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satire

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  • Haasya Vyangya Ke Vividh Rang
    Barsane Lal Chaturvedi
    160 144

    Item Code: #KGP-1808

    Availability: In stock

    बरसानेलाल चतुर्वेदी जी द्वारा सम्पादित पुस्तक "हास्य-व्यंग्य के विविध रंग"
    हास्यरस प्रधान कविताएं सैकड़ों वर्षों से लिखी जा रही हैं । आजकल हास्य-कवि सम्मेलन सर्वाधिक लोकप्रिय हैं । आज का मनुष्य इसी के अभाव में जीता है । वह इतना व्यस्त तथा त्रस्त है कि उसके पास हँसने का समय ही नहीं है ।
    हास्यरस के कवियों ने जहाँ विकृति देखी है उसी को लक्ष्य बनाकर कविता रच डाली है । तुलसीदास हो या सूरदास, बिहारी हों या  अलीमुहीब खाँ 'प्रीतम'—हास्यरस की कविताएं सभी न लिखी हैं । किसी ने दुष्टों पर लिखा है तो किसी ने कंजूसों पर, किसी ने भ्रष्ट नेताओं को अपना शिकार बनाया है तो किसी ने दलबदल की प्रवृति को अपना लक्ष्य बनाया है । भ्रष्टाचारी अफसर, मुनाफाखोर  व्यापारी, रिश्वत, मिलावट, तस्करी, कुर्सीमोह- कहने का तात्पर्य ये है कि हास्यकवियों की निगाह से कोई बच नहीं पाया ।
    यह संकलन उन व्यक्तियों तथा प्रवृतियों का सिलसिलेवार 'एलबम' है जो हास्यरस के कवियों की चपेट में आए हैं और जिनकी पोल समय- समय पर खोली गई हैं। यह आलम्बन कोश इन्हें असंगतियों पर व्यंग्यबाण चलाने वाली हास्य-व्यंग्य की कविताओं का प्रथम संग्रह हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ हास्य-काव्य का इतिहास भी प्रस्तुत करता है ।
  • Angrezi Ki Rangrezi
    Raj Kumar Gautam
    80 72

    Item Code: #KGP-2091

    Availability: In stock

    राजकुमार गौतम में लेखन की जो पकड़ है, वह द्वार अपेक्षाकृत मुश्किल विधा (व्यंग्य) में भी एक हद तक उनका साथ निभा जाती हैं । यही वजह है कि संग्रह के कुछ व्यंग्य, गौतम के व्यंग्यकार की संभावनाओं की ओर इशारा करते हैं । रचनाएँ प्राय: निबंध-शैली में हैं ।  भाषा व्यंग्यकार का सबसे प्रभावी औजार है; यत्र-तत्र उसकी चमक यहां भी दिखाई पड़ती है ।
  • Randa
    Gyan Chaturvedi
    350 315

    Item Code: #KGP-422

    Availability: In stock


  • Vyangya Sarjak : Narendra Kohli
    Prem Janmejai
    300 270

    Item Code: #KGP-468

    Availability: In stock

    सुप्रसिद्ध साहित्यकार नरेन्द्र कोहली का रचना-संसार बहुआयामी है। विभिन्न विधाओं में उन्होंने रेखांकित करने योग्य रचनाएं लिखी हैं। पौराणिक व जीवनीपरक उपन्यासों के क्षेत्र में तो उन्हें शीर्षस्थ लेखक स्वीकार किया जाता है।
    नरेन्द्र कोहली के लेखन का एक जरूरी पक्ष उनका व्यंग्य साहित्य है। ‘व्यंग्य सर्जक: नरेन्द्र कोहली’ पुस्तक में इस पक्ष का कई दृष्टि से विवेचन-विश्लेषण किया गया है। संपादक प्रेम जनमेजय ने पूरे कौशल के साथ व्यंग्य की परंपरा में कोहली को स्थापित किया है। ‘व्यंग्य का नरेन्द्र कोहलीय दृष्टिकोण’ में यज्ञ शर्मा, प्रेम जनमेजय, हरीश नवल, मनोहर पुरी आदि लेखकों ने कोहली के व्यंग्य लेखन में उनकी रचनात्मक विशिष्टता तलाशी है। प्रेम जनमेजय के शब्दों में, "व्यंग्य में शिल्प के विभिन्न कोणों एवं रूपों की प्रस्तुति नरेन्द्र कोहली की व्यंग्य रचनाओं के महत्त्व को रेखांकित करती है। निश्चित ही व्यंग्यकार की व्यंग्य रचनाओं ने व्यंग्य साहित्य की परंपरा को जीवित रखा है, उसे दृढ़ता एवं नवीनता प्रदान की है।"
    पुस्तक के दूसरे हिस्से ‘एक व्यक्ति नरेन्द्र कोहली’ में कोहली के व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर ज्ञान चतुर्वेदी, सूर्यबाला, गिरीश पंकज, मधुरिमा कोहली, कमलेश भारतीय, विवेकी राय, मीरा सीकरी आदि ने संस्मरण-शिल्प में उनसे जुड़ी बातें व्यक्त की हैं। मीरा सीकरी के अनुसार, "...नरेन्द्र कोहली का कृतित्व ही नहीं व्यक्तित्व भी उन्हीं मूल्यों को अपनी जिंदगी में मूर्त करता है जिनकी गरिमामय अभिव्यक्ति वह अपने साहित्य में कर रहा है। बहुत आसानी से नरेन्द्र कोहली के संपूर्ण व्यक्तित्व को उनके साहित्य में ढूंढ़ा जा सकता है।" सभी लेखों की एक समान विशेषता है कि वे लागलपेट के बिना अपनी बात सामने रखते हैं। रचनाकार को मंडित या खंडित करने की प्रवृत्ति से दूर ये लेख कोहली के व्यंग्य साहित्य व स्वभाव का समुचित परीक्षण करते हैं।
    प्रेम जनमेजय द्वारा संपादित यह पुस्तक सामान्य पाठकों व शोधकर्ताओं के लिए समानरूपेण उपयोगी है।
  • Pratidin (3 Vols.)
    Sharad Joshi
    1350 1215

