Dekhana Ek Din

Dinesh Pathak

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  • Year: 2015

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Amarsatya Prakashan

  • ISBN No: 9789383234417

साहित्य में प्रचलित नारों और विमर्शों के शोर-शराबे से अलग अपने एकांत में रचनारत दिनेश पाठक की अधिकांश कहानियां मानव संबंधों व विभिन्न कारणों से उनमें  बनते-बदलते सरोकारों की पड़ताल करती हैं।  
‘देखना एक दिन’ संग्रह की कहानियों का मूल स्वर भी इसी भावभूमि के इर्द-गिर्द हैं। इस संग्रह की अधिकतर कहानियां एक विशेष परिवेश से जुड़ी दिखने के बावजूद संपूर्ण भारतीय समाज के अंतर्संबंधों को प्रस्तुत करती हैं। बहुआयामी धरातल की इन कहानियों में गांव व कस्बे का जीवन तो है ही, साथ ही उनका संघर्ष, उनका जुझारूपन, उनके सुख-दुःख, उनकी आशा-निराशा, उनके बनते- ध्वस्त होते सपने तथा मूल्य संक्रमण के कारण उत्पन्न मानसिक विचलन और इन सबसे इतर जीवन के प्रति उनकी गहन आस्था व गहरी जिजीविषा है। यही कारण है कि वे पराजित नहीं होते, पराजय के बीच से फिर-फिर उठ खड़े होते हैं। यहां ठेठ ग्रामीण जीवन से निकले पात्र भी हैं जिनके लिए जीवन सदा सोद्देश्य है, आधुनिक जीवनशैली व चकाचौंध के प्रति आसक्त चरित्र भी हैं, राजनीतिज्ञों के दुश्चक्र में फंसकर सामाजिक सरोकारों के योद्धा रूप में विकसित होते-होते अपनी संभावनाओं से भटक जाने वाले व्यक्ति भी हैं तो यहां अपनी अस्मिता को तलाशती और उसके लिए जूझती ऐसी स्त्रियां भी हैं जो अंततः विद्रोह की हद तक जा सकती हैं। 
प्रस्तुत पुस्तक में कथाकार ने भाषा को किसी उलझाव में डाले बिना अत्यंत सहज-सरल भाषा-शैली में कथ्य को, परिवेश को, चरित्रों को और परिवेशगत बेचैनी व छटपटाहट को पूरी विश्वसनीयता, प्रामाणिकता तथा गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि ये कहानियां आदि से अंत तक न केवल अपने पाठकों को बांधे चलती हैं बल्कि उन्हें झकझोरने से भी नहीं चूकतीं।

Dinesh Pathak

दिनेश पाठक
जन्म: मई, 1950, कुमाऊं, उत्तराखंड में
आठवें दशक की पीढ़ी के कथाकार। सभी शीर्षस्थ पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। कुछ कहानियों का अन्य भाषाओं में अनुवाद। अब तक नौ कहानी संग्रह, दो उपन्यास व एक संपादित पुस्तक प्रकाशित
कहानी संग्रह: ‘शायद यह अंतहीन’, ‘धुंध भरा आकाश’, ‘जो गलत है’, ‘इन दिनों वे उदास हैं’, ‘रात के बाद’, ‘अपने ही लोग’, ‘पारुलदी’, ‘नस्ल’, ‘देखना एक दिन’
उपन्यास: ‘यानी अंधेरा’, ‘नाव न बांधे ऐसी ठौर’, ‘हवा है’ (शीघ्र प्रकाश्य)
संपादित पुस्तक: ‘आंचलिक कहानियां’

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