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  • Gujrati Katha Sanchayan
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    100 90

    Item Code: #KGP-7812

    Availability: In stock

    कथा साहित्य ही क्या कोई भी  साहित्य किसी देश, काल और समाज की सीमाओं में आबद्ध नहीं होता, वह तो जीवन-जगत का व्याख्यान होने के नाते सार्वजनीन और सार्वभौमिक होता है । हां, इतना अवश्य होता है कि देशज व् क्षेत्रीय परम्पराएं, संस्कार, मान-मूल्य और रीति-रिवाज उसमें सहज ही अपना स्थान बना लेते है, जो उसे एक निजी पहचान देते हैं, लेकिन उसके वैचारिक या भावनात्मक आंतरिक अनुभव मात्र क्षेत्रीय न होकर भूमंडलीय होते हैं, मानवीय होते हैं । इस संचयन की प्रस्तुत कहानियां गुजरात की निजी संस्कृति की विशिष्ट पहचान बनाये रखती हुईं मानवीय संवेदनाओं की मुखर प्रवक्ता हैं, जो पाठकों से बहुत कुछ कहना चाहती हैं, साथ ही गुजराती कहानी की विकास-यात्रा के पड़ावों को भी रेखांकित करती चलती हैं । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan Alpana Mishra (Paperback)
    Alpana Mishra
    225

    Item Code: #KGP-7223

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां अल्पना मिश्र

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अल्पना मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भीतर का वक्त’, ‘कथा के गैरजरूरी प्रदेश में’, ‘मिड डे मील’, ‘बेतरतीब’, ‘उनकी व्यस्तता’, ‘बेदखल’, ‘भय’, ‘उपस्थिति’, ‘मुक्ति-प्रसंग’ तथा ‘छावनी में बेघर’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार अल्पना मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Samarpan
    Bhanu Pratap Shukla
    80 72

    Item Code: #KGP-1959

    Availability: In stock

    समर्पण 
    शताब्दियों से साथ-साथ रहने के बावजूद मुस्लिम मानसिकता भारतीय जीवन-दृष्टि से रच-बस क्यों नहीं सकी ? राष्ट्रीय मूल धारा के प्रवाह को और व्यापक न बनाकर उसे संकीर्ण या उससे हटकर अपनी एक अलग धारा बनाने का प्रयास क्यों चलता रहता है ? भारत में इस्लाम के मतानुयायी यहाँ की विविधता में एकता की अवधारणा के अधिष्ठान का अंग क्यों नहीं बन पाते ? हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा जितना गगनभेदी होता है, दिल की दूरियाँ और दरारें उतनी ही गहरी क्यों होती जाती है ? कैसा स्वर्णिम होगा वह दिन जब भारत के सभी नागरिक मुक्तकण्ठ से 'भारतमाता की जय' के उदघोष में ही सर्वाधिक गौरव और प्रेरणा का अनुभव करेंगे । यहीं लालसा इस पुस्तक की मूल प्रेरणा है । इस पुस्तक में उठाए गए ऐसे तमाम सवालों का बेबाक जवाब मिल जाए और खुले मन से हम उन्हें मान लें तो निश्चित ही उस दिन भारतीय जीवन का सौदर्य अपने पूरे निखार पर होगा । शताब्दियों के संताप से संत्रस्त देश के लिए सहीं, सामयिक और स्थायी विकल्प की तलाश का ही एक नाम है-समर्पण ।
  • Sarhad Paar Ki Bisaten
    Kanhiya Lal Nandan
    180 162

    Item Code: #KGP-9195

    Availability: In stock

    महानायकों की मुसीबत यह होती है कि उन्हें एक साइकिलबाज की तरह कर समय पैडल चलाते रहना पड़ता है, क्योंकि पैडल रुका नहीं कि सवार लुढ़का। बल्कि आगे जाने के लिए उसे पैडल मारने में मेजी से काम लेना होता है, वरना चढ़ाई की दौड़ में उसके पिछड़ जाने का खतरा भी रहता है।
    ये आलेख एक तरह का ऐतिहासिक प्रक्षेपण हैं, जो लगातार घूमते चक्रव्यूह के माध्यम से अपने समय की तस्वीर पेश करते हैं। एक संक्षिप्त कालखंड अपने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय हितों को दृष्टि में रखकर आकार लेता दिखाई दे, यही इन आलेखों की सार्थकता है। किसी भी देश के इतिहास में दो-चार साल का समय कोई बड़ी अहमियत नहीं रखता, लेकिन उन दो-चार सालों के घटनाक्रम को काटकर समूचे इतिहास-क्रम को समझा भी नहीं जा सकता। ये आलेख उस इतिहास-क्रम को समझने में मदद करेंगे, ऐसा विश्वास है।
  • Mere Saakshaatkaar : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    190 171

    Item Code: #KGP-173

    Availability: In stock


  • Debt-Free-Forever (Paperback)
    Gail Vax-Oxlade
    245

    Item Code: #KGP-344

    Availability: In stock

    Imagine waking up in the morning and knowing that no matter what happens today, you can cope. Imagine that you’ve got enough money to take care of the expenses that need to be paid regularly and to have some fun too. Imagine the sense of peace that comes from knowing you’re in control of your life.
    If you’ve been frantically trying to cover your butt because there just never seems to be enough money, I can help you. If you’re up to your eyeballs in debt and can’t even imagine being debt-free, I can help you. If you’re at your wits’ end because you’ve made a huge mess and don’t have a clue how to fix it, I can help you.
    —from the book
    FIGURE OUT WHERE YOU STAND MAKE A PLAN CHANGE YOUR HABITS PREPARE FOR THE FUTURE STAY THE COURSE
  • Yeh Dilli Hai
    Raj Budhiraja
    125 113

    Item Code: #KGP-1961

    Availability: In stock

    मैं इतना कहना चाहुँगी कि मैंने दिल्ली में रहकर सुखद-दुखद और त्रासद अनुभव किए हैं लेकिन मैंने सुखद अनुभवों को ही अभिव्यक्ति प्रदान की है । अभी तक मैंने दिल्ली पर तीन पुस्तके लिखी हैं-'दिल्ली अतीत के झरोखे से, 'हाशिये पर' और 'हाशिये पर दिल्ली' । ऐसी दिल्ली की चारों दिशाओं से सुख व्यापता रहे । इन्हीं शब्दों के साथ मैं ये पुस्तक (जिसका नामकरण मैंने खुद किया है) अपने दिल्लीवासियों को सौंपने का प्रयास करती हूँ। सस्नेह आपकी
    --राज बुद्धिराजा

  • Rashtra Kavi Ka Stri Vimrash
    Prabhakar Shrotiya
    150 135

    Item Code: #KGP-1543

    Availability: In stock

    स्त्री-जागरण और स्त्री-गरिमा को लेकर गुप्त जी ने जो रचनाएं लिखी, वे आज की जरूरत भी हैं, भले ही भिन्न रूप रंग-तेवर में। उन्हांने तभी महसूस कर लिया था कि स्त्री की समस्या सबसे पुरानी, सबसे जटिल लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण है। गुप्त जी ने बड़े घर की नारियों से लगाकर साधारण घर-संसार की ऐसी नारियों का सृजन और पुनर्सृजन किया जो समाज के बहुकोणीय स्वरूप को प्रकट करती हैं। उनके माध्यम से गुप्त जी ने समाज, संस्कृति और मानवीय गुणावगुण रेखांकित किए हैं। उनके स्त्री-चरित्रों की विविधता, उनके अभिप्राय और मर्मस्पर्शिता समाज को शील और आचरण का आईना दिखाती है।
    स्त्री-विमर्श और नारी-सशक्तीकरण के युग में आज यदि हम गुप्त जी के नारी-पात्रों पर विचार करते तो हमें उनके माध्यम से उस संघर्ष और विमर्श का पता चलेगा जो बीसवीं शती के दूसरे-तीसरे दशक में कवि कर रहे थे। उनकी संवेदना, उदारता, प्रगतिशीलता और समय को भरोसे में लेकर समयातीत पहल की क्षमता रेखांकित की जानी चाहिए। इससे यह भी प्रकट होता है कि खड़ीबोली हिंदी के जन्मकाल से ही सामाजिक विकास और उन्नयन का वह आंदोलन प्रारंभ हो गया था जिसे हम 70-89 साल बाद उत्तर-आधुनिक विमर्श बना रहे हैं। हमारी भाषा, हमारे संघर्ष की प्रणाली और अभिव्यक्ति-शिल्प भले बदल गया हो, परंतु चिंता के बीज लगभग वे ही हैं। इस तरह देखने पर हिंदी की जीवट और अग्रगामिता का पता चलता है।
    गुप्त जी के स्त्री-चरित्रों और स्त्री-चिंतन पर यह छोटी-सी पुस्तक दरअसल नई उपजाऊं पीढ़ी के लिए लिखी गई है।
  • Bhasha, Sahitya Aur Jaatiyata
    Ram Vilas Sharma
    640 576

    Item Code: #KGP-884

    Availability: In stock

    भाषा, साहित्य और जातीयता
    डॉ. रामविलास शर्मा की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनके लेखों और समीक्षाओं का यह संग्रह पाठकों के लिए प्रस्तुत है। डॉ.शर्मा द्वारा संपादित पत्रिका ‘समालोचक’ में प्रकाशित यह सामग्री पहली बार पुस्तक के रूप में आ रही है। सामग्री का प्रस्तुतिकरण तथा संपादन किया है डॉ. शर्मा के सुपुत्र विजय मोहन शर्मा ने।
    ज्ञात हो कि ‘समालोचक’ केवल दो वर्ष--फरवरी, 1958 से जनवरी, 1960 तक निकल पाया। कुल चैबीस अंकों में से दो विशेषांक थे--‘सौंदर्यशास्त्र विशेषांक’ और ‘यथार्थवाद विशेषांक’। जिनका उस समय बड़ा स्वागत हुआ और हिंदी साहित्य-जगत् के अनेक ‘सितारों’ ने उनकी सराहना की। ये विशेषांक साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए आज भी महत्त्व रखते हैं।
    ‘समालोचक’ में पुराने लेखकों के अलावा नए लेखक भी लिखते थे। इन लेखकों में हिंदी प्रदेश से बाहर के लेखक भी थे। इसका संपादकीय क्षितिज उदार था। संपादक डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, ”हमारा ध्येय हिंदी आलोचना के विकास में योग देना है, उसमें आमूल परिवर्तन करना अथवा युगांतर उपस्थित करना नहीं। हम विभिन्न विचारधाराओं और मतों के लेखकों की रचनाएं प्रकाशित करके परस्पर विचार-विनिमय द्वारा आलोचना-साहित्य के उत्तरोत्तर विकास का प्रयत्न करेंगे।“
    बीसवीं शताब्दी के हिंदी के सर्वमान्य महान् आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा की साहित्यिक समझ और प्रतिबद्धता का विस्तार इस ग्रंथ की संकलित सामग्री में आद्यंत दिखाई पड़ते हैं। शोध और समीक्षा के प्रतिमान स्थापित करता यह ग्रंथ प्रत्येक बुकशेल्फ की अनिवार्यता है।
  • Mahatma Gandhi
    Jagat Ram Arya
    70 63

    Item Code: #Kgp-mg

    Availability: In stock


  • Antyakshari Kosh
    Laxmi Narayan Garg
    700 525

    Item Code: #KGP-233

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Malay (Paperback)
    Malay
    90

    Item Code: #KGP-1245

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-
    हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-
    अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...।
  • Bengal Shaili Ki Chitrakala
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    400 360

    Item Code: #KGP-9044

    Availability: In stock

    भारत दो चित्रकला शैलियों में बंगाल चित्रकला शैली को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है । उसका यह वेश्मिष्ट्रय विगत शती के बंगाल रिनेसां' अर्थात् माक्षतीय नवजागरण से उसकं संबद्ध होने के कारण भी है । बंगाल शैली देशज निजत्व को पल्लवित और विकसित करनेवाली शैली तो थी ही लेकिन, उसमें ऐसे विरोधाभास भी थे जिससे उसकं समसामयिक मूल्यद्देकन ने दो परस्पर विरोधी अभिमत सामने आये। जहा इस शेली के समर्थक कहय-समीक्षकों ने भावनात्मक लगाव रखते हुए इसे अतिश्योक्तिपूर्ण महत्व दिया यहीं दूसरी और अन्य कला-समीक्षकों ने वस्तुनिष्ठ और दिष्टलेषणमृत्मक मूल्यग्रेकन कर इसकी अनेकानेक कमियों व खामियों को भी उजागर जिया, साथ ही कुछ गंभीर आरोप भी लगाये और इसकी उपलब्धियों के सामने ग्रहन-चिहन खडे किये। आज यह शैली इतिहास का विषय बन चुकी है अत: इस अध्ययन में प्रस्तुत है उसका सर्वागीण सष्टमुक विवेचन, जो अनेक अनछुए पहलुओं को उजागर यता है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheep Singh
    Mahip Singh
    160 144

    Item Code: #KGP-2065

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार महीप सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उलझन', 'पानी और पुल', 'कील', ‘सीधी रेखाओं का वृत्त', 'शोर', 'सन्नाटा', 'सहमे हुए', 'धूप के अंगुलियों के निशान', 'दिल्ली कहाँ है?' तथा 'शोक'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महीप सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Is Daur Mein Hamsafar
    Amar Goswami
    350 315

    Item Code: #KGP-1999

    Availability: In stock

    इस दौर में हमसफ़र
    अमर गोस्वामी उन थोड़े से कथाकारों में से है जिनकी कहानियों पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते है कि यह कहानी अमर गोस्वामी ही लिख सकते थे । आज के दौर में जबकि रचनाएँ ही नहीँ, लेखक भी एक-दूसरे की 'जेरोक्स कापियों' से तबदील हो रहे है, अमर गोस्वामी की यह पहचान और कूवत-या कहिए कि रचनात्मक सामर्थ्य काबिलेगौर है । इस सामर्थ्य के बूते ही अपनी लंबी कथा-यात्रा से कभी रचना पर उनका विश्वास डिगा नहीं और वे उन हड़बडिए लेखकों की पाँत में शामिल नहीं हुए, जो सिर्फ चर्चित होने के लिए लिखते है और अपने आसपास की हर चीज, हर संबंध को 'कैश' कर लेते के लिए उतावले दिखते है ।
    इन बातों की ओर ध्यान दिलाना इसलिए जरूरी लगा क्योंकि  अमर गोस्वामी का पहला उपन्यास ‘इस दौर में हमसफ़र' उनकी इस लंबी और धीरज-भरी यात्रा का ही स्वाभाविक फ़ल है-और  अमर जी का पहला उपन्यास होते हुए भी, गंभीर चर्चा और विश्लेषण की माँग करता है। ऊपर से देखने पर 'इस दौर में हमसफ़र' भले ही प्रेमचंदीय वर्णनात्पक शैली में लिखा उपन्यास नजर आए, पर थोडा भीतर उतरते ही समझ में आ जाता है फि यह सिर्फ एक उपन्यास ही नहीं, हमारे दौर की एक गहरी और स्तब्ध कर देने वाली 'एक्स-रे पड़ताल' भी है । यह दीगर बात है कि यह लिखा गया है इतनी जानदार भाषा और पुरलुत्फ अंदाज में कि जब तक आप इसे खत्म नहीं कर लेते, यह आपको चैन  नहीं लेने देता । बल्कि उपन्यास खत्म होने के बाद भी लंबे अरसे तक पाठकों का 'हमसफ़र' बना रहता है ।
    इसकी वजह शायद यह है कि एक उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी नई कथा-प्रविधियों के दास नहीं है और उन्हें उथले रूप से जैसे-तैसे जहाँ-तहाँ टाँक लेने को हरगिज पसंद नहीं करते । उनके यहाँ जो कुछ है, वह अपने ठेठ मौलिक अंदाज में है और अमर गोस्वामी का निहायत अपना है । इसीलिए वे बगैर दिखावटी स्त्री-विमर्श के शोर-शराबे के, अनन्या के रूप से हमें एक ऐसी विलक्षण और शक्तिशाली स्त्री से मिलवाते हैं जो अपनी बेबनाव शख्सियत से अति आधुनिक ही नहीं, 'नई पीढी की नई नारी’ लगती है, जिसकी धमक आगे आने वाले युगों में और ज्यादा साफ सुनी जा सकेगी । अनन्या के मित्र और सहयात्री के
    रूप में अनिरुद्ध बागची का 'विचलन' या हार, सिर्फ उसी की हार नहीं, आधुनिकता के उन तमाम नकली प्रत्ययों की हार भी है जो आधुनिकता को सिर्फ 'देह-भोग के सुख' तक सीमित कर देना चाहते हैं । अनन्या  के माई मधुसूदन के चेहरे में मुझे तो जगह-जगह स्वयं अमर गोस्वामी का दर्द से तिलपिलाता चेहरा नजर आया । यह दीगर बात है कि मधुसूदन की कहानी अपनी है, और वह अमर जी की नहीं, अपनी ही राह पर आगे बढ़ता दिखाई देता है ।
    ‘इस दौर में हमसफ़र' में आधुनिकता की 'विकृत' और 'रचनात्मक' दोनों ही शक्लें है और अपने पुरे विश्वसनीय रूप से है । इस लिहाज से यह एक ऐसा उपन्यास भी है जिसे कई किस्म के 'कंफ्यूज़न' और मतिभ्रम-भरे आज के समाज से सही दिशा की ओर  इशारा करने वाली एक पहल के रूप में भी देखा जा सकता है । हाँ, यह जरूर है कि अमर गोस्वामी कहीं-कहीं ज्यादा खुल गए है और जहाँ सिर्फ इशारों से काम चल सकता था, वहाँ भी 'रस' लेते नजर आते है । शायद महानगरीय समाज के 'रंगीन विकारों, की ओर ध्यानाकर्षण की यह उनकी अपनी शैली हो ।
    उपन्यास के अंत में मधुसूदन और हेमंती ही नहीं, शर्वाणी की चोट झेलकर अंतत: फिर से सागरिका की ओर मुड़ा शांतनु जिस नए समाज की नींव रखना चाहता है, उसमें मूल्यों के उपहास वाली 'मजावादी' दुष्टि नहीं, बल्कि विडंबनाओं को पहचानकर उनके  बीच से रास्ता खोजती 'मनुष्य की जय-यात्रा' का अगला पडाव नजर आ सकता है ।
    'इस दौर से हमसफ़र' में बेहद तीव्र गति और हलचल है तो विचारों का तेज संघर्ष भी । लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि ये तेज बहसें दिल्ली से मीरजापुर और चुनार तक फैली उपन्यास की प्रदीर्घ कथा का एक सहज हिस्सा बनकर आती हैं । दिल्ली जैसे महानगरों की बनिस्बत छोटे शहरों, कस्बों में अब भी इंसानी संवेदना और आर्द्रता कैसे बनी हुई है, इसकी परख उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी जगह-जगह करवाते हैं । कोई हैरत की बात नहीं कि इसी कोशिश में वे डॉ० प्रशांत सिन्हा जैसे बड़े कद के इंसान से हमें रू-ब-रू होने का मौका देते हैं, जिनके आगे सारी महानगरीय भभ्भड़ और चमक-दमक फीकी लगती है ।
    अलबता अमर गोस्वामी 'इस दौर में हमसफ़र' को एक उपन्यास के साथ-साथ सहज ही बहुरंगी छवियों और गतियों वाले हमारे दौर का 'एक विशद समाजशास्त्रीय अध्ययन' भी बना सके-यह एक बडी सफलता है । अपने पहले ही उपन्यास से अमर गोस्वामी आज के महत्वपूर्ण रचनाकारों की पाँत में आ गए हैं, यह बात उनकी रचनात्मक सामर्थ्य के प्रति मन में 'आश्वस्ति' के साथ-साथ आदर भी पैदा करती है ।
  • Samudra Ke Bhoot
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    60

    Item Code: #KGP-1039

    Availability: In stock


  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 297

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghava (Paperback)
    Rangey Raghav
    140

    Item Code: #KGP-461

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रांगेय राघव 
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रांगेय राघव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'पंच परमेश्वर', 'नारी का विक्षोभ', 'देवदासी', 'तबेले का धुँधलका', 'ऊँट की करवट', 'भय', 'जाति और पेशा, 'गदल', 'बिल और दाना' तथा 'कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेकनीक्स'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रांगेय राघव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Parda Beparda
    Yogendra Dutt Sharma
    180 162

    Item Code: #KGP-1561

    Availability: In stock

    पर्दा-बेपर्दा
    कहाँ है सभ्यता ? किधर है प्रगति ? कैसा है विकास ? इतिहास की लंबी यात्रा करने के बाद भी हम मानसिक रूप से शायद अब भी वहीं के वहीं हैं जहाँ से शुरू हुई थी हमारी यात्रा। सच पूछें, तो हम आज भी किसी आदिम अवस्था में ही जी रहे हैं। क्या सभ्यता का कोई विकास-क्रम हमारी बर्बरता को मिटा पाया है ?
    विश्व-मंच पर ही नहीं, देशीय परिवेश में भी सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित होने का हमारा दंभ निरर्थक और खोखला ही सिद्ध होता है।
    योगेन्द्र दत्त शर्मा की ये कहानियाँ बताती हैं कि कैसे हम आज अनेक विपरीत धु्रवों पर एक साथ जी रहे हैं। कहना ज़रूरी है कि ‘पर्दा-बेपर्दा’ की ये कहानियाँ फैशनपरस्त कहानियों की दुनिया से अलग मानवीय संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी सार्थक रचनाएँ हैं जो लंबे समय तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगी।
  • Hindustan Ki Diary
    Dirgha Narayan
    350 280

