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  • Kavi Ne Kaha : Rajesh Joshi
    Rajesh Joshi
    190 171

    Item Code: #KGP-384

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : राजेश जोशी
    राजेश जोशी अपने अनुभव को कविता में सिरजते वक्त शोकगीत की लयात्मकता नहीं छोड़ते । लय उनकी कविताओं में अत्यंत सहज भाव से आती है जैसे कोई कुशल सरोदवादक धीमी गति में आलाप द्वारा भोपाल राग का विस्तार कर रहा हो । इस दृष्टि से राजेश जोशी के शिल्प को एक सांगीतिक संरचना कहा जा सकता है । वे स्थानीयता के रंग में डूबकर भी कविता के सार्वजनिक प्रयोजनों को रेखांकित करते हैं । उनकी कविता अपने उत्कृष्ट रूप में एक शहर की कविता होते हुए भी मनुष्य के व्यापक संकट का बयान है । -ऋतुराज़
    समकालीन हिंदी कविता में राजेश जोशी की उपस्थिति एक दिलेर उपस्थिति है-कविता लिखना और उसके लिए लड़ना भी । उनमें एक काव्य व्यक्तित्व भी है, जो कविताएं लिखने वाल कई कवियों में नहीं भी हुआ करता है । उनकी यह उपस्थिति एक लोकतांत्रिक उपस्थिति है, जहां आप ढेर सारा संवाद कर सकते हैं।
    राजेश जोशी की कविता में एक टूट-फूट और संगीत का अवसाद है, लेकिन उठ खड़े होने की कोई मूलगामी संरचना भी  है । पस्ती का महिमामंडन नहीं है और पराजय में पराजित की उधेड़बुन नहीं है । इसलिए कौन-सी भंगिमा कब प्रतिकार में बदल जाएगी और एक कॉस्मिक रुप अख्तियार कर लेगी कोई नहीं जानता । तो साधारण की, पिछडे हुए की, मिटा दिए गए की, भुला दिए गए की, विजय होगी ऐसा कोई यूटोपियाई प्रतिवाद उनमें निरंतर मिलता  है। तो नैतिक श्रेष्ठता में विश्वास कभी खंडित नहीं होता।
  • Repartee (Paperback)
    Khushwant Singh
    225

    Item Code: #KGP-328

    Availability: In stock

    KHUSHWANT SINGH, India's iconic journalist and writer, whose works secured largest readership in the country, remains an enigma beyond his writings. His immense popularity and connectivity with his readers made him the common man's idol but his real persona remained in wraps. The 'dirty old man' ensconced in a bulb with a wicked grin and a fountain pen in hand was a far cry in real life.
    This collection of interviews and articles attempts to bring to light the real Khushwant as his family and close friends knew him. 
    A man who was constantly surrounded by beautiful women but remained faithfully wedded to his wife Kaval for 62 years  till she passed away, a man who wrote about wine, women and sex, but lived a life more simple and austere than a commoner, a man who was more disciplined in his fitness regime than men even half his age, a person  who wrote more books, articles and columns than any other journalist or writer in this country, and in a language, so simple that the common reader could comprehend. 
    Little do his readers know that the man famous for his jokes, his love for wine and women and his fierce agnosticism, was a great scholar in real life who wrote classics like A History of the Sikhs, taught comparative religion at Princeton University, was a passionate nature lover who wrote books like Nature Watch, was an art critic and had dabbled in sitar and painting at Shantiniketan in his youth.
    Khushwant Singh voiced his opinions openly and spoke his mind fearlessly through his column's for which he was honoured in 1998, with 'Honest Man of the Year Award and later in 2007 with Padma Vibhushan award.
    He remained reticent about his personal life while he lived. It is about time his loyal fans knew who the real Khushwant was.
  • Nasera Sharma : Shabd Aur Samvedana Ki Manobhoomi
    Lalit Shukla
    595 536

    Item Code: #KGP-894

    Availability: In stock

    नासिरा शर्मा : शब्द और संवेदना की मनोभूमि
    प्रस्तुत कृति सुप्रसिद्ध कथाकार नासिरा शर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व का विवेचन है। उनका स्थान साहित्य में अब निश्चित हो चुका है। भिन्न-भिन्न मानसिकता के लेखकों के विचार यहाँ एक साथ देखने को मिल जाएँगे। संपादन के इस प्रयास से एक तो लेखिका के विपुल अनुभवों का संसार सामने आता है; दूसरे, अनुभूति की बारीकियों से पाठकों का परिचय होता है। 
    नासिरा शर्मा की लेखनी ज़मीन-ज़मीन का फ़क़ऱ् भली-भाँति पहचानती है। संकलित लेखों से लेखिका की सूझबूझ, विवेक, पात्रोचित भाषा एवं कथा- साहित्य की सरसता की पूरी-पूरी जानकारी मिलती है। पाठक इस तथ्य से बख़ूबी परिचित हो जाता है कि साहित्य का उद्देश्य क्या है। वह इंसानियत की वास्तविक तस्वीर बनाने में कहाँ तक सहायक है। 
    अपने लेखन में लेखिका ने परंपरा से प्राप्त ख़ूबियों, जनजीवन से मिली संघर्ष-गाथाओं एवं जिंदगी की तकलीफ़ों का वास्तविक बयान प्रस्तुत किया है। इस प्रस्तुति से नासिरा शर्मा को जानने-समझने एवं परखने में मदद मिलेगी, विश्वास है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    100

    Item Code: #KGP-7196

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    हरिशंकर परसाई

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित दिवंगत कथाकारों की कहानियों के चयन के लिए उनके कथा-साहित्य के प्रतिनिधि एवं अधिकारी विद्वानों तथा मर्मज्ञों को संपादन-प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया है। यह हर्ष का विषय है कि उन्होंने अपने प्रिय कथाकार की दस प्रतिनिधि कहानियों को चुनने का दायित्व गंभीरता से निबाहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Dena Paavna (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    140

    Item Code: #KGP-154

    Availability: In stock


  • Raai Or Parvat
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-63

    Availability: In stock


  • Keral Ka Krantikari (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    40

    Item Code: #KGP-1122

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Jainendra Kumar
    Jainendra Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-2070

    Availability: In stock

    जैनेन्द्र कुमार

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फांसी', 'पाजेब, 'फोटोग्राफी', 'मास्टर जी', 'अपना-अपना भाग्य', 'जाह्नवी', 'एक रात', 'साधु की हठ', 'नीलम देश की राजकन्या' तथा 'चलित-चित'  ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक जैनेन्द्र कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kaaveri Se Saagar Tak
    P.S. Ramanunj
    120 108

    Item Code: #KGP-1859

    Availability: In stock

    कावेरी से सागर तक
    श्री रामानुज की कविता, कविता होने की शर्त पर, संपूर्णतया सामाजिक है और कवि के निजत्व की रक्षा करती हुई भी अपने समय के समाज की चिंता को अभिव्यक्त करती हैं । निजत्व उनकी गहन अनुभूति या कुशल अभिव्यक्ति का है और समाज की चिंता मूल्यहीनता तथा आडंवर को लेकर है। ये कविताएं शोषक और शोषित, सामंतवाद और पूँजीवाद, आभिजात्य और निम्नवर्ग के बँटवारे की कविताएँ नहीं  हैं; ये मनुष्य, उसके परिवेश, उसकी बदली हुई मनोवृति और तत्परिणामी संवेदनहीनता की चिंता की कविताएँ हैं। पुराकथा, प्रचीन संस्कृति और इतिहास से शक्ति ग्रहण करती हैं और भारतीय संस्कृति तथा काव्य-परंपरा से हैं, पर अतीतजीवी, कल्पनाजीवी और पलायनवादी न होकर वर्तमान से सीधे साक्षात्कार करती हैं । जाति-वर्ग और प्रदेश को लांघकर भारतीय परिवेश का प्रतिविंवित करती हैं, अत: सच्चे अर्थ में भारतीय हैं । किसी भी धर्म-संप्रदाय के पक्ष या विपक्ष में खडी नहीं होतीं, बल्कि सीधे मानवीय धर्म को प्रकाशित करती हैं, इसलिए तत्त्वत: धर्म-निरपेक्ष  । संयत छोर शालीन है, अतएव अभिजात है ।
  • Chehre Aur Chehre
    Ram Kumar Bhramar
    60 54

    Item Code: #KGP-1809

    Availability: In stock

    चेहरे और चेहरे
    'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के जिन स्तम्भों को हिन्दी पाठक का अपूर्व स्नेह और लोकप्रियता मिली, उनमें 'इस बार' का विशेष महत्त्व रहा है । 'चेहरे और चेहरे' रामकुमार भ्रमर द्वारा विभिन्न क्षेनों में समय-समय पर बहुचर्चित रहे व्यक्तियों के उन्हीं चरित्र-व्यंग्यों का संकलन है, जो उन्होंने 'इस बार' के अन्तर्गत लिखे थे । सुप्रसिद्ध कार्दूनिस्ट रंगा द्वारा इन चरित्रों के जो कार्टून उन लेखों के साथ बनाये गए थे, उन्हें भी प्रस्तुत पुस्तक में सहेजा गया है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के इन व्यक्तियों को लेकर लेखक ने समय-समय पर जो कुछ लिखा, वह बहुत पसंद किया गया । इन चरित्रों को लेकर भ्रमर के व्यंग्यपूर्ण लेखन की गुदगुदी पाठक का मन लुभा लेती है और अनायास ही चेहरे और चेहरे की मुस्कान बन जाती है ।

  • Amar Shaheedon Ki Amar Kathayen
    Shyam Lal
    50

    Item Code: #KGP-969

    Availability: In stock


  • Tv Samaachaar Ki Duniyaa
    Kumar Kaustubh
    500 450

    Item Code: #KGP-604

    Availability: In stock

    ‘टीवी समाचार की दुनिया’ में समाचार के स्वरूप और उसके कुशल निर्माण व प्रसारण पर लगभग सभी दृष्टिकोणों से विशद चर्चा की गई है। सरल और मनोरंजक शैली में जहां खबर के उत्कृष्ट लेखन-संपादन को समझाया गया है, वहीं उन तमाम टेलीविजन-इतर प्रभावों का चित्रण भी है जिनसे बचा जाना चाहिए। इसके अध्ययन से खबर के निर्माणक डेस्क से लेकर माइक के सामने या परोक्ष में खबरों की सफल और प्रभावी प्रस्तुति तक का सफर सहज और ग्राह्य होकर सामने आ जाता है। इसी तरह ‘न्यूज़ रूम से पैनल तक’ शीर्षक से लेख में स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि आज का प्रसारण पूरी तरह कंप्यूटर-आधारित प्रक्रिया कैसे है। कुमार कौस्तुभ ने पुस्तक में उद्धारण के रूप में ‘खबर: एक कहानी’ का नाम देकर आत्मानुभव को कौशल से लेखनीबद्ध किया है। मैं मानता हूं कि खबरों के उत्पादन-विधान को पढ़ाने वाले अध्यापकगणों को इस पुस्तक से रोचक अनुभव-सामग्री मिलेगी और चैनलों के दर्शकों का भी इसमें किए गए विश्लेषणों से और अधिक जुड़ाव होगा। अध्येता के लिए भी कुमार कौस्तुभ की लिखी यह अनुभवजन्य पुस्तक नई संभावनाओं के द्वार खोलेगी।
    प्रस्तुत पुस्तक में टीवी खबर और उसके परिवेश की समग्रता दिशा-निर्देशों के साथ खुलकर उजागर हुई है।
    —राजनारायण बिसारिया
  • Sachitra Yogasan (Paperback)
    Om Prakash Sharma
    190

    Item Code: #KGP-114

    Availability: In stock

    भारत सदा से ऋषि-मुनियों, योगियों और दार्शनिकों का देश रहा है। यहां के निवासी सदा ही ज्ञान की खोज में लगे रहे हैं। आज नाना प्रकार की नई-नई सुविधएं मौजूद हैं, फिर भी व्यक्ति अधूरा, अतृप्त और अशांत है। उसका मन आज भी दुविधा में पड़ा है। नई पीढ़ी दिशाहीन हो गई लगती है। आत्महत्या करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अनेक भारतीय असफल रहकर पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को अपनाते जा रहे हैं। वे भूल चुके हैं कि हम उन ऋषियों की संतान हैं, जिनके ज्ञान का डंका कभी पूरे विश्व में बजता था।
    इस ऋषि-परंपरा में महर्षि पतंजलि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनके द्वारा प्रतिपादित योग-दर्शन के परिणामों को देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी स्तब्ध रह गए हैं।
    महर्षि पतंजलि ने विश्व-भर के प्राणियों के जीवनकाल का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन करने के पश्चात् चैरासी लाख योगासनों का चुनाव किया और विकारों से बचकर सुखी एवं त्यागमयी जीवन जीने की विधि खोज निकाली।
    योगासन के धीरे-धीरे अभ्यास से आप गंभीर बीमारियों से भी बच सकते हैं और स्वस्थ रह सकते हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक महर्षि पतंजलि द्वारा निरूपित सिद्धांतों को नए रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास है।
  • Gadya Ka Parivesh
    Vishwanath Prasad Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-814

    Availability: In stock

    गद्य का परिवेश
    प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी के महत्त्वपूर्ण गद्य लेखकों (प्रेमचंद, निराला, महादेवी वर्मा, नंददुलारे वाजपेयी, लक्ष्मीनारायण मिश्र, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नेमिचंद्र जैन, विद्यानिवास मिश्र, निर्मल वर्मा आदि) पर नई दृष्टि से गंभीर विचार हुआ है। इसमें आलोच्य लेखकों को नए कोणों से देखने तथा उनकी शक्ति और सामर्थ्य को पहचानने की कोशिश की गई है। इसमें कुछ विशिष्ट गद्यकारों के उन पक्षों पर लिखा गया है, जिन पर प्रायः कम विचार हुआ है। जैसे कि प्रेमचंद की दलित संदर्भ की कहानियों पर या निराला, अज्ञेय, जैनेंद्र कुमार, निर्मल वर्मा के आलोचक और विचारक रूप पर। यह एक तटस्थ और निर्भीक विश्लेषण तथा सहृदय मूल्यांकन करने वाली कृति है। 
    प्रसिद्ध कवि-आलोचक डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी स्वयं एक सर्जनात्मक गद्यकार हैं, जिन्होंने संस्मरण और यात्रा की कई मूल्यवान कृतियां लिखी हैं। उनके इन आलोचनात्मक निबंधों में उनकी रचनात्मक अंतर्दृष्टि के दर्शन होते हैं। साथ ही एक गंभीर पाठक की संतुलित बेधक दृष्टि के भी। हिंदी गद्य के एक मूल्यवान अंश का साक्षात्कार करने वाली यह पुस्तक निश्चय ही पाठकों के लिए उपयोगी और मूल्यवान होगी।
  • Bhaasha Vigyan Pravesh (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    50

    Item Code: #KGP-998

    Availability: In stock

    यदि यह कहा जाए कि सच्चे अर्थों में भाषाविज्ञान का प्रारंभ भारत में हुआ तो अत्युक्ति न होगी, किंतु आधुनिक काल में अपने देश में इसके प्रति रुचि बहुत बाद में जगी और वह भी यूरोपीय प्रभाव ओर प्रेरणा के फलस्वरूप। यह प्रसन्नता की बात है कि इधर लगभग तीन-चार दशकों से यह विषय यहां काफी लोकप्रिय हुआ है और होता जा रहा है।
    हिंदी में उच्चतम कक्षा के उपयुक्त इस विषय की कुछ पुस्तकें तो हैं किंतु ऐसी कोई प्रारंभिक पुस्तक नहीं थी जो इस विषय में रुचि रखने वाले सामान्य लोगों तथा विषय की प्रारंभिक जानकारी चाहने वाले छोटी या बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों आदि के लिए उपयोगी हो। इसी कमी की पूर्ति की दिशा में यह एक प्रयास है। 
    इस संस्करण में कुछ नई सामग्री भी जोड़ दी गई है तथा शेष का संशोधन कर दिया गया है, जिसके कारण यह पुस्तिका अधिक उपयोगी हो गई है।
    —भोलानाथ तिवारी
  • Hindi Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    80

    Item Code: #KGP-1334

    Availability: In stock

    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उर्दू में ग़ज़ल कहने की परंपरा बहुत पुरानी है । मीर, गालिब, जौक, सौदा से लेकर जिगर, सजाना, फैज, साहिर और उनके बाद की अनेक पीढियों तक ग़ज़ल उर्दू शायरी का जरूरी हिस्सा रही है । इधर हिंदी में भी ग़ज़ल ने अपनी एक परंपरा बना ली है और निराला, प्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी, हरिकृष्णा 'प्रेमी', शंभुनाथ शेष, विजित, त्रिलोचन, शमशेर, बलवीर सिंह रंग, दुश्यंत कुमार और उनके बाद छंदबद्ध लिखने वालों की लगभग पूरी की पूरी पीढ़ी  ग़ज़ल -लेखन से जुड़ गई है। कहना ही होगा कि हिंदी ग़ज़ल  के क्षेत्र में पूरे भारत में लगभग हजार से अधिक रचनाकार अपने ढंग से, अपने रंग में, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ ग़ज़लें कह रहे हैं । असलियत यह है कि आज काव्य-मंचों पर, पत्र-पत्रिकाओं में, पुस्तक प्रकाशन में ग़ज़ल का बोलबाला है ।
    इतने व्यापक रचना-संसार में निश्चय ही बहुत-सी ग़ज़लें ऐसी है, जिन्हें काव्यपेमी बार-बार पढ़ना और अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे । प्रस्तुत 'हिन्दी ग़ज़ल शतक' में ग़ज़ल को विविध शैलियों में लिखने वाले पच्चीस ग़ज़लकारों की चार-चार ग़ज़लें दी जा रही है, जो हिंदी ग़ज़ल  के वैविध्य को निश्चय ही प्रभावकारी अंदाज में पेश करती है ।
  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain (Paperback)
    Kunwar Narayan
    90

    Item Code: #KGP-1217

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।

  • Kyon Tanaavgrast Hai Shiksha-Vyavastha
    Jagmohan Singh Rajput
    250 225

    Item Code: #KGP-218

    Availability: In stock


  • Saahsi Bachche : Anokhe Karname
    Sanjiv Gupta
    200 180

    Item Code: #KGP-243

    Availability: In stock


  • Kahin Kuchh Aur
    Ganga Prasad Vimal
    200 180

    Item Code: #KGP-9067

    Availability: In stock


  • Mahayaatra Gaatha (1 & 2) (Paperback)
    Rangey Raghav
    500

    Item Code: #KGP-22

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)

    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    995 896

    Item Code: #KGP-580

    Availability: In stock


  • Utho Annapoorna Saath Chalen
    Usha Mahajan
    100 90

    Item Code: #KGP-9127

    Availability: In stock

    दांपत्य दो समान व्यक्तियों एकीकरण का नाम है। दंपति का संधिविच्छेद करें तो बनता है दम् (घर) $ पति। अर्थात् दोनों ही घर के बराबर के पति हैं। लेकिन कितनी समानता है हमारे समाज में आज भी पति और पत्नी के स्तर में? किस प्रवृत्ति का प्रतीक है सत्तर के दशक से दहेज-हत्याएं कही जाने वाली शादीशुदा औरतों की अप्राकृतिक मौतों का दौर? क्या कारण हैं हिंदू समाज में दांपत्य-संबंधों में बढ़ती दरारों के? जिस समाज मंे स्त्री के लिए पति परमेश्वर के समान माना जाता है, वहीं दिल्ली-मद्रास जैसे महानगरों में डेढ़ से दो हजार कुंवारी लड़कियां हर माह डाॅक्टरों से गर्भपात करवाती हैं, सगे पिता अपनी मासूम बेटियों का यौन-शोषण करते हैं। सेक्स विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों से मिलंे, तो वे बताते हैं कि पहले पुरुषों के ही अवैध संबंध हुआ करते थे, पर अब औरतें भी उनके मुकाबले में विवाहेत्तर और विवाह-पूर्व संबंध रख रही हैं। अदालतों में जाकर देखें तो अनगिनत दंपति एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते, गाली-गलौज करते और यहां तक कि जूते-चप्पल चलाते भी आपको मिल जाएंगे।
  • Mere Saakshatkaar : Nagarjun
    Nagaarjun
    300 270

    Item Code: #KGP-15

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam (Paperback)
    Amrita Pritam
    80

    Item Code: #KGP-1518

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अमृता प्रीतम
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार अमृता प्रीतम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बृहस्पतिवार का व्रत', 'उधड़ी हुई कहानियाँ', 'शाह की कंजरी', 'जंगली बूटी', 'गौ का मालिक', 'यह कहानी नहीं', 'नीचे के कपड़े', 'पाँच बरस लम्बी सड़क', 'और नदी बहती रही' तथा 'फैज की कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dr. Ambedkar Jeevan Ke Antim Kuchh Varsh
    Nanak Chand Rattu
    500 450

    Item Code: #KGP-9187

    Availability: In stock

    ‘डाॅ. अम्बेदकर: जीवन के अंतिम कुछ वर्ष’ पुस्तक डाॅ. अम्बेदकर के जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं का उद्घाटन करती है। इस देश के राजनीतिक चरित्र में गत कुछ वर्षों से उल्लेखनीय परिवर्तन आ रहा है। लोकतंत्र की अवधारणा और उसकी स्वीकृति ने समाज के उन वर्गों को भी देश की राजनीति में वह पहचान देनी प्रारंभ कर दी है, जिससे वे सदा वंचित रहे। जिसके संबंध में जब भी उन्होंने छोटे-मोटे प्रयास किए, वे बुरी तरह दुत्कार दिए गए। आज ऐसे वर्गों ने न केवल अपनी अस्मिता स्थापित की है, अपने आप को सत्ता का सक्रिय भागीदार भी बना लिया है।
    इन सभी उपलब्ध्यिों का बहुत बड़ा श्रेय डाॅ. बाबा साहेब अम्बेदकर की प्रतिभा और उनके जीवनपर्यंत के अथक प्रयसों को दिया जा सकता है।
    डाॅ. अम्बेदकर के अंतिम वर्ष एक ओर उनक जीवन के अत्यंत निर्णायक वर्ष थे, दूसरी ओर उनके गिरते हुए स्वास्थ्य और उनके चारों ओर की संदेहात्मक स्थितियों की छाया भी उन वर्षों पर छाई हुई थी। इसलिए यह पुस्तक डाॅ. अम्बेदकर के जीवन का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गई है।
  • Swasthya Gyan
    Dr. Rakesh Singh
    190 171

