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423

  • grid
  • Afrika Road Tatha Anya Kahaniyan
    300 270

    Item Code: #KGP-610

    Availability: In stock

    अफ्रीका रोड तथा अन्य कहानियां 
    अफ्रीकी देशों से प्रवास के दौरान, फिर लंदन में अफ्रीकी लेखकों और उनकी कहानियों से रूबरू होती रही, पड़ती रही । वे इतनी क्यों कि दिल हुआ वे हिंदी पाठकों तक पहुंचें । रास्ता था अनुवाद । और अनुवाद में आसानी इसलिए हुई कि लगभग सभी कहानियां मूल अंग्रेजी में ही लिखी गई है ।
    -उर्मिता जैन
  • Vishay Purush
    Mastram Kapoor
    100 90

    Item Code: #KGP-2045

    Availability: In stock

    विषय-पुरुष 
    स्त्री और पुरुष दोनो स्वतंत्रचेता व्यक्ति होने के नाते कभी विषयी के रूप ने काम करते हैं तो कभी विषय बनते हैं । किसी से प्यार करते समय है विषयी होते है और प्यार किए जाने की चाह में वे विषय बनते हैं । किंतु विषयी अथवा विषय बनना उनकी स्वतंत्र चेतना का अधिकार हैं । भय या प्रलोभन से किसी पर यह भूमिका लादना अनैतिक ही नहीं, अश्लील भी है । दुर्भाग्य से मानव-समाज ने स्त्री को हमेशा विषय के रूप ने ही स्वीकार किया, उसे विषयी बनने के अधिकार से वंचित रखा और यह काम पुरुष-समाज ने किया भय और प्रलोभन दिखाकर जिसने धर्म का भय और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रलोभन भी शामिल है ।
    स्त्री-स्वतंत्रता के दमन की पुरुष-प्रवृति की प्रतिक्रिया ने लिखा गया यह उपन्यास सशक्त कहानी के साथ-साथ एक वैचारिक प्रयोग भी है । हमेशा विषयी की भूमिका निभाने वाले को (अथवा इसका वा करने वाले को) जब विषय बनना पाता है तो उसको क्या दशा होती है, यही इस उपन्यास का विषय है ।
  • Kama Sutra (Paperback)
    Vatsyayana
    99

    Item Code: #KGP-1100

    Availability: In stock

    It is one of the three goals of Hindu life. It is what the west called ‘erotica’. It is the one we consider sacred. It is Kama. And this is its manual—The Kama Sutra.
    A compilation of seven books, starting with the description of general principles of mortal life that Brahma laid down when he created men and women—dharma (fulfillment of duty), artha (accumulation of wealth), and kama (pleasurable experience of the five senses, to moving forward about the ‘right’ way of life where it talks about many issues including the behaviour and actions during copulation between a man and a woman. A 4th century guide to a virtuous and gracious living, still valid in the 21 century and beyond.    
    Vatsyayana unbashingly talks scientifically and spiritually about what is a taboo today, and emphasises that this book is a must for both men and women. It lays more stress on the fact that women, especially, should be knowledgeable in the arts complimentary to Kama Sutra
    The physical beauty of Khajuraho is the manifestation of the beauty trapped in this book, which the west unknowingly calls the ‘manual of sex’. 
    Discover the knowledge of the gods translated for the mortals by the mortals.
  • Aakhet
    Jagdish Godbole
    125 113

    Item Code: #KGP-9072

    Availability: In stock


  • Teesara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    50

    Item Code: #KGP-7051

    Availability: In stock

    ग़ज़ल शतकों में सम्मिलित कवि
    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उदयप्रताप सिंह ०  कुमार शिव ०  गोपालदास ‘नीरज’ ०   चिरंजीत ०  ज़हीर कुरैशी ०  ज्ञानप्रकाश विवेक ०  त्रिलोचन ०  दुष्यंत कुमार ०  देवेंद्र माँझी ०  प्रमोद तिवारी ०  बलबीर सिंह ‘रंग’ ०  बालस्वरूप राही ० भवानी शंकर ०  मासूम ग़ाज़ियाबादी ०  मृदुला अरुण ०  राजनारायण बिसारिया ०   रामकुमार कृषक ०  रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’ ०  रामदरश मिश्र ०  रामावतार त्यागी ०  शलभ श्रीराम सिंह ०  शिव ओम ‘अंबर’ ०  शेरजंग गर्ग ०  सुरेंद्र श्लेष ०  सूर्यभानु गुप्त।
    दूसरा ग़ज़ल शतक
    अशोक वर्मा ०  आचार्य सारथी ०  उपेन्द्र कुमार ०  उर्मिलेश ०  ओमप्रकाश चतुर्वेदी ‘पराग’ ०  कमल किशोर ‘भावुक’ ०  कमलेश भट्ट ‘कमल’ ०  कुँअर बेचैन ०  ज्योति शेखर ०   नरेन्द्र वसिष्ठ ०  पुरुषोत्तम ‘वज्र’ ०  प्रभात शंकर ०  महेश जोशी ०  योगेन्द्र दत्त शर्मा ०  रंजना अग्रवाल ०  रामनारायण स्वामी ०  रामनिवास ‘मानव’ ०  लक्ष्मण ०   विजय किशोर ‘मानव’ ०  विनीता गुप्ता ०  शिवबहादुर सिंह भदौरिया ०  श्रवण राही ०  सरोज व्यास ०  हरजीत ०   हरिओम।
  • Toro Kara Toro-2 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-513

    Availability: In stock


  • Debt-Free-Forever (Paperback)
    Gail Vax-Oxlade
    245

    Item Code: #KGP-344

    Availability: In stock

    Imagine waking up in the morning and knowing that no matter what happens today, you can cope. Imagine that you’ve got enough money to take care of the expenses that need to be paid regularly and to have some fun too. Imagine the sense of peace that comes from knowing you’re in control of your life.
    If you’ve been frantically trying to cover your butt because there just never seems to be enough money, I can help you. If you’re up to your eyeballs in debt and can’t even imagine being debt-free, I can help you. If you’re at your wits’ end because you’ve made a huge mess and don’t have a clue how to fix it, I can help you.
    —from the book
    FIGURE OUT WHERE YOU STAND MAKE A PLAN CHANGE YOUR HABITS PREPARE FOR THE FUTURE STAY THE COURSE
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramesh Bakshi
    Ramesh Bakshi
    200 180

    Item Code: #KGP-66

    Availability: In stock

    हिंदी के विवादास्पद एवं विख्यात कथाकार रमेश बक्षी की दस प्रतिनिधि कहानियों का यह संचयन कथाकार की उस दुनिया का साक्ष्य भी है, जिससे पैठकर वह असंभव कथ्यों को पाठक वर्ग के समक्ष उदघाटित एवं प्रकाशित करता है । आत्मबोध से उपजी इन कहानियों से लेखक का जो आत्मज्ञान झसता है, वह समकालीन स्त्री-पुरुष संबंधों के संसार को नई परिभाषा, व्याख्या और नैतिकता में रूपायित करने का समुन्नत कथा-उपक्रम है, जिसे सम्यक अर्थों में हम प्रगतिशील कथाक्रम के वर्ग से रख सकते हैं ।
    ये कहानियाँ किसी विरक्त, त्यागी या सन्यासी व्यक्तित्व के विषयमुक्त होने के कथा-चित्र, नहीं है, बल्कि संबंधों के बीच पनपते उपद्रवों का सामना करते चरित्रों की सच्चाइयां है । समकालीन समाज ने अपने जीने के लिए जिस परिवेश की सृष्टि कर ली है, उसमें क्या ठोस है, क्या खोखला तथा क्या मान्य और क्या त्याज्य है-इन विषयों पर बेधक संकेत और संदेश इन कहानियों के मूल में समाहित और प्रवाहित हैं ।
    रमेश बक्षी की सजग कथाकार-दृष्टि को समेटे जिन दस कहानियों को यहीं प्रस्तुत किया जा रहा है, वे हैं- 'मेज़ पर टिकी हुई कुहनियाँ', 'जिनके स्थान ढहते हैं....', 'एक अमूर्त तकसीफ', 'राख', 'खाली', 'आम-नीम-बरगद', 'पैरोडी', 'थर्मस  में कैद कुनकुना पानी', 'अगले मुहर्रम की तैयारी' और 'उतर' । संकलन के प्रस्तोता डॉ. बलदेव वंशी ने अपने इस समकालीन लेखक की कहानियों पर विस्तृत एवं आत्मीय टिप्पणी भी प्रस्तुत की है ।
    आशा है हिंदी कथा-जगत का संवेदनशील पाठक-समाज अपने समय के इस महत्त्वपूर्ण कथाकार को किताबघर प्रकाशन की महत्त्वाकांक्षी  कथा-श्रृंखला 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' की एक कड़ी के रूप में पाकर निश्चय ही संतुष्ट होगा ।
  • Million Dollar Not Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    60

    Item Code: #KGP-1419

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात है ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Kavi Ne Kaha : Viren Dangwal
    Viren Dangwal
    190 171

    Item Code: #KGP-387

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : वीरेन डंगवाल
    वैश्वीकरण भाषाओं, संस्कृतियों और कविता का शत्रु है। उसका स्वप्न एक ऐसी मनुष्यता है जो उसी गांव में बसती है, उसी तरह रहती-सोचती- पहनती, हाव-भाव रचती और खाती-पीती है । एक रासायनिक संस्कृति-बोध से लैस इस वैश्विक  मनुष्यता का आदर्श भी अंतर्राष्ट्रीयवाद है मगर अपने मूल मानवीय अर्थ के बिलकुल उलटे अर्थ में। यह वैश्विक मनुष्य तो पारंपरिक संस्कृतियों और ज्ञान को नष्ट करने वाला और अधिनायकवादी है जो केवल बाजार और उपभोग को मान्यता देता है । यह बहुत पूंजी के प्रचंड विचार का वाहक और यथास्थिति का घनघोर पोषक है । जीवन की अनुकृति बनने वाली कविता उसे रास नहीं आती। वह तो सारे जीवन को अपनी अनुकृति बना देना चाहता है । कविता अगर हमारे समय में पाठकों का रोना रो रही है तो उसकी एक बडी वजह भी बाजार और उपभोग का सारथी वही वैश्विक मनुष्य है ।

  • Devdas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    180 162

    Item Code: #KGP-79

    Availability: In stock


  • Pratiraksha Aur Saamrik Neeti
    Narendra Mohan
    495 446

    Item Code: #KGP-899

    Availability: In stock

    प्रतिरक्षा व सामरिक नीति
    भारत आज एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है । भारत की मंशा अपनी परमाणु शक्ति  उपयोग शांतिपूर्ण कार्यों व आत्मरक्षा के लिए है । किसी भी देश की प्रतिरक्षा व सामरिक नीति वर्तमान और भावी खतरों के आयामों के निरंतर विश्लेषण पर आधारित होती है और भारत को भी इन्हीं आधारों को दृष्टिगत रखते हुए अपने को तैयार रखना होगा । निश्चित रूप से भारत के समक्ष पग-पग पर चुनौतियाँ हैं, लेकिन अपनी संकल्पशक्ति से विद्यमान  सभी चुनौतियों का सामना दृढ़ता व आत्मविश्वास से करेंगे । 
    –अटल बिहारी वाजपेयी 

  • Pustak Sameeksha Ka Paridrishya
    Vishwanath Prasad Tiwari
    120 108

    Item Code: #KGP-1476

    Availability: In stock

    हिंदी पुस्तकों की समीक्षा पर एकाग्र प्रस्तुत चयन में इस विषय के अनेक आयामों के संस्पर्श और आस्वाद का गहरा अनुभव मिलता है। यह अनुभव पाठक-लेखक, समीक्षक-प्रकाशक और संपादक को समांतर रूप से इसलिए छूता है, क्योंकि पुस्तक-समीक्षा के संसार में ये सब निकटतम और घनिष्ठतम ‘पड़ोसी’ हैं। भावनात्मक और सक्रियात्मक दोनों ही रूप में अभिन्न। पुस्तक-समीक्षा का आधुनिक परिदृश्य एक सत बहस और पूछताछ से आच्छादित है और संभवतः इसीलिए यह विषय साहित्य के हाशिए पर रहने वाला विमर्श न रहकर अब केंद्र में आ गया है।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा संचालित वार्षिक ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के वर्ष 2005 के आयोजन में पुस्तक समीक्षा की स्थिति की गहराई से पड़ताल करने के उपक्रम में अनेक गंभीर एवं कतिपय रोचक कथ्य-तथ्य सामने आए। कुल मिलाकर उक्त विषयक स्थिति को चिंतामयी ही चिन्हित किया गया। साथ ही, यह विचार भी सामने आए कि पुस्तक के प्रकाशन के उपरांत होने वाले इस सर्वप्रथम संस्कार (समीक्षा) की पवित्रता को कैसे पुनस्र्थापना मिले तथा इसके भावी रूप-स्वरूप को किस प्रकार मिल आकार और आकृति। इन आलेखों में पाठक पाएंगे कि पुस्तक का समीक्षात्मक परिचय ही पाठक के मनोभाव में विश्वसनीयता जगा सकता है।
    संभवतः हिंदी की यह अकेली और पहली ऐसी पुस्तक है, जिसका विषय किताब के जीवन से सीधे जुड़ा हैं। अर्थात् किताब की चिंता में तल्लीस एवं एक किताब। मुद्रित शब्द पर आए-छाए संकटों के बीच विश्वसनीय पुस्तक-समीक्षा ही एक ऐसा अस्त्र हो सकता है, जिसके सहारे शब्दों के सार्वजनिक प्रहरी सीना तानकर, दृश्यलिप्त दुनिया को यह दिखा सकते हैं कि अंततः शब्द ही ब्रह्म है।
  • Aids : Tathya Evam Bhrantiyan
    Shuk Deo Prasad
    100 90

    Item Code: #KGP-9144

    Availability: In stock

    एड्स कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है कि रोगी का पारिवारिक या कि सामाजिक बहिष्कार किया जाय जैसा कि पहले कुष्ठ रोगियों प्रति किया जाता था। वैसे कुष्ठ भी अब असाध्य नहीं रहा। इस सामाजिक नजरिए में बदलाव की जरूरत है। एड्स रोगी को घृणा नहीं आपका स्नेह चाहिए। एक साथ रहने, उठने-बैठने, भोजन करने, सामूहिक स्नान गृह/शौचालय में जाने, वस्त्रों के संप्रयोग से एड्स नहीं फैलता और न ही एक दफ्तर में साथ काम करने से या कि भीड़ भरे स्थानों में, रेल-बस में साथ-साथ सफल करने से। अतः आप एच.आई.वी. संक्रमित/एड्स ग्रस्त व्यक्ति के साथ सहभागिता कर सकते हैं। ऐसी सामाजिकता से उसकी अपनी जिंदगी के प्रति रुझान बढ़ जाएगी।
    एड्स के अधिकांश मामले यौन संसर्ग के देखे गए हैं। फिर दूषित रक्ताधान, साझे ब्लेडों, सुइयों/सिरिंजों के इस्तेमाल से भी संक्रमण होता है अर्थात् शारीरिक द्रव, यौनिक द्रव इसके प्रसार के कारण हें। इन बातों को ध्यान में रखकर और इनसे परहेज करके आप रोगी के साथ मजे से गुजर-बसर कर सकते हैं। एड्स के बारे में बहुत सी भ्रांत धारणाएं समाज में व्याप्त हैं। उन भ्रांतियों का निवारण और तथ्यों की सटीक जानकारी देना ही पुस्तक का मंतव्य है। एड्स के प्रति आम आदमी की भाषा में जागरूकता जगाने के ही उद्देश्य से पुस्तक लिखी गई है।
  • Bhaasha Vigyan Pravesh (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    50

    Item Code: #KGP-998

    Availability: In stock

    यदि यह कहा जाए कि सच्चे अर्थों में भाषाविज्ञान का प्रारंभ भारत में हुआ तो अत्युक्ति न होगी, किंतु आधुनिक काल में अपने देश में इसके प्रति रुचि बहुत बाद में जगी और वह भी यूरोपीय प्रभाव ओर प्रेरणा के फलस्वरूप। यह प्रसन्नता की बात है कि इधर लगभग तीन-चार दशकों से यह विषय यहां काफी लोकप्रिय हुआ है और होता जा रहा है।
    हिंदी में उच्चतम कक्षा के उपयुक्त इस विषय की कुछ पुस्तकें तो हैं किंतु ऐसी कोई प्रारंभिक पुस्तक नहीं थी जो इस विषय में रुचि रखने वाले सामान्य लोगों तथा विषय की प्रारंभिक जानकारी चाहने वाले छोटी या बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों आदि के लिए उपयोगी हो। इसी कमी की पूर्ति की दिशा में यह एक प्रयास है। 
    इस संस्करण में कुछ नई सामग्री भी जोड़ दी गई है तथा शेष का संशोधन कर दिया गया है, जिसके कारण यह पुस्तिका अधिक उपयोगी हो गई है।
    —भोलानाथ तिवारी
  • Kashmir : Raat Ke Baad
    Kamleshwar
    250 225

    Item Code: #KGP-843

    Availability: In stock

    कश्मीर : रात के बाद
    हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर का कश्मीर से बहुत गहरा लगाव था । 'कश्मीर : रात के बाद' में लेखक के इस गहरे कश्मीरी लगाव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । एक गल्पकार की नक्काशी, एक पत्रकार की निर्भीकता, एक चेतस इतिहास-द्रष्टा की पैनी नज़र तथा इन सबके मूल में जन सामान्य से प्रतिश्रुत मानवीय सरोकारों से लैस यह यात्रा-वृत्तांत लेखक कमलेश्वर का एक और अप्रतिम योगदान है ।
    'कश्मीर : रात के बाद' संभवत: हिंदी में पहला ऐसा मानक प्रयास भी है जो कैमरा और कलम को एक साथ इस अंदाज़ से प्रस्तुत करता है ताकि दोनों की अस्मिता पूर्णतः मुक्त भी रहे । शायद इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा-रिपोर्ताज में कश्मीर के बर्फीले तूफानों और चट्टानों के खिसकी का शाब्दिक 'रोमांच' मात्र नहीं है बल्कि यहाँ है-इतिहास और धर्म (युद्ध) को अपनी एकल परिभाषा देने के मंसूबों को तर्क  और विवेक के बल पर ध्वस्त कर सको की सहमतिजन्य प्रतिभा । कश्मीर की राजनीति में, बल्कि कहे कि अराजक 'अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिज्' में यह लेखक मात्र पत्रकार का तटस्थ और निष्फल बाना धारण करके प्रवेश नहीं करता बल्कि वह एक ऐसे सच्चे और खरे इंसान के रूप में हस्तक्षेप करता है जो भारतीयता को जानता है और कश्मीरियत को पहचानता है । वह प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य-पाशा में बँधा, प्रकृति के अप्रत्याशित रौद्र रूप को, जान की बाजी लगाकर देखता है, तो वह आतंकवादियों के विष-की ठिकानों को भी अपने कलम और कैमरे के माध्यम से उदघाटित करता है । वास्तव में यही साहस इस यात्रा-वृतांत को अविस्मरणीयता सौंपता है ।
    इस पुस्तक में कश्मीर की कुछ खंडित यात्राएँ भी हैं जिनमें जन सामान्य के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को शब्द-दर-शब्द पढ़ा और महसूस किया जा सकता है । परवर्ती यात्रा के रूप में कमलेश्वर ने सुलगते कश्मीर की उस झुलसन को शब्द दिए है, जिसे तमाम तकनीकी विकास के बाबजूद कैमरा पकड नहीं पाता । यह किताब मुद्रित शब्द और कैमरे के आधुनिक युग की सामर्थ्य  और सीमा का भी संभवत: अनुपम दस्तावेज साबित होगी ।
  • Jo Nahin Hai
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-1899

    Availability: In stock

    जो नहीं है
    यह मृत्यु और अनुपस्थिति की एक अद्वितीय पुस्तक है । राग और विराग का पारंपरिक द्वैत यहाँ समाप्त है । अवसाद और आसक्ति पडोसी है । यह जीवन से विरक्ति की नहीं, अनुरक्ति की पोथी है ।  मृत्यु मनुष्य का एक चिरन्तन सरोकार है और चूँकि कविता मनुष्य के बुनियादी सरोकारों को हर समय में खोज़ती-सहेजतो है, वह आदिकाल से एक स्थायी कवियमय भी है ।   विचार- शीलता और गहरी ऐन्द्रियता के साथ अशोक वाजपेयी ने  अपनी कविता में वह एकान्त खोजा-रचा है जिसमें मनुष्य का यह चरम प्रश्न हमारे समय के अनुरूप सघन मार्मिकता और बेचैनी के साथ विन्यस्त हुआ है
    यहाँ मृत्यु या अनुपस्थिति कोई दार्शनिक प्रत्यय न होकर उपस्थिति है । वह नश्वरता की ठोस सचाई का अधिग्रहण करते हुए अनश्वरता का सपना देखने वाली कविता है-अपने गहरे अवसाद के बावजूद वह जीने से विरत नहीं करती । बल्कि उस पर मँडराती नश्वरता की छाया जीने की प्रक्रिया को अधिक समुत्सुक और उत्कट करती चलती है
    दैनन्दिन जीवन से लेकर भारतीय मिथ के अनेक बिम्बो और छवियों को अशोक वाजपेयी ने मृत्यु को समझने-सहने  की युक्तियों के रूप में इस्तेमाल किया है । उनकी गीति-सम्वेदना यहाँ महाकाव्यात्मक आकाश को चरितार्थ करती है और उन्हें फिर एक रूढ हो गये द्वैत से अलग एक संग्रथित और परिपक्व कवि सिद्ध करती है
    यहीं किसी तरह की बेझिलता और दुर्बोधता नहीं, पारदर्शी लेकिन ऐंद्रिक चिंतन है, कविता सोचती-विचारती है पर अपनी ही ऐंद्रिक प्रक्रिया से । 
  • The 10-Pound Shred (Paperback)
    Tommy Europe
    295

    Item Code: #KGP-346

    Availability: In stock

    The 10-Pound Shred lets you bring Tommy Europe's tough-love, bootcamp-style workouts home. In just 31 days, Tommy will take you from flab to fit, helping you shed 10 poundsor more in the process. Each day has complete, easy-to- understand exercise instructions with step-by-step photos. There's no complicated flipping around to figure out what you need to be doing–and no free breaks, either! You don't need fancy equipment or even a gym membership–just a good pair of shoes and the willingness to get moving. There's also a nutritious, flexible meal plan designed to help you set a new, lifelong pattern of healthy eating. And through it all, Tommy's there with his signature blend of drill sergeant and inspiring friend, pushing you to reach higher, go faster and shred a little harder.
    Whether you have a wedding coming up, want to look great at the beach or just want to have more energy, Tommy will help you lose those 10 pounds. You're going to sweat, you're going to hurt–but you're going to love the results. So stop making excuses, put down that cupcake and pick up The 10-Pound Shred.
  • Ek Asamapta Katha
    Rama Singh
    200 180

