Kavi Ne Kaha : Malay (Paperback)

Malay

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  • Year: 2014

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-83233-33-5

रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-
हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-
अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...।

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मलय
जन्म: 19 नवंबर, 1929; सहशन नाम के छोटे से गाँव के एक किसान परिवार में, शिला जबलपुर, मध्य प्रदेश।
शिक्षा: जबलपुर वि.वि. से एम.ए. (हिंदीद्) बाद में  यू.जी.सी. रिसर्च फैलोशिप लेकर इसी वि.वि. से 1968 में पी-एच.डी. ।
प्रकाशित कृतियाँ: हथेलियों का समुद्र, फैलती दरार में, शामिल होता हूँ, अँधेरे दिन का सूर्य, निर्मुक्त अधूरा आख्यान (एक लंबी कविता), लिखने का नक्षत्र, काल घूरता है, देखते न देखते (कविता-संग्रह)। खेत में (कहानी-संग्रह)। सदी का व्यंग्य विमर्श, समय के रंग (आलोचना)।
आलोचनात्मक निबंध, समीक्षाएँ और टिप्पणियाँ प्रकाशित एवं बांग्ला में कविताओं का अनुवाद।
संपादित कृतियाँ: आँखन देखी (संपादकीय सहयोग), साँझ सकारे (बुंदेली लोकगीतों का संकलन), परसाई रचनावली (पाँच संपादकों में से एक)।
कविता का ‘अखिल भारतीय भवानी मिश्र कृति- पुरस्कार’, मध्य प्रदेश साहित्य परिषद्, भोपाल। ‘भवभूति अलंकरण’, म.प्र. साहित्य सम्मेलन, भोपाल (2002)। ‘चंद्रावती शुक्ल पुरस्कार’ (2003), आचार्य रामचंद्र शुक्ल साहित्य-शोध संस्थान, वाराणसी। ‘हरिशंकर परसाई सम्मान’, जमानी, होशंगाबाद (2006)।

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