ्य है, कथ्य है, विद्वता का दबाव नहीं ।
  • Samrat Chandragupta Mourya
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-257

    Availability: In stock


  • Pashchatya Kavya Shastra Ka Itihas
    Dr. Tarak Nath Bali
    395 356

    Item Code: #KGP-864

    Availability: In stock


  • Pracheen Tutan Kahaniyan
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-07

    Availability: In stock

    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
  • Madhavi Kannagi
    Chitra Mudgal
    90 81

    Item Code: #KGP-975

    Availability: In stock

    लगभग दो हजार वर्ष पुराना तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पधिकारम्’ को विषय बनाकर मैं तुम्हारे लिए एक उपन्यास लिखना चाह रही थी। अचानक एक दिन एन. सी. ई. आर. टी. से डाॅ. रामजन्म शर्मा का फोन आया। उनका आग्रह हुआ कि ‘पढ़ें और सीखें’ योजना के अंतर्गत मैं बाल-पाठकों के लिए ‘शिलप्पधिकारम्’ को आधार बनाकर एक बाल-उपन्या लिखूं। किन्हीं कारणों से डाॅ. रामजन्म शर्मा के दुबारा आग्रह पर मुझे दूसरी पुस्तक लिखनी पड़ी। 
    पिछले वर्ष संयोग से कंेद्रीय हिंदी निदेशालय के नव-लेखन प्रशिक्षण शिविर में दक्षिण जाना हुआ। वहां कुछ मित्रों ने उलाहना दिया कि तमिल साहित्य की समृद्धि के बारे में उत्तर भारत के बाल-पाठक कुछ नहीं जानते। बस, इस उलाहने ने मुझे बेचैन कर दिया। पुरानी इच्छा जाग उठी। पाण्डिचेरी से लौटकर मैंने ‘माधवी कन्नगी’ तुरंत लिखना शुरू कर दिया। उपन्यास पूरा हो गया।
    —चित्रा मुद्गल
  • Hindi Sahitya : Sarokaar Aur Saakshaatkaar
    Dr. Arsu
    300 240

    Item Code: #KGP-9031

    Availability: In stock

    हिंदी साहित्य : सरोकार और साक्षात्कार
    हिंदी मात्र हिंदीभाषी क्षेत्र की ही नहीं, बल्कि इस विशाल समूचे देश की भाषा बन चुकी है और उसे यह स्थान दिलाने में अनुवाद के आदान-प्रदान के साथ हिंदीतर क्षेत्र के साहित्यकारों द्वारा हिंदी को अपनाए जाने से संभव हुआ है। हिंदीतर क्षेत्र के अनेक साहित्यकार अपने क्षेत्र के भाषायी साहित्य के साथ हिंदी साहित्य और उसके सरोकारों से गंभीरतापूर्वक जुड़े हुए हैं। डॉ. आरसु हिंदीतर भाषी क्षेत्र के मूर्धन्य साहित्यकार है । वह कालिकट विश्वविद्यालय से हिंदी विभाग के प्राध्यापक है, साथ ही सृजनशील साहित्यकार तथा मर्मग्राही समीक्षक हैं।

    केरल के मलयालमभाषी डॉ० आरसु की यह पुस्तक 'हिंदी साहित्य : सरोकार और साक्षात्कार' इस तथ्य को भली भाँति प्रमाणित करती है कि हिंदी साहित्य की प्रवृतियों और प्रणेताओं पर उनकी निरीक्षण और विश्लेषणपरक वृष्टि कितनी गहरी है । आठवें दशक के हिंदी साहित्य की धाराओं के बारे में सृजन संवाद इस कृति की अनूठी विशेषता है । विदेशो से रहकर निष्ठापूर्वक हिंदी की श्रीवृद्धि करने वाले लेखकों व अनुवादकों के साथ डॉ० आरसु के आंतरिक संवाद, जो वैश्चिक स्तर पर हिंदी के विकास का द्योतक है, को भी इससे कुशालता के साथ रेखांकित किया गया है ।

  • Aastha Ka Raasta
    Dr. Arsu
    160 144

    Item Code: #KGP-9002

    Availability: In stock

    आस्था का रास्ता 
    हर युग की समस्याएं और संवेदना, बदलती रहती हैं । इसका असर साहित्य पर पड़ना सहज स्वाभाविक है, लेकिन बाहरी तौर की विकास योजनाएं हमेशा हमें अंतर्दृष्टि नहीं देती हैं । अंतर्दृष्टि ही आस्था की नीव है । विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के युग में साहित्य में आए परिवर्तन के स्वरूप पर साहित्यकार के मन में आशंकाएं बढ़ रही हैं ।
    आस्था का आलोक बुझ रहा है । बुद्धि-विकास के अनुपात में अनाज हृदय-विकास नहीं होता है । परंपरा, संस्कृति, साहित्य, धरोहर और विरासत का महत्त्व आज फीका पढ़ रहा है ।
    इसके कारणों-परिणामों पर सोच-विचार करने वाले अट्ठारह लेखों का संकलन ।
    मलयालमभाषी हिंदी लेखक और अनुवादक डॉ० आरसु की अद्यतन कृति । इसमें चिंतन का इंधन है । आस्था और आशंकाओं की धड़कन है ।
  • Jansampark : Avadharana Evam Badalata Svaroop
    Kri. Shi. Mehta
    250 225

    Item Code: #KGP-297

    Availability: In stock

    जनसंपर्क, जनसंचार का एक ऐसा घटक है जो एक ओर तो जनसंचार को जीवंत रखता है, वहीं दूसरी ओर उसके प्रभाव अथवा परिणाम के संबंध में विषय विशेषज्ञ भी कोई निश्चित दावा नहीं कर सकते। उसके इस अनिश्चित चरित्र का प्रमुख कारण जनसंपर्क के भागीदार त्रिमूर्ति के बीच विचित्र संगम, समन्वय एवं संप्रेक्षण के अभाव में निहित है। जनसंपर्क वह सूत्र है जो इस त्रिमूर्ति-यानी संदेश, माध्यम तथा हितग्राही को सक्रिय करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह करता है। आज तक किसी ऐसे नियम या मंत्र की खोज नहीं हो पाई है जो जनसंपर्क के प्रभाव ओर उसके परिणाम की सफलता अथवा असफलता का पूर्वानुमान लगा सके।
    जनसंपर्क निरंतर प्रवाहित होने वाली ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर उस देश की भौगोलिक संरचना, ऐतिहासिक परंपरा, संस्कृति, स्थानीय बोलियां एवं भाषा, सामाजिक एवं धार्मिक आचार-विचार, स्थानीय मान्यताओं इत्यादि अनेक बातों तथा घटनाओं का प्रभाव उस परिवेश की त्रिमूर्ति पर निरंतर प्रतिबिंबित होता रहता है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से यह जनसंपर्क के अनिश्चित चरित्र के कारण हो सकते हैं।
    आज एक ओर मीडिया के आधुनिक उपकरणों ने अनायास ही जनसंपर्क के सर्वथा नए द्वार खोल दिए हैं और भविष्य में भी ऐसे अनेक द्वार खुलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, वहीं दूसरी ओर भारत की तेजी से बढ़ती हुई आर्थिक एवं औद्योगिक प्रगति के साथ शैक्षणिक विकास ने हितग्राहियों की रुचि, सामाजिक जीवन एवं संस्कृति के क्षेत्र में उथल-पुथल मचा रखी है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Asghar Wajahat (Paperback)
    Asghar Wajahat
    100

    Item Code: #KGP-7197

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    असग़र वजाहत

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से  स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार असग़र वजाहत की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘केक’, ‘दिल्ली पहुंचना है’, ‘अपनी-अपनी पत्नियों का सांस्कृतिक विकास’, ‘होज वाज पापा’, ‘तेरह सौ साल का बेबी कैमिल’, ‘शाह आलम कैंप की रूहें’, ‘शीशों का मसीहा कोई नहीं’, ‘जख्म’, ‘मुखमंत्राी और डेमोक्रेसिया’ तथा ‘सत्यमेव जयते’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार असग़र वजाहत की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan (Paperback)
    Mukesh Parmar
    90

    Item Code: #KGP-1306

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधरस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • Plot Ka Morcha
    Shamsher Bahadur Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-588

    Availability: In stock


  • Vishwa Ke Mahaan Shikshavid (Paperback)
    M.A. Sameer
    250

    Item Code: #KGP-7209

    Availability: In stock

    जीवन में सफलता व अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था और अपेक्षा–इन तीन शक्तियों को भलीभांति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित कर लेना चाहिए।
    यह विचार एक ऐसे शिक्षक का है, जिसके एक शिष्य ने इन विचारों को न केवल आयुध बनाकर अपने जीवनयुद्ध में प्रयोग किया, अपितु इनसे जीवनयुद्ध का विजेता बनकर संसार के सर्वश्रेष्ठ आयुध्-निर्माताओं में से एक बना। जी हां, यह विचार है इयादुराई सोलोमन नाम के दक्षिण भारतीय शिक्षक और उनका यह शिष्य भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का, जिन्होंने वैज्ञानिकी में स्वयं को समर्पित करके ‘मिसाइलमैन’ की उपाधि प्राप्त की।
    पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद डाॅ. अब्दुल कलाम भारत के ऐसे पहले राजनेता थे, जिन्हें बच्चों का स्नेह प्राप्त था और ‘काका कलाम’ कहकर संबोधित किया जाता था। बच्चों को देश का भविष्य मानने वाले डाॅ. अब्दुल कलाम अकसर समय निकालकर छात्रों के बीच जाते और बच्चों के प्रश्नों के उत्तर बड़ी सहजता से देते और उन्हें भविष्य में कुछ करने के लिए प्रेरित करते। जीवन के मूल्य, आदर्श और सफलता के मंत्र बड़ी रोचक वाणी में बताते। उनके द्वारा लिखित आत्मकथा ‘विंग्स आॅफ फायर’ में उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने विचारों और दृष्टिकोण से मार्ग दिखाया है। उनकी एक-एक बात प्रेरणादायी है। उनका समूचा जीवन ही प्रेरणादायी है।
    आज तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं की बढ़ती संख्या का कारण डाॅ. अब्दुल कलाम की वह प्रेरणा ही है, जिसने देश को आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में सक्षम किया है। डाॅ. कलाम भारतीय तकनीकी विकास को विज्ञान के हर क्षेत्र में लाने का समर्थन करते थे। उनका कहना था कि साॅफ्टवेयर का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए, जिससे अधिक संख्या में लोग इसकी उपयोगिता का लाभ उठा सकें। इसी से सूचना तकनीक का विकास तीव्र गति से हो सकेगा। डाॅ. कलाम का राष्ट्रपति काल भारत के स्वर्णिम काल में से एक है। बिना किसी राजनीतिक विवाद के उन्होंने यूरोपीय देशों और पड़ोसी देशों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे और देश की विकास गति को थमने नहीं दिया। 25 जुलाई, 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ और वे फिर से वैज्ञानिकी एवं तकनीक के क्षेत्र में आ गए।
    ऐसा कहा जाता है कि जब डाॅ. कलाम राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के रूप में प्रवेश कर रहे थे तो उनके एक हाथ में एक थैला था, जो पांच वर्ष बाद जब वे वहां से कार्यमुक्त हुए तो उनके साथ ही था। वे शाकाहारी थे और अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे। समय का उनकी दृष्टि में बड़ा महत्त्व था और इसके सदुपयोग के लिए वे व्यवस्थित चर्या का पालन करते थे।
    –इसी पुस्तक से
  • Manch Andhere Mein (Paperback)
    Narendra Mohan
    60

    Item Code: #KGP-1335

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Vaya Pandepur Chauraha
    A.M. Nayar
    350 315

    Item Code: #KGP-249

    Availability: In stock

    डा. नीरजा माधव हिंदी कथा-साहित्य का एक जाना- पहचाना नाम है। अनेक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों तथा छोटी कक्षाओं में भी उनकी कहानियां, कविताएं और उपन्यास पढ़ाए जा रहे हैं। नित नई और अनछुई भूमि पर अपना कथानक रचने वाली डा. नीरजा माधव ‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’ के माध्यम से ‘इम्पोटेंट इन्टेलीजेंसिया’ का एक भीतरी चेहरा बेनकाब करती हैं। किस तरह आज का बुद्धिजीवी मुखौटा लगाए सामाजिक सरोकारों की बात करता है, किस प्रकार शस्त्र बने शब्दों का मुंह स्वयं अपनी ओर घूम जाता है और हम तिलमिला उठते हैं अपना ही असली चेहरा देख। मानव मन की कृत्रिमता और विवशता को परत दर परत उधेड़ने वाली अलग ढंग की कहानियों का अनूठा संग्रह है--‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’।
  • Dharti Ki Satah Par
    Adam Gondvi
    250 225

    Item Code: #KGP-1904

    Availability: In stock

    आज से लगभग दो दशक पहले अदम गोंडवी की कुछ गजलें पढ़ने को मिली थीं । सियासत. लोकतंत्र और व्यवस्था पर चाबुक मारती अदम गोंडवी की गजलों में एक ऐसी खनक सुनाई देती थी, जैसी अस्सी के दौर में धूमिल की कविताओं और दुष्यंत कुमार की गजलों में । गोंडा के एक छोटे से गॉव से ऊपर उठकर अदम का यश भूमंडलव्यापी हो उठा था ।  उन्हें देख यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि खसरा खतौनी में रामनाथ सिंह के नाम से जाना जाने वाला यही शख्स गजल की चेतना में चिन्गारियाँ पैदा करने वाला अदम गोंडवी है । उनकी मकबूलियत का आलम यह कि सियासत से लेकर अदब से ताल्लुक रखने वालों तक की जबान पर उनके शेर विराजते रहे हैं । गजल की परंपरा ने दुष्यंत कुमार की गजले एक मोड मानी जाती हैं तो अदम कीं गजलें एक दूसरा मोड अख्तियार करती हैं जिसमें एक साथ वे स्थानीयता से लेकर बाजारवाद और भूमंडलीकरण तक से जिरह करते हैं । धरती की सतह पर' का परिवर्धित संस्करण गज़लों में उनकी अलहदा शख्सियत की गवाही देता है ।
    महज प्राइमरी तक की तालीम हासिल करने वाले अदम गोंडवी का बुनियादी काम यो तो खेती-किसानी रहा है किन्तु इस काश्तकार ने गजल की भी एक इन्कलाबी फसल बोई है, जिसके चाहने वाले पूरे देश में फैले हैं । दशकों पहले से उनकी गजल के इस इन्कलाबी मिसरे- 'काजू भुने हैं प्लेट में व्हिस्की गिलास में/ उतरा है रामराज विधायक निवास में'--ने अचानक उन्हें अदबी इलाके में चर्चा में ला दिया था । मंच पर आग उगलने वाली गजलों को सुन उसी लोग पूछते थे, यह किसानी लिबास वाला शख्स कौन है? चेहरे-मोहरे और पहनावे से लगभग धूमिल की याद दिलाने वाले अदम के चेहरे पर एक किसान की खुद्दारी दिखती थी ता गजलों में आज़ादी के बाद मुल्क का लुता-पिटा नक्शा साफ नजर आता था ।  अदम अभावों की धूसर दुनिया से बावस्ता ऐसे नागरिक थे जिन्हें देखकर आप यह मान ही नहीं सकते थे कि वे ही हमारे समय के अविस्मरणीय कवि अदम हैं ।
    -ओम निश्चल
  • Khoyi Huyi Thati
    Ganga Prasad Vimal
    50 45

    Item Code: #KGP-9064

    Availability: In stock


  • Samkalin Sahitya Samachar September, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #September, 2017

    Availability: In stock

  • Anaam Yatraayen
    Ashok Jairath
    300 270

    Item Code: #KGP-237

    Availability: In stock

    जीवन एक सफर और हमें निरंतर इस सफर में चलते रहना है । जो चलता रहा, वह जीता रहा और जो बैठ गया, सो बैठ गया । अकसर लोग यात्राओं से घबराते है । कई कारण हैं -आर्थिक अभाव साथ की कमी या वैसे ही मन नहीं करता, आलस्य में स्चा-बसा मन बस आराम करना चाहता है । हमारा शरीर 'हड्ड हराम' हैं, वह आराम चाहता है, पर जितना ही इसे माँजा जाए, उतना ही यह निखरता है ।
    हिमालयी श्रृंखलाएं, हिममंडित शिखर व्यक्ति को बार-बार बुलाते हैं । इनके ऊपर गूंजते संगीत के स्वर और लोककाथाएं आत्मविभोर कर देती हैं और इनके अजस्र जलस्रोत जहां नैसर्गिक परिवेश को जन्म देते है, वहीं पर थके हुए मन और शरीर को संबल देते है ।
    लेखक ने पश्चिमी हिमालयी सांस्कृतिक क्षेत्र व अनेक हिमानियों के साथ-साथ दूसरे दुर्गम इलाकों की साहसिक यात्राएं की हैं, जिनका विशद विवरण इस पुस्तक के रूप में पाठकों को सौंपा जा रहा है । ये यात्राएं कूमाऊं-गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय एव सांस्कृतिक क्षेत्रों से ही संबंधित हैं, मात्र द्वारकापुरी की यात्रा को छोड़कर । यात्राओं का निरंतर सिलसिला लेखक के अलमोड़ा में प्रवास के दौरान शुरू हुआ, जब सारे उत्तरांचल के साथ हिमानियों को भी ट्रेक किया गया, जहाँ हिमालियाई संस्कृति को बहुत करीब से देखकर स्वयं लेखक हिमालियाई हो आया था ।
    इन ब्योरों के साथ ही उन सभी साथियों-सहयोगियों और मार्गदर्शक का सीधा-सहज और बिना किसी लाग-लपेट के वर्णन भी दिया जा रहा है, जो इन संस्मरणों को और भी मनोरंजक और दिलचस्प बना देता है । आशा है, ये सभी संस्मरण/यात्राओं का वर्णन पाठकों को अच्छा लगेगा ।
  • Anuvaad Vigyan
    Bholanath Tiwari
    250 225

    Item Code: #KGP-735

    Availability: In stock

    अनुवादविज्ञान
    अनुवाद को उसके पूरे परिप्रेक्ष्य में लें तो वह मूलतः अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है। साथ ही अनुवाद करने में व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से भी हमें बड़ी सहायता मिलती है। इस तरह अनुवाद भाषाविज्ञान से बहुत अधिक संबद्ध है।...
    जहाँ तक अनुवाद का प्रश्न है, विद्यार्थी-जीवन में पाठ्यक्रमीय अनुवाद की बात छोड़ दें तो सबसे पहले अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘नेहरू अभिनंदन ग्रंथ’ में मुझे अनुवाद करने का अवसर मिला। उसी समय कुछ भाषा-संबंधी लेखों के मैंने अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किए। ‘गुलनार और नज़ल’ नाम से एक अंग्रेज़ी पुस्तक का संक्षिप्तानुवाद 1952 में पुस्तकाकार भी छपा था। 1962-64 में रूस में अपने प्रवास-काल में कुछ उज़्बेक, रूसी तथा इस्तोनियन कविताओं का भी मैंने हिंदी-अनुवाद किया था। ताशकंद रेडियो में 1962 में मेरे सहयोग से हिंदी विभाग खुला था। वहाँ प्रतिदिन आध घंटे के कार्यक्रम के लिए रूसी, उज़्बेक, अंग्रेज़ी आदि से हिंदी में अनुवाद किया जाता था, जिसका पुनरीक्षण मुझे करना पड़ता था। 1968 में भारतीय अनुवाद परिषद् ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका ‘अनुवाद’ के संपादन का भार मुझे सौंपा और समयाभाव के कारण, न चाहते हुए भी, कई मित्रों के आग्रह से मुझे यह दायित्व लेना पड़ा।
    प्रस्तुत पुस्तक की सामग्री के लेखन का प्रारंभ मूलतः ‘अनुवाद’ पत्रिका का सिद्धांत विशेषांक निकालने के लिए कुछ लेखों के रूप में हुआ था। विशेषांक के लिए कहीं और से अपेक्षित सामग्री न मिलने पर धीरे-धीरे मुझे अपनी सामग्री बढ़ानी पड़ी, किंतु अंत में सामग्री इतनी हो गई कि विशेषांक में पूरी न जा सकी। वह पूरी सामग्री कुछ अतिरिक्त लेखों के साथ प्रस्तुत पुस्तक के रूप में प्रकाशित की जा रही है।  -भोलानाथ तिवारी
  • Jahaanoon
    Manorma Jafa
    240 216

    Item Code: #KGP-197

    Availability: In stock

    कॉलेज में रक्षाबंधन की छुट्टी थी। अनुराधा सुबह-सुबह ही तैयार होकर निकल गई। मैं उसे फाटक तक पहुँचाने गई। हरसिंगार के पेड़ के नीचे खड़ी थी। जमीन पर बिखरे फूल महक रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने फूल बीनकर अपने दुपट्टे के एक कोने में रखने शुरू कर दिए कि तभी एक मोटरसाइकिल बराबर में आकर रुक गई। मैंने मुड़कर देखा, अनुराधा के राजू भैया थे।

    "क्यों भई, किसके लिए फूल बीन रही हो?"

    मन में तो आया कह दूँ ‘आपके लिए।’ पर  जबान नहीं खुली।

    "अनुराधा को लेने आया था। आज रक्षाबंधन है। बुआ जी के यहाँ उसे मैं ही पहुँचा दूँगा।"

    "पर वह तो अभी-अभी वहीं चली गई।"

    "मैंने तो उससे कहा था कि मैं आऊँगा! बड़ी बेवकूफ है।"

    "भूल गई होगी।"

    "तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? तुम भी उसके साथ क्यों नहीं चली गईं? रक्षाबंधन में सब लड़कियाँ बहनें और सब लड़के उनके भैया," और वह हँसने लगे।

    "क्या मतलब?"

