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  • Mandakranta
    Maitreyi Pushpa
    140 126

    Item Code: #KGP-1896

    Availability: In stock

    मंदाक्रान्ता
    श्यामली । एक आदर्श गांव । छोटे-बड़े, जात-पाँत का भेदभाव नहीं । आपस में स्नेह, प्रेम, भाईचारा ऐसा कि लोग मिसाल दे, लेकिन आज श्यामली के लोग अपनी परछाईं तक पर विश्वास नहीं कर पाते । भाई-भाई के बीच रंजिश, घर-घर में क्लेश । जाने कैसा ग्रहण लग गया श्यामली की अच्छाई को ! कुछ भी वैसा न रहा, सिवाय दादा के । बस, बदलते वक्त की आँधी में यही एक बरगद बच रहा है श्यामली में ।
    और सोनपुरा ! गरीबी, बीमारी, भुखमरी और आपसी कलह से जूझता सोनपुरा आब सचमुच सोने-सा दमक रहा है । एकता और आत्मविश्यास से अजित स्वाभिमान और खुशहाली की दमक ।
    एक बहुत पुरानी कहावत है--'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।' श्यामली का मन हार गया, सोनपुरा का मन जीत गया । एकता, प्रेम, भाईचारा, सदूभाव, सामाजिक चेतना आदि के बारे में हम बहुत बार भाषण सुनते रहते हैं और उन्हें किताबी बातें मानकर अनदेखा करते आए हैं, लेकिन सोनपुरा ने इन शब्दों के मर्म को समझ लिया शायद और उन्हें अपनी दिनचर्या में उतार लिया ।
     इन बातों ने गाँवों के प्रति मेरी धारणा, मेरे सरोकार और चिंतन को बेहद प्रभावित किया, जिसे मैंने अपने उपन्यास 'इदन्नमम' के माध्यम से अपने पाठकों के साथ बांटने की अपनी जिम्मेदारी का भरसक सावधानी और ईमानदारी से निर्वाह करने का प्रयास किया । उसी उपन्यास पर आधारित है प्रस्तुत नाटक मंदाक्रान्त ।
    --मैत्रेयी पुष्पा
  • Megha Megha Pani De
    Madhukar Singh
    60

    Item Code: #KGP-1155

    Availability: In stock

    मेघा-मेघा पानी दे
    (एक प्राचीन ऐतिहासिक कथा पर आधारित नाटक)

    गांव की एक डगर। सामने बड़ा-सा चरागाह है। कृष्ण एक ऊंचे टीेले पर बैठा है। तीन-चार लड़के कुछ दूरी पर एक-दूसरे से कटे हुए बैठे हैं। कृष्ण की बंसी के स्वर धीरे-धीरे तेज होते जा रहे हैं।
  • Abhang-Gaatha
    Narendra Mohan
    140 126

    Item Code: #KGP-9138

    Availability: In stock

    ‘खोए हुए शब्द को, अभंग को, सृजनशक्ति को पुनः पाने की तुकाराम की बेचैनी अभूतपूर्व है जो उसे हर युग के कवि की बेचैनी के मिथक के रूप में खड़ा कर देती है। शब्द, सृजन और जिंदगी उनके लिए अलग-थलक नहीं, एक ही हैं। शब्द की इस कैफियत के साथ तुकाराम का मुझ तक पहुंचना एक कवि के एक नए पाठ के खुलने के बराबर है जिसके लिए एक क्या, कई नाटक लिखे जा सकते हैं।’
    ये शब्द हैं डाॅ नरेन्द्र मोहन के जिन्होंने अभंग-गाथा नाटक में तुकाराम की जिंदगी और अभंग-रचना को आज के दहकते हुए संदर्भों से जोड़ दिया है। नाटक के निर्देशक सतीश दवे ने अपने वक्तव्य में ठीक ही कहा है ‘पहली बार जब मैंने अभंग-गाथा का नाट्य आलेख उनसे सुना तो मुझे महसूस हुआ जैसे तुकाराम का मानवीय व्यक्तित्व कई दृश्यों की श्रृंखला में मेरे सामने मूर्तिमान हो गया हो और एक साथ कई रूपाकारों ने मुझे घेर लिया हो। मुझे लगा तुकाराम अपने युग से बाहर आकर मेरे सामने आ खड़े हुए हों और उस वक्त की परिस्थिति, समय और इतिहास मेरी परिस्थिति, समय और इतिहास से जुड़ने-टकराने लगा हो।’
    अभंग-गाथा में शब्द और रंग साथ-साथ हैं। एक-दूसरे को प्रकाशित-स्पंदित करते हुए। इस नाटक को खेलना, इसीलिए, रंगकर्म का एक सांझा अनुभव बनता गया है। अभंग को यहां रंग-संगीत शैली का हिस्सा ही बना दिया गया है और यह शैली नाटक के भीतरी रंग-संयोजनों से मिलकर ही मंच पर आई है। 
  • Maut Kyoun Raat Bhar Nahin Aati
    Pratap Sehgal
    50 45

    Item Code: #KGP-1815

    Availability: In stock

    मौत क्यों रात भर नहीं आती
    'मौत क्यों रात भर नहीं आती' की शुरुआत तो एक यथार्थवादी नाटक की तरह से होती है, लेकिन ज्यों-ज्यों यह आगे बढ़ता है, एक 'फार्स' की शक्ल अख्तियार कर लेता है । अपने पूरे घटनाक्रम में नाटक मध्य- वर्गीय मानसिकता एवं मूल्यों पर हलकी-हलकी चोट करता चलता है ।
    इस नाटक की दिलचस्प बात इसके दो अंत है । किसी भी घटनाक्रम का एक ही अंत हो सकता है, लेकिन संभावना के स्तर पर नाटककार कई तरह के 'अंत' सोच सकता है । यह भी एक तरह से 'फार्स' ही तो है । नाटक की भाषा धुर सिरे से धुर सिरे तक बोलचाल की ही भाषा है ।
    विभिन्न रंग-मंडलियों ने इसे अपने-जपने तरीके से खेला है, जिससे साफ जाहिर होता है कि इसमें खेले जाने की अनंत राहें मौजूद है ।
    हिंदी के प्रतिष्ठित नाटककार प्रताप सहगल का यह नाटक उनके लिए, जो खेलने के लिए किसी नाटक की तलाश में है ।
  • Nau Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    120 108