    Item Code: #KGP-HKD HB

    Availability: In stock

    'हिंदुस्तान की डायरी' में दीर्घ नारायण के कहानीकार का वह रूप सहज ही नजर आ जाता है जिसमें वह कहानी को अपने समय, समाज व बदलती संस्कृति की धड़कन बना देना चाहते हैं। यहाँ अनुभव जिंदगी से निकलकर चौदह कहानियों में इस तरह प्रविष्ट हो गए हैं कि विविध पक्षीय संबंधों-मूल्यों पर संजीदगी से विचार होता चलता है। वर्तमान को तो ये कहानियाँ गहराई से अंकित करती ही हैं, एक गंभीर व सकारात्मक भविष्य-दृष्टि भी सृजित करती हैं जिससे हमारे समाज को संचालित करने वाली शक्तियाँ सचेत हो सकेंगी। लेखक की यह एक वाजिब चिंता है कि भारत का हर नागरिक तो पाकिस्तान में अमन-चैन व तरक्की ही चाहता है किंतु दुर्भाग्य यह है कि पाकिस्तान की नजर में सबसे बड़ा शत्रु भारत बना हुआ है। भारत की ओर से दरअसल यह एक ईमानदार डायरी है जिससे दोनों ओर के हुक्मरानों को सही दिशा मिल सकती है। अपने यथार्थ में एक मुख्य अधिशासी अधिकारी की ये कहानियाँ बदलते समय में उन दस्तकों की शिनाख्त हैं। जो परिवार, शहर, देश और समाज के दरवाजों पर सुनाई पड़ रही हैं। यहाँ भाषा ऐसी दोस्ताना है कि कथा के पात्रों और स्थितियों का मूल भाव बड़ी सहजता से संप्रेषित हो जाता है। रूपवादी लटकों-झटकों से संघर्ष कर रही आज की हिंदी कहानी के लिए दीर्घ नारायण जी की ये कहानियाँ एक सार्थक मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं क्योंकि यहाँ हर कहानी एक नया कथ्य खोजकर लाती है और यथार्थ से सीधी मुठभेड़ करती है 
  • Devdas (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    70

    Item Code: #KGP-7026

    Availability: In stock


  • Sachitra Vigyan Va Praudyogiki Vishvakosh (3 Vols.)
    Vinod Kumar Mishra
    1950 1755

    Item Code: #KGP-570

    Availability: In stock

    सचित्र विज्ञान व प्रौद्योगिकी विश्वकोश (3 खंडों में)
    प्रसिद्ध फ्रांसीसी गणितज्ञ आलेम्बर्त के विषय में कहा गया, "इसकी प्रतिभा फ्रांसीसी विश्वकोश ( 1751-1780) के प्रणयन में अधिक काम आई।" दूसरे शब्दों में गणित की खोजों की कीमत में भाषा की सेवा हो गई। ऐसा भारतीय भाषाओं के संदर्भ में हो ही नहीं सकता, क्योंकि भाषा-सेवा को यहाँ दोयम दर्ज का काम समझा जाता है। यूरोप में भाषा-सेवा देश-सेवा का पर्याय मानी जाती रही, जिस कारण वहाँ विश्वकोशों की परंपरा सदियों पुरानी है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध विश्वकोश 'ब्रिटानिका' का प्रथम संस्करण 1768-1771 में छपा था।
    हिंदी प्रदेश में बीसवीं सदी के आरभ में हिंदी ‘शब्द-सागर को योजना हाथ में ली गई। इसमें तत्कालीन हिंदी के मूर्धन्य आचार्य जुट गए। कार्य को दिशा मिल गई और शब्दकोश-निर्माण की अच्छी परंपरा विकसित हो गई । आज हिंदी में अनेक अच्छे शब्दकोश हैं, यह बात विश्वकोशों के विषय में नहीं कहीं जा सकती। विश्वकोश-निर्माण के भी अनेक प्रयास हुए, पर सामूहिक प्रयासों से इस विधा का क्रमिक विकास नहीं हो पाया। संस्थागत और व्यक्तिगत  प्रयासों से व्यापक या विषयवार दोनों प्रकार के विश्वकोशों का निर्माण हुआ । 
    व्यक्तिगत प्रयास से बने विश्वकोश का एक उदाहरण प्रस्तुत पुस्तक श्रृंखला है। इसके प्रणेता सिद्धहस्त हिंदी लेखक श्री विनोद कुमार मिश्र एक इंजीनियर हैं। इनकी कर्मठता और लगन ने इस ग्रंथ को आकार दिया है। फिर भी मानना पड़ता है कि इनका ज्ञान इंजीनियरी और भौतिक विज्ञानों तक ही सीमित था। सौभाग्य से पुनरीक्षक ऐसे मिल गए, जिनको कोशकला का पर्याप्त अनुभव था और वे जीव विज्ञानों के अध्येता रहे। प्रकाशक ने भी विलक्षण धैर्य और साहस का परिचय दिया । इन सभी सकारात्मक कारकों के योगदान से एक अच्छे ग्रंथ का सृजन संभव हो पाया।
  • Zindagi Aur Jugaar
    Manohar Puri
    250 225

    Item Code: #KGP-9025

    Availability: In stock

    जिन्दगी और जुगाड़
    आपाधापी के इस युग में व्यक्ति को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जुगाड़ का सहारा लेना ही पड़ रहा है। व्यक्तिगत, पारिवारिक अथवा सामाजिक जीवन में कोई भी गतिविधि बिना जुगाड़ के संपन्न करना निरंतर कठिन होता जा रहा है। आर्थिक, राजनीतिक और यहां तक कि शैक्षणिक जीवन भी जुगाड़ पर निर्भर होकर रह गया है। हर एक व्यक्ति दिन-भर किसी न किसी प्रकार से जुगाड़ करके अपने जीवन की गाड़ी को धकेलने का प्रयास कर रहा है। उसके चौबीसों घंटे किसी न किसी प्रकार का जुगाड़ करने में ही व्यतीत होते हैं। देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और अन्य सभी गतिविधियां जुगाड़ के बिना निरर्थक हैं। जिन्दगी का कोई पक्ष जुगाड़ से अछूता नहीं रहा, इसका अनुभव प्रायः हर व्यक्ति को प्रत्येक कदम पर होता है।
    इस उपन्यास में जीवन के कुछ ही पक्षों को छूना संभव हो पाया है। रोजमर्रा का पारिवारिक जीवन, हमारे परस्पर संबंध, राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा और प्रशासन, समाज में निरंतर फैलता भ्रष्टाचार, नशे की दुनिया में डूबती हमारी नई पीढ़ी, धन की अंधाधुंध दौड़ के मोहजाल में फंसी वर्तमान पीढ़ी जल्दी से जल्दी वह सब प्राप्त कर लेना चाहती है, जो उसे वर्षों के परिश्रम के बाद भी ईमानदारी से मिलना संभव नहीं दिखाई देता। इसके लिए शॉर्टकट जरूरी है और यही शॉर्टकट जुगाड़ का मकड़जाल है। एक बार इसमें फंसा व्यक्ति लाख सिर पटक ले, इससे बाहर नहीं निकल पाता।
    इस उपन्यास में विश्वविद्यालयों में पनपते माफिया गिरोह और देह-व्यापार, अस्पतालों से होती मानव-अंगों की व्यापक स्तर पर तस्करी और राजनीति में लगातार पनप रहे भ्रष्ट गठजोड़ सरीखे कुछ पक्षों को ही मात्र छुआ जा सका है। ये समाज में फलने-फूलने वाले कैंसर की एक बानगी मात्र हैं। आप स्वयं इससे कहीं अधिक जानते हैं और प्रतिदिन उसे भोगने को अभिशप्त हैं। समाज के किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग ने इस उपन्यास से प्रेरणा लेकर विरोध का एक स्वर भी उछाला तो मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा। हां, इतना निश्चित है, जितना इसमें लिखा गया है, हालत उससे कहीं अधिक गंभीर है। समय रहते जाग जाना बहुत जरूरी है। जागो, कहीं बहुत देर न हो जाए।    
  • Kavi Ne Kaha : Vishwanath Prasad Tiwari
    Vishwanath Prasad Tiwari
    190 171

    Item Code: #KGP-386

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
    मेरी कविताओं में ऐसे शब्द, बिंब या प्रतीक अधिक हैं जो भोगते हुए या जूझते हुए मनुष्य से संबंधित है । मैं गरीब देहाती दुनिया से जाया हुं और मेरे शुरू के बीस वर्ष उस अनाथ साधनहीन मनुष्य के बीच गुजरे जिसे बार-बार अपमानित होते, यातनाएं सहते देखा है । मेरी कविताओं में 'हत्या' और उससे मिलती-जुलती शब्दावली में जो आतंक है, वह मेरे बालमन पर पडे प्रभावों की ही प्रतिक्रिया है । मेरी कविताओं में 'अंधकार' और 'रात' के बिंब भी अधिक हैं जो एक अनार मेरे अकेलेपन की अतृप्ति को व्यक्त करते है तो दूसरी खार उस अंधकारमय दबाव को जिसे आज का साधनहीन मनुष्य भोग रहा है । मेरी कविताओं में पहाडी परिवेश अधिक मिलेगा । पहाड़ के प्रति मेरा गहरा आकर्षण है और मृत्यु-भय से आतंकित होते हुए भी मैंने पहाडी यात्राएं बहुत की हैं । हिमालय का परिवेश मेरी प्रेम कविताओं में कहीँ-कहीं प्रेमिका के साथ एकाकार हो गया है । कुछ शब्दों के सदंर्भ से प्रयोक्ता और ग्रहीता के अर्थों में अंतर स्वाभाविक है । अपनी कविताओं के प्रसंग में कहूं तो उनमें 'इतिहास', 'धारा', 'अंधकार', 'घाटी', 'जंगल', 'पहाड़' आदि अनेक शब्द अपना विशिष्ट अर्थ रखते है ।
    'बेहतर दुनिया के लिए' और 'आखर अनंत' नामक संग्रहों की बहुत-सी समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी है । इन संग्रहों के बारे में अपनी ओर से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि इनमें मेरी रचनात्मक भाषा  परित्कृत हुई है और कविताओं को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य मिला है । आत्मीय का भी और लोक का भी ।
  • SWAPNAPAASH
    Manisha Kulshreshtha
    240 216

    Item Code: #KGP-1572

    Availability: In stock

    'स्वप्नपाश' नृत्य और अभिनय से आजीविका-स्तर तक संबद्ध माँ-बाप की संतान गुलनाज फरीबा के मानसिक विदलन और अनोखे सृजनात्मक विकास व उपलब्धियों की कथा है । समकालीन सनसनियों में से एक से शुरु हुई यह कथा हमें एक बालिका, एक किशोरी और एक युवती के उस आरिम अरण्य में ले जाती है जहाँ 'नर्म' और 'गर्म' डिल्युजंस और हैल्युसिनैशरेन का वास्तविक मायालोक है। मायालोक और वास्तविक? जी हाँ, वास्तविक क्योंकि स्वप्न-दु:स्वप्न जिस पर बीतते है उसके लिए कुछ भी 'वर्चुअल' नहीं-न सुकून , न सितम । उस पीडा को सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि खुली दुनिया में जीती-जागती काया की चेतना एक अमोघ पाश में आबद्ध हो जाए और अधिकांश अपने किसी सपने के पीछे भागते नज़र आएँ। पाश में बँधे व्यक्ति की मुक्ति तब तक संभव नहीं होती जब तक कोई और आकर खोल न दे। मगर जब एक सम-अनुभूति-संपन्न खोलने वाले की तलाशा त्रासद हो तो? दोतरफा यातना से गुज़रने के खाद अगर कोई मिले और वह भी हौलै-हौले एक नए पाश में बंध चले तो ? अनोखे रोमांसों से भरी इस कथा में एक नए तरह की रोमांचकता है जो एक ही बैठक में पढ़ जाने के लिए बाध्य कर देती है ।
    गुलनाज़ एक चित्रकार है और वह भी 'प्राडिजी'।  ऐसे  चरित्र का बाहरी और भीतरी संसार कला की चेतना और आलोचनात्मक समझ के बगैर नहीं रचा जा सकता था। कथा में पेंटिंग  की दुनिया के प्रासंगिक नमूने और ज्ञात-अल्पज्ञात नाम ऐसे आते हैं गोया वे रचनाकार के पुराने पड़ोसी हों। आश्चर्य तो तब होता है जब हम नायिका की सृजन-प्रविधि और उसको पेंटिग्स के चमत्कृत (कभी-कभी आतंकित) कर देने वाले विवरण से गुजरते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ मूलत: चित्रकार हैं। उनकी रचनात्मक शोधपरकता का आलम यह है कि वे इसी क्रम में यह वैज्ञानिक तथ्य भी संप्रेषित कर जाती है कि स्किजोफ्रेनिया किसी को ग्रस्त भर करता है, उसे एक व्यक्ति के रूप में पूरी तरह खारिज नहीं करता ।
    स्किजोफ्रेनिया पर केंद्रीय यह उपन्यास ऐसे समय में  आया है जब वैश्वीकरण की अदम्यता और अपरिहार्यता के नगाड़े बज रहे हैं। स्थापित तथ्य है कि वैश्वीकरण अपने दो अनिवार्य घटकों-शहरीकरण और विस्थापन- के द्वारा परिवारिक ढाँचे को ध्वस्त करता है। मनोचिकित्सकीय शोधों के अनुसार शहरीकरण स्किजोफ्रेनिया के होने की दर को बढ़ाता है और पारिवारिक ढाँचे में टूट रोग से मुक्ति में बाधा पहुँचाती है। ध्यातव्य है कि गुलनाज पिछले ढाई दशकों में बने ग्लोबल गाँव की बेटी है । अस्तु, इस कथा को एक गंभीर चेतावनी की तरह भी पढे जाने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन, कला और मनोविज्ञान-मनोचिकित्सा की बारीरिज्यों को सहजता से चित्रित करती समर्थ और प्रवहमान भाया में लिखा यह उपन्यास बाध्यकारी विखंडनों से ग्रस्त समय में हर सजग पाठक के लिए एक अनिवार्य पाठ है ।
  • Mera Jamak Vapas Do (Paperback)
    Vidya Sagar Nautiyal
    150

    Item Code: #KGP-7073

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    160 144

    Item Code: #KGP-13

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', 'क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Vansh Vriksha
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-103

    Availability: In stock

    कन्नड़ के विख्यात उपन्यासकार भैरप्पा ने प्रस्तुत उपन्यास में वंशावली के आदि और जटिल प्रश्नों पर आधारित जिस गहन एवं मर्मस्पर्शी कथा का ताना-बाना बुना है, वह भारतीय मनीषा की प्रश्नाकुलता की ऊर्जा है और हमारी वंशीय परंपरा का राग-अनुराग एवं विराग भी। जीवन के लिए निर्धारित लक्ष्यों को अर्जित कर लेना, अपने वंशको आगे बढ़ाने का स्वस्थ संकेत है, अथवा संतति के माध्यम से ही वंशीय परंपरा का वहन सहज संभव हो सकता हैअपने उपलक्ष्य में यह कृति इन प्रश्नों से जूझती है। वंशजों के रक्त-संबंधों की शुचिता की आशंकाएं तथा सरोकार भी इस कथा में जहां-तहां तैरते हुए नए भावबोध और अवधारणाओं से हमारा सामना कराते हैं।

    भैरप्पा के उपन्यासों के पाठक जानते हैं कि अपने पात्रें की बहुविध दुनिया का जैसा सजीव शब्दांकन वह करते हैं, वह विलक्षण है। वंशवृक्षके सभी पात्र स्वयं में संपूर्ण हैंमनुष्यगत अपूर्णताओं के साथ। वे परंपरा के एक साथ संवाहक और भंजक हैं तथा उनकी यही अनायासताउन्हें एक सच्चे और खरे आदमी के चरित्र में कायांतरित कर देती है। इसी कारण यह कृति-कथा हम सबकी देह और आत्मा को बारंबार छूकर निकलती है। इसमें वर्णित देह और नेह की फुहारों से आप-हम रोमांचित और संवेदनशील हो उठते हैं। लक्ष्यार्जजन के पश्चात् मृत्यु को जिस सहजता और क्रमिकता के साथ लेखक यहां अवतरित करता है, वह यमलीला सहज स्वीकार्य प्रतीत होती है इस उपन्यास में।

    एक अंचल विशेष का वर्णन होते हुए भी यह कृति अखिल भारतीय या कहें कि वैश्विक मनोजगत् की प्रतिनिधि रचना है जो जीवन के संबंधों, संयोगों और सहभावों से संरचित है। जीवनगत निर्णयों के उद्दाम स्रोतों से प्रस्फुटित कई जीवनलीलाओं के तटों को निर्धारित और ध्वस्त करती इस कथा में लेखक के द्वंद्वों को स्वर देने का काम उसके नायक करते हैं तथा मानो यह सब घटित होते हैं पाठक के साथ। कृति, कृतिकार और पाठक के त्रिकोण का यह अंतरंग संबंध वंशवृक्षकी एक अन्य तथा अन्यतम उपलब्धि है।

  • Ab Kachhu Kahibe Naahin
    Hazari Prasad Dwivedi
    750 600

    Item Code: #KGP-752

    Availability: In stock


  • Jhoothe Aakash
    Rajesh Jain
    50 45

    Item Code: #KGP-9063

    Availability: In stock


  • Dharmik Kathayen
    Jagat Ram Arya
    150 135

    Item Code: #KGP-108

    Availability: In stock

    धार्मिक कथाएं

    एक दन ब्राह्मण ने मार्ग पर चलते हुए एक हीरा, जिसकी कीमत एक लाख थी, पड़ा आया। वह साधारण रूप से ही हरे को लिए हुए जा रहा था कि उधर आगे की ओर से एक जौहरी जगह-जगह भूमि को देखता हुआ आ रहा था और विशेष व्याकुल था। इतने में ब्राह्मण ने उसे व्याकुल देखकर कहा कि जौहरी भाई, तू व्याकुल क्यों है? देख, एक हीरा हमने पाया है। तेरा हो तो तू ले ले। यह कहकर जौहरी को हीरा दे दिया। अब जौहरी कहने लगा कि मेरे तो दो हीरे थे, इसलिए एक तो तूने दे दिया, दूसरा भी दे दे, तब मैं तुझे छोड़ूंगा। उस जौहरी ने ब्राह्मण को पुलिस के हवाले कर अपना मुकदमा अदालत में दे दिया। वहां अफसर ने उस ब्राह्मण से पूछा कि कहो भाई, क्या मामला है? उसने कहा कि मैं मार्ग में आ रहा था कि मुझे एक हीरा पड़ा मिला। मैं साधारण रूप से जा रहा था तभी उधर से यह कुछ ढूंढ़ता हुआ व्याकुल सा आ रहा था। मैंने इससे पूछा, क्या हे? तब इसने कहा कि मेरा एक हीरा खो गया है। मैंने वह हीरा इसे देकर कहा कि देखो, यह एक हीरा मैंने पाया है। यदि तुम्हारा हो तो ले लो। तब इसने ले लिया और अब यह कहता है कि मेरे तो दो हीरे थे। पुनः अफसर ने सेठ जी से पूछा। तब सेठ जी बोले कि मेरे तो दो हीरे थे जो मार्ग में गिर पड़े थे। उनमें से एक तो इसने दे दिया, पर एक नहीं देता है। अफसर ने समझाया कि यह ब्राह्मण यदि अपने ईमान का पक्का न होता, तो इतना दीन होते हुए एक भी क्यांे देता? अतः यह फैसला किया कि वह हीरा ब्राह्मण को दे दिया जाए। वह जौहरी का नहीं, क्योंकि इसके तो दो हीरे एक साथ गिरे थे, सो इसके कहीं और होंगे। तब तो सेठ बोले कि सरकार, तो मुझे एक ही दिला दिया जाए। तब अफसर ने कहा कि अब तुमहो नहीं मिल सकता।
    —इस संग्रह की ‘सत्यमेव जयते’ कथा
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-1)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1576

    Availability: In stock


  • Nikka Nimana (Paperback)
    Sushil Kalra
    180

    Item Code: #KGP-427

    Availability: In stock

    ...आजादी के पैरोकार जो जमीन तैयार कर रहे थे उसकी उपजनिक्का निमाणा' के अतिरिक्त और हो ही क्या सकती थी। तिरस्कृत, लांछित, अपमानित चरित्र-एक ऐसा चरित्र जो भ्रष्ट आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक प्रक्रिया का कुल योग है।

    पंजाब का पिण्ड घोपलू उन लाखों गांवों में से एक है जो चीख रहे हैं-हमें पानी दो। खाद दो। बीज और बिजली दो। शिक्षा और संस्कार दो। भूरी, नंबर, मद्दी, वड्डी मां, निक्काया, मेंहदीरत्तो, चाचे कृष्णा, कहां नहीं हैं? भरे पड़े हैं सारे देश में संसद की जड़ों में खाद बनकर जी रहे हैं।

    दरियाई घोड़े की तरह मुंह फाड़े राजतंत्र, देह और दौलत की घोर अमानवीय अराजक परिणति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। मूल्य ह्रास, नैतिक पतन, नारकीय जीवन को गांधी टोपी के नीचे छिपाए, जनता को लगातार रौंदता

    और भटकाता सत्ताधारी वर्ग औरत, शराब और पैसे की त्रिवेणी में सदा सर्वदा पवित्र है! जो इस कला में जितना पारंगत है, उतना ही ऊंचा पद, सत्ता में, उसके लिए सुरक्षित है। निक्का इसी गंगा का शालिग्राम है। लेकिन इस प्रतियोगिता में निक्का एक हद तक ही विजयी होता है। धीरे-धीरे डोर उसके हाथ से छूटती जाती है। वह महज एक मोहरा रह जाता है। उभरता है फिर एक अत्यंत क्रूर, अमानवीय, स्वार्थाध शासक वर्ग। लेकिन साथ-साथ ही एक नियामिका शक्ति भी उभरती है-जनता।

    यथार्थ की तहों तक पहुंचतासृजनात्मक प्रवहमान भाषा का माध्यम और सुस्पष्ट दृष्टि का प्रमाण देने वाला यह उपन्यास निश्चित ही अपने समय का दस्तावेज लगता है।    

  • Suraj Men Lage Dhabba
    Ramesh Bakshi
    65 59

    Item Code: #KGP-9092

    Availability: In stock


  • Sitaron Ke Akshar Aur Kirno Ki Bhasha
    Amrita Pritam
    250 200

    Item Code: #KGP-1974

    Availability: In stock

    यूँ तो कुदरत की यह इबारत कई तरह के
    कागजों पर लिखी मिलती है-

    इन्सान के हाथ-पैरों से लेकर उसके नख-शिख को
    भी वह कागजों की तरह इस्तेमाल
    करती है और धूप-छांव की हर गर्दिश में से
    गुजरती हुई वह पशुओं-पंछियों 
    की आवाजों तक को भी अपने कागज बना लेती
    है । पर उसके विज्ञान को
    एक खास पहलू से जानने के लिए, मैंने
    सिर्फ वह कागज चुने-
    इन्सान की सोई हुई आँखो के सपने, जिन पर
    कुदरत की लिखी हुई इबारत
    को हर इंसान देखता है, पर पढने में
    समर्थ नहीं होता ... 