    "मेरा कोई मतलब नहीं था। तुम चलो तो मैं तुम्हें भी अनुराधा की बुआ के यहाँ ले चलता हूँ।"

    "नहीं, मुझे पढ़ाई करनी है। यहीं रहूँगी।"
    —इसी उपन्यास से
  • 20-Best Stories From Turkey (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7203

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folkstales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Turkish short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Prince Ahmed, Storm Fiend, Deceiver and the Thief, Fortuneteller, Shah Jussuf, Forlorn Princess, this book is a compilation of 20 famous Turkish short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Turkey.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-12

    Availability: In stock


  • Bhartiya Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-2
    Shuk Deo Prasad
    450 405

    Item Code: #KGP-9152

    Availability: In stock

    सत्तरादि के आरंभ में हिंदी और हिंदीतर भाषाओं में वैज्ञानिक कहानियां प्रभूत मात्रा में लिखी जाने लगीं। बंगला में सत्यजित राय और प्रेमेन्द्र मित्र के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इन्होंने अपनी लेखनी को विराम क्यों दिया? क्या विज्ञान कथाएं कथा की एक विधा के रूप में जनमानस में अपनी पैठ नहीं बना सकीं?
  • Aadhi Raat Ka Surya : Vaigyanik Kathayen
    Dr. Rajiv Ranjan Upadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-320

    Availability: In stock

    नॉर्वे में मध्य जून से सितंबर मास तक दिन-रात चमकने वाला सूर्य, चंद्रमा की-सी शीतलता रखता है। इसी ग्रीष्म ऋतु में ‘आधी रात का सूर्य’ की घटना घटित होती है। वास्तव में अपराधियों को पकड़ने की डी.एन.ए. ‘फिंगर प्रिंटिंग’ तकनीक के उपयोग के पूर्व इसका संकेत इस कथा में प्रथम बार हुआ है। 
    प्रकृति के रहस्यों को स्पष्ट करने तथा समझने की चेष्टा का फल आधुनिक विज्ञान है, जिसने तर्क और प्रयोगों के सोपानों पर आरूढ़ होकर, मात्र दो सौ वर्षों के अंतराल में, मानव के जीवन को सुखमय बनाने तथा उसे विविध संसाधन उपलब्ध कराने में आशातीत सफलता प्राप्त की है। तथ्यतः मानव के इतिहास में जितनी प्राप्ति विज्ञान ने इन वर्षों में की है, वह एक प्रकार से अभूतपूर्व कही जाएगी।
    मैं मिस्र (इजिप्ट) के नागरिक, रसायनज्ञ मित्र के निमंत्रण पर काहिरा गया था। उन्हीं के साथ विश्वविख्यात गीजा के पिरामिड को भी देखा था। क्लोनिंग को आधार बनाकर, इस ‘पिरामिड’ की पृष्ठभूमि में लिखी गई इसी नायक की कथा इस संग्रह का अंश है। 
    आतंकवाद से जूझ रहे देशों में ‘जैविक आतंकवाद’ की कल्पना सिहरन पैदा कर देती है। इसी पक्ष को बिंबित करती--एंटीरैवियोला वैक्सिन के द्वारा मानवता को त्रण देने का प्रयास करती कथा है--‘जिससे मानवता बची रहे।’
    वह दिन दूर नहीं है, जब मानव अंतरिक्ष के होटलों में जाकर आराम करेगा। पुनः धरती पर अपना कार्य करने, कुछ डॉलर खर्च कर आ जाया करेगा। निकट भविष्य में अंतरिक्ष टूरिज्म प्रारंभ हो जाएगा। आने वाले वर्षों में कंप्यूटर और बुद्धिमान बन जाएगा तथा रोबो संवेदनशील होकर मानव के अधिकांश कार्यों का संपादन करने लगेंगे। 
    आज हम अपने बदलते पर्यावरण की समस्या से परिचित हैं और ‘ग्रीन हाउस’ गैसों और उनसे संबंधित प्रभावों को नियंत्रित करने के प्रयास में लगे हैं। यह समस्या मूलभूत रूप से आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति के असंतुलित पक्ष की ओर संकेत करती है। पर्यावरण को संरक्षित करने की तकनीकों की खोज में वैज्ञानिक लगे हुए हैं।
    हम अनेक ग्रहों, उपग्रहों, शनि और मंगल के रहस्यों को भी समझने के प्रयास में रत हैं। इतना ही नहीं, विज्ञान और वैज्ञानिक ब्रह्मांड की संरचना एवं उसके उत्पत्ति के सूत्रों को खोजने में, हिग्स बोसानों की उपस्थिति ज्ञात कर चुके हैं।
    इसी प्रकार विज्ञान द्वारा प्रदत्त संसाधनों का उपयोग कर, विकसित राष्ट्रों ने ऊर्जा का असंतुलित रूप में दोहन किया है, जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा के नवीन स्रोतों, जो पारंपरिक माध्यमों से इतर हों, को विकसित करने का प्रयास चल रहा है। 
    प्रथम बार हिंदी भाषा की ललित शैली में लिखी गईं ‘दूसरा नहुष’, ‘आधुनिक ययाति’, ‘अंतरिक्ष दस्यु’ एवं ‘जिससे मानवता बची रहे’ नामक विज्ञान कथाओं के साथ गुंपिफत हैं दो लघु विज्ञान कथाएं, जो इस विधा की प्रतिनिधि हैं। त्वरित गति से विकसित हो रही प्रौद्योगिकी के प्रभावों, परिणामों, तज्जनित परिवर्तनों आदि की झलक आपको इन कथाओं में दृष्टिगोचर तो होगी ही, साथ ही साथ आशा है, यह संग्रह आपका स्वस्थ मनोरंजन करने में भी सफल होगा। 
  • Tukara-Tukara Waqt
    Shashi Sahgal
    60 54

    Item Code: #KGP-1866

    Availability: In stock

    टुकड़ा-टुकड़ा वक्त
    शशि सहगल की कविताओं के केन्द्रीय स्वर को जानने के लिए उनकी एक कविता 'असर' पर नज़र डाले :
    झाड़ा-पोंछा
    दिखने में साफ
    कलफ लगी साडी-सा
    कड़क व्यक्तित्व ओढ
    बाहर जाना अच्छा लगता है ।

    ढ़ीले-ढाले वजूद के
    घर के पायदान पर ही छोड़
    हीन भावना से उबरती हुई देह
    दो कदम बाहर रखते ही
    आत्मविश्वास से भर उठती है
    कलफ़ का असर
    कुछ ऐसा ही होता है ।

    शशि जी की कविताएँ घर के अन्दर की कविताएँ जरूर है, लेकिन वे घर में बंद नहीं हैं और ना ही घर और परिवार के संबंध मात्र ही उनकी कविताओं की सीमा हैं । वे घर से बाहर भी झाँकती है और अपने से बाहर भी । अपने भीतर और बाहर तथा घर के अन्दर और घर से बाहर के द्वन्द्वात्मक रिश्तों की वजह से आई दरारें उनकी कविताओं का विषय बनती हैं । उनके पहले कविता-संग्रह में भी इस संवेदन के पहचान बड़े गहरे स्तर पर रही है । इस कविता-संग्रह में यह संवेदन और भी गहराया है । इसमें कहीं मूल्य तलाशने की उत्कटता भी है, 'बाजार' होते रिश्तों में कहीं खुद को बचाकर रखने की केशिश भी । यही इन कविताओं के शक्ति है ।

  • Aalamgeer
    Shashi Sahgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1903

    Availability: In stock

    [जहानारा के चले जाने पर औरंगजेब पुश्तैनी तलवार को उठाकर देर तक देखता रहता है।]
    औरंगजेब : दिल्ली के तख्त पर बादशाह सलामत मुझे खुद बिठा रहे  हैं ।  बादशाह सलामत समझ गए हैं कि मैं ही हुकूमत करने के काबिल हूँ । (उल्लास के साथ) एक ही झटके से पका-पकाया फल गोद में आ गिरा है । (ऊपर-नीचे टहलता है) पर नहीं, यह खुदावंदताला की बख्यिश है ।  यह बरकत  खुदावंदताला की ही हुई है, और किसी की नहीं । 
    [कहीं से हलकी-सी आवाज आती है ।]
    आवाज़ : जहानारा ने जो कुछ कहा, तुमने फ़ौरन ही मान लिया । 
    औरंगजेब : वह बादशाह सलामत की तरफ़ से पेशकश लाई थी ।
    आवाज़ : पर यह एक चाल भी तो हो सकती है ।
    औरंगजेब : चाल क्यों ? यब 'आलमगीर' तलवार, भी उसने साफ कहा हैं कि दिल्ली के तख़्त पर तुम बैठोगे ।
    आवाज़ : वह दिल्ली तृम्हारे दुश्मनों से घिरी  होगी । दारा शूकोह जो इस वक्त भागता फिर रहा है, वह फिर से पंजाब का सूबेदार बनकर लोट आएगा, मुरादबख्श गुजरात में और शुजा बंगाल में । क्या तुम भूल गए कि दारा को ज़हानारा ने ही वली अहद बनवाया था । दारा और जहानारा दो जिस्म एक जान है । दोनों सूफी मुल्लाशाह के शागिर्द।  दिल्ली मुल्लाशाह के मुरीदों का अड्डा बनेगी ।
    औरंगजेब : (स्वत:) सब बात वहीं को वहीं लौट आएगी । ...पर बादशाह सलामत ने मुझे दिल्ली का तख्त अता फर्माया है ।
    आवाज़ : नहीं, वह तुमने अपनी तलवार के जोर में हासिल किया है । वह तुम्हें खुदावंदताला के फजल से मिला है । यह नादर मौका है, औरंगजेब । फिर ऐसा नायाब मौका तुम्हारे हाथ नहीं आएगा । इस चाल को समझो, औरंगजेब । बादशाह सलामत तुम्हारे हाथ में बिल्ली के तख़्त  का झुनझुना पकड़ा देना चाहते है । दारा शुकोह  को बहाल करने का उनके पास यही एक तरीका है ।
    औरंगजेब : (स्वत:) न जाने कौन लोग बादशाह सलामत ने मिलने  आते है । उनके इरादे कौन जान सकता है ? किले की ऊंची दीवारों के पीछे न जाने साजिशें पक रही हैं।
    आवाज़ : दारा की सुबेदारी बहाल होगी तो वह फिर से फ़ौजें मुनज्जम कर सकता है । बादशाह सलामत उसकी पीठ पर हैं । वह अभी भी अपने आपको वली अहद समझे हुए है ।
    औरंगजेब : बादशाह सलामत दारा की पीठ पर है तो ख़ुदावंदताला  मेरे हक में है ।  ख़ुदावंदताला  ने मुझे दिल्ली के तख़्त का हकदार करार  दिया है । वरना मेरो फतह क्योंकर होती ? यह फतह नहीं एक करिश्मा था ।  ख़ुदावंदताला  में मुझे अपना एलची बनाकर भेजा है । उन्हें मुझ पर भरोसा है । पूरा एतमाद है । [इसी पुस्तक से]
  • Pranaam Kapila (Paperback)
    Devendra Deepak
    250

    Item Code: #KGP-1547

    Availability: In stock

    खंड 'अ' के कवि 
    डॉ. अब्दुल ज़ब्बार, अयोध्या प्रसाद ‘हरिऔध’, अरविंद कुमार तिवारी, अशोक जमनानी, आशाराम त्रिपाठी, इस्माइल मेरठी, कमलेश मौर्य ‘मृदु’, काका हाथरसी, कुंकुम गुप्ता, डॉ. कृष्ण गोपाल मिश्र, कृष्ण गोपाल रस्तोगी, डॉ. कृष्ण मुरारी शर्मा, गणेशदत्त सारस्वत, पं. गांगेय नरोत्तम शास्त्री, पं. गिरिमोहन गुरु, गिरीश ‘पंकज’, चकबस्त, छीत स्वामी, जगदीश किंजल्क, डॉ. जयकुमार ‘जलज’, जयकुमार जैन ‘प्रवीण’, आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री, तुलसीदास, दिनेश ‘प्रभात’, दिवाकर वर्मा, डॉ. दुर्गेश दीक्षित, आचार्य धर्मेन्द्र, नरहरि, नरेन्द्र गोयल, नारायणदास चतुर्वेदी, परमानंद, डॉ. परशुराम शुक्ल, डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही’, प्रकाश वैश्य, प्रताप नारायण मिश्र, प्रद्युम्ननाथ तिवारी ‘करुणेश’, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, प्रेमनारायण त्रिपाठी ‘प्रेम’ , आचार्य भगवत प्रसाद दुबे, भोजराज पटेल, डॉ. मनोहरलाल गोयल, महावीर प्रसाद ‘मधुप’, मुंशीराम शर्मा ‘सोम’, मुक्ति कुमार मिश्र, मैथिलीशरण गुप्त, डॉ. योगेश्वर प्रसाद सिंह ‘योगेश’, रघुनंदन शर्मा, रमेश कुमार शर्मा, रमेशचंद्र खरे, पं. राजेन्द्र तिवारी, डॉ. रानी कमलेश अग्रवाल, महात्मा रामचंद्रवीर महाराज, रामदास मालवीय, आचार्य रामनाथ ‘सुमन’, डॉ. रामप्रकाश अग्रवाल, रामस्वरूप दास, डॉ. राष्ट्रबंधु, लाला भगवानदीन, लक्ष्मीनारायण गुप्त ‘विश्वबंधु’, लक्ष्मी प्रसाद गुप्त ‘किंकर’, लेखराम चिले ‘नि:शंक’, वागीश ‘दिनकर’, विजय लक्ष्मी ‘विभा’, डॉ. विमल कुमार पाठक, विमला अग्रवाल, वियोगी हरि, डॉ. शरद नारायण खरे, शिवदीप ‘कनक’, श्याम नारायण पांडेय, श्रीकृष्ण मित्र, श्रीकृष्ण शर्मा, श्रीकृष्ण ‘सरल’, डॉ. श्रीराम परिहार, सुदर्शन ‘चक्र’, सुधेश जैन, डॉ. सुशीला आर्य, सूरदास, हनुमान प्रसाद पोद्दार,  पद्मश्री डॉ. हरिशंकर शर्मा, हरिश्चंद्र टाँटिया, हरीश दुबे
  • Yoon Banee Mahabharat (Paperback)
    Pratap Sehgal
    60

    Item Code: #KGP-1417

    Availability: In stock

    प्रताप सहगल
    कवि, नाटककार, कथाकार, आलोचक
    जन्म : 10 मई, 1945, झंग, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान में)
    प्रकाशित रचनाएँ 
    कविता-संग्रह : 'सवाल अब भी मौजूद है', 'आदिम आग', 'अँधेरे में देखना', 'इस तरह से', 'नचिकेतास ओडिसी', 'छवियाँ और छवियाँ' 
    नाटक : 'अन्वेषक',  'चार रूपांत',  'रंग बसंती', 'मौत क्यों रात- भर नहीं आती', 'नौ लघु नाटक', 'नहीं कोई अंत', 'अपनी-अपनी भूमिका', 'पाँच रंग नाटक', 
    तथा 'छू मंतर' और 'दस बाल नाटक'
    उपन्यास : 'अनहद नाद', 'प्रियकांत' 
    कहानी-संग्रह : 'अब तक', 'मछली-मछली  कितना पानी'
    आलोचना : 'रंग चिंतन', 'समय के निशान', 'समय के सवाल', 
    विविध : 'अंशतः' (चुनिंदा रचनाओं का संग्रह)
    सम्मान एवं पुरस्कार : ० मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार ० 'रंग बसंती' पर साहित्य कला परिषद द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख पुरस्कार ० 'अपनी-अपनी भूमिका' शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत  ० 'आदिम आग' व 'अनहद नाद' हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत ० सौहार्द सम्मान, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ ० राजभाषा सम्मान, भारत सरकार ० साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली और अन्य पुरस्कार । 
    संपर्क : एफ- 101, राजौरी गार्डन, नई दिल्ली- 110027
    फोन : 25100565, मो० : 9910638563
    ई-मेल : partapsehgal@gmail.com 

  • Avinashi
    Dr. Vishv Narayan Shastri
    150 135

    Item Code: #KGP-2046

    Availability: In stock

    अविनाशी
    संस्कृत वाड्मय में यद्यपि कथा-साहित्य का प्रचार है, किंतु आधुनिक रीती से लिखित उपन्यास की न्यूनता परिलक्षित होनी है । 'अविनाशी' संस्कृत-साहित्य का सर्वप्रथम ऐतिहासिक उपन्यास है, ऐसा कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । सप्तम शताब्दी के प्राग्ज्योनिष- पुर अर्थात असम राज्य के राजा कुमार भास्कर वर्मा के साथ कनौजाधिपति हर्षवर्धन की मित्रता तथा दोनों का परस्पर मिलकर गौड़ राज्य पर आक्रमण करना मुख्यतया इस उपन्यास का वर्ण्य विश्व है । उक्त ऐतिहासिक आधार पर औपन्यासिक कल्पना करने एवं चरित्र-चित्रण  युक्त सामाजिक, सांस्कृतिक विषयों पर प्रकाश डालने से उपन्यास का कलेवर परिपुष्ट हुआ है । मूल उपन्यास सन 1984 में संस्कृत भाषा में प्रकाशित हुआ था, तत्पश्चात् साहित्य अकादेमी आदि विभिन्न संस्थान- प्रतिष्ठानों ने पुरस्कृत भी किया था । इतिहास एवं कल्पना-संभूत होने पर भी इसका चारित्रिक चित्रण हृदयावर्जक एवं सामाजिकता से ओतप्रोत है । मानवोचित पारस्परिक प्रेम, ईष्यों, द्वेषादि गुणों, अवगुणों का भी सम्यक प्रकाशन हुआ है ।
    इस उपन्यास को सर्वसुलभ और बोधगम्य बनाने के लिए असमिया, बाँग्ला प्रभृति प्रादेशिक भाषाओं में भी इसका अनुवाद हुआ है और प्रकाशित भी किया जा रहा है । यह हिंदी संस्करण हिंदी-प्रेमी पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रकाशित किया जा रहा है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Gian Ranjan
    Gyanranjan
    160 144

    Item Code: #KGP-27

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ज्ञानरंजन ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'शेष होते हुए', 'पिता', 'फैंस के इधर और उधर', 'छलाँग', 'यात्रा', 'संबंध', 'घंटा', 'बहिर्गमन', 'अमरूद का पेड़' तथा 'अनुभव' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ज्ञानरंजन की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mahadevi Verma Ki Vishvadrishti
    Tomoko Kikuchi
    300 270

    Item Code: #KGP-647

    Availability: In stock

    महादेवी वर्मा की विश्वदृष्टि
    सामान्यतः महादेवी वर्मा की ख्याति रहस्यवादी कवयित्री के रूप में काफी समय तक स्थिर रही। उन पर लगाए जाने वाले पलायनवाद के आरोप का युक्तिसंगत खंडन करके महादेवी के साहित्य में प्रकट मानवीय दृष्टिकोण को सामने लाने के लिए इस पुस्तक में उनकी विश्वदृष्टि पर गहरा अध्ययन हुआ है।
    महादेवी के साहित्य को अधिक गहनता के साथ समझने के लिए उनके जीवन का सूक्ष्म विवेचन अनिवार्य है, अतः उनके व्यक्तिगत अनुभव के साथ उनके जीवन पर बौद्ध धर्म, संस्कृत काव्य, स्वाधीनता आंदोलन, गांधी, तत्कालीन समाज, संस्कृति, छायावाद आदि के प्रभाव के बारे में भी विचार किया गया है। इस पुस्तक में महादेवी की सभी साहित्यिक विधाओं का विश्लेषण हुआ है, जैसे कविता, गद्य, पत्रिका के साथ महादेवी द्वारा चयनित और अनूदित संस्कृत काव्य का भी विस्तार से विवेचन हुआ है। महादेवी की अब तक असंकलित ‘अबला’ और ‘विधवा’ जैसी महत्त्वपूर्ण कविताओं को हिंदी जगत् के सामने लाने का प्रयास भी हुआ है।
    महादेवी वर्मा का एक आश्चर्यजनक व्यक्तित्व है, जिन्होंने एक ही समय में अनेक भूमिकाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह किया है, जैसे साहित्यकार, संपादिका, कॉलेज की प्रधानाचार्या, समाज-सेविका इत्यादि। महादेवी के जीवन के उन विभिन्न पहलुओं से एक ही उद्देश्य और एक ही प्रेरणा पाई जाती है। उनका कहना है—"सब स्त्रियों में जागृति उत्पन्न करने, उन्हें अभाव का अनुभव कराने का भार विदूषियों पर है और बहुत समय तक रहेगा।" असल में इस पुस्तक में अभिव्यक्त सभी व्याख्याएँ यह प्रमाणित करने का प्रयास है कि महादेवी अपने साहित्य के माध्यम से एक तो स्त्रियों के मन में अन्यायपूर्ण स्थिति के प्रति प्रश्नचिह्न लगाने की प्रेरणा देती हैं और दूसरा, स्त्रियों को अपनी स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाने की शक्ति तथा साहस प्रदान करती हैं।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar
    Ajit Kumar
    160 144

    Item Code: #KGP-419

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'अपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Rigveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    300 270

    Item Code: #KGP-115

    Availability: In stock

    ऋग्वेद : युवाओं के लिए यहाँ ऋग्वेद के मन्त्रों की व्याख्याएँ उसे सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं, जिनसे आज का 'कंप्यूटर-सेवी' युवा किसी भी स्थिति में निरपेक्ष नहीं रह सकेगा । पारंपरिक ज्ञान की अमूल्य धरोहर उसके हाथों में रखने का प्रयास है यह पुस्तक ।
  • Jo Nahin Hai
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-1899

    Availability: In stock

    जो नहीं है
    यह मृत्यु और अनुपस्थिति की एक अद्वितीय पुस्तक है । राग और विराग का पारंपरिक द्वैत यहाँ समाप्त है । अवसाद और आसक्ति पडोसी है । यह जीवन से विरक्ति की नहीं, अनुरक्ति की पोथी है ।  मृत्यु मनुष्य का एक चिरन्तन सरोकार है और चूँकि कविता मनुष्य के बुनियादी सरोकारों को हर समय में खोज़ती-सहेजतो है, वह आदिकाल से एक स्थायी कवियमय भी है ।   विचार- शीलता और गहरी ऐन्द्रियता के साथ अशोक वाजपेयी ने  अपनी कविता में वह एकान्त खोजा-रचा है जिसमें मनुष्य का यह चरम प्रश्न हमारे समय के अनुरूप सघन मार्मिकता और बेचैनी के साथ विन्यस्त हुआ है
    यहाँ मृत्यु या अनुपस्थिति कोई दार्शनिक प्रत्यय न होकर उपस्थिति है । वह नश्वरता की ठोस सचाई का अधिग्रहण करते हुए अनश्वरता का सपना देखने वाली कविता है-अपने गहरे अवसाद के बावजूद वह जीने से विरत नहीं करती । बल्कि उस पर मँडराती नश्वरता की छाया जीने की प्रक्रिया को अधिक समुत्सुक और उत्कट करती चलती है
    दैनन्दिन जीवन से लेकर भारतीय मिथ के अनेक बिम्बो और छवियों को अशोक वाजपेयी ने मृत्यु को समझने-सहने  की युक्तियों के रूप में इस्तेमाल किया है । उनकी गीति-सम्वेदना यहाँ महाकाव्यात्मक आकाश को चरितार्थ करती है और उन्हें फिर एक रूढ हो गये द्वैत से अलग एक संग्रथित और परिपक्व कवि सिद्ध करती है
    यहीं किसी तरह की बेझिलता और दुर्बोधता नहीं, पारदर्शी लेकिन ऐंद्रिक चिंतन है, कविता सोचती-विचारती है पर अपनी ही ऐंद्रिक प्रक्रिया से । 
  • Nayee Samiksha Ke Pratimaan
    Nirmla Jain
    400 360