    Item Code: #KGP-2088

    Availability: In stock

    नौ लघु नाटक
    हिंदी में नाट्य-लेखन संस्कृत नाटय-परंपरा और लोक-नाट्य के विविध रूपों से जुड़कर विकसित हुआ हैं । बाद में उस पर ग्रीक त्रासदी, पारसी शैली  और पश्चिमी रंग-शैलियों का असर भी दिखाई देता है ।  मंचीय नाटक बनाम पाठ्य नाटक की बहस भी हिंदी  में होती रही है । इधर हिंदी नाटय-लेखक और हिंदी  रंगमंच अपनी-अपनी दर्पमंडित घोषणाओं के वावजूद एक-दूसरे के पास ही आया है। एकांकी नाटकों-लेखन के विकास के पाशर्व में जहाँ रेडियो की  भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है, वहीं स्कूलों एवं कॉलेजों की नाट्य-संस्थाओं द्वारा महसूस की जाने वाली एकांकी नाटकों की ज़रूरत भी एक कारण रही है ।
    अजब बात है कि इधर एकांकी-लेखन कम हुआ है, पर उसकी जगह लघु नाटक एव नुक्कड़ नाटक ने ली है ।
    प्रताप सहगल रंगमंच से जुड़े हुए नाटककार के रूप में विख्यात हैं । उनके नाटक 'रंग बसंती', 'मौत को रात भर नहीं जाती' तथा 'अँधेरे में' आदि के मंचन बार-बार हुए हैं। अपने पिछले नाटक 'अन्वेषक' से उन्हें विशेष ख्याति मिली है ।
    'नौ लघु नाटक' में समय-समय पर लिखे गए नौ लघु नाटक संग्रह के रूप में आ रहे हैं । प्रताप सहगल का नाट्य-लेखन परंपरा एवं प्रयोगशीलता के संतुलन बिंदु पर खडा नजर आता है । अपनी इसी छवि के अनुरूप उनके इन लघु नाटकों में भी कहीं परंपरा की गंध मिलेगी तो कहीं प्रयोगशीलता की ललक । कहीं मूल्यों का भंजक रूप मिलेगा तो कहीं चरित्रों कै भीतर सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पेठ। इनमें से अनेक नाटक कई-कई बार मंचित हुए हैं और कई एक प्रकाशित होकर अपना पाठक वर्ग बना चुके हैं ।
    छोटे-छोटे शहरों, कस्बों तथा कॉलेजों एवं स्कूलों की नाट्य-मंडलियों को अच्छे लघु नाटकों की प्राय: तलाश रहती है। इस दृष्टि से भी यह संकलन महत्त्वपूर्ण है और लघु नाटकों के विकास की दृष्टि से भी ।
  • Vish Vansh
    Rajesh Jain
    40 36

    Item Code: #KGP-1916

    Availability: In stock

    विष वंश
    कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।
    हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार राजेश जैन के इस प्रस्तुत नाटक 'विष वंश' में राजा की यह कथा हमारे आसपास के भ्रष्टाचार के जिस गहन सचिंतन से नंगा करती है, उसमें प्रतिपक्ष के लिए कोई अवकाश नहीं है । राजा अटपटसिंह और महामंत्री चंटप्रताप सिंह के माध्यम से तंत्र के भ्रष्टीकरण को, आज की नारी की अस्मिता क्या राजनीति में पनप राही वंशवाद को प्रवृति के साथ जोड़कर नाटककार ने इस नाट्यकथा को समकालीन समय का एक टकसाली पाठ बना दिया है । प्रजातंत्र ये प्रजा ही सर्वाधिक शक्तिशाली और सत्ताधीश हो-अत्यंत रोचक ढंग का यह सत्यान्वेषण इस नाटक के सुलझी हुई पहेली है ।
    छठे 'आर्य स्मृति साहित्य समान' के निर्णायक मंडल- राम गोपाल बजाज, कन्हैयालाल नंदन तथा असग़र वजाहत जैसे नाट्यविदों के मूल्यांकन के आधार पर सम्मानित इस नाट्यकृति का प्रकाशन, नाटकों की दुनिया में एक सदाबहार खुशबू का आह्वान है, ऐसा विश्वास है ।

  • Chetana
    Madan Lal Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-1812

    Availability: In stock


  • Saanch Kahoon To…
    Prabhakar Shrotiya
    35 32

    Item Code: #KGP-9105

    Availability: In stock

    'साँच कहूँ तो' राजस्थानी रासो-कथा पर आधारित स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का एक नया लीला-नाटक है । इसमें धारा-नरेश भोज परमार की पुत्री राजमती और अजमेर के चौहान राजा बीसलदेव के विवाह, वियोग एवं पुनर्मिलन की मार्मिक कथा को मारवाड़ और मालवा की लोक-रंग-परम्परा की रंगत के कल्पनाशील प्रयोग से एक दिलचस्प मौलिक नाटक का रूप प्रदान किया गया है ।
    यह नाटक आधुनिक भारतीय रंग मुहावरे की रचनात्मक खोज में लगे प्रतिभावान साहसी रंगकर्मियों को न केवल अपनी ओर आकृष्ट कोमा बल्कि समकालीन हिन्दी नाटय-लेखन एवं रंगकर्म के लिए एक महत्वपूर्ण रचना भी सिद्ध होगा । 
    -जयदेव तनेजा

  • Saadat Hasan Manto Ke Natak
    Narendra Mohan
    400 360

    Item Code: #KGP-3

    Availability: In stock

    सआदत हसन मंटो के नाटक
    सआदत हसन मंटो के नाटकों से हिंदी पाठकों का उतना परिचय नहीं है जितना उनकी कहानियों से, जब कि उन्होंने उच्चकोटि के नाटक लिखे हैं । उनके नाटकों में विडम्बनापूर्ण  स्थितियों के दृश्यात्मक संयोजन के आधार पर चरमबिंदु  की रचना की गई है और फिर उसी में से उभरता है एंटी क्लाइमेक्स । कार्य-व्यापार को आलोकित करने की यह पद्धति, चरमबिंदु के साथ इस ढंग का सलूक मंटो के नाटय-कर्म का अहम हिस्सा है ।
    मंटो के नाटकों में व्यंग्य-दृष्टि और फार्स के साथ-साथ हास्य और क्रीडा का भी विधान हुआ है । इनमें मंटो की संवेदना और सोच का दायरा काफी विस्तृत है-वैयक्तिक कुंठाओं, आकांक्षाओं और सरोकारों से लेकर सामाजिक- राजनीतिक चिंताओं और विदूपताओं तक । ये नाटक श्रव्य माध्यम द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, अत: उर्दू हिंदी भाषाओं की साँझी विरासत हैं ।
    सआदत हसन मंटो के नाटक पुस्तक से मंटो के नाटकों को, उनके नाटककार रूप को पहली बार हिंदी पाठकों के सामने लाने का महत्त्वपूर्ग कार्य किया है हिंदी के जाने-माने नाटककार, कवि और आलोचक डॉ० नरेन्द्र मोहन ने । संपादकीय दृष्टि की वजह से यह मंटो के नाटकों का एक संकलन भर नहीं है, यह एक ऐसा दस्तावेज बन गया है जो पीढियों के फासले को पाटता हुआ हमसे आ जुड़ता है ।
    मंटो ने न आघुनिक्तावादी सांचा कबूल किया, न प्रगतिवादी । यह जिंदगी की जुराब के धागे को एक सिरे से पकड़कर उघेड़ता रहा और उसके साथ हम सब उधड़ते चले गए ।
  • Shankar Shesh : Samagra Naatak (3 Vols.)
    Shanker Shesh
    1600 1440

    Item Code: #KGP-725

    Availability: In stock

    शंकर शेष: समग्र नाटक (3 खण्डों में)
    डॉ. शंकर शेष हिंदी नाट्य साहित्य के अत्यंत प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। पार्थिव शरीर से हमारे साथ न होते हुए भी अपनी रचनाओं के माध्यम से वे निरंतर अपने पाठकों के मन में रहते हुए एक संवाद में लीन अनुभूत होते हैं। 
    डॉ. शेष ने लगभग बीस पूर्ण अंकी नाटक, एकांकी, उपन्यास और कुछ लेख आदि लिखकर साहित्यिक जगत् में जितनी प्रतिष्ठा अर्जित की, चलचित्र जगत् में पटकथा लेखक के रूप में वे उससे कम चर्चित नहीं रहे, बल्कि उनकी विशेषता रही कि उन्होंने सिनेमा जगत् में कम काम किया, किंतु उसके लिए कोई समझौता नहीं किया।
    प्रस्तुत ‘शंकर शेष: समग्र नाटक’ (तीन खंड) में उनके प्रकाशित-अप्रकाशित सभी नाटक-एकांकी संकलित हैं। केवल शेष वही रहा है, जिसका रूप इतना अधूरा था कि उसे पूरा करते तो फिर वह डॉ.  शेष का न रहकर संशोधक या पूरा करने वाले का हो जाता।
    डॉ.  शेष के जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ उनकी रचनाधर्मिता में भी वह उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है और वह व्यक्ति जितना सहज था, इसका प्रमाण भी उनकी रचनाओं में बिखरा पड़ा है। प्रस्तुत तीन खंडों में उनका नाटककार रूप संश्लिष्ट होकर पाठक के सामने आता है। 
    हमें आशा ही नहीं, विश्वास है कि इन खंडों में पाठकों को शंकर शेष की रचनात्मकता के कई स्तर और आयाम मिलेंगे।
  • Kagaar Ki Aag Tatha Anya Radio Naatak
    Himanshu Joshi
    100 90