    Item Code: #KGP-859

    Availability: In stock

    प्रतिदिन (तीन खंड)
    शरद जोशी के व्यंग्य कॉलम 'प्रतिदिन' पर लिखते हुए बहुत- सी बातें मेरे मन मैं हैं ।
    सबसे पहले मेरे मन से वे दिन आ रहे हैं, जब ‘नवभारत टाइम्स' के आखिरी पन्ने के कोने में, शरद जोशी की फोटो के साथ बमुश्किल तमाम दस-पंद्रह पंक्तियों से लेकर पच्चीस- तिस पंक्तियों तक का छोटा-सा व्यंग्य कॉलम लगभग रोज आता था । इस छोटे-से कोने ने तब देश में अखबार पढ़ने के तरीके बदल दिए थे । हम जैसे तमाम लोग पिछले पन्ने से अखबार शुरू करने लगे थे । उत्सुकता रहती थी कि शरद जोशी ने आज किस विषय पर कैसा, क्या लिखा होगा? किस कोण से ? क्या उठाया ? तुमने पढा ? वाह यार !
    शरद जोशी ने सात सालों तक रोज एक नया विषय उठाया, उसे एकदम नईं दृष्टि से देखा और फिर उसे एकदम नई भाषा-शैली के प्रयोग से ऐसा बनाया कि उन दिनो 'नवभारत टाइम्स' का वह कोना मानो फैलकर 'पूरे अखबार पर छा गया था । और अखबार पर ही क्यों, यह तो मानो पाठको की पूरी कायनात पर छा गया था । ऐसा व्यंग्य कॉलम न तो पहले लिखा गया था, न सोचा ही गया था । कुछ ही दिनो से वह इतना लोकप्रिय हो गया था कि यह अफवाह रहती थी कि एक जमाने में शरद जोशी का पेमेंट राजेन्द्र माथुर (जो अखबार के संपादक थे) से ज्यादा हो गया था । उसकी लोकप्रियता के चलते 'टाइम्स आँफ इंडिया' से उसके अंग्रेजी अनुवाद देने की कोशिश भी की गई । तब यह बात और भी विहित से सामने आई कि शरद जोशी जैसे जमीनी लेखक की मुहावरेदार और स्थानीय गमक से समृद्ध भाषा का अनुवाद करना लगभग असंभव बात है ।
    आज सालों के अंतराल के बाद 'प्रतिदिन' में लिखी ये अद्भुत व्यंग्य रचनाएं जब एक साथ इस संकलन से जा रही हैं-तब इनका पुनर्पाठ आपको शरद जोशी की ऐसी विलक्षण प्रतिभा से साक्षात्कार कराता है, जिसकी याद उसके जाने के बाद व्यंग्य में उत्पन्न और व्याप्त बियाबान में और भी शिद्दत से आ रही है। -ज्ञानचतुर्वेदी
  • Nashta Mantri Ka Gareeb Ke Ghar
    Prabha Shanker Upadhayaye
    90 81

    Item Code: #KGP-1863

    Availability: In stock

    नाश्ता मंत्री का गरीब के घर
    विषमताओं विसंगतियों और विद्रूपताओं  से अटी है आज के जिंदगी । ऐसे अनुभवों को अनुभूत का, प्रहारात्मक तरीके से प्रस्तुत करना, व्यंग्य कहा जाता है । साथ ही मानव को कुंठाओं एवं जीवन-मूल्यों में स्खलन के प्रति भी फिक्रमंद होता है व्यंग्यकार । उसकी सोच का पैनापन पाठक के मन को कभी कचोटता है तो कभी उसका फक्कड़ मिजाज पाठक के मन को गुदगुदा जाता है । इसीलिए व्यंग्य के साथ हास्य का जुडाव हो गया है ।
    प्रस्तुत संग्रह में नाना भाँति की महक सहेजे तीस व्यंग्य-पुष्प संकलित हैं, जिन्हें मैंने डेढ़ दशक की अवधि में लिखा है । समाज, व्यवस्था राजनीति, शिक्षा, विज्ञान, अर्थशास्त्र तथा दफ्तरी जिन्दगी इत्यादि विषयों पर कलम चलाने का प्रयास किया है । मैं अपनी लेखनी का तेवर दिखा पाने में कितना कामयाब हो सका हूँ इसका निर्णय तो प्रबुद्ध पाठक एवं सुधी समीक्षक ही करेंगे  ।
    ---प्रभा शंकर उपाध्याय 'प्रभा'
  • Kaag Ke Bhaag Bare
    Prabha Shanker Upadhayaye
    145 131