    Item Code: #KGP-654

    Availability: In stock

    "1930–1960 तक से समय को जॉन हॉलावे ने ‘साहित्यिक आलोचना में क्रांति’ का युग कहा है। कहना न होगा कि इस समय की सबसे महत्त्वपूर्ण और समृद्ध आलोचनात्मक प्रवृत्ति नयी समीक्षा है। प्रवृत्ति विशेष के लिए यह नाम 1941 में प्रकाशित जॉन क्रो रैंसम की इसी शीर्षक की रचना से रूढ़ हुआ।" प्रस्तुत पुस्तक ‘नयी समीक्षा के प्रतिमान’ की संपादक सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन ने भूमिका के इन शब्दों में उस समीक्षा पद्धति का उल्लेख किया जिसने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। रचना और आलोचना के अंतःकरण को संशोध्ति / परिवर्तित करने में ‘नयी समीक्षा’ के सूत्रों व समीकरणों ने ऐतिहासिक कार्य किया। दोनों विश्वयुद्धों के बीच का समय नयी समीक्षा के प्रारंभ, विकास और सिमटाव का भी समय है।
    नयी समीक्षा के अंतर्गत स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति समूह और विक्टोरियन साहित्य की नैतिकता के प्रति विरोध दर्ज हुआ। इससे जुड़े समीक्षक कविता के अध्कि शुद्ध मूल्यांकन के लिए उसको ऐतिहासिक सामाजिक विवरणों व रचनाकार की निजता से काट देना उचित समझते थे। इससे विश्लेषण का क्षेत्र रूपात्मक विलक्षणताओं तक सीमिति हो गया।
    हर आरोह का एक अवरोह होता है। ‘नयी समीक्षा’ की सीमाएं 1950 के आसपास उभरने लगीं। निर्मला जैन के शब्दों में, फ्नयी समीक्षा की सभी महत्त्वपूर्ण कृतियां पहले ही प्रकाशित हो चुकी थीं और आलोचक जैसे अपने ऐतिहासिक दायित्व को पूरा कर विराम की मुद्रा में थे। आलोचना का एक प्रमुख दौर, एक विशेष युग मानो समाप्त हो गया था।
    प्रस्तुत पुस्तक इस महत्त्वपूर्ण आलोचना युग की उल्लेखनीय विशेषताओं को मूल रचनाओं के अनुवाद द्वारा उपलब्ध कराती है। रेने वेलेक, क्लींथ बु्रक्स, आइवर विन्टर्स, टी. एस. इलियट, आई. ए. रिचड्र्स, ऐलन टेट और डब्ल्यू. के. विमसाट के लेखों का अनुवाद अजितकुमार, निर्मला जैन व चंचल चैहान ने किया है। अपने ढब की अकेली पुस्तक, जिसमें जाने कितनी बहसों के प्रस्थान अंतर्निहित हैं। पाठकों की सुविध के लिए दो परिशिष्टों में हिंदी-अंग्रेजी और अंग्रेजी-हिंदी शब्दावली भी दी गई है।
  • Patra-Samvad : Ageya Aur Nand Kishore Aacharya
    Krishna Dutt Paliwal
    175 158

    Item Code: #KGP-2018

    Availability: In stock

    पत्र-संवाद  : अज्ञेय और नंदकिशोर आचार्य
    अज्ञेय जी ने पुराने-नए लेखकों को अनगिनत पत्र लिखे हैं। यहीं मैंने नंदकिशोर आचार्य और अज्ञेय के पत्रों को एक साथ दिया है। इन पत्रों का मूल स्वर आत्मीयता से भरा-पूरा है। सार संक्षेप यह कि एक-दूसरे के प्रति स्नेह, आदर का इन पत्रों में एक संसार है। आचार-विचार में मतांतर रहते हुए भी आत्मीय संबंधों की मिठास में कोई कमी नहीं है।
    अज्ञेय जी की अंतरंगता तो बहुतों से रही लेकिन नंदकिशोर आचार्य से उनकी अंतरंगता की कोई सीमा नहीं रही। कभी यात्रा के बहाने, कभी शिविर के बहाने, कभी कार्यक्रमों की योजना के बहाने, कभी व्याख्यान माला के बहाने, कभी कार्यक्रमों में प्रतिभाशाली युवकों को आमंत्रित करने के बहाने अज्ञेय का अकेलापन नंदकिशोर आचार्य से भराव पाता रहा। इस दृष्टि से आचार्य उनके जीवन के 'कीमती' सखा रहे हैं।
    इन पत्रों की कथ्य-कला का सौंदर्य निजता के परम क्षणों का विस्तार है। इस विस्तार ने ही अज्ञेय जी और आचार्य जी के बीच एक अटूट संवाद-सेतु निर्मित किया है । -संपादक
  • Vaigyanik Pura Kathayen
    Dr. Rajiv Ranjan Upadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-236

    Availability: In stock

    वैज्ञानिक पुरा कथाएँ
    भारत में विज्ञान के विकास के इस युग में पुराकालीन विज्ञान कथाओं पर विज्ञानसम्मत दृष्टि से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि अनेक कथाओं में भविष्यद्रष्टा ऋषियों की दृष्टि में रचा-बसा विज्ञान प्रत्यक्ष दिखाई देता है। इस संग्रह की विमान संबंधित त्रिपुर: अंतरिक्ष में तीन नगर, मनचालित विमान: सौभ, हिरण्यनगर नामक कथाएँ इनके पुराकालीन अस्तित्व की साक्षी हैं।
    भारत का आयुर्विज्ञान कितना विकसित था, सर्जरी कितनी विकसित थी, इसके प्रभाव चरक संहिता और सुश्रुत संहिता तथा आयुर्वेद संबंधित अन्य ग्रंथों में उपलब्ध हैं। संजीवनी, महर्षि भृगु का चमत्कार, महर्षि च्यवन, विशल्या, अश्विद्वय, गणेश, महर्षि दध्यङ तथा उपमन्यु नामक कथाएँ हमारे पुराकालीन आयुर्वेदीय ज्ञान की परिचायक हैं।
    बुढ़ापा एवं मृत्यु का भय मनुष्य को सदैव से सताता रहा है। दीर्घ और अमर जीवन तथा सदैव यौवनयुक्त रहने की मानव की अनादिकाल से कामना रही है। इसी प्रभाव का प्रतिबिंब समुद्र-मंथन और राजा ययाति नामक कथाओं में विद्यमान है। 
    लिंग-परिवर्तन की घटनाएँ पुराकाल में भी होती रही होंगी, इस तथ्य की ओर इंगित करती कथाएँ हैं शिखंडी तथा इला।
    द्रोणाचार्य, कौरवों तथा बेन से उत्पन्न पुत्र की कथा प्राचीन आख्यानों में सुरक्षित है, जो उस युग में भी मौजूद कृत्रिम गर्भाधान विधि की ओर संकेत करती है।
    पुरुष-शरीर में निहित स्तन-वृद्धि नियंत्राक और यौन-कार्य संपादन में प्रभावी जैव रसायनों के स्रोव में परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप, आधुनिक विज्ञान में उपलब्ध विवरणों के अनुसार, पुरुष में स्तन-वृद्धि ही नहीं होती वरन् उसके स्तनों से दुग्ध- स्रोव भी हो सकता है–राजा मांधाता की कथा इसी तथ्य को प्रदर्शित करती है।
    वैदिककाल के भारतीय गणितज्ञों में श्रेष्ठ महर्षि गृत्समद ने शून्य तथा संख्याओं का आविष्कार किया। गणित में निहित वैज्ञानिक तर्कशील पद्धति के उपयोग को प्रदर्शित करती कथाएँ हैं–धु्रव, राजा ककुघ्न, राजा त्रिशंकु और असुर-त्रित की ऋग्वेदिक कथा।                      
    यह निर्विवाद तथ्य है कि क्लोनिंग, विशेषकर मानवीय संदर्भ में, पुराकाल के चिंतकों, वैज्ञानिकों को अज्ञात थी, परंतु उनके उर्वर मस्तिष्क में संभवतः इस विधा के भविष्य में विकसित हो जाने के बिंब थे, जिसके कारण उन्होंने नृसिंह के रूप की कल्पना की थी। यह कथा एक प्रभावी, भविष्योन्मुखी विज्ञान कथा है।
    भारतीय ऋषियों के रसायन ज्ञान का दर्शन कराती कथा है महर्षि आरुणि उद्दालक की। बहुवर्णित मृत्यु के पूर्व अथवा मृत्यु के अवसर पर मानव-शरीर के रहस्य को तंत्रिका वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है। आधुनिक विज्ञान की संदेशवाहक बहुश्रुत कथा है सत्यवान की।
    एक वस्तु को अनेक स्वरूप प्रदान करना शिल्प है। वज्र के निर्माण में निहित शिल्प का प्रयोग वृत्रसुर-विनाश, सुदर्शन चक्र तथा महर्षि दधीचि की कथाओं में हुआ है।
    भारतीय ऋषि भूगर्भीय परिवर्तन, उनके परिणाम एवं प्रभाव से अछूते नहीं थे। उन्होंने पृथ्वी पर उभरते और पुनः धरा में लोप होते पर्वतों को देखा था। विंध्यगिरि, श्वेत वराह, खंड-प्रलय एवं और्व-अग्नि नामक कथाएँ भूगर्भ के विविध पक्षों को चित्रित करती हैं।
    नारद के ब्रह्मांड-भ्रमण में पदार्थ-पारण तथा परमाणु- विस्फोट का आश्चर्यजनक वर्णन, जो हमारे पुराणों, रामायण एवं महाभारत में उपलब्ध है, वह आँखों द्वारा देखा हुआ प्रतीत होता है। क्या यह ऋषियों की कल्पना-शक्ति का प्रतिबिंब है अथवा इस प्रकार के लघु परमाणु-विस्फोट करने की (ब्रह्मास्त्र के माध्यम से) विधि ज्ञात थी ? परीक्षित के जन्म की कथा इसी प्रकार के प्रभाव से संबद्ध है।
    वामन अवतार की कथा सूर्य के प्रकाशपुंज विवर्तन के प्रभाव से जुड़ी है। वास्तव में आलंकारिक वैदिक भाषा में उर्वशी-उषा का प्रतीक है, इस पक्ष में अहल्या, सरमा की कथाओं से कम लोग परिचित हैं। इनसे संबंधित भ्रांतियों के निराकरण तथा इनकी कथाओं में निहित तथ्यों के स्पष्टीकरण को ध्यान में रखकर ये कथाएँ संगृहीत की गई हैं।
    इस संग्रह की कथाओं का अनुशीलन करने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि ऋग्वेद में वर्णित असुर-त्रित की गणित संबंधी कथा प्राचीनतम विज्ञान कथा है जो निर्विवाद रूप से प्रमाणित करती है कि विज्ञान कथाओं का उद्गम-स्थल भारत है, न कि योरोप।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma
    Tajendra Sharma
    270 243

    Item Code: #KGP-827

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghava (Paperback)
    Rangey Raghav
    140

    Item Code: #KGP-461

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रांगेय राघव 
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रांगेय राघव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'पंच परमेश्वर', 'नारी का विक्षोभ', 'देवदासी', 'तबेले का धुँधलका', 'ऊँट की करवट', 'भय', 'जाति और पेशा, 'गदल', 'बिल और दाना' तथा 'कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेकनीक्स'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रांगेय राघव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aacharya Chanakya
    Vishv Nath Gupta
    160 144

    Item Code: #KGP-251

    Availability: In stock


  • Hindi Vyakaran : Ek Navin Drishticon
    Kavita Kumar
    550 440

    Item Code: #KGP-65

    Availability: In stock

    यह पुस्तक सामान्य विद्यार्थियों की सामान्य समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण व्याकरण को छोटी-छोटी इकाइयों-भाषा-ढांचों-में विभाजित करके सुगम, सुबोध एवं सामान्य भाषा में प्रस्तुत करने का एक छोटा-सा प्रयास है। एक शुष्क विषय को रेखाचित्रण द्वारा सजीव व आकर्षक बनाकर, यथासंभव व्याकरणिक पारिभाषिक शब्दावली का कम से कम प्रयोग, आवश्यकतानुसार पुस्तक में स्थान-स्थान पर वर्तनी तथा विराम चिह्नों के प्रयोग संबंधी निर्देश, वाक्य-रचना पर विशेष ध्यान एवं प्रत्येक व्याकरणिक बिंदु पर प्रचुर उदाहरणों सहित प्रस्तुतीकरण इस पुस्तक की विशिष्टता है।
    -कविता कुमार
  • Ullanghan (Paperback)
    Bhairav Prasad Gupt
    190

    Item Code: #KGP-1544

    Availability: In stock

    डॉ. एस.एल. भैरप्पा
    (जन्म: 1934)
    पेशे से प्राध्यापक होते हुए भी, प्रवृत्ति से साहित्यकार बने रहने वाले भैरप्पा ऐसी गरीबी से उभरकर आए हैं जिसकी कल्पना तक कर पाना कठिन है। आपका जीवन सचमुच ही संघर्ष का जीवन रहा। हुब्बल्लि के काडसिद्धेश्वर कालेज  में अध्यापक की हैसियत से कैरियर शुरू करके आपने आगे चलकर गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के एन.सी.ई.आर.टी. तथा मैसूर के प्रादेशिक शिक्षा कालेज में सेवा की है। अवकाश ग्रहण करने के बाद आप मैसूर में रहते हैं।
    ‘धर्मश्री’ (1960) से लेकर ‘मंद्र’ (2002) तक आपके द्वारा रचे गए उपन्यासों की संख्या 19 है। उपन्यास से उपन्यास तक रचनारत रहने वाले भैरप्पा ने भारतीय उपन्यासकारों में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। 
    केंद्रीय साहित्य अकादेमी तथा कर्नाटक साहित्य अकादेमी (3 बार) का पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार--ऐसे कई पुरस्कारों से आप सम्मानित हुए हैं। अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता का, मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन करने का, अमेरिका में आयोजित कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने आदि का गौरव भी आपने अर्जित किया है।
    देश-विदेश की विस्तृत यात्रा करने वाले भैरप्पा ने साहित्येतर चिंतनपरक कृतियों की भी रचना की है। आपकी साहित्यिक साधना से संबंधित कई आलोचनात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित हो  चुकी  हैं।
  • Bhartiya Sant Parampara
    Baldev Vanshi
    500 450

    Item Code: #KGP-750

    Availability: In stock

    भारतीय संत परंपरा
    भावी विश्व का सच्चा विकास आर्थिक भूमंडलीकरण के साथ-साथ नैतिक-आध्यात्मिक चेतना को समाहित कर पूर्ण व संतुलित बनाया जा सकता है। आज भारत तथा समूचे विश्व को केवल संत ही बचा सकते हैं, क्योंकि वे केवल मनुष्य की नैतिक-आध्यात्मिक चेतना के प्रति बद्ध हैं, किन्हीं धर्मग्रंथों, संप्रदायों से नहीं।
    महात्मा बुद्ध ने जो उपदेश दिए वे आधुनिक मानवता के लिए अत्यधिक उपयोगी हैं, बल्कि वे उत्तरोत्तर अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं। लोभ, मोह, घृणा की आग में व्यक्ति, समूह और देश जल-झुलस रहे हैं। सभी जगह जड़वाद, भौतिकवाद के परिणामस्वरूप भोगवाद, तृष्णा, लिप्सा, संग्रह की असीम लालसा के वशीभूत जगत् जलता हुआ जंगल बन चुका है। इनसे बचने के उपदेश तथागत ने दिए थे। बौद्ध संस्कृति का यह सार्वभौम आधार सब देशों-समाजों को ग्राह्य, प्रीतिकर एवं स्पृहणीय लगेगा। फ्रांस के दार्शनिक बर्गसां, जर्मनी के दार्शनिक कांट ने इसे तात्त्विक दृष्टि से उपयोगी बताया है तो चेतनाद्वैतवादी ब्रेडले ने बुद्ध के तर्कवाद-विज्ञानवाद को युग-व्याधियों का उपयुक्त निदान माना है। 
    महात्मा बुद्ध के मूल उपदेशों में प्रज्ञा, शील, ध्यान पातंजलि के ध्यान-योग के अति निकट हैं तो मध्ययुगीन संतों की वाणी में इन्हीं का विस्तार है। अतः ‘भारतीय संत परंपरा’ वर्तमान विश्व मानव के लिए अमृततुल्य है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheep Singh
    Mahip Singh
    160 144

    Item Code: #KGP-2065

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार महीप सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उलझन', 'पानी और पुल', 'कील', ‘सीधी रेखाओं का वृत्त', 'शोर', 'सन्नाटा', 'सहमे हुए', 'धूप के अंगुलियों के निशान', 'दिल्ली कहाँ है?' तथा 'शोक'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महीप सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Nagar
    Vishnu Nagar
    150 135

    Item Code: #KGP-1872

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: विष्णु नागर
    कविता की दुनिया में तीन दशक से भी अधिक सक्रिय विष्णु नागर की प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में आपको उनकी कविताओं में समय के साथ आता बदलाव तो दिखाई देगा ही, यह भी दिखाई देगा कि वह सिर्फ व्यंग्य और विडंबना के कवि नहीं हैं। उनकी कविता में जीवन के अनेक पक्ष हैं, क्योंकि वह जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने का प्रयास करते हैं। वह अपने समय की राजनीति और समाज की विडंबनाओं को भी देखते हैं और जीवन के विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली करुणा, प्रेम, हताशा, विनोद को भी। उनके यहाँ जीवन की आपाधापी में लगे लोगों पर भी कविता है और अपने प्रिय की मृत्यु की एकांतिक वेदना को सहते लोगों पर भी। उनकी कविता से गुजरना छोटी कविता की ताकत से भी गुजरना है जो अपनी पीढ़ी में सबसे ज्यादा उन्होंने लिखी है। उनकी कविता से गुजरना कविता की सहजता को फिर से हासिल करना है। उनकी कविता से गुजरना व्यंग्य और करुणा की ताकत से गुजरना है। उनकी कविता से गुजरना अपने समय की राजनीति से साहसपूर्ण साक्षात्कार करना है। उनकी कविता से गुजरना विभिन्न शिल्पों, अनुभवों, संरचनाओं से गुजरना है और इस अहसास से गुजरना है कि विष्णु नागर सचमुच अपनी तरह के अलग कवि हैं। उनकी कविता को पढ़कर यह नहीं लगता कि यह किसी के अनुकरण या छाया में लिखी गई कविता है। यह मुक्ति के स्वप्न की कविता है, संसार के बदलने की आकांक्षा की कविता है। यह इतनी स्वाभाविक कविता है, जितनी कि हिंदी हमारे लिए है।
  • Tumhare Liye (Paperback)
    Himanshu Joshi
    120

    Item Code: #KGP-7057

    Availability: In stock

    तुम्हारे लिए
    आग की नदी!
    नहीं, नहीं, यह दर्द का दरिया भी है, मौन-मंथर गति से निरंतर प्रवाहित होता हुआ ।
    यह दो निश्छल, निरीह उगते तरुणों की सुकोमल स्नेह-गाथा ही नहीं, उभरते जीवन का स्वप्निल कटु यथार्थ भी है कहीं । वह यथार्थ, जो समय के विपरीत चलता हुआ भी, समय के साथ-साथ, समय का सच प्रस्तुत करता है ।
    मेहा-विराग यानी विराग-मेहा का पारदर्शी, निर्मल स्नेह इस कथा की भावभूमि बनकर, अनायास यह यक्ष-प्रश्न प्रस्तुत करता है-प्रणय क्या है? जीवन क्या है ? जीवन की सार्थकता किसमें है ? किसलिए ?
    ० 
    बहुआयामी इस जीवंत मर्मस्पर्शी कथा में अनेक कथाधाराएँ हैं। अनेक रूप हैं, अनेक रंग। पर ऐसा क्या है इसमें कि हर पाठक को इसके दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब दीखने लगता है ?
    ० 
    हिंदी के बहुचर्चित उपन्यासों में, बहुचर्चित इस उपन्यास के अनेक संस्करण हूए । मराठी, पंजाबी, कन्नड़, तमिल, उर्दू, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं में अनुवाद भी । दूरदर्शन से धारावाहिक रूप में प्रसारण भी हुआ । ब्रिटेन की एक कंपनी ने आडियो कैसेट भी तैयार किया, जो लाखों श्रोताओं द्वारा सराहा गया ।
  • Antim Padaav
    Hari Yash Rai
    180 162

    Item Code: #KGP-1825

    Availability: In stock

    अंतिम पड़ाव
    आज हम समय के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें दुनिया की बढ़ती समृद्धि और वैभव की सर्वभक्षी आकांक्षा सुकून देने के बजाय बेहद डराने वाली है। इस दौर में मनुष्यता का विघटन और क्षरण इतनी तेज़ी से हो रहा है कि सारा वैभव-प्रसार, पुरानी प्रतीकात्मक मिथकीय भाषा में कहूँ तो आसुरी लगता है। यह मात्र संयोग नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध है कि ‘ताकतवर’ होते मध्यवर्ग की निगाह को पूँजी की ताकतों ने उन सवालों की ओर से फेर देने में लगभग ‘सफलता’ हासिल कर ली है, जो कभी मनुष्यता की तरफदारी में हर गली-चैराहे को अपनी आवाज़ से गुँजाते थे। गनीमत है कि ऐसे क्रूर दौर में भी कुछ लोग हैं जो साहित्य, संस्कृति, कला और राजनीति में एक ज़िद के साथ मनुष्यता, नैतिकता और न्याय के सरोकारों के पास से न हटने का हठ ठाने हुए हैं। कथाकारों की ऐसी पाँत में हरियश राय का नाम तेज़ी से उभर रहा है, जो कहानी- कला की बारीकियों की ज़्यादा परवाह न करके मनुष्यता के पक्ष में जी-जान से खड़ा है। 
    हरियश अपनी कहानियों के लिए कथा-सामग्री का चयन रोज़मर्रा की उस उपेक्षित-तिरस्कृत दुनिया के अनुभवों के बीच से करते हैं, जो अब सामान्यतया अघाए लोगों के लिए सोच-विचार तक की चीज भी नहीं रह गई है। वे लगातार कोशिश करते रहे हैं कि अपने मध्यवर्गीय जीवन की सँकरी-सिकुड़ी चैहद्दियों को छोड़कर उन किसानों की ज़िंदगी के विस्तृत मैदान में जाएँ, जहाँ आज भी सबसे बड़ा सहारा धरती, सूरज, चाँद और वर्षा का है। दुनिया के बदल जाने और एक विश्वग्राम बन जाने के कनफोड़ू शोर में कितना ठहराव है, यह उनकी कहानियाँ पढ़कर जाना जा सकता है। यह ठहराव एक वर्ग और जगह का नहीं है। यह जगह-जगह है। यह तेज़ गति से दौड़ते राजधानी-नगरों के आसपास मौजूद है। इसे वृंदावन जैसे उन तीर्थ-नगरों के भजनाश्रमों में अनुभव किया जा सकता है, जहाँ जिजीविषाओं और शवों में बहुत दूरी नहीं रह गई है। ज़रूरत है इसे देखने, जानने, शिद्दत से महसूस करने और बदलने की कोशिश में लग जाने की। कदाचित् ये कहानियाँ ऐसा कुछ कर जाने की आकांक्षा में जन्मी और बड़ी हुई हैं।    
  • Hamara Kshitij
    Sudhakar Adib
    180 162

    Item Code: #KGP-7841

    Availability: In stock


  • Akshar-Kundali
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-1977

    Availability: In stock

    अक्षर-कुण्डली
    'पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे'-
    यह तो महाचैत्तन्य का अनुभव है ।
    इसके लिए तो मीरा हो जाना होता है ।
    लेकिन जब एक जिज्ञासु ऐसी मंजिल के
    सम्भावना अपने में नहीं देख माता,
    तब भी, मैं मानती हूँ कि उसके
    कान उस रास्ते के ओर लगे रहते है-
    जहाँ, दूर से मीरा के पाँव में बँधे
    हुए घुँघरू- उस पुरे रास्ते को तरंगित
    कर रहे होते है ।
    यह पुस्तक 'अक्षर-कुण्डली' मेरी किसी प्राप्ति की गाथा नहीं है । यह तो एक जिज्ञासु मन की अवस्था है, जिसे कभी-कभी किसी पवन के झोंके मेँ, मिली हुई मीरा के घुंघरुओं की ध्वनि सुनाई देती है... 
    -अमृता प्रीतम
  • Shrikant
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    600 540