  • Haashiye Per
    Raj Budhiraja
    100 90

    Item Code: #KGP-1963

    Availability: In stock

    हाशिये यर
    सुपरिचिन संवेदनशील लेखिका राज़ बुद्धिराजा की नवीन कृति है 'हाशिये पर' । अत्याधुनिक भारतीय प्तमाज़ ने जिस प्राचीन संस्कृति को हाशिये पर ला बैठाया है उसे  लेखिका ने शब्दों के मोतियों में पिरोकर भव्य रूप प्रदान किया है । लेखिका को पैनी और सूक्ष्म दृष्टि छोटी से छोटी और बडी से बडी बात, घटनास्थल पर आकर टिक जाती है । आज के टूटते परिवेश और बिखरते मानव-मूल्यों ने आहत होकर कभी विदेशी मित्रों और कभी पास-पडौस के माध्यम से इनकी सशक्त कलम पूरे समाज पर प्रहार करती है । प्रहार इतना तीव्र होता है कि पाठक के सामने हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं होता । धर्म, धर्म, अध्यात्प, शिक्षा, परिवार, समाज, मानवीय संबंध सभी पर लेखनी चलती चली जाती है । इनके दिल की गहराई पाठकों के पटल पर रेशमी मोती बिखेरती है और कभी पाठकों के सामने सवालिया निशान छोड़ती है । वस्तुत: उनके मन के पनीले तट पर वर्णों के संबंध आसन लगाए बैठे हैं । उन्हें तिरोहित होता देख वे पाठकों को ही कठघरे में ला खडा करती हैं । 'अब कहाँ है आनंदी', 'नमस्कार नहीं की जाती यहाँ', 'एक बेगम बादशाह बिन' ऐसे ललित संस्मरण हैं जिनमें पाठक पूरो तरह डूब जाता है और वह भी लेखिका के सुर में सुर मिलाकर कहता है 'मैं हूँ न !'
  • Keral Ka Krantikari (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    40

    Item Code: #KGP-1122

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Kamleshwar
    Kamleshwar
    400 360

    Item Code: #KGP-777

    Availability: In stock


  • Sampurna Baal Kavitayen : Balswaroop Rahi
    Kamleshwar
    300 270

    Item Code: #KGP-470

    Availability: In stock

    बालस्वरूप राही हिंदी के अत्यंत सम्मानित और दिग्गज बालकवि हैं, जिनकी कविताएँ कई पीढ़ियों से बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी रिझाती आई हैं। कथ्य के अनूठेपन और नदी सरीखी लय के साथ बहती उनकी कविताओं ने बाल कविता का समूचा परिदृश्य ही बदल दिया। सच तो यह है कि राही जी बच्चों के लिए लिखने वाले उन बड़े कवियों में से हैं जिनकी कविताएँ पढ़-पढ़कर एक पीढ़ी जवान हो गई, पर इन कविताओं का जादुई सम्मोहन आज भी वैसा ही है। इन कविताओं में बच्चों के मन, सपनों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को बोलचाल की बड़ी ही सीधी-सहज भाषा में ऐसी नायाब अभिव्यक्ति मिली कि आज भी हजारों बच्चे राही जी की बाल कविताओं के मुरीद हैं और उन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ते हैं। खासकर ‘चाँद’ पर लिखा गया उनका एक बालगीत तो इतना प्रसिद्ध हुआ कि बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए लिखने वाले साहित्यिकों में भी उसकी धूम रही और आज भी इसे बाल कविता में एक ‘युगांतकारी’ मोड़ के रूप में याद किया जाता है। चंदा मामा की पुरानी शान और ठाट-बाट यहाँ गायब है और बच्चा कुछ-कुछ ढिठाई से उसकी ‘उधार की चमक-दमक’ पर व्यंग्य करता है। यह नए जमाने के बदले हुए बच्चे का गीत है, जो चंदा मामा पर पारंपरिक ढंग से लिखे गए सैकड़ों बालगीतों से अलग और शायद सबसे मूल्यवान भी है।
    राही जी ने एक ओर बच्चों के कोमल मनोभावों और शरारतीपन पर खूबसूरत कविताएँ लिखीं तो दूसरी ओर ऐसी कविताएँ भी जिनमें खेल-खेल में बड़ी बातें कही गई हैं। उनकी कविताएँ एक अच्छे दोस्त की तरह बच्चों को हाथ पकड़कर एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जिसमें बड़ों की डाँट-डपट और ‘यह करो, वह न करो’ से मुक्त एक ऐसा मनोरम संसार है, जिसमें प्रकृति के एक से एक सुंदर नजारे हैं और आनंद के सोते बहते हैं। पर इसके साथ ही राही जी अपनी कविताओं में अनायास ही एक ऐसा प्रीतिकर संदेश भी गूँथ देते हैं, जो बच्चों के दिल में उतर जाता है और उन्हें सुंदर भावनाओं और संकल्पों वाला एक बेहतर इनसान बनाता है। 
    राही जी के शिशुगीतों में भी बड़े मनोहर रंगों के साथ कुछ नई और मोहक भंगिमाएँ हैं। कार पर लिखा गया उनका एक चुटीला शिशुगीत तो बार-बार याद आता है जिसमें बच्चे का गर्व देखने लायक है, ‘पापा जी की कार बड़ी है / नन्ही-मुन्नी मेरी कार / टाँय-टाँय फिस्स उनकी गाड़ी / मेरी कार धमाकेदार।’ जो कवि बच्चे का मन पढ़ना जानता हो, वही ऐसे शिशुगीत लिख पाएगा जो खेल-खेल में बच्चे की जबान पर चढ़ जाएँ। और राही जी इस मामले में उस्ताद कवि हैं, जिनकी दर्जनों कविताएँ न सिर्फ बच्चे झूम-झूमकर गाते-गुनगुनाते हैं, बल्कि वे बाल कवियों के लिए भी नजीर बन चुकी हैं।
    बाल साहित्य के शिखर कवि बालस्वरूप राही की बच्चों के लिए लिखी गई चुस्त-दुरुस्त और मस्ती की लय में ढली कविताएँ एक साथ, एक ही पुस्तक में बच्चों को पढ़ने को मिलें, यह किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं। हिंदी बाल साहित्य की यह ऐतिहासिक घटना है, इसलिए भी कि बाल कविता के इतिहास के सर्वोच्च नायकों में राही का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उम्मीद है, राही जी की संपूर्ण बाल कविताओं का यह संचयन बच्चों के साथ-साथ सहृदयजनों और हिंदी के साहित्यिकों को भी हिंदी बाल कविता के सबसे सशक्त और सतेज स्वर से रू-ब-रू होने का अवसर देगा।
  • Haadase Aur Hausle
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-8001

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार हैं । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती हैं कि कहानी पाठक को आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझतीं ।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हुई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानियां ।

  • Trishpathga
    Irawati
    400 360

    Item Code: #KGP-2020

    Availability: In stock

    त्रिशपथगा
    साहित्य इतिहास को वाणी देता है, इसलिए इतिहास से साहित्य का संबंध बहुत पुराना है। अपने अतीत के ज्ञान की ललक प्रायः हर व्यक्ति में होती है और उनकी इस जिज्ञासा की तृप्ति इतिहास करता है; परंतु ऐसे व्यक्तियों की संख्या भी कम नहीं जो विभिन्न कारणों से इतिहास का अध्ययन पूरी रुचि से नहीं कर पाते। ऐसे लोग ऐतिहासिक तथ्यों के ज्ञान के साथ-साथ उन तथ्यों को जीवंत बनाने वाले अभिव्यक्ति-सौंदर्य के आनंद की भी इच्छा रखते हैं। अतः वे साहित्य, विशेषकर उपन्यास की ओर देखते हैं। इसी से ऐसे साहित्य की मांग सदैव बनी रहती है जो पाठकों को अतीत से परिचित कराने के साथ-साथ उनकी साहित्य-तृषा को भी तृप्त करे। 
    डॉ. इरावती के इस उपन्यास ‘त्रिशपथगा’ में इतिहास और साहित्य का मणिकांचन संयोग है। उपन्यास की पृष्ठभूमि भारतीय इतिहास का सैंधव सभ्यता काल है जो भारतीय इतिहास और संस्कृति की उन कड़ियों को अपने में समेटे हुए है जो अब हमारे मनोमस्तिष्क से विस्मृत हो चुकी हैं। उपन्यास में अतीत को पुनर्जीवित करना सरल नहीं है किंतु यह उपन्यास भारत की प्राचीनतम संस्कृति के एक प्रतीक ‘लोथल’ को केंद्र बनाकर उस युग की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, दैनिक जीवन, रीति-रिवाज और परंपराओं को जीवंत कर एक ओर हमें उसी युग में ऐसे पहुंचा देता है कि हम पात्रों के सुख-दुःख का सीधा अनुभव करने लगते हैं तो दूसरी ओर एक अत्यंत उदात्त प्रेम और त्याग की कथा सुनकर भावविह्नल हो उठते हैं। हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यासों का अभाव नहीं है परंतु ऐसे उपन्यासकार कम रहे हैं जो इतिहास का भी यथोचित ज्ञान रखते हों और साहित्य की सरसता का भी निर्वाह कर सकें। डॉ. इरावती एक ऐसी ही उपन्यासकार हैं। अतः ‘त्रिशपथगा’ में तीन शपथों के मार्ग का अनुसरण करती नायिका वन्हि की कथा सुनाने में साहित्य की ‘मसि’ में डूब-डूबकर इरावती की इतिहास की लेखनी ने एक अत्यंत रुचिकर उपन्यास की रचना कर दी है। इस उपन्यास में सुधी पाठकों के लिए ऐसा बहुत कुछ है कि एक बार हाथ में लेकर पूरा पढ़े बिना वे इसे रख नहीं पाएंगे।
  • Teri Roshanai Hona Chahati Hoon
    Alka Sinha
    140 126

    Item Code: #KGP-524

    Availability: In stock

    तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ
    प्रतिष्ठित कवयित्री अलका सिन्हा की नवीनतम काव्यकृति 'तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ' की पेम कविताएँ उस कोमल और अमूल्य अहसास की पावन कराती हैं, जिसका अभाव किसी को वहशी बना देता है तो किसी को संन्यासी । इन कविताओं में महानगरीय जीवन की आपाधापी के बीच एक भावात्मक विस्तार की अनुभूति होती है और यह विस्तार कहीं-कहीं तो दार्शनिकता पर जा टिकता है । इसीलिए पूरी कृति में बिखेरे प्रेम-प्रसंगो के वावजूद नितात निजी और आत्मीय क्षणों का यह अहसास कहीं भी छिछला या बेपर्दा नहीं होता । कवयित्री आम जिंदगी की मामूली घटनाओं को सरल और सधी भाषा में अपनी कविताओं में इस प्रकार गुंफित करती है मानो कविता की गलबहियां डाले कोई कहानी साथ-साथ चलती हो ।
    ये कविताएं एक ओर प्रकृति में जीवन की अनंत संभावनाओं की तलाश करती हैं तो दूसरी ओर युगीन विषमताओं पर व्यंग्य भी कसती हैं । सामाजिक चेतना से संबद्ध एक स्वस्थ विमर्श इन कविताओं को लोकमंगल की भावना से जोड़ता है ।
    हर किसी को अपनी-सी लगती ये कविताएं तमाम तनावों, परेशानियों और नाकामियों के बीच जीवन के प्रति आस्था और विश्वास जगाती है और आश्वस्त करती है कि सचमुच कीमती है हमारे बीच बची प्रेम की तरलता !
  • Gulloo Aur Ek Satrangi (Part 5)
    Shrinivas Vats
    300 240

    Item Code: #GAES-5

    Availability: In stock

    वक़्त कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।  पहले खंड से पड़ना शुरू कर आप पाँचवें खंड तक आ पहुँचे।
    कल स्वप्न में मुझे वह लड़की दिखाई दी जिसने वर्षों पहले मुझसे कहा था, ''अंकल ! हमारे लिए एक और ऐसा उपन्यास लिखें, जिसे पढ़ते जाएँ, पढ़ते जाएँ।'' इस बार उसके साथ सतरंगी भी था।  
    मैंने मन में सोचा, 'वह लड़की तो अब बड़ी हो चुकी होगी। संभव है, उसकी शादी भी हो गई हो। यह भी संभव है कि वह अपने स्कूल और इस अंकल को भूल चुकी हो।'
    फिर भी मैंने पूछ लिया, ''तुमने सतरंगी वाला उपन्यास पढ़ा क्या?''
    हँसते हुए बोली, ''अंकल ! सतरंगी ने मुझे पूरी कहानी सुना दी है। मैं तो पूरा उपन्यास पढ़ चुकी हूँ।''
    मैं हैरान था, ऐसा कैसे हो गया?
    मैंने देखा, वह सतरंगी संग वैसे ही घुल-मिल गई थी जैसे राधा और श्वेता।  
    बच्चों ! बचपन में घटित कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनकी समृतियाँ जीवनपर्यंत ताजा बनी रहती हैं।  आपकी तरह मुझे भी अपने बचपन की बहुत सी घटनाएं याद हैं।  
    सोचो, क्या कभी राधा और गुल्लू विष्णु संग बिताएं पल भूल पाएंगे ? कभी नहीं न ! 
    बचपन खरे सोने जैसा होता है।  इसकी मधुर समृतियाँ जितनी दोहराओगे, उतने खुश रहोगे।  
    मुझे कई पाठकों के फोन आए।  उन्होंने बताया कि वे जब किसी विशाल सुंदर पक्षी को देखते हैं, सतरंगी की पूरी कहानी उनके मस्तिष्क में घूमने लगती है।  
    मैंने कहा, ''चुलबुला सतरंगी है ही इतना प्यारा, जिससे एक बार मिल ले उसे अपना प्रशंसक बना लेता हैं।''
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  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Robin Shaw Pushp
    Robin Shaw Pushp
    150 135

    Item Code: #KGP-2081

    Availability: In stock


  • Godaan (Play)
    Jaivardhan
    120 108

    Item Code: #KGP-8005

    Availability: In stock

    कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास 'गोदान' का नाटय रूपांतरण।
  • Bharatvanshi : Bhasha Evam Sanskriti
    Pushpita Awasthi
    450 405

    Item Code: #KGP-708

    Availability: In stock

    डॉ.. पुष्पिता अवस्थी की किताब ‘भारतवंशी: भाषा एवं संस्कृति’ प्रत्यक्ष अनुभव के आलोक में रची ऐसी कृति है जिसमें रचनाकार की संवेदना का परिसर व्यापक है। भारतवंशियों के इतिहास का अध्ययन यहां धर्म, दर्शन, भाषा, संस्कृति और कलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। इतिहास की जड़ों में भारत से निर्वासित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों, यथा--सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, मॉरीशस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे। 
    डॉ. अवस्थी ने इन्हीं पर दशकों तक काम किया। यह काम से अधिक राग है, प्रतिबद्ध समर्पण है। इसमें प्रवासी भारतीयों के इलाकों की भी छवियां हैं। मूलतः यह कृति उन भारतवंशियों के अंधेरों को रोशनी में लाती है जो बहुत हद तक अलक्षित रहा। 
    भारतवंशियों की वैश्विक भारतीयता को सच्ची पहचान दिलाने में एक ऐतिहासिक पहल की तरह यह किताब अपनी मुकम्मल जगह बनाती है। संस्कृति और भाषा का यह गहन-गंभीर अध्ययन कदाचित् पहली बार वैज्ञानिक दृष्टि से सामने आ रहा है। इसमें सृजनशील लेखक और इतिहासविद् की अनूठी जुगलबंदी है। 
    डॉ. अवस्थी ने भारतवंशियों की अलग-अलग धर्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और जातीय पहचानों में हिंदुस्तानियत की शिनाख्त करते हुए उन तत्त्वों का अन्वेषण किया है जो उन्हें भारतवंशी होने के सांस्कृतिक स्वाभिमान में एकसूत्र करते हैं। यह एकसूत्रता संस्कृति और भाषा की अंतर्तहों में किस तरह अंतर्भुक्त है, इसे अकेले दम पर लेखक ने घूम-घूमकर चिन्हित किया है। वे भारतीय आर्यों और पारसीक आर्यों के सांस्कृतिक और भाषायी इतिहास के रास्तों से वैचारिक यात्रा करती हैं और मोटे तौर पर 19वीं से 20वीं सदी के बीच बनी संस्कृति और भाषा की जड़ों को टटोलकर अपनी स्थापनाओं के लिए रास्ता निर्मित करती हैं। इस प्रक्रिया में वे यूरोपीय उपनिवेशों में भारतवंशियों के तत्कालीन दारुण इतिहास, यातनाओं, यंत्राणाओं के वास्तविक चित्रों को क्रमशः सजीव करती हैं। 
    डॉ. अवस्थी ने संस्कृति और भाषा को उस संजीवनी के रूप में खोजा है जिनके कारण ही भारतवंशियों का जीवन है। ये दोनों उनके प्राण तत्त्व बने हुए हैं। इन्हीं दो तत्त्वों से विश्व में उनकी भारतीय अस्मिता का स्थापन हुआ। यह अस्मिता उन भारतीयों से अलग है जो पिछले 30-40 सालों में प्रवास पर पहुंचे। प्रवासी और अप्रवासी के भेद को, भ्रम को अनावृत्त करती यह किताब एक उपलब्धिकी तरह सामने है।
    भूमंडलीकरण के भयावह आक्रमण के दौर में जबकि संस्कृतियों और भाषाओं, बोलियों और लिपियों को बचाना कठिन होता जा रहा है तब यह एक किताब भाषा एवं संस्कृति को बचाने का मेटाफर रचती है। यही इसका मानीख़ेज हासिल है।
  • Bhaykaal
    Ashok Gupta
    200 160

    Item Code: #KGP-483

    Availability: In stock

    अशोक गुप्ता का उपन्यास ‘भयकाल’ मूलतः सामाजिक उपन्यास है। कथाविन्यास को देखें तो यह मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणात्मक है। मनुष्य अपने संस्कार और रुचियों में ऐसी ग्रंथियां पाल लेता है कि वह अपने प्रिय परिवारजनों, यहां तक कि अपने वंशजों से भी भयाक्रांत रहता है और निरंतर अपनी दुर्गति की कल्पना से व्यथित रहता है। अशोक गुप्ता ने उपन्यास के एक चरित्र मिलकीत तनेजा के माध्यम से इस मनोवैज्ञानिक ग्रंथि के वैयक्तिक और पारिवारिक परिणाम का चित्रण किया है।
    दूसरी ओर, जानकी बल्लभ और भानुमती (भानुमती के कई नाम हैं। ये नाम परिस्थितियों और उसके चरित्र के घात-प्रतिघात से उसे मिल गए हैं। उसका एक नाम ‘करिया छबीली’ भी है) के साहसिक और संघर्षमय जीवन कथा के माध्यम से स्वातंत्र्योत्तर भारत के मानवीय और प्रगतिशील बदलाव या विकास का भी चित्रण किया गया है। दोनों प्रकार की कथाएं समांतर शैली में साथ-साथ चलती हैं। पात्र परस्पर टकराते भी हैं। इससे कथा रस का आस्वाद पाठकों को मिलता है और मोनोटोनी नहीं आने पाती है।
    गांवों में गैरजिम्मेदार और बिगड़ैल किशोर किस तरह के कुकृत्य करते हैं और कमजोर तबके के लोगों को सताते हैं इसका मार्मिक और मनोरंजक (भी) वर्णन है। समाज में बुरे लोग हैं तो अहेतु की सहायता करने वाले भी हैं।
    मुझे इस कथाकृति में यह बात विशेष रूप से अच्छी लगी कि आज जब हताशा और दिशाहारा प्रवृत्तियां हमारे साहित्य में आसन जमाए बैठी हैं, अशोक गुप्ता की यह रचना सामाजिक यथार्थ के आधार पर, रचनात्मकता से स्तर पर बने रहते हुए, प्रगतिशीलता और विकास की कथा कहती है।
    उपन्यास की भाषा और संवाद अपनी ताजगी से पढ़ने वालों और विचारकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। अशोक गुप्ता मूलतः कहानीकार हैं और यह कृति उपन्यास होने के साथ बिखराव के बावजूद कहानी का भी रस देती है।
  • Gazal : Ek Safar (Paperback)
    Noornabi Abbasi
    200