    Item Code: #KGP-722

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य-ज्ञान
    पुस्तक में स्वास्थ्य से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर लगभग  35 लेख संकलित हैं । जो लोग यह कहते  हैं की चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम में ही पढाया जा सकता हैं, उनके लिए वे लेख चुनौती है और सिद्ध करते है कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा कै। उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को  माध्यम से पढाया जा सकता है । 
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है । इन लेखों में अधिकांशतः इस बात को ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग  दवाओं का नाय याद कर लेते है और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते है । उससे कितनी हानि हो सकती है, यह 'दवाओ के उपयोग में सावधानियाँ' शीर्षक से स्पष्ट हैं । इसी प्रक्रार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारना से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है । 'ह्रदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हदय- रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है । इसमें अधुनातन  चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है । अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-सम्पन्न है । कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्य एवं उनके सफल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतिक है ।
  • Asprishya
    Ajay Mahapatra
    180 162

    Item Code: #KGP-8003

    Availability: In stock

    ईश्वर की बनाई दुनिया में हर व्यक्ति समान है। सबमें परमात्मा का अंश है। सब उसी परमज्योति से आलोकित हैं। फिर यह असमानता, अन्याय, शोषण, भेदभाव, जातिवाद, नस्लवाद क्यों ! ये मनुष्य की बनाई अवधारणाएं हैं। इनके कारण जाने कितने व्यक्तिगत और सामाजिक संकट उत्पन्न होते रहते हैं। समय-समय पर इनका प्रतिरोध विभिन्न रूपों में सामने आता है। प्रतिवाद और प्रतिरोध का एक विशिष्ट स्वर अजय महापात्र के उपन्यास ‘अस्पृश्य’ में सुना जा सकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में मानवीय संवेदना का गहन प्रभाव है। लेखक ने कला-कौशल या शाब्दिक साहस के स्थान पर कथ्य को प्रमुखता दी है। यह समय को स्पष्ट और सतर्क ढंग से प्रस्तुत करने का रचनात्मक उपक्रम है। 
    ‘अस्पृश्य’ एक शब्द भर नहीं, मात्रा एक भाव संवेद नहीं; यह निरंतर सक्रिय समय का आख्यान है। इसमें समय और समाज के बहुतेरे बिंब देखे जा सकते हैं।
  • A Coders Cocktail
    Shashwat Rai
    595 536

    Item Code: #KGP-853

    Availability: In stock

    An excerpt...
    My dreams had always been extravagant and seemingly more enjoyable to me than my real life. The strange world of 
    imaginations where I rescued the POWs from Somalia to making love to the 
    Hollywood babes was like a daily chore. 
    I would often reach the climax on a high note and would wake up with my heart pounding and sinking like the low-high tides of the moving ridges of the sea.
    My dreams were the answers to my real life questions. I was more than me, a kind of superhero, the Robin Hood alike in my dreams. Like the Iraqi shoe-throw journalist Muntader al-zaidi who was renowned for his dare devil act on Bush, I would somehow find ways while stargazing to flutter woman’s heart or make political revolutions worthy of being termed and credited for cultural turnarounds too. 
    Maybe I always dreamt in lieu of waking up as someone else. Maybe I wanted to be somebody that I wasn’t already now. 
    I loved my dreams more than I loved myself.
  • Sabha Parv
    Badiuzamma
    300 270

    Item Code: #KGP-2040

    Availability: In stock

    सभापर्व 
    जो कहानी महाभारत के 'सभापर्व' से शुरू हुई वह आज भी पूरी नहीं हुई । छोटे-से शहर गया के एक मोहल्ले से शुरू होकर ये उपन्यास इतिहास का सैकडों साल का सफर तय करता है-वह इतिहास जो न चाहते हुए भी हममें जिदा है और हमारे दिले-दिमाग पर हावी है ; वह इतिहास जो बजाहिर तो बदलता है लेकिन दरअसल सिर्फ अपने-आप को दोहराता है । सतह के नीचे सब कुछ वैसा ही रहता है जैसा कि था । धर्म बदले, सिद्धान्त बदले, सत्ता के लिए जद्दोजहद के तरीके बदले लेकिन सत्ता का बुनियादी स्वरूप नही बदला । बनी हाशिम-बनी उमय्या; शीया-सुन्नी, हिन्दू-मुस्लिम, बौद्धधर्म-ब्राह्यणवाद…संघर्ष के मुखोटे बदलते रहते हैं, इंसानी प्रवृत्ति नहीं बदलती । सैकडों साल के सफ़र के दौरान ये उपन्यास समाज के विभिन्न वर्गों का एक जायजा लेता है । घर, कबीले और मुल्क के नक़्शे, और इंसानी ताल्लुकात का बनना- बिगडना न बदलने वाली मानसिकता की पहचान है । यह ऐसी मानसिकता है जिससे हजार साल की नफ़रत, लगाव, तजूर्बात परत-दर-परत जिन्दा हैं ।  इसमें श्रीकृष्ण के कालिय दमन, महात्मा बुद्ध की धर्म विजय और सूफियों के चमत्कार-सब की याद बाकी है । 'सभापर्व' इसी मानसिकता की खोज और पहचान है ।
  • Lalit Nibandh : Swaroop Evam Parampara
    Dr. Shri Ram Parihar
    750 675

    Item Code: #KGP-781

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash
    Uday Prakash
    395 356

    Item Code: #KGP-904

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 3
    Shrinivas Vats
    280 252

    Item Code: #KGP-567

    Availability: In stock

    तीसरा खंड लिखते समय मुझे आनंद की विशेष अनुभूति हुई। कारण, चुलबुला विष्णु कर्णपुर जो लौट आया। इस खंड को पढ़ते हुए आपको भी ऐसा लगेगा कि विष्णु की उपस्थिति हमें आव्हादित करती है। मैंने विभिन्न विधाओं में अब तक लगभग तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं, लेकिन इस किशोर उपन्यास से मुझे विशेष लगाव है। भला क्यों?
    आपके मम्मी-पापा की तरह मेरे पिताजी भी मुझे डाॅक्टर बनाना चाहते थे। मैंने विज्ञान पढ़ा भी। पर जीवित मेढक, खरगोश के ‘डाइसेक्शन’ मन खिन्न हो उठा। मैंने अपनी दिशा बदल ली। मेरी अलमारी में जीवविज्ञान की जगह कालिदास, शेक्सपियर, टैगोर, प्रेचंद की पुस्तकें आ गई। साहित्य पढ़ना और लिखना अच्छा लगने लगा। सोचता हूं, भले ही मैं डाॅक्टर न बन सका, लेकिन विज्ञान और कल्पना के बीच संतुलन बनाते हुए बालकों के लिए लिखना चिकित्सकीय अनुभव जैसा ही है। संभव है चिकित्सक बनकर बच्चों से उतना घुल-मिल न पाता, जितना उन्हें अब समझ पा रहा हूं।
    सतरंगी की चतुराई ने तो मेरा मन ही मोह लिया। डाॅक्टर बनने की राह आसान हो गई। पूछो, कैसे? पढ़िए चैथे खंड में।
    -श्रीनिवास वत्स
  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    150 135

    Item Code: #KGP-479

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधारस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • Ratangarbha
    Shanker Shesh
    40 36

    Item Code: #KGP-2087

    Availability: In stock


  • Adakara Madhubala : Dard Bhari Jeevan Katha
    Shashi Kant Kinikar
    390 351

    Item Code: #KGP-569

    Availability: In stock

    भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग में कुछ नायिकाओं ने दर्शकों के दिल में एक विशिष्ट स्थान बना लिया था, उनमें से प्रमुख कलाकार मधुबाला अपनी सुंदरता, अपने मुस्कराते चेहरे व विभिन्न तरह के रोल करने के कारण दर्शकों की चहेती कलाकार थीं, विशेषकर जो फिल्म जगत् को पसंद करते थे।
    मधुबाला का जन्म 1933 में और देहांत 1969 में हुआ था। मधुबाला ने मात्र 9 वर्ष की आयु से ही अभिनय करना शुरू कर दिया और तो और लड़कपन में ही फिल्मों में नायिका का रोल करना शुरू कर दिया था। सन् 1950 और 1960 के दशकों में मधुबाला ने उस समय के सारे मुख्य अभिनेताओं के साथ अभिनय किया। मधुबाला इस युग में अपनी लोकप्रियता की चरम सीमा पर थीं और इसी युग को भारतीय सिनेमा का स्वर्णकाल कहा जाता है।
    मधुबाला का जीवन उनकी सुंदरता और मुस्कराहट की तरह अच्छा नहीं था। सारा दिन फिल्मों में कार्य करने के बाद भी उन्हें अपने बड़े परिवार को पालने के लिए कार्य करना पड़ता था। अपने बड़े परिवार में वह अकेली जीविका कमाने वाली सदस्य थी और सबका ठीक प्रकार से पालन-पोषण करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करती थीं जिस कारण वह बहुत दुखी रहा करती थीं।
    दिलीप कुमार, जो उस समय के शोकाकुल अभिनय के सम्राट माने जाते थे, से प्रेम व कलाकार किशोर कुमार से विवाह दोनों ही विफल रहे। इन विफलताओं ने उनकी पीड़ा को और बढ़ा दिया था। इस सबके अतिरिक्त वह बालपन से ही बहुत दुर्बल थीं और इसी शारीरिक दुर्बलता के कारण भी उन्होंने बहुत कष्ट झेले। शायद इन सब कारणों के होते उनका देहांत इतनी छोटी आयु में हो गया।
    मधुबाला का स्वयं का जीवन भी एक फिल्म की पटकथा के समान ही था। प्रख्यात लेखक शशिकांत किणीकर ने इस पुस्तक में मधुबाला का जीवन-दर्शन बहुत ही निपुणता से प्रस्तुत किया है जो पाठकों के दिलों को छू लेगा।
  • Qabra Tatha Anya Kahaniyan
    Raj Kumar Gautam
    150 135

    Item Code: #KGP-1845

    Availability: In stock


  • Datta
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-575

    Availability: In stock


  • Manch Andhere Mein
    Narendra Mohan
    120 108

    Item Code: #KGP-1915

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Mahayaatra Gaatha (3 & 4) (Paperback)
    Rangey Raghav
    500

    Item Code: #KGP-23

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)

    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Raseedi Ticket
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-2068

    Availability: In stock


  • Manto Zinda Hai (Paperback)
    Narendra Mohan
    180

    Item Code: #KGP-394

    Availability: In stock

    मंटो जिन्दा है
    सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य का एक बड़ा लेखक होने के साथ-साथ, भाषाओं और देशों की सीमाओं को लाँघ लेखकों- पाठकों की विश्व बिरादरी का हिस्सा बन चुका है । गोर्की, चेखव और मोपासाँ जैसे कथाकारों के साथ विश्व के कथा-शीर्ष पर खड़ा मंटो एक अद्वितीय कथाकार तो है ही, एक अजब और आजाद शख्सीयत भी है । फीनिक्स पक्षी की तरह वह उड़ानें भरता रहा, अपनी ही राख से पुनर्जीवित होता रहा, जिन्दगी और लेखन के मोर्चों पर जीता-मरता रहा और भारतीय उपमहाद्वीप की साइकी में उतर गया । जाहिर हैं, ऐसे लेखक को 'पाकिस्तानी' या 'हिंदुस्तानी' कठघरों में रखकर नहीं देखा जा सकता । मंटो जैसे कालजयी लेखक की जिन्दगी को 'मंटो जिन्दा है' में जीवंतता, गतिशीलता और संपूर्णता से पकडा गया है ।
    'मंटो जिन्दा है' ऐसी जीवनकथा है जो वृतांत होते हुए भी, वृतांत को बाहर-भीतर से काटती-तोड़ती पाठकीय चेतना को झकझोरती जाती है । मंटो की जिन्दगी के कई केंद्रीय  मोटिफ, प्रतीक और पेटॉफर पाठक को स्पन्दित करने लगते है और यह महसूस करता है जैसे वह मंटो को अपनी परिस्थिति, समय और साहित्य के साथ जीने लगा हो । लेखक ने जैसे मंटो को जिन्दा महसूस किया है, पाठक भी किताब पढ़ते हुए वैसी ही हरारत महसूस करने लगता है ।
    मंटो की जिन्दगी ययां टुकडों में नहीं, संपूर्ण जीवनानुभव और समग्र कला-आनुभव के रूप से आकार लेती गई है और एक कला-फार्म में ढलती गई है । इस चुनौतीपूर्ण कार्य का नरेन्द्र मोहन ने आत्मीयता और दायित्व से ही नहीं, निस्संगता और साहस से पूरा किया है । उपलब्ध स्रोतों की गहरी पश्चात करते हुए लेखक घटनाओँ और प्रसंगों की भीतरी तहों में दाखिल हुआ है और इस प्रकार मंटो के जीवन-आख्यान और कथा-पिथक को बडी कलात्मकता से डी-कोड किया है ।
    वृतांत और प्रयोग के निराले संयोजन में बँधी यह मंटो- कथा मंटो को उसके विविध रंगों और छवियों के साथ उसके प्रशंसकों-पाठकों के रू-ब-रू खडा कर देती है ।
  • Chinhaar
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-110

    Availability: In stock

    चिन्हार 
    "माँ, लगाओ अँगूठा !" मँझले ने अँगूठे पर स्याही लगाने की तैयारी कर ली, लेकिन उन्होंने चीकू से पैन माँगकर टेढ़े-मेढे अक्षरों में बडे मनोयोग से लिख दिया-'कैलाशो  देवी"।  उन्हें क्या पता था कि यह लिखावट उनके नाम चढ़ी दस बीघे जमीन को भी छीन ले जाएगी और आज से उनका बुढापा रेहन चढ जाएगा ।
    रेहन में चढा बुढापा, बिकी हुई आस्थाएँ, कुचले हुए सपने, धुंधलाता भविष्य-इन्हीं दुख-दर्द की घटनाओं के ताने-बाने ने चुनी ये कहानियाँ इक्कीसवीं शताब्दी की देहरी पर दस्तक देते भारत के ग्रामीण समाज का आईना हैं । एक ओर आर्थिक प्रगति, दूसरी ओर शोषण का यह सनातन स्वरुप! चाहे 'अपना-अपना आकाश' की अम्मा हो, 'चिन्हार' की सरजू या 'आक्षेप' की रमिया, या 'भंवर' की विरमा-सबकी अपनी-अपनी व्यथाएँ हैं, अपनी-अपनी सीमाएँ ।
    इन्हीं सीमाओं से बँधी, इन मरणोन्मुखी मानव-प्रतिमाओं का स्पंदन सहज ही सर्वत्र अनुभव होता है--प्राय: हर कहानी में ।
    लेखिका ने अपने जिए हुए परिवेश को जिस सहजता से प्रस्तुत किया है, जिस स्वाभाविकता से, उससे अनेक रचनाएँ, मात्र रचनाएं न बनकर, अपने समय का, अपने समाज का एक दस्तावेज बन गई हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamleshwar
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-736

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमलेश्वर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "कोहरा', 'राजा निरबंसिया', 'चप्पल', 'गर्मियों के दिन', 'खोई हुई दिशाएँ', 'नीली झील', 'इंतजार', 'दिल्ली में एक मौत' , 'मांस का दरिया' तथा 'बयान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमलेश्वर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ramcharitmanas Sandarbha Samagra
    Lalit Shukla
    325 293

    Item Code: #KGP-238

    Availability: In stock

    रामचरितमानस संदर्भ समग्र
    ‘रामचरितमानस’ गोस्वामी तुलसीदास की अमर एवं अद्वितीय कृति है। प्रबंध-काव्य के गुणों से ओतप्रोत यह प्रस्तुति भारतीय संस्कृति और मानवोचित लोकानुभव की संदेशवाहिका बनी हुई है। यह अनेक प्रचलित और गूढ़ संदर्भों से युक्त है। इस रचना से उन्हीं संदर्भों को व्याख्यायित और सरलीकृत करने का प्रयत्न किया गया है। 
    हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि इस प्रस्तुति से ‘रामचरितमानस’ के अनुरागियों और अध्येताओं  को कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। लोकभाषा अवधी और देवभाषा संस्कृत के अनेक मार्मिक संदर्भों का सरल रूप यहाँ दिया गया है। 
    यह कृति न तो टीका है और न कोश है। यह अपनी पृथक् शैली की प्रस्तुति है, जो हिंदी और ‘मानस के पाठकों के सामने पहली बार आ रही है। सचमुच महाकवि की यह साहित्यिक यात्रा पाठकों का पाथेय है।’ मानस उसका अमिट स्मारक है।
  • Sant Ravidas Ki Ramkahani
    Devendra Deepak
    250 225

    Item Code: #KGP-732

    Availability: In stock

    'संत रविदास की रामकहानी' कवि देवेन्द्र दीपक की संत  रविदास के जीवन-दर्शन पर अपने किस्म की प्रथम औपन्यासिक रचना है । इसमें सृजन और अध्यात्प चेतना के आस्थाशील आयाम उदघाटित हुए हैं । लेखक ने रविदास के अंतत् से उतरने, उसके चिंतन के मर्म को उकेरने का सफल प्रयास किया है । इसमें संत के मन-आत्म की पारदर्शी निर्मलता तथा हाथ के श्रम के प्रति गहरी आस्था भी व्यक्त  हुई है । अपने समाज के श्रमशील उज्जवल समुदाय को दलित बना दिए जाने की पीडा के साथ भारतीय मूल्यों की पड़ताल करते हुए सामाजिक न्याय, समता, संवेदना की हितैषी स्थापनाएँ भी हुई है ।
    संत रविदास की वाणी से पौराणिक आख्यानों, भक्ति-ज्ञान-कर्म के योग विषयक विचारों, लोक में व्याप्त पारंपरिक इनके रंरा-रूपों को यथावश्यक प्रयुक्त करके देवेन्द्र दीपक ने एक बड़े अभाव की पूर्ति कर बड़ा काम किया है । भारतभूमि पर बहने वाली पुण्य-सलिला नदियों-गंगा, यमुना, सरस्वती को मानव शरीर से कार्यशील-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना से जोड़कर योग-अध्यात्म को तथा राष्ट्रीयता के चिंतन-दर्शन को पुष्ट किया है ।
    वसुधैव कुटुंबकम के वैश्विक विचार को रविदास की समूची वाणी में लक्षित-रेखांकित कर भारतीय अस्मिता एवं लोक-आस्था के प्रति छीजती निष्ठा को पुनः सृजनात्मक आधार प्रदान किया है तो जात-पांत, ऊँच-नीच के सामाजिक संताप को मन और मनोरथ की स्पंदनशीलता, सुचिता, मानवीयता के समक्ष व्यर्थ एवं अमानवीय सिद्ध किया है । भारतीय समाज में फैले धार्मिक पाखंड को निरस्त करती एवं रविदास के ब्रह्मांड व्यापी राम तथा गुरु रामानंद की देशना को रूपायित करती यह रचना अपने काव्यात्मक ललित गद्य के कारण आकर्ष और पठनीय है ।
  • Kavi Ne Kaha : Ibbar Rabbi (Paperback)
    Ibaar Rabbi
    90

    Item Code: #KGP-1406

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : इब्बार रब्बी
    बचपन में महाभारत और प्रेमचंद होने का भ्रम, किशोर अवस्था में छंदों की कुंज गली में भटकने का भ्रम, फिर व्यक्तिवाद की दलदल में डुबकियां । लगातार भ्रमों और कल्पना-लोक में जीने का स्वभाव । क्या आज भी किसी स्वप्न-लोक के नए मायालोक में ही खड़ा हूं? यह मेरा नया भ्रम है या विचार और रचनात्मकता की विकास-यात्रा? क्या  पता । कितनी बार बदलूं।
    नया सपना है शमशेर और नागार्जुन दोनों  महाकवियों का महामिलन । इनकी काव्यदृष्टि और रचनात्मकता एक ही जगह संभव कर पाऊं । जटिल और सरल का समन्वय, कला और इतिवृत्तात्पकता एक साथ । ध्वनि का अभिधा के साथ पाणिग्रहण ।  नीम की छांह में उगे पीले गुलाबों की खुशबू से नाए रसायन, नए रंग और नई गंध जन्म लें । गुलाबों की शफ्फाक नभ-सी क्यारी में बीजों-सी दबी निबोलियां । इस नई मिट्टी और खाद से उगने वाले फूल, लताएं और वनस्पतियां बनें मेरी कविता ।
  • Subhash : Ek Khoj (Paperback)
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    295

    Item Code: #KGP-464

    Availability: In stock

    आज भी वह प्रश्न अपनी जगह पर है और प्रायः तब तक रहेगा जब तक उसका हल नहीं हो जाता कि सुभाषा द्वितीय विश्व समर के अंत हो जाने पर हवाई दुर्घटना में गोलोकवासी नहीं हुए तो कहां गए? क्यों शाहनवाज खां और खोसला आयोग की रिपोर्ट रद्द हुई? क्यों यह प्रश्न ठंडे बस्ते मं डालने की साजिश चलती रही? इसके पीछे कौन लोग थे और हैं? अब मैंने यह जानना चाहा है कि उन पर क्या हो रहा है? इस दृष्टि से मैंने भारत-भ्रमण किया। भारत के अनेक महानगरों, नगरों आदि का दौरा किया। उनमंे वे नगर विशिष्ट थे, जिनका संबंध आज भी नेताजी से है। अनेक स्थानों पर मेरे व्याख्यान हुए।
    अंत में प्रायः मुझसे यह प्रश्न किया गया कि क्या सुभाषा की मृत्यु हवाई दुर्घटना से जापान जाते समय हुई थी? कतिपय जगह यह थी पूछा गया कि क्यों अनेक बार नेताजी के जीवित होने और भारत में प्रकट होने का प्रसंग सुखर््िायों में रहा? इसमें कितना सत्य है? मैंने अपने व्याख्यानों में नेताजी की मृत्यु की चर्चा कहीं भी नहीं की थी। फिर भी श्रोताओं की रुचि इस प्रसंग में बराबर सामने आती रही। 
    आइए, अब इस जटिल प्रश्न पर हम और आप आमने-सामने बैठें और इस बहस को तब तक जारी रखें, जब तक किसी तह तक नहीं पहुंच जाएं। 
    —राजेन्द्रमोहन भटनागर
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Qurratulain Hyder
    Qurratulain Hyder
    260 234

    Item Code: #KGP-833

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कुर्रतुलऐन हैदर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो', 'फोटोग्राफ़र', 'कारमिन', 'पतझड़ की आवाज़', 'जुगनुओं की दुनिया', 'कलंदर', 'कोहरे के पीछे', 'कुलीन', 'डालनवाला' तथा 'यह दाग-दाग उजाला' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कुर्रतुलऐन हैदर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Khare (Paperback)
    Vishnu Khare
    80