    Item Code: #KGP-764

    Availability: In stock


  • Bhagwan Mahaveer
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-127

    Availability: In stock

    भगवान महावीर विश्व के उन महापुरुषों में थे, जो मानव-श्रेणी से ऊपर उठकर देव-कोटि में पहुंच जाते हैं । भगवान महावीर के उपदेशों, सिद्धांतों और शिक्षाओं को लोगों ने हृदय से स्वीकार किया । वे अहिंसा के साक्षात् अवतार थे । उनका हृदय करुणा से आपूरित था । वे मानव मात्र के कल्याण के लिए विश्व-बंधुत्व के भाव को जन-जन  तक पहुंचना चाहते थे ।
    आज़ विश्व से चारों ओर हिंसा का तांडव फैला है । सर्वत्र मार-काट मची है । एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करने की घात लगाए रहता है। ऐसी दशा में भगवान महावीर की शिक्षाएँ बहुत ही उपयोगी हैं। उनका बताया हुआ शांति का मार्ग सारे विश्व के लिए कल्याणकारी है । वे जन-जन में अहिंसा, सत्य, करुणा और प्रेम की उदात्त भावनाएँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं । 
    प्रस्तुत पुस्तक में भगवान महावीर के जीवन-परिचय के साथ-साथ उनके सिद्धांतो, उपदेशों और शिक्षाओं का भी उल्लेख किया गया है । समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उनकी शिक्षाओं पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए ।
    विश्वास है कि पाठक-समूह भगवान महावीर के जीवन और उपदेशों से प्रेरणा लेकर पूरे समाज का जीवन सुखी बना सकेगा ।
  • Mere Saakshatkaar : Manager Pandey
    Manager Pandey
    125 113

    Item Code: #KGP-541

    Availability: In stock


  • Bankon Mein Anuvaad Ki Samasyaen
    Bholanath Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-808

    Availability: In stock

    बैंकों में अनुवाद की समस्याएँ
    हिन्दी में बैंकों के प्रयोग पर बहुत कम पुस्तकें आई है, किन्तु बैंकों में अंग्रेजी सामग्री के हिन्दी अनुवाद की समस्याओं पर शायद यह पहली पुस्तक है ।
    डॉ० भोलानाथ तिवारी के 'अनुवाद : सिद्धान्त और प्रयोग' माला से 'अनुवाद विद्वान', 'काव्यानुवाद की समस्याएं', 'कार्यालयी अनुवाद की समस्याएं', 'वैज्ञानिक अनुवाद की समस्याएं', 'भारतीय भाषाओं से हिन्दी अनुवाद की समस्याएँ', 'विदेशी भाषाओं से हिन्दी अनुवाद की समस्याएँ' तथा 'पत्रकारिता में अनुवाद की समस्याएँ' के बाद यह आठवीं पुस्तक है ।
    यह पुस्तक विशेषत: बैकों में अनुवाद तथा सामान्यता अनुवाद में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Khushboo Ka Libas
    Kanhiya Lal Nandan
    1500 1350

    Item Code: #KGP-907

    Availability: In stock


  • Hum Sab Gunahgar
    Mastram Kapoor
    350 315

    Item Code: #KGP-9027

    Availability: In stock

    हम सब गुनहगार
    लीक से हटकर सोचने वालों ने आशा को नहीं, निराशा को कर्म की प्रेरणा कहा है।
    डॉ. लोहिया ने निराश रहकर काम करते जाने को ही सबसे अच्छा कर्तव्य कहा है।
    फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक एवं दार्शनिक ज्यांपाल सार्त्र ने भी सर्वोत्तम कर्मशक्ति डिस्पेयर की परिभाषा करते हुए कहा है, ‘दि एक्ट विदाउट होप।’
    ‘मा फलेषु कदाचन’ के कथन द्वारा गीता में भी इस सत्य को ही कहने की कोशिश की गई है...
    वर्तमान निराशा के धुँधलके में भविष्य को खोजने का लघु प्रयास यह पुस्तक स्वातंतत्र्योत्तर भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विसंगतियों का भविष्योन्मुख विवेचन है।
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-7110

    Availability: In stock


  • Kasturigandh Tatha Anya Kahaniyan
    Poonam Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-302

    Availability: In stock

    कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ
    ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ पूनम सिंह का दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह की कहानियों में व्यक्ति भी है, परिवार भी और समाज भी। विस्तार, गहराई और संपूर्णता के साथ। इसलिए ये कहानियाँ स्त्री द्वारा रचित होने पर भी सिर्फ स्त्री-समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। इनमें स्त्रीवादी लेखन की शक्ति का स्वीकार भी है और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण भी। इस तरह हिंदी में हो रहे स्त्री-कथा-लेखन को ये कहानियाँ नया आयाम देती हैं।
    प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व की उपज हैं। इनमें परंपरा के जीवित तत्त्वों का स्वीकार आधुनिकता के दायरे में किया गया है। ‘कस्तूरीगंध’, ‘उससे पूछो सोमनाथ’ तथा ‘पालूशन मानिटरिंग’ जैसी कहानियाँ इस कथन के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में देखी जा सकती हैं। इनमें परंपरा के उस पक्ष का अस्वीकार है, जो आधुनिक सोच के विरुद्ध है। इन कहानियों की आधुनिकता नई जीवन स्थितियों के बेहतर रूप का सृजनधर्मी आयाम है, जिसे कहानी-लेखिका ने सीधे, पर सधे शिल्प में उपलब्ध किया है।
    पूनम सिंह की कथा-चेतना बृहत्तर मानवीय और सामाजिक सरोकारों से आत्मीय जुड़ाव का प्रतिफल है, जिसके कारण उनकी कहानियाँ घर-आँगन और सेक्स के भूगोल तक सीमित नहीं हैं। इसके साथ इनमें सादगी से भरा प्यारा घरेलूपन भी है, जो उनकी निजता के संस्पर्श के साथ आंतरिक लहर-सा मंद-मंद प्रवाहित होता रहता है। उनकी कथा-चेतना सामान्यीकृत होकर अपने समय के साथ है तो विशिष्टीकृत होकर अलग से रेखांकित करने लायक भी है। इसका उदाहरण इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं।
    कहा जा सकता है कि ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ समकालीन हिंदी कहानी में नए सृजन का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
  • Vigyan Navneet
    Dr. Ramesh Dutt Sharma
    290 261

    Item Code: #KGP-563

    Availability: In stock

    विज्ञान नवनीत
    लगभग आधी सदी पहले डा. रमेश दत्त शर्मा ने विज्ञान संबंधी विषयों पर लिखना शुरू किया था और जल्द ही वे विज्ञान से जुड़े हर महत्त्वपूर्ण विषय पर लिखने लगे। अब तक हिंदी की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में हजार से अधिक श्रेष्ठ रचनाएं उनकी छप चुकी हैं, लेकिन रचनाओं के छपने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण उन रचनाओं का पढ़ा जाना है। विज्ञान को अकसर नीरस विषय कहा जाता है, लेकिन डा. रमेश दत्त शर्मा का लेखन किसी भी दृष्टि से नीरस नहीं कहा जा सकता। छात्रा भले ही वे विज्ञान के थे, पर साहित्य से हमेशा जुड़े रहे। स्वभाव से कवि तो थे ही, इसलिए उनके लेखन में एक ऐसी रंजकता है, जिसमें पाठकों को भीतर तक छूने और उनका मन जीत लेने की अद्भुत विशेषता रही है। गंभीर वैज्ञानिक विषयों को रोचक कहानी की तरह परोसना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन रमेश जी ने यह काम प्रस्तुत पुस्तक में बड़ी आसानी से किया है। 
    ‘विज्ञान नवनीत’ ढंगदार लेखों का संकलन है, जो देश की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे। यह संयोग भी है कि पुस्तक के बहुत से लेख ‘नवनीत’ में छपे थे। अपनी इस पुस्तक के शीर्षक के साथ लेखक ने लिखा है—‘विज्ञान को मथकर निकाली गई लुभावनी लोनी। बड़ी स्वादिष्ट होती है लोनी। देर तक जीभ पर स्वाद बना रहता है। ऐसा ही स्वाद इन लेखों का भी है।’ 
    प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत लेखों से यह बात सहज ही समझ आ जाती है कि लेखक सिर्फ लिखना ही नहीं चाहता, कुछ सार्थक रचना चाहता है। सार्थकता की गंध इस पुस्तक के हर पन्ने पर अनुभव की जा सकती है। 
    —विश्वनाथ सचदेव
  • Grameen Samaj(Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    290

    Item Code: #KGP-206

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Manglesh Dabral (Paperback)
    Manglesh Dabral
    100

    Item Code: #KGP-1411

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: मंगलेश डबराल
    मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से अपनी सृजनात्मक प्रेरणा ग्रहण करती हुई हिंदी कविता की आज जो पीढ़ी उपस्थित है, उसमें मंगलेश डबराल जैसे समर्थ कवि इतने वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी होते जा रहे हैं कि उनके किसी एक या चुनिंदा पहलुओं को पकड़कर बैठ जाना अपनी समझ और संवेदना की सीमाएं उघाड़कर रख देना होगा। एक ऐसे संसार और समय में जहां ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्हीं भी शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को उसके हाशिये से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचोबीच लाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, ईषर्यालु अथवा आत्मदयाग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोज़ख़ को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इनकार करता है।
    मंगलेश की इन विचलित कर देने वाली कविताओं में गहरी, प्रतिबद्ध, अनुभूत करुणा है, जिसमें दैन्य, नैराश्य या पलायन कहीं नहीं है। करुणा, स्नेह, मानवीयता, प्रतिबद्धता--उसे आप किसी भी ऐसे नाम से पुकारें, लेकिन वही जज़्बा मंगलेश की कविता में अपने गांव, अंचल, वहां के लोगों, अपने कुटुंब और पैतृक घर और अंत में अपनी निजी गिरस्ती के अतीत और वर्तमान, स्मृतियों और स्वप्नों, आकांक्षाओं और वस्तुस्थितियों से ही उपजता है। उनकी सर्जना का पहला और ‘अंतिम प्रारूप’ वही है।
    आज की हिंदी कविता में मंगलेश डबराल की कलात्मक और नैतिक अद्वितीयता इस बात में भी है कि अपनी शीर्ष उपस्थिति और स्वीकृति के बावजूद उनकी आवाज़ में उन्हीं के ‘संगतकार’ की तरह एक हिचक है, अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की कोशिश है, लेकिन हम जानते हैं वे ऐसे विरल सर्जक हैं जिनकी कविताओं में उनकी आवाज़ें भी बोलती-गूंजती हैं जिनकी आवाज़ों की सुनवाई कम होती है।
  • Nidhi Maharaj
    Pradeep Anshu
    35 32

    Item Code: #KGP-2060

    Availability: In stock

    निधि महाराज
    निधि महाराज अमृता प्रीतम के उपन्यास 'कोरे कागज' के शक्ति-बिन्दु हैं । उपन्यास के सभी किरदार अपनी खोई हुई दिशा को उसी शक्ति-बिन्दु से पाते हैं ।
    लेकिन एक गीता है, जो जिंदगी के अन्याय को झेलती हुई जब गंगा की शरण ले लेती है, तो उसकी व्याकुल आत्मा उपन्यास में खामोश बनी रहती है। 
    श्री प्रदीप अंशु निधि महाराज के शक्ति-स्थल से उतरकर एक मर्म को इस तरह पा गए है कि गीता की मुक्ति के लिए भी वह निधि महाराज को ही समर्थ पाते हैं... और जहाँ काल-अंतर मिट जाता है, वहीं खडे होकर श्री प्रदीप अंशु ने  जो  अंतर-ध्वनि सुनी है--उसी का   कि ब्यौरा यह पुस्तक है--'निधि महाराज' ।
    यह लेखन की एक ऐसी विद्या  है, जो आज तक साहित्य का अंग नही बनी थी और प्रदीप अंशु इसी विद्या  को पहली बार साहित्य से लाए हैं।
  • Gauri
    Ajeet Kaur
    125 113

    Item Code: #KGP-2050

    Availability: In stock

    गौरी धीरे-धीरे उठी। चावलों वाले कोठार के एकदम नीचे हाथ मारा और टोहकर एक छोटी-सी पोटली बाहर निकाल ली। धीरे-धीरे उसे मैले-से चिथड़े की गाँठें खोलीं। बीच में से दो बालियाद्द निकालीं, जिनमें एक-एक सुर्ख मोती लटक रहा था।
    उसने बालियाँ काँसे की एक रकाबी में रखकर चूल्हे पर रख दीं। जो भी सुबह रसोई का दरवाजा खोलेगा, उसे सबसे पहले वही दिखेंगी और उससे कहेंगी, ‘इस घर में से एक ही चीज मुझे मिली थी, तुझे पैदा करने का इनाम। तूने उस जन्म को अस्वीकार कर दिया है। तूने उसी कोख को गाली दी है, जिसने तुझे अपने सुरक्षित घेरे में लपेटकर और अपना लहू पिलाकर जीवन दिया। ले ये बालियाँ। ये मैं तुझे देती हूँ। ये गाली हैं, मेरे जन्म पर, तेरे जीवन पर। गाली भी और बद्दुआ भी। ले ले इन्हें, बेचकर दारू पी लेना। मेरे बाप को दे दिए। मुफ्त में दान में। ले मेरा दान और मेरी बद्दुआ, जो पृथ्वी के हर कोने तक तेरा पीछा करेगी।’
    गौरी ने अपनी छोटी-सी कपड़ों की पोटली भी चूल्हे के पास रख दी और बाहर निकल आई।
    पिछले आँगन का दरवाजा खोला और गली में बाहर निकल आईं।
    -इसी उपन्यास से
  • Prasiddha Vyaktiyon Ke Prem-Patra
    Virendra Kumar Gupt
    190 171

    Item Code: #KGP-9034

    Availability: In stock

    स्त्रियों-पुरुषों के हृदयों में एक-दूसरे के प्रति उठते-बैठते ज्वारभाटों की सबसे सच्ची, ईमानदारी शाब्दिक अभिव्यक्ति प्रेम पत्रों में ही हो पाई है । इसका कारण स्पष्ट है । जब भी व्यक्ति ने, स्त्री या पुरुष ने प्रेम-पत्र लिखा है, वह अनायास ही धन-पद-विद्वत्ता या सामाजिक प्रतिष्ठा की ऊंचाइयों से नीचे उतर आया है और स्त्रीत्व-पुरुषत्व की यथार्थ धरती पर खड़े होकर ही उसने अपने प्रेमी या प्रेमिका को संबोधित किया है । तब शरीर की सभी साज-सज्जाएं और चेहरे के सभी मुख़ौटे उतर जाते हैं और धड़कता हृदय ही सामने होता है । इस स्तर पर लिंकन, बायरन, क्रामवेल, नेपोलियन, विस्मार्क,शॉ और गांधी एक ही सुर में बोलते दिखाई पड़ते हैं । 
  • Pracheen Bharat Ki Neetiyan
    Acharya Dina Nath Sidhantalankar
    450 405

    Item Code: #KGP-851

    Availability: In stock

    प्राचीन भारत की नीतियाँ
    हमारे आर्यावर्त्त देश में जनतंत्र और लोकतंत्र चलाने के लिए कैसी नीतियाँ थीं, उसके बाद कैसी नीतियाँ रहीं और अब कौन-सी नीतियाँ हैं, इस दिशा में इस ग्रंथ के संपादन एवं प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण प्रयास किया गया है। विद्वान् सुधी लेखक ने युक्ति, तर्क, औचित्य और वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की दृष्टि से इस ग्रंथ में उन सब संदर्भों को अलग कर दिया है, जो भेदसूचक, ऊंच-नीच द्योतक और समाज के किसी भी वर्ग के प्रति तनिक भी घृणा, विषमता व हीनतासूचक हैं।
    इस ग्रंथ के संकलन के लिए भारतीय दर्शनशास्त्रों का गहराई से अध्ययन किया गया है और उसमें वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की पृष्ठभूमि में उन ही सर्वोपयोगी नीतियों का संकलन किया है, जो समय और औचित्य की दृष्टि से आज की परिस्थितियों में भी उतनी ही तर्कसंगत और मूल्यवान हैं, जितनी प्राचीन युग में थीं। 
    देश की स्वतंत्रता के बाद अंतर्देशीय और अंतर्राष्ट्रीय नीति-निर्धारण में मानवीय पक्ष को ही हमारे राष्ट्र-नायकों ने सामने रखा। किसी एक वर्ग, जाति, संप्रदाय अथवा धर्म के वर्चस्व के स्थान पर उसे समानता का प्रबल आधार प्रदान किया। इसके लिए हमने चार आदर्श अपनाए। प्रथम है–लोकतंत्र, द्वितीय है—समाजवाद, तृतीय है–धर्म-निरपेक्षता और चैथा है गुट-निरपेक्षता। इस नीति-निर्धारण में हमें सबसे बड़ी सहायता भारतीय वाङ्मय की अमूल्य निधि से मिली है। हम यदि अपने प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध जीवन-मूल्यों का आधुनिक युग के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन कर सकें तो समाज उनसे लाभ उठा सकता है।
    इस परिपेक्ष्य में यह ग्रंथ नेताओं, प्रशासकों और आज के प्रबुद्ध पाठक-वर्ग के लिए विशेष स्फूर्तिप्रद होता हुआ भारत के नव-समाज-निर्माण के लिए दिशा-निर्देश करने में अनवरत उपयोगी सिद्ध होगा।
  • Bhasha, Sahitya Aur Jaatiyata
    Ram Vilas Sharma
    640 576

    Item Code: #KGP-884

    Availability: In stock

    भाषा, साहित्य और जातीयता
    डॉ. रामविलास शर्मा की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनके लेखों और समीक्षाओं का यह संग्रह पाठकों के लिए प्रस्तुत है। डॉ.शर्मा द्वारा संपादित पत्रिका ‘समालोचक’ में प्रकाशित यह सामग्री पहली बार पुस्तक के रूप में आ रही है। सामग्री का प्रस्तुतिकरण तथा संपादन किया है डॉ. शर्मा के सुपुत्र विजय मोहन शर्मा ने।
    ज्ञात हो कि ‘समालोचक’ केवल दो वर्ष--फरवरी, 1958 से जनवरी, 1960 तक निकल पाया। कुल चैबीस अंकों में से दो विशेषांक थे--‘सौंदर्यशास्त्र विशेषांक’ और ‘यथार्थवाद विशेषांक’। जिनका उस समय बड़ा स्वागत हुआ और हिंदी साहित्य-जगत् के अनेक ‘सितारों’ ने उनकी सराहना की। ये विशेषांक साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए आज भी महत्त्व रखते हैं।
    ‘समालोचक’ में पुराने लेखकों के अलावा नए लेखक भी लिखते थे। इन लेखकों में हिंदी प्रदेश से बाहर के लेखक भी थे। इसका संपादकीय क्षितिज उदार था। संपादक डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, ”हमारा ध्येय हिंदी आलोचना के विकास में योग देना है, उसमें आमूल परिवर्तन करना अथवा युगांतर उपस्थित करना नहीं। हम विभिन्न विचारधाराओं और मतों के लेखकों की रचनाएं प्रकाशित करके परस्पर विचार-विनिमय द्वारा आलोचना-साहित्य के उत्तरोत्तर विकास का प्रयत्न करेंगे।“
    बीसवीं शताब्दी के हिंदी के सर्वमान्य महान् आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा की साहित्यिक समझ और प्रतिबद्धता का विस्तार इस ग्रंथ की संकलित सामग्री में आद्यंत दिखाई पड़ते हैं। शोध और समीक्षा के प्रतिमान स्थापित करता यह ग्रंथ प्रत्येक बुकशेल्फ की अनिवार्यता है।
  • Dona Paavala Aur Teen Auraten
    Rohitashv
    175 158

    Item Code: #KGP-1836

    Availability: In stock

    गोवा का समुद्री तट। लहरों में लहराता एकांत। फैनी की मादक गिरफ्त। ऑन्जना बीच पर निर्वस्त्र विदेशी नर-नारी देखकर व्हिस्की पीने को मचलता मन। पीने के बाद इस स्वर्ग में गोते खाता नायक ! हाँ, यही तो होटल, बार और क्रूज के साथ तस्वीर है गोवा की। धनाढ्य पर्यटकों की मौज-मस्ती का अपना निजी रंगस्थल, देश-विदेशों में मशहूर ! प्रचलित यह भी है कि गोवा की औरतें स्वच्छंद जीवन की अभ्यस्त होती हैं। वे पैसे कमाती हैं और ऐश करती हैं।
    मगर रोहिताश्व की लिखी कहानियाँ, ये किस गोवा की कथाएँ हैं, जिनमें गोवा का स्वर्ग अपने ही बाशिंदों को आजाद रहन-सहन के बावजूद गरीबी, धोखे, जालसाजी और भावात्मक शोषण की चक्की में पीसकर रख देता है। अत्याचार और शोषण चक्र को खोलता हुआ लेखक सागर-किनारे के चप्पे-चप्पे को खँगालता है। संवेदना की बुनावट में गोवा की तस्वीर बदल जाती है। समुद्र की लहरों पर बल खाती चाँदनी के नीचे कितनी-कितनी काली रातें बिछी हुई हैं। उजाला होने की उम्मीद यहाँ स्त्री-पुरुषों के त्याग और बलिदानों से बने सूरज के हाथ है।
    दोना पावला और तीन औरतें’ संसार की उन तमाम औरतों का प्रतिनिधित्व करती है, जिनका जीवन अकेलेपन की त्रसदी के लिए है। पढ़ते हुए भयानक बेचैनी जकड़ती चली जाती है। कहीं आशा जागती है कि संघर्ष ही उनका मकसद है। स्त्रियाँ टूटती हैं, डगमगाती फिर भी नहीं...
    लेखक कहानियों में विभिन्न नामों से उपस्थित है और अपनी परिचय-भूमियों (गोवा और हैदराबाद) पर घटित होते इतिहास तथा सांस्कृतिक प्रदूषण को बराबर दर्ज करता जाता है। कहन का प्रस्तुतीकरण ऐसा जैसे समूह में बैठकर हम लोककथाएँ सुन रहे हों। यहाँ कथाओं के प्रति वही अटूट आकर्षण जागता है, जिसके गायब हो जाने से कथा-कहानी के प्रति पाठक उदासीन हुआ है। संवेदी लगाव की यह धारदार प्रस्तुति रोमानी हालात में भी संघर्ष की पराकाष्ठा तक अनायास ही पहुँच जाती है।
  • Chunmun Aur Gopa
    Tanu Malkotia
    40

    Item Code: #KGP-1239

    Availability: In stock


  • Honour Killing Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    80

    Item Code: #KGP-1269

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    160 144

    Item Code: #KGP-13

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', 'क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Haitrik (Paperback)
    Rajesh Ahuja
    140