    Item Code: #KGP-465

    Availability: In stock

    ग़ज़ल: एक सफ़र
    उर्दू कविता की सबसे अधिक लोकप्रिय विधा ग़ज़ल है। भारत में इसकी परंपरा लगभग पाँच सदियों से चली आ रही है। ‘वली’ दकनी इसका जनक माना जाता है। ग़ज़ल की जब शुरुआत हुई तो वह सौंदर्य और प्रेम (हुस्न-ओ-इश्क़) तक ही सीमित थी, लेकिन समय के साथ-साथ इसका दामन भी विस्तृत होता गया। फलस्वरूप, आज जीवन का कोई ऐसा विषय नहीं, जो ग़ज़ल में सफलतापूर्वक पेश न किया जा सकता हो, बल्कि पेश न कर दिया गया हो।
    उर्दू में ग़ज़ल की लोकप्रियता के बावजूद इस विधा का अनेक कवियों और आलोचकों ने विरोध किया। किसी को इसमें ‘संडास की बदबू’ महसूस हुई तो दूसरे ने इसे ‘अर्ध- सभ्य काव्यांग’ की संज्ञा दी और तीसरे ने तो इसकी ‘गर्दन उड़ाए जाने’ का फ़तवा भी सुना दिया। लेकिन इन प्रहारों से ग़ज़ल का पौधा न कुम्हलाया और न ही सूख पाया, बल्कि इसकी महक यथावत् बनी रही और आज भी फैली हुई है।
    कुल मिलाकर प्रस्तुत संकलन का ऐतिहासिक दृष्टि से अपना महत्त्व तो है ही। आशा है, उर्दू कविता के प्रेमियों में हमारे इस प्रयास का स्वागत होगा।
    ग़ज़ल की लोकप्रियता का एक कारण इसका विशिष्ट विषय प्रेम या इश्क़ रहा है और प्रेम-भाव वह है, जिससे कोई दिल ख़ाली नहीं। दूसरा यह कि ग़ज़ल के शे’र आसानी से याद हो जाते हैं और समयानुसार उनको पेश किया जा सकता है, ठीक उसी तरह, जैसे हिंदी में दोहे उद्धृत किए जाते हैं। वैसे तो उर्दू में क़सीदा, मर्सिया और मसनवी भी हैं, रुबाइयाँ और नज़्में भी लिखी जाती हैं, लेकिनग़ज़ल का अपना स्थान है।
    प्रस्तुत संकलन में सत्रहवीं सदी से अब तक यानी चार सदियों के लंबे समय में हुए लगभग डेढ़ सौ शायरों की ग़ज़लें प्रस्तुत की गई हैं। आशा है, उर्दू-प्रेमी हिंदी पाठकों में इसका यथेष्ट स्वागत होगा।
  • Maitreyi Pushpa : Rachna Sanchayan
    Sushil Sidharth
    950 855

    Item Code: #KGP-1580

    Availability: In stock

    मैत्रेयी पुष्पा ने कथा साहित्य में एक नए अध्याय की शुरुआत की। बुंदेलखंड के परिवेश और स्वतंत्रचेता परिवार से मिली ऊर्जा ने उनको जीवन की समझ दी। परिस्थितियों ने उन्हेंस्वावलंबी बनायामुसीबतों ने हिम्मत दी। जब वे लिखने की दुनिया में आईं तो उनके पास जो अनुभव थे वे किसी समकालीन लेखक के पास नहीं थे। मध्यवर्गीय मनुहारोंमेंझूला झूलते कथा साहित्य की पींगें रुक गईं जब इदन्नममआया। इस उपन्यास का प्रकाशन एक युगांतर जैसा है। इसके बाद चाकअल्मा कबूतरीकही ईसुरी फागआदिउपन्यासों और कई लंबी कहानियों से उन्होंने रचना का ठाठ उलट दिया। हिंदी नई चाल में ढलीके जोड़ पर कहा जा सकता है कि कथा साहित्य नई चाल में ढला।

    मैत्रेयी पुष्पा को पढ़ते हुए मुंशी प्रेमचंद का वह अविस्मरणीय भाषण याद आता रहता है जिसमें उन्होंने सौंदर्य का मेयार बदलने का आवाहन किया था। मैत्रेयी ने सौंदर्य कीव्याख्या नहीं कीउसका मेयार बदल दिया। ऐसे कथानक और पात्र कथा साहित्य में आए कि कुलीनतंत्र में भगदड़ मच गई। अनुभवों की रेशमी चादरों में लिपटे लोग भरोसा नहींकर पाए कि यह जीवन इसी देश का हैये पात्र इसी समाज के हैं।

    मैत्रेयी पुष्पा : रचना संचयनसाहित्य के अपार पाठकों के लिए है। उनके लिएजिनके लिए मैत्रेयी ने रचना और जीवन में निरंतर संघर्ष किया है। यह रचनात्मक संघर्ष अभीसमाप्त नहीं हुआ है।
  • Kachche Resham Si Larki
    Amrita Pritam
    300 255

    Item Code: #KGP-9079

    Availability: In stock

    मेरे लिए जिन्दगी एक बहुत लम्बी यात्रा  का नाम है। जड़ से लेकर चेतन तक की यात्रा का नाम।  अक्षर से लेकर अर्थ तक की यात्रा का नाम। और हकीकत जो है - वहां से लेकर हकीकत  होनी चाहिए -  उसकी कल्पना और उसमें एतक़ाद रख पाने की यात्रा का नाम।  इस लिए कह सकती हूँ कि मेरी कहानियों में जो भी किरदार हैं वह सभी किरदार जिन्दगी से लिए हुए हैं। लेकिन वह लोग - जो यथार्थ और यथार्थ का फासला तय करना जानते हैं - अमृता प्रीतम
  • Kuchh Kahi Kuchh Ankahi
    Sheela Jhunjhunwala
    495 446

    Item Code: #KGP-1938

    Availability: In stock

    कुछ कही कुछ अनकही
    ...निहायत दिलचस्प शैली, प्रवहमान भाषा-परिवार से लेकर पूरे परिवेश तक से जुडे लोग और स्थितियां...यह किताब शुरु से अंत तक रहस्य/रोमांच/प्रेम/संघर्ष/राजनीती/ परिवार/प्रशासन/टकराव/उपलब्धि और फिर नियति के अनेकानेक खेलों से साक्षात्कार कराती है...
    झुनझुनवाला जी रेवेन्यु डिपार्टमेंट के एक आला अफसर थे । छापे डालने के तनावपूर्ण क्षणों में ये लोग किस-किस तरह के खतरे उठाते हैं…धन की दुनिया से किस तरह के प्रलोभन और हथकंडे काम में लाए जाते है और उस चक्रव्यूह को भेदने में ये लोग क्या-क्या पापड बेलते हैं, यह शायद पहली बार इस किताब से जानने को मिलेगा । समसामयिक राजनीति और शासन तंत्र के अनुभवों पर सटीक टिप्पणियों के साथ-साथ इस पुस्तक से आपातकाल संबंधी कतिपय प्रचलित धारणाओं के बारे में एक नए पहलू से सोचने का मौका भी मिलेगा।
    --कन्हैयालाल नंदन (नई दुनिया से)
    इतनी आसान, इतनी सहज।  ऐसा लगता है कि आप अपने गली-कूचे के बारे से बात कर रहे हैं । चाहे वह कानपुर हो या इलाहाबाद या बंबई, शीलाजी ने अपने समय का अत्यंत जीवंत चित्रण किया है और मुश्किल बातो को भी सरलता से, सहजता से और अपनत्व से कहा है । एक ईमानदार किताब जिसमें से हर क्षण ईमानदारी झलकती दिखाई देती है । -कमलेश्वर
    'कही-अनकही' में बनावट कहीं नहीं है । सब कुछ सहज भाव से कहा गया है । कहीं-कहीं तो ऐसा लगता है कि हम कोई उपन्यास पढ़ रहे है, रहस्य-रो,मांच से भरा उपन्यास और कही-कही अंतरंग, आत्मिक क्षणों को दिखाता हुआ गृहस्थ जीवन।  एक क्षण को भी नहीं लगा कि यह वर्णन कृत्रिम है । -विष्णु प्रभाकर
    रूढ़ियों को भेदकर स्वतन्त्रता की चिनगारियों के साथ-साथ परिवार में तालमेल बिठाने जैसी घटनाएं सार्थक संदेश देती हैँ। -डॉ. शेरजंग गर्ग
    ...बहुत कुछ होने के साथ-साथ बेहद इनसानी रिश्तों की झलक । -नासिरा शर्मा
    'कुछ कही कुछ अनकही' एक मर्यादित प्रेम-प्रसंग के बाद जिंदगी की जद्दो-जहद से गुजरते हुए जहां पहुँचती है वहाँ आसपास के लोग भी उसका एक हिस्सा हो जाते हैं । विवरण रोचक, प्रवाहपूर्ण और तथ्यपरक हैँ। आत्मकथा होते हुए भी यह संयमित है, मर्यादित है और आत्म-श्लाया  से परे है । -पदमा सचदेव
    ...रहस्य, रोमांच, तिलिस्म, रोमांस-सब एक जगह इकट्ठा कर दिया गया है। ...मर्यादित जीवन के सिद्धांत को पकडे हुए अपने समय का जीवंत खाका ।
    -वसंत साठे
    ...महानगरों में रहने वाले मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन के दिन-प्रतिदिन की ऊहापोह और जिजीविषा की खोज में आगे बढ़ते जाने की ललक जगह-जगह आभासित होती है। -डॉ. क्षमा गोस्वामी (वागर्थ से)
    ...सभी प्रणय-चित्रों में गरिमापूर्ण और सधी हुई मानसिकता के साथ एक सतत ठहराव है, छिछोरापन या आजकल जैसा उर्च्छाखाल प्रेम नहीं है-वह जो सीमाएं लांघकर बह जाता है । -डॉ. कुसुम अंसल (संचेतना में)
    सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, राग-विराग सबसे मिलकर बना है जीवन और इसी में उसकी संपूर्णता है । तटस्थ भाव से जो इस संपूर्णता की अनुभूति करता है, वही एक सफल संस्मरण-लेखक भी होता है । इस बात का अहसास 'कुछ कहीँ कुछ अनकही' पढ़कर और अधिक हुआ ।...यह पुस्तक अपने समय को ईमानदारी से रेखांकित करती है ।
    -राधेश्याम (दैनिक हिंदुस्तान में)
    स्त्री-विमर्श का यह आत्मवृत्त अपने निजी, वैयक्तिक अनुभवों और अनुभूतियों से गुजरता हुआ सामाजिक- सार्वजनिक दृष्टि को मुकम्मल रूप में हमारे सामने परिभाषित करता है ।
    -लक्ष्मीकांत मुकुल (समकालीन भारतीय साहित्य में)
    पुस्तक ने भारतीय महिला पत्रकार की आंखों से देखे हुए एक बेहद रोचक कालखंड को जिया है । प्रथम पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक यह रोचकता, रोमांच और कहीं-कहीं रूमानी वासंतीपन लिए हुए है। मार्मिक क्षण भी हैं ।
    -पाञ्चजन्य 
    …कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, पत्र, डायरी आदि अनेक चिताओं से साक्षात्कार कराती एक अत्यंत पठनीय पुस्तक ।
    -रवीन्द्र कालिया
  • Aapki Pratiksha
    Shyam Vimal
    270 243

    Item Code: #KGP-555

    Availability: In stock

    आपकी प्रतीक्षा
    सच भी कई बार कल्पना को ओढ़कर नई भंगिमा अपनाकर कागज की पीठ पर सवार होने को आतुर हो उठता है। अथवा यूं भी कहा जा सकता है कि कल्पना कभी-कभी सच-सी भ्रमित करने लगती है और रिश्ते बदनाम होने लगते हैं।
    जैसे होता है न, मरे हुए कीट-पतिंगे को, गिरे हुए मिठाई के टुकड़े को समग्रतः घेरे हुए लाल चींटियां आक्रांत वस्तु की पहचान को भ्रमित कर देती हैं। यदि ऐसा भ्रम मृत कीट या मिठाई-सा इस रचना से बने तो समझ लो आपने रचना का मज़ा लूट लिया।
    उपन्यासकार को आश्वासन दिया गया था पत्रा का सिलसिला जारी रहने का इस वाक्य के साथ--
    ‘यह वह धारा है जो क्षीण हो सकती है, पर टूटेगी नहीं।
    परंतु वह सारस्वत धारा तो लुप्त हो गई!
    क्या प्रतीक्षा में रहते रहा जाए?
    अंजना की दूसरी जिंदगी कैसे निभ रही होगी?’
  • Hindu Sanskars (Paperback)
    M.L. Ahuja
    125 113

    Item Code: #KGP-357

    Availability: In stock

    The SANSKARAS are rites of passage finding varied acceptance among religious adherents of Hinduism, Jainism and some schools of thought in Buddhism. Hinduism prescribes norms to groom youngsters with values. The values as reflected in sanskaras facilitate the process of adaptation of the behaviour patterns of our children and the process of their socialization. These sanskaras should inculcate in our children the norms to purify, refine and adorn their inner conscience.
    The book, Hindu Sanskaras Sacraments and Rituals in Life’s Journey, is an exposition of the principles enunciated in the Hindu scriptures. This profusely illustrated book provides guidelines for young boys and girls on the threshold of conjugal life. It provides them lucid explanation of sanskaras and human life, Hindu beliefs and rituals, essence of Hindusanskaras, the Vedic and astrological concepts of garbadharan or conception of a child, naming of the baby, baby's first tonsure, importance of sacred thread ceremony, the process of conducting puja or veneration, the significance of idol worship, The underlying purpose of using bindi or tilak, the ritual of observing Karva Chaauth by married women  to pray for the longevity of their husbands, funeral rites and the system of ancestral worship yet form an essential ingredient of the book. The book also provides explanation of rituals like parikarma, ringing of bell, hovering of hands on lighted lamp after concluding prayer, the importance of 108 and breaking of coconut. 
    It is a useful book for all those wishing to know Indian culture, traditions and mythology. It needs to be read by parents for inculcating values among their children, and young boys and girls to carve an ideal approach in life. 
  • Saahasi Bachchon Ke Kaarnaame
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-52

    Availability: In stock

    जब मैं छोटा था तो दूसरे बच्चों की तरह खुद भी काॅमिक्स वगैर पढ़ने का शौक रखता था। कुछ बड़ा हुआ तो सोचा कि ये काॅमिक्स बच्चों का मनोरंजन भले ही करते हों, लेकिन न तो उनका चरित्र-निर्माण ही कर पाते हैं और न उन्हें सही राह ही दिखा पाते हैं। मुझे लगा कि बच्चों के लिए ऐसे साहित्य की रचना होनी चाहिए जो वास्तवित धरातल से जुड़ा हो, उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दे तथा एक अच्छा मनुष्य बनाए।
    पत्रकारिता से जुड़ा और प्रतिवर्ष राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों से बात करने, उनकी कवरेज करने का अवसर मिला तो मन में दबी यह इच्छा फिर से बलवती होने लगी।
    वर्ष 2003 के प्रारंभ में बहादुर बच्चों से मिलने का अवसर मिला तो सोचा कि इस बार उसी प्रयास को और बेहतर ढंग से अंजाम दिया जाए। इस बारमैंने कहानियों को बहादुर बच्चों से बातचीत की शैली में तैयार कियाताकि उनमें और अधिक वास्तविकता आ सके। कहानियों की संख्या भी दस से बढ़कर उन्नीस है और उनका प्रस्तुतिकरण भी अधिक आकर्षक हैं पहली पुस्तक की तुलना में यह पुस्तक और भी कई मायनों में बेहतर स्वरूप संजोए है। 
    —संजीव गुप्ता
  • Lomad Vesh
    Rameshwar Prem
    60

    Item Code: #KGP-1818

    Availability: In stock

    लोमड़ वेश 
    लोमड़ वेश चरित्रों के माध्यम से ऐसी रंगयात्रा के लिए रंगसमूहों और दर्शकों की भागीदारी का रेखांकन है जो लोकधर्मी नाटकों की विरासत है । बेन जान्सन कृत विश्वप्रसिद्ध नाटयकृति वालापोनि के  कथासूत्रों पर आधारित लोमड़ वेश मनुष्य की नकारात्मक प्रवृत्तियों यथा लोभ, प्रपंच, ईषर्या-द्वेष की परत-दर-परत दो अनावृत्त करते हुए समकालीन रंगभाषा का अप्रतिम उदाहरण है ।
  • Akbar-Beerbal Ki Praamaanik Kahaniyan (Paperback)
    Hari Krishna Devsare
    150

    Item Code: #KGP-7064

    Availability: In stock

    अकबर-बीरबल की प्रामाणिक कहानियां 
    अकबर-बीरबल की इन कहानियों में केवल मनोरंजक, हाजिरजवाबी और चतुराई की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इनमें भारतीय इतिहास की दो महान् विभूतियों के व्यक्तित्व के विविध गुणों और विशेषताओं के भी दर्शन होते हैं । इन कहानियों में विद्वानों-गुणी  ज़नों का आदर है, कुशल प्रशासन है, न्याय की तराजू पर किए गए फैसले और सामान्य जनता के कल्याण हेतु कार्यों जैसे पहलू भी उजागर होते हैं ।
    यों तो अकबर-बीरबल के किस्सों में काफी मिलावट हुई है, फिर भी उससे बचकर कुछ ऐसी चुनिंदा कहानियां ही यहाँ प्रस्तुत हैं, जो इतिहास की इन दोनों महान् विभूतियों की गरिमामयी छवि प्रस्तुत कर सकें । आशा है, पाठक इन्हें रुचिकर पाएंगे ।
    –हरिकृष्ण देवसरे

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    185 167

    Item Code: #KGP-2080

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार निर्मल वर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दहलीज', 'लवर्स', 'जलती झाड़ी', 'लंदन की एक रात', 'उनके कमरे'', 'डेढ़ इंच ऊपर', 'पिता और प्रेम', 'वीकएंड', जिंदगी यहाँ और वहाँ' तथा 'आदमी और लड़की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक निर्मल वर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Teesara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    50

    Item Code: #KGP-7051

    Availability: In stock

    ग़ज़ल शतकों में सम्मिलित कवि
    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उदयप्रताप सिंह ०  कुमार शिव ०  गोपालदास ‘नीरज’ ०   चिरंजीत ०  ज़हीर कुरैशी ०  ज्ञानप्रकाश विवेक ०  त्रिलोचन ०  दुष्यंत कुमार ०  देवेंद्र माँझी ०  प्रमोद तिवारी ०  बलबीर सिंह ‘रंग’ ०  बालस्वरूप राही ० भवानी शंकर ०  मासूम ग़ाज़ियाबादी ०  मृदुला अरुण ०  राजनारायण बिसारिया ०   रामकुमार कृषक ०  रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’ ०  रामदरश मिश्र ०  रामावतार त्यागी ०  शलभ श्रीराम सिंह ०  शिव ओम ‘अंबर’ ०  शेरजंग गर्ग ०  सुरेंद्र श्लेष ०  सूर्यभानु गुप्त।
    दूसरा ग़ज़ल शतक
    अशोक वर्मा ०  आचार्य सारथी ०  उपेन्द्र कुमार ०  उर्मिलेश ०  ओमप्रकाश चतुर्वेदी ‘पराग’ ०  कमल किशोर ‘भावुक’ ०  कमलेश भट्ट ‘कमल’ ०  कुँअर बेचैन ०  ज्योति शेखर ०   नरेन्द्र वसिष्ठ ०  पुरुषोत्तम ‘वज्र’ ०  प्रभात शंकर ०  महेश जोशी ०  योगेन्द्र दत्त शर्मा ०  रंजना अग्रवाल ०  रामनारायण स्वामी ०  रामनिवास ‘मानव’ ०  लक्ष्मण ०   विजय किशोर ‘मानव’ ०  विनीता गुप्ता ०  शिवबहादुर सिंह भदौरिया ०  श्रवण राही ०  सरोज व्यास ०  हरजीत ०   हरिओम।
  • Do Naatak
    Jaivardhan
    200 180

    Item Code: #KGP-862

    Availability: In stock


  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-2)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-632

