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Books

  • grid
  • Huzoor Darbar
    Govind Mishra
    375 338

    Item Code: #KGP-315

    Availability: In stock


  • Sikhon Ka Itihaas (Paperback) (Two Valumes)
    Khushwant Singh
    745

    Item Code: #KGP-268

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Das Pranidhini Kahaniyan : Akhilesh
    Sushil Sidharth
    500 450

    Item Code: #KGP-9217

    Availability: In stock

    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है वे हैं-चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, शृंखला तथा अँधेरा । 
  • Mere Saakshatkaar : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    195 176

    Item Code: #KGP-739

    Availability: In stock


  • Hamara Kshitij
    Sudhakar Adib
    180 162

    Item Code: #KGP-7841

    Availability: In stock


  • Lauhpurush Sardar Vallabhbhai Patel-Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    80

    Item Code: #KGP-1410

    Availability: In stock

    सरदार वल्लभभाई पटेल
    सरदार वल्लभभाई पटेल को भारत के इतिहास में लौहपुरुष के रूप में जाना जाता है, जबकि विदेशी इतिहासकारों ने उनकी तुलना बिस्मार्क से की है। वे कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति थे और परिस्थिति फिर चाहे जैसी भी रही हो, अपने कर्तव्य का निर्वाह करने से नहीं चूके। इस संदर्भ में वह घटना याद आती है, जब वे अदालत में अपने मुवक्किल की पैरवी कर रहे थे कि तभी उन्हें उनकी पत्नी की मृत्यु से संबंधित तार मिला। उन्होंने वह तार पढ़ा और उसे अपनी जेब में रख लिया तथा मनोयोग से अपने कर्तव्यपालन में लगे रहे। उनका विचार था कि यदि वे अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते तो एक बेगुनाह को सजा हो जाती।
    सरदार पटेल की सहनशक्ति बड़ी अद्भुत थी। जब उनकी आयु केवल 9 वर्ष थी तो उनकी बगल में एक फोड़ा निकल आया था। फोड़ा पक गया था, जिस कारण उसमें मवाद बन गयी था। इस फोड़े के कारण उन्हें असहनीय पीड़ा होने लगी थी। ऐसे में उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए उस फोड़े को लोहे की गर्म सलाख से फोड़ दिया। इस आयु में इस तरह के साहस व सहनशक्ति के उदाहरण बहुत ही कम देखने को मिलते हैं।
    बाल्यावस्था से ही सरदार पटेल में निर्णय लेने की बड़ी अद्भुत क्षमता थी और उन्होंने जीवन में जो भी निर्णय लिए, उनमें सफलता भी प्राप्त की। पराधीन भारत में उन्होंने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें निडर, साहसी तथा वीर बनने का पाठ पढ़ाया, जबकि स्वतंत्रा भारत में उन्होंने देशी रियासतों को एकीकृत करने का जो गौरवशाली कार्य किया, वह हमारे सामने एकीकरण की आदर्श मिसाल है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल: जीवन दर्शन’ में सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी घटनाओं एवं तथ्यों को सरस, सरल एवं रोचक भाषा में समाहित करने का प्रयास किया गया है।
  • Chhor (Paperback)
    Bhairppa
    125

    Item Code: #KGP-7043

    Availability: In stock

    छोर
    कुशाग्र बुद्धि अमृता ने चाची के कुचक्र की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया और अपनी पढ़ाई-लिखाई में ही व्यस्त रही। कुछ समय उपरांत पिता भी स्वर्गवासी हुए और तब घर-परिवार तथा व्यापार पर चाची का वर्चस्व स्थापित हो गया। अमृता की संपत्ति धीरे-धीरे और भीतर ही भीतर चाची तथा उसके बच्चों की ओर खिसकने लगी। अमृता की संपत्ति पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चाची ने अमृता को बहला-फुसलाकर उसका ब्याह अपने छोटे भाई से करा दिया।
    हालात को स्वीकार करके मजबूर अमृता एक कॉलिज में अध्यापन करने लगी और अपने दो बच्चों के साथ बागान से दूर पिता की एक पुरानी कोठी में रहने लगी। वहीं उसकी मुलाकात वास्तुकार सोमशेखर से हुई जो बंबई छोड़कर मैसूर आ गया था। दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर आकृष्ट होने लगे। इस बीच अमृता को चाची के कुचक्रों का भी आभास होने लगा। परिस्थितियों ने उसके स्वभाव में अजीब चिड़चिड़ापन, जीवन के प्रति अरुचि, कुंठा और विकर्षण को जन्म दिया। उसे जीवन बेमानी लगने लगा किंतु बेटों के प्रति मोह और सोमशेखर के प्रति अस्पष्ट आकर्षण उसे बार-बार आत्महत्या की कगार से लौटा लाता। अमृता की जिंदगी में जीवन और मृत्यु की ऊहापोह, उसकी कुंठा ही उसकी जिंदगी के दो छोर हैं जिनके बीच वह बार-बार झोंटे खाती रहती है।
    यह उपन्यास रोचक होने के साथ-साथ एक विशेष मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ पैदा करता है। जो यथार्थ के साथ-साथ विचित्र भी हो गई हैं। यहाँ है भैरप्पा की कल्पनामय यथार्थ शैली का अद्भुत चमत्कार!
  • Jalatarangon Ki Atmakatha
    Anupam
    50 45

    Item Code: #KGP-9037

    Availability: In stock


  • Parvatiye Lokkathayen
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1935

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sainikon Ki Veergaathayen
    Ram Kumar Bhramar
    350 315

    Item Code: #KGP-526

    Availability: In stock

    हिंदी में युद्ध-कथाओं के पाठक बहुत हैं, किन्तु युद्धकथाओं की संख्या उतनी नहीं है । कारण संभवत: यह  कि भारतीय मानस और उसका लेखक, युद्ध अथवा घटना क्रो लेकर स्तब्धता-बोध की जितनी अनुभूति करता है, उतनी उस बोध को दस्तावेजी तौर पर सुरक्षित करने में रुचि नहीं ले पाता । इस अरुचि का कारण यह भी हो सकता है कि वह संभवत: युद्ध-कथा को साहित्य का बहुत महत्वपूर्ण अंग नहीं मानता । पर मुझे लगता है कि साहित्य के बहुआयामी विधा-रूप में युद्ध-कथाओं का भी अपना एक महत्त्व है और उनसे राष्ट्रीय-बोध के साथ-साथ भूलों का भी इतिहास दर्ज होता रहता है । मैं जब-जब इस विचार और दृष्टि से उद्वेलित हुआ हूं, तब-तब मैंने इन रचनाओं को रचा । यह 'सामयिक साहित्य' होता है, मैं यह भी नहीं मानता, क्योंकि स्नेह-संबंधों में यदि शाश्वतता होती है तब युद्ध की पीडा अथवा राष्ट्रभक्ति की शहीदी में भी एक शाश्वत सत्य छिपा है  यह राष्ट्र-पूज़न है, अत: इस पूजन के फूल अपने पाठक-बंधुओं के लिए समर्पित करता हूं-शब्दपुष्पों का यह संग्रह देशभक्ति की महक देता रहे—इसी कामना के साथ ।
    —रामकुमार भ्रमर
  • Aaj Aur Abhee
    Ramesh Chandra Shah
    220 198

    Item Code: #KGP-406

    Availability: In stock

    ...डायरी इतनी अंतरंग होती है कि आप खुद जैसे अपनी आत्मा से बात कर रहे हों। तो इसे छपने के लिए क्यों दे देते हैं। आखिर क्या बात है कि हमें जरूरी लगता है कि यह छपना चाहिए। ...रमेशचन्द्र शाह जी की डायरी के कुछ अंश पढ़ लेने के बाद मुझे लगा कि जो मैं आगे लिखने वाला था, वह अब नहीं लिखूँगा। कारण, कि इतना अंतरंग है यह। सुनिए 5 मार्च, 1982 की डायरी का एक अंश: 
    आड़ू के फूलों की गंध..., नीबू की पत्तियों की गंध,...कालिका मंदिर के पिछवाड़े नारंगी की गंध, लकड़ियों के पूले बाँधते हुए, चिरे हुए रामबाँस की गंध,...किलेखाई के निंगाले की गंध,...हनुमान मंदिर में साधुओं के चिलम की गंध,...चमेली और चरणामृत की गंध,...बाबू की जेब से तंबाकूमिले प्रसाद की गंध,...जाने कितनी और तरह-तरह की गंध...
    मुझे लगता है कि हमारी पूरी जिंदगी और आसपास की जिंदगी की सारी जितनी महकें हो सकती हैं,...उन महकों को...डायरी की अंतरंगता के साथ जब वे आती हैं तो मुझे लगता है कि जैसे हमारा अपना भारत, हमारी अपनी धरती, हमारा अपना घर, हमारा अपना खेत, हमारा अपना मंदिर और हमारे अपने फल एकाएक महकने लगते हैं। कुल दस पंक्तियाँ इतनी गहरी बात कह जाती हैं कि लगता है कि समूची पूरी पहचान ये छोटी-छोटी सी पंक्तियाँ ही दे देती हैं। ...डायरी कभी-कभी वह बात कह जाती है जो बात और कोई नहीं सह सकता। लेकिन डायरी का कागज कहीं न कहीं वह बात सह लेता है और सहने के साथ-साथ आपको बर्दाश्त करने का धीरज भी दे देता है। मुझे लगता है कि यह भी डायरी का एक बहुत बड़ा सार्थक पक्ष है। 
    -कमलेश्वर (समकालीन साहित्य समाचार, जनवरी, 2007)
  • Mere Saakshatkaar : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    350 280

    Item Code: #KGP-616

    Availability: In stock


  • Suraj Kiran Ki Chhanv
    Rajendra Avasthi
    100 90

    Item Code: #KGP-SKCM

    Availability: In stock


  • Mushkil Kaam (Paperback)
    Asghar Wajahat
    90

    Item Code: #KGP-1454

    Availability: In stock

    मुश्किल काम
    लघुकथा के संबंध में फैली भ्रांतियों को तोड़ती असग़र वजाहत की लघुकथाएँ अपनी विशिष्ट शैलियों तथा व्यापक कथ्य प्रयोगों के कारण चर्चा में रही हैं। वे पिछले पैंतीस साल से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ इन अर्थों में अन्य लघुकथाओं से भिन्न हैं कि उनकी लघुकथाएँ  किसी विशेष शैली के सामने समर्पण नहीं करती है। पंचतंत्र की शैली से लेकर अत्याधुनिक अमूर्तन शैलियों की परिधि को अपने अंदर समेटे असग़र वजाहत की लघुकथाएँ पाठक का व्यापक अनुभव जगत् से साक्षात्कार कराती हैं। प्रस्तुत लघुकथाएँ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विषयों तक फैली हुई हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता इन लघुकथाओं की एक विशेषता है, जो किसी प्रकार के अतिरिक्त आग्रह से मुक्त है। इन लघुकथाओं के माध्यम से मानवीय संबंधों, सामाजिक विषमताओं और राजनीतिक ऊहापोह को सामने लाया गया है।
    निश्चित रूप से प्रस्तुत लघुकथाएँ हिंदी लघुकथा की विकास-प्रक्रिया को समझने में भी सहायक सिद्ध होती हैं।
  • Dek Par Andhera
    Hira Lal Nagar
    400 360

    Item Code: #KGP-402

    Availability: In stock


  • Mera Jamak Vapas Do
    Vidya Sagar Nautiyal
    350 315

    Item Code: #KGP-393

    Availability: In stock


  • Har Baar Musaphir Hota Hoon
    Pratap Sehgal
    280 252

    Item Code: #KGP-611

    Availability: In stock

    हर बार मुसाफिर होता हूं' के यात्रा-वृत्तांत निरे वृतांत नहीं हैं। निरे वृतांत कभी भी यात्रा-साहित्य का हिस्सा नहीं बन सकते। यह यात्रा-वृतांत कभी इतिहास की गलियों से गुज़रते हुए आपको अतीत के किसी पन्ने से जोड़ देते हैं तो कभी भूगोल में प्रवेश करते हुए आपको उसी जगह ले जाकर खड़ा कर देते हैं, जिस जगह का जिक्र लेखक कर रहा है। कभी आप उस जगह के लोक के रीति-रिवाजों से रू-ब-रू होते हैं, कभी वहां के सांस्कृतिक घटकों का तो कभी वहीं की प्राकृतिक संपदा और सौंदर्य का हिस्सा बन जाते हैं।
    विविध विधाओं में लेखन करने वाले लेखक प्रताप सहगल एक घुमंतू जीव भी हैं, यह जानकारी इन यात्रा-वृतांतों को पढ़कर पुख्ता होती है। वन वृत्तातों में कहीं कविता, कहीं नाटक और कहीं कथा का रंग मिलने लगना कोई अजूबा नहीं बल्कि इसे लेखक का शैल्पिक वैशिष्टय ही मानना चाहिए।
    ये यात्रा-वृत्तात इसलिए भी विशिष्ट हो जाते है कि लेखक वर्णित स्थान, समय और वहीं समाहित सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का रूपांकन किनारे या किसी सिरे पर खडा होकर नहीं करता। यह सीधे-सीधे स्थान, समय और परिवेश में दाखिल होकर उसका हिस्सा बनकर जीता है और खुद की भी वहीं शामिल कर लेता है। अपने इन्हीं अनुभवों को पाठक के साथ साझा करने की इच्छा ही लेखक को शब्द का सहारा लेने के लिए विवश करती है। और इसी बहाने और तमाम सार्थक यात्रा-वृत्तांतों की तरह से यह यात्रा-वृत्तांत भी हिंदी के वृहद यात्रा-साहित्य के द्वार पर दस्तक देते हुए आपके हाथ में है।
  • Aapki Pratiksha
    Shyam Vimal
    270 243

    Item Code: #KGP-555

    Availability: In stock

    आपकी प्रतीक्षा
    सच भी कई बार कल्पना को ओढ़कर नई भंगिमा अपनाकर कागज की पीठ पर सवार होने को आतुर हो उठता है। अथवा यूं भी कहा जा सकता है कि कल्पना कभी-कभी सच-सी भ्रमित करने लगती है और रिश्ते बदनाम होने लगते हैं।
    जैसे होता है न, मरे हुए कीट-पतिंगे को, गिरे हुए मिठाई के टुकड़े को समग्रतः घेरे हुए लाल चींटियां आक्रांत वस्तु की पहचान को भ्रमित कर देती हैं। यदि ऐसा भ्रम मृत कीट या मिठाई-सा इस रचना से बने तो समझ लो आपने रचना का मज़ा लूट लिया।
    उपन्यासकार को आश्वासन दिया गया था पत्रा का सिलसिला जारी रहने का इस वाक्य के साथ--
    ‘यह वह धारा है जो क्षीण हो सकती है, पर टूटेगी नहीं।
    परंतु वह सारस्वत धारा तो लुप्त हो गई!
    क्या प्रतीक्षा में रहते रहा जाए?
    अंजना की दूसरी जिंदगी कैसे निभ रही होगी?’
  • Saarth
    Bhairppa
    400 360

    Item Code: #KGP-835

    Availability: In stock

    सार्थ
    सार्थ अर्थात् व्यापारियों का काफिला । नागभट्ट नामक एक वैदिक अपने राजा द्वारा एक सार्थ के साथ उच्च अध्ययन के लिए भेजा जाता है । कथा के वाचक नागभट्ट द्वारा आठवीं शती के भारत का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया गया है । उस समय वैदिक धर्म पतनोन्मुख था, भले ही शकरचार्य, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, भारती देवी आदि जैसी विभूतियां उसके प्रचार-प्रसार में लगी थीं। दूसरी ओर बौद्ध धर्म अपने उत्कर्ष पर था । उसके आचार्य धर्म-प्रचार के लिए स्तूपों, चैत्यों और विहारों के निर्माण में जुटे थे । साथ ही, योग साधना और तंत्र साधना में भी आकर्षण बना हुआ था । भारत के पूर्वी भाग में इस्लाम धर्म तलवार की नोक से अपने धर्म और संस्कृति की लकीर खींच रहा था। डॉ. भैरप्पा ने तत्कालीन समाज और धर्म का सजीव चित्रण अपनी पैनी लेखनी से अपनी विशिष्ट शैली में इस उपन्यास में किया है । संभवत: साधारण जन उस समय भी ऊहापोह की उसी स्थिति में था, जिसमें आज अपने को पा रहा है । इसी कारण पाठक इस उपन्यास को एक बार प्रारंभ करके छोड़ नहीं पाएगा, जब तक कि इसे समाप्त न कर ले ।

    डॉ. भैरप्पा की यह विशिष्ट ऐतिहासिक कृति 'सार्थ' अब आपके सन्मुख प्रस्तुत है ।
  • Chulbuli Kavitayen
    Nisha Bhargva
    200 180

    Item Code: #KGP-9042

    Availability: In stock


  • Turn Your Life Around With Reiki (Self-Help)
    Anil Bhatnagar
    525 473

    Item Code: #KGP-7826

    Availability: In stock

    Reiki is an ancient Japanese energy-healing system of remarkable ease and efficacy that heals at the very causal level. The Reiki energy can be felt by the sender and receiver both, and when photographed by scientists through Kirlian photography it appears to be a laser-like beam emanating from the practitioner’s hands.
    Working from the idea that all human problems and diseases result from the illusion of separateness, Reiki re-establishes our lost connection with ourselves and the oneness that surrounds us in a multiplicity of forms. Reiki can be used to heal yourself and others. When practiced regularly, Reiki begins to bring an all round change in life’s quality and does not leave any aspect of life untouched with its blessings.
    The uses and applications of Reiki are limited only by our own imagination, which is why it is being acquired and practiced by doctors, engineers, healing practitioners, masseurs, physical therapists, psychologists, students, house wives, executives, corporate leaders, people who are interested in personal growth and by people who are simply curious.
  • Bahuvachan
    Ramesh Chandra Shah
    175 158

    Item Code: #KGP-9053

    Availability: In stock


  • Lauh Kapaat Ke Pichhe
    Shravan Kumar Goswami
    60 54

    Item Code: #KGP-1971

    Availability: In stock

    हर जेल के आगे एक अभेद्य लौहकपाट होता है । इसके पीछे एक दुनिया होती है, जो हमारी अपनी ही दुनिया का हिस्सा होते हुए भी, इस दुनिया से बिलकुल स्वतन्त्र एक अलग ही दुनिया होती है । इसके अपने कायदे-कानून होते हैं । यहां जो कुछ भी होता है, उसकी खबर किसी को भी नहीं मिलनी । इसकी चिंता न तो खोजी पत्रकारों को सताती है और न हमारी सरकारों को । इसकी सुधि न तो विरोधी दल के लोग लेते हैं और न न्यायाधीश । 'लौहकपाट के पीछे" वास्तव में जो होता है, उसकी सही जानकारी इसके भीतर रहने वाले बंदियों को भी नहीं मिल पाती है ।
    इस पुस्तक के लेखक ने किसी की हत्या नहीं की थी, उसने किसी के साथ बलात्कार भी नहीं किया था, उसने कोई डकैती भी नहीं की थी और न उसने किसी सरकार का तख्ता पलटने का षड़यन्त्र ही किया था, फिर भी बिहार सरकार ने श्रवणकुमार गोस्वामी को अपने विश्वप्रसिद्ध हजारीबाग के केंद्रीय कारागृह में कुछ समय के लिए कैद रखा था । अपने कारावास के दौरान लेखक ने जेल-जीवन को अत्यन्त समीप से केवल देखा ही नहीं, बल्कि उसे भोगा भी है । अपने इन्हीं अनुभवों का जो विवरण लेखक ने इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है, वह केवल चौकानेवाला ही नहीं, अपितु सभ्य संसार के मुँह पर एक करारा तमाचा भी है ।
    मनोविज्ञान, अपराधशास्त्र, समाजशास्त्र तथा संस्मरण के चौराहे पर खडी यह पुस्तक एक ऐसी विरल कृति है, जो लेखक के उपन्यासों के समान ही अत्यन्त प्रवाहपूर्ण एवं रोचक है ।
    'लौहकपाट के पीछे' उन सभी व्यक्तियों की आंखें खोलने वाली एक अत्यन्त उत्तेजक, उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक है, जो 'मनुष्य और समाज' के बारे में निरन्तर सोचते हैं और मनुष्य के'कल्याणमय भविष्य' के लिए चिन्तित भी रहते हैं। 
  • Ek Svich Tha Bhopal Mein
    Narendra Nagdev
    215 194

    Item Code: #KGP-379

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal (Paperback)
    Bhagwan Das Morwal
    150

    Item Code: #KGP-476

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भगवानदास मोरवाल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bachcho Achchhe Bano
    Prakash Narayan Natani
    200 180

    Item Code: #KGP-317

    Availability: In stock


  • Is Daur Mein Hamsafar
    Amar Goswami
    350 315

    Item Code: #KGP-1999

    Availability: In stock

    इस दौर में हमसफ़र
    अमर गोस्वामी उन थोड़े से कथाकारों में से है जिनकी कहानियों पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते है कि यह कहानी अमर गोस्वामी ही लिख सकते थे । आज के दौर में जबकि रचनाएँ ही नहीँ, लेखक भी एक-दूसरे की 'जेरोक्स कापियों' से तबदील हो रहे है, अमर गोस्वामी की यह पहचान और कूवत-या कहिए कि रचनात्मक सामर्थ्य काबिलेगौर है । इस सामर्थ्य के बूते ही अपनी लंबी कथा-यात्रा से कभी रचना पर उनका विश्वास डिगा नहीं और वे उन हड़बडिए लेखकों की पाँत में शामिल नहीं हुए, जो सिर्फ चर्चित होने के लिए लिखते है और अपने आसपास की हर चीज, हर संबंध को 'कैश' कर लेते के लिए उतावले दिखते है ।
    इन बातों की ओर ध्यान दिलाना इसलिए जरूरी लगा क्योंकि  अमर गोस्वामी का पहला उपन्यास ‘इस दौर में हमसफ़र' उनकी इस लंबी और धीरज-भरी यात्रा का ही स्वाभाविक फ़ल है-और  अमर जी का पहला उपन्यास होते हुए भी, गंभीर चर्चा और विश्लेषण की माँग करता है। ऊपर से देखने पर 'इस दौर में हमसफ़र' भले ही प्रेमचंदीय वर्णनात्पक शैली में लिखा उपन्यास नजर आए, पर थोडा भीतर उतरते ही समझ में आ जाता है फि यह सिर्फ एक उपन्यास ही नहीं, हमारे दौर की एक गहरी और स्तब्ध कर देने वाली 'एक्स-रे पड़ताल' भी है । यह दीगर बात है कि यह लिखा गया है इतनी जानदार भाषा और पुरलुत्फ अंदाज में कि जब तक आप इसे खत्म नहीं कर लेते, यह आपको चैन  नहीं लेने देता । बल्कि उपन्यास खत्म होने के बाद भी लंबे अरसे तक पाठकों का 'हमसफ़र' बना रहता है ।
    इसकी वजह शायद यह है कि एक उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी नई कथा-प्रविधियों के दास नहीं है और उन्हें उथले रूप से जैसे-तैसे जहाँ-तहाँ टाँक लेने को हरगिज पसंद नहीं करते । उनके यहाँ जो कुछ है, वह अपने ठेठ मौलिक अंदाज में है और अमर गोस्वामी का निहायत अपना है । इसीलिए वे बगैर दिखावटी स्त्री-विमर्श के शोर-शराबे के, अनन्या के रूप से हमें एक ऐसी विलक्षण और शक्तिशाली स्त्री से मिलवाते हैं जो अपनी बेबनाव शख्सियत से अति आधुनिक ही नहीं, 'नई पीढी की नई नारी’ लगती है, जिसकी धमक आगे आने वाले युगों में और ज्यादा साफ सुनी जा सकेगी । अनन्या के मित्र और सहयात्री के
    रूप में अनिरुद्ध बागची का 'विचलन' या हार, सिर्फ उसी की हार नहीं, आधुनिकता के उन तमाम नकली प्रत्ययों की हार भी है जो आधुनिकता को सिर्फ 'देह-भोग के सुख' तक सीमित कर देना चाहते हैं । अनन्या  के माई मधुसूदन के चेहरे में मुझे तो जगह-जगह स्वयं अमर गोस्वामी का दर्द से तिलपिलाता चेहरा नजर आया । यह दीगर बात है कि मधुसूदन की कहानी अपनी है, और वह अमर जी की नहीं, अपनी ही राह पर आगे बढ़ता दिखाई देता है ।
    ‘इस दौर में हमसफ़र' में आधुनिकता की 'विकृत' और 'रचनात्मक' दोनों ही शक्लें है और अपने पुरे विश्वसनीय रूप से है । इस लिहाज से यह एक ऐसा उपन्यास भी है जिसे कई किस्म के 'कंफ्यूज़न' और मतिभ्रम-भरे आज के समाज से सही दिशा की ओर  इशारा करने वाली एक पहल के रूप में भी देखा जा सकता है । हाँ, यह जरूर है कि अमर गोस्वामी कहीं-कहीं ज्यादा खुल गए है और जहाँ सिर्फ इशारों से काम चल सकता था, वहाँ भी 'रस' लेते नजर आते है । शायद महानगरीय समाज के 'रंगीन विकारों, की ओर ध्यानाकर्षण की यह उनकी अपनी शैली हो ।
    उपन्यास के अंत में मधुसूदन और हेमंती ही नहीं, शर्वाणी की चोट झेलकर अंतत: फिर से सागरिका की ओर मुड़ा शांतनु जिस नए समाज की नींव रखना चाहता है, उसमें मूल्यों के उपहास वाली 'मजावादी' दुष्टि नहीं, बल्कि विडंबनाओं को पहचानकर उनके  बीच से रास्ता खोजती 'मनुष्य की जय-यात्रा' का अगला पडाव नजर आ सकता है ।
    'इस दौर से हमसफ़र' में बेहद तीव्र गति और हलचल है तो विचारों का तेज संघर्ष भी । लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि ये तेज बहसें दिल्ली से मीरजापुर और चुनार तक फैली उपन्यास की प्रदीर्घ कथा का एक सहज हिस्सा बनकर आती हैं । दिल्ली जैसे महानगरों की बनिस्बत छोटे शहरों, कस्बों में अब भी इंसानी संवेदना और आर्द्रता कैसे बनी हुई है, इसकी परख उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी जगह-जगह करवाते हैं । कोई हैरत की बात नहीं कि इसी कोशिश में वे डॉ० प्रशांत सिन्हा जैसे बड़े कद के इंसान से हमें रू-ब-रू होने का मौका देते हैं, जिनके आगे सारी महानगरीय भभ्भड़ और चमक-दमक फीकी लगती है ।
    अलबता अमर गोस्वामी 'इस दौर में हमसफ़र' को एक उपन्यास के साथ-साथ सहज ही बहुरंगी छवियों और गतियों वाले हमारे दौर का 'एक विशद समाजशास्त्रीय अध्ययन' भी बना सके-यह एक बडी सफलता है । अपने पहले ही उपन्यास से अमर गोस्वामी आज के महत्वपूर्ण रचनाकारों की पाँत में आ गए हैं, यह बात उनकी रचनात्मक सामर्थ्य के प्रति मन में 'आश्वस्ति' के साथ-साथ आदर भी पैदा करती है ।
  • Panchtantra Ke Natak (Paperback)
    Shri Prasad
    50

