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428

  • grid
  • Da Se Dalaal
    Barsane Lal Chaturvedi
    40 36

    Item Code: #KGP-9095

    Availability: In stock


  • Chhatrapati Shivaji
    A.W.I.C.
    40 36

    Item Code: #Kgp-Cps

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Ravindranath Tyagi
    Ravindra Nath Tyagi
    380 342

    Item Code: #KGP-9342

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ त्यागी का रंग व्यंग्य में सबसे निराला है। उनका अध्ययन व्यापक था। स्मृति अच्छी होने से संदर्भ सामने रहते थे। संदर्भों को प्रसंग देकर रचने की विलक्षण योग्यता उनके पास थी। यही कारण है कि त्यागी के व्यंग्य पढ़ते हुए पाठक को आनंद के साथ ज्ञान भी उपलब्ध होता है। बतरस इतना है कि गांव की गोरी पर लिखते हुए प्राकृत से लेकर पेरिस तक अभिव्यक्ति का विस्तार हो सकता है। व्यंग्य में सहज हास्य के वे आचार्य हैं। दफ्रतरशाही,  शृंगार, प्रकृति और अद्भुत तथ्य–प्रायः इन क्षेत्रों से वे विषय चुनते हैं। संस्कृत और अन्य भाषाओं से उद्धरण देते हुए त्यागी व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय प्रश्नों तक बात करते हैं। कई बार लगता है कि उनके लेखन का उद्देश्य निर्मल हास्य की सृष्टि करना है। यह कठिन काम उन्होंने सरलता से किया है। हास्य में आ जाने वाली दुराग्रही वृत्ति उनके लेखन में नहीं है। वे सिद्धांतो से नहीं, आसपास के तथ्यों या व्यक्ति वैचित्रय से हास्य के क्षण निर्मित करते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में रवीन्द्रनाथ त्यागी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Roya Nahin Tha Yaksh
    Hari Ram Meena
    140 126

    Item Code: #KGP-1847

    Availability: In stock


  • Betava Bahati Rahee (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    150 140

    Item Code: #KGP-7045

    Availability: In stock

    बेतवा बहती रही
    एक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी !
    नही-नहीं, यह अनेक उर्वशियों, अनेक मीराओं, अनेक बेतवाओं की कहानी है ।
    बेतवा के किनारे जंगल की तरह उगी मैली बस्तियों । भाग्य पर भरोसा रखने वाले दीन-हीन किसान । शोषण के सतत प्रवाह में डूबा समाज । एक अनोखा समाज, अनेक प्रश्नों, प्रश्नचिन्हों से घिरा ।
    प्राचीन रूढियां है जहाँ सनातन । अंधविश्वास हैं अंतहीन । अशिक्षा का गहरा अंधियारा । शताब्दियों से चली आ रही अमानवीय यंत्रणाएँ । फिर जीने के लिए कोई किंचित ठौर खोजे भी तो कहाँ ! हाँ, इन अंधेरी खोहों और खाइयों में कभी-कभी मुट्ठी-भर किरणों के प्रतिबिंब का अहसास भी कितना कुछ नहीं दे जाता ।
    उर्वशी का दु:ख है कि वह उर्वशी है । साधारण में भी असाधारण । इसीलिए सब तरह से अभिशप्त रही । तिल-तिल मिटती रही चुपचाप ।
    प्रेम, वासना, हिंसा, घृणा से भरी एक हृदयद्रावक अछूती कहानी ! पूरे एक अंचल को व्यथा-कथा ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhu Kankaria (Paperback)
    Madhu Kankria
    180

    Item Code: #KGP-414

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मधु कांकरिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मधु कांकरिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बस…दो चम्मच औरत', 'नंदीग्राम के चूहे', 'चिड़िया ऐसे मरती है', 'अठारह साल का लड़का', 'काला चश्मा', 'चिडिया ऐसे जीती है', 'पोलिथिन में पृथ्वी' तथा 'अन्वेषण'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मधु कांकरिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bharat : Tab Se Ab Tak
    Bhagwan Singh
    325 293

    Item Code: #KGP-9124

    Availability: In stock

    भगवान सिंह ने कविता, कहानी, व्यंग्य, आलोचना, उपन्यास, भाषा-समस्या जिस भी विषय पर लिखा है, उसमें उनका एक नया तेवर रहा है। उनका एक उपन्यास तो हिंदी के सबसे चर्चित और विवादित उपन्यासों में आता है। परंतु इतिहास पर उनका लेखन जितना विचारोत्तेजक और क्रांतिकारी माना गया है, उसकी तुलना उनके अन्य किसी विधा में किए गए लेखन से नहीं की जा सकती। व्यावसायिक इतिहासकार न होते हुए भी उन्होंने प्राचीन इतिहास की जड़ीभूत मान्यताओं को खंडित करते हुए इसकी गहनता, व्याप्ति और दिशा सभी को बदला है और इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों और मनस्वी पाठकों के बीच उसका स्वागत हुआ है।
    प्रस्तुत संग्रह में भी इतिहास पर लिखे गए उनके कुछ ऐसे लेख हैं, जिन्होंने पाठकों और श्रोताओं को उद्वेलित और प्रेरित किया है और उनको पुनर्विचार के लिए बाध्य किया है। साथ ही कुछ ऐसे नए लेख भी हैं, जो इससे पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुए हैं। इनके कारण निबंधों का समग्र फलक बहुत व्यापक हो गया है। जहां कुछ लेखक एक ऐसे अतीत में ले जाते हैं, जहां प्रकाश की कोई अन्य किरण आज तक पहुंच नहीं पाई थी और जिससे आज के दस-बीस हजार या इससे भी पहले की मानसिक ऊहापोह पर हलका और कुछ रंगीनी-भरा प्रकाश पड़ता है, वहीं ऐसे लेख भी हैं, जो ठीक आज की समस्याओं या वर्तमान के अतीत और वर्तमान दोनों की, तीखी पड़ताल करते हैं।
  • Pustak Sameeksha Ka Paridrishya
    Vishwanath Prasad Tiwari
    120 108

    Item Code: #KGP-1476

    Availability: In stock

    हिंदी पुस्तकों की समीक्षा पर एकाग्र प्रस्तुत चयन में इस विषय के अनेक आयामों के संस्पर्श और आस्वाद का गहरा अनुभव मिलता है। यह अनुभव पाठक-लेखक, समीक्षक-प्रकाशक और संपादक को समांतर रूप से इसलिए छूता है, क्योंकि पुस्तक-समीक्षा के संसार में ये सब निकटतम और घनिष्ठतम ‘पड़ोसी’ हैं। भावनात्मक और सक्रियात्मक दोनों ही रूप में अभिन्न। पुस्तक-समीक्षा का आधुनिक परिदृश्य एक सत बहस और पूछताछ से आच्छादित है और संभवतः इसीलिए यह विषय साहित्य के हाशिए पर रहने वाला विमर्श न रहकर अब केंद्र में आ गया है।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा संचालित वार्षिक ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के वर्ष 2005 के आयोजन में पुस्तक समीक्षा की स्थिति की गहराई से पड़ताल करने के उपक्रम में अनेक गंभीर एवं कतिपय रोचक कथ्य-तथ्य सामने आए। कुल मिलाकर उक्त विषयक स्थिति को चिंतामयी ही चिन्हित किया गया। साथ ही, यह विचार भी सामने आए कि पुस्तक के प्रकाशन के उपरांत होने वाले इस सर्वप्रथम संस्कार (समीक्षा) की पवित्रता को कैसे पुनस्र्थापना मिले तथा इसके भावी रूप-स्वरूप को किस प्रकार मिल आकार और आकृति। इन आलेखों में पाठक पाएंगे कि पुस्तक का समीक्षात्मक परिचय ही पाठक के मनोभाव में विश्वसनीयता जगा सकता है।
    संभवतः हिंदी की यह अकेली और पहली ऐसी पुस्तक है, जिसका विषय किताब के जीवन से सीधे जुड़ा हैं। अर्थात् किताब की चिंता में तल्लीस एवं एक किताब। मुद्रित शब्द पर आए-छाए संकटों के बीच विश्वसनीय पुस्तक-समीक्षा ही एक ऐसा अस्त्र हो सकता है, जिसके सहारे शब्दों के सार्वजनिक प्रहरी सीना तानकर, दृश्यलिप्त दुनिया को यह दिखा सकते हैं कि अंततः शब्द ही ब्रह्म है।
  • Pyar Botsavana Kee Baarish Jaisa Hey (African Stories)
    Urmila Jain
    350 315

    Item Code: #KGP-9028

    Availability: In stock

    ‘प्यार बोत्सवाना की बारिश जैसा है’ अत्यंत संवेदनशील अफ्रीकी कहानियों का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद और संपादन उर्मिला जैन ने किया है। वे देशी और विदेशी साहित्य की मर्मज्ञ हैं। पाठक के रूप में जिन रचनाओं ने उनके हृदय को छुआ उन्हें व्यापक पाठक वर्ग के लिए वे इस संकलन में प्रस्तुत कर रही हैं। अनूदित रचनाओं की लोकप्रियता के बावजूद हिंदी में अफ्रीकी कहानियां बहुत कम उपलब्ध हैं। विश्व का यह भाग अपनी संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए रेखांकित किया जाता है। केन्या, गांबिया, गिनी, नाइज़ीरिया, सेनेगल, बोत्सवाना आदि की रचनाशीलता से उर्मिला जैन ने बारह कहानियां चुनी हैं।
    ये कहानियां बताती हैं कि भाषा, देश, पहनावा, आचार, परंपरा आदि की भिन्नताओं के बाद भी मूलभूत समस्याएं और संवेदनाएं तो एक जैसी हैं। अभाव, उपेक्षा, गुलामी, अपमान, निराशा से हर जगह मनुष्य जूझ रहा है। व्यक्ति के भीतर छिपे पाखंड भी हर स्थान पर लगभग समान हैं। संकलन की शीर्षक कहानी के वाक्य हैं, ‘मैंने अपनी पोशाक सावधानी से चुनी थी। अपने भय को सम्मानित रूप में ढका था।’ अनुवाद करते समय उर्मिला जैन ने मूल भाषा के प्रवाह और आशय को भली-भांति संप्रेषित किया है। ‘काली लड़की’ कहानी की डिऔआना का संताप इन पंक्तियों में प्रकट हुआ है, ‘उस रात उसने अपना सूटकेस खोला। उसके अंदर की चीजों को देखा और रोई। किसी ने परवाह नहीं की। फिर भी वह उसी प्रवाह में बहती रही और दूसरों से वैसे ही दूर रही जैसे उसके गांव कासामांस में समुद्र किनारे घोंघे पड़े रहते हैं।’
    अपनी प्रखर कथाभूमि और मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण ये कहानियां पाठकों को खूब अच्छी लगेंगी। ऐसा लगेगा जैसे वे अपने ही समाज या देश का वृत्तांत पढ़ रहे हैं। ये रचनाएं विचार और संवेदना के वैश्विक सूत्र प्रदान करती हैं।
  • Sikha Acharshastra
    Satayendra Pal Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-453

    Availability: In stock

    सिख गुरु साहिबान ने मानवता पर सबसे बड़ा परोपकार किया धर्म को धीर-गंभीर शब्दों के इंद्रजाल और कर्मकांडों के भंवर से मुक्त करके। उन्होंने कहा कि ऐसा पांडित्य और विद्वत्ता व्यर्थ है, खच्चर पर लदे भार व कुंचर स्नान की तरह, यदि इंद्रियां वश में नहीं और आचरण शुद्ध-पवित्र नहीं। इसका एक मात्र उपाय है परमात्मा की शरण में उसकी कृपा प्राप्ति जिससे मन ज्ञान के सूर्य से उद्दीप्त हो उठे। धर्मानुकूल आचार के लिए मन पर सतिगुरु ज्ञान का अंकुश आवश्यक है। सार्थक-सफल जीवन योग्य ज्ञान-चक्षु प्राप्त करने की जो राह सिख गुरु साहिबान ने दिखाई उस ओर ले चलने का संपुष्ट प्रयास है यह पुस्तक जिससे सभी वैयक्तिक व सामाजिक प्रश्नों के उत्तर खोजे जा सकते हैं।
  • Aadhunik Nibandh
    Shyam Chandra Kapoor
    350 263

    Item Code: #KGP-741

    Availability: In stock


  • Chhota-Sa Break
    Vishnu Nagar
    300 270

    Item Code: #KGP-9242

    Availability: In stock

    छोटा-सा ब्रेक
    विष्णु नागर अपनी कविताओं के लिए जितने जाने जाते हैं, अपने व्यंग्यों के लिए भी कम नहीं जाने जाते। ‘छोटा-सा ब्रेक’ में समसामयिक घटनाओं पर छोटे-छोटे व्यंग्य संकलित हैं, जो उन्होंने (दैनिक) ‘नई दुनिया’ में प्रतिदिन ‘गरमागरम’ स्तंभ के अंतर्गत लिखे थे और जिन्हें पाठकों द्वारा बहुत पसंद किया गया था। अधिकतर पाठक तो अखबार खोलकर पहले ‘गरमागरम’ स्तंभ ही पढ़ते थे। जैसा कि आप देखेंगे, ये व्यंग्य-आलेख भले ही समसामयिक घटनाओं- चरित्रों पर हों, मगर इनमें समय की सीमा में रहकर भी उस सीमा के पार जाया गया है। एक सच्चा रचनाकार यही करता है, इसलिए ये व्यंग्य हमारा खयाल है कि कभी पुराने नहीं पड़ेंगे। इसके अलावा ये व्यंग्य उस समय-विशेष का राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज भी हैं, एक ऐसा दस्तावेज, जो सत्ताधीशों की तरफ से नहीं, बल्कि साधारण जनता की तरफ से लिखा गया है, जिसमें उसके तमाम दुःख-तकलीफ दर्ज हैं, उसका व्यंग्य-विनोद भाव अंकित है। ये व्यंग्य परसाई और शरद जोशी दोनों की परंपरा में हैं। उस परंपरा में हैं और अपनी एक अलग परंपरा भी ये बनाते हैं। इनमें शैलियों का अद्भुत वैविध्य है, भाषा की अनोखी सहजता और प्रवाह है। इन्हें पढ़कर नहीं लगता कि व्यंग्य करने के नाम पर शाब्दिक खिलवाड़ की गई है। ये असली चिंता से उपजे व्यंग्य-आलेख हैं। इन्हें पढ़कर समाज को देखने-परखने की एक नई—ऊर्जस्वित दृष्टि भी मिलती है, मात्रा हलका-फुलका मनोरंजन नहीं होता, जैसा कि सामान्यतः व्यंग्य आजकल करते पाए जाते हैं। कैसे गंभीर से गंभीर बात को, जटिल से जटिल विषय को, सहजता-सरलता और व्यंग्यात्मकता से उठाया जाए, इस बात का उदाहरण बनते हैं ये व्यंग्य। इन्हें पढ़कर लगेगा कि व्यंग्य की मौजूदा स्थिति से निराश होने की नहीं, फिर से उत्साहित होने की जरूरत है।
  • Toro Kara Toro-3 (Parivrajak) (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-50

