Dharati Hone Ka Sukh

Keshav

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  • Year: 2006

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788189859138

केशव की कविताएं
मैं/तुम्हें  ढूंढने निकला/तुम/मुझे/अफसोस कि हम/खुद को ढूंढते रहे/ एक दूसरे के मरुस्थल में । केशव की कविताएँ उस दूसरे को जानने का जुनूनी प्रयत्न हैं, इसलिए नहीं कि उसे जाने बिना संसार क्रो नहीं जाना जा सकता, बल्कि इसलिए कि उसे जाने बिना खुद को नहीं जाना जा सकता । इस यात्रा में वे अकेले हैं, संपूर्णता की असंभव चाह लिये सूक्ष्म को भेदने, जानने और पा लेने के जुनून के प्ताथ : झुर्रियां सच है/ देह क्या स्पर्श/ देहातीत/ हम दोनों/ जीवित हैं स्पर्श में/ देह में मृत । देह के उस पार जाने का यत्न, पर देह के सिवा नहीं, यह रास्ता तो  है, मंजिल नहीं वह देहातीत अवस्था, जहां मेरा-तेरा का भेद मिट जाए तू मुझमें है, मैं तुझमें हूं । आसान नहीं है किसी दूसरे को इस तरह जानना, यह छलांग पहले अपने बाहर, फिर अपने भीतर लगती है, उस दूसरे को जानना, वह दूसरा ही हो जाना है ।
केशव की कविताएं उनके लिए हैं जो अपनी तलाश में हैं प्रेम की ऐसी नदी, जो बहती तो जीवन के बीचों-बीच है, पर दिखाई नहीं देती, बहुत कोशिश करो तो सुनाई देती है आवाज उसकी : जब तुम्हारे कान अपनी ही छाती से लगे हों । वह अवस्था कि उस दूसरे को सुनना, खुद के सुनने जैसा हो पाए, उस दूसरे को कहना, खुद को कहने जैसा । प्रेम, सत्य, जीवन, ईश्वर अकथनीय है । इसलिए हम इन्हें बार-बार कहते और इन्हें इनकी असंभव जगहों से उठाकर दुनिया में लाकर अपने लिए संभव बनाते हैं । यह केशव की कविता का दुस्साहस है । जीवन एक दुस्साहसिक यात्रा ही तो है, न कहीं से, न कहीं तक । इस यात्रा में अपनी कल्पना को अपना सच बनाना ही कविता का लक्ष्य है, संसार के बरक्स खडा एक सृजनात्मक संसार, जो उस दूसरे धरातल से कहीं जियादा साफ दिखता है... 
वास्तविक संसार वास्तव में अधूरा ही है । केशव की कविताएं इसे पूरा करती हैं, अपने रचे एक नए काल्पनिक संसार में, जो कल्पना भी नहीं है, न सच ही । वह इन दोनों के बीच खड़ा है, जहाँ से सच इतना साफ पहले कभी नहीं दिखा, जहां से कल्पना इतनी मच कभी नहीं लगी । इन कविताओं में हम केशव की दुनिया में एक अंतरंग भाव से झांक सकते हैं, और शायद यह तय कर सकते हैं कि वे सबको यात्रा में किस  रूप में शामिल हैं । न केवल मनुष्य का भीतरी संसार, बल्कि इनकी कविताएं मनुष्य जीवन के लगभग सभी पहलुओं का स्पर्श करती हैं उसकी गहराई, ऊचाई और विडंबनाओं से एकमेक । उसके आलोक, अधिकार, खूबसूरती, दु:ख और संघर्ष में लिथडी हुई । अपनी ताजा कविताओं में केशव ने कुछ ऐसे विंध्याचल भी लांघें हैं, जिनसे समकालीन कवि प्राय: बचते रहे हैं । देश और दुनिया को बांटकर स्वार्थ-साधना में लगे लोगों को केशव के कवि ने आग्रेय नेत्रों से देखा है, क्योंकि आम आदमी यहाँ पूरी शिद्दत के साथ उपस्थित है ।
प्रकृति भी अपनी पूरी भव्यता और उदात्तता के साथ केशव की कविताओं में मौजूद है । पहाडी परिवेश के मुंह बोलते चित्र इधर की इनकी कविताओं में बहुतायत से नजर आए हैं, जिनके जरिये हम पहाडी जीवन को बहुत गहराई और करीब से देख और जान सकते हैं । केशव प्रकृति को किसी पर्यटक की दृष्टि से नहीं देखते, जिसके पास कैमरा-आंख तो होती है पर उस जंगल में भीतर उतरने का साहस नहीं । वे उसके भीतर उतरते हैं, उसे मात्र अनावृत्त करने नहीं, बल्कि उसके रहस्यों में अपना रहस्य खोजने । इस मायने में इनकी कविताएं अपने समकालीन कवियों में सबसे अलग हैं और उनमें एक निडोंष ताजगी है गहराई है और है भीतर ही भीतर उतरते चले जाने की व्याकुलता, शायद उस उद्यम तक, जहां से जीवन निस्मृत हो रहा है...