    Item Code: #KGP-1322

    Availability: In stock

    मैंने जब विष्णु खरे की कविताओं को यह जानने के उद्देश्य से पढ़ना शुरू किया कि उनकी कविता का संसार किन तत्त्वों से बना है तो मुझे अत्यंत स्फूर्तिदायक अनुभव हुआ। एक के बाद एक काफ़ी दूर तक मुझे ऐसी कविताएँ मिलती रहीं जिन्होंने मुझे समकालीन जीवन के त्रासद से लेकर सुखद अनुभव तक से प्रकंपित किया। सबसे अधिक कविताएँ सांप्रदायिकता और फ़ासिस्ट मनोवृत्ति के जोर पकड़ते जाने को लेकर लिखी गई हैं। ‘शिविर में शिशु’ गुजरात के दंगे से संबंधित है, ‘चुनौती’ शीर्षक कविता में धर्म-भावना के ख़तरनाक रूप का संकेत है, ‘न हन्यते’ में दंगाइयों का रोंगटे खड़े कर देने वाला बयान है, ‘गुंग महल’ भी धार्मिक कट्टरता को ही सामने लाती है और ‘हिटलर की वापसी’ शीर्षक कविता जर्मनी की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। विष्णु खरे की ख़ूबी है कि उनकी कविताएँ अधिकांश वामपंथी कवियों की तरह सिर्फ़ जज़्बे का इज़हार नहीं करतीं बल्कि अपने साथ सोच को भी लेकर चलती हैं, जिससे उनमें स्थिति की जटिलता का चित्राण होता है और वे सपाट नहीं रह जातीं।...
    विष्णु खरे की असली कला और उनका तेवर ‘गुंग महल’ शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है, जिसका अंत जितना ही सशक्त है उतना ही कलात्मक--पाठकों को अनुभूति, सोच और कल्पना तीनों ही स्तर पर उत्तेजित करने वाला। ‘विनाशग्रस्त इलाके से एक सीधी टी.वी. रपट’ कविता में टी.वी. रपट शैली में अनुमानतः गुजरात के भूकंप का ज़िक्र है। अंतर्वस्तु की दृष्टि से इसमें भारत के नैतिक विनाश का ऐसा चित्रण है कि एक बार तो यह प्रतीति होती है कि विष्णु खरे हमारे नैतिक विनाश के ही कवि हैं।...
    विष्णु खरे का गहरा लगाव इस देश की साधारण जनता और साधारण जीवन से है, जिसे वे आधुनिक सभ्यता के बड़े परिप्रेक्ष्य में भी रखकर देखते हैं।...इन्हीं साधारण जनों में औरतों को भी गिनना चाहिए। आकस्मिक नहीं कि इस संग्रह में औरतों पर भी तीन-चार बहुत अच्छी कविताएँ हैं। विष्णु खरे का यथार्थ चित्रण इतना गहरा होता है कि उन्हें फैंटेसी में लिखने की कोई जरूरत नहीं। उन्होंने उस गद्य को आवश्यकतानुसार अनेक रूप प्रदान करके उसे ऐसा बना दिया है कि किसी काव्य और कला-मर्मज्ञ को उससे कोई शिकायत न हो।  
    -नंदकिशोर नवल
  • Aakhiri Adhaai Din (Paperback)
    Madhup Sharma
    120

    Item Code: #KGP-161

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    150 135

    Item Code: #KGP-2079

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नरेन्द्र कोहली ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'परिणति', 'किरचें', 'दृष्टि -देश में एकाएक', 'शटल', 'नमक का कैदी', 'निचले फ्लैट में', 'नींद आने तक', 'संचित भूख', 'संकट' तथा 'छवि' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नरेन्द्र कोहली की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Maharishi Dayanand Saraswati Aur Stree-Vimarsh
    Dr. Meena Sharma
    165 149

    Item Code: #KGP-1243

    Availability: In stock

    महर्षि दयानंद सरस्वती और स्त्री-विमर्श
    महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श में वैचारिकता से अधिक रचनात्मकता है। अपनी रचनात्मकता के कारण उसकी मूल्यवत्ता एवं सार्थकता है। मूल्य और सार्थकता की तलाश हर युग में होती है। आज के स्त्री-विमर्श की दिशाहीनता की स्थिति एवं चुनौतियों के आलोक में दिशा-निर्देशक के रूप में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श, बल्कि यूँ कहें कि स्त्री के दयानंदीय विमर्श की आवश्यकता कल से अधिक आज है। इतिहास में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श की जो भूमिका थी, वर्तमान में स्त्री-विमर्श की उस भूमिका को इतिहास-बोध के साथ युगानुरूप विस्तार दिया जा सकता है।
  • Parvatiye Lokkathayen
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1935

    Availability: In stock


  • Tumhare Pyar Ki Paati
    Shanta Kumar
    95 86

    Item Code: #KGP-1986

    Availability: In stock

    तुम्हारे प्यार की पाती
    कविता लिखने की सोचकर मैंने कभी भी कविता नहीं लिखी। शायद सोचकर कविता लिखी भी नहीं जाती। कविता तो भावनाओं की धारा बनकर स्वयं ही प्रवाहित होती है। स्वयं ही लिखी जाती है।
    मैं 1953 में कश्मीर आंदोलन में सत्याग्रह करके हिसार की जेल में गया। हिसार की तपती गर्मी व जेल की यातनाओं से बाल-मन में कुछ भावनाएँ कविता बनकर उतरती रहीं। उसके बाद लंबे 22 वर्ष बीत गए। सार्वजनिक जीवन की व्यस्तता और संघर्ष में मुझसे मेरे कवि का कोई संपर्क न हुआ। फिर 1975 में आपातकाल के समय नाहन जेल में मुझे मेरा कवि मिला। कुछ कविताएँ लिखी गईं।
    श्री जयप्रकाश नारायण मुंबई में अपने जीवन के अंतिम पहर में थे। कुछ दिन बाद उनका स्वर्गवास हो गया। उनके अंतिम संस्कार में पटना गया। पटना से दिल्ली लौटा। एक कविता ‘फूल लेकर आए थे’ लिखी गई। ‘धर्मयुग’ के संपादक श्री धर्मवीर भारती जी ने मुझे फोन करके उस कविता पर बधाई भेजी थी।
    मैं दो बार हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा और एक बार केंद्र में मंत्री रहा। विकास की सारी प्रक्रिया में ‘अंत्योदय’ का मंत्र मेरी प्रेरणा रहा। उसी संबंध में मेरी कविता ‘अंत्योदय’ को भी श्री धर्मवीर भारती और अन्य मित्रों ने बहुत सराहा था।
    इन कविताओं के माध्यम से जो कुछ मन में उमड़ा वही इन शब्दों में उतर आया और अब पाठकों को समर्पित है।
    —शान्ता कुमार
  • Itihaas Ka Vartamaan : Aaj Ke Bouddhik Sarokar-3 (Paperback)
    Bhagwan Singh
    200

    Item Code: #KGP-7211

    Availability: In stock

    ‘इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार’ इस विमर्श-व्याकुल समय में तर्क, विवेक, परंपरा, निहितार्थ और रचनात्मक साहस सहेजकर लिखी गई एक अद्भुत पुस्तक है। इसके लेखक भगवान सिंह विभिन्न विधाओं में सक्रिय किंतु इतिहास-विवेचन में सर्वाधिक  ख्यातिप्राप्त सजग मनीषी हैं। उनकी इतिहास-दृष्टि स्पष्ट, प्रमाण पुष्ट और चिंतन संपन्न है। यही कारण है कि जब भगवान सिंह ‘तुमुल कोलाहल समय’ व ‘स्वार्थसिद्ध वाग्युद्ध’ को परखने के लिए विचारों में प्रवेश करते हैं तो चिंतन की एक अलग रूपरेखा तैयार होने लगती है। स्वयं लेखक ने कहा है–
    "मैंने चर्चाओं को शीर्षक तो दिए हैं, परंतु उन विषयों का सम्यव्फ निर्वाह नहीं हुआ है। बातचीत करते हुए आप किसी विषय से बँधकर नहीं रह पाते। बात आरंभ जहाँ से भी हुई हो बीच में कोई संदर्भ, दृष्टांत, प्रसंग आते ही विषय बदल जाता है और आप भूल जाते हैं बात कहाँ से आरंभ हुई थी। याद भी आई तो आप कई बार स्वयं पूछते हैं, ‘हाँ तो मैं क्या कह रहा था?’ गरज कि सुनने वाले को आप क्या कह रहे हैं इसका हिसाब भी रखना चाहिए! परंतु सबसे मार्मिक प्रसंग तो उन विचलनों में ही आते हैं, तभी तो अपना दबाव डालकर वे धरा को ही बदल देते हैं ।"
  • Madhumeh Evam Chikitsa
    Maitreyi Pushpa
    120 108

    Item Code: #KGP-9319

    Availability: In stock

    सन् 1967 की बात है। उन दिनों मैं अखिल भारतीय संस्थान, नई दिल्ली के मेडीसन विभाग में कार्य कर रहा था। फारमकाॅलाॅजी में एम. डी. करने के पश्चात् मेडीसन में भी एम. डी. करने की योजना थी। उन दिनों रोगियों से बातचीत करने पर लगता था कि दिल्ली के नागरिकों को स्वास्थ्य संबंधी विशेष जानकारी नहीं थी। कारण भी स्पष्ट था। उन दिनों न तो हिंदी में स्वास्थ्य संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं और न पत्र-पत्रिकाओं से इस प्रकार की जानकारी मिल पाती थी। हां, अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं में यदा-कदा लेख छप जाया करते थे। 
    अतः मन में निरंतर यह बात खटकती रहती थी कि इस कमी को कैसे दूर किया जाय। संयोगवश उन्हीं दिनों श्री रतनलाल जी जोशी से परिचय हुआ। वे उन दिनों ‘दैनिक हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र के प्रधान संपादक थे। बस, उन्हीं से प्रेरणा प्राप्त कर मैंने ‘दैनिक हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र में स्वास्थ्य संबंधी लेखन प्रारंभ किया जो आगे चलकर ‘रोगियों के प्रश्नोत्तर’ नाम से स्थायी स्तंभ के रूप में लगभग बीस साल तक चलता रहा।
    मेरी ऐसी मान्यता है कि आयुर्विज्ञान संबंधी साहित्य का जब तक हिंदी में मौलिक सृजन नहीं होगा, तब तक इस विज्ञान को जन-मानस से नहीं जोड़ा जा सकता। अनुवादित ग्रंथों से जानकारी तो मिल जाती है, परंतु मौलिकता नहीं आ पाती।
    स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संगठित हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में मैंने सदैव अनुभव किया है कि स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान हिंदी के माध्यम से ही जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।
    इसी परिवेश में प्रस्तुत पुस्तक ‘मधुमेह एवं चिकित्सा’ की रचना की गई हे, जिससे लोगों को लाभ होगा, ऐसा विश्वास है।
  • Vishaad Math
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-54

    Availability: In stock


  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan (Paperback)
    Mukesh Parmar
    90

    Item Code: #KGP-1306

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधरस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • 20-Best Stories From Italy (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-1141

    Availability: In stock

    What is an anthology, if aot an amalgamation of words?
    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from lands that are as enigmatic as they are intriguing. Italian folktales are world famous for theirstory-telling flow—natural, simple and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, out beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.
    With stories like Lionbruno and Aurelia, Jatagim—Chief of Robbers, Great Mathilda, Love cannot be Replaced, The Evil-Hearted Right-Hand Squire, The Wizard of Lagotorbido, Romolo and Remolo, this book is a compilation of 20 famous Italian folktales. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.
    Time to indulge in some old-world charm all the way from Italy.
  • Hashiye Ka Raag (Paperback)
    Sushil Sidharth
    150

    Item Code: #KGP-7185

    Availability: In stock


  • Khule Gagan Ke Lal Sitare (Paperback)
    Madhu Kankria
    120

    Item Code: #KGP-222

    Availability: In stock


  • Kambakht Nindar
    Narendra Mohan
    350 315

    Item Code: #KGP-793

    Availability: In stock


  • Arddhnaarishwar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    300

    Item Code: #KGP-215

    Availability: In stock


  • Maansik Svasthya Aur Manahchikitsa
    Asha Rani Vhora
    160 144

    Item Code: #KGP-1095

    Availability: In stock

    मानसिक स्वास्थ्य और मन:चिकित्सा 
    विसंगतियों और विद्रूपताओं, भागदौड़ और आपाधापी के संघर्ष और तनाव के माहौल में व्यक्ति या तो भीड़ का अंग होकर रह गया है या फिर आत्मकेंद्रित हो अकेले जूझने के लिए विवश हो गया है । आज लगभग हर व्यक्ति को अपना मानसिक संतुलन कायम रखने में कठिनाई आ रही है । यही संतुलन अधिक गडबडा जाने पर वह अनेक मानसिक आधियों-व्याधियों से घिरने लगता है । अधियां, यानी मानसिक समस्याएँ और व्याधियां, यानी मानसिक रोग । लेकिन दूर मानसिक रोग पागलपन नहीं होता, न ही लाइलाज, जबकि हमारे समाज में फैली अनेक भ्रांतियों के कारण एक ओर लोग सामान्य मानसिक रोगों को भूत-प्रेत-बाधा मान लेते हैं और झाढ़-फूँक के चक्कर में बिना इलाज रोग को और बढा लेते हैं, दूसरी और मामूली मानसिक समस्या के समाधान के लिए भी मानसिक विशेषज्ञ के पास जाने पर व्यक्ति को संदेह की वृष्टि से देखा जाने लगता है । एक स्वस्थ समाज की रचना के लिए पहले व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक होना चाहिए । अत: मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, सभी स्तरों पर अपेक्षित है । इसी अपेक्षा, आकांक्षा, आवश्यकता-पूर्ति की दिशा में एक सदप्रयास है प्रस्तुत पुस्तक ।

  • Kavi Ne Kaha : Kumar Ambuj (Paperback)
    Kumar Ambuj
    90

    Item Code: #KGP-1497

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : कुमार अम्बुज 
    मैं आधा-अधूरा जैसा भी हुं, एक कवि हूँ और बीत रही इस सदी का एक गवाह हूँ। मेरे सामने हत्याएं की गई है । मेरे सामने ही एक आदमी भूख से तब मरा है, जबकि मैं भोजन कर रहा था । एक स्त्री मेरी आँखों के सामने बेइज्जत की गई । मेरे गर्म बिस्तर से सिर्फ पचास मीटर दूर फुटपाथ पर लोगों ने शीत-भरे जीवन की रातें बिताई हैं । मुआवजा न मिलने से बरबाद हो गए लोगों ने जब सड़क पर जुलूस निकाला, मैं मदिरा पीता पाया गया । मैं चश्मदीद गवाह हूँ। मुझे गवाही देनी होगी । अभी न दूँगा तो अपने अंत में देनी होगी । इस गवाही से बचा नहीं जा सकता। इसी मायने में किसी कवि के लिए और किसी समाज के लिए कविता का रकबा महत्वपूर्ण है । कविता में लिखे शब्द, एक साक्षी के बयान हैं । अपने को सजदे से लाकर, झुककर, लिखे गए बयान । इन बयानो से कवि के अंतमू का और अपने समय के हालात का दूर तक पता चलता है । समाज के पाप और अपराध, एक कवि के लिए पश्चाताप, क्रोध, संताप और वेदना के कारण है । वह एक यूटोपिया का निर्माण भी है, जिसकी संभावना को असंभव नहीं कहा जा सकता ।

  • Kavi Ne Kaha : Kedar Nath Singh (Paperback)
    Kedarnath Singh
    90

    Item Code: #KGP-1307

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के अब तक प्रकाशित संपूर्ण कृतित्व से उनकी प्रतिनिधि कविताओं को छाँट निकालना एक कठिन काम है और चुनौती भरा भी। इस संकलन को तैयार करने में पहली कसौटी मेरी अपनी पसंद ही रही है। पचास वर्षों में फैले कृतित्व में से श्रेष्ठतर को छाँटकर यहाँ प्रस्तुत कर दिया है, ऐसा दावा मेरा बिलकुल नहीं है। हाँ, इतनी कोशिश अवश्य की है कि केदार जी की कविता के जितने रंग है, जितनी भगिमाएँ है उनकी थोडी-बहुत झलक और आस्वाद पाठक को मिल सके...यूँ चयन-दृष्टि का पता तो कविताएँ खुद देंगी ही।
    कविताओं को चुनने और उन्हें अनुक्रम देने में यह कोशिश जरूर रहीं है कि पाठकों को ऐसा न लगे कि कविताओं को यहाँ किसी विशिष्ट श्रेणीबद्ध क्रम में बाँटकर सजाया गया है। भिन्न भाव बोध, रंग और मूड्स की कविताओं को एक साथ रखकर बस घंघोल भर दिया है-एक निरायासज़न्य सहजता के साथ पाठकों को पढ़ते समय जिससे किसी क्रम विशेष में आबद्ध होकर पढने जैसी प्रतीति न हो, बल्कि तरतीब में बनावटी साज-सज्जा से दूर एक मुक्त विचरण जैसा प्रकृत आस्वाद मिल सके ।
  • Insaani Nasl
    Nasera Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-800

    Availability: In stock

    इनसानी नस्ल
    इस संग्रह की सभी कहानियाँ बड़ी सादगी से जीवन के यथार्थ को सामने रखती हैं। अंतर्धारा में एक आग्रह अवश्य महसूस होता है कि इनसान ने अपने ‘स्वयं’ को जीना छोड़ दिया है। वह अपने अंदर यात्रा करने की जगह बाहर की भौतिक दुनिया के कोलाहल में भटकता जा रहा है, जो उसकी सारी सहजता को ख़त्म कर उससे सुख के सारे क्षण छीनता जा रहा है। कभी-कभी ऐसा भी संकेत मिलता है कि वह पाषाण युग की प्रवृत्तियों की तरफ़ अकारण बढ़ रहा है, जो सारी उपलब्धियों के बावजूद उसको वह ‘चैन’ नहीं दे पा रही हैं, जिसका वह सही हक़दार है। आखि़र यह इनसानी नस्ल, जो एक-दूसरे की उत्पत्ति की सिलसिलेवार कड़ी है, वह वास्तव में चाहती क्या है ? एक-दूसरे से हाथ मिला मानव-शृंखला को मज़बूत बनाना या फिर एक-दूसरे के विरोध में खड़े होकर अलगाव की भूमिका निभाना ? यह अलगाव हमें सभ्यता के किस मोड़ पर ले जाएगा ? अलगाव की इस मानसिकता से मुक्त होकर इनसान एक नए युग का सूत्रपात क्यों नहीं कर सकता ? क्या वह आने वाली नस्ल की ख़ातिर जीवन से निरंतर ग़ायब होते जा रहे ‘चैन’ को पाने के लिए कुछ नहीं करेगा ? क्या वह अपने अंदर की यात्रा कर इनसानियत के आलोकित क्षितिजों को छूना नहीं चाहेगा ? इन्हीं सवालों से जूझती ये कहानियाँ आज के इनसान के दिल व दिमाग़ की टकराहट की साक्षी हैं, जो अनेक बुनियादी सवालों से साक्षात्कार करती नज़र आती हैं।
  • Kaag Ke Bhaag Bare
    Prabha Shanker Upadhayaye
    145 131

    Item Code: #KGP-1811

    Availability: In stock

    काग के भाग बड़े
    व्यंग्य को भले ही लेटिन के ‘सेटुरा’ से व्युत्पन्न बताया गया हो, किंतु भारत के प्राचीन साहित्य में व्यंग्य की बूझ रही है। ऋग्वेद में मंत्रवाची मुनियों को टर्राने वाले मेढकों की उपमा दी गई है। भविष्येतर पुराण तथा भर्तृहरिशतकत्रयं में खट्टी-मीठी गालियों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य प्रसंग उत्पन्न किए हैं— ‘गालिदानं हास्यं ललनानर्तनं स्फुटम्’, ‘ददतु ददतु गालीर्गालिगन्तो भवन्तो’। वाल्मीकि रामायण में मंथरा की षड्यंत्र बुद्धि की कायल होकर, कैकेयी उसकी अप्रस्तुत प्रशंसा करती है, "तेरे कूबड़ पर उत्तम चंदन का लेप लगाकर उसे छिपा दूँगी, तब तू मेरे द्वारा प्रदत्त, सुंदर वस्त्र धारण कर देवांगना की भाँति विचरण करना।" रामचरितमानस में भी ‘तौ कौतुकिय आलस नाहीं’ (कौतुक प्रसंग) तथा राम कलेवा में हास्य-व्यंग्य वार्ताएँ हैं। संस्कृत कवियों कालिदास, शूद्रक, भवभूति ने विदूषक के ज़रिए व्यंग्य-विनोद का कुशल संयोजन किया है, "दामाद दसवाँ ग्रह है, जो सदा वक्र व क्रूर रहता है। जो सदा पूजा जाता है और सदा कन्या राशि पर स्थित है।"
    लोक-जीवन में तमाशेबाज़ी, बातपोशी, रसकथाओं, गालीबाज़ों, भांडों और बहुरुपियों ने हास्य-व्यंग्य वृत्तांत वर्णित किए हैं। विवाह और होली पर्व पर हमारा विनोदी स्वभाव उभर आता है। अतः दीगर यह कि विश्व में हास्य-व्यंग्य के पुरोधा हम ही हैं।
    अस्तु, इस व्यंग्य-संग्रह को विषय एवं शैली-वैविध्य के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें व्यंग्य- कथा, निबंध, गोष्ठी, प्रश्नोत्तरी, प्रेस कॉन्फ्रेंस, संवाद, साक्षात्कार, सर्वे आदि शिल्पों की चौंतीस व्यंग्य रचनाएँ संकलित की गई हैं।
  • Nanaji Deshmukh : Jeevan Darshan
    Gaurav Chauhan
    280 252

    Item Code: #KGP-1864

    Availability: In stock

    इस जीवात्मा ने अपने व्यक्तित्व की कुछ ऐसी अमिट छाप समाज पर छोड़ी कि उनके विषय में समाज और देश को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या साधारण मनुष्य भी दलित, शोषित, पीड़ित व वंचित के दुःखों को दूर कर उनके हृदय में एक ईश्वर, गुरु, प्रेरक, श्रद्धा का स्थान ले सकता है। ऐसी ही एक पवित्र जीवात्मा थे जिन्हें हम नानाजी देशमुख के नाम से जानते हैं। 
    "हम अपने लिए नहीं अपनों के लिए हैं। अपने वे हैं जो सदियों से पीड़ित, शोषित व उपेक्षित हैं।" यह कथन इन्हीं जीवात्मा का था जो आज नानाजी के नाम से इस संसार में याद किए जाते हैं। ऐसा ही कोई विरला व्यक्तित्व इस धरा पर जन्म लेकर इस धरा को पवित्र बनाता है।
  • Virajbahu (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1246