    Availability: In stock


  • Suno Manu (Paperback)
    Vishva Mohan Tiwari
    100

    Item Code: #KGP-1488

    Availability: In stock

    सुनो मनु
    आज का युवा तेज़ी से आगे बढ़ना चाहता है, किंतु अपने माता-पिता या दादा-दादी से उचित सलाह न मिल सकने के कारण उसे शीघ्र ही भोगवादी बाज़ार के दलदल में फँस जाने का खतरा रहता है। 
    एक युवक को ऐसे खतरे से बचाने के लिए एक पिता ने होस्टल में रहने वाले अपने पुत्र को लगातार पत्र लिखे, जिससे न केवल उसे वरन् उसकी मित्रमंडली के समुचित विकास में, उन्हें जीवन में सोच-विचार कर आगे बढ़ने में सहायता मिली। 
    उन पत्रों की सफलता का रहस्य था पुत्रा एवं पिता में मित्रवत् व्यवहार। पिता में एक ओर तो अपनी जड़ों से जुड़े रहने का विवेक है तथा दूसरी ओर आधुनिकता की पर्याप्त समझ है। 
    पत्रों में पुत्र की सामान्य समस्याओं से लेकर जीवन-मूल्य संबंधी प्रश्नों पर आपस में विचार- विमर्श है। 
    इस पुस्तक में युवाओं के लिए वे संदेश हैं, जिनसे उनमें इतनी मानसिक, बौद्धिक, नैतिक शक्ति आ सकेगी कि वे भारत को और इसलिए स्वयं को सचमुच ही विश्व में सम्मानप्रद स्थान दिला सकें। 
  • Avsarvaadi Bano
    Vishva Mohan Tiwari
    75 68

    Item Code: #KGP-1803

    Availability: In stock

    रीति सम्प्रदाय के अनुयायी आचार्य कुन्तक ने कहा है :
    'वक्रोक्ति : काव्यस्य जीवितम' अर्थात् उक्ति की वक्रता ही काव्य का जीवन है। काव्यप्रकाश के प्रणेता आचार्य मम्मट भी व्यंजना-प्रधान रचना को ही उत्तम काव्य मानते हैं।
    वस्तुत: बात सब करते हैं किन्तु बात करने का ढंग सबका अलग-अलग होता है। एक की बात में रस की फुहार होती है किन्तु दूसरे की बात नीरस होती है। ऐसा क्यों ? क्योंकि बात को कहने की शैली अच्छी न थी। स्पष्ट है कि एक बात कई मुखों से सुनने पर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ श्रोता के मन-मस्तिष्क पर उत्पन्न करती है । जो शैली अथवा ढंग श्रोता तथा दर्शक को प्रभावित करने में अथवा रसासिक्त करने में समर्थ होती है, वही काव्य में रसोत्पत्ति करने में भी समर्थ होती है।
    निकम्मी से निकम्मी बात प्रभावोत्पादक ढंग से कही या लिखी जाने पर काव्यास्वाद का आनन्द देती है किन्तु अच्छी बात भी यदि उचित ढंग से न कही जाए तो नीरस बनकर रह जाती है। काव्य में औचित्य का महत्त्व नकारा नहीं जा सकता, तभी तो कलामर्मज्ञ क्षेमेन्द्र ने औचित्य को काव्य-स्थिरता का मापदण्ड माना है ।
    स्पष्ट है वक्रता और औचित्य के विना काव्यत्व की बात निरर्थक है। मेरे इन बीस निबन्धों के संग्रह 'अवसरवादी बनो' में उपर्युक्त दोनों तथ्यों के आत्मसात करने की भरपूर चेष्टा रही है, अत: आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी है कि 'अवसरवादी बनो' कृति सामाजिक रूढियों पर प्रहार करेगी और सामाजिकों को स्वस्थ मनोरंजन की उपलब्धि भी कराएगी । इससे अधिक की बात प्रबुद्ध पाठको पर ही छोड़ देना श्रेयस्कर होगी।
    --भरतराम भट्ट
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Balram
    Balram
    230 207

    Item Code: #KGP-692

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बलराम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'शुभ दिन', 'गोआ में तुम', 'शिक्षाकाल', 'पालनहारे', 'सामना', 'कलम हुए हाथ ', 'कामरेड का सपना ', 'मालिक के मित्र', 'अनचाहे सफर' तथा 'पहला सबक' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बलराम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dr. Ambedkar : Jeevan-Marma
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    280 224

    Item Code: #KGP-1880

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-2 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-513

    Availability: In stock


  • Jai Prakash Narayan
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-jpn

    Availability: In stock


  • Godaan (Play)
    Jaivardhan
    120 108

    Item Code: #KGP-8005

    Availability: In stock

    कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास 'गोदान' का नाटय रूपांतरण।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Premchand
    Premchand
    150 135

    Item Code: #KGP-9154

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है।  
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं प्रेमचंद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘पंच परमेश्वर’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘रामलीला’, ‘मंत्र’, ‘जुलूस’, ‘पूस की रात’, ‘सवा सेर गेहूं’, ‘ईदगाह’, ‘नशा’ तथा ‘कफन’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Jama Poonji
    Dronvir Kohli
    160 144

    Item Code: #KGP-1830

    Availability: In stock

    जसा-पूँजी
    हिंदी के प्रख्यात उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली के इस-प्रथम एवं एकमात्र कहानी-संग्रह 'जमा-पूँजी' की कहानियों को पढ़ते हुए लेखक की कथा-वर्णनात्मकता, भाषा-अनुशासन, संयम तथा इनमें पिरोई गई मार्मिक अनुभूतियों से सहज ही प्रभावित हुआ जा सकता है । अपने सामान्य मगर ठोस कथानकों के चलते पाठक इनकी प्रथम पंक्ति से ही बंध एवं बिंध जाता है तथा लेखक धीरे-धीरे कथा की परवरिश करते हुए उसे ऐसा विश्वसनीय बना देता है मानो यह अपने पाठक से एकमेक होकर विचार-विनिमय का रहा हो। पठनीयता को ऐंठकर, रोचक बनाने की चाह या पाठक को कथा के माध्यम से 'पट्टी पढाने' की अपेक्षा इस लेखक में नहीं पाई जाती है ।
    यद्यपि विभिन्न परिवेशों, पात्रों एवं परिस्थितियों के रंगों से कहानी की तस्वीर उकेरना इस कथाकार को आता है तथापि उनके अधिकांश पात्र उस वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते है जो अपनी अत्यंत सीमित दुनिया में अभावों-तले बिजबिजा रहे हैं, जहाँ दाना-पानी का जुगाड़ किसी मन्नत मांगने से कम नहीं, और जहाँ आर्थिक विषमताएं-विपदाएँ रक्त-संबंधों को भी प्रदूषित कर देती है । शोक, हास-विनोद और विषाद की अनबोली स्थितियों को ज़बान देना भी इस कहानीकार को खूब आता है ।
    विगत कुछ दशकों में ज़ब-तब लिखी गई ये कहानियों हमें निम्न-मध्यवर्गिय समाज के जिजीविषारत उस समय में भी ले जाती हैं जब अँगीठियों का धुआँ हमारे महानगरीय जीवन की कड़वाहट को तिक्त कर देता था और चिंताएँ अठन्नी-चवन्नी की हुआ करती थीं । इस प्रकार ये कहानियाँ अपने समय का कोरस हैं तथा हमारे विगत का स्वाभाविक सामाजिक चित्रण भी ।
    अपने समय, समाज और मनुष्य की संपूर्ण संघर्षमयी  जिजीविषा से सन्नद्ध ये कहानियाँ हमारा अपना भूत, वर्तमान और निश्चित ही भावी भी है । हिंदी कहानी की परिपाटी को जानने का अवसर भी इन कहानियों से मौजूद है ।
  • Sikh Dharma Darshan Ke Mool Tattva
    Satayendra Pal Singh
    195 176

    Item Code: #KGP-305

    Availability: In stock

    सिख धर्म दर्शन के मूल तत्त्व
    सदियों से भ्रमित समाज को परमात्मा से मिलन का एक सरल और सहज मार्ग दिखाकर सिख गुरु साहिबान ने धर्म की एक अभिनव दृष्टि प्रदान की। जीवन को विनम्रता, प्रेम, सेवा, समर्पण और संतुष्टि का पर्याय बनाने, परमात्मा के हुक्म के अधीन चलने का संदेश दिया। इससे समाज में अद्भुत चेतना जाग्रत हुई और शोषित, पीड़ित हृदयों में आशा का प्रकाश भर उठा। सिख गुरु साहिबान द्वारा बताया गया मार्ग जितना सरल है उतना ही कठिन भी है।
    उस मार्ग की सरलता और सहजता क्या है और कैसे साहस व समर्पण की आवश्यकता है, इसका उत्तर खोजने के लिए इस पुस्तक का आद्योपांत पठन अपरिहार्य है।
    सिख धर्म दर्शन पर हिंदी में मूल रूप से लिखी गई यह पहली पुस्तक है, जो धर्म के मर्म तक ले जाती है और उसे अपनाने हेतु प्रेरित करती है।
  • Aatm Raksha Ka Adhikaar
    Narendra Kohli
    375 338

    Item Code: #KGP-737

    Availability: In stock

    आत्मरक्षा का अधिकार
    हमारा देश विकट परिस्थितियों में से गुजर रहा है । शासक कहते हैं कि देश के सामने कोई समस्या ही नहीं है और देश देख रहा है कि समस्याएँ ही समस्याएँ हैं  ।
    जो देख सकता है, वह देख रहा है कि देशद्रोह पुरस्कृत हो रहा है । जो भी देश और शासन से द्रोह करता है, उसे पुरस्कार देकर शांत करने का प्रयत्न किया जाता है । परिणामत: देश-प्रेम निरंतर वंचित होता चलता है ।
    सरकार देश को बाँट रही है और देश का संविधान देश को बाँटने का उपकरण बन गया है । उसे वह रूप दे दिया गया है कि वह चाहे भी तो देश की रक्षा नहीं कर सकता । स्पष्ट है कि देश की जनता समझ रही है कि न शासक उसके प्रतिनिधि  हैं, न देश का संविधान । सब उसके विरोधी हैं और उन नीतियों पर चल रहे हैं, जो देश के लिए कल्याणकारी नहीं है । वे अपने स्वार्थ के लिए देश के भविष्य की हत्या करने पर तुले हुए हैं । जनता स्वयं को असहाय पाती है, जैसे अपने देश को किसी माफिया की जकडन में अनुभव कर रही हो ।
    नरेन्द्र कोहली देश और समाज को समस्याओं से मुँह नहीं मोड़ते । वे पाठको के मनोरंजन का दावा भी नहीं करते ।  वे व्यंग्यकार हैं, अत: अपने धर्म का निर्वाह करते हैं । वे देश को जगाने का प्रयत्न करते हैं-अपनी लेखनी से उसे खरोंच लगाकर, कुछ चीरकर, कुछ चुभोकर । वे मानते है कि साहित्यकार का काम अपने धर्म का निर्वाह है, अपने स्वार्थ की पूर्ति नहीं । लोभ और त्रास लेखक के लिए नहीं हैं ।
  • Pracheen Brahman Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-169

    Availability: In stock

    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।

  • Manzil Abhi Door Hai
    Shanta Kumar
    250 200

    Item Code: #KGP-9030

    Availability: In stock

    मंजिल अभी दूर है
    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमने एक मंजिल तय की, एक संकल्प लिया उस मंजिल तक पहुँचने का, परंतु आधी सदी बीत जाने के बाद भी हम उस मंजिल तक पहुँचे नहीं है । इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि या तो हम चले ही नहीं या फिर मंजिल के लिए जो रास्ता चुना, वह ठीक नहीं था ।
    लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली और उस प्रणाली को चलाने वाले नेता-दोनो ही आज की इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। आधी सदी पूरी हो चुकी है। एक प्रणाली का परीक्षण हो चुका है । अब इस बात की आवश्यकता है कि उस संसदीय प्रणाली पर पुनर्विचार किया जाए और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उचित संशोधन किया जाए ।
    जब भारत का संविधान बनाया गया तो संविधान निर्माताओं ने विश्व की अन्य प्रणालियों की सार्थकता तथा उपयोगिता पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया । उन सबके मन में ऐतिहासिक कारणों से एक बात घर कर गई थी कि भारत के लिए ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली ही उपयोगी है क्योंकि पिछले लगभग 200 वर्षों से भारत किसी न किसी प्रकार से इस प्रणाली से जुडा रहा ।
  • Mere Saakshatkaar : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    195 176

    Item Code: #KGP-739

    Availability: In stock


  • The Kindling Touch (Paperback)
    Debabrata Dasgupta
    195

    Item Code: #KGP-330

    Availability: In stock

    t is not all to describe Madame Curie simply as a devoted scientist; she is a radiant milestone in the realm of modern science. Her whole life carries a divine message. The life that nurtured her, gave her feed for the mind and body, was not at all strewn with flowers. Rather, feelings of want, insecurity and doubts tried to strangle her like the tentacles of an octopus. In the dark, deep jungle of uncertainties that was her early life, where there were chances of slippage at every step, she had ventured forward with resolution and courage and finally reached her glorious destination.
  • Chor Darvaazaa
    Jiten Thakur
    225 203

    Item Code: #KGP-292

    Availability: In stock

    जितेन ठाकुर की कहानियां यह स्थापित करती हैं कि कहानी एक निरंतर बदलने वाली विधा है जो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती क्योंकि कहानी अपने समय को यदि रूपायित नहीं करती और अपने काल की त्रसदी को नहीं पहचानती, तो उस समय और उस दौर का पाठक भी कहानी को पहचानने से इनकार कर देता है।
    जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।
    लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।
    क्या इतना बहुत नहीं है कि अपने समय के इस मित्र रचनाकार ने कहानी की विगलित और परंपरापूरक अपेक्षाओं से हटकर, अपने समय के मनुष्य का साथ दिया है?
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rita Shukla (Paperback)
    Rita Shukla
    180

    Item Code: #KGP-510

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : ऋता शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ऋता शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'प्रतीक्षा', 'छुटकारा', 'देस बिराना', 'विकल्प', 'जीवितोअस्मि…!', 'रामो गति देहु सुमति...', 'निष्कृति', 'सलीब पर चढे सूरज का सच', 'उबिठा बनाम उभयनिष्ठा...' तथा 'हबे, प्रभात हबे' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ऋता शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghav
    Rangey Raghav
    225 203

    Item Code: #KGP-92

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रांगेय राघव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'पंच परमेश्वर', 'नारी का विक्षोभ', 'देवदासी', 'तबेले का धुँधलका', 'ऊँट की करवट', 'भय', 'जाति और पेशा, 'गदल', 'बिल और दाना' तथा 'कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेकनीक्स'।

    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रांगेय राघव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Naya Gyan Ki Anokhi Baatein
    Vishv Nath Gupta
    250 200

    Item Code: #KGP-9237

    Availability: In stock

    ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। किसी ने कहा भी है कि ‘जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ’। यह सच है कि जो जितना गहराई में जाएगा, उसे उतना ही ज्यादा मिलेगा।
    इस पुस्तक में जो बातें बतलाई गई हैं उनके बारे में हमारे बाल और किशोर पाठक कुछ-कुछ जानते भी होंगे, लेकिन बाल और किशोर मन में बहुत जिज्ञासा भरी रहती है, वह बहुत कुछ जानने और समझने को उत्सुक व इच्छुक रहता है। इस पुस्तक में जिन विषयों के बारे में लिखा गया है, उनके बारे में उन्हें कुछ नई बातें मालूम होंगी। इससे उनकी जिज्ञासा बढ़ेगी और उनमें और ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा जागृत होगी। वे और पढ़ेंगे तथा और ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। यही इस पुस्तक का उद्देश्य है।
    -विश्वनाथ गुप्त
  • Pakheru Jaante Hain
    Vasant Sakargaye
    280 224

