Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-3

Balram

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  • Year: 2010

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Amarsatya Prakashan

  • ISBN No: 9788188466184

बीसवीं सदी की लघुकथाएं : तीन
अगर बीसवीं सदी के श्रेष्ठ लघुकथा-लेखकों की सूची बनानी पड़े तो उसमें एनॉ उन्नी का नाम किसी भी कीमत पर रखना ही पड़ेगा। हिंदी लघुकथा को एक विशिष्टता प्रेमचंद ने सौंपी तो दूसरी राजेंद्र यादव ने, तीसरी युगल, विष्णु नागर, पृथ्वीराज अरोड़ा और सुदर्शन वशिष्ठ ने, चौथी चित्रा मुद्गल और शशांक ने और पांचवीं उन्नी, पवन एवं चैतन्य त्रिवेदी ने और छठी अर्चना वर्मा, मालचंद तथा मुकेश वर्मा ने। लघुकथा को भाषा और भाव की जो गरिमा उन्नी सौंपते हैं, वह हिंदी में दुर्लभ है, शायद अद्वितीय, पर यह अद्वितीयता न तो रावी जैसी है, न जयशंकर प्रसाद या शशांक जैसी, जिनकी परंपरा संभव नहीं लगती, लेकिन उन्नी की लघुकथाओं की परंपरा बन सकती है, प्रेमचंद की तरह। अद्वितीय होना उस दोधारी तलवार पर चलने की तरह है, जिससे आपकी अपनी काया भी तराश दी जा सकती है। वह आपकी शक्ति हो सकती है और सीमा भी। जयशंकर प्रसाद, रावी और शशांक की लघुकथाओं की अद्वितीयता उन्हें सीमित कर देती है, जबकि प्रेमचंद, राजेंद्र यादव, सुदर्शन वशिष्ठ और चित्रा मुद्गल की अद्वितीयता उनके कथा-लेखन के सीमाहीन विस्तार की राहें खोल देती है। शशांक की लघुकथाएं अपनी परंपरा को छेंककर खड़ी हो जाती हैं, उनकी कहानियों की तरह। प्रारंभ में प्रियंवद की कहानियां भी ऐसी ही लगती थीं, लेकिन प्रियंवद ने अपनी उस अद्वितीयता की सीमाओं को खंड-खंड कर ‘बोधिवृक्ष’ जैसी कहानियों के जरिए खुद को सीमाहीन विस्तार में ले जाने वाली अद्वितीयता सौंपी है। ऐसी बात लेकिन कोई पाठक तब तक दावे से नहीं कह सकता, जब तक वह हिंदी के दो सौ से अधिक कथाकारों की चुनी हुई लघुकथाओं का ‘पाठ-कुपाठ’ न कर ले। आज प्रायः हर कोई स्वीकार कर चला है कि यह समय लघुकथा का समय है। इसीलिए प्रस्तुत संचयन सर्व-संग्रह की साधु-वृत्ति से संचालित होकर संपादित हुआ है, लेकिन इक्कीसवीं सदी में आकर अब लग रहा है कि घना बजने वाले थोथे चनों को छांट देने का समय आ गया है, जिसकी शुरुआत प्रस्तुत संचयन के संपादकीय और संकलित आलोचनात्मक आलेखों से कर दी गई है यानी हिंदी लघुकथा की बीसवीं सदी का समग्र अवलोकन-सिंहावलोकन।

Balram

बलराम
उत्तर प्रदेश में बिठूर के पास स्थित गांव भाऊपुर में 15 नवंबर, 1951 को जन्मे बलराम एम.ए. अधूरा छोड़कर हिंदी दैनिक 'आज' में फीचर संपादक हो गए, जहां से 'रविवार' और 'करंट' साप्ताहिक के लिए उत्तर प्रदेश की रिपोर्टिंग भी करते रहे । फिर टाइम्स ऑफ़ इंडिया की पत्रिका 'सारिका' के संपादक मंडल से संबद्ध हुए। दिल्ली आकर यहीं से हिंदी में एम.ए. किया । बाद में 'नवभारत टाइम्स' के चीफ-सब एडीटर बने । 'भूमिका', 'शिखर' और 'शब्दयोग' के बाद समाचार पाक्षिक 'लोकायत' का संपादन । कृतियां : कलम हुए हाथ, गोआ में तुम, मृगजल, अनचाहे सफ़र तथा सामना (कथा संग्रह), जननी- जन्मभूमि और आवागमन (उपन्यास), माफ करना यार (आत्मकथा), औरत की पीठ पर (रिपोर्ताज), हिंदी कहानी का सफर, आंगन खड़ा फकीर, आधे-अधूरे परिचय (आलोचना), वैष्णवों से वार्ता (इंटरव्यूज) तथा धीमी-धीमी आंच (संस्मरण) आदि प्रकाशित । कारा (उपन्यास) शीघ्र प्रकाश्य । संपादन : दुनिया की प्रमुख भाषाओँ की कथाओं के अनुवाद और संचयन 'विश्व लघुकथा कोश', 'भारतीय लघुकथा कोश' और 'हिंदी लघुकथा कोश' प्रकाशित । दर्जनाधिक अन्य पुस्तकों का भी संपादन किया ।
सम्मान : केंद्रीय हिंदी संस्थान से सृजनात्मक लेखन और पत्रकारिता के लिए 'गणेशशंकर विद्यार्थी स्रम्मान' । हिंदी अकादमी से 'साहित्यकार सम्मान' । संस्मरण के लिए बिहार से 'नई धारा रचना सम्मान' । उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से रिपोर्ताज के लिए' अज्ञेय पुरस्कार' । मध्य प्रदेश से प्रेमचंद पुरस्कार । दिल्ली और उत्तर प्रदेश शासन से कुछ साहित्यिक कृति पुरस्कार भी मिले ।

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