Kavya Shatabdi

Anamika

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789381467107

काव्य शताब्दी
हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।

Anamika

अनामिका
अनामिका निबंध लिखती हैं, अखबारों और पत्रिकाओं में स्तंभ लिखती हैं, कहानियाँ और उपन्यास रचती हैं, कविताओं और उपन्यासों का अनुवाद-संपादन करती हैं, और अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन करती हैं । एक पब्लिक इंटलेक्चुअल के रूप में व्याख्यान देने से लेकर नारीवादी पब्लिक स्फियर में सक्रिय रहने तक वे और भी बहुत कुछ करती हैं, पर सबसे पहले और सबसे बाद में वे एक कवि हैं ।
1961 के उत्तरार्द्ध मेँ मुजफ्फरपुर, बिहार में जन्मी और अंग्रेजी साहित्य से पी-एच०डी० अनामिका राजभाषा परिषद पुरस्कार (1987), भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (1995), साहित्यकार सम्मान (1997), गिरिजाकुमार माथुर सम्मान (1998), परंपरा सम्मान (2001) और साहित्य सेतु सम्मान (2004) से विभूषित हो चुकी हैं ।
उनकी प्रकाशित कृतियाँ : आलोचना : 'पोस्ट एलियट पोएट्री : अ वॉएज फ्रॉम कंफिल्कट टु आइसोलेशन', 'डन क्रिटिसिज्म डाउन दि एजेज़', 'ट्रीटमेंट ऑव लव एंड डेथ इन पोस्ट वार अमेरिकन विमेन पोएटस'; विमर्श-'स्त्रीत्व  का मानचित्र', 'मन माँजने की जरूस्त', 'पानी जो पत्थर पीता है'; कविता- 'गलत पते की चिट्ठी', 'बीजाक्षर', 'समय के शहर में', 'अनुष्टुप', 'कविता में औरत', 'खुरदुरी हथेलियां', कहानी-'प्रतिनायक' संस्मरण  'एक तो शहर था', 'एक थे शेक्सपियर', 'एक थे चार्ल्स  डिकेंस', 'दस द्वारे का पिंजरा; उपन्यास-'अवांतर  कथा, अनुवाद-'नागमंडल' (गिरीश कर्नाड), 'रिल्के की कविताएँ', 'एफ्रो-इंग्लिश पीएम्स', 'अटलांत के आर-पार'
(समकालीन अंग्रेजी कविता), 'कहती हैं औरतें' (विश्व साहित्य की स्त्रीवादी कविताएँ)।

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