    Availability: In stock


  • Kuchh Kharaa Kuchh Khotaa
    Raj Budhiraja
    100

    Item Code: #KGP-1877

    Availability: In stock

    सुविख्यात शिक्षाविद एवं साहित्यकार राज बुद्धिराजा की नवीन कृति है यह । दूटते-बिखरते अत्याधुनिक भारतीय समाज ने जिस प्राचीन संस्कृति की लुटिया को कुएँ में ला डुबोया है, उसे लेखिका ने अपने मन के रहट में भरा है और फिर जल-रूप प्रदान किया है । लेखिका के मन में अपार पीडा है जो उनकी कलम पर धीरे-धीरे उतरकर, कोरे कागजों पर आबदार मोती-रूप बन जाती है । लेखिका की सूक्ष्म-पैनी दृष्टि से छोटी से छोटी बात बच नहीं पाती और वह कलम के हथौड़े से पूरे समाज पर लगातार प्रहार करती चली जाती है और उसके पास हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं होता । लेखनी कभी धर्म की बात करती है, कभी दर्शन-अध्यात्म की, कभी बिखरती मानवीय संवेदना की और कभी जंग खाए रिश्तों की ।
    लगता है कि उनके दिल की गहराई पाठकों पर अमिट छाप छोड़ती है और उनकी आँखें झरने-सी झरने लगती हैँ । ढेर सारे अनुत्तरित प्रश्न सामने आ खड़े होते हैं । इन संस्मरणों का अंत प्रश्नचिह्नों से होता है । ये सभी संस्मरण लेखिका के एकाकीपन के गवाह हैं । लेखन की अंतहीन राह पर चलते-चलते कभी-कभी उन्हें एकाकीपन का अहसास होता है और वे एक बूँद प्यार के लिए तरसती रह जाती हैं । उन्हें अपनेपन की तलाश रहती है । कभी विदेशी मित्र, कभी बाल सखी, कभी युवा मित्र और कभी अनजाने रिश्तों में वे बहुत कुछ ढूँढ़ने का प्रयास करती है और उन्हें यदि एक पल के लिए कुछ मिलता है तो वे उस सुखद पल को अपनों में बाँट देती हैं । यही उनके लेखन की सफलता है, खासकर जब पाठक उनके सुर में सुर मिलाकर झूमते-झामते वृक्षों की तरह झूमने लगता है ।
  • Debt-Free-Forever (Paperback)
    Gail Vax-Oxlade
    245

    Item Code: #KGP-344

    Availability: In stock

    Imagine waking up in the morning and knowing that no matter what happens today, you can cope. Imagine that you’ve got enough money to take care of the expenses that need to be paid regularly and to have some fun too. Imagine the sense of peace that comes from knowing you’re in control of your life.
    If you’ve been frantically trying to cover your butt because there just never seems to be enough money, I can help you. If you’re up to your eyeballs in debt and can’t even imagine being debt-free, I can help you. If you’re at your wits’ end because you’ve made a huge mess and don’t have a clue how to fix it, I can help you.
    —from the book
    FIGURE OUT WHERE YOU STAND MAKE A PLAN CHANGE YOUR HABITS PREPARE FOR THE FUTURE STAY THE COURSE
  • Swatantarata Sangharsh Ka Itihaas_100
    Hazari Prasad Dwivedi
    100 90

    Item Code: #KGP-1061

    Availability: In stock

    स्व. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक गं्रथों द्वारा हिंदी साहित्य की अभूतपूर्व सेवा की है। उन्होंने जहां एक तरफ अत्यंत श्रेष्ठ उपन्यासों की रचना की वहीं दूसरी तरफ शोधपरक ग्रंथों की। निबंध-लेखन के क्षेत्रा में भी उन्होंने ललित निबंधों के सृजन द्वारा हिंदी को अत्यंत सुंदर निबंध दिए। प्रस्तुत पुस्तक स्व. आचार्य द्विवेदी के चिंतन को समझने में एक महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करती है। सैकड़ों साल की गुलामी से सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ था। भारत के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। जागरूक एवं संवेदनशील साहित्यकार इस घटना की उपेक्षा नहीं कर सकता था। स्व. आचार्य जी ने स्वतंत्रता-संघर्ष के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इसमें नामांे की भरमार नहीं है। यह उनकी अपनी दृष्टि थी। इस पुस्तक का रचनाकाल सन् 1948 के बरी है। इसमें हमने किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया है। नई पीढ़ी को हमारी यह एक विनम्र भेंट है।
    —मुकुंद द्विवेदी
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma
    Tajendra Sharma
    270 243

    Item Code: #KGP-827

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Suno Manu
    Vishva Mohan Tiwari
    225 203

    Item Code: #KGP-537

    Availability: In stock

    सुनो मनु
    आज का युवा तेज़ी से आगे बढ़ना चाहता है, किंतु अपने माता-पिता या दादा-दादी से उचित सलाह न मिल सकने के कारण उसे शीघ्र ही भोगवादी बाज़ार के दलदल में फँस जाने का खतरा रहता है। 
    एक युवक को ऐसे खतरे से बचाने के लिए एक पिता ने होस्टल में रहने वाले अपने पुत्र को लगातार पत्र लिखे, जिससे न केवल उसे वरन् उसकी मित्रमंडली के समुचित विकास में, उन्हें जीवन में सोच-विचार कर आगे बढ़ने में सहायता मिली। 
    उन पत्रों की सफलता का रहस्य था पुत्रा एवं पिता में मित्रवत् व्यवहार। पिता में एक ओर तो अपनी जड़ों से जुड़े रहने का विवेक है तथा दूसरी ओर आधुनिकता की पर्याप्त समझ है। 
    पत्रों में पुत्र की सामान्य समस्याओं से लेकर जीवन-मूल्य संबंधी प्रश्नों पर आपस में विचार- विमर्श है। 
    इस पुस्तक में युवाओं के लिए वे संदेश हैं, जिनसे उनमें इतनी मानसिक, बौद्धिक, नैतिक शक्ति आ सकेगी कि वे भारत को और इसलिए स्वयं को सचमुच ही विश्व में सम्मानप्रद स्थान दिला सकें। 
  • Jhansi Ki Rani
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1821

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Svadeshi Chikitsa Paddhati (Paperback)
    Om Prakash Sharma
    160

    Item Code: #KGP-7072

    Availability: In stock

    स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति
    मनुष्य को परमेश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना माना गया है । किसी समय वह भी पूर्ण स्वस्थ और सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण रहा होगा, लेकिन आज स्थिति सर्वथा विपरीत है । आज पूरे विश्व में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसे कोई कष्ट न हो तथा जो शोक, सन्ताप और चिन्ता से मुक्त हो अथवा निराश न हो । इसका एकमात्र कारण है- प्रकृति की उपेक्षा ।  प्रकृति कभी अन्याय का पक्ष नहीं लेती । जो भी उसके नियमों को भंग करता है, वह उसे दपिडत करती है ।
    मनुष्य को हर प्रकार की व्याधि और रोग से मुक्त रहने का अधिकार प्राप्त है; लेकिन इसके लिए उसे प्रकृति के स्वभाव को समझना चाहिए । उसे अपने शरीर के स्वभाव के अनुकूल अपनी दिनचर्या का पालन करना चाहिए । बुहिमान् व्यक्ति वही होता है, जो किसी विपति में फंसने से पहले ही अपना बचाव कर ले । यदि फिर भी असावधानीवश अथवा किसी अन्य कारणवश वह बीमार हो जाये, तो प्रकृति-प्रदत्त पदार्थों के उपयोग से पुन : स्वस्थ व समान्य हो सकता है ।
    प्रकृति ने हमारे देश पर ऐसी कृपा की  है कि यहां अनेक प्रकार की उपयोगी ज़डी-बूटियां ( औषधियां) पैदा होती हैं, जो घर-घर में विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लायी जाती हैं ।
    आज साधारण व्यक्ति डॉक्टरों की ऊंची फीस व महंगी दवाओ का प्रयोग करने में असमर्थता अनुभव कर रहा है तथा अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव से ग्रसित है। तब स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति की उपयोगिता से कौन इनकार कर सकता है ? स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति के सहारे आप दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक वस्तुओ से नाना प्रकार के जटिल रोगों की अचूक चिकित्सा कर सकते हैं।
    'स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति' पुस्तक में प्रत्येक रोग के लिए अनेक अचूक इलाज बताये गये हैं, जिनकी सहायता से साधारण व्यक्ति भी कठिन से कठिन रोगों की चिकित्सा स्वय कर सकता है ।
    पुस्तक में रोगों के निदान और चिकित्सा के साथ ही उपयोगी योगासनों व प्राणायाम का भी समावेश किया गया है ।
  • Bhakt Soordas
    Chandrika Prasad Sharma
    190 171

    Item Code: #KGP-140

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-3 (Parivrajak) (Paperback)
    Narendra Kohli
    280

    Item Code: #KGP-50

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From China (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7199

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Chinese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup 
    of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Taoist Novice, Chang And Cheng, Supernatural Wife, Taoist Priest, Man Thrown In A Well, Rat Wife, this book is a compilation of 20 famous Chinese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from China.
  • Yathartha Se Samvad
    B.L. Gaur
    400 360

    Item Code: #KGP-449

    Availability: In stock

    बेख़ौफ अंगारे
    साहित्य को अब रास नहीं आता निरा रस 
    उससे भी ज़रूरी है कलमकार में साहस 
    ये काम अदब का है–अदब करना सिखाए 
    उनको जो बनाए हैं हरिक काम को सरकस
    दम घुट रहा अवाम का, फनकार बचा लो
    सब मूल्य तिरोहित हुए, दो-चार बचा लो
    सच्चे की शुबां पर हैं जहां शुल्म के ताले
    हर ओर लगा झूठ का दरबार, बचा लो
    संपादकीय ऐसे हैं ऐ दोस्त, तुम्हारे
    जैसे अंधेरी रात में दो-चार सितारे
    गुणगान में सत्ता के जहां रत हैं सुखनवर
    तुम ढाल रहे शब्द में बेख़ौफ अंगारे
    मैं ख़ुश हूं बड़े यत्न से धन, तुमने कमाया
    उससे भी अधिक ख़ुश हूं कि फन तुमने कमाया
    मेरी ये दुआ है कि सलामत रहो बरसों
    सदियों रहे ज़िंदा जो सृजन तुमने कमाया।
    —बालस्वरूप राही

  • Polywood Ki Apsara
    Girish Pankaj
    225 203

    Item Code: #KGP-2049

    Availability: In stock

    पॉलिवुड की अप्सरा
    "पॉलीवुड की अप्सरा' उत्तर-आधुनिक मनुष्य के मोहभंग की तथा-कथा है, जिसमें गिरीश पंकज विशुद्ध व्यंग्यकार सिद्ध होते है । (जहाँ हास्य का हाशिए पर भी जगह नहीं है) तात्पर्य यह है कि इस उपन्यास में व्यंग्यकार ने  यथार्थ का पल्ला कहीं भी नहीं छोडा है, जिससे यह समझने में आसानी होती है कि व्यंग्य-लेखन ही सच्चा लेखन हो सकता है। जिस प्रकार 'हॉलीवुड' के सादृश्य पर 'बॉलीबुड' रखा गया, उसी प्रकार 'बॉलीबुड' कै सादृश्य पर 'पॉलीवुड' बना । 'पॉलीवुड की अप्सरा' भी बॉलीवुड की समांतर भूमि में अपने रूप, रस, गंध और स्पर्श के साथ प्रतिष्ठित है  ।
    शेक्सपियर ने कभी कहा था कि नास में क्या रखा है, परंतु इस उपन्यास में सार नाम इसीलिए सोद्देश्य एवं सार्थक हैं कि नाम सुनते या पढ़ते ही उनका 'चरित्तर' मूर्त हो उठता  है ।
    'अप्सरा' अपने जन्म से ही अभिशप्त रही है, जिस ‘स्वर्वेश्या' भी कहा गया है । बॉलीबुड की अप्सरा बनने का पावती का सपना अंत तक पूरा सच नहीं हो पाता । यह त्रासदी 'अप्सरा' में व्यंजित तथाकथित आभिजात्य की निस्सास्ता से और भी सटीक हो गई है, जो परी में नहीं है । 'पार्वती' का 'पैरी' में  रूपांतरण एक ऐसी चेतावनी है, जिससे वर्त्तमान एवं भावी पीढ़ी झूठी महत्वाकांक्षा की आग में न कूदे । दार्शनिक शब्दावली में कहें तो जो कुछ दिख रहा है, यह सब माया है, छलावा  है । लगता है, समकालीन परिस्थितियों ने ही कबीर जैसे युगचेता का 'आखिन देखी ' कहने के लिए विवश किया ।
    इस कृति में उत्तर-आधुनिक मनुष्य और उसकी क्रीत-कुँठा सफल व्यंग्यकार गिरीश पंकज की सारग्रही सूक्ष्म-दूष्टि से उजागर होकर एक ही निष्कर्ष पर पहुंचती है कि मनुष्य की सफलता मनुष्यता का पाने में है, खोने में नहीं ।
  • Ek Sadaa Aati To Hai
    Pramod Beria
    150 135

    Item Code: #KGP-9307

    Availability: In stock


  • Kokh
    Roshan Premyogi
    300 255

    Item Code: #KGP-287

    Availability: In stock

    कोख
    सन् 1984 से एक किशोरी एक राजा की हवश का शिकार बनती है । उसकी कोख से जन्मे बच्चे के मन से करीब 25 साल बाद अपने सांवले रंग और नयन-नक्श को लेकर संदेह पैदा होता है । सदेह पुख्ता होता है तो वह पिता से लड़ता है अपनी माँ के लिए ।
    उपन्यास में तीन महिला पात्र हैं । इनमें मधुरिमा सिंह ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया । वह पहले मुझे सौतेली मां की तरह लगी, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती  गई, वह धरती की तरह धैर्यवान और समुद्र की तरह गरमाहट से भरपूर मां लगी । आई.ए.एस. प्रभुनाथ सिंह  पहले खलनायक लगते हैं, लेकिन जब कहानी खुलती है तो तमाम पूर्वाग्रह ध्वस्त हो जाते है । शैलजा तो बहुत ही प्यारी और समझदार लड़की है, वह सीमान्त को बिखरने से बचाती है । दरअसल शैलजा खंड-खंड होकर नष्ट होने को तत्पर कुछ लोगों को फिर से एक परिवार बनने के लिए प्रेरित करती है । देखा जाए तो अपने व्यक्तित्व से शैलजा ही इस उपन्यास को बडा बनाती है । उसके प्यार को थोड़ा और स्पेस मिलना चाहिए था ।
    गायत्री देवी का संघर्ष और दंश मन को झकझोर देता है । कहानी अंत तक बांधे रखती है मन को, लेकिन यह थोड़ा अजीब लगता है कि गायत्री देवी के दंश को लेखक ने बेटे के प्यार और नैतिकता के बोझ तले दबा दिया, वैसे यह पुरुषप्रधान समाज की रीति है ।
  • Ritusamhaar (Paperback)
    Kaalidas
    195

    Item Code: #KGP-7035

    Availability: In stock

    ऋतुसंहार
    प्रेम, सौंदर्य, भक्ति, मर्यादा, कला व संस्कृति के सम्मिश्रण का दूसरा नाम है—कालिदास। स्थान व काल के संदर्भ में अपने को अपरिचित रखकर जिसने अपनी कृतियों के माध्यम से, विषयवस्तु के साथ-साथ भारतवर्ष की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक गरिमा और भौगोलिक सौंदर्य से हमें सुपरिचित कराया, वह आज किसी एक काल व एक स्थान का कवि न होकर, सार्वकालिक विश्वकवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है।
    उसी महाकवि की एक छोटी-सी काव्यकृति है—‘ऋतुसंहार’। इसमें सचित्रा षड् ऋतु वर्णन के परिपार्श्व में तदनुरूप स्त्री-पुरुष के प्रेम और सौंदर्य-भोग का श्रृंगारिक चित्रण हुआ है।
    इस त्रैभाषिक पुस्तक की विशेषता एक तो यह है कि सामान्य हिंदी पाठक हिंदी रूपांतर द्वारा कालिदास के काव्य-सौंदर्य एवं प्रेम की अनुभूति प्राप्त करेंगे, दूसरी यह कि संस्कृत जानने वाले संस्कृत मूल का भी रसास्वादन कर सकेंगे। तीसरी विशेषता यह कि अंग्रेजी अनुवाद से आधुनिक पाश्चात्य प्रेमी भी भारत की संस्कृति की सरसता से परिचय पा लेंगे।
    इस चित्रात्मक कृति की सर्वोपरि विशेषता भी है। वह यह कि यह पुस्तक गृहस्थाश्रम में कदम रखने वाले युवक-युवतियों के लिए पठनीय है और मित्रों एवं सखियों को विवाहोत्सव पर भेंट करने के लिए इसे खास तौर से तैयार कराया गया है।

  • Gujrat : Sahakarita, Samaj Seva
    Neelam Kulshreshtha
    420 357

    Item Code: #KGP-599

    Availability: In stock

    गुजरात गांधी जी, सरदार पटेल, विक्रम साराभाई परिवार, अमूल डेरी, अपनी सहकारिता व औद्योगिक प्रगति के कारण जाना जाता है लेकिन ये बड़े-बड़े नाम हैं । समाज के उत्थान के लिए अनेक लोग अपनी आत्मा में नन्हे-नन्हे दीप संजोए बैठे हैं, गांधी जी के व साहित्यिक मूल्यों को अपने जीवन में जीते हुए । यदि अन्य प्रदेश प्रगति करना चाहते हैं तो इस समृद्धतम प्रदेश गुजरात से संबंधित निम्न बिंदुओं का विश्लेषण करें जिनसे समाज के भौतिक ही नहीं ,मानवता के विकास के लिए बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
    ० वडोदरा के महाराजा सयाजीराव तृतीय के शासनकाल की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से की जा सकती है। उनकी दी हुई परंपरा के कारण ये शहर 'कलाकारों का मक्का' कहलाता है। लेखिका इसे 'सिटी ऑफ इंटरनेशनल 'सोल्स' कहती हैं ।
    ० गांधी जी की प्रेरणा से भारत  द्वितीय महिला संगठन  'ज्योति संग' की स्थापना हुई व सन् 1920 में एक स्त्री अनुसूइया साराभाई ने टेक्सटाइल मिल की भारत की सर्वप्रथम सबसे वृहद ट्रेड यूनियन संगठित की ।
    ० विश्व भर में लोकप्रिय होती जा रही लोक अदालत को  श्री हरिवल्लभ पारिख ने रंगपुर (क्वांट) स्थित आनंद  निकेतन आश्रम में जन्म दिया  ।
    ० मैग्सेसे पुरस्कार विजेता इला भट्ट की 'सेवा' संस्था सेल्फ एम्प्लॉयड वीमन एसोसिएशन आज़ भी अपनी तरह की विश्व की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन है । 
    ० विश्व में संभवतः एकमात्र उदाहरण है यहाँ के शहरों व गांवों में फैला पुस्तकालयों के नेटवर्क का संगठन 'गुजरात पुस्तकालय सहायक सहकारी मंडल' ।
    ० एशिया में सहकारी बैंक अन्योन्य बैंक, महिला सहकारी बैंक व उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा करने वाली जागृत ग्राहक संस्था सर्वप्रथम यहीं संगठित हुई ।
    ० डॉ. जी. एम. ओझा ने भारत ही नहीं, एशिया में भी पर्यावरण संरक्षण की संस्था 'इनसोना' सन् 1975 में यहीं स्थापित की ।
    ० श्री सूर्यकांत पटेल का चालीस एकड़ जमीन में बनाया विश्वविख्यात फार्महाउस वडोदरा में है। 
    ० भारत में महाराष्ट्र में दो, सिर्फ गुजरात में ही तीन स्टॉक एक्सचेंज हैं जहाँ सभी राज्यों से अधिक पैसे का निवेश होता है ।
    ० विकलांगों द्वारा संस्था बनाकर विकलांगों की सहायता के उदाहरण अन्य प्रदेशों में दुर्लभ हैं । 
    ०  'गुजराती नी गजी नो तडियो भा तो नथी' इस कहावत का अर्थ जानिए इस पुस्तक से ।
    ० अस्मिता : गुजरात से एक साहित्यिक आंदोलन' इस पुस्तक से जानिए क्यों 'एक्सेल गुप्त इंडस्ट्रीज' में  प्रबंधन व मज़दूरों का कभी झगड़ा नहीं हुआ ।
    ० विश्यविख्वात आर्कीटेक्ट कर्ण ग्रोवर, जिनके हैदराबाद में बनाए सोहराबजी ग्रीन बिजनेस सेंटर को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ग्रीन बिल्डिंग घोषित किया गया है, व उनके साथियों द्वारा स्थापित हेरिटेज ट्रस्ट के प्रयासों से चांपानेर को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया है । ग्रोवर जी की नई उपलब्धि है कि उनकी बनाई बी एन एमरो बैंक को भी विश्व की पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ इमारत घोषित किया गया है । 
    ० यदि किसी शहर का उत्थान करना है तो वडोदरा की स्वयंसेवी  संस्थाओं ‘बड़ौदा सिटिजंस काउंसिल' व 'यूनाइटेड वे ऑफ बड़ौदा' को समझना होगा ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajeet Kaur
    Ajeet Kaur
    350 315

    Item Code: #KGP-442

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजीत कौर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "वन जीरो वन', 'सूरज, चिड़ियां और रब्ब', 'ना मारो', 'मौत अलीबाबा की', 'चौरासी का नवंबर है', 'कसाईबाड़ा', 'पिछले बसंत की पतंग' , 'हरी चिड़िया’ , 'चीख एक उकाब की है' तथा 'नया साल'।

    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजीत कौर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Shabd Ka Uday : Vikas Evam Anuprayog
    Dayanand Pant
    250 213

    Item Code: #KGP-1286

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तिका भारत में वैज्ञानिक शब्दावली-विकास के अभियान से संबद्ध है। इसमें शब्द-चर्चा के अतिरिक्त अभियान के मुख्य उद्देश्य अर्थात् वैज्ञानिक वाड्मय का सृजन, अविज्ञान-शिक्षा का माध्यम आदि पर भी सार्थक चर्चा है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद जोर पकड़ता अभियान पूर्णरूपेण सफलता को प्राप्त नहीं हो सका क्योंकि माध्यम परिवर्तन में शिक्षक ही बाधक हो गए और अपनी भाषा के माध्यम से उच्चतर शिक्षा देने वाले एशियाई देशों-जापान, चीन, कोरिया की विलक्षण वैज्ञानिक प्रगति से हम सीख नहीं ले पाए।
    लेखक ने निष्पक्ष रूप से शब्दावली अभियान के चरणों और गुण-दोषों का विवेचन किया है। साथ ही, दो बातों पर रोना रोया है जो हैं (1) शब्दावली-निर्माण में भाषा-प्रेमियों ने लगन और उत्साह से काम तो किया, पर अंग्रेजी समर्थकों की चाल को न समझकर उनकी ही धुन में नाचते रहे और (2) आज का भारतीय भाषा लेखक अंग्रेजी में सोचकर अपनी भाषा में लिख रहा है जिस कारण मुहावरे का सहज विकास अवरुद्ध हो गया है और भाषा की बोध-गम्यता कम होती जा रही है।
  • Toro Kara Toro (All 6 Vols.) (Paperback)
    Narendra Kohli
    1780 1424

