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  • Himachal Pradesh Ka Lok Jeevan
    Kuldeep Singh
    290 261

    Item Code: #KGP-9113

    Availability: In stock

    हिमाचल प्रदेश का लोक-जीवन
    आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारी लोक-संस्कृति पिछड़ी तो नहीं है, परंतु आधुनिकता के लबादे ने इसको ढक अवश्य दिया है। एक तरफ पाश्चात्य संस्कृति की चकाचैंध से आम व्यक्ति प्रभावित हुआ है तो दूसरी तरफ आधुनिकता और परंपरा में सामंजस्य न बिठा पाने के कारण भी हमारी लोक-संस्कृति पतनोन्मुख हुई है। टी.वी. के विदेशी चैनलों ने आम व्यक्ति के पहनावे, खान-पान, रहन-सहन तथा दिनचर्या को प्रभावित ही नहीं किया, बल्कि परिवर्तित करके रख दिया है। फलतः मूल लोक-संस्कृति की जड़ें हिल गई हैं। आम व्यक्ति दोराहे पर आ गया है। न तो वह स्वयं को आधुनिकता के अनुरूप ढाल पा रहा है और न ही पूर्ण रूप से अपनी लोक-संस्कृति को व्यवहार में ला रहा है। 
    गत दो-तीन दशकों में हिमाचल प्रदेश की ही नहीं, अपितु संपूर्ण भारत की लोक-संस्कृति में व्यापक उथल-पुथल देखने को मिली है। संस्कृति के ढाँचे में परिवर्तन भी हुए हैं। अनेक रीति-रिवाजों, परंपराओं, प्रथाओं का तथाकथित आधुनिकीकरण हुआ है, परंतु यह सब होने के बावजूद आधुनिकता और लोक-संस्कृति  का आपसी सामंजस्य नहीं बैठ पाया है।
    इस पुस्तक के माध्यम से भारत का जनमानस हिमाचल प्रदेश के जनजीवन की केवल झलक ही नहीं पा सकेगा, बल्कि उसे वास्तविक रूप में निहार भी सकेगा, उसका अनुभव भी कर सकेगा। साहित्यकार किस प्रकार किसी भी संस्कृति और जनजीवन को अंकित करता है, यह कृति उसका प्रमाण है।
  • Bhartiya Sanskriti Aur Hindi Pradesh-2
    Ram Vilas Sharma
    750 675

    Item Code: #KGP-842

    Availability: In stock


  • Aadivasi Shourya Evam Vidroh (Jharkhand)
    Ramnika Gupta
    280 252

    Item Code: #KGP-751

    Availability: In stock

    इतिहास-लेखन को लेकर समय-समय पर सहमतियाँ व असहमतियाँ दर्ज की जाती रही हैं। कई बार वे व्यक्ति/समुदाय/संघर्ष/प्रतिवाद हाशिए पर रह जाते हैं या नेपथ्य में चले जाते हैं जिन्होंने समय के नुकीले प्रहार सहे होते हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में आदिवासियों को प्रायः नेपथ्य में रखा जाता रहा है। धीरे-धीरे उनके संघर्षों के मूल्यांकन का कार्य शुरू हुआ। यह एक तरह से असंख्य मनुष्यों के प्रति सभ्यता का आभार ज्ञापन भी है। रमणिका गुप्ता ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘आदिवासी: शौर्य एवं विद्रोह (झारखंड)’ उनका इस सिलसिले में नया हस्तक्षेप है। झारखंड के आदिवासियों पर केंद्रित इस पुस्तक में अनेक भूले-बिसरे वृत्तांत समाहित हैं।
    रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित प्रस्तुत पुस्तक में वीरांगना सिनती दई, पहाड़िया वीर, तिलका माँझी, रानी शिरोमणि, सिदो व कान्हू, पृथ्वी माँझी, बिरसा मुंडा तथा जतरा भगत आदि अविस्मरणीय चरित्रों के विषय में महत्त्वपूर्ण सामग्री सँजोई गई है। अनेक लेखकों ने झारखंड के आदिवासियों का योगदान रेखांकित किया है। भूमिका में रमणिका लिखती हैं, ‘झारखंड के शौर्य और विद्रोह की यह गाथा बूढ़े बुजुर्गों की स्मृतियों, उनके गीतों, बैलेड्स, लीजेंड्रियों, लोककथाओं व किंवदंतियों और अंग्रेजों द्वारा लिखे गए दस्तावेजों के ऐतिहासिक तथ्यों पर आधरित है।’ सचमुच, आदिवासियों का योगदान इतना विस्मयपूर्ण है कि वह लोककथाओं, लोकगीतों का अनिवार्य हिस्सा बन गया है। अपने देश और समाज के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने वाली विभूतियों का जीवन चरित पीढ़ियों को प्रेरणा दे रहा है। 
    आज के संदर्भ में ऐसी पुस्तकों का महत्त्व इस कारण बढ़ जाता है क्योंकि ‘जल-जंगल-जमीन’ को लेकर कई तरह के संघर्ष छिड़े हुए हैं। एक व्यापक सामाजिक न्याय की भूमिका बनाती यह सामग्री विस्मृतप्राय इतिहास का नया आख्यान है।
  • Dropadi Ka Cheer Haran Aur Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    65 59