    Item Code: #KGP-447

    Availability: In stock

    उपन्यास लिखते हुए कभी-कभी लगता था जैसे पात्रों के साथ मैं भी उन बीहड़ों में भटक रही हूं। कई एक सवाल थे जो मुझे कोंचते रहे। सबसे बड़ा सवाल कि ये विचारधारा मेरी समझ से परे लगी, जहां एक ओर गरीबों, बेसहारा और दलितों की आवाज बनकर नक्सली आंदोलन अस्तित्व में आया, वहीं निर्दोष अमीरों के खून से ही नहीं, गरीबों के खून से भी जमीन लाल होती रही। तभी कानू सान्याल नक्सल आंदोलन के जन्मदाता के निधन से एक बहुत बड़ा जन-समुदाय शोक-संतप्त था। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उमड़ी भीड़ को पढ़कर, सुनकर, देखकर मैं चकित रह गई। उन शोक-संतप्त लोगों की भीड़ को मैं पहचानना चाह रही थी...कानू सान्याल ने इनके लिए क्या किया था? क्या बीज-मंत्रा दिया था कि आज भी उनकी सोच में, उनके आचार-विचार में वह सब ध्वनित होता दिख रहा है।
    कुछ तो नक्सली आंदोलन में ऐसा रहा होगा कि आज भी उस लहर का असर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। मेरे खयाल में अभावों की पराकाष्ठा, दूभर होती दिनचर्या के आक्रोश की आवाज एक ही होती है। वह कुछ कर गुजरने के आगे के औचित्य नहीं देखती है। ऐसे लोगों को कानू सान्याल या फिर चारु मजुमदार ने क्रांति का जो बीज-मंत्रा दिया होगा, वह उनकी दुखती रग पर हाथ रखने जैसा ही रहा होगा और राहत की उसी धुन में वे आगे बढ़ते गए। फिर तो बीहड़ों से वापस आना कहां संभव हो पाता है? मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया था।
    -लेखिका
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rabindra Nath Thakur
    Rabindra Nath Thakur
    250 225

    Item Code: #KGP-622

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रस्तुत संकलन में जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अनधिकार प्रवेश', 'मास्टर साहब', 'पोस्टमास्टर', 'जीवित और मृत', 'काबुलीवाला', 'आधी रात में', 'क्षुधित पाषाण', 'अतिथि', 'दुराशा' तथा 'तोता-कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Thank You Idi Amin (Paperback)
    Mohezin Tejani
    395

    Item Code: #KGP-324

    Availability: In stock

    Through adversity, a new life emerges
    Bouncing back from one of the horrific episodes of world history—Idi Amin’s expulsion of 80,000 Asians from Uganda— Mohezin Tejani presents a collection of true stories about being a global Muslim refugee.
    Liberated from the confines of his own culture by political realities, Tejani sets out to learn how to be rooted in the absence of a place to call home. His writing is a hypnotic bhangra dance through time and space where he deftly explores both geographical and psychological displacement. Yet it is precisely through such disorientation and a host of intercultural encounters that he eventually finds solace in being a ‘global village on two legs.’
    Thank You, Idi Amin portrays the intersecting points of congruence among humans that are neither from the East nor the West, nor the North or South, but are all part of a global compass navigating the new world of tomorrow.
  • Mera Paigaam Muhabbat Hai Jahan Tak Pahunche
    Jigar Muradabadi
    250 225

    Item Code: #KGP-98

    Availability: In stock

    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
    'जिगर' साहब इंसानियत और शेरियत दोनों का पैकर थे । उनकी शायराना अजमत का बडा राज उनकी मखसूस सज-धज, तर्जेअदा और तरन्नुम था । उनकी मासूम जोर दिलकश शखसियत ने उन्हें अपने दौर का महबूब-तरीन शायर बना दिया था । उनकी बड़ाई को इस पैमाने से भी नापा जा सकता है कि दौरे जदीद में कितनों ने जिगर बनने की कोशिश की, इसलिए कि शेर की दुनिया के वह एक तर्ज थे। असलूब थे, एक स्टाइल थे ।
    'जिगर' ने गजल को एक नई जिंदगी बख्शी । उनकी गजले मदहोशी व रंगीनी के छलकते हुए सागर  हैं, जिससे तरह-तरह के रंग मौजूद है और किस्म-किस्म के जजबात जलवागर हैं,
    जिनका मुताअला जिंदगी के नशे को गहरा कर देता है, कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और हयात नये रूप में जलवागर होकर दिल की धड़कन में जज्ब हो जाती है । खून की रवानी तेज हो जाती है और शायरी के तारों से आहंग हो जाती है। ये इंतेखाबे गजल के अशआर ऐसे है जिनमें नई जिंदगी और वक्त की धड़कनों की आवाजें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख 'जिगर' को कभी भुला नहीं सकेंगी ।
  • Computer Yaani Masheeni Dimaag
    Shuk Deo Prasad
    125

    Item Code: #KGP-1159

    Availability: In stock

    कम्प्यूटर यानी एक मशीन —'मशीनी दिमाग' (Electronic brain) , जिसके अंदर बिछा होता है अनगिनत तारों का मायाजाल। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Upendranath Ashq
    Upender Nath Ashq
    150 135

    Item Code: #KGP-2071

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पलंग', 'आकाशचारी', 'काकड़ां का तेली', 'उबाल', 'मि० घटपाण्डे', 'बैंगन का पौधा', 'डाची', 'पिजरा', 'काले साहब' और  'अजगर' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mahaan Vyaktitva Jin Par Hamain Garv Hai
    Pravesh Chaturvedi
    480 432

    Item Code: #KGP-448

    Availability: In stock


  • Hindi Kahaniyon Mein Hans Patrika Ka Yogdan
    Meera Ramrav Nichale
    450 405

    Item Code: #KGP-758

    Availability: In stock

    हिंदी कहानियों में ‘हंस’ पत्रिका का योगदान
    सौ०  मीरा निचळे से मेरा परिचय इस शोध-प्रबंध के दौरान ही हुआ। साधना शाह का पत्र लेकर वह मुझसे मिलने औरंगाबाद से आई थी और शीघ्र ही इतनी खुल गई कि जब तक अपने प्रश्नों के सही जवाब नहीं पा लेती थी तब तक पूछती ही रहती थी। वह सीधे-सरल स्वभाव की अध्ययनशील लड़की है।
    मैंने उसका शोध-प्रबंध देखा है और मुझे लगा कि काफी परिश्रम और सूझबूझ के साथ मीरा ने यह अध्ययन प्रस्तुत किया है। मैं उसे इसके लिए बधाई देता हूं। यह प्रबंध अपने आप में तो महत्त्वपूर्ण है ही, आगे काम करने वालों के लिए भी इसकी जरूरत बनी रहेगी। मीरा अपना अध्ययन और लिखना आगे भी चलाए रखे इसके लिए मेरी शुभकामनाएं...
    —राजेन्द्र यादव
  • Sikhon Ka Itihaas (2 Vol.)
    Khushwant Singh
    1295 1166

    Item Code: #KGP-9302

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Priyamvada
    Usha Priyamvda
    300 270

    Item Code: #KGP-628

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषा प्रियंवदा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'जिंदगी और गुलाब के फूल', 'वापसी', 'छुट्टी का दिन', 'जाले', 'एक कोई दूसरा', 'झूठा दर्पण', 'सागर पार का संगीत', 'चांदनी में बर्फ पर', 'शून्य' तथा 'आधा शहर' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषा प्रियंवदा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें
  • Kavi Ne Kaha : Rajesh Joshi
    Rajesh Joshi
    190 171

    Item Code: #KGP-384

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : राजेश जोशी
    राजेश जोशी अपने अनुभव को कविता में सिरजते वक्त शोकगीत की लयात्मकता नहीं छोड़ते । लय उनकी कविताओं में अत्यंत सहज भाव से आती है जैसे कोई कुशल सरोदवादक धीमी गति में आलाप द्वारा भोपाल राग का विस्तार कर रहा हो । इस दृष्टि से राजेश जोशी के शिल्प को एक सांगीतिक संरचना कहा जा सकता है । वे स्थानीयता के रंग में डूबकर भी कविता के सार्वजनिक प्रयोजनों को रेखांकित करते हैं । उनकी कविता अपने उत्कृष्ट रूप में एक शहर की कविता होते हुए भी मनुष्य के व्यापक संकट का बयान है । -ऋतुराज़
    समकालीन हिंदी कविता में राजेश जोशी की उपस्थिति एक दिलेर उपस्थिति है-कविता लिखना और उसके लिए लड़ना भी । उनमें एक काव्य व्यक्तित्व भी है, जो कविताएं लिखने वाल कई कवियों में नहीं भी हुआ करता है । उनकी यह उपस्थिति एक लोकतांत्रिक उपस्थिति है, जहां आप ढेर सारा संवाद कर सकते हैं।
    राजेश जोशी की कविता में एक टूट-फूट और संगीत का अवसाद है, लेकिन उठ खड़े होने की कोई मूलगामी संरचना भी  है । पस्ती का महिमामंडन नहीं है और पराजय में पराजित की उधेड़बुन नहीं है । इसलिए कौन-सी भंगिमा कब प्रतिकार में बदल जाएगी और एक कॉस्मिक रुप अख्तियार कर लेगी कोई नहीं जानता । तो साधारण की, पिछडे हुए की, मिटा दिए गए की, भुला दिए गए की, विजय होगी ऐसा कोई यूटोपियाई प्रतिवाद उनमें निरंतर मिलता  है। तो नैतिक श्रेष्ठता में विश्वास कभी खंडित नहीं होता।
  • Kavi Ne Kaha : Naresh Saxena
    Naresh Saxena
    190 171

    Item Code: #KGP-446

    Availability: In stock

    नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के ऐसे कवि हैं, जिनकी गिनती बिना कविता-संग्रह के ही अपने समय के प्रमुख कवियों में की जाने लगी।
    एक संग्रह प्रकाशित होते-होते उच्च माध्यमिक कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाए जाने लगे। पेशे से इंजीनियर और फिल्म निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही संगीत, नाटक आदि विधाओं में गहरा हस्तक्षेप। संभवतः यही कारण है कि उनकी कविताएँ अपनी लय, ध्वन्यात्मकता और भाषा की सहजता के कारण अनगिनत श्रोताओं, पाठकों की शुबान पर चढ़ गई हैं। वैज्ञानिक संदर्भों ने न सिर्फ उनकी कविताओं को मौलिकता प्रदान की है बल्कि बोलचाल की भाषा में उनके मार्मिक कथन, अभूतपूर्व संवेदना जगाने में सपफल होते हैं। निम्न उद्धरण इसका प्रमाण है--
    पुल पार करने से, पुल पार होता है
    नदी पार नहीं होती
    या 
    शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है
    बाद में सीखेगा भाषा
    अभी वह अर्थ समझता है
    या 
    बहते हुए पानी ने पत्थरों पर, निशान छोड़े हैं
    अजीब बात है
    पत्थरों ने, पानी पर
    कोई निशान नहीं छोड़ा
    या 
    दीमकों को पढ़ना नहीं आता 
    वे चाट जाती हैं / पूरी किताब
  • Aadhi Chutti Ka Itihas
    Raj Kumar Gautam
    140 126

    Item Code: #KGP-1844

    Availability: In stock

    आधी छुट्टी का इतिहास
    हिंदी के चर्चित कथाकार राजकुमार गौतम की कहानियाँ समकालीन जीवन-स्थितियों  का गहरी इमानदारी से  उकेरती हैं । शहरी और  कस्बाई निम्न-मध्यवर्ग उनकी कहानियों में विशेष रूप से चित्रिन हुआ है, जो न तो किताबी है और न आयातित, बल्कि ठेठ हिंदुस्तानी हैं । यही कारण है कि राजकुमार गौतम की प्राय प्रत्येक कहानी किसी भी साहित्यिक वाद-विवाद से परे सामाजिक यथार्थ के विभिन्न स्तरों की खरी पहचान कराने में समर्थ है ।
    आधी छुट्टी का इतिहास में राजकुमार गौतम की एक दर्जन कहानियाँ संगृहीत हैं । इनसे गुजरते हुए लगया कि इनका प्रत्येक कथा-चरित्र हमारे एकदम नजदीक है या शायद हमारा ही प्रतिरूप  है। इतना ही नहीं, इनमें उन निर्जीव  वस्तुओं को भी जुबान मिली है, जो हमारी रोज  की बुनियादी जरूरतों को पूरा करती  हैं और इसी बिंदु पर ये कहानियाँ मनुष्य की अभावग्रस्त जिंदगी, यातना और उसकी जिजीविषा को मार्मिक ढंग से उजागर करती  ।
    टुटे-अधटूटे पारिवारिक रिश्तों और दायित्वों का बोझ ढोते, घर-दफ्तर के बीच चक्कार काटते तथा छोटी-छोटी इच्छाओं, खुशियों और उम्मीदों की पूर्ति के  लिए दिन- दिन  कितने ही चरित्र इन कहानियों में हैं, जो हमने बोलना-बतियाना चाहते  हैं, ताकि अपने जीवन पर पड़ते विभिन्न दबावों के प्रतिरोध की ताकत बटोर और सौंप  सकें । संक्षेप में, अपने सामाजिक परिवेश, उसके यथार्थ और अपनी लडाई के निजी मोर्चों की पहचान के लिए इन कहानियों को लंबे समय तक याद किया जाएगा ।
  • Vigyan Navneet
    Dr. Ramesh Dutt Sharma
    290 261

    Item Code: #KGP-563

    Availability: In stock

    विज्ञान नवनीत
    लगभग आधी सदी पहले डा. रमेश दत्त शर्मा ने विज्ञान संबंधी विषयों पर लिखना शुरू किया था और जल्द ही वे विज्ञान से जुड़े हर महत्त्वपूर्ण विषय पर लिखने लगे। अब तक हिंदी की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में हजार से अधिक श्रेष्ठ रचनाएं उनकी छप चुकी हैं, लेकिन रचनाओं के छपने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण उन रचनाओं का पढ़ा जाना है। विज्ञान को अकसर नीरस विषय कहा जाता है, लेकिन डा. रमेश दत्त शर्मा का लेखन किसी भी दृष्टि से नीरस नहीं कहा जा सकता। छात्रा भले ही वे विज्ञान के थे, पर साहित्य से हमेशा जुड़े रहे। स्वभाव से कवि तो थे ही, इसलिए उनके लेखन में एक ऐसी रंजकता है, जिसमें पाठकों को भीतर तक छूने और उनका मन जीत लेने की अद्भुत विशेषता रही है। गंभीर वैज्ञानिक विषयों को रोचक कहानी की तरह परोसना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन रमेश जी ने यह काम प्रस्तुत पुस्तक में बड़ी आसानी से किया है। 
    ‘विज्ञान नवनीत’ ढंगदार लेखों का संकलन है, जो देश की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे। यह संयोग भी है कि पुस्तक के बहुत से लेख ‘नवनीत’ में छपे थे। अपनी इस पुस्तक के शीर्षक के साथ लेखक ने लिखा है—‘विज्ञान को मथकर निकाली गई लुभावनी लोनी। बड़ी स्वादिष्ट होती है लोनी। देर तक जीभ पर स्वाद बना रहता है। ऐसा ही स्वाद इन लेखों का भी है।’ 
    प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत लेखों से यह बात सहज ही समझ आ जाती है कि लेखक सिर्फ लिखना ही नहीं चाहता, कुछ सार्थक रचना चाहता है। सार्थकता की गंध इस पुस्तक के हर पन्ने पर अनुभव की जा सकती है। 
    —विश्वनाथ सचदेव
  • Manto Zinda Hai
    Narendra Mohan
    350 315

    Item Code: #KGP-805

    Availability: In stock

    मंटो जिन्दा है
    सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य का एक बड़ा लेखक होने के साथ-साथ, भाषाओं और देशों की सीमाओं को लाँघ लेखकों- पाठकों की विश्व बिरादरी का हिस्सा बन चुका है । गोर्की, चेखव और मोपासाँ जैसे कथाकारों के साथ विश्व के कथा-शीर्ष पर खड़ा मंटो एक अद्वितीय कथाकार तो है ही, एक अजब और आजाद शख्सीयत भी है । फीनिक्स पक्षी की तरह वह उड़ानें भरता रहा, अपनी ही राख से पुनर्जीवित होता रहा, जिन्दगी और लेखन के मोर्चों पर जीता-मरता रहा और भारतीय उपमहाद्वीप की साइकी में उतर गया । जाहिर हैं, ऐसे लेखक को 'पाकिस्तानी' या 'हिंदुस्तानी' कठघरों में रखकर नहीं देखा जा सकता । मंटो जैसे कालजयी लेखक की जिन्दगी को 'मंटो जिन्दा है' में जीवंतता, गतिशीलता और संपूर्णता से पकडा गया है ।
    'मंटो जिन्दा है' ऐसी जीवनकथा है जो वृतांत होते हुए भी, वृतांत को बाहर-भीतर से काटती-तोड़ती पाठकीय चेतना को झकझोरती जाती है । मंटो की जिन्दगी के कई केंद्रीय मोटिफ, प्रतीक और पेटॉफर पाठक को स्पन्दित करने लगते है और यह महसूस करता है जैसे वह मंटो को अपनी परिस्थिति, समय और साहित्य के साथ जीने लगा हो । लेखक ने जैसे मंटो को जिन्दा महसूस किया है, पाठक भी किताब पढ़ते हुए वैसी ही हरारत महसूस करने लगता है ।
    मंटो की जिन्दगी ययां टुकडों में नहीं, संपूर्ण जीवनानुभव और समग्र कला-आनुभव के रूप से आकार लेती गई है और एक कला-फार्म में ढलती गई है । इस चुनौतीपूर्ण कार्य का नरेन्द्र मोहन ने आत्मीयता और दायित्व से ही नहीं, निस्संगता और साहस से पूरा किया है । उपलब्ध स्रोतों की गहरी पश्चात करते हुए लेखक घटनाओँ और प्रसंगों की भीतरी तहों में दाखिल हुआ है और इस प्रकार मंटो के जीवन-आख्यान और कथा-पिथक को बडी कलात्मकता से डी-कोड किया है ।
    वृतांत और प्रयोग के निराले संयोजन में बँधी यह मंटो- कथा मंटो को उसके विविध रंगों और छवियों के साथ उसके प्रशंसकों-पाठकों के रू-ब-रू खडा कर देती है ।
  • 20-Best Stories From Italy (Classics)
    GLOBAL VISION PRESS
    395 356

    Item Code: #KGP-365

    Availability: In stock

    Imagine reading a 20-page introduction about an author and their times before we even start reading a story. Wait… do not imagine… just pick up any classic available, and the imagination will transform into reality. In all possibility, we 'reject' these classics outright but our grandparents still swear by their narrations and their plots. They say a good story can never be put down… what happened to these? Younger generation, wrong choices—is it?
    A good story lives and touches our hearts but only in the form the author wrote it, and not with editorial notes. What is an enjoyable tale today is a classic tomorrow. Over generations, each piece of literary classic has received newer interpretations, perceptions and proportions. The 21st century world too needs a dollop of the classics of the yesteryears, which still stand relevant to our present conditions, even though the times have changed, be it only historically.
    Keeping this thought in mind, each classic in this collection comes to the reader just as the original piece; meaning, neither the publisher nor the editor have tampered with the authors' original writings. Each classic stands untouched and unabridged—just like it was years back, fresh from the author, fresh from the press!
  • Kavi Ne Kaha : Malay (Paperback)
    Malay
    90

    Item Code: #KGP-1245

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-
    हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-
    अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...।
  • Jeet Ki Raah
    Swed Marten
    200 180

    Item Code: #KGP-857

    Availability: In stock

    पुस्तक में स्वेट मार्डन जैसे महान् व्यक्तित्व के आधुनिक विचारों के साथ भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से प्रेरित विचारों का मिला-जुला संगम है, ठीक गंगा-यमुना की भाँति पावन व पवित्र । एक जोर से विद्धान् स्वेट मार्डेन की विचाररूपी गंगा एवं दूसरी ओर से भारतीय विचारों की सरिता यमुना का जल आकर मिल गया है इस 'जीत की राह' में।
    इस पुस्तक का वास्तविक शीर्षक है 'जीत की राह', परंतु इससे
    अधिक आकर्षक है 'स्वेट मार्डन : सूक्तियाँ व प्रेरक विचार'।  इस पुस्तक
    में स्वेट मार्डन की तीन पुस्तकों क्रमश 'The Conquest of Worry', 'He can who think he can', 'To succeed in Life' में से उनकी
    सूक्तियाँ व प्रेरक विचार संगृहीत किए गए हैं।
  • 23 Lekhikayen Aur Rajendra Yadav (Paperback)
    Geeta Shree
    195

    Item Code: #KGP-262

    Availability: In stock

    23 लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव
    अपने ढंग की अद्भुत पुस्तक है यह '23 लेखिकाएं और  राजेन्द्र यादव' । शायद किसी भी भारतीय भाषा में अकेली । इसे गीताश्री के पत्रकार-जीवन की एक उपलब्धि भी कह सकते  हैं । यहाँ गीता ने समय-समय पर लिखे गए समकालीन महिला-रचनाकारों के इम्प्रैशन (प्रभाव-चित्रों) का संयोजन किया है । कहीं ये साक्षात्कार हैं तो कहीं संस्मरण, कहीं राजेन्द्र जी के रचनाकार को समझने की कोशिश है तो कहीँ 'हंस' के संपादकीय, को लेकर उन पर बाकायदा मुकदमे । यहाँ अगर मन्नू भंडारी, मृदुता गर्ग, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोडा, ममता कालिया, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका तथा कविता हैं तो निर्मला जैन, जयंती  रंगनाथन, पुष्पा सक्सेना, वीना उनियाल और रचना यादव भी अपने वक्तव्यों के साथ उपस्थित है । राजेन्द्र यादव अपने समय के सबसे महत्त्वपूर्ण कथाकार, नई कहानी आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तक और कथा-समीक्षा के विलक्षण व्याख्याकार हैं । इधर चौबीस वर्षों में तो 'हंस' के तूफानी विचारों ने हंगामा ही खड़ा कर दिया हैं--राजेन्द्र जी को खलनायक और माफिया डॉन या पता नहीं और क्या-क्या बना दिया । विवादास्पद होना  जैसे उनकी स्थायी नियति है--'हंस' के माध्यम से उन्होंने स्त्री-दलित और अल्पसंख्यकों के पक्ष में जो जेहादी मुहिम चलाई है उसने निश्चय ही हिंदी के यथास्थितिवादी परंपरा-पोषकों की नींद हराम कर दी है । वे तर्क से नहीं, गालियों और आक्षेपों से राजेन्द्र जी के प्रश्नों का उत्तर देते हैं । मठाधीशों के लिए यह सचमुच बैचेन कर देने वाला सत्य है कि उनके देखते-देखते दलित और स्त्री-विमर्श आज साहित्य की केंद्रीय मुख्य धाराएँ हैं ।
    राजेन्द्र यादव के इस विकट और अपने समय के सबसे जटिल व्यक्तित्व के विविध आयामों को समेटने की कोशिश करती हैं ये लेखिकाएँ गीताश्री के मंच से ।
    किताबघर प्रकाशन की एक भव्य प्रस्तुति ।
  • Taaki Desh Mein Namak Rahe
    Asghar Wajahat
    390 351

    Item Code: #KGP-475

    Availability: In stock

    ताकि देश में नमक रहे पुस्तक में कुल 42 लेख संकलित हैं, जिन्हें दो खंडों में विभाजित किया गया है। पहले खंड के अंतर्गत साहित्यिक लेख हैं, जब कि दूसरे खंड में सामाजिक-सांस्कृतिक लेख संकलित हैं। साहित्यिक लेखों में सिर्फ साहित्यिक विधाओं या सरोकारों की ही बात नहीं की गई है बल्कि कई ऐसी साहित्यिक विभूतियों पर भी लेखक ने पूरी आत्मीयता से लिखा है, जिन्होंने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। मुज़फ्फर अली के साथ बिताए ख़ूबसूरत दिन हों या बेगम अख़्तर, शैलेन्द्र और शहरयार के लिए मन में मौजूद दीवानगी का अहसास, प्रमोद जोशी और ब्रजेश्वर मदान जैसे अपनी तरह की विशिष्ट-सामान्य शख़्सियतों की बातें हों या कुर्रतुलऐन हैदर और मंटो जैसे अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों के प्रति आदर-भाव प्रकट करना हो, हर लेख में असग़र वजाहत कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर दे जाते हैं जिसे पाठक अपने मन से कभी विस्मृत नहीं कर सकता। 
    पुस्तक के दूसरे खंड में संकलित लेख हालांकि सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े हैं लेकिन उनका वैचारिक धरातल अत्यंत विस्तृत है। इनमें भाषा से जुडे़ सवाल, सिनेमा और साहित्य के अंतर्संबंध, आने वाले समय में हिंदी सिनेमा की दशा-दिशा का आकलन, भारतीय गणतंत्र से जुड़े दशकों पुराने अनुत्तरित सवाल और लगातार छीजते जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहन चिंताएं मौजूद हैं। असग़र वजाहत इन लेखों के जरिए वर्तमान समय के जटिल सवालों को न केवल उभारते हैं बल्कि उनसे मुठभेड़ कर उनकी तहों में जाकर कारण भी तलाशते हैं। 
    इन विविध लेखों को क्रमिक रूप से पढ़ने पर हम अतीत से शुरू कर वर्तमान को पार करते हुए भविष्य के संभावित सवालों से भी रूबरू हो सकते हैं। यह असग़र वजाहत के लेखन की कलात्मकता ही है कि वह छोटे तथा मामूली से दिखने वाले मुद्दे या सवाल से अपनी बात शुरू कर उसे पूरे समाज और व्यवस्था के लिए एक ज़रूरी सवाल का स्वरूप प्रदान कर देते हैं।
    भूमिका से 
  • Kavya Shatabdi (Paperback)
    Anamika
    160