    Item Code: #KGP-TKTPB1

    Availability: In stock

     All 6 Vols. in Paperback.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Balram (Paperback)
    Balram
    130

    Item Code: #KGP-411

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : बलराम
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बलराम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'शुभ दिन', 'गोआ में तुम', 'शिक्षाकाल', 'पालनहारे', 'सामना', 'कलम हुए हाथ ', 'कामरेड का सपना ', 'मालिक के मित्र', 'अनचाहे सफर' तथा 'पहला सबक' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बलराम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Gazal Ek Safar
    Noornabi Abbasi
    450 405

    Item Code: #KGP-848

    Availability: In stock

    ग़ज़ल: एक सफ़र
    उर्दू कविता की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा ग़ज़ल है। भारत में इसकी परंपरा लगभग पाँच सदियों से चली आ रही है। ‘वली’ दकनी इसका जनक माना जाता है। ग़ज़ल की जब शुरुआत हुई तो वह सौंदर्य और प्रेम (हुस्न-ओ-इश्क़) तक ही सीमित थी, लेकिन समय के साथ-साथ इसका दामन भी विस्तृत होता गया। फलस्वरूप, आज जीवन का कोई ऐसा विषय नहीं, जो ग़ज़ल में सफलतापूर्वक पेश न किया जा सकता हो, बल्कि पेश न कर दिया गया हो।
    उर्दू में ग़ज़ल की लोकप्रियता के बावजूद इस विधा का अनेक कवियों और आलोचकों ने विरोध किया। किसी को इसमें ‘संडास की बदबू’ महसूस हुई तो दूसरे ने इसे ‘अर्ध- सभ्य काव्यांग’ की संज्ञा दी और तीसरे ने तो इसकी ‘गर्दन उड़ाए जाने’ का फ़तवा भी सुना दिया। लेकिन इन प्रहारों से ग़ज़ल का पौधा न कुम्हलाया और न ही सूख पाया, बल्कि इसकी महक यथावत् बनी रही और आज भी फैली हुई है।
    कुल मिलाकर प्रस्तुत संकलन का ऐतिहासिक दृष्टि से अपना महत्त्व तो है ही। आशा है, उर्दू कविता के प्रेमियों में हमारे इस प्रयास का स्वागत होगा।
    ग़ज़ल की लोकप्रियता का एक कारण इसका विशिष्ट विषय प्रेम या इश्क़ रहा है और प्रेम-भाव वह है, जिससे कोई दिल ख़ाली नहीं। दूसरा यह कि ग़ज़ल के शे’र आसानी से याद हो जाते हैं और समयानुसार उनको पेश किया जा सकता है, ठीक उसी तरह, जैसे हिंदी में दोहे उद्धृत किए जाते हैं। वैसे तो उर्दू में क़सीदा, मर्सिया और मसनवी भी हैं, रुबाइयाँ और नज़्में भी लिखी जाती हैं, लेकिन ग़ज़ल का अपना स्थान है।
    प्रस्तुत संकलन में सत्रहवीं सदी से अब तक यानी चार सदियों के लंबे समय में हुए लगभग डेढ़ सौ शायरों की ग़ज़लें प्रस्तुत की गई हैं। आशा है, उर्दू-प्रेमी हिंदी पाठकों में इसका यथेष्ट स्वागत होगा।
  • Antarvartayen
    Kanhiya Lal Nandan
    240 216

    Item Code: #KGP-802

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक में सम्मिलित लगभग सभी बातचीतें किसी न किसी प्रतिष्ठित पत्रिका के माध्यम से पहले भी पाठकों के सन्मुख आ चुकी हैं, लेकिन समवेत रूप में दिनकर और अज्ञेय से लेकर कामतानाथ तक कई पीढ़ियों के रचनाकारों के अंतरंग मन में पैठा जा सके और उस पैठ के ज़रिए साहित्यिक जिज्ञासुओं की प्रश्नाकुल उत्कंठाएँ शांत हो सकें, इस दृष्टि से इस पुस्तक का विशेष महत्त्व मैं मानता रहा हूँ । फिल्मकार बासु भट्टाचार्य, चित्रकार कृष्ण हेब्बार और छायाकार रघु राय भी बातचीत के इस समवेत क्रम में सम्मिलित कर लिए गए हैं ताकि संवेदना के धरातल पर अनेक माध्यमों से जुड़े हुए लोगों की एकसूत्रता की प्रतिच्छवि भी आँकी जा सके ।
    कोई भी रचनाकार अपने युग को सिर्फ अपनी विधा के चश्मे से नहीं देखता । यह अगर कहानीकार है तो उसके साथ-साथ एक संघर्ष करता हुआ सामाजिक प्राणी भी है; जो कि ट्रेन-यात्रा में टिकट के लिए धक्के खाता भी हो सकता है, समाज में फैली किसी बुराई विशेष के प्रति एक आदमी की तरह सोच भी सकता है और उसकी प्रतिक्रिया में हिस्सेदार भी हो सकता है । रचनाकार को उसके समूचे रंगों में टटोलने की इसी जद्दोजहद से मैंने इन बातचीतों के क्रम में कुछ ऐसे ढंग से यह बार सवाल रखे हैं जो पूर्वापर संबंध के साथ असंगत दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उस बातचीत के समूचे प्रभाव में मुख्य उद्देश्य यहीं रहा है कि यह रचनाकार अपने मन के अछूते पहलुओं को पाठकों के सामने खोले; खासकर ऐसे पहलू जिन पर बहुत कम प्रकाश पड़ा है ।
    इस पुस्तक में सम्मिलित सभी रचनाकार व्यक्तित्व मुझे अंतरंग आत्मीयता प्रदान करते रहे हैं । संबंधों की यह अंतरंग आत्मीयता मेरी इन सभी बातचीतों का मूल आधार रही है । शायद इसीलिए जब-जब ये बातचीतें पहली बार प्रकाश में आई हैं, मुझे इनकी शैली के लिए पाठकों का अतिरिक्त स्नेह मिलता रहा है ।
    -कन्हैयालाल नंदन


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    200 180

    Item Code: #KGP-2078

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार श्रीलाल शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इस उम्र में', ‘सुखांत', "संपोला', 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल', 'शिष्टाचार', 'दंगा', 'सुरक्षा', 'छुट्टियाँ', 'यह घर मेरा नहीं' तथा 'अपनी पहचान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshatkaar : Ramnika Gupta
    Ramnika Gupta
    240 216

    Item Code: #KGP-623

    Availability: In stock


  • Path Ke Daavedaar
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-866

    Availability: In stock


  • Ath Nadi Katha
    Hari Krishna Devsare
    450 405

    Item Code: #KGP-219

    Availability: In stock

    अथ नदी कथा
    भारत की नदियों की पवित्रता, ऐतिहासिकता, पौराणिकता और उनके गौरवशाली वरदानों से हम सदियों से जुडे है । आम आदमी के लिए, नदी की यह कथा न केवल रोचक हो सकती है, उसके लिए प्रेरक भी हो सकती है। समय के साथ हमने कितनी ही नदियों की गाथाएँ भुला दी हैं। केवल उँगलियों पर गिने जा सकने वाले नाम ही लोगों को याद हैं। इस पुस्तक में यही प्रयास किया गया है कि भारत को लगभग सभी महत्वपूर्ण? नदियों के सम्मिलित किया जाए। फिर भी क्षेत्रीय महत्त्व की और छोटे यात्रा-पथ वाली नदियों का छूट जाना स्वाभाविक ही है।
    इस पुस्तक में सम्मिलित नदियों का यथासंभव पौराणिक माहात्य, उनकी पौराणिक एवं लोक- प्रसिद्ध कथाएँ, उनसे संबद्ध ऋषियों, तपस्वियों की कथाएँ दी गई है । इसी के साथ उनकी उत्पत्ति, की कथाएँ, उद्गम स्थल का भौगोलिक महत्त्व और फिर आगे के यात्रा-पथ का वर्णन है। यात्रा-पथ में नदी के दोनों तटों पर बसे धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं औद्योगिक नगरों के साथ साथ तीर्थों, संगमों, मंदिरों आदि के लोकव्यापी महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है। ये सभी विवरण हमारी भावी पीढ़ी, युवा पीढ़ी और प्रौढ़ों-तीनों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • Bharat : Tab Se Ab Tak
    Bhagwan Singh
    325 293

    Item Code: #KGP-9124

    Availability: In stock

    भगवान सिंह ने कविता, कहानी, व्यंग्य, आलोचना, उपन्यास, भाषा-समस्या जिस भी विषय पर लिखा है, उसमें उनका एक नया तेवर रहा है। उनका एक उपन्यास तो हिंदी के सबसे चर्चित और विवादित उपन्यासों में आता है। परंतु इतिहास पर उनका लेखन जितना विचारोत्तेजक और क्रांतिकारी माना गया है, उसकी तुलना उनके अन्य किसी विधा में किए गए लेखन से नहीं की जा सकती। व्यावसायिक इतिहासकार न होते हुए भी उन्होंने प्राचीन इतिहास की जड़ीभूत मान्यताओं को खंडित करते हुए इसकी गहनता, व्याप्ति और दिशा सभी को बदला है और इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों और मनस्वी पाठकों के बीच उसका स्वागत हुआ है।
    प्रस्तुत संग्रह में भी इतिहास पर लिखे गए उनके कुछ ऐसे लेख हैं, जिन्होंने पाठकों और श्रोताओं को उद्वेलित और प्रेरित किया है और उनको पुनर्विचार के लिए बाध्य किया है। साथ ही कुछ ऐसे नए लेख भी हैं, जो इससे पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुए हैं। इनके कारण निबंधों का समग्र फलक बहुत व्यापक हो गया है। जहां कुछ लेखक एक ऐसे अतीत में ले जाते हैं, जहां प्रकाश की कोई अन्य किरण आज तक पहुंच नहीं पाई थी और जिससे आज के दस-बीस हजार या इससे भी पहले की मानसिक ऊहापोह पर हलका और कुछ रंगीनी-भरा प्रकाश पड़ता है, वहीं ऐसे लेख भी हैं, जो ठीक आज की समस्याओं या वर्तमान के अतीत और वर्तमान दोनों की, तीखी पड़ताल करते हैं।
  • Svadharma Aur Kaalgati
    Ramesh Chandra Shah
    75 68

    Item Code: #KGP-9123

    Availability: In stock

    स्वधर्म और कालगति
    ‘मनुष्य सत्य को नहीं जान सकता किंतु उसे जीवन में अवतरित अवश्य कर सकता है’
    आधुनिक कवि येट्स ने लिखा था, अपनी मृतयु से एकाध दिन पहले ही। जैसे उसके कुल जीवानानुभव और कवि-कर्म का निचोड़ इस वाक्य में आ गया हो। प्रकारांतर से क्या यह ‘सब होकर सबको देखने’ वाले दर्शन से ही जुड़ी हुई बात नहीं लगती? रचना भी ज्ञान का ही एक प्रकार है; पर रचना का ‘जानना’ ज्ञान के अन्य अनुशासनों के ‘जानने’ की प्रक्रिया से मूलतः भिन्न है। इसलिए कि वह स्वयं जीकर के, स्वयं होकर के जानना है। ‘जानना’ यहां ‘होने’ पर अवलंबित है। रचना का सच अस्तित्वात्मक और रागदीप्त सच है। किंतु क्या इसीलिए वह सत्य के दूसरे किस्म के खोजियों और दावेदारों को उनकी तथाकथित वस्तुपरक कसौटी के चलते संदिग्ध नहीं लगता होगा? आयोनेस्को से पूछा गया कि तुम क्यों लिखते हो? उसने उत्तर का प्रारंभ ही इस वाक्य से किया कि ‘मैं क्यों लिखता हूं-यदि मैं सचमुच यह जानता होता तो मुझे लिखने की कोई प्रेरणा ही नहीं होती, यही जानने के लिए तो मैं लिखता हूं कि मैं क्यांे लिखता हूं?’ जाहिर है कि इस तरह का लगातार जानना भी लेखक होने से छुटकारा नहीं दिलाता। यदि लेखन-कर्म को व्यापक जीवन और सृष्टि के प्रति एक तरह के ऋणशोध या आत्मदान की प्रक्रिया के रूप में देखें तो भी इससे यह कहां निकलता है कि इस जीवनव्यापी प्रयिा की परिणति आत्मज्ञान और आत्मोपलब्धि में होगी ही। हो भी तो वह आत्मज्ञान और आत्मोपलब्धि-सब होकर सबको जानने का अनुभव-सचमुच ‘ज्ञान’ की है और दूसरे वस्तुपरक ज्ञान की तरह ही उपयोगी और समर्थ ज्ञान है, इसका भरोसा दूसरे को कैसे हो?
    (पुस्तक के एक निबंध से)
  • Khabrein Aur Anya Kavitayen
    Ganga Prasad Vimal
    175 158

    Item Code: #KGP-546

    Availability: In stock

    "खबरें और अन्य कविताएँ' एक ऐसे प्रयोगधर्मी कवि का नया प्रधान है, जो हमारे सामने पाँच दृष्टियों से एक विषय को विस्तार देकर जनोन्मुखी विषादों की गहरी सच्चाइयों से परिचय कराता है । पाँच दृष्टियाँ ही क्यों? एक सहज सवाल उभरता है । हमारे पंचेंद्रिय ज्ञान की परिसीमाओं में उनका अलग-अलग रूप क्या हो--इसे जानना भी रोचक हो सकता है, परंतु इसका परिदर्शन हम कविताओं के स्वायत्तम संसार में जाकर ही कर पाएंगे । यह बोध का परिदर्शन है, परंतु आज के समय में पाँच के कई अर्थ हैं--हम किस-किस सोपान से क्या-क्या या सकते हैं यह बहुत हम पर निर्भर करता है और यहीं से बहस शुरू हो जाती है कि कवि के पास से कविता या सृजेता के पास से सृजन उसी क्षण दूसरों की सम्मति हो जाती है जिस क्षण वह स्वांत: सुखाय की निजता से मुक्त होता है ।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Yashpal
    Yash Pal
    250 225

    Item Code: #KGP-9155

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं यशपाल की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘मक्रील’, ‘नई दुनिया’, ‘प्रतिष्ठा का बोझ’, ‘परदा’, ‘मंगला’, ‘उत्तमी की मां’, ‘ओ भैरवी!’, ‘वैष्णवी’, ‘कलाकार की आत्महत्या’ तथा ‘भूख के तीन दिन’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Parda Beparda
    Yogendra Dutt Sharma
    180 162

    Item Code: #KGP-1561

    Availability: In stock

    पर्दा-बेपर्दा
    कहाँ है सभ्यता ? किधर है प्रगति ? कैसा है विकास ? इतिहास की लंबी यात्रा करने के बाद भी हम मानसिक रूप से शायद अब भी वहीं के वहीं हैं जहाँ से शुरू हुई थी हमारी यात्रा। सच पूछें, तो हम आज भी किसी आदिम अवस्था में ही जी रहे हैं। क्या सभ्यता का कोई विकास-क्रम हमारी बर्बरता को मिटा पाया है ?
    विश्व-मंच पर ही नहीं, देशीय परिवेश में भी सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित होने का हमारा दंभ निरर्थक और खोखला ही सिद्ध होता है।
    योगेन्द्र दत्त शर्मा की ये कहानियाँ बताती हैं कि कैसे हम आज अनेक विपरीत धु्रवों पर एक साथ जी रहे हैं। कहना ज़रूरी है कि ‘पर्दा-बेपर्दा’ की ये कहानियाँ फैशनपरस्त कहानियों की दुनिया से अलग मानवीय संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी सार्थक रचनाएँ हैं जो लंबे समय तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगी।
  • Gareeb Mahilayen Udhar Evam Rozgaar
    Indira Mishra
    250 225

    Item Code: #KGP-37

    Availability: In stock

    भारत में गरीबी की समस्या प्रबल है और गरीबी की मार महिलाओं पर अधिक सीधी और तीखी होती है, क्योंकि महिलाएं परिवार के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार ठहराई जाती हैं। वे मातृत्व का भार वहन करते हुए शरीर से दुर्बल होती हैं, यद्यपि उनमें भावनात्मक इच्छाशक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। गरीबी को दूर करने के लिए केंद्रीय तथा प्रदेश सरकारें, स्वायत्त संस्थाएं तथा अन्य कई प्रकार की एजेंसियां कटिबद्ध हैं, किंतु यह समस्या अभी तक कारगर ढंग से सुलझाई नहीं जा सकी। गरीब तथा ग्रामीण महिलाएं अक्सर अचल संपत्ति-विहीन और शिक्षा के लाभ से वंचित होती हैं। फिर भी उनके अंदर रचनात्मकता तो होती ही है तथा अपनी मदद स्वयं करने के लिए भी वे सतत उत्सुक होती हैं।
    ऐसी महिलाओं की, जो स्वयं की छोटी सी दूकान खोलना या कोई अन्य छोटा-मोटा रोजगार करना चाहती हैं, कर्जे की आवश्यकता बहुत ज्यादा नहीं होती। दूसरी आजमाई हुई बात यह है कि महिला उतना ही ऋण लेना पसंद करती है जितने को किस्तों में लौटा भी सके। किंतु इस सबके बावजूद कोई भी वित्तीय संस्था एकाएक उसे कोई ऋण देने की स्थिति में नहीं होती।
    प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे विषय सामान्य नागरिकों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा बैंककर्मियों आदि के समक्ष स्पष्ट किए गए हैं।
  • Jigyaasa
    Bhairppa
    250 225

    Item Code: #KGP-214

    Availability: In stock


  • Tukara-Tukara Waqt
    Shashi Sahgal
    60 54

    Item Code: #KGP-1866

    Availability: In stock

    टुकड़ा-टुकड़ा वक्त
    शशि सहगल की कविताओं के केन्द्रीय स्वर को जानने के लिए उनकी एक कविता 'असर' पर नज़र डाले :
    झाड़ा-पोंछा
    दिखने में साफ
    कलफ लगी साडी-सा
    कड़क व्यक्तित्व ओढ
    बाहर जाना अच्छा लगता है ।

    ढ़ीले-ढाले वजूद के
    घर के पायदान पर ही छोड़
    हीन भावना से उबरती हुई देह
    दो कदम बाहर रखते ही
    आत्मविश्वास से भर उठती है
    कलफ़ का असर
    कुछ ऐसा ही होता है ।

    शशि जी की कविताएँ घर के अन्दर की कविताएँ जरूर है, लेकिन वे घर में बंद नहीं हैं और ना ही घर और परिवार के संबंध मात्र ही उनकी कविताओं की सीमा हैं । वे घर से बाहर भी झाँकती है और अपने से बाहर भी । अपने भीतर और बाहर तथा घर के अन्दर और घर से बाहर के द्वन्द्वात्मक रिश्तों की वजह से आई दरारें उनकी कविताओं का विषय बनती हैं । उनके पहले कविता-संग्रह में भी इस संवेदन के पहचान बड़े गहरे स्तर पर रही है । इस कविता-संग्रह में यह संवेदन और भी गहराया है । इसमें कहीं मूल्य तलाशने की उत्कटता भी है, 'बाजार' होते रिश्तों में कहीं खुद को बचाकर रखने की केशिश भी । यही इन कविताओं के शक्ति है ।

  • Buniad Ali Ki Bedil Dilli
    Dronvir Kohli
    400 360

    Item Code: #KGP-263

    Availability: In stock

    बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली
    यह अपूर्व संग्रह 'धर्मयुग' के लोकप्रिय स्तंभ बेदिल दिल्ली में प्रकाशित लेखों का है। डॉ० धर्मवीर भारती के विशेष आग्रह पर इसे लिखा करते थे उपन्यासकार द्रोणवीर  कोहली-बुनियाद अली के छदम नाम से।
    स्तंभ में जाने वाली सामग्री के बारे में प्राय: तीखी प्रतिक्रिया होती थी। साहित्यिक गोष्टियों वाले लेखों को लेकर कुछ लेखक लाल-पीले भी होने लगते थे। ऐसी स्थिति में स्तंभ-लेखक के बारे में तरह-तरह के कयास लगाए जाते थे। लेकिन भारती जी ने लेखक की पहचान को निरंतर गुप्त रखा-इतना कि 'धर्मयुग' में उनके सहयोगी तक नहीं जान पाते थे कि इसे लिख कौन रहा है।
    डॉ. धर्मवीर भारती इस स्तंभ के बारे में इतने उत्साहित थे कि लेखक को उन्होंने अपने 4-4-81 के पत्र में यह कहकर प्रोत्साहित किया था : "स्तंभ जोरदार जा रहा है। अपने ढंग का बिलकुल अलगा "
  • Antrang Saakshatkar
    Krishna Dutt Paliwal
    200 180

    Item Code: #KGP-621

    Availability: In stock


  • Aacharya Ram Chandra Shukla Ka Chintan Jagat
    Krishna Dutt Paliwal
    695 626

    Item Code: #KGP-9007

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Ashok Vajpayee
    Ashok Vajpayee
    190 171

    Item Code: #KGP-440

    Availability: In stock

    लगभग एक हजार लिखी गई कविताओं से कुछ चुनना स्वयं कवि के लिए मुश्किल काम है। एक अधसदी भर कविता लिखने और कविता के लिए अपने समय और समाज में थोड़ी सी जगह बनाने की कोशिश करते हुए उसकी रुचि और दृष्टि बदलती रही है। फिर अगर आप कविता लिखने के अलावा आलोचना भी लिखते हों, जो कि मैं करता रहा हूँ, तो मुश्किल और बढ़ जाती है। आपको रुचि और दृष्टि की अपार बहुलता से निपटना पड़ता है। आप कितने ही तीख़े आत्मालोचक क्यों न हों जो आपको प्रिय लगता हो वह जरूरी नहीं कि महत्त्वपूर्ण भी हो या कि वस्तुनिष्ठ ढंग से ऐसा माना जा सके। स्वयं कवि के अपनी कविता को लेकर भी पूर्वग्रह होते हैं और उनमें से कई जीवन भर उसका साथ नहीं छोड़ते। इस संचयन में वे सक्रिय नहीं होंगे इसकी संभावना नहीं है। फिर भी प्रयत्न यह है कि कई रंगों की कविताएँ उसमें आ जाएँ।
    बाकी सब तो कविताएँ ही अपने ढंग से कहेंगी: उनके बारे में कवि को संभव हो तो चुप ही रहना चाहिए। अकसर कविताएँ कवि से अधिक जानती हैं; अपने रचयिता से। इतना भर इस मुकाम पर कहा जा सकता है कि ज्यादातर एक ऐसे समय और समाज में जो कविता से कोई उम्मीद नहीं लगाता और अकसर उसकी अनसुनी-अनदेखी ही करता है, कविता में विश्वास बना रहा है।
    -लेखक
  • Kavi Ne Kaha : Gyanendrapati
    Gyanendrapati
    150 135