    Item Code: #KGP-949

    Availability: In stock

    मूल महाभारत का कलेवर वर्तमान में उपलब्ध महाभारत का दशांश रहा होगा। उसके पश्चात् जो मौखिक प्रक्षेप होता रहा है और अब भी होता रहता है, उसका अंत नहीं हैं ऐसे ही कुछ अधिक महत्वपूर्ण विषयों पर इस छोटी-सी पुस्तक में विचार किया गया है। उन्हें अन्तिमेत्थम् के रूप में स्वीकार किए जाने का लेखक का आग्रह नहीं है। सुधीजनो के विचारार्थ प्रस्तुत है।
    —विद्यानन्द सरस्वती
  • Ramayan Bharantiyan Aur Samadhaan
    Swami Vidya Nand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1115

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के पढ़ने से पता चलेगा कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम राज्य पाने के इच्छुक थे, वे पिता के कहने से वन नहीं गए, राम दीपावली के दिन नहीं बल्कि चैत्र शुक्ला 6 को अयोध्या लौटे थे, सीता का स्वयंवर नहीं हुआ था, कौशल्या की स्थिति घर में दासियों से भी बुरी थी, राम ने धोबी या किसी के भी कहने से सीता को वनवास नहीं दिया था, उन्होंने तपस्या करते तथाकथित शुद्र शम्बूक का वध नहीं किया था, हनुमान बंदर नहीं बल्कि व्याकरणाचार्य तथा चारों वेदों के विद्वान् थे, बालि की पत्नी तारा वेदों के रहस्य को जानने वाली थी, उसका पुत्र अंगद बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ था और उसके श्वसुर सुषेण बड़े कुशल सर्जन और प्लास्टिक सर्जरी में निष्णात थे, हनुमान, जटायु, रावण आदि छोटे-छोटे निजी हेलीकाॅप्टरों में यात्रा करते थे, शबरी भीतनी नहीं, उच्च कुल की तपोनिष्ठ देवी थी, अयोध्या तथा लंका की राजभाषा संस्कृत थी इत्यादि...
  • Jan, Samaaj Aur Sanskriti
    Vishnu Prabhakar
    35 32

    Item Code: #KGP-9141

    Availability: In stock

    वे कुछ भी क्यों न हों पर उनमें से अधिकांश के पीछे एक समान दृष्टि है । वह दृष्टि परंपरा को नकारती नहीं, बल्कि उसके मध्य से भावात्मक एकता की कल्पना की एकता-मूलक संस्कृति को समझने-पहचानने की कोशिश करती है । वह दृष्टि धर्म, समाज, संस्कृति और संप्रदाय के मोहातीत सही अर्थ जानने को भी व्यग्र है । उसमें न पूर्वाग्रह है, न विद्वत्ता का उदघोष, बल्कि जो उपलब्ध है, उसकी सहायता से खोज की, निरंतर खोज की छह है । इससे अधिक का दावा किया भी नहीं जा सकता क्योंकि सर्जक के सामने मंजिल होती ही नहीं, तलाश होती है । 
    तलाशो तलब में वह लज्जत मिली है 
    दुआ कर रहा हूँ की मंज़िल न आवे । 
  • Shaantidoot Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    300 270

