Saadat Hasan Manto Ki Kahaniyan (Paperback)

Narendra Mohan

Availability: In stock

Seller: KGPBOOKS

Qty:
395 + Free Shipping


  • Year: 2018

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-85054-01-3

सआदत हसल मंटो उर्दू के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, चर्चित और विवादास्पद लेखक हैं। इस एक लेखक को लेकर जितनी चर्चाएं उठी हैं, उतनी अन्य किसी लेखक को लेकर नहीं। मंटो की खासियत है कि उसने नये विषयों पर ही नहीं लिखा, नये अन्दाजेबयां और नजरिये से भी लिखा। इस एक बात ने उन्हें अपने समय का ही नहीं, आज के समय का भी एक बड़ा कहानीकार बना दिया है।
मंटो की कहानियां पाठकों की अन्तश्चेतना को बुरी तरह झकझोरने वाली, तिलमिला देने वाले विचारों तक ले जाने वाली हैं। यह बेचैनी महज व्यक्तिगत नहीं है, मुल्क और कौम की बेचैनी से जुड़ी हुई है जो कहानियों की मार्फत पाठकों तक सीधे पहुंचती है। उनकी कहानियों में गहरी मानवीय दृष्टि के साथ-साथ तीव्र आक्रोश और प्रतिकार भी है। हरारत और रोशनी, स्वप्न और दुःस्वप्न उनकी सृजनात्मक प्रेरणा के हिस्से हैं। इन कहानियों के जरिये मंटो हमें विसंगति-भरी जिन्दगी में जीने की शर्त का गहरा एहसास कराते हैं।
सआदत हसन मंटो की कहानियां पुस्तक में मंटो के कथा-संसार में झांकने का, उनकी कहानियों को चुनकर, एक परिप्रेक्ष्य देकर हमारे सामने पेश करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है हिन्दी के जाने-माने कवि, नाटककार और आलोचक डाॅ. नरेन्द्र मोहन ने। मंटो की सृजनात्मक प्रेरणा और संपादकीय दृष्टि में आश्चर्यजनक साम्य है-एक-दूसरी में खुलती गई हैं और उन्हें अलगाया नहीं जा सकता। इससे यह पुस्तक कहानियों का संकलन-भर नहीं रही है, एक दस्तावेज बन गई है।

Narendra Mohan

डॉ. नरेन्द्र मोहन कवि, नाटककार और आलोचक के रूप में सुविख्यात नरेन्द्र मोहन का जन्म 30 जुलाई, 1935 को लाहौर (अब पाकिस्तान) में हुआ । अपनी कविताओं (कविता-संग्रह) इस हादसे में (1975), सामना होने पर (1979), एक अग्निकांड जगहें बदलता (1983), हथेली पर अंगारे की तरह (1990), संकट दृश्य का नहीं (1993), एक सुलगती ख़ामोशी (1997), एक खिड़की खुली है अभी (2005), नीले घोड़े का सवार (2008), रंग आकाश में शब्द (2012) द्वारा वे नए अंदाज़ में कविता की परिकल्पना करते रहे हैं तथा नई संवेदना और प्रश्नाकुलता को विकसित करने में उनकी खास भूमिका रही है । अपने नाटकों : कहै कबीर सुनो भाई साधो (1988), सींगधारी (1988), कलंदर (1991), नौ मैंस लैंड (1994), अभंगगाथा (2000), मि० जिन्ना (2005), हद हो गई, यारो (2005), मंच अंधेरे में (2010) में वे हर बार नई वस्तु और दृष्टि को तलाश करते दिखते है । नई रंगत मेँ ढली उनकी डायरी साथ-साथ मेरा साया ने इस विधा को नए मायने दिए हैं । इसी क्रम से आई हैं - साये से डायरी (2010) और फ्रेम से बाहर आती तस्वीरें (संस्मरण 2010) । नरेन्द्र मोहन ने अपनी आलोचना पुस्तकों और संपादन-कार्यों द्वारा जो विमर्श खड़े किए है, उनके द्वारा सृजन और चिंतन के नए आधारों की खोज संभव हुई है । लंबी कविता का विमर्श उन्हीं की देन है । विभाजनं : भारतीय भाषाओं की कहानियां खंड एक व दो और मंटो की कहानियां उनकी संपादन प्रतिभा के परिचायक हैं । आठ खंडों में नरेंद्र मोहन रचनावली प्रकाशित हो चुकी है । उनके नाटक और कविताएं विभिन्न भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में भी अनुदित हो चुकी हैं । वे कई राष्ट्रीय और प्रादेशिक पुरस्कारों से सम्मानित साहित्यकार हैं ।

Scroll