    Item Code: #KGP-1363

    Availability: In stock


  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-4
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-826

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-4
    समकालीन लघुकथाओं से गुजरते हुए इधर जिस खास बात पर ध्यान अटक गया है, वह है ‘लघुकथा में प्रवेश कर रहे काव्य-तत्त्व’। लघुकथा के इतिहास पर गौर करें तो पता चलेगा कि इस विधा के अंकुरण-काल में ही प्रेमचंद ने इसे गद्य-काव्य और कहानी के बीच की विधा कह दिया था, जिसका उल्लेख कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने अपने लघुकथा-संग्रह ‘आकाश के तारे, धरती के फूल’ की भूमिका में किया है। प्रेमचंद के अनुसार ‘लघुकथा में गद्य-काव्य का चित्र और कहानी का चरित्र होता है’। अज्ञेय इसे ‘छोटी कहानी’ कहते थे तो कमल गुप्त ने ‘लघुकहानी’ का झंडा फहरा रखा है और विनायक अपनी लघुकहानियों के लिए अलग से पहचाने जाते हैं। बालेंदुशेखर तिवारी, हरीश नवल, प्रेम जनमेजय और दामोदर दत्त दीक्षित आदि लघु-व्यंग्य के शामियाने तले गुफ्तगू करते रहे हैं। महेश दर्पण का संग्रह ‘लघुकहानी-संग्रह’ के रूप में छपा है, न कि लघुकथा-संग्रह के रूप में। मुकेश वर्मा की ऐसी रचनाओं को विष्णु नागर ने ‘छोटी कहानियां’ कहते हुए इस समय को छोटी कहानी का समय कहा है और हममें से अधिसंख्य लोग मुकेश वर्मा की छोटी कहानियों को उच्चस्तरीय लघुकथा के नमूने कहेंगे। उदय प्रकाश अपनी ऐसी रचनाओं को किस्से, छोटे किस्से कहकर पुकारना पसंद करते हैं अर्थात् छोटी कथा-रचनाओं की अहमियत तो निर्विवाद है, विवाद सिर्फ नाम पर है और काम सभी छोटी कथाएं प्रायः एक ही करती हैं : पाठक पर त्वरित प्रभाव, जैसे तुरंता भोजन, पाठक की मानसिक तृप्ति। परम। पाठक को परम मानसिक तृप्ति देने वाला चैतन्य त्रिवेदी का लघुकथा-संग्रह ‘उल्लास’ बीसवीं सदी की ढलती शाम में लोकार्पित हुआ तो विष्णु प्रभाकर से लेकर राजकुमार गौतम तक प्रायः सभी पीढ़ियों के लोग उस पर लट्टू हो गए और कमलेश्वर ने तो कह ही दिया कि आज लघुकथा एक विधा के रूप में स्थापित हो गई। उसी विधा की एक सदी की संघर्ष-यात्रा का प्रतीक-वृत्तांत पाठकों को सौंपकर अब हम आश्वस्त हैं कि इस कारवां में मुकेश वर्मा जैसे सिद्ध नाम दिन-प्रतिदिन जुड़ते चले जाएंगे और अंततः एक दिन कहानी और उपन्यास जैसी प्रतिष्ठा लघुकथा को भी हासिल हो जाएगी।
  • Computer : Kya? Kyon? Kaise?
    Varun Kumar Sharma
    100 90

    Item Code: #KGP-9153

    Availability: In stock

    कंप्यूटर शब्द अंग्रेजी के 'कम्प्यूट' (Compute) शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है – गणना करना । इस प्रकार साधारण भाषा में कम्प्यूटर का अर्थ एक ऐसी मशीन से है, जो गणना संबंधी कार्यों को शीघ्रता से कर सकती है । परंतु सही अर्थों में गणना करने के अलावा कम्प्यूटर और भी कई कार्य कर सकता है । कंप्यूटर की जानकारी के लिए इसकी विशेषताओं को जानना आवश्यक है ।
  • Paheli
    Meera Sikri
    200 180

    Item Code: #KGP-9332

    Availability: In stock

    पहेली प्रसिद्ध  रचनाकार मीरा सीकरी का अत्यंत विचारोत्तेजक और रोचक उपन्यास है। लेखिका ने मनोविज्ञान की सूक्ष्मता के साथ स्त्राी-पुरुष संबंधों  को विश्लेषित किया है, फिर ये रिश्ते मां-बेटा, भाई-बहन, पति-पत्नी कैसे भी हों। जीत और वरयाम भाई-बहन हैं, उनके बीच कोई ऐसा ‘मेंटल ब्लाक’ है जिसके कारण उनकी जिंदगी की ‘आयरनी’ आकार लेती है। ...यही पहेली है जिसे मीरा सीकरी ने बेहद पठनीय कथा विन्यास में सुलझाया है। उपन्यास के खत्म होते-होते इसका एक जिंदादिल पात्रा आर. पी. कहता है, ‘...जिन भाई-बहन के असामान्य से दिखते संबंधें को न समझ पाने के कारण तुम इतना परेशान हो रही हो, ऐसे संबंधों  की विविध छायाएं, जैसे—लेस्बियन, गेयज पौराणिक काल से लेकर आज तक मिल जाएंगी। हमें उनकी उपेक्षा और अवज्ञा न कर उन्हें सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि से समझने की कोशिश करनी चाहिए।’ ...कहना न होगा कि मीरा सीकरी ने पूरी सहानुभूति के साथ पात्रों को चित्रित किया है। कोई पात्र नकारात्मक नहीं लगता। सब मनःस्थिति और परिस्थिति के दायरों में सांस ले रहे हैं।
    जाहिर है, उपन्यास में एक ‘मनोवैज्ञानिक तनाव’ व्याप्त है। इसके बावजूद रोचकता, उत्फुललता  और पठनीयता से भरपूर यह रचना एक ही बैठक में पढ़े जाने के लिए विवश करती है। जब जटिल को सरल या बोधम्य बनाना हो तो रचनाकार के पास सशक्त, बिंबधर्मी, पारदर्शी भाषा का होना जरूरी है। ‘अपरिपक्व उम्र की धुंधली स्मृतियों के अपूर्ण आभासों और अनुमान के आधर पर बीत गई (मृत कहने का मन नहीं होता उसका) जीत के व्यक्तित्व की गरिमा को खंडित करने का उसे कोई अधिकार नहीं।’ ...ऐसे अर्थपूर्ण विषय पर लिखने वाली लेखिका मीरा सीकरी ने इस उपन्यास में अंतर्मन के रहस्यों में विद्यमान ग्रंथियों को रेखांकित किया है।
  • Mere Saakshatkaar : Rajendra Yadav
    Rajendra Yadav
    300 270

    Item Code: #KGP-858

    Availability: In stock


  • Kashmkash
    Manoj Singh
    520 468

    Item Code: #KGP-846

    Availability: In stock


  • Teesara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    50

    Item Code: #KGP-7051

    Availability: In stock

    ग़ज़ल शतकों में सम्मिलित कवि
    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उदयप्रताप सिंह ०  कुमार शिव ०  गोपालदास ‘नीरज’ ०   चिरंजीत ०  ज़हीर कुरैशी ०  ज्ञानप्रकाश विवेक ०  त्रिलोचन ०  दुष्यंत कुमार ०  देवेंद्र माँझी ०  प्रमोद तिवारी ०  बलबीर सिंह ‘रंग’ ०  बालस्वरूप राही ० भवानी शंकर ०  मासूम ग़ाज़ियाबादी ०  मृदुला अरुण ०  राजनारायण बिसारिया ०   रामकुमार कृषक ०  रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’ ०  रामदरश मिश्र ०  रामावतार त्यागी ०  शलभ श्रीराम सिंह ०  शिव ओम ‘अंबर’ ०  शेरजंग गर्ग ०  सुरेंद्र श्लेष ०  सूर्यभानु गुप्त।
    दूसरा ग़ज़ल शतक
    अशोक वर्मा ०  आचार्य सारथी ०  उपेन्द्र कुमार ०  उर्मिलेश ०  ओमप्रकाश चतुर्वेदी ‘पराग’ ०  कमल किशोर ‘भावुक’ ०  कमलेश भट्ट ‘कमल’ ०  कुँअर बेचैन ०  ज्योति शेखर ०   नरेन्द्र वसिष्ठ ०  पुरुषोत्तम ‘वज्र’ ०  प्रभात शंकर ०  महेश जोशी ०  योगेन्द्र दत्त शर्मा ०  रंजना अग्रवाल ०  रामनारायण स्वामी ०  रामनिवास ‘मानव’ ०  लक्ष्मण ०   विजय किशोर ‘मानव’ ०  विनीता गुप्ता ०  शिवबहादुर सिंह भदौरिया ०  श्रवण राही ०  सरोज व्यास ०  हरजीत ०   हरिओम।
  • Andher Nagari : Srijan-Vishleshan Aur Paath
    Ramesh Gautam
    80 72

    Item Code: #KGP-9131

    Availability: In stock


  • Raashtra Aur Musalman
    Nasera Sharma
    350 315

    Item Code: #KGP-172

    Availability: In stock

    समय की छाती पर खड़ा मुसलमान आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। ‘मुसलमानों’ को लेकर इतना कुछ कहा जा रहा है कि स्वयं मुसलमान भी इस चर्चित मुसलमान के बारे में नई-नई सूचनाएं सुनने की जिज्ञासा रोक नहीं पाता है।
    वह क्या है? वह कौन था? उसका भविष्य क्या होगा? इस विषय पर वार्तालाप के द्वारा अनेक नए-नए नजरिए, खबरें और ऐतिहासिक पृष्ठीाूमि की पर्तें रोज सामने लाई जा रही हैं। बहुत कुछ छप रहा है।
    इस किताब में मुसलमान एक आम आदमी की तरह अपनी खूबी और कमजोरी के साथ मौजूद है। वह स्वयं अपनी बात कहने में सक्षम हे, इसलिए वह किसी बड़े नाम के सहारे या धार्मिक नेताओं के बल पर आगे नहीं बढ़ता है। 
    जो सच है, वह सामने है। उसको स्वीकार करना या न करना पढ़ने वालों की अपनी दृष्टि एवं सामाजिक अवलोकन पर निर्भर है। 
  • Chaanda Sethani
    Yadvendra Sharma Chandra
    125 113

    Item Code: #KGP-2042

    Availability: In stock

    'चाँदा सेठानी' के लिखने की प्रेरणा मुझे अपने इस समाज की सेठानियों से मिलने के बाद मिली । जब उन्होंने अपने जीवन के सत्यों को उजागर किया तो मेरे विचारों में जोर का कंपन हुआ । लगा कि इन सेठानियों के त्याग, तप, संयम और सच के कारण ही राजस्थानी लोगों ने देश के धन्नासेठों में अपने नाम लिखाए । पूर्वी देशों की यातनापूर्ण कठिन यात्राएँ, संकट और संस्कृति व वहाँ की भाषा को अजानकारी, सभी परिस्थितियों में राजस्थानी लोगों ने अदम्य साहस का परिचय दिया । आरंभिक पीढ़ी के त्रासदपूर्ण जीवन का शुभ फल दूसरी पीढ़ी को मिला और यह फल पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता रहा । यहीं कारण है कि चाहे बिरला हो, चाहे गोयनका, पोद्दार हो चाहे सोमानी, दम्माणी हो, चाहे डागा, सब के सब अब समृद्धि के शिखर को छू रहे हैं ।
    पाँच से दस सालों तक की यात्राएँ की परदेश में गांव जमाने का संघर्ष । अपनी जवान पत्नियों का त्याग! क्या यह तपस्या नहीं ? और उन पत्नियों का तप तो और भी महान् लगता है, जिन्होंने सूखे प्रांतर की तपती रेत और उसके असह्य ठंडेपन का सूखी रोटियाँ और मोठ-बाजारी के खिचड़े को खाकर सहा ओर सहज जीवन जिया ।
    -लेखक
  • Sitaron Ke Akshar Aur Kirno Ki Bhasha
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1974

    Availability: In stock

    यूँ तो कुदरत की यह इबारत कई तरह के
    कागजों पर लिखी मिलती है-

    इन्सान के हाथ-पैरों से लेकर उसके नख-शिख को
    भी वह कागजों की तरह इस्तेमाल
    करती है और धूप-छांव की हर गर्दिश में से
    गुजरती हुई वह पशुओं-पंछियों 
    की आवाजों तक को भी अपने कागज बना लेती
    है । पर उसके विज्ञान को
    एक खास पहलू से जानने के लिए, मैंने
    सिर्फ वह कागज चुने-
    इन्सान की सोई हुई आँखो के सपने, जिन पर
    कुदरत की लिखी हुई इबारत
    को हर इंसान देखता है, पर पढने में
    समर्थ नहीं होता ... 

  • Aakhir Kab Tak
    Rajendra Avasthi
    450 405

    Item Code: #KGP-137

    Availability: In stock

    आखिर कब तक ?
    राजेन्द्र अवस्थी कथाकार और पत्रकार तो हैं ही, उन्होंने सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा सामयिक विषयों पर भी भरपूर लिखा डै । अनेक दैनिक समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओं में उनके लेख प्रमुखता से छपते रहे । उनकी बेबाक टिप्पणियाँ अनेक बार आक्रोश और विवाद को भी जन्म देती रहीं, लेकिन अवस्थी जी कभी भी अपनी बात कहने से नहीं चूकते । वह कहेंगे और बहुत निडर तथा बेबाक होकर कहेंगे, भले ही उनके मित्र भी उनसे अप्रसन्न क्यों न हो जाएँ । परिणामस्वरूप, उनका यह लेखन समसामयिक साहित्य का दस्तावेज बन गया । उन्होंने कई सुविख्यात व्यक्तित्व के जीवन को आधार बनाकर औपन्यासिक कृतियाँ दी हैं  और उनमें कथानायकों की विशेषताओं के साथ ही उनकी दुर्बलताओं की चर्चा भी की है । सक्रिय लेखन के दौरान बड़ी-बड़ी हस्तियों से उनका साबका तो पड़ता ही रहा । यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि कई बड़े लोगों के वह आत्मीय रहे हैं । ऐसे लेखन से उनका क्षेत्र व्यापक बना और साहित्य के रचना-प्रदेश के बाहर भी अन्य क्षेत्रों में उनकी खासी सर्जनात्मक पहचान बन पाई ।
    प्रस्तुत टिप्पणियां मूल्यवान लेखन है। लेखक का मानना है कि उन्होंने एक भी घटना न बनावटी लिखी है और न ही कभी झूठ-फरेबी पत्रकारिता को स्वीकारा । जो जैसा है, जो सही है, जो स्पंदित है, उसी पर उन्होंने लिखा है। इस दृष्टि से यह कृति अत्यंत मदृत्यपूर्ण हो उठती है ।

  • Mera Paigaam Muhabbat Hai Jahan Tak Pahunche
    Jigar Muradabadi
    250 225

    Item Code: #KGP-98

    Availability: In stock

    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
    'जिगर' साहब इंसानियत और शेरियत दोनों का पैकर थे । उनकी शायराना अजमत का बडा राज उनकी मखसूस सज-धज, तर्जेअदा और तरन्नुम था । उनकी मासूम जोर दिलकश शखसियत ने उन्हें अपने दौर का महबूब-तरीन शायर बना दिया था । उनकी बड़ाई को इस पैमाने से भी नापा जा सकता है कि दौरे जदीद में कितनों ने जिगर बनने की कोशिश की, इसलिए कि शेर की दुनिया के वह एक तर्ज थे। असलूब थे, एक स्टाइल थे ।
    'जिगर' ने गजल को एक नई जिंदगी बख्शी । उनकी गजले मदहोशी व रंगीनी के छलकते हुए सागर  हैं, जिससे तरह-तरह के रंग मौजूद है और किस्म-किस्म के जजबात जलवागर हैं,
    जिनका मुताअला जिंदगी के नशे को गहरा कर देता है, कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और हयात नये रूप में जलवागर होकर दिल की धड़कन में जज्ब हो जाती है । खून की रवानी तेज हो जाती है और शायरी के तारों से आहंग हो जाती है। ये इंतेखाबे गजल के अशआर ऐसे है जिनमें नई जिंदगी और वक्त की धड़कनों की आवाजें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख 'जिगर' को कभी भुला नहीं सकेंगी ।
  • Mere Saakshatkaar : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    225 203

    Item Code: #KGP-841

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Scandinavia
    Prashant Kaushik
    395 356

    Item Code: #KGP-9314

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics  from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Scandinavian short stories  are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious.  A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup  of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new  world on each page.

    With stories like Shortshanks, Priest and The Clerk, Golden Castle in the Air,  Two Stepsisters, Princess on the Glass Hill, Master-smith, this book is a compilation of 20 famous Scandinavian short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Scandinavia.
  • Bhartiya Naari Aur Pashchimikaran
    Shanti Kumar Syal
    300 270

    Item Code: #KGP-602

    Availability: In stock

    भारतीय नारी और पश्चिमीकरण 
    पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति और सभ्यता के दुष्प्रभाव ने भारतीय समाज में नारी समाज के यथार्थ को बदल दिया है। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित नारी स्वयं वंदनीय न मानकर स्वयं को पुरुषों के समान बनने के लिए आंदोलनरत है। सदियों से पीडित नारी का सब्र का बांध टूट गया है। प्राचीन परंपराओं की पकड़ से बाहर आ गई है। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही है। आज की शिक्षित नारी अत्याचार के विरोध में बलपूर्वक खड़ी हो रही है। आधुनिक माहौल में तमाम लड़कियां घर की देहरी लांघकर स्वावलंबी हो रही है । आधुनिक भारतीय नारी अन्याय और अत्याचार को चुपचाप नहीं सहती, बल्कि उसका प्रतिकार कर समाज  में अपने लिए अलग जगह बनाती है। आज की नारी स्वतंत्रता चाहती है। वह पुरुष की अधीनता में रहना नहीं चाहती। वह पुरे प्राणवेग के साथ जाग उठी है।
    पश्चिमीकरण से नारी की दुनिया बदल रही है । उसके सपने, उसकी इच्छाएं, आकाक्षाएं, उसके जीने और सोचने का ढंग बदल रहा है। वह अब जानने लगी है कि अपने सपनों को कैसे पूरा किया जा सकता है । अब वह अपनी तरह अपनी शर्तों पर जीना चाहती है। वर्तमान युग में शिक्षित एवं अशिक्षित नारियां अकेलेपन की शिकार होने लगी हैं। यह समस्या आधुनिक युग की देन है। नारी घर की चारदीवारी को लांघकर पुरुषों से बराबरी करने, नौकरी करने निकली है किन्तु वह अपनी लज्जा, संस्कृति, सदाचारिता को पीछे छोड़ आई है। इस नारी स्वतंत्रयुग की नारियां पश्चिमी दौड़ में दौड़ती हुई, अपनी संस्कृति की मान-मर्यादा को पीछे छोड़ती हुई कहीं अंधकारमय युग में खो न जाएं... ।
  • Jeevanopayogi Jari-Bootiyan
    Dr. Rajiv Sharma
    450 405

    Item Code: #KGP-9018

    Availability: In stock

    जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियाँ 
    जड़ी-बूटियाँ शब्द सुनते ही हमें लगना है कि सुदूर जंगल में पहुँचकर कुछ पेड़-पौधों की खोज करनी पडेगी, जबकि हमारे आसपास दैनिक उपयोग की इतनी वनस्पतियां  मौजूद है कि उनके द्वारा सामान्य रोगों का उपनार हम स्वयं घर पर ही आसानी से कर सकते है ।
    तुलसी, लहसुन, अश्वगंधा, अशोक, अर्जुन. हींग, बिल्व (बेल), कनेर, मुलहठी, त्रिफला, सौंठ, कुकरौंदा, शिलाजीत, आँवला नीम, महुआ, हुरहुर, अरण्ड, सर्पगंधा, अमलतास आदि सैकडों जड़ी-बूटियाँ हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी हैं और आसानी ये उपलब्ध भी ।
    प्रस्तुत पुस्तक में प्रख्यात चिकित्साविज्ञ ने लगभग ढाई सौ उपयोगी जड़ी-बूटियों के गुणों, उपयोग तथा उनकी प्रकृति आदि के बारे में विस्तार से बताया है । पुस्तक को संपूर्ण सूचनाप्रद बनाते हुए सैकड़ों जड़ी-बूटियाँ के चित्र भी पुस्तक में ममाहित किए गए है ।
    निस्संदेह, यह पुस्तक आम पाठक के लिए तो स्वास्थ्य-रक्षा व घरेलू नुस्खों को जानने की दृष्टि से उपयोगी है ही, जिज्ञासु पाठकों की ज्ञान-पिपासा को संतुष्ट करने में भी सक्षम है, क्योंकि इसमें ज़डी-बूटियों के बारे में अत्यंत  सरल भाषा में विस्तृत जानकारी दी गई है । कहना न होगा कि निजी एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए तो यह अनिवार्य ग्रंथ है ।

  • Agyey Sahachar
    Vishwanath Prasad Tiwari
    695 626

    Item Code: #KGP-1940

    Availability: In stock

    अज्ञेय सहचर
    छायावादोत्तर हिंदी साहित्य में अज्ञेय का व्यक्तित्व एक स्वाधीन चिंतक और प्रयोगधर्मी रचनाकार के रूप में अद्वितीय है। इस संदर्भ में एक-दो लेखक ही उनकी पंक्ति में बैठते हैं। उनकी सर्जनात्मक प्रयोगशीलता और नवीनता तथा अनेक कलाओं में उनकी दक्षता को देखते हुए उन्हें हिंदी का ‘रवींद्रनाथ’ कहना उपयुक्त है। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं (कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, संस्मरण, यात्रावृत्त, आलोचना और अन्य लघु विधाएँ) को अपनी प्रतिभा से समृद्ध किया है। कुछ नवीन गद्य विधाओं को जन्म देने का श्रेय भी उन्हें है, जिन्हें उन्होंने ‘अंतःप्रक्रिया’, ‘लॉग बुक’ और ‘टीप’ आदि कहा है। ये ‘डायरी’ विधा के निकट हैं, मगर उनसे भिन्न और नवीन। इस प्रसंग में मुझे यह भी कहना चाहिए कि हिंदी की साहित्यिक भाषा को जितने नए शब्द अज्ञेय ने दिए हैं, उनके किसी समकालीन लेखक ने नहीं दिए। यह एक ऐसा रेखांकित करने योग्य कार्य है, जिसे कोई महान् लेखक ही कर पाता है। वस्तुतः अज्ञेय हिंदी के एक युग-प्रवर्तक साहित्यकार हैं। उन्होंने अनेक रूपों में छायावादोत्तर हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को प्रभावित किया है तथा उसे नई दिशाओं की ओर प्रेरित और संचालित भी किया है।
    अज्ञेय का जितना बड़ा योगदान रचना और चिंतन के क्षेत्र में है, उतना ही या उससे थोड़़ा ही कम हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध करने और अपने समय में एक साहित्यिक वातावरण निर्मित करने वाले व्यक्तित्वसंपन्न लेखक के रूप में। उन्होंने न केवल स्वयं लिखा, बल्कि प्रतिभावान लेखकों की एक पूरी पीढ़ी को मंच देने और सामने लाने का प्रयास किया। 
    आज हिंदी के एक बड़े और वास्तविक पाठक-वर्ग में अज्ञेय प्रतिष्ठित हैं और उन पर लिखा भी कम नहीं गया है, जिसका प्रमाण है यह पुस्तक।
  • Sant Kabir
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-135