    Availability: In stock


  • Kayantran
    Jitendra Shrivastva
    180 162

    Item Code: #KGP-1912

    Availability: In stock

    जितेन्द्र श्रीवास्तव का नया संग्रह ‘कायांतरण’ इस मायने में भी नया है कि यह उनके और वृहत्तर अर्थों में हिंदी के काव्य परिसर का सार्थक विस्तार करता है। इस संग्रह में जितेन्द्र की काव्य-संवेदना की मूल भूमि नए संदर्भों से आबाद होकर अर्थ-बहुल होती गई है। जीवन के छोटे-बड़े संदर्भों के प्रति एक जैसी गहरी आसक्ति इन कविताओं की ताकत है। स्मृति और विस्मृति के दबावों के बीच हमारी आंतरिकता के निरंतर क्षरण पर व्याकुल-सी दिखती इन कविताओं का रहस्य यह है कि इनकी आलोचकीय अथवा आक्रोशी वैचारिकताएँ इन्हीं व्याकुलताओं के नीचे सक्रिय रहती हैं।
    मनुष्य जीवन के सामान्य संवेदनों के माध्यम से कवि हर बार एक ऐसे अनदेखे और अबूझ अनुभव को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है कि वे सामान्य अनुभव मनुष्य जीवन की व्यापक विडंबनाओं को प्रतीकित करने लगते हैं। कवि सहज ही मानवीय भावनाओं को सभ्यता समीक्षा का मानक बना लेता है। मनुष्य समाज को इन्हीं आधारों पर जाँचते हुए जितेन्द्र के यहाँ प्रेम जैसी भावना महज मनुष्य के आंतरिक संवेदनों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि कठोर राजनीतिक आशयों में परिवर्तित हो जाती है। यहाँ विशृंखलित और विघटित समाज की वर्तमान त्रासदी ही नहीं रेखांकित होती बल्कि ‘चाहिए’ की अंतर्ध्वनि  के साथ मनुष्यता के वैकल्पिक रूपों की जरूरत को भी कवि अपनी अटूट निष्ठा से व्यक्त करता है। वैश्वीकरण की मायावी शब्दावली के घटाटोप में जब इतिहास और आख्यान के अंत की घोषणा कर दी गई है, तब कवि उस यूटोपिया का सृजन करता है, राजनीतिक दृष्टि से जिसकी मौजूदगी प्लेटो तक सहन नहीं कर पाते थे। कहने की जरूरत नहीं कि यह यूटोपिया एक बेहतर मनुष्य समाज के निर्माण का प्रेरक है। इन मायनों में जितेन्द्र का कवि-कर्म मौजूदा समय में स्रष्टा-द्रष्टा की हैसियत प्राप्त कर लेता है, जिसमें अधिक मानवीय समाज को अर्जित करने की नैतिक विकलता विद्यमान है।   
  • Mere Saakshatkaar : Devendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    200 180

    Item Code: #KGP-548

    Availability: In stock


  • Nibandhkar Hazari Prasad Diwvedi
    Usha Singhal
    60 54

    Item Code: #KGP-1468

    Availability: In stock

    निबंधकार हजारीप्रसाद द्विवेदी
    शैली विज्ञान के संदर्भ में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध-साहित्य पर अभी तक कोई निरुपाधि या सोपाधि शोधकार्य संभवत: नहीं हुआ है । अत: शैली विज्ञान की दृष्टि से आचार्य द्विवेदी के निबंधों के सम्यक विश्लेषण का यह पहला प्रयास है ।
    शैलीवैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र में किसी कृति के सम्यक विश्लेषण के लिए, आज नानाविध प्रतिमान प्रचलित हैं, जिनमें 'चयन-प्रतिमान' को सभी प्रतिमानों का मूलाधार माना जाता है । प्रस्तुत अध्ययन इसी प्रतिमान को आधार बनाकर किया गया है ।
    आचार्य द्विवेदी ने अपने निबन्धों में किस प्रकार ध्वनि, शब्द, वाक्य, तथा विभिन्न व्याकरणिक कोटियों के सार्थक चयन से कथ्य का चयन किया है, इस पर भी विदुषी आलोचिका डा० उषा सिंहल ने अपनी विश्लेषणपरक दृष्टि केंद्रिय रखी है ।
    यह अध्ययन विद्वत् समाज के लिए आचार्य द्विवेदी के साहित्य के अध्ययन की नई दिशाएँ प्रशस्त करेगा ।
  • Interview (Hindi Interviews)
    Majda Asad
    60 54

    Item Code: #KGP-2022

    Availability: In stock

    इंटरव्यू
    इस किताब में इंटरव्यू विधा, उसके विकास और विभिन्न व्यक्तियों से वार्तालाप को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है ।
    लेखिका ने बातचीत के माध्यम से विभिन्न वर्गों के विशिष्ट व्यक्तियों से साक्षात्कार कराया है । प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ-साथ समाज-सेवा से लगे सामान्य व्यक्तियों की विशेषताओं का निरूपण किया गया है । राजनीति, साहित्य, कला और समाज-सेवा से संबंधित व्यक्तियों के इंटरव्यू लिये गये हैं । उपराष्ट्रपति, केन्दीय मंत्री, साहित्यकार, संगीताचार्य, गाइड और रसोइया एक साथ नजर आते हैं । इन सबसे बडे आत्मीय ढंग से बातचीत कर इनके व्यक्तित्व को बहुत सहज ढंग से उजागर किया गया है । यह भी स्पष्ट रूप से बताया है कि अपनी-अपनी जगह पर हर व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है और समाज में अपना विशेष स्थान रखता है । यह पुस्तक दो हिस्सों में विभाजित है । पहले खंड में व्यक्तिगत इंटरव्यू है । दूसरे में विषयगत, जिसके अन्तर्गत किसी एक विषय पर अनेक व्यक्तियों से बातचीत कर उनके विचार प्रस्तुत किये गये हैं । सन् 1971 से लेकर 1991 तक लिये गये इंटरव्यू यहाँ संकलित है । इनमें से अधिकांश समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं । बातचीत के दौरान व्यक्तित्व तो उभरा ही, साथ ही बहुत-से रोचक प्रसंग भी उभरकर सामने आये हैं जो पाठको के लिए उपयोगी और प्रेरणादायक सिद्ध होंगे ।  यह पुस्तक अपने ढंग का अनूठा प्रयास है । इंटरव्यू विधा में अपना विशेष स्थान रखती है । पाठको द्वारा इसका स्वागत होगा ।
  • Yathartha Se Samvad
    B.L. Gaur
    400 360

    Item Code: #KGP-449

    Availability: In stock

    बेख़ौफ अंगारे
    साहित्य को अब रास नहीं आता निरा रस 
    उससे भी ज़रूरी है कलमकार में साहस 
    ये काम अदब का है–अदब करना सिखाए 
    उनको जो बनाए हैं हरिक काम को सरकस
    दम घुट रहा अवाम का, फनकार बचा लो
    सब मूल्य तिरोहित हुए, दो-चार बचा लो
    सच्चे की शुबां पर हैं जहां शुल्म के ताले
    हर ओर लगा झूठ का दरबार, बचा लो
    संपादकीय ऐसे हैं ऐ दोस्त, तुम्हारे
    जैसे अंधेरी रात में दो-चार सितारे
    गुणगान में सत्ता के जहां रत हैं सुखनवर
    तुम ढाल रहे शब्द में बेख़ौफ अंगारे
    मैं ख़ुश हूं बड़े यत्न से धन, तुमने कमाया
    उससे भी अधिक ख़ुश हूं कि फन तुमने कमाया
    मेरी ये दुआ है कि सलामत रहो बरसों
    सदियों रहे ज़िंदा जो सृजन तुमने कमाया।
    —बालस्वरूप राही

  • Videshi Mahilaon Ka Bharatprem
    M.A. Sameer
    280 252

    Item Code: #KGP-7809

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक ‘विदेशी महिलाओं का भारतप्रेम’ उन महिलाओं के विषय में लिखी गई है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारतभूमि की तथा भारत के लोगों की तन मन धन से सेवा एवं सहायता की। चाहे वे कोक्को सोमा हों या उनकी बेटी तोशिको, उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से भारत की सेवा की। इसी क्रम में आगे श्रीमती एनीबेसेंट, मारग्रेट कजिंस और एमिली शैंकल के नाम भी उल्लेखनीय हैं। इन महिलाओं ने जन्म भले ही भारतभूमि पर न लिया हो, लेकिन उनके भारतप्रेम को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनका भारत से घनिष्ठ संबंध है। उनके द्वारा दिए गए अविस्मरणीय योगदान को इस पुस्तक में सरल, सरस और रोचक शैली में उल्लिखित किया गया है। 
  • Toro Kara Toro-4 (Nirdesh) (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-64

    Availability: In stock


  • Tv Samaachaar Ki Duniyaa
    Kumar Kaustubh
    500 450

    Item Code: #KGP-604

    Availability: In stock

    ‘टीवी समाचार की दुनिया’ में समाचार के स्वरूप और उसके कुशल निर्माण व प्रसारण पर लगभग सभी दृष्टिकोणों से विशद चर्चा की गई है। सरल और मनोरंजक शैली में जहां खबर के उत्कृष्ट लेखन-संपादन को समझाया गया है, वहीं उन तमाम टेलीविजन-इतर प्रभावों का चित्रण भी है जिनसे बचा जाना चाहिए। इसके अध्ययन से खबर के निर्माणक डेस्क से लेकर माइक के सामने या परोक्ष में खबरों की सफल और प्रभावी प्रस्तुति तक का सफर सहज और ग्राह्य होकर सामने आ जाता है। इसी तरह ‘न्यूज़ रूम से पैनल तक’ शीर्षक से लेख में स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि आज का प्रसारण पूरी तरह कंप्यूटर-आधारित प्रक्रिया कैसे है। कुमार कौस्तुभ ने पुस्तक में उद्धारण के रूप में ‘खबर: एक कहानी’ का नाम देकर आत्मानुभव को कौशल से लेखनीबद्ध किया है। मैं मानता हूं कि खबरों के उत्पादन-विधान को पढ़ाने वाले अध्यापकगणों को इस पुस्तक से रोचक अनुभव-सामग्री मिलेगी और चैनलों के दर्शकों का भी इसमें किए गए विश्लेषणों से और अधिक जुड़ाव होगा। अध्येता के लिए भी कुमार कौस्तुभ की लिखी यह अनुभवजन्य पुस्तक नई संभावनाओं के द्वार खोलेगी।
    प्रस्तुत पुस्तक में टीवी खबर और उसके परिवेश की समग्रता दिशा-निर्देशों के साथ खुलकर उजागर हुई है।
    —राजनारायण बिसारिया
  • Sharat Ka Katha Sahitya
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    595 536

    Item Code: #KGP-889

    Availability: In stock

    बाँग्ला के अमर कथाशिल्पी शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में पढ़े जाने वाले शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनके कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में भी हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उसके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की। सम्भवतः वह अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फिल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी। ‘देवदास’, ‘चरित्रहीन’ और ‘श्रीकान्त’ के साथ तो यह बारम्बार घटित हुआ है। 
    अपने विपुल लेखन के माध्यम से शरत् बाबू ने मनुष्य को उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित ‘परम्पराओं’ को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की बिलख-चीख और आर्तनाद को उन्होंने परखा तथा गहरे पैठकर यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। इस षड्यन्त्र के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक ‘आम सहमति’ पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों-करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्रण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। 
    हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। 
  • Itihaas Ka Vartamaan : Aaj Ke Bouddhik Sarokar-3
    Bhagwan Singh
    500 450

    Item Code: #KGP-9328

    Availability: In stock

    ‘इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार’ इस विमर्श-व्याकुल समय में तर्क, विवेक, परंपरा, निहितार्थ और रचनात्मक साहस सहेजकर लिखी गई एक अद्भुत पुस्तक है। इसके लेखक भगवान सिंह विभिन्न विधाओं में सक्रिय किंतु इतिहास-विवेचन में सर्वाधिक  ख्यातिप्राप्त सजग मनीषी हैं। उनकी इतिहास-दृष्टि स्पष्ट, प्रमाण पुष्ट और चिंतन संपन्न है। यही कारण है कि जब भगवान सिंह ‘तुमुल कोलाहल समय’ व ‘स्वार्थसिद्ध वाग्युद्ध’ को परखने के लिए विचारों में प्रवेश करते हैं तो चिंतन की एक अलग रूपरेखा तैयार होने लगती है। स्वयं लेखक ने कहा है–
    "मैंने चर्चाओं को शीर्षक तो दिए हैं, परंतु उन विषयों का सम्यव्फ निर्वाह नहीं हुआ है। बातचीत करते हुए आप किसी विषय से बँधकर नहीं रह पाते। बात आरंभ जहाँ से भी हुई हो बीच में कोई संदर्भ, दृष्टांत, प्रसंग आते ही विषय बदल जाता है और आप भूल जाते हैं बात कहाँ से आरंभ हुई थी। याद भी आई तो आप कई बार स्वयं पूछते हैं, ‘हाँ तो मैं क्या कह रहा था?’ गरज कि सुनने वाले को आप क्या कह रहे हैं इसका हिसाब भी रखना चाहिए! परंतु सबसे मार्मिक प्रसंग तो उन विचलनों में ही आते हैं, तभी तो अपना दबाव डालकर वे धरा को ही बदल देते हैं ।"
  • Goonj Uthin Thaliyan
    Dr. Kusum Meghwal
    590 443

    Item Code: #KGP-GUT HB

    Availability: In stock

    मेरी लगभग 60 पुस्तकें प्रकाशित होने के बाद मेरे जीवन का यह पहला उपन्यास है–‘गूँज उठीं थालियाँ’, जो कल्पना पर आधारित नहीं है बल्कि पूरी तरह सत्य घटना पर आधारित है। इतना ही नहीं, इससे जुड़ी हुई अन्य सभी घटनाएँ भी सत्य पर आधारित हैं। केवल पात्रों के नाम, स्थानों के नामों में परिवर्तन अवश्य किया गया है।

    यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मेरी हर पुस्तक का जन्म किसी घटना के आधार पर ही हुआ है और यह उपन्यास भी उसका अपवाद नहीं है।

    इस उपन्यास का जन्म जिस घटना के आधार पर हुआ है, उसके पात्र ने तो आसमान की ऊँचाइयों को छू लिया है। उसने पूरी दुनिया को अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया है। वर्षों पूर्व उसे जिदा जमीन में गाड़ देने का फोटो तो मैं नहीं ले पाई, किंतु उसी घटना को पुनः दोहराने वाला फोटो मुझे उपलब्ध हो गया और तब से ही मेरे मस्तिष्क के गर्भ में पल रहे संबंधित विचारों को, उसके चित्रों को कोरे कागज पर उकेरने के लिए मेरी कलम उतावली हो गई तो उस घटना ने इस उपन्यास के रूप में जन्म लेकर अपने पाठकों तक पहुँचने का पक्का इरादा कर लिया।

    कोई भी काम अकारण नहीं होता। उसके करने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। इस पुरुषप्रधान अन्यायपरक, असमानतापरक समाज व्यवस्था के विरोध का कीड़ा तो मेरे दिमाग में बचपन से ही कुलबुलाने लग गया था, कितु उसे निकालने का काम अब कई वर्षों बाद अर्थात् मेरे जीवन के उत्तरार्द्ध में हो रहा है।

    वैसे तो अपनी खुद की समझ आने के बाद से अर्थात् लगभग पाँच वर्ष की उम्र से लड़की के पैदा होने से लेकर मरने तक के पूरे जीवन में कदम-कदम पर उसके साथ होने वाले भेदभाव, अन्याय, अत्याचार, उसके हर कदम पर लगाए गए प्रतिबंधों को मैंने न केवल पढ़ा और सुना है वरन् स्वयं भोगा भी है और वे सभी कष्ट, पीड़ाएँ एवं दर्द मेरी कहानियों, कविताओं के माध्यम से बह निकले, जिन्होंने हिंदी साहित्य के विशाल समुद्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

    यह उपन्यास भी नारी व्यथाओं तथा उसके कष्ट, दर्द, पीड़ाओं को अभिव्यक्ति देता हुआ नारी को क्रांतिकारी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली मेरी कहानियों, कविताओं की श्रृंखला में एक और कड़ी के रूप में जुड़ गया है, जो मेरे पाठकों को मेरी पूर्व की पुस्तकों की तरह ही पसंद आएगा, ऐसी मेरी उम्मीद है।

    वैसे तो लेखक की हर रचना की सफलता-असफलता का निर्णायक पाठक वर्ग ही होता है, कितु अपने पाठक वर्ग की मानसिकता को पहचानते हुए मुझे यह लिखने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती कि यह भी उन्हें पसंद ही आएगा।

    मेरे जीवन का यह प्रथम उपन्यास हिंदी उपन्यास जगत् में लाते हुए, अपने पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे अतीव हर्ष हो रहा है।

    मुझे यहाँ यह लिखने में भी कोई आपत्ति नहीं है कि हिंदी साहित्य जगत् के ठेकेदार, आलोचक व समालोचक इसे चाहे किसी भी दृष्टि से लें, किंतु अपने लेखकीय दायित्व को मैंने पूरी ईमानदारी से निभाया है, इसे कोई झुठला नहीं सकता। वैसे भी खरा-सच्चा लेखक, समाज की खरी-सच्ची बातें लिखने वाला लेखक किसी की आलोचना की परवाह नहीं करता। वह अपने जीवन के महान् लक्ष्य की प्राप्ति में लगा रहता है और मैं भी अपने जीवन के महान् लक्ष्य पुरुषों द्वारा नारी को भी एक इनसान मान लेने के लक्ष्य को पूरा करने में लगी हुई हूँ और आजीवन लगी रहूँगी। मुझे अपने इस दृढ़ निश्चय से कोई हटा नहीं सकता।

    मुझे आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि अपने आपको इनसान के तराजू में तौलने और उस पर खरे उतरने वाले इनसानी पुरुषों की भागीदारी, उनका स्नेह, सहकार तथा प्रोत्साहन मुझे अवश्य मिलेगा।

    इसी उम्मीद के साथ---

    डॉ. कुसुम मेघवाल

  • Ved Kya Hain ?
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-8002

    Availability: In stock

    पुस्तक के प्रारम्भ में यह बताने की कोशिश की गई है कि वेद का अर्थ क्या है तथा वेदों का निर्माण कब हुआ । फिर चारों वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के बारे में अलग-अलग बताया है कि उनमें से प्रत्येक में क्या-क्या है। इसके साथ ही यह भी बताया है की प्रत्येक वेद के चार भाग हैं —संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद । फिर इन चारों भागों के बारे में विस्तृत चर्चा की गयी है।
    इसके उपरांत वेदांगों के बारे में जानकारी दी गयी है । वेदांग छह हैं — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंदशास्त्र । इन छह वेदांगों के बारे में पुस्तक में सविस्तार चर्चा की गयी है । 
    चारों वेदों के आलावा चार उपवेद भी हैं । ये हैं—आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्व वेद तथा स्थापत्य वेद । इनके बारे में भी आवश्यक जानकारी पुस्तक में दी गयी है ।
  • Dohra Abhishaap
    Kaushlya Baisntari
    220 198

    Item Code: #KGP-2011

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
  • Gujrat : Sahakarita, Samaj Seva
    Neelam Kulshreshtha
    420 357

    Item Code: #KGP-599

    Availability: In stock

    गुजरात गांधी जी, सरदार पटेल, विक्रम साराभाई परिवार, अमूल डेरी, अपनी सहकारिता व औद्योगिक प्रगति के कारण जाना जाता है लेकिन ये बड़े-बड़े नाम हैं । समाज के उत्थान के लिए अनेक लोग अपनी आत्मा में नन्हे-नन्हे दीप संजोए बैठे हैं, गांधी जी के व साहित्यिक मूल्यों को अपने जीवन में जीते हुए । यदि अन्य प्रदेश प्रगति करना चाहते हैं तो इस समृद्धतम प्रदेश गुजरात से संबंधित निम्न बिंदुओं का विश्लेषण करें जिनसे समाज के भौतिक ही नहीं ,मानवता के विकास के लिए बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
    ० वडोदरा के महाराजा सयाजीराव तृतीय के शासनकाल की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से की जा सकती है। उनकी दी हुई परंपरा के कारण ये शहर 'कलाकारों का मक्का' कहलाता है। लेखिका इसे 'सिटी ऑफ इंटरनेशनल 'सोल्स' कहती हैं ।
    ० गांधी जी की प्रेरणा से भारत  द्वितीय महिला संगठन  'ज्योति संग' की स्थापना हुई व सन् 1920 में एक स्त्री अनुसूइया साराभाई ने टेक्सटाइल मिल की भारत की सर्वप्रथम सबसे वृहद ट्रेड यूनियन संगठित की ।
    ० विश्व भर में लोकप्रिय होती जा रही लोक अदालत को  श्री हरिवल्लभ पारिख ने रंगपुर (क्वांट) स्थित आनंद  निकेतन आश्रम में जन्म दिया  ।
    ० मैग्सेसे पुरस्कार विजेता इला भट्ट की 'सेवा' संस्था सेल्फ एम्प्लॉयड वीमन एसोसिएशन आज़ भी अपनी तरह की विश्व की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन है । 
    ० विश्व में संभवतः एकमात्र उदाहरण है यहाँ के शहरों व गांवों में फैला पुस्तकालयों के नेटवर्क का संगठन 'गुजरात पुस्तकालय सहायक सहकारी मंडल' ।
    ० एशिया में सहकारी बैंक अन्योन्य बैंक, महिला सहकारी बैंक व उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा करने वाली जागृत ग्राहक संस्था सर्वप्रथम यहीं संगठित हुई ।
    ० डॉ. जी. एम. ओझा ने भारत ही नहीं, एशिया में भी पर्यावरण संरक्षण की संस्था 'इनसोना' सन् 1975 में यहीं स्थापित की ।
    ० श्री सूर्यकांत पटेल का चालीस एकड़ जमीन में बनाया विश्वविख्यात फार्महाउस वडोदरा में है। 
    ० भारत में महाराष्ट्र में दो, सिर्फ गुजरात में ही तीन स्टॉक एक्सचेंज हैं जहाँ सभी राज्यों से अधिक पैसे का निवेश होता है ।
    ० विकलांगों द्वारा संस्था बनाकर विकलांगों की सहायता के उदाहरण अन्य प्रदेशों में दुर्लभ हैं । 
    ०  'गुजराती नी गजी नो तडियो भा तो नथी' इस कहावत का अर्थ जानिए इस पुस्तक से ।
    ० अस्मिता : गुजरात से एक साहित्यिक आंदोलन' इस पुस्तक से जानिए क्यों 'एक्सेल गुप्त इंडस्ट्रीज' में  प्रबंधन व मज़दूरों का कभी झगड़ा नहीं हुआ ।
    ० विश्यविख्वात आर्कीटेक्ट कर्ण ग्रोवर, जिनके हैदराबाद में बनाए सोहराबजी ग्रीन बिजनेस सेंटर को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ग्रीन बिल्डिंग घोषित किया गया है, व उनके साथियों द्वारा स्थापित हेरिटेज ट्रस्ट के प्रयासों से चांपानेर को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया है । ग्रोवर जी की नई उपलब्धि है कि उनकी बनाई बी एन एमरो बैंक को भी विश्व की पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ इमारत घोषित किया गया है । 
    ० यदि किसी शहर का उत्थान करना है तो वडोदरा की स्वयंसेवी  संस्थाओं ‘बड़ौदा सिटिजंस काउंसिल' व 'यूनाइटेड वे ऑफ बड़ौदा' को समझना होगा ।
  • Aadarsh Ghar-Parivaar Aur Mahilayen
    Sudha Gautam
    180 162

