Himalaya : Aitihaasik Evam Pauranik Kathayen

Padamchandra Kashyap

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Himachal Pustak Bhandar

  • ISBN No: 9788188123346

हिमालय ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाएँ
एक समय आया जब भारतीय संस्कृति के अजस खोट स्त्रोत  देवात्मा पुण्यात्मा नगाधिराज़ हिमालय के मानव को  असंस्कृत, प्लेच्छ, वृषल कहकर मुख्य धारा से बाहर हाशिये पर ला बिठा दिया गया । वह सच्चाई जानता था, अविचल रहा । पाषाण युग से आरंभिक वैविध्यपूर्ण अतीत के इस उत्तराधिकारी का सच और झूठ मापने का निजी पैमाना था । वह न कभी विजेता से भयभीत हो उसके आगे नतमस्तक हुआ और न पराजित को दुत्कारा, भुलाया । उसने इंद्र का सम्मान किया किंतु सहानुभूति वृत्र को दी और उसे भी देवता माना । पांडवों की जीत स्वीकार की, पर 'उद्दंड’ कहकर उन्हें दुर्दैव के हवाले कर दिया । 'शालीन' कौरवों को सराहा तथा 'मामा विष्णु' का प्यार दिलाया । महाभारत का कारण साग-सब्जी की वाटिका थी, तो सीता-हरण के पीछे उसका पकाया हुआ बड़ा' । सनुद्र-मंथन से निकला अमृत कहीं छलका, महाप्रलय के बाद मनु की नाव कहाँ उतरी और पुनः कृषि के लिए बीज कौन लाया, इसकी नई जानकारी दी । उसने मनुष्य को देवता बनते देखा और स्वयं देवता को मनुष्य बना, उसे खिलाव-पिलाया, नचवाया, साथ चलाया, चाकरी करवाई और दंडित भी किया, भले ही वह बडा देव विष्णु हो या महादेव शिव । महात्मा बुद्ध को देवराज इंद्र, अनाम राज्य की एक सनाम रानी को  परशुराम माता रेणुका तथा यमुना नदी को द्रोहणी घोषित किया ।
सहज, सरल, बातचीत की भाषा में, हलके-फुलके रोचक ढंग से हिमालय संतति की देखी-सुनी बताता है लघु कथाओं का यह संग्रह, जिसमें वेद है, इतिहास-पुराण भी । इसमें तथ्य है, कथ्य है, विद्वता का दबाव नहीं ।

Padamchandra Kashyap

डॉ० पद्मचन्द्र काश्यप भारतीय इतिहास और संस्कृति के मान्य अध्येता है । हिमालयी जीवन के सर्वागीण निरीक्षण-परीक्षण में उनकी विशेष रुचि है ।
हिमाचल प्रदेश के निरमंड गाँव (कुल्लू जिला) में अक्तूबर, 1925 को ज़न्मे डॉ० काश्यप पश्चिमी हिमालय के लोक-साहित्य का वैज्ञानिक विश्लेषण करने वाले पहले व्यक्ति है । उनकी जातीय-पुरातात्त्विक ऐतिहासिक खोजें बताती हैं कि भारत का सुदूर भूतकाल केवल मिट्टी के नीचे दबा पड़ा नहीं है, वह आज भी जीवित है । उनके ‘Surviving Harappan Civilisation’ को डॉ. एच० डी० सांकलिया ने ‘A Sensational Book…(which) Opens Up A Hitherto Neglected Line Of Ethno-archaelogical Invectivation’ आँका है । सम्प्रति प्रकाशित हो रहे ‘The Living Veda : Pre-Rigvedic And Early Rigvedic Traditions In Himalaya’ में उन्होंने स्थापित किया है कि लोक-संस्कृति इतिहास के लिए उतना ही प्रामाणिक आधार है जितना लिखित-उत्खनित सामग्री । वैदिक सप्त सिन्धु के पर्वतीय क्षेत्र की लोक- संस्कृति में उन्होंने पूर्व ऋग्वेदिक एवं आरंभिक ऋग्वेदिक युगीन इतिहास का मुँह बोलता विवरण प्रस्तुत किया है ।
आपके 'हिमाचल प्रदेश-ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अध्ययन', 'हिमाचली संस्कृति का इतिहास’ क्या कुल्लुई लोक-साहित्य' अपने विषय के अधिकारिक संदर्भ ग्रंथ बन गए है ।.

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