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • Uski Bhee Suno
    Bharti Gore
    320 288

    Item Code: #KGP-471

    Availability: In stock

    ‘उसकी भी सुनो’ पुस्तक की कहानियां सामाजिक रूढ़ियों, पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। इसमें समाज के सभी तबकों की स्त्रिायों की समस्याओं का गंभीर विवेचन है। सफेदपोश समाज में जीती स्त्री, बाहर से अमीर और सुखासीन लगने वाली स्त्री की अस्तित्वहीन स्थिति के साथ-साथ दलित और आदिवासी स्त्री के सदैव उपेक्षित अस्तित्व की चर्चा है। इन कहानियों की नायिकाओं की विशेषता यह है कि वे कभी हार नहीं मानतीं।
    प्रस्तुत पुस्तक की हर कहानी अपने आप में समाज में महिलाओं के प्रति घटने वाली हर घटना को या कहिए हर आयाम को बड़े ही सटीक अंदाज में पेश करती है। साहित्य ने हमेशा से हर आंदोलन को प्रभावित किया है और जन आंदोलनों ने भी हमेशा साहित्य को प्रभावित किया है। चाहे वह आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद के आंदोलन, साहित्य ने कहानी, कविताओं, गीतों के जरिए हमेशा आम जनता के आंदोलनों को एक बेहतर आवाज दी है। साहित्य के बिना समाज अधूरा है। और अगर साहित्य महिलाओं द्वारा रचा जाए तो उसकी बात ही निराली है।
    धार्मिक उन्माद का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती हैं। दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक महिलाओं के ऊपर तो इनकी दोहरी मार पड़ती है। नारी-मुक्ति की इस मुहिम को समाज के अन्य हिस्सों को साथ लेकर एक नए बदलाव की तरफ बढ़ना होगा। समाज के बदलाव में साहित्य इसी कड़ी में महिलाओं के लिए एक सशक्त रास्ता है।
  • Teen Taal
    Sanjay Kundan
    335 302

    Item Code: #KGP-9340

    Availability: In stock

    सुप्रसिद्ध कथाकार संजय कुंदन का नवीनतम उपन्यास तीन ताल समकालीन यथार्थ को उसके समुचित कद में चित्रित करती रचना है। संजय अपने लेखन में जनप्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। व्यवस्था और सत्ता के अंतर्विरोध वे कलात्मक कुशलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं।
    ‘तीन ताल’ के केंद्र में तीन चरित्रा हैं—सुमित, पारुल और अभिषेक। उनमें मित्राता की अद्भुत लय है। सुमित पत्रकारिता के संकटों का सामना कर रहा है, पारुल अपनी सार्थकता हासिल करने के लिए छटपटा रही है और अभिषेक एक बड़ी कंपनी में काम करते हुए पाखंड का नग्न रूप देख रहा है। इन व्यक्तियों, संघर्षों के साथ देश-समाज की ज्वलंत समस्याएं गुंथी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार। इसने राष्ट्र की समृद्धि और उन्नति को पंगु-सा कर दिया है। संजय एक स्थान पर लिखते हैं—‘लड़ाइयां चल रही थीं। छोटी-बड़ी कितनी लड़ाइयां। हो सकता है ये सब मिलकर एक दिन बड़ी लड़ाई का रूप ले लें। इसलिए संघर्ष रुकना नहीं चाहिए।’ क्योंकि तभी ‘नीला निरभ्र आकाश’ और ‘एक महीन चंपई-सी रेखा’ दिखने की संभावना निर्मित हो सकती है।
    यह उपन्यास रोचक कथानक के साथ कई जरूरी सवालों से भी गुजरता है। ध्वस्त होती पत्रकारिता, इंटेलेक्चुअल दलाल, भीषण बेरोजगारी, एनजीओ की लूटपाट, जनजागरूकता और काॅमर्स के बीच मारक संघर्ष, स्त्राी-पुरुष संबंधों का तनाव, योग्यता की उपेक्षा...आदि-इत्यादि। सवालों के साथ समाधन के लिए उठ खड़ा एक जन आंदोलन भी है, जिसकी अगुआई ‘छोटे गांधी’ ने की। एक हालिया इतिहास भी इस रचना में दर्ज है।
    संजय कुंदन सच को सूक्तियों में बयान करते हैं। जैसे—‘अब नौकरी का अर्थ है व्यक्ति का अनुकूलन बाजार के प्रति।’ ऐसे ही यथार्थ का मुकाबला करने के लिए ‘तीन ताल’ नाट्यदल का गठन होता है। उद्देश्य है जनजागरण। क्योंकि भविष्य संकटों से घिरा है। उपन्यासकार लिखता है—‘मुझे तो डर है कि एक दिन सब कुछ काॅरपोरेट के हाथ में हो जाएगा।’ इसलिए चेतना में ‘नवगति नवलय ताल छंद नव’ की आवश्यकता है। यानी, एक नया स्वप्न!
    ‘तीन ताल’ एक नए स्वप्न की शुरुआत है।
  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta
    Dr. Kripa Shanker Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-162

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Arora
    Sudha Arora
    280 238

    Item Code: #KGP-701

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा अरोड़ा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महानगर की मैथिली', 'सात सौ का कोट', 'दमनचक्र', 'दहलीज पर संवाद', 'रहोगी तुम वहीं', 'बिरादरी बाहर', 'जानकीनामा', 'यह रास्ता उसी अस्पताल को जाता है', ‘कांसे का गिलास' तथा 'कांच के इधर-उधर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सुधा अरोड़ा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hari Shankar Parsai
    Hari Shankar Parsai
    200 180

    Item Code: #KGP-9305

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    हरिशंकर परसाई

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित दिवंगत कथाकारों की कहानियों के चयन के लिए उनके कथा-साहित्य के प्रतिनिधि एवं अधिकारी विद्वानों तथा मर्मज्ञों को संपादन-प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया है। यह हर्ष का विषय है कि उन्होंने अपने प्रिय कथाकार की दस प्रतिनिधि कहानियों को चुनने का दायित्व गंभीरता से निबाहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Bayaan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-684

    Availability: In stock


  • Sikha Acharshastra
    Satayendra Pal Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-453

    Availability: In stock

    सिख गुरु साहिबान ने मानवता पर सबसे बड़ा परोपकार किया धर्म को धीर-गंभीर शब्दों के इंद्रजाल और कर्मकांडों के भंवर से मुक्त करके। उन्होंने कहा कि ऐसा पांडित्य और विद्वत्ता व्यर्थ है, खच्चर पर लदे भार व कुंचर स्नान की तरह, यदि इंद्रियां वश में नहीं और आचरण शुद्ध-पवित्र नहीं। इसका एक मात्र उपाय है परमात्मा की शरण में उसकी कृपा प्राप्ति जिससे मन ज्ञान के सूर्य से उद्दीप्त हो उठे। धर्मानुकूल आचार के लिए मन पर सतिगुरु ज्ञान का अंकुश आवश्यक है। सार्थक-सफल जीवन योग्य ज्ञान-चक्षु प्राप्त करने की जो राह सिख गुरु साहिबान ने दिखाई उस ओर ले चलने का संपुष्ट प्रयास है यह पुस्तक जिससे सभी वैयक्तिक व सामाजिक प्रश्नों के उत्तर खोजे जा सकते हैं।
  • Andher Nagari : Srijan-Vishleshan Aur Paath
    Ramesh Gautam
    80 72

    Item Code: #KGP-9131

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Vishvanath Prasad Tiwari
    Vishwanath Prasad Tiwari
    150 135

    Item Code: #KGP-2032

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : विश्वनाथप्रसाद तिवारी
    इस पुस्तक में संकलित साक्षात्कार अपने समय के एक महत्त्वपूर्ण लेखक से साक्षात्कार तो हैं ही, संपूर्ण  साहित्य से भी साक्षात्कार हैं । खास तौर से समकालीन साहित्य से । स्वयं अपने बारे में दिए गए संकेतों के साथ लेखक ने रचना और आलोचना के बुनियादी सरोकारों को भी स्पष्ट किया है तथा अपने समकालीनों के बारे में भी उसने दो टूक प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की है । इन प्रतिक्रियाओं में साहस के साथ संयम भी है और कथ्य के साथ तथ्य भी । लेखक क्योंकि किसी संघ या गुट में विश्वास नहीं करता, किसी दलीय विचारधारा का वह कट्टर अनुयायी नहीं है अतः कोई उसका अपना-पराया भी नहीं है । दूसरों की रचना ही उसके लिए प्रमाण है । वह इतना आत्मलिप्त भी नहीं है कि अपनी रचना की सीमाओं की पहचान न सके । इसलिए आत्मप्रशंसा और परनिंदा के लिए इन साक्षात्कारों में कोई जगह नहीं है । पूछे गए प्रश्नों के संतुलित, तर्कसंगत, सुलझे हुए और सीधे जवाब इन साक्षात्कारों की विशेषताएं हैं । इनको पढ़ते हुए बहुत; से पाठकों के मन की बहुत-सी धुंध साफ होगी, उनकी बहुत-सी उलझनों के सही और स्पष्ट उत्तर मिलेंगे । उन्हें महसूस होगा कि इन साक्षात्कारों को पढ़कर वे समृद्ध हुए हैं और उनके सामने सृजन और चिंतन की अनेक नई दिशाएं उभरी हैं जिधर वे सोच सकते हैं और चाहें तो चल भी सकते हैं।
  • Aalochna Ka Samay
    Dr. Jyotish Joshi
    320 288

    Item Code: #KGP-687

    Availability: In stock

    आलोचना का समय ग्यारह महत्त्वपूर्ण लेखकों के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करने का प्रयत्न है जिसमें उनके ‘रचना समय’ के साथ ‘आज के समय’ को देखने की कोशिश की गई है। आलोचना महज रचना के बोध और अर्थ को समझने वाली विध ही नहीं होती, वह अपने समय की रचनाशीलता को अपने वर्तमान की चुनौतियों में देखती है और इस तरह एक विमर्श को भी जन्म देती है। पुस्तक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, नेमिचन्द्र जैन, केदारनाथ सिंह, भुवनेश्वर, सुदामा पांडेय ‘धूमिल’, मैनेजर पांडेय तथा उदय प्रकाश जैसे लेखकों के अवदान को रेखांकित करते हुए उनके उन पक्षों को विशेष रूप से विवेचन का आधर बनाया गया है जिनके कारण उनकी महती उपादेयता है। विवेच्य लेखकों में मूल रूप से रचनाकार और आलोचक दोनों हैं जो अपने लेखन में ‘समय’ को देखते हैं तथा समय की अपेक्षाओं के अनुरूप अपने लेखकीय दायित्व का निर्वाह करते हैं।
    अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप आलोचक डॉ. ज्योतिष जोशी ने बहुत मनोयोग से पुस्तक में कृती लेखकों के योगदान को विवेचित किया है। इसमें उनकी भाषा, विवेचन की पद्धति तथा अपने समय की चुनौतियों से टकराने की दृष्टि आपको बहुत प्रभावित करेगी। कहना न होगा कि यह कृति पठनीय ही नहीं वरन् संग्रहणीय भी है।
  • Mere Saakshatkaar : Mridula Garg
    Mridula Garg
    225 203

    Item Code: #KGP-870

    Availability: In stock


  • Mahaan Tatvagyani Ashtavakra
    Vinod Kumar Mishra
    295 266

    Item Code: #KGP-148

    Availability: In stock

    महान तत्त्वज्ञानी अष्टावक्र 
    असली ज्ञान शास्त्रों में नहीं है, बल्कि मनुष्य के अंदर है । शास्त्रों की रचना तो मनुष्य ने विभिन्न सन्दर्भों व परिस्थितियों में की है । इनमें विरोधाभास भी मिलेंगे । असली ज्ञान-शक्ति तो मनुष्य के अंदर छिपी है । यदि मनुष्य अपने आपको पहचान ले तो वह परमात्मातुल्य हो जाता है ।
    "परमात्मा किसी सातवें आसमान पर विराजमान नहीं है । यह सारी सृष्टि परमात्मा का ही दृश्य रूप है । इसकी सेवा और विकास ही ईश्वर की सच्ची आराधना है ।"
    "मोक्ष के पश्चात् व्यक्ति किसी दूसरे लोक में नहीं जाता, वह इसी संसार में करता रहता है, पर उनमें लिप्त नहीं होता ।"
    प्रस्तुत पुस्तक में अष्टावक्र के जीवन व दर्शन, जो 'अष्टावक्र गीता' के नाम से प्रसिद्ध है, का रोचक व प्रेरक वर्णन है । लेखक ने इसके वैज्ञानिक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला है ।
  • Jahaan Charan Pare Raghuvar Ke (Paperback)
    Rajesh Tripathi
    195

    Item Code: #KGP-7031

    Availability: In stock

    इतिहास में ओरल हिस्ट्री (मौखिक इतिहास) को मान्यता मिली हुई है। ओरल हिस्ट्री यानी इतिहास के वे ब्योरे जो किताबों में भले न हों पर जुबान पर हों, स्मृतियों में हों। राजेश ने इस अंचल की ओरल हिस्ट्री को रिकॉर्डेड हिस्ट्री में बदलने का भी काम किया है जिसके लिए इतिहासकारों को भी उनका आभारी होना चाहिए। यह किताब इतिहास और उपन्यास के दो छोरों के बीच झूलते उस हिंडोले की तरह है जिसकी हर पेंग एक नई दुनिया की सैर कराती है। मुझे विश्वास है कि यह किताब सिर्फ अपने कंटेंट के लिए नहीं बल्कि अपने अंदाजे- बयां के लिए भी पाठकों का इस्तकबाल हासिल करेगी।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shaani
    Shaani
    200 180

    Item Code: #KGP-29

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार शानी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दोज़खी', 'जहाँपनाह जंगल', 'जली हुई रस्सी', 'जगह दो, रहमत के फरिश्ते आएंगे', डाली नहीं फूलती', 'बिरादरी', 'बोलने वाले जानवर', 'एक नाव के यात्री', 'चहल्लुम' तथा 'युद्ध'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक शानी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Raakshas (Paperback)
    Shanker Shesh
    125

    Item Code: #KGP-48

    Availability: In stock

    राक्षस
    राक्षस एक जातिवाचक शब्द ही नहीं, मानसिकता द्योतक शब्द भी है। राक्षस वह है, जो सामान्य मानवीय स्वरूप के विरोध में रहता है ।
    इस नाटक में शंकर शेष ने मनुष्य की इसी वृत्ति को उभारा है । यहाँ रणछोड़दास, सुकालू और दुकालू ऐसे चरित्र हैं जो मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम और द्वेष के संघर्ष को तीव्र करते है और फिर इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि–
    अब नहीं रुकेगा कमल फूल
    अब नहीं गिरेगी
    आने वाले कल की आँखों में धूल
    अब गाँव हमारा नहीं रहेगा
    जड़ पत्थर की नाँव 
    राक्षस अपनी पूरी अमानवीय स्थिति के साथ हमें इस आशा की स्थिति तक एहुंचाता है ।
    शकर शेष द्वारा लिखा गया एक सशक्त नाटक ।

  • Kashmkash (Paperback)
    Manoj Singh
    240

    Item Code: #KGP-378

    Availability: In stock


  • Namvar Singh Ka Aalochna-Karm : Ek Punah Paath
    Bharat Yayavar
    250 225

    Item Code: #KGP-791

    Availability: In stock

    नामवर सिंह की लिखित आलोचना की पुस्तकें काफी पुरानी हो गयी हैं, फिर भी उनका गहन अवगाहन करने के  बाद यह कहा जा सकता है कि उनमें आज भी कई नई उद्भावनाएं और स्थापनाएं ऐसी हैं, जिनमें नयापन है और भावी आलोचकों के लिए वे प्रेरक हैं । उनकी पुनर्व्याख्या और पुनर्विश्लेषण की काफी गुंजाइश है । नामवर सिंह ने अपने वरिष्ठ आलोचकों की तुलना में कम लिखा है, पर गुणवत्ता की दृष्टि से  वे महान कृतियाँ हैं । तथ्यपरक, समावेशी और जनपक्षधरता से युक्त उनकी आलोचना बहुआयामी है । उनकी आलोचना आज के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक है । पुरानी होकर भी उसमे ताजापन है । वह साहित्य की अनगिनत अनसुलझी गुत्थियों  को सुलझाती है और साहित्य-पथ में रोशनी दिखती है । 
  • Shakti Kanon Ki Leela
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-1993

    Availability: In stock

    शक्ति कणों की लीला
    सोच की इकाई के तोड़ने की पहली साजिश दुनिया में जाने किसने की थी... 
    बात चाहे जिस्म की किसी काबलियत की हो, या मस्तक की किसी काबलियत की पर दोनों तरह की काबलिया के एक दूसरी की मुखालिफ़ करार देकर, एक को 'जीत गई' और एक को 'हार गई' कहने वाली यह भयानक साजिश थी, जो इकाई के चाँद सूर्य को हमेशा के लिए एक ग्रहण लगा गई... 
    और आज हमारी दुनिया मासूम खेलों के मुकाबले से लेकर भयानक युद्धों के मुकाबले तक ग्रहणित है... 
    पर इस समय मैं जहनी काबलियत के चाँद सूर्य को लगे हुए ग्रहण की बात करूँगी, जिसे सदियों से 'शास्त्रार्थ' का नाम दिया जा रहा है ।
    अपार ज्ञान के कुछ कण जिनकी प्राप्ति होते हैं, वे कण आपस में टकराने  के लिए नहीं होते । वे तो एक मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति को, दूसरो मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति में मिलाने के लिए होते हैं ताकि हमारी प्राप्तियां बड़ी हो जाएँ ... 
    अदबी मुलाकातें दो नदियों के संगम हो सकते है पर एक भयानक साजिश थी कि वे शास्त्रार्थ हो गए... 
    ज्ञान की नदियों को एक-दूसरे में समाना था, और एक महासागर बनना था पर जब उनके बहाव के सामने हार-जीत के बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए, तो वे नदियां सूखने लगीं...  नदियों की आत्मा सूखने लगी... 
    जीत अभिमानित हो गई, और हार क्रोधित हो गई... 
    अहम् भी एक भयानक अग्नि है, जिसकी तपिश से आत्मा का पानी सूख जाता है, और क्रोध भी एक भयानक अग्नि है, जो हर प्राप्ति को राख कर देता है... 
  • Jan, Samaaj Aur Sanskriti
    Vishnu Prabhakar
    35 32

    Item Code: #KGP-9141

    Availability: In stock

    वे कुछ भी क्यों न हों पर उनमें से अधिकांश के पीछे एक समान दृष्टि है । वह दृष्टि परंपरा को नकारती नहीं, बल्कि उसके मध्य से भावात्मक एकता की कल्पना की एकता-मूलक संस्कृति को समझने-पहचानने की कोशिश करती है । वह दृष्टि धर्म, समाज, संस्कृति और संप्रदाय के मोहातीत सही अर्थ जानने को भी व्यग्र है । उसमें न पूर्वाग्रह है, न विद्वत्ता का उदघोष, बल्कि जो उपलब्ध है, उसकी सहायता से खोज की, निरंतर खोज की छह है । इससे अधिक का दावा किया भी नहीं जा सकता क्योंकि सर्जक के सामने मंजिल होती ही नहीं, तलाश होती है । 
    तलाशो तलब में वह लज्जत मिली है 
    दुआ कर रहा हूँ की मंज़िल न आवे । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma (Paperback)
    Tajendra Sharma
    170

    Item Code: #KGP-441

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : तेजेन्द्र शर्मा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jauhar Ke Akshar
    Santosh Shelja
    160 144

    Item Code: #KGP-9075

    Availability: In stock


  • Buniad Ali Ki Bedil Dilli
    Dronvir Kohli
    400 360

    Item Code: #KGP-263

    Availability: In stock

    बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली
    यह अपूर्व संग्रह 'धर्मयुग' के लोकप्रिय स्तंभ बेदिल दिल्ली में प्रकाशित लेखों का है। डॉ० धर्मवीर भारती के विशेष आग्रह पर इसे लिखा करते थे उपन्यासकार द्रोणवीर  कोहली-बुनियाद अली के छदम नाम से।
    स्तंभ में जाने वाली सामग्री के बारे में प्राय: तीखी प्रतिक्रिया होती थी। साहित्यिक गोष्टियों वाले लेखों को लेकर कुछ लेखक लाल-पीले भी होने लगते थे। ऐसी स्थिति में स्तंभ-लेखक के बारे में तरह-तरह के कयास लगाए जाते थे। लेकिन भारती जी ने लेखक की पहचान को निरंतर गुप्त रखा-इतना कि 'धर्मयुग' में उनके सहयोगी तक नहीं जान पाते थे कि इसे लिख कौन रहा है।
    डॉ. धर्मवीर भारती इस स्तंभ के बारे में इतने उत्साहित थे कि लेखक को उन्होंने अपने 4-4-81 के पत्र में यह कहकर प्रोत्साहित किया था : "स्तंभ जोरदार जा रहा है। अपने ढंग का बिलकुल अलगा "
  • Hashiye Ka Raag
    Sushil Sidharth
    300 270

    Item Code: #KGP-9334

    Availability: In stock


  • Rangey Raghav Teen Charchit Upanyas
    Rangey Raghav
    550 495

    Item Code: #KGP-2005

    Availability: In stock

    रांगेय राघव हिंदी के उन विशिष्ट कथाकारों में हैं जिनकी रचनाएं अपने समय को लांघकर भी जीवित रहती हैं। रांगेय राघव के तीन उपन्यासों—‘आग की प्यास’, ‘छोटी सी बात’ और ‘दायरे’ को पाठकों की सुविधा के लिए यहां एक ही जिल्द में प्रस्तुत किया जा रहा है—
    ‘आग की प्यास’ रांगेय राघव का एक बहुचर्चित उपन्यास है, जिसकी कथावस्तु के केंद्र में ग्रामीण जीवन है—वहां की राजनीति, अर्थव्यवस्था और बदलता हुआ सामाजिक-धर्मिक परिवेश। लेकिन मुख्य कथावस्तु अर्थकेंद्रित है। समाज के कुछ इने-गिने लोगों की धन की प्यास कैसे वृहत्तर समुदाय का जीवन नारकीय बनाती जा रही है, यह इस उपन्यास में प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुआ है।
    ‘छोटी सी बात’ रांगेय राघव का अत्यंत लोकप्रिय एवं पठनीय उपन्यास है। कलेवर में भले ही यह लघु है परंतु अपने कथ्य में अत्यंत विराट है। कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जीवंत दस्तावेज है।
    ‘दायरे’ उपन्यास का केंद्र एक अवैध (?) बच्चे और उसकी मां की यातना है, लेकिन उसके माध्यम से लेखक ने स्त्री-पुरुष के संबंधों से लगाकर धर्म-संस्कृति तक को अपने दायरे में ले लिया है। एक तीव्र संवेदनात्मक तथा वैचारिक द्वंद्व उपन्यास में शुरू से आखिर तक चलता रहता है। रांगेय राघव ने हिंदी कथा साहित्य को रोजा, सत्यदेव, फादर तोलियाती के रूप में तीन अमर पात्र इस उपन्यास में दिए हैं...
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Saadat Hasan Manto (Paperback)
    Saadat Hasan Manto
    250