    Item Code: #KGP-1888

    Availability: In stock

    कगार की आग तथा अन्य रेडियो नाटक
    लेखक का बहुचर्चित उपन्यास है- 'कगार की आग' । उस पर आधारित नाटक का कई बार मंचन हुआ । रेडियो रूपक भी उस पर बना । इसके अतिरिक्त तेरह कडियों का रेडियो धारावाहिक भी प्रसारित हुआ ।
    आस्ट्रेलिया को केनबरा यूनिवर्सिटी में वर्षों तक वह पाठ्यक्रम में पढाया जाता रहा है । पंजाबी, डोगरी, मराठी, कोंकणी, उडिया आदि के अतिरिक्त उसका अंग्रेजी, नार्वेजियन, चीनी, बर्मी, नेपाली तथा बांग्ला में (बांग्लादेश में) भी रूपांतर हुआ ।
    ‘कगार की आग’ के अलावा 'हरा सूरज' रेडियो धारावाहिक भी चर्चा का विषय रहा । इनके साथ-साथ ‘कांछा', 'सु-राज', 'तपस्या', 'अगला यथार्थ', ‘इस बार’, 'स्वभाव' आदि अनेक रचनाएँ इस श्रृंख़ला में शामिल है । 'तरपन', 'सूरज की ओर’ तथा 'सु-राज' पर फ़िल्में बनी । 'सु-राज’ को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भारत की ओर से भेजा गया । 'तुम्हरे  लिए' पर तेरह किस्तों का दूरदर्शन-धारावाहिंक तैयार हुआ ।
  • Jhansi Ki Rani
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1821

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Dus Baal Naatak
    Pratap Sehgal
    240 216

    Item Code: #KGP-759

    Availability: In stock

    दस बाल नाटक
    ये नाटक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जिन कहानियों से प्रेरित हैं, उन कहानियों का समय वह समय है, जिसे हम भारत के  पुनर्जागरण और आजादी के संघर्ष का समय कहते हैं। भारत के अन्य इलाकों की अपेक्षा बंगाल में शिक्षा को व्यवस्था बेहतर थी, लेकिन आज के मुकाबले में उस शिक्षा-व्यवस्था को भी हम पिछड़ा हुआ ही कहेंगे।  ऐसे ही समय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व दुनिया को  चौका देता हैं। अपनी अन्य कलात्मक कियाओं के साथ-साथ वे बच्चों को कभी नहीं भूले। उन्होंने एक जगह कहा भी है कि बच्चा बडों का पिता होता है। यानी हम आने वाली हर पीढ़ी से कुछ सीखते हैं और कुछ सिखाते हैं।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बाल-कहानियों में सन्देश स्पष्ट हैं। ये संदेश बच्चों की अपेक्षा उनके अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अधिक हैं। अपना संदेश समाज तक पहुँचाने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर बच्चे को भी एक व्हीकल की तरह से इस्तेमाल करले हैं। कहानी का पाठक भल ही मौजूद हो, लेकिन उसका दर्शक नहीं होता। इसलिए प्रताप सहगल ने इन कहानियों को यहाँ लघु नाटकों के माध्यम से रखा है।  प्रताप सहगल हिंदी के जाने-माने कवि-नाटककार हैं। उन्हें भी अपन बहुविध लेखन के लिए जाना जाता हैं। इससे पूर्व उनके बाल-नाटकों की एक किताब 'छूमंतर' ( किताबघर प्रकाशान) प्रकाशित होकर मकबूल साबित हुई है। इसका प्रमाण उसके लगातार छपने चाल संस्करण हैं। इस बार प्रताप सहगल ने गुरुदेव की बाल-कहानियों का अपने बाल-नाट्य-लेखन का आधार बनाया है। ये नाटक जहाँ अपने समय में अवस्थित हैं, वहीं वे हमारे समय के साथ भी जुड़ जाते हैं और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इनकी उपयोगिता बनी रहेगी।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रताप सहगल-दोनों के कन्सर्न्स का जानने के लिए दस बाल-नाटकों का यह संग्रह हर बड़े और हर बच्चे के लिए एक जरूरी किताब बन जाता है।
  • Hi ! Handsome
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1823

    Availability: In stock


  • 1128 Mein Crime 27
    C. J. Thomas
    100

    Item Code: #KGP-1817

    Availability: In stock

    1128 में क्राइम 27
    '1128 में क्राइम 27' थॉमस का दूसरा नाटक है । उसकी समस्या सार्वदेशीय है । उन्होंने मौत को एक विशेष प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है । नाटक में जिंदगी और मृत्यु के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है । कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सिनिक है, क्योंकि उनका यह नाटक सिनिसिज्म की सृष्टि है।... 
    तत्कालीन रंगमंच पर जमी हुई हास्य रूढियों के प्रति विद्रोह, प्रबोधन की शक्ति पर विश्वास रखकर संसार का उद्धार करने की मूर्खता आदि पर भी उन्होंने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। असली जिंदगी और जीवन की व्याख्या करने वाले नाटक टेकनीक के वैभवों क द्वारा उनकी असली भिन्नताओं को उसी तरह रहने देकर रंगमंच पर प्रस्तुत करने का उनका कौशल आश्चर्यजनक ही है। जिंदगी मिथ्या है, यह दार्शनिक आशय दर्द-भरी हँसी के साथ वे मंच पर प्रस्तुत करते हैं। नाटक चलाने वाला और नाटक की व्याख्या करने वाला गुरु एक तरफ़, नाटक खेलने वाले, नेपथ्य, प्रोप्टर, स्टेज मैनेजर आदि का एक ढेर दूसरी तरफ, अखबार का दफ्तर, संपादक, चक्की आदि का एक ढेर तीसरी तरफ।  इन सबके सम्मुख गुरु के लिए जब चाहे तब इशारा कर सकने वाला एक प्रेक्षक समूह । इस प्रकार नाटक और जिंदगी को उनके असली रूप में अपने-अपने व्यक्तित्व से युक्त एक ही स्टेज पर एक साथ इस नाटक में प्रस्तुत करता है । नाटकीय प्रभाव एवं आंतरिक संघर्षों की दृष्टि से यह नाटक अत्यंत सफल है।
  • Koi Aur Raasta Tatha Anya Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    200 180