    Item Code: #KGP-644

    Availability: In stock

    भारत के इतिहास में फिर एक बार वैसा ही समय आया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक बार फिर कुछ वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग करके देश का विभाजन करने की मांग की। गांधी जी ने मुस्लिम लीग को देश के विभाजन से विरत करने के लिए मुहम्मद अली जिन्ना के हाथ पर कोरा चैक रखकर संपूर्ण देश पर शासन करने का अधिकार मुस्लिम लीग को दे दिया, किंतु मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान से कम पर समझौता करने से इनकार कर दिया। सन् 1999 में पाकिस्तान ने देश पर आक्रमण कर दिया। इससे पूर्व भी पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण करके देश को हथियाने का प्रयत्न किया था, किंतु इस बार पाकिस्तान से बातचीत न करके पाकिस्तान को ईंटों का जवाब पत्थरों से देकर देश की रक्षा करने मंे सफलता प्राप्त कर ली, किंतु इसे युद्ध की समाप्ति नहीं माना जाना चाहिए। पाकिस्तान की ओर से फिर भी युद्ध की स्थिति पैदा की जाती रहेगी। वस्तुतः देश की समस्या समय-समय पर होने वाले आक्रमण नहीं हैं। जब तक पाकिस्तान रहेगा तब तक युद्ध की स्थिति बनी रहेगी। महाभारत की तरह एक निर्णायक युद्ध होकर अखंड भारत की स्थापना ही इस समस्या का समाधान है।
    -इस पुस्तक के ‘गांधी जी के शांति-प्रयासों की असफलता के कारण’ अध्याय से
  • Bharatvanshi : Bhasha Evam Sanskriti
    Pushpita Awasthi
    450 405

