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  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Om Dhingra
    Sudha Om Dhingra
    250 225

    Item Code: #KGP-9378

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ सुधा ओम ढींगरा
    ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से  स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा ओम ढींगरा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘पासवर्ड’, ‘टाॅरनेडो’, ‘बेघर सच’, ‘कमरा नंबर 103’, ‘सूरज क्यों निकलता है?’, ‘क्षितिज से परे...’, ‘वह कोई और थी...’, ‘विकल्प’, ‘अनुगूँज’ तथा ‘काश! ऐसा होता...’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार सुधा ओम ढींगरा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Namvar Hone Ka Arth (Paperback)
    Bharat Yayavar
    225

    Item Code: #KGP-392

    Availability: In stock

    नामवर होने का अर्थ
    प्रस्तुत पुस्तक नामवर सिंह के जीवन एवं साहित्य का एक पाश्र्वचित्र या प्रोफाइल है। इसे सही मायनों में ‘जीवनी’ भी नहीं कहा जा सकता। कोशिश यह रही है कि उनके जीवन एवं साहित्य का एक सामान्य परिचय इस पुस्तक के द्वारा प्रस्तुत हो जाए। इस कोशिश में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह स्वयं नहीं कह सकता। बस निश्चयपूर्वक इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उनके जीवन एवं साहित्य को जानने-समझने का यह मेरा विनम्र प्रयास है।
    बात उस समय की है, जब मैं साहित्य की दुनिया में अपनी आँखें खोल रहा था। यह बीसवीं शताब्दी का आठवाँ दशक था और मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी था। उन्हीं दिनों मैंने नामवर जी की तीन पुस्तकें खरीदीं और पढ़ी थीं-- ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’। इनमें उनकी ‘छायावाद’ पुस्तक मुझे तब बहुत अच्छी लगी थी और आज भी उनकी सभी पुस्तकों में यही मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। 
    1982 ई. की गर्मियों में मैं दिल्ली गया। उन्हीं दिनों एक दिन मुझसे त्रिलोचन जी ने कहा कि नामवर अपने समय के एक समर्थ कवि थे, उनकी कविताओं को खोजकर पुस्तक-रूप में प्रकाशित कीजिए। इन कविताओं की खोज के साथ-साथ तभी मैंने प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने का मन बना लिया था। खोज की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर यह पुस्तक तैयार की।
    मैं यह भी स्पष्टीकरण कर देना चाहता हूँ कि यह पुस्तक एक सहयोगी प्रयास है। इसमें सबसे ज्यादा नामवर जी की विलुप्त रचनाएँ दी गई हैं। उनसे संबंध रखने वाले लेखकों के संस्मरण एवं पत्रों का भी उपयोग इसमें हुआ है। इस सहयोगी प्रयास में जिन लेखकों के वक्तव्य या कथन का इसमें प्रयोग किया गया है, उनके प्रति मैं आभार स्वीकार करता हूँ।
  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    240 216

    Item Code: #KGP-235

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • Amar Shaheedon Ki Amar Kathayen
    Shyam Lal
    50

    Item Code: #KGP-969

    Availability: In stock


  • Interview (Hindi Interviews)
    Majda Asad
    60 54

    Item Code: #KGP-2022

    Availability: In stock

    इंटरव्यू
    इस किताब में इंटरव्यू विधा, उसके विकास और विभिन्न व्यक्तियों से वार्तालाप को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है ।
    लेखिका ने बातचीत के माध्यम से विभिन्न वर्गों के विशिष्ट व्यक्तियों से साक्षात्कार कराया है । प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ-साथ समाज-सेवा से लगे सामान्य व्यक्तियों की विशेषताओं का निरूपण किया गया है । राजनीति, साहित्य, कला और समाज-सेवा से संबंधित व्यक्तियों के इंटरव्यू लिये गये हैं । उपराष्ट्रपति, केन्दीय मंत्री, साहित्यकार, संगीताचार्य, गाइड और रसोइया एक साथ नजर आते हैं । इन सबसे बडे आत्मीय ढंग से बातचीत कर इनके व्यक्तित्व को बहुत सहज ढंग से उजागर किया गया है । यह भी स्पष्ट रूप से बताया है कि अपनी-अपनी जगह पर हर व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है और समाज में अपना विशेष स्थान रखता है । यह पुस्तक दो हिस्सों में विभाजित है । पहले खंड में व्यक्तिगत इंटरव्यू है । दूसरे में विषयगत, जिसके अन्तर्गत किसी एक विषय पर अनेक व्यक्तियों से बातचीत कर उनके विचार प्रस्तुत किये गये हैं । सन् 1971 से लेकर 1991 तक लिये गये इंटरव्यू यहाँ संकलित है । इनमें से अधिकांश समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं । बातचीत के दौरान व्यक्तित्व तो उभरा ही, साथ ही बहुत-से रोचक प्रसंग भी उभरकर सामने आये हैं जो पाठको के लिए उपयोगी और प्रेरणादायक सिद्ध होंगे ।  यह पुस्तक अपने ढंग का अनूठा प्रयास है । इंटरव्यू विधा में अपना विशेष स्थान रखती है । पाठको द्वारा इसका स्वागत होगा ।
  • Varanch
    Raj Kumar Gautam
    50 45

    Item Code: #KGP-2090

    Availability: In stock

    वरंच
    यदि ध्यान से देखा जाये तो हमारा समकालीन जीवन बहुविध विडम्बनाओं से भरा हुआ है । सुबह हाथ-मुँह धोने से लेकर रात-गये बिस्तर पकड़ने तक हम उन विडम्बनाओं से गुजरते है और अगर संवेदनक्षम हुए तो उन्हें महसूस भी करते है।  लेकिन बावजूद इस सबके हम उन तमाम सामाजिक, आर्थिक सांस्कृतिक और राजनीतिक मूल्यों क्रा विश्लेषण नहीं कर पाते जो उनके कारण स्वरूप हैं अथवा व्यंग्यात्मक स्थितियों का निर्माण करते हैं। वरंच में संगृहीत इन व्यंग्य कथाओं  को इसी नजरिये से पढा जाना अपेक्षित है ।
    सुपरिचित साहित्यकार राजकुमार गौतम के ये व्यंग्य-रचनाएँ शहरी मध्यवर्ग के जिस वेतनभोगी संसार को हम पर खोलती है, उसकी त्रासदी को महज उसी तक सीमित रहकर नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसके लिए उसके बाहर आना होगा; क्योंकि उसके अंतर्सूत्र समूचे समाज में गूँथे हुए है । राजकुमार गौतम बहुत सहज भाव से इस सच्चाई की ओर संकेत करते चलते हैं । वे इन सूत्रों को एक ऐसी भाषा-शैली में उजागर करते है जो हमें अनायास ही हमारे साक्षात्कार तक पहुँचाने में समर्थ है ।
    साहित्य, कला, संस्कृति तथा अन्याय दृश्य-विधाओं की विसंगतियों की कोख से उपजी ये व्यंग्य-कथाएँ अपने लहजे में तो अनूठी हैं ही भाषा के स्तर पर भी परिपक्व हैं। व्यंग्यकार के इस प्रयास में पाठक को मानो वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है जो बरसों से उसके मन में कहीं उमड़-घुमड़ रहा होता है । पाठक तथा लेखक की यह 'परस्परता' ही इस व्यंग्य-संकलन के एक और उपलब्धि कही जा सकती है ।
  • 20-Best Stories From China (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7199

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Chinese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup 
    of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Taoist Novice, Chang And Cheng, Supernatural Wife, Taoist Priest, Man Thrown In A Well, Rat Wife, this book is a compilation of 20 famous Chinese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from China.
  • Sine Sitaron Ke Anchhuye Prasang
    Sheela Jhunjhunwala
    200 180

    Item Code: #KGP-69

    Availability: In stock


  • Hamare Prerna Srot
    Sharan
    170 153

    Item Code: #KGP-955

    Availability: In stock

    हमारे प्रेरणा-स्रोत
    प्रस्तुत पुस्तक उन महापुरुषों के श्रेष्ठ विचारों व उत्तम आचरण का जीता-जागता प्रमाण हैं, जिन्होंने उच्च विचारों के लिए सादा जीवन बिताना परमावश्यक समझा । उनका खान-पान, रहन-सहन तो सादा था, पर विचार बहुत ऊँचे थे । आचरण महान् था । वास्तव में अगर जीवन में सादगी है, छल-कपट, लोभ, मोह, झूठ और रिश्वतखोरी से हम दूर हैं तो हमारा मन-मस्तिष्क स्थिर होगा, उसमें नए-नए सुंदर व उच्च विचार पैदा होंगे । यदि हम विलासिता की ओर दौड़ेंगे तो हमारा जीवन बनावटी हो जाएगा । हम सदैव हो अनुचित ढंग से धन व पद पाने की लालसा रखेंगे । सहयोग, सहानुभूति और राष्ट्र-प्रेम की भावना का हमारे अंदर अभाव हो जाएगा । आशा है, पाठकों को यह कृति पसंद आएगी और इससे उन्हें अपना जीवन संवारने में सफ़लता मिलेगी ।

  • Naav Doobne Se Nahin Darati
    Leena Malhotra
    200 180

    Item Code: #KGP-423

    Availability: In stock

    कभी-कभी तो ऐसा लगता है, प्रगतिशील कवियों ने बात-बात पर तन जाने वाली जो बेटियाँ साहित्य को दीं, बड़ी होकर वे सब लीना-जैसी (मीठी फटकार लगाने और सात्त्विक आक्रोश दिखाने में निपुण) स्त्री-कवि बन गईं। 
    लीना और फटकार? एक झलक में बात बनती नहीं जान पड़ती! इतनी संजीदा लड़की और फटकार? ये तो भरमुँह किसी से बोलतीं भी नहीं। ये नहीं बोलतीं पर इनकी कविताएँ तो बोलती हैं न-आपके मन पर पड़ी सब चट्टानों की आखिरी परत तक से इनका दो-टूक संवाद हो जाता है, और उनकी फॉसिलों में दबके पड़े स्नेह के सोते एकदम से फूट जाते हैं। 
    एक महीन अर्थ में प्रायः सारी कविताएँ राजनीतिक हैं-हर अन्याय को तमाशे की तरह देखते, आपके ही भीतर छुपे उस टुच्चे आदमी को धता बतातीं कविताएँ जिसे एक प्रगतिसिद्ध कवि बरजता रहा था: कभी अभिधा, कभी व्यंजना, कभी लक्षणा में! लीना में व्यंजना का स्वर अधिक प्रबल है और सबसे बड़ी बात ये है कि शायद ही कहीं वे इकहरी होती हैं! लीना-जैसी सांद्र ऐंद्रिकता की प्रेम- कविताएँ भी कम ही स्त्री-कवियों ने लिखी हैं। स्त्री-नागरिकता और स्त्री-फैंटेसी के अनेक रंग आपको इस संग्रह में एक साथ मिलेंगे।  
    -अनामिका
  • Katha Samay : Srijan Aur Vimarsh
    Shashi Kala Rai
    245 221

    Item Code: #KGP-905

    Availability: In stock


  • Antarctica Abhiyan
    Hridya Nath Dutta
    425 383

    Item Code: #KGP-891

    Availability: In stock

    अंटार्कटिका अभियान
    हमारी पृथ्वी असंख्य रत्नों और अनेक रहस्यों से भरी हुई है । प्रकृति ने भी इसे सजाने-सँवारने के लिए अनुपम सौंदर्य लुटाया है । इंसान हमेशा से ही पृथ्वी के रहस्यों से पर्दा उठाने के लिए प्रयत्नशील रहा है । अपने ज्ञान में वृद्धि के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का अपने हित में अधिक से अधिक दोहन भी इसका मूल कारण है । बरक्स इसके पृथ्वी का एक बहुत बड़ा भाग अब भी इंसान के द्वारा पूरी तरह जाना-समझा नहीं गया है । अंटार्कटिका क्षेत्र भी उन्हीं भागों में से एक है ।
    कहने की ज़रूरत नहीं कि अंटार्कटिका एक ऐसा भूभाग है, जो अपने अद्भुत सौंदर्य, स्वच्छ वातावरण, शुद्ध जल के अकूत  भंडार की वजह से हमेशा से वैज्ञानिको और पर्यावरणविदों के आकर्षण का केंद्र रहा है । समय-समय पर पूरे विश्व से वैज्ञानिको के दल वहां जाकर शोध और अध्ययन करते रहते है । कई देशों ने वहाँ अपने स्टेशन भी स्थापित किए हैं । गर्व की बात है कि इस मुहिम से भारत भी किसी से पीछे नहीं है ।
    भारतीय वैज्ञानिकों के अनेक दल कई बार अंटार्कटिका जाकर यहीं के वातावरण पर शोध करते रहे है । ऐसे ही अंटार्कटिका अभियान दलों में तीन बार डॉ० हृदयनाथ दत्ता और दो बार डॉ० जसवंत सिंह भी शामिल होकर कई शोध-कार्यों में हिस्सा ले चुके है । लगभग दो वर्ष पूर्व उन्होंने अपनी उन अद्भुत यात्राओं के संस्मरणों को पुस्तकाकार में प्रकाशित करने की इच्छा जाहिर की; लेकिन उनका कहना था कि वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यों और वहाँ की विशेषताओं को उन्होंने लिपिबद्ध तो कर दिया है, लेकिन पुस्तक के रूप में आने से पहले इसके संपादन की आवश्यकता है । फलस्वरूप यह जिम्मेदारी उन्होंने मुझे सोप दी । पुस्तक के संपादन के दौरान मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि इसमें वैज्ञानिकता के साथ ही रोचकता भी बनी रहे । इस प्रयत्न में मैं कहाँ तक सफल हुआ यह तो पाठक ही तय करेंगे, लेकिन इतना निश्चित है कि यह पुस्तक अंटार्कटिका को जानने-समझने और उससे जुडे असंख्य रोचक तथ्यों से परिचित कराएगी । साथ ही भविष्य में उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय खतरों के प्रति आगाह भी करेगी ।
  • Goswami Tulsidas
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-138

    Availability: In stock

    तुलसीदास विश्व-काव्य गगन के प्रभावान नक्षत्र हैं । उनका काव्य 'स्वान्त: सुखाय' रचा गया है किंतु उससे संपूर्ण समाज का हित होता है । राम की कीर्ति का गान तुलसी ने जिस श्रद्धा और भक्ति के साथ किया है, उसका वर्णन अन्य किसी कवि ने नहीं किया है ।
    संस्कृत और ठेठ अवधी दोनों को मिलाकर तुलसी ने अपनी कृति 'रामचरितमानस' में अनूठा प्रयोग किया है । उनकी भाषा में लोकोक्तियों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। अब तक तुलसी के 'मानस' का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है ।
    भारतीय जनमानस के हृदय में राम के प्रति अपूर्व भक्ति और श्रद्घा उत्पन्न कर जनमानस के साथ तुलसी ने बहुत बडा उपकार किया है । उनकी यह कृति विश्व की अन्य काव्यकृतियों में सर्वोत्तम स्थान रखती है ।
    'रामचरितमानस' भारतीय जनता का कंठहार बना हुआ है। यह महाकाव्य विद्वानों और अल्पशिक्षितों को समान रूप से प्रिय है।
    यह ग्रंथ हमारी श्रद्धा और भक्ति का अनुपम प्रसाद है।

  • Meethi Neem
    Chandrika Prasad Sharma
    550 495

    Item Code: #KGP-720

    Availability: In stock


  • Hansi Oth Per Aankhen Nam Hain
    Ramdarash Mishra
    75 68

    Item Code: #KGP-9039

    Availability: In stock

    मेरी समग्र ग़ज़लें यहाँ रचना-तिथि के क्रम से दी जा रही है । शुरू की ग़ज़लों पर मैंने रचना-तिथि नहीं लिखी थी अत: यहाँ अनुमान से उनके रचना-वर्ष का उल्लेख कर दिया गया है । कुछ पूर्व प्रकाशित ग़ज़लों को रूप की दृष्टि से फिर तराशा है ।
    ये ग़ज़लें शास्त्रीय दृष्टि से कैसी है यह तो ग़ज़ल-शास्त्री ही जाने किन्तु मुझे विश्वास है कि कविता के पाठकों को इनमें कविता जरूर मिलेगी । मुझे इनके द्वारा अपने अनुभवों को व्यक्त करने में एक अलग तरह की तृप्ति मिली है । मेरी तृप्ति यदि पाठकों क्रो तृप्ति बन सकेगी तो अधिक सार्थक होगी ।
  • She (Stories)
    Dixy Gandhi
    425 383

    Item Code: #KGP-783

    Availability: In stock

    A first ever collection of stories centered around Women’s lives in Modern Times
    Society in modern times is changing very fast, and so is changing the situation and role of women in facing and dealing with them. With the expansion of education among them, they are taking things with gusto and intelligence, at times coming out with unexpected results. Their understanding is different, approach is different and what they present is also not only engrossing but also enlightening.
    It is time women wrote with themselves at the centre of happenings and here is perhaps the first such collection of exciting stories by the upcoming author Dixy Gandhi who shows great promise and quality.

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Jainendra Kumar
    Jainendra Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-2070

    Availability: In stock

    जैनेन्द्र कुमार

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फांसी', 'पाजेब, 'फोटोग्राफी', 'मास्टर जी', 'अपना-अपना भाग्य', 'जाह्नवी', 'एक रात', 'साधु की हठ', 'नीलम देश की राजकन्या' तथा 'चलित-चित'  ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक जैनेन्द्र कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Baba Shekh Fareed
    Jainendra Kumar
    120 108

    Item Code: #KGP-367

    Availability: In stock


  • Dainik Jeevan Mein Ayurveda (Paperback)
    Vinod Verma
    240

    Item Code: #KGP-26

    Availability: In stock

    दुर्भाग्य की बात है कि आयुर्वेद का असीमित ज्ञान इस देश की संचालन-व्यवस्था में समुचित प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आयुर्वेद के विकास तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। हमारी शासन-व्यवस्था भी इस ओर उदासीन रही। आयुर्वेद को ‘देशी’ कहकर उपेक्षित कर दिया गया। किंतु आज जिस नए युग का प्रारंभ हो रहा है उसमें हमारा पुनर्जागरण सुनिचित है जिसमें हमें आभास होगा कि जिसे हमारे देशवासियों ने ‘देशी’ कहकर त्याग दिया था उसी को विदेशी लोग अच्छे आवरण में डालकर हमें बेच रहे हैं। ‘दादी मां’ की परंपरा अर्थात् आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान, जो हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है, उसे हमारी शिक्षा-प्रणाली में सम्मिलित किया जाय। इस दृष्टि से स्कूलों तथा मेडिकल काॅलेजों के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के कुछ महत्वपूर्ण अंश पढ़ाए तथा सिखाए जाने चाहिए। आयुर्वेद के जिज्ञासुओं और अनुसंधित्सुओं के लिए उपयोगी जानकारी देने और तत्संबंधी अज्ञान को दूर करने में सहायक प्रस्तुत ग्रंथ इस विषय की विदुषी सुश्री विनोद वर्मा की अनूठी कृति है।
  • Hindi Vyakaran : Ek Navin Drishticon
    Kavita Kumar
    550 440

    Item Code: #KGP-65

    Availability: In stock

    यह पुस्तक सामान्य विद्यार्थियों की सामान्य समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण व्याकरण को छोटी-छोटी इकाइयों-भाषा-ढांचों-में विभाजित करके सुगम, सुबोध एवं सामान्य भाषा में प्रस्तुत करने का एक छोटा-सा प्रयास है। एक शुष्क विषय को रेखाचित्रण द्वारा सजीव व आकर्षक बनाकर, यथासंभव व्याकरणिक पारिभाषिक शब्दावली का कम से कम प्रयोग, आवश्यकतानुसार पुस्तक में स्थान-स्थान पर वर्तनी तथा विराम चिह्नों के प्रयोग संबंधी निर्देश, वाक्य-रचना पर विशेष ध्यान एवं प्रत्येक व्याकरणिक बिंदु पर प्रचुर उदाहरणों सहित प्रस्तुतीकरण इस पुस्तक की विशिष्टता है।
    -कविता कुमार
  • Sikh Dharma Darshan Ke Mool Tattva
    Satayendra Pal Singh
    195 176

    Item Code: #KGP-305

    Availability: In stock

    सिख धर्म दर्शन के मूल तत्त्व
    सदियों से भ्रमित समाज को परमात्मा से मिलन का एक सरल और सहज मार्ग दिखाकर सिख गुरु साहिबान ने धर्म की एक अभिनव दृष्टि प्रदान की। जीवन को विनम्रता, प्रेम, सेवा, समर्पण और संतुष्टि का पर्याय बनाने, परमात्मा के हुक्म के अधीन चलने का संदेश दिया। इससे समाज में अद्भुत चेतना जाग्रत हुई और शोषित, पीड़ित हृदयों में आशा का प्रकाश भर उठा। सिख गुरु साहिबान द्वारा बताया गया मार्ग जितना सरल है उतना ही कठिन भी है।
    उस मार्ग की सरलता और सहजता क्या है और कैसे साहस व समर्पण की आवश्यकता है, इसका उत्तर खोजने के लिए इस पुस्तक का आद्योपांत पठन अपरिहार्य है।
    सिख धर्म दर्शन पर हिंदी में मूल रूप से लिखी गई यह पहली पुस्तक है, जो धर्म के मर्म तक ले जाती है और उसे अपनाने हेतु प्रेरित करती है।
  • Japan Mein Kuchh Din
    Krishna Dutt Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-1926

    Availability: In stock

    जापान में कुछ दिन
    हर यात्रा का अपना एक परिवेश होता है और तनाव । मुझे यात्रा-भीरु ही समझिए । घर से देश-विदेश तो जाता हूँ, लेकिन विवशता में । बिना गए काम नहीं चल सकता । चल पड़ने पर भय और न जाने कैसी-कैसी चिंताएँ !
    तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरैन स्टडीज़, जापान में विजिटिंग प्रोफेसर होकर गया । यहीं तरह-तरह के नवीन जीवनानुभव । विकसित देश में उत्तर-आधुनिक समाज की दमक ।
    काफी समय के बाद मन की उथल-पुथल को शांत करने के लिए 'डायरी' लिखना शुरू किया । इस 'डायरी' में यात्रावृत्त, संस्मरण, रिपोर्ताज-सब कुछ रिल…मिल गया । विधा का बंधन अपने आप भंग हो गया । यहाँ कई विधाओं की मिलावट के कारण मेरी अंतःप्रक्रियाएं अनेक आत्मबिंबों में उभरती मिलेंगी ।
    इस अंतर्यात्रा के आप सहचर बनें, इस भरोसे के साथ 'जापान में कुछ दिन' आपको सौंप रहा हूँ।
    -कृष्णदत्त पालीवाल
  • Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap
    Madan Kashyap
    150 135

    Item Code: #KGP-225

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : मदन कश्यप
    'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीं रहते, उसमें पैठते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते हैं और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते हैं ।‘
    'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
    'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृजनात्मक उपयोग करते हैं ।'
    'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'
  • Yatrayen (Paperback)
    Himanshu Joshi
    60