    Item Code: #KGP-163

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ज्ञानेन्द्रपति
    ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है । जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है ।  वे  कविता के नहीं, उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिसकी प्रस्तावना की थी । उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है । बेशक, यह हर बार एक नये छन्द का अन्वेषण हैं जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-द्रव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मता से सम्भव होता है । हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहां खूब बन पडा है । तदभव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है न देशज अस्मृश्य; अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक और तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जनमत भूमि पर दृढ़ता से पाँव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है । धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता-वह किसी को नहीं बख्शती । उसकी दीठ प संतप्त भूगोल है । साम्राज्यबाद के नए पैंतरों का वह पहचानती है । अभय में पगी हूई करुणा उसे विरासत में मिली है । वह एक महान् परम्परा की परिणति है ।
    स्वयं ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं ही, आयामी संग्रेहों से भी कविताएँ शामिल है, बल्कि अनेक तो पहली बार यही प्रकाशित हो रही हैं । बिला शक अपने समाज-समय को कविता को आँख से देखना-समझना चाहने वालों के लिए एक अनिवार्य-किताब नहीं-सहचर!
  • Toro Kara Toro-1 (Nirman)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-1574

    Availability: In stock


  • Hamare Jeevan Moolya-1
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1145

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamleshwar (Paperback)
    Kamleshwar
    90

    Item Code: #KGP-1251

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : कमलेश्वर
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमलेश्वर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "कोहरा', 'राजा निरबंसिया', 'चप्पल', 'गर्मियों के दिन', 'खोई हुई दिशाएँ', 'नीली झील', 'इंतजार', 'दिल्ली में एक मौत' , 'मांस का दरिया' तथा 'बयान' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमलेश्वर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Chunauti
    Sudrashan Kumar Chetan
    150 135

    Item Code: #KGP-177

    Availability: In stock


  • Poster
    Shanker Shesh
    120 108

    Item Code: #KGP-1897

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Rao (Paperback)
    Rajendra Rao
    150

    Item Code: #KGP-503

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजेन्द्र राव
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र राव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उत्तराधिकार', 'लोकी का तेल', 'अमर नहीं यह प्यार', 'वैदिक हिंसा', 'बाकी इतिहास', 'घुसपेट','छिन्नमस्ता' 'असत्य के प्रयोग', 'शिफ्ट' तथा 'नौसिखिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजेन्द्र राव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Khed Nahin Hai
    Mridula Garg
    300 270

    Item Code: #KGP-543

    Availability: In stock

    खेद नहीं है
    मृदुला गर्ग की छवि पाठकों के बीच अब तक एक कथाकार की रही है। धीर-गंभीर पर ऐसा कथाकार, जिसके कथानकों में व्यंग्य की सूक्ष्म अंतर्धारा बहती है। इस पुस्तक में संकलित लेखों से गुज़रने के बाद यह धारणा पुष्ट होगी कि खाँटी व्यंग्य-लेखन की रसोक्ति पर भी उनकी पकड़ प्रभावी है। इनमें वे जिस पैनेपन से व्यवस्था में धँसे विद्रूप की काट-छाँट करती हैं उसी तर्ज़ पर पूरे खिलंदड़ेपन के साथ हमारे भीतर उपस्थित विसंगतियों को भी सामने ला खड़ा करती हैं। 
    दरअसल, ये सभी लेख पिछले कुछ वर्षों से ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका में ‘कटाक्ष’ स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित हो रहे हैं, जिनके ज़रिए वे अपने आसपास पसरी विडंबनाओं की शिनाख़्त कर पाठकों के सामने पेश करती हैं, बिना किसी लाग-लपेट के। जब जहाँ जैसा ठीक लगा, उसे वहाँ वैसा ही बयान कर दिया। कोई बंदिश नहीं। न भाषा की, न शैली की और न ही विधा की। पर उनकी इसी अनुशासनहीनता से ये लेख विशिष्ट बन पड़े हैं। मज़े की बात यह भी कि इस बेतकल्लुफ़ी को लेकर उनके मन में ज़रा भी ‘खेद नहीं है’।
    इन्हें पढ़ना इसलिए भी ज़रूरी है कि इस बहाने हमें खुद पर हँसने का मौक़ा मिलेगा। और शायद सोचने का भी।
  • Ramayan Bharantiyan Aur Samadhaan
    Swami Vidya Nand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1115

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के पढ़ने से पता चलेगा कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम राज्य पाने के इच्छुक थे, वे पिता के कहने से वन नहीं गए, राम दीपावली के दिन नहीं बल्कि चैत्र शुक्ला 6 को अयोध्या लौटे थे, सीता का स्वयंवर नहीं हुआ था, कौशल्या की स्थिति घर में दासियों से भी बुरी थी, राम ने धोबी या किसी के भी कहने से सीता को वनवास नहीं दिया था, उन्होंने तपस्या करते तथाकथित शुद्र शम्बूक का वध नहीं किया था, हनुमान बंदर नहीं बल्कि व्याकरणाचार्य तथा चारों वेदों के विद्वान् थे, बालि की पत्नी तारा वेदों के रहस्य को जानने वाली थी, उसका पुत्र अंगद बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ था और उसके श्वसुर सुषेण बड़े कुशल सर्जन और प्लास्टिक सर्जरी में निष्णात थे, हनुमान, जटायु, रावण आदि छोटे-छोटे निजी हेलीकाॅप्टरों में यात्रा करते थे, शबरी भीतनी नहीं, उच्च कुल की तपोनिष्ठ देवी थी, अयोध्या तथा लंका की राजभाषा संस्कृत थी इत्यादि...
  • Premchand : Jeevan, Kala Aur Krittwa
    Hansraj Rehbar
    400 360

    Item Code: #KGP-9288

    Availability: In stock

    प्रेमचंद का सारा जीवन संघर्षो में व्यतीत हुआ। वे डाकखाने के एक मामूली क्लर्क के बेटे थे। अर्थाभाव के कारण मैट्रिक बड़ी मुश्किल से पास किया। इसके उपरांत उन्हें जीविकोपार्जन में जुट जाना पड़ा। लेकिन उनमें विकास और उन्नति की जो एक भावना थी, ओ बढ़ने की जो एक उत्कृट अभिलाषा थी, उसने उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया। वे जीवन-पर्यन्त परिस्थितियों से लड़ते और उनसे ऊपर उइने का सतत् प्रयत्न करते रहे। उन्हें आर्थिक और भौतिक सुख भोगना भले ही नसीब न हुआ, लेकिन अपने इस प्रयत्न से वे महान् लेखक बन गए। उन्होंने जनता के दुःख दर्द को स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी और बारीकी से उसका वर्णन किया। 
    निस्संदेह प्रेमचंद आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी साहित्यकार है, जिनकी प्रतयेक रचना भारतीय जन-जीवन का आइना है तथा हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।
    —इसी पुस्तक से...
  • Mans Ka Dariya
    Kamleshwar
    80 72

    Item Code: #KGP-9061

    Availability: In stock


  • Mahaan Sant Raidas
    Hari Krishna Devsare
    150 135

    Item Code: #KGP-208

    Availability: In stock


  • Mushkil Kaam (Paperback)
    Asghar Wajahat
    90

    Item Code: #KGP-1454

    Availability: In stock

    मुश्किल काम
    लघुकथा के संबंध में फैली भ्रांतियों को तोड़ती असग़र वजाहत की लघुकथाएँ अपनी विशिष्ट शैलियों तथा व्यापक कथ्य प्रयोगों के कारण चर्चा में रही हैं। वे पिछले पैंतीस साल से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ इन अर्थों में अन्य लघुकथाओं से भिन्न हैं कि उनकी लघुकथाएँ  किसी विशेष शैली के सामने समर्पण नहीं करती है। पंचतंत्र की शैली से लेकर अत्याधुनिक अमूर्तन शैलियों की परिधि को अपने अंदर समेटे असग़र वजाहत की लघुकथाएँ पाठक का व्यापक अनुभव जगत् से साक्षात्कार कराती हैं। प्रस्तुत लघुकथाएँ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विषयों तक फैली हुई हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता इन लघुकथाओं की एक विशेषता है, जो किसी प्रकार के अतिरिक्त आग्रह से मुक्त है। इन लघुकथाओं के माध्यम से मानवीय संबंधों, सामाजिक विषमताओं और राजनीतिक ऊहापोह को सामने लाया गया है।
    निश्चित रूप से प्रस्तुत लघुकथाएँ हिंदी लघुकथा की विकास-प्रक्रिया को समझने में भी सहायक सिद्ध होती हैं।
  • Plot Ka Morcha
    Shamsher Bahadur Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-588

    Availability: In stock


  • Surakshit Pankhon Ki Uraan
    Alka Sinha
    100 90

    Item Code: #KGP-9294

    Availability: In stock

    बारूदी गंध और धुएं से स्याह आज के आकाश पर हवाई आतंक के मनहूस बादल निरंतर मंडरा रहे हैं। हर पिछली भयावह घटना को छोअी बनाती अगली घटना अपने को बड़ा सिद्ध कर रही है। 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय ससंद पर हुए आतंकवादी हमले से देश की संप्रभुता को तो आघात पहुंचा ही है, सुरक्षा का मनोविज्ञान भी घायल हुआ है। आतंवाद की भयावहता शांति और सुरक्षा के प्रति राष्ट्र को आशंकित कर रही है, तो 11 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ हवाई हमला आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दे रहा है और हवाई आतंक के प्रति समूची धरती और आकाश के माथे पर चिंता और विषाद की लकीरें गहरा गई हैं। आज का समय बच्चे-बच्चे से सुरक्षा के प्रति जागरूक होने की मांग करता है दरवाजे खुले छोड़कर सोने का समय बहुत पीछे छूट गया। अब तो बंद दरवाजों में भी व्यक्ति खुद को असुरक्षित महसूस करता है। सुबह घर से निकला आदमी शाम को सकुशल लौट भी आएगा, कह पाना कठिन है। फिर भी जिंदगी चलती रहती है और चलते रहते हैं जिंदगी के कामकाज। सर्दी-खांदी की तरह भय और आतंक भी जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। ऐसी सूरत में कहानी का उद्देश्य किस्सागोई अथवा मनोरंजन कतई नहीं है। वे जमाने लद गए जब दादी-नानी के पेट से सटकर राजा-रानी की कहानियां सुनते-सुनते नींद आ जाती थी और सपनों में उड़ने वाला घोड़ा लेकर उतर आता था कोई राजकुमार।
    —अलका सिन्हा 
  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh
    Shravan Kumar
    600 450

    Item Code: #KGP-596

    Availability: In stock


  • Jalatarangon Ki Atmakatha
    Anupam
    50 45

    Item Code: #KGP-9037

    Availability: In stock


  • Dinkar : Vyaktitva Aur Rachana Ke Aayam
    Gopal Rai
    425 383

    Item Code: #KGP-259

    Availability: In stock

    दिनकर: व्यक्तित्व और रचना के आयाम
    प्रस्तुत पुस्तक दिनकर को नए परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करती है। दिनकर का काव्य-संसार लगभग पाँच दशकों, 1924 से 1974 तक फैला हुआ है। बीसवीं शती के आरंभिक दशक में राष्ट्रीय आंदोलन जुझारू रुख अख्तियार करने लगा था और गांधी जी के हाथों में नेतृत्व आने के बाद तो राष्ट्रीय आंदोलन जनांदोलन के रूप में परिणत होने लगा। दिनकर की काव्य-चेतना और काव्य-चिंतन के निर्माण में राष्ट्रवादी आंदोलन के जुझारूपन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उनकी कविताओं में भारतीय किसानों का श्रम, उनकी आशाएँ और अभिलाषाएँ लिपटी हुई हैं। 
     दिनकर साहित्य में समकालीनता और सामयिकता को वरेण्य मानते हैं। वही साहित्य दिनकर के लिए काम्य है, जो दलितों, उपेक्षितों और समाज के मान्य वर्ग की दृष्टि से असभ्य लोगों का पक्षधर बनकर खड़ा हो सके। दिनकर राजनीतिक विषयों को भी महत्त्व देते हैं और मानते हैं कि राजनीतिक कविता श्रेष्ठ कविता होती है। 
    दिनकर ने अकबर इलाहाबादी का एक शे’र उद्धृत किया है जो उनके काव्य-चिंतन का निचोड़ है:
    ‘‘मानी को छोड़कर जो हों नाजुक-बयानियाँ,
    वह शे’र नहीं, रंग है लफ़्ज़ों के ख़ून का।’’
  • Charitra-Nirmaan : Kya? Kyon? Kaise?
    Dhram Pal Shastri
    100 0

    Item Code: #KGP-142

    Availability: In stock

    चरित्र-निर्माण : क्या ? क्यों ? कैसे ?
    लोगों का यह वहम है कि संत-महात्माओं को ही चरित्र  को आवश्यकता है, गृहस्थियों और दुनियादारी को नहीं । सब जानते है कि संत लोग जंगल के एकांत में रहते हैं। न उन्हें ऊधो का लेना, न माधो का देना । न किसी से मिलना-मिलना, न किसी प्रकार का व्यापार- व्यवहार करना । इस प्रकार जो रहता ही अकेला है, भला वह किसी को सतायेगा क्या ? झूठ बोले तो किससे ? धोखा दे तो किसे ? अत:, उनके जीवन में शान्ति-संतोष और भगवदभजन के अतिरिक्त अन्य चारित्रिक गुणों का व्यवहार करने के अवसर ही बहुत कम आते हैं।
    इसके विपरीत हम दुनियादारों का तो लोगों से दिन-रात का संबंध है । बच्चे से लेकर बूढे तक हर एक को दिन में बीसियों, पचासों और सैकड़ों लोगों से निपटना पड़ता है, जिनमें कुछ अच्छे लोग भी होने है, कुछ बुरे भी; नरम भी, गरम भी; पढे-लिखे भी, अनपढ़ भी; भोले-भाले भी, चतुर-चालाक भी, सच्चे भी, झूठे भी, मीठे भी, कड़वे भी । इस प्रकार अनगिनत प्रकार के और रंग-बिरंगे स्वभाव के लोगों के साथ व्यवहार करना कोई खालाजी का घर नहीं । यहीं मनुष्य के चरित्र की असली परख होती हैं । यहीं उसके चारित्रिक गुण प्रकट करने के पर्याप्त स्थान और अवसर आते हैं। ऐसे अवसरों पर कदम-कदम  पर उसे चरित्र की अनावश्यकता पड़ती है । हम तो कहते हैं कि चरित्र के बिना दुनिया में किसी भी आदमी का कोई भी काम नहीं चल सकता । 

  • Shirdi Wale Sai Baba
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-275

    Availability: In stock


  • Gautam Buddha
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-126

    Availability: In stock

    भगवान गौतम बुद्ध की गौरवगाथा स्वदेश की सीमाओं को लाँघकर विश्व के अनेक देशों में फैली हुई है । उनके सिद्धातों और शिक्षाओं ने सभी देशों के लोगों को आकृष्ट किया है । अशोक जैसे महान् सम्राट ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और उसका प्रचार-प्रसार किया । गौतम बुद्ध की शिक्षाओं ने जनता के हृदय में अपना स्थान बना लिया । गौतम बुद्ध मानव-मात्र के कल्याण की शिक्षा देते थे ।
    अहिंसा के पुजारी गौतम बुद्ध ने हिंसा का डटकर विरोध किया । वे अहिंसा को महान धर्म मानते थे । बाल्यावस्था से ही वे हिंसा के विरोधी थे । किसी भी प्रकार की हिंसा पर वे अपने मित्रों को समझाते थे कि हिसा महान् पाप है । इससे आत्मा को बहुत क्लेश होता है ।
    गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं को अत्यंत सादा जीवन व्यतीत करने की सलाह ही । यज्ञ-बलि की वे सर्वत्र निंदा करते थे और उसे निकृष्टतम  कृत्य मानते थे । वास्तव में वे करुणा के अवतार थे । उनका संदेश था कि मनुष्य को सामाजिक हित का सदैव ध्यान रखना चाहिए । वे एकांतवास के पक्षधर थे ।
    प्रस्तुत पुस्तक में भगवान बुद्ध के संक्षिप्त जीवन-परिचय के साथ उनकी शिक्षाओं, उपदेशों, सिद्धांतों और आदशों का वर्णन सरल भाषा में किया गया है।
  • Taaki Desh Mein Namak Rahe
    Asghar Wajahat
    390 351

    Item Code: #KGP-475

    Availability: In stock

    ताकि देश में नमक रहे पुस्तक में कुल 42 लेख संकलित हैं, जिन्हें दो खंडों में विभाजित किया गया है। पहले खंड के अंतर्गत साहित्यिक लेख हैं, जब कि दूसरे खंड में सामाजिक-सांस्कृतिक लेख संकलित हैं। साहित्यिक लेखों में सिर्फ साहित्यिक विधाओं या सरोकारों की ही बात नहीं की गई है बल्कि कई ऐसी साहित्यिक विभूतियों पर भी लेखक ने पूरी आत्मीयता से लिखा है, जिन्होंने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। मुज़फ्फर अली के साथ बिताए ख़ूबसूरत दिन हों या बेगम अख़्तर, शैलेन्द्र और शहरयार के लिए मन में मौजूद दीवानगी का अहसास, प्रमोद जोशी और ब्रजेश्वर मदान जैसे अपनी तरह की विशिष्ट-सामान्य शख़्सियतों की बातें हों या कुर्रतुलऐन हैदर और मंटो जैसे अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों के प्रति आदर-भाव प्रकट करना हो, हर लेख में असग़र वजाहत कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर दे जाते हैं जिसे पाठक अपने मन से कभी विस्मृत नहीं कर सकता। 
    पुस्तक के दूसरे खंड में संकलित लेख हालांकि सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े हैं लेकिन उनका वैचारिक धरातल अत्यंत विस्तृत है। इनमें भाषा से जुडे़ सवाल, सिनेमा और साहित्य के अंतर्संबंध, आने वाले समय में हिंदी सिनेमा की दशा-दिशा का आकलन, भारतीय गणतंत्र से जुड़े दशकों पुराने अनुत्तरित सवाल और लगातार छीजते जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहन चिंताएं मौजूद हैं। असग़र वजाहत इन लेखों के जरिए वर्तमान समय के जटिल सवालों को न केवल उभारते हैं बल्कि उनसे मुठभेड़ कर उनकी तहों में जाकर कारण भी तलाशते हैं। 
    इन विविध लेखों को क्रमिक रूप से पढ़ने पर हम अतीत से शुरू कर वर्तमान को पार करते हुए भविष्य के संभावित सवालों से भी रूबरू हो सकते हैं। यह असग़र वजाहत के लेखन की कलात्मकता ही है कि वह छोटे तथा मामूली से दिखने वाले मुद्दे या सवाल से अपनी बात शुरू कर उसे पूरे समाज और व्यवस्था के लिए एक ज़रूरी सवाल का स्वरूप प्रदान कर देते हैं।
    भूमिका से 
  • The Luck Of The Jews (Novel)
    Michael Benanav
    595 536

    Item Code: #KGP-893

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Aalaap-Vilaap
    Rajendra Laharia
    150 135

    Item Code: #KGP-298

    Availability: In stock

    आलाप-विलाप
    कथाकार राजेन्द्र लहरिया के उपन्यास अपने समय से मुठभेड़ करते कथ्य के साथ ही मर्म को छुने वाले होते हैं और उनका शिल्प भी नव्यता से भरा और पाठकीय जिज्ञासा को उकसाने वाला होता है । वे अपने उपन्यासों को 'कहानी' की तरह साधते हैं, जहाँ कुछ भी फालतू होने  (लिखने) की गुंजाइश नहीं होती । 'आलाप-विलाप' भी इसका अपवाद नहीं है । बकौल लेखक, 'सकेतों की 'भाषा मनुष्य हमेशा से समझता आया है । कोई कहानी या उपन्यास लिखते वक्त मेरा ध्यान इस बात पर हमेशा बना रहता है कि मेरा काम यदि एक शब्द लिखने से चलता है तो अनावश्यक दस शब्द क्यों लिखूं! शब्दों की फिजूलख़र्ची तो कई तरह के नुकसान करती है... 
    'आलाप-विलाप' के बारे में एक सुधी पाठक की राय द्रष्टव्य है : 'कथाकार राजेन्द्र लहरिया का लपन्यास 'आलाप-विलाप' मार्मिकता से भरा व मूलत: राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक छदमों को उदूघाटित करता है। जीवन की भयावह स्थितियों इस उपन्यास को जीवंत कथ्य देती है । छोटे-छोटे उपकथानकों में परिवेश की  पीड़ाओं के झकझोरने वाले वर्णन इसके प्रभाव को सघन करते हैं। हमारे समय की एक प्रमुख समस्या नक्सलवाद के उभार और उसकी वजहों को भी इस उपन्यास में देखा-पहचाना और समझा जा सकता है । प्रशासनिक और सांस्कृतिक-साहित्यिक छदमों और पाखंडों की लीलाएँ गरीब, कमजोर और संवेदनशील व्यक्तियों तथा तबकों को क्या-क्या नचाती हैं, इसका-दिलचस्प और बेधक दिग्दर्शन इस उपन्यास में है। और खास बात यह है कि  अँधेरे समय और स्याह चरित्रों के बीच भी उम्मीद की  कौंध से भरे कुछ ऐसे उजले चरित्र यह उपन्यास हमें देता  है, जो लड़ाई को बेहद कठिन समझते हुए भी अविचल  रूप से संघर्ष करते है, और इसलिए उनकी हार भी हमें  निराशावाद की ओर नहीं ले जाती । वह इस छोटे से उपन्यास  की बड़ी खुबी है... 
    कहा जा सकता है कि 'आलाप-विलाप' आकार से लघु, मगर सरोकार में बडा उपन्यास है ।
  • Godhooli
    Bhairppa
    300 270

    Item Code: #KGP-669

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Tiger Tantra (Paperback)
    Ganga Prasad Vimal
    245 221

    Item Code: #KGP-326

    Availability: In stock

    A first ever Novel on an Untouched Subject
    The Tantra, its cults and practices have always attracted attention worldwide due to its strange disciplines and various hidden secrets. Chiefly because of its use of esoteric practices— in acquiring siddhis (supernatural powers), spiritual perfection and other material gains—Tantra came to be regarded as anti-social and unethical, forcing it to go underground.
    The present novel explores an unusual aspect of the tantric discipline, which makes it quite interesting. The author has taken up a subject inherent to the sub-culture of the Himalayan regions to which he belongs, and tried to weave it into a quite probable story, realistic as well as readable.
    ‘Tiger Tantra’ or the Tantra which changes the practitioner into a tiger or Bokshu and makes him immortal, lies buried under the ruins of a temple in the village of Jaled, the centre of an isolated Tantric Peeth in the Himalayan region.
    A scholar in search of the Tiger Tantra visits the village, to uncover the secret and to find the hidden mantra, finds a swami engaged in some strange practices . . . and the story unfolds in its fantastic dimensions . . . till the virgin offers herself to the scholar to corrupt the swami’s sadhana.
  • Prakaaraantar
    Madhur Shastri
    125 113