    Item Code: #KGP-1811

    Availability: In stock

    काग के भाग बड़े
    व्यंग्य को भले ही लेटिन के ‘सेटुरा’ से व्युत्पन्न बताया गया हो, किंतु भारत के प्राचीन साहित्य में व्यंग्य की बूझ रही है। ऋग्वेद में मंत्रवाची मुनियों को टर्राने वाले मेढकों की उपमा दी गई है। भविष्येतर पुराण तथा भर्तृहरिशतकत्रयं में खट्टी-मीठी गालियों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य प्रसंग उत्पन्न किए हैं— ‘गालिदानं हास्यं ललनानर्तनं स्फुटम्’, ‘ददतु ददतु गालीर्गालिगन्तो भवन्तो’। वाल्मीकि रामायण में मंथरा की षड्यंत्र बुद्धि की कायल होकर, कैकेयी उसकी अप्रस्तुत प्रशंसा करती है, "तेरे कूबड़ पर उत्तम चंदन का लेप लगाकर उसे छिपा दूँगी, तब तू मेरे द्वारा प्रदत्त, सुंदर वस्त्र धारण कर देवांगना की भाँति विचरण करना।" रामचरितमानस में भी ‘तौ कौतुकिय आलस नाहीं’ (कौतुक प्रसंग) तथा राम कलेवा में हास्य-व्यंग्य वार्ताएँ हैं। संस्कृत कवियों कालिदास, शूद्रक, भवभूति ने विदूषक के ज़रिए व्यंग्य-विनोद का कुशल संयोजन किया है, "दामाद दसवाँ ग्रह है, जो सदा वक्र व क्रूर रहता है। जो सदा पूजा जाता है और सदा कन्या राशि पर स्थित है।"
    लोक-जीवन में तमाशेबाज़ी, बातपोशी, रसकथाओं, गालीबाज़ों, भांडों और बहुरुपियों ने हास्य-व्यंग्य वृत्तांत वर्णित किए हैं। विवाह और होली पर्व पर हमारा विनोदी स्वभाव उभर आता है। अतः दीगर यह कि विश्व में हास्य-व्यंग्य के पुरोधा हम ही हैं।
    अस्तु, इस व्यंग्य-संग्रह को विषय एवं शैली-वैविध्य के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें व्यंग्य- कथा, निबंध, गोष्ठी, प्रश्नोत्तरी, प्रेस कॉन्फ्रेंस, संवाद, साक्षात्कार, सर्वे आदि शिल्पों की चौंतीस व्यंग्य रचनाएँ संकलित की गई हैं।
  • Chehre Aur Chehre
    Ram Kumar Bhramar
    60 54

    Item Code: #KGP-1809

    Availability: In stock

    चेहरे और चेहरे
    'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के जिन स्तम्भों को हिन्दी पाठक का अपूर्व स्नेह और लोकप्रियता मिली, उनमें 'इस बार' का विशेष महत्त्व रहा है । 'चेहरे और चेहरे' रामकुमार भ्रमर द्वारा विभिन्न क्षेनों में समय-समय पर बहुचर्चित रहे व्यक्तियों के उन्हीं चरित्र-व्यंग्यों का संकलन है, जो उन्होंने 'इस बार' के अन्तर्गत लिखे थे । सुप्रसिद्ध कार्दूनिस्ट रंगा द्वारा इन चरित्रों के जो कार्टून उन लेखों के साथ बनाये गए थे, उन्हें भी प्रस्तुत पुस्तक में सहेजा गया है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के इन व्यक्तियों को लेकर लेखक ने समय-समय पर जो कुछ लिखा, वह बहुत पसंद किया गया । इन चरित्रों को लेकर भ्रमर के व्यंग्यपूर्ण लेखन की गुदगुदी पाठक का मन लुभा लेती है और अनायास ही चेहरे और चेहरे की मुस्कान बन जाती है ।

  • Khed Nahin Hai
    Mridula Garg
    300 270

    Item Code: #KGP-543

    Availability: In stock

    खेद नहीं है
    मृदुला गर्ग की छवि पाठकों के बीच अब तक एक कथाकार की रही है। धीर-गंभीर पर ऐसा कथाकार, जिसके कथानकों में व्यंग्य की सूक्ष्म अंतर्धारा बहती है। इस पुस्तक में संकलित लेखों से गुज़रने के बाद यह धारणा पुष्ट होगी कि खाँटी व्यंग्य-लेखन की रसोक्ति पर भी उनकी पकड़ प्रभावी है। इनमें वे जिस पैनेपन से व्यवस्था में धँसे विद्रूप की काट-छाँट करती हैं उसी तर्ज़ पर पूरे खिलंदड़ेपन के साथ हमारे भीतर उपस्थित विसंगतियों को भी सामने ला खड़ा करती हैं। 
    दरअसल, ये सभी लेख पिछले कुछ वर्षों से ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका में ‘कटाक्ष’ स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित हो रहे हैं, जिनके ज़रिए वे अपने आसपास पसरी विडंबनाओं की शिनाख़्त कर पाठकों के सामने पेश करती हैं, बिना किसी लाग-लपेट के। जब जहाँ जैसा ठीक लगा, उसे वहाँ वैसा ही बयान कर दिया। कोई बंदिश नहीं। न भाषा की, न शैली की और न ही विधा की। पर उनकी इसी अनुशासनहीनता से ये लेख विशिष्ट बन पड़े हैं। मज़े की बात यह भी कि इस बेतकल्लुफ़ी को लेकर उनके मन में ज़रा भी ‘खेद नहीं है’।
    इन्हें पढ़ना इसलिए भी ज़रूरी है कि इस बहाने हमें खुद पर हँसने का मौक़ा मिलेगा। और शायद सोचने का भी।
  • Baitaal Suno
    Rajendra Tyagi
    250 225