    Item Code: #KGP-7088

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े  संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां  उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके क्राव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते है । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढने की गंभीर कोशिश दिखाई देती हे ।
    --मंगलेश डबराल 
  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    240 216

    Item Code: #KGP-235

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • 1128 Mein Crime 27
    C. J. Thomas
    100

    Item Code: #KGP-1817

    Availability: In stock

    1128 में क्राइम 27
    '1128 में क्राइम 27' थॉमस का दूसरा नाटक है । उसकी समस्या सार्वदेशीय है । उन्होंने मौत को एक विशेष प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है । नाटक में जिंदगी और मृत्यु के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है । कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सिनिक है, क्योंकि उनका यह नाटक सिनिसिज्म की सृष्टि है।... 
    तत्कालीन रंगमंच पर जमी हुई हास्य रूढियों के प्रति विद्रोह, प्रबोधन की शक्ति पर विश्वास रखकर संसार का उद्धार करने की मूर्खता आदि पर भी उन्होंने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। असली जिंदगी और जीवन की व्याख्या करने वाले नाटक टेकनीक के वैभवों क द्वारा उनकी असली भिन्नताओं को उसी तरह रहने देकर रंगमंच पर प्रस्तुत करने का उनका कौशल आश्चर्यजनक ही है। जिंदगी मिथ्या है, यह दार्शनिक आशय दर्द-भरी हँसी के साथ वे मंच पर प्रस्तुत करते हैं। नाटक चलाने वाला और नाटक की व्याख्या करने वाला गुरु एक तरफ़, नाटक खेलने वाले, नेपथ्य, प्रोप्टर, स्टेज मैनेजर आदि का एक ढेर दूसरी तरफ, अखबार का दफ्तर, संपादक, चक्की आदि का एक ढेर तीसरी तरफ।  इन सबके सम्मुख गुरु के लिए जब चाहे तब इशारा कर सकने वाला एक प्रेक्षक समूह । इस प्रकार नाटक और जिंदगी को उनके असली रूप में अपने-अपने व्यक्तित्व से युक्त एक ही स्टेज पर एक साथ इस नाटक में प्रस्तुत करता है । नाटकीय प्रभाव एवं आंतरिक संघर्षों की दृष्टि से यह नाटक अत्यंत सफल है।
  • Anuvaad Vigyan : Siddhant Evam Pravidhi
    Bholanath Tiwari
    480 432

    Item Code: #KGP-539

    Availability: In stock

    अनुवाद विज्ञान : सिद्धांत एवं प्रविधि
    लंबे समय से अनुवाद पर एक ऐसी प्रामाणिक पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी जो सभी प्रकार के पाट्यक्रमों की ज़रूरत को तो पूरा करती ही हो, साथ ही शोधार्थियों, अनुवाद के शिक्षकों, प्राध्यापकों के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ अनुवाद कार्य से जुडे अनुवादकों तया अनुवाद व्यवसाय से जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए उपयोगी हो ।
    इस पुस्तक में अनुवाद विद्वान की समस्त प्रविधियों व सिद्धांतों का विवेचन-विशलेषण भी किया गया है तथा जुत्ताई, 2008 तक अनुवाद के क्षेत्र से हुए चिंतन एव शोधों को समाहित करते हुए इस अनुवाद पर अद्यतन एवं प्रामाणिक पुस्तक के रूप में तैयार किया गया है । इसलिए इसका पुराना नाम 'अनुवाद विज्ञान' न रखकर इसे अनुवाद विज्ञान : सिंद्धांत एवं प्रविधि' नाम दिया गया है, क्योंकि  यह पुस्तक नवीनतम उदभावनाओं व विचारों से युक्त है तथा  मेरे 30 वर्षों से भी अधिक के अनुवाद के अनुभवों को समेटे हुए है । मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफल होगी तथा विद्यार्थियों, प्राध्यापकों, अनुवादकों व अनुवाद के गंभीर अध्येताओं के लिए भी समान रूप से उपादेय सिद्ध होगी ।
  • Khed Nahin Hai
    Mridula Garg
    300 270

    Item Code: #KGP-543

    Availability: In stock

    खेद नहीं है
    मृदुला गर्ग की छवि पाठकों के बीच अब तक एक कथाकार की रही है। धीर-गंभीर पर ऐसा कथाकार, जिसके कथानकों में व्यंग्य की सूक्ष्म अंतर्धारा बहती है। इस पुस्तक में संकलित लेखों से गुज़रने के बाद यह धारणा पुष्ट होगी कि खाँटी व्यंग्य-लेखन की रसोक्ति पर भी उनकी पकड़ प्रभावी है। इनमें वे जिस पैनेपन से व्यवस्था में धँसे विद्रूप की काट-छाँट करती हैं उसी तर्ज़ पर पूरे खिलंदड़ेपन के साथ हमारे भीतर उपस्थित विसंगतियों को भी सामने ला खड़ा करती हैं। 
    दरअसल, ये सभी लेख पिछले कुछ वर्षों से ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका में ‘कटाक्ष’ स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित हो रहे हैं, जिनके ज़रिए वे अपने आसपास पसरी विडंबनाओं की शिनाख़्त कर पाठकों के सामने पेश करती हैं, बिना किसी लाग-लपेट के। जब जहाँ जैसा ठीक लगा, उसे वहाँ वैसा ही बयान कर दिया। कोई बंदिश नहीं। न भाषा की, न शैली की और न ही विधा की। पर उनकी इसी अनुशासनहीनता से ये लेख विशिष्ट बन पड़े हैं। मज़े की बात यह भी कि इस बेतकल्लुफ़ी को लेकर उनके मन में ज़रा भी ‘खेद नहीं है’।
    इन्हें पढ़ना इसलिए भी ज़रूरी है कि इस बहाने हमें खुद पर हँसने का मौक़ा मिलेगा। और शायद सोचने का भी।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    185 167

    Item Code: #KGP-2080

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार निर्मल वर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दहलीज', 'लवर्स', 'जलती झाड़ी', 'लंदन की एक रात', 'उनके कमरे'', 'डेढ़ इंच ऊपर', 'पिता और प्रेम', 'वीकएंड', जिंदगी यहाँ और वहाँ' तथा 'आदमी और लड़की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक निर्मल वर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Baarish Ke Baad
    Radhey Shyam Tiwari
    125 113

    Item Code: #KGP-1990

    Availability: In stock

    बारिश के बाद
    राधेश्याम तिवारी हिंदी के एक ऐसे कवि हैं, जो अपने आसपास के साधारण-सामान्य और लगभग घटनाविहीन जीवन से मार्मिकता को बड़े अचूक ढंग से पकडने की क्षमता रखते हैं। उनकी कविताओं में कल्पना की ऊँचाइयाँ हैं, लेकिन जैसा कि वे अपनी एक कविता 'बीज-मंत्र' में कहते हैं कि बीज का बाहर निकलकर भी धरती से जुडाव कम नहीं होता, उसी तरह उनकी कविता  का लगाव भी किसी भी हालत में इस धरती से, यहाँ के इंसान से, यहाँ के मौसमों से, अभावों और स्मृतियों से कम नहीं होता, बल्कि और सघन होता जाता है । उनकी हर कविता जीवन के बीच सहज ही मिलने वाला एक मार्मिक प्रसंग बन जाती है । यह मार्मिकता शब्द-क्रीड़ा से हासिल नहीं की गई है बल्कि जीवन की परिस्थितियों से प्राप्त की गई है। शहर तथा गाँव के बीच हिलगी हुई राधेश्याम तिवारी की कविता कई जगह गीतात्मक हो जाती है बल्कि कहीं-कहीं वे अपनी बात कहने के लिए गीत का सहारा भी लेते है, मगर दिलचस्प बात यह है कि यह कवि जीवन के प्रति हमेशा बहुत सकारात्मक है, कटु और कठोर नहीं । उसका लहजा शिकायत-भरा नहीं, ललक-भरा है । उनकी कविताओं से जीवन के दबावों-तनावों को दरगुजर नहीं किया गया है, अभावों की चर्चा से परहेज नहीं किया गया है, मगर विवशता की बजाय एक दार्शनिक ऊँचाई दी गई है । उनकी एक कविता है 'न्यूटन', जिसमें वह कहते हैं कि "न्यूटन ने यह तो सोच लिया कि सेब पेड़ से नीचे क्यों गिरता है, लेकिन यह नहीं सोचा कि नीचे गिरकर भी वह नीचे के लोगों को क्यों नहीं मिलता?" इतना ही नहीं, वे आगे कहते हैं कि "यह तो ठीक है कि गुरुत्वाकर्षण सबको अपनी ओर खींचता है, मगर जमीन में दबा हुआ बीज कैसे ऊपर उठ जाता है, न्यूटन ने यह नहीं सोचा ।" यहीं अभावों की चर्चा है, लेकिन यहाँ बेचैनी का स्वर और स्तर भिन्न है तथा इसी के साथ यह सकारात्मक स्वर भी है ।
    इस संग्रह में अनेक ऐसी कविताएँ हैं जैसे 'बाकी सब माया हैं, 'पुराना पता', 'सर्कस में बाघ', ‘संबंध', 'घर', 'किराए का मकान' आदि जो हमारे इस दैनिक संसार की कविताएँ हैं मगर उससे बाहर ले जाकर विचलित करने वाली कविताएँ भी हैं। ये कविताएँ सहज हैं, क्योकि मर्मभेदी हैं । वे सहज हैं, क्योंकि मनुष्य के साथ ये प्रकृति से भी सघन रूप से जुड़ती हैं। ये सहज हैं, क्योंकि इनमें हमारा सहजात मनुष्य है, उसकी मानवीयता है, उसका राग और विराग है ।
  • Durg-Bhed
    Deepak Sharma
    50 45

    Item Code: #KGP-9110

    Availability: In stock

    दुर्ग-भेद
    "अजीब संयोग है, आप दोनों ही किसी एक चीज को चाहने और पाने को इतना अधिक महत्व देते है कि अपना सारा अस्तित्व ही उस एक के प्रति अर्पित कर देना चाहते है । पर क्या अपनी शक्तियों व इन्द्रियों को एक ही बिन्दु पर केन्द्रित कर जब आप अपनी परिधि निर्धारित का लेंगे तो अपनी स्वतन्त्रता नहीं खो बैठेंगे ? जब मुक्त गीत आपको पुकारेंगे  तो क्या आप उसी संकीर्ण दुर्ग में बँधे रह पायेंगे ?" "जब उस दुर्ग को अभेद्य व अपारदर्शी बनाए रखने का उत्तरदायित्व ही हमीं पर होगा तो क्यों हम...", "हाँ तो क्यों आप सुमन व सुमन के माता-पिता की तरह उसी प्रकार के लौहगढ़ में बंद नहीं हो जाएँगे, जहाँ निजी स्वार्थी घेरों में कैद आप हर क्रन्दन , हर उत्सव से अछूते , पैसे कमाने के लिए कोरे, रूखे व कठोर चेहरे लिए दिन-रात मेहनत करते चले जाएँगे ।"
    (कहलीं-संग्रह की 'दुर्ग-भेद' काली से)

  • Vish Vansh
    Rajesh Jain
    40 36

    Item Code: #KGP-1916

    Availability: In stock

    विष वंश
    कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।
    हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार राजेश जैन के इस प्रस्तुत नाटक 'विष वंश' में राजा की यह कथा हमारे आसपास के भ्रष्टाचार के जिस गहन सचिंतन से नंगा करती है, उसमें प्रतिपक्ष के लिए कोई अवकाश नहीं है । राजा अटपटसिंह और महामंत्री चंटप्रताप सिंह के माध्यम से तंत्र के भ्रष्टीकरण को, आज की नारी की अस्मिता क्या राजनीति में पनप राही वंशवाद को प्रवृति के साथ जोड़कर नाटककार ने इस नाट्यकथा को समकालीन समय का एक टकसाली पाठ बना दिया है । प्रजातंत्र ये प्रजा ही सर्वाधिक शक्तिशाली और सत्ताधीश हो-अत्यंत रोचक ढंग का यह सत्यान्वेषण इस नाटक के सुलझी हुई पहेली है ।
    छठे 'आर्य स्मृति साहित्य समान' के निर्णायक मंडल- राम गोपाल बजाज, कन्हैयालाल नंदन तथा असग़र वजाहत जैसे नाट्यविदों के मूल्यांकन के आधार पर सम्मानित इस नाट्यकृति का प्रकाशन, नाटकों की दुनिया में एक सदाबहार खुशबू का आह्वान है, ऐसा विश्वास है ।

  • Toro Kara Toro-5 (Sandesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-667

    Availability: In stock


  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    995 896

    Item Code: #KGP-580

    Availability: In stock


  • Mere Saakshaatkaar : Kunwar Narain
    Kunwar Narayan
    235 212

    Item Code: #KGP-9049

    Availability: In stock


  • Pattharon Per Tootata Jal
    Surendra Pant
    160 144

    Item Code: #KGP-1852

    Availability: In stock

    पत्थरों पर टूटता जल

    आरम्भिक कविताएँ कवि के आत्मसंघर्ष का,
    खुद से लड़ते हुए कहीं न पहुँचने की
    विवशता के बीच भी अपनी पहचान
    बनाने की ललक से भरी तैयारी
    का दस्तावेज होती है ।
    उनमें एक ओर प्रचलित काव्यविधान
    से टूटने की छटपटाहट होती है
    तो दूसरी और शास्त्र की चुनौतियों के सम्मुख
    कुछ नया कहने का तेवर होता है ।
    इतना कहने का प्रयोजन यह नहीं कि
    सुरेन्द्र पंत की कविताएँ अन्तिम कविताएँ हैं
    जिन पर बहस नहीं की जा सकती ।
    वास्तव में वे कविताएँ बहस की कविताएँ है ।
    कारण यह कि उनमें एक गंभीर किस्म के
    कवि की मुद्रा सहसा किसी शब्द मा शब्दार्थ
    के कोने से झलकने लगती है ।

    वे चाहे आज की भाषा में खुद को खोजने की
    कोशिशें हो पर उनमें आज और कल की
    कालगत धारणाओं से बचने की कोशिशें हों ।
    इस अर्थ में वे ऐसे वर्तमान की कविताएँ है
    जो सदैव अमानवीय परिस्थितियों में
    ऐसी ही रुपाकृ्ति देता है ।
  • Bengal Shaili Ki Chitrakala
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    400 360

    Item Code: #KGP-9044

    Availability: In stock

    भारत दो चित्रकला शैलियों में बंगाल चित्रकला शैली को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है । उसका यह वेश्मिष्ट्रय विगत शती के बंगाल रिनेसां' अर्थात् माक्षतीय नवजागरण से उसकं संबद्ध होने के कारण भी है । बंगाल शैली देशज निजत्व को पल्लवित और विकसित करनेवाली शैली तो थी ही लेकिन, उसमें ऐसे विरोधाभास भी थे जिससे उसकं समसामयिक मूल्यद्देकन ने दो परस्पर विरोधी अभिमत सामने आये। जहा इस शेली के समर्थक कहय-समीक्षकों ने भावनात्मक लगाव रखते हुए इसे अतिश्योक्तिपूर्ण महत्व दिया यहीं दूसरी और अन्य कला-समीक्षकों ने वस्तुनिष्ठ और दिष्टलेषणमृत्मक मूल्यग्रेकन कर इसकी अनेकानेक कमियों व खामियों को भी उजागर जिया, साथ ही कुछ गंभीर आरोप भी लगाये और इसकी उपलब्धियों के सामने ग्रहन-चिहन खडे किये। आज यह शैली इतिहास का विषय बन चुकी है अत: इस अध्ययन में प्रस्तुत है उसका सर्वागीण सष्टमुक विवेचन, जो अनेक अनछुए पहलुओं को उजागर यता है ।
  • Urgent Meeting (Paperback)
    Jaivardhan
    50

    Item Code: #KGP-7092

    Availability: In stock

    नाटक कैसा हो ? हमेशा चर्चा का विषय रहा है । आगे  भी इस पर चर्चा होगी । नाटक ऐसा हो, वैसा हो। कथानक ऐसा हो । ताना-बाना ऐसा हो । भाषा ऐसी हो। चरित्रों का विकास ऐसा हो। कभी-कभी सरे मापदंड, सारे व्याकरण फेल  हैं, जब किसी लंबी कविता, कहानी को मंच पर प्रदर्शित कर दिया जाता है अथवा किसी कथानक को एकल-नाटक के रूप में प्रस्तुत कर दिया  जाता है । 
    इस नाटक की पृष्ठभूमि दिल्ली की है । अधिकांश चरित्र भी दिल्ली के हैं । 
  • Bayaan (Paperback)
    Kamleshwar
    60

    Item Code: #KGP-7058

    Availability: In stock


  • Muhim
    Sitesh Alok
    280 252

    Item Code: #KGP-291

    Availability: In stock

    कहानियाँ किसी अन्य अनजान लोक से नहीं आतीं...हमारे बीच, हमारे आसपास ही उपजती और पनपती रहती हैं...किंतु कोई साहित्यकार ही अपनी पारखी दृष्टि से चुनकर और संवेदना से सँवारकर उन्हें शब्दों के संसार में स्थापित करता है। 
    बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. सीतेश आलोक ने गत तीन दशकों में साहित्य की अनेकानेक विधओं में अपने अवदान द्वारा एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, यात्रा-वृत्तांत, व्यंग्य, समसामयिक विषयों पर लेख आदि पर लिखी डॉ. आलोक की अनेक पुस्तकों को न केवल पाठकों ने सराहा, कई संस्थाओं ने सम्मान भी प्रदान किया। मौलिकता इनके लेखन की एक विशेषता है। इनके चरित्र एवं कथानक न तो किसी साँचे में ढलकर आते हैं और न किसी वाद से प्रभावित होकर रूपाकार ग्रहण करते हैं।
    डॉ. सीतेश आलोक उन इने-गिने लेखकों में से हैं जिनमें लीक से हटकर अनेक ऐसे विषयों पर भी लिखने का साहस है, जिन्हें अधिकांश लेखक छूने से भी कतराते हैं।
    इस संग्रह की अनेक कहानियाँ वागर्थ, साक्षात्कार, समकालीन भारतीय साहित्य, कथादेश, साहित्य अमृत, नयी धारा आदि में प्रकाशित एवं आकाशवाणी से प्रसारित हो चुकी हैं।
  • Mere Saakshatkaar : Shiv Prasad Singh
    Shiv Prasad Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2024

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : शिवप्रसाद सिंह
    शिवप्रसाद सिंह स्वीकार करते हैं कि "मैं भाव और रूप को अपनी क्षमता पर बाँध सकने की कोशिश में कुछ भी उठा नहीं रखता । उनका यह भी मानना है कि सत्य तो साक्षात् देखा होने पर भी भाषा की गुंजलक में अँट नहीं पाता । अधूरे सपने पूरे मानसिक ताप में जब पिघलते हैं तो सही क्षण पहचानकर उन्हें भी में डालना, शीतल करना और फिर बाहर निकालकर चमक दे देना कलाकार की तपस्या है । उसकी डाई (साँचा) विश्व के किसी भी अन्य कथाकार-रचनाकार से मेल नहीं खाती, न तो कहीं से कोई सादृश्य ही रखती है, यहीं वैयक्तिक स्वतन्त्रता रचनाकार की निजी धरोहर और यही उसके मन की प्रतिबद्धता भी ।
    साक्षात्कारों में अक्सर प्रस्तुतकर्ता की अपनी समझ रूपायित होती है, पर जो पाठक प्रश्न के साथ जुड़े हो उन्हें उत्तर से भी जुड़ना लाजिम नही है । शिवप्रसाद सिंह कहते है कि प्रेमबंधन को चटकाकर तोड़ने पर गाँठ पड़ना अनिवार्य है । जुड़ना बिना ग्रंथि के संभव नहीं होता, पर इससे धीरे-धीरे धागा छोटा होता रहता है । उसे अगर पहली स्थिति में लाना हो तो गांठें खोलिए और तब वह धागा वस्तु-जगत को प्रेम की डोर से बाँध लेगा ।
    यह नई पुस्तक साक्षात्कारों पर केंद्रित है जिसमें उनके समवयस्क या नई पीढी, समकालीन पीढी से जुड़े रचनाकारों, पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर है । शायद इनमें से कोई प्रश्न आपका भी हो, तो उत्तर पर सोचिए--
  • Kavi Ne Kaha : Bhagwat Ravat (Paperback)
    Bhagwat Rawat
    90

    Item Code: #KGP-1379

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : भगवत रावत
    यह कविता पर निर्भर करता है कि वह अपने पाठक को कितनी देर अपने पास बिठाए रख सकती है, अथवा पहली बार के बाद दोबारा अपने पास बुलाने को कितना विवश कर सकती है। इस तरह कविता के पास जाने की पहल तो पाठक ही करता है। इसके बाद की जिम्मेदारी कविता पर आ जाती है कि वह कितनी अपने पाठक की हो पाती है। कितनी उसके अनुभव-संसार का रचनात्मक हिस्सा बन पाती है, जो सब कुछ छोड़कर कविता के पास कुछ पाने की गरज से आता है। 
    समाज के जिस अनुभव-संसार में पाठक रहता है, उसी समाज से रचनाकार भी आता है। जीवन की तमाम अच्छाइयों, बुराइयों, समानता, असमानताओं, विसंगतियों और जटिलताओं आदि के बीच रचनाकार जो भी कुछ ऐसा देखता है जिसे प्राप्त भाषा के माध्यम से परिभाषित या अभिव्यक्त करना संभव नहीं होता, तो उसी प्राप्त भाषा को रचनाकार न, सिरे से गढ़ता है और उसके इस प्रयत्न का प्रतिफल ही उसकी रचना होती है।
  • Sarjana Ka Agni-path
    Prabhakar Shrotiya
    125 113

