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  • Taaki Desh Mein Namak Rahe
    Asghar Wajahat
    390 351

    Item Code: #KGP-475

    Availability: In stock

    ताकि देश में नमक रहे पुस्तक में कुल 42 लेख संकलित हैं, जिन्हें दो खंडों में विभाजित किया गया है। पहले खंड के अंतर्गत साहित्यिक लेख हैं, जब कि दूसरे खंड में सामाजिक-सांस्कृतिक लेख संकलित हैं। साहित्यिक लेखों में सिर्फ साहित्यिक विधाओं या सरोकारों की ही बात नहीं की गई है बल्कि कई ऐसी साहित्यिक विभूतियों पर भी लेखक ने पूरी आत्मीयता से लिखा है, जिन्होंने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। मुज़फ्फर अली के साथ बिताए ख़ूबसूरत दिन हों या बेगम अख़्तर, शैलेन्द्र और शहरयार के लिए मन में मौजूद दीवानगी का अहसास, प्रमोद जोशी और ब्रजेश्वर मदान जैसे अपनी तरह की विशिष्ट-सामान्य शख़्सियतों की बातें हों या कुर्रतुलऐन हैदर और मंटो जैसे अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों के प्रति आदर-भाव प्रकट करना हो, हर लेख में असग़र वजाहत कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर दे जाते हैं जिसे पाठक अपने मन से कभी विस्मृत नहीं कर सकता। 
    पुस्तक के दूसरे खंड में संकलित लेख हालांकि सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े हैं लेकिन उनका वैचारिक धरातल अत्यंत विस्तृत है। इनमें भाषा से जुडे़ सवाल, सिनेमा और साहित्य के अंतर्संबंध, आने वाले समय में हिंदी सिनेमा की दशा-दिशा का आकलन, भारतीय गणतंत्र से जुड़े दशकों पुराने अनुत्तरित सवाल और लगातार छीजते जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहन चिंताएं मौजूद हैं। असग़र वजाहत इन लेखों के जरिए वर्तमान समय के जटिल सवालों को न केवल उभारते हैं बल्कि उनसे मुठभेड़ कर उनकी तहों में जाकर कारण भी तलाशते हैं। 
    इन विविध लेखों को क्रमिक रूप से पढ़ने पर हम अतीत से शुरू कर वर्तमान को पार करते हुए भविष्य के संभावित सवालों से भी रूबरू हो सकते हैं। यह असग़र वजाहत के लेखन की कलात्मकता ही है कि वह छोटे तथा मामूली से दिखने वाले मुद्दे या सवाल से अपनी बात शुरू कर उसे पूरे समाज और व्यवस्था के लिए एक ज़रूरी सवाल का स्वरूप प्रदान कर देते हैं।
    भूमिका से 
  • Kuchh Lekh Kuchh Bhaashan
    Atal Bihari Vajpayee
    400 360

    Item Code: #KGP-703

    Availability: In stock

    कुछ लेख, कुछ भाषण
    समूचा भारत हमारी निष्ठाओं का केंद्र और हमारा कार्यक्षेत्र है। भारत की जनता हमारा आराध्य है। हमें अपनी स्वाधीनता को अमर बनाना है, राष्ट्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखना है और विश्व में स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीवित रहना है। इसके लिए हमें भारत को सुदृढ़, शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बनाना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो साधन आवश्यक होगा, हम अपनाएंगे, जो नीति उपयोगी होगी, उसका अवलंबन लेंगे, जो कार्यक्रम हितावह होगा, उसका निर्धारण तथा कार्यान्वयन करेंगे।
    कंधे से कंधा लगाकर, कदम से कदम मिलाकर हमें अपनी जययात्रा को ध्येय-सिद्धि के शिखर तक ले जाना है। भावी भारत हमारे प्रयत्नों और परिश्रम पर निर्भर करता है। हम अपना कर्तव्य पालन करें, हमारी सफलता सुनिश्चित हैं।
    -इसी पुस्तक से
  • Yathartha Se Samvad
    B.L. Gaur
    400 360

    Item Code: #KGP-449

    Availability: In stock

    बेख़ौफ अंगारे
    साहित्य को अब रास नहीं आता निरा रस 
    उससे भी ज़रूरी है कलमकार में साहस 
    ये काम अदब का है–अदब करना सिखाए 
    उनको जो बनाए हैं हरिक काम को सरकस
    दम घुट रहा अवाम का, फनकार बचा लो
    सब मूल्य तिरोहित हुए, दो-चार बचा लो
    सच्चे की शुबां पर हैं जहां शुल्म के ताले
    हर ओर लगा झूठ का दरबार, बचा लो
    संपादकीय ऐसे हैं ऐ दोस्त, तुम्हारे
    जैसे अंधेरी रात में दो-चार सितारे
    गुणगान में सत्ता के जहां रत हैं सुखनवर
    तुम ढाल रहे शब्द में बेख़ौफ अंगारे
    मैं ख़ुश हूं बड़े यत्न से धन, तुमने कमाया
    उससे भी अधिक ख़ुश हूं कि फन तुमने कमाया
    मेरी ये दुआ है कि सलामत रहो बरसों
    सदियों रहे ज़िंदा जो सृजन तुमने कमाया।
    —बालस्वरूप राही

  • Samarpan
    Bhanu Pratap Shukla
    80 72

    Item Code: #KGP-1959

    Availability: In stock

    समर्पण 
    शताब्दियों से साथ-साथ रहने के बावजूद मुस्लिम मानसिकता भारतीय जीवन-दृष्टि से रच-बस क्यों नहीं सकी ? राष्ट्रीय मूल धारा के प्रवाह को और व्यापक न बनाकर उसे संकीर्ण या उससे हटकर अपनी एक अलग धारा बनाने का प्रयास क्यों चलता रहता है ? भारत में इस्लाम के मतानुयायी यहाँ की विविधता में एकता की अवधारणा के अधिष्ठान का अंग क्यों नहीं बन पाते ? हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा जितना गगनभेदी होता है, दिल की दूरियाँ और दरारें उतनी ही गहरी क्यों होती जाती है ? कैसा स्वर्णिम होगा वह दिन जब भारत के सभी नागरिक मुक्तकण्ठ से 'भारतमाता की जय' के उदघोष में ही सर्वाधिक गौरव और प्रेरणा का अनुभव करेंगे । यहीं लालसा इस पुस्तक की मूल प्रेरणा है । इस पुस्तक में उठाए गए ऐसे तमाम सवालों का बेबाक जवाब मिल जाए और खुले मन से हम उन्हें मान लें तो निश्चित ही उस दिन भारतीय जीवन का सौदर्य अपने पूरे निखार पर होगा । शताब्दियों के संताप से संत्रस्त देश के लिए सहीं, सामयिक और स्थायी विकल्प की तलाश का ही एक नाम है-समर्पण ।
  • Lauh Kapaat Ke Pichhe
    Shravan Kumar Goswami
    60 54

    Item Code: #KGP-1971

    Availability: In stock

    हर जेल के आगे एक अभेद्य लौहकपाट होता है । इसके पीछे एक दुनिया होती है, जो हमारी अपनी ही दुनिया का हिस्सा होते हुए भी, इस दुनिया से बिलकुल स्वतन्त्र एक अलग ही दुनिया होती है । इसके अपने कायदे-कानून होते हैं । यहां जो कुछ भी होता है, उसकी खबर किसी को भी नहीं मिलनी । इसकी चिंता न तो खोजी पत्रकारों को सताती है और न हमारी सरकारों को । इसकी सुधि न तो विरोधी दल के लोग लेते हैं और न न्यायाधीश । 'लौहकपाट के पीछे" वास्तव में जो होता है, उसकी सही जानकारी इसके भीतर रहने वाले बंदियों को भी नहीं मिल पाती है ।
    इस पुस्तक के लेखक ने किसी की हत्या नहीं की थी, उसने किसी के साथ बलात्कार भी नहीं किया था, उसने कोई डकैती भी नहीं की थी और न उसने किसी सरकार का तख्ता पलटने का षड़यन्त्र ही किया था, फिर भी बिहार सरकार ने श्रवणकुमार गोस्वामी को अपने विश्वप्रसिद्ध हजारीबाग के केंद्रीय कारागृह में कुछ समय के लिए कैद रखा था । अपने कारावास के दौरान लेखक ने जेल-जीवन को अत्यन्त समीप से केवल देखा ही नहीं, बल्कि उसे भोगा भी है । अपने इन्हीं अनुभवों का जो विवरण लेखक ने इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है, वह केवल चौकानेवाला ही नहीं, अपितु सभ्य संसार के मुँह पर एक करारा तमाचा भी है ।
    मनोविज्ञान, अपराधशास्त्र, समाजशास्त्र तथा संस्मरण के चौराहे पर खडी यह पुस्तक एक ऐसी विरल कृति है, जो लेखक के उपन्यासों के समान ही अत्यन्त प्रवाहपूर्ण एवं रोचक है ।
    'लौहकपाट के पीछे' उन सभी व्यक्तियों की आंखें खोलने वाली एक अत्यन्त उत्तेजक, उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक है, जो 'मनुष्य और समाज' के बारे में निरन्तर सोचते हैं और मनुष्य के'कल्याणमय भविष्य' के लिए चिन्तित भी रहते हैं। 
  • Bhartiya Sahitya Par Ramayan Ka Prabhav
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    275 248