    Item Code: #KGP-7066

    Availability: In stock

    यात्राएँ
    कहानियों, उपन्यासों की तरह हिमांशु जोशी के यात्रा-वृत्तांतों  की भी अपनी विशेषता है। पढ़ते-पढ़ते पाठक को कहीं लगने लगता है कि इन यात्राओं में लेखक के साथ-साथ वह भी यात्रा कर रहा है । लेखक जिस तरह से इन सबको देख रहा है, जिस तरह की अनुभूति उसे हो रही है, कुछ-कुछ वैसी ही उसे भी होने लगती है । सरलता, सहजता, स्वाभाविकता हिमांशु जोशी की रचनाओं के सहज, स्वाभाविक गुण हैं । संभवत: ये ही मूल गुण किसी रचना को जीवंत बनाने में सफल होते है ।
    इन यात्राओं से कश्मीर के बर्फीले दुर्गम सीमा-क्षेत्र शामिल हैं तो पूर्व में बाँग्लादेश और भारत को विभाजित करती सुदूर हरित वंगा या इच्छामती के कूल-कगार भी । कहीं कन्याकुमारी तथा केरल की मनोरम हरित दुश्यावलियाँ हैं तो कुमाऊँ के पर्वतीय प्रदेश की अनेक अज्ञात, अछूती मनोरम झाँकियाँ भी। मॉरिशस का नीलवर्णी निर्मल स्वच्छ सागर है कहीं तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश की हिमशीतल सफेद हवाएँ भी अपने अस्तित्व का अहसास जताने लगती है । हिमांशु जोशी संभवत: वह हिंदी के पहले लेखक है, जिन्होंने विश्वविख्यात नाटककार हैनरिक इब्सन के घर सीयन की साहित्यिक यात्रा की थी । उसी तरह नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नार्वेजियन लेखक सीगरी उनसत तथा ब्यौर्नसन के घरों की तीर्थयात्राएँ भी।
    ये यात्रा-विवरण मात्र यात्रा के विवरण ही नहीं, कहीं इनमें  इतिहास भी है, भूगोल के साथ-साथ साहित्य भी । कला एवं संस्कृति की मार्मिक छुअन भी। इसीलिए ये वृतांत कहीं  दस्तावेज भी बन गए हैँ-जीए हुए अतीत के। पाठको को इनसे एक संपूर्ण जीवन का अहसास होने लगता है। एक साथ वह बहुत कुछ ग्रहण करने में सफल होता है-शायद यह भी इन वृत्तात्तों की एक सबसे बडी सफलता है ।
  • Hi ! Handsome (Paperback)
    Jaivardhan
    50

    Item Code: #KGP-7056

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 
  • Mere Saakshatkaar : Shyam Singh Shashi
    Shyam Singh Shashi
    300 255

    Item Code: #KGP-581

    Availability: In stock


  • Panchtantra Ke Natak
    Shri Prasad
    125 113

    Item Code: #KGP-316

    Availability: In stock


  • Satya Ke Prayog
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    350 315

    Item Code: #KGP-9055

    Availability: In stock


  • Hriday Ka Kaanta
    Tejrani Dixit
    300 255

    Item Code: #KGP-695

    Availability: In stock

    पंडित सूर्यनारायण जी दीक्षित, एम. ए., अपने जीवन के प्रभात-काल में हिंदी के प्रेमी रहे हैं। कुमारी तेजरानी जी उनकी सुपुत्री हैं। कुमारी जी की प्रतिभा का फल-स्वरूप ‘हृदय का कांटा’ हमारे सामने प्रस्तुत है।
    जहां तक हमें ज्ञात है कुमारी जी पहली स्त्री-रत्न हैं जिन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी में मौलिक उपन्यास लिखा है। आपसे हिंदी के पाठक एकदम अपरिचित नहीं हैं। समय-समय पर आपकी लिखी हुई कहानियां पाठकों के सामने आती रही हैं और पाठकों ने उनका आदर भी किया है। परंतु ‘हृदय का कांटा’ से कुमारी जी का स्थान साहित्य-जगत् से निश्चित और सुरक्षित हो जाता है।
    ‘हृदय का कांटा’ का प्लाट साधारण है। कई गार्हस्थ्य उपन्यासों से कथा मिलती-जुलती है। फिर भी हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि उपन्यास मौलिक है। इस प्रकार के अन्य उपन्यासों से इसमें एक विशेषता यह है कि जहां और उपन्यास आदि से लेकर अंत तक भाव-प्रधान हैं, वहां प्रस्तुत उपन्यास की धरा भाव के भंवर से कर्म के समुद्र की ओर बहती है।
    उपन्यास में सामाजिक कुरीतियों का प्रदर्शन भलीभांति किया गया है और यह दिखाने की चेष्टा की गई है कि गार्हस्थ्य जीवन की अनेक अशुभ घटनाओं का कारण सामाजिक कुरीतियां हैं।
    ‘प्रतिभा’ के चरित्र में अस्वाभाविकता की जरा सी झलक आ गई है। उसका कारण यह है कि कुमारी जी ने उपन्यास में हमारे सम्मुख स्त्री-जाति का आदर्श रखने का प्रयत्न किया है और इसी से स्त्री-जाति की अनेक मानवीय प्रवृत्तियों का दमन करना पड़ा है। परंतु जहां हम प्रतिभा के चरित्रा में कुछ अमानवीय देवीत्व पाते हैं, वहां ‘मालती’ और ‘महेश’ के संबंध का विकास और उसकी निस्सारता का चित्रण बहुत ही मर्मस्पर्शी, रोचक और स्वाभाविक है। कुमारी जी की प्रतिभा का वास्तविक परिचय हमें यहीं पर मिलता है।
    उपन्यास मंजी हुई लेखनी का लिखा हुआ न होने पर भी हमें कुमारी जी की प्रतिभा तथा वेदनापूर्ण सहृदयता का पर्याप्त परिचय कराता है। हमारा विचार है कि किसी भी लेखक या लेखिका का पहले-पहल ऐसा उपन्यास लिखना उसके लिए गौरव की बात होगी।
    हमें कुमारी जी से हिंदी साहित्य-सेवा की बहुत कुछ आशा है और विश्वास है कि आप निरंतर कुछ न कुछ लिखती रहेंगी।
    —बंशीधर, एम. ए.
    [सरस्वती (पत्रिका) : मार्च 1929 (फाल्गुन 1985), भाग 30, खंड 1, संख्या 3, पूर्ण संख्या 151, पृ. 346]
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Rao (Paperback)
    Rajendra Rao
    150

    Item Code: #KGP-503

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजेन्द्र राव
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र राव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उत्तराधिकार', 'लोकी का तेल', 'अमर नहीं यह प्यार', 'वैदिक हिंसा', 'बाकी इतिहास', 'घुसपेट','छिन्नमस्ता' 'असत्य के प्रयोग', 'शिफ्ट' तथा 'नौसिखिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजेन्द्र राव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Hindi Natya-Kavya : Punarmoolyankan
    Hukum Chand Rajpal
    250 225

    Item Code: #KGP-856

    Availability: In stock

    हिन्दी नाट्य-काव्य: पुनर्मूल्यांकन
    प्रस्तुत आलोचना-ग्रंथ में लेखक ने ‘अंधायुग’, ‘संशय की एक रात’, ‘एक कण्ठ विषपायी’ तथा ‘एक प्रश्न मृत्यु’ सरीखी कृतियों के रूपाकार-विधा की चर्चा सविस्तार की है। ऐसी रचनाओं को एक साथ प्रबंध-काव्य, नाटक, गीति नाट्य, पद्य नाटक, काव्य नाटक तथा नाट्य-काव्य आदि नामों से विवेचित-विश्लेषित करना विचित्र प्रतीत होता है। लेखक ने नाट्य-काव्य विधा की सैद्धान्तिक चर्चा करते हुए कविता और नाटक दोनों विधाओं के सुमेल पर आधारित इस नवीन एवं सार्थक विधा की प्रतिष्ठा करने का प्रयास किया है। उनका मानना है कि ऐसी रचनाएँ कोई स्थापित कवि ही कर सकता है, जिसे नाटकीय विधान की सही समझ हो। इसमें दोनों साहित्य-विधाओं की सम्यक् एवं सहज प्रस्तुति अपेक्षित है। यही कारण है कि धर्मवीर भारती को इस विशिष्ट विधा का प्रथम सफल रचनाकार स्वीकार किया गया है। लेखक की स्पष्ट धारणा है कि ऐसी कृतियाँ एक विशिष्ट मानसिकता पर आधारित होती हैं—इनकी रचना-प्रक्रिया के अनेक सोपान एवं पड़ाव होते हैं—काव्यात्मकता इसका मूलाधार है तथा नाटकीयता इसका बाह्य विधान। ये इसे अधिक ग्राह्य एवं प्रभावोत्पादक बनाते हैं। इस ग्रंथ में पहली बार नाट्य-काव्य, संश्लिष्ट नाट्य-काव्य (लम्बी कविता) और रंग-काव्य सरीखी रचनाओं के अन्तर्सम्बन्धों को सोदाहरण रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। अपनी धारणाओं-स्थापनाओं को प्रामाणिक-तार्किक आधार प्रदान करने हेतु शोध-प्रविधि के नियमों की सटीक प्रस्तुति के साथ ही इस विधा के सभी विद्वानों की चर्चा यथास्थान की गई है। लेखक की विशिष्टता इस बात में है कि वे स्थापित समीक्षकों के साथ ही नवोदित रचनाधर्मियों का उल्लेख एवं उन्हें महत्त्व प्रदान करने में उदार रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि इस ग्रंथ से इस विवादास्पद विधा को सही धरातल पर समझने का मार्ग प्रशस्त होगा। 
  • Chune Huye Nibandh
    Hazari Prasad Dwivedi
    195 176

    Item Code: #KGP-850

    Availability: In stock


  • Charitraheen
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    400 360

    Item Code: #KGP-878

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sanjeev
    Sanjeev
    200 180

    Item Code: #KGP-665

    Availability: In stock

    कहानियों सें विषयों के व्यापक शोध, अनुभव के संदर्भ, समसामयिक प्रसंग और प्रश्न तथा पठनीय वृत्तांतों का संयुक्त एव सार्वजनिक संसार ही संजीव की कहानियाँ चुनता-बुनता है। इन कथाओं की सविस्तार प्रस्तुति से अभिव्यक्त समाहार का अवदान इस कथाकार को उल्लेख्य बनाता है। घटनाओं की क्रीड़ास्थली बनाकर कहानी को पठनीय बनाने में इस कहानीकार की विशेष रुचि नहीं होती बल्कि यह ऐसे सारपूर्ण कथानक की सुसज्जा में पाठक को ले जाता है, जहाँ समकालीन जीवन का जटिल और क्रूर यथार्थ है तथा पारंपरिक कथाभूमि की निरूपणता और अतिक्रमणता भी । यथार्थ के अमंगल ग्रह को, पढ़वा लेने की साहिबी इस कथाकार को सहज ही प्राप्त है, जिसे इस संग्रह की कहानियों में साक्षात् अनुभव किया जा सकता है ।
    प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।
    संजीव द्वारा स्वयं चुनी गई ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं- 'अपराध', 'टीस', 'प्रेत-मुक्ति' 'पुन्नी माटी', 'ऑपरेशन जोनाकी', 'प्रेरणास्रोत', 'सागर सीमांत', 'आरोहण', 'नस्ल' तथा 'मानपत्र' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रहीं 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कया-संग्रह को दसवें 'आर्य स्मृति साहित्य सम्मान' (16 दिसंबर, 2003) के अवसर पर विशेष सम्मान के साथ प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन से कभी भी तलाशा जा सकेगा।
  • Rajneeti Ki Shatranj
    Shanta Kumar
    375 338

    Item Code: #KGP-107

    Availability: In stock

    राजनीति की शतरंज
    मुख्यमंत्री-पद छोड़ने के बाद मेरा मन भरा हुआ था । ढाई साल की छोटी-सी अवधि में इतनी घटनाएं घटी थीं, इतने मीठे-कड़वे अनुभव प्राप्त किए थे कि वह एक अधूरे सफर की पूरी कहानी बन गई थी  ।
    लंबी सोच के बाद मैंने निर्णय किया कि मुझे पुस्तक लिखनी चाहिए । ढ़ाई साल में मैंने मूल्यवान अनुभव प्राप्त किए । एक असाधारण संघर्ष से गुजारा । कुछ अच्छे काम किए । गलतियां कीं । वे सारे अनुभव मेरे निजी नहीं हैं । वे समाज की संपत्ति हैं । एक राजनीतिक व्यक्ति उन्हें अपने तक रख सकता था, परंतु एक लेखक ऐसा नहीं कर सकता था । लेखक को ऐसा करने का अधिकार भी नहीं है ।
    इस पुस्तक को पाठक एक राजनीतिक व्यक्ति के संस्मरण ही न समझे । एक लेखक जीवन के लंबे  सफर में संयोग से या भूल से सत्ता की राजनीति की संकरी गली में चला गया था । वहीं जो देखा, पाया, खोया व अनुभव किया, वह उसके अंतर में उमड़ता-घुमड़ता रहा । मेरा लेखक उस सबको छिपा कर या दबाकर रख ही नहीं सकता था। मेरे ये संस्मरण-ये अनुभव समाज के हैं और मैं समाज को ही इन्हें अर्पित कर रहा हूँ।
  • Rajendra Yadav Ne Jyoti Kumari Ko Bataye Swastha Vyakti Ke Beemar Vichar
    Rajendra Yadav
    290 261

    Item Code: #KGP-838

    Availability: In stock

    राजेन्द्र यादव ने ज्योति कुमारी को बताए स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार 
    लेखक के अनुसार यह पुस्तक इस अर्थ में विलक्षण है कि न तो यह आत्मकथा है, न आत्मवृत्त और न ही संस्मरणों का संकलन । तीन महीने बिस्तर पर निष्क्रिय पड़े रहने के दौरान जो कुछ उल-जलूल असंबद्ध तरीके से दिमाग में आता गया उसे ही कागज पर उतारने की कोशिश है । कोई भूला हुआ क्षण, गूंजता हुआ अनुभव या संपर्क में आए किसी का व्यक्तित्व । अंग्रेजी में ऐसे लेखन को रैम्बलिंग कहते हैं । हिंदी में शायद इसे भटकाव कहेंगे । बिना किसी सूत्र का सहारा लिए जहाँ मन हुआ वहां टहल आना । इस तरह की किसी और किताब का ध्यान सहसा नहीं आता । सब कुछ जो लिखा गया है बहुत तार्किक, सुसंबद्ध और विचारपक्व है ।
  • Mannu Bhandari : Srijan Ke Shikhar
    Sudha Arora
    550 495

    Item Code: #KGP-801

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी : सृजन के शिखर
    हिन्दी साहित्य का समृद्ध करने में जिन कथा-लेखिकाओं  का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, मन्नू भंडारी उनमें एक अग्रणी नाम हैं । पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय मन्नू भंडारी हिंदी भाषा के साथ-साथ अनेक देशी-विदेश भाषाओं में एक से आदर-सम्मान के साथ पढी जाने वाली रचनाकार हैं ।
    मन्नू भंडारी के दो उपन्यास 'आपका बंटी' और  'महाभोज' हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर और सृजनात्मकता शिखर पर प्रतिष्ठित हैं । ये दोनों  उपन्यास अपने समय से आगे की कहानी कहत्ते और एक लंबे कालखंड का सच होने के कारण कालजयी उपन्यास, की श्रेणी में आते हैं ।
    मीडिया लेखन में भी मन्नू जी की पटकथाओं ने और  धारावाहिकों में 'रजनी' ने अपनी धाक जमाई । मन्नू  जी  व्यक्तित्व व रचनात्मक पक्ष  सभी कोणों का इस  पुस्तक में विश्लेषण है।
    एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी मन्नू जी का जीवन एक दृढ़ और जिजीविषा की अद्भुत  मिसाल हैं । हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में पहले एक पग्म स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं. जो पहली  ही मुलाकात में आपका बनावट आया दिखावट से पर अपने आत्मीय घेरे में  ले लेता है   ।
    बंगाल की सर्वाधिक लोकप्रिय लेखिका और  सामाजिक कार्यकर्ता महास्वेता देवी से लेकर ? वरिष्ट चिंतक-समीक्षक नामवर सिंह, निर्मला जैन, राजेद्र यादव, गिरिराज किशोर, विश्वनाथ त्रिपाटी, विजयमोहन सिंह, अजितकुमार, देवेंद्रराज अंकुर, स्वयं प्रकाश, राजी सेठ, अर्चना वर्मा तथा मन्नू जी का करीब से जानने वाले उनके अध्याय स्वजनों ने अपने वक्तव्यों, आलेखों और  विश्लेषण से इम पुस्तक को समृद्ध बनाया है । आशा है  पाठकों की कसौटी पर भी यह पुस्तक खरी उतरेगी ।
    -सुधा अरोड़ा
  • Dohra Abhishaap
    Kaushlya Baisntari
    220 198

    Item Code: #KGP-2011

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
  • 20-Best Stories From Russia (Paperback)
    Prashant Kaushik
    125

    Item Code: #KGP-351

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words? 
    In this first in the 20-BEST series, we bring to you short stories and classics from a land that is as enigmatic as intriguing. Russian short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious—as well as the equally famous Russian authors. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.  
    With stories like The Bet and Vanka by Chekhov, God sees the truth but waits by Leo Tolstoy, The Queen of Spades by Alexander Pushkin, Her Lover and One Autumn Night by Gorky, The Cloak by Gogol, The Signal by Garshin, this book is a compilation of 20 famous Russian short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.
    Time to indulge in some old-world charm all the way from Russia.  
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma (Paperback)
    Tajendra Sharma
    170

    Item Code: #KGP-441

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : तेजेन्द्र शर्मा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Tab Aur Ab
    Alok Mehta
    595 536

    Item Code: #KGP-656

    Availability: In stock

    तब और अब
    अखबार  के बारे  में सामान्यत यह धारणा होती है कि सुबह होने के दो घंटे बाद उसकी उपयोगिता नहीं रहती । खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के युग से छपे हुए शब्दों के महत्त्व पर भी सवाल उठने लगे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाए तो पता चलेगा कि छपे हुए शब्दों से हर दिन इतिहास का एक नया पन्ना बनता है । राजाओं के दरबार रहे हो या ब्रिटिश शासन अथवा आजादी के बाद बनी लोकतांत्रिक सरकारों ने पिछले 60 वर्षों से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक बदलाव पर विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करके रखा होगा । फिर भी ऐसी हजारों घटनाएं, तथ्य, अंतर्कथाएँ हैं, जो किसी सरकारी या गैरसरकारी दस्तावेजो से नहीं मिलेगी । इंटरनेट तो हाल के वर्षों में आया है और उसमें हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों या पत्रिकाओं में प्रकाशित महत्त्वपूर्ण बाते उपलब्ध नहीं होगी। 
    इस पुस्तक की टिप्पणियों तात्कातिक परिस्थितियों से प्रभावित रही हैं और आज के संदर्भ में संभव है, उन पर दूसरे ढंग से सोचने की स्थिति बनती है। तब भी पुरानी घटनाएँ और परिस्थितियाँ नई सुबह के लिए सबक देती हैं । इस पुस्तक की अधिकांश टिप्पणियाँ नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तानम दैनिक भास्कर और आउटलुक साप्ताहिक में रहते हुए लिखी गई हैं और कुछ टिप्पणियाँ संपादकीय रूप में होने के कारण संक्षिप्त हैं । इस दृष्टी से यह अपने पत्रकारीय कास का लेखा- जोखा भी है और पाठको के लिए अधिक उपयोगी संदर्भ सामग्री भी ।
  • Vyavharik Pryay Kosh
    Mahendra Chaturvedi
    150 135

    Item Code: #KGP-83

    Availability: In stock


  • Saadat Hasan Manto Ki Kahaniyan (Paperback)
    Narendra Mohan
    395 300

    Item Code: #KGP-04

    Availability: In stock

    सआदत हसल मंटो उर्दू के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, चर्चित और विवादास्पद लेखक हैं। इस एक लेखक को लेकर जितनी चर्चाएं उठी हैं, उतनी अन्य किसी लेखक को लेकर नहीं। मंटो की खासियत है कि उसने नये विषयों पर ही नहीं लिखा, नये अन्दाजेबयां और नजरिये से भी लिखा। इस एक बात ने उन्हें अपने समय का ही नहीं, आज के समय का भी एक बड़ा कहानीकार बना दिया है।
    मंटो की कहानियां पाठकों की अन्तश्चेतना को बुरी तरह झकझोरने वाली, तिलमिला देने वाले विचारों तक ले जाने वाली हैं। यह बेचैनी महज व्यक्तिगत नहीं है, मुल्क और कौम की बेचैनी से जुड़ी हुई है जो कहानियों की मार्फत पाठकों तक सीधे पहुंचती है। उनकी कहानियों में गहरी मानवीय दृष्टि के साथ-साथ तीव्र आक्रोश और प्रतिकार भी है। हरारत और रोशनी, स्वप्न और दुःस्वप्न उनकी सृजनात्मक प्रेरणा के हिस्से हैं। इन कहानियों के जरिये मंटो हमें विसंगति-भरी जिन्दगी में जीने की शर्त का गहरा एहसास कराते हैं।
    सआदत हसन मंटो की कहानियां पुस्तक में मंटो के कथा-संसार में झांकने का, उनकी कहानियों को चुनकर, एक परिप्रेक्ष्य देकर हमारे सामने पेश करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है हिन्दी के जाने-माने कवि, नाटककार और आलोचक डाॅ. नरेन्द्र मोहन ने। मंटो की सृजनात्मक प्रेरणा और संपादकीय दृष्टि में आश्चर्यजनक साम्य है-एक-दूसरी में खुलती गई हैं और उन्हें अलगाया नहीं जा सकता। इससे यह पुस्तक कहानियों का संकलन-भर नहीं रही है, एक दस्तावेज बन गई है।

  • Gyarah Shreshtha Kahaniyan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-804

    Availability: In stock

    ग्यारह श्रेष्ठ कहानियां
    हिंदी कहानी ने अपनी यात्रा में अनेक सुगम और दुर्गम मार्ग तय किए हैं । वैदिक साहित्य की आख्यायिकाओं तथा ब्राह्मण ग्रंथों में आए अनेक आख्यान हमारी कहानी-परंपरा के आदि स्रोत रहे हैं । सर्जना की सर्वथा लोकप्रिय विधा रहने के कारण कहानी, लेखकों की लेखनी की लाडली विधा भी बनी रही और संभवत: इसीलिए कहानी के अलंकरण और उपयोग निरंतर विकासमान रहे । प्रेमचंद और प्रसाद ने हिंदी कहानी को जिस श्रेष्ठ लोकहित में मर्यादित और निर्धारित किया, उसकी अनुगूँजें आज भी हिंदी के युवा कथाकारों की रचनाओं में प्रवहमान है ।
    जनप्रियता के कारण हिंदी कहानी की गति को खूब-खूब  उतार-चढाव भी देखने पड़े तथा कथा-आंदोलनों के शोर में विशिष्ट कहानियों के प्रभामंडल का पहचान पाना तक एक मुश्किल कार्य हो गया । कहीं अनुभूत यथार्थ के चित्रण  का शोर, तो यहीं कल्पनावृत्ति को तिलांजलि देने की जिद । ऐसे में कहानी की रचनाशीलता को समग्रता में हानि पहुंची। मगर इस गुलगपाड़े के बीच जो अच्छी कहानियाँ लिखी गई, वे ही अंतत: हमारी कथा-धरोहर भी बनती गई हैं।
    प्रस्तुत संकलन से संपादकद्वय ने हिंदी की ऐसी श्रेष्ठ कहानियों को प्रस्तुत किया है जो अपने पाठ के माध्यम से हमें लौकिक बनाती हैं तथा हमारे सामाजिक संज्ञान और सरोकारों को, समय की कसौटी पर कुशलता से स्थापित और उद्वेलित करती हैं। व्यक्ति भले ही न रहे, मगर पात्र का चित्रण उस व्यक्ति का शाश्चता सौंप सके-ऐसी क्षमता जिन कहानियों में समाहित है-उन्हें ही प्रस्तुत संग्रह में संकलित किया गया है । प्रेमचंद, जयशंकर पसार तथा विष्णु प्रभाकर आदि वरिष्ट कथाकारों की कालजयी कहानियों के साथ-साथ, अन्य सुप्रतिष्ठित कहानीकारों की कहानियाँ भी पाठक एवं साहित्य के छात्र इस एक ही जिल्द से पढ़कर लाभान्वित होंगे, इसी आशमा और अपेक्षा के साथ यह संग्रह आपको सौंपा जा रहा है ।
  • Kuchh Kahi Kuchh Ankahi
    Sheela Jhunjhunwala
    495 446