    Item Code: #KGP-123

    Availability: In stock

    बैताल सुनो 
    'बैताल सुनो' की रचनाओं का इतिहास भी अजीब है । अच्छी हास्य-रचनाएँ पाठकों को पढ़ने को मिलें, इस दृष्टि से मैंने इन्हें 'कादम्बिनी' में विशेष रूप से लिखना शुरु किया। एक संपादक के नाते मैं नहीं चाहता था कि मेरे नाम से कई रचनाएँ एक अंक में प्रकाशित हो । फिर मेरे लेखन की दृष्टि पाठकों के लिए अलग है । चाहे वे कहानियां हों अथवा 'कालचिंतन' जैसा विशिष्ट दार्शनिक स्तंभ या फिर 'आखिर कब तक' या 'समय के हस्ताक्षर' ये सब एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं । एक स्तंभ चिंतन के लिए है तो दूसरा राजनीतिक और सामाजिक अभिव्यक्ति के लिए ।
    एक गंभीर लेखक हास्य-व्यंग्य की रचनाएं भी बहुत सटीक ढंग से लिख सकता है, पाठकों के लिए यह आश्चर्य का विषय होगा । ऐसी स्थिति में, मैं यानी राजेन्द्र अवस्थी हास्य-व्यंग्य की दुनिया से जाकर 'सेवकराम ओखाडू' बन गया ।
    तो इन्हीं 'सेवकराम ओखाडू' की हास्य-रचनाएँ है इस संग्रह में ।

  • Us Desh Ka Yaaron Kaya Kahana
    Manohar Shyam Joshi
    345 311

    Item Code: #KGP-554

    Availability: In stock

    उस देश का यारो क्या कहना
     हिंदी की तमाम अनसुलझी बहसों में से एक यह  भी रही है की व्यंग्य को विधा माना जाय कि वस्तु ? मनोहर जोशी के यहाँ व्यंग्य एक दृष्टि या दृष्टिकोण, एक धजा या अदा की शक्ल अख्तियार  करता है। वे किसी भी स्थिति और व्यक्ति को, विधा और वस्तु को, पवित्र या अस्पृश्य  नहीं मानते । जिस तरह वे अपने को, उसी तरह और सब कुछ को धो-धाकर ठिकाने लगा देने में यकीन करते है । यही उनका कथा है यहीं उनका शिल्प ।
    कोई गुब्बारा दिखा नहीं कि मश्जो उसमें पिन चुभोने के लिए बेताब हो उठते है, गोकि वे इसे बडी तरतीब और तरकीब से करते हैं-- कुछ इस तरह कि वह भड़ाक से न फूटे, हवा धीरे-धीरे फुस्स करती निकले । गुब्बारे को अच्छी बरह पिचकाकर ही मश्जो चैन पाते हैं, जो उनकी ममता का सूचक है या निर्ममता का, यह अपने-आप में विवाद का विषय हो सकता है ।
    हिन्दी व्यंग्य-लेखन के आरंभिक उदाहरण और प्रतिमान यदि शिवशंभु के चिट्ठों में देखे जा सकते हैं तो उनके लगभग सौ वर्षों बाद लिखित 'नेताजी-कक्काजी संवाद' हमें एक बार फिर समय और समाज के आमने-सामने लाते है । तब इस विडंबना की ओर ध्यान जाए बिना नहीँ रहता कि चीजे और स्थितियां जितनी बदलती है, उतनी ही वे पहले जैसी रहती है ।
    इसलिए, लार्ड कर्जन और नैताजी और मुंगेरीलाल एक ही सिक्के के अलग-अलग पहलू जैसे नजर आएँ नो क्या आश्चर्य ।
    यह समझ चुकने के बाद केवल जीना ही समझना बाकी बचना है कि तिथियों, नामों और प्रसंगों के बासीपन के बावजूद, उनके पीछे मौजूद बहुत कुछ तरोताजा बना रहता है । मश्जो उसे कई तरह से झलकाते हैं, यहाँ तक कि छद्म गंभीरता के आवरण में छिपाकर भी ।
    हिन्दी ये एक समय अनेक तात्कालिक कारणों से जिस तरह 'एकांकी' का विस्फोट हुआ था, उसी तरह पत्रकारिता के पिछले दौर में 'व्यंग्य' की भरपूऱ खेती हुई है । कोई चाहे तो इस 'बम्पर क्राप' को 'स्वाधीनता के पचास वर्षों की देन' भी कह सकता है और उम्मीद बाँधी जा सकती है कि जश्न के इस मौके पर संसद का जो विशेष अधिवेशन हुआ था, उसके अनन्तर 'शान्तं पापम्’ नामक एक नया सीरियल शुरु होगा । वह मात्र पचास दिनों का होकर न रह जाय,
    बल्कि आगामी पचास वर्षों तक चलता हुआ, स्वाधिनता का शतक भी धूमधाम से मना सके, इस गुन्ताड़े में हमारे सुपर स्क्रिप्ट-राइटर मश्जो  इन दिनों-बाकी सभी हास्य-व्यंग्यकारों सहित- लगे हुए है ।
    यही वह वजह है कि सूचना मुझ जैसे मुहर्रमी व्यक्ति को देनी पड़ रही है कि आत्मसाक्षात्कार से लेकर आत्मधिक्कार  क्या आत्मशोधन तक की तमाम संभावित छवियों को समेटने वाली उस अखंड राष्ट्रीय गाथा के एल धमाकेदार ट्रेलर की भाँति अब आपके सामने पेश है--'उस देश का यारो क्या कहना ।'
    -अजितकुमार
  • Da Se Dalaal
    Barsane Lal Chaturvedi
    40 36

