Jangal Juhi

Ramesh Chandra Shah

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789383233373

रमेशचन्द्र शाह के डायरी-लेखन की पहली कृति 'अकेला मेला' में सन् 1981 से 1985 तक की प्रविष्टियाँ शामिल थी तो दूसरी कृति 'इस खिड़की से' 1986 से 2004 तक की डायरी को समाहित किए हुए थी। तीसरी 'आज और अभी' का फलक 2004 से 2009 तक पाँच वर्षों को अंतः प्रक्रियाओं को समेटे हुए है और, अब यह चौथी डायरी 'जंगल जुही' अद्यावधि और 'अद्यतन' को। इस डायरी में लेखक ने अपने प्राग और हैदराबाद प्रवास के अत्यंत रोचक और मूल्यवान् यात्रानुभवों को भी सहज ही स्वत:स्फूर्त ढंग से पिरो दिया है, जिनसे-पाठक पाएँगे कि-उनके अपने ही जिये और भोगे हुए में एक नया और अप्रत्याशित आयाम आ जुड़ा है।
जैसा कि एक सुधी समालोचक का मंतव्य है-"एक ही विधा में अनेक विधाओं का कायंतरण और अर्थांतस्या कैसे होता है, यह रमेशचन्द्र शाह की डायरियों को पढ़कर जाना जा सकता हैं।" यह भी कि-"एक सर्जक अपनी निर्विकार चेतना में कितना बहुविध हो जाता हैं। शाह की डायरी केवल तिथिक्रम में घटित जीवन-लीलाओं का बयान नहीं है, बल्कि भाव-विपुल सौंदर्य और अनुभूतियों में निहित मर्म का उदघाटन है। यहाँ दर्शन है-साहित्य की तरह; साहित्य है संस्मरणों की समृद्धि की तरह; संस्मरण है-जीवन के धड़कते हर पल की तरह डायरियाँ अनुभवों की जीवंत गाथाओं के समान होती हैँ।
वे कल्पना-प्रसूत कविता-कहानी न होकर भी अगर उन्हीं की तरह आंदोलित और आनंदित करती है तो मानना पड़ेगा कि डायरी-लेखक एक कल्पनाशील-विचारशील व्यक्ति के साथ भाषा- शिल्पज्ञ भी है।" शाह की डायरियाँ अर्थान्वेषण की गंभीरता के साथ-साथ आलोचनात्मक अंतर्दूष्टि, 'विट' और 'ह्यूमर' से भी परिपूर्ण होती हैं। पाठक देख सकते हैं कि उनकी काल-चेतना कितनी प्रखर, प्रबुद्ध और संवेदनशील है।
रमेशचन्द्र शाह की डायरी एक और रसिक मर्मज्ञ के शब्दों मे-"महज डायरी नहीं है; इसमें सही  में साहित्य का वैश्वीकरण हो गया है, जिसने मनुष्य की बनाई सारी सरहदों को तोड़कर सारी धरती को अपना घर-कूटुंब मान लिया है।' कुल मिलाकर शाह का डायरी-लेखन देश-काल की हदों को लाँघ  हमें उस लेकि में ले जाता है जहाँ हम खुद को सच के आईने के सामने खड़ा पाते है, जहाँ अपने से बचना मुरिकल ही नहीं, नामुमकिन होता है।

Ramesh Chandra Shah

रमेशचन्द्र शाह
जन्म: वैशाखी त्रयोदशी, 1937, अल्मोड़ा (उत्तराखंड)
शिक्षा: बी.एस-सी., एम.ए., पी-एच.डी.। 1997 में भोपाल के शासकीय हमीदिया कॉलेज के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त। तत्पश्चात् सन् 2000 तक भोपाल में निराला सृजनपीठ के निदेशक रहे। फिलहाल केंद्रीय हैदराबाद विश्वविद्यालय में एस. राधाकृष्णन् चेयर प्रोफेसर।
प्रकाशित कृतियाँ: नदी भागती आई, हरिश्चन्द्र आओ, प्यारे मुचकुंद को, देखते हैं शब्द भी अपना समय, अनागरिक तथा समग्र काव्य-संकलन (2009), कछुए की पीठ पर (पहचान सीरीज-3, 1974) इनका पहला संग्रह था। हिंदी साहित्य सम्मेलन की ‘आधुनिक कवि-माला’ के 24वें पुष्प के रूप में संकलन प्रकाशित (2008) (कविता-संग्रह) ०  गोबरगणेश, किस्सा गुलाम, पूर्वापर, पुनर्वास, आखिरी दिन, आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू (उपन्यास) ०  जंगल में आग, मुहल्ले का रावण, मानपत्र, थियेटर, मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ, मेरी प्रिय कहानियाँ तथा गेटकीपर (कहानी-संग्रह) ०  सबद निरंतर, स्वधर्म और कालगति, नेपथ्य से, देहरी की बात (2009) तथा अगुन  सगुन बिच (2010) (वैचारिक निबंध-संग्रह) ०  रचना के बदले, आड़ू का पेड़, पढ़ते-पढ़ते, शैतान के बहाने (ललित निबंध-संग्रह) ०  छायावाद की प्रासंगिकता, समानांतर, वागर्थ, आलोचना का पक्ष, समय-संवादी, वागर्थ का वैभव, जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय (साहित्य अकादेमी मोनोग्राफ़) (साहित्यालोचन) ०  मारा जाई खुसरो, मटियाबुर्ज (राशोमन का अनुवाद) (नाटक) ०  अज्ञेय काव्य स्तबक, प्रसाद रचना-संचयन (साहित्य अकादेमी, दिल्ली) जड़ की बात (जैनेन्द्र के निबंध) (संपादन) ०  Ancestral Voices, Yeats & Eliot : Perspectives On India : Jaishankar Prasad: Thus Spoke Bhartrihari (भर्तृहरि का अंग्रेजी में पद्यानुवाद) (अंग्रेजी) ०  एक लंबी छाँह (यात्रावृत्त) ०  अकेला मेला (2009), इस खिड़की से (2010) (डायरी)।
सम्मान: म.प्र. शासन का शिखर सम्मान (1987-88), के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा व्यास सम्मान (2001), पद्मश्री अलंकरण (2004), म.प्र. साहित्य परिषद का भवानीप्रसाद मिश्र पुरस्कार तथा भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार ‘पूर्वापर’ उपन्यास के लिए, केंद्रीय भाषा संस्थान, आगरा का महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार यात्रावृत्त ‘एक लंबी छाँह’ के लिए, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान (2009) इत्यादि।

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