Jansampark : Avadharana Evam Badalata Svaroop

Kri. Shi. Mehta

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-80146-09-6

जनसंपर्क, जनसंचार का एक ऐसा घटक है जो एक ओर तो जनसंचार को जीवंत रखता है, वहीं दूसरी ओर उसके प्रभाव अथवा परिणाम के संबंध में विषय विशेषज्ञ भी कोई निश्चित दावा नहीं कर सकते। उसके इस अनिश्चित चरित्र का प्रमुख कारण जनसंपर्क के भागीदार त्रिमूर्ति के बीच विचित्र संगम, समन्वय एवं संप्रेक्षण के अभाव में निहित है। जनसंपर्क वह सूत्र है जो इस त्रिमूर्ति-यानी संदेश, माध्यम तथा हितग्राही को सक्रिय करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह करता है। आज तक किसी ऐसे नियम या मंत्र की खोज नहीं हो पाई है जो जनसंपर्क के प्रभाव ओर उसके परिणाम की सफलता अथवा असफलता का पूर्वानुमान लगा सके।
जनसंपर्क निरंतर प्रवाहित होने वाली ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर उस देश की भौगोलिक संरचना, ऐतिहासिक परंपरा, संस्कृति, स्थानीय बोलियां एवं भाषा, सामाजिक एवं धार्मिक आचार-विचार, स्थानीय मान्यताओं इत्यादि अनेक बातों तथा घटनाओं का प्रभाव उस परिवेश की त्रिमूर्ति पर निरंतर प्रतिबिंबित होता रहता है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से यह जनसंपर्क के अनिश्चित चरित्र के कारण हो सकते हैं।
आज एक ओर मीडिया के आधुनिक उपकरणों ने अनायास ही जनसंपर्क के सर्वथा नए द्वार खोल दिए हैं और भविष्य में भी ऐसे अनेक द्वार खुलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, वहीं दूसरी ओर भारत की तेजी से बढ़ती हुई आर्थिक एवं औद्योगिक प्रगति के साथ शैक्षणिक विकास ने हितग्राहियों की रुचि, सामाजिक जीवन एवं संस्कृति के क्षेत्र में उथल-पुथल मचा रखी है।

Kri. Shi. Mehta

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