    Item Code: #KGP-1862

    Availability: In stock

    प्रकारान्तर
    वर्तमान जीवन-परिवेश की दुर्दान्त अमानवीयता के सामने पड़ने पर अस्वीकार का स्वर ही स्वाभाविक परिणति होती है एक सर्जक कवि की । मधुर शास्त्री का कवि भी मुक्त- छंद की इन कविताओं में अपना कटु अस्वीकार दर्ज करता है : 'चलो, लौट चलें पुराने दिनों की ओर/शाम झुकने लगी है/रात जाने वाली है/मुँह में भरकर झाग/लाल जीभ में है काला जहर इसके साथ है खूँख्वार अँधेरा' -प्रतीकात्मक व्यंजना में युग की विभीषिका व्यक्त है ।
    गीत के ऊँचे सृज़न-तल से बाध्यकारी जिन सीमाओं- स्थितियोंवश मधुर शास्स्त्री का गीतकार मुक्तछंद के तल पर उतरा है, वे निश्चय ही युग-यथार्थ  को रेखांकित कर रही हैं तथा जिन्होंने कवि को झेंझोड़ दिया है। अन्याय, हिंसा, हत्या के अपूर्व भयावह वर्तमान को भावोपचार  से अधिक संवेदनात्मक विचारोपचार एवं व्यंग्य-प्रहार की दरकार है ।
    समाज-जीवन की विचार-विश्लेषणमयी पहचान के बावजूद मधुर जी का गीतकार कवि अपनी मूल प्रकृति को पूरी तरह छोड़ नहीं देता । यह अच्छा हैं, क्योंकि सृजन की मौलिक चिंतन-दृष्टि ही प्रामाणिकता को सिद्ध करती है। बाहरी बाध्यताओं में घिरकर भी मधुर शास्त्री दृष्टि, भाषा, लय, तुक आदि को शिथिल नहीं होने देते तथा निराला की मुक्तछंद परंपरा में काव्य-सृजन की हरीतिमा, सरसता, संवेदना, लोकाभिमुखता, संप्रेषणीयता, सहजता की भूमि को विकसित करने में संलग्न रहते हैं । यहीं यह कह देना अप्रासंगिक न होगा कि निराला ने छंद तोड़ा नहीं था, एक नया छंद-मुक्तछंद, जोड़ा था।
  • Bachchon Ke Chhah Naatak
    Jaivardhan
    200 180

    Item Code: #KGP-1816

    Availability: In stock


  • Bahadur Bachche : Romanchak Ghatnayen
    Sanjiv Gupta
    90 81

    Item Code: #KGP-9292

    Availability: In stock

    पत्रकारिता के पेशे में रहते हुए बहुत बार ऐसे विषयों पर भी काम करने का अवसर मिलता है, जो व्यक्तिगत स्तर पर भी मन को छू जाते हैं। हर साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ से सम्मानित होने वाले बच्चों का विषय भी कुछ ऐसा ही था। जब इस विषय पर मैंने कई साल काम किया, बहादुर बच्चों से मिलने और उनसे बात करने का मौका मिला तो उनका सरल व्यक्तित्व, उनके बहादुरी भरे प्रेरक कारनामे मन को गहरे तक छू गए। मन में आया कि अगर हर बच्चा ऐसा ही सरल, सच्चा और बहादुर हो तो शायद हमें आने वाले कल की चिंता ही नहीं रह जाएगी।
    —संजीव गुप्ता
  • Himalaya : Aitihaasik Evam Pauranik Kathayen
    Padamchandra Kashyap
    200 180

    Item Code: #KGP-1932

    Availability: In stock

    हिमालय ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाएँ
    एक समय आया जब भारतीय संस्कृति के अजस खोट स्त्रोत  देवात्मा पुण्यात्मा नगाधिराज़ हिमालय के मानव को  असंस्कृत, प्लेच्छ, वृषल कहकर मुख्य धारा से बाहर हाशिये पर ला बिठा दिया गया । वह सच्चाई जानता था, अविचल रहा । पाषाण युग से आरंभिक वैविध्यपूर्ण अतीत के इस उत्तराधिकारी का सच और झूठ मापने का निजी पैमाना था । वह न कभी विजेता से भयभीत हो उसके आगे नतमस्तक हुआ और न पराजित को दुत्कारा, भुलाया । उसने इंद्र का सम्मान किया किंतु सहानुभूति वृत्र को दी और उसे भी देवता माना । पांडवों की जीत स्वीकार की, पर 'उद्दंड’ कहकर उन्हें दुर्दैव के हवाले कर दिया । 'शालीन' कौरवों को सराहा तथा 'मामा विष्णु' का प्यार दिलाया । महाभारत का कारण साग-सब्जी की वाटिका थी, तो सीता-हरण के पीछे उसका पकाया हुआ बड़ा' । सनुद्र-मंथन से निकला अमृत कहीं छलका, महाप्रलय के बाद मनु की नाव कहाँ उतरी और पुनः कृषि के लिए बीज कौन लाया, इसकी नई जानकारी दी । उसने मनुष्य को देवता बनते देखा और स्वयं देवता को मनुष्य बना, उसे खिलाव-पिलाया, नचवाया, साथ चलाया, चाकरी करवाई और दंडित भी किया, भले ही वह बडा देव विष्णु हो या महादेव शिव । महात्मा बुद्ध को देवराज इंद्र, अनाम राज्य की एक सनाम रानी को  परशुराम माता रेणुका तथा यमुना नदी को द्रोहणी घोषित किया ।
    सहज, सरल, बातचीत की भाषा में, हलके-फुलके रोचक ढंग से हिमालय संतति की देखी-सुनी बताता है लघु कथाओं का यह संग्रह, जिसमें वेद है, इतिहास-पुराण भी । इसमें तथ्य है, कथ्य है, विद्वता का दबाव नहीं ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Savyam Prakash
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-56

    Availability: In stock

    भारतीय श्रमिक तथा वंचित वर्ग के कथा-नायकों को जो सत्कार तथा पक्षधरता स्वयं प्रकाश की कहानियों में मिली है, वैसे उजले उदाहरण समकालीन हिंदी कहानी में गिने-चुने ही हैं । इन वंचित वर्गों के स्वपनों को दुःस्वप्नों में बदलने वाली कुव्यवस्था को यह कथाकार केवल चिन्हीत ही नहीं करता, बल्कि इसके मूल में बसे कुकारणों को पारदर्शी बनाकर दिखाता है तथा उस जाग्रति को भी रेखांकित करता है जो कि अंतत: लोक-चेतना का अनिवार्य तत्त्व है । और खास बात यह है कि इस सबके उदघाटन-प्रकाशन में यहाँ लेखक जीवन के हर स्पंदन और उसके आयामों पर कहानी लिखने को उद्यत दिखाई पाता है । अर्थात् सम्यक् लोकचेतना की 'साक्षरता' इन कहानियों में वर्णित जीवन में यथोचित पिरोई गई है ।
    कहानी की कला की गुणग्राहकता से लबरेज ये कहानियां विचारधारा के प्रचार और सदेश के 'उपलक्ष्य' को मिटाकर व्यवहार के धरातल तक पाठक को सहज ही ले जाती है । पात्रों की आपबीती को जगबीती बनाने का संकल्प यहाँ प्रामाणिक रूप में उपस्थित हुआ है।
    स्वयं प्रकाश द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं-'नीलकांत का सफर', 'सूरज कब निकलेगा', 'पार्टीशन', 'क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा ?', 'नैनसी का धूड़ा', 'बलि', 'संहारकर्ता', 'अगले जनम', 'गौरी का गुस्सा' तथा 'संधान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक स्वयं प्रकाश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Sangharsh Ki Pratimurti : Aang Saan Su Ki
    M.A. Sameer
    240 216

    Item Code: #KGP-1564

    Availability: In stock

    आंग सान सू की यह नाम एक ऐसी महिला का है, जिसने अपने असाधारण धैर्य और असीमित देशप्रेम की भावना से अपने देश बर्मा को 70 वर्ष की तानाशाही सैन्य सरकार से मुक्ति दिलाकर लोकतंत्र की स्थापना करके विश्च भर को नारी-शक्ति से परिचित कराया हैं। इस महान् महिला सू की का जीवन कठिन संघर्षों, विपरीत परिस्थितियों में भी अविचल रहने के गुण और तानाशाहों की कुटिल प्रताड़नाओँ से भरा रहा है।
    प्रस्तुत पुस्तक 'संघर्ष की प्रतिमूर्ति -- आंग सान सू की : जीवन दर्शन' में आंग सान सू की के जीवन से जुडी घटनाओँ व तथ्यों को सरस, सरल और रोचक भाषाशैली में कलमबद्ध करने का प्रयास किया गया है। अहिंसा को अपना प्रमुख अस्त्र मानने वाली आंग  सान सू की के जीवन पर आधारित यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठक को अवश्य रुचिकर लगेगी।

  • Chhajju Ram Dinmani Tatha Anya Kahaniyan
    Mohan Thapliyal
    60 54

    Item Code: #KGP-1929

    Availability: In stock

    छज्जूराम दिनमणि तथा अन्य कहानियाँ
    मोहन थपलियाल ऐसे कहानीकार हैं, जिनके लिखने की रफ्तार बहुत धीमी है, फिर भी कम छपने के बावजूद वह उल्लेखनीय कथाकार बने रहे है । इनकी कहानियों में ग्रामीण और शहरी परिवेश का अदभुत संयोजन दिखाई देता है । निम्न-मध्य और गरीब तबके के लोग इन कहानियों के मुख्य पात्र हैं, जिनके साथ समकालीन समाज की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों की ऐतिहासिकता भी बराबर मौजूद है । जहाँ तक कथ्य और शिल्प का ताल्लुक है, ये कहानियाँ अवसर पारंपरिक ढांचे का निषेध करती हैं। कहीं-कहीं एक नए डिक्शन की तलाश भी इनमें है- 'शवासन' इसी तरह का मंजर पैदा करती है । यथार्थ और फंतासी का ताना-बाना मोहन थपलियाल की कहानियों में एक अलग जादूगरी पैदा करता है, लेकिन यह जादूगरी किसी चकमे या चमत्कार को दिखाने के लिए न होकर पात्रों व परिस्थितियों की हकीका जानने में मददगार सिद्ध होती है । द्वंहात्पक दर्शन को पहचान देने वाली ये कहानियाँ व्यक्ति की निजी लडाई को समाज की व्यापक लडाई से जोडना अपना फर्ज समझती है । यह अलग बात है कि यह मकसद पाने के लिए ऊँचे-ऊँचे आदर्शों, जोशीले नारों और बड़बोले भाषणों का इस्तेमाल प्रत्यक्षत: लेखक ने कहीं नहीं किया है । शायद इस संदर्भ में लेखक बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की इस उक्ति --'हमने उनके दुख के नहीं, दुख के कारणों के बारे में बात की' --का सहारा लेकर आगे बढ़ना चाहता है । दुख के कारण और सामाजिक विसंगतियों की गहरी पड़ताल इस संग्रह की तमाम कहानियों में मौजूद है । बतौर बानगी ‘एक वक्त की रोटी' और 'छज्जूराम दिनमणि' देखी जा सकती है । दुख की घडी की टिक-टिक दोनों जगह समान है भले ही सामाजिक परिवेश बिलकुल भिन्न । लेकिन इस संग्रह को वहानियों का अंतिम लक्ष्य दुख और नैराश्य न होकर पाठक के मन में बेहतर भविष्य के लिए एक जीती-जागती उम्मीद भरना है ।
  • Dharati Mata, Pita Aakash
    Pushpa Sinha
    175 158

    Item Code: #KGP-228

    Availability: In stock

    धरती माता, पिता आकाश
    आज पर्यावरण प्रदूषण के कारण पर्यावरण असंतुलन हो रहा है। इससे न केवल जीवन प्रक्रिया बाधित हो रही है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक प्रगति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इतना ही नहीं अब पर्यावरण प्रदूषण के कारण प्राकृतिक आपदाओं की वृद्धि हो रही है, जिसके कारण प्रचुर मात्र में जन-धन की हानि हो रही है। भूमंडलीय ताप बढ़ रहा है, जिसके कारण हिमाच्छादित क्षेत्रों की काफी बर्फ पिघलने से भविष्य में समुद्रतल में वृद्धि होगी और महत्त्वपूर्ण तटीय क्षेत्र डूब जाएँगे। साथ ही पर्यावरण प्रदूषण से अब जलवायु परिवर्तन का खतरा मँडरा रहा है, जिसके कारण कई जीव विलुप्त हो जाएँगे और खाद्य संकट की आशंका भी जताई जा रही है। हो सकता है कि एक दिन भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण डाइनोसोरस की तरह पृथ्वी से मानव भी विलुप्त हो जाएँ।
    अतः इस पुस्तक में पर्यावरण को बचाने के लिए विभिन्न उपाय सुझाए गए हैं, जिनको अपनाकर हम पर्यावरण को संतुलित कर सकते हैं और भयंकर संकट से हमारा बचाव हो सकता है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chandrakanta
    Chandrakanta
    250 225

    Item Code: #KGP-716

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चन्द्रकान्ता ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पोशनूल की वापसी', 'आवाज़', 'चुप्पी की धुन', 'पत्थरों के राग', "अलग-अलग इंतजार', 'भीतरी सफाई', 'आत्मबोध', 'सिद्धि का कटरा' , 'लगातार युद्ध' तथा 'रात में सागर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चन्द्रकान्ता की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rajneeti Ki Shatranj
    Shanta Kumar
    375 338

    Item Code: #KGP-107

    Availability: In stock

    राजनीति की शतरंज
    मुख्यमंत्री-पद छोड़ने के बाद मेरा मन भरा हुआ था । ढाई साल की छोटी-सी अवधि में इतनी घटनाएं घटी थीं, इतने मीठे-कड़वे अनुभव प्राप्त किए थे कि वह एक अधूरे सफर की पूरी कहानी बन गई थी  ।
    लंबी सोच के बाद मैंने निर्णय किया कि मुझे पुस्तक लिखनी चाहिए । ढ़ाई साल में मैंने मूल्यवान अनुभव प्राप्त किए । एक असाधारण संघर्ष से गुजारा । कुछ अच्छे काम किए । गलतियां कीं । वे सारे अनुभव मेरे निजी नहीं हैं । वे समाज की संपत्ति हैं । एक राजनीतिक व्यक्ति उन्हें अपने तक रख सकता था, परंतु एक लेखक ऐसा नहीं कर सकता था । लेखक को ऐसा करने का अधिकार भी नहीं है ।
    इस पुस्तक को पाठक एक राजनीतिक व्यक्ति के संस्मरण ही न समझे । एक लेखक जीवन के लंबे  सफर में संयोग से या भूल से सत्ता की राजनीति की संकरी गली में चला गया था । वहीं जो देखा, पाया, खोया व अनुभव किया, वह उसके अंतर में उमड़ता-घुमड़ता रहा । मेरा लेखक उस सबको छिपा कर या दबाकर रख ही नहीं सकता था। मेरे ये संस्मरण-ये अनुभव समाज के हैं और मैं समाज को ही इन्हें अर्पित कर रहा हूँ।
  • Mere Saakshatkaar : Shiv Prasad Singh
    Shiv Prasad Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2024

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : शिवप्रसाद सिंह
    शिवप्रसाद सिंह स्वीकार करते हैं कि "मैं भाव और रूप को अपनी क्षमता पर बाँध सकने की कोशिश में कुछ भी उठा नहीं रखता । उनका यह भी मानना है कि सत्य तो साक्षात् देखा होने पर भी भाषा की गुंजलक में अँट नहीं पाता । अधूरे सपने पूरे मानसिक ताप में जब पिघलते हैं तो सही क्षण पहचानकर उन्हें भी में डालना, शीतल करना और फिर बाहर निकालकर चमक दे देना कलाकार की तपस्या है । उसकी डाई (साँचा) विश्व के किसी भी अन्य कथाकार-रचनाकार से मेल नहीं खाती, न तो कहीं से कोई सादृश्य ही रखती है, यहीं वैयक्तिक स्वतन्त्रता रचनाकार की निजी धरोहर और यही उसके मन की प्रतिबद्धता भी ।
    साक्षात्कारों में अक्सर प्रस्तुतकर्ता की अपनी समझ रूपायित होती है, पर जो पाठक प्रश्न के साथ जुड़े हो उन्हें उत्तर से भी जुड़ना लाजिम नही है । शिवप्रसाद सिंह कहते है कि प्रेमबंधन को चटकाकर तोड़ने पर गाँठ पड़ना अनिवार्य है । जुड़ना बिना ग्रंथि के संभव नहीं होता, पर इससे धीरे-धीरे धागा छोटा होता रहता है । उसे अगर पहली स्थिति में लाना हो तो गांठें खोलिए और तब वह धागा वस्तु-जगत को प्रेम की डोर से बाँध लेगा ।
    यह नई पुस्तक साक्षात्कारों पर केंद्रित है जिसमें उनके समवयस्क या नई पीढी, समकालीन पीढी से जुड़े रचनाकारों, पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर है । शायद इनमें से कोई प्रश्न आपका भी हो, तो उत्तर पर सोचिए--
  • Samkalin Sahitya Samachar January, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #January, 2017

    Availability: In stock

  • Jinavar
    Chitra Mudgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1998

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Suryabala
    Suryabala
    230 207

    Item Code: #KGP-418

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सूर्यबाला ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रेस', 'बिन रोई लड़की', 'बाऊजी और बंदर', 'होगी जय, होगी जय...हे पुरुषोत्तम नवीन !', 'न किन्नी न', 'दादी और रिमोट', 'शहर की सबसे दर्दनाक खबर, 'सुमिन्तरा की बेटियां', 'माय नेम इश ताता' तथा 'सप्ताहांत का ब्रेकफास्ट'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सूर्यबाला की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Hi ! Handsome (Paperback)
    Jaivardhan
    50

    Item Code: #KGP-7056

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 
  • Saamanya Paryavaran Gyan
    Rajendra Chandrakant Rai
    100 90

    Item Code: #KGP-9146

    Availability: In stock

    पर्यावरण अब एक जाना-पहचाना और जीवन से सम्बद्ध विषय है। पर्यावरण पर गंभीर और वैज्ञानिक ग्रंथ तो उपलब्ध हैं, किंतु सहज और सरल तरीके से पर्यावरण की समग्रता का परिचय कराने वाली एक ऐसी पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी, जो सर्वसाधारण के लिए उपयोगी हो। इस पुस्तक के प्रकाशन के पीछे यही दृष्टि मुख्य रूप से मौजूद रही है।
    विद्यार्थियों, गृहिणियों, ग्रामीणों, सामाजिव कार्यकर्ताओं, पर्यावरणों-प्रेमियों तथा गैरसरकारी संगठनों के लिए यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी, यह विश्वास है।
  • Khaadi Mein Polyester
    Rajendra Tyagi
    260 221

    Item Code: #KGP-144

    Availability: In stock

    यह अनायास  नहीं है कि पूरे संग्रह में कई रचनाएँ गाँधी जी पर  केंद्रित हैं । आज़ादी के बाद इस देश का जो राजनितिक अर्थशास्त्र रहा है, उसे समझने के लिए गांधी के नाम पर चले गांधीवाद के छद्म को समझना जरुरी है । गांधीवाद जीवनशैली बनने के बजाय एक ऐसी फिलॉसफी हो लिया है, जिसमें माल काटने की अब भरपूर गुंजाइश है ।
  • Pagdangi Chhip Gayi Thee : Chhattisgarh Par Ekagra Kavitayen
    Sanjay Alung
    200 180

    Item Code: #KGP-512

    Availability: In stock

    संजय अलंग की कविताएँ छत्तीसगढ़ के जनजीवन पर एकाग्र हैं। इस दृष्टि से ये अपने होने को अलग से देखने की सहज माँग करती हैं। पहले-पहल पाठ से गुजरते हुए ये कविताएँ छत्तीसगढ़ की आबरू को कई कोणों से उद्घाटित करती हैं। इनमें प्रकृति और मनुष्य के बीच का राग-विराग है, जिसे आधुनिक संदर्भ में देखा गया है। सांस्कृतिकबोध और जीवन की दुश्वारियों को समझती इन कविताओं में गहरी स्थानीयता के यथार्थ बिंब व चित्र हैं। वस्तु वर्णन की जगह भाव चित्रण की उपस्थिति आश्वस्त करती है। इसलिए मनुष्य के दुःख-सुख, आशा-हताशा और जय-पराजय को कविता में अनुभव किया जा सकता है। कविताओं में जिन शब्दों की सहज आवाजाही हुई है, उनमें लोकल और आब्जेक्ट का विरल संस्पर्श है। ये शब्द काव्यभाषा में अतिरिक्त इजाफा करते हैं। उदाहरण के लिए काँदो, गेंडी, गँवर, सरई, लुरकी, फुल्ली आदि। इसके अलावा कई अनूठे शब्द हैं, जो छत्तीसगढ़ की माटी के रंग में डूबे हैं और कविता को विश्वसनीय बनाते हैं। 
    संजय अलंग की कविताओं में सामाजिक, मानवीय सोच और दृष्टि की उजास का परिचय मिलता है। इसी रास्ते वे जनसामान्य की कठिनाइयों और कठोर सच्चाइयों को प्रत्यक्ष करते हैं, जिससे संघर्ष के रास्ते खुलते हैं। जीवन के सच को समय से जोड़ देने की कला भी इन कविताओं में सहज उपस्थित है बिना किसी अतिरिक्त शोर के। कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में संघर्षरत अस्मिताओं का विमर्श कविताओं की तहों में बावस्ता है जिसे धैर्य से पढ़ना अपेक्षित है। 
    संजय अलंग की कविताओं में भरोसे के स्वर विन्यस्त हैं। उनका अगला संग्रह इस जमीन के राग से अधिक परिपक्व होगा, ऐसी उम्मीद है।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 1
    Shrinivas Vats
    240 216

    Item Code: #KGP-307

    Availability: In stock

    गुल्लू कर्णपुर गांव के किसान विजयपाल का बेटा है। उसका असली नाम गुलशन है, पर सब उसे प्यार से ‘गुल्लू’ ही कहते हैं। उसकी उम्र है लगभग बारह साल। उसकी एक छोटी बहन है राधा। उसकी उम्र आठ साल है। परंतु वह स्कूल नहीं जाती। कारण, उनके गांव में कोई स्कूल नहीं है। उनकी मां को मरे आठ साल हो गए। राधा को जन्म देने के बाद मां चल बसी थी।
    गुल्लू की मां की मृत्यु के बाद उनके पिता ने पास के गांव की सविता नामक एक महिला से पुनः विवाह कर लिया। सौतेली मां घर में आई तो गुल्लू खुश था। उसे भरोसा था कि उसे और उसकी छोटी बहन को मां का प्यार मिल जाएगा। पर सौतेली मां बहुत कठोर स्वभाव की थी। शुरू में कुछ दिन तो ठीक रहा, पर बाद में उसने बच्चों को पीटना शुरू कर दिया। बात-बात में भला-बुरा कहती। यद्यपि किसान के सामने वह लाड़-प्यार का नाटक करती, पर उसके खेत में जाते ही वह बच्चों को डांटना शुरू कर देती।