    Item Code: #KGP-187

    Availability: In stock

    'आदर्श घर-परिवार और महिलाएँ' पुस्तक में सुधा गौतम ने अपने अनुभवों के आधार पर जिन शीर्षकों के अंतर्गत जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण बातों की जानकारी दी है, उनमें से कुछ शीर्षकों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है । आशा है, यह पुस्तक महिलाओं के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध होगी :
    ० जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए
    ० छोटी-छोटी बातों से न हो परेशान
    ० बाँधे रखें पति को
    ० कड़वी यादे भुला दें
    ० जब आप फोटो खिंचवाने जाएं
    ० आप और आपकी शारीरिक गठन
    ० आप और आपका परिधान
    ० आप और आपकी नींद
    ० वर्तमान में जीना सीखें
    ० यदि आपके घर में नौकर है
    ० आप और आपकी खरीदारी
    ० आप और आपके घर के कीड़े-मकोड़े
    ० आपकी बढती उम्र और आप
    ० बच्चों के सुन्दर भविष्य के लिए
    ० जब आप सफर पर जाएं
    ० जब आपके मेहमान आपके घर आएं
    ० आप और आपकी सेहत
    ० बच्चों के लिए नाश्ता 
    ० चमकदार त्वचा के लिए
    ० खूबसूरत होंठों के लिए
    ० त्वचा में निखार के लिए
    ० गर्मियों में आपका मेकअप
    ० मुँहासों से छुटकारा
    ० खूबसूरत बालों के लिए
    ० आपकी गर्दन रहे सुंदर
    ० धूप का चश्मा
    ० आप और आपके गहने
    ० आपके घर का फर्श
    ० महिलाएँ और रसोई
    ० आपके गरम कपडे
    ० कैसे छुड़ाएँ कपडों के दाग
    ० अपने बच्चों के मित्र बनिए
    ० जब बच्चा स्कूल जाने लगे
    ० जिद्दी बच्चा
    ० माँ-बेटी का रिश्ता
    ० बच्चे कैसे बनाएं अपनी अलग पहचान
    ० बच्चे अपना काम स्वयं करें
    ० बच्चे भोजन बेकार न करें
    ० शरारती बच्चों को कैसे सुधारें
    ० बच्चों के ज्ञानवर्द्धन के लिए
    ० जब आपका बच्चा आपसे दूर रहे
    ० छात्र और परीक्षा
    ० बच्चे कैसे रहें परीक्षा के दिनों में  तनावमुक्त
    ० कैसे लिखे प्रश्नों के उत्तर
    ० कैसे मिले परीक्षा में सफलता
    ० आपका कंप्यूटर
    ० आप और आपके छोटे बच्चे
    ० बच्चों की छोटी-मोटी तकलीफें
    ० घरेलू दवाइयाँ
    ० छोटी-छोटी काम की बातें

  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-3
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-829

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं : तीन
    अगर बीसवीं सदी के श्रेष्ठ लघुकथा-लेखकों की सूची बनानी पड़े तो उसमें एनॉ उन्नी का नाम किसी भी कीमत पर रखना ही पड़ेगा। हिंदी लघुकथा को एक विशिष्टता प्रेमचंद ने सौंपी तो दूसरी राजेंद्र यादव ने, तीसरी युगल, विष्णु नागर, पृथ्वीराज अरोड़ा और सुदर्शन वशिष्ठ ने, चौथी चित्रा मुद्गल और शशांक ने और पांचवीं उन्नी, पवन एवं चैतन्य त्रिवेदी ने और छठी अर्चना वर्मा, मालचंद तथा मुकेश वर्मा ने। लघुकथा को भाषा और भाव की जो गरिमा उन्नी सौंपते हैं, वह हिंदी में दुर्लभ है, शायद अद्वितीय, पर यह अद्वितीयता न तो रावी जैसी है, न जयशंकर प्रसाद या शशांक जैसी, जिनकी परंपरा संभव नहीं लगती, लेकिन उन्नी की लघुकथाओं की परंपरा बन सकती है, प्रेमचंद की तरह। अद्वितीय होना उस दोधारी तलवार पर चलने की तरह है, जिससे आपकी अपनी काया भी तराश दी जा सकती है। वह आपकी शक्ति हो सकती है और सीमा भी। जयशंकर प्रसाद, रावी और शशांक की लघुकथाओं की अद्वितीयता उन्हें सीमित कर देती है, जबकि प्रेमचंद, राजेंद्र यादव, सुदर्शन वशिष्ठ और चित्रा मुद्गल की अद्वितीयता उनके कथा-लेखन के सीमाहीन विस्तार की राहें खोल देती है। शशांक की लघुकथाएं अपनी परंपरा को छेंककर खड़ी हो जाती हैं, उनकी कहानियों की तरह। प्रारंभ में प्रियंवद की कहानियां भी ऐसी ही लगती थीं, लेकिन प्रियंवद ने अपनी उस अद्वितीयता की सीमाओं को खंड-खंड कर ‘बोधिवृक्ष’ जैसी कहानियों के जरिए खुद को सीमाहीन विस्तार में ले जाने वाली अद्वितीयता सौंपी है। ऐसी बात लेकिन कोई पाठक तब तक दावे से नहीं कह सकता, जब तक वह हिंदी के दो सौ से अधिक कथाकारों की चुनी हुई लघुकथाओं का ‘पाठ-कुपाठ’ न कर ले। आज प्रायः हर कोई स्वीकार कर चला है कि यह समय लघुकथा का समय है। इसीलिए प्रस्तुत संचयन सर्व-संग्रह की साधु-वृत्ति से संचालित होकर संपादित हुआ है, लेकिन इक्कीसवीं सदी में आकर अब लग रहा है कि घना बजने वाले थोथे चनों को छांट देने का समय आ गया है, जिसकी शुरुआत प्रस्तुत संचयन के संपादकीय और संकलित आलोचनात्मक आलेखों से कर दी गई है यानी हिंदी लघुकथा की बीसवीं सदी का समग्र अवलोकन-सिंहावलोकन।
  • Kavya Shatabdi
    Anamika
    350 315

    Item Code: #KGP-789

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।
  • Madhumeh Evam Chikitsa
    Jagnnath Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-9319

    Availability: In stock

    सन् 1967 की बात है। उन दिनों मैं अखिल भारतीय संस्थान, नई दिल्ली के मेडीसन विभाग में कार्य कर रहा था। फारमकाॅलाॅजी में एम. डी. करने के पश्चात् मेडीसन में भी एम. डी. करने की योजना थी। उन दिनों रोगियों से बातचीत करने पर लगता था कि दिल्ली के नागरिकों को स्वास्थ्य संबंधी विशेष जानकारी नहीं थी। कारण भी स्पष्ट था। उन दिनों न तो हिंदी में स्वास्थ्य संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं और न पत्र-पत्रिकाओं से इस प्रकार की जानकारी मिल पाती थी। हां, अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं में यदा-कदा लेख छप जाया करते थे। 
    अतः मन में निरंतर यह बात खटकती रहती थी कि इस कमी को कैसे दूर किया जाय। संयोगवश उन्हीं दिनों श्री रतनलाल जी जोशी से परिचय हुआ। वे उन दिनों ‘दैनिक हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र के प्रधान संपादक थे। बस, उन्हीं से प्रेरणा प्राप्त कर मैंने ‘दैनिक हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र में स्वास्थ्य संबंधी लेखन प्रारंभ किया जो आगे चलकर ‘रोगियों के प्रश्नोत्तर’ नाम से स्थायी स्तंभ के रूप में लगभग बीस साल तक चलता रहा।
    मेरी ऐसी मान्यता है कि आयुर्विज्ञान संबंधी साहित्य का जब तक हिंदी में मौलिक सृजन नहीं होगा, तब तक इस विज्ञान को जन-मानस से नहीं जोड़ा जा सकता। अनुवादित ग्रंथों से जानकारी तो मिल जाती है, परंतु मौलिकता नहीं आ पाती।
    स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संगठित हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में मैंने सदैव अनुभव किया है कि स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान हिंदी के माध्यम से ही जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।
    इसी परिवेश में प्रस्तुत पुस्तक ‘मधुमेह एवं चिकित्सा’ की रचना की गई हे, जिससे लोगों को लाभ होगा, ऐसा विश्वास है।
  • Kangaruon Ke Desh Mein
    Rekha Rajvanshi
    250 225

    Item Code: #KGP-887

    Availability: In stock

    कंगारुओं के देश में
    रेखा राजवंशी की ये कविताएं डायरी हैं उन स्मृतियों की, जो कवयित्री के मन में भारत को लेकर बसी हुई है । ये कविताएँ हैं तुलनात्मक अध्ययन की कि भारत में कैसा था, आंरट्रेलिया में कैसा है । ये कविताएं हैं दो संस्कृतियों को आमने-सामने रखकर उनसे स्वयं  को तलाशने की कि वे कहीं है । इन कविताओं में बचपन है, विभीशेरावस्था है, वृद्धावस्था है । माँ की कॉंपती उँगलियों में कभी त्वरित गति से चलती हुई सलाइयों का सौर्य है । कवि-मन को ये सलाइयाँ मिल जाएं तो दिल की उँगलियाँ अतीत का स्वेटर कभी बुनने लगती  कभी उधेड़ने लगती है । इन सलाइयों ने कंगारुओं के देश का एक कोलाज़ बनाया है और रंग भारत के भरे हैं । एक विकास-यात्रा है पिछले एक दशक की, जिससे धीरे-धीरे हमारी धरती एक ग्लोबल गाँव में बदल गई है ।
    अपना वतन छोड़कर रेखा राजवंशी चली गई ऑस्ट्रेलिया, लेकिन इन कविताओं में उन्होंने हर पल भारत को जिया है । भारत में अगर अन्याय के परिदृश्य हैं तो ऑस्ट्रेलिया में भी कम नहीं । वे यहीं के आदिवासी लोगों पर हुए अत्याचारों के अतीत को जानकर विचलित हो जाती हैं । डिजरीडू नामक लंबे वाद्य-जितनी लंबी पीड़ा उनको होने लगती है । पीड़ा का संगीत कविताओं की शक्ल से ढलकर सामने आ जाता है ।
  • Dr. K.B. Hedgewar : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    190 171

    Item Code: #KGP-487

    Availability: In stock

    निडर और साहस के धनी डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार भारत की उन महान् विभूतियों में से एक हैं, जिन्होंने राष्ट्रसेवा के पथ पर चलते हुए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। अपनी जीवनशैली में सदैव अनुशासन और राष्ट्रप्रेम को अधिक महत्त्व देने वाले डॉ. केशवराव ने बाल्यावस्था में ही अपने अंग्रेजविरोधी तेवर दिखाने आरंभ कर दिए थे।
    डॉ. केशवराव उन विलक्षण व्यक्तियों में से थे, जो युवाओं की मानसिकता को भलीभांति जानते थे और उनकी क्षमताओं को विकसित करने के नए-नए तरीके खोजते रहते थे।
    देश की युवा पीढ़ी को भारत की सनातन संस्कृति और आदर्शों से जोड़े रखने के लिए 28 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के पर्व पर ‘संघ’ नामक नए राष्ट्रीय हिंदूवादी संगठन की स्थापना की गई। साहस और अनुशासन पर आधारित इस संगठन को खड़ा करने का पूरा श्रेय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार को जाता है। इस स्थापना-समूह के अन्य सदस्यों में डॉ. वी. एस. मुंजे, बापूजी सोनी तथा डॉ. परांजपे आदि वरिष्ठ नेता शामिल थे।
  • Uttar Kand (Paperback)
    Bhairppa
    300 240

    Item Code: #UK pb

    Availability: In stock

    वाल्मीकि के ‘रामायण’ का अध्ययन करते समय हमें चरित्रें की दृष्टि से, चरित्र-चित्रण की दृष्टि से, घटनाओं की स्वाभाविकता की दृष्टि से, वर्णनों के औचित्य की दृष्टि से और चरित्रें के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की दृष्टि से जो कमियाँ नजर आती हैं, उन सभी का समाधान उत्तर कांड नामक इस उपन्यास में मिलता है। जैसा कि ‘पर्व’ में किया गया था, ‘उत्तर कांड’ में भी चरित्रें और घटनाओं को मिथकीकरण से मुक्त करके, स्वाभाविक परिवेश में प्रस्तुत कर दिया गया है। इसलिए इसको आधुनिक गद्य-महाकाव्य होने की प्रतिष्ठा भी मिली है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है 
  • Panchtantra Ke Natak
    Shri Prasad
    125 113

    Item Code: #KGP-316

    Availability: In stock


  • Naamdev Rachanavali (Paperback)
    Govind Rajnish
    90

    Item Code: #KGP-1493

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • Narak Dar Narak
    Mamta Kalia
    200 180

    Item Code: #KGP-159

    Availability: In stock

    इस उपन्यास पर सबसे पहले मुझे अपने प्रिय रचनाकार यशपाल जी का पत्र मिला तो में कई दिनों तक रोमांचित रही। इस महान उपन्यासकार ने मेरे जैसी नई लेखिका की पुस्तक  सिर्फ पढ़ी, वरन उस पर पत्र लिखकर अपनीसराहना व्यक्त की, इस गर्व और सुख का बयान मैं शब्दों में नहीं कर सकती। यशपाल जी का पत्र मैंने प्रमाण-पत्र की तरह पिछले तीस वर्षों से सँभालकर रखा हुआ है। जब कभी लिखने का विश्वास डगमगाने लगता हैयह पत्रध्रुव तारे की तरह मुझे रास्ता दिखाता है। यशपाल जी के ही शब्दों में : ‘उपन्यास की भाषा संक्रमण काल के उफनते-खलबलाते जीवन की संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के अनुरूप सरल-ओजस्वी लगी। विशेषकर उषा या माँ की सामाजिकता और आवरणरहित स्वाभाविकता। कथानक और उसके अनुषंग मर्मस्पर्श के साथ नए जीवन-संतुलन की चेतना को भी कुरेदते हैं।

    'नरक दर नरक नाम की चोट चौंकाकर ध्यान खींचती है, परंतु पाठक की यात्रा सहारा के नरक की वीरानगियों में दम छूट जाने से पहले ही बागे-अदन की संजीवनी वायु का आभास महसूसती जान पड़ती है। नरक दर नरक से घोर बचाव की आशा जगने लगती है। सफल रचना के लिए बधाई।' -यशपाल

  • Antarvartayen
    Kanhiya Lal Nandan
    240 216

    Item Code: #KGP-802

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक में सम्मिलित लगभग सभी बातचीतें किसी न किसी प्रतिष्ठित पत्रिका के माध्यम से पहले भी पाठकों के सन्मुख आ चुकी हैं, लेकिन समवेत रूप में दिनकर और अज्ञेय से लेकर कामतानाथ तक कई पीढ़ियों के रचनाकारों के अंतरंग मन में पैठा जा सके और उस पैठ के ज़रिए साहित्यिक जिज्ञासुओं की प्रश्नाकुल उत्कंठाएँ शांत हो सकें, इस दृष्टि से इस पुस्तक का विशेष महत्त्व मैं मानता रहा हूँ । फिल्मकार बासु भट्टाचार्य, चित्रकार कृष्ण हेब्बार और छायाकार रघु राय भी बातचीत के इस समवेत क्रम में सम्मिलित कर लिए गए हैं ताकि संवेदना के धरातल पर अनेक माध्यमों से जुड़े हुए लोगों की एकसूत्रता की प्रतिच्छवि भी आँकी जा सके ।
    कोई भी रचनाकार अपने युग को सिर्फ अपनी विधा के चश्मे से नहीं देखता । यह अगर कहानीकार है तो उसके साथ-साथ एक संघर्ष करता हुआ सामाजिक प्राणी भी है; जो कि ट्रेन-यात्रा में टिकट के लिए धक्के खाता भी हो सकता है, समाज में फैली किसी बुराई विशेष के प्रति एक आदमी की तरह सोच भी सकता है और उसकी प्रतिक्रिया में हिस्सेदार भी हो सकता है । रचनाकार को उसके समूचे रंगों में टटोलने की इसी जद्दोजहद से मैंने इन बातचीतों के क्रम में कुछ ऐसे ढंग से यह बार सवाल रखे हैं जो पूर्वापर संबंध के साथ असंगत दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उस बातचीत के समूचे प्रभाव में मुख्य उद्देश्य यहीं रहा है कि यह रचनाकार अपने मन के अछूते पहलुओं को पाठकों के सामने खोले; खासकर ऐसे पहलू जिन पर बहुत कम प्रकाश पड़ा है ।
    इस पुस्तक में सम्मिलित सभी रचनाकार व्यक्तित्व मुझे अंतरंग आत्मीयता प्रदान करते रहे हैं । संबंधों की यह अंतरंग आत्मीयता मेरी इन सभी बातचीतों का मूल आधार रही है । शायद इसीलिए जब-जब ये बातचीतें पहली बार प्रकाश में आई हैं, मुझे इनकी शैली के लिए पाठकों का अतिरिक्त स्नेह मिलता रहा है ।
    -कन्हैयालाल नंदन


  • Isliye
    Ashok Gupta
    175 158

    Item Code: #KGP-1831

    Availability: In stock


  • Shabd Ka Uday : Vikas Evam Anuprayog
    Dayanand Pant
    250 213

    Item Code: #KGP-1286

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तिका भारत में वैज्ञानिक शब्दावली-विकास के अभियान से संबद्ध है। इसमें शब्द-चर्चा के अतिरिक्त अभियान के मुख्य उद्देश्य अर्थात् वैज्ञानिक वाड्मय का सृजन, अविज्ञान-शिक्षा का माध्यम आदि पर भी सार्थक चर्चा है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद जोर पकड़ता अभियान पूर्णरूपेण सफलता को प्राप्त नहीं हो सका क्योंकि माध्यम परिवर्तन में शिक्षक ही बाधक हो गए और अपनी भाषा के माध्यम से उच्चतर शिक्षा देने वाले एशियाई देशों-जापान, चीन, कोरिया की विलक्षण वैज्ञानिक प्रगति से हम सीख नहीं ले पाए।
    लेखक ने निष्पक्ष रूप से शब्दावली अभियान के चरणों और गुण-दोषों का विवेचन किया है। साथ ही, दो बातों पर रोना रोया है जो हैं (1) शब्दावली-निर्माण में भाषा-प्रेमियों ने लगन और उत्साह से काम तो किया, पर अंग्रेजी समर्थकों की चाल को न समझकर उनकी ही धुन में नाचते रहे और (2) आज का भारतीय भाषा लेखक अंग्रेजी में सोचकर अपनी भाषा में लिख रहा है जिस कारण मुहावरे का सहज विकास अवरुद्ध हो गया है और भाषा की बोध-गम्यता कम होती जा रही है।
  • Apni Dharti Apne Log-3 Vols. (Paperback)
    Ram Vilas Sharma
    600

    Item Code: #KGP-7112

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Vishvanath Prasad Tiwari
    Vishwanath Prasad Tiwari
    150 135

