Abhi Shesh Hai

Mahip Singh

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170166399

स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास का वह एक ऐसा कालखंड था, जब निकट अतीत की व्यक्तिवादी, भ्रष्ट एवं सर्वसत्तावादी निरंकुश प्रवृत्तियाँ चरम पर पहुँच गई थीं और लोकतंत्र आधी रात को किसी भी दरवाजे पर पड़ने वाली दस्तक के आतंक से सहमा हुआ था।

उस दौर में कुछ आवाजें बिना बोले भी बहुत कुछ कह रही थीं।

...और कैसे जी रहा था देश का आम आदमी ?

...वह आम आदमीजो देश के विभाजन की भयावह स्मृतियाँ लिए द्विभाजित मानसिकता में जीने को अभिशप्त था।

...और वह आम आदमी, जो पाश्चात्य देशों को स्वर्ग मान बैठा था।

महाकाव्यात्मक आयाम लिए उस कालखंड के भारतीय समाज की कथाजिसमें इतिहास के साथ-साथ भविष्यदृष्टि भी विद्यमान है।

Mahip Singh

महीप सिंह जन्म : 15 अगस्त, 1950 जन्म-स्थान : जिला उन्नाव (उत्तर प्रदेश) शिक्षा : एम०ए० (हिंदी), डी०ए०वी० कॉलेज, कानपुर (1951), पी-एच०डी०, आगरा विश्वविद्यालय, आगरा (1963) व्यवसाय प्राध्यापक-खालसा कॉलेज, मुंबई (1955-63), श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज, दिल्ली (1963-93), विदेश अध्ययन की कन्साई यूनिवर्सिटी, हीराकाता जापान में एक वर्ष तक अतिथि प्राध्यापक (1975-76) रचनाएँ कहानी-संग्रह : 'सुबह के फूल', 'उजाले के उल्लू', 'घिराव', 'कुछ और कितना', 'कितने संबंध', 'धूप की अंगुलियों के निशान', 'सहमे हुए', 'इक्यावन कहानियाँ', 'चर्चित कहानियाँ' तथा तीन खंडों में 'समग्र कहानियाँ' । उपन्यास : 'यह भी नहीं' (हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी, पंजाबी, मलयालम में भी प्रकाशित) संपादन : 25 पुस्तकों का संपादन पुरस्कार : उ०प्र० हिंदी संस्थान पुरस्कार, भाषा विभाग (पंजाब), शिरोमणि साहित्यकार पुरस्कार, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय पुरस्कार, हिंदी अकादमी (दिल्ली) पुरस्कार, छठे हिंदी सम्मेलन (सितंबर, 1999 लंदन) में साहित्यिक सेवाओं के लिए विशिष्ट सामान स्मृति-शेष : 24 नवम्बर, 2015

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