    Item Code: #KGP-7011

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सआदत हसन मंटो
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सआदत हसन मंटो ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'स्वराज्य के लिए', 'हतक' हैं 'मेरा नाम राधा हैं', 'बाबू गोपीनाथ', 'मम्मी', 'मम्मद भाई', 'जानकी', "मोजेल', 'सियाह हाशिए' तथा 'टोबा टेकसिंह'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सआदत हसन मंटो की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Turn Your Life Around With Reiki (Self-Help)
    Anil Bhatnagar
    525 473

    Item Code: #KGP-7826

    Availability: In stock

    Reiki is an ancient Japanese energy-healing system of remarkable ease and efficacy that heals at the very causal level. The Reiki energy can be felt by the sender and receiver both, and when photographed by scientists through Kirlian photography it appears to be a laser-like beam emanating from the practitioner’s hands.
    Working from the idea that all human problems and diseases result from the illusion of separateness, Reiki re-establishes our lost connection with ourselves and the oneness that surrounds us in a multiplicity of forms. Reiki can be used to heal yourself and others. When practiced regularly, Reiki begins to bring an all round change in life’s quality and does not leave any aspect of life untouched with its blessings.
    The uses and applications of Reiki are limited only by our own imagination, which is why it is being acquired and practiced by doctors, engineers, healing practitioners, masseurs, physical therapists, psychologists, students, house wives, executives, corporate leaders, people who are interested in personal growth and by people who are simply curious.
  • Samkalin Sahitya Samachar March, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #March, 2017

    Availability: In stock

  • Kashmir : Raat Ke Baad
    Kamleshwar
    250 225

    Item Code: #KGP-843

    Availability: In stock

    कश्मीर : रात के बाद
    हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर का कश्मीर से बहुत गहरा लगाव था । 'कश्मीर : रात के बाद' में लेखक के इस गहरे कश्मीरी लगाव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । एक गल्पकार की नक्काशी, एक पत्रकार की निर्भीकता, एक चेतस इतिहास-द्रष्टा की पैनी नज़र तथा इन सबके मूल में जन सामान्य से प्रतिश्रुत मानवीय सरोकारों से लैस यह यात्रा-वृत्तांत लेखक कमलेश्वर का एक और अप्रतिम योगदान है ।
    'कश्मीर : रात के बाद' संभवत: हिंदी में पहला ऐसा मानक प्रयास भी है जो कैमरा और कलम को एक साथ इस अंदाज़ से प्रस्तुत करता है ताकि दोनों की अस्मिता पूर्णतः मुक्त भी रहे । शायद इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा-रिपोर्ताज में कश्मीर के बर्फीले तूफानों और चट्टानों के खिसकी का शाब्दिक 'रोमांच' मात्र नहीं है बल्कि यहाँ है-इतिहास और धर्म (युद्ध) को अपनी एकल परिभाषा देने के मंसूबों को तर्क  और विवेक के बल पर ध्वस्त कर सको की सहमतिजन्य प्रतिभा । कश्मीर की राजनीति में, बल्कि कहे कि अराजक 'अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिज्' में यह लेखक मात्र पत्रकार का तटस्थ और निष्फल बाना धारण करके प्रवेश नहीं करता बल्कि वह एक ऐसे सच्चे और खरे इंसान के रूप में हस्तक्षेप करता है जो भारतीयता को जानता है और कश्मीरियत को पहचानता है । वह प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य-पाशा में बँधा, प्रकृति के अप्रत्याशित रौद्र रूप को, जान की बाजी लगाकर देखता है, तो वह आतंकवादियों के विष-की ठिकानों को भी अपने कलम और कैमरे के माध्यम से उदघाटित करता है । वास्तव में यही साहस इस यात्रा-वृतांत को अविस्मरणीयता सौंपता है ।
    इस पुस्तक में कश्मीर की कुछ खंडित यात्राएँ भी हैं जिनमें जन सामान्य के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को शब्द-दर-शब्द पढ़ा और महसूस किया जा सकता है । परवर्ती यात्रा के रूप में कमलेश्वर ने सुलगते कश्मीर की उस झुलसन को शब्द दिए है, जिसे तमाम तकनीकी विकास के बाबजूद कैमरा पकड नहीं पाता । यह किताब मुद्रित शब्द और कैमरे के आधुनिक युग की सामर्थ्य  और सीमा का भी संभवत: अनुपम दस्तावेज साबित होगी ।
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan
    Kamlesh Pandey
    220 198

    Item Code: #KGP-1838

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah (Vol.-2)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    650 585

    Item Code: #KGP-603

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (2)
    (आजादी के नीतिकार)
    आँखों देखे ये वृत्तांत स्मृतियों के जीवत कालखंड भी है । इनमें राजनीतिक हलचलें हैं तो आत्मीयता यानी अपनेपन में पगी अविस्मरणीय, दुर्लभ घटनाएँ भी ।
    सूमित्रा जी साक्षी रहीं उस परिवर्तन के दौर की, इसलिए उनकी दृष्टि व्यापक एवं विस्तृत रही । उन्होंने सीमित दायरे के बावजूद असीमित परिधि को छुआ है । इसलिए गांधी जी को समझने में यह कृति हर अर्थ में सहायक सिद्ध होगी ।
    उस दौर में विश्व में क्या-क्या हुआ, उसका सहज आकलन भी इनमें दीखता है । 'जलियाँवाला बाग़' नरसंहार के दिल को दहला देने वाले दृश्य ! डेढ़ हजार से अधिक निर्दोष लोग भून दिए गए । जनरल डायर की इस दानवीय लीला ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया था ।
    'साबरमती आश्रम' गांधीवादी विचारों की प्रयोगशाला बना । चंद्रभागा और साबरमती नदी के बीच, बबूल की कँटीली झाडियों कै पार्श्व में एक नए संसार की साधना हुई-खुले आसमान के नीचे ।
    यह आश्रम कब तीर्थ बना, पता ही नहीं चला । 
    'चंपारण', 'खेड़ा सत्याग्रह', 'साइमन कमीशन’, 'नोआखली', 'बिहार को कौमी आग' अनेक प्रसंग हैं, जो अनेक अर्थों से उल्लेखनीय है ।
    सुमित्रा जी ने गांधी जी के उन पक्षों पर भी प्रकाश डाला, जो महत्त्वपूर्ण है, जिनके बारे में लोग अधिक नहीं जानते । क्योंकि उन्होंने यह सब स्वयं घटित होते देखा है, इसलिए प्रामाणिक भी कम नहीं ।
    हैदराबाद रियासत का भारत में विलय-प्रसंग भी कम रोचक नहीं । कासिम रिजवी का दिल्ली के लाल किले पर अपना झंडा फहराने का सपना सपना ही रह गया । हैदराबाद मुक्ति के पश्चात सरदार पटेल ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर दिल्ली बुलाया । लाल किले पर तो कासिम अपनी ध्वजा नहीं फहरा पाए, हाँ, लाल किले के तहखाने में कैद कर उसे अवश्य रखा गया । उन पर मुकदमा चला और आजीवन कैद की सजा मिली ।
    ऐसे अनेक प्रसंग, विचारोत्तेजक ।
    --हिमाशु जोशी
    15 अगस्त, 2009
  • Vartmaan Ki Dhool
    Govind Prasad
    250 225

    Item Code: #KGP-658

    Availability: In stock

    ‘वर्तमान की धूल’ गोबिन्द प्रसाद का तीसरा काव्य संग्रह है जो एक छोटे से अंतराल के बाद आ रहा है। इस संग्रह के पाठक सहज ही लक्ष्य करेंगे कि इस कवि का अपना एक अलग रंग है जो सबसे पहले उसकी भाषा की बनावट में दिखाई पड़ता है और बेशक अनुभवों के संसार में भी। मेरा ध्यान सबसे पहले जिस बात ने आकृष्ट किया वह यह है कि इस कवि ने हिंदी और उर्दू काव्य भाषा की बहुत सी दूरियाँ ध्वस्त कर दी हैं। और इस तरह एक नई काव्य-भाषा बनती हुई दिखती है। इसे गोबिन्द प्रसाद की एक काव्यगत सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। यह वह परंपरा है जिसकी शुरुआत कभी शमशेर ने की थी और गोबिन्द प्रसाद इसे आज की ज़रूरत के मुताबिक एक नए अंदाज़़ में आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं । पर केवल इतनी सी बात से इस संग्रह की विशेषता प्रकट नहीं होती। असल में यहाँ गोबिन्द प्रसाद एक गहरी घुलावट वाली रूमानियत के समानांतर एक विलक्षण राजनीतिक चेतना को भी बेबाक ढंग से व्यक्त कर सके हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘अल्लाह नहीं अमेरिका जानता है’ शीर्षक कविता जिसकी आरंभिक दो पंक्तियाँ हमारे समय की एक बहुत बड़ी राजनीतिक गुत्थी को खोलती जान पड़ती हैं-- 
    किस देश में कल क्या होगा
    अल्लाह नहीं अमेरिका जानता है।
    यह पूरी कविता इतने बेबाक ढंग से लिखी गई है कि अलग से हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। यह गोबिन्द प्रसाद के कवि से हमारा नया परिचय है जो इन्हें उनकी पिछली कृतियों से अलग करता है। एक और छोटी सी राजनीतिक कविता पर मेरा ध्यान गया जिसका शीर्षक है ‘क्रांति की जेबों में’। यह एक गहरी चोट करने वाली व्यंग्य की कविता है जो शाब्दिक क्रांति के आडंबर पर चोट करती है। इस दृष्टि से इस कविता का अध्ययन दिलचस्प हो सकता है। 
    इस संग्रह की कई छोटी कविताएँ आधुनिक प्रेम की विसंगतियों को खोलती दिखाई पड़ती हैं। कुल मिलाकर यह संग्रह अनुभव के विभिन्न आयामों से गुज़रता हुआ--जिसमें कुछ विदेशी पृष्ठभूमि के अनुभव भी शामिल हैं--एक भरी-पूरी दुनिया का फलक हमारे सामने रखता है। मैं आज की हिंदी कविता के एक पाठक के रूप में यह पूरे बलाघात के साथ कह सकता हूँ कि संग्रहों की भीड़ में गोबिन्द प्रसाद का यह नया काव्य प्रस्थान अलग से लक्षित किया जाएगा।
  • Aarsa Sahitya Mein Moolbhoot Vigyan
    Vishnu Dutt Sharma
    220 198

    Item Code: #KGP-774

    Availability: In stock

    प्राचीन भारत में वैज्ञानिकों की कोई कमी नहीं थी। इनका विवरण अनेक आर्ष साहित्य में उपलब्ध है। वास्तव में भारतीय वैज्ञानिकों के धार्मिक एवं दार्शनिक पक्षों को देखकर ही उन्हें ऋषियों की श्रेणी में रखा तथा उनके वैज्ञानिक योगदान के महत्त्व को कम कर दिया गया और उसका समुचित रूप से मूल्यांकन भी नहीं किया गया। वैदिक काल से गुप्तकाल (400 ई. पूर्व) तक विज्ञान के सिद्धांत एवं वैज्ञानिक पद्धति के विषय में महत्त्वपूर्ण कार्य हुए किंतु दुर्भाग्य से प्राचीन भारतीय विज्ञान के विकास का समुचित विश्लेषणात्मक अध्ययन नहीं हो पाया है।
    प्रस्तुत शोध-ग्रंथ ‘आर्ष साहितय में मूलभूत विज्ञान’ के लेखक डाॅ. विष्णुदत्त शर्मा द्वारा प्राचीन भारतीय विद्वानों के सिद्धांतों की परिपुष्टि को प्रकाश में लाया गया है। आशा है, प्रबुद्ध पाठक प्रस्तुत ग्रंथ में वर्णित भारतीय परिव्राजकों द्वारा किए गए अनुसंधानों तथा कालांतर में ये ही शोध-कार्य पश्चिमी देशों की मोहर लगकर भारत मं आयातित विज्ञान के तथ्य को जानने का प्रयास करेंगे। आशा ही नहीं अपितु विश्वास है कि यह पुस्तक शोधकत्र्ताओं और विज्ञान एवं अध्यात्म में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए समान रूप से रोचक होगी।
  • Nanhe Haath Khoj Mahan
    Hari Krishna Devsare
    150 135

    Item Code: #KGP-109

    Availability: In stock

    एक पुरानी कहावत है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात। विज्ञान के आविष्कारों में अनेक ऐसी कथाएं छिपी हुई हैं, जिनके बीज बचपन में ही पड़ गए थे। उन वैज्ञानिकों के बचपन में ही कुछ ऐसा हुआ था, जिसने आगे चलकर एक महान आविष्कार, अनुसंधान या खोज का रूप लिया। इस पुस्तक में कुछ ऐसी ही विशिष्ट कथाएं दी गई हैं, जो बाल-पाठकों को प्रेरणा देंगी कि उनका हर काम महत्वपूर्ण है। कौन जाने, उनका कौन-सा काम बड़े होने पर प्रेरणा देगा और उन्हें महानता की सीढ़ियों पर चढ़ाकर विशिष्ट बना देगा। ये कहानियां रोचक हें, ज्ञानवर्धक हैं और प्रेरक हैं। आशा है, सभी आयु के पाठक इनसे प्रेरणा लेंगे।
    —हरिकृष्ण देवसरे
  • Himalaya Gaatha-3 (Janjati Sanskriti)
    Sudarshan Vashishath
    550 495

    Item Code: #KGP-639

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-3 (जनजाति संस्कृति)
    न जाने कब फहराने लगीं धर्म पताकाएँ हिमप्रदेश के बीहडों में । कब बौद्ध मंत्र भोटी में गूँजने लगे । तथागत कब महाविरोचन, अक्षोभ्य, अमिताभ, अमोधसिद्धि बने । कब आए पदूमसम्भव, रत्नभद्र । इस अभियान में कौन भिक्षु त्यागी हुए । और बौद्ध  वाड़मय से पहले गुफाओं मेँ कौन लोग वास करते थे । क्या कहते हैं, हजारों वर्ष से भी पुराने ताबो मठ के पास चट्टानों पर खुदे गुफा चित्र । ये बाते अभी पूर्णतया स्पष्ट नहीं है । इतिहास ग्लेशियर में छिपी नदी की तरह है ।
    तथापि ए० एच० फ्रेंके तथा दुची जैसे यूरोपीय विद्वानो ने खोले हैं । आज तक इन्हीं का अनुसरण करते जाए शोधकर्ता । हिमालय की संस्कृति पर गंभीरता से मौलिक कार्य नहीं हुआ । कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाई है । 'आँखिन देखी’ के आधार पर संस्मरण, यात्रा और कथात्मक शैली में वर्णन इन का गुण है । सरल, सुरुचिपूर्ण और स्पष्ट भाषा में रोचकता के साथ गंभीर पहलुओं का विवेचन, वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।
    संस्कृति पर लिखने वाले ऐसे बिरले साहित्यकारों में है वशिष्ठ । जो अपनी यायावर प्रवृति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते है । संस्कृति को बहुत करीब से देखा, परखा, समझा और फिर लिखा है । किन्नौर के अंतिम गांव छितकुल और नसज्ञा से लेकर चम्बा के साच दर्रे से होकर सुदूर पांगी तक पैदल यात्राओं के बाद यहाँ की अनूठी संस्कृति पर लेखनी चलाई है ।
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत तीसरे खंड में हिमाचल के किन्नौर, लाहौल स्थिति और पांगी-भरमौर जैसे दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों की संस्कृति पर अछूती सामग्री दी जा रही है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sanjiv (Paperback)
    Sanjeev
    80

    Item Code: #KGP-1271

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : संजीव
    कहानियों सें विषयों के व्यापक शोध, अनुभव के संदर्भ, समसामयिक प्रसंग और प्रश्न तथा पठनीय वृत्तांतों का संयुक्त एव सार्वजनिक संसार ही संजीव की कहानियाँ चुनता-बुनता है। इन कथाओं की सविस्तार प्रस्तुति से अभिव्यक्त समाहार का अवदान इस कथाकार को उल्लेख्य बनाता है। घटनाओं की क्रीड़ास्थली बनाकर कहानी को पठनीय बनाने में इस कहानीकार की विशेष रुचि नहीं होती बल्कि यह ऐसे सारपूर्ण कथानक की सुसज्जा में पाठक को ले जाता है, जहाँ समकालीन जीवन का जटिल और क्रूर यथार्थ है तथा पारंपरिक कथाभूमि की निरूपणता और अतिक्रमणता भी । यथार्थ के अमंगल ग्रह को, पढ़वा लेने की साहिबी इस कथाकार को सहज ही प्राप्त है, जिसे इस संग्रह की कहानियों में साक्षात् अनुभव किया जा सकता है ।
    प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।
    सजीव द्वारा स्वयं चुनी गई ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं- 'अपराध', 'टीस', 'प्रेत-मुक्ति' 'पुन्नी माटी', 'ऑपरेशन जोनाकी', 'प्रेरणास्रोत', 'सागर सीमांत', 'आरोहण', 'नस्ल' तथा 'मानपत्र' ।
  • Nihatthi Raat Mein
    Indira Mishra
    150 135

    Item Code: #KGP-9134

    Availability: In stock


  • Sitaron Ke Sanket
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1970

    Availability: In stock

    अमृता प्रीतम द्वारा समय-समय पर देखे हुए सपनों की जो व्याख्याएँ प्रसिद्ध स्वप्न विज्ञानवेत्ता एवं ज्योतिषाचार्य श्री राज ने अमृता जी भेंटवार्त्ता के दौरान की थीं, उन्हीं का लेखा-जोखा प्रस्तुत पुस्तक 'सितारों के संकेत’ में दर्ज है। सितारों के हिसाब से और ग्रहचाल की गणनानुसार अमृता जी के सपनों 'से मम्बन्धित जन्म-कुंडलियाँ भी पुस्तक में अंकित हैं जिनमें आचार्य राज का विशाल ज्योतिष-ज्ञान उजागर होता है। अमृताजी ने आचार्य जी के साथ हुई समस्त भेंटवार्त्ताओं को अपनी चिर-परिचित भाषा-शैली में औपन्यासिक गति से लेखनीबद्ध किया है।
    भक्ति योग, साधना योग, ज्ञान योग और कर्म योग की व्याख्या में उतरते हुए आचार्य राज, सितारों के संकेत देखकर जो कहते रहे, अमृता प्रीतम की कलम से उसी का ब्योरा यह पुस्तक है। 
    साथ ही जन्म-जन्म के गाथा को भी कुछ पहचानने की कोशिश है । पूर्व जन्म को कुण्डली से भी जो संकेत मिलते हैं, वे किस तरह एक आधार-शिला बनते है, इस गहराई को लिए हुए यह पुस्तक अनंत शक्तियों के दर्शन में उतरती है।

  • The Growing Years (Self-Help) (Paperback)
    Ann Delorme
    195

    Item Code: #KGP-340

    Availability: In stock

    The Growing Years is a novel that deals with the life of a mother living in the shadow of death and, also the painful, exploratory years of adolescent children. It delves with a touch of humour into the complex psychology of children and adults as they age towards maturity and death, unwilling participants.
    The novel also traverses the depths of an Anglo Indian culture left behind by the colonials who quit India. A culture that has been nurtured and blossoms in the gardens of a hybrid race that still closet themselves in the bungalows of their minds.
  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh (Paperback)
    Shravan Kumar
    240

    Item Code: #KGP-136

    Availability: In stock


  • Afrika Road Tatha Anya Kahaniyan
    Shravan Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-610

    Availability: In stock

    अफ्रीका रोड तथा अन्य कहानियां 
    अफ्रीकी देशों से प्रवास के दौरान, फिर लंदन में अफ्रीकी लेखकों और उनकी कहानियों से रूबरू होती रही, पड़ती रही । वे इतनी क्यों कि दिल हुआ वे हिंदी पाठकों तक पहुंचें । रास्ता था अनुवाद । और अनुवाद में आसानी इसलिए हुई कि लगभग सभी कहानियां मूल अंग्रेजी में ही लिखी गई है ।
    -उर्मिता जैन
  • Saphalata Ka Rahasya
    Jagat Ram Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-99

    Availability: In stock

    सफलता का रहस्य
    जीवन में सफलता की चाहना सब रखते हैं, लेकिन सफल हो नहीं पाते। ऐसा न होने पर कोई भाग्य को कोसता है, कोई हालात को। जबकि सफलता हमारे अपने व्यवहार पर ज्यादा निर्भर है, न कि किन्हीं और बाह्य कारणों पर।
    सफलता के आधारभूत सूत्र हैं-शुद्ध व्यवहार, सीखने की प्रवृत्ति, आत्मनिर्भरता, संतोष तथा और भी बहुत कुछ।
    आर्य जी ने अपनी इस पुस्तक में सफलता के रहस्यों की सरल-सुबोध भाषा में व्याख्या की है। पुस्तक पठनीय तो है ही, जीवन से लिए गए सच्चे उदाहरणों के चलते संग्रहणीय भी बन पड़ी है।
  • Kavya Shatabdi (Paperback)
    Anamika
    160

    Item Code: #KGP-7088

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े  संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां  उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके क्राव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते है । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढने की गंभीर कोशिश दिखाई देती हे ।
    --मंगलेश डबराल 
  • Teesara Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    180 162

    Item Code: #KGP-301

    Availability: In stock


  • Yatrayen
    Himanshu Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-1928

    Availability: In stock

    यात्राएँ
    कहानियों, उपन्यासों की तरह हिमांशु जोशी के यात्रा-वृत्तांतों  की भी अपनी विशेषता है। पढ़ते-पढ़ते पाठक को कहीं लगने लगता है कि इन यात्राओं में लेखक के साथ-साथ वह भी यात्रा कर रहा है । लेखक जिस तरह से इन सबको देख रहा है, जिस तरह की अनुभूति उसे हो रही है, कुछ-कुछ वैसी ही उसे भी होने लगती है । सरलता, सहजता, स्वाभाविकता हिमांशु जोशी की रचनाओं के सहज, स्वाभाविक गुण हैं । संभवत: ये ही मूल गुण किसी रचना को जीवंत बनाने में सफल होते है ।
    इन यात्राओं से कश्मीर के बर्फीले दुर्गम सीमा-क्षेत्र शामिल हैं तो पूर्व में बाँग्लादेश और भारत को विभाजित करती सुदूर हरित वंगा या इच्छामती के कूल-कगार भी । कहीं कन्याकुमारी तथा केरल की मनोरम हरित दुश्यावलियाँ हैं तो कुमाऊँ के पर्वतीय प्रदेश की अनेक अज्ञात, अछूती मनोरम झाँकियाँ भी। मॉरिशस का नीलवर्णी निर्मल स्वच्छ सागर है कहीं तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश की हिमशीतल सफेद हवाएँ भी अपने अस्तित्व का अहसास जताने लगती है । हिमांशु जोशी संभवत: वह हिंदी के पहले लेखक है, जिन्होंने विश्वविख्यात नाटककार हैनरिक इब्सन के घर सीयन की साहित्यिक यात्रा की थी । उसी तरह नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नार्वेजियन लेखक सीगरी उनसत तथा ब्यौर्नसन के घरों की तीर्थयात्राएँ भी।
    ये यात्रा-विवरण मात्र यात्रा के विवरण ही नहीं, कहीं इनमें  इतिहास भी है, भूगोल के साथ-साथ साहित्य भी । कला एवं संस्कृति की मार्मिक छुअन भी। इसीलिए ये वृतांत कहीं  दस्तावेज भी बन गए हैँ-जीए हुए अतीत के। पाठको को इनसे एक संपूर्ण जीवन का अहसास होने लगता है। एक साथ वह बहुत कुछ ग्रहण करने में सफल होता है-शायद यह भी इन वृत्तात्तों की एक सबसे बडी सफलता है ।
  • Geeton Ke Indradhanush
    Sher Jung Garg
    50