    Item Code: #KGP-PJH HB

    Availability: In stock

  • Naye Sire Se
    Govind Mishra
    195 166

    Item Code: #KGP-723

    Availability: In stock

    नये सिरे से
    गोविन्द मिश्र की पहली कहानी ‘नये पुराने मां-बाप' ‘माध्यम' (इलाहाबाद : संपादक बालकृष्ण राव), 1965 में प्रकाशित हुई थी। लिख वे इसके पहले से रहे थे। इस तरह कहानियां लिखते हुए गोविन्द मिश्र को लगभग पचास वर्ष होने को आ रहे हैं। प्रस्तुत संग्रह में उनकी 2010 तक की नई कहानियां हैं, जो पिछले किसी संग्रह में नहीं आई हैं। यहां वे जैसे कहानी को नये सिरे से पकड़ने चले हैं। पहले जो लेखक कभी कोई जीवन-स्थिति, व्यक्ति की भीतरी जटिलता, समाज के नासूर, जीवन के खूबसूरत रंग जैसी चीजों से कहानी पकड़ता दिखा था, वह यहां बिलकुल फर्क ढंग से चला है। पिछले इतने सारे वर्षों में अर्जित परिपक्वता में, जैसे-कला, शिल्प, भाषायी सौष्ठव जैसी चीजें ही घुलकर खो गई हैं। कहा भी जाता है कि सर्वोच्च कला वह है जहां कला ही तिरोहित हो जाती है। रह जाती है तो सिर्फ स्वाभाविकता, जिसके रास्ते जीवन कला में सरक जाता है; कलाकृति जीवन की आकृति नहीं, साक्षात् जीवन दीखती है।
    करीब-करीब इन सभी कहानियों में दर्द की एक खिड़की है, जिसके पार जीवन है, अपनी गति से पल-पल सरकता हुआ।...उस खिड़की से उदासीन जिसके रास्ते जीवन दिखाई देता है। जीवन जो है, वह बदलता नहीं...लेकिन दर्द से उठतीं कुलबुलाहटें हैं उसे बदलने की। और तेज आवाज है स्त्रियों की, जिनमें कछ नया कर गुज़रने, कोई रास्ता ढूंढ़ने और दिखाने की बेचैनी है चाहे वह ‘तुम हो' कि सुषमा हो या ‘छाया', ‘मोहलत’ और ‘प्रेमसंतान' की ‘वह'। गोविन्द मिश्र जो अकसर अपने पात्रों को ‘यह' या ‘वह' कहकर अनाम छोड़ देते हैं तो शायद इस आशय से कि भले ही दर्द की वह दास्तान खास हो, पर वह है आम ही...और यह तार फिर उसी स्वाभाविकता से जुड़ता है, जहां कलाहीनता ही सर्वोच्च कला है।
  • Haasya Vyangya Ke Vividh Rang
    Barsane Lal Chaturvedi
    160 128

    Item Code: #KGP-1808

    Availability: In stock

    बरसानेलाल चतुर्वेदी जी द्वारा सम्पादित पुस्तक "हास्य-व्यंग्य के विविध रंग"
    हास्यरस प्रधान कविताएं सैकड़ों वर्षों से लिखी जा रही हैं । आजकल हास्य-कवि सम्मेलन सर्वाधिक लोकप्रिय हैं । आज का मनुष्य इसी के अभाव में जीता है । वह इतना व्यस्त तथा त्रस्त है कि उसके पास हँसने का समय ही नहीं है ।
    हास्यरस के कवियों ने जहाँ विकृति देखी है उसी को लक्ष्य बनाकर कविता रच डाली है । तुलसीदास हो या सूरदास, बिहारी हों या  अलीमुहीब खाँ 'प्रीतम'—हास्यरस की कविताएं सभी न लिखी हैं । किसी ने दुष्टों पर लिखा है तो किसी ने कंजूसों पर, किसी ने भ्रष्ट नेताओं को अपना शिकार बनाया है तो किसी ने दलबदल की प्रवृति को अपना लक्ष्य बनाया है । भ्रष्टाचारी अफसर, मुनाफाखोर  व्यापारी, रिश्वत, मिलावट, तस्करी, कुर्सीमोह- कहने का तात्पर्य ये है कि हास्यकवियों की निगाह से कोई बच नहीं पाया ।
    यह संकलन उन व्यक्तियों तथा प्रवृतियों का सिलसिलेवार 'एलबम' है जो हास्यरस के कवियों की चपेट में आए हैं और जिनकी पोल समय- समय पर खोली गई हैं। यह आलम्बन कोश इन्हें असंगतियों पर व्यंग्यबाण चलाने वाली हास्य-व्यंग्य की कविताओं का प्रथम संग्रह हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ हास्य-काव्य का इतिहास भी प्रस्तुत करता है ।
  • Gulaha- E- Parishaan (Paperback)
    Khursheed Nabi Abbasi
    300

    Item Code: #KGP-7113

    Availability: In stock

    गुलहा-ए-परीशाँ 
    एक जमाने में हर पढ़ा-लिखा काव्य-प्रेमी अच्छे-अच्छे और पसंदीदा अशआर को एक बयाज (संग्रह) रखता था, जिसमें दर्ज शेर जिंदगी की कशमकश, प्रतिकूल परिस्थितियों, सुख और दु:ख  क्षणों में उसे याद आते थे और उनको दोहराकर वह अपना दु:ख घटाता या सुख में वृद्धि कर लेता था ।  आज का जीवन व्यस्ततर है और हर व्यक्ति अस्तित्व के संघर्ष में ऐसा गूँथा हुआ है कि जिंदगी की लताफ़त अब उसे आकर्षित नहीं कर पाती । ऐसे में यदि काव्य-सागर के मंथन से निकले कुछ काव्य-रत्न उसे दिए जाएं तो वह अपनी जिंदगी को कटुता और वेदना में कुछ कमी महसूस कर सकता है । इसी विचार से प्रस्तुत संकलन में तीन सौ से अधिक विषयों पर कहे गए शेर एकत्रित किए गए हैं, जिनके साथ हमारे जीवन के अनेकानेक अनुभव जुड़े हुए हैं और यह कोशिश की गई है कि तवज्जो शाइर के नाम पर नहीं, उसके द्वारा किसी विषय विशेष पर रचे हुए शेर पर ही दी गयी है ।  शेर के चयन में रदीफ-क्राफिया, कल्पना-शक्ति, उपमा-अलंकार पर इतना बल नहीं दिया गया है, जितना शाइर की आत्मा की व्याकुलता या उसकी मनोदशा की तीव्रता को मद्देनजर रखा गया है।
    उर्दू के सभी या अधिकतर शाइरों के प्रतिनिधि शेरों का यह संकलन अपने में एक अनूठा प्रयास है, जिसका हिंदी जगत् में निश्चय ही स्वागत किया जाएगा ।
  • Andhere Ke Deep
    Shanta Kumar
    450 338

    Item Code: #KGP-661

    Availability: In stock

    अंधेरे के दीप प्रखर राष्ट्रवादी सोच के धनी राजनेता व लेखक शान्ता कुमार के लेखों का संग्रह है। इन लेखों के केंद्र में वर्ष 2008 से अक्टूबर 2014 के मध्य की वे घटनाएं/सक्रियताएं हैं जिन्होंने लेखक को उद्वेलित किया। लेखक ने अपनी हार्दिकता व बौद्धिकता के आलोक में इस उद्वेलन को विश्लेषित किया है। ये लेख आठ खंडों में संयोजित हैं--भ्रष्टाचार और राजनीति, गरीब और सामाजिक न्याय, आर्थिक परिदृश्य, न्यायपालिका, व्यक्ति-विशेष, संस्कृति, विविध एवं विदेशी निवेश। इनमें भी ‘भ्रष्टाचार और राजनीति’ पर सर्वाधिक लेख हैं। यह बात समझी जा सकती है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की घटनाएं देख-सुनकर कोई भी संवेदनशील मन व्यथित हो जाएगा। लेखक ने सक्रिय राजनीति में रहकर व्यवस्था, प्रशासन और सामान्यजन को बखूबी जाना-समझा है। यही अनुभव अब लेखों में व्यक्त हो रहा है। शान्ता कुमार कोई एक ज्वलंत घटना उदाहरणार्थ चुन लेते हैं और उसके बहाने स्वतंत्रता, समता, मानवाधिकार, सामाजिक मूल्य, मानवीय गरिमा, सामाजिक समरसता, विकास आदि पर सार्थक बहस छेड़ देते हैं। जैसे लोकतंत्र में बढ़ते परिवारतंत्र पर वे टिप्पणी करते हैं, ‘सत्ता की महत्त्वाकांक्षा और व्यक्तिगत स्वार्थ इतने बढ़ गए हैं कि परिवारवाद की इस प्रवृत्ति से अधिकांश कार्यकर्ता अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं, परंतु बोलते नहीं। राजनीति में आंतरिक लोकतंत्र किसी कारण समाप्त होता जा रहा है। ऐसा लगता है कि अधिकतर जगह धृतराष्ट्र का दरबार बन गया है जहां शुचिता और पवित्राता की द्रोपदी का चीरहरण हो रहा है...।’
    शान्ता कुमार की दृष्टि देश की अर्थव्यवस्था, न्याय-व्यवस्था, संस्कृति, पर्यावरण, ग्रामीण संरचना आदि पर भी गई है। अटल बिहारी वाजपेयी, स्वामी विवेकानंद, नरेन्द्र मोदी और वीर सावरकर पर लिखते हुए लेखक ने उन कारणों की तलाश की है जिन्होंने इनमें नेतृत्व की क्षमता विकसित की। सारे लेख सक्रिय आत्मीयता से भरे हैं। देशहित की चिंता ही इन लेखों का प्रेरक बिंदु है। इनको पढ़ते हुए पाठक अपने देश-परिवेश से रूबरू होता है। प्रामाणिकता व तार्किकता इन लेखों की विशेष शक्ति है। भाषा पारदर्शी है और शैली भावानुकूल।
  • Aawara
    Pandey Baichain Sharma 'Ugra'
    175 158

    Item Code: #KGP-436

    Availability: In stock

    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का समाज-अध्ययन बड़ा प्रखर था। उन्होंने गरीबी में उसकी संपूर्ण भयावहता को बाल्यावस्था में ही भोगा था, अतः उग्र जी ‘आवारा’ नाटक में पूरी तरह सपफल सामाजिक नाटककार प्रतीत होते हैं। ‘उग्र’ का यह नाटक उस अभिनंदनीय योजना का पावन-प्रेरक स्मृति-चिन्ह बन आज भी विजयपताका की तरह यशगान करता पफहरा रहा है। सभ्य, समृद्ध समाज और उसमें कलाकार की दयनीय स्थिति, जमींदार की क्रूरता व जालसाजी का बिलकुल नग्न चित्रण है। 
    लाली-दयाराम की निश्छल प्लेटोनिक मनोवैज्ञानिक प्रेमगाथा को भी ‘उग्र’ ने जीवन के घिनौने पाशविक प्रेम-व्यवहारों से अलग-थलग चित्रित कर मर्मस्पर्शी और हृदयद्रावक बना दिया है।
    आलोचकों ने इस नाटक को स्वाभाविक माना था किंतु समसामयिक प्रगतिशील नाट्य रचनाओं में नई धारा और नूतन अभिव्यक्ति के अभाव का अनुभव कर उग्र ने सामाजिक जीवन में कला का स्वरूप निखारने के लिए नाटक में प्रचलित और रुचिकर शैली का अनुगमन किया है।
    ‘उग्र’ ने अपने लेखन-जीवन का आरंभ ही नाटकों से किया था। उनका पहला ही नाटक ‘महात्मा ईसा’ हिंदी का अत्यंत सफल और चर्चित नाटक रहा था।
    ‘चुंबन’, ‘गंगा का बेटा’, ‘अन्नदाता’, ‘माधव महाराज महान’ उनकी अन्य लोकप्रिय नाट्य कृतियां रही हैं। उपन्यास और भारी-भरकम संपादकीय से समय निकालकर ‘उग्र’ ने एकांकी और प्रहसन की भी रचना की है।
    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ रचित नाटक ‘आवारा’ में सामान्य सहायक पात्रों के अलावा छह पुरुष पात्र और तीन स्त्री पात्र हैं, नाटक तैंतीस दृश्यों तथा तीन अंकों 
    में समायोजित है। पहले अंक में आठ, दूसरे में अठारह व तीसरे अंक में सात दृश्य हैं। ‘नाटक’ में ‘उग्र’ द्वारा प्रणीत गीत भी समायोजित हैं जो कथानक व वातावरण को सजीव बनाते हैं। गीत-नाट्य की यह पद्धति लोक-नाट्य परंपरा की-सी है। कथानक में प्रायः जो घटनाएं मंच पर नहीं दिखाई जातीं उनकी सूचना व वातावरण की मार्मिकता को और गहन बनाए रखने के लिए या कभी-कभी उसके प्रतीकात्मक अर्थों को स्पष्ट करने के लिए गायन पद्धति उपयोगी सिद्ध होती है।
    प्रस्तुत नाटक ‘आवारा’ में बूढ़े भिखारी बुद्धूराम की बेटी लाली और क्रूर जमींदार के छोटे भाई दयाराम को प्रमुख पात्र के रूप में चित्रित कर हमारी सामाजिक मान्यताओं और परिस्थितियों पर सामयिक, तीखा और तीव्र व्यंग्य किया गया है। आज हिंदी में ‘उग्र’ नहीं रहे, न वैसे गुण-ग्राहक पाठक, मगर ‘उग्र’ का अकल्पनीय नाटक ‘आवारा’ आज भी उग्र की अपनी अद्भुत शैली ‘उग्र-शैली’  की याद दिलाता है।
  • Nayi Kahani Ki Sanrachana
    Hemlata
    600 540