    Item Code: #KGP-9135

    Availability: In stock

    सर्जना का अग्नि-पथ
    "तुमसे अच्छा ऐसा साहित्य का संयोजन कोई कर सका है या कर सकता है, मेरी कल्पना में नहीं है ।" यह लिखा था प्रख्यात वरिष्ठ विचारक, आलोचक और लेखक डॉ० रघुवंश ने 'ज्ञानोदय' से प्रकाशित पत्र में डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के संपादन के बारे में । डॉ० श्रोत्रिय के संपादन की प्रशंसा बडे विचारकों, लेखको, विद्वानों से लेकर सामान्य पाठको ने भी अकसर की है । परंतु 'वागर्थ' और 'नया ज्ञानोदय' में विविध विषयों पर लिखे उनके अग्रलेखों ने एक विशाल पाठक समाज को प्रभावित और उद्वेलित करने के साथ ही समय के प्रश्नों पर गहराई से सोचने को प्रेरित किया है । झालावाड़ के विवेक मिश्र अपने पत्र में लिखते हैं—"आपके संपादकीय विवेक से हमारे समय का सांस्कृतिक विमर्श बन रहा है।" 'बिन पानी सब सून' अक पर साइप्रस से ममता जैन लिखती हैं—"यूरोप के भूमध्य सागर के मनोरम तट पर बैठ विशाल जलराशि की लहरों की बूँदें मुझे स्पर्श कर रहीं हैं और मैं ‘बिन पानी सब सून' के प्रवाह से बह रही हूँ...आपके संपादकीय के चार पृष्ठ इस विशद 300 पृष्ठ के विशेषांक की आत्मा हैं ।"
    "शक्ति का केन्द्रीकरण' लेख पर बहादुरगढ़ से श्री ज्ञानप्रकाश विवेक लिखते हैं—"संपादकीय अमेरिकी नीतियों और इराक युद्ध की जिस ईमानदार लहजे में और आक्रामक भाषा में निंदा करता है, वह नायाब है।" एक अन्य पाठक की राय में— "अग्रलेख में आपने अमेरिकी साम्राज्यवाद की राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक निरंकुश रूप की निर्भीक समीक्षा की है।" इस आलेख को दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने पाट्यक्रम में शामिल किया है । 'दुर्जेय पर विजय' आलेख पर प्रसिद्ध कवि देवव्रत जोशी की राय थी–"इस संपादकीय को 'जनसत्ता', 'नवभारत टाइम्स’ में और हो सके तो अनुवाद कर अंग्रेजी पत्र में भी छपवा दें। यह राष्ट्रीय अस्मिता, चिकित्सकीय जीवन और लाखों के मरने के विरुद्ध एक सशक्त आलेख है ।"
  • Vipathgami
    Mastram Kapoor
    80 72

    Item Code: #KGP-2044

    Availability: In stock

    विपथगामी
    विपथगामी उस युवा पीढ़ी की कहानी है जिसे डॉ० राममनोहर लोहिया कुजात पीढ़ी  कहते थे । यह ऐसी पीढ़ी है जो अतीत की जकड़नों से मुक्त होकर भविष्य की तलाश करना चाहती है । जो समाज की वर्तमान नैतिकता का संदेह की नजर से देखती है और उस नैतिकता की खोज में भटकती है जो मानय की जन्मजात आकांक्षाओं  स्वतंत्रता, समता और बंधुता को न कुचले । 
    पचास के दशक के प्रारंभिक वर्षों में महानगर बंबई के क्रूर वातावरण से अपने लिए जमीन तलाशती यह पीढी सद्य:प्राप्त स्वतन्त्रता से मोह-भंग की स्थिति से गुजरती है जब वह यह देखती है कि कही कुछ नहीं बदला है । वह पाती है कि कानून की नजर में हर आदमी अपराधी है जब तक यह अपने को निर्दोष सिद्ध नहीं करता न कि (जैसा कि कानून दावा करता है) हर आदमी निर्दोष है जब तक कि वह अपराधी सिद्ध नहीं होता ।
  • Gautam Buddha
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-126

    Availability: In stock

    भगवान गौतम बुद्ध की गौरवगाथा स्वदेश की सीमाओं को लाँघकर विश्व के अनेक देशों में फैली हुई है । उनके सिद्धातों और शिक्षाओं ने सभी देशों के लोगों को आकृष्ट किया है । अशोक जैसे महान् सम्राट ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और उसका प्रचार-प्रसार किया । गौतम बुद्ध की शिक्षाओं ने जनता के हृदय में अपना स्थान बना लिया । गौतम बुद्ध मानव-मात्र के कल्याण की शिक्षा देते थे ।
    अहिंसा के पुजारी गौतम बुद्ध ने हिंसा का डटकर विरोध किया । वे अहिंसा को महान धर्म मानते थे । बाल्यावस्था से ही वे हिंसा के विरोधी थे । किसी भी प्रकार की हिंसा पर वे अपने मित्रों को समझाते थे कि हिसा महान् पाप है । इससे आत्मा को बहुत क्लेश होता है ।
    गौतम बुद्ध ने भिक्षुओं को अत्यंत सादा जीवन व्यतीत करने की सलाह ही । यज्ञ-बलि की वे सर्वत्र निंदा करते थे और उसे निकृष्टतम  कृत्य मानते थे । वास्तव में वे करुणा के अवतार थे । उनका संदेश था कि मनुष्य को सामाजिक हित का सदैव ध्यान रखना चाहिए । वे एकांतवास के पक्षधर थे ।
    प्रस्तुत पुस्तक में भगवान बुद्ध के संक्षिप्त जीवन-परिचय के साथ उनकी शिक्षाओं, उपदेशों, सिद्धांतों और आदशों का वर्णन सरल भाषा में किया गया है।
  • Shubhada
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    270 243

    Item Code: #KGP-574

    Availability: In stock


  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan (Paperback)
    Mannu Bhandari
    150

    Item Code: #KGP-1426

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है। 
  • Saarth
    Bhairppa
    400 360

    Item Code: #KGP-835

    Availability: In stock

    सार्थ
    सार्थ अर्थात् व्यापारियों का काफिला । नागभट्ट नामक एक वैदिक अपने राजा द्वारा एक सार्थ के साथ उच्च अध्ययन के लिए भेजा जाता है । कथा के वाचक नागभट्ट द्वारा आठवीं शती के भारत का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया गया है । उस समय वैदिक धर्म पतनोन्मुख था, भले ही शकरचार्य, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, भारती देवी आदि जैसी विभूतियां उसके प्रचार-प्रसार में लगी थीं। दूसरी ओर बौद्ध धर्म अपने उत्कर्ष पर था । उसके आचार्य धर्म-प्रचार के लिए स्तूपों, चैत्यों और विहारों के निर्माण में जुटे थे । साथ ही, योग साधना और तंत्र साधना में भी आकर्षण बना हुआ था । भारत के पूर्वी भाग में इस्लाम धर्म तलवार की नोक से अपने धर्म और संस्कृति की लकीर खींच रहा था। डॉ. भैरप्पा ने तत्कालीन समाज और धर्म का सजीव चित्रण अपनी पैनी लेखनी से अपनी विशिष्ट शैली में इस उपन्यास में किया है । संभवत: साधारण जन उस समय भी ऊहापोह की उसी स्थिति में था, जिसमें आज अपने को पा रहा है । इसी कारण पाठक इस उपन्यास को एक बार प्रारंभ करके छोड़ नहीं पाएगा, जब तक कि इसे समाप्त न कर ले ।

    डॉ. भैरप्पा की यह विशिष्ट ऐतिहासिक कृति 'सार्थ' अब आपके सन्मुख प्रस्तुत है ।
  • Vyangya Samay : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    380 342

    Item Code: #KGP-9337

    Availability: In stock

    नरेन्द्र कोहली व्यंग्य साहित्य में कथात्मकता, वैचारिक उदारता और संवेदनात्मक सघनता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने विभिन्न विधाओं के साथ हिंदी व्यंग्य को भी समृद्ध किया है। उनके व्यंग्य लेखन की बहुत बड़ी शक्ति है घटना को अनुभव में रूपांतरित कर लेने की क्षमता। निजी सुख-दुःख से लेकर देश-दुनिया के जाने कितने पक्षों पर उन्होंने लिखा है। वे संप्रेषण का महत्त्व जानते हैं, इसलिए उनकी रचनाएं पाठकों में पर्याप्त लोकप्रिय हैं। कई बार वैचारिक पक्षध्रता या जड़ता एक लेखक को सीमित कर देती हैं। नरेन्द्र कोहली जड़ता को ‘रचनात्मक दृढ़ता’ से अपदस्थ करने वाले विवेकशील लेखक हैं। राजनीति से जुड़े विषयों में उनका विवेक विशेष रूप से देखा जा सकता है। वे असंगति पर आक्रमण करते हुए भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ मूल्यों को बचाने का प्रस्ताव रखते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में नरेन्द्र कोहली के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • 20-Best Stories From Italy (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-1141

    Availability: In stock

    What is an anthology, if aot an amalgamation of words?
    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from lands that are as enigmatic as they are intriguing. Italian folktales are world famous for theirstory-telling flow—natural, simple and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, out beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.
    With stories like Lionbruno and Aurelia, Jatagim—Chief of Robbers, Great Mathilda, Love cannot be Replaced, The Evil-Hearted Right-Hand Squire, The Wizard of Lagotorbido, Romolo and Remolo, this book is a compilation of 20 famous Italian folktales. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.
    Time to indulge in some old-world charm all the way from Italy.
  • Ek Nirvasit Maharaja (Paperback)
    Navtej Sarna
    200 180

    Item Code: #KGP-311

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Satta Ke Aar-Paar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    35

    Item Code: #KGP-932

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    -इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Nadi Ke Saath Bahate
    P.S. Ramanunj
    65 59

    Item Code: #KGP-1853

    Availability: In stock

    'नदी के साथ बहते' श्री पी०एस० रामानुजं की कन्नड़ कविताओं का हिन्दी में श्री टी०आर० भट्ट द्वारा प्रस्तुत हिन्दी काव्यान्तर है । प्रसन्नता की बात है कि काव्यांतर  की भाषा अनुवाद जैसी नहीं लगनी प्रत्युत मौलिक कविता लगती है। कहीं-कहीं कन्नड़ रग अवश्य है,  पर वह उचित ही है । उसमें कविता को मर्मस्पर्शिता बढ़ जानी है । श्री रामानुजं के काव्य में एक क्लासिक कविता का गुण है जिसमें भावोछवास संयत रूप में है।
  • Keral Ka Krantikari
    Vishnu Prabhakar
    120 108

    Item Code: #KGP-1195

    Availability: In stock


  • Prachin Unani Kahaniyan
    Rangey Raghav
    340 306

    Item Code: #KGP-06

    Availability: In stock

    प्राचीन यूनानी कहानियाँ
    यूनानी संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाली ऐसी कहानियों का संग्रह, जो वहाँ के अतीत जीवन की अत्यंत रोचक झाँकी प्रस्तुत करती हैं ।
  • Manvadhikar Ki Aseemit Sarhadein (Paperback)
    Pushpa Sinha
    150

    Item Code: #KGP-477

    Availability: In stock

    इक्कीसवीं सदी को मानवाधिकर एवं टेक्नोलोजी की सदी माना जा रहा है। मानवाधिकर प्रकृति द्वारा दी गई जीवन की जरूरी शर्तें हैं जिसमें मानव अपना जीवन स्वेच्छा से मर्यादापूर्वक जी सके। हर धर्म  एवं शास्त्रों में यह माना गया है कि प्रत्येक मानव जन्म से समान एवं स्वतंत्र है।
    लेकिन हमारी दुनिया की सामाजिक व्यवस्था ऐसी है जो एक मानव को दूसरे मानव से विभिन्न आधारों पर, जैसे—लिंग, धर्म, जाति, स्थान विशेष, भाषा आदि के द्वारा ऊंच या नीच समझता है। तब ऐसी स्थिति में मानव के जीवन एवं मर्यादा की रक्षा के लिए मानवाधिकार शब्द का आविष्कार किया गया। अतः सही मायने में मानवाधिकार एक सभ्य समाज के जीवन-शैली की रूपरेखा है जिसमें सभी अधिकार सभी को मिल सकें।
    मानव के अपने मूल-अधिकारों के हनन से ही समाज में असंतोष फैलता है, जो धीरे-धीरे उग्र होकर हिंसा का रूप लेता है, जिसके फलस्वरूप आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी भयानक सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है।
    अतः मानवाधिकार का मूल-मंत्र है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। समाज में अधिकार और कर्तव्य का ताना-बाना बहुत सूक्ष्म है, यानी कि प्रत्येक मानव द्वारा हर पल सही कर्म करने की गति हो तभी ‘मानवाधिकार की असीमित सरहदें’ पार की जा सकती हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Suryabala
    Suryabala
    230 207

    Item Code: #KGP-418

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सूर्यबाला ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रेस', 'बिन रोई लड़की', 'बाऊजी और बंदर', 'होगी जय, होगी जय...हे पुरुषोत्तम नवीन !', 'न किन्नी न', 'दादी और रिमोट', 'शहर की सबसे दर्दनाक खबर, 'सुमिन्तरा की बेटियां', 'माय नेम इश ताता' तथा 'सप्ताहांत का ब्रेकफास्ट'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सूर्यबाला की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kahanikar Kamleshwar : Punarmulyankan
    Pushp Pal Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-879

    Availability: In stock

    ‘नयी कहानी’ की प्रसिद्ध त्रयी के प्रमुख पुरोधा रूप में उभरे कमलेश्वर निश्चय ही प्रेमचंदोत्तर समय के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अत्यंत लोकप्रिय कहानीकार हैं। ‘नयी कहानी’ के समय से लेकर नयी शती के प्रथम दशक तक अपने को उन्होंने निरंतर सृजनशील रखा, एक से एक बढ़कर उम्दा और सशक्त कहानियां रचकर। ‘राजा निरबंसिया’, ‘खोई हुई दिशाएं’, ‘जार्ज पंचम की नाम’, ‘मांस का दरिया’ से लेकर ‘मानसरोवर के हंस’, ‘इतने अच्छे दिन’, ‘तुम्हारा शरीर मुझे पाप क लिए पुकारता है’, ‘सफेद सड़क’ जैसी कितनी ही कालजयी और विश्वस्तरीय श्रेण्य कहानियां उनके खाते में हैं जिन्होंने हिंदी कहानी का चेहरा पूरी तरह बदलकर रख दिया। सहास विश्वास नहीं होता कि कहानी के ललित कोमल स्वरूप में उन्होंने बौद्धिकता का ऐसा निर्मोक प्रदान कर दिया कि वह चिंतन-स्तर पर पाठक को इतना उद्वेलित कर सकने की क्षमता से युक्त हो सकी है। 
    प्रख्यात कथा-समीक्षक डाॅ. पुष्पपाल सिंह ने अपनी प्रखर और पूर्ण निष्पक्ष दृष्टि से कमलेश्वर के समग्र कहानी-साहित्य का यह अत्यंत सुचिंतित अध्ययन प्रस्तुत किया है, यदि वे कमलेश्वर की कहानियों के श्रेष्ठ पर रीझकर उनका पूर्ण निस्संग और उन्मुकत भाव से विश्लेषण करते हैं तो उनके श्याम पक्ष और न्यूनताओं का भी रेखांकन इसी बेबाकी से करते हैं।
  • Manzil Abhi Door Hai
    Shanta Kumar
    225 203

    Item Code: #KGP-9030

    Availability: In stock

    मंजिल अभी दूर है
    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमने एक मंजिल तय की, एक संकल्प लिया उस मंजिल तक पहुँचने का, परंतु आधी सदी बीत जाने के बाद भी हम उस मंजिल तक पहुँचे नहीं है । इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि या तो हम चले ही नहीं या फिर मंजिल के लिए जो रास्ता चुना, वह ठीक नहीं था ।
    लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली और उस प्रणाली को चलाने वाले नेता-दोनो ही आज की इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। आधी सदी पूरी हो चुकी है। एक प्रणाली का परीक्षण हो चुका है । अब इस बात की आवश्यकता है कि उस संसदीय प्रणाली पर पुनर्विचार किया जाए और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उचित संशोधन किया जाए ।
    जब भारत का संविधान बनाया गया तो संविधान निर्माताओं ने विश्व की अन्य प्रणालियों की सार्थकता तथा उपयोगिता पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया । उन सबके मन में ऐतिहासिक कारणों से एक बात घर कर गई थी कि भारत के लिए ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली ही उपयोगी है क्योंकि पिछले लगभग 200 वर्षों से भारत किसी न किसी प्रकार से इस प्रणाली से जुडा रहा ।
  • Shankar Shesh Ke Naatakon Mein Sangharsh Chetna
    Hemant Kukreti
    280 252

    Item Code: #KGP-9097

    Availability: In stock


  • Lomad Vesh
    Rameshwar Prem
    60

    Item Code: #KGP-1818

    Availability: In stock

    लोमड़ वेश 
    लोमड़ वेश चरित्रों के माध्यम से ऐसी रंगयात्रा के लिए रंगसमूहों और दर्शकों की भागीदारी का रेखांकन है जो लोकधर्मी नाटकों की विरासत है । बेन जान्सन कृत विश्वप्रसिद्ध नाटयकृति वालापोनि के  कथासूत्रों पर आधारित लोमड़ वेश मनुष्य की नकारात्मक प्रवृत्तियों यथा लोभ, प्रपंच, ईषर्या-द्वेष की परत-दर-परत दो अनावृत्त करते हुए समकालीन रंगभाषा का अप्रतिम उदाहरण है ।
  • Saptam Abhiyaan
    Sunil Gangopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-2009

    Availability: In stock

    सप्तम अभियान
    अपनी की आकांक्षाएँ, लिप्साएँ उसे कहाँ से कहाँ तक पहुँचा देती हैं इसका जीवंत चित्रण 'सप्तम अभियान' में सुनील गंगोपाध्याय ने किया है । आपसी द्वंद्व, घृणा, कुंठा, अतृप्ति आदि से भागकर आदमी प्रेम और सहयोग की तलाश करता है, दर-दर भटकता है, परन्तु अन्तत: पाता है कि हर जगह एक-सी ही स्थितियाँ व्यक्ति और समाज को घेरे हुए है । छोटे-छोटे स्वार्थ से लेकर बड़ी-बड़ी महत्त्वकांक्षाओं की पूर्ति तक मनुष्य को क्या-क्या नहीं करना पडता, कैसे-कैसे रूप नहीं धारण करने पडते ? व्यक्ति के अन्तरमन की इन्हीं उलझनों को दर्शाता है यह उपन्यास ।  साथ ही यह भी कि मनुष्य जीवन में असफलताओं का दौर चलता ही रहता है किन्तु व्यक्ति अगर साहस न छोडे, प्रयास-विमुख न हो तो सफलता उसको मिलती ही है, वह अपने अभियान में सफल होता ही है ।
    साहित्य अकादमी से पुरस्कृत बंगला लेखक सुनील गंगोपाध्याय का एक ऐसा रहस्यात्मक और रोमांचक स्थितियों से भरपूर उपन्यास जिसे बीच में छोड पाना किसी भी पाठक के लिए असंभव है ।
  • Bheer Mein Akela
    Vishv Nath Gupta
    35 32

    Item Code: #KGP-1917

    Availability: In stock

    भीड़ में अकेला
    गाँव से पलायन करके शहर में आने वाला आदमी अपने गम के सागर में इस तरह डूब जाता है कि उससे बाहर निकलने की कोई राह उसे नजर नहीं आती । शहर में नया होने के कारण शुरू-शुरू में उसे भ्रम होता है । जल्दी ही उसका वह भ्रम टूट जाता है । जब वह शहर की भीड़ में गुम होता है तो उसे अहसास होता है कि उसका अस्तित्व वहाँ पर वैसा ही है जैसा समुद्र में एक लहर का । अपने दिल की बात वह किसी से कहना चाहता है, लेकिन उसे सुनने की किसी को फुर्सत ही नहीं है । उसे अपनी जिन्दगी ज़हर- सी लगती है ।  उसका मन उडने के लिए छटपटाता है, लेकिन एक परले परिन्दे की तरह वह कहीं उड़ नहीं सकता । बेबस-सा, असहायता झेलता रहता है वह उस गम की जिन्दगी को और पीता रहता है उसके जहर को ।
    गाँव के आदमी की इसी त्रासदी को रूपायित किया है कवि विश्वनाथ गुप्त ने अपनी गज़लों में, जो सीधे-सादे शब्दों में, बिना किसी लाग-लपेट के उसकी दास्तां बया करती है ।
  • Bhaykaal
    Ashok Gupta
    200 180

    Item Code: #KGP-483

    Availability: In stock

    अशोक गुप्ता का उपन्यास ‘भयकाल’ मूलतः सामाजिक उपन्यास है। कथाविन्यास को देखें तो यह मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणात्मक है। मनुष्य अपने संस्कार और रुचियों में ऐसी ग्रंथियां पाल लेता है कि वह अपने प्रिय परिवारजनों, यहां तक कि अपने वंशजों से भी भयाक्रांत रहता है और निरंतर अपनी दुर्गति की कल्पना से व्यथित रहता है। अशोक गुप्ता ने उपन्यास के एक चरित्र मिलकीत तनेजा के माध्यम से इस मनोवैज्ञानिक ग्रंथि के वैयक्तिक और पारिवारिक परिणाम का चित्रण किया है।
    दूसरी ओर, जानकी बल्लभ और भानुमती (भानुमती के कई नाम हैं। ये नाम परिस्थितियों और उसके चरित्र के घात-प्रतिघात से उसे मिल गए हैं। उसका एक नाम ‘करिया छबीली’ भी है) के साहसिक और संघर्षमय जीवन कथा के माध्यम से स्वातंत्र्योत्तर भारत के मानवीय और प्रगतिशील बदलाव या विकास का भी चित्रण किया गया है। दोनों प्रकार की कथाएं समांतर शैली में साथ-साथ चलती हैं। पात्र परस्पर टकराते भी हैं। इससे कथा रस का आस्वाद पाठकों को मिलता है और मोनोटोनी नहीं आने पाती है।
    गांवों में गैरजिम्मेदार और बिगड़ैल किशोर किस तरह के कुकृत्य करते हैं और कमजोर तबके के लोगों को सताते हैं इसका मार्मिक और मनोरंजक (भी) वर्णन है। समाज में बुरे लोग हैं तो अहेतु की सहायता करने वाले भी हैं।
    मुझे इस कथाकृति में यह बात विशेष रूप से अच्छी लगी कि आज जब हताशा और दिशाहारा प्रवृत्तियां हमारे साहित्य में आसन जमाए बैठी हैं, अशोक गुप्ता की यह रचना सामाजिक यथार्थ के आधार पर, रचनात्मकता से स्तर पर बने रहते हुए, प्रगतिशीलता और विकास की कथा कहती है।
    उपन्यास की भाषा और संवाद अपनी ताजगी से पढ़ने वालों और विचारकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। अशोक गुप्ता मूलतः कहानीकार हैं और यह कृति उपन्यास होने के साथ बिखराव के बावजूद कहानी का भी रस देती है।
  • Kaaveri Se Saagar Tak
    P.S. Ramanunj
    120 108

    Item Code: #KGP-1859

    Availability: In stock

    कावेरी से सागर तक
    श्री रामानुज की कविता, कविता होने की शर्त पर, संपूर्णतया सामाजिक है और कवि के निजत्व की रक्षा करती हुई भी अपने समय के समाज की चिंता को अभिव्यक्त करती हैं । निजत्व उनकी गहन अनुभूति या कुशल अभिव्यक्ति का है और समाज की चिंता मूल्यहीनता तथा आडंवर को लेकर है। ये कविताएं शोषक और शोषित, सामंतवाद और पूँजीवाद, आभिजात्य और निम्नवर्ग के बँटवारे की कविताएँ नहीं  हैं; ये मनुष्य, उसके परिवेश, उसकी बदली हुई मनोवृति और तत्परिणामी संवेदनहीनता की चिंता की कविताएँ हैं। पुराकथा, प्रचीन संस्कृति और इतिहास से शक्ति ग्रहण करती हैं और भारतीय संस्कृति तथा काव्य-परंपरा से हैं, पर अतीतजीवी, कल्पनाजीवी और पलायनवादी न होकर वर्तमान से सीधे साक्षात्कार करती हैं । जाति-वर्ग और प्रदेश को लांघकर भारतीय परिवेश का प्रतिविंवित करती हैं, अत: सच्चे अर्थ में भारतीय हैं । किसी भी धर्म-संप्रदाय के पक्ष या विपक्ष में खडी नहीं होतीं, बल्कि सीधे मानवीय धर्म को प्रकाशित करती हैं, इसलिए तत्त्वत: धर्म-निरपेक्ष  । संयत छोर शालीन है, अतएव अभिजात है ।
  • Mahadevi Ki Kavita Ka Nepathya
    Vijay Bahadur Singh
    125 113