    Item Code: #KGP-731

    Availability: In stock

    कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक
    यह नया नाट्य-संग्रह आपके हाथों में है । एकांकी के बंधनों को तोड़ने वाले इन नौ लघु नाटकों के विषय अलग-अलग हैं।
     'अंक-दृष्टा' जहाँ रामानुजन की जीनियस को रेखांकित करता है तो 'अंतराल के बाद' में बदलते मूल्यों के बीच माँ एवं पुत्र के संवेदनात्मक संबंधी के बदलने की गाथा है । 'दफ्तर में एक दिन' एक सरकारी दफ्तर के कर्मचारियों की कार्यशैली एवं उबाऊ माहौल को उकेरता है तो 'कोई और रास्ता' संस्कारों से बँधी एक आधुनिक लड़की की संघर्ष-गाथा है । 'फैसला' में नारी- सम्मान का प्रश्च है तो 'लडाई' जाति के बंधनों के विरोध की दास्तान है । 'वापसी' अपनी जड़ों से उखड़ विदेश बसने की आकांक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते युवा पीढी का बयान है तो 'लम्हों ने खता की थी' एड्स के खतरों से आगाह करने की कोशिश है । इसी तरह से 'मेरी-तेरी सबकी गंगा' में गंगा की पौराणिक कथा को आधुनिक दृष्टि से देखने का प्रयास है ।
    यानी कुल मिलाकर सभी नाटकों का रंग अलग, मिजाज अलग, समस्या अलग है । मामूली लोगों के जीवन के विविध पक्षों को पकड़ते, परखते ये लधु नाटक आपको बाँधेंगे भी, कोंचेंगे भी ।

  • Poster
    Shanker Shesh
    120 108

    Item Code: #KGP-1897

    Availability: In stock


  • Keral Ka Krantikari
    Vishnu Prabhakar
    120 108

    Item Code: #KGP-1195

    Availability: In stock


  • Urgent Meeting
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1822

    Availability: In stock


  • Asghar Wajahat Ke Aath Naatak
    Asghar Wajahat
    450 405

    Item Code: #KGP-9001

    Availability: In stock


  • Rang De Basanti Chola
    Bhishm Sahni
    2014 1813

    Item Code: #KGP-19

    Availability: In stock

    रंग दे बसन्ती चोला
    [जलियाँवाला बाघ रतनदेवी आती है । हाथ में पानी का लोटा है ।]
    रतनदेवी : ले मेरे लाल । मैं तेरे लिए पानी लाई हूँ। (किश्ना के होंठों से पानी डालती है ।) तू बोलता क्यों नहीं किश्ना बेटे । (माथे को छुकर) चला गया, यह भी चला गया । इसकी भी प्यास बुझ गई । मैं कर्मजली तेरे होंठों में दो बूँट पानी भी नहीं डाल पाई । तू भगवान् को प्यारा हो गया है। (रो पड़ती है, फिर धीरे से उठकर अपने पति के शव के पास पहुंचती है। ) तू भी भगवान् के पास जा रहा है । मैं रोऊँगी नहीं । मैं तेरा सफर खराब नहीं करूँगी । हँसता-हँसता जा। भगवन् तुझे गले लगाएंगे ।
    तेरे सैकडों संगी-साथी मौत की नींद सोए पडे हैं । वे भी तेरे साथ भगवान् के दरबार में जाएँगे। उनके घरवाले अभी भी उनकी राह देख रहे हैं। 
    तूने अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा । तू अपनी जान निछावर कर गया । मैं पापिन तुझे सारा वक्त उलाहने देती रही । तेरे साथ झगड़ती रही, पर मुझे क्या मालूम था, तू सचमुच चला जाएगा । (उसका माथा सहलाती हुई) मैं कहाँ लुट-पुट गई ? मैं तो चिर सुहागिन हूँ । जिसका घरवाला ऐसा शूरवीर हो । तू तो मेरा सूरमा पति है । तू तो नाचता-गाता हुआ घर आया करता था : मेरा रंग दे, मेरा रंग दे बसन्ती चोला ।
    -(इस पुस्तक से)
  • Anveshak
    Pratap Sehgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1914

    Availability: In stock

    अन्वेषक
    महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम अतीत की ओर मुँह करके खडे को जाएँ और खडे रहें। हाथ में अतीत का झंडा उठा लें और गौरव को मीनारों पर चढ़कर खुद को बडा महसूस करें। महत्वपूर्ण यह है कि अतीत को खँगालें, अतीत की मीनारों को ओर देखें, पर अपने पैरों तले को जमीन न छोड़ें।
    'अन्वेषक' को रचना का मूल बिंदु यहीँ से शुरु होता है। इसी अर्थ में यह नाट्य-रचना पाँचवीं शती के उत्तरार्द्ध में हुए आर्यभट और उसके अन्वेषणों के बहाने समकालीन प्रश्नों यर विचार करती है। प्रगतिकामी और प्रतिगामी शक्तियों के बीच को रहे संघर्ष को नाटकीय तनावों के साथ अभिव्यक्त करती है। अवरोधकारी और अंधविश्वासी शक्तियों के सामने क्रांतिकारी अन्वेषण करने वाले किसी भी अन्वेषक को जिस मानसिक यातना से गुजरना पड़ सकता है और अंततः  उसकी क्या नियति हो सकती है इस सवाल पर भी यह नाटक गौर करता है।
    इतिहास नाटक की पृष्ठभूमि है इसलिए यह ऐतिहासिक नाटक नहीं है। इसका मकसद की जानकारी देना भी नहीं, बल्कि इतिहास के एक कालखंड, उस कालखंड में जन्मे आर्यभट के अन्वेषणों के बहाने परिवर्तन-, शक्तियों के संघर्ष को रेखाकित करना है। इसी के साथ जुड़ते है प्रेम, ईष्यों, स्मृहा, देश-प्रेम और वैज्ञानिक-टैम्पर से जुडे तमाम सवाल । 
    इन अर्थों में 'अन्वेषक' हिंदी नाटकों की उस परंपरा को आगे बढाता है जो प्रसाद से शुरू होकर मोहन राकेश में बदल जाती है। यहीं इतिहास पर उतना आग्रह नहीं, जितना प्रसाद को था पर नाटय-व्यापार पर आग्रह है। इतिहास के महीन तंतु को एक प्रभावी नाटक में रचने की क्षमता यहाँ साफ झलकती है। आशा है प्रताप सहगल का यह नाटक रंगकर्मियों  एवं नाट्य प्रेमियों की अदम्य रंग-पिपासा को एक सीमा तक अवश्य ही शांत करेगा।