    Item Code: #KGP-876

    Availability: In stock

    नई कहानी की संरचना
    इतिहास के वे क्षण अति महत्त्वपूर्ण होते है जो संकट और परिवर्तनों के क्षण होते है । ऐसे समय में ही पुरानी व्यवस्था को पीछे ढकेलकर नई व्यवस्था आगे आती है और परंपरागत अनेक रूढ तथा गतिहीन तत्त्व पीछे छुट जाते हैं और उनके स्थान पर नए यथार्थ से उदूभूत नए तत्त्व परंपरा का जीवंत अंश वन जाते हैं । इनसे मानव संबंधों के लिए नई भूमिका बनती है, नए मानव का जन्म होता है । इस संधिकाल में वहीं साहित्यकार सफल होता है जो तत्कालीन जीवन यथार्थ को अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्त करता है ।
    साहित्य में निहित 'समय सत्य' को पहचानना और उदघाटित करना आलोचक का धर्म है । आलोचक यदि कृति मेँ निहित जीवन सत्य की उपेक्षा करके अपने दृष्टिकोण के संदर्भ में कृति का विश्लेषण करता है तो कृति के साथ न्याय नहीं कर पाता ।
    स्वातंत्र्योत्तर युग से जिस समय यथार्थ का दर्शन तत्कालीन कथा साहित्य में हुआ, वह रचनाकार ने स्वयं  होता था और यहीं कारण है कि उसकी अभिव्यक्ति भी उससे प्रभावित हुई । तत्कालीन साहित्यकार की अनुभूति और अभिव्यक्ति की भिन्नता का विश्लेषण भी प्राचीन मानद्रडों के आधार पर संभव नहीं था, विशेष रूप से कथा साहित्य का, जिसे 'नई कहानी' नाम से जाना गया ।
    'नई कहानी' के माध्यम से व्यक्त भावबोध ने उसकी अभिव्यक्ति शैली को प्रभावित किया । भाव और शैली ने सम्मानित रूप से समय यथार्थ का चित्रण किया । यहीं कारण है कि कहानी विश्लेषण के परंपरागत मानदंड इन कहानियों के विश्लेषण के लिए सक्षम नहीं थे । 'नई कहानी' के विश्लेषण के भिन्न मानदंडों का आश्रय लिया गया जो उन कहानियों में से ही निसृत हुए थे । इस पुस्तक में उन्हें मानदंडों को खोज करने का प्यास है जो उन कहानियों में से ही निसृत हुए हैं और 'नई कहानी की संरचना' से जिनका विशेष महत्त्व रहा है ।

  • Upnivesh
    Narayan Gangopadhyaya
    125 113

    Item Code: #KGP-1942

    Availability: In stock

    उपनिवेश
    नदी-मातृक्र देश बंगाल-पश्चिम और पूर्व की  सीमाओं से मुक्ति-संयुक्त और सम्पूर्ण बंगाल के उस अछूते क्षेत्र विशेष-चर-इस्माइल की एक अदभुत गाथा जिसे पुर्तगाली ज़ल-टस्युओं। में बसाया था, नदी के मुहाने पर, सुन्दर वन से जुडा हुआ ।
    प्रकृति के साथ मनुष्य के संघर्ष की रोमांचपूर्ण जीवन-यात्रा की लोमहर्षक कहानी सभ्य और सहज के मानसिक द्वन्द्व भी वर्गगत संघर्ष का एक अनूठा दस्तावेज विभिन्न नस्लो के विविध चरित्रों को मनोमुग्धकारी मंजुषा आप इस उपन्यास में पायेंगे ।
    द्वितीय महायुद्ध में जमता त्रास और आत्म रक्षा के लिए एकता और संघर्ष भी गुहार की राष्ट्रीय तस्वीर की सजीव रूपरेखा वास्तव ये इस उपन्यास को बंगला उपन्यासों में क्लासिक का दर्जा सही ही प्राप्त है । 
    रहस्य, रोमांच, हास्य, करुणा, प्रेम वासना-क्या कुछ नहीँ है इसमें ।
  • Nepathya Se
    Ramesh Chandra Shah
    175 158

    Item Code: #KGP-9117

    Availability: In stock

    इस पुस्तक का प्रारंभ एक आत्मनिबंध-सी लगने वाली रचना से होता है और उपसंहार एक ऐसे पत्र-संवाद से, जो दरअसल समूची पुस्तक में अंतव्र्याप्त विषयवस्तु से ही संबद्ध विचारों का वाद्य-वृंद अथवा ‘ड्रामा’ है। इस तरह यह एक ओर मेरे विशुद्ध व्यक्ति-व्यंजक निबंध-संग्रहों ‘रचना के बदले’, ‘आडू का पेड़’ और ‘शैतान के बहाने’ से और दूसरी ओर मेरे वैचारिक निबंध-संकलनों ‘सबद निरंतर’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ तथा ‘स्वाधीन इस देश में’ से जुड़ता है; हालांकि है यह कुल मिलाकर वैचारिक निबंधों का संग्रह ही। पाठक लक्ष्य करेंगे कि विशुद्ध साहित्यिक आलोचना जिसे कहा जाता है, उससे भिनन कोटि का उपक्रम होते हुए भी यह लेखन ‘आलोचना’ को हर जगह स्पर्श करता चलता है अलगपन इसमें यह, कि आलोचना का यह स्वर संस्कृति के व्यापक सरोकारों का, कहंे कि एक तरह की सभ्यता-समीक्षा का स्वर है।
    पिछले तीन-चार बरसों के दौरान लिखे गए इन निबंधों में सुधी पाठक को कुछ न कुछ तारतम्य और पूर्वापर-संबंध की प्रतीति भी अवश्य होगी जो इनके पुस्तकाकार प्रकाशन को संकलन की तरह ही नहीं, अंतग्र्रथित गं्रथ के रूप में भी यथेष्ट औचित्य प्रदान करती है। इस अवसर पर लेखक उन समस्त संस्थाओं और पत्रिकाओं के प्रति आभार व्यक्त करना अपना कर्तव्य समझता है, जिन्होंने इन निबंधों को प्रेरित या प्रकाशित किया।
    —रमेशचंद्र शाह
  • Sahitya-Darshan
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    400 360

    Item Code: #KGP-756

    Availability: In stock


  • Indian Education : Beyond Headlines (Education)
    Jagmohan Singh Rajput
    595 536

    Item Code: #KGP-9016

    Availability: In stock

    The contents of this volume are essentially an attempt to catch up with the stakeholders in education, study and analyze their perceptions and the manner these are articulated. These are primarily based on observations, interactions and analysis that emerged from the lecture tours, discussions with experts, teachers, parents and informed citizens. There is a general impression that even when major educational reforms are planned and announced, there is little motivation in the system ensures that these are effectively implemented in the right spirit. It would be seen that the major national concerns in education centre on quality improvement, skill orientation, and value development and nurturance. Everyone expects an environment in school that would be attractive to the learner and let him interact with his 'role models'. It would be a place where every teacher realizes that he is being watched and observed by the innocent young ones who imitate him and treat him as an icon!
    The education system must create learning conditions that lead to the internalization of the democratic values enshrined in the Constitution of India. The process of teaching and learning must consistently strive to inculcate the eternal and universally accepted values of Truth, Peace, Nonviolence, Dharma (Righteous Conduct) and Love. This is necessary to sustain social cohesion and religious amity in the country. Education alone has the unique strength to promote the desire to live together which is critical to the unity and identity of India. Citizenship education must begin at the right stage and can continue all along during education as it would become an asset in the working life. India would enhance its cognitive capital manifold if all of its children get good quality school education of comparable and acceptable quality. It would lead to improvement in the quality of research and innovations which at present is an area of considerable concern.
  • Bayabaan Mein Bahaar
    Urmila Shirish
    450 405

    Item Code: #KGP-594

    Availability: In stock


  • Roma Putri Ke Naam
    Shyam Singh Shashi
    300 255

    Item Code: #KGP-9355

    Availability: In stock

    श्याम सिंह शशि ने अनेक विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया है। उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की है। वहां की जीवन स्थिति, प्रकृति, संस्कृति और मनःस्थिति का गहन अध्ययन किया है। उन्होंने लगभग एक हजार वर्ष पूर्व भारत छोड़कर गए रोमा समुदाय पर विशेष लेखन किया है। तीन करोड़ यायावर भारतवंशी रोमा समुदायों की जीवन पद्धति का उनको विशेषज्ञ माना जाता है। रोमा पुत्री के नाम उनकी विशेषज्ञता का एक और रचनात्मक चरण है।
    आत्माख्यान-यायावरी उपन्यास ‘रोमा पुत्री के नाम’ 
    श्याम सिंह शशि की रचनाशीलता का नया आयाम है। लेखक के शब्दों में, "...यह यायावरी उपन्यास कलेवर में भले ही बहुत बड़ा न लगे किंतु इसमें एक अनूठी दुनिया है जो यथार्थ की अद्भुत यात्रा है। कला और साहित्य का सत्यं शिवं सुन्दरम् के रूप में यायावरी प्रस्तुतीकरण है। मेरे नए-पुराने यात्रा-विवरणों की अनकही कथा है।य् लेखक ने परम घुमक्कड़ महापंडित राहुल सांकृत्यायन का भी इस संदर्भ में स्मरण किया है। इस उपन्यास को मानवीय अधिकारों के लिए संघर्षरत भारतवंशी रोमा समाज का दस्तावेज भी कहा जा सकता है।
    यह उपन्यास रोमा पुत्री कैथी की मार्मिक और रोचक दास्तान है। यूक्रेन के कीव नगर में जन्मी, वारसा शहर में पली-बढ़ी, जर्मनी के बर्लिन महानगर में युवती हुई कैथी की दास्तान जो यायावर है और चित्रकार है। कैथी का जीवन उकेरते हुए लेखक ने विश्व के बीच रोमा समुदाय के आत्मसंघर्ष को अंकित किया है। इस समुदाय के मन में अपने प्रति हुए निरंतर अन्याय के लिए अत्यंत आक्रोश है। विशेषकर हिटलर के रक्तशुद्धता वाले कांड के लिए। रोमा भारत को ‘बारोथान’ कहते हैं—‘बड़ा स्थान’। यहां आते रहना उनको भाता है। फिर भी, उनका जीवन एक रहस्य है। कैथी के संदर्भ में लेखक कहता है, फ्रोमा पुत्री कितने मूड्स हैं तुम्हारी कला में, तुम्हारे जीवन में!"
    हिंदी में अपनी तरह का यह अन्यतम उपन्यास है। एक जीवित यायावर समुदाय के जीवन-समुद्र का अवगाहन करती एक अत्यंत पठनीय रचना।
  • Rangey Raghav Teen Charchit Upanyas
    Rangey Raghav
    550 495

    Item Code: #KGP-2005

    Availability: In stock

    रांगेय राघव हिंदी के उन विशिष्ट कथाकारों में हैं जिनकी रचनाएं अपने समय को लांघकर भी जीवित रहती हैं। रांगेय राघव के तीन उपन्यासों—‘आग की प्यास’, ‘छोटी सी बात’ और ‘दायरे’ को पाठकों की सुविधा के लिए यहां एक ही जिल्द में प्रस्तुत किया जा रहा है—
    ‘आग की प्यास’ रांगेय राघव का एक बहुचर्चित उपन्यास है, जिसकी कथावस्तु के केंद्र में ग्रामीण जीवन है—वहां की राजनीति, अर्थव्यवस्था और बदलता हुआ सामाजिक-धर्मिक परिवेश। लेकिन मुख्य कथावस्तु अर्थकेंद्रित है। समाज के कुछ इने-गिने लोगों की धन की प्यास कैसे वृहत्तर समुदाय का जीवन नारकीय बनाती जा रही है, यह इस उपन्यास में प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुआ है।
    ‘छोटी सी बात’ रांगेय राघव का अत्यंत लोकप्रिय एवं पठनीय उपन्यास है। कलेवर में भले ही यह लघु है परंतु अपने कथ्य में अत्यंत विराट है। कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जीवंत दस्तावेज है।
    ‘दायरे’ उपन्यास का केंद्र एक अवैध (?) बच्चे और उसकी मां की यातना है, लेकिन उसके माध्यम से लेखक ने स्त्री-पुरुष के संबंधों से लगाकर धर्म-संस्कृति तक को अपने दायरे में ले लिया है। एक तीव्र संवेदनात्मक तथा वैचारिक द्वंद्व उपन्यास में शुरू से आखिर तक चलता रहता है। रांगेय राघव ने हिंदी कथा साहित्य को रोजा, सत्यदेव, फादर तोलियाती के रूप में तीन अमर पात्र इस उपन्यास में दिए हैं...
  • Naya Vidhaan (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    120

    Item Code: #KGP-203

    Availability: In stock


  • Zalzala
    Gulshan Rai Monga
    60 54

    Item Code: #KGP-2057

    Availability: In stock

    एक अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए आदमी को जिन चीजों की तवक्को रहती है मसलन महानगर में अपना निजी फ्लैट, गाड़ी, चलता हुआ व्यवसाय, वह सब उसे हासिल था । संतुष्टि के लिए पर्याप्त प्राप्य। 
    भीतर यह जो आत्मा है इतने पर संतोष कर ले यह आवश्यक नहीं है । उसकी अपनी इच्छाएं, वृत्तियां, संस्कार और जरूरतें हैं जिन्हें 'सप्रैस' करने में कोई औचित्य नहीं है । ऐसा प्रयास किसी ओर से भी किया जाए तो आत्मा विद्रोह कर देती है और इस विद्रोह की परिणति होती है एक गहरी सोच में । इस जीव-जगत में अपने होने की अर्थवत्ता अर्थात इस संसार में  के मकसद की तलाश। 
    इस दिशा में गजानन की सफलता-असफलता का लेख-जोखा करने की जुर्रत की गयी है । यह चरित्र अपनी तमाम कमियों, कमजोरियों  और कुछ अच्छाइयों के साथ आपके (पाठकों के) निर्णय का मोहताज है जिसे उसके आंतरिक और बाह्य परिवेश में रखते हुए उसके साथ सहानुभूति, नफरत अथवा प्यार करना आप पर निर्भर करता है । 
  • Sant Meeranbai Aur Unki Padaavali (Paperback)
    Baldev Vanshi
    90

    Item Code: #KGP-7071

    Availability: In stock

    संत मीराँबाई और उनकी पदावली
    मीराँबाई  की गति अपने मूल की ओर है । बीज-भाव की ओर है । भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तित्व को, मूल को अर्जित किया है। आत्मिक, परम आत्त्मिक उत्स (कृष्ण) से जुड़कर जीवन को उत्सव बनाने में वह धन्य हुई । अस्तित्व की गति, लय, छंद को उसने निर्बंध के मंच पर गाया है। जीया है । 
    मीराँ उफनती आवेगी बरसाती नदी की भाँति वर्जनाओं की चटूटानें  राह बनाती अपने गंतव्य की ओर बे-रोक बढती चली गई । वर्जनाओं के टूटने की झंकार से मीराँ की कविता अपना श्रृंगार करती है। मीराँ हर स्तर पर लगातार वर्जनाओं को क्रम-क्रम तोड़ती चली गई । राजदरबार की, रनिवास की, सामंती मूल्यों की, पुरुष-प्रधान ममाज द्वारा थोपे गए नियमों की कितनी ही वर्जनाओं की श्रृंखलाएँ मीराँ ने तोड़ फेंकीं और मुक्त हो गई । इतना ही नहीं, तत्कालीन धर्म-संप्रदाय की वर्जनाओं को भी अस्वीकार कर दिया । तभी मीराँ, मीराँ बनी ।
  • Gulaha- E- Parishaan
    A.M. Nayar
    395 356