    Item Code: #KGP-708

    Availability: In stock

    डॉ.. पुष्पिता अवस्थी की किताब ‘भारतवंशी: भाषा एवं संस्कृति’ प्रत्यक्ष अनुभव के आलोक में रची ऐसी कृति है जिसमें रचनाकार की संवेदना का परिसर व्यापक है। भारतवंशियों के इतिहास का अध्ययन यहां धर्म, दर्शन, भाषा, संस्कृति और कलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। इतिहास की जड़ों में भारत से निर्वासित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों, यथा--सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, मॉरीशस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे। 
    डॉ. अवस्थी ने इन्हीं पर दशकों तक काम किया। यह काम से अधिक राग है, प्रतिबद्ध समर्पण है। इसमें प्रवासी भारतीयों के इलाकों की भी छवियां हैं। मूलतः यह कृति उन भारतवंशियों के अंधेरों को रोशनी में लाती है जो बहुत हद तक अलक्षित रहा। 
    भारतवंशियों की वैश्विक भारतीयता को सच्ची पहचान दिलाने में एक ऐतिहासिक पहल की तरह यह किताब अपनी मुकम्मल जगह बनाती है। संस्कृति और भाषा का यह गहन-गंभीर अध्ययन कदाचित् पहली बार वैज्ञानिक दृष्टि से सामने आ रहा है। इसमें सृजनशील लेखक और इतिहासविद् की अनूठी जुगलबंदी है। 
    डॉ. अवस्थी ने भारतवंशियों की अलग-अलग धर्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और जातीय पहचानों में हिंदुस्तानियत की शिनाख्त करते हुए उन तत्त्वों का अन्वेषण किया है जो उन्हें भारतवंशी होने के सांस्कृतिक स्वाभिमान में एकसूत्र करते हैं। यह एकसूत्रता संस्कृति और भाषा की अंतर्तहों में किस तरह अंतर्भुक्त है, इसे अकेले दम पर लेखक ने घूम-घूमकर चिन्हित किया है। वे भारतीय आर्यों और पारसीक आर्यों के सांस्कृतिक और भाषायी इतिहास के रास्तों से वैचारिक यात्रा करती हैं और मोटे तौर पर 19वीं से 20वीं सदी के बीच बनी संस्कृति और भाषा की जड़ों को टटोलकर अपनी स्थापनाओं के लिए रास्ता निर्मित करती हैं। इस प्रक्रिया में वे यूरोपीय उपनिवेशों में भारतवंशियों के तत्कालीन दारुण इतिहास, यातनाओं, यंत्राणाओं के वास्तविक चित्रों को क्रमशः सजीव करती हैं। 
    डॉ. अवस्थी ने संस्कृति और भाषा को उस संजीवनी के रूप में खोजा है जिनके कारण ही भारतवंशियों का जीवन है। ये दोनों उनके प्राण तत्त्व बने हुए हैं। इन्हीं दो तत्त्वों से विश्व में उनकी भारतीय अस्मिता का स्थापन हुआ। यह अस्मिता उन भारतीयों से अलग है जो पिछले 30-40 सालों में प्रवास पर पहुंचे। प्रवासी और अप्रवासी के भेद को, भ्रम को अनावृत्त करती यह किताब एक उपलब्धिकी तरह सामने है।
    भूमंडलीकरण के भयावह आक्रमण के दौर में जबकि संस्कृतियों और भाषाओं, बोलियों और लिपियों को बचाना कठिन होता जा रहा है तब यह एक किताब भाषा एवं संस्कृति को बचाने का मेटाफर रचती है। यही इसका मानीख़ेज हासिल है।
  • Bhartiya Sanskriti Aur Hindi-Pradesh-1
    Ram Vilas Sharma
    750 675

    Item Code: #KGP-9024

    Availability: In stock

    भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश : 1
    महाभारत और रामायण में सभागारों और बड़े-बड़े भवनों का वर्णन है । वे हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों में प्रत्यक्ष है । पाटलिपुत्र एक बड़े साम्राज्य की राजधानी बना । वहां के भवन चीनी यात्री फाहियान ने देखे तो उसने सीधा, ये मनुष्यों के नहीं, देवों के बनाए हुए होंगे । पाटलिपुत्र, काशी, मथुरा और उज्जयिनी, ये भारत के प्राचीन नगर थे । आज भी ये संसार के ऐसे प्राचीनतम नगर हैं, जिनका इतिहास अब तक अटूट चला आ रहा है । भारतीय संस्कृति का बहुत गहरा संबंध इन चार महानगरों से है । इन नगरों पर ध्यान देते ही यह प्रचलित धारणा खंडित हो जाती है कि भारत ग्राम समाजों का देश है, यहाँ के लोग कला-कौशल में पिछडे हुए थे और हमें उन्हें ग्राम समाजों की ओर लौट जाना चाहिए । ये चारों महानगर विभिन्न युगों में व्यापारिक संबंधों से परस्पर जुड़े रहे हैं । इन्होंने दक्षिण जनपदों के मदुरै आदि नगरों से भी संबंध कायम किया था । मगध से मालवा तक अब जातीय भाषा के रूप में हिन्दी का व्यवहार होता है । नगरों के बिना हिन्दी का यह प्रसार भारत के सबसे बडे जातीय क्षेत्र में असंभव था । इन नगरों के द्वारा हिन्दी प्रदेश के जनपद प्राचीन काल से परस्पर संबद्ध हुए और दक्षिण भारत से उन्होंने अपना संबंध जोड़ा । इसलिए भारत राष्ट्र के निर्माण में और भारतीय संस्कृति के विकास में हिन्दी प्रदेश की निर्णायक भूमिका स्वीकार करनी चाहिए । दक्षिण में तमिलनाडु, उत्तर में कश्मीर, पूर्व में असम और पश्चिम में गुजरात, दूर-दूर के इन प्रदेशों को जोड़ने वाला, इनके बीच स्थित विशाल हिन्दी प्रदेश है । ऋग्वेद, अथर्ववेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, अर्थशास्त्र की रचना यहीं हुई । यहीं कालिदास और भवभूति ने अपने ग्रंथ रचे और मौर्य तथा गुप्त साम्राज्यों की आधारभूमि यही प्रदेश था । उत्तरकाल से दिल्ली, आगरा इस प्रदेश के बहुत बड़े नगर बने । ये व्यापार के बहुत बड़े केंद्र थे और सांस्कृतिक केंद्र भी थे । तुर्कवंशी राजाओं ने यहीं रहकर शताब्दियों तक एक बहुत बड़े राज्य का संचालन किया था । विद्यापति, कबीर, सूरदास, तुलसीदास जैसे कवि इसी क्षेत्र में हुए । इसी प्रदेश में प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन का जन्म हुआ । अपने स्थापत्य सौन्दर्य से संसार को चकित कर देने वाला ताजमहल इसी प्रदेश के आगरा नगर में है । इसलिए इस पुस्तक का नाम भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश है ।
  • Himalaya Gaatha-3 (Janjati Sanskriti)
    Sudarshan Vashishath
    550 495

