Ajit Kumar : Rachna-Sanchayan

Ganga Prasad Vimal

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789381467053

अजितकुमार: रचना-संचयन
अजितकुमार अपने समय के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में अग्रणी हैं। उनके लेखन का वैविध्य साबित करता है कि वे अपनी पीढ़ी की सभी विधाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। कवियों के बीच कविता के साथ-साथ वे श्रेष्ठ कथाकार हैं। कथाकारों के बीच वे श्रेष्ठ कवि हैं। कवि और कथाकार होने के साथ-साथ वे गंभीर गद्य लेखक हैं। चिंतक, विवेचक और अद्भुत अनुवादक के रूप में उनकी ख्याति सर्वत्र व्याप्त है।
प्रस्तुत संचयन उनके 80 वर्ष के होने के उपलक्ष्य में तैयार किया गया है। चिर शिशु, चिर किशोर, चिर युवा अजित- कुमार के सृजन में एक साथ कई गुण मिलते हैं। उनमें एक नैसर्गिक विनोदप्रियता है। इस अनोखी आदत के कारण वे सभी वर्गों में लोकप्रिय हैं। उनसे ईषर्या रखने वाले लोग तो उन्हें महिलाओं में ही लोकप्रिय मानते हैं। उनके शत्रुओं का कथन यहाँ ज़्यादा विश्वसनीय लगता है कि उन्होंने स्त्री-रिझावु साहित्य का प्रणयन किया है तथापि स्त्री और पुरुष समान रूप से उनकी रचनाओं के पाठक हैं। कल्पनाशीलता उनकी रचनाओं का आद्य गुण है, किंतु यथार्थ के वे उतने ही बड़े संस्थापक हैं, जितने बड़े वे भाषा के द्वारा वास्तविकता की सजीवता स्थापित करते हैं।
अजितकुमार के लेखन में समता, असांप्रदायिकता, सौंदर्यवादिता और जनपक्षधरता मौलिक रूप से विद्यमान है। उनका इतिहास-बोध भारतीय उपमहाद्वीप को भौगोलिक और राजनीतिक परिसीमाओं से ज़्यादा उदार घोषित करता है। वे भारत की बहुलता के समर्थक हैं। उनकी रचनाएँ उनकी वैचारिक ऊष्मा की प्रतीक हैं। सृजन के सभी गुणधर्मों का स्पर्श करने वाला अजितकुमार का लेखन परंपरा और आधुनिकता व उत्तर-आधुनिकता के आदर्शों को संकेतित करते हुए सनातनता की अवधारणा को पुष्ट करता है।

Ganga Prasad Vimal

गंगाप्रसाद विमल हिमालय के एक छोटे-से कस्बे में, 1939 में जन्मे गंगाप्रसाद विमल ने अनेक विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाई । एक-चौथाई शताब्दी अध्यापन करने के बाद वे 1989 में भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक नियुक्त किए गए । साथ ही साथ उन्होंने सिंधी भाषा की राष्ट्रीय परिषद और उर्दू भाषा की राष्ट्रीय परिषदों का काम भी संभाला । विश्व की अनेक भाषाओं में उनकी कहानियों के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं । 'न्यूडायमेंशंस', 'मेडिटिरेनियन रिव्यू', 'वैस्टर्न ह्यूमेनिटीज रिव्यू', 'द न्यू रेनेंया', 'क्वैरी', ‘प्रिन्य इंटरनेशनल', 'इस्टर्न होराइ्जन' आदि विश्वप्रसिद्ध पत्रिकाओं में उनकी कहानियों का प्रकाशन हुआ है । लंदन के फॉरेस्ट बुक्स ने उनकी कविताओं और कहानियों का एक बृहद संकलन कुछ वर्ष पहले प्रकाशित किया था । अब तक हिंदी में उनके ग्यारह कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए हैं । इसके साथ ही चार उपन्यास तथा सात कविता-संग्रह व विश्व की अनेक कृतियों की उनके द्वारा अनुदीत पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं । हाल ही से उनके उपन्यास 'मृगान्तक' पर एक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म "बोक्षु : द मिथ' का निर्माण हुआ है, जिसका प्रदर्शन अंतर्राष्टीय फिल्म महोत्सव में किया गया। अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत गंगाप्रसाद विमल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर-पद से सेवामुक्त होकर लेखन में सक्रिय है ।

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