    Item Code: #KGP-1210

    Availability: In stock


  • Pahli Gustakhi
    Ramesh Dutt
    190 171

    Item Code: #KGP-772

    Availability: In stock

    पहली गुस्ताखी
    संग्रह की कविताएं अत्यंत सहज, सरल और सीधे-सीधे पाठकों तक संप्रेषित होने वाली हैं । उनमें प्रायः एक अनगढ़पन भी है, लेकिन कवि अपने सामाजिक एवं मानवीय सरोकारों के प्रति अत्यंत गंभीर है । आज जबकि पूरी दुनिया समूची धरती को बचाने के लिए चिंतित है, डॉ. शर्मा की ग़ज़लनुमा कविताओं में पर्यावरणीय चिंताओं के बिंब, संग्रह को उल्लेखनीय बनाते हैं ।
    वर्तमान समय की शायद ही कोई भी समस्या हो, जिस पर कवि ने अपनी कलम न चलाई हो । चाहे गरीबी हो या बेकारी, भ्रष्टाचार हो या सांप्रदायिकता, हिंसा हो या अपराध, राजनीति की गिरावट हो या नौकरशाही की सुविधापरस्ती, समाज में टूटते- बिखरते रिश्तों एवं मानवीय मूल्यों के क्षरण पर कवि का ध्यान बार-बार जाता है और वह बार-बार अपनी रचनाओं में उन्हें पिरोता है ।
  • Vyavharik Pryay Kosh
    Mahendra Chaturvedi
    150 135

    Item Code: #KGP-83

    Availability: In stock


  • Kushti
    Sudhir Sen
    25

    Item Code: #KGP-7182

    Availability: In stock


  • Polywood Ki Apsara
    Girish Pankaj
    225 203

    Item Code: #KGP-2049

    Availability: In stock

    पॉलिवुड की अप्सरा
    "पॉलीवुड की अप्सरा' उत्तर-आधुनिक मनुष्य के मोहभंग की तथा-कथा है, जिसमें गिरीश पंकज विशुद्ध व्यंग्यकार सिद्ध होते है । (जहाँ हास्य का हाशिए पर भी जगह नहीं है) तात्पर्य यह है कि इस उपन्यास में व्यंग्यकार ने  यथार्थ का पल्ला कहीं भी नहीं छोडा है, जिससे यह समझने में आसानी होती है कि व्यंग्य-लेखन ही सच्चा लेखन हो सकता है। जिस प्रकार 'हॉलीवुड' के सादृश्य पर 'बॉलीबुड' रखा गया, उसी प्रकार 'बॉलीबुड' कै सादृश्य पर 'पॉलीवुड' बना । 'पॉलीवुड की अप्सरा' भी बॉलीवुड की समांतर भूमि में अपने रूप, रस, गंध और स्पर्श के साथ प्रतिष्ठित है  ।
    शेक्सपियर ने कभी कहा था कि नास में क्या रखा है, परंतु इस उपन्यास में सार नाम इसीलिए सोद्देश्य एवं सार्थक हैं कि नाम सुनते या पढ़ते ही उनका 'चरित्तर' मूर्त हो उठता  है ।
    'अप्सरा' अपने जन्म से ही अभिशप्त रही है, जिस ‘स्वर्वेश्या' भी कहा गया है । बॉलीबुड की अप्सरा बनने का पावती का सपना अंत तक पूरा सच नहीं हो पाता । यह त्रासदी 'अप्सरा' में व्यंजित तथाकथित आभिजात्य की निस्सास्ता से और भी सटीक हो गई है, जो परी में नहीं है । 'पार्वती' का 'पैरी' में  रूपांतरण एक ऐसी चेतावनी है, जिससे वर्त्तमान एवं भावी पीढ़ी झूठी महत्वाकांक्षा की आग में न कूदे । दार्शनिक शब्दावली में कहें तो जो कुछ दिख रहा है, यह सब माया है, छलावा  है । लगता है, समकालीन परिस्थितियों ने ही कबीर जैसे युगचेता का 'आखिन देखी ' कहने के लिए विवश किया ।
    इस कृति में उत्तर-आधुनिक मनुष्य और उसकी क्रीत-कुँठा सफल व्यंग्यकार गिरीश पंकज की सारग्रही सूक्ष्म-दूष्टि से उजागर होकर एक ही निष्कर्ष पर पहुंचती है कि मनुष्य की सफलता मनुष्यता का पाने में है, खोने में नहीं ।
  • Isliye
    Ashok Gupta
    175 158

    Item Code: #KGP-1831

    Availability: In stock


  • Samkalin Sahitya Samachar December, 2016
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #December,2016

    Availability: In stock

  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand (Paperback)
    Shanta Kumar
    180

    Item Code: #KGP-399

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापकविवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Rang Aakash Mein Shabd
    Narendra Mohan
    1500 1350

    Item Code: #KGP-674

    Availability: In stock

    रंग आकाश में शब्द नरेन्द्र मोहन और शामा की एक ऐसी अपूर्व संस्कृति है जिसमें रंग और शब्द, चित्र और कविता परस्पर जुडे होते हुए भी अपना एक मौलिक उत्कर्ष रचते है । यहीं एक साथ कई सौंदर्य-छवियां, रंग-रेखाएँ और शब्द प्रकाशमान हैं। हिंदी में, भारतीय कविता में इसे अपनी तरह का पहला और अनूठा प्रयोग माना जा सकता है ।
    कविता और चित्र यहाँ विंब-प्रतिबिंब रूप ने आमने-सामने नहीं हैं, साथ-साथ हैं । उनमें अनुपात बैठाना या अर्थों-आशयों की समांतरता दूँढ़ना दोनों कलाओं को कमतर आँकना होगा, हालाँकि दोनों ने छिपे रचना-सूत्रों की खोज की जा सकती है । दरअसल, कविता और कला संबंधी यह एक बिलकूल नई तरह का अंतरावलंबन है । चित्रों  के रंग-संकेत, छवियां और छायाएँ यहाँ कविता के अंतरंग का हिस्सा बनी हैं।
    चित्र के संवेदन धरातलों और सौंदर्य-रूपों को, अमूर्तन में लिपटी हुई रंग-रेखाओं के शिल्प को अपनी संवेदना में ढाल कवि ने यहाँ अपनी कल्पना शक्ति से कविता के शब्द में रचा है। चित्रों की रंग-गतियों में प्राकृतिक बिंबो और दृश्यावलियों में झाँकने की चित्रकार की ललक को, रंगों की कंपकंपाहट और थरथराहट को, दौड़ते भागते रंगों में लिपटी उदासी, पीड़ा, खामोशी और खोए हुए वजूद को कवि ने कविता की लय, बिंब-विधान और संरचना का हिस्सा बना दिया है । चित्रों के रंग कवि को अँधेरे ने लपटों की तरह उठते दिखे हैं । ऐसा भी लगा जैसे अँधेरे का एक उफनता समुद्र हो जिसकी उत्ताल तरंगें आग से दीप्त हों। ऐसे ही किसी क्षण में उसे महसूस हुआ :
    रंगों के पीछे आग है
    और रेखाएँ चुप नहीं है


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Yadav (Paperback)
    Rajendra Yadav
    100

    Item Code: #KGP-1264

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजेन्द्र यादव
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र यादव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिंहवाहिनी', 'मैं तुन्हें मार दूँगा', 'वहाँ तक पहुँचने की दौड़', 'रोशनी कहीं है?', 'संबंध', 'सीज फायर', 'मेहमान', 'एक कटी हुई कहानी', 'छोटे-छोटे ताजमहल' तथा 'तलवार पंचहजारी'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Gyarah Shreshtha Kahaniyan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-804

    Availability: In stock

    ग्यारह श्रेष्ठ कहानियां
    हिंदी कहानी ने अपनी यात्रा में अनेक सुगम और दुर्गम मार्ग तय किए हैं । वैदिक साहित्य की आख्यायिकाओं तथा ब्राह्मण ग्रंथों में आए अनेक आख्यान हमारी कहानी-परंपरा के आदि स्रोत रहे हैं । सर्जना की सर्वथा लोकप्रिय विधा रहने के कारण कहानी, लेखकों की लेखनी की लाडली विधा भी बनी रही और संभवत: इसीलिए कहानी के अलंकरण और उपयोग निरंतर विकासमान रहे । प्रेमचंद और प्रसाद ने हिंदी कहानी को जिस श्रेष्ठ लोकहित में मर्यादित और निर्धारित किया, उसकी अनुगूँजें आज भी हिंदी के युवा कथाकारों की रचनाओं में प्रवहमान है ।
    जनप्रियता के कारण हिंदी कहानी की गति को खूब-खूब  उतार-चढाव भी देखने पड़े तथा कथा-आंदोलनों के शोर में विशिष्ट कहानियों के प्रभामंडल का पहचान पाना तक एक मुश्किल कार्य हो गया । कहीं अनुभूत यथार्थ के चित्रण  का शोर, तो यहीं कल्पनावृत्ति को तिलांजलि देने की जिद । ऐसे में कहानी की रचनाशीलता को समग्रता में हानि पहुंची। मगर इस गुलगपाड़े के बीच जो अच्छी कहानियाँ लिखी गई, वे ही अंतत: हमारी कथा-धरोहर भी बनती गई हैं।
    प्रस्तुत संकलन से संपादकद्वय ने हिंदी की ऐसी श्रेष्ठ कहानियों को प्रस्तुत किया है जो अपने पाठ के माध्यम से हमें लौकिक बनाती हैं तथा हमारे सामाजिक संज्ञान और सरोकारों को, समय की कसौटी पर कुशलता से स्थापित और उद्वेलित करती हैं। व्यक्ति भले ही न रहे, मगर पात्र का चित्रण उस व्यक्ति का शाश्चता सौंप सके-ऐसी क्षमता जिन कहानियों में समाहित है-उन्हें ही प्रस्तुत संग्रह में संकलित किया गया है । प्रेमचंद, जयशंकर पसार तथा विष्णु प्रभाकर आदि वरिष्ट कथाकारों की कालजयी कहानियों के साथ-साथ, अन्य सुप्रतिष्ठित कहानीकारों की कहानियाँ भी पाठक एवं साहित्य के छात्र इस एक ही जिल्द से पढ़कर लाभान्वित होंगे, इसी आशमा और अपेक्षा के साथ यह संग्रह आपको सौंपा जा रहा है ।
  • Kavi Ne Kaha : Manglesh Dabral
    Manglesh Dabral
    150 135

    Item Code: #KGP-1875

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: मंगलेश डबराल
    मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से अपनी सृजनात्मक प्रेरणा ग्रहण करती हुई हिंदी कविता की आज जो पीढ़ी उपस्थित है, उसमें मंगलेश डबराल जैसे समर्थ कवि इतने वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी होते जा रहे हैं कि उनके किसी एक या चुनिंदा पहलुओं को पकड़कर बैठ जाना अपनी समझ और संवेदना की सीमाएं उघाड़कर रख देना होगा। एक ऐसे संसार और समय में जहां ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्हीं भी शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को उसके हाशिये से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचोबीच लाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, ईषर्यालु अथवा आत्मदयाग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोज़ख़ को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इनकार करता है।
    मंगलेश की इन विचलित कर देने वाली कविताओं में गहरी, प्रतिबद्ध, अनुभूत करुणा है, जिसमें दैन्य, नैराश्य या पलायन कहीं नहीं है। करुणा, स्नेह, मानवीयता, प्रतिबद्धता--उसे आप किसी भी ऐसे नाम से पुकारें, लेकिन वही जज़्बा मंगलेश की कविता में अपने गांव, अंचल, वहां के लोगों, अपने कुटुंब और पैतृक घर और अंत में अपनी निजी गिरस्ती के अतीत और वर्तमान, स्मृतियों और स्वप्नों, आकांक्षाओं और वस्तुस्थितियों से ही उपजता है। उनकी सर्जना का पहला और ‘अंतिम प्रारूप’ वही है।
    आज की हिंदी कविता में मंगलेश डबराल की कलात्मक और नैतिक अद्वितीयता इस बात में भी है कि अपनी शीर्ष उपस्थिति और स्वीकृति के बावजूद उनकी आवाज़ में उन्हीं के ‘संगतकार’ की तरह एक हिचक है, अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की कोशिश है, लेकिन हम जानते हैं वे ऐसे विरल सर्जक हैं जिनकी कविताओं में उनकी आवाज़ें भी बोलती-गूंजती हैं जिनकी आवाज़ों की सुनवाई कम होती है।
    -विष्णु खरे
  • Sant Kavi Dadu
    Baldev Vanshi
    220 198

    Item Code: #KGP-100

    Availability: In stock

    संत कवि दादू
    श्री दादूजी महाराज की वाणी काव्यमयी है । अतः  महाराज की वाणी काव्य है । श्री दादूजी महाराज और कबीर जी में प्रकृति भेद के कारण दोनों के व्यक्तित्व में स्वभावत: भेद आ गया है । वैसे उनके विचारों और सिद्धांतों में कोई भेद नहीं है । दोनों ही संत ज्ञानश्रयी  धारा के अग्रणी संत हैं । दोनों का मार्ग भक्तिमार्ग है । दोनों में ही जहाँ हिंदू और मुसलमानी मजहबों की आलोचना की है वहीं दोनों ने भारतीय दार्शनिकों और भक्तों के विचारों को स्वीकार किया है ।
    हम पहले ही कह चुके है कि यद्यपि श्री महाराज ने अपनी वाणी में बार-बार भक्तों और संतों के नामों का आदरपूर्वक संस्मरण किया है, उनकी वाणी में गोरखनाथ, नामदेव, कबीर, पीपा, रैदास आदि के नाम बार-बार आए हैं, किंतु उनकी श्रद्धा कबीर में अधिक है :
    साँचा शब्द कबीर का, मीठा लागे मोय । 
    दादू सुनताँ परम सुख, केता आनंद होय ।
  • Anant Naam Jigyasa
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-1976

    Availability: In stock

    अनंत नाम जिज्ञासा
    जाने किस-किस काल के स्मरण इंसान के
    अंतर में समाए हुए होते हैं, और जब कुदरत 
    उनको किसी रहस्य में ले जाती है, तो इस
    जन्म की जाति और मजहब बीच में हायल
    नहीं होते…
    इसी से मन में आया कि जो लोग अपनी
    आपबीती कभी नहीं लिखेंगे, उनके इतने बड़े 
    अनुभव, उन्हीं की कलम से लेकर सामने रख
    सकूँ  … 
    ओशो याद आए, जो कहते हैँ- 'अगर आप
    लोग मुझसे कोई प्रश्न न पूछते, तो मैं
    खामोश रहता, मुझे किसी को कुछ भी कहना
    नहीं था, यह तो आप लोग पूछते है, तो
    इतना बोल जाता हूँ...'
    ओशो ने जो इतना बड़ा ज्ञान दुनिया को दिया
    है, वह सब उनकी खामोशी में पड़ा रहता,
    अगर  लोग उन्हें प्रश्न-उत्तर के धरातल पर न
    ले आते... यही धागा हाथ में आया, तो मैंने
    अपनी पहचान वालों के सामने कितने ही प्रश्न
    रख दिए । बातचीत की सूरत में कुछ लिखने
    के लिए नहीं, केवल उनकी खामोशी को
    तोड़ने के लिए । इसीलिए मैं यहीं कई जगह
    अपने किसी प्रश्न को सामने नहीं रख रही,
    लेकिन जवाब में जो उन्होंने कहा, या लिखकर
    दिया, वही पेश कर रही हूँ ।
    -अमृता
  • Bimla
    Jagnnath Prabhakar
    75 68

    Item Code: #KGP-2023

    Availability: In stock

    राजा समरसिंह को उनके दीवान सतीशचन्द्र ने अपने एक विश्वस्त नौकर के उकसाने पर मरवा डाला । उनकी रानी ने उसके विरुद्ध अति भयंकर व्रत धारण किया । वह व्रत क्या था ? इन्द्रनाथ को महाश्वेता की बेटी सरला से प्रेम हो गया, पर ब्याह महाश्वेता का व्रत पूरा हुए बिना नहीं हो सकता था । इस व्रत को पूरा करने के लिये इन्द्रनाथ घर से चल पडा । महेश्वर मन्दिर में एक अद्वितीय सुन्दरी उस पर मोहित हो गयी । सुन्दरी ने अपना नाम भिखारिन बताया ।  उसने एक भिक्षा इन्द्रनाथ से सतीशचन्द्र का वध न करने की माँग ली और सतीशचन्द्र के नौकर को हत्यारा बताया । इन्द्रनाथ मुंगेर पहुँच कर राजा टोडरमल की सेना में भरती हो गया । संध्या समय वह गंगा-तट पर शत्रुओं से लड़ता हुआ बेहोश हो कर गंगा से गिर पड़ा । एक युवक! अपनी नाव से कूदा, उसे उठाकर अपनी नाव में डाल लिया । होश आने पर उसने देखा, इस युवक के भेस में वही भिखारिन थी । उधर दीवान के उसी शबित-सम्पन्न नौकर ने महाश्वेता को सरला सहित चतुर्वेष्ठित दुर्ग में कैद कर लिया था । भिखारिन उन्हें काल कोठरी से निकालकर अपने मकान में ले आयी । इधर टोडरमल ने पठानों के दुर्ग पर हमला किया । गुड़सवार नायक इन्द्रनाथ लड़ाई में घायल व बेहोश होकर गिर पडा । शात्रुओं ने उसे उठा कर दुर्ग में कैद कर लिया । भिखारिन ने वहाँ पहुँच कर उसे दुर्ग से कैसे बाहर भेज दिया और स्वय इन्द्रनाथ बन कर कैद हो गयी ? भेद खुलने पर भिखारिन को मृत्यु दण्ड देने के लिये वृक्ष के साथ बांध दिया गया । परन्तु इन्द्रनाथ ने किस प्रकार उसे बचा लिया ? इतने में दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली गयी ।  इसके बाद सतीशचन्द्र के उसी नौकर ने उन्हें मार डाला । विजेता इन्द्रनाथ अपने वचन के अनुसार निश्चित दिन सरला के पास पहुँच गया ।
    राजा टोडरमल की सभा लगी थी । सतीशचन्द्र का हत्यारा कैदी के रूप में राजा के सामने पेश किया गया । उसे मृत्यु दण्ड सुनाया गया । कैदी ने कहा, "मैं ब्राह्मण हूँ । ब्राह्यण को मृत्यु दण्ड देना शास्त्र-विरुद्ध है । धार्मिक टोडरमल सोच में पड़ गये । इतने में एक निहत्थी महिला तेजी से सभा मण्डल में घुसी और छुरी से सतीशचन्द्र के हत्यारे कैदी की हत्या कर डाली । वह महिला कौन थी और उसने छुरी कैसे प्राप्त कर ली ?
    अपने ब्याह के निश्चित दिन इन्द्रनाथ भिखारिन के पास गया और कहा, "भिखारिन । तुमने मुझे चार बार मौत से बचाया, जिसका बदला मैं चुका नहीं सकता । मेरी प्रार्थना है, तुम मेरे पास पटरानी की तरह रहो । सरला तुम्हारी सेवा करेगी ।" इस प्रकार जाने क्या-क्या स्नेह-भरी बाते कह रहा था, परन्तु वास्तव में भिखारिन वहाँ नहीं थी, था उस का प्राणहीन पार्थिव शरीर । वह इन्द्रनाथ के प्रति शाश्वत प्रेम रखती थी, उसी प्रेम की ज्वाला में वह आत्म- बलिदान कर चुकी थी । हाँ तो यह भिखारिन वास्तव में थी कौन?
    उपर्युक्त समस्त रहस्यमय प्रश्नों के उत्तर विविध रोमांचकारी विवरणों सहित यह पुस्तक प्रस्तुत कर रही है ।
  • Metamorphosis (Paperback)
    Franz Kafka
    99

    Item Code: #KGP-1130

    Availability: In stock

    The Metamorphosis is one of Franz Kafka's most well-known works. It is the story of a young man, Gregor Samsa, who transformed overnight into a giant beetle-like insect, becomes an object of disgrace to his family, an outsider in his own home, a quintessentially alienated man. 
    A harrowing—though absurdly comic — meditation on human feelings of inadequacy, guilt, and isolation, The Metamorphosis has taken its place as one of the most widely read and influential works of twentieth-century fiction.
  • Mahaan Yoddha Prithviraaj Chauhan : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    190 171

    Item Code: #KGP-492

    Availability: In stock

    भारतवर्ष के इतिहास में क्षत्रिय राजवंशों की गौरवगाथा इतनी लोमहर्षक है कि उन्हें बारंबार पढ़ने को मन करता है। पौराणिक काल से ही क्षत्रिय वंश ने राष्ट्र और समाज की रक्षा में अपनी तलवार उठाए रखी और अपने कर्तव्य का पालन किया।
    अजमेर चैहान वंश की राजधनी रहा है, जिसके प्रतापी राजा सोमेश्वर चैहान थे। सोमेश्वर चैहान के पुत्र पृथ्वीराज चैहान थे, जिनकी वीरता को आज भारतवर्ष में बड़े गर्व से याद किया जाता है। प्रस्तुत पुस्तक ‘महान् योद्धा पृथ्वीराज चैहान: जीवन दर्शन’ में पृथ्वीराज चैहान के जीवन से जुड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाओं को सरल, सरस व सुबोध् शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-3)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1578

    Availability: In stock


  • Jokhim
    Hridyesh
    395 356

    Item Code: #KGP-270

    Availability: In stock


  • Chhotoo Ustaad
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-728

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में संकलित कथाकार स्वयं प्रकाश की कहानियां आकार में छोटी हैं लेकिन प्रभाव में ‘बड़ी’। ये लघुकथाएं नहीं हैं। लघुकथा अकसर एकायामी कथ्य की वाहक होती है और एक निश्चित बिंदु पर प्रहार करती है। जबकि ये कहानियां बहुपर्ती हैं और आपकी पूरी विचार प्रक्रिया को प्रभावित बल्कि परिवर्तित कर देती हैं। मसलन ‘हत्या’ एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो जंगल के राजा शेर को सर्कस में रिंग मास्टर के इशारे पर भीत गुलामों की तरह व्यवहार करते देख रो पड़ता है तो ‘बिछुड़ने से पहले’ सड़क और पगडंडी की बातचीत के बहाने विकास के पूंजीवादी मॉडल को प्रश्नांकित करती है। रेटोरिक का इस्तेमाल जिन बहुत ही कम कहानीकारों ने हथियार की तरह किया है उनमें स्वयं प्रकाश एक हैं। ‘सुलझा हुआ आदमी’ में बहुत बोलने वाले और व्यवहार में इससे उलट आचरण करने वाले लोगों पर ‘कहता है’ के माध्यम से बड़ी तीखी गुम चोट की गई है।
    ये कहानियां किसी बड़े कलाकार--मसलन--यामिनी रॉय या मकबूल फिदा हुसैन के रेखाचित्रों की याद दिलाती हैं जिनमें न डिटेल्स की पेशकश होती है, न रंगों का पसारा, लेकिन फिर भी जिनमें कम से कम रेखाओं के माध्यम से एक अभिभूत कर डालने वाली माया का सृजन हो जाता है! और यही इन रचनाओं की सबसे बड़ी खूबी है। पाठकों को इन कहानियों को पढ़ते समय परसाई जी की या आचार्य अत्रो की या पु. ल. देशपांडे की याद आए तो इसे अपनी परंपरा में सुरभित पारिजात के नन्हे फूलों की पावन सुगंध् ही समझना चाहिए। कथाकार स्वयं प्रकाश की ये अद्भुत कहानियां पहली बार किसी संकलन में प्रकाशित हो रही हैं।
  • Ek Nirvasit Maharaja (Paperback)
    Navtej Sarna
    200 180

