Aashcharya Ki Tarah Khula Hai Sansar (Paperback)

Ashok Vajpayee

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  • Year: 2013

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-82114-26-0

आश्चर्य की तरह खुला है संसार 
आधुनिक कवियों में अशोक वाजपेयी अरसे से प्रेम के एकाधिकारी कवि बने हुए हैं और यह उत्सवता सत्तर पार की उनकी शब्दचर्या में भी उतना ही दखल रखती है जितना कभी उनके युवा समय में। सच कहें तो प्रेम का कवि कभी बूढ़ा नहीं होता। वे कभी यह नहीं भूलना चाहते कि जीवन राग-अनुराग, सौन्दर्यबोध और सौष्ठवता का प्रफुल्ल विस्तार है।
अशोक वाजपेयी के यहाँ प्रेम का यूटोपियाई स्वप्न नहीं देखा गया है बल्कि वह उनके लेखे जीवन का अध्यात्म है। उसे भाषा में खोजना व्यर्थ है क्योंकि वह शब्दों के बीच की चुप्पियों में/चाहत के अर्धविरामों में/संकोच के विरामों में/प्रेम की असम्भव संस्कृत में बसता है। रति से उनकी कविता की अनुरक्ति पुरानी है। रतिमुक्त प्रेम के बारे में कविता लिखना आसान है जबकि रति के रूपक रचना कठिन। अशोक वाजपेयी ने रति के सुघर और शिष्ट विन्यास में सफलता पाई है। इसीलिए कविता की लम्बी पारी खेलने वाले वाजपेयी के प्रेम और रति के रूपकों को भाषा के नेपथ्य में कौंधती अन्तध्र्वनियों में ही महसूस किया जा सकता है।
कविता व ललित कलाओं के भव्य भुवन में रमते हुए अशोक वाजपेयी को कोई अर्धशती से ऊपर होने को आए। सेंट स्टीफेंस कालेज में पढ़ने वाला वह युवा अब अपनी परिपक्व वयस् में है। उसकी कविता एक अकेले की सृष्टि लगती है जहाँ वह सदियों से कवि-परंपरा को गाता चला आ रहा है। यह कवि अज्ञेय की तरह सुरुचिवान है तो श्रीकांत वर्मा की तरह स्मृतिसंपन्न। मुक्तिबोध के प्रति उसमें अनन्य अनुराग और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता है। गोष्ठियों-सभाओं-अनुष्ठानों- महफिलों का यह निर्विकल्प नायक शब्दों का कुशल कारीगर है। वह देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण की तरह जैसे अनंत समय से आदि कवि का ऋण अदा कर रहा है।
अशोक वाजपेयी की कविता की तहें वैसे ही खुलती हैं, जैसे आश्चर्य की तरह खुलता है संसार। उन्हें पढ़ते हुए अकसर लगता है कि हम कविता की किसी साफ-सुथरी कालोनी से होकर गुजर रहे हैं जहाँ की आबोहवा हमारे निर्मल चित्त को एक नई आनुभूतिक बयार से भर रही है। यह नया रचने की उत्कंठा है जो उनसे कहलवाती है: मैं उम्मीद को दूसरे नाम से पुकारना चाहता हूँ/मैं इस गहरी कामना को एक उपयुक्त संज्ञा देना चाहता हूँ/मैं पलटता हूँ कामना का कोश/एक नया शब्द पाने के लिए। जो कवि अपनी माँ को महसूस करते हुए लिख सकता है: तुम्हारी बाँहें ऋतुओं की तरह युवा हैं, तुम्हारे होठों पर नई बोली की पहली चुप्पी है, तुम्हारी उँगलियों के पास कुछ नए स्पर्श हैं-वह अपनी कविता को सदैव नई बोली, नए स्पर्श देने के लिए प्रतिश्रुत रहेगा, इसमें संशय नहीं। अशोक वाजपेयी की कविताएँ-प्रेम कविताएँ बार-बार एक नया शब्द पाने, रचने और गढ़ने का उद्यम हैं।
यह संग्रह अशोक वाजपेयी की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।

Ashok Vajpayee

अशोक वाजपेयी
जन्म: 16 जनवरी, 1941
भाषा-दक्षता: अंग्रेजी एवं हिंदी, संस्कृत एवं उर्दू की भी जानकारी
प्रकाशन: हिंदी में कविता एवं आलोचना की 38 पुस्तकें। बांग्ला, मराठी, गुजराती, राजस्थानी, उर्दू, अंग्रेजी एवं पोलिश में 8 पुस्तकें अनूदित
हिंदी एवं अंग्रेजी में 8 पत्रिकाएँ संपादित-समवेत, पहचान, पूर्वग्रह, समास, बहुवचन (सभी हिंदी), बहुवचन, कविता एशिया एवं हिंदी (सभी अंग्रेशी)
महत्त्वपूर्ण समाचार-पत्रों-टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, पायनियर, द हिंदू, द वीक, नई दुनिया, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स आदि में रचनात्मक योगदान
अंग्रेशी, फ्रेंच, जर्मन, रूसी, स्पानी, हंगारी, नार्वेजियन, अरबी, पोलिश, बांग्ला, कन्नड़, मराठी, पंजाबी, असमिया व स्वीडी इत्यादि में कविताएँ व लेख अनूदित एवं प्रकाशित।
पुरस्कार: कविता के लिए दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान (1994); कविता-संग्रह 'कहीं नहीं वहीं' के लिए साहित्य अकादेमी, राष्ट्रीय पुरस्कार (1994); अज्ञेय राष्ट्रीय सम्मान (1997); हिंदी साहित्य को योगदान के लिए; ऑफिस ऑफ द आर्डर ऑफ क्रास (2004), पोलैंड गणराज्य; ऑफिसर डे ल' ऑर्डर देस आर्ट्स एट देस लेटर्स (2005), फ़्रांस गणराज्य; कबीर सम्मान, (2006) मध्य प्रदेश शासन; डी.लिट् (मानद) (2011), केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद।

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