    Item Code: #KGP-639

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-3 (जनजाति संस्कृति)
    न जाने कब फहराने लगीं धर्म पताकाएँ हिमप्रदेश के बीहडों में । कब बौद्ध मंत्र भोटी में गूँजने लगे । तथागत कब महाविरोचन, अक्षोभ्य, अमिताभ, अमोधसिद्धि बने । कब आए पदूमसम्भव, रत्नभद्र । इस अभियान में कौन भिक्षु त्यागी हुए । और बौद्ध  वाड़मय से पहले गुफाओं मेँ कौन लोग वास करते थे । क्या कहते हैं, हजारों वर्ष से भी पुराने ताबो मठ के पास चट्टानों पर खुदे गुफा चित्र । ये बाते अभी पूर्णतया स्पष्ट नहीं है । इतिहास ग्लेशियर में छिपी नदी की तरह है ।
    तथापि ए० एच० फ्रेंके तथा दुची जैसे यूरोपीय विद्वानो ने खोले हैं । आज तक इन्हीं का अनुसरण करते जाए शोधकर्ता । हिमालय की संस्कृति पर गंभीरता से मौलिक कार्य नहीं हुआ । कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाई है । 'आँखिन देखी’ के आधार पर संस्मरण, यात्रा और कथात्मक शैली में वर्णन इन का गुण है । सरल, सुरुचिपूर्ण और स्पष्ट भाषा में रोचकता के साथ गंभीर पहलुओं का विवेचन, वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।
    संस्कृति पर लिखने वाले ऐसे बिरले साहित्यकारों में है वशिष्ठ । जो अपनी यायावर प्रवृति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते है । संस्कृति को बहुत करीब से देखा, परखा, समझा और फिर लिखा है । किन्नौर के अंतिम गांव छितकुल और नसज्ञा से लेकर चम्बा के साच दर्रे से होकर सुदूर पांगी तक पैदल यात्राओं के बाद यहाँ की अनूठी संस्कृति पर लेखनी चलाई है ।
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत तीसरे खंड में हिमाचल के किन्नौर, लाहौल स्थिति और पांगी-भरमौर जैसे दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों की संस्कृति पर अछूती सामग्री दी जा रही है ।
  • Himalaya Ki Sanskritik Sampada
    Sudarshan Vashishath
    460 414