    Item Code: #KGP-9095

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Sharad Joshi
    Sharad Joshi
    380 342

    Item Code: #KGP-9347

    Availability: In stock

    शरद जोशी हिंदी व्यंग्य के सार्वकालिक महान् रचनाकार हैं। विसंगति के ड्डोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों व लोकप्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धातिक व व्यावहारिक अंतर्विरोधें पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार व अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। उनका एक वाक्य है—‘प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीबी की पीड़ा उससे भी गहरी होती है।’ यही विरल यथार्थबोध है जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है। वे महत्त्वपूर्ण संदर्भों के व्यंग्य लेखक हैं। साहित्य, पत्रकारिता, टी. वी. और सिनेमा में उनके लेखन ने कीर्तिमान बनाए हैं। ‘मासूमियत में निहित मर्म और मुस्कान’ शरद जोशी के लेखन का मूल मंत्रा है। व्यंग्य समय में शरद जोशी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
  • Varanch
    Raj Kumar Gautam
    50 45

    Item Code: #KGP-2090

    Availability: In stock

    वरंच
    यदि ध्यान से देखा जाये तो हमारा समकालीन जीवन बहुविध विडम्बनाओं से भरा हुआ है । सुबह हाथ-मुँह धोने से लेकर रात-गये बिस्तर पकड़ने तक हम उन विडम्बनाओं से गुजरते है और अगर संवेदनक्षम हुए तो उन्हें महसूस भी करते है।  लेकिन बावजूद इस सबके हम उन तमाम सामाजिक, आर्थिक सांस्कृतिक और राजनीतिक मूल्यों क्रा विश्लेषण नहीं कर पाते जो उनके कारण स्वरूप हैं अथवा व्यंग्यात्मक स्थितियों का निर्माण करते हैं। वरंच में संगृहीत इन व्यंग्य कथाओं  को इसी नजरिये से पढा जाना अपेक्षित है ।
    सुपरिचित साहित्यकार राजकुमार गौतम के ये व्यंग्य-रचनाएँ शहरी मध्यवर्ग के जिस वेतनभोगी संसार को हम पर खोलती है, उसकी त्रासदी को महज उसी तक सीमित रहकर नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसके लिए उसके बाहर आना होगा; क्योंकि उसके अंतर्सूत्र समूचे समाज में गूँथे हुए है । राजकुमार गौतम बहुत सहज भाव से इस सच्चाई की ओर संकेत करते चलते हैं । वे इन सूत्रों को एक ऐसी भाषा-शैली में उजागर करते है जो हमें अनायास ही हमारे साक्षात्कार तक पहुँचाने में समर्थ है ।
    साहित्य, कला, संस्कृति तथा अन्याय दृश्य-विधाओं की विसंगतियों की कोख से उपजी ये व्यंग्य-कथाएँ अपने लहजे में तो अनूठी हैं ही भाषा के स्तर पर भी परिपक्व हैं। व्यंग्यकार के इस प्रयास में पाठक को मानो वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है जो बरसों से उसके मन में कहीं उमड़-घुमड़ रहा होता है । पाठक तथा लेखक की यह 'परस्परता' ही इस व्यंग्य-संकलन के एक और उपलब्धि कही जा सकती है ।
  • Vyangya Samay : Ravindranath Tyagi
    Maitreyi Pushpa
    380 342

    Item Code: #KGP-9342

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ त्यागी का रंग व्यंग्य में सबसे निराला है। उनका अध्ययन व्यापक था। स्मृति अच्छी होने से संदर्भ सामने रहते थे। संदर्भों को प्रसंग देकर रचने की विलक्षण योग्यता उनके पास थी। यही कारण है कि त्यागी के व्यंग्य पढ़ते हुए पाठक को आनंद के साथ ज्ञान भी उपलब्ध होता है। बतरस इतना है कि गांव की गोरी पर लिखते हुए प्राकृत से लेकर पेरिस तक अभिव्यक्ति का विस्तार हो सकता है। व्यंग्य में सहज हास्य के वे आचार्य हैं। दफ्रतरशाही,  शृंगार, प्रकृति और अद्भुत तथ्य–प्रायः इन क्षेत्रों से वे विषय चुनते हैं। संस्कृत और अन्य भाषाओं से उद्धरण देते हुए त्यागी व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय प्रश्नों तक बात करते हैं। कई बार लगता है कि उनके लेखन का उद्देश्य निर्मल हास्य की सृष्टि करना है। यह कठिन काम उन्होंने सरलता से किया है। हास्य में आ जाने वाली दुराग्रही वृत्ति उनके लेखन में नहीं है। वे सिद्धांतो से नहीं, आसपास के तथ्यों या व्यक्ति वैचित्रय से हास्य के क्षण निर्मित करते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में रवीन्द्रनाथ त्यागी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Namaskar Bharat Mera Mahan
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-314