    Item Code: #KGP-76

    Availability: In stock

    गुलहा-ए-परीशाँ 
    एक जमाने में हर पढ़ा-लिखा काव्य-प्रेमी अच्छे-अच्छे और पसंदीदा अशआर को एक बयाज (संग्रह) रखता था, जिसमें दर्ज शेर जिंदगी की कशमकश, प्रतिकूल परिस्थितियों, सुख और दु:ख  क्षणों में उसे याद आते थे और उनको दोहराकर वह अपना दु:ख घटाता या सुख में वृद्धि कर लेता था ।  आज का जीवन व्यस्ततर है और हर व्यक्ति अस्तित्व के संघर्ष में ऐसा गूँथा हुआ है कि जिंदगी की लताफ़त अब उसे आकर्षित नहीं कर पाती । ऐसे में यदि काव्य-सागर के मंथन से निकले कुछ काव्य-रत्न उसे दिए जाएं तो वह अपनी जिंदगी को कटुता और वेदना में कुछ कमी महसूस कर सकता है । इसी विचार से प्रस्तुत संकलन में तीन सौ से अधिक विषयों पर कहे गए शेर एकत्रित किए गए हैं, जिनके साथ हमारे जीवन के अनेकानेक अनुभव जुड़े हुए हैं और यह कोशिश की गई है कि तवज्जो शाइर के नाम पर नहीं, उसके द्वारा किसी विषय विशेष पर रचे हुए शेर पर ही दी गयी है ।  शेर के चयन में रदीफ-क्राफिया, कल्पना-शक्ति, उपमा-अलंकार पर इतना बल नहीं दिया गया है, जितना शाइर की आत्मा की व्याकुलता या उसकी मनोदशा की तीव्रता को मद्देनजर रखा गया है।
    उर्दू के सभी या अधिकतर शाइरों के प्रतिनिधि शेरों का यह संकलन अपने में एक अनूठा प्रयास है, जिसका हिंदी जगत् में निश्चय ही स्वागत किया जाएगा ।
  • Chhatrapati Shivaji
    Lala Lajpat Rai
    150 120

    Item Code: #KGP-1876

    Availability: In stock

    छत्रपति शिवाजी

    हम शिवाजी की जीवनी संक्षेप में लिख रहे है । इसे पढ़कर पाठकों को ज्ञात होगा कि शिवाजी में महान् पुरुष होने के सभी गुण विद्यमान थे । शिवाजी प्रबंध में जितने निपुण थे, संगठन की शक्ति को भी भली-भांति जानते थे । वह संगठन के सिद्धात का ज्ञान रखते थे । यदि शिवाजी आज़ होते तो वह यूरोपियनसेनापतियों और विद्वानों से बाजी मार लेते । वह युद्धविद्या में निपुण थे । शत्रु को निर्बल करने का ढंग वह भली-भाँति जानते थे । शिवाजी बहुत धैर्य वाले व्यक्ति थे । वह किसी के व्यंग्य-बाण सहन नहीं कर पाते थे । वह वीरता और बहादुरी में अद्वितीय थे । वह औरंगजेब के प्रधानमंत्री की जरा-सी बात
    पर आगबबूला हो गए और विरोध करने से जरा-सा भी भयभीत नहीं हुए । अपने धर्म में उनका अटूट विश्वास था ।  इस संबंध में वह औरंगजेब को भी मात देते थे । वह वीरों का बहुत सम्मान करते थे । अपने सदाचार के सामने किसी को नहीं टिकने देते थे । वह अदभुत व्यक्तित्व के धनी थे । इसी कारण हम उस महापुरुष की जीवन-कहानी अपने नवयुवकों को सुनाते है । आशा है, आज के नवयुवक अपने कर्त्तव्य का पालन करेंगे और सदाचारी रहकर प्रमाण प्रस्तुत करेंगे । परमेश्वर हमरि देश के लोगों के हृदय में देशभक्ति की भावना भर दे । उन्हें देश और जाति से प्रेम करना सिखाए, साथ ही शुद्ध, पवित्र आचरण एवं आदर्श जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दे । 
    --लाजपतराय 

  • Nai-Naveli Paheliyan
    Kulbhushan Lal Makhija
    80 72

    Item Code: #KGP-952

    Availability: In stock


  • Shakti Kanon Ki Leela
    Amrita Pritam
    180 144

    Item Code: #KGP-1993

    Availability: In stock

    शक्ति कणों की लीला
    सोच की इकाई के तोड़ने की पहली साजिश दुनिया में जाने किसने की थी... 
    बात चाहे जिस्म की किसी काबलियत की हो, या मस्तक की किसी काबलियत की पर दोनों तरह की काबलिया के एक दूसरी की मुखालिफ़ करार देकर, एक को 'जीत गई' और एक को 'हार गई' कहने वाली यह भयानक साजिश थी, जो इकाई के चाँद सूर्य को हमेशा के लिए एक ग्रहण लगा गई... 
    और आज हमारी दुनिया मासूम खेलों के मुकाबले से लेकर भयानक युद्धों के मुकाबले तक ग्रहणित है... 
    पर इस समय मैं जहनी काबलियत के चाँद सूर्य को लगे हुए ग्रहण की बात करूँगी, जिसे सदियों से 'शास्त्रार्थ' का नाम दिया जा रहा है ।
    अपार ज्ञान के कुछ कण जिनकी प्राप्ति होते हैं, वे कण आपस में टकराने  के लिए नहीं होते । वे तो एक मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति को, दूसरो मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति में मिलाने के लिए होते हैं ताकि हमारी प्राप्तियां बड़ी हो जाएँ ... 
    अदबी मुलाकातें दो नदियों के संगम हो सकते है पर एक भयानक साजिश थी कि वे शास्त्रार्थ हो गए... 
    ज्ञान की नदियों को एक-दूसरे में समाना था, और एक महासागर बनना था पर जब उनके बहाव के सामने हार-जीत के बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए, तो वे नदियां सूखने लगीं...  नदियों की आत्मा सूखने लगी... 
    जीत अभिमानित हो गई, और हार क्रोधित हो गई... 
    अहम् भी एक भयानक अग्नि है, जिसकी तपिश से आत्मा का पानी सूख जाता है, और क्रोध भी एक भयानक अग्नि है, जो हर प्राप्ति को राख कर देता है... 
  • Goonj Uthin Thaliyan
    Dr. Kusum Meghwal
    590 443

    Item Code: #KGP-GUT HB

    Availability: In stock

    मेरी लगभग 60 पुस्तकें प्रकाशित होने के बाद मेरे जीवन का यह पहला उपन्यास है–‘गूँज उठीं थालियाँ’, जो कल्पना पर आधारित नहीं है बल्कि पूरी तरह सत्य घटना पर आधारित है। इतना ही नहीं, इससे जुड़ी हुई अन्य सभी घटनाएँ भी सत्य पर आधारित हैं। केवल पात्रों के नाम, स्थानों के नामों में परिवर्तन अवश्य किया गया है।

    यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मेरी हर पुस्तक का जन्म किसी घटना के आधार पर ही हुआ है और यह उपन्यास भी उसका अपवाद नहीं है।

    इस उपन्यास का जन्म जिस घटना के आधार पर हुआ है, उसके पात्र ने तो आसमान की ऊँचाइयों को छू लिया है। उसने पूरी दुनिया को अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया है। वर्षों पूर्व उसे जिदा जमीन में गाड़ देने का फोटो तो मैं नहीं ले पाई, किंतु उसी घटना को पुनः दोहराने वाला फोटो मुझे उपलब्ध हो गया और तब से ही मेरे मस्तिष्क के गर्भ में पल रहे संबंधित विचारों को, उसके चित्रों को कोरे कागज पर उकेरने के लिए मेरी कलम उतावली हो गई तो उस घटना ने इस उपन्यास के रूप में जन्म लेकर अपने पाठकों तक पहुँचने का पक्का इरादा कर लिया।

    कोई भी काम अकारण नहीं होता। उसके करने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। इस पुरुषप्रधान अन्यायपरक, असमानतापरक समाज व्यवस्था के विरोध का कीड़ा तो मेरे दिमाग में बचपन से ही कुलबुलाने लग गया था, कितु उसे निकालने का काम अब कई वर्षों बाद अर्थात् मेरे जीवन के उत्तरार्द्ध में हो रहा है।

    वैसे तो अपनी खुद की समझ आने के बाद से अर्थात् लगभग पाँच वर्ष की उम्र से लड़की के पैदा होने से लेकर मरने तक के पूरे जीवन में कदम-कदम पर उसके साथ होने वाले भेदभाव, अन्याय, अत्याचार, उसके हर कदम पर लगाए गए प्रतिबंधों को मैंने न केवल पढ़ा और सुना है वरन् स्वयं भोगा भी है और वे सभी कष्ट, पीड़ाएँ एवं दर्द मेरी कहानियों, कविताओं के माध्यम से बह निकले, जिन्होंने हिंदी साहित्य के विशाल समुद्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

    यह उपन्यास भी नारी व्यथाओं तथा उसके कष्ट, दर्द, पीड़ाओं को अभिव्यक्ति देता हुआ नारी को क्रांतिकारी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली मेरी कहानियों, कविताओं की श्रृंखला में एक और कड़ी के रूप में जुड़ गया है, जो मेरे पाठकों को मेरी पूर्व की पुस्तकों की तरह ही पसंद आएगा, ऐसी मेरी उम्मीद है।

    वैसे तो लेखक की हर रचना की सफलता-असफलता का निर्णायक पाठक वर्ग ही होता है, कितु अपने पाठक वर्ग की मानसिकता को पहचानते हुए मुझे यह लिखने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती कि यह भी उन्हें पसंद ही आएगा।

    मेरे जीवन का यह प्रथम उपन्यास हिंदी उपन्यास जगत् में लाते हुए, अपने पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे अतीव हर्ष हो रहा है।

    मुझे यहाँ यह लिखने में भी कोई आपत्ति नहीं है कि हिंदी साहित्य जगत् के ठेकेदार, आलोचक व समालोचक इसे चाहे किसी भी दृष्टि से लें, किंतु अपने लेखकीय दायित्व को मैंने पूरी ईमानदारी से निभाया है, इसे कोई झुठला नहीं सकता। वैसे भी खरा-सच्चा लेखक, समाज की खरी-सच्ची बातें लिखने वाला लेखक किसी की आलोचना की परवाह नहीं करता। वह अपने जीवन के महान् लक्ष्य की प्राप्ति में लगा रहता है और मैं भी अपने जीवन के महान् लक्ष्य पुरुषों द्वारा नारी को भी एक इनसान मान लेने के लक्ष्य को पूरा करने में लगी हुई हूँ और आजीवन लगी रहूँगी। मुझे अपने इस दृढ़ निश्चय से कोई हटा नहीं सकता।

    मुझे आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि अपने आपको इनसान के तराजू में तौलने और उस पर खरे उतरने वाले इनसानी पुरुषों की भागीदारी, उनका स्नेह, सहकार तथा प्रोत्साहन मुझे अवश्य मिलेगा।

    इसी उम्मीद के साथ---

    डॉ. कुसुम मेघवाल

  • Mera Paigaam Muhabbat Hai Jahan Tak Pahunche (Paperback)
    Jigar Muradabadi
    150

    Item Code: #KGP-7111

    Availability: In stock

    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
    'जिगर' साहब इंसानियत और शेरियत दोनों का पैकर थे । उनकी शायराना अजमत का बडा राज उनकी मखसूस सज-धज, तर्जेअदा और तरन्नुम था । उनकी मासूम जोर दिलकश शखसियत ने उन्हें अपने दौर का महबूब-तरीन शायर बना दिया था । उनकी बड़ाई को इस पैमाने से भी नापा जा सकता है कि दौरे जदीद में कितनों ने जिगर बनने की कोशिश की, इसलिए कि शेर की दुनिया के वह एक तर्ज थे। असलूब थे, एक स्टाइल थे ।
    'जिगर' ने गजल को एक नई जिंदगी बख्शी । उनकी गजले मदहोशी व रंगीनी के छलकते हुए सागर  हैं, जिससे तरह-तरह के रंग मौजूद है और किस्म-किस्म के जजबात जलवागर हैं,
    जिनका मुताअला जिंदगी के नशे को गहरा कर देता है, कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और हयात नये रूप में जलवागर होकर दिल की धड़कन में जज्ब हो जाती है । खून को रवानी तेज हो जाती है और शायरी के तारों से आहंग हो जाती है। ये इंतेखाबे गजल के अशआर ऐसे है जिनमें नई जिंदगी और वक्त की धड़कनों की आवाजें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख 'जिगर' को कभी भुला नहीं सकेंगी ।
  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap
    M.A. Sameer
    250 200

    Item Code: #KGP-9331

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : S.R. Harnot (Paperback)
    S. R. Harnot
    180

    Item Code: #KGP-7214

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Buddha Charitam (Paperback)
    Hari Krishna Taileng
    120

    Item Code: #KGP-7226

    Availability: In stock

    बुद्ध चरितम्
    संस्कृत के सात श्रेष्ठ महाकाव्यों और नाटकों पर आधारित हिंदी कथाएँ
    बुद्ध चरितम् की विशेषता यह है कि इसमें भगवान बुद्ध के जन्म से निर्वाण तक का जीवन-चरित्र तो है ही, साथ ही  महाकवि ने बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों को रुचिकर कथा में पिरोकर मधुर और सहज ग्राह्य बना दिया है ।
    सौंदर नंद में बोद्ध धर्म के सिद्धांतों और साधना-रीति को कथा में गूँथकर महाकवि ने सहज और बोधगम्य बना दिया है । इस महाकाव्य में गौतम बुद्ध की विमाता से उत्पन्न भाई नंद और उसकी अतीव सुंदर पत्नी सुंदरी की मनोहारी कथा है ।
    नागानंद में नागों की रक्षा में प्राणोत्सर्ग कर देने वाले परोपकारी नायक जीमूतवाहन की कथा है । संयत और उदात्त प्रेम, लोकहित और प्राणीत्सर्ग की यह कथा मानवीय गुणों से परिपूर्ण और प्रभावशाली है ।
    मालती-माधवम में मालती और माधव की प्रणय गाथा है, जो अनेक बाधाओं के आते रहने के बावजूद सफलता प्राप्त करती है । कथा बडी रोचक है ।
    प्रतिमा नाटक में पुरुषोत्तम राम के वनगमन से लेकर राज्यारोहण की कथा कही गई है । कथावस्तु का प्रस्तुतीकरण अत्यंत कलापूर्ण और मनोहारी है । यह नाटक बड़ा आदर- प्राप्त और विशिष्ट है । इसमें भरत का उदात्त चरित्र और महारानी कैकेयी का मार्मिक व सहानुभूतिपूर्ण चित्रण हुआ है । कैकेयी महाकवि द्वारा निर्दोष सिद्ध की गई है ।
    रत्नावली नाटक में वत्सराज उदयन से सिंहल की राजकुमारी रत्नावली के विवाह की रोचक व सरस कथा है ।
    विक्रमोर्वशी नाटक में चंद्रवंश के इंद्र के समान प्रतापी महाराज पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी की प्रेमकथा प्रस्तुत की गई है।
  • Ratangarbha
    Shanker Shesh
    40 36

    Item Code: #KGP-2087

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamleshwar (Paperback)
    Kamleshwar
    90

    Item Code: #KGP-1251

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : कमलेश्वर
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमलेश्वर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "कोहरा', 'राजा निरबंसिया', 'चप्पल', 'गर्मियों के दिन', 'खोई हुई दिशाएँ', 'नीली झील', 'इंतजार', 'दिल्ली में एक मौत' , 'मांस का दरिया' तथा 'बयान' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमलेश्वर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand
    Shanta Kumar
    300 240

    Item Code: #KGP-1865

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापक विवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Bhartiya Sabhyata Ki Nirmiti
    Bhagwan Singh
    540 432