    Item Code: #KGP-1938

    Availability: In stock

    कुछ कही कुछ अनकही
    ...निहायत दिलचस्प शैली, प्रवहमान भाषा-परिवार से लेकर पूरे परिवेश तक से जुडे लोग और स्थितियां...यह किताब शुरु से अंत तक रहस्य/रोमांच/प्रेम/संघर्ष/राजनीती/ परिवार/प्रशासन/टकराव/उपलब्धि और फिर नियति के अनेकानेक खेलों से साक्षात्कार कराती है...
    झुनझुनवाला जी रेवेन्यु डिपार्टमेंट के एक आला अफसर थे । छापे डालने के तनावपूर्ण क्षणों में ये लोग किस-किस तरह के खतरे उठाते हैं…धन की दुनिया से किस तरह के प्रलोभन और हथकंडे काम में लाए जाते है और उस चक्रव्यूह को भेदने में ये लोग क्या-क्या पापड बेलते हैं, यह शायद पहली बार इस किताब से जानने को मिलेगा । समसामयिक राजनीति और शासन तंत्र के अनुभवों पर सटीक टिप्पणियों के साथ-साथ इस पुस्तक से आपातकाल संबंधी कतिपय प्रचलित धारणाओं के बारे में एक नए पहलू से सोचने का मौका भी मिलेगा।
    --कन्हैयालाल नंदन (नई दुनिया से)
    इतनी आसान, इतनी सहज।  ऐसा लगता है कि आप अपने गली-कूचे के बारे से बात कर रहे हैं । चाहे वह कानपुर हो या इलाहाबाद या बंबई, शीलाजी ने अपने समय का अत्यंत जीवंत चित्रण किया है और मुश्किल बातो को भी सरलता से, सहजता से और अपनत्व से कहा है । एक ईमानदार किताब जिसमें से हर क्षण ईमानदारी झलकती दिखाई देती है । -कमलेश्वर
    'कही-अनकही' में बनावट कहीं नहीं है । सब कुछ सहज भाव से कहा गया है । कहीं-कहीं तो ऐसा लगता है कि हम कोई उपन्यास पढ़ रहे है, रहस्य-रो,मांच से भरा उपन्यास और कही-कही अंतरंग, आत्मिक क्षणों को दिखाता हुआ गृहस्थ जीवन।  एक क्षण को भी नहीं लगा कि यह वर्णन कृत्रिम है । -विष्णु प्रभाकर
    रूढ़ियों को भेदकर स्वतन्त्रता की चिनगारियों के साथ-साथ परिवार में तालमेल बिठाने जैसी घटनाएं सार्थक संदेश देती हैँ। -डॉ. शेरजंग गर्ग
    ...बहुत कुछ होने के साथ-साथ बेहद इनसानी रिश्तों की झलक । -नासिरा शर्मा
    'कुछ कही कुछ अनकही' एक मर्यादित प्रेम-प्रसंग के बाद जिंदगी की जद्दो-जहद से गुजरते हुए जहां पहुँचती है वहाँ आसपास के लोग भी उसका एक हिस्सा हो जाते हैं । विवरण रोचक, प्रवाहपूर्ण और तथ्यपरक हैँ। आत्मकथा होते हुए भी यह संयमित है, मर्यादित है और आत्म-श्लाया  से परे है । -पदमा सचदेव
    ...रहस्य, रोमांच, तिलिस्म, रोमांस-सब एक जगह इकट्ठा कर दिया गया है। ...मर्यादित जीवन के सिद्धांत को पकडे हुए अपने समय का जीवंत खाका ।
    -वसंत साठे
    ...महानगरों में रहने वाले मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन के दिन-प्रतिदिन की ऊहापोह और जिजीविषा की खोज में आगे बढ़ते जाने की ललक जगह-जगह आभासित होती है। -डॉ. क्षमा गोस्वामी (वागर्थ से)
    ...सभी प्रणय-चित्रों में गरिमापूर्ण और सधी हुई मानसिकता के साथ एक सतत ठहराव है, छिछोरापन या आजकल जैसा उर्च्छाखाल प्रेम नहीं है-वह जो सीमाएं लांघकर बह जाता है । -डॉ. कुसुम अंसल (संचेतना में)
    सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, राग-विराग सबसे मिलकर बना है जीवन और इसी में उसकी संपूर्णता है । तटस्थ भाव से जो इस संपूर्णता की अनुभूति करता है, वही एक सफल संस्मरण-लेखक भी होता है । इस बात का अहसास 'कुछ कहीँ कुछ अनकही' पढ़कर और अधिक हुआ ।...यह पुस्तक अपने समय को ईमानदारी से रेखांकित करती है ।
    -राधेश्याम (दैनिक हिंदुस्तान में)
    स्त्री-विमर्श का यह आत्मवृत्त अपने निजी, वैयक्तिक अनुभवों और अनुभूतियों से गुजरता हुआ सामाजिक- सार्वजनिक दृष्टि को मुकम्मल रूप में हमारे सामने परिभाषित करता है ।
    -लक्ष्मीकांत मुकुल (समकालीन भारतीय साहित्य में)
    पुस्तक ने भारतीय महिला पत्रकार की आंखों से देखे हुए एक बेहद रोचक कालखंड को जिया है । प्रथम पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक यह रोचकता, रोमांच और कहीं-कहीं रूमानी वासंतीपन लिए हुए है। मार्मिक क्षण भी हैं ।
    -पाञ्चजन्य 
    …कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, पत्र, डायरी आदि अनेक चिताओं से साक्षात्कार कराती एक अत्यंत पठनीय पुस्तक ।
    -रवीन्द्र कालिया
  • Sampurna Upnanayas : Himanshu Joshi ( 2Vols.)
    Himanshu Joshi
    2100 1365

    Item Code: #KGP-SUHJ HB

    Availability: In stock


  • Vidrohini Shabri
    Hiralal Bachhotia
    100 90

    Item Code: #KGP-1854

    Availability: In stock

    विद्रोहिणी शबरी 
    जन्मजात विद्रोहिणी शबरी का विद्रोह जड़-परंपराओं और रूढियों के खिलाफ था । शबरी ने एक तरह से अतीत को या उस अतीत को जो हिंसा पर टिका था, को ललकारा था । वह आतंक के रावण के खिलाफ संकल्प के साथ आगे बढ़ रही थी । शबरी ने नारी के रक्षिता माने जाने पर भी उँगली उठाई तो तरुणी शबरी पर भी जिसने देखा उसी ने उँगली उठाई थी । लेकिन शबरी अपने रास्ते चलती रही और जा पहुंची पंपा सरोवर क्षेत्र में । कठोर यथार्थ की रगड़ से उत्पन्न आदर्श ही शबरी का प्राप्तव्य बना और यह आदर्श शस्य श्यामल राम के रूप में परिकल्पित हुआ। मुग्धमना शबरी उसी राम के लिए प्रतीक्षारत रही । राम उद्धारक नहीं, शबरी के लिए मीत बनकर प्रकट हुए थे। केवट, निषाद के साथ राम के व्यवहार ने शबरी को ऐसा ही आश्वासन दिया था । राम का सबके प्रति समता भाव ही शबरी के लिए वरेण्य था । शबरी की वृष्टि में राम ने मानव-गरिमा की प्रतिष्ठा कर एक नई पहल की धी। शबरी अपनी इसी आस्था पर आरूढ राम के लिए प्रतीक्षारत रही । प्रतीक्षा के क्षणों को काटने के लिए शबरी बेर के पेडों का रोपण और फलो का संचयन करती रही । शबरी अरण्य संस्कृति की प्रतिरूप प्रकृति के संरक्षण में संलग्न रही। शबरी ने शूर्पणखा प्रकरण में अमर्यादित नारी को वरेण्य नहीं माना । इसीलिए राम ने हाथ उठाकर कहा था-शबरी प्रतिरूप है नवधा भक्ति का । इसीलिए शबरी सामान्य से असामान्य या असाधारण बन गई और राम के हृदय में मूर्ति के समान विराजित रही । यही शबरी की आस्था की विजय थी । शबरी ने अपनी अंतर्दृष्टि के आधार पर राम को जनकनंदिनी को खोजने के संकेत दिए थे । इसमें सुग्रीव-हनुमान मिलन के पूर्व संकेत भी शामिल थे । भावी आपदाओं की ज्वालाओं को शांत करने हेतु सांत्वना नीर उड़ेलते रहना ही शबरी का प्राप्तव्य बना रहा ।
  • Manu Ko Banaati Manaii (Paperback)
    Gyanendrapati
    160

    Item Code: #KGP-415

    Availability: In stock


  • Kavya Shatabdi
    Anamika
    350 315

    Item Code: #KGP-789

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।
  • Sach Ke Surya Guru Nanak
    Satayendra Pal Singh
    450 383

    Item Code: #KGP-SKSGN HB

    Availability: In stock

    गुरु नानक साहिब की सबसे विलक्षण श्रेष्ठता थी कि उन्होंने मानव समाज का सामान्य अंग बनकर मानवता को अभिप्रेरित और दिग्दर्शित किया। उनकी सहजता और सरलताइतनी प्रभावी थी कि समाज का परिदृश्य बदल गया। गुरु नानक साहिब ने परमात्मा और सृष्टि के हर उस तत्त्व को प्रकट किया जिसे सदियों से रहस्य के आवरण में ओझल कियागया था। इससे धर्म और परमात्मा पर विशेषाधिकार स्थापित हो गए थे। गुरु नानक साहिब ने लोगों को परमात्मा और धर्म से सीधे जोड़ा। ज्ञान के सूर्य की किरणें निर्बाध रूप सेहर घरहर आंगन में राह बनाने लगीं। जीवन को एक नया आधार मिला। धर्म ही नहीं समाज की कुरीतियां और अंधविश्वास भी ढहने लगे और नई चेतना ने जन्म लिया।

    गुरु नानक साहिब की निर्मल और स्पष्ट वैचारिक दृष्टि से हर वर्गहर धर्महर समाज में उनकी स्वीकार्यता स्थापित हुई। रंक से राजा तकनिरक्षर से प्रकांड विद्वान् तक,अधर्मी से धर्मशास्त्री तक सभी उनके अनुयायी बन गए। वे उन सभी के गुरुप्रेरकमार्गदर्शक थे जो समाज में धर्म की प्रतिष्ठा और मानवीय मूल्यों का सत्कार चाहते थे। गुरुनानक साहिब मानव समाज के थे और हैं।

    मानव समाज अनेक दुखों में जी रहा था। जैसे आकाश में चमक रहे तारों की गणना नहीं की जा सकती वैसे ही लोगों के दुःख थे। समाज धनी-निर्धनसबल-निर्बलउच्च-निम्न,शासक-शोषितआभिजात्य-वंचित आदि में बंटा हुआ था। ये विभाजन रेखाएं इतनी गहरी और निर्मम हो गई थीं कि लोगों ने उनसे पार पाने के बारे में सोचना भी छोड़ दिया था।इसे नियति मानकर स्वीकार कर लिया गया था। ये सारे विभेद एक तरह से मानव संस्कृति के अंग बन गए थे। यह उसी तरह हो रहा था जैसे किसी ने दिन  देखा हो। वह रात केअंधेरे को ही अंतिम सच मान लेता है। वह तारों से आने वाली रौशनी को ही प्रकाश समझता है और उसी में जीने का अभ्यस्त हो जाता है।

    एक रात का यह अंधेरा युगों का सच बन चुका था। अंधेरे से लड़ना संभव नहीं होता। उसे  तो मिटाया जा सकता है भगाया जा सकता है। छोटे-छोटे दीये टिमटिमाते हैं औरबुझ जाते हैं। दीयों की रौशनी से कुछ पल के लिए दिखने लगता है किंतु दृष्टि एक सीमित दायरे में ही सिमटकर रह जाती है। अंधेरे को दूर करने के लिए एक सूरज की आवश्यकताहोती है। गुरु नानक साहब का अवतार लेना ऐसे ही सूरज का उदय था जिसने संसार के सारे भ्रम दूर कर दिए कि अंधेरा सच नहीं है। तारों की रौशनी जीवन के मार्ग को प्रकाशितनहीं कर सकती।

    -इसी पुस्तक से
  • Wuthering Heights (Novel)
    Emily Bronte
    495 446

    Item Code: #KGP-573

    Availability: In stock

    A snowstorm evening. A moorland farmhouse. A visitor from south England on a recuperation trip. And a nightmare featuring the ghost of the earlier occupant of the farmhouse—trying to get in.
    Wuthering Heights and its chambers have stood the test of time and temperaments of the illustrious Earnshaws and the dark-skinned orphan Heathcliff. Through this classic romance, Emily Bronte takes us to the rebellious young Catherine Earnshaw, who with time, grows into an opinionated, treacherous woman in love with two men. And to Heathcliff, adoration and hatred for Catherine is the stuff classics are made of. All this while two illustrious families fall prey to the perfect scheming of the dark-skinned lunatic orphan! Will her love win or will it be his hatred?
    With love, betrayal, rivalry, and revenge at its heart, this saga of the moorland farmhouse has everything that awakens the base humane emotions. Realistically real with its vivid imagery, Wuthering Heights—166 years later too lives on, because love still drives the world, and revenge still destroys it.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan
    Usha Kiran Khan
    240 216

    Item Code: #KGP-685

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bankon Mein Anuvaad Ki Samasyaen
    350 315

    Item Code: #KGP-808

    Availability: In stock

    बैंकों में अनुवाद की समस्याएँ
    हिन्दी में बैंकों के प्रयोग पर बहुत कम पुस्तकें आई है, किन्तु बैंकों में अंग्रेजी सामग्री के हिन्दी अनुवाद की समस्याओं पर शायद यह पहली पुस्तक है ।
    डॉ० भोलानाथ तिवारी के 'अनुवाद : सिद्धान्त और प्रयोग' माला से 'अनुवाद विद्वान', 'काव्यानुवाद की समस्याएं', 'कार्यालयी अनुवाद की समस्याएं', 'वैज्ञानिक अनुवाद की समस्याएं', 'भारतीय भाषाओं से हिन्दी अनुवाद की समस्याएँ', 'विदेशी भाषाओं से हिन्दी अनुवाद की समस्याएँ' तथा 'पत्रकारिता में अनुवाद की समस्याएँ' के बाद यह आठवीं पुस्तक है ।
    यह पुस्तक विशेषत: बैकों में अनुवाद तथा सामान्यता अनुवाद में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Chhota-Sa Break (Paperback)
    Vishnu Nagar
    140

    Item Code: #KGP-306

    Availability: In stock

    छोटा-सा ब्रेक
    विष्णु नागर अपनी कविताओं के लिए जितने जाने जाते हैं, अपने व्यंग्यों के लिए भी कम नहीं जाने जाते। ‘छोटा-सा ब्रेक’ में समसामयिक घटनाओं पर छोटे-छोटे व्यंग्य संकलित हैं, जो उन्होंने (दैनिक) ‘नई दुनिया’ में प्रतिदिन ‘गरमागरम’ स्तंभ के अंतर्गत लिखे थे और जिन्हें पाठकों द्वारा बहुत पसंद किया गया था। अधिकतर पाठक तो अखबार खोलकर पहले ‘गरमागरम’ स्तंभ ही पढ़ते थे। जैसा कि आप देखेंगे, ये व्यंग्य-आलेख भले ही समसामयिक घटनाओं- चरित्रों पर हों, मगर इनमें समय की सीमा में रहकर भी उस सीमा के पार जाया गया है। एक सच्चा रचनाकार यही करता है, इसलिए ये व्यंग्य हमारा खयाल है कि कभी पुराने नहीं पड़ेंगे। इसके अलावा ये व्यंग्य उस समय-विशेष का राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज भी हैं, एक ऐसा दस्तावेज, जो सत्ताधीशों की तरफ से नहीं, बल्कि साधारण जनता की तरफ से लिखा गया है, जिसमें उसके तमाम दुःख-तकलीफ दर्ज हैं, उसका व्यंग्य-विनोद भाव अंकित है। ये व्यंग्य परसाई और शरद जोशी दोनों की परंपरा में हैं। उस परंपरा में हैं और अपनी एक अलग परंपरा भी ये बनाते हैं। इनमें शैलियों का अद्भुत वैविध्य है, भाषा की अनोखी सहजता और प्रवाह है। इन्हें पढ़कर नहीं लगता कि व्यंग्य करने के नाम पर शाब्दिक खिलवाड़ की गई है। ये असली चिंता से उपजे व्यंग्य-आलेख हैं। इन्हें पढ़कर समाज को देखने-परखने की एक नई—ऊर्जस्वित दृष्टि भी मिलती है, मात्रा हलका-फुलका मनोरंजन नहीं होता, जैसा कि सामान्यतः व्यंग्य आजकल करते पाए जाते हैं। कैसे गंभीर से गंभीर बात को, जटिल से जटिल विषय को, सहजता-सरलता और व्यंग्यात्मकता से उठाया जाए, इस बात का उदाहरण बनते हैं ये व्यंग्य। इन्हें पढ़कर लगेगा कि व्यंग्य की मौजूदा स्थिति से निराश होने की नहीं, फिर से उत्साहित होने की जरूरत है।
  • Saakshi
    Bhairppa
    295 266

    Item Code: #KGP-875

    Availability: In stock

    यह उपन्यास 1986 की सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ कृति के रूप में स्वीकृत होकर 'ग्रंथलोक' पुरस्कार से सम्मानित।
  • Yogkshem
    Rajendra Tyagi
    540 432

    Item Code: #KGP-286

    Availability: In stock

    योगक्षेम
    काफी विचार करने के उपरान्त मैंने गीता को उपन्यास के रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया । इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों के साथ विचार-विमर्श किया । कुछ ने मेरे विचार की सराहना की तो कुछ ने यह कहते हुए कि गीता स्वयं ही एक उपन्यास है, मेरे विचार को नकार दिया । कुछ का मत था कि विचार तो उचित है, किन्तु रचना में मौलिकता का अभाव रहने का खतरा है। समझाया उनका आशय गीता के मूलपाठ की सुरक्षा से था । गीता के मूलपाठ के साथ यदि छेड़छाड़ की गई तो उसका मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा और यदि मूलपाठ के साथ छेड़छाड़ नहीं की तो उपन्यास में मौलिकता का अभाव रहने की पूरी सम्भावना है । इस प्रकार यह मौलिक कृति नहीं कहलाएगी । उनकी आशंका अपने स्थान पर उचित थी किन्तु मेरे लिए चुनौती । चुनौती स्वीकारते हुए मैंने गीता पर आधारित उपन्यास ही लिखने का अन्तिम निर्णय लिया ।
    लक्ष्यप्राप्ति के लिए मैं चिन्तन-मनन में व्यस्त हो गया और महत्त्वपूर्ण दो विचार मेरे चिन्तन में अवतरित हुए । प्रथम-गीता के विभिन्न श्लोकों के सम्बन्ध में व्याप्त भ्रान्तियों का निराकरण ।  द्वितीय—गीता में निहित शिक्षा का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विस्तृत व्याख्या । इसके अतिरिक्त एक प्रमुख विचार यह था कि जब तक कृष्ण और अर्जुन के मध्य वार्तालाप चलता रहा, तब तक कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध के लिए तत्पर सेनानायक व सैनिक क्या करते रहे ! मुझे यह अनुभव हुआ कि प्रथम दो विचार तो गीता को सरल व सर्वग्रासी बनाने में सहायक सिद्ध होंगे और अन्तिम विचार गीता की रोचक प्रस्तुति में सहायक सिद्ध होगा ।
    इस प्रकार गीता के मूलपाठ से खिलवाड़ न करते हुए अर्जुन व धृतराष्ट्र के माध्यम से गीता को सर्वग्राही व उपन्यास का रूप और विस्तार प्रदान करने का प्रयास किया गया है । -लेखक
  • Piya Peer Na Jaani
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-1982

    Availability: In stock

    पिया पीर न जानी
    इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर खडे होकर, स्वाधीनना की पचासवीं वर्षगाँठ मनाते हुए भी यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि भारतीय नारी पूर्णरूपेण स्वतंत्र है ।
    परम्यरा की, रूढियों की, सनातन संस्कारों को अर्गलाएँ आज भी उसके पाँवों को घेरे हुए है । आर्थिक स्वातंत्र्य का झाँसा देकर उसे अर्थार्जन में भी झोंक दिया गया है । अब वह घर और बाहर दोनों तरफ पिसती है--दो-दो हुक्मरानों के आदेशों पर नाचती है । इस मायने में वह सोलहवीं सदी की नारी से भी जादा शोषित और असहाय हो गई है ।
    पर हाँ, इधर कुछ वर्षो में छटपटाने लायक ऊर्जा उसने अपने में भर ली है । इसीलिए कभी-कभी इन बंधनों को तोड़ने में भी वह सफल हो जाती है ।


  • Nepathya Se
    Ramesh Chandra Shah
    175 158

    Item Code: #KGP-9117

    Availability: In stock

    इस पुस्तक का प्रारंभ एक आत्मनिबंध-सी लगने वाली रचना से होता है और उपसंहार एक ऐसे पत्र-संवाद से, जो दरअसल समूची पुस्तक में अंतव्र्याप्त विषयवस्तु से ही संबद्ध विचारों का वाद्य-वृंद अथवा ‘ड्रामा’ है। इस तरह यह एक ओर मेरे विशुद्ध व्यक्ति-व्यंजक निबंध-संग्रहों ‘रचना के बदले’, ‘आडू का पेड़’ और ‘शैतान के बहाने’ से और दूसरी ओर मेरे वैचारिक निबंध-संकलनों ‘सबद निरंतर’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ तथा ‘स्वाधीन इस देश में’ से जुड़ता है; हालांकि है यह कुल मिलाकर वैचारिक निबंधों का संग्रह ही। पाठक लक्ष्य करेंगे कि विशुद्ध साहित्यिक आलोचना जिसे कहा जाता है, उससे भिनन कोटि का उपक्रम होते हुए भी यह लेखन ‘आलोचना’ को हर जगह स्पर्श करता चलता है अलगपन इसमें यह, कि आलोचना का यह स्वर संस्कृति के व्यापक सरोकारों का, कहंे कि एक तरह की सभ्यता-समीक्षा का स्वर है।
    पिछले तीन-चार बरसों के दौरान लिखे गए इन निबंधों में सुधी पाठक को कुछ न कुछ तारतम्य और पूर्वापर-संबंध की प्रतीति भी अवश्य होगी जो इनके पुस्तकाकार प्रकाशन को संकलन की तरह ही नहीं, अंतग्र्रथित गं्रथ के रूप में भी यथेष्ट औचित्य प्रदान करती है। इस अवसर पर लेखक उन समस्त संस्थाओं और पत्रिकाओं के प्रति आभार व्यक्त करना अपना कर्तव्य समझता है, जिन्होंने इन निबंधों को प्रेरित या प्रकाशित किया।
    —रमेशचंद्र शाह
  • Anuvaad Aur Bhaashik Sanskriti Hindi Ke Prayojanparak Sandarbh
    Rita Rani Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-528

