Us Desh Ka Yaaron Kaya Kahana

Manohar Shyam Joshi

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170163893

उस देश का यारो क्या कहना
 हिंदी की तमाम अनसुलझी बहसों में से एक यह  भी रही है की व्यंग्य को विधा माना जाय कि वस्तु ? मनोहर जोशी के यहाँ व्यंग्य एक दृष्टि या दृष्टिकोण, एक धजा या अदा की शक्ल अख्तियार  करता है। वे किसी भी स्थिति और व्यक्ति को, विधा और वस्तु को, पवित्र या अस्पृश्य  नहीं मानते । जिस तरह वे अपने को, उसी तरह और सब कुछ को धो-धाकर ठिकाने लगा देने में यकीन करते है । यही उनका कथा है यहीं उनका शिल्प ।
कोई गुब्बारा दिखा नहीं कि मश्जो उसमें पिन चुभोने के लिए बेताब हो उठते है, गोकि वे इसे बडी तरतीब और तरकीब से करते हैं-- कुछ इस तरह कि वह भड़ाक से न फूटे, हवा धीरे-धीरे फुस्स करती निकले । गुब्बारे को अच्छी बरह पिचकाकर ही मश्जो चैन पाते हैं, जो उनकी ममता का सूचक है या निर्ममता का, यह अपने-आप में विवाद का विषय हो सकता है ।
हिन्दी व्यंग्य-लेखन के आरंभिक उदाहरण और प्रतिमान यदि शिवशंभु के चिट्ठों में देखे जा सकते हैं तो उनके लगभग सौ वर्षों बाद लिखित 'नेताजी-कक्काजी संवाद' हमें एक बार फिर समय और समाज के आमने-सामने लाते है । तब इस विडंबना की ओर ध्यान जाए बिना नहीँ रहता कि चीजे और स्थितियां जितनी बदलती है, उतनी ही वे पहले जैसी रहती है ।
इसलिए, लार्ड कर्जन और नैताजी और मुंगेरीलाल एक ही सिक्के के अलग-अलग पहलू जैसे नजर आएँ नो क्या आश्चर्य ।
यह समझ चुकने के बाद केवल जीना ही समझना बाकी बचना है कि तिथियों, नामों और प्रसंगों के बासीपन के बावजूद, उनके पीछे मौजूद बहुत कुछ तरोताजा बना रहता है । मश्जो उसे कई तरह से झलकाते हैं, यहाँ तक कि छद्म गंभीरता के आवरण में छिपाकर भी ।
हिन्दी ये एक समय अनेक तात्कालिक कारणों से जिस तरह 'एकांकी' का विस्फोट हुआ था, उसी तरह पत्रकारिता के पिछले दौर में 'व्यंग्य' की भरपूऱ खेती हुई है । कोई चाहे तो इस 'बम्पर क्राप' को 'स्वाधीनता के पचास वर्षों की देन' भी कह सकता है और उम्मीद बाँधी जा सकती है कि जश्न के इस मौके पर संसद का जो विशेष अधिवेशन हुआ था, उसके अनन्तर 'शान्तं पापम्’ नामक एक नया सीरियल शुरु होगा । वह मात्र पचास दिनों का होकर न रह जाय,
बल्कि आगामी पचास वर्षों तक चलता हुआ, स्वाधिनता का शतक भी धूमधाम से मना सके, इस गुन्ताड़े में हमारे सुपर स्क्रिप्ट-राइटर मश्जो  इन दिनों-बाकी सभी हास्य-व्यंग्यकारों सहित- लगे हुए है ।
यही वह वजह है कि सूचना मुझ जैसे मुहर्रमी व्यक्ति को देनी पड़ रही है कि आत्मसाक्षात्कार से लेकर आत्मधिक्कार  क्या आत्मशोधन तक की तमाम संभावित छवियों को समेटने वाली उस अखंड राष्ट्रीय गाथा के एल धमाकेदार ट्रेलर की भाँति अब आपके सामने पेश है--'उस देश का यारो क्या कहना ।'
-अजितकुमार

Manohar Shyam Joshi

मनोहर श्याम जोशी 9 अगस्त, सन् 1953 को अजमेर से जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी 'कल के वैज्ञानिक' की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गए । अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ । स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्ष से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गए । प्रेस, रेडियो. टी. वी., वृत्तचित्र, फिल्म, विज्ञापन-संप्रषण का ऐसा कोई माध्यम नहीं, जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो । खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विषय नहीं, जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो । आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकते रहे । पहली कहानी तब छपी जब यह अठारह वर्ष के थे, लेकिन पहली बडी साहित्यिक कृति तब प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्ष के होने आए । केंद्र सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह से होते हुए जोशी जी सन् 1967 में हिंदुस्तान टाइम्स में साप्ताहिक हिंदुस्तान के संपादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी संपादन किया । टेलीविजन धारावाहिक 'हम लोग' लिखने के लिए सन 1984 में संपादक की कुर्सी छोड दी और तब से अंत तक स्वतंत्र लेखन करते रहे ।
स्मृति शेष : 30 मार्च 2006

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