    Availability: In stock

    कबीरदास की वाणी वह लता है, जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पडने से अंकुरित हुई थी । उन दिनों उत्तर के हठयोगियों और दक्षिण के भक्तों में मौलिक अंतर था । एक टूट जाता था, पर झुकता न था; दूसरा झुक जाता, पर टूटता न था । एक के लिए समाज की ऊँच- नीच की भावना मजाक और आक्रमण का विषय थी, दूसरे के लिए मर्यादा और स्फूर्ति की । और फिर भी विरोधाभास यह कि एक जहाँ सामाजिक विषमताओं को अध्याय समझकर भी व्यक्ति को सबके ऊपर रखता था, वहाँ दूसरा सामाजिक उच्चता का अधिकारी होकर भी अपने को तृण से भी गया-गुजरा समझता था । ...एक के लिए पिंड ही ब्रह्माण्ड था तो  दूसरे के लिए समस्त ब्रह्माण्ड भी पिंड । एक का भरोसा अपने पर था, दूसरे का राम पर; एक प्रेम को दुर्बल समझता था, दूसरा ज्ञान को कठोर—एक योगी था, दूसरा भक्त ।
    -आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
  • Mans Ka Dariya
    Kamleshwar
    80 72

    Item Code: #KGP-9061

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    185 167

    Item Code: #KGP-2080

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार निर्मल वर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दहलीज', 'लवर्स', 'जलती झाड़ी', 'लंदन की एक रात', 'उनके कमरे'', 'डेढ़ इंच ऊपर', 'पिता और प्रेम', 'वीकएंड', जिंदगी यहाँ और वहाँ' तथा 'आदमी और लड़की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक निर्मल वर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bharat Mein Panchayati Raaj (Paperback)
    Vishv Nath Gupta
    70

    Item Code: #KGP-1405

    Availability: In stock


  • Shiksha Tatha Lok Vyavhar
    Maharishi Dayanand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1213

    Availability: In stock

    जब मनुष्य धार्मिक होता है, तब उसका विश्वास और मान्य शत्रु भी करते हैं और जब अधर्मी होता है, तब उसका विश्वास और मान्य मित्र भी नहीं करते। इससे जो थोडी विद्या वाला भी मनुष्य श्रेष्ठ शिक्षा पाकर सुशील होता है, उसका कोई भी कार्य नहीं बिगड़ता ।
    इसलिए मैं मनुष्यों को उत्तम शिक्षा के अर्थ सब वेदादिशास्त्र और सत्याचारी विद्वानों की रीति से युक्त इस ग्रंथ को बनाकर प्रकट करता हूँ की जिसको देख-दिखा, पढ़-पढाकर मनुष्य अपने और अपनी संतान तथा विद्यार्थियों का आचार अत्युत्तम करें, कि जिससे आप और वे सब दिन सुखी रहें ।
    इस ग्रंथ में कहीं-कहीं प्रमाण के लिए संस्कृत और सुगम भाषा और अनेक उपर्युक्त दृष्टान्त देकर सुधार का अभिप्राय प्रकाशित किया, जिसको सब कोई सुख से समझ अपना-अपना स्वाभाव सुधार, उत्तम व्यवहार को सिद्ध किया करें । 

  • Ek Vyakti Narendra Kohli (Paperback)
    Narendra Kohli
    80

    Item Code: #KGP-7100

    Availability: In stock


  • Dropadi Ka Cheer Haran Aur Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    65 59

    Item Code: #KGP-949

    Availability: In stock

    मूल महाभारत का कलेवर वर्तमान में उपलब्ध महाभारत का दशांश रहा होगा। उसके पश्चात् जो मौखिक प्रक्षेप होता रहा है और अब भी होता रहता है, उसका अंत नहीं हैं ऐसे ही कुछ अधिक महत्वपूर्ण विषयों पर इस छोटी-सी पुस्तक में विचार किया गया है। उन्हें अन्तिमेत्थम् के रूप में स्वीकार किए जाने का लेखक का आग्रह नहीं है। सुधीजनो के विचारार्थ प्रस्तुत है।
    —विद्यानन्द सरस्वती
  • Buddha Ka Chakravarti Saamrajya
    Rajesh Chandra
    240 216

    Item Code: #KGP-9114

    Availability: In stock


  • She (Paperback)
    Dixy Gandhi
    245 221

    Item Code: #KGP-332

    Availability: In stock

    A first ever collection of stories centered around Women’s lives in Modern Times

    Society in modern times is changing very fast, and so is changing the situation and role of women in facing and dealing with them. With the expansion of education among them, they are taking things with gusto and intelligence, at times coming out with unexpected results. Their understanding is different, approach is different and what they present is also not only engrossing but also enlightening.
    It is time women wrote with themselves at the centre of happenings and here is perhaps the first such collection of exciting stories by the upcoming author Dixy Gandhi who shows great promise and quality.
  • Lekhak Ki Chherchhar
    Kashi Nath Singh
    350 315

    Item Code: #KGP-434

    Availability: In stock

    लेखक की छेड़छाड़ 
    आलोचना की भाषा और रचना की भाषा एक नहीं हो सकती–इस मानने वाले लोग हैं लेकिन काशीनाथ सिंह ऐसे लेखक हैं जिनका प्रबल विश्वास है कि आलोचना भी रचना है । 'लेखक की छेड़छाड़' में उनके इस विश्वास के आधार देखे जा सकते हैं । काशीनाथ सिंह के मूल स्वभाव यहाँ भी देखा जा सकता है–बतकही, चुहल और मजे-मजे में जमाने भर की बात कह देना । वे अपने साथ चलने वाले समकालीनों के काम पर नजर डालते हैं तो अग्रजों को अघर्य  भी देते हैं । उनके अपने कहानी लेखन के अंतरसूत्रों को जानना हो या अभी-अभी के नए कथा परिदृश्य का सिंघावलोकन, यहाँ सब मौजूद है । 'अपना मोर्चा' और 'कशी एक अस्सी' जैसे कालजयी उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया में केवल शोधार्थियों की ही दिलचस्पी नहीं हो सकती और न ही लेखक की सामाजिक भूमिका पर बहस पर किन्हीं ख़ास पाठकों की। यह एक अनुपम गद्य सर्जक के ही बुते की बात है कि वह धूमिल जैसे कवि पर आलेख लिखता है तो गोदान का नए जमाने में महत्त्व भी खोज पाता है । यहां भी काशीनाथ सिंह की पहले दर्जे की गद्य सर्जन का आस्वाद लिया जा सकता  है जो आलोचना, लेख, मूल्यांकन, समीक्षा या स्मृति लेख के रूप में आए हैं । यह लेखक की छेड़छाड़ तो है लेकिन इस छेड़छाड़ की व्यंजन गहरी है और मार दूर तक जाने वाली है । 
  • Sant Ka Divya Sansaar
    Deep Shikha Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-1870

    Availability: In stock

    संत का दिव्य संसार
    पारलौकिक जगत् में विचरण करते भक्तों ने देखा-एक हरा-भरा प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त पर्वत-शिखर, जिस पर सूर्य-रश्मियां बिखरी पडी थीं, स्निग्ध पवन की स्निग्धता से विभोर पर्वत-शिखर परम शति में डूबा हुआ था ।
    उस शांत, एकांत, मानवीय पदचापों एवं कोलाहल से पूर्णत: मुक्त पर्वत के उत्तुंग शिखर पर एक जर्जर शरीर- धारी तपस्वी तपस्यारत था । स्वच्छ-सुगंधित-शीतल पवन उन्मुक्त हो बह रहा था । अवरोधरहित पवन तपस्वी के शरीर से टकरा तपस्वी को अपनी प्रशंसा करने के लिए बाध्य-सा करता प्रतीत हो रहा था ।
    किंतु, तपस्वी पवन के प्रफुल्लकारी स्पर्श से पूर्णत: प्रभावहीन था । उस पर पवन की स्निग्धता का, उसकी कोमलता का, उसकी प्रफुल्लता का और उसकी शीतलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था । वह पूर्णतया नि:संग था, तटस्थ था, निर्विकार था, अचल था, स्थिर था ।
    सूर्य-रशिमयों की गरिमामयी प्रखरता भी तपस्वी में किसी भी प्रकार का विक्षोभ उत्पन्न करने में असफल-सी जान पड़ रही थी । तपस्वी अविचल समाधिस्थ बैठा हुआ था ।
    तपस्वी की स्थिर अवस्था, तपस्वी के सैकडों वर्षों से निरंतर एक ही आसन में बैठे रहने का संकेत-सी करती प्रतीत हो रही थी । संभवत: तपस्वी सदियों से एक ही मुद्रा में, एक ही आसन में, एक ही स्थान पर बैठा प्रभु से एकात्म की स्थापना का प्रयास कर रहा था ।
    उसके मुखमंडल से झरती अपूर्व शांति उसके प्रयास की सफलता का जयघोष-सी करती प्रतीत हो रही थी । कदाचित् तपस्वी अपने प्रयास में सफल हो चुका था । तभी तो उसके मुखमंडल को चारों ओर से एक विशिष्ट आभा ने घेर रखा था । वह जितेन्द्रिय-सा लग रहा था ।
  • Snehbandh Tatha Anya Kahaniyan
    Malti Joshi
    250 225

    Item Code: #KGP-1997

    Availability: In stock

    वरिष्ठ रचनाकार मालती जोशी असंख्य पाठकों की प्रिय कहानीकार हैं। आज जब अनेक तर्क देकर यह कहा जा रहा है कि साहित्य के पाठक सिमटते जा रहे हैं तब पाठकों को मालती जोशी की हृदयस्पर्शी कहानियों की प्रतीक्षा रहती है। ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ में उनकी ऐसी ही रचनाएं हैं। उनकी लोकप्रिय रचनाशीलता का रहस्य लेखन की सहजता में छिपा है। कथानक का चयन, भाषा, पात्रों का अंतरद्वंद्व और अभिव्यक्ति प्रणाली—सबमें एक सहजता अनुभव की जा सकती है। मालती जोशी छोटी-छोटी घटनाओं या अनुभूतियों से रचना का निर्माण करती हैं। उनका ध्यान व्यक्ति और समाज की मानसिकता पर रहता है। बाहरी हलचल से अधिक वे मन की सक्रियता अंकित करती हैं। उनकी कहानियों के पात्र भावुक, विचारशील, निर्णय संपन्न और व्यावहारिक होते हैं। आदर्श के मार्ग पर चलते हुए वे कोरी भावुकता में नहीं जीते। एक अजब पारिवारिकता उनकी रचनाओं में महकती रहती है। संवाद मालती जोशी की पहचान हैं। छोटे-छोटे वाक्य, संकेतों से भरे शब्द और संवेदना की अपार ध्वनियां—इन गुणों से भरे संवाद पाठक के मन में उतर जाते हैं। किस्सागोई और विवरणशीलता का बहुत अच्छा उपयोग इन कहानियों में मिलता है। परिस्थिति और संयोग के माध्यम से प्रसंगों को गति मिलती है।
    इस संग्रह की सारी कहानियां स्त्री-मन की गहराई व सच्चाई को पूरी विश्वसनीयता के साथ व्यक्त करती हैं। यहां प्रचलित विमर्श नहीं, जीवन की समझ से उत्पन्न विवेक है। निश्चित रूप से ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ की सभी कहानियां पाठकों की प्रशंसा प्राप्त करेंगी।
  • Mere Saakshaatkaar : Nasera Sharma
    Nasera Sharma
    350 315

    Item Code: #KGP-664

    Availability: In stock


  • Randa
    Gyan Chaturvedi
    350 315

    Item Code: #KGP-422

    Availability: In stock


  • Antim Pankti Mein
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1900

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी की ये कविताएँ गवाह हैं कि इधर वे कविता की प्रगीतात्मक संरचना से आगे बढ़कर उसके आख्यानात्मक शिल्प की ओर आई हैं । इस प्रक्रिया में दोनों तरह की संरचनाओं के द्वंद्व और सहकार, उनकी अंत:क्रिया से ऐसा शिल्प विकसित करने में वे कामयाब हुई हैं, जो दोनों की प्रमुख विशेषताओं का सारभूत और संशिलष्ट रूप है । कविता के ढाँचे में लगातार चलती तोड़-फोड़, कुछ नया सिरज सकने की उनकी बेचैनी, प्रयोगधर्मिता के साहस और शिल्प को लेकर उनके जेहन में जारी बहस का समेकित नतीजा है ! बहुत-से कवियों की लगता है कि जीवन में जोखिम उठाना पर्याप्त है और कविता बिना जोखिम के लिखी जा अकती है। मगर नीलेश से हम कला की दुनिया का यह अनिवार्य सबक सीख सकते हैं कि जीवन से भी ज्यादा जोखिम है कला में । इसलिए वे आत्म-तत्त्व की कीमत पर साज-सज्जा में नहीं जाना चाहतीं। वह तो सच का अन्यथाकरण और अवमूल्यन है ! मानो वे स्वयं कहती हैं-जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को अरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते।
    विगत वर्षों में कुछ युवा कवियों के आख्यान की बनावट चेतना और प्रतिबद्धता के विस्तार के रूप में आकृष्ट करती रही है ! दरअसल या शिल्प कविता को चीजों का महज़ भावुक, एकांगी और सरल पाठ बन जाने से रोकता है और उसे भरसक वस्तुनिष्ठ, बहुआयामी और जटिल यथार्थ में ले जाता है ।  कवियों को 'पूरा वाक्य' लिखने की त्रिलोचन को सलाह पर अमल तो यहाँ है ही, कार्य-कारण-संबंध का विवेक भी और एक किस्म के गद्य की प्रचुरता वास्तविकता के काफी हद तक शुष्क और दारुण होने की साक्ष्य है! इसलिए रोजमर्रा की बातचीत की लय, व्याख्या और किस्सागोई का अंदाज और अनुभव का विषम धरातल-ये तत्व मिलकर इस कविता का निर्माण करते हैँ। यहाँ किसी अप्रत्याशित  सौंदर्य-लोक, कल्पना के नायाब उत्कर्ष या संवेदना की सजल पृष्ठभूमि की उम्मीद करना बेमानी है; क्योंकि इस शिल्प के चुनाव में ही कविता की पारंपरिक भूमि और भूमिका से एक प्रस्थान निहित है ! यह भी नहीं कि वह स्वप्नशील नहीं है! नीलेश रघुवंशी इस बदरंग और ऊबड़-खाबड़ दुनिया को एक खेत में बदलने और उसमें मनुष्यता को रोपने का सपना देखती हैं, मगर उसी समय यथार्थ की जटिल समस्या उन्हें घेर लेती है-एक स्वप्न है जाती हूँ जिसमें बार-बार/लौटती हूँ हर बार/मकडी के  जाले-सी बुनी इस दुनिया के भीतर !
    सच्चाई से सचेत और उसके प्रति ईमानदार होने की बुनियादी प्रतिश्रुति की बदौलत कविता किसी स्वप्निल, कोमल, वायवीय संसार में नहीं भटकती, बल्कि इच्छा और परिस्थिति के विकट द्वंद्व को साकार करती है ! नीलेश की नजर में अपने लिए किसी स्वप्न क्रो स्वायत्त करना और उसकी वैयक्तिक साधना करना गुनाह है ! उनके यहाँ सामान्य जन-जीवन ही स्वप्न की कसौटी है ! यही इस कविता का साम्यवाद है, जिसके चलते वे अपनी ही उत्साहित वस्तु से श्रमिक-वर्ग की चेतना के अलगाव और अपरिचय की विडंबना को पहचान पाती हैं-वे जो घर बनाते हैं उसके स्वप्न भी नहीं आते उन्हें !
    सवाल है कि प्रेमचंद के जिस होरी को किसान से भूमिहीन मजदुर बनने को विवश होना पड़ा और जिसकी एक दिन लू लगने से अकाल मृत्यु हुई, वह आज कहाँ है ? यह जानना हो तो नीलेश की अत्यंत मार्मिक और सांद्र कविता किसान पढ़नी चाहिए, जिसके किसी एक अंशा को उद्धृत करना कविता से अन्याय होगा ? फिर भी सारे ब्यौरे की प्रामाणिक लहजे में इस निष्कर्ष तक ले आते हैं-ये हमारे समय का किसान है न कि किसान का समय है ये । कोई पूछ सकता है कि किसान का समय था ही कब, पर कहने की जरूरत नहीं कि यह समय उसके लिए ज्यादा क्रूर और कठिन है । नीलेश साधारण जन-समाज से आवयविक रिश्ता कायम करती हैं, क्योंकि वे काव्य-वस्तु के लिए ही नहीं, भाषा और भाव के लिए भी उसके पास जाती हैं। सच है कि जो लोग सबसे अरक्षित और साधनहीन हैं, वे ही हँसते-हँसते मृत्यु की कामना कर सकते हैं । कबीर ने जिसे आकाश से अमृत निचोड़ना कहा था, उस तरह ये मृत्यु के हाथों से जिन्दगी छीन  लेते हैं । लेकिन जो मौत से डरते हैं, वे अपना सब कुछ बचाने की फिराक में जिन्दगी से ही कतराकर निकल जाते हैं । नीलेश की कविता प्रश्न करती है-क्यों खुटने से डरते हो ? हम तो रोज़ खुटते हैं ।
  • 20-Best Stories From Europe
    Prashant Kaushik
    545 491

    Item Code: #KGP-9318

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. European short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Elsi, The Unusual Farm Maid by Jeremias Gotthelf, The Jews’ Beech-tree by Annette Von Droste-hülshoff, The Broommaker of Rychiswyl by Jeremias Gotthelf, Fair Eckbert by Ludwig Tieck, How Joggeli Finds A Wife by Jeremias Gotthelf, A Little Legend of the Dance by Gottfied Keller, this book is a compilation of 20 famous European short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Europe.
  • Vichaar-Yaatra : Lal Krishna Advani
    Lal Krishna Advani
    245 221

    Item Code: #KGP-860

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Gyanendrapati
    Gyanendrapati
    150 135

    Item Code: #KGP-163

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ज्ञानेन्द्रपति
    ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है । जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है ।  वे  कविता के नहीं, उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिसकी प्रस्तावना की थी । उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है । बेशक, यह हर बार एक नये छन्द का अन्वेषण हैं जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-द्रव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मता से सम्भव होता है । हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहां खूब बन पडा है । तदभव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है न देशज अस्मृश्य; अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक और तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जनमत भूमि पर दृढ़ता से पाँव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है । धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता-वह किसी को नहीं बख्शती । उसकी दीठ प संतप्त भूगोल है । साम्राज्यबाद के नए पैंतरों का वह पहचानती है । अभय में पगी हूई करुणा उसे विरासत में मिली है । वह एक महान् परम्परा की परिणति है ।
    स्वयं ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं ही, आयामी संग्रेहों से भी कविताएँ शामिल है, बल्कि अनेक तो पहली बार यही प्रकाशित हो रही हैं । बिला शक अपने समाज-समय को कविता को आँख से देखना-समझना चाहने वालों के लिए एक अनिवार्य-किताब नहीं-सहचर!
  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7210

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nasera Sharma
    Nasera Sharma
    200 180

    Item Code: #KGP-618

    Availability: In stock

    अपनी कहानियों में इंसानी पीड़ाओं के अहसास को जीवंत अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली लेखिका नासिरा शर्मा जीवन के विविध कार्य एवं अनुभव-क्षेत्रों से विषय अर्जित करके, रचाव की संपूर्ण प्रयोगनिपुणता के साथ रचना प्रस्तुत करती हैं । कथा-संसार की यह विविधता जहाँ उनके पाठकों के लिए उपहार-सम है यहीं आलोचकों-समीक्षकों के लिए एक चुनौती भी-कि ऐसे में उन्हें किस कद-पद का कहानीकार मान्य किया जाए ? विगत छवि की निर्मिति-भंजन का काम वे स्वयं अपनी प्रत्येक नई रचना में करती प्रतीत होती हैं तथा इस प्रकार पाठक की ताजा आश्वस्ति भी पाती हैं ।
    इन कहानियों में नासिरा शर्मा इंसानी देह-नेह की आदिम इच्छाओं की विचारणाओं के साथा-साथ राष्ट्र, इतिहास, धर्म और प्रकृति की अभिव्यक्ति के पर्यावरण से भी संबोधित हैं । जन की कथाओं की व्यापक परिधि पर जड़ित ये कहानियाँ संपूर्ण मानवीय प्रवृति की संस्कृति और उसकी रसभंगता को पाठकों के सामने रखती हैं। नवरसों को समान कूतित्व देती ये कहानियाँ कालांतर में हमारे मनो-मस्तिष्क से उड़ नहीं जाती, बल्कि यहीं अपनी स्मृति का स्थान निर्धारित कर लेती है ।
    नासिरा शर्मा द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं-'जोड़ा', 'बावली', 'कशीदाकारी', 'पाँचवाँ बेटा', 'दूसरा ताजमहल', 'आमोख़्ता', 'तीसरा मोर्चा', ‘मिस्टर ब्राउनी', 'अपनी कोख' तथा 'चार बहनें शीशमहल की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका नासिरा शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे ।
  • Maalish Mahapuran
    Sushil Sidharth
    300 270

    Item Code: #KGP-782

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    [इसी पुस्तक से]
  • Vo Tera Ghar Ye Mera Ghar (Paperback)
    Malti Joshi
    80

    Item Code: #KGP-1313

    Availability: In stock

    वो तेरा घर, ये मेरा घर
    इस बंगले के गृह-प्रवेश पर मां-पिताजी दोनो आए थे । बंगले की भव्यता देखकर खुश भी बहुत हुए थे, पर माँ ने उसांस भरकर कहा था, 'सोचा था, कभी-कभार छुट्टियों में तुम लोग आकर रहोगे, पर अब यह महल छोड़कर तुम उस कुटिया में तो आने से रहे।'
    उन्होने कहा था, 'हम यहाँ भी कहाँ रह पाते है मां । नौकरी के चक्कर में रोज तो यहाँ से वहाँ भागते रहते हैं। यहाँ तो शायद पेंशन के बाद ही रह पाएंगे । मैं तो कहता हूँ आप लोग वह घर बेच दो । पैसे फिक्स डिपॉजिट में रख दो या लड़कियों को दे दो और ठाठ से यहाँ आकर रहो ।'
    'न बेटे! मेरे जीते-जी तो वह मकान नहीं बिकेगा,' पिताजी ने दृढ़ता के साथ कहा था, 'हमने बड़े अरमानों से यह घर बनाया था । इसे लेकर बहुत सपने संजोए थे । अब वे सारे सपने हवा हो गए, यह बात और है।'
    'ऐसा क्यों कह रहे है पिताजी । इस घर ने आपको क्या नहीं दिया ! हम सब इसी घर से पलकर बड़े हुए हैं। हम चारों की शादियां इसी घर से हुई हैं। बच्चों की शिक्षा- दीक्षा और शादियां—मां-बाप के यही तो सपने होते हैं ।'
    'हाँ, यह भी तुम ठीक ही कह रहे हो । मैं ही पागलों की तरह सोच बैठा था कि यह घर हमेशा इसी तरह गुलजार रहेगा। भूल ही गया था कि लडकियों को एक दिन ससुराल जाना है । लड़कों को रोजगार के लिए बाहर निकलना है । और एक बार उड़ना सीख जाते है तो पखेरू घोंसले में कहाँ लौटते हैं। अब मुझें अम्मा-बाबूजी की पीड़ा समझ में आ रही है ।'
    "कैसी पीडा?'
    ‘पाँच-पाँच बेटों के होते हुए अंत में अकेले ही रह गए थे दोनों । अम्मा तो हमेशा कहती थी, अगर मैं जानती कि पढ-लिखकर तुम लोग बेगाने हो जाओगे तो किसी को स्कूल नहीं भेजती । अपने आँचल से छुपाकर रखती ।'
    और अपने अम्मा-बाबूजी की याद में पिताजी की आँखें छलछला आई थी ।
    -[इसी संग्रह की कहानी 'साँझ की बेला, पंछी अकेला' से]
  • Aranya
    Himanshu Joshi
    125 113

    Item Code: #KGP-2051

    Availability: In stock

    अरण्य
    बर्फ ! पहाड़ ! शीत ! ठिठुरन ! अभाव ! दुख ! शोषण ! कुहासा ! इन सारे शब्दों को मिलाकर जो बनता है, वही है इनके जीवन की भी परिभाषा। कावेरी की यह व्यथा मात्र एक कावेरी की नहीं, अनेक काल-खंडों में, अनेक तरह से, अनेक रूपों में जी रहीँ अनेक कावेरियों की व्यथा-कथा है । हिम-शीतल सुरजों से ताप कहाँ से आएगा ? कहाँ से आएगी वह ऊष्मा, यह ऊर्जा, जो किसी को जीने-भर के लिए प्रेरित कर सके ? फिर भी लोग जीते हैं, जी-जी कर मरते हैं … इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है ?
    अग्नि को साक्षी रखकर तो सभी जीते हैं, विन्तु एक निर्धूम अग्नि-ज्वाला अपने सीने से समेटे, जीने का जीवट कितनों में होता है ? अनाम रिश्तों के भी कुछ नाम हुआ करते हैं । स्वयं की अपेक्षा पर के लिए जीने का भी एक और सुख होता है । शायद इसीलिए कावेरी हर संकट को सहज कर, हर गरल को अमृत मानकर पीती रही । पल्लवित वृक्ष की तरह, सदानीरा सरिता की भाँति सबको सब कुछ देती हुई भी विनिमय में ही रिक्त रही ।
    कावेरी, मानिक, माधव मामा पधान भले ही आज़ जीवित नहीं, पर नाना रूपों में हमारे सामने कभी-कभी प्रकट होते रहते हैं … अनेक  प्रश्न बनकर । उन यंत्रणाओं का क्या होगा, जो किसी निर्दोष/निरपराध को मिलती हैं? न्याय की परिभाषा क्या है ? समाज किसके लिए है ? हम क्यों जीते है ? बार-बार बिना मौत क्यों मरते है ? हमारी अकालमृत्यु क्यों होती है ?
  • Mere Saakshatkaar : Kedar Nath Singh
    Kedarnath Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-2027