    Item Code: #KGP-311

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-2075

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका में यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुड़िया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    100

    Item Code: #KGP-7196

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    हरिशंकर परसाई

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित दिवंगत कथाकारों की कहानियों के चयन के लिए उनके कथा-साहित्य के प्रतिनिधि एवं अधिकारी विद्वानों तथा मर्मज्ञों को संपादन-प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया है। यह हर्ष का विषय है कि उन्होंने अपने प्रिय कथाकार की दस प्रतिनिधि कहानियों को चुनने का दायित्व गंभीरता से निबाहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Vrinda
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-91

    Availability: In stock

    वृन्दा
    "मैं वृन्दा के बिना अपने होने की कल्पना भी नहीं करता । अब कैसे जिऊँगा और क्यों जिऊँगा ? अब मुझे भी कोई रोक नहीं सकता---पर हाँ वृन्दा, जाने से पहले तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ--काना चाहता हूँ... "  शास्त्री जी कुछ संभलकर खडे हो गए ।
    सब उत्सुकता से उनकी और देखने लगे ।
    वृन्दा की ओर देखकर शास्त्री जी बोले--“मुझे जीवन के अंतिम क्षण तक एक दु:ख कचोटता रहेगा कि तुमने 'गीता' पढी तो सही, पर केवल शब्द ही पढे तुम 'गीता' को जीवन में जी न सकी । तुम हमेँ छोड़कर जा रही हो, यह आघात तो है ही; पर उससे भी बड़ा आघात मेरे लिए यह है कि मेरी वृन्दा 'गीता' पढ़ने का ढ़ोंग करती रही । जब युद्ध का सामना हुआ तो टिक न सकी । मुझें दु:ख है कि तुमने 'गीता' पढ़कर भी न पढी। वृन्दा ! 'गीता' सुनकर तो अर्जुन ने गांडीव उठा लिया था और तुम हमें छोड़कर, उस विद्यालय के उन नन्हे-मुन्ने बच्चों को छोड़कर यों भाग रहीं हो मुझे तुम पर इतना प्रबल विश्वास था ।  आज सारा चकनाचूर हो गया । ठीक है, तुम जाओ... जहाँ भी रहो, सुखी रहो...  सोच लूँगा, एक सपना था जो टूट गया ।"

    (इसी उपन्यास से)
  • Yah Ant Naheen
    Mithileshwar
    500 450

    Item Code: #KGP-812

    Availability: In stock


  • Grameen Samaj
    Mithileshwar
    340 306

    Item Code: #KGP-717

    Availability: In stock


  • Das Pratinidhi Kahaniyan : S.R. Harnot (Paperback)
    S. R. Harnot
    180

    Item Code: #KGP-7214

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Devinder Ki Kahaniyan
    Devindra
    125 113

    Item Code: #KGP-1828

    Availability: In stock


  • Antim Pankti Mein
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1900

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी की ये कविताएँ गवाह हैं कि इधर वे कविता की प्रगीतात्मक संरचना से आगे बढ़कर उसके आख्यानात्मक शिल्प की ओर आई हैं । इस प्रक्रिया में दोनों तरह की संरचनाओं के द्वंद्व और सहकार, उनकी अंत:क्रिया से ऐसा शिल्प विकसित करने में वे कामयाब हुई हैं, जो दोनों की प्रमुख विशेषताओं का सारभूत और संशिलष्ट रूप है । कविता के ढाँचे में लगातार चलती तोड़-फोड़, कुछ नया सिरज सकने की उनकी बेचैनी, प्रयोगधर्मिता के साहस और शिल्प को लेकर उनके जेहन में जारी बहस का समेकित नतीजा है ! बहुत-से कवियों की लगता है कि जीवन में जोखिम उठाना पर्याप्त है और कविता बिना जोखिम के लिखी जा अकती है। मगर नीलेश से हम कला की दुनिया का यह अनिवार्य सबक सीख सकते हैं कि जीवन से भी ज्यादा जोखिम है कला में । इसलिए वे आत्म-तत्त्व की कीमत पर साज-सज्जा में नहीं जाना चाहतीं। वह तो सच का अन्यथाकरण और अवमूल्यन है ! मानो वे स्वयं कहती हैं-जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को अरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते।
    विगत वर्षों में कुछ युवा कवियों के आख्यान की बनावट चेतना और प्रतिबद्धता के विस्तार के रूप में आकृष्ट करती रही है ! दरअसल या शिल्प कविता को चीजों का महज़ भावुक, एकांगी और सरल पाठ बन जाने से रोकता है और उसे भरसक वस्तुनिष्ठ, बहुआयामी और जटिल यथार्थ में ले जाता है ।  कवियों को 'पूरा वाक्य' लिखने की त्रिलोचन को सलाह पर अमल तो यहाँ है ही, कार्य-कारण-संबंध का विवेक भी और एक किस्म के गद्य की प्रचुरता वास्तविकता के काफी हद तक शुष्क और दारुण होने की साक्ष्य है! इसलिए रोजमर्रा की बातचीत की लय, व्याख्या और किस्सागोई का अंदाज और अनुभव का विषम धरातल-ये तत्व मिलकर इस कविता का निर्माण करते हैँ। यहाँ किसी अप्रत्याशित  सौंदर्य-लोक, कल्पना के नायाब उत्कर्ष या संवेदना की सजल पृष्ठभूमि की उम्मीद करना बेमानी है; क्योंकि इस शिल्प के चुनाव में ही कविता की पारंपरिक भूमि और भूमिका से एक प्रस्थान निहित है ! यह भी नहीं कि वह स्वप्नशील नहीं है! नीलेश रघुवंशी इस बदरंग और ऊबड़-खाबड़ दुनिया को एक खेत में बदलने और उसमें मनुष्यता को रोपने का सपना देखती हैं, मगर उसी समय यथार्थ की जटिल समस्या उन्हें घेर लेती है-एक स्वप्न है जाती हूँ जिसमें बार-बार/लौटती हूँ हर बार/मकडी के  जाले-सी बुनी इस दुनिया के भीतर !
    सच्चाई से सचेत और उसके प्रति ईमानदार होने की बुनियादी प्रतिश्रुति की बदौलत कविता किसी स्वप्निल, कोमल, वायवीय संसार में नहीं भटकती, बल्कि इच्छा और परिस्थिति के विकट द्वंद्व को साकार करती है ! नीलेश की नजर में अपने लिए किसी स्वप्न क्रो स्वायत्त करना और उसकी वैयक्तिक साधना करना गुनाह है ! उनके यहाँ सामान्य जन-जीवन ही स्वप्न की कसौटी है ! यही इस कविता का साम्यवाद है, जिसके चलते वे अपनी ही उत्साहित वस्तु से श्रमिक-वर्ग की चेतना के अलगाव और अपरिचय की विडंबना को पहचान पाती हैं-वे जो घर बनाते हैं उसके स्वप्न भी नहीं आते उन्हें !
    सवाल है कि प्रेमचंद के जिस होरी को किसान से भूमिहीन मजदुर बनने को विवश होना पड़ा और जिसकी एक दिन लू लगने से अकाल मृत्यु हुई, वह आज कहाँ है ? यह जानना हो तो नीलेश की अत्यंत मार्मिक और सांद्र कविता किसान पढ़नी चाहिए, जिसके किसी एक अंशा को उद्धृत करना कविता से अन्याय होगा ? फिर भी सारे ब्यौरे की प्रामाणिक लहजे में इस निष्कर्ष तक ले आते हैं-ये हमारे समय का किसान है न कि किसान का समय है ये । कोई पूछ सकता है कि किसान का समय था ही कब, पर कहने की जरूरत नहीं कि यह समय उसके लिए ज्यादा क्रूर और कठिन है । नीलेश साधारण जन-समाज से आवयविक रिश्ता कायम करती हैं, क्योंकि वे काव्य-वस्तु के लिए ही नहीं, भाषा और भाव के लिए भी उसके पास जाती हैं। सच है कि जो लोग सबसे अरक्षित और साधनहीन हैं, वे ही हँसते-हँसते मृत्यु की कामना कर सकते हैं । कबीर ने जिसे आकाश से अमृत निचोड़ना कहा था, उस तरह ये मृत्यु के हाथों से जिन्दगी छीन  लेते हैं । लेकिन जो मौत से डरते हैं, वे अपना सब कुछ बचाने की फिराक में जिन्दगी से ही कतराकर निकल जाते हैं । नीलेश की कविता प्रश्न करती है-क्यों खुटने से डरते हो ? हम तो रोज़ खुटते हैं ।
  • Antarctica Abhiyan (Paperback)
    Hridya Nath Dutta
    195

    Item Code: #KGP-366

    Availability: In stock

    अंटार्कटिका अभियान
    हमारी पृथ्वी असंख्य रत्नों और अनेक रहस्यों से भरी हुई है । प्रकृति ने भी इसे सजाने-सँवारने के लिए अनुपम सौंदर्य लुटाया है । इंसान हमेशा से ही पृथ्वी के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए प्रयत्नशील रहा है । अपने ज्ञान में वृद्धि के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का अपने हित में अधिक से अधिक दोहन भी इसका मूल कारण है । बरक्स इसके पृथ्वी का एक बहुत बड़ा भाग अब भी इंसान के द्वारा पूरी तरह जाना-समझा नहीं गया है । अंटार्कटिका क्षेत्र भी उन्हीं भागों में से एक है ।
    कहने की ज़रूरत नहीं कि अंटार्कटिका एक ऐसा भूभाग है, जो अपने अद्भुत सौंदर्य, स्वच्छ वातावरण, शुद्ध जल के अकूत  भंडार की वजह से हमेशा से वैज्ञानिको और पर्यावरणविदों के आकर्षण का केंद्र रहा है । समय-समय पर पूरे विश्व से वैज्ञानिको के दल वहां जाकर शोध और अध्ययन करते रहते है । कई देशों ने वहाँ अपने स्टेशन भी स्थापित किए हैं । गर्व की बात है कि इस मुहिम से भारत भी किसी से पीछे नहीं है ।
    भारतीय वैज्ञानिकों के अनेक दल कई बार अंटार्कटिका जाकर यहीं के वातावरण पर शोध करते रहे है । ऐसे ही अंटार्कटिका अभियान दलों में तीन बार डॉ० हृदयनाथ दत्ता और दो बार डॉ० जसवंत सिंह भी शामिल होकर कई शोध-कार्यों में हिस्सा ले चुके है । लगभग दो वर्ष पूर्व उन्होंने अपनी उन अद्भुत यात्राओं के संस्मरणों को पुस्तकाकार में प्रकाशित करने की इच्छा जाहिर की; लेकिन उनका कहना था कि वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यों और वहाँ की विशेषताओं को उन्होंने लिपिबद्ध तो कर दिया है, लेकिन पुस्तक के रूप में आने से पहले इसके संपादन की आवश्यकता है । फलस्वरूप यह जिम्मेदारी उन्होंने मुझे सोप दी । पुस्तक के संपादन के दौरान मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि इसमें वैज्ञानिकता के साथ ही रोचकता भी बनी रहे । इस प्रयत्न में मैं कहाँ तक सफल हुआ यह तो पाठक ही तय करेंगे, लेकिन इतना निश्चित है कि यह पुस्तक अंटार्कटिका को जानने-समझने और उससे जुडे असंख्य रोचक तथ्यों से परिचित कराएगी । साथ ही भविष्य में उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय खतरों के प्रति आगाह भी करेगी ।
    -विज्ञान भूषण
  • Haadase Aur Hausle (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-7077

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार है । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती है कि कहानी पाठक की आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र  में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझती।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हूई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानिया ।
  • Bhaasaa Vigyan Pravesh Evam Hindi Bhaasaa (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    230

    Item Code: #KGP-7065

    Availability: In stock

    भाषा विज्ञान प्रवेश एवं हिंदी भाषा
    डॉ.  भोलानाथ तिवारी लब्धप्रतिष्ठ भाषाविज्ञानी हैं। प्रस्तुत पुस्तक में उन्होंने भाषा विज्ञान को सरल और सहज रूप में प्रस्तुत किया है। भाषा विज्ञान के पारंपरिक विषयों के साथ-साथ नए विषयों व भाषा विज्ञान के नए आयामों को शामिल करते हुए उन्होंने पुस्तक की उपादेयता बढ़ा दी है।
    यह पुस्तक भाषा विज्ञान हेतु भारत के सभी विश्वविद्यालयों के लिए तो उपयोगी होगी ही, साथ ही केंद्र सरकार, सार्वजनिक उपक्रमों व बैंकों के राजभाषा अनुभागों तथा उनमें कार्यरत हिंदी से जुड़े अधिकारियों, सहायकों, अनुवादकों व भाषा से जुड़े प्रौद्योगिकीविदों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध होगी, क्योंकि इसमें भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा से जुड़े अद्यतन ज्ञान को सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। 
    यह पुस्तक भाषा से सरोकार रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए भी उपयोगी होगी, यह हमारा विश्वास है।
    इस पुस्तक में अद्यतन जानकारियाँ तथा जटिल संकल्पनाओं को भी इतने सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि भाषा विज्ञान में रुचि रखने वाले सामान्य पाठक के लिए भी यह उपादेय सिद्ध होगी।
  • Unheen Mein Palata Raha Prem
    Poonam Shukla
    200 180

    Item Code: #KGP-9329

    Availability: In stock

    उन्हीं में पलता रहा प्रेम 
    पूनम शुक्ला की कविताएँ एक ओर जहाँ स्त्री-विमर्श के दायरे को मजबूत करती हैं वहीं दूसरी ओर उसे विस्तार भी देती हैं। स्त्राी के दुःख और संघर्ष को ही नहीं, उसके अधिकार और ताकत को भी पहचानती हैं और उसे तर्क की ठोस भूमि पर निरूपित करती हैं। ऐसे में कविता के बयान बन जाने का खतरा बार-बार उपस्थित होता है, लेकिन भावात्मक लगाव और संवेदनात्मक स्पर्श से वे न सिर्फ ऐसे खतरों को टालने में सफल होती हैं बल्कि कई बार कविता की नई जमीन तोड़ने का उद्यम भी करती दिखती हैं। स्त्री कविता की प्रचलित अवधारणा से अलग एक संवेदनशील और विवेकशील मनुष्य की तरह समय के बीहड़ में प्रवेश करती हैं और समाज की उन विषमताओं और विसंगतियों को देखने में भी सफल होती हैं, जिन्हें देखने के लिए एक वर्गदृष्टि चाहिए। खास बात यह है कि उनकी कविताओं में यह वर्गदृष्टि आरोपित नहीं बल्कि जीवनानुभव के विस्तार और उत्पीड़ित जनों के साथ संवेदनात्मक जुड़ाव से पैदा हुई दृष्टि है।
    पूनम शुक्ला अपने समय के विमर्शों से प्रभावित तो हैं लेकिन वे ज्ञान और सूचनाओं का उपयोग, उन्हें अपने जीवनानुभव में शामिल करने के उपरांत ही करती हैं, इसलिए वे पाठकों को चैंकाती नहीं हैं बल्कि बेचैन कर देती हैं। यह उनका दूसरा संग्रह है, लेकिन इसे एक नई शुरुआत की तरह देखा जाना चाहिए। पहले संग्रह में काव्याभ्यास वाली कविताएँ अधिक थीं। उसके साथ इस संग्रह की कविताओं को देखकर लगता है कि यह विकास नहीं बल्कि छलाँग है, एक बिलकुल अलग तरह के काव्यलोक में। जाहिर है अपना मुहावरा पाने के लिए उन्होंने कठिन रचनात्मक संघर्ष किया है जिसकी झलक इन कविताओं में मिलती है।
    —मदन कश्यप 
  • Brahm Kamal
    Swati Tiwari
    300 270

    Item Code: #KGP-497

    Availability: In stock


  • Aadhi Chutti Ka Itihas
    Raj Kumar Gautam
    140 126

    Item Code: #KGP-1844

    Availability: In stock

    आधी छुट्टी का इतिहास
    हिंदी के चर्चित कथाकार राजकुमार गौतम की कहानियाँ समकालीन जीवन-स्थितियों  का गहरी इमानदारी से  उकेरती हैं । शहरी और  कस्बाई निम्न-मध्यवर्ग उनकी कहानियों में विशेष रूप से चित्रिन हुआ है, जो न तो किताबी है और न आयातित, बल्कि ठेठ हिंदुस्तानी हैं । यही कारण है कि राजकुमार गौतम की प्राय प्रत्येक कहानी किसी भी साहित्यिक वाद-विवाद से परे सामाजिक यथार्थ के विभिन्न स्तरों की खरी पहचान कराने में समर्थ है ।
    आधी छुट्टी का इतिहास में राजकुमार गौतम की एक दर्जन कहानियाँ संगृहीत हैं । इनसे गुजरते हुए लगया कि इनका प्रत्येक कथा-चरित्र हमारे एकदम नजदीक है या शायद हमारा ही प्रतिरूप  है। इतना ही नहीं, इनमें उन निर्जीव  वस्तुओं को भी जुबान मिली है, जो हमारी रोज  की बुनियादी जरूरतों को पूरा करती  हैं और इसी बिंदु पर ये कहानियाँ मनुष्य की अभावग्रस्त जिंदगी, यातना और उसकी जिजीविषा को मार्मिक ढंग से उजागर करती  ।
    टुटे-अधटूटे पारिवारिक रिश्तों और दायित्वों का बोझ ढोते, घर-दफ्तर के बीच चक्कार काटते तथा छोटी-छोटी इच्छाओं, खुशियों और उम्मीदों की पूर्ति के  लिए दिन- दिन  कितने ही चरित्र इन कहानियों में हैं, जो हमने बोलना-बतियाना चाहते  हैं, ताकि अपने जीवन पर पड़ते विभिन्न दबावों के प्रतिरोध की ताकत बटोर और सौंप  सकें । संक्षेप में, अपने सामाजिक परिवेश, उसके यथार्थ और अपनी लडाई के निजी मोर्चों की पहचान के लिए इन कहानियों को लंबे समय तक याद किया जाएगा ।
  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-2)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-632

    Availability: In stock


  • Safed Chaadar
    Jiyalal Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-1994

    Availability: In stock

    सफेद चादर
    बहुपथीन प्रतिभा के धनी श्री जियालाल आर्य की  यह कथाकृति 'सफद चादर' अनेक संदर्भों में उपन्यास-जगत् की एक अनूठी उपलब्धि है ।
    इस उपन्यास में समष्टि-हित की व्यापक दृष्टि से संपन्न एक ऐसी सशक्त और सतत संघर्षशील ग्रामीण नारी की कथा है, जो नारी-मुक्ति की संभावनाओं को सहज सम्भाव्य बनाती है । घोर कायिक और मानसिक उत्पीड़न तथा अत्याचार के बावजूद श्री आर्य की नायिका की महती मानवीय संवेदना और सामाजिक संचेतना किंचित् काले नहीं होती, अपितु भांति-भांति की कुंरीतियों-कुत्साओं के विषदंश से विमूच्छित मनुष्यता को मर्मन्तुद जर्जरता को उन्मूलित करने का उसका उत्साह उत्तरोत्तर अदम्यतर होता जाता है । मानवता के प्रति उपन्यासकार की यह मांगलिक निष्ठा इस उपन्यास को एक श्रेष्ट कृति की कोटि में प्रतिष्ठित करती है ।
    प्रज्ञापटु कथाशिल्पी श्री जियालाल आर्य के इस उपन्यास में पाठकों को बाँध लेने की अदभुत क्षमता है । अपनी हर अगली पंक्ति के लिए पाठकों का औत्सुक्य अक्षुष्ण रखने की कला में कथाकोविद श्री आर्य को पूर्ण प्रवीणता प्राप्त है । जिसके साथ में यह उपन्यास जाएगा, वह इसे अथ से इति तक पढे बिना नहीं ही छोड़ेगा, यह मेरा अनुभूत अभिमत है ।
    -डॉ० कुणाल कुमार
  • Devtaon Ki Ghaati
    Dronvir Kohli
    60 54

    Item Code: #KGP-1919

    Availability: In stock

    परीक्षा की घड़ी
    कोई-कोई यही बडी मनहूस होती है । ऐसी ही एक घडी आई थी हिमाचल की 'देवताओं की घाटी' में, जब वहीं के सीधे-सादे, भाले-भाले, निरीह प्राणियों पर, सचमुच, मुसीबत के पहाड़ टूटे थे।
    यह डरावनी वेला भुलाए नहीं भूलेगी इस घाटी के लोगों को । और दुनिया भी याद करेगी कि इन असहाय लोगों ने कितने धीरज से इतनी बड़ी विपदा का सामना किया ।
    बड़े जीवट के लोग है 'देवताओं की घाटी' के निवासी ।
    'देवताओं की घाटी' और उस घाटी में आई उस भयंकर विपति से जूझने का यह अद्भुत सच्चा वृत्तांत मैंने  बालय-बालिकाओं के लिए विशेष रूप से लिखा है ।
    -द्रोणवीर कोहली

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi (Paperback)
    Manohar Shyam Joshi
    120

    Item Code: #KGP-462

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मनोहर श्याम जोशी
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका  में  यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुडिया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ek Aur Lal Tikon (Paperback)
    Narendra Kohli
    50

    Item Code: #KGP-7099

    Availability: In stock


  • Himalaya Gaatha (2) Parv-Utsav
    Sudarshan Vashishath
    300 270

    Item Code: #KGP-167

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chandrakanta (Paperback)
    Chandrakanta
    150

    Item Code: #KGP-408

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : चन्द्रकान्ता
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चन्द्रकान्ता ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पोशनूल की वापसी', 'आवाज़', 'चुप्पी की धुन', 'पत्थरों के राग', "अलग-अलग इंतजार', 'भीतरी सफाई', 'आत्मबोधग', 'सिद्धि का कटरा' , 'लगातार युद्ध' तथा 'रात में सागर'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चन्द्रकान्ता की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aacharya
    Indira Dangi
    180 162

    Item Code: #KGP-1573

    Availability: In stock


  • Kaale Kuyen
    Ajeet Kaur
    225 203

    Item Code: #KGP-18

    Availability: In stock

    काले कुएँ
    इस संग्रह की कहानी 'बाजीगरनी'