    Item Code: #KGP-2032

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : विश्वनाथप्रसाद तिवारी
    इस पुस्तक में संकलित साक्षात्कार अपने समय के एक महत्त्वपूर्ण लेखक से साक्षात्कार तो हैं ही, संपूर्ण  साहित्य से भी साक्षात्कार हैं । खास तौर से समकालीन साहित्य से । स्वयं अपने बारे में दिए गए संकेतों के साथ लेखक ने रचना और आलोचना के बुनियादी सरोकारों को भी स्पष्ट किया है तथा अपने समकालीनों के बारे में भी उसने दो टूक प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की है । इन प्रतिक्रियाओं में साहस के साथ संयम भी है और कथ्य के साथ तथ्य भी । लेखक क्योंकि किसी संघ या गुट में विश्वास नहीं करता, किसी दलीय विचारधारा का वह कट्टर अनुयायी नहीं है अतः कोई उसका अपना-पराया भी नहीं है । दूसरों की रचना ही उसके लिए प्रमाण है । वह इतना आत्मलिप्त भी नहीं है कि अपनी रचना की सीमाओं की पहचान न सके । इसलिए आत्मप्रशंसा और परनिंदा के लिए इन साक्षात्कारों में कोई जगह नहीं है । पूछे गए प्रश्नों के संतुलित, तर्कसंगत, सुलझे हुए और सीधे जवाब इन साक्षात्कारों की विशेषताएं हैं । इनको पढ़ते हुए बहुत; से पाठकों के मन की बहुत-सी धुंध साफ होगी, उनकी बहुत-सी उलझनों के सही और स्पष्ट उत्तर मिलेंगे । उन्हें महसूस होगा कि इन साक्षात्कारों को पढ़कर वे समृद्ध हुए हैं और उनके सामने सृजन और चिंतन की अनेक नई दिशाएं उभरी हैं जिधर वे सोच सकते हैं और चाहें तो चल भी सकते हैं।
  • Bhasha-Praudyogiki Evam Bhasha-Prabandhan
    Prof. Surya Prasad Dixit
    550 495

    Item Code: #KGP-738

    Availability: In stock

    भाषा-प्रौद्योगिकी एवं भाषा-प्रबंधन
    हिंदी भाषा-साहित्य को प्रौद्योगिकी रूप में सुगठित करना और प्रबंध-विज्ञान के सहारे संपूर्ण देश में उसे कार्यान्वित करना संप्रति बहुत बड़ी चुनौती है। पहली आवश्यकता यह है कि भाषा-प्रौद्योगिकी का एक व्यावहारिक शास्त्र बनाया जाए और फिर उसकी प्रविधि तथा प्रक्रिया का परिविस्तार किया जाए। भारत की भाषा-समस्या का निराकरण विधवा-विलाप से नहीं होगा, बल्कि वह संभव होगा विधेयात्मक वैकल्पिक परिकल्पनाओं से। ऐसी ही कुछ वृहत्तर परिकल्पनाओं से उपजी है यह पुस्तक।
    इसमें हिंदी की भाषिक प्रकृति तथा संस्कृति पर विचार करते हुए भाषा के विभिन्न चरित्रों की मीमांसा की गई है। राजभाषा, संपर्क-भाषा, शिक्षण-माध्यम-भाषा, संचार-भाषा और कंप्यूटर-भाषा की शक्ति तथा सीमाओं का विश्लेषण करते हुए यहाँ लेखक ने अनुवाद, वेटिंग, अनुसृजन, पारिभाषिक शब्दावली, संकेताक्षर, दुभाषिया प्रविधि, डबिंग, मीडिया-लेखन, संभाषण-कला, रूपांतरण, सर्जनात्मक लेखन, पत्रकारिता, नाट्यांदोलन, प्रचार- साहित्य-लेखन, कोश-निर्माण, ज्ञान-विज्ञानपरक वैचारिक लेखन, देहभाषा, यांत्रिक भाषा, लोक वाङ्मय, शोध समीक्षा, प्राध्यापन, भाषा-शिक्षण, इतिहास-दर्शन, प्रकाशन, परीक्षण, विपणन, संगोष्ठी-संयोजन, लिपि के मानकीकरण, विभाषाओं के संरक्षण तथा इन विचार-बिंदुओं से जुड़े तमाम पक्षों का बारीक विश्लेषण किया है।
    प्रस्तावना, भाषा-प्रौद्योगिकी, भाषा-प्रबंधन और समाहार नामक चार स्तंभों पर आधारित यह कृति हिंदी भाषा-साहित्य का एक नया ढाँचा निर्मित करने हेतु कृतसंकल्प रही है। इसका अनुगमन करते हुए इस ढाँचे को जन-सहभागिता के सहारे भव्य प्रासाद का रूप दिया जा सकता है। यही आह्नान एक-एक अध्याय में किया गया है। अस्तु, यह मात्रा लेखन मात्रा न होकर समग्रतः एक सुनियोजित भाषांदोलन है। एक रचनात्मक महानुष्ठान !
  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-2
    Kamal Kishore Goyenka
    950 808

    Item Code: #KGP-58

    Availability: In stock


  • Heeraman High School
    Kusum Kumar
    500 450

    Item Code: #KGP-577

    Availability: In stock


  • The Kindling Touch (Paperback)
    Debabrata Dasgupta
    195

    Item Code: #KGP-330

    Availability: In stock

    t is not all to describe Madame Curie simply as a devoted scientist; she is a radiant milestone in the realm of modern science. Her whole life carries a divine message. The life that nurtured her, gave her feed for the mind and body, was not at all strewn with flowers. Rather, feelings of want, insecurity and doubts tried to strangle her like the tentacles of an octopus. In the dark, deep jungle of uncertainties that was her early life, where there were chances of slippage at every step, she had ventured forward with resolution and courage and finally reached her glorious destination.
  • Us Raat Ki Baat
    Amrendra Mishra
    50 45

    Item Code: #KGP-9062

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Balram
    Balram
    230 207

    Item Code: #KGP-692

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बलराम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'शुभ दिन', 'गोआ में तुम', 'शिक्षाकाल', 'पालनहारे', 'सामना', 'कलम हुए हाथ ', 'कामरेड का सपना ', 'मालिक के मित्र', 'अनचाहे सफर' तथा 'पहला सबक' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बलराम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sanjeev
    Sanjeev
    200 180

    Item Code: #KGP-665

    Availability: In stock

    कहानियों सें विषयों के व्यापक शोध, अनुभव के संदर्भ, समसामयिक प्रसंग और प्रश्न तथा पठनीय वृत्तांतों का संयुक्त एव सार्वजनिक संसार ही संजीव की कहानियाँ चुनता-बुनता है। इन कथाओं की सविस्तार प्रस्तुति से अभिव्यक्त समाहार का अवदान इस कथाकार को उल्लेख्य बनाता है। घटनाओं की क्रीड़ास्थली बनाकर कहानी को पठनीय बनाने में इस कहानीकार की विशेष रुचि नहीं होती बल्कि यह ऐसे सारपूर्ण कथानक की सुसज्जा में पाठक को ले जाता है, जहाँ समकालीन जीवन का जटिल और क्रूर यथार्थ है तथा पारंपरिक कथाभूमि की निरूपणता और अतिक्रमणता भी । यथार्थ के अमंगल ग्रह को, पढ़वा लेने की साहिबी इस कथाकार को सहज ही प्राप्त है, जिसे इस संग्रह की कहानियों में साक्षात् अनुभव किया जा सकता है ।
    प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।
    संजीव द्वारा स्वयं चुनी गई ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं- 'अपराध', 'टीस', 'प्रेत-मुक्ति' 'पुन्नी माटी', 'ऑपरेशन जोनाकी', 'प्रेरणास्रोत', 'सागर सीमांत', 'आरोहण', 'नस्ल' तथा 'मानपत्र' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रहीं 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कया-संग्रह को दसवें 'आर्य स्मृति साहित्य सम्मान' (16 दिसंबर, 2003) के अवसर पर विशेष सम्मान के साथ प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन से कभी भी तलाशा जा सकेगा।
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 1 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    195

    Item Code: #KGP-295

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (1)
    (व्यक्तित्व और परिवार)
    एक नहीं अनेक गांधी हैं--गांधी के  अकेले एक व्यक्तित्व से समाए हुए ।
    गत पूरी एक शताब्दी गांधी की शताब्दी थी । इतना महान् व्यक्तित्व संभवत: विश्व में कोई दूसरा नहीँ था । उनके अवसान के पश्चात उनका विशाल स्वरूप धुँधलाया नहीं, बल्कि और प्रखर, और अधिक प्रासंगिक होकर उभरा । अतीत के गांधी की अपेक्षा आज का गांधी अधिक व्यापक एव विराट, है ।  हिंसा की आग में झुलसते, आज के इस भयाक्रांत वानावरण में गांधी की आवश्यकता अधिक गहराई से अनुभव की जा रही है ।
    यों तो अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है गांधी जी पर, उनके जीवन-दर्शन पर, परंतु बहन सुमित्रा जी ने अपने पितामह का जिस रूप में रेखांकित किया है, वह उन सबसे भिन्न है । बापू के जीवन की पारदर्शिता उसमें झलके बिना नहीं रहती । सुपित्रा जी ने नि:स्पृह एवं निष्पक्ष भाव स सारी स्थितियों का गहन विवेचन किया है । अपने पितामह को भी क्षमा नहीं किया ।
    इस संपूर्ण कृति में हरिलाल भाई वाला प्रसंग सबसे करुण एवं दारुण है--दिल की दहला देने वाला । तब बापू मात्र बापू न रहकर एक संवेदनशून्य पिता की भूमिका में दीखते हैं । हरिलाल भाई सारा गरल चुपचाप पी जाते हैं, पर किसी से कोई शिकायत नहीं । इतना प्रखर, मेधावी, आज्ञाकारी सुपुत्र पिता की उपेक्षा का शिकार बनकर अपनी आहुति दे टेना है । तब गांधी से बडा गांधी लगता है वह--एक निपट मानव के रूप में । अपनी परदादी माँ 'पुतली माँ' पर भी सुपित्रा जी न विस्तार स लिखकर 'गांधी-परिवार' की इस पुण्य-गाथा को एक युग-गाथा का नया आयाम प्रदान किया है । संयुक्त परिवार में पद्म-पत्रवत् रहने की उनकी तपश्चर्या कितनी प्रेरक थी ! इस कृति में ऐसा बहुत कुछ  जो गंभीरता के साथ सोचने के लिए विवश करता है ।  सुमित्रा जी की यह रचना इसलिए अनेक अर्थों में अद्वितीय बन गई है ।
    --हिमाशु जोशी
    13 अगस्त, 2009
  • Goma Hansti Hai
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-1991

    Availability: In stock

    गोमा हंसती है
    शहरी मध्यवर्ग के सीमित कथा-संसार में मैत्रीय पुष्पा का कहानियाँ उन लोगों को लेकर आई हैं, जिन्हें आज समाजशास्त्री 'हाशिए के लोग' कहते है । वे अपनी 'कहन' और 'कथन' में ही अलग नहीं हैं, भाषा और मुहावरे में भी ‘मिट्टी की गंध' समेटे हैं ।
    'गोमा हंसती है' की कहानियों के केंद्र में है नारी, और वह अपन सुख-दु:खों, यंत्रणाओं और यातनाओं में तपकर अपनी स्वतंत्र पहचान माँग रही है । उसका अपने प्रति ईमानदार होना ही 'बोल्ड' होना है, हालाँकि यह बिलकुल नहीँ जानती कि वह क्या है, जिसे 'बोल्ड होने' का नाम दिया जाता है । नारी-चेतना की यह पहचान या उसके सिर उठाकर खड़े होने में ही समाज की पुरुषवादी मर्यादाएं या महादेवी वर्मा के शब्दों में 'श्रृंखला की कडियाँ' चटकने-टूटने लगती है । वे औरत को लेकर बनाई गई शील और नैतिकता पर पुनर्विचार की मजबूरी पैदा करती है । 'गोमा हंसती है' की कहानियों की नारी अनैतिक नहीं, नई नैतिकता को रेखांकित करती है ।
    इन साधारण और छोटी-छोटी कथाओं को 'साइलैंट रिवोल्ट' (निश्शब्द विद्रोह) की कहानियाँ भी कहा जा सकता है क्योंकि नारीवादी घोषणाएँ इनसे कहीं नहीं है । ये वे अनुभव-खंड है जो स्वयं 'विचार' नहीं हैं, मगर उन्हीं के आधार पर 'विचार' का स्वरूप बनता है ।
    कलात्मकता की शर्तों के साथ बेहद पठनीय ये कहानियाँ निश्चय ही पाठको को फिर-फिर अपने साथ बॉंधेंगी, क्योंकि  इनमें हमारी जानी-पहचानी दुनिया का वह 'अलग' और 'अविस्मरणीय' भी है जो हमारी दृष्टि को माँजता है।
    इन कहानियों की भावनात्मक नाटकीयता निस्संदेह हमें चकित भी करेगी और मुग्ध भी। ये सरल बनावट की जटिल कहानियां है ।

    'गोमा हँसती है' सिर्फ एक कहानी नही, कथा-जगत्की एक 'घटना' भी है । -राजेन्द्र यादव

  • Mahaan Yoddha Prithviraaj Chauhan : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    90

    Item Code: #KGP-1319

    Availability: In stock

    भारतवर्ष के इतिहास में क्षत्रिय राजवंशों की गौरवगाथा इतनी लोमहर्षक है कि उन्हें बारंबार पढ़ने को मन करता है। पौराणिक काल से ही क्षत्रिय वंश ने राष्ट्र और समाज की रक्षा में अपनी तलवार उठाए रखी और अपने कर्तव्य का पालन किया।
    अजमेर चैहान वंश की राजधनी रहा है, जिसके प्रतापी राजा सोमेश्वर चैहान थे। सोमेश्वर चैहान के पुत्र पृथ्वीराज चैहान थे, जिनकी वीरता को आज भारतवर्ष में बड़े गर्व से याद किया जाता है। प्रस्तुत पुस्तक ‘महान् योद्धा पृथ्वीराज चैहान: जीवन दर्शन’ में पृथ्वीराज चैहान के जीवन से जुड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाओं को सरल, सरस व सुबोध् शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
  • Naya Gyan Ki Anokhi Baatein
    Vishv Nath Gupta
    250 200

    Item Code: #KGP-9237

    Availability: In stock

    ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। किसी ने कहा भी है कि ‘जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ’। यह सच है कि जो जितना गहराई में जाएगा, उसे उतना ही ज्यादा मिलेगा।
    इस पुस्तक में जो बातें बतलाई गई हैं उनके बारे में हमारे बाल और किशोर पाठक कुछ-कुछ जानते भी होंगे, लेकिन बाल और किशोर मन में बहुत जिज्ञासा भरी रहती है, वह बहुत कुछ जानने और समझने को उत्सुक व इच्छुक रहता है। इस पुस्तक में जिन विषयों के बारे में लिखा गया है, उनके बारे में उन्हें कुछ नई बातें मालूम होंगी। इससे उनकी जिज्ञासा बढ़ेगी और उनमें और ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा जागृत होगी। वे और पढ़ेंगे तथा और ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। यही इस पुस्तक का उद्देश्य है।
    -विश्वनाथ गुप्त
  • Ath Nadi Katha
    Hari Krishna Devsare
    450 405

    Item Code: #KGP-219

    Availability: In stock

    अथ नदी कथा
    भारत की नदियों की पवित्रता, ऐतिहासिकता, पौराणिकता और उनके गौरवशाली वरदानों से हम सदियों से जुडे है । आम आदमी के लिए, नदी की यह कथा न केवल रोचक हो सकती है, उसके लिए प्रेरक भी हो सकती है। समय के साथ हमने कितनी ही नदियों की गाथाएँ भुला दी हैं। केवल उँगलियों पर गिने जा सकने वाले नाम ही लोगों को याद हैं। इस पुस्तक में यही प्रयास किया गया है कि भारत को लगभग सभी महत्वपूर्ण? नदियों के सम्मिलित किया जाए। फिर भी क्षेत्रीय महत्त्व की और छोटे यात्रा-पथ वाली नदियों का छूट जाना स्वाभाविक ही है।
    इस पुस्तक में सम्मिलित नदियों का यथासंभव पौराणिक माहात्य, उनकी पौराणिक एवं लोक- प्रसिद्ध कथाएँ, उनसे संबद्ध ऋषियों, तपस्वियों की कथाएँ दी गई है । इसी के साथ उनकी उत्पत्ति, की कथाएँ, उद्गम स्थल का भौगोलिक महत्त्व और फिर आगे के यात्रा-पथ का वर्णन है। यात्रा-पथ में नदी के दोनों तटों पर बसे धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं औद्योगिक नगरों के साथ साथ तीर्थों, संगमों, मंदिरों आदि के लोकव्यापी महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है। ये सभी विवरण हमारी भावी पीढ़ी, युवा पीढ़ी और प्रौढ़ों-तीनों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • Patrakarita Mein Anuvad Ki Samasyayen
    400 360

    Item Code: #KGP-239

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में सामान्य समाचारों का अनुवाद, खेलकूद के समाचारों का अनुवाद, बाजार-भाव के समाचारों का अनुवाद, विज्ञापनों का अनुवाद तथा संपादकीय का अनुवाद आदि उन सभी विषयों को दिया गया है जिनसे समाचारपत्रों के संपादकीय विभाग को जूझना पड़ता है। व्यक्तिवाचक नामों तथा वर्तनी की समस्या भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। अतः उन्हें भी ले लिया गया है। अंत में आकाशवाणी और दूरदर्शन के समाचारों पर भी अनुवाद की दृष्टि से विचार किया गया है। अंत में कुछ पारिभाषिक शब्दों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है जो इस प्रसंग में काम के हैं।
    विश्वास है कि यह पुस्तक अनुवाद में सामान्य रूप से रुचि रखने वालों तथा विशेष रूप से समाचारपत्रों और आकाशवाणी-दूरदर्शन के अनुवादकों के लिए उपयोगी होगी।
  • Mere Saakshatkaar : Mridula Garg
    Mridula Garg
    225 203

    Item Code: #KGP-870

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrit Lal Nagar (Paperback)
    Amritlal Nagar
    90

    Item Code: #KGP-7008

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अमृतलाल नागर
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अमृतलाल नागर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'किस्सा बी सियासत भठियारिन और एडीटर बुल्लेशाह का', 'एक दिल हजार अफसाने', 'जंतरर्-मंतर', 'मन के संकेत', 'लंगूर का बच्चा', ‘शकीला की माँ', 'सती का दूसरा ब्याह', 'ओढ़री सरकार', 'सूखी नदियाँ' तथा 'पाँचवाँ दस्ता' । संपादक द्वारा लिखी गई पुस्तक की भूमिका के माध्यम ते अमृतलाल नागर की समग्र कथा-यात्रा और उसके महत्त्व से भी सहज ही परिचित हुआ जा सकता है ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अमृतलाल नागर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    200 180

    Item Code: #KGP-770

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकू' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Postmortem
    Ajeet Kaur
    160 144

    Item Code: #KGP-2048

    Availability: In stock


  • Rangon Ki Gandh-2
    Govind Mishra
    595 536

    Item Code: #KGP-9161

    Availability: In stock

    रंगों की गंध

    यात्रा जीवन के दूसरे अनुभवों से थोड़े अलग किस्म का अनुभव है। जहां दूसरे अनुभव हमें साफ-साफ जोड़ते-तोड़ते हैं, अपनी अंतरंगता में चरमरा डालते हैं या फिर सूखा-सूखा और दूर-दूर रखते हैं...वहां यात्रा दूसरी रखते हुए भी पास लाती हे, हम अपने खोल से बाहर निकलकर संसार की व्यापकता को छूते होते हैं। व्यापकता की यह छांह दुखी व्यक्ति को टूटने से बचाती है। स्वयं से थोड़ा वैराग्य और बाहर से जुड़ना दोनों एक साथ होता चलता है। मेरे लिए जो इससे बड़ी बात है, वह यह कि यात्रा में हम चलते हैं, हर हाल में चलते रहना-यह मेरी जिद दृढ़तर करती है यात्रा।
    -गोविन्द मिश्र
  • Fantasia (Paperback)
    Vaughn Petterson
    245

    Item Code: #KGP-343

    Availability: In stock

    Touching on a wide range of different themes, Fantasia on a Theme of Thomas Tallis is a truly compelling read. Throughout the pages of his thought-provoking novel, the author, Vaughn Petterson, presents readers with a vivid portrait of the best and worst that humanity has to offer, inviting them to form their own conclusions about the respective moral weight of our various social folkways and mores. Written in a deeply lyrical style, Fantasia successfully incorporates the transformative media of art, music, and literature as a figurative backdrop for Joe’s personal metamorphosis—highlighting the significance of the arts in helping to change us in ways we could hardly imagine. Petterson also skillfully invokes higher levels of deeper thought in the reader, chiefly by inviting them to consider the deeper spiritual ramifications of the issues with which his characters are forced to contend—issues that rest at the core of our collective existence.
  • Nadi Ke Saath Bahate
    P.S. Ramanunj
    65 59

    Item Code: #KGP-1853

    Availability: In stock

    'नदी के साथ बहते' श्री पी०एस० रामानुजं की कन्नड़ कविताओं का हिन्दी में श्री टी०आर० भट्ट द्वारा प्रस्तुत हिन्दी काव्यान्तर है । प्रसन्नता की बात है कि काव्यांतर  की भाषा अनुवाद जैसी नहीं लगनी प्रत्युत मौलिक कविता लगती है। कहीं-कहीं कन्नड़ रग अवश्य है,  पर वह उचित ही है । उसमें कविता को मर्मस्पर्शिता बढ़ जानी है । श्री रामानुजं के काव्य में एक क्लासिक कविता का गुण है जिसमें भावोछवास संयत रूप में है।
  • Lalit Nibandh : Swaroop Evam Parampara
    Dr. Shri Ram Parihar
    750 675