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के साक्षात्कारों की यह किताब कविता के ज़रिए समकालीन जीवन में झाँकने की एक कोशिश है । इनसे गुज़रना अपने समय की बदलती हुई सौंदर्य-चेतना के खुले-अधखुले गलियारों से गुज़रना है । विगत पच्चीस वर्षों के लंबे अंतराल में लिए गए ये इंटरव्यू कवि की विकास-यात्रा को समझने की कुंजी भी देते हैं और उन मोड़ों-घुमावों की प्रामाणिक जानकारी भी, जिनसे होकर उसकी सृजन-यात्रा अविराम चलती रही है । यह एक रचनाकार की विश्व-दुष्टि के बनने और आकार ग्रहण करने की लंबी प्रक्रिया का दस्तावेज़ है-एक ऐसा कच्चा माल, जिसमें समकालीन कविता के इतिहास के रंग-रेशे तलाशे जा सकते हैं ।
    कवि केदारनाथ सिंह की कविताएँ समय के साथ संवाद करती हुई कविताएं हैं। यही वजह है कि उनकी कविताओं में एक तरह की प्रश्नाकुलता दिखाई देती है। ऐसी प्रश्नाकुलता, जो कहीं गहरे पैठकर पाठक को बेचैन करती है। यह देखना भी एक दिलचस्प अनुभव होगा कि अपनी कविताओं में निरंतर प्रश्न उपस्थित करने वाला कवि स्वयं प्रश्नों का सामना कैसे करता है ।
    समकालीन सर्जन-परिवेश में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों के लिए एक संग्रहणीय दस्तावेज़ है यह किताब ।
  • Mere Saakshatkaar : Prabhakar Shrotriya
    Prabhakar Shrotiya
    175 158

    Item Code: #KGP-2035

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : प्रभाकर श्रोत्रिय
    मैं एक लेखक से अधिक एक मनुष्य होना श्रेयस्कर मानता हूँ। अध्यापन तो अपने में ही एक बादशाहत है, परंतु यहीं से हटकर प्रशासन में संयोगवश मुझे दूसरे नंबर पर नहीं रहना पड़ता । फिर वह भोपाल हो, कलकत्ता हो या दिल्ली । चाहा यही कि इन सर्वोच्च पदों की गरिमा को न गिरने दूं, लेकिन अपने को ऐसा ढालूँ कि इन पदों से उतरने पर मुझे ऐसा न लगे कि किसी पद पर था, जिस पर अब नहीं हूँ। और इस 'पद' का अर्थ मेरे लिए सिर्फ पाँव हो-जो अपनी ज़मीन पर टिका है ।
    मैं अकसर उन लोगों पर लिखना चाहता रहा हूँ जो चुनौती बनते है या उपेक्षित होते हैं । शमशेर बहादुर सिह की कविता पर इसीलिए लिखा। वह हिंदी के सबसे जटिल कवि हैं। मैथिलीशरण गुप्त को कोई कवि नहीं मान रहा था, तब उन पर एक पुस्तक अलग ढंग की लिखी । छायावाद के मूल्यांकन में जब बेहद बीहड़ता थी, तब छायावाद पर लिखा । प्रसाद पर लिखा, नरेश मेहता पर लिख रहा हूँ ।
    ० 
    पत्रिका के स्तरीय पाठक के अलावा भी पाठकों का एक वर्ग होता है, जो साहित्य के प्रति उत्सुक होता है । इसलिए कुछ ऐसी रचनाएँ भी होनी चाहिए, जिनके जरिए ऐसे पाठक पत्रिका में प्रवेश कर सकें, उनका संस्कार हो सके । पत्रिका के महत्त्व की एक कसौटी यह भी है कि वह कितनी प्रतिभाओं को सिरजती और प्रोत्साहित करती है । कई अच्छे लेखक पत्रिकाओं के निर्माण होते है ।
    ० 
    व्यावसायिक पत्रिकाओं से जुडी हुई संपादक की संस्था भी बहुत कमजोर हो गई है। पत्रिकाएं हमेशा संपादक के बलबूते पर ही निकलती और यशस्वी होती है । 'सरस्वती' से लेकर 'सारिका' और 'धर्मयुग' का यहीं इतिहास रहा है । लोकप्रिय पत्रिकाओं को भी दोयम और दृष्टिहीन संपादक नष्ट का देते हैं । 

    [प्रभाकर श्रोत्रिय द्वारा प्रश्नोंत्तर के कुछ अंश]
  • Vo Tera Ghar Ye Mera Ghar
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-181

    Availability: In stock

    वो तेरा घर, ये मेरा घर
    इस बंगले के गृह-प्रवेश पर मां-पिताजी दोनो आए थे । बंगले की भव्यता देखकर खुश भी बहुत हुए थे, पर माँ ने उसांस भरकर कहा था, 'सोचा था, कभी-कभार छुट्टियों में तुम लोग आकर रहोगे, पर अब यह महल छोड़कर तुम उस कुटिया में तो आने से रहे।'
    उन्होने कहा था, 'हम यहाँ भी कहाँ रह पाते है मां । नौकरी के चक्कर में रोज तो यहाँ से वहाँ भागते रहते हैं। यहाँ तो शायद पेंशन के बाद ही रह पाएंगे । मैं तो कहता हूँ आप लोग वह घर बेच दो । पैसे फिक्स डिपॉजिट में रख दो या लड़कियों को दे दो और ठाठ से यहाँ आकर रहो ।'
    'न बेटे! मेरे जीते-जी तो वह मकान नहीं बिकेगा,' पिताजी ने दृढ़ता के साथ कहा था, 'हमने बड़े अरमानों से यह घर बनाया था । इसे लेकर बहुत सपने संजोए थे । अब वे सारे सपने हवा हो गए, यह बात और है।'
    'ऐसा क्यों कह रहे है पिताजी । इस घर ने आपको क्या नहीं दिया ! हम सब इसी घर से पलकर बड़े हुए हैं। हम चारों की शादियां इसी घर से हुई हैं। बच्चों की शिक्षा- दीक्षा और शादियां—मां-बाप के यही तो सपने होते हैं ।'
    'हाँ, यह भी तुम ठीक ही कह रहे हो । मैं ही पागलों की तरह सोच बैठा था कि यह घर हमेशा इसी तरह गुलजार रहेगा। भूल ही गया था कि लडकियों को एक दिन ससुराल जाना है । लड़कों को रोजगार के लिए बाहर निकलना है । और एक बार उड़ना सीख जाते है तो पखेरू घोंसले में कहाँ लौटते हैं। अब मुझें अम्मा-बाबूजी की पीड़ा समझ में आ रही है ।'
    "कैसी पीडा?'
    ‘पाँच-पाँच बेटों के होते हुए अंत में अकेले ही रह गए थे दोनों । अम्मा तो हमेशा कहती थी, अगर मैं जानती कि पढ-लिखकर तुम लोग बेगाने हो जाओगे तो किसी को स्कूल नहीं भेजती । अपने आँचल से छुपाकर रखती ।'
    और अपने अम्मा-बाबूजी की याद में पिताजी की आँखें छलछला आई थी ।
    -[इसी संग्रह की कहानी 'साँझ की बेला, पंछी अकेला' से]

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Upendranath Ashq (Paperback)
    Upender Nath Ashq
    90

    Item Code: #KGP-1505

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उपेन्द्रनाथ अश्क
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पलंग', 'आकाशचारी', 'काकड़ां का तेली', 'उबाल', 'मि० घटपाण्डे', 'बैंगन का पौधा', 'डाची', 'पिजरा', 'काले साहब' क्या 'अजगर' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Doosara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    100

    Item Code: #KGP-1203

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Vishwa Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-3
    Shuk Deo Prasad
    545 491

    Item Code: #KGP-699

    Availability: In stock

    विज्ञान कथाओं को कथा की एक विधा के रूप में मान्यता मिले, ह्यूगो गन्र्सबैक ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई और उन्होंने ही इसे ‘साइंटीफिक्शन’ नाम से अभिहित किए जाने का परामर्श दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने इस विधा को अपनी तरह से परिभाषित भी किया। ‘अमेजिंग स्टोरीज’ के प्रथमांक में संपादकीय टिप्पणी में गन्र्सबैक ने लिखा-‘साइंटीफिक्शन’ से मेरा अभिप्राय जूल्स वर्न, एच.जी. वेलस और एडगर एलन पो द्वारा लिखी गई ऐसी कहानियों से है, जिसमें आकर्षक रोमांच के साथ वैज्ञानिक तथ्य और युगद्रष्टा की दूरदर्शिता का सम्मिश्रण हो। ....आज विज्ञान कथा-साहित्य में चित्रित किए गए किसी आविष्कार के कल सत्य हो जाने में असंभव जैसा कुछ नहीं है।’
    गन्र्सबैक की इसी परिभाषा के कारण विज्ञान-गल्पों को ‘भविष्यद्रष्टा साहित्य’ भी कहा जाने लगा और लेखकों से ऐसी अपेक्षाएं की जाने लगीं जो निंतात अव्यावहारिक थीं।
    तो क्या विज्ञान कथाओं में आज के कल्पित आविष्कार कल के सच हैं? जी नहीं! ऐसा कदापि नहीं हो सकता। किसी भी गल्प में परिकल्पित कोई भी आविष्कार तदनुरूप कभी भी साकार नहीं हुआ। ऐसे सारे दावे मिथ्या हैं। हां, आविष्कारकों ने विज्ञान-गल्पों से प्रेरणाएं अवश्य ली हैं, इसकी स्वीकारोक्तियां हैं।
    ऐसा इसलिए असंभव है कि गल्पकार आविष्कारक नहीं है और आविष्कारक की गल्प-लेखन में मति-गति नहीं है। विज्ञान-गल्प-लेखन एक विरल विधा है, जिसमें विज्ञानसिद्धि और रससिद्धि दोनों वांछनीय हैं। और ऐसा संयोग विरल ही है।
  • Akbar-Beerbal Ki Praamaanik Kahaniyan (Paperback)
    Hari Krishna Devsare
    90

    Item Code: #KGP-7064

    Availability: In stock

    अकबर-बीरबल की प्रामाणिक कहानियां 
    अकबर-बीरबल की इन कहानियों में केवल मनोरंजक, हाजिरजवाबी और चतुराई की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इनमें भारतीय इतिहास की दो महान् विभूतियों के व्यक्तित्व के विविध गुणों और विशेषताओं के भी दर्शन होते हैं । इन कहानियों में विद्वानों-गुणी  ज़नों का आदर है, कुशल प्रशासन है, न्याय की तराजू पर किए गए फैसले और सामान्य जनता के कल्याण हेतु कार्यों जैसे पहलू भी उजागर होते हैं ।
    यों तो अकबर-बीरबल के किस्सों में काफी मिलावट हुई है, फिर भी उससे बचकर कुछ ऐसी चुनिंदा कहानियां ही यहाँ प्रस्तुत हैं, जो इतिहास की इन दोनों महान् विभूतियों की गरिमामयी छवि प्रस्तुत कर सकें । आशा है, पाठक इन्हें रुचिकर पाएंगे ।
    –हरिकृष्ण देवसरे

  • Hanzaad
    Manohar Shyam Joshi
    75 68

    Item Code: #KGP-9045

    Availability: In stock


  • Ghareloo Hinsa : Vaishvik Sandarbh
    Vibha Devsare
    345 311

    Item Code: #KGP-559

    Availability: In stock

    महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध हिंसा एक ऐसी भूमंडलीय गंभीर समस्या है, जो शारीरिक, मानसिक, यौनाचार और आर्थिक रूप से उनकी हत्या करती है या उन्हें सताती है, या उन्हें अपांग बना देती है । मानव-अधिकारों का  सर्वाधिक व्यापक उल्लंघन है, जिसके द्वारा महिलाओं और लड़कियों को सुरक्षा, सम्मान, समानता, आत्मोत्कर्ष और बुनियादी आज़ादी के अधिकारों से वंचित रखा जाता है । महिलाओं के प्रति हिंसा आज हर देश में व्याप्त है । इसके विश्वव्यापी विस्तार के सामने संस्कृतियों, वर्गों, शिक्षा, आय, जातीयता और आयु की किसी भी सीमा का कोई महत्त्व नहीं होता । हालाँकि अधिकांश समाजों द्वारा महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का निषेध किया गया है, लेकिन सच्चाई तो यह है कि उन समाजों में भी सांस्कृतिक परम्पराओं, मान्यताओं या धार्मिक सिद्धांतों की भ्रांत व्याख्या की ओट में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की स्वीकृति दी जाती है । इतना ही नहीं, जब यह हिंसा घर के अंदर होती है, जैसा की अधिकतर होता है, तो इस बुराई को राज्य तथा कानून-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार शक्तियां अपने अव्यक्त मौन तथा उदासीनता के द्वारा प्रभावशाली ढंग से दबा देती हैं । 
  • Vrihat Hindi Lokokti Kosh
    Bholanath Tiwari
    795 716

    Item Code: #KGP-2107

    Availability: In stock

    वृहत् हिन्दी लोकोक्ति कोश
    हमारी प्रभावी, पूर्ण और आकर्षक अभिव्यक्ति का सबसे समर्थ साधन लोकोक्तियाँ होती हैं। वे वह गागर होती हैं, जिनमें अर्थ के सागर भरे होते हैं। अभी तक हिन्दी लोकोक्तियों का कोई ऐसा बड़ा कोश प्रकाशित नहीं हुआ है, जिसमें अधिकाधिक लोकोक्तियों को लिया गया हो। प्रस्तुत कोश इसी दिशा में एक महत् प्रयास है।
    इस प्रसंग में यह ध्यान देने की बात है कि ‘लोकोक्ति’ लोक की उक्ति होती है, इसलिए मानक भाषा की तुलना में लोकभाषा में लोकोक्तियों का प्रयोग कहीं अधिक होता है और मानक भाषा में भी काफी लोकोक्तियाँ लोकभाषा से ही छनकर आती हैं, जिन्हें संक्षेप में यहाँ देखा जा सकता है।
    प्रस्तुत ‘लोकोक्ति कोश’ में उपर्युक्त दृष्टि से कई विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। एक तो यह कि इसमें हिन्दी में प्रचलित और प्रयुक्त काफी लोकोक्तियाँ ले ली गई हैं। निश्चय ही इस दृष्टि से अब तक प्रकाशित हिन्दी लोकोक्ति कोशों में यह सबसे बड़ा लोकोक्ति कोश है।
    दूसरे, इसमें हिन्दी की अधिकांश बोलियों की अनेक लोकोक्तियाँ भी ली गई हैं, जैसे—अवधी, कन्नौजी, कौरवी, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी, निमाड़ी, मालवी, मैथिली, राजस्थानी, हरियाणवी, हाड़ौती आदि।
    तीसरे, मानक हिन्दी की अधिकाधिक तथा हिन्दी की प्रायः सभी लोकोक्तियों तथा हिन्दी की बोलियों की अधिकाधिक लोकोक्तियों को लेने के अतिरिक्त अपने देश की असमिया, उर्दू, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, बंगला, मराठी, मलयालम, सिंधी, संस्कृत आदि से भी काफी लोकोक्तियाँ तुलनात्मक रूप में यथास्थान दी गई हैं।
    चौथी विशेषता यह है कि उपर्युक्त लोकोक्तियों के अतिरिक्त इसमें देश के बाहर की अंग्रेज़ी, अरबी, उज़बेक, तुर्की, फारसी, रूसी आदि की भी जो तुलनात्मक लोकोक्तियाँ मिल सकी हैं, शामिल कर ली गई हैं।
    इस तरह यह कोश अपने आयाम में अब तक के लोकोक्ति कोशों से काफी अलग भी है और बड़ा भी।
    डॉ. तिवारी के लगभग 32-33 वर्षों के परिश्रम का परिणाम यह कोश निश्चय ही हिन्दी में अद्वितीय है। 

  • Haasya Vyangya Ke Vividh Rang
    Barsane Lal Chaturvedi
    160 144

    Item Code: #KGP-1808

    Availability: In stock

    बरसानेलाल चतुर्वेदी जी द्वारा सम्पादित पुस्तक "हास्य-व्यंग्य के विविध रंग"
    हास्यरस प्रधान कविताएं सैकड़ों वर्षों से लिखी जा रही हैं । आजकल हास्य-कवि सम्मेलन सर्वाधिक लोकप्रिय हैं । आज का मनुष्य इसी के अभाव में जीता है । वह इतना व्यस्त तथा त्रस्त है कि उसके पास हँसने का समय ही नहीं है ।
    हास्यरस के कवियों ने जहाँ विकृति देखी है उसी को लक्ष्य बनाकर कविता रच डाली है । तुलसीदास हो या सूरदास, बिहारी हों या  अलीमुहीब खाँ 'प्रीतम'—हास्यरस की कविताएं सभी न लिखी हैं । किसी ने दुष्टों पर लिखा है तो किसी ने कंजूसों पर, किसी ने भ्रष्ट नेताओं को अपना शिकार बनाया है तो किसी ने दलबदल की प्रवृति को अपना लक्ष्य बनाया है । भ्रष्टाचारी अफसर, मुनाफाखोर  व्यापारी, रिश्वत, मिलावट, तस्करी, कुर्सीमोह- कहने का तात्पर्य ये है कि हास्यकवियों की निगाह से कोई बच नहीं पाया ।
    यह संकलन उन व्यक्तियों तथा प्रवृतियों का सिलसिलेवार 'एलबम' है जो हास्यरस के कवियों की चपेट में आए हैं और जिनकी पोल समय- समय पर खोली गई हैं। यह आलम्बन कोश इन्हें असंगतियों पर व्यंग्यबाण चलाने वाली हास्य-व्यंग्य की कविताओं का प्रथम संग्रह हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ हास्य-काव्य का इतिहास भी प्रस्तुत करता है ।
  • Kavi Ne Kaha : Leeladhar Mandloyi (Paperback)
    Leeladhar Mandloi
    80

    Item Code: #KGP-1265

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : लीलाधर मंडलोई
    लीलाधर मंडलोई अपनी पीढ़ी के उन थोड़े-से कवियों से अग्रणी हैं, जिन्होंने अपने समय के वैचारिक दिभ्रमों से जूझते हुए, कविता के वृहत्तर सरोकार को बचाए रखने का उपक्रम किया है । पिछले तीस-बत्तीस वर्षों की काव्ययात्रा में उनका एक अलग स्वर उभरकर आया है ।
    हिंदी कविता में किसान चेतना की व्यापकता तो देखी जा सकती है, मगर मज़दूरों, खासकर औद्योगिक मज़दूरों की उपस्थिति सांकेतिक ही रही है । मंडलोई शायद पहली बार उसके जीवन-संघर्ष को, उसकी 'सफ़रिंग' को, उसकी करुणा को अपनी कविता में दर्ज करने में सफल हुए हैं । वे अपने बचपन को याद करते हुए मध्यप्रदेश की कोयला खदानों के उस यथार्थ को सामने लाते हैं जो श्रमिक संगठनों के दस्तावेजो तक में शामिल नहीं है । अपने जीवन के सच को समय के सच से जोड़ देने की कला की व्याप्ति उनकी अन्य कविताओं में भी देखी जा सकती है । अंदमान की जनजातियों के जीवन संघर्ष को पहली बार कविता में लाने का श्रेय भी उन्हें जाता है ।
    लीलाधर मंडलोई की कविताओं में प्रकृति और स्त्री की अपनी खास जगह है । वे केवल नैसर्गिक सौंदर्य का ही उदघाटन नहीं करते हैं, बल्कि उन कठोर सच्चाइयों को भी सामने लाते है जिनसे उनके समकालीन कवि प्राय: बचना चाहते है । उन्होंने कुछ ऐसी मार्मिक कविताएं भी लिखी है जो हमारी संवेदना का विस्तार करती है । प्रसंग चाहे अपने कुत्ते के खो जाने का हो अथवा पत्नी द्वारा मोहल्ले की उस कुतिया को रोटी खिलने का, जो मां बनने वाली है-वे छीजती हुई संवेदना के इस कठिन दोर से भी मनुष्यता के बचे होने की गाथा ही नहीं रचते, अपनी कलात्मकता से पाठको को भी उसमें शामिल कर लेते है ।
    ध्यान देने की बात है कि उनकी मार्मिक कविताएं भी हमें हताश नहीं करती, बल्कि जीवन की जद्दोजहद से और डूबने की प्रेरणा देती है । वे निराशा और मृत्यु के कवि नहीं हैं । उनकी कविता जीने और जीतने की हमारी इच्छा को मज़बूत करती है, दुखों से लड़ते हुए जीवन की सुंदरता को पहचानने की दृष्टि देती है 
  • Rigveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    300 270

    Item Code: #KGP-115

    Availability: In stock

    ऋग्वेद : युवाओं के लिए यहाँ ऋग्वेद के मन्त्रों की व्याख्याएँ उसे सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं, जिनसे आज का 'कंप्यूटर-सेवी' युवा किसी भी स्थिति में निरपेक्ष नहीं रह सकेगा । पारंपरिक ज्ञान की अमूल्य धरोहर उसके हाथों में रखने का प्रयास है यह पुस्तक ।
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan
    Kamlesh Pandey
    220 198

    Item Code: #KGP-1838

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Paarijat (Paperback)
    Nasera Sharma
    290 261

    Item Code: #KGP-299

    Availability: In stock


  • Gunjan Sharma Beemar Hai
    Vivekanand
    200 180

    Item Code: #KGP-586

    Availability: In stock

    गुंजन शर्मा बीमार है
    विवेकानंद का भाषा पर अच्छा अधिकार है। पात्रों के अनुकूल भाषा का चुनाव और उसे अर्थवत्ता प्रदान करना साहित्यिक विधा के रूप में कहानी की अनिवार्य शर्त है। विवेकानंद इस अनिवार्यता के बारे में सचेत हैं, यह अच्छी बात है। इनमें बहुत कम स्थल ऐसे हैं जहां विचारों को सीधे-सीधे भाषणमाला की तरह इस्तेमाल किया गया हो जैसे कि सत्तरोत्तरी बरसों में हिंदी की ‘क्रांतिकामी’ कहानियों में देखने को मिलता था। विवेकानंद ने यदि ‘महुआ छाया’ में नत्थीराम धोबी से भोजपुरी में संवाद बुलवाए हैं तो महानगर में पली आधुनिकता कुंज से अंग्रेजी में भी। 
    गुंजन शर्मा बीमार है की भाषा में सांकेतिकता और बिंबात्मकता के प्रयोग द्वारा अर्थवत्ता प्रदान करने की कोशिश की है। उसमें ‘सांप’ की घटना और बाद में उसके बिंब का सांकेतिक प्रयोग फ्रायडीय मनोविश्लेषण के आधार पर भी व्याख्यायित होने की संभावनाएं रखता है और गुंजन शर्मा की बीमारी भी ‘लिबिडो’ की ही देन मानी जा सकती है। जिससे निम्नमध्यवर्गीय किशोरमन पीड़ित है। इस तरह की अर्थवत्ता की संभावनाओं से युक्त भाषा का इन कहानियों में प्रयोग यह दर्शाता है कि विवेकानंद में कलात्मक कहानियों की रचना क्षमता है।
  • Shaam Ki Jhilmil
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-9309

    Availability: In stock

    बुढ़ापे में अकेले हो जाने पर, फिर जी भर जी लेने की उद्दाम इच्छा, उसे साकार करने के प्रयत्न, एक-पर-एक...कुछ हास्यास्पद, कुछ गंभीर, कुछ बेहद गंभीर कि जीवन इहलोक और परलोक में इस पार से उस पार बार-बार बह जाता हो....कोई सीमारेखा नहीं। हताशा, जीने की मजबूरी, कुछ नया लाने की कोशिश...दरम्यान उठते जीवन सम्बन्ध मूलभूत प्रश्न
    गोविन्द मिश्र का यह बारहवाँ उपन्यास वृद्धावस्था के अकेलेपन और जिजीविषा के द्वन्द और टकराहट पर लिखा गया संभवतः हिंदी का पहला उपन्यास है।
  • Neeraj Ke Prem Geet (Paperback)
    Gopal Das Neeraj
    70

    Item Code: #KGP-7063

    Availability: In stock

    नीरज के प्रेमगीत
    लड़खड़ाते हो उमर के पांव,
    जब न कोई दे सफ़र में साथ,
    बुझ गए हो राह के चिराग़
    और सब तरफ़ हो काली रात,
    तब जो चुनता है डगर के खार-वह प्यार है ।
    ० 
    प्यार में गुजर गया जो पल वह
    पूरी एक सदी से कम नहीं है,
    जो विदा के क्षण नयन से छलका
    अश्रु वो नदी से कम नहीं है,
    ताज से न यूँ लजाओ
    आओं मेरे पास आओ
    मांग भरूं फूलों से तुम्हारी
    जितने पल हैं प्यार करो 
    हर तरह सिंगार करो,
    जाने कब हो कूच की तैयारी !
    ० 
    कौन श्रृंगार पूरा यहाँ कर सका ?
    सेज जो भी सजी सो अधूरी सजी,
    हार जो भी गुँथा सो अधूरा गुँथा,
    बीना जो भी बजी सो अधूरी बजी,
    हम अधुरे, अधूरा हमारा सृजन,
    पूर्ण तो एक बस प्रेम ही है यहाँ
    काँच से ही न नज़रें मिलाती रहो,
    बिंब का मूक प्रतिबिंब छल जाएगा ।
    [इसी पुस्तक से ]
  • Saahsi Bachche : Anokhe Karname
    Sanjiv Gupta
    200 180