    Availability: In stock

    नमस्कार! भारत मेरा महान!
    अमृतलाल नागर और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का शिष्य कहने में मनोहर श्याम जोशी बहुत गौरव का अनुभव करते थे। जोशी जी के निजी जीवन, साहित्य, पत्राकारिता और सिनेमा के पन्नों में उक्त दोनों आचार्यों की छाप देखी जा सकती है। 
    भारतीय राजनीति और समाज पर मनोहर श्याम जोशी की बेबाक टिप्पणियाँ हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। राजेंद्र माथुर की तरह उनके पत्रकारीय लेखन से लोग चकित और कुछ भ्रमित हो जाते थे, क्योंकि किसी टिप्पणी में वह मार्क्सवादी-समाजवादी, किसी लेख में हिंदूवादी, किसी विश्लेषण में कांग्रेसी विचारों से ओतप्रोत लगते थे। प्रगतिशील होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी या डॉ. कर्णसिंह से अच्छे संवाद और संबंध की क्षमता उनमें थी। 
    अमृतलाल नागर की तरह उनके व्यंग्य और कहानी- उपन्यास में सामाजिक कुप्रथाओं, बंधनों पर पैना प्रहार पढ़ने को मिलता है। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभ-लेखन में जोशी जी देश-विदेश के किसी नेता, पूँजीपति या बड़ी हस्ती की कमियों पर सीधे प्रहार करने में नहीं चूके। शरद जोशी की तरह मनोहर श्याम जोशी प्रतिदिन स्तंभ लिखने की क्षमता रखते थे। इसीलिए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने जोशी जी को एक नियमित स्तंभ लिखने का निमंत्रण दिया। सत्ता और प्रबंधन का भय इन संपादकों को कभी नहीं रहा। इसलिए जोशी जी ने भारत की सामाजिक-राजनीतिक दशा पर ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ लिखना शुरू किया। 
    ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ की विशेषता यह थी कि इस स्तंभ की टिप्पणियों पर पत्र आमंत्रित किए जाते थे और सैकड़ों पत्रों में से चुनिंदा छाँटकर अगली किस्त में स्तंभ के साथ छपते थे। यह स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुआ। जोशी जी ने जीवन की अंतिम साँस तक यह स्तंभ लिखा, जिसकी रचनाएँ दशकों तक कई पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
  • Mathuradas Ki Diary
    Mudra Rakshes
    50 45

    Item Code: #KGP-2089

    Availability: In stock

    थुरादास की डायरी' शीर्षक से ही  कुछ बरस पहले एक अत्यन्त विवादास्पद लगभग विस्फोटक व्यंग्य लेख श्रृंखला छपी थी । पता यहीं वह इन लेखों की सफलता थी या असफलता कि लोगों ने इसे बंद कराकर ही दम लिया । इसके बाद एक दूसरी श्रृंखला छपी 'राक्षस उवाच' नाम से । इसके वैसे हो अन्त से पहले घर पर  पथराव हुए, कुछ धमकियाँ भी आई ।  बदमाशा मित्र इसे सौभाग्य बताते रहे पर संपादक नेक साबित हुए । श्रृंखला फिर बन्द हो गई ।
    मगर कुछ लोगों का शुभ विचार है कि श्रृंखलाएँ बंद करवाने की इतनी सफल कोशिशों कें बाद भी ये लेख गड़बड़ी  फैलाने में खासे कामयाब हुए ।

    –मुद्राराक्षस
  • Paanch Absord Upanyas
    Narendra Kohli
    80 72

    Item Code: #KGP-2084

    Availability: In stock

    पाँच एब्सर्ड उपन्यास
    जब एक उपन्यासकार की कलम, कार्टूनिस्ट की दृष्टि पा जाती है तो एब्सर्ड उपन्यासों की रचना होती है । नरेन्द्र कोहली की इन पाँच रचनाओं में आपको उपन्यास का गठन, व्यंग्य-चित्रकार की पैनी दृष्टि, एक अनोखा अप्रस्तुत विधान, तीखा-करारा व्यंग्य तथा समकालीन जीवन की कुतर्कशीलता अपनी समग्रता में उपलब्ध होगी । सर्वथा नवीन कथ्य, शिल्प, शैली और विधा ! व्यंग्य-लेखन का एक सर्वथा नवीन आयाम ! इन रचनाओं में आपको व्यंग्य अपनी संपूर्ण गंभीरता में मिलेगा और आप समझ पाएँगे कि व्यंग्य हँसाने के साथ-साथ रुला भी सकता है, घावों को कुरेद भी सकता है और व्यक्ति को उसके आक्रोश का जीवन्त साक्षात्कार भी करा सकता है ।
  • Maalish Mahapuran
    Sushil Sidharth
    300 270

