Abhang-Gaatha

Narendra Mohan

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Jagat Ram & Sons

  • ISBN No: 978-81-88125-79-1

‘खोए हुए शब्द को, अभंग को, सृजनशक्ति को पुनः पाने की तुकाराम की बेचैनी अभूतपूर्व है जो उसे हर युग के कवि की बेचैनी के मिथक के रूप में खड़ा कर देती है। शब्द, सृजन और जिंदगी उनके लिए अलग-थलक नहीं, एक ही हैं। शब्द की इस कैफियत के साथ तुकाराम का मुझ तक पहुंचना एक कवि के एक नए पाठ के खुलने के बराबर है जिसके लिए एक क्या, कई नाटक लिखे जा सकते हैं।’
ये शब्द हैं डाॅ नरेन्द्र मोहन के जिन्होंने अभंग-गाथा नाटक में तुकाराम की जिंदगी और अभंग-रचना को आज के दहकते हुए संदर्भों से जोड़ दिया है। नाटक के निर्देशक सतीश दवे ने अपने वक्तव्य में ठीक ही कहा है ‘पहली बार जब मैंने अभंग-गाथा का नाट्य आलेख उनसे सुना तो मुझे महसूस हुआ जैसे तुकाराम का मानवीय व्यक्तित्व कई दृश्यों की श्रृंखला में मेरे सामने मूर्तिमान हो गया हो और एक साथ कई रूपाकारों ने मुझे घेर लिया हो। मुझे लगा तुकाराम अपने युग से बाहर आकर मेरे सामने आ खड़े हुए हों और उस वक्त की परिस्थिति, समय और इतिहास मेरी परिस्थिति, समय और इतिहास से जुड़ने-टकराने लगा हो।’
अभंग-गाथा में शब्द और रंग साथ-साथ हैं। एक-दूसरे को प्रकाशित-स्पंदित करते हुए। इस नाटक को खेलना, इसीलिए, रंगकर्म का एक सांझा अनुभव बनता गया है। अभंग को यहां रंग-संगीत शैली का हिस्सा ही बना दिया गया है और यह शैली नाटक के भीतरी रंग-संयोजनों से मिलकर ही मंच पर आई है। 

Narendra Mohan

डॉ. नरेन्द्र मोहन कवि, नाटककार और आलोचक के रूप में सुविख्यात नरेन्द्र मोहन का जन्म 30 जुलाई, 1935 को लाहौर (अब पाकिस्तान) में हुआ । अपनी कविताओं (कविता-संग्रह) इस हादसे में (1975), सामना होने पर (1979), एक अग्निकांड जगहें बदलता (1983), हथेली पर अंगारे की तरह (1990), संकट दृश्य का नहीं (1993), एक सुलगती ख़ामोशी (1997), एक खिड़की खुली है अभी (2005), नीले घोड़े का सवार (2008), रंग आकाश में शब्द (2012) द्वारा वे नए अंदाज़ में कविता की परिकल्पना करते रहे हैं तथा नई संवेदना और प्रश्नाकुलता को विकसित करने में उनकी खास भूमिका रही है । अपने नाटकों : कहै कबीर सुनो भाई साधो (1988), सींगधारी (1988), कलंदर (1991), नौ मैंस लैंड (1994), अभंगगाथा (2000), मि० जिन्ना (2005), हद हो गई, यारो (2005), मंच अंधेरे में (2010) में वे हर बार नई वस्तु और दृष्टि को तलाश करते दिखते है । नई रंगत मेँ ढली उनकी डायरी साथ-साथ मेरा साया ने इस विधा को नए मायने दिए हैं । इसी क्रम से आई हैं - साये से डायरी (2010) और फ्रेम से बाहर आती तस्वीरें (संस्मरण 2010) । नरेन्द्र मोहन ने अपनी आलोचना पुस्तकों और संपादन-कार्यों द्वारा जो विमर्श खड़े किए है, उनके द्वारा सृजन और चिंतन के नए आधारों की खोज संभव हुई है । लंबी कविता का विमर्श उन्हीं की देन है । विभाजनं : भारतीय भाषाओं की कहानियां खंड एक व दो और मंटो की कहानियां उनकी संपादन प्रतिभा के परिचायक हैं । आठ खंडों में नरेंद्र मोहन रचनावली प्रकाशित हो चुकी है । उनके नाटक और कविताएं विभिन्न भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में भी अनुदित हो चुकी हैं । वे कई राष्ट्रीय और प्रादेशिक पुरस्कारों से सम्मानित साहित्यकार हैं ।

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