Naamdev Rachanavali (Paperback)

Govind Rajnish

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  • Year: 2006

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Amarsatya Prakashan

  • ISBN No: 978-81-88466-27-6

नामदेव रचनावली
नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।

Govind Rajnish

डॉ० गोविन्द रजनीश
जन्म : 10 सितंबर, 1938 को राजस्थान के वैर कसी में 
शिक्षा : राजस्थान विश्वविद्यालय से एम०ए० आगरा विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० और डी०लिट्० सैंतीस वर्षों तक विश्वविद्यालयों में अध्यापन 1 जुलाई, 1999 को प्रोफेस-पद से सेवानिवृत्त इस दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के भाषा-सलाहकार तथा क० मुं० हिंदी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ के निदेशक रहे।  जाने-माने साहित्यकार । तीस पुस्तकें प्रकाशित । पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लेखन
प्रमुख रचनाएँ-
समकालीन हिंदी कविता की संवेदना', 'साहित्य का सामाजिक यथार्थ', 'पुनश्चितन', 'समसामयिक हिंदी कविता : विविध परिदृश्य', 'रांगेय राघव का रचना-संसार', 'नयी कविता : परिवेश, प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति' (आलोचना) ० 'रहीम ग्रंथावली', 'सत्यनारायण ग्रंथावली', 'रैदास रचनावली', 'नामदेवर चनावली', 'पंचामृत और पंचरंग', 'बखना रचनावली', 'हिंदी की आदि और मध्यकालीन फागु कृतियां' (संपादन) ०  'लोक महाकाव्य : आल्हा', 'हरदौल लोकगाथा', 'राजस्थान के पूर्वी अंचल का लोकसाहित्य', 'ब्रज की लोकगाथाएँ' (लोकसाहित्य) ० साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 'इनसाइक्लोपीडिया आंफ इंडिया लिट्रेचर' के छह खंडों के लिए लेखन
सहस्राब्दी विश्व हिंदी सम्मेलन, केंद्र साकार, उ०प्र० सरकार, उ०प्र० हिंदी संस्थान, सत्यनारायण-स्मारक-समिति, आगरा विश्वविद्यालय तथा लोक परिषद से सम्मानित एवं पुरस्कृत ।

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