    Availability: In stock

    हिंदी लंबे समय से अनुवाद कर्म करने के बावजूद हम अनुवाद को भाषायी गतिविधियों से सकारात्मक और सर्जनात्मक ढंग से जोड़ने में बहुत सफल नहीं हो पाए हैं। अनुवाद के माध्यम से हिंदी को अभिव्यक्ति की सहजता से, उसकी बोलियों की अपनी कमाई हुई शब्दावली और भंगिमाओं से, जीवन संदर्भों की निकटता से जोड़ते हुए भाषायी पैनेपन को निखार नहीं पाए हैं।
    भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर की भाषाओं के लिए कई तरह की चुनौतियां हैं। हिंदी को उन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपनी भाषिक संस्कृति को न केवल पहचानना होगा बल्कि उस भाषिक सांस्कृतिक परिवेश को कायम रखने का हर प्रयास करना होगा, जिसमें हिंदी भाषी समाज का सामूहिक अवचेतन और जातीय स्मृति संचित है; साथ ही जिसमें हिंदी भाषी समाज की मौजूदा और भावी पीढ़ियों की आशाएं, आकांक्षाएं अपना विस्तार और प्रसार पाती हैं और पाएंगी। भाषायी अस्मिता केवल बोलचाल, घरेलू व्यवहार, मनोरंजन से संचित और समृद्ध नहीं होती। उसके लिए उच्चकोटि के सर्जनात्मक साहित्य और साहित्य-विमर्श के साथ-साथ आवश्यक होती है उस भाषा में ज्ञान-संपदा की, दैनंदिन जीवन के बड़े से बड़े कार्यकलाप के संचालन, प्रयोजन और चिंतन की निरंतर और सिलसिलेवार मौजूदगी।
    प्रस्तुत पुस्तक हिंदी भाषा-संस्कृति के इन्हीं व्यापक सरोकारों से संबंधित है।
  • Lakeer Tatha Anya Kahaniyan
    Urmila Shirish
    250 200

    Item Code: #KGP-242

    Availability: In stock

    लकीर तथा अन्य कहानियाँ
    उर्मिला शिरीष की कथाभूमि उनका परिवेश, समाज और वह पर्यावरण है, जिनमें वे एक साथ तीन तत्त्वों का समावेश करती हैं। एक है पात्र या मनुष्य, जो उनकी संवेदना का अस्तित्व है; दूसरा है उनकी विषयवस्तु, जो एक कथा में कथा की उपस्थिति की तरह है और तीसरा है उनका शिल्प, जो उनकी भाषा-चेतना और शब्द-सत्ता से निर्मित होकर जीवन-संबोधी बनता है।
    उर्मिला की ये दस कहानियाँ मृत्यु-पर्व से शुरू होती हैं तो पाठक को एक प्रकार के सदमे में ले जाती हैं, लेकिन मृत्यु का पर्व या जश्न संवेदना के कितने धरातल एक साथ हिला देता है, यह कहानी की आंतरिक काया से प्रकट होता है। एक बहुत ही ध्यातव्य तथ्य इन कहानियों के बारे में यह है कि कथाकार के आग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह कहीं नहीं हैं--न यथार्थ के स्तर पर, न शिल्प और भाषा के स्तर पर। जीवन के सारे सामान्य, सामान्य की तरह ही हर कहानी में मौजूद हैं, लेकिन जब उनके मर्म की मृदुलता में उतरते हैं तो कहानी हमें अंदर तक भिगो देती है।
    ‘अग्निरेखा’ से ‘लकीर’ तक की ये कहानियाँ घटनाओं की न होकर घटित होते जीवन की कहानियाँ हैं। यह भी दावा नहीं है कि कथाकार कथा की कोई कारीगरी कर रही हो। कहानियाँ कहीं विडंबना में बोलती हैं, कहीं व्यथा में, कहीं व्यंग्य में तो कहीं विषमतागत व्यग्रता में। इसलिए कहा जा सकता है कि इन कहानियों के अंदर एक ऐसी अनुभूति है, जो एक तरफ पाठक को कहानी से जोड़ती है, तो दूसरी ओर अपने ऐसे जीवन-क्षणों, स्पंदनों और संवेदनों से, जो पराये भी नहीं लगते और निजी बनाने की कोशिश में निजत्व से भी पृथक् हो जाते हैं।
    कहानियों में रचा गया जो संसार है, वह एक कथाकार की व्याकुलता से भरा-भरा है, इसलिए ये कहानियाँ पाठक के मन को अपनी ओर खींचने और अपने अंदर टिकाए रहने की कोशिशभरी कोशिश की तरह हैं।

  • Chintan Karen Chintan Mukt Rahen
    Swed Marten
    150 128

    Item Code: #KGP-279

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं ।
  • Saphalata Ka Rahasya
    Jagat Ram Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-99

    Availability: In stock

    सफलता का रहस्य
    जीवन में सफलता की चाहना सब रखते हैं, लेकिन सफल हो नहीं पाते। ऐसा न होने पर कोई भाग्य को कोसता है, कोई हालात को। जबकि सफलता हमारे अपने व्यवहार पर ज्यादा निर्भर है, न कि किन्हीं और बाह्य कारणों पर।
    सफलता के आधारभूत सूत्र हैं-शुद्ध व्यवहार, सीखने की प्रवृत्ति, आत्मनिर्भरता, संतोष तथा और भी बहुत कुछ।
    आर्य जी ने अपनी इस पुस्तक में सफलता के रहस्यों की सरल-सुबोध भाषा में व्याख्या की है। पुस्तक पठनीय तो है ही, जीवन से लिए गए सच्चे उदाहरणों के चलते संग्रहणीय भी बन पड़ी है।
  • Mere Papa Ki Shaadi
    Aabid Surti
    375 338

    Item Code: #KGP-62

    Availability: In stock


  • Dharmkshetre Kurukshetre
    Shanker Shesh
    70 63

    Item Code: #KGP-2014

    Availability: In stock

    धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे 
    धृतराष्ट्र का विवाह! अंधे को चतुर्भुज बनाना ! कोण देगा अनंत अँधेरे को अपनी कन्या ? कौन करेगा अपंग जीवन का वरण ? प्रश्न टेढा था । सत्यवती दबाव डाल रही यी। लगातार पडी थी  मेरे पीछे ।
    माँ को तो एक बार समझा भी लो, दादी को समझाना कठिन होता है । पौत्र चाहे लूला हो, लँगडा हो, अपाहिज हो, लेकिन उसका ब्याह होना बहुत जरूरी है । आज़ तक समझ में नहीं आया, मौका पाते ही एक स्त्री दूसरी स्त्री पर अत्याचार क्यों करने लगती है । सत्यवती क्यों नहीं सोचती ।  अंधे से ब्याह करने वाली लड़की को आजन्म कारावास भोगना पडेगा । सारी जिदगी अंधे की पत्नी कहाना होया । राजघराने का आदमी हुआ तो क्या हुआ, अंधा तो अंधा है,  रहेगा । लेकिन सत्यवती को समझाता कौन ! मेरा पिता तो उसे समझा नहीं सका, फिर मैं किस खेत की मूली था !
    इच्छा  हुई अपना उदाहरण सामने क्यों न रखूँ। आखिर मैं भी पूरे जीवन बिना स्वी के रह सका या नहीं । सशक्त ददेवपुत्र-सा दिखाई देन वाला में । तो यह 'अंधा क्यों नहीं रह सकता । मेरे मामले में  सत्यवती इतनी कठोर क्यों हो गई थी और अब पौत्र  के मामले में। (इसी उपन्यास से)
  • The Luck Of The Jews (Paperback)
    Michael Benanav
    395

    Item Code: #KGP-323

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Manas Manthan
    Braj Bhushan
    250

    Item Code: #KGP-104

    Availability: In stock

    अपने आपको जानने का काम मश्किल इसलिए माना गया है कि मनुष्य स्वभाव से ही पक्षपाती है। वह निष्पक्ष होकर अपने बारे में कभी विचार कर ही नहीं सकता। अपने विषय में सोचते हुए वह निष्पक्ष रह ही नहीं सकता। दुर्बल होते हुए भी कोई भी अपने को गामा और रुस्तम से कम नहीं समझता। दो हड्डी का आदमी भी कभी-कभी कह उठता है ‘‘ऐसा दूंगा हाथ कि जाकर दस कदम दूर गिरेगा।’’ ऐसे व्यक्ति को अपने बारे में कितनी गलत जानकारी है, यह सहज ही ज्ञात हो जाता है। अज्ञानी होते हुए भी कोई अपने को अरस्तू और चाणक्य से कम नहीं समझता। ऐसे व्यक्ति भी प्रायः कहते सुने जाते हैं ‘‘अरे, अरस्तू जैसे दस को मैं अपनी जेब में रखता हूं।’’ जबकि ऐसे व्यक्ति को मैट्रिक पास करने में चार साल लग गए थे। गहन अध्ययन, आत्मनिरीक्षण और सूक्ष्म विवेचना के द्वारा ही अपने आपको जानने के मार्ग की ओर बढ़ा जा सकता है।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 3 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7061

    Availability: In stock

    तीसरा खंड लिखते समय मुझे आनंद की विशेष अनुभूति हुई। कारण, चुलबुला विष्णु कर्णपुर जो लौट आया। इस खंड को पढ़ते हुए आपको भी ऐसा लगेगा कि विष्णु की उपस्थिति हमें आव्हादित करती है। मैंने विभिन्न विधाओं में अब तक लगभग तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं, लेकिन इस किशोर उपन्यास से मुझे विशेष लगाव है। भला क्यों?
    आपके मम्मी-पापा की तरह मेरे पिताजी भी मुझे डाॅक्टर बनाना चाहते थे। मैंने विज्ञान पढ़ा भी। पर जीवित मेढक, खरगोश के ‘डाइसेक्शन’ मन खिन्न हो उठा। मैंने अपनी दिशा बदल ली। मेरी अलमारी में जीवविज्ञान की जगह कालिदास, शेक्सपियर, टैगोर, प्रेचंद की पुस्तकें आ गई। साहित्य पढ़ना और लिखना अच्छा लगने लगा। सोचता हूं, भले ही मैं डाॅक्टर न बन सका, लेकिन विज्ञान और कल्पना के बीच संतुलन बनाते हुए बालकों के लिए लिखना चिकित्सकीय अनुभव जैसा ही है। संभव है चिकित्सक बनकर बच्चों से उतना घुल-मिल न पाता, जितना उन्हें अब समझ पा रहा हूं।
    सतरंगी की चतुराई ने तो मेरा मन ही मोह लिया। डाॅक्टर बनने की राह आसान हो गई। पूछो, कैसे? पढ़िए चैथे खंड में।
    -श्रीनिवास वत्स
  • Jakadan
    Mahashweta Devi
    125 113

    Item Code: #KGP-68

    Availability: In stock

    जकड़न
    पुलिस अफसर ने काफी सहनशील ढंग से और सहानुभूति-भरी नजर से एक बार देखा । विनय के साहित्य में पुलिस कितनी क्रूर, कुटिल, निर्मम है, लेकिन अभी उनको पुलिस से कितना सदभावपूर्ण व्यवहार मिल रहा है । हालाँकि बउआ की माँ ने कहा था—तुम लोगों के घर की बात है, इसीलिए इतना कुछ हो पा रहा है बहू जी ! हम लोगों के लिए होता ? कितना कुछ घटा, लेकिन मुए थाने ने सुना कभी? अफसर कहता है, मुझे लगता है इसलिए कह रहा हूँ मैं सरकारी तौर पर नहीं कह रहा हूँ, ऐसा लगता है कि उनमें किसी बात पर झगडा हो रहा होगा, अचानक गुस्से में आकर एक पीतल की ऐशट्रै फेंककर मारी, वह जाकर नस पर लगी, उससे आपकी बेटी बेहोश होकर गिर पडी, उसके बाद... 
    [इसी उपन्यास से]
  • The Hanuman Factor (Paperback)
    Anand Krishna
    195

    Item Code: #KGP-336

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
    Let us explore together…..
  • Aagaami Ateet (Paperback)
    Kamleshwar
    70

    Item Code: #KGP-7068

    Availability: In stock


  • Chunauti
    Sudrashan Kumar Chetan
    150 135

    Item Code: #KGP-177

    Availability: In stock


  • Nahin Koi Ant
    Pratap Sehgal
    80 72

    Item Code: #KGP-1300

    Availability: In stock


  • Samgra Kahaniyan : Ab Tak
    Maitreyi Pushpa
    695 556

    Item Code: #KGP-271

    Availability: In stock

    समग्र कहानियाँ: अब तक
    आँधी की तरह अपने उपन्यासों से पाठकों को झकझोर देने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री के अपने फैसलों की विचारोत्तेजक कहानियाँ-उपन्यास लिखे हैं। शहरी मध्यवर्गीय कहानियों के संसार को गाँव के उभरते मेहनतकश समाज से जोड़ा है, जहाँ अपनी परंपराएँ हैं, रूढ़ियाँ हैं और सबसे ऊपर है ‘खानदान की नाक’ और सब कुछ टिका है स्त्री के कंधों पर--जमीन और स्त्री ही उलझनों के केंद्र हैं और दोनों के ‘उत्पादन’ आपस में गुँथे हैं। सब मालिक की कृपा पर साँस लेते हैं। मैत्रेयी की स्त्रियों की सारी शिकायतें इसी मालिक से हैं कि वह साथी और हमसफर क्यों नहीं हो सकता--क्यों मालिक बनकर ढोर-डंगर की तरह औरत को ही हाँके रखता है। 
    स्त्री का अपनी नियति को अस्वीकार करना ही सामाजिक मर्यादाओं का टूटना है।
    स्त्री के उत्थान और सबलीकरण की ये कहानियाँ यथास्थिति से विद्रोह ही नहीं, भविष्य की दृष्टि से समाज-परिवर्तन की ध्वजवाहिनी भी हैं। मैत्रेयी ने कहानियाँ शहरी जीवन को लेकर भी लिखी हैं, मगर जिस आत्मीयता और गहराई से उन्होंने गाँव के जीवन को देखा है वह हिंदी में प्रेमचंद और रेणु 
    के सिवा शायद ही किसी को नजर आया हो। ये बेजुबानी स्त्री की यातनाओं, उसके संघर्षों और सपनों के बेआवाज विद्रोह की दस्तावेज हैं।
  • Guru Nanak Dev
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-131

    Availability: In stock

    मानवता को सत्पथ पर ले जाने के लिए ईश्वर महान् आत्माओं को धरती पर भेजता है । गुरू नानक देव एक ऐसे ही महान् आत्मा थे, जिन्होंने मानव मात्र के कल्याण के लिए अपने जीवन को तपाया । उन्होंने जग की भलाई के लिए स्वयं नाना प्रकार के कष्ट झेले । वे ऐसे महापुरुष थे, जो जाति-पांति के भेदभाव से दूर रहते थे । उनका सादा जीवन लोक-कल्याण के लिए ही था । वे जीवन को सोने की भाँति तपाकर विश्व का कल्याण करते थे ।
    गुरू नानक देव की शिक्षाएं हमें जीवन में उत्तम मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं । उन्होंने मनुष्य मात्र को अच्छाइयों को स्वीकार करने की प्रेरणा दी । बुराइयों से दूर रहने की बात उन्होंने सर्वत्र कही । वे दया, क्षमा, करुणा, प्रेम और बंधुत्य  शिक्षा देते थे ।
    वे मानव मात्र को भलाई के मार्ग पर चलने की शिक्षा देते थे । उनकी दृष्टि में न काई छोटा था, न बड़ा, सभी समान थे ।
  • Vikalp
    Sukhdev Prasad Dubey
    1100 825

    Item Code: #KGP-653

    Availability: In stock

    बीसवीं शताब्दी ने मनुष्य को आजादी दी, लेकिन उसकी आत्मा छीन ली। आत्मविहीन होकर मनुष्य अपना सब कुछ, जो आत्मीय था, को छोड़कर बाहर भागने लगा। ऐसा ही एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मा, अति महत्त्वाकांक्षी युवक बड़ा आदमी बनने के स्वप्न का पीछा करते हुए देश का सब कुछ बिसराकर अमेरिका भाग जाता है और वहीं का होकर रह जाता है। जैसा कि 70 के दशक में अनेक युवक करने लगे थे।
    15 वर्ष बाद अचानक, अपने पिता द्वारा आत्मदाह कर लेने की खबर उसे वहां का सब कुछ छोड़कर गांव ले आती है और वह फिर से यहां सबसे जुड़ने लगा था, जिसे वह छोड़कर गया था। तभी फिर अचानक विदेश से आई एक बुरी खबर, उसे विदेश ले जाती है। जहां उसकी पत्नी की विलासिता और लापरवाही से हुई पुत्र की मृत्यु, उसे इतना दुखित करती है कि वह अपनी पत्नी को ही 14 वर्ष जेल करवा के सदा के लिए यह सोचकर देश लौट आता है कि महान् देशों में भी महानता कहां मिलती है।
    और फिर शुरू होता है, उसके संघर्ष का एक लंबा सिलसिलाµघर, परिवार, गांव बस्ती, देश तथा उसके अपने प्रेम को, न्याय दिलवाने और उनकी गरिमा लौटाने की उसकी योग्यता को सिद्ध कर दिखाने की परीक्षा का-लेकिन विशृंखल समाज, भ्रष्ट सत्ता और संवेदनहीन अक्षम नौकरशाही उससे समर्पण कराने में लग जाते हैं। वह घबराकर विकल्पों के पीछे दौड़ता-भागता थक जाता है-क्या शैतान के समक्ष समर्पण कर दे? क्या इस अनिश्चितता, अराजकता और अंत के आतंक से वह हार मान ले? आधुनिक युग की अतिबुद्धिवादी पीढ़ियों के सामने यही सवाल है-क्या मनुष्यता को, जो अनंत का गुणांश है, चंद मनुष्यों के हाथों अंत हो जाने दें।
    विकल्प? क्रांति-न हिंसक, न अहिंसक-आत्मक्रांति!
    नर्मदांचल की प्रकृति और नियति के कोमल-कठोर प्रश्नों से गुंथी, एक अनुप्रेरक प्रेम-कथा जो मानवीय संबंधों के आदर्श एवं यथार्थ के अनछुए पक्षों को उजागर करती हुई, अनुभूत तथ्यों एवं कथ्यों से रोमांचित करती है रोष भी पैदा करती है, और होश भी जगाती है।
  • Raseedi Ticket
    Amrita Pritam
    200 180

    Item Code: #KGP-2068

    Availability: In stock


  • Sachitra Rashtriya Pratik Evam Gaurav Kosh
    GLOBAL VISION PRESS
    495 446

    Item Code: #KGP-2108

    Availability: In stock


  • Aur Aagey Badhatey Raho (Paperback)
    Dr. Rashmi
    135

    Item Code: #KGP-467

    Availability: In stock

    जीवन व साहित्य में सदुपदेश, सत्संग और सुभाषित का विशेष महत्त्व है। इनमें अनुभवों का ऐसा खजाना होता है जो किसी को भी समृद्ध कर सकता है। यही कारण है कि साहित्य में प्रारंभ से ही नीति-कथाओं का प्रचलन है। ये कथाएं प्रेरणा देती हैं, संघर्ष करना सिखाती हैं, असमंजस में उलझे मन को उचित निर्णय लेने की शक्ति देती हैं और समग्रतः जीना सिखाती हैं। ‘...और आगेबढ़ते रहो’ प्रेरक प्रसंगों की एक ऐसी ही रोचक पुस्तक है। लेखिका डॉ. रश्मि ने बड़ी कुशलता से उपयोगी जीवन सूत्रों को प्रस्तुत करते हुए उनमें निहित संदेश भी रेखांकित कर दिया है।
    इन प्रेरक प्रसंगों में मूलतः नैतिक शिक्षा छिपी है। वह नैतिकता जिसके बिना सार्थक, संतुलित और स्वस्थ मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी प्रेरक कथाएं वर्षों से समाज में सत्य, प्रेम, अहिंसा, त्याग और सहनशीलता के बीज बोती रही हैं। पहले घर-परिवार में बड़े बुजुर्ग, जैसे--दादी-दादा, नानी-नाना ऐसी बहुत सारी कहानियां सुनाते थे। बहाने-बहाने से बच्चे उनसे बहुत कुछ ऐसी बातें सीखते थे जो जीवनपर्यंत याद रहती थीं। आज समय बदल गया है। क्या बड़े, क्या बच्चे--सब अपनी-अपनी जगह व्यस्त हैं। प्रेरक प्रसंगों से भरी कहानियां सुनाने का जिम्मा पुस्तकों ने ले लिया है। इस बात का अनुभव पाठक यह पुस्तक पढ़ते हुए करेंगे। सीधी सुगम भाषा और प्रवाहपूर्ण शैली में लिखी ये रचनाएं पाठकों को प्रभावित व प्रेरित करेंगी--ऐसा हमारा विश्वास है।
  • Bhartiya Vangmay Per Divyadrishti
    Kashiram Sharma
    400 360

    Item Code: #KGP-9137

    Availability: In stock

    भारतीय वाड्मय का एक बहुत बड़ा भाग चार महास्तंभों पर आरित है। वे हैं: रामायण, पुराण और बड्ढकहा (बुहत्कथा)। सभी भारतीय भाषाओं के रचनाकारों ने आदिकाव्य रामायण, जयकाव्य महाभारत और पुराणों को अपना उपजीव्य बनाया है। संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का पर्याप्त वाड्मय ‘बड्ढ कहा’ पर भी आश्रित है। अतः इन चार महास्तंभों का सम्यक् परिचय प्राप्त किए बिना भारतीय वाड्मय का सुचारु अध्ययन संभव नहीं है। इस बात को तो लोग प्रायः स्वीकृत कर लेते हैं कि भारतीय वाड्मय भवन का बहुत बड़ा भाग इन चार स्तंभों पर टिका है पर ये महास्तंभ किस ‘घातु’ के बने हैं, यह जानारी बहुत ही कम लोगों को है। इस पुस्तका में उस धातु का परिचय कराने का विनम्र प्रयास है। वह धातु क्या है और उसका उद्गम स्थान कहा हैं, यह भी बताने का प्रयास किया गया है।
  • Do Naatak (Paperback)
    Jaivardhan
    100

    Item Code: #KGP-1323

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 
  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal (Paperback)
    Indira Mishra
    180

    Item Code: #KGP-410

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
    --राजेश जैन
  • Kavi Ne Kaha : Bhagwat Ravat (Paperback)
    Bhagwat Rawat
    90

    Item Code: #KGP-1379

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : भगवत रावत
    यह कविता पर निर्भर करता है कि वह अपने पाठक को कितनी देर अपने पास बिठाए रख सकती है, अथवा पहली बार के बाद दोबारा अपने पास बुलाने को कितना विवश कर सकती है। इस तरह कविता के पास जाने की पहल तो पाठक ही करता है। इसके बाद की जिम्मेदारी कविता पर आ जाती है कि वह कितनी अपने पाठक की हो पाती है। कितनी उसके अनुभव-संसार का रचनात्मक हिस्सा बन पाती है, जो सब कुछ छोड़कर कविता के पास कुछ पाने की गरज से आता है। 
    समाज के जिस अनुभव-संसार में पाठक रहता है, उसी समाज से रचनाकार भी आता है। जीवन की तमाम अच्छाइयों, बुराइयों, समानता, असमानताओं, विसंगतियों और जटिलताओं आदि के बीच रचनाकार जो भी कुछ ऐसा देखता है जिसे प्राप्त भाषा के माध्यम से परिभाषित या अभिव्यक्त करना संभव नहीं होता, तो उसी प्राप्त भाषा को रचनाकार न, सिरे से गढ़ता है और उसके इस प्रयत्न का प्रतिफल ही उसकी रचना होती है।
  • Kya, Kab, Kahan?
    Mahendra Raja Jain
    1100 990

