Vishaad Math

Rangey Raghav

Availability: In stock

Seller: KGPBOOKS

Qty:
300.00 255 + Free Shipping


  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170166092

जब मुगलों का राज्य समाप्त होने पर आया था तब बंगाल की हरी-भरी धरती पर अकाल पड़ा था। उस समय बंकिमचंद्र चटर्जी नेआनंद मठ' लिखा था। जब अँगरेजों का राज्य समाप्त होने पर आया तब फिर बंगाल की हरी-भरी धरती पर अकाल पड़ा। उसका वर्णन करते हुए मैंने इसीलिए इस पुस्तक कोविषाद मठ' नाम दिया।

प्रस्तुत उपन्यास तत्कालीन जनता का सच्चा इतिहास है। इसमें एक भी अत्युक्ति नहींकहीं भी जबर्दस्ती अकाल की भीषणता को गढ़ने के लिए कोई मनगढंत कहानी नहीं। जो कुछ हैयदिसामान्य रूप से दिमाग मेंबहुत अमानुषिक होने के कारणआसानी से नहीं बैठतातब भी अविश्वास की निर्बलता दिखाकर ही इतिहास को भी तो फुसलाया नहीं जा सकता।

विषाद मठहमारे भारतीय साहित्य की महान् परंपरा की एक छोटी-सी कड़ी है। जीवन अपार हैअपार वेदना भी हैकिंतु यह शृंखला भी अपना स्थायी महत्त्व रखती है।

-रांगेय राघव


Rangey Raghav

रांगेय राघव 17 जनवरी, 1923 को जन्म आगरा में । मूल नाम टी०एन०बी० आचार्य (तिरुमल्लै नम्बाकम् वीर राघव आचार्य) । कुल से दाक्षिणात्य, लेकिन ढाई शतक से पूर्वज वैर (भरतपुर) के निवासी और वैर, बारौली गांवों के जागीरदार । शिक्षा आगरा में । सेंट जॉन्स कॉलेज से 1944 में स्नातकोत्तर और 1948 में आगरा विश्वविधालय से गुरू गोरखनाथ पर पी-एच०डी० । हिंदी, अंग्रेजी, ब्रज और संस्कृत पर असाधारण अधिकार । 13 वर्ष की आयु में लेखनारंभ । 23-24 वर्ष की आयु में ही अभूतपूर्व चर्चा के विषय । 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद लिखे रिपोर्ताज 'तूफानों के बीच' से चर्चित। साहित्य के अतिरिक्त चित्रकला, संगीत और पुरातत्त्व में विशेष रुचि थी । साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में सिद्धहस्त थे । मात्र 39 वर्ष की आयु से कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, सभ्यता और संस्कृति पर शोध व व्याख्या के क्षेत्रों को 150 से भी अधिक पुस्तकों से समृद्ध किया । अपनी अद्भुत प्रतिभा, असाधारण ज्ञान और लेखन-क्षमता के लिए सर्वमान्य अद्वितीय लेखक थे। संस्कृत रचनाओं का हिंदी, अंग्रेजी में अनुवाद। विदेशी साहित्य का हिंदी में अनुवाद । 7 मई, 1956 को सुलोचना जी से विवाह। 8 फरवरी, 1960 को पुत्री सीमन्तिनी का जन्म। अधिकांश जीवन आगरा, वैर और जयपुर में व्यतीत । आजीवन स्वतंत्र लेखन । हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार (1951), डालमिया पुरस्कार (1954), उत्तर प्रदेश सरकार पुरस्कार (1957 व 1959), राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) तथा मरणोंपराते (1966) महात्पा गांधी पुरस्कार से सम्मानित । विभिन्न कृतियाँ अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित और प्रशंसित । लंबी बीमारी के बाद 12 सितंबर, 1962 को मुंबई में देहांत ।

Scroll