    Item Code: #KGP-243

    Availability: In stock


  • Tinke-Tinke
    Nisha Bhargva
    165 149

    Item Code: #KGP-1806

    Availability: In stock

    निशा भार्गव के लघु कथा संग्रह, 'तिनके-तिनके' में परिवर्तित जीवन मूल्यों के छोटे-छोटे सच हैं, स्त्री प्रश्न, परिवारिक-सामाजिक वैषम्य और संबंधों की आइरनी दर्शाती छोटी-छोटी घटनायें हैं, जिन्हें अर्थकेंद्रित जीवन की आपाधापी में रोज़मर्रा की बाते समझकर, 'यह सब तो होता ही रहता है', वाले खाने में डालकर अदेखा किया जाता है ।
    हमारी आसपास की दुनिया में आए दिन काफी कुछ घटता रहता है। चौतरफ हेर फेर, अनाचार, स्कैम्स, आतंकी हमलों से लेकर, स्त्रियों से दुराचार, वृद्धों की अवमानना एवं आत्महत्याओं से टीवी और समाचार पत्र भरे रहते है । ऐसे में देखने सुनते में साधारण और औसत, पर चीन्हने में अर्थगर्भित ये बातें महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि गुट्ठिल होते जीवन में हमारा दिलोदिमाग, जो अशुभ और अनाचार सुनने का आदी हो गया है उसे हुन रोज़मर्रा के सुख-दु:ख, राग-विराग, प्रेम, ईषर्या और ईमानदारी की छोटी-छोटी घटनाओं से रू-ब-रू करा कर, उसकी संवेदनशीलता को टहोका जाय । शायद नज़र अंदाज होती ये छोटी-छोटी घटनाएं उन्हें अपने भीतर झांकने को प्रेरित करें । इनमें उन्हें खुशहाल जिन्दगी के कुछ छोटे-बड़े नुस्खे मिल जाये, जिनसे आए दिन के तनावों और घरेलू कलहों से कुछ तो मुक्ति मिले ।
    निशा नाउम्मीदी में भी संस्कारशील व्यक्ति और स्वस्थ समाज की उम्मीद नहीं छोड़ती । उसे अच्छाई पर भरोसा है यह भरोसा वह अपने पाठकों को सौंपना चाहती है । सीधी-सादी बोलचाल की भाषा में निशा बडे प्रश्न उठाती है । कैंसर की मरीज चारु, मौत के  इंतजार में सजना-संवरना क्यों छोडे? पचपन की उम्र में अकेली पडी शशि का पुनर्विवाह उसका गुनाह क्यों साबित किया जाय ? इस छोटे से जीवन को बयों भरपूर न जिया जाय ?
    बिना किसी भाषायी करिश्मे और दावे के निशा इस तिनके-तिनके  संग्रह में, स्मृतियों में अटके , यादों-स्थितियों के कुछ तिनके संजोकर बतकहियों और किस्सों के माध्यम से पाठकों से संवाद करती है, देखे जिए क्षणों को, छोटे-छोटे अनुभवों को सहज संवेदना से रेखांकित कर संधि पाठक तक पहुंचती है । इनकी सादगी ही इनकी खूबी हैं ।
  • Japan Mein Kuchh Din
    Krishna Dutt Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-1926

    Availability: In stock

    जापान में कुछ दिन
    हर यात्रा का अपना एक परिवेश होता है और तनाव । मुझे यात्रा-भीरु ही समझिए । घर से देश-विदेश तो जाता हूँ, लेकिन विवशता में । बिना गए काम नहीं चल सकता । चल पड़ने पर भय और न जाने कैसी-कैसी चिंताएँ !
    तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरैन स्टडीज़, जापान में विजिटिंग प्रोफेसर होकर गया । यहीं तरह-तरह के नवीन जीवनानुभव । विकसित देश में उत्तर-आधुनिक समाज की दमक ।
    काफी समय के बाद मन की उथल-पुथल को शांत करने के लिए 'डायरी' लिखना शुरू किया । इस 'डायरी' में यात्रावृत्त, संस्मरण, रिपोर्ताज-सब कुछ रिल…मिल गया । विधा का बंधन अपने आप भंग हो गया । यहाँ कई विधाओं की मिलावट के कारण मेरी अंतःप्रक्रियाएं अनेक आत्मबिंबों में उभरती मिलेंगी ।
    इस अंतर्यात्रा के आप सहचर बनें, इस भरोसे के साथ 'जापान में कुछ दिन' आपको सौंप रहा हूँ।
    -कृष्णदत्त पालीवाल
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shaani
    Shaani
    200 180

    Item Code: #KGP-29

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार शानी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दोज़खी', 'जहाँपनाह जंगल', 'जली हुई रस्सी', 'जगह दो, रहमत के फरिश्ते आएंगे', डाली नहीं फूलती', 'बिरादरी', 'बोलने वाले जानवर', 'एक नाव के यात्री', 'चहल्लुम' तथा 'युद्ध'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक शानी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Na Radha Na Rukamani
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-2103

    Availability: In stock

    आज हरकृष्ण को अपना वह सपना याद आया तो लगा—इंसान ने सचमुच कभी इन्सान लफ़ज़ के अर्थ के नहीं जाना, और न उसने कभी धर्म लफ़ज़ के अर्थ को जाना है—
    और उसी सांस में हरकृष्ण को अहसास हुआ कि इंसान ने अभी तक रिश्ता लफ़ज़ की भी  थाह नाते पाई है... 
    रिश्ता लहू के कौन-कौन से तार से जुड़ता है, लोगों को सगा कर जाता है, और कौन-कौन से तार से उखड़कर लोगों को पराया कर जाता है, कुछ भी हरकृष्ण  की पकड़ में नहीं आया । लेकिन जिंदगी को सुनी हुई और भुगती हुई कुछ हकीकतें थी जो उसके सामने एक खुली किताब की तरह थीं—

    -इसी उपन्यास से
  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale (Paperback)
    Chanderkant Deotale
    90

    Item Code: #KGP-1492

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।

    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।

    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
    -चन्द्रकांत देवताले
  • Tumhare Pyar Ki Paati
    Shanta Kumar
    95 86

    Item Code: #KGP-1986

    Availability: In stock

    तुम्हारे प्यार की पाती
    कविता लिखने की सोचकर मैंने कभी भी कविता नहीं लिखी। शायद सोचकर कविता लिखी भी नहीं जाती। कविता तो भावनाओं की धारा बनकर स्वयं ही प्रवाहित होती है। स्वयं ही लिखी जाती है।
    मैं 1953 में कश्मीर आंदोलन में सत्याग्रह करके हिसार की जेल में गया। हिसार की तपती गर्मी व जेल की यातनाओं से बाल-मन में कुछ भावनाएँ कविता बनकर उतरती रहीं। उसके बाद लंबे 22 वर्ष बीत गए। सार्वजनिक जीवन की व्यस्तता और संघर्ष में मुझसे मेरे कवि का कोई संपर्क न हुआ। फिर 1975 में आपातकाल के समय नाहन जेल में मुझे मेरा कवि मिला। कुछ कविताएँ लिखी गईं।
    श्री जयप्रकाश नारायण मुंबई में अपने जीवन के अंतिम पहर में थे। कुछ दिन बाद उनका स्वर्गवास हो गया। उनके अंतिम संस्कार में पटना गया। पटना से दिल्ली लौटा। एक कविता ‘फूल लेकर आए थे’ लिखी गई। ‘धर्मयुग’ के संपादक श्री धर्मवीर भारती जी ने मुझे फोन करके उस कविता पर बधाई भेजी थी।
    मैं दो बार हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा और एक बार केंद्र में मंत्री रहा। विकास की सारी प्रक्रिया में ‘अंत्योदय’ का मंत्र मेरी प्रेरणा रहा। उसी संबंध में मेरी कविता ‘अंत्योदय’ को भी श्री धर्मवीर भारती और अन्य मित्रों ने बहुत सराहा था।
    इन कविताओं के माध्यम से जो कुछ मन में उमड़ा वही इन शब्दों में उतर आया और अब पाठकों को समर्पित है।
    —शान्ता कुमार
  • Vishnugupta Chanakya
    Virendra Kumar Gupt
    450 383

    Item Code: #KGP-1969

    Availability: In stock

    विष्णुगुप्त चाणक्य
    "वत्स यवन ! मैं सत्यान्वेषी अध्येता और अध्यापक हूँ। यही मेरी मूल वृत्ति और साधना है ।
    इसी सत्य-शोध की साधना के बीच अनायास ही चन्द्रगुप्त मुझे मिला, नंद-वंश के विनाश और नए साम्राज्य के निर्माण का संकल्प मुझे मिला; संकल्प की पूर्ति मिली और इस विशाल आर्य साम्राज्य का महामंत्रित्व मिला । पर सदैव ये सब मेरे लिए माध्यम ही रहे, सत्य ही लक्ष्य रहा ।"
    -(इसी उपन्यास से)
  • Kaal Chetna
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1975

    Availability: In stock

    काल चेतना
    एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,
    लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं ।
    सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक है
    और चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का ।
    सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती है
    और चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति ।
    दोनों शक्तियां स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक है ।
    अन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,
    इंसान के भीतर पडी पनपती रहती है ।
    यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती है
    और पिता-पितामह के करमों से भी ।'
    हमारे अपने देश में, कई जातियों में
    एक बहीं रहस्यमय बात कही जाती है,
    हर बच्चे के जन्म के समय,
    कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना ।
    इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,
    किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रिय
    से रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती है
    और आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती 
    मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथा
    बहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मत
    की लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए ।
    पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,
    ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियों
    से न रूठने का संकेत है ।
    यह पुस्तक भी तेरहवीं थाली में कुछ परसने का यत्न है ।
    - अमृता प्रीतम
  • Chuhiya Rajkumari Ka Svayamvar
    Vinod Sharma
    60 54

    Item Code: #KGP-931

    Availability: In stock


  • Jhansi Ki Rani (Paperback)
    Jaivardhan
    50

    Item Code: #KGP-7091

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Prachin Unani Kahaniyan
    Rangey Raghav
    340 306

    Item Code: #KGP-06

    Availability: In stock

    प्राचीन यूनानी कहानियाँ
    यूनानी संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाली ऐसी कहानियों का संग्रह, जो वहाँ के अतीत जीवन की अत्यंत रोचक झाँकी प्रस्तुत करती हैं ।
  • Premchand : Jeevan, Kala Aur Krittwa
    Hansraj Rehbar
    400 360

    Item Code: #KGP-9288

    Availability: In stock

    प्रेमचंद का सारा जीवन संघर्षो में व्यतीत हुआ। वे डाकखाने के एक मामूली क्लर्क के बेटे थे। अर्थाभाव के कारण मैट्रिक बड़ी मुश्किल से पास किया। इसके उपरांत उन्हें जीविकोपार्जन में जुट जाना पड़ा। लेकिन उनमें विकास और उन्नति की जो एक भावना थी, ओ बढ़ने की जो एक उत्कृट अभिलाषा थी, उसने उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया। वे जीवन-पर्यन्त परिस्थितियों से लड़ते और उनसे ऊपर उइने का सतत् प्रयत्न करते रहे। उन्हें आर्थिक और भौतिक सुख भोगना भले ही नसीब न हुआ, लेकिन अपने इस प्रयत्न से वे महान् लेखक बन गए। उन्होंने जनता के दुःख दर्द को स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी और बारीकी से उसका वर्णन किया। 
    निस्संदेह प्रेमचंद आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी साहित्यकार है, जिनकी प्रतयेक रचना भारतीय जन-जीवन का आइना है तथा हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।
    —इसी पुस्तक से...
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal
    Bhagwan Das Morwal
    300 255

    Item Code: #KGP-706

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढ़ियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Doston Ke Jaane Par Kamleshwar Ki Yadein
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-403

    Availability: In stock


  • Katha Aur Samay Ka Sach
    Nirmla Jain
    325 293

    Item Code: #KGP-776

    Availability: In stock

    हिंदी कथा साहित्य में ऐसी अनेक रचनाएं हैं जिन्होंने रचनात्मक उत्कर्ष के कीर्तिमान निर्मित किए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह विचित्र लग सकता है कि आज तक कथा आलोचना के सर्वमान्य प्रतिमान निर्मित नहीं हो सके। अनेक वाचिक वैभव संपन्न और विमर्श निष्णात आचार्यों ने असहमति व्यक्त करते हुए भी कविता के प्रचलित प्रतिमानों से ही प्रायः कथा साहित्य का मूल्यांकन किया। इस दिशा में मौलिक कार्य करने का श्रेय जिन आलोचकों को दिया जा सकता है उनमें डा. निर्मला जैन का नाम अग्रणी है। निर्मला जैन ने साहित्य का अनुशासित अध्ययन करते हुए कथा रचना के चित्त व चरित्र को परखने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। आज उनकी प्रतिष्ठा गंभीर, तर्कसंपन्न, आधुनिक व प्रखर आलोचक के रूप में है। ‘कथा और समय का सच’ पुस्तक इस संदर्भ में रेखांकित करने योग्य है।
    यह गौरतलब है कि रचनाकार पर बेजा प्रश्न उठाने के स्थान पर डा. जैन आलोचना के संकट पर बात करते हुए ‘आलोचक का दुःख: बतौर भूमिका’ में लिखती हैं, ‘जाहिर है संकट आलोचक के सामने भी है–विज्ञापनधर्मी भाषिक छल और पैंतरेबाजी से बचते हुए–सही-गलत, अच्छे-बुरे, वास्तविक छद्म, महत्त्वपूर्ण-महत्त्वहीन, जरूरी-गैरजरूरी के बीच अंतर करने का विवेक, और चाहिए मूल्यपरक निर्णय की अभिव्यक्ति का साहस। ऐसे निर्णय से बचने की कोशिश आलोचकीय पाखंड के अलावा कुछ नहीं हो सकती।’
    पुस्तक में प्रेमचंद, निराला, जैनेन्द्र की कहानियों के अतिरिक्त अनेक चर्चित उपन्यासों पर डा. निर्मला जैन ने विस्तृत विचार किया है। महिला कथाकारों के बहाने उत्तरशती के उपन्यासों पर भी चर्चा है। यह पुस्तक कृति का अंतरंग खोलने के साथ पाठक में आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करती है। महत्त्वपूर्ण व मूल्यवान पुस्तक।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan
    Usha Kiran Khan
    240 216

    Item Code: #KGP-685

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Unke Hastakshar
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-2029

    Availability: In stock

    उनके हस्ताक्षर
    ० एक लम्बा रास्ता गुजर गया, जब एक उपन्यास लिखा था, डॉक्टर देव । अब चालीस साल के बाद जब मैंने उसे फिर से देखा, लगा-उसका  हिन्दी अनुवाद अच्छा नहीं हुआ है । मन में आया, अगर उसका अनुवाद मैं अब स्वयं करूँ, तो उसकी रगों में कुछ धड़कने लगेगा और यही जब करने लगी, तो बहुत कुछ बदल गया ।
    ० इसी तरह एक मुद्दत हो गई, एक उपन्यास लिखा था…'घोंसला' । प्रकाशित हुआ तो बाद में किफायती संस्करण 'नीना' नाम से चलता रहा । आज उसे देखकर लगा कि वह उस कदर पुख्ता नहीं हो पाया था, जो होना चाहिए था । और उसी को अब फिर से लिखा है, जिससे वह सघन भी हो पाया है और पुख्ता भी ।
    ० इसी तरह कभी एक कहानी लिखी थी ‘पाँच बहनें-और उस कहानी को लेकर जब किसी ने फिल्म बनाने की बात की, तो मैंने कहानी को फिर से देखा । अहसास हुआ कि इस जमीन पर जो कहा जा सकता था, वह कहानी में नहीं उतर पाया था। यह अहसास कुछ इस तरह मेरा पीछा करने लगा कि एक दिन मुझे पकड़कर बैठ गया । कुछ और मसले भी थे, जो कहानी में नहीं आ पाए थे । और उन सबको लेकर पाँच की जगह सात श्रेणियों के किरदार सामने रखे और उन सबको कागज़ पर उतार दिया । अब उसे नाम दिया है-उनके हस्ताक्षर' ।
    -अमृता प्रीतम
  • Kahanikar Kamleshwar : Punarmulyankan
    Pushp Pal Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-879

    Availability: In stock

    ‘नयी कहानी’ की प्रसिद्ध त्रयी के प्रमुख पुरोधा रूप में उभरे कमलेश्वर निश्चय ही प्रेमचंदोत्तर समय के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अत्यंत लोकप्रिय कहानीकार हैं। ‘नयी कहानी’ के समय से लेकर नयी शती के प्रथम दशक तक अपने को उन्होंने निरंतर सृजनशील रखा, एक से एक बढ़कर उम्दा और सशक्त कहानियां रचकर। ‘राजा निरबंसिया’, ‘खोई हुई दिशाएं’, ‘जार्ज पंचम की नाम’, ‘मांस का दरिया’ से लेकर ‘मानसरोवर के हंस’, ‘इतने अच्छे दिन’, ‘तुम्हारा शरीर मुझे पाप क लिए पुकारता है’, ‘सफेद सड़क’ जैसी कितनी ही कालजयी और विश्वस्तरीय श्रेण्य कहानियां उनके खाते में हैं जिन्होंने हिंदी कहानी का चेहरा पूरी तरह बदलकर रख दिया। सहास विश्वास नहीं होता कि कहानी के ललित कोमल स्वरूप में उन्होंने बौद्धिकता का ऐसा निर्मोक प्रदान कर दिया कि वह चिंतन-स्तर पर पाठक को इतना उद्वेलित कर सकने की क्षमता से युक्त हो सकी है। 
    प्रख्यात कथा-समीक्षक डाॅ. पुष्पपाल सिंह ने अपनी प्रखर और पूर्ण निष्पक्ष दृष्टि से कमलेश्वर के समग्र कहानी-साहित्य का यह अत्यंत सुचिंतित अध्ययन प्रस्तुत किया है, यदि वे कमलेश्वर की कहानियों के श्रेष्ठ पर रीझकर उनका पूर्ण निस्संग और उन्मुकत भाव से विश्लेषण करते हैं तो उनके श्याम पक्ष और न्यूनताओं का भी रेखांकन इसी बेबाकी से करते हैं।
  • Satta Ke Aar-paar
    Vishnu Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9106

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    —इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Aakhiri Adhaai Din (Paperback)
    Madhup Sharma
    120

    Item Code: #KGP-161

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Khushwant Singh
    Khushwant Singh
    150 135

    Item Code: #KGP-30

    Availability: In stock

    किताबघर प्रकाशन की महत्वाकांक्षी कथा-सीरीज़ 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' को विस्तार देते हुए इसे अब अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया गया है । अर्थात् इस सीरीज़ में अब सभी भारतीय भाषाओँ के शीर्ष कथाकारों की प्रतिनिधि कहानियां उपलब्ध कराये जाने की योजना है ।
    सीरीज़ के इस नव्यतम सेट में शामिल कथाकार हैं : अमरकान्त, कृष्ण बलदेव वैद, खुशवंत सिंह, गोविन्द मिश्र, ज्ञानरंजन, देवेन्द्र सत्यार्थी, निर्मल वर्मा, प्रतिभा राय, शनी, शेखर जोशी तथा शैलेश मटियानी । विभिन्न भाषाओँ के इन भारतीय कथाकारों ने अपनी सर्जनात्मकता के बल पर स्वयं को आधुनिक कथा के जिस शीर्षस्थ स्थान पर स्थापित किया है वह अपने आप में एक उपलब्धि है । इसी 'उपलब्धि' को एक सीरीज़ के माध्यम से पाठक तक पहुँचाकर हम गौरवान्वित है ।
    यह सुखद संयोग है कि आजादी के पावन स्वर्ण जयंती  के शुभ अवसर पर देश का विशाल पाठक वर्ग इन कथाओं के माध्यम से मनुष्य और परिवेश के नितांत नये रूपों और अप्रकाशित छवियों को पा सकेगा । इन कहानियों में आदमी के मनुष्य हो जाने की अनुभूतियों के जिस तरलता और सरलता से पिरोया गया है, वह सचमुच एक अदभुत पाठकानुभव है । 
    कहानीकार के कथाकर्म का प्रतिनिधि एवं केंद्रीय स्वर, गहन आत्मीयता से यहाँ सामने लाया गया है । यह कथाकार की अपनी कथाभूमि तो है ही, लगता है, हम सबकी सगी दुनिया भी यही है । टूटती-ढहती और फिर से बनती-सँवरती दुनिया । मानवताकामी शुभेच्छा की यह आकांक्षा ही इस सीरीज़ की वह शक्ति है जो आज के तमाम चालू कथा- सीरीज़ों से इसे अलग खड़ा करती है ।
    तो, प्रस्तुत है खुशवंत सिंह की दस प्रतिनिधि कहानियाँ  ।
  • Puraan Gatha
    Sudarshan Vashishath
    90 81

    Item Code: #KGP-1842

    Availability: In stock

    पुराण गाथा
    हमारे देश में हिमालय वह भू-भाग है, जहाँ वेद-पुराण रचयिता ऋषि-मुनियों ने वास किया । हमारा पौराणिक साहित्य भी विवित्र है । जितना काल्पनिक लगता है, उतना ही व्यावहारिक है । जितना यथार्थवादी है, उतना ही प्रतीकात्मक भी है । समस्त साहित्य काव्यमय होने के कारण कई बार अतिजशयोक्ति का भ्रम देता है, किंतु कल्पना त्तत्त्व को हटा देने पर एकाग्र यथार्थवादी से जाता है । इस साहित्य में सर्वाधिक यथार्थवादी रचना महाभारत है, जिसमें हर पात्र, हर घटना को यथार्थवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है । किसी भी आदर्श पात्र को कहीं पर बक्शा नहीं गया है ।
    प्रस्तुत है, सहज-सरल भाषा में हिमालय क्षेत्र की रोचक गाथाएँ ।
  • Kohare Se Lipe Chahre
    Suryakant Nagar
    130 117

    Item Code: #KGP-1802

    Availability: In stock

    कोहरे से लिपे चेहरे
    सूर्यकांत नागर उन कथाकारों से हैं जो आधुनिक संवेदना की जटिलता और उसकी सहज अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाते हैं। उनके रचनाकार की मार्मिकता मनुष्य के विशिष्ट स्वभाव र्ताक्वे स्थितियों में उतरकर उन्हें पहचानने के गुणों में निहित है । वे अपनी कहानियों में इनके अन्तर्सम्बंधों के प्रति व्यग्र दिखाई देने हैं ।
    उनको चिंता के केंद्र में मनुष्यता है । मानवीय मूल्यों में उनकी गहरी आस्था है । अपनी कहानियों में मनुष्य के दोहरे और दोगलेपन का उजागर करने का वे कोई अवसर नहीं छोडते । दूसरों  द्वारा अपमानित होने के बजाय जब  मनुष्य स्वयं की नजरों में लज्जित होता है तो अधिक ग्लानि का अनुभव करता है । संग्रह की 'तमाचा', 'अँधेरे से उजास', 'एक और विभाजन' तथा 'अब अब और नहीं' कहानियाँ इसी श्रेणी की हैं । नागर जी के पास एक सहज, प्रवाहमयी भाषा है, जिनमें कहीँ-कहीँ व्यंग्य का मार्मिक और अनायास स्पर्श है-वर्णन, संवाद और चरित्रांकन तीनों में ।
    सूर्यकांत नागर किसी विचारधारा से ज़कड़े लेखक नहीं है कि विचारधारा का सहारा लेकर वैतरणी पार कर लें । वे स्वाधीनता का मार्ग चुनते हुए अपनी राह स्वयं बनाते है । उनकी हर कहानी सौद्देश्य और उत्तरदायी है । कथा-कथन में वे सिद्ध हैं । कहानियों की नोकें भले उतनी उभरी दिखाई न दें, परंतु भीतरी चुभन प्राय: हर कहानी में मौजूद है । सादा तबियत र्वश्च अंतर्मुखी नागर जी ने विविध विषयों में खूब लिखा है, लेकिन वे अभी भी अपने विशिष्ट होने का मान नहीं होने देते ।
  • Baazaar Mein Guriya
    Sitesh Alok
    190 171

    Item Code: #KGP-284

    Availability: In stock

    बाज़ार में गुड़िया
    कवि, कहानीकार, उपन्यासकार डॉ. सीतेश आलोक ने पिछले तीस वर्षों में साहित्य की अनेक विधाओं में अपने अवदान द्वारा एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। वे उन कवियों में हैं जो लीक से हटकर नितांत अपनी शैली में अपने मन की बात कहने का साहस रखते हैं।
    इनकी अनेक कविताएँ भारतीय भाषाओं के साथ ही अंग्रेज़ी में भी अनूदित होकर प्रकाशित होती रही हैं।
    डॉ. आलोक के लिए कविता सायास रची जाने वाली कोई सामग्री न होकर सहज ही उपजने वाली अभिव्यक्ति है। ऐसी रचनाएँ नित्य नहीं उपजतीं... किसी साँचे में ढालकर नहीं बनाई जा सकतीं।
    इस संग्रह की अनेक कविताएँ ‘आजकल’, ‘साहित्य अमृत’, ‘साक्षात्कार’, ‘विपाशा’ आदि कई पत्रा- पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
  • Aids : Tathya Evam Bhrantiyan
    Shuk Deo Prasad
    100 90