    Item Code: #KGP-371

    Availability: In stock

    आज भी हिमालय अपने में आदि संस्कृति छिपाए हुए है। आज के युग में तमाम प्रदूषण, मिश्रण और संकरण के बावजूद पर्वत कंदराओं में पुरातन संस्कृति के दर्शन हो सकते हैं। जैसे हिम ग्लेशियरों में सदियों से पानी छिपा रहता है, ठीक वैसे ही पर्वतों की गुफाओं में वे संस्कार छिपे हैं जिन्हें आधुनिकतावादी मृतप्राय समझ बैठे हैं। यह एक तथ्य है कि संस्कृति किसी भी बाहरी आक्रमण से एकदम नहीं मरा करती। वह जीवित रहती है चिरकाल तक, चाहे आक्रमणकारी यह समझें कि इसे मिटा दिया गया है। संस्कार अपने भीतर का एक अनुशासन है जो भीतर ही भीतर छिपा रहता है और चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने प्रकट होता है। बाहरी हाव-भाव, क्रियाकलाप से लेकर मन की गहराइयों तक संस्कार अपना घर बनाए रहते हैं जिन्हें जड़ से समाप्त करना किसी के लिए भी संभव नहीं।
    हिमाचल प्रदेश में किन्नौर तथा लाहौल-स्पीति, दो जिले पूर्ण रूप से जनजातीय घोषित हैं। जिला चंबा में भरमौर तथा पांगी क्षेत्र जनजातीय हैं। यहाँ संस्कृतियों का संगम भी एक विलक्षणता लिए हुए है। किन्नौर में बुशहर का राजवंश पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बाणासुर, उषा-अनिरुद्ध उपाख्यान से जुड़ा हुआ है। यहाँ उषा देवी का मंदिर है तो दूसरी ओर बौद्ध परंपरा भी विद्यमान है। किन्नौर में हिंदू मंदिर तथा गोम्पा यानी बौद्ध मठ एक ही प्रांगण में स्थापित हैं। यही संगम लाहौल से होता हुआ भरमौर तक चला गया।
    हिमालय का साक्षात्कार कराती प्रस्तुत पुस्तक संस्कृति- प्रेमियों, अनुसंधानकर्ताओं तथा पाठकों के लिए उपयोगी एवं रोचक सिद्ध होगी।
    अस्तर में: बुद्ध प्रतिमा (8वीं शताब्दी)
    परशुराम मंदिर निरमंड से ये प्रतिमाएँ 1981 में हुए ‘भुंडा उत्सव’ के अवसर पर बाहर निकाली गई थीं। ये मूर्तियाँ उत्सव के कुछ समय बाद चोरी हो गईं। पुलिस द्वारा इन प्रतिमाओं को अन्य चोरी हुई मूर्तियों सहित बरामद कर लिया गया। अब ये रामपुर के सरकारी खजाने में जमा हैं।
  • Jharkhand Ki Sanskritik Dharohar Saraikela Chhau
    Yogendra Prasad
    190 171

    Item Code: #KGP-398

    Availability: In stock

    झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर सरायकेला छऊ
    सरायकेला छऊ झारखंड की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है। इस नृत्य में मुखौटों का प्रयोग किया जाता है। इस नृत्य की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि बिना संवाद के ही नर्तक पूरी कथा समझा देते हैं। इसकी ताल और गति लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
    सरायकेला छऊ 1930 के दशक से ही कलाप्रेमियों के लिए जिज्ञासा और आकर्षण का केंद्र रहा है। चाहे कला संस्कृति से जुड़ी हस्ती हो, बुद्धिजीवी या फिर राजनीति से ताल्लुक रखने वाली शख्सियत–सभी इस छऊ नृत्य के कायल रहे हैं। इंदिरा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘इटरनल इंडिया’ में सरायकेला छऊ को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। सरायकेला राजपरिवार ने भी इस कला के संरक्षण और संवर्द्धन में अपनी विशेष भूमिका का निर्वाह किया है। इस अनमोल कला के महत्त्व को देखते हुए राज्य सरकार प्रत्येक वर्ष चैत्र पर्व के अवसर पर ‘छऊ महोत्सव’ का आयोजन करने लगी है।
    इस नृत्य ने अपने चारू प्रदर्शन से न सिर्फ देश के कोने-कोने में अपितु विदेशों में भी अपनी धाक जमाई है। 1938 में यहाँ के कलाकारों ने इंग्लैंड, इटली, फ्रांस आदि देशों में इस कला का प्रदर्शन किया और अब तो यह भारत सरकार के सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों का अभिन्न अंग बन चुकी है। इस कला से प्रभावित होकर विदेशों से भी लोग यहाँ प्रशिक्षण के लिए आते हैं।
    भारत सरकार ने भी इस कला का सम्मान किया है। अब तक इस नृत्य से जुड़े छह कलाकारों को ‘पद्मश्री’ से नवाजा जा चुका है। झारखंड की इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत के महत्त्व को देखते हुए सन् 2010 में यूनेस्को ने सरायकेला छऊ को ‘इंटेजिबल कल्चरल हैरिटेज’ की सूची में शामिल कर लिया है। झारखंड राज्य तथा भारतवर्ष की लोकसंस्कृति में सरायकेला छऊ नृत्य शैली गौरवमयी स्थान रखती है।                  
  • Himalaya Gaatha-4 (Samaj-Sanskriti)
    Sudarshan Vashishath
    400 360