Keshav

केशव
हवाओं के लिहाफ में दुबके रहने वाले कांगड़ा जनपद के गांव टंबर में तहसीलदार बिहारी लाल के घर 8 अप्रैल, 1949 में जन्मे केशव अपनी माँ कौशल्या देवी की पहली संतान हैं । हिंदी-उर्दू और अंग्रेजी के अध्येता पिता उर्दू में शायरी और अंग्रेजी में गद्य लिखा करते थे, जिनसे बचपन में ही केशव के भीतर साहित्यिक संस्कार पनप गए । हमीरपुर (हिमाचल) में बीए करते समय प्रो. ओ.पी. शर्मा जैसे अंग्रेजी के विद्या-सर्जक ने केशव के भीतर पनपे सर्जनात्मक संस्कारों को पोषित-पल्लवित ही नहीं किया अपने इस प्रतिभाशाली छात्र का साहित्यिक विकास भी खूब किया । चंडीगढ़ में अग्रेजी से एम.ए. करते समय इंद्रनाथ मदान से आगे बढने की प्रेरणा पाने वाले केशव हर्मन हेस, डी.एच.लरेंस और टी.एस. इलियट को पसंद करते हैं । घर में पिता से सर्जनात्मक संस्कार ग्रहण करने वाले केशव को शिवालिक हिमाचल के जीवन और परिवेश की मोहक और दाहक छवियां एक साथ प्राप्त हुईं, जिन्हें इनकी कविताओं और कहानियों में देखा जा सकता है । पालमपुर के करीब अंद्रेटा में प्रसिद्ध आयरिश अभिनेत्री नोरा रिचर्ड से हुई केशव की अंतरंग मुलाकातों ने उनके एलीट संस्कारों में लोक संस्कार रोपे तो सरदार शोभा सिंह, भावेश सान्याल, रंधावा और गुरशरण सिंह की कलात्मक गूंजों- अनुगूंजों ने युवा केशव की सर्जनात्मकता को लगातार धार और धूप देने का काम किया, जिससे वे एक बडे रचनाकार बनकर उभर आए । इनका कहानी संग्रह 'रक्तबीज' भारतीय ज्ञानपीठ ने छापा तो उपन्यास 'हवाघर' राजकमल प्रकाशन ने और वहीँ से छपा पांचवां कविता संग्रह 'धुप के जल में' । पहला कविता संग्रह 'शहर का दुख' तभी छप राया था, जब वे एम.ए. के छात्र थे । 'अलगाव', 'एक सूनी यात्रा', 'ओ पवित्र नदी' तथा 'धरती होने का सुख' जैसे कविता संग्रह और 'फासला है तथा " अलाव हैं जैसे कहानी संग्रह भी पराग, प्रवीण और किताबघर प्रकाशन जैसे प्रकाशकों ने छापे हैं और अब अंग्रेजी उपन्यास 'डीमनट्रैप' से केशव अपने लिए अंतर्राष्ट्रीय साहित्य संसार की सांकल खोलने को हैं, जिसके हिंदी, उर्दू और ओडिया अनुवाद 'असुरघात' नाम से आने वाले हैं । शायद इसीलिए हिमाचल सरकार वा सर्वोच्च पुरस्कार 'गुलेरी सम्मान' सर्वप्रथम कवि-कथाकार केशव को ही प्रदान किया गया । हिमाचल साहित्य अकादमी तथा पंजाब कला अकादमी से भी पुरस्कृत ।

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