    Item Code: #KGP-9144

    Availability: In stock

    एड्स कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है कि रोगी का पारिवारिक या कि सामाजिक बहिष्कार किया जाय जैसा कि पहले कुष्ठ रोगियों प्रति किया जाता था। वैसे कुष्ठ भी अब असाध्य नहीं रहा। इस सामाजिक नजरिए में बदलाव की जरूरत है। एड्स रोगी को घृणा नहीं आपका स्नेह चाहिए। एक साथ रहने, उठने-बैठने, भोजन करने, सामूहिक स्नान गृह/शौचालय में जाने, वस्त्रों के संप्रयोग से एड्स नहीं फैलता और न ही एक दफ्तर में साथ काम करने से या कि भीड़ भरे स्थानों में, रेल-बस में साथ-साथ सफल करने से। अतः आप एच.आई.वी. संक्रमित/एड्स ग्रस्त व्यक्ति के साथ सहभागिता कर सकते हैं। ऐसी सामाजिकता से उसकी अपनी जिंदगी के प्रति रुझान बढ़ जाएगी।
    एड्स के अधिकांश मामले यौन संसर्ग के देखे गए हैं। फिर दूषित रक्ताधान, साझे ब्लेडों, सुइयों/सिरिंजों के इस्तेमाल से भी संक्रमण होता है अर्थात् शारीरिक द्रव, यौनिक द्रव इसके प्रसार के कारण हें। इन बातों को ध्यान में रखकर और इनसे परहेज करके आप रोगी के साथ मजे से गुजर-बसर कर सकते हैं। एड्स के बारे में बहुत सी भ्रांत धारणाएं समाज में व्याप्त हैं। उन भ्रांतियों का निवारण और तथ्यों की सटीक जानकारी देना ही पुस्तक का मंतव्य है। एड्स के प्रति आम आदमी की भाषा में जागरूकता जगाने के ही उद्देश्य से पुस्तक लिखी गई है।
  • Kyon Tanaavgrast Hai Shiksha-Vyavastha
    Jagmohan Singh Rajput
    250 225

    Item Code: #KGP-218

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Maitreyi Pushpa
    Maitreyi Pushpa
    275 248

    Item Code: #KGP-312

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar (Paperback)
    Ajit Kumar
    90

    Item Code: #KGP-1384

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अजितकुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'उपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Doob Aur Pani
    Bhagwati Sharan Mishra
    50 45

    Item Code: #KGP-9036

    Availability: In stock


  • Dushyant Kumar Rachanavali (Paperback)
    Vijay Bahadur Singh
    1250

    Item Code: #KGP-77

    Availability: In stock


  • Malyalam Ke Mahaan Kathakaar : Srijan-Samvaad
    Dr. Arsu
    200 180

    Item Code: #KGP-902

    Availability: In stock

    मलयालम के महान कथाकार : सृजन-संवाद
    अन्तर्सबंधों की मजबूती से ही संस्कृति टिकाऊ बनेगी । कला और संस्कृति के माध्यम से ही यह प्रक्रिया संभव  होगी । भाषायी अजनबीपन के कोहरे को मिटाने पर ही मानवीय सोच-संस्कार का क्षितिज विशाल बनेगा ।
    बहरहाल भाषायी कठमुल्लेपन को हटाकर हम हिंदी को सर्वभारतीयता का प्रतीक बनाना चाहते हैं । उसके लिए भाषायी भाईचारा पहले मज़बूत बने । उत्तर-दक्षिण का खुला संवाद इसका एक रास्ता है ।
    यह कृति मलयालमभाषी हिंदी लेखक डॉ० आरसु की साहित्यिक तीर्थयात्रा का परिणाम है । इसके पीछे एक विराट लक्ष्य है । यह भाषायी समन्वय का कार्यक्षेत्र है । सुदूर दक्षिण के प्रांत केरल में रहकर कई साहित्यकारों ने अमर कृतियाँ लिखी हैं । उनकी कृतियां भी राष्ट्र भारती की संपदा हैं ।
    तकषी शिवशंकर पिल्लै, एस०के० पोटटेक्काटट और एम०टी० वासुदेवन नायर को इस भाषा में कृतियां लिखकर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था । उनके समानधर्मी और भी कई कथाकार हैं ।
    सृजन-क्षण की ऊर्जा, उन्मेष और उलझन पर उनके विचारों से अवगत होने के लिए अब हिंदी पाठकों को एक अवसर मिल रहा है । दक्षिण भारत की एक भाषा के साहित्यकारों के साक्षात्कार पहली बार एक अलग पुस्तक के रूप में हिंदी पाठकों को अब मिल रहे हैं ।
    मलयालम के बीस कथाकारों के हृदय की नक्षत्रद्युति यहाँ हिंदी पाठकों को मिलेगी । कुछ विचारबिंदु वे अवश्य आत्मसात् भी कर सकेंगे। हिंदी भेंटवार्ता के शताब्दी प्रसंग में प्रकाशित यह कृति एक कीर्तिमान है । इस कृति के माध्यम से मलयालम और हिंदी हाथ मिलाती हैं । दक्षिण के हृदय को उत्तर समझ रहा है । यह सांस्कृतिक साहित्यिक समन्वय की एक फुलझड़ी है ।
  • Janhit Tatha Anya Kavitayen
    Hiralal Bachhotia
    85 77

    Item Code: #KGP-1856

    Availability: In stock

    जनहित तथा अन्य कविताएँ
    हीरालाल बाछोतिया की कविताओं में आज के मनुष्य की जिजीविषा, करुणा एवं मनस्ताप अभिव्यक्त हुआ है । कविताओं में एक ताजगी है, अन्य समकालीनों से अलगाव, जिसे है कवि का एक आवश्यक गुण मानता है । अपने परिवेश, अपनी धरती और अपनी आंतरिक अन्विति इन कविताओं में सजीव रूप में ध्वनित हुई है ।
    इस संग्रह की कविताएँ चार खंडों में विभाजित हैं । इन चारों खंडों में वैविध्य भी है और एक आंतरिक सामंजस्य भी । जो विशेष बात इन तमाम कविताओं में दिखाई दी, वह है मनुष्य के संताप को दूर करने के लिए कविता के द्वारा अक्रिय प्रयास । इसे मैं मानव-मुक्ति को कविता कह सकता हूँ ।
    इस संग्रह में कहीं-कहीं प्रकृति के अछूते बिंब है और ऐसा लगता है कि महानगर के विषाक्त वातावरण में रहकर भी कवि अपने अतीत को और अपने आत्मीय क्षणों को भूल नहीं पाया है । किंतु यह अतीतजीवी होना नहीं, नित नवीन की और अग्रसर होते हुए अपनी स्मृतियों को भी सहेजकर रखने जैसा है ।
    हिंदी पाठकों को ये कविताएँ आकृष्ट भी करेंगी और एक नई काव्य-संवेदना से भी उनका साक्षात्कार होगा ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mamta Kaliya
    Mamta Kalia
    150 135

    Item Code: #KGP-75

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ममता कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आपकी छोटी लड़की', 'वसंत-सिर्फ एक तारीख', 'लड़के', 'दल्ली', 'लैला-मजनू', 'जितना तुम्हारा हूँ', 'सुलेमान', 'छुटकारा', 'पीठ' तथा 'बोहनी' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ममता कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Thus Spake Lord Krishna (Self-Help)
    Shiv K. Kumar
    295 266

    Item Code: #KGP-329

    Availability: In stock

    Only he whose hands are steady on the steering wheel of his mind and body and is in full control of his desires, can carry the wisdom's mark on his forehead. To such an enlightened mind, the darkness of the night glows like a sunlit day, dark ignorance yielding to bright knowledge. Nothing can hoodwink his all-perceiving eyes. A genuine saint is such a man blessed by the Gods.
    Like the deep sea, he absorbs an insurgent flood but does not let its shore-line be deflected. It welcomes rivers from all directions but is not overwhelmed by them—its underworld remains undisturbed because its centre can always hold.
    So, O blessed Prince, throw away the yoke of your impulses, their oppressive burden, regaining your suzerainty over them. Disengage yourself from man's prime infirmities—his ego and passion.
    This, O Prince, is the only way to merge into God, the individual soul's union with the Oversoul. Once you are up there on the heights, you will never slide down to the dark valley below. It will then be the same for you—living or dying, waking or dreaming, gaining or losing.
    This is what the sages call Moksha—release from the bondage of birth and death—basking forever in the sunshine of Life Divine, of peace eternal.
  • Baitaal Suno
    Rajendra Tyagi
    250 225

    Item Code: #KGP-123

    Availability: In stock

    बैताल सुनो 
    'बैताल सुनो' की रचनाओं का इतिहास भी अजीब है । अच्छी हास्य-रचनाएँ पाठकों को पढ़ने को मिलें, इस दृष्टि से मैंने इन्हें 'कादम्बिनी' में विशेष रूप से लिखना शुरु किया। एक संपादक के नाते मैं नहीं चाहता था कि मेरे नाम से कई रचनाएँ एक अंक में प्रकाशित हो । फिर मेरे लेखन की दृष्टि पाठकों के लिए अलग है । चाहे वे कहानियां हों अथवा 'कालचिंतन' जैसा विशिष्ट दार्शनिक स्तंभ या फिर 'आखिर कब तक' या 'समय के हस्ताक्षर' ये सब एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं । एक स्तंभ चिंतन के लिए है तो दूसरा राजनीतिक और सामाजिक अभिव्यक्ति के लिए ।
    एक गंभीर लेखक हास्य-व्यंग्य की रचनाएं भी बहुत सटीक ढंग से लिख सकता है, पाठकों के लिए यह आश्चर्य का विषय होगा । ऐसी स्थिति में, मैं यानी राजेन्द्र अवस्थी हास्य-व्यंग्य की दुनिया से जाकर 'सेवकराम ओखाडू' बन गया ।
    तो इन्हीं 'सेवकराम ओखाडू' की हास्य-रचनाएँ है इस संग्रह में ।

  • Anuvaad Aur Bhaashik Sanskriti Hindi Ke Prayojanparak Sandarbh
    Rita Rani Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-528

    Availability: In stock

    हिंदी लंबे समय से अनुवाद कर्म करने के बावजूद हम अनुवाद को भाषायी गतिविधियों से सकारात्मक और सर्जनात्मक ढंग से जोड़ने में बहुत सफल नहीं हो पाए हैं। अनुवाद के माध्यम से हिंदी को अभिव्यक्ति की सहजता से, उसकी बोलियों की अपनी कमाई हुई शब्दावली और भंगिमाओं से, जीवन संदर्भों की निकटता से जोड़ते हुए भाषायी पैनेपन को निखार नहीं पाए हैं।
    भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर की भाषाओं के लिए कई तरह की चुनौतियां हैं। हिंदी को उन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपनी भाषिक संस्कृति को न केवल पहचानना होगा बल्कि उस भाषिक सांस्कृतिक परिवेश को कायम रखने का हर प्रयास करना होगा, जिसमें हिंदी भाषी समाज का सामूहिक अवचेतन और जातीय स्मृति संचित है; साथ ही जिसमें हिंदी भाषी समाज की मौजूदा और भावी पीढ़ियों की आशाएं, आकांक्षाएं अपना विस्तार और प्रसार पाती हैं और पाएंगी। भाषायी अस्मिता केवल बोलचाल, घरेलू व्यवहार, मनोरंजन से संचित और समृद्ध नहीं होती। उसके लिए उच्चकोटि के सर्जनात्मक साहित्य और साहित्य-विमर्श के साथ-साथ आवश्यक होती है उस भाषा में ज्ञान-संपदा की, दैनंदिन जीवन के बड़े से बड़े कार्यकलाप के संचालन, प्रयोजन और चिंतन की निरंतर और सिलसिलेवार मौजूदगी।
    प्रस्तुत पुस्तक हिंदी भाषा-संस्कृति के इन्हीं व्यापक सरोकारों से संबंधित है।
  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai (Paperback)
    Ubaid Siddqi
    200

    Item Code: #KGP-200

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
    इस संग्रह के प्रकाशन से मैं बहुत ख़ुश हूं और उम्मीद करता हूं कि उबैद की शाइरी के रसास्वादन के बाद आप ख़ुद को भी इस ख़ुशी में मेरा शरीक पाएंगे।
    दशहरयार 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mamta Kaliya (Paperback)
    Mamta Kalia
    80

    Item Code: #KGP-7002

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : ममता कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ममता कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आपकी छोटी लड़की', 'वसंत-सिर्फ एक तारीख', 'लड़के', 'दल्ली', 'लैला-मजनू', 'जितना तुम्हारा हूँ', 'सुलेमान', 'छुटकारा', 'पीठ' तथा 'बोहनी' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ममता कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Tal-Ghar
    Deepak Sharma
    175 158

    Item Code: #KGP-1835

    Availability: In stock


  • Vaigyanikon Ki Batein
    Shuk Deo Prasad
    100

    Item Code: #KGP-921

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Aisa Satyavrat Ne Nahin Chacha Tha
    Raj Kumar Gautam
    60 54

    Item Code: #KGP-2100

    Availability: In stock

    ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था
    सदी के इस कठिन और जटिल समय में हिन्दी के जिन युवा लेखकों ने उपन्यास लिखे हैं उनके बीच राजकुमार गौतम की 'उपस्थिति' महत्वपूर्ण और 'निजी' ढंग से हुई है । अपनी सादगी, संवेदनशीलता और आयासहीन शिल्प के लिए चर्चित राजकुमार गौतम का कहानीकार 'ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था' में एक प्रौढ़, अनुभवी लेकिन जोखिम उठने वाले मछुआरे की तरह उतरा है । प्रतिकूलताओं और असभ्य जीवन स्थितियों के उछाल मारते, सिर पटकते पागल समुद्र की अतल गहराई में दुबली आस्था और संघर्ष की जो 'मछली' राजकुमार ने पकड़ी है और अपने नायक सत्यव्रत को सौंपी है उसके लिए इस उपन्यास को बहुत देर तक और दूर तक एक चमत्कार की तरह याद किया जाएगा ।
    नामहीन-व्यक्तित्वहीन केंद्रीय चरित्रों के मौजूदा ममय में इस उपन्यास का 'सत्यव्रत’ वापसी है उस नामधारी व्यक्तित्व की जिसका लोप छठे दशक के उत्तरार्द्ध से आरंभ हुआ था । 'ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था' में राजकुमार ने यथार्थ के स्तर-दर-स्तर उदघाटित करने के लिए जो अनेक आयामों वाली तीखी भाषा 'खोजी' है और प्रतिकुलताओं से लडते- भिड़ते लहूलुहान आदमी की गहरी त्रासदी, उदासी, करुणा और अंतर्द्वन्द्व को 'उभारने' के लिए जिस 'अंडरकरेंट' की तरह बहते 'सटायर' को चुना है वह मौजूदा समय में लिखी जा रही इकहरी और एकायामी रचनाओं के 'भब्भड़' में एक गहरा रचनात्मक सुख प्रदान करता है । भाषा के स्तर पर एक घटना के रूप में रेखांकित किया जा सकने वाला यह उपन्यास कथ्य के स्तर पर आज के आदमी की तकलीफदेह साँसो की गवाही तो है ही, यह गवाही है उसके टूटकर भी न टूटने की जिद और आकांक्षा की भी ।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Jaishankar Prasad
    Jaishankar Prasad
    180 162

    Item Code: #KGP-9158

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं जयशंकर प्रसाद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘आकाश-दीप’, ‘ममता’, ‘आंधी’, ‘मधुआ’, ‘व्रत-भंग’, ‘पुरस्कार’, ‘इंद्रजाल’, ‘गुंडा’, ‘देवरथ’ तथा ‘सालवती’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Ek Sur Mera-Ek Saarangi Ka
    Pandit Ram Narayan
    195 176

    Item Code: #KGP-2069

    Availability: In stock

    एक सुर मेरा-एक सारंगी का
    पंडित रामनारायण ऐसे पहले कलाकार हैं, जिनके माध्यम से सारंगी वाद्य का पुनर्जन्म हुआ, इस वाद्य को लंबे समय से खोई हुई अपनी सांस्कृतिक पहचान मिली ।
    सारंगी वाद्य को लेकर यदि इस महापुरुष की सही में किसी से तुलना की जा सकती है तो पाश्चात्य संगीत के महान् वॉयलिनवदक पागानीनी, जिन्होंने वॉयलिन की वादनशेली में आमूलचूल परिवर्तन कर नये सिरे से वादनशैली को स्थापित किया । दूसरे महान संगीतज्ञ रेस्ट्रो पस्वीज और तीसरे यहूदी मेनुहिन जैसे महारथी संगीतज्ञों से ही उनकी तुलना की जा सकती है । 
     यदि धनुर्वाद्य के इस महापंडित एवं आचार्य के बारे में  संक्षेप से कुछ कहा जाए तो उनकें वाद्य से जिस तरह की ध्वनि  (साउंड) संचारित हुई, वैसी आज तक किसी अन्य वादक के वाद्य में नहीं सुनी गई । गज के संचालन को लेकर सार्थक अनुसंधान करते हुए पंडित जी ने जो तकनीक विकसित की वो किसी अन्य वादक की क्षमता और कल्पना से बाहर की बात सिद्ध हुई । फिर आलाप की बात करें तो पंडित जी ने अपनी अद्भुत सोच से इसमें एक-एक स्वर का प्रयोग समझदारी के साथ करते हुए संपूर्ण आलाप में लय का समावेश करते हुए उसे नए ढंग से परिभाषित किया और विलक्षण जोड़ की परिकल्पना सारंगी जैसे वाद्य से साकार किया । पंडित जी ने जिस राग को छुआ, उसकी शुद्धता को कायम रखते हुए उसे नए आयाम दिए। इसके अतिरिक्त विलंबित 'गत' अथवा रचनाओं को बजाने का उन्होंने अपना अलग कौशल और इन रचनाओं से बजने वाले एक-एक 'बोल' का लय में कुशलता के साथ गुँथा होना, तानों की विविधता और उनमें विलक्षण द्रुतगति, जो आज तक न देखी, न सुनी गई और इस सब पर आत्मा को छू जाने वाले स्वरों जैसी कुछ चंद विशेषताओं ने उन्हें इस वाद्य का आचार्य एवं महापंडित बना दिया ।
  • Teen Laghu Upanyas : Mamta Kaliya (Paperback)
    Mamta Kalia
    150

    Item Code: #KGP-211

    Availability: In stock


  • Hashiye Ka Raag
    Sushil Sidharth
    300 270

    Item Code: #KGP-9334

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Malay
    Malay
    190 171

    Item Code: #KGP-730

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी  ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...। (‘हरी दूब पर क्षण भर’ से)
    - नंदकिशोर नवल
  • Mori Ki Int
    Madan Dikshit
    150 135

    Item Code: #KGP-9073

    Availability: In stock


  • Soochana Ka Adhikaar (Paperback)
    Vishv Nath Gupta
    70

    Item Code: #KGP-1438

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ganga Prasad Vimal
    Ganga Prasad Vimal
    200 180

    Item Code: #KGP-89

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार गंगाप्रसाद विमल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इंता-फिंता', 'बच्चा', 'अभिशाप', 'आत्महत्या', 'सन्नाटा', 'बाहर न भीतर', 'फूल कह रहे हैं', 'बदहवास, 'अतीत मेँ कुछ' तथा 'बीच की दरार'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक गंगाप्रसाद विमल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Roshni Mein Chhipe Andhere
    Gurudeep Khurana
    250 225

    Item Code: #KGP-485

    Availability: In stock

    शुभ्रा उसकी आंखों में देखते हुए धीरे से बोली, "नहीं दीप, ऐसी बात तुम्हारे मुंह से अच्छी नहीं लगती। अगर हालात ऐसे बने हैं तो इसमें शहर का क्या दोष। ऐसे दया भाई तो कहीं भी हो सकते हैं। कब, कहां ऐसा जहर भर दें, कुछ नहीं कह सकते। बहुत दिन नहीं ठहरेगा यह जहर। देखना, जल्दी सब नार्मल हो जाएगा।"
    "मुझे तो लगता है इस दौरान नफरत के जो बीज बो दिए गए हैं उनका असर पुश्तों तक चलेगा।"
    "यह तो है। नफरत फैलाने में घड़ियां लगती हैं और मिटाने में सदियां।"
    "बिलकुल ठीक।"
    "वैसे मैं एक बात और भी कहना चाहती हूं...कह दूं?"
    "जरूर!"
    "देखो दीप, घृणा केवल वही नहीं जो दया भाई जैसे लोग फैला रहे हैं...घृणा वो भी है जो तुम्हारे मन में पल रही है दया भाई के प्रति।"
    "कहना क्या चाह रही हो?"
    "यही कि वह घृणा भी कम घातक नहीं। मैं तो सोचती हूं...उन लोगों के बारे में भी घृणा से नहीं, प्यार से भरकर सोचो। आखिर वे कोई अपराधी तत्त्व नहीं। अपनी तरफ से वे जो भी कर रहे हैं राष्ट्रहित में कर रहे हैं। बस, दिशा भटक गए हैं। बहके हुए लोग हैं वे।..."
    —इसी पुस्तक से

  • Priyakant
    Pratap Sehgal
    160 144

    Item Code: #KGP-2043

    Availability: In stock

    प्रियकांत
    प्रताप सहगल उन लेखकों में से हैं, जिन्होंने अपने लड़कपन से ही दिल्ली नगर को महानगर और महानगर को सर्वदेशीय नगर (Cosmopolitan City) बनते हुए देखा है। इस बदलाव के साथ जुड़े आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक पहलुओं के बदलते रंगों को भी महसूस किया है। इन बदलते रंगों के साथ बदलते वैयक्तिक संबंधों और मूल्य-मानों पर उनकी पैनी निगाह रहती है। इसीलिए उनके लेखन में निरा वर्णन नहीं होता, बल्कि उसके साथ समय के कई सवाल जुड़े रहते हैं। कभी यथार्थ के धरातल पर तो कभी दर्शन के स्तर पर ।
    उनका नया उपन्यास 'प्रियकांत' भी कोई अपवाद नहीं है। पिछले तीस-चालीस सालों में धर्म का व्यापारीकरण और बाजारीकरण हुआ है। इसके लिए आम-जन को अपने परोसने के लिए धर्म के नए-नए मंच बने और नए-नए धर्मगुरु तथा धर्माचार्य फिल्मी सितारों की तरह चमकने लगे।
    'प्रियकांत' एक ऐसे ही धर्माचार्य के उदय और उसके साथ जुड़ी महत्वाकांक्षाओं और विसंगतियों की कथा है। पात्र पौराणिक हो, ऐतिहासिक हों या समकालीन-प्रताप सहगल की नज़र हमेशा उनके माध्यम से समय के साथ मुठभेड़ मर ही रहती है। और इस उपन्यास में भी धर्म, धर्मगुरु, ज्ञान एवं अनुभव से जुड़े कुछ सवाल ही रेखांकित होते हैं...शेखर, नीहार और गुलशन के साथ...आप पढ़ेंगे तो आपको भी लगेगा कि इस कथा में आप भी कहीं न कहीं ज़रूर हैं।
  • Main Or Mera Man
    Dr. Sharad Nagar
    480 432

    Item Code: #KGP-7851

    Availability: In stock

    मैं और मेरा मन जीवन के एक विलक्षण साधक और रसिक की कलम से निकली हुई यादों, बातों, दास्तानों और दस्तावेज़ों का अनूठा सम्मिश्रण है। इस पुस्तक में हम मिलते हैं एक ऐसे सर्जक से जो अपनी गहरी से गहरी तकलीफें भूलने की कोशिश करता तथा तमाम जगहों और लोगों को दिए हुए अपने वायदों को निभाता हुआ उनके इतिहास और भूगोल को, उनकी बातों और वि़फस्सों को जिलाए रखने के काम में पूरे यव़फीन और मोहब्बत से जुटकर अपने जीने की ख़ुराक ढूँढ़ता है।
    डॉ. शरद नागर के मन में समाए इन लोगों और लोकों के किस्सों में हमें मिलते हैं घने पारिवारिक रिश्ते, गली-मोहल्लों के यादगार चित्रा और चरित्रा तथा अनदेखे पूर्वज। साथ ही हमें मिलती हैं बीसवीं सदी के सामाजिक इतिहास की कुछ ऐसी बारीकियाँ जिनके आज की पाठ्यपुस्तकों में पहुँचने की नौबत ही नहीं आती-जैसे, 1918 के इन्फ्ऱलूएन्ज़ा के प्रकोप की दिल को दहला देने वाली यादें; आगरा में बसे गुजराती नागरों के मोहल्लों-टोलों की भूली-बिसरी आवाज़ें; आज़ादी की जंग के दौर में मिले सृजन और सौहार्द के संस्कार; मैकॉले की नीति का शिक्षा और सामाजिक स्तरीकरण पर प्रभाव; समाज के बदलते उसूलों और खुलती-कसती बेड़ियों के बीच औरतों की स्थिति ही नहीं, बल्कि उनका श्रम, उनकी रचनात्मकता, उनकी जंग; तथा भारतीय रंगमंच के इतिहास से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ाव।
    शरद जी एक साहित्यकार और ज़िंदगी तथा समाज की तहों में गहरे उतरकर रमने वाले आराधक और कलाकार के रूप में अमृतलाल नागर के बहुत बड़े उपासक थे। इस पुस्तक में प्रस्तुत उनका लेखन अमृतलाल नागर जी को लेखक और पिता के रूप में बड़े निराले ढंग से जिलाता है। हम न केवल लेखक बनने से जुड़ी अमृतलाल नागर जी की निजी और उनके परिवार की अनेक संघर्ष यात्राओं को पहचान पाते हैं बल्कि आज़ादी के पहले के तीन दशकों में और आज़ादी के बाद के चार दशकों में साहित्य और रंगमंच समाज से किस व़फदर गुँथकर अपनी दिशाएँ खोज रहे थे, उसका अहसास भी हमें ख़ूब होता है।
  • Ek Aur Chandrakanta (2nd Part)
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-900