    Item Code: #KGP-702

    Availability: In stock

    ‘क्या, कब, कहाँ?’ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ-ग्रन्थ है। यह राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित ‘हंस’ पत्रिका के समस्त अंकों (अगस्त 1986-अक्टूबर 2013) की विषय सूची है। लेखक, शीर्षक, विषयानुक्रमणिका के रूप में इसे तैयार किया है ‘सन्दर्भिका निर्माण’ के विशेषज्ञ महेन्द्र राजा जैन ने। उन्होंने सर्जनात्मक रुचि के साथ अत्यन्त परिश्रमपूर्वक ‘क्या, कब, कहाँ?’ को आकार दिया है। डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के शब्दों में, ‘मैं सचमुच महेन्द्र राजा जैन को हृदय से धन्यवाद देना चाहूँगा—एक पाठक के नाते, एक लेखक के नाते कि वे अपनी भाषा और साहित्य के लिए इतना महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं।’
    कई वर्षों के अथक परिश्रम से ‘हंस’ के इन अंकों की विषय सूची तैयार की गई है। लेखक, शीर्षक और विषयों के अकारादि क्रम से संयोजित इस सूची से तत्काल पता चलेगा कि ‘हंस’ में—
    ० किसी लेखक की, किसी शीर्षक की कोई रचना छपी या नहीं या कब छपी?
    ० किसी विषय की कौन-कौन सी रचनाएँ छपीं या वे किसकी लिखी हुई हैं?
    ० किसी पुस्तक की समीक्षा छपी या नहीं या कब छपी या वह किसकी लिखी हुई है?
    ० ‘हंस’ में छपी किसी रचना पर किसकी क्या प्रतिक्रिया कब छपी?
    ० ‘मेरी-तेरी उसकी बात’ में कब किस विषय पर चर्चा की गई है या किसी विषय पर कुछ लिखा गया है या नहीं?
    ० ‘काँटे की बात’ में कब किस-किस विषय पर लिखा गया है?
    ० ‘हंस’ में किसी महत्त्वपूर्ण गोष्ठी, सेमिनार आदि की रिपोर्ट छपी या नहीं या कब छपी?
    ० ‘बात बोलेगी’ और ‘समकालीन सृजन-सन्दर्भ’ में कब किस विषय पर लिखा गया है?
    इसके साथ और भी बहुत कुछ जानने योग्य।
    राजेन्द्र यादव की कीर्ति के स्थायी स्मारक ‘हंस’ के प्रत्येक पृष्ठ का अवगाहन करता यह ग्रन्थ समस्त हिन्दी प्रेमियों, पाठकों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों और बौद्धिकों के लिए पठनीय व संग्रहणीय है।
  • Manjhi Na Bajao Vanshi
    Om Bharti
    225 203

    Item Code: #KGP-1883

    Availability: In stock

    माँझी! न बजाओ वंशी
    केदारनाथ अग्रवाल के जीवन और कविता दोनों में एक अनिंद्य प्रेम का भाव विराजता है। जो जीवन में है वह कविता की परिधि से बाहर नहीं है। जहां लोग दांपत्य प्रेम को जीते हुए अपने उत्तरवर्ती जीवन तक आकर ऊब का अनुभव करने लगते हैं, वहीं केदार जी आजीवन इस प्यार से बँधे-बिंधे रहे। हिंदी की काव्य परंपरा में प्रेम का अनूठा और अद्वितीय स्थान है पर है वह परकीया प्रेम से बँधा हुआ। आधुनिक कवियों में  केदारनाथ अग्रवाल का एक विरल उदाहरण है जहाँ वे दांपत्य प्रेम में ही लौकिक-अलौकिक सुखों की अपूर्व व्यंजना कविताओं में संभव करते हैं। जमुन जल तुम जैसा संग्रह तथा अन्य संकलनों की प्रेम कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने प्रेम को दांपत्य की सुखद अनुभूतियों और संवेदना से भरा है। छायावादियों में जो प्रेम लौकिक धरातल से ऊपर उठकर दार्शनिक उपपत्तियों में पर्यवसित हो गया था, सूफी कवियों के यहाँ जो प्रेम ईश्वरीय सत्ता से लगन का पर्याय बन गया है, वह केदारनाथ अग्रवाल जैसे प्रगतिवादी कवि के यहाँ लोक में उपलब्ध प्रेम की कर्मठ जिजीविषा का पर्याय है।
    प्रेम केदारनाथ अग्रवाल की दिनचर्या का ही एक अंग रहा है। वह जीवन की मांसपेशियों में रुधिर की तरह प्रवाहित है। प्रेममय जीवन के सारे काम जीवन के काम हैं। कुरते में बटन नहीं लगी, ऊपर से वह फटा हुआ है, सारा घर अस्त-व्यस्त हो उठा है, न सोपकेस में साबुन, न तेल की एक बूँद, न खोजने से मिल पाता रूमाल, मेजपोश पर धूल, किताब पर प्याला, कॉपी पर औंधा रखा गिलास-कवि अधीर होकर संबोधित करता है पत्नी को कि घर सँवारने कब आओगी। घर की सारी शिष्ट सँवरन पत्नी की देन है-पत्नी जो प्रिय है, जिसके होने से जीवन है।
    कभी ठाकुर प्रसाद सिंह ने ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’ लिखकर रोमानी अनुभूतियों के प्रदेश में एक हलचल मचा दी थी। ‘वंशी और मादल’ के इस गीत को नवगीत के स्थापत्य में नवता के उन्मेष के रूप में देखा गया। गीत स्निग्धता के लिए जाने जाते रहे हैं, उनकी कोमल पदावलियों को केदारनाथ अग्रवाल ने अपने कवि-जीवन में एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में ग्रहण किया है। आज भी हम उनकी कविताएँ पढ़ते हैं तो लगता है, माँझी कहीं दूर वंशी बजा रहा है और उसकी टेर हमारे भीतर सुनाई दे रही है। वह किसी कान्हा की बाँसुरी से कम नहीं है। जीवन में प्रेम हो तो समूची कविता मानवीय प्रेम की व्यंजना में बदल जाती है। केदार जी ने कविता में यही किया है।
     यह संग्रह केदारनाथ अग्रवाल की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Krantikari
    Roshan Premyogi
    260 234

    Item Code: #KGP-1943

    Availability: In stock

    क्रांतिकारी
    दलित परिवार में जन्म लेने के कारण सामाजिक अस्पृश्यता और उत्पीड़न का दंश मैंने भी सहा है, इसलिए ‘क्रांतिकारी’ को पढ़ते हुए यह सवाल मेरे मन में कई बार उठा कि जिस तरह इस उपन्यास में चंद्रशेखर और केवलानंद जैसे सचेत सवर्ण लड़के दलित रामकरन के साथ खड़े हैं, मेरे साथ क्यों नहीं खड़े हुए ?
    चंद्रशेखर मुख्य पात्र है, जो चाहता है कि इलाके के गाँवों में दलितों का जीवन-स्तर ऊँचा उठे, वे संगठित हों और बराबरी पर आने के लिए लड़ें। दलितों की लड़ाई में वह अपना एक हाथ गँवा बैठता है। अंत में उसके विचारों की विजय होती है। विजय इस तरह कि दो मेधावी युवा अपने-अपने गाँव यह सोचकर आए थे कि वे यहीं पर रोजगार करेंगे और अपने साथ दलित समाज का भी जीवन-स्तर ऊँचा उठाएँगे। उनकी राह में क्षेत्रीय विधायक काँटा बोते हैं, इसलिए कि यदि रामकरन जैसे हरिजन दलितों के सर्वमान्य नेता बन जाएँगे तो हम सवर्णों का वोट बैंक टूट जाएगा। उधर चंद्रशेखर और रामकरन मिलकर दलितों को यह अहसास कराते हैं कि यदि संगठित और शिक्षित बनोगे तो कोई भी तुम्हारा उत्पीड़न नहीं कर पाएगा।
    ईशावस्या, माला और संध्या जैसे स्त्री-पात्रों को उपन्यास में महत्त्व नहीं मिला है, लेकिन सबकी कमी पूरी कर देती हैं सुन्नरी देवी। उनका संघर्ष समूची दलित स्त्री जाति का संघर्ष है। वे किसी देवी की तरह समाजियों का नेतृत्व सँभालती हैं। दरअसल दलित क्रांति की मशक्कत तीन युवा मिलकर करते हैं, लेकिन जब क्रांति होती है तो वे युवा पीछे रह जाते हैं और सुन्नरी देवी विजय का परचम लहरा देती हैं।  

  • Kahani Samgra : Govind Mishra (1st Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1581

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Malti Joshi
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-55

    Availability: In stock


  • Qabra Tatha Anya Kahaniyan
    Raj Kumar Gautam
    150 135

    Item Code: #KGP-1845

    Availability: In stock


  • Khilafat
    Govind Mishra
    430 366

    Item Code: #KGP-9374

    Availability: In stock

    ‘‘अब्बा हुजूर! हम पढ़े-लिखे लोग हैं, तो कभी मज़हबी नज़रिये से थोड़ा अलग हटकर भी हमें देखना चाहिए, अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए। दुनिया में मुसलमान जो इस वक्त एक तरह के तूफान में फँसा हुआ है, उसमें हम मुसलमानों ने ही खुद को डाला है...मिडिल ईस्ट की पाक ज़मीं पर इस्लाम के  कितने फिरके  आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, मुसलमान ही मुसलमानों को मार रहे हैं...
    हिन्दुस्तान में जिहादी, हमारे अशरफ जैसे एक-दो ही हुए। यह इसलिए कि यहाँ कितने मज़हब, कितनी जातियाँ, कितने खयालात...कितने-कितने सालों...पहले तो साथ रहने को मजबूर हुए, फिर रहने लगे, रहते-रहते एक दूसरे से लेने-देने सीखने लगे। सदियों की इस ‘चर्निंग’ को हमें पहचानना चाहिए... 
    सऊदी इस्लाम की जगह हिन्दुस्तानी इस्लाम क्यों नहीं...जो हिन्दुस्तान में कुदरतन ईजाद हो चुका है...जिस तरह इतने मज़हब यहाँ साथ रहते हैं, वैसे ही इस्लाम के मुख्तलिफ फिरके मिडिल ईस्ट या कहीं भी क्यों नहीं रह सकते...’’
    इस्लामिक स्टेट...अबूबकर बगदादी की ‘खिलाफत’ के परिवेश पर लिखा गया हिन्दी का पहला उपन्यास...आई.एस. सम्बन्धी विस्तृत जानकारियों के बीच, यहाँ कई अहं सवालों को उठाया गया है, जैसे कि आज अगर इस्लाम को दुनिया अपने सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती को रूप में देख रही है तो क्यों...इस्लाम अमन का मज़हब है या कि जंग का...दूसरे मज़हबों की तरह वक्त के साथ-साथ इस्लाम भी क्यों नहीं बदलता या खुद को बदलने देता... नौजवानों की जि़न्दगी बेहतर बनाने की बजाय वह उन्हें जिहाद की आग में क्यों झोंक देता है, लड़कियों की शिक्षा, आज़ादी...और इस सबके नीचे अन्डरकरैन्ट की तरह कश्मीर की समस्या। 
    कश्मीर की शिया लड़की, सुन्नी लड़का...दोनों में बचपन से प्रेम, उनके निष्कलुष सपने...उल्टी बहती हवा उन्हें किस तरह अपनी जद में ले लेती है और वे किस तरह बाहर निकलने की कोशिश करते हैं...अबूबकर की खिलाफत के खिलाफ उनकी खिलाफत क्या शक्ल इख्तियार करती है... 
    हर बार की तरह गोविन्द मिश्र अपने इस नये उपन्यास में फिर नये परिवेश, नये विषय के साथ प्रस्तुत हैं।
  • The 10-Pound Shred (Paperback)
    Tommy Europe
    295

    Item Code: #KGP-346

    Availability: In stock

    The 10-Pound Shred lets you bring Tommy Europe's tough-love, bootcamp-style workouts home. In just 31 days, Tommy will take you from flab to fit, helping you shed 10 poundsor more in the process. Each day has complete, easy-to- understand exercise instructions with step-by-step photos. There's no complicated flipping around to figure out what you need to be doing–and no free breaks, either! You don't need fancy equipment or even a gym membership–just a good pair of shoes and the willingness to get moving. There's also a nutritious, flexible meal plan designed to help you set a new, lifelong pattern of healthy eating. And through it all, Tommy's there with his signature blend of drill sergeant and inspiring friend, pushing you to reach higher, go faster and shred a little harder.
    Whether you have a wedding coming up, want to look great at the beach or just want to have more energy, Tommy will help you lose those 10 pounds. You're going to sweat, you're going to hurt–but you're going to love the results. So stop making excuses, put down that cupcake and pick up The 10-Pound Shred.
  • Kuchh Kharaa Kuchh Khotaa
    Raj Budhiraja
    100

    Item Code: #KGP-1877

    Availability: In stock

    सुविख्यात शिक्षाविद एवं साहित्यकार राज बुद्धिराजा की नवीन कृति है यह । दूटते-बिखरते अत्याधुनिक भारतीय समाज ने जिस प्राचीन संस्कृति की लुटिया को कुएँ में ला डुबोया है, उसे लेखिका ने अपने मन के रहट में भरा है और फिर जल-रूप प्रदान किया है । लेखिका के मन में अपार पीडा है जो उनकी कलम पर धीरे-धीरे उतरकर, कोरे कागजों पर आबदार मोती-रूप बन जाती है । लेखिका की सूक्ष्म-पैनी दृष्टि से छोटी से छोटी बात बच नहीं पाती और वह कलम के हथौड़े से पूरे समाज पर लगातार प्रहार करती चली जाती है और उसके पास हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं होता । लेखनी कभी धर्म की बात करती है, कभी दर्शन-अध्यात्म की, कभी बिखरती मानवीय संवेदना की और कभी जंग खाए रिश्तों की ।
    लगता है कि उनके दिल की गहराई पाठकों पर अमिट छाप छोड़ती है और उनकी आँखें झरने-सी झरने लगती हैँ । ढेर सारे अनुत्तरित प्रश्न सामने आ खड़े होते हैं । इन संस्मरणों का अंत प्रश्नचिह्नों से होता है । ये सभी संस्मरण लेखिका के एकाकीपन के गवाह हैं । लेखन की अंतहीन राह पर चलते-चलते कभी-कभी उन्हें एकाकीपन का अहसास होता है और वे एक बूँद प्यार के लिए तरसती रह जाती हैं । उन्हें अपनेपन की तलाश रहती है । कभी विदेशी मित्र, कभी बाल सखी, कभी युवा मित्र और कभी अनजाने रिश्तों में वे बहुत कुछ ढूँढ़ने का प्रयास करती है और उन्हें यदि एक पल के लिए कुछ मिलता है तो वे उस सुखद पल को अपनों में बाँट देती हैं । यही उनके लेखन की सफलता है, खासकर जब पाठक उनके सुर में सुर मिलाकर झूमते-झामते वृक्षों की तरह झूमने लगता है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrilal Shukla (Paperback)
    Shree Lal Shukla
    120

    Item Code: #KGP-44

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : श्रीलाल शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार श्रीलाल शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इस उम्र में', ‘सुखांत', "सँपोला', 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल', 'शिष्टाचार', 'दंगा', 'सुरक्षा', 'छुट्टियाँ', 'यह घर मेरा नहीं' तथा 'अपनी पहचान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Alif Laila Hazar Dastan
    Amrita Pritam
    160 144

    Item Code: #KGP-7822

    Availability: In stock


  • Bhartiya Thal Sena : Badhate Kadam
    A. K. Gandhi
    380 342

    Item Code: #KGP-9308

    Availability: In stock

    अनुशासन, देशप्रेम, स्वाभिमान, सेवा, उत्सर्ग और शौर्य का प्रतीक भारतीय सेना पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। धरती, आकाश और जल मार्गों पर किसी तपस्वी की भाँति एकाग्र भारतीय सेना की गौरवगाथा जितनी लिखी जाए उतनी कम है।
    प्रस्तुत पुस्तक भारतीय थल सेना: बढ़ते कदम में ए. के. गाँधी ने इस अनूठे व अप्रतिम सैन्य संगठन के विविध पक्षों पर प्रामाणिक व रोचक ढंग से लिखा है। गाँधी स्वयं भारतीय वायु सेना में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं, इसलिए उनके विवरण में तथ्यात्मकता और सूक्ष्मता है।
    लेखक ने भारतीय थल सेना के महत्त्व को कई कोणों से विवेचित किया है। भारतीय थल सेना के गौरवपूर्ण इतिहास और उसकी उपलब्धियों  को पढ़ते हुए किसी भी भारतीय का मन गर्व से भर जाएगा। सरहद पर देश की रक्षा करने के साथ आवश्यकता होने पर देश के भीतर किसी भी प्रकार की सेवा या सहायता के लिए सेना तत्पर रहती है। राष्ट्रीय पर्वों और विभिन्न खेलों में इसका हुनर और हौसला रोमांचित कर देता है। असंभव को संभव बनाने की कला भारतीय सेना को आती है।
    प्रस्तुत पुस्तक के अध्ययन से पाठक भारतीय थल सेना के प्रति अधिक आत्मीयता का अनुभव करेगा। भारत के सबसे बड़े रोजगार प्रदाताओं में से एक होने के कारण इसमें आजीविका के अवसर भी तलाशे जाते हैं। इस प्रयोजन से भी यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि पुस्तक एक गौरवशाली संगठन में चयन की विधियों पर भी सम्यव्फ प्रकाश डालती है। 
  • Spandit Pratibimb
    Amar Nath 'Amar'
    150 135

    Item Code: #KGP-1857

    Availability: In stock

    स्पन्दित प्रतिबिम्ब
    संघर्ष का चिराग
    जीवन के अंधेरे पलों में
    रोशनी के लिए
    संघर्ष
    जब बढ़ जाता है
    तब
    सन्नाटों को बुनते हुए
    खुद चिराग़ बन
    जल उठता हूँ मैं!
    हाँ
    यही परिभाषा
    बन गई है जिदंगी की !
    गंगा की धारा में
    मेरी खुशियों, उमंगों 
    और लक्ष्यों का
    प्रतिबिम्ब उभरता है
    अक्सर
    चाँदनी के बीच
    और फिर जीवन
    गीत बन जाता है
    लहरों के संग चलकर
    घुप अँधेरे के
    साए में भी !
    [इसी पुस्तक से]
  • Namvar Hone Ka Arth
    Bharat Yayavar
    500 450

    Item Code: #KGP-9012

    Availability: In stock

    नामवर होने का अर्थ
    प्रस्तुत पुस्तक नामवर सिंह के जीवन एवं साहित्य का एक पाश्र्वचित्र या प्रोफाइल है। इसे सही मायनों में ‘जीवनी’ भी नहीं कहा जा सकता। कोशिश यह रही है कि उनके जीवन एवं साहित्य का एक सामान्य परिचय इस पुस्तक के द्वारा प्रस्तुत हो जाए। इस कोशिश में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह स्वयं नहीं कह सकता। बस निश्चयपूर्वक इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उनके जीवन एवं साहित्य को जानने-समझने का यह मेरा विनम्र प्रयास है।
    बात उस समय की है, जब मैं साहित्य की दुनिया में अपनी आँखें खोल रहा था। यह बीसवीं शताब्दी का आठवाँ दशक था और मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी था। उन्हीं दिनों मैंने नामवर जी की तीन पुस्तकें खरीदीं और पढ़ी थीं-- ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’। इनमें उनकी ‘छायावाद’ पुस्तक मुझे तब बहुत अच्छी लगी थी और आज भी उनकी सभी पुस्तकों में यही मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। 
    1982 ई. की गर्मियों में मैं दिल्ली गया। उन्हीं दिनों एक दिन मुझसे त्रिलोचन जी ने कहा कि नामवर अपने समय के एक समर्थ कवि थे, उनकी कविताओं को खोजकर पुस्तक-रूप में प्रकाशित कीजिए। इन कविताओं की खोज के साथ-साथ तभी मैंने प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने का मन बना लिया था। खोज की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर यह पुस्तक तैयार की।
    मैं यह भी स्पष्टीकरण कर देना चाहता हूँ कि यह पुस्तक एक सहयोगी प्रयास है। इसमें सबसे ज्यादा नामवर जी की विलुप्त रचनाएँ दी गई हैं। उनसे संबंध रखने वाले लेखकों के संस्मरण एवं पत्रों का भी उपयोग इसमें हुआ है। इस सहयोगी प्रयास में जिन लेखकों के वक्तव्य या कथन का इसमें प्रयोग किया गया है, उनके प्रति मैं आभार स्वीकार करता हूँ।
    -
    भारत यायावर
  • Taahliyan
    Santosh Shelja
    110 99

    Item Code: #KGP-9300

    Availability: In stock

    जब रांझलू को दूल्हा बना पालकी में बिठा बारात चलने लगी, तभी शोर मच गया-‘फुलमां ने जहर खा लिया!’ रांझलू के कानों मेंये शब्द तीन-से लगे। वह झपटकर पालकी से उतर पड़ा। मां-बाप ने लाख रोका, अपशकुन का वास्ता दिया; पर रांझलू के लिए तो मानो प्रलय आ गई थी। वह भागता हुआ वहां जा पहुंचा जहां उसकी संगिनी बेजान लाश बनी पड़ी थी। बरसती आंखों और कांपते हाथों से उसने फुलमां की अरथी को कंधा दिया। श्मशाम घाट में उसने अपने हाथों से उसे चिता पर रखा और जैसे कोई पति अपनी पत्नी को विदा करता है, वैसे ही अपनी लाल चादर उसे ओढ़ाकर उसने चिता को आग लगा दी। आज तक ऐसा न किसी ने देखा, न ही सुना था। रांझलू ने अपनी फुलमां को सबके सामने सुहागिन बना के भेजा। उसके गीत आज तक पहाड़ों में गाए जाते हैं।
    —इस संग्रह की कहानी ‘फुलमां’ से
  • Angaaron Main Phool
    Santosh Shelja
    140 126

    Item Code: #KGP-1981

    Availability: In stock

    अंगारों में फूल
    माँ का अडिग साहस देख तिलक विस्मित थे । आज पहली बार मां व बाबा को अपने दु:ख का संवेदनशील श्रोता मिला था । इस लंबी वार्ता में तीनों की आँखें कईं बार गीली हुई और कई बार गर्व से छाती फूल उठी । जाने से पहले लोकमान्य ने झुककर माँ व बाबा के चरण स्पर्श किए और रुँधे कंठ से कहने लगे,  गौरवशाली बलिदान का श्रेय न मुझे है न उन्हें है-बल्कि सचमुच में इसका श्रेय आपको और आपकी बहुओं को है । गीता पढ़ना सरल है मां, पर उसे वास्तविक जीवन में उतारना बहुत ही कठिन है । एक बार मरना संभव है, किन्तु इस प्रकार मरण  को हृदय से लगाए हुए जिंदा रहना बहुत असंभव है । पर अपने वही कर दिखाया... धन्य है आप!'
    [इसी पुस्तक से]
  • Kahani Samagra : Nasera Sharma(3Vols.)
    Nasera Sharma
    2100 1785

