Hindi Sahitya Ka Itihaas

Pooran Chand Tandon

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  • Year: 2010

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Jagat Ram & Sons

  • ISBN No: 978-81-88125-09-8

किसी भी साहितय की चेतना का निरंतर विकास और तत्संबंधी शोध-यात्रा के नवीन परिणाम तथा निष्कर्ष उसके इतिहास-लेखन को अधुनातन एवं अद्यतन बनाने के प्रेरक कारण बनते हैं। युग-सापेक्ष साहित्य-चेतना, परिवर्तनशीलता की द्योतक होती है। हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन का भी एक सुदीर्घ एवं सशक्त इतिहास मौजूद है। और हम इतिहास लेखन के बदलते मापदंडों को, पुनर्लेखन की प्रेरक दृष्टियोग को, संदर्भ एवं समय-सापेक्ष व्याख्याओं को-इसी इतिहास के माध्यम से समझ तथा देख भी पाते हैं। हिंदी साहित्य का पहला इतिहास-गं्रथ हमारे समक्ष जिस रूप में आया था, दूसरा, तीसरा या चैथा उसी रूप में नहीं दोहराया गया, इतिहासकार की इतिहास-दृष्टि ने उसे नए आयाम, नए संदर्भ तथा नए परिदृश्यों के माध्यम से नई अर्थवत्ता प्रदान की। आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘हिंदी साहित्य के इतिहास’ को आज भी वैज्ञानिक, इतिहास-दृष्टि-सम्मत तथा सर्वाधिक तार्किक माना जाता है, लेकिन उस महत्वपूर्ण इतिहास के लेखन-प्रकाशन के पश्चात् जो साहित्य खोजा गया, जो आलोचनाएं-समीक्षाएं लिखी गईं और हिंदी साहित्य संबंधी जो अनुसंधान देश-विदेश में किए गए, उन्होंने शुकल जी के तथ्यों को, सूचनाओं को, विवरणों को अपर्याप्त घोषित कर दिया। इतिहासकार की अपनी एक विशिष्ट दृष्टि भी होती है। उस दृष्टि से मूल में क्रमबद्धता, अन्विति तथा अखंडता तो रहती ही है, देखने का निजी अंदाज भी सक्रिस रहता है। कवि, साहित्यकार, आलोचक या चिंतक के प्रति, उसकी रचना के प्रति, उसकी भाषा के प्रति तथा उसकी समग्र दृष्टि के प्रति, इतिहासकार अपनी एक विशिष्ट दृष्टि बना लेता है और उसी आधार पर उसके प्रति अपने विचार प्रकट करता है।

Pooran Chand Tandon


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