    Item Code: #KGP-781

    Availability: In stock


  • Daadoo Samgra (2 Vols.)
    Govind Rajnish
    1195 1076

    Item Code: #KGP-1584

    Availability: In stock

    दादू समग्र : 1
    भक्तिकाल के निर्गुण संप्रदाय में कबीर के पश्चात सबसे महत्त्वपूमृर्प सर्जनात्मक व्यक्तित्व संत दादू दयाल (दादू अवधूत जोग्यन्द्र) का है । पुरे भारत से सामाजिक, धार्मिक और दार्शनिक चेतना को जगाने तथर विराट सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने में इनकी अग्रणी भूमिका रही है । इन्होंने मनुष्य के भीतर सोए हुए विराट अनुराग को जगाने तथा ज्ञानात्मक संवेदनाओं और आध्यात्मिक अनुभवों से संपन्न करने का प्रयास किया था। इनके 'न्रिपख' दर्शन ने हिंदू और मुसलमानों की कुरीतियों, बाह्याडंबरों, जड़ताओं, रूढियों और विसंगतियों की आलोचना करते हुए, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठने का संदेश दिया था ।
    दादू महान् संत, रचनाकार, नीतिज्ञ और उपदेशक ही नहीं थे, विश्व-बोध और मानवीयता से ओतप्रोत समाज-सुधारक भी थे । इन्होंने मजहब और जाति-भेद से ऊपर उठकर मानवीय भावों को परखकर विशाल मानवीय बोध जगाया था। इनकी साधना-भूमि, काव्य-भूमि एवं भाव-भूमि अत्यंत व्यापक और संवेदना जन-मन-स्पर्शिनी थी । इन्होंने भेदों से अभेद और नानात्व में एकता का संधान तथा आत्म-बोध और जगत्-बोध को एकाकार किया था । दादू का काव्य कबीर के वैचारिक क्षितिज को व्यापक किंतु धीर-गंभीर बनाने का उपक्रम है।
    दादू अपने सहज, निश्छल भगवत्प्रेम के सोपान से ब्रह्म-द्वार की उस सीमा तक पहुंचे, जहाँ परम तत्त्व के यथार्थ स्वरूप को पहचानने और पाने का मार्ग संसार को दिखा सके । इन्होंने ऐसे व्यक्ति और समाज की रचना का प्रयास किया था, जो सच्चाई, समता, प्रेम, भाईचारे और मानवीयता से ओतप्रोत था।
    अनेक प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर पहली बार इनकी समग्र रचनाओं का प्रामाणिक और पूर्ण वैज्ञानिक पाठ-संपादन करके तथा पुनरावृत्ति तथा भ्रमपूर्ण पाठों का निराकरण करते हुए, दादू की मूल रचना का पाठ प्रस्तुत किया गया है । विद्वतजनों के अतिरिक्त सामान्य पाठकों को इनका सृजन सहज बोधगम्य हो सके, इसके लिए भावार्थ और शब्दार्थ भी दिए गए हैं।

    दादू समग्र : 2
    महिमामय व्यक्तित्व और रचनात्मक प्रतिभा से संपन्न निर्गुणपंथी  कवियों में कबीर के पश्चात् दूसरा स्थान संत दादू दयाल का है । स्वयं सक्रिय रचनाशील रहते हुए अपने शिष्यों की रचनात्मक प्रतिभा को आगे बढाने वाले प्रेरक के रूप से उनका विशिष्ट महत्त्व रहा है । इसी कारण से मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के समस्त संप्रदायों में सर्वाधिक रचनाकार दादू-पंथ मेँ हुए थे।
    दादू दयाल की रचनाओं का समग्र एवं प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत करना, अन्य कवियों की अपेक्षा जटिल, समय-साध्य एवं चुनौतीपूर्ण कार्य था। संत-काव्य-मर्मज्ञ डॉ० रजनीश ने 14 वर्षों की निरंतर साधना से विभिन्न स्थानों, दादू-द्वारों और सांस्थानों में जाकर, वहाँ से प्राप्त सर्वाधिक प्राचीन 29 पांडुलिपियों के आधार पर दादू-काव्य का पूर्णिया वैज्ञानिक, मूल एवं विश्वसनीय पाठ प्रस्तुत किया है।
    दादू 'जोग्यन्द्र' की अज्ञात, लुप्तप्राय और अपूर्व रचना 'आदि बोध-सिद्धांत-ग्रंथ' के साथ उनकी अन्य रचनाएँ पहली  बार इसमें दी जा रही हैं। 'समग्र' में समग्रत: पुनरावृत्ति और प्रक्षिप्त साखियों को छाँटकर पाद-टिप्पणियों या अतिरिक्त साखियों के अंतर्गत रखकर, कथ्य द्वार संदर्भ की दृष्टि से उनका उपयुक्त स्थान निर्धारित किया गया है ।
    ग्रंथ की विस्तृत भूमिका और यथार्थपरक विवेचना से अनेक लोक-प्रवादों और भ्रांत धाराओं का निराकरण करते हुए इस प्रस्तुति में दादू के जीवन और रचनाधर्मिता के बारे में नई दिशाएं दी गई हैं।
    जन-सामान्य को दादू दयाल की कविता का मर्म सहज ग्राह्य हो सके, इसके लिए साखियों और पदों के साथ भावार्थ और शब्दार्थ भी दिए गए है, जिससे यह ग्रंथ विद्वानों, सुधी पाठकों और जन-सामान्य के लिए समान रूप से उपयोगी हो गया है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chandrakanta
    Chandrakanta
    250 225

    Item Code: #KGP-716

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चन्द्रकान्ता ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पोशनूल की वापसी', 'आवाज़', 'चुप्पी की धुन', 'पत्थरों के राग', "अलग-अलग इंतजार', 'भीतरी सफाई', 'आत्मबोध', 'सिद्धि का कटरा' , 'लगातार युद्ध' तथा 'रात में सागर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चन्द्रकान्ता की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kirti-Kalash
    Bhanu Pratap Shukla
    125 113

    Item Code: #KGP-9275

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में राजनेताओं, विचारकों, साहित्यकारों, युग-निर्माता महापुरुषों के संस्मरण संकलित हैं। इस पुस्तक की साहित्य में महत्वपूर्ण उपादेयता होगी, क्योंकि संस्मरण के लेखक का व्यक्तित्व बहुआयामीय है। उसकी दृष्टि प्रत्येक संस्मरणदायी व्यक्ति का समग्रता से मूल्यांकन करती है और उन व्यक्तियों के व्यक्तितव के सत्व तक जाती है, न कि सतही ढंग से याद करने की औपचारिकता पूरी करती है। कितने ही अनछुए पक्षों को ये संकलित संस्मरण उजागर करते हैं।
    —संवेदना भूमि से
  • Gulloo Aur Ek Satrangi (Part 4)
    Shrinivas Vats
    300 240

    Item Code: #KGP-9369

    Availability: In stock

    पिछले तीन खंडों पर सुधी पाठकों, विद्वान् समीक्षकों ने ऐसी उत्साहवर्धक बातें कहीं, जिन्हें पढ़-सुनकर मेरा हौसला दुगना बढ़ गया। मैं सहृदयता से उनका आभार प्रकट करता हूँ।
    सतरंगी के सात रंग और उपन्यास के सात खंड। इन सातों खंडों में आपको प्रकाश के सात रंगों की तरह हर बार नया रंग दृष्टिगोचर होगा। जैसे प्रकाश में सात रंग होते हैं वैसे ही साहित्य में नौ रस होते हैं। आप बड़े होकर पढ़ना कि साहित्य के नौ रस कौन से हैं?
    संस्कृत, हिंदी, तमिल, बंगला, मलयालम आदि भाषाओं में रचा गया भारतीय साहित्य इन रसों से भरा हुआ है।
    विष्णु के जीवन में झंझावात तो आते रहे हैं, आगे भी आते रहेंगे। चुलबुला विष्णु उनसे कभी नहीं घबराया, बल्कि हर बार ‘सुपर हीरो’ बनकर उभरा है।
    अंतर्राष्ट्रीय हस्ती होते हुए भी विष्णु को कर्णपुर से बहुत लगाव है। आपकी ही तरह गुल्लू, राधा, विष्णु अपने गाँव, अपने देश को जी-जीन से प्यार करते हैं। सच भी है, भले ही हम चाहे जहाँ रहें अपने प्यारे भारतवर्ष को कभी न भूलें।
    उपन्यास के अगले खंडों में आपको विष्णु के दूसरे अद्भुत साथियों से रूबरू होने का अवसर मिलेगा। तब तक चैथा खंड पढ़ लीजिए। शीघ्र ही शेष खंड भी आपके हाथों में होंगे।

  • Ek Svich Tha Bhopal Mein
    Narendra Nagdev
    215 194

    Item Code: #KGP-379

    Availability: In stock


  • Repartee : Khushwant Singh
    Khushwant Singh
    395 356

    Item Code: #KGP-634

    Availability: In stock

    KHUSHWANT SINGH, India's iconic journalist and writer, whose works secured largest readership in the country, remains an enigma beyond his writings. His immense popularity and connectivity with his readers made him the common man's idol but his real persona remained in wraps. The 'dirty old man' ensconced in a bulb with a wicked grin and a fountain pen in hand was a far cry in real life.
    This collection of interviews and articles attempts to bring to light the real Khushwant as his family and close friends knew him. 
    A man who was constantly surrounded by beautiful women but remained faithfully wedded to his wife Kaval for 62 years  till she passed away, a man who wrote about wine, women and sex, but lived a life more simple and austere than a commoner, a man who was more disciplined in his fitness regime than men even half his age, a person  who wrote more books, articles and columns than any other journalist or writer in this country, and in a language, so simple that the common reader could comprehend. 
    Little do his readers know that the man famous for his jokes, his love for wine and women and his fierce agnosticism, was a great scholar in real life who wrote classics like A History of the Sikhs, taught comparative religion at Princeton University, was a passionate nature lover who wrote books like Nature Watch, was an art critic and had dabbled in sitar and painting at Shantiniketan in his youth.
    Khushwant Singh voiced his opinions openly and spoke his mind fearlessly through his column's for which he was honoured in 1998, with 'Honest Man of the Year Award and later in 2007 with Padma Vibhushan award.
    He remained reticent about his personal life while he lived. It is about time his loyal fans knew who the real Khushwant was.
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Khare (Paperback)
    Vishnu Khare
    80

    Item Code: #KGP-1322

    Availability: In stock

    मैंने जब विष्णु खरे की कविताओं को यह जानने के उद्देश्य से पढ़ना शुरू किया कि उनकी कविता का संसार किन तत्त्वों से बना है तो मुझे अत्यंत स्फूर्तिदायक अनुभव हुआ। एक के बाद एक काफ़ी दूर तक मुझे ऐसी कविताएँ मिलती रहीं जिन्होंने मुझे समकालीन जीवन के त्रासद से लेकर सुखद अनुभव तक से प्रकंपित किया। सबसे अधिक कविताएँ सांप्रदायिकता और फ़ासिस्ट मनोवृत्ति के जोर पकड़ते जाने को लेकर लिखी गई हैं। ‘शिविर में शिशु’ गुजरात के दंगे से संबंधित है, ‘चुनौती’ शीर्षक कविता में धर्म-भावना के ख़तरनाक रूप का संकेत है, ‘न हन्यते’ में दंगाइयों का रोंगटे खड़े कर देने वाला बयान है, ‘गुंग महल’ भी धार्मिक कट्टरता को ही सामने लाती है और ‘हिटलर की वापसी’ शीर्षक कविता जर्मनी की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। विष्णु खरे की ख़ूबी है कि उनकी कविताएँ अधिकांश वामपंथी कवियों की तरह सिर्फ़ जज़्बे का इज़हार नहीं करतीं बल्कि अपने साथ सोच को भी लेकर चलती हैं, जिससे उनमें स्थिति की जटिलता का चित्राण होता है और वे सपाट नहीं रह जातीं।...
    विष्णु खरे की असली कला और उनका तेवर ‘गुंग महल’ शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है, जिसका अंत जितना ही सशक्त है उतना ही कलात्मक--पाठकों को अनुभूति, सोच और कल्पना तीनों ही स्तर पर उत्तेजित करने वाला। ‘विनाशग्रस्त इलाके से एक सीधी टी.वी. रपट’ कविता में टी.वी. रपट शैली में अनुमानतः गुजरात के भूकंप का ज़िक्र है। अंतर्वस्तु की दृष्टि से इसमें भारत के नैतिक विनाश का ऐसा चित्रण है कि एक बार तो यह प्रतीति होती है कि विष्णु खरे हमारे नैतिक विनाश के ही कवि हैं।...
    विष्णु खरे का गहरा लगाव इस देश की साधारण जनता और साधारण जीवन से है, जिसे वे आधुनिक सभ्यता के बड़े परिप्रेक्ष्य में भी रखकर देखते हैं।...इन्हीं साधारण जनों में औरतों को भी गिनना चाहिए। आकस्मिक नहीं कि इस संग्रह में औरतों पर भी तीन-चार बहुत अच्छी कविताएँ हैं। विष्णु खरे का यथार्थ चित्रण इतना गहरा होता है कि उन्हें फैंटेसी में लिखने की कोई जरूरत नहीं। उन्होंने उस गद्य को आवश्यकतानुसार अनेक रूप प्रदान करके उसे ऐसा बना दिया है कि किसी काव्य और कला-मर्मज्ञ को उससे कोई शिकायत न हो।  
    -नंदकिशोर नवल
  • Saryu Se Ganga (Novel) (Paperback)
    Kamlakant Tripathi
    650 520

    Item Code: #KGP-SSG PB

    Availability: In stock

    अठारहवीं शती का उत्तरार्द्ध ऐसा कालखंड है जिसमें देश की सत्ता-संरचना में ईस्ट इंडिया कंपनी का उत्तरोत्तर हस्तक्षेप एक जटिबहुआयामी राजनीतिक-सांस्कृति संक्रमण को जन्म देता है। उसकी व्याप्ति की धमक हमें आज तक सुनाई पड़ती है। सरयू से गंगा उस कालखंड के अंतर्द्वंद्वों का एक बेलौस आईना है। सामान्य नजीवन की अमूर्त हलचलों और ऐतिहासिक घटित के बीच की आवाजाही से प्रचलित विधाओं की परिधि का अतिक्रमण कर एक विशिष्ट विधा की रचना बनाती है।अकारण नहीं कि समें इतिहास स्वयं एक पात्र है और सामान्य एवं विशिष्टमूर्त एवं अमूर्त के तानेबाने को जोड़ता बीच-बीच में स्वयं अपना पक्ष रखता है। इस दृष्टि से ‘सरयू से गंगा  एक कथाकृति के रूप में उस कालखंड के इतिहास की सृजनात्मक पुनर्रचना का उपक्रम भी है।

    सरयू से गंगा’ की कथात्मक उपजीव्य ध्वंस और निर्माण का वह चक् है जो परिवर्तनकामी मानव-चेतना का सहजसामाजिक व्यापार है कथाकृति के रूप में यह संप्रति प्रचलित वैचारिकी के कुहासे को भेदकर चेतना के सामाजिक उन्मेष को मानव-स्वभाव के अंतर्निहित में खोजती है और समय के दुरूह यथार्थ से टकराकर असंभव को संभव बनानेवाली एक महाकाव्यात्मक  गाथा का सृजन करती है।

    फ़ॉर्मूलाबद्ध लेखन से इतरजीवन जैसा है उसे उसी रूप में लेते हुएउसके बीहड़ के बीच से अपनी प्रतनु डंडी बनानेवाले रचनाकार को स्वीकृति और प्रशस्ति से निरपेक्ष होनापड़ता है। लेकिन तभी वह अपने स्वायत्त औज़ारों से सत्य के नूतन आयामों के प्रस्फुटन को संभव बना पाता है। तभी वह वैचारिक यांत्रिकता के बासीपन से मुक्त होकर सही अर्थों में ‘सृजन’ कर पाता है।  सरयू से गंगा   ऐसे ही मुक्त सृजन की ताज़गी से लबरेज़ है। लेखीपतिमामासावित्रीपुरखिन अइयामतईनाई काकाशेख़ चाचाजमीलरज़्ज़ाक औरजहीर जैसे पात्र मनुष्य की जिस जैविक और भावात्मक निष्ठा को अर्घ्य देकर जेय बनाते हैंवह अपने नैरंतर् में कालतीत है। मानवता के नए बिहान की नई किरण भी शायद वहीं कहीं से फूटे।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chitra Mudgal (Paperback)
    Chitra Mudgal
    120

    Item Code: #KGP-7005

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : चित्रा मुद्गल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चित्रा मुद्गल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'गेंद', 'लेन', 'जिनावर', 'जगदंबा बाबू गांव आ रहे हैं', 'भूख', 'प्रेतयोनि', 'बलि', 'दशरथ का वनवास', 'केंचुल' तथा 'बाघ'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चित्रा मुद्गल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash
    Uday Prakash
    395 316

    Item Code: #KGP-904

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma (Paperback)
    Tajendra Sharma
    170

    Item Code: #KGP-441

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : तेजेन्द्र शर्मा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Durg-Bhed
    Deepak Sharma
    50 45

    Item Code: #KGP-9110

    Availability: In stock

    दुर्ग-भेद
    "अजीब संयोग है, आप दोनों ही किसी एक चीज को चाहने और पाने को इतना अधिक महत्व देते है कि अपना सारा अस्तित्व ही उस एक के प्रति अर्पित कर देना चाहते है । पर क्या अपनी शक्तियों व इन्द्रियों को एक ही बिन्दु पर केन्द्रित कर जब आप अपनी परिधि निर्धारित का लेंगे तो अपनी स्वतन्त्रता नहीं खो बैठेंगे ? जब मुक्त गीत आपको पुकारेंगे  तो क्या आप उसी संकीर्ण दुर्ग में बँधे रह पायेंगे ?" "जब उस दुर्ग को अभेद्य व अपारदर्शी बनाए रखने का उत्तरदायित्व ही हमीं पर होगा तो क्यों हम...", "हाँ तो क्यों आप सुमन व सुमन के माता-पिता की तरह उसी प्रकार के लौहगढ़ में बंद नहीं हो जाएँगे, जहाँ निजी स्वार्थी घेरों में कैद आप हर क्रन्दन , हर उत्सव से अछूते , पैसे कमाने के लिए कोरे, रूखे व कठोर चेहरे लिए दिन-रात मेहनत करते चले जाएँगे ।"
    (कहलीं-संग्रह की 'दुर्ग-भेद' काली से)

  • Bhartiya Sanskriti Aur Hindi Pradesh-2
    Ram Vilas Sharma
    750 675

    Item Code: #KGP-842

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  • Lok Ka Avlokan
    Suryakant Nagar
    280 252

    Item Code: #KGP-787

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    प्रस्तुत निबंध-संग्रह में कुछ निबंध सिद्धांतसम्मत, कुछ शोधपरक और कुछ मौलिक हैं । कुछ तो पत्र-पत्रिकाओं में छपे भी हैं और कुछ एकदम नए । किन्तु, सभी लोकगंगा में स्नात हैं, आकंठ डूबे भी । आंचलिकता अथवा क्षेत्रीयता के आग्रह से दूर ये निबंध अपने ढंग से लोक की बातें बयां करते हैं, फिर भी भोजपुरी वर्चस्व से नकार नहीं । लोक का ही चिंतन-मनन, लोक का ही अध्ययन-अनुशीलन और लोक के ही सुख-दुःख का निरूपण इन लोकरंगी निबंधों का वणर्य विषय है । आगे ये 'लोक का अवलोकन' पाठकों को कितना लुभा पायेगा, यह तो उनकी प्रतिक्रियाएं ही बताएंगी । 
  • Grameen Samaj(Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    290

    Item Code: #KGP-206

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  • Amar Ho Gaya Magar
    Ramesh Bedi
    50

    Item Code: #KGP-1197

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  • Maila Darpan
    Moti Bhuvania
    125 113

    Item Code: #KGP-1851

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    मैला दर्पण
    'मैला दर्पण’ कलापारखी मोती भुवानिया का क्या संचयन  है । उनकी कविताओँ में कलाकृतियों जैसे वर्णबिम्बों को भरमार को वजह शायद यही है कि एक लंबे अर्से तक कला की दुनिया से संबद्ध होने के कारण वे कविता में या कहें शब्दों में एक मुकम्मल चित्र की रचना कर डालते है ।  कविता के लिए शब्द चुनते वक्त जैसे वे आकृतियों के रूप चुनते है ।
    'मैला दर्पण’ स्मृति का पुनरख्यान नहीं है । वह एक लंबे 'कैनवस' पर जीवन को संपूर्णता में उकेरने की एक व्यवस्थित कोशिश है । व्यवस्थित इसलिए कि मोती भुवानिया का विचार जगत अनिर्णय से ग्रस्त किसी मोह से लिपटा हुआ नहीं है । वे भरसक खुद को भी तोड़कर-फिर से नए रूप में छोड़ने की ललक से भरे हुए है । नई कविता के उत्कर्ष काल में जिस विविधता का भव्यतापूर्ण रचनात्मक रूप कविताओं में चित्रित हुआ है उसका सौष्ठव अपनै चरम रूप में भुवानिया जी की कविताओं में मिलेगा । यह तो मात्र संयोग है कि 'मैला दर्पण' के उस सौष्ठव में काव्य-भाषा के अब तक प्रचलित रूपों के साथ अद्यतन रूपों की झलक भी मिलेगी । और कहना पडेगा कि एक प्रासंगिक कविता में परंपरा और भविष्य दोनों एकमेक होकर कविता को अगली द