    Item Code: #KGP-595

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य पर रामायण का प्रभाव
    रामकथा से संबद्ध काव्य-रचना की एक सुदीर्घ परंपरा है, जिसका उद्गम वैदिक वाङ्मय से माना जाता है। लौकिक संस्कृत में इस परंपरा का विधिवत् सूत्रपात आदिकवि वाल्मीकि से हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने रामकथा को जो व्यवस्था, उदात्तता, महनीयता और कालजयिता प्रदान की उसके लिए साहित्य जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। विश्व मानचित्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को रामकथा ने अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। भारत के अतिरिक्त आज भी मिस्र और रोम से लेकर वियतनाम, मंगोलिया, इग्नेशिया तक रामकथा की अमिट छाप देखी जा सकती है। भारत और भारतीय मूल के लोगों के लिए रामकथा शक्तिशाली सांस्कृतिक आधार है। भारतीय भाषाओं में रामकथा का स्वरूप अनेक रूपों में विद्यमान है जो भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता को सिद्ध करता है।
    रामकथा की नित्य-प्रवाही पुण्यसलिला की अजस्र धारा अनादि काल से भारतीय मनीषा को सम्मोहित और भारतीय जीवन को संस्कारित करती रही है।
    रामकथा के सार्वदेशिक स्वरूप को विभिन्न भारतीय भाषाओं में जांचना-परखना ही इस उपक्रम का अभीष्ट है।
    विश्वास है कि रामकथा और रामकथा से संबद्ध साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए इसमें प्रचुर सामग्री मिल सकेगी।
  • Buniad Ali Ki Bedil Dilli
    Dronvir Kohli
    400 360

    Item Code: #KGP-263

    Availability: In stock

    बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली
    यह अपूर्व संग्रह 'धर्मयुग' के लोकप्रिय स्तंभ बेदिल दिल्ली में प्रकाशित लेखों का है। डॉ० धर्मवीर भारती के विशेष आग्रह पर इसे लिखा करते थे उपन्यासकार द्रोणवीर  कोहली-बुनियाद अली के छदम नाम से।
    स्तंभ में जाने वाली सामग्री के बारे में प्राय: तीखी प्रतिक्रिया होती थी। साहित्यिक गोष्टियों वाले लेखों को लेकर कुछ लेखक लाल-पीले भी होने लगते थे। ऐसी स्थिति में स्तंभ-लेखक के बारे में तरह-तरह के कयास लगाए जाते थे। लेकिन भारती जी ने लेखक की पहचान को निरंतर गुप्त रखा-इतना कि 'धर्मयुग' में उनके सहयोगी तक नहीं जान पाते थे कि इसे लिख कौन रहा है।
    डॉ. धर्मवीर भारती इस स्तंभ के बारे में इतने उत्साहित थे कि लेखक को उन्होंने अपने 4-4-81 के पत्र में यह कहकर प्रोत्साहित किया था : "स्तंभ जोरदार जा रहा है। अपने ढंग का बिलकुल अलगा "
  • Nai Chetana Ki Disha
    Rajeshwar Prasad Kaushik
    90 81

    Item Code: #KGP-9133

    Availability: In stock

    ध्यान, मनन, चिंतन
    ध्यान करने का उद्देश्य है ध्याता को खोजना । ध्याता (वह सत्ता जो ईश्वर, सत्य या निर्वाण का दर्शन करना चाहती है) को खोजे बिना ध्यान केवल भ्रम का एक यंत्र बनता है । ध्याता को खोजना उसकी परिसमाप्ति है । वह सत्य, जो यह कहे कि मुझे ईश्वर को या सत्य को खोजना है, पाना है, वह उसे कमी भी नहीं पा सकता । बुद्धि स्वयं सीमित है, वह उस असीम या शाश्वत की कभी अनुभूति नहीं कर सकती । बुद्धि की सर्वोच्च अनुभूति केवल यह हो सकती है कि वह सीमित तथा प्रतिबद्ध है और इसलिए वह सत्य का दर्शन पाने में असमर्थ है।  इस विवेक का उदय होने पर बुद्धि शांत हो जाती है । बुद्धि के पूर्ण शांत होने का अर्थ है-ध्याता की समाप्ति और ध्यान की भी समाप्ति । ध्यान की ही समाप्ति में से ही प्रेम प्रस्फुटित होता है ।
    यदि कोई व्यक्ति भावुक और गम्भीर है तो इसी क्षण इस प्रस्फुटन के अनुभूति हो सकती है । अन्यथा मनुष्य को ध्यान के अनेक भिन्न-भिन्न  उपायों और पद्धतियों के बीच से होकर गुजरना होता है और उनकी सीमाएँ देखनी होगी । ये उपाय और पद्धतियां बुद्धि की उपज है, इसलिए वे अधिक सूक्ष्म रूपों में 'मैं' और 'मेरा' को जीवित बनाये रखती है । इन पद्धतियों के द्वारा सत्य की खोज की व्यर्थता की जब अनुभूति होती है तब विवेक का आरम्भ होता है ।
  • Aadami Aur Uska Samaaj
    Vishnu Nagar
    225 203

    Item Code: #KGP-88

    Availability: In stock


  • Tabdeel Nigahein
    Maitreyi Pushpa
    240 216

    Item Code: #KGP-396

    Availability: In stock

    तबदील निगाहें
    किसी भी व्यक्ति, विषय या कृति के संबंध में जो सिद्धांत, मान्यताएं और अवधारणाएं, वर्षों या सदियों पहले सही मान ली गई थीं, जरूरी नहीं कि हर युग में उनको उसी रूप में स्वीकार किया जाए। समय और परिस्थितियों से उपजे सवाल, उसे अपने मानकों पर कसते हैं। हालांकि सच यह भी है कि साहित्य और समाज में वर्षों से चली आ रही मान्यताओं और प्रतिमानों को खंडित करने का साहस यदा-कदा ही किया जाता है, क्योंकि बहुजन के दबाव और विरोध को सहकर अपनी बात कहने से प्रायः बुद्धिजीवी लोग बचने में ही अपनी भलाई समझते हैं। बावजूद इसके कुछ रचनाकार अपवाद रहे हैं।
    सच को पूरे साहस से कहने वाली रचनाकारों में सम्मिलित मैत्रेयी पुष्पा ने इस पुस्तक के संकलित लेखों में कुछ ऐसा ही प्रयास किया है। ‘उसने कहा था’, ‘गोदान’, ‘चित्रालेखा’, ‘धु्रवस्वामिनी’, ‘त्यागपत्र’, ‘मैला आंचल’ और ‘राग दरबारी’ जैसी अपने समय की कालजयी रचनाओं को बिलकुल अलग निगाह से देखतीं और उसके स्त्री-पात्रों के मन में सोए पड़े सवालों को उघाड़कर उन्होंने एक नई बहस को आधार प्रदान किया है। इन कृतियों के संदर्भ में लेखिका द्वारा उठाए गए सवाल, न केवल पढ़ने वाले को बेचैन कर सकते हैं बल्कि इन्हें नए तरह से तबदील निगाहों के जरिए पुनर्मूल्यांकित करने की मांग भी करते हैं। 
    कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके और कुछ अवसरों पर दिए गए इन वक्तव्यों में मैत्रेयी पुष्पा के भीतर की आलोचकीय दृष्टि भी सघन रूप से प्रकट हुई है। बनी-बनाई धारणाओं और अपनी कूपमंडूकता में आनंदित रहने वाले आलोचकों के लिए यह पुस्तक एक सबक की तरह हो सकती है।
    –विज्ञान भूषण
  • Sambhavami
    Asha Rani Vhora
    150 135