    Item Code: #KGP-375

    Availability: In stock

    प्रख्यात कथा-लेखिका नासिरा शर्मा की कहानियाँ  समकालीन स्त्री रचनाकारों की कहानियों से कई मायनों में अलग और सर्वथा नई परिभाषा गढ़ती हुई नजर आती हैं । उनके यहाँ इनसानी रिश्ते केवल खून से ही नहीं, संवेदनाओं के उन तंतुओं से निर्मित होते हैं, जो इनसानियत के वजूद को बचाए रखने के लिए जारी हैं ।
    पहले खंड की कहानियाँ परिवार, देश-समाज की सीमा को लाँघते हुए ईरान तक की यात्रा कराती हैं । ईरान के अपने प्रवास काल के दौरान लेखिका ने जिस शिद्दत से वहाँ की जीवनशैली, संस्कृति को आत्मसात् किया, उसको बहुत प्रभावी ढंग से उन्होंने इन कहानियों में अभिव्यक्त भी किया है ।  इस बहाने भारत और ईरान के प्राचीन रिश्तों की भी लेखिका शिनाख्त करती हैँ। इस खंड की कई कहानियों में लेखिका अपने अतीत के पन्ने उलटते हुए उन क्षणों को वर्तमान संदर्भों से पुन: जीवंत करने का प्रयत्न करती है, जिन पर समय की बेशुमार परतें चढ़ चुकी हैं । दरअसल इन कहानियों के जरिए लेखिका अपने अतीत में घटित उन सामाजिक-राजनीतिक घटनाओँ की पड़ताल बदले हुए समय में करती हैं, जिनका संबंध वर्तमान से विच्छेद नहीं हुआ है ।
    दूसरे खंड की कहानियाँ इनसान के भीतर मौजूद शैतान को बाहर खींच निकालती हैं। सत्तालोलुपता की हवस में इनसान के हैवान में रूपांतरण की ये कहानियाँ अनेक सवालों को उठाती हैं। धर्म-स्थापना के नाम पर किसी भी प्रकार के अधार्मिक और अमानवीय क्रियाकलापों को जायज़ ठहराने वाली बीमार मानसिकता को भी ये कहानियाँ अनावृत करती हैं। इन कहानियों में समाज के निचले तबके के उन लोगों के दारुण यथार्थ की तस्वीर भी मौजूद है, जो अपना सब कुछ न्योछावर करके किसी भी देश-समाज की सांस्कृतिक नींव तैयार करते हैं। बावजूद इसके शक्तिसंपन्न और सामंती मानसिकता के लोग उनका शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं।
    तीसरे खंड में लेखिका द्वारा पिछले तीन दशक में लिखी गई कहानियाँ सम्मिलित हैं । इनमें कुछ लंबी और कुछ लघु कथाएँ भी हैं । कथानक और घटनाक्रम के आधार पर इस खंड की कहानियाँ पूर्ववर्ती दो खंडों की कहानियों से कूछ अलग नजर आती हैं । इसका कारण यह है कि इस खंड की कहानियों में लेखिका ने अपनी दृष्टि के  विस्तार को थोड़ा संघनित किया है । यही वजह है कि इनमें देश-समाज-राजनीति-इतिहास से जुड़ी कहानियों के स्थान पर इनसानी नस्ल की प्रवृतियों पर आधारित कहानियाँ पढ़ने को मिलती हैं । बहुत कम लेखक ऐसे होते हैं, जिनकी आँखें बारीक़ से बारीक रेशे को पकड़ती हैं, जिनके कान महीन से महीन आवाज को सुनते हैं और नाक हलकी से हलकी गंध ग्रहण करती है । ऐसे लेखकों को हम सहस्राक्षी लेखक भी कह सकते हैं । नासिरा शर्मा भी ऐसी ही लेखिका ।
    इनसानी मनोविज्ञान का गहन विश्लेषण करती ये कहानियाँ लेखिका के भाषा-प्रवाह और ट्रीटमेंट के प्रति सजगता को भी प्रमाणित करती हैं ।
  • Megha Megha Pani De
    Madhukar Singh
    60

    Item Code: #KGP-1155

    Availability: In stock

    मेघा-मेघा पानी दे
    (एक प्राचीन ऐतिहासिक कथा पर आधारित नाटक)

    गांव की एक डगर। सामने बड़ा-सा चरागाह है। कृष्ण एक ऊंचे टीेले पर बैठा है। तीन-चार लड़के कुछ दूरी पर एक-दूसरे से कटे हुए बैठे हैं। कृष्ण की बंसी के स्वर धीरे-धीरे तेज होते जा रहे हैं।
  • Tremontana
    Urmila Jain
    320 288

    Item Code: #KGP-9371

    Availability: In stock

    गैबरील गार्सिया मार्कवेज की कहानियों के अनुवाद का संग्रह ट्रेमोण्टाना उत्सवी तथा जीवन की विलक्षणताओं से भरपूर है। ये कहानियां मार्कवेज की उदारता तथा पात्रों को महसूस करने से अपनी ताकत बटोरती हैं जो अच्छी भी हैं, खराब भी और अशिष्ट भी पर निर्दोष हैं। तभी तो मार्कवेज की गणना शताब्दी के स्मरणीय लेखकों में की जाती है और उन्हें किसी भी भाषा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण लेखक माना जाता है। उन्हें 1982 में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था। पाठक निश्चित ही इन कहानियों को पढ़कर प्रमुदित होंगे।
  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap
    M.A. Sameer
    250 225

    Item Code: #KGP-9331

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Vo Tera Ghar Ye Mera Ghar
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-181

    Availability: In stock

    वो तेरा घर, ये मेरा घर
    इस बंगले के गृह-प्रवेश पर मां-पिताजी दोनो आए थे । बंगले की भव्यता देखकर खुश भी बहुत हुए थे, पर माँ ने उसांस भरकर कहा था, 'सोचा था, कभी-कभार छुट्टियों में तुम लोग आकर रहोगे, पर अब यह महल छोड़कर तुम उस कुटिया में तो आने से रहे।'
    उन्होने कहा था, 'हम यहाँ भी कहाँ रह पाते है मां । नौकरी के चक्कर में रोज तो यहाँ से वहाँ भागते रहते हैं। यहाँ तो शायद पेंशन के बाद ही रह पाएंगे । मैं तो कहता हूँ आप लोग वह घर बेच दो । पैसे फिक्स डिपॉजिट में रख दो या लड़कियों को दे दो और ठाठ से यहाँ आकर रहो ।'
    'न बेटे! मेरे जीते-जी तो वह मकान नहीं बिकेगा,' पिताजी ने दृढ़ता के साथ कहा था, 'हमने बड़े अरमानों से यह घर बनाया था । इसे लेकर बहुत सपने संजोए थे । अब वे सारे सपने हवा हो गए, यह बात और है।'
    'ऐसा क्यों कह रहे है पिताजी । इस घर ने आपको क्या नहीं दिया ! हम सब इसी घर से पलकर बड़े हुए हैं। हम चारों की शादियां इसी घर से हुई हैं। बच्चों की शिक्षा- दीक्षा और शादियां—मां-बाप के यही तो सपने होते हैं ।'
    'हाँ, यह भी तुम ठीक ही कह रहे हो । मैं ही पागलों की तरह सोच बैठा था कि यह घर हमेशा इसी तरह गुलजार रहेगा। भूल ही गया था कि लडकियों को एक दिन ससुराल जाना है । लड़कों को रोजगार के लिए बाहर निकलना है । और एक बार उड़ना सीख जाते है तो पखेरू घोंसले में कहाँ लौटते हैं। अब मुझें अम्मा-बाबूजी की पीड़ा समझ में आ रही है ।'
    "कैसी पीडा?'
    ‘पाँच-पाँच बेटों के होते हुए अंत में अकेले ही रह गए थे दोनों । अम्मा तो हमेशा कहती थी, अगर मैं जानती कि पढ-लिखकर तुम लोग बेगाने हो जाओगे तो किसी को स्कूल नहीं भेजती । अपने आँचल से छुपाकर रखती ।'
    और अपने अम्मा-बाबूजी की याद में पिताजी की आँखें छलछला आई थी ।
    -[इसी संग्रह की कहानी 'साँझ की बेला, पंछी अकेला' से]

  • Yah Ant Naheen (Paperback)
    Mithileshwar
    250

    Item Code: #KGP-36

    Availability: In stock

    यह अंत नहीं

    अंतहीन बनती समस्याओं के खिलाफ मानवीय संघर्ष की विजयगाथा का जीवंत उपन्यास। जीवन की सकारात्मक चेतना और अपराजेय मानवीय जिजीविषा का सार्थक उद्घोष। ग्रामीण जीवन की जमीनी सच्चाई का बेबाक चित्रण। चुनिया और जोखन के रूप में अविस्मरणीय चरित्रों का सृजन। हिंसा, द्वेष और नफरत के विरुद्ध सहज मानवीय संबंधों की स्थापना। गहन मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज। हिंदी उपन्यास के समकालीन दौर में कलावाद और यथार्थवाद के द्वंद्व को पाटने वाला एक मजबूत सेतु। एक तरफ भाषा की रवानगी और खिलंदड़पन तो दूसरी तरफ जमीनी सच्चाइयों का अंकन। भाषा, शिल्प और कथ्य के स्तर पर एक सशक्त कृति। बीसवीं शताब्दी को एक स्तरीय और यादगार उपन्यास

  • Jhoothe Aakash
    Rajesh Jain
    50 45

    Item Code: #KGP-9063

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Nagar
    Vishnu Nagar
    150 135

    Item Code: #KGP-1872

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: विष्णु नागर
    कविता की दुनिया में तीन दशक से भी अधिक सक्रिय विष्णु नागर की प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में आपको उनकी कविताओं में समय के साथ आता बदलाव तो दिखाई देगा ही, यह भी दिखाई देगा कि वह सिर्फ व्यंग्य और विडंबना के कवि नहीं हैं। उनकी कविता में जीवन के अनेक पक्ष हैं, क्योंकि वह जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने का प्रयास करते हैं। वह अपने समय की राजनीति और समाज की विडंबनाओं को भी देखते हैं और जीवन के विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली करुणा, प्रेम, हताशा, विनोद को भी। उनके यहाँ जीवन की आपाधापी में लगे लोगों पर भी कविता है और अपने प्रिय की मृत्यु की एकांतिक वेदना को सहते लोगों पर भी। उनकी कविता से गुजरना छोटी कविता की ताकत से भी गुजरना है जो अपनी पीढ़ी में सबसे ज्यादा उन्होंने लिखी है। उनकी कविता से गुजरना कविता की सहजता को फिर से हासिल करना है। उनकी कविता से गुजरना व्यंग्य और करुणा की ताकत से गुजरना है। उनकी कविता से गुजरना अपने समय की राजनीति से साहसपूर्ण साक्षात्कार करना है। उनकी कविता से गुजरना विभिन्न शिल्पों, अनुभवों, संरचनाओं से गुजरना है और इस अहसास से गुजरना है कि विष्णु नागर सचमुच अपनी तरह के अलग कवि हैं। उनकी कविता को पढ़कर यह नहीं लगता कि यह किसी के अनुकरण या छाया में लिखी गई कविता है। यह मुक्ति के स्वप्न की कविता है, संसार के बदलने की आकांक्षा की कविता है। यह इतनी स्वाभाविक कविता है, जितनी कि हिंदी हमारे लिए है।
  • Benaras : A Journey Within (Memoirs)
    Roli Jindal
    295 266

    Item Code: #KGP-345

    Availability: In stock

    Benaras – A city so beautiful, even the Ganges changed course and flowed north to be able to swing by it. Lord Shiva located this beautiful city on the tips of his trident, and came here to live the life of a householder with his wife. He is in the very spirit and very soul of the city. With Moksha promised to those that die here, Benarasis, it is said, want to make the most of their last life on earth. Eat, drink and be merry, for never again shall you live. Amazingly, in this day and age, a lot of those ‘eats’ and ‘drinks’ have still not travelled out of the city. With unique flavours, a distinct gharana of classical music, deep-rooted traditions of dance, a spectacular riverfront, a world-renowned seat of learning, a tolerant social fabric as rich as the luxurious saree, and the fabled Benarasi banter, life in Benaras is not the same as everywhere else.
    What is it like to live here? With local insight, Roli Jindal takes you beyond the tourist guides deep inside the heart of Benaras and shows you how this bustling, crowded city retains its spiritual core and its unique culture, while staying perfectly in sync with modern times. This is a personal, insider view of what life is like in this very interesting city.

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya
    Ravindra Kalia
    180 162

    Item Code: #KGP-74

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Hindi Ghazal, Yaani…
    Dixit Dankauri
    190 171

    Item Code: #KGP-9086

    Availability: In stock


  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah (Vol.-2)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    650 585

    Item Code: #KGP-603

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (2)
    (आजादी के नीतिकार)
    आँखों देखे ये वृत्तांत स्मृतियों के जीवत कालखंड भी है । इनमें राजनीतिक हलचलें हैं तो आत्मीयता यानी अपनेपन में पगी अविस्मरणीय, दुर्लभ घटनाएँ भी ।
    सूमित्रा जी साक्षी रहीं उस परिवर्तन के दौर की, इसलिए उनकी दृष्टि व्यापक एवं विस्तृत रही । उन्होंने सीमित दायरे के बावजूद असीमित परिधि को छुआ है । इसलिए गांधी जी को समझने में यह कृति हर अर्थ में सहायक सिद्ध होगी ।
    उस दौर में विश्व में क्या-क्या हुआ, उसका सहज आकलन भी इनमें दीखता है । 'जलियाँवाला बाग़' नरसंहार के दिल को दहला देने वाले दृश्य ! डेढ़ हजार से अधिक निर्दोष लोग भून दिए गए । जनरल डायर की इस दानवीय लीला ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया था ।
    'साबरमती आश्रम' गांधीवादी विचारों की प्रयोगशाला बना । चंद्रभागा और साबरमती नदी के बीच, बबूल की कँटीली झाडियों कै पार्श्व में एक नए संसार की साधना हुई-खुले आसमान के नीचे ।
    यह आश्रम कब तीर्थ बना, पता ही नहीं चला । 
    'चंपारण', 'खेड़ा सत्याग्रह', 'साइमन कमीशन’, 'नोआखली', 'बिहार को कौमी आग' अनेक प्रसंग हैं, जो अनेक अर्थों से उल्लेखनीय है ।
    सुमित्रा जी ने गांधी जी के उन पक्षों पर भी प्रकाश डाला, जो महत्त्वपूर्ण है, जिनके बारे में लोग अधिक नहीं जानते । क्योंकि उन्होंने यह सब स्वयं घटित होते देखा है, इसलिए प्रामाणिक भी कम नहीं ।
    हैदराबाद रियासत का भारत में विलय-प्रसंग भी कम रोचक नहीं । कासिम रिजवी का दिल्ली के लाल किले पर अपना झंडा फहराने का सपना सपना ही रह गया । हैदराबाद मुक्ति के पश्चात सरदार पटेल ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर दिल्ली बुलाया । लाल किले पर तो कासिम अपनी ध्वजा नहीं फहरा पाए, हाँ, लाल किले के तहखाने में कैद कर उसे अवश्य रखा गया । उन पर मुकदमा चला और आजीवन कैद की सजा मिली ।
    ऐसे अनेक प्रसंग, विचारोत्तेजक ।
    --हिमाशु जोशी
    15 अगस्त, 2009
  • Paisa Aapka Bhavishya Aapka (Paperback)
    Ajay Shukla
    175

    Item Code: #KGP-7220

    Availability: In stock

    ‘अर्थ’ (धन) इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसे ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ में शामिल किया गया है। कोई भी युग हो, कोई भी देश, कोई भी सभ्यता हो या कोई भी संस्कृति—रुपयों के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन रहा है। आज तो चारों ओर पैसे का बोलबाला है। उसकी चमक और खनक के सामने सब फीका है। ...और यह जरूरी भी है कि सुखपूर्वक जीवन की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए किसी भी व्यक्ति के पास यथेष्ट पैसा हो।
    प्रश्न है कि पैसा किस तरह बचाया और बढ़ाया जाए। सीमित आय वालों को ‘मनी मैनेजमेंट’ सिखाने के लिए ही अजय शुक्ला ने पैसा आपका भविष्य आपका नामक पुस्तक लिखी। आसान भाषा और दिलचस्प शैली में यह पुस्तक पाठकों को बताती है कि छोटी-छोटी बचतों और कुछ सावधानियों से भविष्य के लिए पैसा बचाया जा सकता है। बुढ़ापे में जब कमाने की शक्ति नहीं रहती, अनेक तरह की हारी-बीमारी घेर लेती हैं और कई बार जब अपने भी मुंह मोड़ लेते हैं तब बचाया हुआ पैसा ही काम आता है। किसी ने कहा है कि पैसा भगवान् तो नहीं है, पर भगवान् से कम भी नहीं है।
    प्रस्तुत पुस्तक को जिन अध्यायों में संयोजित किया गया, वे हैं—बचत प्रबंधन, बीमा, इंटरनेट का प्रयोग, मुद्रास्फीति, आयकर, निवेश के मूल सिद्धान्त, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, निवेश के साधन, स्वर्ण में निवेश, घर/प्राॅपर्टी में निवेश, पोर्टफोलियो बनाना, वसीयतनामा, रिटायरमेंट प्रबंधन। इन अध्यायों को पढ़कर सुखी, निश्चिंत  व धन संपन्न भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
  • Aagaami Ateet
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-210

    Availability: In stock


  • Hamare Jeevan Moolya-2
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1157

    Availability: In stock


  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    995 896

    Item Code: #KGP-580

    Availability: In stock


  • Vichaar-Bindu (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    200

    Item Code: #KGP-456

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।
    -अटल बिहारी वाजपेयी
  • Lohit
    Anita Sabharwal
    400 360

    Item Code: #KGP-9375

    Availability: In stock

    ‘लोहित’ उपन्यास विचारोत्तेजक कथानक और उत्कृष्ट भाषा-शैली वेफ कारण समकालीन कथा साहित्य में अनूठी संवेदना के साथ अभिव्यक्त होता है। लेखिका अनिता सभरवाल ने देश और व्यक्ति की नियति का जो सघन चित्राण प्रस्तुत किया है वह अद्भुत है। उपन्यास की कथावस्तु असम प्रदेश के परंपरागत जीवन प्रवाह के साथ वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक परिवेश को आत्मसात् कर विकसित हुई है। असम की सामाजिक कुरीतियों (विशेषकर जातिवाद) के कारण उत्पन्न पीढ़ी-संघर्ष का ज्वलंत वर्णन किया गया है। युवा वर्ग के भटकाव का यथार्थस्वरूप रचनाकार ने वहां रहते हुए देखा, अनुभव किया। हितेन और जोयमती जैसे मुख्य चरित्रों के द्वारा लेखिका ने उस रोशनी की तलाश की है जो तनाव, अवसाद, विघटन, हताशा और मोहभंग के घने अंधकार में न्याय, समानता, एकता की उम्मीद जगाती है।
    उल्लेखनीय है कि असम के जन्म से लेकर आज तक उसके प्रत्येक स्पंदन का साक्षी ब्रह्मपुत्र नद इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र है। इसे लोहित, लौहित्य, दिहांग, सियांग जैसे नामों से भी पुकारा जाता है। पौराणिक अवधारणाओं व वर्तमान वैचारिक सक्रियताओं को लोहित कथा एवं आत्मसंवाद के सहमेल से प्रस्तुत करता है। लोहित का आत्मस्वीकार है, ‘मैं क्या करूं? मैं तो कहीं जा भी नहीं सकता। ...यहां के दुःख भी मेरे, सुख भी मेरे। फर्क बस इतना है कि मेरे दुःख किसी को दिखाई नहीं देते।’ अगोचर दुःखों और संघर्षों का पठनीय वर्णन पाठकों के हृदय को छू लेगा, यह विश्वास है। यह मानो ‘असम की आत्मकथा’ ही है।
  • Dushyant Ke Jaane Par Doston Ki Yadein (Paperback)
    Kamleshwar
    90

    Item Code: #KGP-1381

    Availability: In stock


  • Lekhak Ki Chherchhar
    Kashi Nath Singh
    350 315

    Item Code: #KGP-434

    Availability: In stock

    लेखक की छेड़छाड़ 
    आलोचना की भाषा और रचना की भाषा एक नहीं हो सकती–इस मानने वाले लोग हैं लेकिन काशीनाथ सिंह ऐसे लेखक हैं जिनका प्रबल विश्वास है कि आलोचना भी रचना है । 'लेखक की छेड़छाड़' में उनके इस विश्वास के आधार देखे जा सकते हैं । काशीनाथ सिंह के मूल स्वभाव यहाँ भी देखा जा सकता है–बतकही, चुहल और मजे-मजे में जमाने भर की बात कह देना । वे अपने साथ चलने वाले समकालीनों के काम पर नजर डालते हैं तो अग्रजों को अघर्य  भी देते हैं । उनके अपने कहानी लेखन के अंतरसूत्रों को जानना हो या अभी-अभी के नए कथा परिदृश्य का सिंघावलोकन, यहाँ सब मौजूद है । 'अपना मोर्चा' और 'कशी एक अस्सी' जैसे कालजयी उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया में केवल शोधार्थियों की ही दिलचस्पी नहीं हो सकती और न ही लेखक की सामाजिक भूमिका पर बहस पर किन्हीं ख़ास पाठकों की। यह एक अनुपम गद्य सर्जक के ही बुते की बात है कि वह धूमिल जैसे कवि पर आलेख लिखता है तो गोदान का नए जमाने में महत्त्व भी खोज पाता है । यहां भी काशीनाथ सिंह की पहले दर्जे की गद्य सर्जन का आस्वाद लिया जा सकता  है जो आलोचना, लेख, मूल्यांकन, समीक्षा या स्मृति लेख के रूप में आए हैं । यह लेखक की छेड़छाड़ तो है लेकिन इस छेड़छाड़ की व्यंजन गहरी है और मार दूर तक जाने वाली है । 
  • Vyangya Samay : Ravindranath Tyagi (Paperback)
    Ravindra Nath Tyagi
    225

    Item Code: #KGP-7218

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ त्यागी का रंग व्यंग्य में सबसे निराला है। उनका अध्ययन व्यापक था। स्मृति अच्छी होने से संदर्भ सामने रहते थे। संदर्भों को प्रसंग देकर रचने की विलक्षण योग्यता उनके पास थी। यही कारण है कि त्यागी के व्यंग्य पढ़ते हुए पाठक को आनंद के साथ ज्ञान भी उपलब्ध होता है। बतरस इतना है कि गांव की गोरी पर लिखते हुए प्राकृत से लेकर पेरिस तक अभिव्यक्ति का विस्तार हो सकता है। व्यंग्य में सहज हास्य के वे आचार्य हैं। दफ्रतरशाही,  शृंगार, प्रकृति और अद्भुत तथ्य–प्रायः इन क्षेत्रों से वे विषय चुनते हैं। संस्कृत और अन्य भाषाओं से उद्धरण देते हुए त्यागी व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय प्रश्नों तक बात करते हैं। कई बार लगता है कि उनके लेखन का उद्देश्य निर्मल हास्य की सृष्टि करना है। यह कठिन काम उन्होंने सरलता से किया है। हास्य में आ जाने वाली दुराग्रही वृत्ति उनके लेखन में नहीं है। वे सिद्धांतो से नहीं, आसपास के तथ्यों या व्यक्ति वैचित्रय से हास्य के क्षण निर्मित करते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में रवीन्द्रनाथ त्यागी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Goma Hansti Hai
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-1991

    Availability: In stock

    गोमा हंसती है
    शहरी मध्यवर्ग के सीमित कथा-संसार में मैत्रीय पुष्पा का कहानियाँ उन लोगों को लेकर आई हैं, जिन्हें आज समाजशास्त्री 'हाशिए के लोग' कहते है । वे अपनी 'कहन' और 'कथन' में ही अलग नहीं हैं, भाषा और मुहावरे में भी ‘मिट्टी की गंध' समेटे हैं ।
    'गोमा हंसती है' की कहानियों के केंद्र में है नारी, और वह अपन सुख-दु:खों, यंत्रणाओं और यातनाओं में तपकर अपनी स्वतंत्र पहचान माँग रही है । उसका अपने प्रति ईमानदार होना ही 'बोल्ड' होना है, हालाँकि यह बिलकुल नहीँ जानती कि वह क्या है, जिसे 'बोल्ड होने' का नाम दिया जाता है । नारी-चेतना की यह पहचान या उसके सिर उठाकर खड़े होने में ही समाज की पुरुषवादी मर्यादाएं या महादेवी वर्मा के शब्दों में 'श्रृंखला की कडियाँ' चटकने-टूटने लगती है । वे औरत को लेकर बनाई गई शील और नैतिकता पर पुनर्विचार की मजबूरी पैदा करती है । 'गोमा हंसती है' की कहानियों की नारी अनैतिक नहीं, नई नैतिकता को रेखांकित करती है ।
    इन साधारण और छोटी-छोटी कथाओं को 'साइलैंट रिवोल्ट' (निश्शब्द विद्रोह) की कहानियाँ भी कहा जा सकता है क्योंकि नारीवादी घोषणाएँ इनसे कहीं नहीं है । ये वे अनुभव-खंड है जो स्वयं 'विचार' नहीं हैं, मगर उन्हीं के आधार पर 'विचार' का स्वरूप बनता है ।
    कलात्मकता की शर्तों के साथ बेहद पठनीय ये कहानियाँ निश्चय ही पाठको को फिर-फिर अपने साथ बॉंधेंगी, क्योंकि  इनमें हमारी जानी-पहचानी दुनिया का वह 'अलग' और 'अविस्मरणीय' भी है जो हमारी दृष्टि को माँजता है।
    इन कहानियों की भावनात्मक नाटकीयता निस्संदेह हमें चकित भी करेगी और मुग्ध भी। ये सरल बनावट की जटिल कहानियां है ।

