Delhi

Khushwant Singh

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  • Year: 2013

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170161912

उपन्यास का नाम शहर के नाम से ! जी हाँ, यह दिल्ली की कहानी है। छह सौ साल पहले से लेकर आज तक की खुशवंत सिंह की अनुभवी कलम ने इतिहास के ढाँचे को अपनी रसिक कल्पना की शिराओं और मांस-मज्जा से भरा। यह शुरू होती है सन् 1265 के ग़यासुद्दीन बलबन के शासनकाल से तैमूर लंग, नादिरशाह, मीर तक़ी मीर, औरंगज़ेब, अमीर खुसरो, बहादुर शाह ज़फ़र आदि के प्रसंगों के साथ कहानी आधुनिक काल की दिल्ली तक पहुँचती है कैसे हुआ नयी दिल्ली का निर्माण ! और अंत होता है 1984 के दंगों के अवसानमय परिदृश्य में !

कहानी का नायकमुख्य वाचक हैदिल्ली को तहेदिल से चाहने वाला एक व्यभिचारी किस्म का चरित्रजिसकी प्रेयसी भागमती कोई रूपगर्विता रईसज़ादी नहींवरन् एक कुरूप हिंजड़ा है।दिल्ली और भागमती दोनों से ही  नायक को समान रूप से प्यार है। देश-विदेश के सैर-सपाटों के बाद जिस तरह वह बार-बार अपनी चहेती दिल्ली के पास लौट-लौट आता हैवैसे ही देशी-विदेशीऔरतों के साथ खाक छानने के बाद वह फिर-फिर अपनी भागमती के लिए बेकरार हो उठता है। तेल चुपड़े बालों वालीचेचक के दागों से भरे चेहरे वालीपान से पीले पड़े दाँतों वाली भागमती केवास्तविक सौंदर्य को उसके साथ बिताए अंतरंग क्षणों में ही देखा-महसूसा जा सकता है। यही बात दिल्ली के साथ भी है। भागमती और दिल्ली दोनों ही ज़ाहिलों के हाथों रौंदी जाती रहीं। भागमतीको उसके गँवार ग्राहकों ने रौंदादिल्ली को बार-बार उजाड़ा विदेशी लुटेरों और आततायियों के आक्रमणों ने। भागमती की तरह दिल्ली भी बाँझ की बाँझ ही रही     

Khushwant Singh

खुशवंत सिंह
15 अगस्त, 1915 हडाली (अब पाकिस्तान में) में जन्म ।  लाहौर से स्नातक तथा किंग्स कॉलेज, लंदन से एल-एल० बी० ।
1939 से 1947 तक लाहौर हाईकोर्ट में वकालत । विभाजन के बाद भारत की 'राजनयिक सेवा' के अंतर्गत कनाडा में 'इन्फॉर्मेशन अफसर' तथा इंग्लैंड में भारतीय उच्चायुक्त के 'प्रेस अटैची' के पद पर कार्य । कुछ वर्षों तक प्रिंस्टन तथा स्वार्थमोर विश्वविद्यालयों में अध्यापन ।
भारत लौटकर नौ वर्षों तक 'इलस्ट्रेटेड वीकली तथा तीन वर्षों त्तक 'हिन्दुस्तान टाइम्स' का संपादन । 1980 में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत ।  1974 में प्राप्त पद्मभूषण की उपाधि वा 'ऑपरेशन ब्लू स्टार ' के विरोधस्वरूप त्याग । 'हिन्दुस्तान टाइम्स', 'वीक' और 'संडे आब्जर्वर' के लिए नियमित स्तंभ लिखे  तथा 'पेंगुइन बुक्स कंपनी इंडिया' के सलाहकार संपादक के रूप में भी कार्य किया।
पैतीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित । प्रमुख हैं : ट्रेन टु पाकिस्तान ० हिस्ट्री  ऑफ सिख्स (दो खंड) ० रंजीत सिंह ०  दिल्ली ० मेरे मित्र : कुरु महिलाएँ कुछ पुरुष ० नेचर वॉच तथा कालीघाट टु कैलकटा । चार कहानी-संग्रहों तथा अनेक लेखमालाओं के अतिरिक्त उर्दू और पंजाबी से कई अनुवाद भी ।
स्मृति-शेष : 20 मार्च, 2014

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