    Item Code: #KGP-9136

    Availability: In stock

    श्रीमती आशारानी व्होरा की यह रचना ‘संभवामि’ सामयिक भी है, प्रासंगिक भी। सामयिक इस दृष्टि से कि ‘संभवामि’ की विषयवस्तु इन दिनों चर्चा में है। प्रासंगिक इसलिए कि इस विषय पर अभी जो कुछ लिखा जा रहा है उसमें से अधिकांश में गहराई और दृष्टि का अभाव है। ‘संभवामि’ इन दोनों की पूर्ति करता है।
    लेखिका ने उन्मुक्त दृष्टि से पक्ष-विपक्ष दोनों को संतुलित दृष्टि से प्रस्तुत कर अपना सुचिंतित मंतव्य भी दिया है जो उनकी लेखकीय जिम्मेवारी बनती है।
    संधि-युग का आज का मानव-मन संशयालु हो उठा है। वह राह की खोज में है। ‘संभवामि’ में उसे आशा की वह किरण दिख सकती है, जो उसके मन को संशय से मुक्त करने में सहायक हो।
    अभी इतना ही पर्याप्त होगा क्योंकि पाठकों का स्वयं का निर्णय ही आगे आने वाली सदी में उनकी भूमिका निर्धारित करेगा।
    -सिद्धेश्वर प्रसाद
  • Bharat : Tab Se Ab Tak
    Bhagwan Singh
    325 293

    Item Code: #KGP-9124

    Availability: In stock

    भगवान सिंह ने कविता, कहानी, व्यंग्य, आलोचना, उपन्यास, भाषा-समस्या जिस भी विषय पर लिखा है, उसमें उनका एक नया तेवर रहा है। उनका एक उपन्यास तो हिंदी के सबसे चर्चित और विवादित उपन्यासों में आता है। परंतु इतिहास पर उनका लेखन जितना विचारोत्तेजक और क्रांतिकारी माना गया है, उसकी तुलना उनके अन्य किसी विधा में किए गए लेखन से नहीं की जा सकती। व्यावसायिक इतिहासकार न होते हुए भी उन्होंने प्राचीन इतिहास की जड़ीभूत मान्यताओं को खंडित करते हुए इसकी गहनता, व्याप्ति और दिशा सभी को बदला है और इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों और मनस्वी पाठकों के बीच उसका स्वागत हुआ है।
    प्रस्तुत संग्रह में भी इतिहास पर लिखे गए उनके कुछ ऐसे लेख हैं, जिन्होंने पाठकों और श्रोताओं को उद्वेलित और प्रेरित किया है और उनको पुनर्विचार के लिए बाध्य किया है। साथ ही कुछ ऐसे नए लेख भी हैं, जो इससे पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुए हैं। इनके कारण निबंधों का समग्र फलक बहुत व्यापक हो गया है। जहां कुछ लेखक एक ऐसे अतीत में ले जाते हैं, जहां प्रकाश की कोई अन्य किरण आज तक पहुंच नहीं पाई थी और जिससे आज के दस-बीस हजार या इससे भी पहले की मानसिक ऊहापोह पर हलका और कुछ रंगीनी-भरा प्रकाश पड़ता है, वहीं ऐसे लेख भी हैं, जो ठीक आज की समस्याओं या वर्तमान के अतीत और वर्तमान दोनों की, तीखी पड़ताल करते हैं।
  • Saleem Ke Shanidev
    Pankaj Prashar
    100 90

    Item Code: #KGP-9100

    Availability: In stock


  • Sarhad Paar Ki Bisaten
    Kanhiya Lal Nandan
    180 162

    Item Code: #KGP-9195

    Availability: In stock

    महानायकों की मुसीबत यह होती है कि उन्हें एक साइकिलबाज की तरह कर समय पैडल चलाते रहना पड़ता है, क्योंकि पैडल रुका नहीं कि सवार लुढ़का। बल्कि आगे जाने के लिए उसे पैडल मारने में मेजी से काम लेना होता है, वरना चढ़ाई की दौड़ में उसके पिछड़ जाने का खतरा भी रहता है।
    ये आलेख एक तरह का ऐतिहासिक प्रक्षेपण हैं, जो लगातार घूमते चक्रव्यूह के माध्यम से अपने समय की तस्वीर पेश करते हैं। एक संक्षिप्त कालखंड अपने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय हितों को दृष्टि में रखकर आकार लेता दिखाई दे, यही इन आलेखों की सार्थकता है। किसी भी देश के इतिहास में दो-चार साल का समय कोई बड़ी अहमियत नहीं रखता, लेकिन उन दो-चार सालों के घटनाक्रम को काटकर समूचे इतिहास-क्रम को समझा भी नहीं जा सकता। ये आलेख उस इतिहास-क्रम को समझने में मदद करेंगे, ऐसा विश्वास है।
  • Deshraag
    Vishwanath Prasad Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-9306

    Availability: In stock

    ‘देशराग’ सुविज्ञ और सुप्रतिष्ठित कवि-आलोचक-संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अध्ययन व मनन को रेखांकित करती एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। रचना के अपूर्व आयाम विकसित करने के साथ-साथ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने ‘दस्तावेज़’ जैसी उल्लेखनीय साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते हुए शब्द की संस्कृति को शिखर तक पहुंचाया है। यह पत्रिका संतुलित, सकारात्मक व संपन्न सामग्री के लिए तो प्रशंसित है ही, इसके संपादकीय प्रत्येक पाठक की अमूल्य धरोहर हैं। ‘देशराग’ में कुछ ऐसे ही विचारोत्तेजक संपादकीय संगृहीत हैं।
    राजनीति, समाज और साहित्य के विविध पक्षों पर ‘दस्तावेज़’ के इन संपादकीयों में विचार किया गया है। लेखक के शब्दों में, इन टिप्पणियों में साहित्य, संस्कृति, भाषा, समाज और व्यक्तियों के प्रति जो कुछ भी व्यक्त हुआ है, वह गहरे देशराग के ही कारण। भारत का साधरण आदमी और उच्चतर मूल्य ही इन टिप्पणियों का पक्ष रहा है और उसे संकट में डालने वाला सब कुछ विपक्ष। भाव का जो अंश रचना में ढलने से रह गया, वही इस सीधे कथन के रूप में व्यक्त हुआ।
    विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने इन लेखों के माध्यम से स्वस्थ विमर्श का उदाहरण प्रस्तुत किया है। वे ‘निर्णयात्मक’ होकर विचार नहीं करते। एक चिंतन प्रक्रिया चलती है, तर्क मुखर होते हैं, पक्ष-विपक्ष प्रकट होते हैं, व्यापक सामाजिक निहितार्थ खुलते हैं–तब कोई निर्णय उपलब्ध होता है। भाषा में वे सारे तत्त्व हैं जिनसे मिलकर ‘हिंदी जाति का तेजस्वी गद्य’ बनता है। 
    देश और उसमें गूंजने वाली प्रशस्त सामाजिकता के राग को चीन्हने के लिए ‘देशराग’ बहुमूल्य पुस्तक है।
  • Pustak Sameeksha Ka Paridrishya
    Vishwanath Prasad Tiwari
    120 108

