Rupantar

Muni Rupchandra

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  • Year: 1995

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Bhartiya Prakashan Sansthan

  • ISBN No: 8899334456991

रूपान्तर
कविता सृष्टि का रूपान्तर है । मुनि रूपचन्द्र जी इस रूपान्तर के अनोखे भाष्यकार है जो प्रचलित काव्यशैलियों में निरन्तर उस गहरे, अनिर्वच आत्म- गोपन को वाणी दे रहे है ।
प्रचलित शब्दार्यों से आन्तरिक ध्वन्यार्थों को व्यंजित करने का चामत्कारिक कौशल इन कविताओं में है। इनमें अतिरिक्त रूप से कोई प्रदर्शन नहीं है। अत्यन्त सहज भाव से मानवीय आर्द्रता को रूप देने की साधना का ही जैसे यह प्रतिफल है ।
एक लंबे अर्से से शब्दों के द्वारा मुनिश्री लयबद्ध या लेयमुक्त आधारों पर आन्तरिक लय का सृजन कर उस सेतु का निर्माण कर रहे है जिस पर चढ़कर आप लोकोत्तर अनुभवों का स्पर्श भी कर सकते हैं और लौटकर जैविक सृष्टि के सौन्दर्य का अनुभावन भी कर सकते हैं ।
विचित्र सृष्टि विधान में क्रूरतम के बीच भी अविश्वसनीय रसधारा बहती है किन्तु मुनिश्री क्रूरतम के रसमय रुपाख्यान के रूपान्तर को वाणी देते हैं । सदियों से कवि साधना की पूर्णता की खोज में लगे है । और एक साधक सदियों की खोज के अनुभव के भीतर आवेग के उफनते सागर को शब्द, अर्थ, लय, इंगित के बीचोबीच आकृति में बाँधने, आत्मा के वर्णहीन रूप में ढालने में निरत है…क्या कविता भी साधना नहीं है...

Muni Rupchandra

मुनि रूपचन्द्र जी की प्रमुख कृतियाँ कला- अकला, अंधा चाँद, खुले आकाश में, अर्धविराम, भीड़ भरी आँखें, मैं कहता आँखन देखी, किस संबोधन से पुकारूँ, भगवान महावीर, मार्क्स-महावीर और गांधी, इन्द्रधनुष, दीवारें ही दीवारें, सुना है मैंने आयुष्मन् । आदि

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