    Item Code: #KGP-9115

    Availability: In stock

    महादेवी की कविता का नेपथ्य
    मुझे लगता है, समकालीन स्त्री-जीवन के भीतर रचे-बसे आदिम राग का सबसे सघन, तीव्र और सूक्ष्म प्रतिबिंबन इस कविता में बतौर एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ के रूप में उपलब्ध है। स्त्री अपने आसपास को किन आँखों से देखती है, उसके प्रति कैसी ऐंद्रिक प्रतिक्रियाएँ करती है और सृजन की भूमि पर उतरकर किस असाधारण खूबसूरती से उसकी पुनर्सृष्टि करती है, वह समूची प्रक्रिया यहाँ परखी और महसूस की जा सकती है।
    महादेवी के गीत आदिम स्त्री-मन के भी गीत हैं और उस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक मन के भी, जो सभ्यताओं के कई-कई वार झेलकर भी अविकृत रह सका है। स्त्री का यह मन कितना तरल, मृदुल, कितना विनयी, समर्पण- शील किंतु कितना आत्मचेतस और आत्मविश्वासी है, इसे महादेवी के शब्द-शब्द में अनुभव किया जा सकता है। निसर्ग और जीवन, उसकी सारी गतियाँ और भंगिमाएँ कुछ भी तो उसकी पहुँच से बाहर नहीं है। आधुनिक पुरुष की भाँति वह इस जीवन को केवल उपभोग का साधन मानने को तैयार नहीं। महादेवी की कविता उसमें एक रागपूर्ण कृतज्ञता का अनुभव कराती है और उस राग सम्मोहन का भी, जिसके बगैर कविता ही नहीं, जीवन भी बेमानी है। महादेवी की कविता इसी विराट् राग की सबसे सम्मोहक अनुगूँज है।
    वह जीवन के स्थूल व्यापारों से उन सूक्ष्म गतिविधियों तक व्यापी हुई है, जहाँ लोक और लोकोत्तर एक होकर रहस्यमय हो उठे हैं, किंतु यह रहस्यमयता जीवन का निषेध नहीं, उसकी उन उदात्त ऊँचाइयों की ओर इशारे करती है, जहाँ कविता मनुष्यता की परिभाषा ही नहीं, उसकी जीवंत पहचान भी बन जाती है।
  • Doobte Waqt
    Dixit Dankauri
    150 135

    Item Code: #KGP-1901

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।

  • Yahin Kahin Hoti Thi Zindagi
    Ajeet Kaur
    300 270

    Item Code: #KGP-9218

    Availability: In stock

    अजीत कौर की अपनी एक खास ‘कहन’ है, जिसके कारण उनकी कहानियां बहुत सादगी के साथ व्यक्त होती हैं और पाठकों की संवेदना में स्थान बना लेती हैं। ‘यहीं कहीं होती थी जिंदगी’ उनका नया कहानी संग्रह है। पंजाबी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां विषयवस्तु से नयापन लिए हैं और शिल्प के एतबार से पाठक को अजब सी राहत देती हैं। एक एक महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह है, न केवल पठनीयता से समृद्ध है बल्कि एक दार्शनिक वैचारिक संपदा से भी संपन्न है। अजीत कौर की रचनात्मक सुघड़ता तो सर्वोपरि है ही।
  • Sikha Acharshastra
    Satayendra Pal Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-453

    Availability: In stock

    सिख गुरु साहिबान ने मानवता पर सबसे बड़ा परोपकार किया धर्म को धीर-गंभीर शब्दों के इंद्रजाल और कर्मकांडों के भंवर से मुक्त करके। उन्होंने कहा कि ऐसा पांडित्य और विद्वत्ता व्यर्थ है, खच्चर पर लदे भार व कुंचर स्नान की तरह, यदि इंद्रियां वश में नहीं और आचरण शुद्ध-पवित्र नहीं। इसका एक मात्र उपाय है परमात्मा की शरण में उसकी कृपा प्राप्ति जिससे मन ज्ञान के सूर्य से उद्दीप्त हो उठे। धर्मानुकूल आचार के लिए मन पर सतिगुरु ज्ञान का अंकुश आवश्यक है। सार्थक-सफल जीवन योग्य ज्ञान-चक्षु प्राप्त करने की जो राह सिख गुरु साहिबान ने दिखाई उस ओर ले चलने का संपुष्ट प्रयास है यह पुस्तक जिससे सभी वैयक्तिक व सामाजिक प्रश्नों के उत्तर खोजे जा सकते हैं।
  • Jalti Chhaya
    Prabha Saxena
    50 45

    Item Code: #KGP-9068

    Availability: In stock


  • Manch Andhere Mein (Paperback)
    Narendra Mohan
    60

    Item Code: #KGP-1335

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Aalaap-Vilaap
    Rajendra Laharia
    150 135

    Item Code: #KGP-298

    Availability: In stock

    आलाप-विलाप
    कथाकार राजेन्द्र लहरिया के उपन्यास अपने समय से मुठभेड़ करते कथ्य के साथ ही मर्म को छुने वाले होते हैं और उनका शिल्प भी नव्यता से भरा और पाठकीय जिज्ञासा को उकसाने वाला होता है । वे अपने उपन्यासों को 'कहानी' की तरह साधते हैं, जहाँ कुछ भी फालतू होने  (लिखने) की गुंजाइश नहीं होती । 'आलाप-विलाप' भी इसका अपवाद नहीं है । बकौल लेखक, 'सकेतों की 'भाषा मनुष्य हमेशा से समझता आया है । कोई कहानी या उपन्यास लिखते वक्त मेरा ध्यान इस बात पर हमेशा बना रहता है कि मेरा काम यदि एक शब्द लिखने से चलता है तो अनावश्यक दस शब्द क्यों लिखूं! शब्दों की फिजूलख़र्ची तो कई तरह के नुकसान करती है... 
    'आलाप-विलाप' के बारे में एक सुधी पाठक की राय द्रष्टव्य है : 'कथाकार राजेन्द्र लहरिया का लपन्यास 'आलाप-विलाप' मार्मिकता से भरा व मूलत: राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक छदमों को उदूघाटित करता है। जीवन की भयावह स्थितियों इस उपन्यास को जीवंत कथ्य देती है । छोटे-छोटे उपकथानकों में परिवेश की  पीड़ाओं के झकझोरने वाले वर्णन इसके प्रभाव को सघन करते हैं। हमारे समय की एक प्रमुख समस्या नक्सलवाद के उभार और उसकी वजहों को भी इस उपन्यास में देखा-पहचाना और समझा जा सकता है । प्रशासनिक और सांस्कृतिक-साहित्यिक छदमों और पाखंडों की लीलाएँ गरीब, कमजोर और संवेदनशील व्यक्तियों तथा तबकों को क्या-क्या नचाती हैं, इसका-दिलचस्प और बेधक दिग्दर्शन इस उपन्यास में है। और खास बात यह है कि  अँधेरे समय और स्याह चरित्रों के बीच भी उम्मीद की  कौंध से भरे कुछ ऐसे उजले चरित्र यह उपन्यास हमें देता  है, जो लड़ाई को बेहद कठिन समझते हुए भी अविचल  रूप से संघर्ष करते है, और इसलिए उनकी हार भी हमें  निराशावाद की ओर नहीं ले जाती । वह इस छोटे से उपन्यास  की बड़ी खुबी है... 
    कहा जा सकता है कि 'आलाप-विलाप' आकार से लघु, मगर सरोकार में बडा उपन्यास है ।
  • Hindi Ghazal, Yaani…
    Dixit Dankauri
    190 171

    Item Code: #KGP-9086

    Availability: In stock


  • Desh-Desh Mein, Gaon-Gaon Mein
    Urmila Jain
    180 162

    Item Code: #KGP-9185

    Availability: In stock

    ब्रिटेन, फ्रांस, लैटिन अमेरिकी तथा विश्व के अन्य अनेक देशों के भूगोल और इतिहास की खाक छानते हुए लेखिका ने अपनी जानकारियों, सूचनाओं के परिचय को तो यहां बढ़ाया ही है, साथ ही वह रवानगीपूर्ण भाषा-शैली में पाठक को भी उस स्थल विशेष की सैर करा पाने में सफल हुई है। विश्व के नक्शे पर चहलकदमी करने का जिस सहजता से मौका लेखिका निकाल लेती है-वह एक ओर तो विश्व-ग्राम की परिकल्पना को संभव बनाता प्रतीत होता है तथा दूसरी ओर ये वृत्तांत आम पाठक को वैसा ही करने को अधीर बनाते हें। किसी भी साहित्यिक रचना का यही सर्जनात्मक अवदान होता है, जो इस पुस्तक में पर्याप्त रूप से मयस्सर हुआ है। 
    डाॅ. उर्मिला जैन की इन यात्राओं में एक और बात उल्लेखनीय है कि वह नारी-मन के साथ, भारतीय मानसिकता की सांस्कृतिक-सामाजिक ऊंचाइयों को लेकर यात्रा करती हैं और इसीलिए पाठक को वह उन चुनिंदा पर्यटक-स्थलों या भूगोल के जाने-अनजाने कोने-अंतरों में ले जा पाई हैं, जहां आधुनिक विश्व के मनुष्य का (और खास तौर से नई नारी का) निर्माण हो रहा है। कृति में यात्रा के रोमांचक क्षण भी जहां-तहां आते हें और उनकी लोकमहर्षक प्रतिध्वनियां पाठक के मस्तिष्क में देर तक गूंजती रहती हैं।
    यह किताब उन यात्रापसंद पर्यटकों के लिए भी प्रेरणादायिनी सिद्ध होगी, जो किन्हीं संकोचवश अपने यात्रानुभवों को शब्दांकित करने से स्वयं को बाधित किए हुए हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhukar Singh
    Madhukar Singh
    200 180

    Item Code: #KGP-14

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मधुकर सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'तक्षक', 'अगनुकापड़', 'उसका सपना', 'हरिजन सेवक', 'दुश्मन', 'कवि भुनेसर मास्टर', 'भाई का जख्म', 'लहू पुकारे आदमी', 'सत्ताचारी' तथा 'माई' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मधुकर सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Hindustan Aur Pakistan Ki Behatreen Urdu Haasya-Vyang Shaaeree
    T.N. Raj
    395 356

    Item Code: #kgp-1910

    Availability: In stock

    उर्दू ज़बान अपनी शीरीनी, लताफ़त और नज़ाकत के सबब सदियों से लोगों के दिलों पर राज कर रही है। उर्दू शायरी ख़ास तौर पर ग़ज़ल लिखने, पढ़ने, सुनाने या गाने वाला शख्स हमें कहीं न कहीं मिल ही जाता है । मीर, ग़ालिब, इकबाल, दाग, फ़ैज, फ़िराक़, जिगर और साहिर वग़ैरा की शायरी का जादू हमेशा बरकरार रहेगा । यह मानने में कोई हरज नहीं कि उर्दू की संजीदा शायरी के मुकाबले में अभी हास्य व्यंग्य कविता में बहुत-सी गुंजाइशें बाक़ी हैं । जहाँ तक उर्दू नस्र (गद्य) में हास्य-व्यंग्य का तआल्लुक है यह बात पूरे यकीन से कही जा सकती है कि इसमें अनमोल हीरों और मोतियों की कोई कमी नहीं ।
  • Mahan Vibhutiyon Ka Adhura Bachpan
    Vinod Kumar Mishra
    200 180

    Item Code: #KGP-247

    Availability: In stock

    महान् विभूतियों का अधूरा बचपन
    विश्व की अनेक महान् विभूतियाँ बचपन में ही गंभीर विकलांगता का शिकार हो गई थीं। विकलांगता अपने साथ शारीरिक कष्ट के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक व सामाजिक दुःख भी लाती है। इन विभूतियों ने विकलांगता का सामना एक सामान्य चुनौती की भाँति किया और समस्त संसार उनकी उपलब्धियों व योगदानों के समक्ष नतमस्तक हो गया।
    दूसरी ओर एक आम अच्छा-भला व्यक्ति मामूली समस्याओं से झुँझला जाता है और लक्ष्य पूरा न हो पाने  के लिए परिस्थितियों को अधिक दोष देने का प्रयास करता है।
    प्रस्तुत पुस्तक न केवल इन महान् व्यक्तियों का उदाहरण देते हुए आम बच्चों को चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करती है वरन् यह भी बताती है कि किस प्रकार आम बच्चों व विकलांग बच्चों के बीच सम्मानजनक समन्वय होना चाहिए।
    वास्तव में विकलांगता बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करती है और यदि परिस्थितियाँ अनुकूल बना दी जाएँ तो विकलांगता का प्रभाव न्यूनतम हो जाता है। अतः यह आवश्यक है कि भौगोलिक परिस्थितियों के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था को भी अनुकूल बनाया जाए ताकि विकलांगजनों व शेष समाज के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो और उनकी अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित हो।
  • Doston Ke Jaane Par Kamleshwar Ki Yadein
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-403

    Availability: In stock


  • The Kindling Touch (Paperback)
    Debabrata Dasgupta
    195

    Item Code: #KGP-330

    Availability: In stock

    t is not all to describe Madame Curie simply as a devoted scientist; she is a radiant milestone in the realm of modern science. Her whole life carries a divine message. The life that nurtured her, gave her feed for the mind and body, was not at all strewn with flowers. Rather, feelings of want, insecurity and doubts tried to strangle her like the tentacles of an octopus. In the dark, deep jungle of uncertainties that was her early life, where there were chances of slippage at every step, she had ventured forward with resolution and courage and finally reached her glorious destination.
  • Puraskrit Bachchon Ki Gaurav Gathayen
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-319

    Availability: In stock

    जिस तरह हर इंसान के भीतर एक बच्चा छिपा होता है, उसी तरह हर बच्चे के अंदर भी एक जिम्मेदार नागरिक का भाव रहता है। परिस्थिति आने पर बच्चे की उम्र से परे यह भाव परिलक्षित भी हो उठता है। राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित बच्चों के भीतर भी यही जिम्मेदारी नजर आती है। बालपन में भी दूसरों के लिए अपनी जान तक की बाजी लगा देना इन बच्चों के भीतर छिपे जिम्मेदार नागरिक की पहचान ही तो है। 
    आज जबकि ‘बड़े’ अपनी जिम्मेदारियां भूलते जा रहे हैं या समय आने पर उनसे बच निकलने का प्रयास करते हैं, बच्चों में जिम्मेदारी का यह भाव न केवल सराहनीय बल्कि अनुकरणीय भी है। हमारा यह भी फर्ज बनता हे कि बच्चों के प्रयास को समाज के सामने लाएं। शायद यही वजह है कि अब तो मुझे ही साल जनवरी माह के तीसरे सप्ताह में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों से मुलाकात का इंतजार रहने लगा है। 
    इस पुस्तक को तैयार करने में सक्रिय सहयोग देने के लिए मैं अपने साले साहब विनोद गुप्ता का विशेष आभार प्रकट करना चाहूंगा। दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अपने स्थानांतरण के चलते उनके सहयोग कि बिना मेरे लिए यह पुस्तक तैयार कर पाना निस्संदेह मुश्किल था।
    —संजीव गुप्ता 
  • Pratidin (3 Vols.)
    Sharad Joshi
    1350 1215

    Item Code: #KGP-859

    Availability: In stock

    प्रतिदिन (तीन खंड)
    शरद जोशी के व्यंग्य कॉलम 'प्रतिदिन' पर लिखते हुए बहुत- सी बातें मेरे मन मैं हैं ।
    सबसे पहले मेरे मन से वे दिन आ रहे हैं, जब ‘नवभारत टाइम्स' के आखिरी पन्ने के कोने में, शरद जोशी की फोटो के साथ बमुश्किल तमाम दस-पंद्रह पंक्तियों से लेकर पच्चीस- तिस पंक्तियों तक का छोटा-सा व्यंग्य कॉलम लगभग रोज आता था । इस छोटे-से कोने ने तब देश में अखबार पढ़ने के तरीके बदल दिए थे । हम जैसे तमाम लोग पिछले पन्ने से अखबार शुरू करने लगे थे । उत्सुकता रहती थी कि शरद जोशी ने आज किस विषय पर कैसा, क्या लिखा होगा? किस कोण से ? क्या उठाया ? तुमने पढा ? वाह यार !
    शरद जोशी ने सात सालों तक रोज एक नया विषय उठाया, उसे एकदम नईं दृष्टि से देखा और फिर उसे एकदम नई भाषा-शैली के प्रयोग से ऐसा बनाया कि उन दिनो 'नवभारत टाइम्स' का वह कोना मानो फैलकर 'पूरे अखबार पर छा गया था । और अखबार पर ही क्यों, यह तो मानो पाठको की पूरी कायनात पर छा गया था । ऐसा व्यंग्य कॉलम न तो पहले लिखा गया था, न सोचा ही गया था । कुछ ही दिनो से वह इतना लोकप्रिय हो गया था कि यह अफवाह रहती थी कि एक जमाने में शरद जोशी का पेमेंट राजेन्द्र माथुर (जो अखबार के संपादक थे) से ज्यादा हो गया था । उसकी लोकप्रियता के चलते 'टाइम्स आँफ इंडिया' से उसके अंग्रेजी अनुवाद देने की कोशिश भी की गई । तब यह बात और भी विहित से सामने आई कि शरद जोशी जैसे जमीनी लेखक की मुहावरेदार और स्थानीय गमक से समृद्ध भाषा का अनुवाद करना लगभग असंभव बात है ।
    आज सालों के अंतराल के बाद 'प्रतिदिन' में लिखी ये अद्भुत व्यंग्य रचनाएं जब एक साथ इस संकलन से जा रही हैं-तब इनका पुनर्पाठ आपको शरद जोशी की ऐसी विलक्षण प्रतिभा से साक्षात्कार कराता है, जिसकी याद उसके जाने के बाद व्यंग्य में उत्पन्न और व्याप्त बियाबान में और भी शिद्दत से आ रही है। -ज्ञानचतुर्वेदी
  • Doosara Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    200 160

    Item Code: #KGP-775

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Gulmohar Phir Khilega
    Kamleshwar
    300 270

    Item Code: #KGP-46

    Availability: In stock


  • Rigveda : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    140

    Item Code: #KGP-7109

    Availability: In stock

    ऋग्वेद : युवाओं के लिए
    यहाँ ऋग्वेद के मन्त्रों की व्याख्याएँ उसे सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं, जिनसे आज का 'कंप्यूटर-सेवी' युवा किसी भी स्थिति में निरपेक्ष नहीं रह सकेगा । पारंपरिक ज्ञान की अमूल्य धरोहर उसके हाथों में रखने का प्रयास है यह पुस्तक । 
  • Akbar-Beerbal Ki Praamaanik Kahaniyan
    Hari Krishna Devsare
    175 158

    Item Code: #KGP-194

    Availability: In stock

    अकबर-बीरबल की प्रामाणिक कहानियां 
    अकबर-बीरबल की इन कहानियों में केवल मनोरंजक, हाजिरजवाबी और चतुराई की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इनमें भारतीय इतिहास की दो महान् विभूतियों के व्यक्तित्व के विविध गुणों और विशेषताओं के भी दर्शन होते हैं । इन कहानियों में विद्वानों-गुणी  ज़नों का आदर है, कुशल प्रशासन है, न्याय की तराजू पर किए गए फैसले और सामान्य जनता के कल्याण हेतु कार्यों जैसे पहलू भी उजागर होते हैं ।
    यों तो अकबर-बीरबल के किस्सों में काफी मिलावट हुई है, फिर भी उससे बचकर कुछ ऐसी चुनिंदा कहानियां ही यहाँ प्रस्तुत हैं, जो इतिहास की इन दोनों महान् विभूतियों की गरिमामयी छवि प्रस्तुत कर  सकें । आशा है, पाठक इन्हें रुचिकर पाएंगे ।
  • Kavi Ne Kaha : Gyanendrapati (Paperback)
    Gyanendrapati
    90

    Item Code: #KGP-1409

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ज्ञानेन्द्रपति
    ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है । जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है ।  वे  कविता के नहीं, उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिसकी प्रस्तावना की थी । उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है । बेशक, यह हर बार एक नये छन्द का अन्वेषण हैं जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-द्रव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मता से सम्भव होता है । हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहां खूब बन पडा है । तदभव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है न देशज अस्मृश्य; अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक और तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जनमत भूमि पर दृढ़ता से पाँव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है । धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता-वह किसी को नहीं बख्शती । उसकी दीठ प संतप्त भूगोल है । साम्राज्यबाद के नए पैंतरों का वह पहचानती है । अभय में पगी हूई करुणा उसे विरासत में मिली है । वह एक महान् परम्परा की परिणति है ।
    स्वयं ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं ही, आयामी संग्रेहों से भी कविताएँ शामिल है, बल्कि अनेक तो पहली बार यही प्रकाशित हो रही हैं । बिला शक अपने समाज-समय को कविता को आँख से देखना-समझना चाहने वालों के लिए एक अनिवार्य-किताब नहीं-सहचर! 