    Item Code: #KGP-1476

    Availability: In stock

    हिंदी पुस्तकों की समीक्षा पर एकाग्र प्रस्तुत चयन में इस विषय के अनेक आयामों के संस्पर्श और आस्वाद का गहरा अनुभव मिलता है। यह अनुभव पाठक-लेखक, समीक्षक-प्रकाशक और संपादक को समांतर रूप से इसलिए छूता है, क्योंकि पुस्तक-समीक्षा के संसार में ये सब निकटतम और घनिष्ठतम ‘पड़ोसी’ हैं। भावनात्मक और सक्रियात्मक दोनों ही रूप में अभिन्न। पुस्तक-समीक्षा का आधुनिक परिदृश्य एक सत बहस और पूछताछ से आच्छादित है और संभवतः इसीलिए यह विषय साहित्य के हाशिए पर रहने वाला विमर्श न रहकर अब केंद्र में आ गया है।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा संचालित वार्षिक ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के वर्ष 2005 के आयोजन में पुस्तक समीक्षा की स्थिति की गहराई से पड़ताल करने के उपक्रम में अनेक गंभीर एवं कतिपय रोचक कथ्य-तथ्य सामने आए। कुल मिलाकर उक्त विषयक स्थिति को चिंतामयी ही चिन्हित किया गया। साथ ही, यह विचार भी सामने आए कि पुस्तक के प्रकाशन के उपरांत होने वाले इस सर्वप्रथम संस्कार (समीक्षा) की पवित्रता को कैसे पुनस्र्थापना मिले तथा इसके भावी रूप-स्वरूप को किस प्रकार मिल आकार और आकृति। इन आलेखों में पाठक पाएंगे कि पुस्तक का समीक्षात्मक परिचय ही पाठक के मनोभाव में विश्वसनीयता जगा सकता है।
    संभवतः हिंदी की यह अकेली और पहली ऐसी पुस्तक है, जिसका विषय किताब के जीवन से सीधे जुड़ा हैं। अर्थात् किताब की चिंता में तल्लीस एवं एक किताब। मुद्रित शब्द पर आए-छाए संकटों के बीच विश्वसनीय पुस्तक-समीक्षा ही एक ऐसा अस्त्र हो सकता है, जिसके सहारे शब्दों के सार्वजनिक प्रहरी सीना तानकर, दृश्यलिप्त दुनिया को यह दिखा सकते हैं कि अंततः शब्द ही ब्रह्म है।
  • Is Jantantra Mein
    Prabhakar Shrotiya
    980 882

    Item Code: #KGP-645

    Availability: In stock

    यह पुस्तक हमारी दुनिया के लोकतंत्र की अनेक विसंगतियों का बारीक रूपायन करती है। आज जब अनेक देशों में अखबारों का मुंह तक बंद करा दिया जाता है, आंग सान सूकी जैसी बड़ी नेता और कार्यकर्ता जेल की अनावश्यक और थोपी हुई सजा काटने को विवश होती हैं तो श्रोत्रिय जी के ये लेख बड़े प्रासंगिक लगते हैं।
    यह पुस्तक पिछले कुछ वर्षों की नहीं, बल्कि पिछली कुछ शताब्दियों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक लकीरों की पड़ताल करती है...
    –प्रांजल धर 
  • Bhartiya Thal Sena : Badhate Kadam
    A. K. Gandhi
    380 342

    Item Code: #KGP-9308

    Availability: In stock

    अनुशासन, देशप्रेम, स्वाभिमान, सेवा, उत्सर्ग और शौर्य का प्रतीक भारतीय सेना पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। धरती, आकाश और जल मार्गों पर किसी तपस्वी की भाँति एकाग्र भारतीय सेना की गौरवगाथा जितनी लिखी जाए उतनी कम है।
    प्रस्तुत पुस्तक भारतीय थल सेना: बढ़ते कदम में ए. के. गाँधी ने इस अनूठे व अप्रतिम सैन्य संगठन के विविध पक्षों पर प्रामाणिक व रोचक ढंग से लिखा है। गाँधी स्वयं भारतीय वायु सेना में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं, इसलिए उनके विवरण में तथ्यात्मकता और सूक्ष्मता है।
    लेखक ने भारतीय थल सेना के महत्त्व को कई कोणों से विवेचित किया है। भारतीय थल सेना के गौरवपूर्ण इतिहास और उसकी उपलब्धियों  को पढ़ते हुए किसी भी भारतीय का मन गर्व से भर जाएगा। सरहद पर देश की रक्षा करने के साथ आवश्यकता होने पर देश के भीतर किसी भी प्रकार की सेवा या सहायता के लिए सेना तत्पर रहती है। राष्ट्रीय पर्वों और विभिन्न खेलों में इसका हुनर और हौसला रोमांचित कर देता है। असंभव को संभव बनाने की कला भारतीय सेना को आती है।
    प्रस्तुत पुस्तक के अध्ययन से पाठक भारतीय थल सेना के प्रति अधिक आत्मीयता का अनुभव करेगा। भारत के सबसे बड़े रोजगार प्रदाताओं में से एक होने के कारण इसमें आजीविका के अवसर भी तलाशे जाते हैं। इस प्रयोजन से भी यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि पुस्तक एक गौरवशाली संगठन में चयन की विधियों पर भी सम्यव्फ प्रकाश डालती है। 
  • Kaash, Main Raastra-Drohi Hota
    Rajendra Yadav
    500 450

    Item Code: #KGP-9121

    Availability: In stock

    इस संकलन में राजेन्द्र यादव द्वारा सन् 2003 से 2006 के बीच लिखे गए लेख और टिप्पणियां हैं, जिन्हें मुख्यतः ‘हंस’ के संपादकीयों की तरह ही लिखा गया है। 
    संकलन में मुख्यतः आलेख ही हैं, परंतु ‘विकल्प पर विमर्श’ शीर्षक अजेय कुमार के साक्षात्कार को भी इसमें शामिल किया गया है।, क्योंकि इसमें दलित व स्त्री विषयक चिंतन मुखर रूप से सामने आया है।
    इन संपादकीयों में कई जगह दोहराव भी मिलता है, संभवतः इसका कारण यह है कि ये सभी अलग-अलग समय पर लिखे गए विचार और प्रतिक्रियाएं हैं। 
    सब मिलाकर यह एक बेहद विचारोत्तेजक पुस्तक है, जो नया सोचने को मजबूर करती है।
  • Dharm Ke Aar-Paar Aurat
    Neelam Kulshreshtha
    450 405

    Item Code: #KGP-310

    Availability: In stock

    धर्म के आर-पार औरत
    मानव जीवन के लिए धार्मिक आस्था व संस्कार दोनों आवश्यक हैं। स्त्रियाँ धर्म के पाखंडी व शोषक स्वरूप का विभिन्न माध्यमों से ज़ोर-शोर से विरोध कर रही हैं। इस पुस्तक में पढ़िए:
    अधिकतर धर्म कैसे पोषित होता है?
    प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन ने क्यों कहा है, ‘कुरान शुड बी रिवाइज़्ड?’
    समाज में वर्गभेद का आधार पौराणिक पृष्ठभूमि भी है। क्या उसका आधुनिकीकरण आवश्यक है?
    गीता के दसवें अध्याय में स्त्री में अपनी सात विभूतियों की चर्चा करने वाले कृष्ण स्वयं क्या थे?
    सती के चैरों व मेलों पर क्यों प्रतिबंध लगना चाहिए? लड़कियों को कैसी पुस्तकें पढ़नी चाहिए?
    दक्षिण भारत में स्त्री के गले में पहना एक पोटु (पेंडेंट) वाला मंगलसूत्र उसके शरीर तक जाने का रास्ता था।
    जैन धर्म में भी माना गया है कि पूर्वजन्म में जो कुछ बुरे कार्य करता है, वही स्त्री के रूप में पैदा होता है।
    परिवार को त्यागकर मोक्ष की चाह में भटकना अधिक कठिन है या गृहस्थी का संचालन करना?
    दुनिया को अपनी दृष्टि से देखती स्त्री क्यों स्वीकार करे पौराणिक स्त्री-चरित्रों जैसी नियति?
  • Samay Mein Vichar
    Prabhakar Shrotiya
    575 518