    Item Code: #KGP-401

    Availability: In stock

    भारतीय सभ्यता की निर्मिति भगवान सिंह की रचनाओं में ही भारतीय इतिहासलेखन के इतिहास में एक नया कीर्तिमान इस विशेष अर्थ में है कि इससे पहले इतिहासकारों की दृष्टि हड़प्पा के नगरों या ऋग्वेद तक जाकर रुक जाती थी, इससे आगे कुछ दीखता नहीं था और बहुत से प्रश्नों का हमें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता था। 
    प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार उन्होंने हड़प्पा काल से भी आठ-दस हजार पीछे के सांस्कृतिक विकासों और सभ्यता के उन नियामक तत्त्वों की खोज की, जिनका उपयोग विविध सभ्यताओं ने अपने निर्माण में गारे और पलस्तर के रूप में किया। विषय गंभीर होते हुए भी उन्होंने इसे इतना सरल और बहुजनग्राह्य रूप में प्रस्तुत किया है कि अखबार पढ़ने की योग्यता रखने वाला व्यक्ति भी इसे पढ़ते हुए किसी तरह के भारीपन या उलझाव का अनुभव नहीं करता। इस पुस्तक में उनकी विवेचनशैली भी उनकी अन्य कृतियों से भिन्न है। नृतत्त्व, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान और साहित्य की सामग्री का इतनी कल्पनाशीलता से उपयोग किसी अन्य कृति में देखने में नहीं मिलता।
  • Shaantidoot Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    300 270

    Item Code: #KGP-644

    Availability: In stock

    भारत के इतिहास में फिर एक बार वैसा ही समय आया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक बार फिर कुछ वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग करके देश का विभाजन करने की मांग की। गांधी जी ने मुस्लिम लीग को देश के विभाजन से विरत करने के लिए मुहम्मद अली जिन्ना के हाथ पर कोरा चैक रखकर संपूर्ण देश पर शासन करने का अधिकार मुस्लिम लीग को दे दिया, किंतु मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान से कम पर समझौता करने से इनकार कर दिया। सन् 1999 में पाकिस्तान ने देश पर आक्रमण कर दिया। इससे पूर्व भी पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण करके देश को हथियाने का प्रयत्न किया था, किंतु इस बार पाकिस्तान से बातचीत न करके पाकिस्तान को ईंटों का जवाब पत्थरों से देकर देश की रक्षा करने मंे सफलता प्राप्त कर ली, किंतु इसे युद्ध की समाप्ति नहीं माना जाना चाहिए। पाकिस्तान की ओर से फिर भी युद्ध की स्थिति पैदा की जाती रहेगी। वस्तुतः देश की समस्या समय-समय पर होने वाले आक्रमण नहीं हैं। जब तक पाकिस्तान रहेगा तब तक युद्ध की स्थिति बनी रहेगी। महाभारत की तरह एक निर्णायक युद्ध होकर अखंड भारत की स्थापना ही इस समस्या का समाधान है।
    -इस पुस्तक के ‘गांधी जी के शांति-प्रयासों की असफलता के कारण’ अध्याय से
  • Door Van Mein Nikat Man Mein
    Ajit Kumar
    360 288

    Item Code: #KGP-868

    Availability: In stock

    दूर वन में निकट मन में
    मनुष्य एक-दूसरे को सुख-दुःख देते किन नातों के जाल में बँधते-जुड़ते रहते हैं? उनके संबंधों की आधारभूमि क्या है? एक-दूसरे के सारे मीठे-कड़वे अनुभव कालांतर में एक भाव, एक स्मृति, एक टीस बनकर रह जाते हैं! उस भाव का महत्त्व क्या है?
    ‘दूर वन में’ अजितकुमार द्वारा रचित कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरणों का संग्रह है। इसमें कुछ प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध विशेषकर ऐसे लोग हैं जो अब भूले से जा रहे हैं, पर अपने ज़माने के विशिष्ट व्यक्तित्व रहे हैं। अधिकांश संस्मरण पारिवारिक दायरे में आने वाले लोगों के हैं। 
    ‘निकट मन में’ भी अजितकुमार के संस्मरणों का संग्रह है।  इन पुस्तकों के शीर्षकों में तुक तो अनायास मिल गया है, उनकी तान, लय और समझ में भी पाठकगण उस निरंतरता का, तारतम्य का आभास पाएँगे, जो अजितकुमार की कविता और गद्य-रचना का स्वाभाविक गुण है।
    संस्मरणों के माध्यम से अजितकुमार अतीत को नहीं पगुराते, हिसाब-किताब भी बराबर नहीं करते, वे अनुभव तथा संवेदना का पथ प्रशस्त करते हैं। इस नाते, ये संस्मरण जितने उनके हैं, लगभग उतने ही या उससे भी अधिक औरों के अपने हो सकेंगे।
    अजितकुमार के संस्मरणों की ये दो पुस्तकें एक ही जिल्द में प्रस्तुत हैं। प्रसिद्ध कवि अजितकुमार एक समर्थ और सशक्त गद्यकार भी हैं। इनके गद्य की ताकत का नमूना तो ये संस्मरण हैं ही, उनके संवेदनशील, सजग, जागरूक व्यक्तित्व का भी परिचय देते हैं।
  • Vaigyanik Sahitya Ke Anuvaad Ki Samashyayen Aur Unka Samadhan
    Ajit Kumar
    400 300

    Item Code: #KGP-9385

    Availability: In stock

    यह युग विज्ञान का है। पूरा विश्व विज्ञान की उपलब्धियों, क्षमताओं, संभावनाओं और आवश्यकताओं से चमत्कृत है। विज्ञान की तमाम शाखाओं-प्रशाखाओं का अध्ययन करने के लिए जो पाठ्य सामग्री तैयार होती है वह मूलतः अनुवाद पर ही निर्भर है।
    जाहिर है कि वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद अत्यंत विशिष्ट होता है। अत्यंत कठिन भी। निश्चित पारिभाषिक शब्दावली, सुनिश्चित अर्थबोध, व्यापक संकेत पद्धति आदि के कारण वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद करते समय किसी को भी सूचना और ज्ञान के साथ सटीक शब्दावली का अभ्यास होना अपेक्षित है। प्रस्तुत पुस्तक ‘वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद की समस्याएं और उनका समाधन’ में इसी विषय के अनेक पक्षों पर विचार किया गया है। यह वस्तुतः प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की सामग्री की हिंदी में अनुवाद की समस्याओं का लेखा-जोखा है। प्रस्तुत पुस्तक का संपादन डाॅ. भोलानाथ तिवारी तथा वैश्विक मान्यता प्राप्त विद्वान् डाॅ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल ने किया है। इसमें विषय वेफ अनेक अधिकारी विद्वानों के लेख शामिल हैं।
    संपादक के शब्दों में, ‘जब भी वैज्ञानिक साहित्य का अनुवाद किया जाता है तो प्रायः हमें कुछ शब्द नए बनाने पड़ते हैं या संस्कृत से या स्रोत भाषा अंग्रेजी से या अन्य भाषाओं, बोलियों से लेने पड़ते हैं। इस तरह हमारी भाषा की वैज्ञानिक शब्दावली में वृद्धि होती है...।’ एक बेहद जरूरी पुस्तक।
  • Maila Darpan
    Moti Bhuvania
    125 113

    Item Code: #KGP-1851

    Availability: In stock

    मैला दर्पण
    'मैला दर्पण’ कलापारखी मोती भुवानिया का क्या संचयन  है । उनकी कविताओँ में कलाकृतियों जैसे वर्णबिम्बों को भरमार को वजह शायद यही है कि एक लंबे अर्से तक कला की दुनिया से संबद्ध होने के कारण वे कविता में या कहें शब्दों में एक मुकम्मल चित्र की रचना कर डालते है ।  कविता के लिए शब्द चुनते वक्त जैसे वे आकृतियों के रूप चुनते है ।
    'मैला दर्पण’ स्मृति का पुनरख्यान नहीं है । वह एक लंबे 'कैनवस' पर जीवन को संपूर्णता में उकेरने की एक व्यवस्थित कोशिश है । व्यवस्थित इसलिए कि मोती भुवानिया का विचार जगत अनिर्णय से ग्रस्त किसी मोह से लिपटा हुआ नहीं है । वे भरसक खुद को भी तोड़कर-फिर से नए रूप में छोड़ने की ललक से भरे हुए है । नई कविता के उत्कर्ष काल में जिस विविधता का भव्यतापूर्ण रचनात्मक रूप कविताओं में चित्रित हुआ है उसका सौष्ठव अपनै चरम रूप में भुवानिया जी की कविताओं में मिलेगा । यह तो मात्र संयोग है कि 'मैला दर्पण' के उस सौष्ठव में काव्य-भाषा के अब तक प्रचलित रूपों के साथ अद्यतन रूपों की झलक भी मिलेगी । और कहना पडेगा कि एक प्रासंगिक कविता में परंपरा और भविष्य दोनों एकमेक होकर कविता को अगली दस्तक की पहचान मिलती है ।
    सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण 'मैला दर्पण' की भाषा है, जिसमें एक साथ प्राज्जलता का प्रदर्शनकारी रूप है तो लोक का विलुप्त-सा वह संस्पर्श भी जो हलके से हमें अपनी 'लोकस्मृति' से जोड़ देता हैं ।
    कुल मिलाकर भुवानिया जी की वे कविताएँ हमें हमारे  वैभव में परिचित कराती है तो साथ ही साथ हमें बहुत कूर रूप से हमारे वर्तमान से भी जोड़ती है। भाषा के स्तर पर भुवानिया जी की कविताएँ न केवल अपने समकालीनों से अलग है अपितु अपने परवर्तियों से भी कुछ आगे का अनुभव देतीं है । 

  • Vaksh Shila
    Sunil Gangopadhyaya
    90 81

    Item Code: #KGP-2008

    Availability: In stock

    वक्ष-शिला
    'वक्ष-शिला' पढ़ने का अर्थ है एक पुरे इतिहास से गुजरना । सातवें दशक  में पश्चिम बंगाल, बिहार आदि राज्यों में नक्सलवाद की जो तीव्र आंधी, चली थी, उसमें जिस तरह हजारों युवकों को बलि चढी थी, उसका साक्षी इतिहास है और उस इतिहास का एक अंश है यह उपन्यास । प्रसिद्ध बांग्ला क्याकार सुनील गंगोपाध्याय ने उस समय को, उस काल की स्थितियों को, युवा मन की भावनाओं को, राजनीति को लेकर इस उपन्यास का जो रोचक ताना-बाना बुना है, वह अदभुत है । यह उपन्यास प्रमाणित करता है कि एक औपन्यासिक जाते के माध्यम से किसी विशेष कालखंड को कितनी गहनता से प्रस्तुत किया जा सकता है ।
    'नक्सलवाद' वैचारिक धरातल पर बहुत सारे प्रश्न छोड़ गया है, आज भी हम उन प्रश्नों के घेरे से बाहर नहीं निकले हैं, किंतु इस उपन्यास में अनेक प्रश्नों के उत्तर हमें मिल सबत्ते हैं जो उस आंदोलन को समझने में मदद करते हैं ।
    अनूठी शैली, रोचक भाषा और नये धरातल पर खडी कथा के कारण यह उपन्यास अपना एक विशिष्ट प्रभाव छोड़ता है ।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Jaishankar Prasad
    Jaishankar Prasad
    180 153

    Item Code: #KGP-9158

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं जयशंकर प्रसाद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘आकाश-दीप’, ‘ममता’, ‘आंधी’, ‘मधुआ’, ‘व्रत-भंग’, ‘पुरस्कार’, ‘इंद्रजाल’, ‘गुंडा’, ‘देवरथ’ तथा ‘सालवती’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Mere Papa Ki Shaadi
    Aabid Surti
    375 338

    Item Code: #KGP-62

    Availability: In stock


  • Satta Ke Nagaare
    Alok Mehta
    595 536

    Item Code: #KGP-229

    Availability: In stock

    लोकतंत्र में राजनीति हर ताले की चाबी मानी जाती है। राजनीति का जितना ज्ञान महानगरों में रहने वाले विश्लेषकों, कंप्यूटर पर आंकड़ों की जोड़-तोड़कर चुनावी भविष्यवाणी करने वालों, अर्थशास्त्रियों, राजनयिकों या प्रकाड पत्रकारों को होता है, उससे अच्छी व्यावहारिक समझ सुदूर गांवों में रहने वाले गरीब पिछड़े-अर्द्धशिक्षित भलेमानुष की होती है। गांव की पंचायतों में राजनीति चैपड़ की पकड़ अधिक अच्छी होती है। उन्हें मालूम है कि सत्ता के नगाड़े कब और क्यों बजते हैं। सत्ता के अनंत विस्तार को मरुस्थल भी कहा जा सकता है और अथाह सागर भी। राम राज्य रहा हो या महाभारत काल, ब्रिटिश राज रहे या अमेरिका से अभिभूत रहने वाली सत्ता-व्यवस्था राजनीति का लावा कभी ठंडा नहीं होगा।
    पत्रकारिता का दायित्व यही है कि अपने पाठकों को हर समय राजनीति के अमृत और विषय का सही आकलन करके बाता रहे। पिछले वर्षो के दौरान इस कड़वे सच को पेश करते रहने से जहां पाठकों का अधिकाधिक स्नेह और समर्थन मिला, वहीं कई राजनीतिज्ञ नाराज भी होते रहे। लेकिन हमारा कर्तव्य समाज और सत्ता की पहरेदारी करना है। इसलिए किसी की खुशी या किसी की नाराजगी की चिंता नहीं कर सकते। सत्ता के नगाड़े इस तरह बजने चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक समाज जागता रहे और अच्छे पके हुए फल उसे मिलते रहें। इस संकलन में पिछले वर्षो के दोरान सत्ता के इर्द-गिर्द चलते रहे घटनाचक्रों पर लिखी गई टिप्पणियां शामिल हैं। एक तरह से यह इतिहास के कुछ पन्नों को संजोकर रखने का प्रयास मात्र है। आज ऐसी टिप्पणियों पर चाहे जैसी खट्ठी-मीठी प्रतिक्रियाएं हों, राजनीति के दूरगामी परिणाम समझाने वालों के लिए ये सदैव उपयोगी साबित हो सकती है। 
  • Qalandar
    Narendra Mohan
    25 23

    Item Code: #KGP-9102

    Availability: In stock


  • Idhar Ki Hindi Kavita
    Ajit Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-9130