  • Sant Meeranbai Aur Unki Padaavali
    Baldev Vanshi
    295 266

    Item Code: #KGP-168

    Availability: In stock

    संत मीराँबाई और उनकी पदावली
    मीराँबाई  की गति अपने मूल की ओर है । बीज-भाव की ओर है । भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तित्व को, मूल को अर्जित किया है। आत्मिक, परम आत्त्मिक उत्स (कृष्ण) से जुड़कर जीवन को उत्सव बनाने में वह धन्य हुई । अस्तित्व की गति, लय, छंद को उसने निर्बंध के मंच पर गाया है। जीया है ।
    मीराँ उफनती आवेगी बरसाती नदी की भाँति वर्जनाओं की चटूटानें  राह बनाती अपने गंतव्य की ओर बे-रोक बढती चली गई । वर्जनाओं के टूटने की झंकार से मीराँ की कविता अपना श्रृंगार करती है। मीराँ हर स्तर पर लगातार वर्जनाओं को क्रम-क्रम तोड़ती चली गई । राजदरबार की, रनिवास की, सामंती मूल्यों की, पुरुष-प्रधान ममाज द्वारा थोपे गए नियमों की कितनी ही वर्जनाओं की श्रृंखलाएँ मीराँ ने तोड़ फेंकीं और मुक्त हो गई । इतना ही नहीं, तत्कालीन धर्म-संप्रदाय की वर्जनाओं को भी अस्वीकार कर दिया । तभी मीराँ, मीराँ बनी ।
  • Mere Saakshatkaar : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    350 280

    Item Code: #KGP-616

    Availability: In stock


  • Aacharya Chanakya
    Vishv Nath Gupta
    160 144

    Item Code: #KGP-251

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Egypt
    Prashant Kaushik
    325 293

    Item Code: #KGP-9313

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Egyptian short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Re’s Story, Isis, Osiris, The Greek Princess, The Shipwrecked Sailor, The Book of Thoth, Egypt’s Great Magician, this book is a compilation of 20 famous Egyptian short stories. 
    Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Egypt.
  • Shubhada (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150

    Item Code: #KGP-204

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है शुभदा और दूसरा है बड़ी दीदी।
  • Hindustan Aur Pakistan Ki Behatreen Urdu Haasya-Vyang Shaaeree (Paperback)
    T.N. Raj
    195

    Item Code: #KGP-7054

    Availability: In stock

    उर्दू ज़बान अपनी शीरीनी, लताफ़त और नज़ाकत के सबब सदियों से लोगों के दिलों पर राज कर रही है। उर्दू शायरी ख़ास तौर पर ग़ज़ल लिखने, पढ़ने, सुनाने या गाने वाला शख्स हमें कहीं न कहीं मिल ही जाता है । मीर, ग़ालिब, इकबाल, दाग, फ़ैज, फ़िराक़, जिगर और साहिर वग़ैरा की शायरी का जादू हमेशा बरकरार रहेगा । यह मानने में कोई हरज नहीं कि उर्दू की संजीदा शायरी के मुकाबले में अभी हास्य व्यंग्य कविता में बहुत-सी गुंजाइशें बाक़ी हैं । जहाँ तक उर्दू नस्र (गद्य) में हास्य-व्यंग्य का तआल्लुक है यह बात पूरे यकीन से कही जा सकती है कि इसमें अनमोल हीरों औरमोतियों की कोई कमी नहीं । 
  • Himanshu Joshi Rachana Sanchayan
    Himanshu Joshi
    995 896

    Item Code: #KGP-589

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sainikon Ki Veergaathayen
    Ram Kumar Bhramar
    350 315

    Item Code: #KGP-526

    Availability: In stock

    हिंदी में युद्ध-कथाओं के पाठक बहुत हैं, किन्तु युद्धकथाओं की संख्या उतनी नहीं है । कारण संभवत: यह  कि भारतीय मानस और उसका लेखक, युद्ध अथवा घटना क्रो लेकर स्तब्धता-बोध की जितनी अनुभूति करता है, उतनी उस बोध को दस्तावेजी तौर पर सुरक्षित करने में रुचि नहीं ले पाता । इस अरुचि का कारण यह भी हो सकता है कि वह संभवत: युद्ध-कथा को साहित्य का बहुत महत्वपूर्ण अंग नहीं मानता । पर मुझे लगता है कि साहित्य के बहुआयामी विधा-रूप में युद्ध-कथाओं का भी अपना एक महत्त्व है और उनसे राष्ट्रीय-बोध के साथ-साथ भूलों का भी इतिहास दर्ज होता रहता है । मैं जब-जब इस विचार और दृष्टि से उद्वेलित हुआ हूं, तब-तब मैंने इन रचनाओं को रचा । यह 'सामयिक साहित्य' होता है, मैं यह भी नहीं मानता, क्योंकि स्नेह-संबंधों में यदि शाश्वतता होती है तब युद्ध की पीडा अथवा राष्ट्रभक्ति की शहीदी में भी एक शाश्वत सत्य छिपा है  यह राष्ट्र-पूज़न है, अत: इस पूजन के फूल अपने पाठक-बंधुओं के लिए समर्पित करता हूं-शब्दपुष्पों का यह संग्रह देशभक्ति की महक देता रहे—इसी कामना के साथ ।
    —रामकुमार भ्रमर
  • Lauhpurush Sardar Vallabhbhai Patel-Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    80

    Item Code: #KGP-1410

    Availability: In stock

    सरदार वल्लभभाई पटेल
    सरदार वल्लभभाई पटेल को भारत के इतिहास में लौहपुरुष के रूप में जाना जाता है, जबकि विदेशी इतिहासकारों ने उनकी तुलना बिस्मार्क से की है। वे कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति थे और परिस्थिति फिर चाहे जैसी भी रही हो, अपने कर्तव्य का निर्वाह करने से नहीं चूके। इस संदर्भ में वह घटना याद आती है, जब वे अदालत में अपने मुवक्किल की पैरवी कर रहे थे कि तभी उन्हें उनकी पत्नी की मृत्यु से संबंधित तार मिला। उन्होंने वह तार पढ़ा और उसे अपनी जेब में रख लिया तथा मनोयोग से अपने कर्तव्यपालन में लगे रहे। उनका विचार था कि यदि वे अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते तो एक बेगुनाह को सजा हो जाती।
    सरदार पटेल की सहनशक्ति बड़ी अद्भुत थी। जब उनकी आयु केवल 9 वर्ष थी तो उनकी बगल में एक फोड़ा निकल आया था। फोड़ा पक गया था, जिस कारण उसमें मवाद बन गयी था। इस फोड़े के कारण उन्हें असहनीय पीड़ा होने लगी थी। ऐसे में उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए उस फोड़े को लोहे की गर्म सलाख से फोड़ दिया। इस आयु में इस तरह के साहस व सहनशक्ति के उदाहरण बहुत ही कम देखने को मिलते हैं।
    बाल्यावस्था से ही सरदार पटेल में निर्णय लेने की बड़ी अद्भुत क्षमता थी और उन्होंने जीवन में जो भी निर्णय लिए, उनमें सफलता भी प्राप्त की। पराधीन भारत में उन्होंने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें निडर, साहसी तथा वीर बनने का पाठ पढ़ाया, जबकि स्वतंत्रा भारत में उन्होंने देशी रियासतों को एकीकृत करने का जो गौरवशाली कार्य किया, वह हमारे सामने एकीकरण की आदर्श मिसाल है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल: जीवन दर्शन’ में सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी घटनाओं एवं तथ्यों को सरस, सरल एवं रोचक भाषा में समाहित करने का प्रयास किया गया है।
  • Jeevan Hamara
    Bebi Kambley
    120 108

    Item Code: #KGP-2099

    Availability: In stock

    जीवन हमारा
    मराठी लेखिका बेबी कांबले दलित साहित्य की प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । दलित लोगों के विपन्न, दयनीय और दलित जीवन को आधार बनाकर लिखे गए इस आत्मकथात्मक उपन्यास ने मराठी साहित्य में तहलका मचा दिया था। महाराष्ट्र के पिछडे इलाके के सुदूर गाँवों में अस्मृश्य माने जाने वाले आदिवासी समाज ने जो नारकीय, अमानवीय और लगभग घृणित जीवन का जहर घूँट-घूँट पिया उसका मर्मांतक  आख्यान है यह उपन्यास । शुरु से अंत तक लगभग सम्मोहन की तरह बाँधे रखने वाले इस उपन्यास में दलितो के जीवन में जड़ें जमा चुके अंधविश्वास पर तो प्रहार किया ही गया है, उस अंधविश्वास को सचेत रूप से उनके जीवन में प्रवेश दिलाने और सतत पनपाने वाले सवर्णो की साजिश का भी पर्दाफाश किया गया है । इस उपन्यास को पढ़ना महाराष्ट्र के डोम समाज ही नहीं वरन् समस्त पददलित जातियों के हाहाकार और विलाप को अपने रक्त में बजता अनुभव करना है । शोषण, दमन और रुदन का जीवंत दस्तावेज है यह उपन्यास, जो बेबी कांबले ने आत्मकथात्मक लहजे में रचा है ।


  • Vishwa Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-3
    Shuk Deo Prasad
    545 491

    Item Code: #KGP-699

    Availability: In stock

    विज्ञान कथाओं को कथा की एक विधा के रूप में मान्यता मिले, ह्यूगो गन्र्सबैक ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई और उन्होंने ही इसे ‘साइंटीफिक्शन’ नाम से अभिहित किए जाने का परामर्श दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने इस विधा को अपनी तरह से परिभाषित भी किया। ‘अमेजिंग स्टोरीज’ के प्रथमांक में संपादकीय टिप्पणी में गन्र्सबैक ने लिखा-‘साइंटीफिक्शन’ से मेरा अभिप्राय जूल्स वर्न, एच.जी. वेलस और एडगर एलन पो द्वारा लिखी गई ऐसी कहानियों से है, जिसमें आकर्षक रोमांच के साथ वैज्ञानिक तथ्य और युगद्रष्टा की दूरदर्शिता का सम्मिश्रण हो। ....आज विज्ञान कथा-साहित्य में चित्रित किए गए किसी आविष्कार के कल सत्य हो जाने में असंभव जैसा कुछ नहीं है।’
    गन्र्सबैक की इसी परिभाषा के कारण विज्ञान-गल्पों को ‘भविष्यद्रष्टा साहित्य’ भी कहा जाने लगा और लेखकों से ऐसी अपेक्षाएं की जाने लगीं जो निंतात अव्यावहारिक थीं।
    तो क्या विज्ञान कथाओं में आज के कल्पित आविष्कार कल के सच हैं? जी नहीं! ऐसा कदापि नहीं हो सकता। किसी भी गल्प में परिकल्पित कोई भी आविष्कार तदनुरूप कभी भी साकार नहीं हुआ। ऐसे सारे दावे मिथ्या हैं। हां, आविष्कारकों ने विज्ञान-गल्पों से प्रेरणाएं अवश्य ली हैं, इसकी स्वीकारोक्तियां हैं।
    ऐसा इसलिए असंभव है कि गल्पकार आविष्कारक नहीं है और आविष्कारक की गल्प-लेखन में मति-गति नहीं है। विज्ञान-गल्प-लेखन एक विरल विधा है, जिसमें विज्ञानसिद्धि और रससिद्धि दोनों वांछनीय हैं। और ऐसा संयोग विरल ही है।
  • Vigyan Aur Dharmik Manyataayen
    Vinod Kumar Mishra
    130 117

    Item Code: #KGP-9043

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar (Paperback)
    Kamal Kumar
    130

    Item Code: #KGP-412

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : कमल कुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    80

    Item Code: #KGP-1255

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : विष्णु प्रभाकर
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', "क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Phanishwar Nath Renu
    Phanishwarnath Renu
    225 203

    Item Code: #KGP-556

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के प्रस्तुत संकलन में जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रसप्रिया', 'नैना जोगिन', 'तीर्थोदक', 'तॉबे एकता चलो रे', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'पुरानी कहानी : नया पाठ', 'भित्तिचित्र की मयूरि, 'आत्म-साक्षी', 'एक आदिम रात्रि की महक' तथा 'तीसरी कसम, अर्थात् मारे गए गुलफाम'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक फणीश्वरनाथ रेणु की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ek Aur Chandrakanta : 1
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-9040

    Availability: In stock

    एक और चन्द्रकान्ता-1
    भारतीय दूरदर्शन के इतिहास में 'चन्द्रकान्ता' सीरियल है जो लोकप्रियता का कीर्तिमान स्थापित किया है, इसका श्रेय हिन्दी के अग्रणी उपन्यासकार बाबू देवकीनंदन खत्री को जाता है क्योंकि 'चन्द्रकान्ता' सीरियल के सुप्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर का मानना है कि इसकी प्रेरणा उन्होंने खत्री जी से ही ग्रहण की है । खत्रीजी की प्रेरणा के महादान से संपन्न इस शीर्ष कथाकार ने जिम प्रकार उपन्यास से सीरियल को अलग किया था, उसी तरह सीरियल से एक और चन्द्रकान्ता की इस महागाथा को अलग करके प्रस्तुत किया है ।
    'एक और चन्द्रकान्ता' के इस पाठ में हिन्दी पाठक एक बार फिर से अपनी भाषा तथा कथा के आदर्श तथा गौरवमयी अनुभव से गुजर सकेगा । कहा जा सकता है कि हिन्दी में यह रचना के स्तर पर एक प्रयोग भी है । लेखक के अनुसार यह “भाषायी स्तर पर एक विनम्र प्रयास है ताकि हिन्दी अधिकतम आम-फ़हम बन सके ।" हिन्दी कथा-परंपरा में किस्सागोई की मोहिनी को पुन: अवतरित करने में लेखक के भाषागत सरोकार और उपकार का यह औपन्यासिक वृत्तांत अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। 
    चमत्कार, ऐयारी, फंतासी, बाधाएँ, कर्तव्य, दोस्ती, युद्ध-पराक्रम, नमकहरामी, बगावत, प्रतिरोध, साजिश, मक्कारी, तांत्रिक एवं शैतानी शक्तियाँ, वासना, वफादारी तथा अंधसत्ता आदि को बखानती और परत-दर-परत खुलती-बंद होती अनेक कथा-उपकथाओं को इस उपन्यास-श्रृंखला ने मात्र प्यार-मोहब्बत की दास्तान को ही नहीं बखाना गया है बल्कि इस दास्तान के बहाने लेखक ने अपने देश और समाज की झाडा-तलाशी ली है ।  यही कारण है कि कुंवर  वीरेन्द्रसिंह और राजकुमारी चन्द्रकान्ता की उद्याम प्रेमकथा को बारंबार स्थगित करते हुए लेखक को दो देशों की परस्पर शत्रुता के बीच संधि की कोशिश को शिरोधार्य करता प्रतीत होता है तो वहीं भ्रष्टाचार, राष्ट्रद्रोह को प्रतिच्छाया वाली उपकथाओं के सृजन में व्यस्त दीखता है । समय के साथ निरंतर बहने भी रहने वालो 'एक और चन्द्रकान्ता' को इस महाकथा में महानायकों का चिरंतन संघर्ष यहाँ मौजूद है, उनका समाधान नहीं।  अर्थात यह एक अनंत कथा है जो यथार्थ और कल्पना की देह-आत्मा से सृजित और नवीकृत होती रहती है । कहना न होगा कि यह हिन्दी की एक समकालीन ऐसो 'तिलिस्मी' उपन्यास-श्रृंखला है जो हमारे अपने ही आविष्कृत रूप-स्वरूप को प्रत्यक्ष करती  है । इस उपन्यास-श्रृंखला  के सैकड़ों बयानों की अखण्ड पठनीयता लेखक की विदग्ध प्रतिभा का जीवंत साक्ष्य है ।
    यदि इस लेखक की सामाजिक प्रतिबद्धता क्रो बात पर ध्यान दें तो 'एक और चन्द्रकान्ता’ उसकी सम्यक लेखकीय 'जवाबदेही' का साहसिक उदाहरण है । अपने अग्रज-पूर्वज उपन्यासकारों का ऋण स्वीकार करते हुए, स्पर्धाहीन सर्जन की ऐसी बेजोड़ मिसाल आज अन्यत्र उपलब्ध नहीं है । दूसरे शब्दों में, कमलेश्वर का हिन्दी साहित्य में यह एक स्वतंत्रता संग्राम भी है जिसमें आम हिन्दी को सुराज सौंपने का सपना लक्षित है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-2075

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका में यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुड़िया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Jainendra Kumar
    Jainendra Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-2070

    Availability: In stock

    जैनेन्द्र कुमार

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फांसी', 'पाजेब, 'फोटोग्राफी', 'मास्टर जी', 'अपना-अपना भाग्य', 'जाह्नवी', 'एक रात', 'साधु की हठ', 'नीलम देश की राजकन्या' तथा 'चलित-चित'  ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक जैनेन्द्र कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavita Ki Rangshaala
    Kuber Dutt
    125 113

    Item Code: #KGP-1911

    Availability: In stock

    कविता की रंगशाला
    कुबेर दत्त की कविताओं का कथ्य सविशेष होकर सविशेष शिल्प में व्यक्त हुआ है । कवि की कविताएँ मानवीय बोध से सम्मन्न हैं और इनमें जो तथ्य और स्थितियाँ प्रस्तुत है, उन्हें कवि ने अपने ढंग से पाया । यह कठिन काम था, जोखिम का काम था, पर इसे कवि ने सफ़लतापूर्वक प्रिय और विशिष्ट बनाया । ये कविताएँ सारवान और सार्थक हैं। हिन्दी में ऐसी कविताएँ प्राय: दुर्लभ हैं।

  • Khushabu To Bacha Li Jaaye
    Laxmi Shankar Vajpayee
    80

    Item Code: #KGP-1905

    Availability: In stock

    खुशबू तो बचा ली जाए
    तमाम आडंबरों, विडंबनाओं और त्रासदियों के रहते, घुटते हुए माहौल में, एक ताजा हवा का झोंका है— खुशबू तो बचा ली जाए । विवशताओं के चलते, खुद से जूझते और अँधेरों के लंबे रेगिस्तान में रोशनी की फिक्र, आस्थाओं की नदी और नूर की बारिश की प्रार्थनाएँ हैं इसकी गज़लें । कभी आगाह करती हैं तो कभी आह्वान । कभी अंतस में टीस भरती हैं तो कभी चेतना में उजास—और अपने होने का असर लेकर दूर तक साथ चलती हैं।
    ओस में बंद सूरज, शंख में समाए नाद की तरह, दो मिसरों के बीच कहीं क्रांति की आग है तो कहीं विश्वास का चंदन । कहीं सांस्कृतिक सुरभि है तो कहीं वक्त की छटपटाहट-कहीं दहकते हुए सवाल हैं तो कहीं सुलगती हुई चिंताएँ ।
    न कोई लाग-लपेट, न बनावट, सीधी-सच्ची बात, आप लोगों की बात, आमफहम भाषा में, जो हदय से चलकर हृदय से उतरती है। शायद इसीलिए इन ग़ज़लों ने, राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं के संपादकीय लेखों, महत्वपूर्ण अभियानों, आन्दोलनों से लेकर  दार्शनिकों के प्रवचन तक सक्रिय भूमिका निभाई है । संक्रांति के इस युग में, मूल्यवान एवं पवित्र परंपराओं, मर्यादाओं और मानवीय संवेदनाओं को सहेजने की ईमानदार कोशिश है—'खुशबू तो बचा ली जाए' ।
  • Vidrohini Shabri
    Hiralal Bachhotia
    100 90

    Item Code: #KGP-1854

    Availability: In stock

    विद्रोहिणी शबरी 
    जन्मजात विद्रोहिणी शबरी का विद्रोह जड़-परंपराओं और रूढियों के खिलाफ था । शबरी ने एक तरह से अतीत को या उस अतीत को जो हिंसा पर टिका था, को ललकारा था । वह आतंक के रावण के खिलाफ संकल्प के साथ आगे बढ़ रही थी । शबरी ने नारी के रक्षिता माने जाने पर भी उँगली उठाई तो तरुणी शबरी पर भी जिसने देखा उसी ने उँगली उठाई थी । लेकिन शबरी अपने रास्ते चलती रही और जा पहुंची पंपा सरोवर क्षेत्र में । कठोर यथार्थ की रगड़ से उत्पन्न आदर्श ही शबरी का प्राप्तव्य बना और यह आदर्श शस्य श्यामल राम के रूप में परिकल्पित हुआ। मुग्धमना शबरी उसी राम के लिए प्रतीक्षारत रही । राम उद्धारक नहीं, शबरी के लिए मीत बनकर प्रकट हुए थे। केवट, निषाद के साथ राम के व्यवहार ने शबरी को ऐसा ही आश्वासन दिया था । राम का सबके प्रति समता भाव ही शबरी के लिए वरेण्य था । शबरी की वृष्टि में राम ने मानव-गरिमा की प्रतिष्ठा कर एक नई पहल की धी। शबरी अपनी इसी आस्था पर आरूढ राम के लिए प्रतीक्षारत रही । प्रतीक्षा के क्षणों को काटने के लिए शबरी बेर के पेडों का रोपण और फलो का संचयन करती रही । शबरी अरण्य संस्कृति की प्रतिरूप प्रकृति के संरक्षण में संलग्न रही। शबरी ने शूर्पणखा प्रकरण में अमर्यादित नारी को वरेण्य नहीं माना । इसीलिए राम ने हाथ उठाकर कहा था-शबरी प्रतिरूप है नवधा भक्ति का । इसीलिए शबरी सामान्य से असामान्य या असाधारण बन गई और राम के हृदय में मूर्ति के समान विराजित रही । यही शबरी की आस्था की विजय थी । शबरी ने अपनी अंतर्दृष्टि के आधार पर राम को जनकनंदिनी को खोजने के संकेत दिए थे । इसमें सुग्रीव-हनुमान मिलन के पूर्व संकेत भी शामिल थे । भावी आपदाओं की ज्वालाओं को शांत करने हेतु सांत्वना नीर उड़ेलते रहना ही शबरी का प्राप्तव्य बना रहा ।
  • The Mother Of All Books (Paperback)
    Rajni Arun Kumar
    99

    Item Code: #KGP-1451

    Availability: In stock

    Sense has been banned from discotheque, multiplex, several restaurants, shopping mall, plane and many other places of recreation*. And this was even before the baby was born... Yes, Sense was expecting... A baby...
    To make things worse, she has to contend with having no permanent address, a set of friends who think nothing of scrutinising her like a specimen under a microscope, and relatives who mean well. Then there’s the journey of re-discovering her constantly changing body, which for anyone who has crossed puberty is not in the least pleasant – now it’s cold, now it isn’t; now it’s fat, no, it isn’t; now it fits, Ha! Now it doesn’t! All very confusing... For someone who has prided on knowing her mind since she was three, this was allgoing horribly wrong.
    Come due date, and Sense, as usual has managed to get herself into a pickle and is once again, very nearly banned from the hospital*! Can the Baa-lamb (who has the patienceof a saint) and Sense’s parents (whose understanding parallels the Dalai Lama) guide her through these tumultuous times? Will the little one survive Sense’s adventures unscathed? And what other adventures are in store for Sense and family in this journey called Motherhood? 
    *She staunchly insists this is through no fault of hers and blames it squarely on extenuating circumstances.
  • Akasmaat Kuchh Kavitayen
    Surendra Pant
    160 144

    Item Code: #KGP-9336

    Availability: In stock

    हिंदी कवियों ने अपने काव्य-मुहावरों को यदि रसिकतापूर्ण काव्यरूपों से श्रृंगारित किया है तो कुछ कवियों ने कविताओं को चीखने की स्वतंत्रता भी दी है। मगर इस संगह की कविताओं में पाठक पाएंगे कि कवि का सरोकार बृहत्तर मानवता की उपस्थिति करने में कई बार वह संप्रेषणीयता की रूप-सज्जा की भी परवाह नहीं करता। व्यापक जनहितों की आकांक्षाओं के बीच से अंकुरित इन कविताओं को सच्चे ईश्वर, खरे अध्यात्म तथा खनकदार वर्तमान की चाहत है, जो भोले-भाले लोक को उसकी निष्कपटता लौटा सके। ‘मदर टेरेसा’ पर केंद्रित कविता को पढ़कर हमें कवि की मानवगत अवधारणाओं का समूचा अहसास होता है।
    पुलिस विभाग के अत्यंत महत्वपूर्ण एवं ‘संवेदनशील’ पद का निर्वहन करते हुए यह कवि समाज और राजनीति की ‘रणनीति’ में लाखों-लाख हंसते-रोते हैवानों-इंसानों के परम-चरम अनुभवों का साक्षी रहा है, इसीलिए ये कविताएं हमारे समय और समाज की धाराओं-उपधाराओं के रूप में कवि के सामने ‘पेशी’ पाकर शब्दांकित होती हैं। संभवतः इस अनुभवबहुलता ने कवि को किसी इकहरे विषय का मर्मज्ञ न रहने देकर, सर्वत्र का प्रवक्ता कवि भी बना दिया है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस विविधता के बावजूद कवि का ध्यान अपने देश, संस्कृति और जन पर लगभग प्रत्येक कविता मंे कंेद्रीकृत हुआ है।
    कहना न होगा कि इन कविताओं के नए तेवर का आगमन भले ही अकस्मात् रूप में हुआ है, मगर निश्चित ही इनका सृजन गहरी विचारशीलता के बाद ही संभव हुआ होगा।
  • Metamorphosis (Novel)
    Franz Kafka
    395 356

    Item Code: #KGP-361

    Availability: In stock

    The Metamorphosis is one of Franz Kafka's most well-known works. It is the story of a young man, Gregor Samsa, who transformed overnight into a giant beetle-like insect, becomes an object of disgrace to his family, an outsider in his own home, a quintessentially alienated man. 
    A harrowing—though absurdly comic — meditation on human feelings of inadequacy, guilt, and isolation, The Metamorphosis has taken its place as one of the most widely read and influential works of twentieth-century fiction.
  • Svadeshi Chikitsa Paddhati
    Om Prakash Sharma
    350 298