    Item Code: #KGP-830

    Availability: In stock

    समय में विचार
    ऐसी यथार्थपूर्ण, गहन, तर्कपुष्ट एवं झकझोरकर रख देने वाली अभिव्यक्ति हिंदी में कम ही हुई है। यह आश्चर्यचकित कर देने वाला तथ्य है कि शायद श्रोत्रिय जी का साहित्यिक पाठक इन आलेखों को पढ़ने के बाद सहसा विश्वास न कर सकेगा कि एक आलोचक अपने काल के प्रवहमान विचार-बिंदुओं पर भी इतनी गहराई, तन्मयता एवं राग से लिख सकता है। हमारे राष्ट्रीय जीवन की विडंबनाएं यदि यहां रेखांकित हैं तो सामाजिक जीवन की विसंगतियां भी उद्घाटित हैं। एक ओर अंतर्राष्ट्रीय जीवन की धड़कनों पर नज़र है तो दूसरी ओर वैश्वीकरण के छल-छद्म एवं राजनीतिक बिसात पर बिछे कूटनीतिक मोहरों की चालें भी लेखक की दृष्टि से नहीं बची हैं।...वर्तमान के अंतर्विरोध पर गहरी नज़र के साथ-साथ भविष्य की चिंताकुलता इन आलेखों का वैशिष्ट्य है।
    –पश्यंती
    ये निबंध जहां एक ओर पाठकों की कसौटी पर पहले से ही परीक्षित हैं, वहीं अपने समय के फलक पर वस्तुनिष्ठ चिंतन की एक ऐसी निर्मिति हैं, जिन्हें अपने समय, समाज और साहित्य के प्रति सजग एक लेखक का तत्त्व-चिंतन माना जाना चाहिए और यदि हम सुपरिचित लेखक शुकदेव सिंह के मत का आश्रय लें तो ‘ये निबंध (आज व्यक्तिवादी चित्तवृत्ति को केंद्र में लेकर लिखे जा रहे संपादकीयों के सापेक्ष) निबंधों के विकल्प के रूप में एक सात्त्विक विधा का आविष्कार हैं।’  
    –जनसत्ता, सबरंग
    श्रोत्रिय जी अकेले दम पर सच लिख रहे हैं, एक भारतीय मनुष्य के नैतिक विजन के साथ। उनकी निर्भीकता तीसरी दुनिया की मनीषा की निर्भीकता है, प्रदत्त स्थितियों और प्रयोजन की परिस्थितियों से मुठभेड़ की यह मनीषा उम्मीद जगाती है।...संरचना में आश्चर्यजनक अनुशासन का परिचय देते हुए कथ्यगत क्रांतिकारी आशय भर देना कोई श्रोत्रिय जी से सीखे। यह गद्यकला का नागर स्वभाव उन्होंने बड़ी साधना से अर्जित किया है।...यह उन रचनाकारों-आलोचकों का पथ है, जो स्वतंत्रता की बात करते हैं, आत्मा और विवेक को गिरवी नहीं रखना चाहते।...श्रोत्रिय जी जड़ सूत्रवादियों और अंध मतवादियों के उन तमाम विभ्रमों का खंडन करते हैं, जो स्वाधीनता को विचारहीनता मानते हैं। स्वाधीनता का तर्क विचारहीनता का पर्याय नहीं है, न ही हर बार अचूक अवसरवाद। स्वाधीनता व्यक्ति हो, समाज हो, राष्ट्र हो, सबसे अपना मूल्य मांगती है।...                      
    –समीक्षा
  • Katha Samay : Srijan Aur Vimarsh
    Shashi Kala Rai
    245 221

    Item Code: #KGP-905

    Availability: In stock


  • Hashiye Par Harf
    Prem Bhardwaj
    400 360

    Item Code: #KGP-450

    Availability: In stock

    लक्ष्मण रेखा लांघने वाली बात मीडिया के साथ कैसे कुछ हद तक सही बैठती है, इसे भी समझने की जरूरत है। एक जमाने से पत्रकारिता को पवित्र पेशा या मिशन माना गया है। किसी लक्ष्मण ने नहीं, उससे पवित्रता की इसी जन-अपेक्षा ने लक्ष्मण रेखा न जाने कब, क्यों और कैसे खींच दी? सत्ता का यह चरित्र होता है कि वो अपने समय में पवित्र चीजों को भ्रष्ट करती है और मन को भाने वाली वस्तु या इंसान को भोग की चीज मानती है। सर्वत्र पर मालिकाना हक ही उसका स्वभाव है। लिहाजा उसे गवारा नहीं कि वो गलत है तो सामने वाला सही रहकर उसके लिए ‘गलत’ की परिधि को बरकरार रखे। खुद को इस परिधि से बाहर निकालने या अच्छाई की लकीर को मिटाने के मकसद से ही वो तरह-तरह का छल-प्रपंच करती है। कई दफा वो अपनी ताकत का जौहर दिखाकर जबरदस्ती भी करती है। जरूरत पड़ने पर ‘मायाजाल’ भी रचने से गुरेज नहीं करती। राडिया प्रकरण में कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने भी मायाजाल रचा। मीडियारूपी सीता के मन में ‘स्वर्णमृग’ (धन, संपन्नता और सुविधाएं) का लोभ जन्मा। और वह किसी को कुछ देने (एक राजा को मंत्रालय देने) की खातिर लक्ष्मण रेखा को लांघ गई। बदले में उसे क्या मिला, यह अभी सामने नहीं आया है। बहुत संभव है बाद में कुछ पता चले।
  • Satta Ke Nagaare
    Alok Mehta
    595 536

    Item Code: #KGP-229

    Availability: In stock

    लोकतंत्र में राजनीति हर ताले की चाबी मानी जाती है। राजनीति का जितना ज्ञान महानगरों में रहने वाले विश्लेषकों, कंप्यूटर पर आंकड़ों की जोड़-तोड़कर चुनावी भविष्यवाणी करने वालों, अर्थशास्त्रियों, राजनयिकों या प्रकाड पत्रकारों को होता है, उससे अच्छी व्यावहारिक समझ सुदूर गांवों में रहने वाले गरीब पिछड़े-अर्द्धशिक्षित भलेमानुष की होती है। गांव की पंचायतों में राजनीति चैपड़ की पकड़ अधिक अच्छी होती है। उन्हें मालूम है कि सत्ता के नगाड़े कब और क्यों बजते हैं। सत्ता के अनंत विस्तार को मरुस्थल भी कहा जा सकता है और अथाह सागर भी। राम राज्य रहा हो या महाभारत काल, ब्रिटिश राज रहे या अमेरिका से अभिभूत रहने वाली सत्ता-व्यवस्था राजनीति का लावा कभी ठंडा नहीं होगा।
    पत्रकारिता का दायित्व यही है कि अपने पाठकों को हर समय राजनीति के अमृत और विषय का सही आकलन करके बाता रहे। पिछले वर्षो के दौरान इस कड़वे सच को पेश करते रहने से जहां पाठकों का अधिकाधिक स्नेह और समर्थन मिला, वहीं कई राजनीतिज्ञ नाराज भी होते रहे। लेकिन हमारा कर्तव्य समाज और सत्ता की पहरेदारी करना है। इसलिए किसी की खुशी या किसी की नाराजगी की चिंता नहीं कर सकते। सत्ता के नगाड़े इस तरह बजने चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक समाज जागता रहे और अच्छे पके हुए फल उसे मिलते रहें। इस संकलन में पिछले वर्षो के दोरान सत्ता के इर्द-गिर्द चलते रहे घटनाचक्रों पर लिखी गई टिप्पणियां शामिल हैं। एक तरह से यह इतिहास के कुछ पन्नों को संजोकर रखने का प्रयास मात्र है। आज ऐसी टिप्पणियों पर चाहे जैसी खट्ठी-मीठी प्रतिक्रियाएं हों, राजनीति के दूरगामी परिणाम समझाने वालों के लिए ये सदैव उपयोगी साबित हो सकती है। 
  • Aakhir Kab Tak
    Rajendra Avasthi
    450 405