    'गोमा हँसती है' सिर्फ एक कहानी नही, कथा-जगत्की एक 'घटना' भी है । -राजेन्द्र यादव

  • Bharat Ke Pramukh Sahityakaron Se Antrang Baatcheet
    Ranvir Rangra
    450 405

    Item Code: #KGP-234

    Availability: In stock

    भारत के प्रमुख साहित्यकारों से अन्तरंग बातचीत
    किताबघर प्रकाशन श्रेष्ठ भारतीय साहित्य के आदान-प्रदान से भी सक्रिय रहा है । भारतीयता और भारतीय साहित्य की अंतर्धारा को समझने के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपनी भाषा की सीमारेखाओं से बाहर भी झाँकें । प्रमुख भारतीय साहित्यकारों को एक मंच पर लाने की दिशा में हमारा पहला अभिनव प्रयोग था 'भारतीय लेखिकाओं से साक्षात्कार' । प्रस्तुत प्रकाशन उसी की अगली कड़ी है जिससे भारत के पच्चीस साहित्यकारों से इस विधा के विशेषज्ञ डॉ० रणवीर रांग्रा की अन्तरंग बातचीत सम्मितित है, जिसके माध्यम से अनेक ऐसे रचना-रहस्य प्रकाश में आए हैं जिनसे अब तक हिंदी-जगत ही नहीं, भारतीय साहित्य-समाज भी अनभिज्ञ था ।
    इस प्रकार, यह पुस्तक मात्र एक और प्रकाशन नहीं, बल्कि एक दस्तावेज से जिसका उपयोग भारतीय साहित्य के संदर्भ-ग्रंथ के रूप में भी किया जा सकता है । आशा हैं, इससे प्रबुद्ध पाठको की अनेक जिज्ञासाओं का समाधान हो सकेगा और उन्हें एक ऐसी अंतर्दूष्टि प्राप्त होगी जिससे समकालीन भारतीय साहित्य की आत्मा तक पहुंचने में सहायता मिलेगी ।
  • Sachitra Vigyan Va Praudyogiki Vishvakosh (3 Vols.)
    Vinod Kumar Mishra
    1950 1755

    Item Code: #KGP-570

    Availability: In stock

    सचित्र विज्ञान व प्रौद्योगिकी विश्वकोश (3 खंडों में)
    प्रसिद्ध फ्रांसीसी गणितज्ञ आलेम्बर्त के विषय में कहा गया, "इसकी प्रतिभा फ्रांसीसी विश्वकोश ( 1751-1780) के प्रणयन में अधिक काम आई।" दूसरे शब्दों में गणित की खोजों की कीमत में भाषा की सेवा हो गई। ऐसा भारतीय भाषाओं के संदर्भ में हो ही नहीं सकता, क्योंकि भाषा-सेवा को यहाँ दोयम दर्ज का काम समझा जाता है। यूरोप में भाषा-सेवा देश-सेवा का पर्याय मानी जाती रही, जिस कारण वहाँ विश्वकोशों की परंपरा सदियों पुरानी है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध विश्वकोश 'ब्रिटानिका' का प्रथम संस्करण 1768-1771 में छपा था।
    हिंदी प्रदेश में बीसवीं सदी के आरभ में हिंदी ‘शब्द-सागर को योजना हाथ में ली गई। इसमें तत्कालीन हिंदी के मूर्धन्य आचार्य जुट गए। कार्य को दिशा मिल गई और शब्दकोश-निर्माण की अच्छी परंपरा विकसित हो गई । आज हिंदी में अनेक अच्छे शब्दकोश हैं, यह बात विश्वकोशों के विषय में नहीं कहीं जा सकती। विश्वकोश-निर्माण के भी अनेक प्रयास हुए, पर सामूहिक प्रयासों से इस विधा का क्रमिक विकास नहीं हो पाया। संस्थागत और व्यक्तिगत  प्रयासों से व्यापक या विषयवार दोनों प्रकार के विश्वकोशों का निर्माण हुआ । 
    व्यक्तिगत प्रयास से बने विश्वकोश का एक उदाहरण प्रस्तुत पुस्तक श्रृंखला है। इसके प्रणेता सिद्धहस्त हिंदी लेखक श्री विनोद कुमार मिश्र एक इंजीनियर हैं। इनकी कर्मठता और लगन ने इस ग्रंथ को आकार दिया है। फिर भी मानना पड़ता है कि इनका ज्ञान इंजीनियरी और भौतिक विज्ञानों तक ही सीमित था। सौभाग्य से पुनरीक्षक ऐसे मिल गए, जिनको कोशकला का पर्याप्त अनुभव था और वे जीव विज्ञानों के अध्येता रहे। प्रकाशक ने भी विलक्षण धैर्य और साहस का परिचय दिया । इन सभी सकारात्मक कारकों के योगदान से एक अच्छे ग्रंथ का सृजन संभव हो पाया।
  • Mathuradas Ki Diary
    Mudra Rakshes
    50 45

    Item Code: #KGP-2089

    Availability: In stock

    थुरादास की डायरी' शीर्षक से ही  कुछ बरस पहले एक अत्यन्त विवादास्पद लगभग विस्फोटक व्यंग्य लेख श्रृंखला छपी थी । पता यहीं वह इन लेखों की सफलता थी या असफलता कि लोगों ने इसे बंद कराकर ही दम लिया । इसके बाद एक दूसरी श्रृंखला छपी 'राक्षस उवाच' नाम से । इसके वैसे हो अन्त से पहले घर पर  पथराव हुए, कुछ धमकियाँ भी आई ।  बदमाशा मित्र इसे सौभाग्य बताते रहे पर संपादक नेक साबित हुए । श्रृंखला फिर बन्द हो गई ।
    मगर कुछ लोगों का शुभ विचार है कि श्रृंखलाएँ बंद करवाने की इतनी सफल कोशिशों कें बाद भी ये लेख गड़बड़ी  फैलाने में खासे कामयाब हुए ।

    –मुद्राराक्षस
  • Desh-Desh Mein, Gaon-Gaon Mein
    Urmila Jain
    180 162

    Item Code: #KGP-9185

    Availability: In stock

    ब्रिटेन, फ्रांस, लैटिन अमेरिकी तथा विश्व के अन्य अनेक देशों के भूगोल और इतिहास की खाक छानते हुए लेखिका ने अपनी जानकारियों, सूचनाओं के परिचय को तो यहां बढ़ाया ही है, साथ ही वह रवानगीपूर्ण भाषा-शैली में पाठक को भी उस स्थल विशेष की सैर करा पाने में सफल हुई है। विश्व के नक्शे पर चहलकदमी करने का जिस सहजता से मौका लेखिका निकाल लेती है-वह एक ओर तो विश्व-ग्राम की परिकल्पना को संभव बनाता प्रतीत होता है तथा दूसरी ओर ये वृत्तांत आम पाठक को वैसा ही करने को अधीर बनाते हें। किसी भी साहित्यिक रचना का यही सर्जनात्मक अवदान होता है, जो इस पुस्तक में पर्याप्त रूप से मयस्सर हुआ है। 
    डाॅ. उर्मिला जैन की इन यात्राओं में एक और बात उल्लेखनीय है कि वह नारी-मन के साथ, भारतीय मानसिकता की सांस्कृतिक-सामाजिक ऊंचाइयों को लेकर यात्रा करती हैं और इसीलिए पाठक को वह उन चुनिंदा पर्यटक-स्थलों या भूगोल के जाने-अनजाने कोने-अंतरों में ले जा पाई हैं, जहां आधुनिक विश्व के मनुष्य का (और खास तौर से नई नारी का) निर्माण हो रहा है। कृति में यात्रा के रोमांचक क्षण भी जहां-तहां आते हें और उनकी लोकमहर्षक प्रतिध्वनियां पाठक के मस्तिष्क में देर तक गूंजती रहती हैं।
    यह किताब उन यात्रापसंद पर्यटकों के लिए भी प्रेरणादायिनी सिद्ध होगी, जो किन्हीं संकोचवश अपने यात्रानुभवों को शब्दांकित करने से स्वयं को बाधित किए हुए हैं।
  • Baron Ki Baatein
    Shuk Deo Prasad
    240 216

    Item Code: #KGP-244

    Availability: In stock

    आराम कहां?
    चीनी हमले के बाद हार की वजह से नेहरू जी कुछ हिल से गए थे। एक दिन मौका देखकर उनके सहकारी टी.एन. कौल ने कहा--‘पंडित जी, आप कुछ दिन के लिए विश्राम क्यों नहीं कर लेते? एक सप्ताह आप आराम कर लें तब तक आप काफी तनावरहित महसूस करने लगेंगे।’
    नेहरू जी ने छूटते ही कहा--‘तुमने भी खूब कहा। विश्राम और वह भी एक सप्ताह का? यदि मैं एक सप्ताह बिस्तर पर पड़ गया तो कभी उठ नहीं पाऊंगा। मेरे जीवन में विश्राम कहां?’
    सचमुच पं. जवाहरलाल नेहरू के जीवन का मंत्र ही था चरैवेति-चरैवेति। उन्होंने ही नारा दिया था-- ‘आराम हराम है।’ और जीवन की आखिरी सांस तक वे इस पर अमल करते रहे।
    उनकी मेज पर राबर्ट फ्रास्ट की ये कविताएं लिखी हुई सदा विराजमान रहती थीं: ‘वुड्स आर लवली डार्क एंड डीप। बट आई हैव प्रामिसेस टू कीप। माइल्स टू गो बिफोर आई स्लीप। माइल्स टू गो बिफोर आई स्लीप।’
    सघन ये वन सुंदर भरपूर
    पर मुझे तो रखनी बात जरूर।
    सोने से पहले तो मुझे जाना
    है मीलों दूर।
    मुझे जाना है मीलों दूर।
    --इसी पुस्तक से
  • Veshya
    Ajay Kumar Singh
    395 356

    Item Code: #KGP-1979

    Availability: In stock

    वेश्या
    अच्छे समाज के निर्माण की प्रक्रिया में स्वयं समाज को अनेक अंतर्विरोधों से जूझना पड़ता है। समाज का उत्थान हर व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत लाभों के त्याग द्वारा ही सुगम बनता है। मनुष्य का स्वार्थी होना स्वाभाविक गुण है, जो उसे सीमित करता है। वही त्याग का आदर्श है, जिससे निर्माण एवं सृजन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। समाज जब अपने वेश्यापन को छोड़ आदर्श की ओर बढ़ेगा तभी हम सभ्य समाज का निर्माण कर सकेंगे।
    आज के समय में समाज का बहुसंख्यक वर्ग निजी लाभ को समाज के लाभ से श्रेयस्कर समझता है। यह रीति ही हमें तृतीय विश्व के देशों का हिस्सा बनाती है। हमारी सोच प्रथम विश्व एवं द्वितीय विश्व के समाज के समान नहीं है। यही हमारा दुर्भाग्य है। ऐसे में कुछेक ऊँची सोच वाले लोग अंत में अपने को ठगा हुआ-सा महसूस करते हैं।
  • Dus Baal Naatak
    Pratap Sehgal
    240 216

    Item Code: #KGP-759

    Availability: In stock

    दस बाल नाटक
    ये नाटक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जिन कहानियों से प्रेरित हैं, उन कहानियों का समय वह समय है, जिसे हम भारत के  पुनर्जागरण और आजादी के संघर्ष का समय कहते हैं। भारत के अन्य इलाकों की अपेक्षा बंगाल में शिक्षा को व्यवस्था बेहतर थी, लेकिन आज के मुकाबले में उस शिक्षा-व्यवस्था को भी हम पिछड़ा हुआ ही कहेंगे।  ऐसे ही समय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व दुनिया को  चौका देता हैं। अपनी अन्य कलात्मक कियाओं के साथ-साथ वे बच्चों को कभी नहीं भूले। उन्होंने एक जगह कहा भी है कि बच्चा बडों का पिता होता है। यानी हम आने वाली हर पीढ़ी से कुछ सीखते हैं और कुछ सिखाते हैं।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बाल-कहानियों में सन्देश स्पष्ट हैं। ये संदेश बच्चों की अपेक्षा उनके अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अधिक हैं। अपना संदेश समाज तक पहुँचाने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर बच्चे को भी एक व्हीकल की तरह से इस्तेमाल करले हैं। कहानी का पाठक भल ही मौजूद हो, लेकिन उसका दर्शक नहीं होता। इसलिए प्रताप सहगल ने इन कहानियों को यहाँ लघु नाटकों के माध्यम से रखा है।  प्रताप सहगल हिंदी के जाने-माने कवि-नाटककार हैं। उन्हें भी अपन बहुविध लेखन के लिए जाना जाता हैं। इससे पूर्व उनके बाल-नाटकों की एक किताब 'छूमंतर' ( किताबघर प्रकाशान) प्रकाशित होकर मकबूल साबित हुई है। इसका प्रमाण उसके लगातार छपने चाल संस्करण हैं। इस बार प्रताप सहगल ने गुरुदेव की बाल-कहानियों का अपने बाल-नाट्य-लेखन का आधार बनाया है। ये नाटक जहाँ अपने समय में अवस्थित हैं, वहीं वे हमारे समय के साथ भी जुड़ जाते हैं और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इनकी उपयोगिता बनी रहेगी।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रताप सहगल-दोनों के कन्सर्न्स का जानने के लिए दस बाल-नाटकों का यह संग्रह हर बड़े और हर बच्चे के लिए एक जरूरी किताब बन जाता है।
  • Marxwadi Jeevan-Drishti Aur Rangey Raghav
    Madhuresh
    350 315

    Item Code: #KGP-700

    Availability: In stock

    श्री मधुरेश ने निःसंग मेध से रांगेय राघव के विषय में इस भ्रांति का भी निराकरण किया है कि रांगेय राघव ‘नस्लवादी’ थे। यह भयंकर आरोप डॉ. रामविलास शर्मा ने लगाया था। मधुरेश जी का यह मत मान्य है कि उस समय तक और आज तक, भारत के प्रागैतिहासिक युग (मोहन जोदड़ो) के विषय में निर्विवाद जानकारी उपलब्ध नहीं है और यह कि रांगेय राघव का ध्यान सर्वत्र ‘व्यवस्था’ पर केंद्रित रहता था और मानव शोषण और अत्याचार के विरोध पर तथा मानवतावादी प्रवाह की खोज पर। इसीलिए द्रविड़ों पर आर्य अत्याचार हो या मुसलमानों पर आंग्ल-आक्रमण हो, वह सर्वत्र हृदय से आक्रांत, शोषित, दमित के साथ रहते हैं और जालिमों का विरोध करते हैं, चाहे जुल्मी आर्य हो या अनार्य, यवन हो या ब्राह्मण, मुसलमान हो या कम्युनिस्ट। सर्वत्र राघव ने मानव-न्याय का परिचय दिया है। —डॉ. विश्वंभर नाथ उपाध्याय
    माकर्सवादी आलोचक के रूप में केवल मधुरेश ने उनके महत्त्व को रेखांकित किया, 1987 में जब उन्होंने साहित्य अकादेमी के लिए मोनोग्राफ लिखा ‘रांगेय राघव’। इस मोनोग्राफ में उन्होंने बाकायदे एक अध्याय लिखा ‘हिंदी की माकर्सवादी आलोचना और रांगेय राघव’। उनका मानना था कि ‘सन् ’45 से ’55 तक का काल हिंदी की माकर्सवादी आलोचना में प्रखर विवादों का काल रहा है और इन विवादों के आपसी अंतर्विरोध ही वस्तुतः हिंदी क्षेत्र में प्रगतिवादी आंदोलन के विघटन और माकर्सवादी आलोचना में भयंकर गतिरोध के कारण भी बने। यह दौर माकर्सवादी हिंदी आलोचना में ऐसी भयावह उग्रता और विनाशकारी उच्छेदवाद का दौर रहा है जिसमें अपने निकट वर्तमान में प्रगतिवादी साहित्य के निर्माण और विकास की संभावनाओं के प्रति पूरी तरह उदासीन रहकर बेहद गलत मुद्दों पर सारी बहस को केंद्रित कर दिया है।’
  • Bhrashta Samaaj (Paperback)
    Chandan Mitra
    90

    Item Code: #KGP-7048

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Amrita Pritam
    Amrita Pritam
    250 225

    Item Code: #KGP-16

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : अमृता प्रीतम
    पंजाबी और भारत के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में से एक, अमृता प्रीतम के साक्षात्कारों की यह किताब हमें उस अमृता से मिलाती है, जिसकी जात उसके ज़माने के हर दु:ख का आईना है । यह दु:ख चाहे निजी हो या दुनिया के किसी भी समाज में किसी भी इंसान का । यह भी ज़रूरी नहीं कि इसका संबंध उसके समय से हो । अत्याचार दूर कहीं अतीत में भी किसी के साथ हुआ हो, तो वह युगों और सदियों के फासले पर भी उसकी पीड़ा अपने भीतर महसूस करती है । इसी तरह अपने गम में उन्हें अपना साथी मानकर उनसे अपना दर्द बाँटती है । समकालीन साहित्यकारों के साथ, इतिहास के साथ, सूफियों के साथ अमृता ने जो बातचीत की है, उसमें समय या सोच का कोई फासला कहीं प्रतीत नहीं होता । यह किताब अमृता के जीवन के समस्त पहलुओं को अपने में समेटे हुए है । और आगाज़ से अंजाम तक अमृता के जीवन और सृजन का आईना बनकर अब आपके हाथों में है ।
  • Keshavraav Baliram Hedgewar : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    100

    Item Code: #KGP-488

    Availability: In stock

    निडर और साहस के धनी डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार भारत की उन महान् विभूतियों में से एक हैं, जिन्होंने राष्ट्रसेवा के पथ पर चलते हुए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। अपनी जीवनशैली में सदैव अनुशासन और राष्ट्रप्रेम को अधिक महत्त्व देने वाले डॉ. केशवराव ने बाल्यावस्था में ही अपने अंग्रेजविरोधी तेवर दिखाने आरंभ कर दिए थे।
    डॉ. केशवराव उन विलक्षण व्यक्तियों में से थे, जो युवाओं की मानसिकता को भलीभांति जानते थे और उनकी क्षमताओं को विकसित करने के नए-नए तरीके खोजते रहते थे।
    देश की युवा पीढ़ी को भारत की सनातन संस्कृति और आदर्शों से जोड़े रखने के लिए 28 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के पर्व पर ‘संघ’ नामक नए राष्ट्रीय हिंदूवादी संगठन की स्थापना की गई। साहस और अनुशासन पर आधारित इस संगठन को खड़ा करने का पूरा श्रेय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार को जाता है। इस स्थापना-समूह के अन्य सदस्यों में डॉ. वी. एस. मुंजे, बापूजी सोनी तथा डॉ. परांजपे आदि वरिष्ठ नेता शामिल थे।
  • Mere Saakshatkaar : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    195 176

    Item Code: #KGP-739

    Availability: In stock


  • Chhoo Mantar
    Pratap Sehgal
    100

    Item Code: #KGP-958

    Availability: In stock


  • Teri Roshanai Hona Chahati Hoon
    Alka Sinha
    140 126

    Item Code: #KGP-524

    Availability: In stock

    तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ
    प्रतिष्ठित कवयित्री अलका सिन्हा की नवीनतम काव्यकृति 'तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ' की पेम कविताएँ उस कोमल और अमूल्य अहसास की पावन कराती हैं, जिसका अभाव किसी को वहशी बना देता है तो किसी को संन्यासी । इन कविताओं में महानगरीय जीवन की आपाधापी के बीच एक भावात्मक विस्तार की अनुभूति होती है और यह विस्तार कहीं-कहीं तो दार्शनिकता पर जा टिकता है । इसीलिए पूरी कृति में बिखेरे प्रेम-प्रसंगो के वावजूद नितात निजी और आत्मीय क्षणों का यह अहसास कहीं भी छिछला या बेपर्दा नहीं होता । कवयित्री आम जिंदगी की मामूली घटनाओं को सरल और सधी भाषा में अपनी कविताओं में इस प्रकार गुंफित करती है मानो कविता की गलबहियां डाले कोई कहानी साथ-साथ चलती हो ।
    ये कविताएं एक ओर प्रकृति में जीवन की अनंत संभावनाओं की तलाश करती हैं तो दूसरी ओर युगीन विषमताओं पर व्यंग्य भी कसती हैं । सामाजिक चेतना से संबद्ध एक स्वस्थ विमर्श इन कविताओं को लोकमंगल की भावना से जोड़ता है ।
    हर किसी को अपनी-सी लगती ये कविताएं तमाम तनावों, परेशानियों और नाकामियों के बीच जीवन के प्रति आस्था और विश्वास जगाती है और आश्वस्त करती है कि सचमुच कीमती है हमारे बीच बची प्रेम की तरलता !
  • Hindi Sahitya Ka Itihaas
    Pooran Chand Tandon
    275 248

    Item Code: #KGP-9248

    Availability: In stock

    किसी भी साहितय की चेतना का निरंतर विकास और तत्संबंधी शोध-यात्रा के नवीन परिणाम तथा निष्कर्ष उसके इतिहास-लेखन को अधुनातन एवं अद्यतन बनाने के प्रेरक कारण बनते हैं। युग-सापेक्ष साहित्य-चेतना, परिवर्तनशीलता की द्योतक होती है। हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन का भी एक सुदीर्घ एवं सशक्त इतिहास मौजूद है। और हम इतिहास लेखन के बदलते मापदंडों को, पुनर्लेखन की प्रेरक दृष्टियोग को, संदर्भ एवं समय-सापेक्ष व्याख्याओं को-इसी इतिहास के माध्यम से समझ तथा देख भी पाते हैं। हिंदी साहित्य का पहला इतिहास-गं्रथ हमारे समक्ष जिस रूप में आया था, दूसरा, तीसरा या चैथा उसी रूप में नहीं दोहराया गया, इतिहासकार की इतिहास-दृष्टि ने उसे नए आयाम, नए संदर्भ तथा नए परिदृश्यों के माध्यम से नई अर्थवत्ता प्रदान की। आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित ‘हिंदी साहित्य के इतिहास’ को आज भी वैज्ञानिक, इतिहास-दृष्टि-सम्मत तथा सर्वाधिक तार्किक माना जाता है, लेकिन उस महत्वपूर्ण इतिहास के लेखन-प्रकाशन के पश्चात् जो साहित्य खोजा गया, जो आलोचनाएं-समीक्षाएं लिखी गईं और हिंदी साहित्य संबंधी जो अनुसंधान देश-विदेश में किए गए, उन्होंने शुकल जी के तथ्यों को, सूचनाओं को, विवरणों को अपर्याप्त घोषित कर दिया। इतिहासकार की अपनी एक विशिष्ट दृष्टि भी होती है। उस दृष्टि से मूल में क्रमबद्धता, अन्विति तथा अखंडता तो रहती ही है, देखने का निजी अंदाज भी सक्रिस रहता है। कवि, साहित्यकार, आलोचक या चिंतक के प्रति, उसकी रचना के प्रति, उसकी भाषा के प्रति तथा उसकी समग्र दृष्टि के प्रति, इतिहासकार अपनी एक विशिष्ट दृष्टि बना लेता है और उसी आधार पर उसके प्रति अपने विचार प्रकट करता है।
  • Vigyan Aur Dharmik Manyataayen
    Vinod Kumar Mishra
    130 117