    Item Code: #KGP-531

    Availability: In stock

    स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति
    मनुष्य को परमेश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना माना गया है । किसी समय वह भी पूर्ण स्वस्थ और सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण रहा होगा, लेकिन आज स्थिति सर्वथा विपरीत है । आज पूरे विश्व में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसे कोई कष्ट न हो तथा जो शोक, सन्ताप और चिन्ता से मुक्त हो अथवा निराश न हो । इसका एकमात्र कारण है- प्रकृति की उपेक्षा ।  प्रकृति कभी अन्याय का पक्ष नहीं लेती । जो भी उसके नियमों को भंग करता है, वह उसे दपिडत करती है ।
    मनुष्य को हर प्रकार की व्याधि और रोग से मुक्त रहने का अधिकार प्राप्त है; लेकिन इसके लिए उसे प्रकृति के स्वभाव को समझना चाहिए । उसे अपने शरीर के स्वभाव के अनुकूल अपनी दिनचर्या का पालन करना चाहिए । बुहिमान् व्यक्ति वही होता है, जो किसी विपति में फंसने से पहले ही अपना बचाव कर ले । यदि फिर भी असावधानीवश अथवा किसी अन्य कारणवश वह बीमार हो जाये, तो प्रकृति-प्रदत्त पदार्थों के उपयोग से पुन : स्वस्थ व समान्य हो सकता है ।
    प्रकृति ने हमारे देश पर ऐसी कृपा की  है कि यहां अनेक प्रकार की उपयोगी ज़डी-बूटियां ( औषधियां) पैदा होती हैं, जो घर-घर में विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लायी जाती हैं ।
    आज साधारण व्यक्ति डॉक्टरों की ऊंची फीस व महंगी दवाओ का प्रयोग करने में असमर्थता अनुभव कर रहा है तथा अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव से ग्रसित है। तब स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति की उपयोगिता से कौन इनकार कर सकता है ? स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति के सहारे आप दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक वस्तुओ से नाना प्रकार के जटिल रोगों की अचूक चिकित्सा कर सकते हैं।
    'स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति' पुस्तक में प्रत्येक रोग के लिए अनेक अचूक इलाज बताये गये हैं, जिनकी सहायता से साधारण व्यक्ति भी कठिन से कठिन रोगों की चिकित्सा स्वय कर सकता है ।
    पुस्तक में रोगों के निदान और चिकित्सा के साथ ही उपयोगी योगासनों व प्राणायाम का भी समावेश किया गया है ।
  • Kavi Ne Kaha : Jitendra Shrivastava
    Jitendra Shrivastva
    240 216

    Item Code: #KGP-7818

    Availability: In stock

    पिछली सदी के आखिरी दशक में एक धमक की तरह काव्य-परिदृश्य पर उपस्थित हुए कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव आज नयी सदी की कविता के सर्वाधिक प्रशंसित और अनिवार्य कवि हैं। बाजारू प्रलोभनों से बचाकर हिंदी कविता को विश्वसनीय बनाए रखने के प्रति सर्जनात्मक सजगता जितेन्द्र को अपने समकालीनों में अलग पहचान दिलाती है। हमेशा करुणा, प्रेम और उम्मीद का पक्ष लेती हुई जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने आसपास पसरी हुई त्रासदी, अन्याय और दुःख के राजनीतिक तात्पर्यों का साहसिक उद्घाटन भी करती चलती है। जैसा कि होना चाहिए--गहन रूप से राजनीतिक होकर भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने स्वभाव में मानवीय, मार्मिक और भावनात्मक रूप से आर्द्र बनी रहती है।
    जितेन्द्र के लिए, कविता मनुष्य की नैसर्गिक संवेदनाओं को परिमार्जित करने का माध्यम है। मानवीय जिजीविषा के बहुविधि संस्तरों से साक्षात्कार के क्रम में उनकी कविता को कलात्मक मेयार की कठिनतर ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए देखा जा सकता है। नयी सदी की कविता के भाषिक और संवेदनात्मक आचरण को उदाहरणीय बनाने में जिन थोड़े कवियों का योगदान है, उनमें जितेन्द्र श्रीवास्तव अलग से ध्यान खींचते हैं।
    स्त्री, दलित, उत्पीड़ित और मार्जिनलाइज्ड समाज के तमाम अंतरंग जीवन-प्रसंगों से निर्मित जितेन्द्र की कविता का वितान बहुआयामी तो है ही, इसकी हदें इतिहास से लेकर भविष्य के अनिश्चय भरे अँधेरों तक व्याप्त हैं। जहाँ तक विमर्शों का प्रश्न है कविता में कला का सौंदर्य बचाते हुए जितेन्द्र को पूरे काव्यात्मक संतुलन के साथ, विमर्शों में कारगर हस्तक्षेप करते हुए देखा जा सकता है।
    कविता के प्रति पाठकों की घटती हुई अभिरुचि के प्रतिकूल माहौल में भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अनेक तरह के सांस्कृतिक समूहों और आर्थिक-राजनीतिक रुझानों के पाठकों में समान प्रशंसा और प्रतिष्ठापूर्वक पढ़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि उनकी कविताओं का यह चयन पाठकों की संवेदना को स्पंदित करने में सफल रहेगा।
    --कपिलदेव
  • Sangharsha-Meemaansa
    Ravi Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9083

    Availability: In stock


  • Antrang Saakshatkar
    Krishna Dutt Paliwal
    200 180

    Item Code: #KGP-621

    Availability: In stock


  • Varjit Baag Ki Gatha
    Amrita Pritam
    160 144

    Item Code: #KGP-7820

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Turkey (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7203

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folkstales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Turkish short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Prince Ahmed, Storm Fiend, Deceiver and the Thief, Fortuneteller, Shah Jussuf, Forlorn Princess, this book is a compilation of 20 famous Turkish short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Turkey.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ram Kumar
    Prashant Kaushik
    125 113

    Item Code: #kgp-2074

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रामकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कहानी जो कभी लिखी न गई', 'रेवा', 'एक चेहरा', 'सेलर', 'दीमक', 'चिंटू', ‘सर्दियों का आकाश', 'जाड़ों की पहली बर्फ', 'शिलालेख" तथा 'रेलवे फाटक'।

    हमें  विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रामकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Kashmkash (Paperback)
    Manoj Singh
    240

    Item Code: #KGP-378

    Availability: In stock


  • Samgra Kahaniyan : Ab Tak
    Maitreyi Pushpa
    695 626

    Item Code: #KGP-271

    Availability: In stock

    समग्र कहानियाँ: अब तक
    आँधी की तरह अपने उपन्यासों से पाठकों को झकझोर देने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री के अपने फैसलों की विचारोत्तेजक कहानियाँ-उपन्यास लिखे हैं। शहरी मध्यवर्गीय कहानियों के संसार को गाँव के उभरते मेहनतकश समाज से जोड़ा है, जहाँ अपनी परंपराएँ हैं, रूढ़ियाँ हैं और सबसे ऊपर है ‘खानदान की नाक’ और सब कुछ टिका है स्त्री के कंधों पर--जमीन और स्त्री ही उलझनों के केंद्र हैं और दोनों के ‘उत्पादन’ आपस में गुँथे हैं। सब मालिक की कृपा पर साँस लेते हैं। मैत्रेयी की स्त्रियों की सारी शिकायतें इसी मालिक से हैं कि वह साथी और हमसफर क्यों नहीं हो सकता--क्यों मालिक बनकर ढोर-डंगर की तरह औरत को ही हाँके रखता है। 
    स्त्री का अपनी नियति को अस्वीकार करना ही सामाजिक मर्यादाओं का टूटना है।
    स्त्री के उत्थान और सबलीकरण की ये कहानियाँ यथास्थिति से विद्रोह ही नहीं, भविष्य की दृष्टि से समाज-परिवर्तन की ध्वजवाहिनी भी हैं। मैत्रेयी ने कहानियाँ शहरी जीवन को लेकर भी लिखी हैं, मगर जिस आत्मीयता और गहराई से उन्होंने गाँव के जीवन को देखा है वह हिंदी में प्रेमचंद और रेणु 
    के सिवा शायद ही किसी को नजर आया हो। ये बेजुबानी स्त्री की यातनाओं, उसके संघर्षों और सपनों के बेआवाज विद्रोह की दस्तावेज हैं।
  • Netaji Subhash Chandra Bose
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-134

    Availability: In stock

    यह जीवनी है उस क्रांतिकारी महाबली की, जो देश की आजादी के लिए प्राणी को हथेली पर रखकर अर्द्धरात्रि में अपने घर से वेश बदलकर काबुल होकर जर्मनी-जापान पहुंच गए । अंग्रेज उन्हें ताकते ही रह गए और वे देश से विदेश पहुँच गए । ये थे-नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ।
    नेताजी 'आजाद हिंद फौज' बनाकर देश की आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करते रहे । 'दिल्ली चलो' का नारा उन्होंने ही बर्मा में दिया । उनका प्रत्येक क्षण देश की आजादी के विषय में सोचने में लगता था ।
    नेताजी गरीबों के मसीहा थे, किसानों और मजदूरों के संरक्षक थे । वे धैर्यवान, शक्तिमान और महान राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने देशवासियों से कहा था—'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा ।'
  • Amar Shaheed Bhagat Singh
    Vishnu Prabhakar
    150 135

    Item Code: #KGP-106

    Availability: In stock


  • Manas Manthan
    Braj Bhushan
    250

    Item Code: #KGP-104

    Availability: In stock

    अपने आपको जानने का काम मश्किल इसलिए माना गया है कि मनुष्य स्वभाव से ही पक्षपाती है। वह निष्पक्ष होकर अपने बारे में कभी विचार कर ही नहीं सकता। अपने विषय में सोचते हुए वह निष्पक्ष रह ही नहीं सकता। दुर्बल होते हुए भी कोई भी अपने को गामा और रुस्तम से कम नहीं समझता। दो हड्डी का आदमी भी कभी-कभी कह उठता है ‘‘ऐसा दूंगा हाथ कि जाकर दस कदम दूर गिरेगा।’’ ऐसे व्यक्ति को अपने बारे में कितनी गलत जानकारी है, यह सहज ही ज्ञात हो जाता है। अज्ञानी होते हुए भी कोई अपने को अरस्तू और चाणक्य से कम नहीं समझता। ऐसे व्यक्ति भी प्रायः कहते सुने जाते हैं ‘‘अरे, अरस्तू जैसे दस को मैं अपनी जेब में रखता हूं।’’ जबकि ऐसे व्यक्ति को मैट्रिक पास करने में चार साल लग गए थे। गहन अध्ययन, आत्मनिरीक्षण और सूक्ष्म विवेचना के द्वारा ही अपने आपको जानने के मार्ग की ओर बढ़ा जा सकता है।
  • Guftgoo : Sarhadon Ke Aar-Paar (Paperback)
    Prem Kumar
    150

    Item Code: #KGP-433

    Availability: In stock

    गुफ्तगू : सरहदों के आर-पार
    प्रेमकुमार की यह पुस्तक अपनी भिन्न विशिष्ट पद्धति और अभिव्यक्ति वाले साक्षात्कारों के माध्यम से पांच देशों के सात स्थापित-सुविख्यात साहित्यजीवियों की जिंदगी और लेखन के अनेक अनसुने-अनजाने प्रसंगों-हिस्सों से सहज-दिलचस्प ढंग से पाठक का परिचय कराती है। पांच देश-भारत, आस्ट्रिया, ईरान, पाकिस्तान और अमेरिका।  सात साहित्यजीवी--नैयर राही, आंद्रेयास वेबर, अली मुहम्मद मुअज्जनी, सलीमा हाशमी, अहमद फराज, इंतिजार हुसेन और मुनीबुरर्हमान। 
    इन बातचीतों के माध्यम से रचनाकारों के परिवेश, लेखन और लेखन-प्रक्रिया के बारे में तो आसानी और सहजता के साथ जाना-समझा जा ही सकेगा, भिन्न-भिन्न देशों व भाषाओं के पारस्परिक संबंधों, उनके बीच की सामाजिक-सांस्कृतिक समानताओँ-असमानताओँ, समस्याओं-संभावनाओं आदि को भी समझने-सुलझाने या विवेचित-विश्लेषित करने में मदद भी मिलेगी। तमाम तरह की बाडों-सीमाओं को लांघ-पारकर कोई सृजन या अभिव्यक्ति कैसे यहां-वहां सब कहीं स्वीकृत- समादृत हो पाते हैं-ऐसे कुछ सूत्रों-प्रश्नों के मूल और हल भी इन संवादों में ढूंढे-तलाशे जा सकते हैं ।
    अत्यंत अनौपचारिक, आत्मीय और विश्वासपूर्ण वातावरण में अप्रत्याशित ढंग से संभव-संपन्न हुई इन बातों- मुलाकातों का एक अहम और उल्लेख्य पक्ष यह भी है कि सात में से पांच बातचीतें सीधे-सीधे संबंधित साहित्यकारों से हुई हैं, जबकि दो रचनाकारों के जीवन-लेखन को उनके दो अत्यंत करीबी संबंधों के सोच और दृष्टि से जाना-समझा गया है। राही मासूम रजा की पत्नी नैयर राही ने अपने सर्जक-पति और फैज अहमद 'फैज' की बडी बेटी सलीमा हाशमी ने अपने रचनाकार पिता के जीने-सोचने, लिखने तथा उनके जीवन-मूल्यों, अभावों, संघर्षों आदि के बारे में बातों-बातों में बहुत कुछ समझा-बता देना चाहा है।
    निश्चय ही ये बातचीतें सुधी पाठकों, साहित्यसेवियों एवं शोधार्थियों के लिए पठनीय और उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Meri Romanchak Satyakathayen
    Kaviraj Om Prakash
    250 225

    Item Code: #KGP-648

    Availability: In stock

    मेरी रोमांचक सत्य-कथाएँ
    इस संग्रह की कहानियों के कथानक वर्तमान काल के अलावा वैदिक और पौराणिक काल के भी हैं और भारत के विभाजन से पहले के भी है । कई कहानियाँ साधु-संतों, महात्माओं और नाग आदि  देवी-देवताओं के संबंध में भी है । इनसे पता चलता है कि कविराज को भारतीय इतिहास, संस्कृति और जनजीवन की व्यापक और सही जानकारी है । यह भी पता चलता है कि वे आस्थावान हैं और भारतीय संस्कृति से बड़ी गहराई से जुडे हुए है । हस संग्रह की कहानियां कला की दृष्टि है भी उच्चकोटि की है । प्रत्येक कहानी का कथानक, विषयवस्तु और चरित्र-चित्रण मार्मिक एवं आकर्षक है । प्रत्येक कहानी  रोचक है, पाठक के मन को बाँधने वाली है और अच्छी शिक्षा देने वाली है ।
  • Vaigyanikon Ke Saras Prasang
    Shuk Deo Prasad
    120 108

    Item Code: #KGP-9150

    Availability: In stock

    ये प्रसंग साक्षी हैं कि सत्य की खोज में जीवन होम करने वाले वैज्ञानिक समाज के अंतरंग प्राणी, मानवीय मूल्यों के पोषक और संकल्पनिष्ठ ईमानदार इंसान हैं। 
    विज्ञान-विभूतियों के जीवन से चुने हुए रंग-बिरंगे, खुशबूदार फूलों का यह बेशकीमती गुलदश्ता निश्चय ही अपनी सुरभि से आपके जीवन में नए उत्साह का संचार एवं स्वस्थ दृष्टिकोण का निर्माण करेगा । 
    हमारे चारों ओर प्रेरणा-पुरुष बिखरे पड़े हैं । प्रश्न है इनसे कुछ सीखने का, ग्रहण करने का । विज्ञानं विभूतियों के ये 'सरस प्रसंग' हास-परिहास के साथ पाठकों के जीवन में आशा और नवीन उत्साह का भी संचार करेंगे, ऐसी आशा है । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vijay Dan Detha
    Vijaydan Detha
    200 180

    Item Code: #KGP-94

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Rajesh Joshi (Paperback)
    Rajesh Joshi
    90

    Item Code: #KGP-7023

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : राजेश जोशी
    राजेश जोशी अपने अनुभव को कविता में सिरजते वक्त शोकगीत की लयात्मकता नहीं छोड़ते । लय उनकी कविताओं में अत्यंत सहज भाव से आती है जैसे कोई कुशल सरोदवादक धीमी गति में आलाप द्वारा भोपाल राग का विस्तार कर रहा हो । इस दृष्टि से राजेश जोशी के शिल्प को एक सांगीतिक संरचना कहा जा सकता है । वे स्थानीयता के रंग में डूबकर भी कविता के सार्वजनिक प्रयोजनों को रेखांकित करते हैं । उनकी कविता अपने उत्कृष्ट रूप में एक शहर की कविता होते हुए भी मनुष्य के व्यापक संकट का बयान है । -ऋतुराज़
    समकालीन हिंदी कविता में राजेश जोशी की उपस्थिति एक दिलेर उपस्थिति है-कविता लिखना और उसके लिए लड़ना भी । उनमें एक काव्य व्यक्तित्व भी है, जो कविताएं लिखने वाल कई कवियों में नहीं भी हुआ करता है । उनकी यह उपस्थिति एक लोकतांत्रिक उपस्थिति है, जहां आप ढेर सारा संवाद कर सकते हैं।
    राजेश जोशी की कविता में एक टूट-फूट और संगीत का अवसाद है, लेकिन उठ खड़े होने की कोई मूलगामी संरचना भी  है । पस्ती का महिमामंडन नहीं है और पराजय में पराजित की उधेड़बुन नहीं है । इसलिए कौन-सी भंगिमा कब प्रतिकार में बदल जाएगी और एक कॉस्मिक रुप अख्तियार कर लेगी कोई नहीं जानता । तो साधारण की, पिछडे हुए की, मिटा दिए गए की, भुला दिए गए की, विजय होगी ऐसा कोई यूटोपियाई प्रतिवाद उनमें निरंतर मिलता  है। तो नैतिक श्रेष्ठता में विश्वास कभी खंडित नहीं होता।
  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand (Paperback)
    Shanta Kumar
    180

    Item Code: #KGP-399

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापकविवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Raseedi Ticket
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-2068

    Availability: In stock


  • Peeth Peechhe Ki Duniya
    Neelam Chaturvedi
    200 180

    Item Code: #KGP-1833

    Availability: In stock

    पीठ पीछे की दुनिया
    कहानियां अब भावहीन हो जाना चाहती हैं। बहुत सारी आशाओं, सपनों और कसमों से जरा अलग हटकर। सांस लेना चाहती हैं। सीमाओं के परे पढ़ने वाले के अंतर्मन में पैठने वाली। नीलम की कहानियां सहजता से यह सब करती हैं। उन्होंने बातचीत की भाषा को इसके लिए चुना है। बोलने वाली भाषा। जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखें। हू ब हू।
    नीलम की कहानियां व्यंग्य का सहारा लेकर किसी चरित्र को उधेड़ती नहीं हैं। वे संबंधों को अनेक स्तरों तक ले जाने के लिए हैं। उनका ताप दफ्तरों में धीमे-धीमे सांस ले रहे लोगों को उकसाता है। बहुरंगी और मानवीय चरित्र अपने आप को कितना विचित्र बना डालने के लिए आतुर है। कहानियां यह इंगित करती हैं। पीठ पीछे की निस्संग दुनिया को देख पाना नीलम ने संभव किया है।
    संबंध जब बोझ बन जाते हैं तब नैतिकता घुलने लगती है। नीलम ने बहुत साहस से, अनेक कहानियों से इसे हम तक पहुंचाया है। यहां मध्यम संगीत की अनुगूंजें हैं। जैसे जीने का विश्वास। अदम्य। अचूक। प्रेम की टूटती डोर में, अवसाद में भी यह कला, आकर्षण की ओर ले जाती है।
    यह कहानी-संग्रह नए कथा क्षेत्र में सादगी, विस्तार और अनुपम अनुभवों से हमें संपन्न बनाता है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan
    Usha Kiran Khan
    240 216

    Item Code: #KGP-685

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Reverse Your Thoughts Reverse Your Diseases (Paperback)
    Anil Bhatnagar
    245

    Item Code: #KGP-337

    Availability: In stock

    Like an artist who expresses herself on canvas with colors, our thoughts do so on the canvas of life (health included). Health or diseases, therefore, do not come by chance; they are created through our mental processes—though unknowingly.
    As per Psychoneuroimmunology, a new branch of science that studies the mind-body connection, the thoughts and emotions that we choose get instantly transformed into chemicals. These chemicals are, effectively, either self- administered injections of ‘slow poisons’ or of ‘healing medicines’ that eventually freeze into and become our physical states, i.e. the way we feel physically in our bodies—dis-eased or eased (i.e., healthy).
    Reverse Your Thoughts, Reverse Your Diseases is your guide to retrace your path back towards health from diseases through the same route whence these came from, i.e. through the route of your thoughts, emotions, beliefs and imagination. The book shares with you symptoms, emotional causes, metaphysical reasons, affirmations and dietary suggestions for averting and curing over 150 diseases . . . along with power-packed strategies for liberating you from corrosive thoughts and emotions.
  • Shankhnaad
    Raj Budhiraja
    140 126

    Item Code: #KGP-118

    Availability: In stock

    शंखनाद
    "गांधी जी अगर राष्ट्र के पिता थे तो महर्षि दयानंद सरस्वती राष्ट्र के पितामह थे । महर्षि जी हमारी राष्ट्रीय  प्रवृत्ति और स्वाधीनता आंदोलन के आद्य-प्रवर्तक थे। गांधी जी उन्हीं के पदचिन्हों  पर चले । यदि महर्षि हमें मार्ग न दिखाते तो अंग्रेजी शासन में उस समय सारा पंजाब मुसलमान हो जाता और सारा बंगाल ईसाई हो जाता।" —अनंतशायनम् आयंगर
    "महर्षि दयानंद भारतमाता के उन प्रसिद्ध और उच्च आत्माओं में से थे, जिनका नाम संसार के इतिहास से सदैव चमकते हुए सितारों की तरह प्रकाशित रहेगा । वे भारतमाता के उन सपूतों में से हैं, जिनके व्यक्तित्व पर जितना भी अभिमान किया जाए थोड़ा है ।  नेपोलियन और सिकंदर जैसे अनेक सम्राट एवं विजेता संसार में हो चूके है, परंतु स्वामी जी उन सबसे बढ़कर थे ।" —खदीजा बेगम
    “बहुत-से लोग महर्षि दयानंद को सामाजिक और धार्मिक सुधारक कहते हैं, परंतु मेरी दृष्टि में तो वे सच्चे राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने सारे देश में एक भाषा, खादी, स्वदेश प्रचार, पंचायतों की स्थापना, दलितोद्धार, राष्ट्रीय और सामाजिक एकता, उत्कट देशाभिमान और स्वराज्य की घोषणा—यह सब बहुत पहले से देश को दिया है ।" —विट्ठलभाई पटेल
  • 20-Best Stories From China (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7199

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Chinese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup 
    of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Taoist Novice, Chang And Cheng, Supernatural Wife, Taoist Priest, Man Thrown In A Well, Rat Wife, this book is a compilation of 20 famous Chinese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from China.
  • Toro Kara Toro (All 6 Vols.) (Paperback)
    Narendra Kohli
    1780 1424

    Item Code: #KGP-TKTPB1

    Availability: In stock

     All 6 Vols. in Paperback.
  • Saaksharta Aur Samaj
    Vinod Das
    125 113

    Item Code: #KGP-9122

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में साक्षरता की महिमा और संबंधित सामाजिक द्वंद्वों और इसके प्रसार में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, जनसंचार माध्यमों की भूमिकाओं, तत्संबंधी सांस्कृति-उपभोक्तावादी ऊहापोहों, स्त्री-साक्षरता के महत्त्व जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को पहचानने का प्रयास किया गया है, वहीं उन वर्गीय पूर्वाग्रहों को भी अनोखी अंतर्दृष्टि और वयस्क विवेक से चिह्नित किया गया है, जिनके कारण साक्षरता का आलोक देश की धूसर और मटमैली झुग्गियों-झोंपड़ियों में अभी तक नहीं पहुंच पाया है। यह सही है कि लेखक के इन विमर्शों और स्थापनाओं में तीखापन और तुर्शी है। कई बार सामाजिक जड़ता और धीमी गति को लेकर यहां गुस्सा, क्षोभ और अवसाद भी मिलता है। लेकिन विनोद दास हिंदी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जो एक संवेदनशील बुद्धिजीवी की तरह शिक्षा से जुड़े गंभीर सवालों पर वैचारिक हस्तक्षेप करते हुए अपनी परंपरा को पहचानकर मूल्यवान की खोज करते हैं। इस संकलन में उनका एक ऐसा व्यक्तिपरक निबंध भी है, जिसमें वह जमीन से जुड़े उन दो अक्षरवंचित विभूतियों को आत्मीयता से स्मरण करते हैं, जिन्होंने मूल रूप से उन्हें साक्षरता की दिशा में कार्य करने के लिए उत्प्रेरित किया है। एक तरफ इन निबंधों में साक्षरता के बारे मंे व्याप्त भ्रांतियों और धुंध को छांटने की कोशिश है, वहीं उस उम्मीद की लौ को तेज करने की कोशिश है, जो मनुष्य में समाज को बेहतर बनाने के लिए भीतर-भीतर ही सुलगती रहती है।
  • Sahitya : Vividh Vidhayen (Paperback)
    Shashi Sahgal
    100