    Item Code: #KGP-137

    Availability: In stock

    आखिर कब तक ?
    राजेन्द्र अवस्थी कथाकार और पत्रकार तो हैं ही, उन्होंने सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा सामयिक विषयों पर भी भरपूर लिखा डै । अनेक दैनिक समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओं में उनके लेख प्रमुखता से छपते रहे । उनकी बेबाक टिप्पणियाँ अनेक बार आक्रोश और विवाद को भी जन्म देती रहीं, लेकिन अवस्थी जी कभी भी अपनी बात कहने से नहीं चूकते । वह कहेंगे और बहुत निडर तथा बेबाक होकर कहेंगे, भले ही उनके मित्र भी उनसे अप्रसन्न क्यों न हो जाएँ । परिणामस्वरूप, उनका यह लेखन समसामयिक साहित्य का दस्तावेज बन गया । उन्होंने कई सुविख्यात व्यक्तित्व के जीवन को आधार बनाकर औपन्यासिक कृतियाँ दी हैं  और उनमें कथानायकों की विशेषताओं के साथ ही उनकी दुर्बलताओं की चर्चा भी की है । सक्रिय लेखन के दौरान बड़ी-बड़ी हस्तियों से उनका साबका तो पड़ता ही रहा । यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि कई बड़े लोगों के वह आत्मीय रहे हैं । ऐसे लेखन से उनका क्षेत्र व्यापक बना और साहित्य के रचना-प्रदेश के बाहर भी अन्य क्षेत्रों में उनकी खासी सर्जनात्मक पहचान बन पाई ।
    प्रस्तुत टिप्पणियां मूल्यवान लेखन है। लेखक का मानना है कि उन्होंने एक भी घटना न बनावटी लिखी है और न ही कभी झूठ-फरेबी पत्रकारिता को स्वीकारा । जो जैसा है, जो सही है, जो स्पंदित है, उसी पर उन्होंने लिखा है। इस दृष्टि से यह कृति अत्यंत मदृत्यपूर्ण हो उठती है ।

  • Raashtra Aur Musalman
    Nasera Sharma
    350 315

    Item Code: #KGP-172

    Availability: In stock

    समय की छाती पर खड़ा मुसलमान आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। ‘मुसलमानों’ को लेकर इतना कुछ कहा जा रहा है कि स्वयं मुसलमान भी इस चर्चित मुसलमान के बारे में नई-नई सूचनाएं सुनने की जिज्ञासा रोक नहीं पाता है।
    वह क्या है? वह कौन था? उसका भविष्य क्या होगा? इस विषय पर वार्तालाप के द्वारा अनेक नए-नए नजरिए, खबरें और ऐतिहासिक पृष्ठीाूमि की पर्तें रोज सामने लाई जा रही हैं। बहुत कुछ छप रहा है।
    इस किताब में मुसलमान एक आम आदमी की तरह अपनी खूबी और कमजोरी के साथ मौजूद है। वह स्वयं अपनी बात कहने में सक्षम हे, इसलिए वह किसी बड़े नाम के सहारे या धार्मिक नेताओं के बल पर आगे नहीं बढ़ता है। 
    जो सच है, वह सामने है। उसको स्वीकार करना या न करना पढ़ने वालों की अपनी दृष्टि एवं सामाजिक अवलोकन पर निर्भर है। 
  • Aastha Ka Raasta
    Dr. Arsu
    160 144

    Item Code: #KGP-9002

    Availability: In stock

    आस्था का रास्ता 
    हर युग की समस्याएं और संवेदना, बदलती रहती हैं । इसका असर साहित्य पर पड़ना सहज स्वाभाविक है, लेकिन बाहरी तौर की विकास योजनाएं हमेशा हमें अंतर्दृष्टि नहीं देती हैं । अंतर्दृष्टि ही आस्था की नीव है । विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के युग में साहित्य में आए परिवर्तन के स्वरूप पर साहित्यकार के मन में आशंकाएं बढ़ रही हैं ।
    आस्था का आलोक बुझ रहा है । बुद्धि-विकास के अनुपात में अनाज हृदय-विकास नहीं होता है । परंपरा, संस्कृति, साहित्य, धरोहर और विरासत का महत्त्व आज फीका पढ़ रहा है ।
    इसके कारणों-परिणामों पर सोच-विचार करने वाले अट्ठारह लेखों का संकलन ।
    मलयालमभाषी हिंदी लेखक और अनुवादक डॉ० आरसु की अद्यतन कृति । इसमें चिंतन का इंधन है । आस्था और आशंकाओं की धड़कन है ।
  • Bhartiya Sahitya Par Mahabharat Ka Prabhav
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    275 248

    Item Code: #KGP-811

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य पर महाभारत का प्रभाव
    ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मूलाधार हैं। जीवन के आदर्श और यथार्थ का इतना व्यापक और विश्वसनीय अनुभव विश्व में अन्यत्र असंभव है। इनमें जहाँ पूर्ववर्ती गतिशील मनीषा का अक्षय कोष है, वहीं पर परवर्ती चिंतन-सरणियों को प्रेरित और प्रभावित करने की विलक्षण क्षमता है। 
    ‘महाभारत’ के संबंध में कहा जाता है--"जो महाभारत में नहीं है, वह भारत में भी नहीं है।" अर्थात् भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक आदि विशेषताओं का सर्वस्व ‘महाभारत’ में विद्यमान है। लोककथाओं से लेकर शिष्ट साहित्य की विविध विधाओं तक ‘महाभारत’ के जीवंत प्रतिबिंब को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 
    ‘गीता’ के आध्यात्मिक चिंतन से लेकर विभिन्न सामाजिक घटनाओं और पात्रों से सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य ने अपना उपजीव्य ग्रहण किया है। मिथकीय संभावनाओं की व्यापकता के कारण भारतीय साहित्य की विभिन्न विधाओं में युगबोधी संवेदना को अभिव्यक्त करने के लिए प्रभूत लेखन किया गया है।
    ‘महाभारत’ पर आधारित विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य को जाँचने-परखने पर यह रोचक तथ्य सामने आता है कि इस विपुल लेखन में भौगोलिक अंतराल और भाषा-भेद के होने पर भी हमारी चिंतन धारा में अद्भुत समता है। यह हमारी सांस्कृतिक एकता और भावात्मक अखंडता का प्रमाण है।
  • Manzil Abhi Door Hai
    Shanta Kumar
    225 203

    Item Code: #KGP-9030

    Availability: In stock

    मंजिल अभी दूर है
    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमने एक मंजिल तय की, एक संकल्प लिया उस मंजिल तक पहुँचने का, परंतु आधी सदी बीत जाने के बाद भी हम उस मंजिल तक पहुँचे नहीं है । इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि या तो हम चले ही नहीं या फिर मंजिल के लिए जो रास्ता चुना, वह ठीक नहीं था ।
    लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली और उस प्रणाली को चलाने वाले नेता-दोनो ही आज की इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। आधी सदी पूरी हो चुकी है। एक प्रणाली का परीक्षण हो चुका है । अब इस बात की आवश्यकता है कि उस संसदीय प्रणाली पर पुनर्विचार किया जाए और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उचित संशोधन किया जाए ।
    जब भारत का संविधान बनाया गया तो संविधान निर्माताओं ने विश्व की अन्य प्रणालियों की सार्थकता तथा उपयोगिता पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया । उन सबके मन में ऐतिहासिक कारणों से एक बात घर कर गई थी कि भारत के लिए ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली ही उपयोगी है क्योंकि पिछले लगभग 200 वर्षों से भारत किसी न किसी प्रकार से इस प्रणाली से जुडा रहा ।
  • Bhasha, Sahitya Aur Jaatiyata
    Ram Vilas Sharma
    640 576

    Item Code: #KGP-884

    Availability: In stock

    भाषा, साहित्य और जातीयता
    डा. रामविलास शर्मा की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनके लेखों और समीक्षाओं का यह संग्रह पाठकों के लिए प्रस्तुत है। डा. शर्मा द्वारा संपादित पत्रिका ‘समालोचक’ में प्रकाशित यह सामग्री पहली बार पुस्तक के रूप में आ रही है। सामग्री का प्रस्तुतिकरण तथा संपादन किया है डा. शर्मा के सुपुत्र विजय मोहन शर्मा ने।
    ज्ञात हो कि ‘समालोचक’ केवल दो वर्ष–फरवरी, 1958 से जनवरी, 1960 तक निकल पाया। कुल चैबीस अंकों में से दो विशेषांक थे—‘सौंदर्यशास्त्र विशेषांक’ और ‘यथार्थवाद विशेषांक’। जिनका उस समय बड़ा स्वागत हुआ और हिंदी साहित्य-जगत् के अनेक ‘सितारों’ ने उनकी सराहना की। ये विशेषांक साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए आज भी महत्त्व रखते हैं।
    ‘समालोचक’ में पुराने लेखकों के अलावा नए लेखक भी लिखते थे। इन लेखकों में हिंदी प्रदेश से बाहर के लेखक भी थे। इसका संपादकीय क्षितिज उदार था। संपादक 
    डा. रामविलास शर्मा के अनुसार, "हमारा ध्येय हिंदी आलोचना के विकास में योग देना है, उसमें आमूल परिवर्तन करना अथवा युगांतर उपस्थित करना नहीं। हम विभिन्न विचारधाराओं और मतों के लेखकों की रचनाएं प्रकाशित करके परस्पर विचार-विनिमय द्वारा आलोचना-साहित्य के उत्तरोत्तर विकास का प्रयत्न करेंगे।"
    बीसवीं शताब्दी के हिंदी के सर्वमान्य महान् आलोचक डा. रामविलास शर्मा की साहित्यिक समझ और प्रतिबद्धता का विस्तार इस ग्रंथ की संकलित सामग्री में आद्यंत दिखाई पड़ते हैं। शोध और समीक्षा के प्रतिमान स्थापित करता यह ग्रंथ प्रत्येक बुकशेल्फ की अनिवार्यता है।
  • Andhere Ke Deep
    Shanta Kumar
    450 405