    Availability: In stock

    ‘कविता का जीवित संसार’ (1972) के बाद ‘इधर की हिंदी कविता’ (1999) अजित कुमार के लेखों का दूसरा संग्रह है। कविता की अपनी व्याख्या को उन्होंने पहले संग्रह में ‘स्नेहमयी व्याख्या’ नाम दिया था, जिसका मतलब कुछ लोगों ने यह निकाला कि कविता उनके लिए एक घरेलू मामला है।
    अब यदि वे ‘इधर की हिंदी कविता’ प्रकाशित कर रहे हैं तो पहला प्रश्न यही उठेगा कि ‘इधर’ की व्याप्ति किधर तक है? इसका एक उत्तर यह होगा कि ‘इधर’ वहां तक है, जहां से ‘उधर’ शुरू होता है। उत्तर और भी हो सकते हैं, वैसे ही जैसे कि प्रश्न अनेक होंगे।
    उनमें से किन्हीं को समझने और अपने तईं सुलझाने की कोशिश इन लेखों में हुई है। संभव है, वह आधी-अधूरी कोशिश हो, जिसका कुछ कारण इस स्थिति में देखा जा सकता है कि अजित कुमार अपने को समीक्षकों के बीच कवि और कवियों के बीच समीक्षक पाते रहे हैं। संभव तो यह भी है कि इसी नाते उन्हें निराला प्रिय हों, जिनका खयाल था-
    ‘बाहर मैं कर दिया गया हूं।
    भीतर, पर, भी दिया गया हूं।’
    कौन जाने, अपठनीयता की मारा-मारी में पठनीयता का यह हस्तक्षेप दमघोंटू माहौल में ताजी हवा के एक झोंके-सा मालूम हो।
  • Asprishya
    Ajay Mahapatra
    180 162

    Item Code: #KGP-8003

    Availability: In stock

    ईश्वर की बनाई दुनिया में हर व्यक्ति समान है। सबमें परमात्मा का अंश है। सब उसी परमज्योति से आलोकित हैं। फिर यह असमानता, अन्याय, शोषण, भेदभाव, जातिवाद, नस्लवाद क्यों ! ये मनुष्य की बनाई अवधारणाएं हैं। इनके कारण जाने कितने व्यक्तिगत और सामाजिक संकट उत्पन्न होते रहते हैं। समय-समय पर इनका प्रतिरोध विभिन्न रूपों में सामने आता है। प्रतिवाद और प्रतिरोध का एक विशिष्ट स्वर अजय महापात्र के उपन्यास ‘अस्पृश्य’ में सुना जा सकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में मानवीय संवेदना का गहन प्रभाव है। लेखक ने कला-कौशल या शाब्दिक साहस के स्थान पर कथ्य को प्रमुखता दी है। यह समय को स्पष्ट और सतर्क ढंग से प्रस्तुत करने का रचनात्मक उपक्रम है। 
    ‘अस्पृश्य’ एक शब्द भर नहीं, मात्रा एक भाव संवेद नहीं; यह निरंतर सक्रिय समय का आख्यान है। इसमें समय और समाज के बहुतेरे बिंब देखे जा सकते हैं।
  • Hamare Aadarsh Mahapurush
    Nirankar Dev Sewak
    40

    Item Code: #KGP-948

    Availability: In stock


  • Aacharya Chanakya
    Vishv Nath Gupta
    160 128

    Item Code: #kgp-ac

    Availability: In stock


  • Bevatna & Other Stories
    Amrita Pritam
    240 216

    Item Code: #KGP-9077

    Availability: In stock


  • Culture Valture
    Mamta Kalia
    350 280

    Item Code: #KGP-9221

    Availability: In stock

    कल्चर वल्चर
    शीर्षस्थ कथाकार ममता कालिया की प्रत्येक रचना पर उनकी रचनाशीलता के हस्ताक्षर रहते हैं। संवेदना की थाह लेने और भाषा में उसे संभव करने का उनका अपना एक अनूठा ढंग है। ‘कल्चर वल्चर’ ममता कालिया का नवीनतम उपन्यास है। इसके बीज-विचार के संदर्भ में उन्होंने लिखा है, ‘कला, साहित्य व संस्कृति आज सरोकार न रहकर कारोबार बनते जा रहे हैं और इसके प्रबंधक, कारोबारी। इनके हाथों में संस्कृति, विकृति बन रही है और साहित्य, वाहित्य।’
    ममता कालिया ने बहुत कुशलता के साथ कोलकाता की पृष्ठभूमि में इस उपन्यास की कथा बुनी है। महत्तर उद्देश्यों को लेकर अस्तित्व में आई एक साहित्यिक- सांस्कृतिक संस्था किस तरह विडंबनाओं, विरूपताओं, अंतर्विरोधें, कपट, कलह, चतुर चाटुकारिता व निजी महत्त्वाकांक्षाओं का तलघर बन जाती है—यह तथ्य ‘कल्चर वल्चर’ में उजागर हुआ है। लेखकीय कौशल यह है कि सारे चरित्र और कथा-प्रसंग कल्पना पर आधारित होते हुए भी अपनी निष्पत्तियों में अत्यंत जीवंत हैं। चाहें तो इस उपन्यास में समकालीनता की पदचाप या अनुगूंज भी सुन सकते हैं। नवीन और सुषमा जैसे चरित्र अपने निहितार्थों के साथ पाठक के चित्त पर अंकित हो जाते हैं। लेखिका ने व्यापक संदर्भों के साथ उन मनोवृत्तियों को टटोला है जो शब्द में सिक्कों की खनक और साहित्य में सरोकारों का शोकगीत सुनना चाहती हैं। ‘कल्चर वल्चर’ भूमंडलीकरण, उद्दंड पूंजी, निरंकुश सोच आदि के आशयों को भी खंगालता है। अपनी प्रांजल व खिलंदड़ी भाषा के लिए ममता कालिया बहुप्रशंसित हैं। यह उपन्यास उनकी रचनात्मक सिद्धि का एक अभिनव आयाम है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hridayesh
    Hridyesh
    200 180

    Item Code: #KGP-90

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार हृदयेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'खेत', 'जो भटक रहे हैं', 'कोई एक दूसरा', 'मृगया', 'जीवन राग', 'उसकी कहानी', 'जहर', 'मनु', 'पूँजी'  तथा 'सत्तर पार का वह बूढ़ा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक हृदयेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mahabharat Ka Abhiyukti
    Rajendra Tyagi
    195 176

    Item Code: #KGP-1951

    Availability: In stock


  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7210

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Ramcharitmanas Sandarbha Samagra
    Lalit Shukla
    325 293

    Item Code: #KGP-238

    Availability: In stock

    रामचरितमानस संदर्भ समग्र
    ‘रामचरितमानस’ गोस्वामी तुलसीदास की अमर एवं अद्वितीय कृति है। प्रबंध-काव्य के गुणों से ओतप्रोत यह प्रस्तुति भारतीय संस्कृति और मानवोचित लोकानुभव की संदेशवाहिका बनी हुई है। यह अनेक प्रचलित और गूढ़ संदर्भों से युक्त है। इस रचना से उन्हीं संदर्भों को व्याख्यायित और सरलीकृत करने का प्रयत्न किया गया है। 
    हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि इस प्रस्तुति से ‘रामचरितमानस’ के अनुरागियों और अध्येताओं  को कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। लोकभाषा अवधी और देवभाषा संस्कृत के अनेक मार्मिक संदर्भों का सरल रूप यहाँ दिया गया है। 
    यह कृति न तो टीका है और न कोश है। यह अपनी पृथक् शैली की प्रस्तुति है, जो हिंदी और ‘मानस के पाठकों के सामने पहली बार आ रही है। सचमुच महाकवि की यह साहित्यिक यात्रा पाठकों का पाथेय है।’ मानस उसका अमिट स्मारक है।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-1)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1576

    Availability: In stock


  • Yajurveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    365 329

    Item Code: #KGP-9112

    Availability: In stock

    यजुर्वेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की तीसरी पुस्तक ‘यजुर्वेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें यजुर्वेद के 112 मन्त्रों को ऋग्वेद की तरह दस शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। ज्ञान-शिक्षा, स्वास्थ्य-योग, मानसिक स्वास्थ्य, धर्म-नैतिकता, अर्थ- धनैश्वर्य, घर-परिवार, समाज, राष्ट्र, पर्यावरण तथा वैश्विकता जैसे विषयों पर इन मन्त्रों के माध्यम से चर्चा हुई है। यजुर्वेद मुख्यतः कर्म से सम्बद्ध है। यह ‘कर्म’ यज्ञ है, जिसे यहाँ श्रेष्ठतम बताया गया है। पारम्परिक दृष्टि से ‘यज्ञ’ का सीमित अर्थ होता है—अग्नि में आहुति देना। परन्तु ‘यज्ञ’ का व्यापक अर्थ भी है, जहाँ समर्पण-भाव मुख्य रहता है। अतः समाजोपयोगी सभी कर्म यज्ञ के अन्तर्गत आ जाते हैं।
    इन मन्त्रों में ज्ञान, दीर्घायु व धन-सम्पत्ति तथा सुरक्षादि पाने के लिए प्रार्थनाएँ हैं। क्रीड़ा, योगादि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। धर्म कर्तव्य तथा नैतिकता से जुड़ा है। यह लोभ प्रवृत्ति ही है, जिससे संसार में उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिलता है। इसी के कारण एक ओर भय व आतंक पनपते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण-प्रदूषण होता है। आधुनिक युग में यज्ञपरक जीवन परोपकार भावना से युक्त मानव-जनों की अपेक्षा है। शान्ति, विश्रान्ति और आनन्द की चाह है सबको। वह कैसे मिले? यही मन्त्र निर्देश करते हैं। ‘विश्व-शान्ति’ के लिए किया जाने वाला ‘शान्तिपाठ’ इसी वेद की देन है।
    यह पुस्तक उन सभी के लिए भी है, जो ‘मन से युवा हैं’ तथा प्राचीन ज्ञान को आधुनिक सन्दर्भों में समझना चाहते हैं।
  • Samkalin Sahitya Samachar July, 2019
    M.A. Sameer
    0

    Item Code: #KGP-MGZN 2019 July

    Availability: In stock

  • Videshi Mahilaon Ka Bharatprem
    M.A. Sameer
    280 252

    Item Code: #KGP-7809

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक ‘विदेशी महिलाओं का भारतप्रेम’ उन महिलाओं के विषय में लिखी गई है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारतभूमि की तथा भारत के लोगों की तन मन धन से सेवा एवं सहायता की। चाहे वे कोक्को सोमा हों या उनकी बेटी तोशिको, उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से भारत की सेवा की। इसी क्रम में आगे श्रीमती एनीबेसेंट, मारग्रेट कजिंस और एमिली शैंकल के नाम भी उल्लेखनीय हैं। इन महिलाओं ने जन्म भले ही भारतभूमि पर न लिया हो, लेकिन उनके भारतप्रेम को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनका भारत से घनिष्ठ संबंध है। उनके द्वारा दिए गए अविस्मरणीय योगदान को इस पुस्तक में सरल, सरस और रोचक शैली में उल्लिखित किया गया है। 
  • Karyalayi Anuvad Ki Samasyayen
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    450 338

    Item Code: #KGP-KAKS HB

    Availability: In stock

    अनुवाद आज के युग की एक अनिवार्य आवश्यकता है।भारत मेंजिन विभिन्न प्रकार के साहित्यों का आज अनुवाद हो रहा हैउनमें कार्यालयी साहित्य प्रमुख है किंतु अभी तक इस प्रकार केअनुवाद की समस्याओं पर विस्तार से विचार नहीं हुआ है।प्रस्तुत पुस्तक इसी दिशा में एक प्रयास है।इसमें कार्यालयी अनुवाद से संबंधित सारी समस्याओं को एक ही स्थान पर दिया गया है।साथ हीपुस्तक के अंत में विभिन्न प्रकार के कार्यालयी अनुवाद के उदाहरण भी दिए गए हैं। विश्वास है यह पुस्तक ऐसे अनुवाद में रुचि रखने वाले लोगों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।

    सहयोगी लेखिकाओं और लेखकों के प्रति हम आभारी हैंजिनके सहयोग के बिना यह संकलन अधूरा रह जाता।


  • Mere Saakshaatkaar : Kunwar Narain
    Kunwar Narayan
    235 212

    Item Code: #KGP-9049

    Availability: In stock


  • Sunanda Ki Dairy (Paperback)
    Raj Kishore
    195

    Item Code: #KGP-903

    Availability: In stock

    एक थी सुनंदा  ।
    संपन्न परिवार की लड़की । मित्र से पति बने मलय के  साथ नहीं बनी, तो वह किसी नीहारिका की तरह शून्य में विचरण करने लगी । कभी इस शहर में, कभी  उस शहर में  । उसने कई नौकरियाँ कीं, परंतु स्वतंत्रता की उसकी चेतना ने उसे कहीं भी टिकने नहीं दिया । यह एक अदृश्य बेचैनी का शिकार थी । उसके मन में कई तरह के सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहते थे, पर किसी भी उत्तर से उसे संतोष नहीं होता था । उसकी यह खोज ही उसे नैनीताल ले आई, जहाँ वह कुछ दिनों तक विश्राम करना चाहती थी, ताकि आगे की जिंदगी की कोई रूपरेखा उभर सके ।
    एक था सुमित ।
    मस्त, फक्कड़ और विचारशील । माँ-बाप नहीं रहे, तो पारिवारिक संपत्ति को अपने गाँव के कल्याण के लिए समर्पित कर वह आवारगी करने लगा । उसकी एक अंतरंग मित्र मंडली थी, जिसके आर्थिक सहयोग से वह अपनी मनचाही जिंदगी बिता रहा था । उसकी जिंदगी में किताब, शराब और सिगरेट के अलावा और कुछ नहीं था । घुमते-फिरते वह भी नैनीत्ताल आ गया । संयोग से यह उसी गेस्ट हाउस में ठहरा जहाँ सुनंदा ठहरी हुई थी ।
    दोनों की मुलाकात दोनों  के ही लिए एक अविस्मरणीय घटना बन गई । सुनंदा और सुमित विभिन्न विषयों पर बातचीत करने लगे, जैसे ईश्वर, धर्म, नैतिकता, प्रेम, विवाह, स्त्री, लोकतंत्र, मानव अधिकार आदि । इसके साथ ही, दोनों के हृदय अनुराग की आभा से भरते चले गए । लेकिन परिपाक की ऐश्वर्यमयी रात के तुरंत बाद जुदाई का मुहूर्त आ पहुंचा - दोनों की जिंदगी को एक नई दिशा प्रदान करने के लिए ।
    'सुनंदा की डायरी' विचार-विमर्श के इन्हें घटनापूर्ण दिनों का दिलचस्प दस्तावेज है ।
  • Hamse Hai Paryavaran
    Anku Shree
    140 126

    Item Code: #KGP-495

    Availability: In stock

    पर्यावरण के अनेक घटकों में मनुष्य भी एक है। मनुष्यरूपी बुद्धिमान प्राणी द्वारा पर्यावरण की अन्य इकाइयों का उपयोग किया जाता है। यह उपयोग ही पर्यावरण का संचालन है। इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। यह प्रभाव कुप्रभाव भी हो सकता है। इसी कुप्रभाव को हम पर्यावरण का प्रदूषण कहते हैं।
    प्रदूषण नहीं होना और उसके प्रभाव से पर्यावरण को बचाना मनुष्य का कर्तव्य है। आज का बालक की कल का मनुष्य है। इसलिए बालकों और युवाओं को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक ऐसे ही पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। हालांकि यह सभी वर्ग के पाठकों के लिए समान रूप से रुचिकर और उपयोगी लगेगी।
    पुस्तक को बाईस शीर्षकों में बांटा गया है। प्रतयेक शीर्षक अलग-अलग आलेख हैं। फिर भी कुछ बातें प्रसंगवश एक से अधिक आलेखों में आ गई हैं किंतु सारे तथ्य प्रसंगवश रहने के कारण आलेख की रोचकता में कमी नहीं आने पाई है।
    —अंकुश्री
  • Imandaari Ka Swaad
    Harish Kumar 'Amit'
    180 162