    Item Code: #KGP-782

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    [इसी पुस्तक से]
  • Hashiye Ka Raag
    Sushil Sidharth
    300 270

    Item Code: #KGP-9334

    Availability: In stock


  • Prerana Dene Wale
    Ishan Mahesh
    120 108

    Item Code: #KGP-1801

    Availability: In stock

    प्रेरणा देने वाले
    ईशान महेश बड़े, सचेत और संचेत्य
    व्यक्ति हैं, तनिक भी किसी से कुछ
    उनके पत्र का उत्तर न देने की
    या उनका समय व्यर्थ
    करने की कोई भूल हुई,
    उन्हें बड़ी चोट पहुँचती है । 
    ऐसा मन ही गूंगी पर
    संवेदनशील प्रकृति का मर्म
    भली-भाँति समझता है ।
    मुझे उनको रचना आद्योपांत 
    पढकर अच्छा लगा ।
    किशोर मन इससे उत्साहित
    होगा और उसी के उत्साहित
    होने से आज्ञा भी है ।"
    -पं ० विद्यानिवास मिश्र

  • Khaadi Mein Polyester
    Rajendra Tyagi
    260 221

    Item Code: #KGP-144

    Availability: In stock

    यह अनायास  नहीं है कि पूरे संग्रह में कई रचनाएँ गाँधी जी पर  केंद्रित हैं । आज़ादी के बाद इस देश का जो राजनितिक अर्थशास्त्र रहा है, उसे समझने के लिए गांधी के नाम पर चले गांधीवाद के छद्म को समझना जरुरी है । गांधीवाद जीवनशैली बनने के बजाय एक ऐसी फिलॉसफी हो लिया है, जिसमें माल काटने की अब भरपूर गुंजाइश है ।
  • Ghanchakkar
    Nisha Bhargva
    225 203

    Item Code: #KGP-1805

    Availability: In stock

    व्यंग्य-लेखन की प्रवृत्ति आधुनिक युग की देन है। पिछले चंद दशकों में समाज में विषमताओं, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं, विसंगतियों, स्वार्थपरता का जो सैलाब आया है वह अभूतपूर्व है। ऐसी परिस्थितियों में स्वाभाविक है कि जागरूक लेखक व्यंग्य की ओर उन्मुख हो । यहाँ इस ओर संकेत करना भी आवश्यक है कि व्यंग्य-साहिंत्य के क्षेत्र में लेखिकाओं की उपस्थिति जोरदार तरीके से दर्ज नहीं हो पाईं। गिनी-चुनी हास्य-व्यंग्य को बहुचर्चित कवयित्रियों में निशा भार्गव का नाम विशेष रूप से उभरकर आया है।
    निशा भार्गव की कविताओं में हास्य-व्यंग्य के साथ ही एक अतिरिक्त तत्त्व भी विद्यमान है। उनकी कविता में तीखे प्रहार के साथ ही अच्छे संस्कार की पैरवी भी मौजूद है । उनकी कविताओं में सामाजिक, परिवारिक, राजनीतिक आडम्बरों को तो निपुणता के साथ बेनकाब किया ही गया है, स्वस्थ समाज के निर्माण का आह्वान भी किया गया है। उनकी रचनाएं ठोस सकारात्मक सोच से ओत-प्रोत हैं।
  • Hashiye Ka Raag (Paperback)
    Sushil Sidharth
    150

    Item Code: #KGP-7185

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    380 342

    Item Code: #KGP-9337

    Availability: In stock

    नरेन्द्र कोहली व्यंग्य साहित्य में कथात्मकता, वैचारिक उदारता और संवेदनात्मक सघनता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने विभिन्न विधाओं के साथ हिंदी व्यंग्य को भी समृद्ध किया है। उनके व्यंग्य लेखन की बहुत बड़ी शक्ति है घटना को अनुभव में रूपांतरित कर लेने की क्षमता। निजी सुख-दुःख से लेकर देश-दुनिया के जाने कितने पक्षों पर उन्होंने लिखा है। वे संप्रेषण का महत्त्व जानते हैं, इसलिए उनकी रचनाएं पाठकों में पर्याप्त लोकप्रिय हैं। कई बार वैचारिक पक्षध्रता या जड़ता एक लेखक को सीमित कर देती हैं। नरेन्द्र कोहली जड़ता को ‘रचनात्मक दृढ़ता’ से अपदस्थ करने वाले विवेकशील लेखक हैं। राजनीति से जुड़े विषयों में उनका विवेक विशेष रूप से देखा जा सकता है। वे असंगति पर आक्रमण करते हुए भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ मूल्यों को बचाने का प्रस्ताव रखते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में नरेन्द्र कोहली के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Topitantra Zindabad
    Sudhir Kumar Chaudhary
    50 45