    Item Code: #KGP-661

    Availability: In stock

    अंधेरे के दीप प्रखर राष्ट्रवादी सोच के धनी राजनेता व लेखक शान्ता कुमार के लेखों का संग्रह है। इन लेखों के केंद्र में वर्ष 2008 से अक्टूबर 2014 के मध्य की वे घटनाएं/सक्रियताएं हैं जिन्होंने लेखक को उद्वेलित किया। लेखक ने अपनी हार्दिकता व बौद्धिकता के आलोक में इस उद्वेलन को विश्लेषित किया है। ये लेख आठ खंडों में संयोजित हैं--भ्रष्टाचार और राजनीति, गरीब और सामाजिक न्याय, आर्थिक परिदृश्य, न्यायपालिका, व्यक्ति-विशेष, संस्कृति, विविध एवं विदेशी निवेश। इनमें भी ‘भ्रष्टाचार और राजनीति’ पर सर्वाधिक लेख हैं। यह बात समझी जा सकती है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की घटनाएं देख-सुनकर कोई भी संवेदनशील मन व्यथित हो जाएगा। लेखक ने सक्रिय राजनीति में रहकर व्यवस्था, प्रशासन और सामान्यजन को बखूबी जाना-समझा है। यही अनुभव अब लेखों में व्यक्त हो रहा है। शान्ता कुमार कोई एक ज्वलंत घटना उदाहरणार्थ चुन लेते हैं और उसके बहाने स्वतंत्रता, समता, मानवाधिकार, सामाजिक मूल्य, मानवीय गरिमा, सामाजिक समरसता, विकास आदि पर सार्थक बहस छेड़ देते हैं। जैसे लोकतंत्र में बढ़ते परिवारतंत्र पर वे टिप्पणी करते हैं, ‘सत्ता की महत्त्वाकांक्षा और व्यक्तिगत स्वार्थ इतने बढ़ गए हैं कि परिवारवाद की इस प्रवृत्ति से अधिकांश कार्यकर्ता अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं, परंतु बोलते नहीं। राजनीति में आंतरिक लोकतंत्र किसी कारण समाप्त होता जा रहा है। ऐसा लगता है कि अधिकतर जगह धृतराष्ट्र का दरबार बन गया है जहां शुचिता और पवित्राता की द्रोपदी का चीरहरण हो रहा है...।’
    शान्ता कुमार की दृष्टि देश की अर्थव्यवस्था, न्याय-व्यवस्था, संस्कृति, पर्यावरण, ग्रामीण संरचना आदि पर भी गई है। अटल बिहारी वाजपेयी, स्वामी विवेकानंद, नरेन्द्र मोदी और वीर सावरकर पर लिखते हुए लेखक ने उन कारणों की तलाश की है जिन्होंने इनमें नेतृत्व की क्षमता विकसित की। सारे लेख सक्रिय आत्मीयता से भरे हैं। देशहित की चिंता ही इन लेखों का प्रेरक बिंदु है। इनको पढ़ते हुए पाठक अपने देश-परिवेश से रूबरू होता है। प्रामाणिकता व तार्किकता इन लेखों की विशेष शक्ति है। भाषा पारदर्शी है और शैली भावानुकूल।
  • Satta Ke Aar-paar
    Vishnu Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9106

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    —इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Manvadhikar Ki Aseemit Sarhadein
    Pushpa Sinha
    250 225

    Item Code: #KGP-565

    Availability: In stock

    इक्कीसवीं सदी को मानवाधिकर एवं टेक्नोलोजी की सदी माना जा रहा है। मानवाधिकर प्रकृति द्वारा दी गई जीवन की जरूरी शर्तें हैं जिसमें मानव अपना जीवन स्वेच्छा से मर्यादापूर्वक जी सके। हर धर्म  एवं शास्त्रों में यह माना गया है कि प्रत्येक मानव जन्म से समान एवं स्वतंत्र है।
    लेकिन हमारी दुनिया की सामाजिक व्यवस्था ऐसी है जो एक मानव को दूसरे मानव से विभिन्न आधारों पर, जैसे—लिंग, धर्म, जाति, स्थान विशेष, भाषा आदि के द्वारा ऊंच या नीच समझता है। तब ऐसी स्थिति में मानव के जीवन एवं मर्यादा की रक्षा के लिए मानवाधिकार शब्द का आविष्कार किया गया। अतः सही मायने में मानवाधिकार एक सभ्य समाज के जीवन-शैली की रूपरेखा है जिसमें सभी अधिकार सभी को मिल सकें।
    मानव के अपने मूल-अधिकारों के हनन से ही समाज में असंतोष फैलता है, जो धीरे-धीरे उग्र होकर हिंसा का रूप लेता है, जिसके फलस्वरूप आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी भयानक सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है।
    अतः मानवाधिकार का मूल-मंत्र है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। समाज में अधिकार और कर्तव्य का ताना-बाना बहुत सूक्ष्म है, यानी कि प्रत्येक मानव द्वारा हर पल सही कर्म करने की गति हो तभी ‘मानवाधिकार की असीमित सरहदें’ पार की जा सकती हैं।
  • Agyey Sahachar
    Vishwanath Prasad Tiwari
    695 626

    Item Code: #KGP-1940

    Availability: In stock

    अज्ञेय सहचर
    छायावादोत्तर हिंदी साहित्य में अज्ञेय का व्यक्तित्व एक स्वाधीन चिंतक और प्रयोगधर्मी रचनाकार के रूप में अद्वितीय है। इस संदर्भ में एक-दो लेखक ही उनकी पंक्ति में बैठते हैं। उनकी सर्जनात्मक प्रयोगशीलता और नवीनता तथा अनेक कलाओं में उनकी दक्षता को देखते हुए उन्हें हिंदी का ‘रवींद्रनाथ’ कहना उपयुक्त है। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं (कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, संस्मरण, यात्रावृत्त, आलोचना और अन्य लघु विधाएँ) को अपनी प्रतिभा से समृद्ध किया है। कुछ नवीन गद्य विधाओं को जन्म देने का श्रेय भी उन्हें है, जिन्हें उन्होंने ‘अंतःप्रक्रिया’, ‘लॉग बुक’ और ‘टीप’ आदि कहा है। ये ‘डायरी’ विधा के निकट हैं, मगर उनसे भिन्न और नवीन। इस प्रसंग में मुझे यह भी कहना चाहिए कि हिंदी की साहित्यिक भाषा को जितने नए शब्द अज्ञेय ने दिए हैं, उनके किसी समकालीन लेखक ने नहीं दिए। यह एक ऐसा रेखांकित करने योग्य कार्य है, जिसे कोई महान् लेखक ही कर पाता है। वस्तुतः अज्ञेय हिंदी के एक युग-प्रवर्तक साहित्यकार हैं। उन्होंने अनेक रूपों में छायावादोत्तर हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को प्रभावित किया है तथा उसे नई दिशाओं की ओर प्रेरित और संचालित भी किया है।
    अज्ञेय का जितना बड़ा योगदान रचना और चिंतन के क्षेत्र में है, उतना ही या उससे थोड़़ा ही कम हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध करने और अपने समय में एक साहित्यिक वातावरण निर्मित करने वाले व्यक्तित्वसंपन्न लेखक के रूप में। उन्होंने न केवल स्वयं लिखा, बल्कि प्रतिभावान लेखकों की एक पूरी पीढ़ी को मंच देने और सामने लाने का प्रयास किया। 
    आज हिंदी के एक बड़े और वास्तविक पाठक-वर्ग में अज्ञेय प्रतिष्ठित हैं और उन पर लिखा भी कम नहीं गया है, जिसका प्रमाण है यह पुस्तक।
  • Kuchh Kharaa Kuchh Khotaa
    Raj Budhiraja
    100