  • Baapu Qaid Mein
    Rajendra Tyagi
    120 108

    Item Code: #KGP-1824

    Availability: In stock

    बापू कैद में
    आवाज : ठीक, बहुत ठीक । वैसे भी तुम लोग अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, क्योंकि अब मैं आजाद हूँ देहमुक्त हूँ। (विराम) तुन्हीं ने तो अपनी गोली से मुझे आजाद किया था । हाँ-हाँ, मुझे आजाद किया था और बापू को कैद !
    (कुछ देर रुकने के बाद) हाँ, मैं ठीक कह रहा हूँ बापू तुम्हारी ही कैद में है । तुन्हीं ने उन्हें कैद कर रखा है और तुम्ही बापू की समाधि पर… ! (बल देते हुए) हाँ-हाँ-हाँ! आत्मविहीन समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित का रहे हो । है ना मजाक ! "तुम नेता ही नहीं, अव्वल दर्जे के अभिनेता भी हो । जाओ, पहले बापू को आजाद करो और फिर आना उन्हें  श्रद्धांजलि अर्पित करने ।
    (क्षण-भर रुकने के बाद, अटटहास का स्थान सिसकियाँ ले लेती हैं और रुंधे गले से वही आवाज पुन: आती है) 'नहीं-नहीँ, तुम बापू को अभी आजाद नहीं करोगे, क्योकि तुममें इतना साहस ही नहीं है। तुम डरपोक हो। तुम जानते हो, बापू यदि आजाद हो गए तो देश में क्रांति आ जाएगी और तुम्हारी दुकानदारी बंद हो जाएगी ।
    (रुदन बंद और पुन: अटटहास) जाओ अपने-अपने घर लौट जाओ। नाटक बंद करो। सिंहासन तुम्हारी प्रतीक्षा में है। बापू जब तक कैद हैं, तब तक तुम्हारा सिंहासन अटल है । क्यों गृहमंत्री जी, ठीक कहा ना मैंने ? मैं भी जा रहा के तुम भी लौट जाओं ।
    बापू आज भी प्रासंगिक है । आम जन के हदय से उनके प्रति श्रद्धा है, उनके आदर्शों व सिद्धांतों के प्रति आस्था; किंतु बापू की इस लोकप्रियता का नेता अनुचित लाभ उठा रहे हैं । उनके लिए बापू एक ब्रांड हैं । ऐसा ब्रांड, मार्केट में जिसकी साख हैं । क्योकि साख है, इसलिए उसे कैश करना वे अपना धर्म समझते है । निहित स्वार्थ व दूषित राजनीति के अनुरूप वे बापू के आदर्शों व सिद्धांतों को जैसा चाहे उसी रूप में परिभाषित कर रहे हैं । केवल आम जन को सम्मोहित करने के लिए वे बापू की दुहाई देते हैं, उनके आदर्श व सिद्धांतों की दुहाई देते है । उनके लिए बापू की बस यही उपयोगिता है। यथार्थ में बापू की हत्या किसी गोड़से ने नहीं की थी । इसी दूषित राजनीति ने की थी और अब स्वार्थ-पूर्ति के लिए इसी राजनीति ने बापू की आत्मा को कैद कर रखा है ।
  • Rang Basanti
    Pratap Sehgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1913

    Availability: In stock

    रंग बसंत
    आजादी के आंदोलन के संभवत: ऐसे दो ही क्रांतिकारी महानायक है, जो सैक्टेरियन सोच से परे जाकर व्यापक स्तर पर सामाजिक एवं राजनीतिक विकास का स्वरूप सामने रखते है । किसी भी भारतीय से पूछिए, वह नेताजी सुभाषचंद्र बोस और भगतसिंह का नाम लेगा । प्रताप सहगल का ‘रंग बसंती' नाटक भगतसिंह के जीवन का आख्यान मात्र नहीं, बल्कि उसके समय को भी पूरी शक्ति एवं जीवंतता के साथ हमारे सामने रखता है । भगतसिंह अपने जीवनकाल में ही लीजेंड बन गया था । उसके क्रांतिकारी कृत्यों को तो बार-बार सामने लाया गया, लेकिन उसके समाजवादी चिंतन को हमेशा नेपथ्य में ही रखा गया । भगतसिंह न सिर्फ अपने एक्शन में, बल्कि अपनी सोच में भी एक रैडिकल व्यक्तिव के रूप में सामने आता है । प्रस्तुत नाटक भगतसिंह के इसी रूप को हमारे सामने रखता है ।
    नाटक का ढाँचा दृश्यों में बाँधा गया है, जो इसे बेहद लचीला बना देता है । मुक्ताकाशी रंगमंच हो या प्रेक्षागृह का मंच, शैली यथार्थवादी से या प्रतीकवादी- हर तरह से नाटक को खेलने की संभावनाएँ इसमें मौजूद हैं । बई बार मंचित होकर तथा साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख के रूप में समादृत हो चुका 'रंग बसंती' नए रंग में पाठकों के हाथ में देते हुए सार्थकता का ही अनुभव किया जा सकता है । वस्तुत: गंभीर रंग-कर्म करने वालों के लिए यह एक उपहार है ।
  • Aawara
    Pandey Baichain Sharma 'Ugra'
    175 158

    Item Code: #KGP-436

    Availability: In stock

    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का समाज-अध्ययन बड़ा प्रखर था। उन्होंने गरीबी में उसकी संपूर्ण भयावहता को बाल्यावस्था में ही भोगा था, अतः उग्र जी ‘आवारा’ नाटक में पूरी तरह सपफल सामाजिक नाटककार प्रतीत होते हैं। ‘उग्र’ का यह नाटक उस अभिनंदनीय योजना का पावन-प्रेरक स्मृति-चिन्ह बन आज भी विजयपताका की तरह यशगान करता पफहरा रहा है। सभ्य, समृद्ध समाज और उसमें कलाकार की दयनीय स्थिति, जमींदार की क्रूरता व जालसाजी का बिलकुल नग्न चित्रण है। 
    लाली-दयाराम की निश्छल प्लेटोनिक मनोवैज्ञानिक प्रेमगाथा को भी ‘उग्र’ ने जीवन के घिनौने पाशविक प्रेम-व्यवहारों से अलग-थलग चित्रित कर मर्मस्पर्शी और हृदयद्रावक बना दिया है।
    आलोचकों ने इस नाटक को स्वाभाविक माना था किंतु समसामयिक प्रगतिशील नाट्य रचनाओं में नई धारा और नूतन अभिव्यक्ति के अभाव का अनुभव कर उग्र ने सामाजिक जीवन में कला का स्वरूप निखारने के लिए नाटक में प्रचलित और रुचिकर शैली का अनुगमन किया है।
    ‘उग्र’ ने अपने लेखन-जीवन का आरंभ ही नाटकों से किया था। उनका पहला ही नाटक ‘महात्मा ईसा’ हिंदी का अत्यंत सफल और चर्चित नाटक रहा था।
    ‘चुंबन’, ‘गंगा का बेटा’, ‘अन्नदाता’, ‘माधव महाराज महान’ उनकी अन्य लोकप्रिय नाट्य कृतियां रही हैं। उपन्यास और भारी-भरकम संपादकीय से समय निकालकर ‘उग्र’ ने एकांकी और प्रहसन की भी रचना की है।
    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ रचित नाटक ‘आवारा’ में सामान्य सहायक पात्रों के अलावा छह पुरुष पात्र और तीन स्त्री पात्र हैं, नाटक तैंतीस दृश्यों तथा तीन अंकों 
    में समायोजित है। पहले अंक में आठ, दूसरे में अठारह व तीसरे अंक में सात दृश्य हैं। ‘नाटक’ में ‘उग्र’ द्वारा प्रणीत गीत भी समायोजित हैं जो कथानक व वातावरण को सजीव बनाते हैं। गीत-नाट्य की यह पद्धति लोक-नाट्य परंपरा की-सी है। कथानक में प्रायः जो घटनाएं मंच पर नहीं दिखाई जातीं उनकी सूचना व वातावरण की मार्मिकता को और गहन बनाए रखने के लिए या कभी-कभी उसके प्रतीकात्मक अर्थों को स्पष्ट करने के लिए गायन पद्धति उपयोगी सिद्ध होती है।
    प्रस्तुत नाटक ‘आवारा’ में बूढ़े भिखारी बुद्धूराम की बेटी लाली और क्रूर जमींदार के छोटे भाई दयाराम को प्रमुख पात्र के रूप में चित्रित कर हमारी सामाजिक मान्यताओं और परिस्थितियों पर सामयिक, तीखा और तीव्र व्यंग्य किया गया है। आज हिंदी में ‘उग्र’ नहीं रहे, न वैसे गुण-ग्राहक पाठक, मगर ‘उग्र’ का अकल्पनीय नाटक ‘आवारा’ आज भी उग्र की अपनी अद्भुत शैली ‘उग्र-शैली’  की याद दिलाता है।
  • Do Dhurva
    Anton Chekhov
    225 191