    Item Code: #KGP-9043

    Availability: In stock


  • Jalti Chhaya
    Prabha Saxena
    50 45

    Item Code: #KGP-9068

    Availability: In stock


  • Zindagi Aur Jugaar
    Manohar Puri
    250 225

    Item Code: #KGP-9025

    Availability: In stock

    जिन्दगी और जुगाड़
    आपाधापी के इस युग में व्यक्ति को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जुगाड़ का सहारा लेना ही पड़ रहा है। व्यक्तिगत, पारिवारिक अथवा सामाजिक जीवन में कोई भी गतिविधि बिना जुगाड़ के संपन्न करना निरंतर कठिन होता जा रहा है। आर्थिक, राजनीतिक और यहां तक कि शैक्षणिक जीवन भी जुगाड़ पर निर्भर होकर रह गया है। हर एक व्यक्ति दिन-भर किसी न किसी प्रकार से जुगाड़ करके अपने जीवन की गाड़ी को धकेलने का प्रयास कर रहा है। उसके चौबीसों घंटे किसी न किसी प्रकार का जुगाड़ करने में ही व्यतीत होते हैं। देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और अन्य सभी गतिविधियां जुगाड़ के बिना निरर्थक हैं। जिन्दगी का कोई पक्ष जुगाड़ से अछूता नहीं रहा, इसका अनुभव प्रायः हर व्यक्ति को प्रत्येक कदम पर होता है।
    इस उपन्यास में जीवन के कुछ ही पक्षों को छूना संभव हो पाया है। रोजमर्रा का पारिवारिक जीवन, हमारे परस्पर संबंध, राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा और प्रशासन, समाज में निरंतर फैलता भ्रष्टाचार, नशे की दुनिया में डूबती हमारी नई पीढ़ी, धन की अंधाधुंध दौड़ के मोहजाल में फंसी वर्तमान पीढ़ी जल्दी से जल्दी वह सब प्राप्त कर लेना चाहती है, जो उसे वर्षों के परिश्रम के बाद भी ईमानदारी से मिलना संभव नहीं दिखाई देता। इसके लिए शॉर्टकट जरूरी है और यही शॉर्टकट जुगाड़ का मकड़जाल है। एक बार इसमें फंसा व्यक्ति लाख सिर पटक ले, इससे बाहर नहीं निकल पाता।
    इस उपन्यास में विश्वविद्यालयों में पनपते माफिया गिरोह और देह-व्यापार, अस्पतालों से होती मानव-अंगों की व्यापक स्तर पर तस्करी और राजनीति में लगातार पनप रहे भ्रष्ट गठजोड़ सरीखे कुछ पक्षों को ही मात्र छुआ जा सका है। ये समाज में फलने-फूलने वाले कैंसर की एक बानगी मात्र हैं। आप स्वयं इससे कहीं अधिक जानते हैं और प्रतिदिन उसे भोगने को अभिशप्त हैं। समाज के किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग ने इस उपन्यास से प्रेरणा लेकर विरोध का एक स्वर भी उछाला तो मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा। हां, इतना निश्चित है, जितना इसमें लिखा गया है, हालत उससे कहीं अधिक गंभीर है। समय रहते जाग जाना बहुत जरूरी है। जागो, कहीं बहुत देर न हो जाए।    
  • Hindi Ki Pratinidhi Kahaniyan Taatvik Vivechan
    Jayanti Prasad Nautiyal
    215 194

    Item Code: #KGP-542

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य पर अनुशीलन, साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कम ही हुआ है । कहानी साहित्य जहाँ एक ओर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है  वहीं दूसरी ओर कहानी  पाठक वर्ग बहुत विस्तीर्ण है, परंतु इतने विराट और व्यापक साहित्य पर आलोचना, समालोचना तथा तात्त्विक विवेचनपरक साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है । 
    इस पुस्तक में कथा तत्त्वों का विश्लेषण, शब्दार्थ एवं टिप्पणी खंड तथा व्याख्या खंड आदि का अनुशीलन उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम के बोर्डों, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किया गया है । 
    संक्षेप में कहें तो कह सकते हैं कि यह पुस्तक सम्पूर्ण भारत में विश्वविद्यालयों, बोर्डों, महाविद्यालयों आदि के प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, साथ ही यह पुस्तक शोधार्थियों, कथा साहित्य के गंभीर अध्येताओं, समालोचकों, समीक्षकों के लिए भी उपादेय सिद्ध होगी ।  इस पुस्तक को इस प्रकार लिखा गया है कि यदि सामान्य पाठक भी इसे पढ़ना चाहे तो उसे हिंदी कथा साहित्य की पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो ।
  • Rath-Kshobh
    Deepak Sharma
    80 72

    Item Code: #KGP-1834

    Availability: In stock

    रथ-क्षोम 
    "मरते समय मां ने मुझे बताया, वे मुझे जन्म नहीं देना चाहती था ।"
    "तू अभी बहुत छोटा है । उस बेचारी का दुख नहीं समझ सकेगा ।"
    "मेरा दु:ख कोई दुख नहीं ?" मैं फट पड़ता हूँ "माँ ने मुझे नफ़रत में जन्म दिया, नफरत में बडा किया और फिर कह गईं-मैं एक वहशी की संतान हूँ-बिना यह बताए कि किस वहशी की ।"
    "अपने ताऊ की"
    मैं सन्न रह गया ।
    "मैं तुम्हें बताती हूँ।" काँपती, भर्राई आवाज में ताई ने बताया, "सब बताती हूँ। उस रात इसी तरह मैं उधर लुधियाणे में  भरती थी । मेरा भाई उन दिनों अपनी एल०आई०सी० की नौकरी से लुधियाणे में तैनात था । जब मैं एकाएक उधर बीमार पडी और अस्पताल में दाखिल करवा दी गई, तेरे ताऊजी उसी शाम इधर अपने गाँव से मुझे देखने के लिए पहुँच लिए थे । उन्हीं की जिद थी कि उस रात मेरी देखभाल वहीँ करेंगे । और उसी रात स्नेहंप्रभा की भी ड्यूटी वहीँ थी । बेहोशी और कष्ट की हालत में अचानक अपने प्राइवेट कमरे के बाथरूम के आधे दरवाजे के पीछे से एक सनसनी अपने तक पहुंचती हुई मेरी बेहोशी टूटी तो पशुवत् तेरे ताऊ की बर्बरता की गंध से-सुकुमार स्नेहप्रभा के आतंक की दहल से । पार उधर स्नेहप्रभा निस्सहाय रहने पर मजबूर रहीँ और इधर मैं निश्चल पडी रहने पर बाध्य..."
    "पापा से माँ की शादी इसीलिए आपने करवाईं ?" मैंने थूक निब्बाला ।
    "अस्पताल में मेरी भरती लंबी चली थी और जब स्नेहप्रभा ने अपने गर्भवती हो जाने की बात मुझसे कहीँ थी तो मैँने ही उसे अपनी बीमारो का वास्ता दिया था, अपने स्वार्थ का वास्ता दिया था और लुधियाणे से उसे अपने साथ इधर ले आई थी । सोचा था, जब वह अपने दूसरे बच्चे को जन्म देगी तो मैं इस पहले बच्चे को गोद ले लूँगी । लेकिन तुम्हारी प्रसूति के समय उसे ऐसा आँपेरेशन करवाना पडा, जिसके बाद उसका दोबारा माँ बनना मुश्किल हो गया"
    "पापा को सब मालूम है ?"
    “नहीं । बिलकुल नहीँ । और उसे कभी मालूम होना भी नहीं चाहिए । मेरी खातिर । स्नेहप्रभा की खातिर । "
    -इसी संग्रह की कहानी 'मुडा हुआ कोना' से
  • Debt-Free Forever (Personal Finance)
    Gail Vax-Oxlade
    495 446

    Item Code: #KGP-9015

    Availability: In stock

    TIRED OF GETTING TO THE END OF THE MONEY BEFORE YOU GET TO THE END OF THE MONTH? WISH YOU WERE IN CONTROL?
    If you are afraid to open your bills, if you’ve never added up how much you owe, if you can’t even imagine being debt-free, it’s time to join thousands of people Gail Vaz-Oxlade has helped. Her straightforward approach to money management is based on self-control, hard work, and prioritizing what’s really important. Debt-Free Forever is Gail’s step-by-step guide, and she’ll show you how to
    ~ figure out how much you’ve actually been spending
    ~ calculate how much you owe—and what it’s costing you
    ~ build a budget that works
    ~ maximize your debt repayments so you can be consumer debt-free
    in 3 years or less
    ~ prepare for a rainy day so it doesn’t mean a major setback
    ~ set goals for your new, debt-free life
    Make no mistake, getting out of debt isn’t easy. But in Debt-Free Forever, Gail gives you a clear strategy and the steps needed to implement it. So if you’re finished with excuses, overdue notices, and maxed-out credit cards, pick up this book, follow Gail’s plan, and start becoming Debt-Free Forever.
  • Aakhiri Adhaai Din
    Madhup Sharma
    240 216

    Item Code: #KGP-865

    Availability: In stock


  • Reverse Your Thoughts Reverse Your Diseases (Self-Help)
    Anil Bhatnagar
    495 446

    Item Code: #KGP-641

    Availability: In stock

    Like an artist who expresses herself on canvas with colors, our thoughts do so on the canvas of life (health included). Health or diseases, therefore, do not come by chance; they are created through our mental processes—though unknowingly.
    As per Psychoneuroimmunology, a new branch of science that studies the mind-body connection, the thoughts and emotions that we choose get instantly transformed into chemicals. These chemicals are, effectively, either self- administered injections of ‘slow poisons’ or of ‘healing medicines’ that eventually freeze into and become our physical states, i.e. the way we feel physically in our bodies—dis-eased or eased (i.e., healthy).
    Reverse Your Thoughts, Reverse Your Diseases is your guide to retrace your path back towards health from diseases through the same route whence these came from, i.e. through the route of your thoughts, emotions, beliefs and imagination. The book shares with you symptoms, emotional causes, metaphysical reasons, affirmations and dietary suggestions for averting and curing over 150 diseases . . . along with power-packed strategies for liberating you from corrosive thoughts and emotions.
  • Haadase Aur Hausle (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-7077

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार है । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती है कि कहानी पाठक की आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र  में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझती।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हूई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानिया ।
  • Bayaan (Paperback)
    Kamleshwar
    60

    Item Code: #KGP-7058

    Availability: In stock

    बयान

    इस संग्रह में ‘बयान के साथ कमलेश्वर की वे सभी कहानियाँ संगृहीत हैंजिन्हें कहानीकार की विशिष्ट उपलब्धियों के रूप में सभी ने स्वीकारा और सराहा है।

    नई कहानी आंदोलनके प्रमुख प्रवर्तक और प्रखर प्रवक्ता एवं ‘समांतर लेखन’ आंदोलन के प्रथम पुरुष के रूप में कमलेश्वर ने आम आदमी के साथ अपने लेखन को जोड़ा और अपनी रचनाओं में उसे सशक्त अभिव्यक्ति दी।

    आज़ादी मुबारक’, ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’, ‘राजा निरबंसिया’, ‘मांस का दरिया’, ‘कस्बे का आदमी’, ‘खोई हुई दिशाएँ’, ‘जार्ज पंचम की नाक’, ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’, ‘इतने अच्छे दिन', ‘रावल की रेल’, ‘कोहरा’, ‘समग्र कहानियाँके बाद ‘बयानकमलेश्वर द्वारा आम आदमी की अभिव्यक्ति की सशक्त सनद है।    

  • Hindi Kahaniyon Mein Hans Patrika Ka Yogdan
    Meera Ramrav Nichale
    450 405

    Item Code: #KGP-758

    Availability: In stock

    हिंदी कहानियों में ‘हंस’ पत्रिका का योगदान
    सौ०  मीरा निचळे से मेरा परिचय इस शोध-प्रबंध के दौरान ही हुआ। साधना शाह का पत्र लेकर वह मुझसे मिलने औरंगाबाद से आई थी और शीघ्र ही इतनी खुल गई कि जब तक अपने प्रश्नों के सही जवाब नहीं पा लेती थी तब तक पूछती ही रहती थी। वह सीधे-सरल स्वभाव की अध्ययनशील लड़की है।
    मैंने उसका शोध-प्रबंध देखा है और मुझे लगा कि काफी परिश्रम और सूझबूझ के साथ मीरा ने यह अध्ययन प्रस्तुत किया है। मैं उसे इसके लिए बधाई देता हूं। यह प्रबंध अपने आप में तो महत्त्वपूर्ण है ही, आगे काम करने वालों के लिए भी इसकी जरूरत बनी रहेगी। मीरा अपना अध्ययन और लिखना आगे भी चलाए रखे इसके लिए मेरी शुभकामनाएं...
    —राजेन्द्र यादव
  • Yugdrashta Shivaji
    Shashi Bhushan Singhal
    380 323

    Item Code: #KGP-288

    Availability: In stock

    राष्ट्रकवि ने खूब कहा है—
    ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। 
    कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।।’ 
    महापुरुषों की हार्दिकता से गायी गई गाथा सदैव आनंददायी है। मध्ययुग में रूढि़वादिता और धर्मांधता के छाए घने अंधेरे के बीच शिवाजी ने मानव स्वतंत्रता का जो दीप जलाया था, वह आज भी प्रज्वलित है। हमें धीरज बंधता है कि देर है, अंधेर नहीं। सुहानी सुबह उजाला लाएगी और हम तन-मन से, बंधनमुक्त होंगे।
    आधुनिक युग को लें। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उद्घोष किया था—‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ उन्होंने शिवाजी जयंती पर बृहत् आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शिवाजी को, उचित ही, देश का महानायक कहा था।
    यह उपन्यास शिवाजी के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व की गाथा कहता है। कथा इतिहास पर आधरित है, इसे बयान करने में उपन्यासकार की कल्पना की उतनी ही भूमिका है, जितनी शुद्ध सोने में लगे टांके की, जो उसे गहने में ढालती है।
    उपन्यास पढ़ देखिए। रोचक कथा। गतिमय शैली।
  • Saryu Didi
    Manorma Jafa
    175 158

    Item Code: #KGP-1956

    Availability: In stock

    सरयू दीदी
    मैंने फोन मिलाया। गोपाल जोशी सुनाकर सदके में आ गए, 'यह नहीं हो सकता। मैं अभी पता लगाता हूँ।' उन्होंने फोन रख दिया।
    'क्या करूं मनु?' दीदी की आवाज में बेबसी थी। वही तो सदा समझदार रहीं। वही तो हर प्रश्न का उत्तर और हर समस्या का हल ढूंढ़ लेती थीं। पर यहां वह किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी थीं ।  वह उठकर कमरे में टहलने लगीं । 'अभी तो जीवन शुरू ही हुआ था मनु।' दीदी ने हाथ जोड़े ऊपर देखा, आंखें बंद कीं और जोर से बोली, 'हे ईश्वर आप ही माता है आप ही पिता हैं। हे ईश्वर आप ही सबकी रक्षा करने वाले हैं। हे ईश्वर मुझे ठीक सोचने-समझने की शक्ति दीजिए। मुझे बल दीजिए। हे ईश्वर मुझे बल दीजिए।' दो क्षण बाद दीदी की आंखें झरने लगीं। थोडी देर बाद दीदी में शक्ति लौटकर आ गई, 'मनु मैं यब कुछ सह लूंगी। भगवान महान हैं, दयालु हैं।' मेरी तरफ़ मुड़कर बोलीं, 'मनु। पापा से पूछो अजीत को लेकर प्लेन कब आ रहा है?' वह उठकर दराज़ में से कूछ खोजने लगीं।
    तभी फोन की घंटी बजी मैंने फ़ोन उठा लिया। उधर फोन पर मां थी, 'मनु अजीत को यहां अपने घर ले आते हैं। वही ठीक होगा। वहीं सरयूजी क्या करेंगी? '
    मैं दीदी से पूछती हूँ। हिम्मत करके मैंने दीदी से पूछा। दीदी ने कहा, 'मनु! अजीत का घर यहीं है, वह यहीं आयेंगे ।'
    मैंने जाकर मां को बता दिया।
    -(इसी उपन्यास से)
  • Kashmir Aur Bharat Pak Sambandh
    Prakash Veer Shastri
    400 360

    Item Code: #KGP-143

    Availability: In stock

    देश-हित को ध्यान में रखते हुए अत्यंत आवश्यक विषयों की ओर दोनों सदनों का ध्यान आकर्षित करने की कला में श्री शास्त्री जी अति निपुण थे । उन्होंने जिन गंभीर विषयों की चर्चा सदन में की थी, आज लगभग 40  वर्षा बाद भी वे विषय, वे प्रश्न ज्यों के त्यों अपने उद्धार की प्रतीक्षा कर रहे हैं । आज राजनीति में सत्य के कहने वाले और सुनने वालों का प्रायः अभाव हो रहा है, ऐसी दशा में लोकोपकारक सत्य को अभिव्यक्ति करने का साहस जुटा पाना किसी निर्भय, वीर पुरुष का ही काम है ।
    इस ग्रन्थ में प्रकाशित शास्त्री जी के इन विचारों से देश की जनता तथा नेताओं को एक नई दिशा मिल पाएगी, जिससे देश की गंभीर समस्याओं से निपटने में सही मार्गदर्शन हो सकेगा और पाठक महानुभाव श्री प्रकाशवीर शास्त्री की विद्वत्ता, देशभक्ति, स्पष्टवादिता, वाक्चातुर्य, वर्णन-शैली तथा विषयों की गंभीरता से सुपरिचित हो सकेंगे ।
  • 23 Lekhikayen Aur Rajendra Yadav (Paperback)
    Geeta Shree
    195

    Item Code: #KGP-262

    Availability: In stock

    23 लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव
    अपने ढंग की अद्भुत पुस्तक है यह '23 लेखिकाएं और  राजेन्द्र यादव' । शायद किसी भी भारतीय भाषा में अकेली । इसे गीताश्री के पत्रकार-जीवन की एक उपलब्धि भी कह सकते  हैं । यहाँ गीता ने समय-समय पर लिखे गए समकालीन महिला-रचनाकारों के इम्प्रैशन (प्रभाव-चित्रों) का संयोजन किया है । कहीं ये साक्षात्कार हैं तो कहीं संस्मरण, कहीं राजेन्द्र जी के रचनाकार को समझने की कोशिश है तो कहीँ 'हंस' के संपादकीय, को लेकर उन पर बाकायदा मुकदमे । यहाँ अगर मन्नू भंडारी, मृदुता गर्ग, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोडा, ममता कालिया, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका तथा कविता हैं तो निर्मला जैन, जयंती  रंगनाथन, पुष्पा सक्सेना, वीना उनियाल और रचना यादव भी अपने वक्तव्यों के साथ उपस्थित है । राजेन्द्र यादव अपने समय के सबसे महत्त्वपूर्ण कथाकार, नई कहानी आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तक और कथा-समीक्षा के विलक्षण व्याख्याकार हैं । इधर चौबीस वर्षों में तो 'हंस' के तूफानी विचारों ने हंगामा ही खड़ा कर दिया हैं--राजेन्द्र जी को खलनायक और माफिया डॉन या पता नहीं और क्या-क्या बना दिया । विवादास्पद होना  जैसे उनकी स्थायी नियति है--'हंस' के माध्यम से उन्होंने स्त्री-दलित और अल्पसंख्यकों के पक्ष में जो जेहादी मुहिम चलाई है उसने निश्चय ही हिंदी के यथास्थितिवादी परंपरा-पोषकों की नींद हराम कर दी है । वे तर्क से नहीं, गालियों और आक्षेपों से राजेन्द्र जी के प्रश्नों का उत्तर देते हैं । मठाधीशों के लिए यह सचमुच बैचेन कर देने वाला सत्य है कि उनके देखते-देखते दलित और स्त्री-विमर्श आज साहित्य की केंद्रीय मुख्य धाराएँ हैं ।
    राजेन्द्र यादव के इस विकट और अपने समय के सबसे जटिल व्यक्तित्व के विविध आयामों को समेटने की कोशिश करती हैं ये लेखिकाएँ गीताश्री के मंच से ।
    किताबघर प्रकाशन की एक भव्य प्रस्तुति ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-869

    Availability: In stock

    कहानियां कहानियां होते हुए भी कहीं सच भी होती हैं । बल्कि सच से भी अधिक सच । हिमांशु जोशी की ये कहानियां उसी सच को रेखांकित करती अनाज के यथार्थ से साक्षात्कार कराती हुई कई प्रश्न जगाती हैं ।
    इन रचनाओं की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं, इनकी सरलता, सहजता एवं मार्मिकता। सरल शब्दों में बड़ी बात कह देना बड़ा कठिन कार्य है। परंतु हिमांशु जोशी की इस महारत ने आज के अनेक कथाकारों के बीच उनकी अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई हैं । शायद इसीलिए ये कहानियां कहानियां  होते हुए भी जिए हुए जीवन के जीवंत अंश-सी लगती हैं । इनमें स्पदित होता यथार्थ, इन्हें सच के इतने निकट ले जाता है कि ये सच का ही पर्याय बन जाती हैं । किसी की अपनी ही जीवन-गाथा के सजीव दृश्य !
    इनमें धुँधलाए गाँव हैं मैले कस्बे, भीड़-भरे महानगर ! दिन-रात हांफते-कांपते, यंत्रवत जीते लोग ! उनके दुःख-सुख । उनकी समस्याएं ! एक नन्हे-से संसार में समाए कई-कई संसार !
    गहन अनुभव एवं अनुभूतियों के ताने-बाने से बुनी  इन रचनाओं के कुछ अलग रंग हैं। अलग राग ।
  • Prakarantar
    Roop Singh Chandel
    100 90

    Item Code: #KGP-9088

    Availability: In stock


  • Rangey Ghazal
    Om Prakash Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-151

    Availability: In stock

    रंगे ग़ज़ल
    यह एक अनूठा दस्तावेज है, जिसे एक प्रयोग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।  इस संकलन की कुछ गज़लें जहां अपनी परम्पराओं के साथ नजर आयेंगी, वहीं कुछ ग़ज़लों का रूप रूढियों और परम्पराओं से हटकर जमाने के नयेपन को छूता नजर आयेगा ।
    इस संकलन में पुराने शाइरों की ग़ज़लों के साथ ही कुछ नये शाइरों की ग़ज़लें भी सम्मिलित की गयी हैं, जो आज लोगों के दिलों में अपनी जगह बना रहे हैं तथा ग़ज़ल के प्रगतिवादी स्वरूप को नयी दिशा ध्यान कर रहे हैं । इन शाइरों में प्रमुख हैं-डा० बशीर 'बद्र', निदा फाजली, अख्तर शीरानी, ताहिर अली 'ताहिर', यूसुफ हसन, मुनीर नियाजी, मुजफ्फर हनफी, परवीन 'शाकिर', शोहरत बुखारी, शह्रयार, महकूर ‘खिजां', जिगर श्योपुरी, तस्नीम सिद्दीकी, अहमद 'कमाल', जफर 'इक्बाल', खालिद अहमद, जावेद शाहीँ, कतील शिफ़ाई, कर्रार 'नूरी', 'जोश' मलीहाबादी, साहिर होशियारपुरी, निश्तर खानकाही, मजीद अमजद, कुमार 'पाशी' और गुलशन मदान आदि ।