    Availability: In stock


  • Sahitya-Darshan
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    400 360

    Item Code: #KGP-756

    Availability: In stock


  • Goma Hansti Hai
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-1991

    Availability: In stock

    गोमा हंसती है
    शहरी मध्यवर्ग के सीमित कथा-संसार में मैत्रीय पुष्पा का कहानियाँ उन लोगों को लेकर आई हैं, जिन्हें आज समाजशास्त्री 'हाशिए के लोग' कहते है । वे अपनी 'कहन' और 'कथन' में ही अलग नहीं हैं, भाषा और मुहावरे में भी ‘मिट्टी की गंध' समेटे हैं ।
    'गोमा हंसती है' की कहानियों के केंद्र में है नारी, और वह अपन सुख-दु:खों, यंत्रणाओं और यातनाओं में तपकर अपनी स्वतंत्र पहचान माँग रही है । उसका अपने प्रति ईमानदार होना ही 'बोल्ड' होना है, हालाँकि यह बिलकुल नहीँ जानती कि वह क्या है, जिसे 'बोल्ड होने' का नाम दिया जाता है । नारी-चेतना की यह पहचान या उसके सिर उठाकर खड़े होने में ही समाज की पुरुषवादी मर्यादाएं या महादेवी वर्मा के शब्दों में 'श्रृंखला की कडियाँ' चटकने-टूटने लगती है । वे औरत को लेकर बनाई गई शील और नैतिकता पर पुनर्विचार की मजबूरी पैदा करती है । 'गोमा हंसती है' की कहानियों की नारी अनैतिक नहीं, नई नैतिकता को रेखांकित करती है ।
    इन साधारण और छोटी-छोटी कथाओं को 'साइलैंट रिवोल्ट' (निश्शब्द विद्रोह) की कहानियाँ भी कहा जा सकता है क्योंकि नारीवादी घोषणाएँ इनसे कहीं नहीं है । ये वे अनुभव-खंड है जो स्वयं 'विचार' नहीं हैं, मगर उन्हीं के आधार पर 'विचार' का स्वरूप बनता है ।
    कलात्मकता की शर्तों के साथ बेहद पठनीय ये कहानियाँ निश्चय ही पाठको को फिर-फिर अपने साथ बॉंधेंगी, क्योंकि  इनमें हमारी जानी-पहचानी दुनिया का वह 'अलग' और 'अविस्मरणीय' भी है जो हमारी दृष्टि को माँजता है।
    इन कहानियों की भावनात्मक नाटकीयता निस्संदेह हमें चकित भी करेगी और मुग्ध भी। ये सरल बनावट की जटिल कहानियां है ।

    'गोमा हँसती है' सिर्फ एक कहानी नही, कथा-जगत्की एक 'घटना' भी है । -राजेन्द्र यादव

  • Swasthya Gyan
    Dr. Rakesh Singh
    190 171

    Item Code: #KGP-722

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य-ज्ञान
    पुस्तक में स्वास्थ्य से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर लगभग  35 लेख संकलित हैं । जो लोग यह कहते  हैं की चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम में ही पढाया जा सकता हैं, उनके लिए वे लेख चुनौती है और सिद्ध करते है कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा कै। उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को  माध्यम से पढाया जा सकता है । 
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है । इन लेखों में अधिकांशतः इस बात को ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग  दवाओं का नाय याद कर लेते है और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते है । उससे कितनी हानि हो सकती है, यह 'दवाओ के उपयोग में सावधानियाँ' शीर्षक से स्पष्ट हैं । इसी प्रक्रार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारना से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है । 'ह्रदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हदय- रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है । इसमें अधुनातन  चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है । अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-सम्पन्न है । कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्य एवं उनके सफल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतिक है ।
  • Madhumeh Evam Chikitsa
    Maitreyi Pushpa
    120 108

    Item Code: #KGP-9319

    Availability: In stock

    सन् 1967 की बात है। उन दिनों मैं अखिल भारतीय संस्थान, नई दिल्ली के मेडीसन विभाग में कार्य कर रहा था। फारमकाॅलाॅजी में एम. डी. करने के पश्चात् मेडीसन में भी एम. डी. करने की योजना थी। उन दिनों रोगियों से बातचीत करने पर लगता था कि दिल्ली के नागरिकों को स्वास्थ्य संबंधी विशेष जानकारी नहीं थी। कारण भी स्पष्ट था। उन दिनों न तो हिंदी में स्वास्थ्य संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं और न पत्र-पत्रिकाओं से इस प्रकार की जानकारी मिल पाती थी। हां, अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं में यदा-कदा लेख छप जाया करते थे। 
    अतः मन में निरंतर यह बात खटकती रहती थी कि इस कमी को कैसे दूर किया जाय। संयोगवश उन्हीं दिनों श्री रतनलाल जी जोशी से परिचय हुआ। वे उन दिनों ‘दैनिक हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र के प्रधान संपादक थे। बस, उन्हीं से प्रेरणा प्राप्त कर मैंने ‘दैनिक हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र में स्वास्थ्य संबंधी लेखन प्रारंभ किया जो आगे चलकर ‘रोगियों के प्रश्नोत्तर’ नाम से स्थायी स्तंभ के रूप में लगभग बीस साल तक चलता रहा।
    मेरी ऐसी मान्यता है कि आयुर्विज्ञान संबंधी साहित्य का जब तक हिंदी में मौलिक सृजन नहीं होगा, तब तक इस विज्ञान को जन-मानस से नहीं जोड़ा जा सकता। अनुवादित ग्रंथों से जानकारी तो मिल जाती है, परंतु मौलिकता नहीं आ पाती।
    स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संगठित हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में मैंने सदैव अनुभव किया है कि स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान हिंदी के माध्यम से ही जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।
    इसी परिवेश में प्रस्तुत पुस्तक ‘मधुमेह एवं चिकित्सा’ की रचना की गई हे, जिससे लोगों को लाभ होगा, ऐसा विश्वास है।
  • Mere Saakshatkaar : Amrita Pritam
    Amrita Pritam
    250 225

    Item Code: #KGP-16

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : अमृता प्रीतम
    पंजाबी और भारत के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में से एक, अमृता प्रीतम के साक्षात्कारों की यह किताब हमें उस अमृता से मिलाती है, जिसकी जात उसके ज़माने के हर दु:ख का आईना है । यह दु:ख चाहे निजी हो या दुनिया के किसी भी समाज में किसी भी इंसान का । यह भी ज़रूरी नहीं कि इसका संबंध उसके समय से हो । अत्याचार दूर कहीं अतीत में भी किसी के साथ हुआ हो, तो वह युगों और सदियों के फासले पर भी उसकी पीड़ा अपने भीतर महसूस करती है । इसी तरह अपने गम में उन्हें अपना साथी मानकर उनसे अपना दर्द बाँटती है । समकालीन साहित्यकारों के साथ, इतिहास के साथ, सूफियों के साथ अमृता ने जो बातचीत की है, उसमें समय या सोच का कोई फासला कहीं प्रतीत नहीं होता । यह किताब अमृता के जीवन के समस्त पहलुओं को अपने में समेटे हुए है । और आगाज़ से अंजाम तक अमृता के जीवन और सृजन का आईना बनकर अब आपके हाथों में है ।
  • Jeevan Hamara (Paperback)
    Bebi Kambley
    60

    Item Code: #KGP-1509

    Availability: In stock

    जीवन हमारा
    मराठी लेखिका बेबी कांबले दलित साहित्य की प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । दलित लोगों के विपन्न, दयनीय और दलित जीवन को आधार बनाकर लिखे गए इस आत्मकथात्मक उपन्यास ने मराठी साहित्य में तहलका मचा दिया था। महाराष्ट्र के पिछडे इलाके के सुदूर गाँवों में अस्मृश्य माने जाने वाले आदिवासी समाज ने जो नारकीय, अमानवीय और लगभग घृणित जीवन का जहर घूँट-घूँट पिया उसका मर्मांतक  आख्यान है यह उपन्यास । शुरु से अंत तक लगभग सम्मोहन की तरह बाँधे रखने वाले इस उपन्यास में दलितो के जीवन में जड़ें जमा चुके अंधविश्वास पर तो प्रहार किया ही गया है, उस अंधविश्वास को सचेत रूप से उनके जीवन में प्रवेश दिलाने और सतत पनपाने वाले सवर्णो की साजिश का भी पर्दाफाश किया गया है । इस उपन्यास को पढ़ना महाराष्ट्र के डोम समाज ही नहीं वरन् समस्त पददलित जातियों के हाहाकार और विलाप को अपने रक्त में बजता अनुभव करना है । शोषण, दमन और रुदन का जीवंत दस्तावेज है यह उपन्यास, जो बेबी कांबले ने आत्मकथात्मक लहजे में रचा है ।
  • Man Mirza Tan Sahiban
    Amrita Pritam
    90 81

    Item Code: #KGP-1967

    Availability: In stock


  • Sarla : Ek Vidhva Ki Aatmjeevani
    Pragya Pathak
    100 90

    Item Code: #KGP-2062

    Availability: In stock


  • KUCH SAMAY BAAD
    Devendra Chaubey
    180 162

    Item Code: #KGP-1563

    Availability: In stock

    कुछ समय बाद
    पहले कहानी-संग्रह से ही देवेन्द्र चौबे इस रूप में आश्वस्त करते नजर आते है कि वह मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कथाकार हैं । 'कुछ समय बाद’ की अधिकांश रचनाएं पाठक को विभ्रम से निकालकर यथार्थ से जोड़ने का काम करती हैं। 'उत्तर-कथा' के नेपाली के हों या 'छोटे-छोटे सपने' के करीमना के, कहानीकार पात्रों के जीवनानुभवों को समझते हुए उनके मन में उतर जाने की सामर्थ्य रखता है । कहीं वह मन की शांति की सच्ची खोज करता है तो कहीं व्यक्ति के सपनों के दरकने के कारणों की खोज करता नजर आता है ।
    शहर और गाँव के बीच प्रभावित होते जीवन को तो देवेन्द्र अपनी कहानियों में  लाते ही हैं, सामूहिक राजनीतिक चेतना का विवेकशील स्फुरण भी यहीं मौजूद है, जो स्थानीय हितों को अदेखा नहीं करता । चरित्रों, स्थितियों और जीवन के विविध ऐसे प्रसंगों से कहानी की जमीन अपनी ही भाषा से तलाशना देवेन्द्र को भाता है, जो व्यक्ति के अनुभव को समृद्ध करते हुए उसे और अधिक संवेदनशील बनाते हैं । उनकी रचनाओं की यह सहज विशेषता है कि वे समाज के कोनों-अंतरों में चल रहे छोटे-छोटे महायुद्धों की टोह लेती नजर आती हैं । जीवन की सहजता यहाँ उसकी विसंगतियों के साथ मौजूद है ।
    अव्यवस्थित और मनुष्य-विरोधी व्यवस्था पर कहानियों के जरिए कमेंट करना देवेन्द्र चौबे के कथाकार को अच्छा लगता है । अपनी पहली कहानी से ही जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था लिए यह कथाकार जब 'सजा' जैसी बड़ी कहानी पर पहुंचता है तो यह संकेत भी दे जाता है कि यथार्थ को पकड़ने के लिए दूरी भी कभी-कभी सहायक साबित होती है । सोवियत संघ के विघटन के बहाने लिखी गई यह कहानी गौरतलब तो है ही, गंभीर बहस भी आमंत्रित करती है ।
  • Guru Nanak Dev
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-131

    Availability: In stock

    मानवता को सत्पथ पर ले जाने के लिए ईश्वर महान् आत्माओं को धरती पर भेजता है । गुरू नानक देव एक ऐसे ही महान् आत्मा थे, जिन्होंने मानव मात्र के कल्याण के लिए अपने जीवन को तपाया । उन्होंने जग की भलाई के लिए स्वयं नाना प्रकार के कष्ट झेले । वे ऐसे महापुरुष थे, जो जाति-पांति के भेदभाव से दूर रहते थे । उनका सादा जीवन लोक-कल्याण के लिए ही था । वे जीवन को सोने की भाँति तपाकर विश्व का कल्याण करते थे ।
    गुरू नानक देव की शिक्षाएं हमें जीवन में उत्तम मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं । उन्होंने मनुष्य मात्र को अच्छाइयों को स्वीकार करने की प्रेरणा दी । बुराइयों से दूर रहने की बात उन्होंने सर्वत्र कही । वे दया, क्षमा, करुणा, प्रेम और बंधुत्य  शिक्षा देते थे ।
    वे मानव मात्र को भलाई के मार्ग पर चलने की शिक्षा देते थे । उनकी दृष्टि में न काई छोटा था, न बड़ा, सभी समान थे ।
  • Hinsaabhas
    Deepak Sharma
    60 54

    Item Code: #KGP-9109

    Availability: In stock

    हिंसाभास
    सामाजिक परिवेश में रची-बसी इस संग्रह की कहानियाँ आज के संघर्षरत मानव की मर्मान्तक पीडा का चित्रण अत्यन्त मर्मस्पर्शी तथा हृदयबेधक भाषाशैली में करती हैं । हमारे दैनंदिन जीवन में विषमता, नीरसता और विरक्ति का जो जहर घुल चुका है उससे हमें आगाह भी करती हैं। मानव-मानव के बीच बढती विषमता और कटुता की खाई को यदि समय रहते पाटा न गया, और सौहार्द व सदभात्र की भावना को न रोपा गया तो हम विघटन और विनाश की जोखिम-भरी जिन्दगी जीने के लिए बाध्य होकर रह जायेगे ।

  • Computer Kosh
    Dr. Rajeshwar Gangwar
    500 450

    Item Code: #KGP-175

    Availability: In stock


  • Maheep Singh Rachana-Sanchayan
    Mahip Singh
    695 626

    Item Code: #KGP-718

    Availability: In stock


  • Culture Valture
    Mamta Kalia
    350 315

    Item Code: #KGP-9221

    Availability: In stock

    कल्चर वल्चर
    शीर्षस्थ कथाकार ममता कालिया की प्रत्येक रचना पर उनकी रचनाशीलता के हस्ताक्षर रहते हैं। संवेदना की थाह लेने और भाषा में उसे संभव करने का उनका अपना एक अनूठा ढंग है। ‘कल्चर वल्चर’ ममता कालिया का नवीनतम उपन्यास है। इसके बीज-विचार के संदर्भ में उन्होंने लिखा है, ‘कला, साहित्य व संस्कृति आज सरोकार न रहकर कारोबार बनते जा रहे हैं और इसके प्रबंधक, कारोबारी। इनके हाथों में संस्कृति, विकृति बन रही है और साहित्य, वाहित्य।’
    ममता कालिया ने बहुत कुशलता के साथ कोलकाता की पृष्ठभूमि में इस उपन्यास की कथा बुनी है। महत्तर उद्देश्यों को लेकर अस्तित्व में आई एक साहित्यिक- सांस्कृतिक संस्था किस तरह विडंबनाओं, विरूपताओं, अंतर्विरोधें, कपट, कलह, चतुर चाटुकारिता व निजी महत्त्वाकांक्षाओं का तलघर बन जाती है—यह तथ्य ‘कल्चर वल्चर’ में उजागर हुआ है। लेखकीय कौशल यह है कि सारे चरित्र और कथा-प्रसंग कल्पना पर आधारित होते हुए भी अपनी निष्पत्तियों में अत्यंत जीवंत हैं। चाहें तो इस उपन्यास में समकालीनता की पदचाप या अनुगूंज भी सुन सकते हैं। नवीन और सुषमा जैसे चरित्र अपने निहितार्थों के साथ पाठक के चित्त पर अंकित हो जाते हैं। लेखिका ने व्यापक संदर्भों के साथ उन मनोवृत्तियों को टटोला है जो शब्द में सिक्कों की खनक और साहित्य में सरोकारों का शोकगीत सुनना चाहती हैं। ‘कल्चर वल्चर’ भूमंडलीकरण, उद्दंड पूंजी, निरंकुश सोच आदि के आशयों को भी खंगालता है। अपनी प्रांजल व खिलंदड़ी भाषा के लिए ममता कालिया बहुप्रशंसित हैं। यह उपन्यास उनकी रचनात्मक सिद्धि का एक अभिनव आयाम है।
  • Moldeviya Ki Lokkathayen
    Sanjiv Thakur
    175 158

    Item Code: #KGP-195

    Availability: In stock

    मोल्देविया की लोककथाएँ
    मोल्देविया (वर्तमान नाम मोलदोव (Moldova)) उक्रेन के पास एक छोटा-सा देश है। वहाँ  लोककथाओं की अच्छी-खासी परंपरा रही है। लोककथाओं के साथ-साथ वहीं लंबी-लंबी परीकथाएँ भी कही-सुनी जाती रही हैं। इस संग्रह मेँ उनमें से कुछ लोककथाएँ और परीकथाएँ प्रस्तुत की गई हैं। संग्रह में प्रस्तुत लोककथाओं में जहाँ जनजीवन से जुडी बाते है, वहीँ परीकथाओं में अदभुत कल्पनालोक दिखाई देता है । इन्हें पढ़कर मोल्देविया के सामान्य लोगों के कल्पनाशील होने का पता चलता है तो अपने समाज के यथार्थ के प्रति उनके जागरूक होने का पता भी चलता है। एक तीसरी धारा हास्य की है जो मोल्देविया के जन-मानस में बहती दिखाई देती है ।
    राजा, राजकुमारी, राजकुमार, जमींदार, पादरी, गरीब आदमी, गड़रिया, ड्रैगन, दैत्य आदि अच्छे-बुरे पात्रों के द्वारा कही गई ये कथाएँ अच्छाई, बुराई, चालाकी, दुष्टता, बुद्धिमानी, मूर्खता, शत्रुता, मित्रता जैसी चीजो से पाठकों का परिचय अनायास करवा सकती है ।
    मोल्देविया के लोक-मानस की थाह दिलाने वाली ये कथाएँ बच्चों और बडों को समान रूप से आकर्षित करने की सामर्थ्य रखती हैं ।
  • Shankar Shesh : Samagra Naatak (3 Vols.)
    Shanker Shesh
    1600 1440

    Item Code: #KGP-725

    Availability: In stock

    शंकर शेष: समग्र नाटक (3 खण्डों में)
    डॉ. शंकर शेष हिंदी नाट्य साहित्य के अत्यंत प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। पार्थिव शरीर से हमारे साथ न होते हुए भी अपनी रचनाओं के माध्यम से वे निरंतर अपने पाठकों के मन में रहते हुए एक संवाद में लीन अनुभूत होते हैं। 
    डॉ. शेष ने लगभग बीस पूर्ण अंकी नाटक, एकांकी, उपन्यास और कुछ लेख आदि लिखकर साहित्यिक जगत् में जितनी प्रतिष्ठा अर्जित की, चलचित्र जगत् में पटकथा लेखक के रूप में वे उससे कम चर्चित नहीं रहे, बल्कि उनकी विशेषता रही कि उन्होंने सिनेमा जगत् में कम काम किया, किंतु उसके लिए कोई समझौता नहीं किया।
    प्रस्तुत ‘शंकर शेष: समग्र नाटक’ (तीन खंड) में उनके प्रकाशित-अप्रकाशित सभी नाटक-एकांकी संकलित हैं। केवल शेष वही रहा है, जिसका रूप इतना अधूरा था कि उसे पूरा करते तो फिर वह डॉ.  शेष का न रहकर संशोधक या पूरा करने वाले का हो जाता।
    डॉ.  शेष के जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ उनकी रचनाधर्मिता में भी वह उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है और वह व्यक्ति जितना सहज था, इसका प्रमाण भी उनकी रचनाओं में बिखरा पड़ा है। प्रस्तुत तीन खंडों में उनका नाटककार रूप संश्लिष्ट होकर पाठक के सामने आता है। 
    हमें आशा ही नहीं, विश्वास है कि इन खंडों में पाठकों को शंकर शेष की रचनात्मकता के कई स्तर और आयाम मिलेंगे।
  • Halahal
    Dhirendra Aasthana
    180 162

    Item Code: #KGP-1952

    Availability: In stock

    हलाहल
    धीरेन्द्र अस्थाना ने अपने साथी रचनाकारों की तुलना से कम लिखा है; लेकिन जो भी लिखा है, उसका हिंदी के व्यापक पाठक समाज में बेहद ममता और ललक के साथ स्वागत हुआ है । गहरी, मर्मस्पर्शी और अनेक आयामी भाषा के कुशल शिल्पी धीरेन्द्र अस्थाना का नाम उन रचनाकारों से लिया जाता है, जो लेखन को बेहद गंभीरता से लेते हैं और किसी प्रकार की जल्दबाजी में नहीं रहते । यही कारण है कि उनका लेखन उत्पादन नहीं, सृजन की श्रेणी में खडा मिलता है । लिखे जाने के क्रम में 'हलाहल' उनका दूसरा उपन्यास है । पहली बार सन् 1988 में प्रकाशित इस उपन्यास को आज भी पढ़ना रचनात्मकता की उस ताकत से हमारा साक्षात्कार कराता है, जिसे मुहावरे की भाषा में 'पुनर्नवा' कहते है । स्त्री-पुरुष संबंधों की एक बेहद पेचीदी स्थिति में उलझ गए इस उपन्यास के नायक की त्रासदी और वेदना इसका सतही सत्य है । अपने गोरे अर्थों में यह उपन्यास उन प्रतिकूलताओं को उजागर करता हैं, जिनमें फैलकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति 'नारसिसस' हो जाने के अभिशाप की तरफ फिसल जाता है, क्योंकि उसे सहेजने-संवारने के लिए एक तिनका तक प्रकट नहीं हो पाता । हिंदी के अत्यंत चर्चित और बहुपठित लेखक उदय प्रकाश ने कभी लिखा था 'धीरेन्द्र अस्थाना एक तटस्थ निर्ममता और निर्वेग संयम के साथ अपने भीतरी संसार के समूचे अंतर्द्वद्वों  के बखान के लिए बाहरी दुनिया में उसका समरूप प्रति संसार तलाशते हैं । ऐसे 'कोरिलेटिव' को अजित करना समकालीन लेखन में रचनात्मक उपलब्धि मानी जानी चाहिए ।'
  • Gyarah Shreshtha Kahaniyan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-804

    Availability: In stock

    ग्यारह श्रेष्ठ कहानियां
    हिंदी कहानी ने अपनी यात्रा में अनेक सुगम और दुर्गम मार्ग तय किए हैं । वैदिक साहित्य की आख्यायिकाओं तथा ब्राह्मण ग्रंथों में आए अनेक आख्यान हमारी कहानी-परंपरा के आदि स्रोत रहे हैं । सर्जना की सर्वथा लोकप्रिय विधा रहने के कारण कहानी, लेखकों की लेखनी की लाडली विधा भी बनी रही और संभवत: इसीलिए कहानी के अलंकरण और उपयोग निरंतर विकासमान रहे । प्रेमचंद और प्रसाद ने हिंदी कहानी को जिस श्रेष्ठ लोकहित में मर्यादित और निर्धारित किया, उसकी अनुगूँजें आज भी हिंदी के युवा कथाकारों की रचनाओं में प्रवहमान है ।
    जनप्रियता के कारण हिंदी कहानी की गति को खूब-खूब  उतार-चढाव भी देखने पड़े तथा कथा-आंदोलनों के शोर में विशिष्ट कहानियों के प्रभामंडल का पहचान पाना तक एक मुश्किल कार्य हो गया । कहीं अनुभूत यथार्थ के चित्रण  का शोर, तो यहीं कल्पनावृत्ति को तिलांजलि देने की जिद । ऐसे में कहानी की रचनाशीलता को समग्रता में हानि पहुंची। मगर इस गुलगपाड़े के बीच जो अच्छी कहानियाँ लिखी गई, वे ही अंतत: हमारी कथा-धरोहर भी बनती गई हैं।
    प्रस्तुत संकलन से संपादकद्वय ने हिंदी की ऐसी श्रेष्ठ कहानियों को प्रस्तुत किया है जो अपने पाठ के माध्यम से हमें लौकिक बनाती हैं तथा हमारे सामाजिक संज्ञान और सरोकारों को, समय की कसौटी पर कुशलता से स्थापित और उद्वेलित करती हैं। व्यक्ति भले ही न रहे, मगर पात्र का चित्रण उस व्यक्ति का शाश्चता सौंप सके-ऐसी क्षमता जिन कहानियों में समाहित है-उन्हें ही प्रस्तुत संग्रह में संकलित किया गया है । प्रेमचंद, जयशंकर पसार तथा विष्णु प्रभाकर आदि वरिष्ट कथाकारों की कालजयी कहानियों के साथ-साथ, अन्य सुप्रतिष्ठित कहानीकारों की कहानियाँ भी पाठक एवं साहित्य के छात्र इस एक ही जिल्द से पढ़कर लाभान्वित होंगे, इसी आशमा और अपेक्षा के साथ यह संग्रह आपको सौंपा जा रहा है ।
  • Neend Se Pahale
    Soma Bharti
    195 176