    Item Code: #KGP-614

    Availability: In stock

    दो ध्रुव 
    अन्तोन चेखोव (1860-1904) रूस के ही नहीं, वरन विश्व के सुविख्यात कथाकार और नाटककार हैं। अपनी कहानियों में उन्होंने बहुत ही सीधे-सरल शब्दों में मनुष्य के असत्य, आडंबर, चापलूसी और  असहाय व्यक्ति के शोषण के विरुद्ध संकेत कर यह संदेश दिया है कि हम अधिक से अधिक मानवीय शोर संवेदनशील बनकर बेहतर इंसान बनें। साथ ही हम संसार को भी बेहतर बनाने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि यह सब लोगों के जीने  के योग्य बन सके ।
    इन कहानियों के मंच के लिए किए गए नाटय-रूपांतर, कॉन्स्टेंट गारनेट द्वारा रूसी से अंग्रेजी में किए उनके अनुवादों के आधार पर हिंदी  में किए गए है ।
    ऐसे ही आठ नाटय-रूपांतर इस पुस्तक में संकलित किए गए । आशा है, ये पाठकों को भी, और इन छोटे-बड़े नाटकों को मंच पर खेलने वाले अभिनेताओं-निर्देशकों को भी पसंद आएंगे, दर्शकों  को भी ।
    ये नाटक थोड़े बहुत आवश्यक परिवर्तन के साथ मंच पर आसानी से खेले जा सकते है ।
  • Lomad Vesh
    Rameshwar Prem
    60

    Item Code: #KGP-1818

    Availability: In stock

    लोमड़ वेश 
    लोमड़ वेश चरित्रों के माध्यम से ऐसी रंगयात्रा के लिए रंगसमूहों और दर्शकों की भागीदारी का रेखांकन है जो लोकधर्मी नाटकों की विरासत है । बेन जान्सन कृत विश्वप्रसिद्ध नाटयकृति वालापोनि के  कथासूत्रों पर आधारित लोमड़ वेश मनुष्य की नकारात्मक प्रवृत्तियों यथा लोभ, प्रपंच, ईषर्या-द्वेष की परत-दर-परत दो अनावृत्त करते हुए समकालीन रंगभाषा का अप्रतिम उदाहरण है ।
  • Godaan (Play)
    Jaivardhan
    120 108

    Item Code: #KGP-8005

    Availability: In stock

    कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास 'गोदान' का नाटय रूपांतरण।
  • Manch Andhere Mein
    Narendra Mohan
    120 108

    Item Code: #KGP-1915

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Saat Rashtriya Radio Naatak
    Chiranjeet
    100 90

    Item Code: #KGP-1813

    Availability: In stock

    हमारे लिए निश्चय ही यह हर्ष का विषय है कि भारतीय स्वतंत्रता की स्वर्ण-जयंती के वर्ष में अग्रणी राष्ट्रीय नाटककार पदूमश्री बिरंजीत के सात अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि राष्ट्रीय रेडियो-नाटकों  का यह संग्रह प्रकाशित हुआ है । स्वतंत्रता-प्राप्ति के वर्ष सत् 1947 से लेकर अब तक रचित राष्ट्रीय रेडियो-नाटक साहित्य में इन सातों नाटकों का विषय-वस्तु एवं शिल्प की दृष्टि से अपना विशिष्ट स्थान है । इनमें से चार नाटक- 'नया जन्म' , 'ऊंचा पर्वत, ऊंचे लोग' , 'अपने-अपने भूचाल' और 'निहाली' आकाशवाणी के नाटकों के अखिल भारतीय कार्यक्रम के अंतर्गत हिंदी के अतिरिक्त अन्य सभी भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर आकाशवाणी के पूरे देश में फैले समस्त केद्रों से प्रसारित हुए थे और व्यापक रूप से चर्चित-प्रशंसित भी हुए थे । 'कालकूप का कालचक्र' और 'दर्पण को परछाई' आकाशवाणी, दिल्ली के अलावा अन्य केंद्रों से भी कई बार प्रसारित होकर अपार लोकप्रियता प्राप्त कर चुके है । इस संग्रह का पहला नाटक 'स्वर्णिम गौरव- गाथा' भारतीय स्वतंत्रता की स्वर्ण-जयंती के उपलक्ष्य में रचित श्री चिरंजीन का नवीनतम राष्ट्रीय  रेडियो-नाटक है । 

  • Raakshas
    Shanker Shesh
    75 68

    Item Code: #KGP-9107

    Availability: In stock

    राक्षस
    राक्षस एक जातिवाचक शब्द ही नहीं, मानसिकता द्योतक शब्द भी है। राक्षस वह है, जो सामान्य मानवीय स्वरूप के विरोध में रहता है ।
    इस नाटक में शंकर शेष ने मनुष्य की इसी वृत्ति को उभारा है । यहाँ रणछोड़दास, सुकालू और दुकालू ऐसे चरित्र हैं जो मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम और द्वेष के संघर्ष को तीव्र करते है और फिर इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि–
    अब नहीं रुकेगा कमल फूल
    अब नहीं गिरेगी
    आने वाले कल की आँखों में धूल
    अब गाँव हमारा नहीं रहेगा
    जड़ पत्थर की नाँव 
    राक्षस अपनी पूरी अमानवीय स्थिति के साथ हमें इस आशा की स्थिति तक एहुंचाता है ।
    शकर शेष द्वारा लिखा गया एक सशक्त नाटक ।

  • Shringaar Shatak
    Basant Kumar Mahapatra
    40 36

    Item Code: #KGP-9104

    Availability: In stock

    'श्रृंगार शतक' नाटक का एक संक्षिप्त अंश
    नयना : लेकिन ऐसा क्यों हुआ महाराज !!! यह युग हठात इस तरह को बदल गया ?
    सूर्यभानु : हर चीज हमेशा एक-सी नहीं रहती सुनयना! बीस साल पहले मैने तुझे जिस रूप में देखा था-क्या तुम आज वैसी ही हो ? ठीक उसी तरह समय के साथ-साथ न जाने कितना कुछ बदल जाता है । राजा सूर्यभानु आज भिखारी है और मेरा गुमाश्ता सनातन राजा । वह देखो, मेरे घर के आगे सिर उठाए खडी है उसकी तिमंजिली कोठी। बिजली की रोशनी से किस कदर झिलमिला रही है वह कोठी । जानती हो, आज उसके लड़के की शादी है । इसीलिए उसके दरवाजे पर इतनी गाड़ियां खडी है । कितनी भीड़ है । सारे ऑफिसर और मंत्री आज़ उसके यहीं आए है । पूरी रात वे जश्न मनाएँगे । आज जैसे दिन में यदि मैं चिल्ला-चिल्लाकर कहूँ-सना मेरा गुमाश्ता था-मेरे गोदाम से धान चोरी करते समय पकडे जाने पर वह बर्खास्त हुआ था–मेरी बात पर कौन विश्वास करेगा ? दिन बदल गए हैं सुनयना, सब कुछ उलट-पलट गया है ।
    नयना : किंतु ऐसा कब तक चलेगा महाराज ?
    सूर्यभानु : राजा है जुल्म किया, इसलिए प्रजा ने राजतंत्र तोड़कर गणतंत्र की स्थापना की । गणतंत्र में जुल्म हुआ तो लोग फिर इसके विरुद्ध विद्रोह करेंगे । उस विद्रोह में पैदा होगी–और किसी तरह की नवीन शासन पद्धति । खैर, छोडो–यह सब सोचकर कोई लाभ नहीं । जब तक कोई परिवर्तन आएगा हम लोग नहीं होंगे ।