    -इसी पुस्तक से
  • Doordarshan Evam Media Vividh Aayam
    Amar Nath 'Amar'
    260 234

    Item Code: #KGP-190

    Availability: In stock

    क्या टेलीविजन माध्यम आज अपनी राह से भटक चुका है? क्या यह अपना बुनियादी स्वरूप खोने लगा है? क्या साहित्य, कला, संगीत, नृत्य और लोकपरंपराओं की सांस्कृतिक धरोहर धुंधली होने लगी है? नहीं, ऐसा भी नहीं है। आज आम जनता इस सशक्त इलेक्ट्राॅनिक माध्यम को पब्लिक ब्राॅडकास्टर के रूप में ही देखना पसंद करती है। उनके मन में आज भी उत्सुकता बनी रहती है कि आखिर दूरदर्शन पर ऐसे कौन-कौन से कार्यक्रम हैं, जिन्हें देखकर हम मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानवर्द्धन भी करना पसंद करेंगे।
    इस पुस्तक में विविध पक्षों पर लेख के रूप में विद्वानों के विचार हैं जो दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों और अन्य माध्यमों की न केवल चर्चा करते हैं बल्कि उनकी समीक्षा भी करते हैं। ये लेख कई वर्षों से धीरे-धीरे एकत्र हुए और आज एक किताब के रूप में आपके समक्ष हैं।

  • Ved Kya Hain ?
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-8002

    Availability: In stock

    पुस्तक के प्रारम्भ में यह बताने की कोशिश की गई है कि वेद का अर्थ क्या है तथा वेदों का निर्माण कब हुआ । फिर चारों वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के बारे में अलग-अलग बताया है कि उनमें से प्रत्येक में क्या-क्या है। इसके साथ ही यह भी बताया है की प्रत्येक वेद के चार भाग हैं —संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद । फिर इन चारों भागों के बारे में विस्तृत चर्चा की गयी है।
    इसके उपरांत वेदांगों के बारे में जानकारी दी गयी है । वेदांग छह हैं — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंदशास्त्र । इन छह वेदांगों के बारे में पुस्तक में सविस्तार चर्चा की गयी है । 
    चारों वेदों के आलावा चार उपवेद भी हैं । ये हैं—आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्व वेद तथा स्थापत्य वेद । इनके बारे में भी आवश्यक जानकारी पुस्तक में दी गयी है ।
  • Goswami Tulsidas
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-138

    Availability: In stock

    तुलसीदास विश्व-काव्य गगन के प्रभावान नक्षत्र हैं । उनका काव्य 'स्वान्त: सुखाय' रचा गया है किंतु उससे संपूर्ण समाज का हित होता है । राम की कीर्ति का गान तुलसी ने जिस श्रद्धा और भक्ति के साथ किया है, उसका वर्णन अन्य किसी कवि ने नहीं किया है ।
    संस्कृत और ठेठ अवधी दोनों को मिलाकर तुलसी ने अपनी कृति 'रामचरितमानस' में अनूठा प्रयोग किया है । उनकी भाषा में लोकोक्तियों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। अब तक तुलसी के 'मानस' का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है ।
    भारतीय जनमानस के हृदय में राम के प्रति अपूर्व भक्ति और श्रद्घा उत्पन्न कर जनमानस के साथ तुलसी ने बहुत बडा उपकार किया है । उनकी यह कृति विश्व की अन्य काव्यकृतियों में सर्वोत्तम स्थान रखती है ।
    'रामचरितमानस' भारतीय जनता का कंठहार बना हुआ है। यह महाकाव्य विद्वानों और अल्पशिक्षितों को समान रूप से प्रिय है।
    यह ग्रंथ हमारी श्रद्धा और भक्ति का अनुपम प्रसाद है।

  • Ghar Nikaasi (Paperback)
    Nilesh Raghuvanshi
    70

    Item Code: #KGP-1316

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti (Paperback)
    Hemant Kukreti
    140

    Item Code: #KGP-7019

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Mere Saakshatkaar : Ramdarash Mishra
    Ramdarash Mishra
    275 248

    Item Code: #KGP-217

    Availability: In stock


  • Shesh Parichay
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-704

    Availability: In stock


  • Boo Toon Raaji
    Padma Sachdev
    150 135

    Item Code: #KGP-60

    Availability: In stock

    बू तूँ राजी
    मैं मूलत: कवयित्री हूँ । जो बात कविता से बहुत बडी हो जाती है, वह कहानी बनकर मेरे हाथों में छोटे बच्चे की तरह कुलबुलाने लगती है । कहानी की यह मेरी दूसरी किताब है । कभी-कभी लिखती हूँ कहानियाँ, वह भी उस वक्त, जब कहानियों के पात्र मेरे आँचल का कोना पकडे-पकडे मेरी गरदन तक आकर मुझे दाब लेते है । और ये पात्र जब मेरे जीवन का हिस्सा हो जाते हैं तब में लफ्जों के दोने में इन्हें फूलों की तरह सजाकर अपने पाठकों की झोली में डाल देती हूँ फिर वे इसका हार बनाएँ, फूलों को मंदिर के आगे सजाएँ या अपनी आँखों की पतली काजल की लकीर से पिरोकर अपने गले में डालें-ये उनकी खुशी है । मेरी कहानियों के पात्र मेरे घर के सदस्यों की तरह हो जाते हैं । मैं चाहती हूँ, आप भी इन्हें अपनी बैठक में बैठने का स्वान दें ।
  • Mahasagar (Paperback)
    Himanshu Joshi
    25

    Item Code: #KGP-1212

    Availability: In stock


  • Vikalang Vibhutiyon Ki Jeevan Gaathayen
    Vinod Kumar Mishra
    600 540

    Item Code: #KGP-38

    Availability: In stock

    विकलांग विभूतियों को जीवनगाथाएँ 
    विकलता महापुरुषों ने समाज के हर क्षेत्र, जैसे वैदिक रचना, साहित्य, कला, विज्ञान, आविष्कार, वीरता, राजनीति, खेल आदि में उत्कृष्ट प्रदर्शन करके दिखा दिया है कि वे समाज में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं । विकलांगों के संबंध में नीतियाँ और कार्यक्रम बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ये व्यक्ति अंतत: समाज में अपना बराबर का योगदान करने लायक बन सके ।
    ---जे०बी० सिंह, सदस्य सचिव, भारतीय पुनर्वास परिषद
    किसी भी सामाजिक समस्या के हल के लिए उपयोगी साहित्य को आवश्यकता होती है । ऐसा साहित्य समस्या के प्रति जनचेतना तो जगाता ही है, समाज को इसके हल के नजदीक ले जाने में भी सहायक होता है । पुस्तक में विकलांग विभूतियों के व्यक्तित्व की विवेचना के अलावा विकलांगता का इतिहास, विकलांगता के बारे में समय-समय पर बदलती धारणा, विकलांग विभूतियों की सफलता का राज भी वर्णित है ।
    ---डॉ० वीरेंद्र शर्मा, भारतीय विदेश सेवा ( अव०), पूर्व राजदूत
    पुस्तक में वर्णित अनेक महापुरुषों के बारे में हम काफी जानते रहे हैं, पर उनकी चर्चा करते समय हमें कभी ध्यान नहीं रहता है कि वे विकलांग थे । पुस्तक में दिखाया गया है कि किस प्रकार इन विभूतियों ने अपने जीवन में तमाम बाधाओं का सामना किया तथा पीड़ाएँ सहीं और अंतत: इन पीड़ाओं को ही पूँजी बनाकर सफलता हासिल की । इनमें से अनेक को समाज से कुछ नहीं मिला, पर उन्होंने समाज को जो दिया, वह अमूल्य था ।
    ---ए० वेंकट नारायण, कापी एडीटर, 'स्पान' अमेरिकन सेंटर
    नेत्र हीनों का कृतित्व इतना सुंदर क्यों होता है, विकलांग वैज्ञानिकों द्वारा किए गए आविष्कार इतने उपयोगी क्यों होते हैं, निरंतर ये प्रश्न उठते हैं और उत्तर मिलता है कि शिक्षा असंभव नहीं हो सकती, चाहे विकलांगता कितनी भी गंभीर क्यों न हो । इस पुस्तक में उपरोक्त निष्कर्ष लम्बे और गहन शोथ के बाद निकाले गए हैं ।
    ---के ० कानन, पत्रकार, 'हिन्दू'
  • Tinku Chala Nana Ke Ghar
    Anju Sandal
    60

    Item Code: #KGP-927

    Availability: In stock


  • Gazal : Ek Safar (Paperback)
    Noornabi Abbasi
    200

    Item Code: #KGP-465

    Availability: In stock

    ग़ज़ल: एक सफ़र
    उर्दू कविता की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा ग़ज़ल है। भारत में इसकी परंपरा लगभग पाँच सदियों से चली आ रही है। ‘वली’ दकनी इसका जनक माना जाता है। ग़ज़ल की जब शुरुआत हुई तो वह सौंदर्य और प्रेम (हुस्न-ओ-इश्क़) तक ही सीमित थी, लेकिन समय के साथ-साथ इसका दामन भी विस्तृत होता गया। फलस्वरूप, आज जीवन का कोई ऐसा विषय नहीं, जो ग़ज़ल में सफलतापूर्वक पेश न किया जा सकता हो, बल्कि पेश न कर दिया गया हो।
    उर्दू में ग़ज़ल की लोकप्रियता के बावजूद इस विधा का अनेक कवियों और आलोचकों ने विरोध किया। किसी को इसमें ‘संडास की बदबू’ महसूस हुई तो दूसरे ने इसे ‘अर्ध- सभ्य काव्यांग’ की संज्ञा दी और तीसरे ने तो इसकी ‘गर्दन उड़ाए जाने’ का फ़तवा भी सुना दिया। लेकिन इन प्रहारों से ग़ज़ल का पौधा न कुम्हलाया और न ही सूख पाया, बल्कि इसकी महक यथावत् बनी रही और आज भी फैली हुई है।
    कुल मिलाकर प्रस्तुत संकलन का ऐतिहासिक दृष्टि से अपना महत्त्व तो है ही। आशा है, उर्दू कविता के प्रेमियों में हमारे इस प्रयास का स्वागत होगा।
    ग़ज़ल की लोकप्रियता का एक कारण इसका विशिष्ट विषय प्रेम या इश्क़ रहा है और प्रेम-भाव वह है, जिससे कोई दिल ख़ाली नहीं। दूसरा यह कि ग़ज़ल के शे’र आसानी से याद हो जाते हैं और समयानुसार उनको पेश किया जा सकता है, ठीक उसी तरह, जैसे हिंदी में दोहे उद्धृत किए जाते हैं। वैसे तो उर्दू में क़सीदा, मर्सिया और मसनवी भी हैं, रुबाइयाँ और नज़्में भी लिखी जाती हैं, लेकिनग़ज़ल का अपना स्थान है।
    प्रस्तुत संकलन में सत्रहवीं सदी से अब तक यानी चार सदियों के लंबे समय में हुए लगभग डेढ़ सौ शायरों की ग़ज़लें प्रस्तुत की गई हैं। आशा है, उर्दू-प्रेमी हिंदी पाठकों में इसका यथेष्ट स्वागत होगा।
  • Datta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150

    Item Code: #KGP-202

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Priyamvada
    Usha Priyamvda
    300 270

    Item Code: #KGP-628

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषा प्रियंवदा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'जिंदगी और गुलाब के फूल', 'वापसी', 'छुट्टी का दिन', 'जाले', 'एक कोई दूसरा', 'झूठा दर्पण', 'सागर पार का संगीत', 'चांदनी में बर्फ पर', 'शून्य' तथा 'आधा शहर' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषा प्रियंवदा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें
  • Svasthya Evam Chikitsa
    Dr. Rakesh Singh
    300 270

    Item Code: #KGP-566

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य एवं चिकित्सा 
    पुस्तक में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर लगभग 41 लेख संकलित हैं। जो लोग यह कहते हैं कि चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम से ही पकाया जा सकता है, उनके लिए ये लेख चुनौती हैं और सिद्ध करते हैं कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा को उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को हिंदी माध्यम से पढाया जा सकता है।
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है। इन लेखों में अधिकांशत: इस बात की ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग कुछ दवाओं का नाम याद कर लेते हैं और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते हैं। उससे कितनी जानि हो सकती है, यह 'दवाओं के उपयोग में सावधानियाँ शीर्षक से स्पष्ट है। इसी प्रकार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारता से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है। 'हदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हृदय-रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इसमें अधुनातन चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है। अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-संपन्न है। कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्व एवं उनके सफ़ल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतीक है।
  • Haitrik (Paperback)
    Rajesh Ahuja
    140

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya (Paperback)
    Ravindra Kalia
    120

    Item Code: #KGP-430

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रवीन्द्र कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Mool Chanakya Niti
    Vigyan Bhushan
    250 225

    Item Code: #KGP-192

    Availability: In stock

    आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान् विभूति थे, जिन्होंने  अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री होने के साथ ही नीतिशास्त्रज्ञ के रूप में भी विश्वविख्यात हुए। इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवनानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह निःस्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।
    वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारु ढंग से संचालित करने के लिए चाणक्य द्वारा बताई गई नीतियाँ और सूत्रा अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। उनके सिद्धांतों में निहित अर्थों की महत्ता समझते हुए ही कई विश्वविद्यालयों और प्रबंधन संस्थानों में भी ‘चाणक्य नीति’ पर शोध और अध्ययन किया जा रहा है। ऐसे विलक्षण व्यक्ति के अमूल्य वचनों को सार-रूप में प्रस्तुत करती इस पुस्तक में ‘चाणक्य नीति’ और ‘चाणक्य सूत्र’ के साथ ही ‘अर्थशास्त्र’ को भी सम्मिलित किया गया है।


  • Kabir Ka Samagra Anbhai Sansar (2nd Part)
    Govind Rajnish
    1000 800

    Item Code: #KGP-489

    Availability: In stock

    संत कबीर भारतीय चेतना का ऐसा शिखर है जिसके सम्मुख शब्द और शब्दातीत नतमस्तक होते हैं। उनकी बानी ‘अनहद का अनुभव’ है। ऐसा अनुभव; जिसमें जीव, जगत् और परमात्मा की सघन अभिव्यक्ति है। कबीर की बानी साखी, सबद, रमैनी के अंतर्गत रखकर पढ़ने व विश्लेषित करने की सुदीर्घ परंपरा है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ में मर्मज्ञ आलोचक प्रो. गोविंद रजनीश ने इस परंपरा को संवधिर्त किया है।
    कबीर-काव्य के तीन स्रोत हैं—राजस्थानी, पंजाबी और पूरबी की प्राचीन पांडुलिपियाँ। इनके तुलनात्मक विवेचन द्वारा मूल व प्रामाणिक पाठ तक पैठने का यत्न किया गया है। कबीर के नाम से प्रचलित ‘बानियों’ और ‘क्षेपकों’ का तार्किक परीक्षण किया गया है। इससे कबीर-काव्य का आस्वाद दुगुना हो गया, ऐसा पाठक महसूस करेंगे।
    प्रो. रजनीश ने भावार्थ, पाठांतर और टिप्पणी के द्वारा कबीर के अनेक आयामों को उद्घाटित किया है। कबीर लोक में समाए संत-कवि हैं। उनसे संबंधित बहुतेरे तथ्य दंतकथाओं, जनश्रुतियों और अन्य शब्द-प्रपंच में ओझल होते रहे हैं। यहाँ एक प्रयास यह भी है कि ‘चिनगी’ को ‘राख’ से निकाल लिया जाए। तभी यह सिद्ध हो सका कि कबीर-काव्य समकालीन संदर्भों में एक नयी प्रासंगिकता अर्जित कर रहा है। झूठ, कपट, पाखंड के खिलाफ सदियों पहले गूँजे शब्द आज भी चुनौती और चेतावनी दे रहे हैं।
    ‘संसकिरत है कूप जल भाखा बहता नीर’ ऐसा कहने वाले कबीर की अंतरात्मा को थाहना बेहद कठिन रहा है। ‘ढाई आखर’ के बल पर पंडिताई को ललकारने वाले कालजयी कबीर के प्रामाणिक पाठ को अर्थ-विस्तार से पढ़कर पाठक निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे। शोध्कर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध पाठकों तक समानरूपेण उपयोगी। मानव जीवन के उन्नयन व परिष्कार के साथ भक्ति और अध्यात्म की रश्मियाँ बिखेरती कबीर बानी को विद्वान् लेखक ने ‘पुनः पाठ की सार्थकता’ प्रदान की है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ वस्तुतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है
  • Hindi Turkey Dictionary
    Sita Laxmi
    495 446

    Item Code: #KGP-2039

    Availability: In stock


  • Dr. Siddharth
    Kavita Surabhi
    260 234

    Item Code: #KGP-1950

    Availability: In stock

    डॉ० सिद्धार्थ
    'डॉ० सिद्धार्थ' लेखिका का पहला उपन्यास है। उनकी दृढ मान्यता है कि जहाँ समाज में विडंबनाएं, विसंगतियां, अपराध, पीडा, विकृतियाँ और भोगवादी  राक्षसी अपसंस्कृति है, वहीं डॉ० सिद्धार्थ जैसी निर्मापाधर्मा शक्तियां भी हैं। सच्चे, निर्मल और सात्यिक जीवन में बहुत आकर्षण है; किंतु उसे अंगीकार करने का मूल्य असाधारण है । अत: एक शाश्वत प्रश्न हमारे सामने है कि क्या कोई व्यक्ति धर्म की राह पर चलकर भी सामाजिक दृष्टि से सफल हो सकता है ?
    शिष्या  के रूप से दामिनी, अपने गुरु के स्नेह का सुख पाती हे। समय के साथ डॉ० सिद्धार्थ की बौद्धिकता, उसकी प्रतिभा को ही नहीं, उसकी आत्मा को भी सँवारती है । वह समझ पाती है कि चमक और दिव्यता में अंतर होता है । लौकिक सफलताओं की चमक हमारी आँखों को चौंधियाती है और आत्मिक विकास हमें दिव्यता से भर देता है। अध्यापक की बुद्धि से उच्च है उसका विवेक, और विवेक से उच्चतर  है उसका आचरण । आचार्य वही है, जो आचरण को शुद्ध ही नहीं दिव्य भी कर दे । डॉ. सिद्धार्थ का चरित्र इन सिद्धांतों का मूर्तिमंत रूप है ।
  • Devtaon Ki Ghaati
    Dronvir Kohli
    60 54

    Item Code: #KGP-1919

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    परीक्षा की घड़ी
    कोई-कोई यही बडी मनहूस होती है । ऐसी ही एक घडी आई थी हिमाचल की 'देवताओं की घाटी' में, जब वहीं के सीधे-सादे, भाले-भाले, निरीह प्राणियों पर, सचमुच, मुसीबत के पहाड़ टूटे थे।
    यह डरावनी वेला भुलाए नहीं भूलेगी इस घाटी के लोगों को । और दुनिया भी याद करेगी कि इन असहाय लोगों ने कितने धीरज से इतनी बड़ी विपदा का सामना किया ।
    बड़े जीवट के लोग है 'देवताओं की घाटी' के निवासी ।
    'देवताओं की घाटी' और उस घाटी में आई उस भयंकर विपति से जूझने का यह अद्भुत सच्चा वृत्तांत मैंने  बालय-बालिकाओं के लिए विशेष रूप से लिखा है ।
    -द्रोणवीर कोहली

  • Nihatthi Raat Mein
    Indira Mishra
    150 135

    Item Code: #KGP-9134

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  • Yeh Dilli Hai
    Raj Budhiraja
    125 113

    Item Code: #KGP-1961

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    मैं इतना कहना चाहुँगी कि मैंने दिल्ली में रहकर सुखद-दुखद और त्रासद अनुभव किए हैं लेकिन मैंने सुखद अनुभवों को ही अभिव्यक्ति प्रदान की है । अभी तक मैंने दिल्ली पर तीन पुस्तके लिखी हैं-'दिल्ली अतीत के झरोखे से, 'हाशिये पर' और 'हाशिये पर दिल्ली' । ऐसी दिल्ली की चारों दिशाओं से सुख व्यापता रहे । इन्हीं शब्दों के साथ मैं ये पुस्तक (जिसका नामकरण मैंने खुद किया है) अपने दिल्लीवासियों को सौंपने का प्रयास करती हूँ। सस्नेह आपकी
    --राज बुद्धिराजा

  • Ghane Kertarutale
    N.E. Vishwanath Iyyer
    140 126

    Item Code: #KGP-9118

    Availability: In stock

    निबंधकार के रूप में लेखक का राष्ट्रीय व्यक्तित्व हर रचना में अपनी छाप छोड़ता है। यह उस सृजनधर्मी राष्ट्रीय व्यकिततव के अनुरंजक छाप की गुणवता होती है कि मोटे रूप में शुष्क समझा जाने वाला यात्रा-वर्णन सरल ललित निबंध की कलाभंगिमा में प्रस्तुत मिलता हैं
    यात्रा-वर्णन के अतिरिक्त इन निबंधों में संस्करण, स्मृति-तर्पण, वर्णन, पत्र, रिपोर्ताज और संवाद-शिल्प प्रयुक्त हुआ है। विधा कोई भी हो, लेखक का लक्षित विधेयक मूलतः एक है और वह है राष्ट्रीय समन्वयात्मक विशालता। इसके लिए व्यष्टि के छोर से समष्टि की खोज-खबर ली जाती है और साहित्य चिंतन अथवा आत्म-चिंतन से राष्ट्रीय चिंतन को संपृक्त करते हुए लेखक प्रादेशिक छवियों, रंगारंग सभ्यताओं और नए अभ्युत्थान के प्रतिष्ठानी आकर्षणों को संवेदनीय शिल्प में विस्तार के साथ रेखांकित-चित्रित करता है।
    —डाॅ. विवेकीराय
  • Jeet Ki Raah
    Swed Marten
    200 180

    Item Code: #KGP-857

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    पुस्तक में स्वेट मार्डन जैसे महान् व्यक्तित्व के आधुनिक विचारों के साथ भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से प्रेरित विचारों का मिला-जुला संगम है, ठीक गंगा-यमुना की भाँति पावन व पवित्र । एक जोर से विद्धान् स्वेट मार्डेन की विचाररूपी गंगा एवं दूसरी ओर से भारतीय विचारों की सरिता यमुना का जल आकर मिल गया है इस 'जीत की राह' में।
    इस पुस्तक का वास्