    Item Code: #KGP-1354

    Availability: In stock

    साहित्य : विविध विधाएं
    हिंदी साहित्य का संसार जितना विपुल है, उसी अनुपात में साहित्य की विधाओं का भी विस्तार हुआ है। साहित्य की विकास-यात्रा में भले ही एक विधा का प्रवेश दूसरी विधा में हो रहा है, फिर भी प्रत्येक विधा के कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे हम उस विधा की पहचान करते हैं। मसलन नाटक और उपन्यास या फिर कहानी और डायरी आदि सभी विधाओं के कुछ ऐसे बुनियादी तत्त्व हैं जो साहित्य की एक विधा से दूसरी विधा को अलग पहचान देते हैं। शशि सहगल की पहचान एक कवि, आलोचक एवं अनुवादक के रूप में है। 
    एक लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पठन-पाठन करते हुए उन्होंने जिस जरूरत को खुद महसूस किया, यह पुस्तक उन्हीं बिंदुओं एवं अनुभवों से प्रेरित है और साहित्य की विविध विधाओं के बुनियादी तत्त्वों से जुड़े भारतीय एवं पाश्चात्य विचारकों की धारणाओं को संक्षेप रूप में सामने रखती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक का महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इसमें बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करने के साथ-साथ कुछ प्रमुख लेखकों या प्रमुख रचनाओं के बहाने प्रत्येक विधा की अद्यतन जानकारी भी दी गई है। इस मायने में यह किताब साहित्य की प्रत्येक विधा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने रखती है। 
    इस प्रकार ‘साहित्य: विविध विधाएं’ साहित्य के आम जिज्ञासु पाठकों, छात्रों, शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी और जरूरी किताब बन जाती है।
  • Shringaar Shatak
    Basant Kumar Mahapatra
    40 36

    Item Code: #KGP-9104

    Availability: In stock

    'श्रृंगार शतक' नाटक का एक संक्षिप्त अंश
    नयना : लेकिन ऐसा क्यों हुआ महाराज !!! यह युग हठात इस तरह को बदल गया ?
    सूर्यभानु : हर चीज हमेशा एक-सी नहीं रहती सुनयना! बीस साल पहले मैने तुझे जिस रूप में देखा था-क्या तुम आज वैसी ही हो ? ठीक उसी तरह समय के साथ-साथ न जाने कितना कुछ बदल जाता है । राजा सूर्यभानु आज भिखारी है और मेरा गुमाश्ता सनातन राजा । वह देखो, मेरे घर के आगे सिर उठाए खडी है उसकी तिमंजिली कोठी। बिजली की रोशनी से किस कदर झिलमिला रही है वह कोठी । जानती हो, आज उसके लड़के की शादी है । इसीलिए उसके दरवाजे पर इतनी गाड़ियां खडी है । कितनी भीड़ है । सारे ऑफिसर और मंत्री आज़ उसके यहीं आए है । पूरी रात वे जश्न मनाएँगे । आज जैसे दिन में यदि मैं चिल्ला-चिल्लाकर कहूँ-सना मेरा गुमाश्ता था-मेरे गोदाम से धान चोरी करते समय पकडे जाने पर वह बर्खास्त हुआ था–मेरी बात पर कौन विश्वास करेगा ? दिन बदल गए हैं सुनयना, सब कुछ उलट-पलट गया है ।
    नयना : किंतु ऐसा कब तक चलेगा महाराज ?
    सूर्यभानु : राजा है जुल्म किया, इसलिए प्रजा ने राजतंत्र तोड़कर गणतंत्र की स्थापना की । गणतंत्र में जुल्म हुआ तो लोग फिर इसके विरुद्ध विद्रोह करेंगे । उस विद्रोह में पैदा होगी–और किसी तरह की नवीन शासन पद्धति । खैर, छोडो–यह सब सोचकर कोई लाभ नहीं । जब तक कोई परिवर्तन आएगा हम लोग नहीं होंगे ।

  • Maafiya
    Girish Pankaj
    175 158

    Item Code: #KGP-2041

    Availability: In stock

    माफिया
    जानते सब हैं, पर लिखते बहुत कम है कि राजनीति के समान साहित्य में भी दल ही दल हैं, तिकड़पबाजियाँ और सौदेबाजियाँ हैं, अवसरवाद और खिलाऊ-पिलाऊवद है, अफसरों और नेताओं के 'साहित्यिक' हथकंडे हैं और संपादकों तथा सम्मानों के बिकाऊ झंडे हैं । गिरीश पंकज ने इस उपन्यास में संगोष्टियों आदि के माध्यम से बिना 'लोक-लाज' के भय के इन सबके कपडे उतार दिए हैं । अब यह पाठकों पर निर्भर करता है कि वे इस 'नंगेपन' पर 'कैसी नजर डालते हैं! उपन्यास का प्रमुख कथ्य बहुरूपी साहित्य-माफिया है, जिसके बीच-बीच से शोध-माफिया, विज्ञापन-पुराण, छंद-हत्या, ठेका-लेखन आदि पर भी लटके-झटके सफाई किए गए है । दूसरी ओर, एक आदर्शवादी साहित्यकार की मनोव्यथा, आकांक्षाएं-अपेक्षाएं और सपने भी फूट-फूटकर निकले हैं।
    उपन्यास इस दृष्टि से अंकों का काफी ऊँचा प्रतिशत अर्जित करता है कि इसके दर्जनों अच्छे-बुरे पात्र ऐसे हैं, जिनसे हम रोज़ मिलते हैं, और इसका घटनाक्रम ऐसा है, जैसा हमारे सामने दिन-रात घटित होता रहता है। कथानक का यह सामाजिक सरोकार साहित्य पर हावी होते माफिया राज से जुड़कर आज शायद हर सही-गलत साहित्यकार के रास्ते को किसी न किसी तरह प्रभावित कर रहा है ।
    गिरीश पंकज साहित्य की धारा में काफी तैर चुके हैं, इसलिए इनकी भाषाभिव्यक्ति के प्रवाह में एक कुशल तैराक की गति है । तय समझिए कि यह उपन्यास साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े हर स्तर के पाठकों को पसंद आएगा, क्योकि वे इसके किसी न किसी पात्र से अपना तादात्म्य स्थापित किए बिना नहीं रह सकेंगे
  • Angrezi Ki Rangrezi
    Raj Kumar Gautam
    80 72

    Item Code: #KGP-2091

    Availability: In stock

    राजकुमार गौतम में लेखन की जो पकड़ है, वह द्वार अपेक्षाकृत मुश्किल विधा (व्यंग्य) में भी एक हद तक उनका साथ निभा जाती हैं । यही वजह है कि संग्रह के कुछ व्यंग्य, गौतम के व्यंग्यकार की संभावनाओं की ओर इशारा करते हैं । रचनाएँ प्राय: निबंध-शैली में हैं ।  भाषा व्यंग्यकार का सबसे प्रभावी औजार है; यत्र-तत्र उसकी चमक यहां भी दिखाई पड़ती है ।
  • Shyamji Krishna Verma : Jeevan Darshan (Paperback)
    Mukesh Parmar
    90

    Item Code: #KGP-1272

    Availability: In stock

    भारतभूमि पर बलिदानी क्रांतिकारियों की संख्या असंख्य है किंतु विदेश में जाकर भारत की स्वाधीनता के लिए संग्राम करने वालों में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और महात्मा गांधी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा जाता है। इसी क्रम में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम भी उल्लेखनीय है। विचारों की भिन्नता और कार्यशैली में अंतर अवश्य हो सकता है किंतु नेताजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा की परिस्थितियों और कार्यशैली में ज्यादा अंतर नहीं है। श्यामजी ने देश-विदेश में अपनी कार्यकुशलता, संगठनशक्ति और भारतीय स्वाधीनता का जो शंखनाद किया उसने भारत सहित समूचे यूरोप और विशेषकर ब्रिटिश साम्राज्य को कंपित कर दिया। ऐसी क्रांति के युद्धवीरों में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में रेखांकित करने योग्य है। 
  • Parineeta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1353

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है परिणीता और दूसरा है मझली दीदी।
  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand
    Shanta Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-1865

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापक विवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Boomraing
    Rekha Rajvanshi
    225 203

    Item Code: #KGP-877

    Availability: In stock

    बूमरैंग
    इस पुस्तक की संपादक रेखा राजवंशी को आस्ट्रेलिया के प्रमुख कवियों को जोड़ने और पुस्तक-प्रकाशन का विचार तब सूझा जब कैनबरा और सिडनी में आयोजित कवि-सम्मेलनों में किशोर नंगरानी, अब्बास रजा अलवी, शैलजा चतुर्वेदी, हरिहर झा तथा सुभाष शर्मा जी से उनकी मुलाकात हुई । पर्थ के प्रेम माथुर जी व अनिल वर्मा जी की कविताएं भी उन्हें यहीं सुनने को मिली । बाद में जब वह होली के कवि-सम्मेलन में मेलबर्न गईं तो सुभाष जी से इस बारे से चर्चा हुई और उनके सहयोग तथा ई-पत्रों के माध्यम से इस विचार को आकार मिला । बाद में एडीलेड से राय कूकणा जी व पर्थ से रेनू शर्मा जी को भी इसने सम्मिलित किया गया । 
    रेखा राजवंशी के अनुसार, पुस्तक का नाम 'बूमरैंग' इसलिए रखा गया, क्योंकि 'बूमरैंग' आस्ट्रेलिया की आदिवासी देशीय जनजाति का प्रतिनिधित्व करता है । यह एक ऐसा हथियार है, जिसे किसी भी दिशा में फेंका जाए, यह फेंकने वाले के पास ही वापस आ जाता है । तात्पर्य यह कि भारतीय कवि कहीं भी रहें, उनका हृदय बार-बार अपने देश भारत की और ही वापस जाता है। यानी हर भारतीय प्रवासी चाहे- अनचाहे ही 'बूमरैंग' बन जाता है ।
  • Naaz
    Inaytullah
    80 72

    Item Code: #KGP-2098

    Availability: In stock


  • Chinhaar
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-110

    Availability: In stock

    चिन्हार 
    "माँ, लगाओ अँगूठा !" मँझले ने अँगूठे पर स्याही लगाने की तैयारी कर ली, लेकिन उन्होंने चीकू से पैन माँगकर टेढ़े-मेढे अक्षरों में बडे मनोयोग से लिख दिया-'कैलाशो  देवी"।  उन्हें क्या पता था कि यह लिखावट उनके नाम चढ़ी दस बीघे जमीन को भी छीन ले जाएगी और आज से उनका बुढापा रेहन चढ जाएगा ।
    रेहन में चढा बुढापा, बिकी हुई आस्थाएँ, कुचले हुए सपने, धुंधलाता भविष्य-इन्हीं दुख-दर्द की घटनाओं के ताने-बाने ने चुनी ये कहानियाँ इक्कीसवीं शताब्दी की देहरी पर दस्तक देते भारत के ग्रामीण समाज का आईना हैं । एक ओर आर्थिक प्रगति, दूसरी ओर शोषण का यह सनातन स्वरुप! चाहे 'अपना-अपना आकाश' की अम्मा हो, 'चिन्हार' की सरजू या 'आक्षेप' की रमिया, या 'भंवर' की विरमा-सबकी अपनी-अपनी व्यथाएँ हैं, अपनी-अपनी सीमाएँ ।
    इन्हीं सीमाओं से बँधी, इन मरणोन्मुखी मानव-प्रतिमाओं का स्पंदन सहज ही सर्वत्र अनुभव होता है--प्राय: हर कहानी में ।
    लेखिका ने अपने जिए हुए परिवेश को जिस सहजता से प्रस्तुत किया है, जिस स्वाभाविकता से, उससे अनेक रचनाएँ, मात्र रचनाएं न बनकर, अपने समय का, अपने समाज का एक दस्तावेज बन गई हैं।
  • Anveshak (Paperback)
    Pratap Sehgal
    25

    Item Code: #KGP-942

    Availability: In stock

    अन्वेषक
    महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम अतीत की ओर मुँह करके खडे को जाएँ और खडे रहें। हाथ में अतीत का झंडा उठा लें और गौरव को मीनारों पर चढ़कर खुद को बडा महसूस करें। महत्वपूर्ण यह है कि अतीत को खँगालें, अतीत की मीनारों को ओर देखें, पर अपने पैरों तले को जमीन न छोड़ें।
    'अन्वेषक' को रचना का मूल बिंदु यहीँ से शुरु होता है। इसी अर्थ में यह नाट्य-रचना पाँचवीं शती के उत्तरार्द्ध में हुए आर्यभट और उसके अन्वेषणों के बहाने समकालीन प्रश्नों यर विचार करती है। प्रगतिकामी और प्रतिगामी शक्तियों के बीच को रहे संघर्ष को नाटकीय तनावों के साथ अभिव्यक्त करती है। अवरोधकारी और अंधविश्वासी शक्तियों के सामने क्रांतिकारी अन्वेषण करने वाले किसी भी अन्वेषक को जिस मानसिक यातना से गुजरना पड़ सकता है और अंततः  उसकी क्या नियति हो सकती है इस सवाल पर भी यह नाटक गौर करता है।
    इतिहास नाटक की पृष्ठभूमि है इसलिए यह ऐतिहासिक नाटक नहीं है। इसका मकसद की जानकारी देना भी नहीं, बल्कि इतिहास के एक कालखंड, उस कालखंड में जन्मे आर्यभट के अन्वेषणों के बहाने परिवर्तन-, शक्तियों के संघर्ष को रेखाकित करना है। इसी के साथ जुड़ते है प्रेम, ईष्यों, स्मृहा, देश-प्रेम और वैज्ञानिक-टैम्पर से जुडे तमाम सवाल । 
    इन अर्थों में 'अन्वेषक' हिंदी नाटकों की उस परंपरा को आगे बढाता है जो प्रसाद से शुरू होकर मोहन राकेश में बदल जाती है। यहीं इतिहास पर उतना आग्रह नहीं, जितना प्रसाद को था पर नाटय-व्यापार पर आग्रह है। इतिहास के महीन तंतु को एक प्रभावी नाटक में रचने की क्षमता यहाँ साफ झलकती है। आशा है प्रताप सहगल का यह नाटक रंगकर्मियों  एवं नाट्य प्रेमियों की अदम्य रंग-पिपासा को एक सीमा तक अवश्य ही शांत करेगा।

  • Plot Ka Morcha
    Shamsher Bahadur Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-588

    Availability: In stock


  • Doosara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    100

    Item Code: #KGP-1203

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Vyavharik Pryay Kosh
    Mahendra Chaturvedi
    150 135

    Item Code: #KGP-83

    Availability: In stock


  • Hindi Sahitya : Sarokaar Aur Saakshaatkaar
    Dr. Arsu
    300 240

    Item Code: #KGP-9031

    Availability: In stock

    हिंदी साहित्य : सरोकार और साक्षात्कार
    हिंदी मात्र हिंदीभाषी क्षेत्र की ही नहीं, बल्कि इस विशाल समूचे देश की भाषा बन चुकी है और उसे यह स्थान दिलाने में अनुवाद के आदान-प्रदान के साथ हिंदीतर क्षेत्र के साहित्यकारों द्वारा हिंदी को अपनाए जाने से संभव हुआ है। हिंदीतर क्षेत्र के अनेक साहित्यकार अपने क्षेत्र के भाषायी साहित्य के साथ हिंदी साहित्य और उसके सरोकारों से गंभीरतापूर्वक जुड़े हुए हैं। डॉ. आरसु हिंदीतर भाषी क्षेत्र के मूर्धन्य साहित्यकार है । वह कालिकट विश्वविद्यालय से हिंदी विभाग के प्राध्यापक है, साथ ही सृजनशील साहित्यकार तथा मर्मग्राही समीक्षक हैं।

    केरल के मलयालमभाषी डॉ० आरसु की यह पुस्तक 'हिंदी साहित्य : सरोकार और साक्षात्कार' इस तथ्य को भली भाँति प्रमाणित करती है कि हिंदी साहित्य की प्रवृतियों और प्रणेताओं पर उनकी निरीक्षण और विश्लेषणपरक वृष्टि कितनी गहरी है । आठवें दशक के हिंदी साहित्य की धाराओं के बारे में सृजन संवाद इस कृति की अनूठी विशेषता है । विदेशो से रहकर निष्ठापूर्वक हिंदी की श्रीवृद्धि करने वाले लेखकों व अनुवादकों के साथ डॉ० आरसु के आंतरिक संवाद, जो वैश्चिक स्तर पर हिंदी के विकास का द्योतक है, को भी इससे कुशालता के साथ रेखांकित किया गया है ।

  • Pride And Prejudice (Paperback)
    Jane Austen
    125

    Item Code: #KGP-347

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • Pahiye Ki Vikaas Katha (Paperback)
    Chetan Kumar
    60

    Item Code: #KGP-7089

    Availability: In stock


  • Charaiveti-Charaiveti
    Shyam Singh Shashi
    75 68

    Item Code: #KGP-1892

    Availability: In stock


  • Chune Huye Nibandh
    Hazari Prasad Dwivedi
    195 176

    Item Code: #KGP-850

    Availability: In stock


  • Chaak Par Charhi Maati
    Baldev Vanshi
    200 180

    Item Code: #KGP-631

    Availability: In stock

    धरती पर माटी का अम्बार, अनेकानेक रूपों में बढ़ता जा रहा है । माटी का विस्तार संवेदना-शून्य, मरी माटी का । पांवों तले बेदर्दी से कुचली-गूंधी माटी/खेतों की/नदी-नालों के बहते पानियों की/कहाँ-कहाँ से आई बहकर / रोते हुए भूखे कण/दुविधा में दुखते क्षण/अकाल के मारे । पानी-पानी जागने/पत्थर-पत्थर सोने के/उनींदे-विदीर्ण सपनों के/कैसा लेंगे रूप? यही वर्तमान इक्कीसवीं सदी की भयसनी, भयंकर त्रासदियों की नियति है । लगता है किन्हीं अलक्ष्य ग्रहों से पीड़ाएँ इस धरती पर मृत्यु, युद्ध, हिंसा, हत्या के रूप में बरस रही हैं या इस धरती की माटी से ही उग-उगकर बाहर निकल रही हैं ।
  • Kanak Chadi
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1980

    Availability: In stock

    कनक छड़ी
    'धन्नो के कान उसकी तरफ़ लगे थे,
    किन्तु मन ? 
    मन तो आज जैसे हजार  आँखों से 
    उन तसवीरों को देख रहा था,
    जो उसके स्मृति-पट पर
    उभर रही थीं ।
    उनमें तारा ही तारा थी…
    कभी बेरियों से बेर तोड़ते हुए
    कभी शटापू खेलते हुए
    कभी को खेतों में कोयल संग
    कूककर भागते हुए 
    कभी ढोलक की थाप पर गाते हुए
    कभी 'तीयों' के गोल में
    थिरकती तारा नजर आती
    कभी ब्याह के सुर्ख जोड़े में सजी हुई
    लजाती-मुस्कराती दिखती
    उसकी आँसुओं में डूबी छवि के साथ
    यह सिनेमा रील टूट जाती । 
    [इसी उपन्यास से]
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vijay Dan Detha (Paperback)
    Vijaydan Detha
    90

    Item Code: #KGP-7012

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : विजयदान देथा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार विजयदान देथा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'लजवन्ती', 'दूजौ कबीर', 'फितरती चोर', 'बडा कौन', 'दूरि, 'सिकन्दर और कौआ', 'राजीनामा', रैनादे का रूसना', 'अनेकों हिटलर' तथा 'हाथी-कांड' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक विजयदान देथा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jinavar
    Chitra Mudgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1998

    Availability: In stock


  • Dharmik Kathayen
    Jagat Ram Arya
    150 135

    Item Code: #KGP-108

    Availability: In stock

    धार्मिक कथाएं

    एक दन ब्राह्मण ने मार्ग पर चलते हुए एक हीरा, जिसकी कीमत एक लाख थी, पड़ा आया। वह साधारण रूप से ही हरे को लिए हुए जा रहा था कि उधर आगे की ओर से एक जौहरी जगह-जगह भूमि को देखता हुआ आ रहा था और विशेष व्याकुल था। इतने में ब्राह्मण ने उसे व्याकुल देखकर कहा कि जौहरी भाई, तू व्याकुल क्यों है? देख, एक हीरा हमने पाया है। तेरा हो तो तू ले ले। यह कहकर जौहरी को हीरा दे दिया। अब जौहरी कहने लगा कि मेरे तो दो हीरे थे, इसलिए एक तो तूने दे दिया, दूसरा भी दे दे, तब मैं तुझे छोड़ूंगा। उस जौहरी ने ब्राह्मण को पुलिस के हवाले कर अपना मुकदमा अदालत में दे दिया। वहां अफसर ने उस ब्राह्मण से पूछा कि कहो भाई, क्या मामला है? उसने कहा कि मैं मार्ग में आ रहा था कि मुझे एक हीरा पड़ा मिला। मैं साधारण रूप से जा रहा था तभी उधर से यह कुछ ढूंढ़ता हुआ व्याकुल सा आ रहा था। मैंने इससे पूछा, क्या हे? तब इसने कहा कि मेरा एक हीरा खो गया है। मैंने वह हीरा इसे देकर कहा कि देखो, यह एक हीरा मैंने पाया है। यदि तुम्हारा हो तो ले लो। तब इसने ले लिया और अब यह कहता है कि मेरे तो दो हीरे थे। पुनः अफसर ने सेठ जी से पूछा। तब सेठ जी बोले कि मेरे तो दो हीरे थे जो मार्ग में गिर पड़े थे। उनमें से एक तो इसने दे दिया, पर एक नहीं देता है। अफसर ने समझाया कि यह ब्राह्मण यदि अपने ईमान का पक्का न होता, तो इतना दीन होते हुए एक भी क्यांे देता? अतः यह फैसला किया कि वह हीरा ब्राह्मण को दे दिया जाए। वह जौहरी का नहीं, क्योंकि इसके तो दो हीरे एक साथ गिरे थे, सो इसके कहीं और होंगे। तब तो सेठ बोले कि सरकार, तो मुझे एक ही दिला दिया जाए। तब अफसर ने कहा कि अब तुमहो नहीं मिल सकता।
    —इस संग्रह की ‘सत्यमेव जयते’ कथा
  • In Dinon Ve Udhas Hain
    Dinesh Pathak
    75 68

    Item Code: #KGP-1930

    Availability: In stock

    इम दिनों वे उदास हैं
    'इन दिनों वे उदास हैं ' दिनेश पाठक की नौ बहुचर्चित कहानियों का संकलन है । इस संकलन की कहानियों में जीवन के कई रंग, कईं अनुभव है । लेखक की विशेषता जीवनानुभवों को वस्तुगत रूप में प्रस्तुत करना नहीं, वरन उन्हें रचना के दायरे में लाकर उनका सामाजिक अर्थ पाने की स्पष्ट एवं सार्थक कोशिश करना है । कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ अनुभव-संबद्धता से पैदा हुई आत्मीय संस्पर्श की ऊष्मा से  परिपूर्ण कहानियाँ है । प्रस्तुति के स्तर पर इनमें न कोई बौद्धिक आडंबर है, न चमचमाता वाग्जाल । जो कुछ है, वह अनुभव के स्वायत्त वेग से उत्पन्न शिल्प है, भाषा है । एकदम सहज-सरल और स्वत स्फूर्त ।