    Item Code: #KGP-795

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-4 (समाज-संस्कृति)
    स्वर्ग की कल्पना एक ऊँचे स्थान पर की गई है । पृथ्वी के स्वर्ग पर्वतों पर स्थित थे । हमारे पुराणों से भूगोल वर्णन के समय जिन स्थानों पर स्वर्ग बताए गए हैं, वे सभी पर्वतों पर थे । शंकर का प्रिय कैलास, कुबेर की अलकापुरी, इंद्र की इन्द्रपुरी, सब ऊँचे स्थानों पर अवस्थित थे । गंधमादन पर्वत, कैलास पर्वत तथा मेरु पर्वत के चारों और शीतांत आदि केसर पर्वतों का वर्णन मिलता है, जहाँ धार्मिक पुरुष वास करते थे । ये संपूर्ण स्थान पृथ्वी के स्वर्ग कहलाते थे । इन पर विजय पाने के लिए सभी देव, दानव और मानव प्रयत्न करते रहते ।
    पर्वतवासियों से मैदानी सभ्यता का संघर्ष होता रहा । आर्यों ने पर्वतों पर विजय पाने के लिए अनेक प्रयास किए । उन्हें परास्त किया और बार-बार पर्वतों की ओर धकेला । इस सबके बाबजूद भी पार्वती संस्कृति अपने मूल रूप में बनी रही और अनेक बाहरी प्रभावों के बाद आज भी अपने आदि रूप से संरक्षित मिलती है ।
    हिमाचल प्रदेश के अनेक भूखड़ों से आज भी वे परंपराएँ विद्यमान हैं, जो एकदम आदि परंपराएँ कही जा सकती है । प्रकृति पूजा में आकाश, भूमि, जल, पाषाण, वनस्पति पूजा  आज भी की जाती है । कुछ परंपराएँ गोपनीय ढंग से निभाई जाती हैं, जो अधिक महत्वपूर्ण है ।
    आज समाज, पर्वतीय समाज की प्रमुख विशेषता रही है । आज भी जनजातीय समाज जाति और वर्गविहीन है ।
    आज संस्कृति पर लेखन कम होता जा रहा है । संस्कृति पर लेखनी बताने वाली में वशिष्ठ एक बिरले साहित्यकार है, जिन्होंने गहरे में जाकर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से समाज का एक चित्र प्रस्तुत किया है । परंपरा की एक अमूल्य थाती शनै:- शनै: समाप्त हो रही है । इसे पिछडी सभ्यता का द्योतक माना जा रहा है। ऐसे में यह कार्य और भी मह्रत्वपूर्ण हो जाता है।
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत चौथे खंड मेँ समाज और संस्कृति की सूक्ष्म मान्यताओं, लोकविश्वासों, रीति-रिवाजों और संस्कारगत परंपराओं पर ऐसी दुर्लभ सामग्री दी जा रही है, जो अब मिटने के कगार पर है ।
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