    Item Code: #KGP-373

    Availability: In stock

    नींद से पहले
    सोमा भारती की कहानियां हमें उस जानी-पहचानी निम्न- मध्यमवर्गीय दुनिया में ले चलती हैं, जिनसे हम जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जिन्हें हम देखकर भी अनदेखा किए रहते हैं।
    इनके पात्र, चाहे वह ‘जस्सो मासी मर गई’ की जस्सो मासी हों या ‘नींद से पहले’ के रमापति, ‘किराये के मकान’ की पेइंग गेस्ट हो या कोई अन्य, मोमबत्तियों की तरह हवाओं में जूझते, जलते-गलते रहते हैं। वे आपसे दया की भीख नहीं मांगते, लेकिन समय, संयोग और नियति ने उन्हें जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, उसका दीदार जरूर कराती हैं कि देखो, यह मैं हूं, यह तुम भी हो सकते थे।
    सोमा ने अभिनय और एंकरिंग आदि अभिव्यक्ति के जिन मंचों पर काम किया है, उसका लाभ उनकी भाषा-भंगिमा, भाव और बोध को मिला है। कहानियों के रचाव-रसाव के लिए सोमा को किसी सायासता की जरूरत नहीं पड़ती, भाषा-शिल्प के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते, न ही चैंकाने वाले चमत्कारों के टोने-टोटके टटोलने की आवश्यकता होती है। कहानियों की सहज संवेदना ही उनकी शक्ति है, जिनकी तासीर खुद-ब-खुद आपको पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
    सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ! सोमा ने दूसरी कहानियां न भी लिखी होतीं, उनकी अकेली कहानी ‘जस्सो मासी मर गई’ ही उन्हें अमर बना सकती है।
    --संजीव
  • Bhartiya Loktantra Aur Hamare Raastrapati
    Janak Raj Jai
    495 446

    Item Code: #KGP-141

    Availability: In stock

    भारतीय लोकतंत्र और हमारे राष्ट्रपति
    भारत के गणतंत्र-राष्ट्र बनने पर 26 जनवरी, 1950 को डॉ० राजेन्द्रप्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने, जो लगभग बारह वर्ष तक इस पद पर रहे…और अब 25 जुलाई, 2007 को श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण की।
    हमारे सभी राष्ट्रपति प्रबुद्ध, देशभक्त तथा विद्वान थे, जो विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण पदों पर रहे । सभी ने अत्यंत प्रतिबद्धता, गौरव तथा निष्ठा से अपना कार्यकाल पूरा  किया। जनहित के कुछ मुद्दों पर कभी-कभी किन्हीं राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के बीच मतभेद भी हुए । कभी-कभी किन्हीं राष्ट्रपति ने अपने पद की गरिमा निभाते हुए अपने निर्णय स्पष्ट रूप से जाहिर किए । महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने तो साफ कह दिया है कि वे सभी कार्य व निर्णय संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत करेंगी ।
    भारत का सविधान आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रपति को भारतीय नागरिकों के उत्थान एवं संविधान की रक्षा हेतु पूर्ण अधिकार देता है ।
    इस पुस्तक में हिंदू कोड बिल, पोस्टल बिल, अध्यादेश, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स प्रकरण, शाहबानू प्रकरण, संसद और विधानसभाओं को भंग करना, हंग संसद, संविधान के अंतर्गत बाहर रहकर समर्थन देना और प्रधानमंत्री की नियुक्ति जैसे प्रमुख मुदूदों पर भी चर्चा की गई है ।
    राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच अनकहे घात-प्रतिघातों की रोचक घटनाओँ का विवरण भी इस पुस्तक में पढ़ने को मिलेगा ।
    यह पुस्तक वास्तव में सुधी नागरिको और पाठकों के लिए जीवंत दस्तावेज सिद्ध होगी । देश के प्रति प्रेम रखने वालों तथा स्वातंत्र्य-प्रेमी पाठकों को यह पुस्तक अवश्य रुचिकर लगेगी ।
  • She (Stories)
    Dixy Gandhi
    425 383

    Item Code: #KGP-783

    Availability: In stock

    A first ever collection of stories centered around Women’s lives in Modern Times
    Society in modern times is changing very fast, and so is changing the situation and role of women in facing and dealing with them. With the expansion of education among them, they are taking things with gusto and intelligence, at times coming out with unexpected results. Their understanding is different, approach is different and what they present is also not only engrossing but also enlightening.
    It is time women wrote with themselves at the centre of happenings and here is perhaps the first such collection of exciting stories by the upcoming author Dixy Gandhi who shows great promise and quality.

  • Meri Priya Kahaniyan
    Jwahar Singh
    50 45

    Item Code: #KGP-9065

    Availability: In stock


  • Kabir Ka Samagra Anbhai Sansar (1st Part)
    Govind Rajnish
    1000 900

    Item Code: #KGP-689

    Availability: In stock

    संत कबीर भारतीय चेतना का ऐसा शिखर है जिसके सम्मुख शब्द और शब्दातीत नतमस्तक होते हैं। उनकी बानी ‘अनहद का अनुभव’ है। ऐसा अनुभव; जिसमें जीव, जगत् और परमात्मा की सघन अभिव्यक्ति है। कबीर की बानी साखी, सबद, रमैनी के अंतर्गत रखकर पढ़ने व विश्लेषित करने की सुदीर्घ परंपरा है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ में मर्मज्ञ आलोचक प्रो. गोविंद रजनीश ने इस परंपरा को संवधिर्त किया है।
    कबीर-काव्य के तीन स्रोत हैं—राजस्थानी, पंजाबी और पूरबी की प्राचीन पांडुलिपियाँ। इनके तुलनात्मक विवेचन द्वारा मूल व प्रामाणिक पाठ तक पैठने का यत्न किया गया है। कबीर के नाम से प्रचलित ‘बानियों’ और ‘क्षेपकों’ का तार्किक परीक्षण किया गया है। इससे कबीर-काव्य का आस्वाद दुगुना हो गया, ऐसा पाठक महसूस करेंगे।
    प्रो. रजनीश ने भावार्थ, पाठांतर और टिप्पणी के द्वारा कबीर के अनेक आयामों को उद्घाटित किया है। कबीर लोक में समाए संत-कवि हैं। उनसे संबंधित बहुतेरे तथ्य दंतकथाओं, जनश्रुतियों और अन्य शब्द-प्रपंच में ओझल होते रहे हैं। यहाँ एक प्रयास यह भी है कि ‘चिनगी’ को ‘राख’ से निकाल लिया जाए। तभी यह सिद्ध हो सका कि कबीर-काव्य समकालीन संदर्भों में एक नयी प्रासंगिकता अर्जित कर रहा है। झूठ, कपट, पाखंड के खिलाफ सदियों पहले गूँजे शब्द आज भी चुनौती और चेतावनी दे रहे हैं।
    ‘संसकिरत है कूप जल भाखा बहता नीर’ ऐसा कहने वाले कबीर की अंतरात्मा को थाहना बेहद कठिन रहा है। ‘ढाई आखर’ के बल पर पंडिताई को ललकारने वाले कालजयी कबीर के प्रामाणिक पाठ को अर्थ-विस्तार से पढ़कर पाठक निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे। शोध्कर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध पाठकों तक समानरूपेण उपयोगी। मानव जीवन के उन्नयन व परिष्कार के साथ भक्ति और अध्यात्म की रश्मियाँ बिखेरती कबीर बानी को विद्वान् लेखक ने ‘पुनः पाठ की सार्थकता’ प्रदान की है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ वस्तुतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
  • Yugdhvani
    Bal Swaroop Raahi
    250 225

    Item Code: #KGP-807

    Availability: In stock

    लोकप्रियता की युगधवनि
    बालस्वरूप राही की ये कविताएं उस यादगार दौर की कविताए हैं, जब कविता के पाठक तथा श्रोता रसज्ञ तथा संवेदनशील हुआ करते थे और युवक-युवतियों में विशेष रूप से कविता के प्रति गहरा लगाव होता था। इन कविताओं को पढ़-पढ़ कर प्रौढ़ता की ओर अग्रसर हो रहे कविता-प्रेम भी पुन: युवा को जाया करते थे। आज को लगभग पांच दशक पहले भी राही की रुबाइयों, ग़ज़लों, गीतों तथा लम्बी कविताओं में यही खूबी थी। इन पंक्तियों के लेखक ने वह ज़माना देखा है, जब मंच से सुनाए जाने पर ये कविताएं श्रोताओं के मन-प्राण पर अंकित हो जाया करती थीं और उन की डायरियों में दर्ज हो जाती थीं। घनघोर रूप से पसन्द की जाने वाली उन की अनेक कविताएं देश- भर में काव्य-प्रेमियों को कंठस्थ है ।
    प्रसन्नता की बात है कि राही की ऐसी विविध आयामी परम लोकप्रिय कविताएं, जो अब तक उन के किसी संकलन में नहीं आई थीं और कविता-प्रेमियों  द्वारा जिन के प्रकाशन की मांग निरन्तर की जा रही थी, अब पुस्तकाकार प्रकाशित हो रही हैं।
    देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओँ में एक के बाद एक प्रकाशित होने वाली ये अविस्मरणीय कविताएं न केवल राही की लम्बी सार्थक काव्य-यात्रा में मील के पत्थर के समान हैं, वरन् पिछले पांच दशकों में हिन्दी-कविता के बदलते रूप-रंग तथा मिजाज़ की भी पुख्ता पहचान कराती हैं।
    राही का यह अनूठा काव्य-संकलन 'युगध्वनि' हिन्दी कविता की लोकप्रियता के इतिहास को समझने के इच्छाओं तथा काव्य-प्रेमियों के लिए सचमुच एक तोहफे के समान है।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 1 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7059

    Availability: In stock

    गुल्लू कर्णपुर गांव के किसान विजयपाल का बेटा है। उसका असली नाम गुलशन है, पर सब उसे प्यार से ‘गुल्लू’ ही कहते हैं। उसकी उम्र है लगभग बारह साल। उसकी एक छोटी बहन है राधा। उसकी उम्र आठ साल है। परंतु वह स्कूल नहीं जाती। कारण, उनके गांव में कोई स्कूल नहीं है। उनकी मां को मरे आठ साल हो गए। राधा को जन्म देने के बाद मां चल बसी थी।
    गुल्लू की मां की मृत्यु के बाद उनके पिता ने पास के गांव की सविता नामक एक महिला से पुनः विवाह कर लिया। सौतेली मां घर में आई तो गुल्लू खुश था। उसे भरोसा था कि उसे और उसकी छोटी बहन को मां का प्यार मिल जाएगा। पर सौतेली मां बहुत कठोर स्वभाव की थी। शुरू में कुछ दिन तो ठीक रहा, पर बाद में उसने बच्चों को पीटना शुरू कर दिया। बात-बात में भला-बुरा कहती। यद्यपि किसान के सामने वह लाड़-प्यार का नाटक करती, पर उसके खेत में जाते ही वह बच्चों को डांटना शुरू कर देती।

    -इसी पुस्तक से
  • Jahaan Charan Pare Raghuvar Ke (Paperback)
    Rajesh Tripathi
    195

    Item Code: #KGP-7031

    Availability: In stock

    इतिहास में ओरल हिस्ट्री (मौखिक इतिहास) को मान्यता मिली हुई है। ओरल हिस्ट्री यानी इतिहास के वे ब्योरे जो किताबों में भले न हों पर जुबान पर हों, स्मृतियों में हों। राजेश ने इस अंचल की ओरल हिस्ट्री को रिकॉर्डेड हिस्ट्री में बदलने का भी काम किया है जिसके लिए इतिहासकारों को भी उनका आभारी होना चाहिए। यह किताब इतिहास और उपन्यास के दो छोरों के बीच झूलते उस हिंडोले की तरह है जिसकी हर पेंग एक नई दुनिया की सैर कराती है। मुझे विश्वास है कि यह किताब सिर्फ अपने कंटेंट के लिए नहीं बल्कि अपने अंदाजे- बयां के लिए भी पाठकों का इस्तकबाल हासिल करेगी।
  • Dharmkshetre Kurukshetre
    Shanker Shesh
    70 63

    Item Code: #KGP-2014

    Availability: In stock

    धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे 
    धृतराष्ट्र का विवाह! अंधे को चतुर्भुज बनाना ! कोण देगा अनंत अँधेरे को अपनी कन्या ? कौन करेगा अपंग जीवन का वरण ? प्रश्न टेढा था । सत्यवती दबाव डाल रही यी। लगातार पडी थी  मेरे पीछे ।
    माँ को तो एक बार समझा भी लो, दादी को समझाना कठिन होता है । पौत्र चाहे लूला हो, लँगडा हो, अपाहिज हो, लेकिन उसका ब्याह होना बहुत जरूरी है । आज़ तक समझ में नहीं आया, मौका पाते ही एक स्त्री दूसरी स्त्री पर अत्याचार क्यों करने लगती है । सत्यवती क्यों नहीं सोचती ।  अंधे से ब्याह करने वाली लड़की को आजन्म कारावास भोगना पडेगा । सारी जिदगी अंधे की पत्नी कहाना होया । राजघराने का आदमी हुआ तो क्या हुआ, अंधा तो अंधा है,  रहेगा । लेकिन सत्यवती को समझाता कौन ! मेरा पिता तो उसे समझा नहीं सका, फिर मैं किस खेत की मूली था !
    इच्छा  हुई अपना उदाहरण सामने क्यों न रखूँ। आखिर मैं भी पूरे जीवन बिना स्वी के रह सका या नहीं । सशक्त ददेवपुत्र-सा दिखाई देन वाला में । तो यह 'अंधा क्यों नहीं रह सकता । मेरे मामले में  सत्यवती इतनी कठोर क्यों हो गई थी और अब पौत्र  के मामले में। (इसी उपन्यास से)
  • 20-Best Stories From China
    Prashant Kaushik
    295 266

    Item Code: #KGP-9312

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Chinese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Taoist Novice, Chang And Cheng, Supernatural Wife, Taoist Priest, Man Thrown In A Well, Rat Wife, this book is a compilation of 20 famous Chinese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from China.
  • Hindi Sahitya Ka Itihas (Paperback)
    Hemant Kukreti
    350

    Item Code: #KGP-511

    Availability: In stock

    ‘साहित्य के बेहतर इतिहास में तथ्यों का वस्तुनिष्ठ परीक्षण और पूर्वग्रहरहित विश्लेषण होता है।’ ‘महान साहित्य अपने समय के प्रश्नों और समाज से अलग नहीं होता और न रचनाकार का विवेक इतिहास से स्वायत्त होता है।’ ‘एक अच्छे इतिहास में भाषा और साहित्य की सांस्कृतिक परंपरा, लेखकीय रचनात्मकता का विश्लेषण, देशकाल वातावरण के द्वंद्व और घात-प्रतिघात का संतुलित विश्लेषण किया जाता है। इतिहास लेखन में विकासवादी नजरिया और वैज्ञानिक प्रस्तुति होनी चाहिए।’ हेमंत कुकरेती की ये उपर्युक्त पंक्तियां उनके साहित्य इतिहासबोध को स्पष्ट करती हैं।
    यह अब तक प्रकाशित हिंदी साहित्य का सबसे अद्यतन इतिहास है। हिंदी गीत, गजल इत्यादि से लेकर पत्रकारिता, तमाम गद्य-विधएं, स्त्री एवं दलित विमर्श एवं लेखन के विकास का विश्लेषण किया गया है। इस मायने में यह हिंदी साहित्य का इतिहास आचार्य शुक्ल, द्विवेदी जी, डाॅ. रामविलास शर्मा इत्यादि की परंपरा को आगे बढ़ाता है।
  • Bhartiya Sabhyata Ki Nirmiti
    Bhagwan Singh
    540 486

    Item Code: #KGP-401

    Availability: In stock

    भारतीय सभ्यता की निर्मिति भगवान सिंह की रचनाओं में ही भारतीय इतिहासलेखन के इतिहास में एक नया कीर्तिमान इस विशेष अर्थ में है कि इससे पहले इतिहासकारों की दृष्टि हड़प्पा के नगरों या ऋग्वेद तक जाकर रुक जाती थी, इससे आगे कुछ दीखता नहीं था और बहुत से प्रश्नों का हमें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता था। 
    प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार उन्होंने हड़प्पा काल से भी आठ-दस हजार पीछे के सांस्कृतिक विकासों और सभ्यता के उन नियामक तत्त्वों की खोज की, जिनका उपयोग विविध सभ्यताओं ने अपने निर्माण में गारे और पलस्तर के रूप में किया। विषय गंभीर होते हुए भी उन्होंने इसे इतना सरल और बहुजनग्राह्य रूप में प्रस्तुत किया है कि अखबार पढ़ने की योग्यता रखने वाला व्यक्ति भी इसे पढ़ते हुए किसी तरह के भारीपन या उलझाव का अनुभव नहीं करता। इस पुस्तक में उनकी विवेचनशैली भी उनकी अन्य कृतियों से भिन्न है। नृतत्त्व, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान और साहित्य की सामग्री का इतनी कल्पनाशीलता से उपयोग किसी अन्य कृति में देखने में नहीं मिलता।
  • Subhash : Ek Khoj
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    595 536

    Item Code: #KGP-747

    Availability: In stock

    आज भी वह प्रश्न अपनी जगह पर है और प्रायः तब तक रहेगा जब तक उसका हल नहीं हो जाता कि सुभाषा द्वितीय विश्व समर के अंत हो जाने पर हवाई दुर्घटना में गोलोकवासी नहीं हुए तो कहां गए? क्यों शाहनवाज खां और खोसला आयोग की रिपोर्ट रद्द हुई? क्यों यह प्रश्न ठंडे बस्ते मं डालने की साजिश चलती रही? इसके पीछे कौन लोग थे और हैं? अब मैंने यह जानना चाहा है कि उन पर क्या हो रहा है? इस दृष्टि से मैंने भारत-भ्रमण किया। भारत के अनेक महानगरों, नगरों आदि का दौरा किया। उनमंे वे नगर विशिष्ट थे, जिनका संबंध आज भी नेताजी से है। अनेक स्थानों पर मेरे व्याख्यान हुए।
    अंत में प्रायः मुझसे यह प्रश्न किया गया कि क्या सुभाषा की मृत्यु हवाई दुर्घटना से जापान जाते समय हुई थी? कतिपय जगह यह थी पूछा गया कि क्यों अनेक बार नेताजी के जीवित होने और भारत में प्रकट होने का प्रसंग सुखर््िायों में रहा? इसमें कितना सत्य है? मैंने अपने व्याख्यानों में नेताजी की मृत्यु की चर्चा कहीं भी नहीं की थी। फिर भी श्रोताओं की रुचि इस प्रसंग में बराबर सामने आती रही। 
    आइए, अब इस जटिल प्रश्न पर हम और आप आमने-सामने बैठें और इस बहस को तब तक जारी रखें, जब तक किसी तह तक नहीं पहुंच जाएं। 
    —राजेन्द्रमोहन भटनागर
  • Kaash, Main Raastra-Drohi Hota
    Rajendra Yadav
    500 450

    Item Code: #KGP-9121

    Availability: In stock

    इस संकलन में राजेन्द्र यादव द्वारा सन् 2003 से 2006 के बीच लिखे गए लेख और टिप्पणियां हैं, जिन्हें मुख्यतः ‘हंस’ के संपादकीयों की तरह ही लिखा गया है। 
    संकलन में मुख्यतः आलेख ही हैं, परंतु ‘विकल्प पर विमर्श’ शीर्षक अजेय कुमार के साक्षात्कार को भी इसमें शामिल किया गया है।, क्योंकि इसमें दलित व स्त्री विषयक चिंतन मुखर रूप से सामने आया है।
    इन संपादकीयों में कई जगह दोहराव भी मिलता है, संभवतः इसका कारण यह है कि ये सभी अलग-अलग समय पर लिखे गए विचार और प्रतिक्रियाएं हैं। 
    सब मिलाकर यह एक बेहद विचारोत्तेजक पुस्तक है, जो नया सोचने को मजबूर करती है।
  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-1)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-630

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Bhagwat Ravat
    Bhagwat Rawat
    190 171

    Item Code: #KGP-552

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : भगवत रावत
    यह कविता पर निर्भर करता है कि वह अपने पाठक को कितनी देर अपने पास बिठाए रख सकती है, अथवा पहली बार के बाद दोबारा अपने पास बुलाने को कितना विवश कर सकती है। इस तरह कविता के पास जाने की पहल तो पाठक ही करता है। इसके बाद की जिम्मेदारी कविता पर आ जाती है कि वह कितनी अपने पाठक की हो पाती है। कितनी उसके अनुभव-संसार का रचनात्मक हिस्सा बन पाती है, जो सब कुछ छोड़कर कविता के पास कुछ पाने की गरज से आता है। 
    समाज के जिस अनुभव-संसार में पाठक रहता है, उसी समाज से रचनाकार भी आता है। जीवन की तमाम अच्छाइयों, बुराइयों, समानता, असमानताओं, विसंगतियों और जटिलताओं आदि के बीच रचनाकार जो भी कुछ ऐसा देखता है जिसे प्राप्त भाषा के माध्यम से परिभाषित या अभिव्यक्त करना संभव नहीं होता, तो उसी प्राप्त भाषा को रचनाकार न, सिरे से गढ़ता है और उसके इस प्रयत्न का प्रतिफल ही उसकी रचना होती है।
  • Shishu Seekhen Achchhi Baaten-2
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1106

    Availability: In stock


  • Vish Vansh (Paperback)
    Rajesh Jain
    25

    Item Code: #KGP-1503

    Availability: In stock

    विष वंश
    कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।
    हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार राजेश जैन के इस प्रस्तुत नाटक 'विष वंश' में राजा की यह कथा हमारे आसपास के भ्रष्टाचार के जिस गहन सचिंतन से नंगा करती है, उसमें प्रतिपक्ष के लिए कोई अवकाश नहीं है । राजा अटपटसिंह और महामंत्री चंटप्रताप सिंह के माध्यम से तंत्र के भ्रष्टीकरण को, आज की नारी की अस्मिता क्या राजनीति में पनप राही वंशवाद को प्रवृति के साथ जोड़कर नाटककार ने इस नाट्यकथा को समकालीन समय का एक टकसाली पाठ बना दिया है । प्रजातंत्र ये प्रजा ही सर्वाधिक शक्तिशाली और सत्ताधीश हो-अत्यंत रोचक ढंग का यह सत्यान्वेषण इस नाटक के सुलझी हुई पहेली है ।
    छठे 'आर्य स्मृति साहित्य समान' के निर्णायक मंडल- राम गोपाल बजाज, कन्हैयालाल नंदन तथा असग़र वजाहत जैसे नाट्यविदों के मूल्यांकन के आधार पर सम्मानित इस नाट्यकृति का प्रकाशन, नाटकों की दुनिया में एक सदाबहार खुशबू का आह्वान है, ऐसा विश्वास है ।
  • Mujhse Kaisa Neh
    Alka Sinha
    200 180

    Item Code: #KGP-395

    Availability: In stock

    मुझसे कैसा नेह
    बहुचर्चित कहानीकार अलका सिन्हा ने अपने पहले ही कहानी-संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उडान' की टेक्नोलिटररी कहानियों से अपनी अलग पहचान बनाई । इस संग्रह के लगातार प्रकाशित हो रहे संस्करणों और इस पर संपन्न शोध-कार्य आदि पाठकों की पुरजोर स्वीकृति के प्रमाण हैं ।
    अलका सिन्हा का दूसरा कहानी-संग्रह 'मुझसे कैसा नेह' भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में आधुनिक संदर्भों  और बदलते समीकरणों का खुलासा करता है, बहुत कुछ हासिल कर चुकने के बाद भी भीतर से रिक्त होते जा रहे व्यक्ति की पहचान कराता है । आज के जटिल यथार्थ से उपजे संघर्ष, तनाव और एकाकीपन के धरातल पर खडी ये कहानियां घर-परिवार के बीच से निकलती हुई वैश्विक परिदृश्य की साक्षी बन जाती हैं ।
    मानवीय मूल्यों की पक्षधर इन कहानियों के पात्र तयशुदा ढर्रे से हटकर नए विकल्पों की खोज करते हैं । बेहतरी के नाम पर ये अपने देशकाल या परिस्थितियों से पलायन नहीं करते, न ही अपने स्त्री-पात्रों को जबरन 'बोल्ड' बनाकर स्त्री-विमर्श का झंडा उठाते हैं । दैहिक विमर्श से आगे अपनी अस्मिता के प्रति चेतना संपन्न ये स्त्रियां आधुनिकता की ओट में अमर्यादित नहीं होती तथा उच्छ्रंखल  और उन्मुक्त हुए बिना भी स्त्री मुक्ति की अवधारणा को संपुष्ट करती हैं ।
    स्फीति से बचती दूश्य-प्रधान भाषा-शैली पाठक को एक नई दुनिया का हिस्सा बना देती है और वह सहज ही इन पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । भाव प्रवणता के साथ-साथ वैचारिक चिंतन से दीप्त ये कहानियाँ साधारण व्यक्ति की असाधारण भूमिका की संस्तुति करती हैं और अपने यथार्थ को कोसने के बदले अभिनव संकल्पनाओं की जमीन तोड़ती हैं ।