  • Kissa Maujpur Ka
    Jaivardhan
    160 144

    Item Code: #KGP-1819

    Availability: In stock

    'किस्सा मौजपुर का' नाटक को वर्ष 2012 के दस श्रेष्ठ नाटकों में से एक श्रेष्ठ नाटक चुना गया । 'भारतेंदु नाट्य उत्सव' के अंतर्गत 23 मार्च, 2013 को इसका पुनः जोरदार प्रदर्शन हुआ । नाटक देखकर लेखक और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रेवती सरन शर्मा ने कहा था कि इस विषय पर कोई नाटक ऐसे भी लिखा जा सकता है, कम से कम मैं नहीं सोच सकता ।
  • Mayaram Ki Maya (Paperback)
    Jaivardhan
    80

    Item Code: #KGP-1368

    Availability: In stock

    ‘मायाराम की माया’ नाटक का केंद्रबिंदु मनुष्य है। सृष्टि के असंख्य जीवों में से मनुष्य एक ऐसा जीव है, जो ईश्वर की सत्ता के समानांतर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता है। जिज्ञासा कहें या फितरत, कभी-कीाी मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व को ललकारता दिखाई देता है। उसका मन नाना प्रकार के विकारों से भरा पड़ा है।
    यही कारण है कि मनुष्य सोचता कुछ है, दिखता कुछ है और करता कुछ और है। समय आने पर प्रगाढ़ संबंधों को भी भूल जाता है। इस संसार में जन्म देने वाले ईश्वर की कृतज्ञता और श्रद्धा को भूल जाता है। ब्रह्मलोक में इसी बात पर चर्चा चल रही है कि क्या मनुष्य इस पृथ्वी लोक का सबसे सीधा जीव है? इस बात को प्रमाणित करने के लिए पृथ्वीलो से ‘मायाराम’ नाम के व्यक्ति को ब्रह्मलोक में लाया जाता है। 
    -जयवर्धन

    ‘मायाराम की माया’ को मैं फार्स की श्रेणी में ही रखना चाहूंगा। इस नाटक की स्थितियों, घटनाओं और चरित्रों की बुनावट जयवर्धन ने फैंटेसी के अंदाज में की है। बाह्य यथार्थ से कोसों दूर, लेकिन आंतरिक यथार्थ के बहुत करीब और नाटक के अंत में ब्रह्मा का नारद से यह कहना ‘‘आप ठीक कह रहे हैं मुनिवर। एक इंसान की गलती की सजा समस्त इंसान को देना ठीक नहीं होगा। यह सृष्टि है। सृष्टि का चक्र सदा चलता रहेगा। हां, भविष्य में इंसान को बनाते समय इंसानियत थोड़ा ज्यादा डालनी होगी।’’
    -प्रताप सहगल
  • Ratangarbha
    Shanker Shesh
    40 36

    Item Code: #KGP-2087

    Availability: In stock


  • Aacharya
    Indira Dangi
    180 162

    Item Code: #KGP-1573

    Availability: In stock


  • Mayaram Ki Maya
    Jaivardhan
    160 144

    Item Code: #KGP-1820

    Availability: In stock

    ‘मायाराम की माया’ नाटक का केंद्रबिंदु मनुष्य है। सृष्टि के असंख्य जीवों में से मनुष्य एक ऐसा जीव है, जो ईश्वर की सत्ता के समानांतर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता है। जिज्ञासा कहें या फितरत, कभी-कीाी मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व को ललकारता दिखाई देता है। उसका मन नाना प्रकार के विकारों से भरा पड़ा है।
    यही कारण है कि मनुष्य सोचता कुछ है, दिखता कुछ है और करता कुछ और है। समय आने पर प्रगाढ़ संबंधों को भी भूल जाता है। इस संसार में जन्म देने वाले ईश्वर की कृतज्ञता और श्रद्धा को भूल जाता है। ब्रह्मलोक में इसी बात पर चर्चा चल रही है कि क्या मनुष्य इस पृथ्वी लोक का सबसे सीधा जीव है? इस बात को प्रमाणित करने के लिए पृथ्वीलो से ‘मायाराम’ नाम के व्यक्ति को ब्रह्मलोक में लाया जाता है। 
    -जयवर्धन

    ‘मायाराम की माया’ को मैं फार्स की श्रेणी में ही रखना चाहूंगा। इस नाटक की स्थितियों, घटनाओं और चरित्रों की बुनावट जयवर्धन ने फैंटेसी के अंदाज में की है। बाह्य यथार्थ से कोसों दूर, लेकिन आंतरिक यथार्थ के बहुत करीब और नाटक के अंत में ब्रह्मा का नारद से यह कहना ‘‘आप ठीक कह रहे हैं मुनिवर। एक इंसान की गलती की सजा समस्त इंसान को देना ठीक नहीं होगा। यह सृष्टि है। सृष्टि का चक्र सदा चलता रहेगा। हां, भविष्य में इंसान को बनाते समय इंसानियत थोड़ा ज्यादा डालनी होगी।’’
    -प्रताप सहगल
  • Paanch Rang Naatak
    Pratap Sehgal
    495 446

    Item Code: #KGP-767

    Availability: In stock

    पाँच रंग नाटक
    हिंदी में अच्छे नाटकों की कमी की दुहाई हमेशा दी जाती है । अच्छे नाटकों की कमी विश्व की किस भाषा में नहीं है, इसलिए हिंदी को अपवाद मानना सही नहीं है । यह भी सच है कि हिंदी रंगमंच के विकास एवं विस्तार के साथ-साथ नाटकों की कमी गहरे  स्तर पर खलने लगी तो विदेशी एवं हिंदीतर भारतीय भाषाओँ के नाटकों के अनुवाद/रूपांतर का प्रचलन बढा । यह प्रक्रिया स्वस्भाविक  ही है । रंगमंच के विकास ने हिंदी के कई लेखकों को अपनी ओर आकृष्ट किया और साहित्य की अन्य विधाओं में लिखने वाले नाट्य-लेखन में प्रवृत्त हुए ।  इस तरह से हिंदी के नाटक भी हुए और हिंदीतर भाषाओं के भी । 
    प्रताप सहगल कविता से नाटक की और प्रवृत्त हुए है और उन्होंने
    नाट्य-लेखन को रंगमंच से जोड़कर ही देखा है, इसलिए उनके
    नाटकों में नाटकीय गत्यात्मकता, नाटकीय बिम्ब और नाटकीय
    शब्द भरपूर मिलता है । उनका मानना है कि नाटक के संवादों में
    अभिनय-कला को उजागर करने की जगह जरूर होनी चाहिए । 
    गत दो दशकों में उन्होंने नाटक के विविध रूपों को अपने 'संप्रेष्य' का माध्यम बनाया है । प्रस्तुत 'पाँच रंग नाटक' उनके विपुल नाट्य-लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । यहीं 'अन्वेषक' हैं 'रंग बसंतो', 'मौत क्यों रात भर नहीं आती', 'अँधेरे में’ तथा 'नहीं कोई अंत'--पाँच नाटक मौजूद हैं।
    'अन्वेषक' को जहाँ विज्ञान-नाटक नाम से एक नई नाट्य-धारा की शुरुआत माना जा रहा है, वहीं 'रंग बसंती' भगतसिंह के जीवन एवं समय को ब्रेख्तियन रंग-शैली की परंपरा में नाट्यांकित  करता है । 'मोत क्यों रात पर नहीं आती' फार्स और यथार्थ का मिला-जुला प्रारूप है तो 'नहीं कोई अंत’ यथार्थवादी नाटकों की श्रेणी में रखा जा सकता है । 'अँधेरे में' नाटक में तो ब्लैक कॉमेडी निहित है ही ।
    अपनी अलग-अलग भंगिमाओं एवं प्रस्तावनाओं के कारण ये सभी नाटक देश के विभिन्न छोटे-बड़े नगरों में बार-बार  खेले गए है और इन्होंने कई बहसों, विवादों और संवादों को जन्म दिया है । अब वे पांचों रंग नाटक एक ही जिल्द में, ताकि इधर-उधर भटना न पड़े ।
  • Yoon Banee Mahabharat
    Pratap Sehgal
    100 90

