Polywood Ki Apsara

Girish Pankaj

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  • Year: 2008

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Arya Prakashan Mandal

  • ISBN No: 9788189982096

पॉलिवुड की अप्सरा
"पॉलीवुड की अप्सरा' उत्तर-आधुनिक मनुष्य के मोहभंग की तथा-कथा है, जिसमें गिरीश पंकज विशुद्ध व्यंग्यकार सिद्ध होते है । (जहाँ हास्य का हाशिए पर भी जगह नहीं है) तात्पर्य यह है कि इस उपन्यास में व्यंग्यकार ने  यथार्थ का पल्ला कहीं भी नहीं छोडा है, जिससे यह समझने में आसानी होती है कि व्यंग्य-लेखन ही सच्चा लेखन हो सकता है। जिस प्रकार 'हॉलीवुड' के सादृश्य पर 'बॉलीबुड' रखा गया, उसी प्रकार 'बॉलीबुड' कै सादृश्य पर 'पॉलीवुड' बना । 'पॉलीवुड की अप्सरा' भी बॉलीवुड की समांतर भूमि में अपने रूप, रस, गंध और स्पर्श के साथ प्रतिष्ठित है  ।
शेक्सपियर ने कभी कहा था कि नास में क्या रखा है, परंतु इस उपन्यास में सार नाम इसीलिए सोद्देश्य एवं सार्थक हैं कि नाम सुनते या पढ़ते ही उनका 'चरित्तर' मूर्त हो उठता  है ।
'अप्सरा' अपने जन्म से ही अभिशप्त रही है, जिस ‘स्वर्वेश्या' भी कहा गया है । बॉलीबुड की अप्सरा बनने का पावती का सपना अंत तक पूरा सच नहीं हो पाता । यह त्रासदी 'अप्सरा' में व्यंजित तथाकथित आभिजात्य की निस्सास्ता से और भी सटीक हो गई है, जो परी में नहीं है । 'पार्वती' का 'पैरी' में  रूपांतरण एक ऐसी चेतावनी है, जिससे वर्त्तमान एवं भावी पीढ़ी झूठी महत्वाकांक्षा की आग में न कूदे । दार्शनिक शब्दावली में कहें तो जो कुछ दिख रहा है, यह सब माया है, छलावा  है । लगता है, समकालीन परिस्थितियों ने ही कबीर जैसे युगचेता का 'आखिन देखी ' कहने के लिए विवश किया ।
इस कृति में उत्तर-आधुनिक मनुष्य और उसकी क्रीत-कुँठा सफल व्यंग्यकार गिरीश पंकज की सारग्रही सूक्ष्म-दूष्टि से उजागर होकर एक ही निष्कर्ष पर पहुंचती है कि मनुष्य की सफलता मनुष्यता का पाने में है, खोने में नहीं ।

Girish Pankaj

गिरीश पंकज 
जन्म : 1 जनवरी 1957
शिक्षा : एम०ए० (हिंदी), बी० जे० (प्रावीण्य सूची में प्रथम), डिप्लोमा इन फोक आर्ट ।
प्रकाशन : छड व्यंग्य-संग्रड : ‘ट्यूशन शरणम् गच्छामि', 'भ्रष्टाचार विकास प्राधिकरण', 'ईमानदारों की तलाश', 'मंत्री को जुकाम', 'मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ', 'नेताजी बाथरूम में' । दो व्यंग्य उपन्यास : 'मिठलबरा की  आत्मकथा' एवं 'माफिया' (दोनों पुरस्कृत), नवसाक्षरों के  लिए बारह पुस्तकें, बच्चों के लिए चार पुस्तकें । एक गजल-संग्रह, एक हास्य चालीसा। चार व्यंग्य-संग्रहों में  रचनाएं संकलित । अनुवाद : कुछ रचनाओं का तमिल, उर्दू  कन्नड़, अँगरेजी, नेपाली, सिंधी, मराठी, पंजाबी, छत्तीसगढ़ी आदि में अनुवाद ।
सम्मान-पुरस्कार : व्यंग्य का बहुचर्चित अट्टहास युवा सम्मान । 'माफिया' के लिए लीलारानी स्मृति सम्मान एवं 'मिठलबरा की आत्मकथा' के लिए रत्नभरती सम्मान । तीस से ज्यादा संस्थाओं द्वारा सम्मान-पुरस्कार ।
विदेश प्रवास : अमेरिका, ब्रिटेन, त्रिनिडाड एंड टुबैगो, थाईलैंड, मॉरीशस, श्रीलंका, नेपाल, बहरीन, मस्कट । कार्यानुभव : तीस साल से विभिन्न समाचार-पत्रों के   संपादकीय विमाग में कार्य । अनेक पुरस्कार से सम्मानित । अनुवाद पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' का प्रकाशन-संपादन ।
अन्य : प्रदेश सचिव-सर्वोदय मंइल, अध्यक्ष-छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, सदस्य-छत्तीसगढ़ बाल कल्याण परिषद समेत अनेक संस्थाओं से संबद्ध । व्यंग्य रचनाओं पर चार छात्रों द्वारा लघु शोधकार्य । पत्रिका साहित्य वैभव, रायपुर द्वारा 'पचास के गिरीश' नामक वृहद विशेषांक प्रकाशित । पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर व्यंग्य एवं सामयिक मुद्दो पर लेखन ।

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