Manushkhor

Ganga Prasad Vimal

Availability: In stock

Seller: KGPBOOKS

Qty:
595.00 476 + Free Shipping


  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789382114215

मानुषखोर इतिहास के रास्ते मनुष्य के भविष्य की एक ऐसी यात्रा है जिसे समझदार लोग सभ्यताओं की टकराहट से जोड़ेंगे परंतु आदमी की छोटी-छोटी ज़रूरतों पर जैसे किसी दूसरी ही ताकतका कब्ज़ा है। इतिहास में उसे पराशक्ति कहकर आदमी के अशक्त और अकेले होने को दुर्निवार ठहराया गया था। हमारे वर्तमान में हम उसे राजनीतिक चालों की गाथा में टोहते हैं। अब धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा है कि कोई दुष्चक्र है जो दुनिया के ज्यादातर लोगों को दारुण स्थितियों में जीने के लिए विवश करता

मानुषखोर इस लिहाज से एक सीधी-सादी कथा है पर अपनी बुनावट में वह उन जटिलताओं को व्यक्त करने से परहेज़ नहीं करती जिनकी वजह से सत्ताएं आदमी को बांटने, उसे तोड़ने तोड़ने के अपने अदृश्य अभियान में लगी रहती हैं।

क्या हमारा वर्तमान सचमुच नरभक्षियों से पटा पड़ा है? राजनीतिक वर्चस्व मानुषखोर है। तमाम तरह की विनाशलीलाओं के लिए किसी दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराकर अपनी भूमिकाओं से पल्ला झाड़ने वाली यह नई सांस्कृतिक बिरादरी किस तरह से पर्यावरण को क्षत-विक्षत कर समूची पीढ़ियों को मनोरुग्णता के धार्मिक धड़ों में शामिल होने के लिए मजबूर कर रही है?

इतिहासपुराकथाएंलोकचर्याएं काल्पनिक लगने लगी हैं-सभ्यता के नए संतरण की दहलीज पर मानुषखोर अवतरित हो रहा है...

Ganga Prasad Vimal

गंगाप्रसाद विमल हिमालय के एक छोटे-से कस्बे में, 1939 में जन्मे गंगाप्रसाद विमल ने अनेक विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाई । एक-चौथाई शताब्दी अध्यापन करने के बाद वे 1989 में भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक नियुक्त किए गए । साथ ही साथ उन्होंने सिंधी भाषा की राष्ट्रीय परिषद और उर्दू भाषा की राष्ट्रीय परिषदों का काम भी संभाला । विश्व की अनेक भाषाओं में उनकी कहानियों के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं । 'न्यूडायमेंशंस', 'मेडिटिरेनियन रिव्यू', 'वैस्टर्न ह्यूमेनिटीज रिव्यू', 'द न्यू रेनेंया', 'क्वैरी', ‘प्रिन्य इंटरनेशनल', 'इस्टर्न होराइ्जन' आदि विश्वप्रसिद्ध पत्रिकाओं में उनकी कहानियों का प्रकाशन हुआ है । लंदन के फॉरेस्ट बुक्स ने उनकी कविताओं और कहानियों का एक बृहद संकलन कुछ वर्ष पहले प्रकाशित किया था । अब तक हिंदी में उनके ग्यारह कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए हैं । इसके साथ ही चार उपन्यास तथा सात कविता-संग्रह व विश्व की अनेक कृतियों की उनके द्वारा अनुदीत पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं । हाल ही से उनके उपन्यास 'मृगान्तक' पर एक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म "बोक्षु : द मिथ' का निर्माण हुआ है, जिसका प्रदर्शन अंतर्राष्टीय फिल्म महोत्सव में किया गया। अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत गंगाप्रसाद विमल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर-पद से सेवामुक्त होकर लेखन में सक्रिय है ।

Scroll