    Item Code: #KGP-1877

    Availability: In stock

    सुविख्यात शिक्षाविद एवं साहित्यकार राज बुद्धिराजा की नवीन कृति है यह । दूटते-बिखरते अत्याधुनिक भारतीय समाज ने जिस प्राचीन संस्कृति की लुटिया को कुएँ में ला डुबोया है, उसे लेखिका ने अपने मन के रहट में भरा है और फिर जल-रूप प्रदान किया है । लेखिका के मन में अपार पीडा है जो उनकी कलम पर धीरे-धीरे उतरकर, कोरे कागजों पर आबदार मोती-रूप बन जाती है । लेखिका की सूक्ष्म-पैनी दृष्टि से छोटी से छोटी बात बच नहीं पाती और वह कलम के हथौड़े से पूरे समाज पर लगातार प्रहार करती चली जाती है और उसके पास हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं होता । लेखनी कभी धर्म की बात करती है, कभी दर्शन-अध्यात्म की, कभी बिखरती मानवीय संवेदना की और कभी जंग खाए रिश्तों की ।
    लगता है कि उनके दिल की गहराई पाठकों पर अमिट छाप छोड़ती है और उनकी आँखें झरने-सी झरने लगती हैँ । ढेर सारे अनुत्तरित प्रश्न सामने आ खड़े होते हैं । इन संस्मरणों का अंत प्रश्नचिह्नों से होता है । ये सभी संस्मरण लेखिका के एकाकीपन के गवाह हैं । लेखन की अंतहीन राह पर चलते-चलते कभी-कभी उन्हें एकाकीपन का अहसास होता है और वे एक बूँद प्यार के लिए तरसती रह जाती हैं । उन्हें अपनेपन की तलाश रहती है । कभी विदेशी मित्र, कभी बाल सखी, कभी युवा मित्र और कभी अनजाने रिश्तों में वे बहुत कुछ ढूँढ़ने का प्रयास करती है और उन्हें यदि एक पल के लिए कुछ मिलता है तो वे उस सुखद पल को अपनों में बाँट देती हैं । यही उनके लेखन की सफलता है, खासकर जब पाठक उनके सुर में सुर मिलाकर झूमते-झामते वृक्षों की तरह झूमने लगता है ।
  • Itihaas Ka Vartamaan : Aaj Ke Bouddhik Sarokar-3
    Bhagwan Singh
    500 450

    Item Code: #KGP-9328

    Availability: In stock

    ‘इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार’ इस विमर्श-व्याकुल समय में तर्क, विवेक, परंपरा, निहितार्थ और रचनात्मक साहस सहेजकर लिखी गई एक अद्भुत पुस्तक है। इसके लेखक भगवान सिंह विभिन्न विधाओं में सक्रिय किंतु इतिहास-विवेचन में सर्वाधिक  ख्यातिप्राप्त सजग मनीषी हैं। उनकी इतिहास-दृष्टि स्पष्ट, प्रमाण पुष्ट और चिंतन संपन्न है। यही कारण है कि जब भगवान सिंह ‘तुमुल कोलाहल समय’ व ‘स्वार्थसिद्ध वाग्युद्ध’ को परखने के लिए विचारों में प्रवेश करते हैं तो चिंतन की एक अलग रूपरेखा तैयार होने लगती है। स्वयं लेखक ने कहा है–
    "मैंने चर्चाओं को शीर्षक तो दिए हैं, परंतु उन विषयों का सम्यव्फ निर्वाह नहीं हुआ है। बातचीत करते हुए आप किसी विषय से बँधकर नहीं रह पाते। बात आरंभ जहाँ से भी हुई हो बीच में कोई संदर्भ, दृष्टांत, प्रसंग आते ही विषय बदल जाता है और आप भूल जाते हैं बात कहाँ से आरंभ हुई थी। याद भी आई तो आप कई बार स्वयं पूछते हैं, ‘हाँ तो मैं क्या कह रहा था?’ गरज कि सुनने वाले को आप क्या कह रहे हैं इसका हिसाब भी रखना चाहिए! परंतु सबसे मार्मिक प्रसंग तो उन विचलनों में ही आते हैं, तभी तो अपना दबाव डालकर वे धरा को ही बदल देते हैं ।"
  • Kashmir Aur Bharat Pak Sambandh
    Prakash Veer Shastri
    400 360

    Item Code: #KGP-143

    Availability: In stock

    देश-हित को ध्यान में रखते हुए अत्यंत आवश्यक विषयों की ओर दोनों सदनों का ध्यान आकर्षित करने की कला में श्री शास्त्री जी अति निपुण थे । उन्होंने जिन गंभीर विषयों की चर्चा सदन में की थी, आज लगभग 40  वर्षा बाद भी वे विषय, वे प्रश्न ज्यों के त्यों अपने उद्धार की प्रतीक्षा कर रहे हैं । आज राजनीति में सत्य के कहने वाले और सुनने वालों का प्रायः अभाव हो रहा है, ऐसी दशा में लोकोपकारक सत्य को अभिव्यक्ति करने का साहस जुटा पाना किसी निर्भय, वीर पुरुष का ही काम है ।
    इस ग्रन्थ में प्रकाशित शास्त्री जी के इन विचारों से देश की जनता तथा नेताओं को एक नई दिशा मिल पाएगी, जिससे देश की गंभीर समस्याओं से निपटने में सही मार्गदर्शन हो सकेगा और पाठक महानुभाव श्री प्रकाशवीर शास्त्री की विद्वत्ता, देशभक्ति, स्पष्टवादिता, वाक्चातुर्य, वर्णन-शैली तथा विषयों की गंभीरता से सुपरिचित हो सकेंगे ।
  • Doob Aur Pani
    Bhagwati Sharan Mishra
    50 45

    Item Code: #KGP-9036

    Availability: In stock


  • Tab Aur Ab
    Alok Mehta
    595 536

    Item Code: #KGP-656

    Availability: In stock

    तब और अब
    अखबार  के बारे  में सामान्यत यह धारणा होती है कि सुबह होने के दो घंटे बाद उसकी उपयोगिता नहीं रहती । खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के युग से छपे हुए शब्दों के महत्त्व पर भी सवाल उठने लगे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाए तो पता चलेगा कि छपे हुए शब्दों से हर दिन इतिहास का एक नया पन्ना बनता है । राजाओं के दरबार रहे हो या ब्रिटिश शासन अथवा आजादी के बाद बनी लोकतांत्रिक सरकारों ने पिछले 60 वर्षों से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक बदलाव पर विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करके रखा होगा । फिर भी ऐसी हजारों घटनाएं, तथ्य, अंतर्कथाएँ हैं, जो किसी सरकारी या गैरसरकारी दस्तावेजो से नहीं मिलेगी । इंटरनेट तो हाल के वर्षों में आया है और उसमें हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों या पत्रिकाओं में प्रकाशित महत्त्वपूर्ण बाते उपलब्ध नहीं होगी। 
    इस पुस्तक की टिप्पणियों तात्कातिक परिस्थितियों से प्रभावित रही हैं और आज के संदर्भ में संभव है, उन पर दूसरे ढंग से सोचने की स्थिति बनती है। तब भी पुरानी घटनाएँ और परिस्थितियाँ नई सुबह के लिए सबक देती हैं । इस पुस्तक की अधिकांश टिप्पणियाँ नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तानम दैनिक भास्कर और आउटलुक साप्ताहिक में रहते हुए लिखी गई हैं और कुछ टिप्पणियाँ संपादकीय रूप में होने के कारण संक्षिप्त हैं । इस दृष्टी से यह अपने पत्रकारीय कास का लेखा- जोखा भी है और पाठको के लिए अधिक उपयोगी संदर्भ सामग्री भी ।
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