    Item Code: #KGP-9103

    Availability: In stock

    टोपीतंत्र जिन्दाबाद
    व्यंग्य-लेखन के क्षेत्र में सुधीरकुमार चौधरी काफी आगे तक जाने की संभावना रखते हैं । उनका लेखन सहज है । लेखक की अपनी समझ व दृष्टि से उभरता है । उन पर किसी का असर नहीं है । हाँ, उनके लेखन में क्योंकि आक्रोश और अधीरता के बजाय तटस्थ चित्रण और मध्यममार्गी आलोचना का स्वर है, वे परसाई स्कूल से अधिक शरद स्कूल के निकट पडते हैं । पर इतनी तुलना उनके लेखन की शक्ल का अंदाज देने के लिए है । सच्चाई यह है कि सुधीर के व्यंग्य उनके अपने व्यंग्य हैं । 
    एक बात और गौर करने लायक है । वह है विषय का चुनाव । अर्थात् किन बातो पर सुधीर की नजर जाती है जिन पर व्यंग्य किया जा सके । सुधीर के विषय हल्ले-फुलके हैं । वे सद्य विकृति और हास्योत्पादक विसंगति को अपने घेरे में लेते है।  इस वजह से रचना हास्य की तरफ ज्यादा झुक गई है और 'लतियाव', 'जुतियाव' व 'ठुकाई' कम करती है जिसकी इस बेशर्म और उजड्ड जमाने को अब ज्यादा जरूरत है, लेकिन पूर्ण तो कोई लेखक नहीं होता । सुधीर की भाषा सीधी, स्पष्ट व रोचक है । हम एक परिपाक पत्रकार व उभरते साहित्यकार के सम्पर्क में हैं । 
    -अजातशत्रु 

  • Vyangya Samay : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    380 342

    Item Code: #KGP-9341

    Availability: In stock

    कालजयी कृति ‘राग दरबारी’ के महान् रचनाकार श्रीलाल शुक्ल युगांतरकारी व्यंग्यकार हैं। उनका व्यंग्य लेखन ‘सुबुक सुबुक वादी’ भावुकता और जड़ीभूत जीवनदृष्टि के प्रतिरोध से प्रारंभ होता है। साहित्य में ‘प्रतिभा’ क्या होती है, यह श्रीलाल शुक्ल को पढ़कर जाना जा सकता है। वे पूर्वानुमानित या राजनीति से उत्सर्जित विषयों की ओर कभी नहीं गए। उनके द्वारा रचे गए व्यंग्यों के शीर्षक ही यह बताने के लिए यथेष्ट हैं कि समाज, संस्कृति, साहित्य और साहित्य के धूसर धुंधली इलाकों से होकर वे किस तरह गुजरते हैं। क्लासिक व्यंग्य लेखन के सर्वोत्तम उदाहरण देतीं श्रीलाल शुक्ल की रचनाएं अविस्मरणीय हैं। भाषा के अनेक विस्मयकारी प्रयोग उन्होंने  किए हैं। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल और ज्ञान चतुर्वेदी व्यंग्य रचना में प्रत्युत्पन्नमति, वचनवक्रता, समासोक्ति, अन्योक्ति आदि के लिए विशेषतः उल्लेखनीय हैं। श्रीलाल शुक्ल विश्व साहित्य में व्यंग्य की परंपरा के अद्भुत ज्ञाता थे। उनके व्यंग्य विश्वस्तरीय व्यंग्य साहित्य में प्रसन्नतापूर्वक शामिल किए जा सकते हैं। मनुष्य मन के अतल में छिपी प्रवृत्तियों को उजागर करते हुए उन्होंने व्यापक सभ्यता समीक्षा की है। 
    ‘व्यंग्य समय’ में श्रीलाल शुक्ल के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और उन्हें पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Navak Ke Teer
    Sharad Joshi
    390 351

    Item Code: #KGP-21

    Availability: In stock

    नावक के तीर
    मैं धर्मयुग छोड़कर कलकत्ता गया । 'रविवार’ का प्रकाशन प्रारम्भ हो रहा था । वहीं पहुँचते ही मैंने पहला पत्र शरद जी को लिखा था : शरद जी, समय आ गया है । अब आप शुरू हो जाइये । आपकी यह मलाल नहीं रहना चाहिए कि आपको हिंदी वालों ने नियमित स्तंभ लिखने का मौका नहीं दिया । शाद जी ने सहमति का पत्र तो भेजा, पर साथ ही यह भी जड़ दिया कि प्यारे, अब मैं देनिक स्तंभ के बारे में सोच रहा हूँ । कोई साहसी संपादक मिल ही नहीं रहा है ।  बहरहाल, उनका स्तंभ चालू हुआ । हमारी संपादकीय टीम ने काफी बहस-मुबाहसे के बाद तय दिया कि स्तंभ का नाम 'नावक के तीर' होना चहिए । बिहारी से साभार । उनका पहला लेख था-अथ गणेशाय नम: और स्तंभ का नाम छपा था-नाविक के तीर । पहला अंक बाजार में आते ही शरद जी की घबराहट-भरी चिट्ठी आयी--"भैया, नाविक नहीं नावक । अपना अज्ञान मुझ पर क्यों थोप रहे हो ।" खैर । कॉलम चला और खूब चला । पाठक प्रमुदित थे और कई व्यंग्यकार निराश। 
    मुझे गर्व की अनुभूति कभी-कभी होती रहती है कि हिन्दी व्यंग्य-लेखन की इस विजय-यात्रा में बतौर दर्शक ही, मेरी भी एक विनम्र भूमिका रही है ।
    --सुरेन्द्र प्रताप सिंह
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