    Item Code: #KGP-1207

    Availability: In stock


  • Aalamgeer
    Pratap Sehgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1903

    Availability: In stock

    [जहानारा के चले जाने पर औरंगजेब पुश्तैनी तलवार को उठाकर देर तक देखता रहता है।]
    औरंगजेब : दिल्ली के तख्त पर बादशाह सलामत मुझे खुद बिठा रहे  हैं ।  बादशाह सलामत समझ गए हैं कि मैं ही हुकूमत करने के काबिल हूँ । (उल्लास के साथ) एक ही झटके से पका-पकाया फल गोद में आ गिरा है । (ऊपर-नीचे टहलता है) पर नहीं, यह खुदावंदताला की बख्यिश है ।  यह बरकत  खुदावंदताला की ही हुई है, और किसी की नहीं । 
    [कहीं से हलकी-सी आवाज आती है ।]
    आवाज़ : जहानारा ने जो कुछ कहा, तुमने फ़ौरन ही मान लिया । 
    औरंगजेब : वह बादशाह सलामत की तरफ़ से पेशकश लाई थी ।
    आवाज़ : पर यह एक चाल भी तो हो सकती है ।
    औरंगजेब : चाल क्यों ? यब 'आलमगीर' तलवार, भी उसने साफ कहा हैं कि दिल्ली के तख़्त पर तुम बैठोगे ।
    आवाज़ : वह दिल्ली तृम्हारे दुश्मनों से घिरी  होगी । दारा शूकोह जो इस वक्त भागता फिर रहा है, वह फिर से पंजाब का सूबेदार बनकर लोट आएगा, मुरादबख्श गुजरात में और शुजा बंगाल में । क्या तुम भूल गए कि दारा को ज़हानारा ने ही वली अहद बनवाया था । दारा और जहानारा दो जिस्म एक जान है । दोनों सूफी मुल्लाशाह के शागिर्द।  दिल्ली मुल्लाशाह के मुरीदों का अड्डा बनेगी ।
    औरंगजेब : (स्वत:) सब बात वहीं को वहीं लौट आएगी । ...पर बादशाह सलामत ने मुझे दिल्ली का तख्त अता फर्माया है ।
    आवाज़ : नहीं, वह तुमने अपनी तलवार के जोर में हासिल किया है । वह तुम्हें खुदावंदताला के फजल से मिला है । यह नादर मौका है, औरंगजेब । फिर ऐसा नायाब मौका तुम्हारे हाथ नहीं आएगा । इस चाल को समझो, औरंगजेब । बादशाह सलामत तुम्हारे हाथ में बिल्ली के तख़्त  का झुनझुना पकड़ा देना चाहते है । दारा शुकोह  को बहाल करने का उनके पास यही एक तरीका है ।
    औरंगजेब : (स्वत:) न जाने कौन लोग बादशाह सलामत ने मिलने  आते है । उनके इरादे कौन जान सकता है ? किले की ऊंची दीवारों के पीछे न जाने साजिशें पक रही हैं।
    आवाज़ : दारा की सुबेदारी बहाल होगी तो वह फिर से फ़ौजें मुनज्जम कर सकता है । बादशाह सलामत उसकी पीठ पर हैं । वह अभी भी अपने आपको वली अहद समझे हुए है ।
    औरंगजेब : बादशाह सलामत दारा की पीठ पर है तो ख़ुदावंदताला  मेरे हक में है ।  ख़ुदावंदताला  ने मुझे दिल्ली के तख़्त का हकदार करार  दिया है । वरना मेरो फतह क्योंकर होती ? यह फतह नहीं एक करिश्मा था ।  ख़ुदावंदताला  में मुझे अपना एलची बनाकर भेजा है । उन्हें मुझ पर भरोसा है । पूरा एतमाद है । [इसी पुस्तक से]
  • Gyarah Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    300 270

    Item Code: #KGP-9322

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ ठाकुर विश्व साहित्य में एक विशिष्ट पहचान रखने वाले कालजयी रचनाकार हैं। अभिव्यक्ति की अनेक विधओं में उन्होंने नवीन प्रस्थान निर्मित किए। भाषा, शैली, विचार और दर्शन को मानवता के विराट प्रांगण में अभिमंत्रित आमंत्रित किया। प्रस्तुत पुस्तक ग्यारह लघु नाटक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की अपूर्व प्रतिभा का प्रकाश एक नए शिल्प में देखा जा सकता है। सुप्रसिद्ध नाट्य लेखक और रंगमनीषी प्रताप सहगल ने ठाकुर की ग्यारह कहानियों को चुनकर उन्हें नाट्य रूप प्रदान किया है। उनके शब्दों में, ‘‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियों में 1940 से पहले के बंगाल का जीवन धडकता है। ...जब इन ग्यारह कहानियों को मैंने चुना तो स्पष्ट रूप से यह बात मन में काम कर रही थी कि मैं इन्हें नाट्य रूप में ऐसे प्रस्तुत करूं कि इनका मूल भाव एवं मूल परिवेश क्षरित हुए बिना ये हमारे समय में भी प्रासंगिक बनी रहें।’’
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ये सभी कहानियां बहुत प्रसिद्ध  हैं। कहना तो यह भी उचित होगा कि अनेक रचनाकारों ने इनके छाया-अर्थ से स्वयं को समृद्ध किया है। एक रात, काबुलीवाला, पोस्टमास्टर, क्षुधित पाषाण और समाप्ति आदि कहानियों के नाट्य रूपांतर से पाठकों और रंगकर्मियों को कुछ सार्थक विकल्प मिलेंगे। प्रताप सहगल ने कहानियों में निहित नाट्य स्थितियों और रंग- संभावनाओं को समझते हुए रूपांतर को समृद्ध किया है।
    पाठकों के लिए तो इन रूपांतरित रचनाओं से गुज़रना एक विलक्षण अनुभव है ही, उन लोगों को भी आनंद की अनुभूति होगी जो मंचन के लिए सुरुचिपूर्ण नाट्यालेखों की खोज में रहते हैं। एक तरह से प्रताप सहगल ने सार्थक नाट्यालेखों की संख्या में वृद्धि की है। यह करते समय उन्होंने मूल संवेदना को अक्षत रखा है। ‘ग्यारह लघु नाटक’ एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Do Naatak
    Jaivardhan
    200 180

    Item Code: #KGP-862

    Availability: In stock


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