Manch Andhere Mein (Paperback)

Narendra Mohan

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  • Year: 2010

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-80146-80-5

मंच अँधेरे में
मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।

Narendra Mohan

डॉ. नरेन्द्र मोहन कवि, नाटककार और आलोचक के रूप में सुविख्यात नरेन्द्र मोहन का जन्म 30 जुलाई, 1935 को लाहौर (अब पाकिस्तान) में हुआ । अपनी कविताओं (कविता-संग्रह) इस हादसे में (1975), सामना होने पर (1979), एक अग्निकांड जगहें बदलता (1983), हथेली पर अंगारे की तरह (1990), संकट दृश्य का नहीं (1993), एक सुलगती ख़ामोशी (1997), एक खिड़की खुली है अभी (2005), नीले घोड़े का सवार (2008), रंग आकाश में शब्द (2012) द्वारा वे नए अंदाज़ में कविता की परिकल्पना करते रहे हैं तथा नई संवेदना और प्रश्नाकुलता को विकसित करने में उनकी खास भूमिका रही है । अपने नाटकों : कहै कबीर सुनो भाई साधो (1988), सींगधारी (1988), कलंदर (1991), नौ मैंस लैंड (1994), अभंगगाथा (2000), मि० जिन्ना (2005), हद हो गई, यारो (2005), मंच अंधेरे में (2010) में वे हर बार नई वस्तु और दृष्टि को तलाश करते दिखते है । नई रंगत मेँ ढली उनकी डायरी साथ-साथ मेरा साया ने इस विधा को नए मायने दिए हैं । इसी क्रम से आई हैं - साये से डायरी (2010) और फ्रेम से बाहर आती तस्वीरें (संस्मरण 2010) । नरेन्द्र मोहन ने अपनी आलोचना पुस्तकों और संपादन-कार्यों द्वारा जो विमर्श खड़े किए है, उनके द्वारा सृजन और चिंतन के नए आधारों की खोज संभव हुई है । लंबी कविता का विमर्श उन्हीं की देन है । विभाजनं : भारतीय भाषाओं की कहानियां खंड एक व दो और मंटो की कहानियां उनकी संपादन प्रतिभा के परिचायक हैं । आठ खंडों में नरेंद्र मोहन रचनावली प्रकाशित हो चुकी है । उनके नाटक और कविताएं विभिन्न भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में भी अनुदित हो चुकी हैं । वे कई राष्ट्रीय और प्रादेशिक पुरस्कारों से सम्मानित साहित्यकार हैं ।

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