    Item Code: #KGP-9367

    Availability: In stock


  • Vaigyanikon Ki Batein (Paperback)
    Shuk Deo Prasad
    50

    Item Code: #KGP-7085

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Lokmanya Baalgangadhar Tilak : Jivan Darshan
    M.A. Sameer
    280 252

    Item Code: #KGP-809

    Availability: In stock

    1857 की क्रांति ने जो बयार बहाई, उसने घर-घर में मन को छुआ और अगले स्वातंत्र्य समर की—जो अनवरत था और शांत भले ही था, लेकिन थमा नहीं था—रूपरेखा बना दी। इस उत्तरार्द्ध में केवल जोशीले राष्ट्रभक्त ही नहीं हुए बल्कि बौद्धक क्रांति का बिगुल बजाने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक असाधारण चिंतक और वक्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।
    यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।
  • Aur Aagey Badhatey Raho...
    Dr. Rashmi
    200 180

    Item Code: #KGP-466

    Availability: In stock

    जीवन व साहित्य में सदुपदेश, सत्संग और सुभाषित का विशेष महत्त्व है। इनमें अनुभवों का ऐसा खजाना होता है जो किसी को भी समृद्ध कर सकता है। यही कारण है कि साहित्य में प्रारंभ से ही नीति-कथाओं का प्रचलन है। ये कथाएं प्रेरणा देती हैं, संघर्ष करना सिखाती हैं, असमंजस में उलझे मन को उचित निर्णय लेने की शक्ति देती हैं और समग्रतः जीना सिखाती हैं। ‘...और आगे बढ़ते रहो’ प्रेरक प्रसंगों की एक ऐसी ही रोचक पुस्तक है। लेखिका डॉ. रश्मि ने बड़ी कुशलता से उपयोगी जीवन सूत्रों को प्रस्तुत करते हुए उनमें निहित संदेश भी रेखांकित कर दिया है।
    इन प्रेरक प्रसंगों में मूलतः नैतिक शिक्षा छिपी है। वह नैतिकता जिसके बिना सार्थक, संतुलित और स्वस्थ मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी प्रेरक कथाएं वर्षों से समाज में सत्य, प्रेम, अहिंसा, त्याग और सहनशीलता के बीज बोती रही हैं। पहले घर-परिवार में बड़े बुजुर्ग, जैसे--दादी-दादा, नानी-नाना ऐसी बहुत सारी कहानियां सुनाते थे। बहाने-बहाने से बच्चे उनसे बहुत कुछ ऐसी बातें सीखते थे जो जीवनपर्यंत याद रहती थीं। आज समय बदल गया है। क्या बड़े, क्या बच्चे--सब अपनी-अपनी जगह व्यस्त हैं। प्रेरक प्रसंगों से भरी कहानियां सुनाने का जिम्मा पुस्तकों ने ले लिया है। इस बात का अनुभव पाठक यह पुस्तक पढ़ते हुए करेंगे। सीधी सुगम भाषा और प्रवाहपूर्ण शैली में लिखी ये रचनाएं पाठकों को प्रभावित व प्रेरित करेंगी--ऐसा हमारा विश्वास है।

  • Shatal (Paperback)
    Narendra Kohli
    40

    Item Code: #KGP-7098

    Availability: In stock


  • Utho Annapoorna Saath Chalen
    Usha Mahajan
    100 90

    Item Code: #KGP-9127

    Availability: In stock

    दांपत्य दो समान व्यक्तियों एकीकरण का नाम है। दंपति का संधिविच्छेद करें तो बनता है दम् (घर) $ पति। अर्थात् दोनों ही घर के बराबर के पति हैं। लेकिन कितनी समानता है हमारे समाज में आज भी पति और पत्नी के स्तर में? किस प्रवृत्ति का प्रतीक है सत्तर के दशक से दहेज-हत्याएं कही जाने वाली शादीशुदा औरतों की अप्राकृतिक मौतों का दौर? क्या कारण हैं हिंदू समाज में दांपत्य-संबंधों में बढ़ती दरारों के? जिस समाज मंे स्त्री के लिए पति परमेश्वर के समान माना जाता है, वहीं दिल्ली-मद्रास जैसे महानगरों में डेढ़ से दो हजार कुंवारी लड़कियां हर माह डाॅक्टरों से गर्भपात करवाती हैं, सगे पिता अपनी मासूम बेटियों का यौन-शोषण करते हैं। सेक्स विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों से मिलंे, तो वे बताते हैं कि पहले पुरुषों के ही अवैध संबंध हुआ करते थे, पर अब औरतें भी उनके मुकाबले में विवाहेत्तर और विवाह-पूर्व संबंध रख रही हैं। अदालतों में जाकर देखें तो अनगिनत दंपति एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते, गाली-गलौज करते और यहां तक कि जूते-चप्पल चलाते भी आपको मिल जाएंगे।
  • Vipathgami
    Mastram Kapoor
    80 72

    Item Code: #KGP-2044

    Availability: In stock

    विपथगामी
    विपथगामी उस युवा पीढ़ी की कहानी है जिसे डॉ० राममनोहर लोहिया कुजात पीढ़ी  कहते थे । यह ऐसी पीढ़ी है जो अतीत की जकड़नों से मुक्त होकर भविष्य की तलाश करना चाहती है । जो समाज की वर्तमान नैतिकता का संदेह की नजर से देखती है और उस नैतिकता की खोज में भटकती है जो मानय की जन्मजात आकांक्षाओं  स्वतंत्रता, समता और बंधुता को न कुचले । 
    पचास के दशक के प्रारंभिक वर्षों में महानगर बंबई के क्रूर वातावरण से अपने लिए जमीन तलाशती यह पीढी सद्य:प्राप्त स्वतन्त्रता से मोह-भंग की स्थिति से गुजरती है जब वह यह देखती है कि कही कुछ नहीं बदला है । वह पाती है कि कानून की नजर में हर आदमी अपराधी है जब तक यह अपने को निर्दोष सिद्ध नहीं करता न कि (जैसा कि कानून दावा करता है) हर आदमी निर्दोष है जब तक कि वह अपराधी सिद्ध नहीं होता ।
  • Suraj Men Lage Dhabba
    Ramesh Bakshi
    65 59

    Item Code: #KGP-9092

    Availability: In stock


  • Suraj Se Puchhen
    Neelam Kanvdia
    60 54

    Item Code: #KGP-9035

    Availability: In stock

    सूरज से पूछे
    रचना कब, क्यों, कहां, कैसे, कैसी जन्म लेती है,
    यह रचनाकार स्वयं भी नहीं जानता, न बता
    सकता है । लेकिन जीवन में कभी ऐसा पल, अवसर
    या प्रसंग आ जुटता है जो रचनारत करता है, तो
    कभी रचनाकर्म को एक नया आयाम,
    नए क्षितिज दे जाता है ।
    श्रीमती नीलम कावडिया के जीवन में ऐसा एक
    अवसर आया, रक्षाबंधन के दिन भानुजी के
    राखी बंधवाने के लिए घर आने पर ।
    राखी बाँधकर नीलमजी ने अपनी एक कविता
    भानुजी को सुनाई। उस पुरस्कृत कविता
    को सुनकर भानुजी गंभीर हो आए ।
    बाद को एक दिन वह प्रसंग उठाने पर भानुजी ने
    जो उत्तर दिया उसे सुनकर नीलमजी तत्काल
    तो मौन रह गई लेकिन वह मौन कहीं
    अंतरतम में बार-बार, लगातार गुंजित होता रहा,
    मथता रहा रचनाकार को,
    उनकी सोच, समझ और दृष्टि को ।
    अनंतर जब अंतरतम की वह गुँज बाहर मुखरित हुई
    तब सामने आई ये कविताएँ, जिन्होंने न केवल
    नीलमजी की दिशा ही बदल दी,
    साहित्य-जगत को मिली एक अनूठी काव्यकृति
    'सूरज से पूछें'। 
  • Tan Man
    Shivram Karant
    100 90

    Item Code: #KGP-2086

    Availability: In stock

    भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता शिवराम कारंत का अत्यन्त लोकप्रिय उपन्यास 'तन मन' कन्नड़ साहित्य की अनुपम कृति है ।
    चिरन्तन काल से विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध विषयक प्रवृत्ति ने 'विश्व के सबसे पुराने पेशे' को जन्म दिया । यह पेशा आज भी जीवित है । पुरुष ने नारी को शब्दों में जितने सम्मान का नाटक रचा है, अपनी प्रवृति से उसे निरीह और भोग्य ही रखा है । कल की देवदासी और आज की मॉडल या सुन्दरियों का चुनाव क्या है ? इसी जीवन्त समस्या को लेखक ने काफी गहरे उतरकर अपने अनुपम शिल्प में बाँधा है । इसमें एक ही प्रधन-स्वर बार- बार ध्वनित होता है—आखिर यह कबतक, आखिर यह कब तक...?
  • Kavi Ne Kaha : Anamika
    Anamika
    200 170

    Item Code: #KGP-223

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : अनामिका
    अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करतीं ।
    भारतीय स्त्रियों के जीवन-संघर्ष तथा हास-परिहास और गीत-अनुष्ठान आदि के जरिए पीड़ा को सह पाने की उनकी परंपरागत युक्तिहीन युक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर अनामिका की कविताओं के नए अर्थ खुलते हैं, जिन तक कविता को देखने-परखने के रूढ़ ढाँचे को तोड़कर ही पहुंचा जा सकता है ।
    उनकी संवेदना का फैलाव उन वंचित जनों तक है, जिनसे एक स्त्री की करुणा सहज रूप से जुड़ जाती है । लोकभाषा के शब्द उनके यहाँ किसी गुर की तरह नहीं आते, बल्कि वे उनके अनुभव का अनिवार्य हिस्सा हैं । 'जनमतुआ' बच्चे की 'चानी' की तरह 'पुलपुल' कविताओं में परिपक्व कठोरता की विपुल संभावनाएं अंतर्निहित हैं । हिंस्र  समय के प्रतिरोध का उनका अपना ढंग है, जो भारतीय स्त्रियों की प्रतिरोध की परंपरा की गहरी समझ और संवेदनात्मक जुड़ाव से उपजा है ।
    समस्याओं और घटनाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण एक ऐसी संवेदनशील स्त्री का दृष्टिकोण है, जिसके भीतर अभी भी निष्पाप बचपन बचा हुआ है ।
  • Bhartiya Naitik Shiksha : 4
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-267

    Availability: In stock

    नैतिक शिक्षा का प्रत्यक्ष पाठ बचपन में माता-पिता से तथा विद्यालयों में गुरुजनों के सान्निध्य में बैठकर मिलता है । धीरे-धीरे समझ विकसित होने पर धर्म और संस्कृति द्धारा भी हमें नैतिक शिक्षा का सैद्धान्तिक पक्ष स्वाध्याय के माध्यम से सीखने को मिलता है । फिर समाज और राष्ट्र के लिए किए गए सेवा-कार्यों के लिए समर्पण के प्रति हमारे मन में जो भावना निरंतर उठती रहती है, उससे हम यह जान सकते हैं कि हमारी नैतिक शिक्षा के संबंध में धारणा कितनी व्यावहारिक है।
    माता-पिता एवं गुरुजनों के प्रति बढ़ती अश्रद्धा, वैज्ञानिक दुष्टिकोण
    के नाम पर धर्म एव संस्कृति के प्रति घटती निष्ठा ने नैतिक शिक्षा को
    विवादों के घेरे में ला दिया है। सरकार द्वारा पाठयक्रम में भले ही उसे
    पढाने का संकेत दिया जाता रहा है, किन्तु ऐसे कितने शिक्षक एवं
    विधालय है जो इसके प्रति गंभीर हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव समाज एवं
    राष्ट्र में बढ़ती चोरी, लूटमारी, बेईमानी, हिंसा और भ्रष्टाचार के रूप में
    दिखाई देने लगा है।
    घर में माता-पिता को समयाभाव के कारण नैतिक शिक्षा का पाठ पढाने का समय भी नहीं मिलता । अत: विद्यालयों को ही इसका दायित्व संभालना होगा । यह ठीक है कि विद्यालयों में भी पठन-पाठन एवं परीक्षा- कार्यों की अधिकता के कारण समयाभाव रहता है, किन्तु तीन स्तरों पर यह संभव है…एक तो विषयों के पठन-पाठन के अंतर्गत ही जो नैतिक संदर्भ आते है, उन प्रसंगों का सदुपयोग कर, दूसरे, नैतिक शिक्षा के अन्य कार्यक्रम बनाकर, जैसे-प्रार्थना, पुस्तकालय, पत्रिका, संग्रह-पुस्तिका, दुश्य-श्रव्य सामग्री तथा दिनचर्या आदि सभी माध्यमों का प्रयोग करने का वातावरण  बनाकर।  तीसरे, विद्यालय की दैनिक गतिविधियों में ऐसे अवसर प्रदान कर जिससे बालको में नैतिक विचारों को व्यावहारिक रूप से अपनाने की भावना जगे ।
  • Saundarya-Meemansa
    V.K. Gokak
    90 81

    Item Code: #KGP-9126

    Availability: In stock

    "सौंदर्य-मीमांसा" कन्नड़ के प्रतिष्ठित लेखक डॉ० वी० के० गोकाक की कन्नड़ कृति 'काव्य-मीमांसे' का हिंदी अनुवाद है । हिंदी में सौंदर्यशास्त्र पर यह अपने ढंग की पुस्तक होगी ओर निश्चय ही मोंदृवंशद्रस्व के अध्येताओं को इस पुस्तक से काफी सहायता मिलेगी । गोकाक ने विशेष भाषण-माला के अन्तर्गत सौंदर्यशास्त्र पर भाषण दिए थे । 'कला-स्वरूप', 'ध्वनि तथा प्रतिध्वनि', 'रस या जीवन-दृष्टि'–इन लेखों में लेखक ने भारतीय तथा पाश्चात्य आलोचना त्तत्वों के आधार पर विचार करके अपने मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है । डॉ. गोकाक स्वयं कन्नड़ और अंग्रेजी के कवि, उपन्यासकार और श्रेष्ठ आलोचक हैं। गोकाक के पास जीवन का व्यापक अनुभव और अंग्रेजी साहित्य का अपार पांडित्य है । दार्शनिक मनोवृति से वस्तु को तटस्थ दृष्टि से देखकर उसके सत्य को परखने की जिज्ञासा उनमें है । इन लेखों में उन्होंने साहित्या, कला, धर्म के  तत्यों के आराधक होकर सौंदर्य के तत्तवों का साक्षात्कार किया है। नि:संदेह यह कृति भारतीय काव्यशास्त्र को लेखक की अमूल्य देन है। इस अनुवाद में यदि त्रुटियाँ मिल जाएँ तो समझिए यह मेरी कमजोरी है ।
    डॉ. टी. आर० भट्ट

  • Gai Jhulani Toot
    Usha Kiran Khan
    270 243

    Item Code: #KGP-9364

    Availability: In stock

    उषाकिरण खान हिंदी की ऐसी रचनाकार हैं जिन्हें असंख्य पाठकों का साथ मिला है। वे चालू फैशन की ओर या प्रायोजित विमर्श की ओर कभी नहीं जातीं। उनके  पास बेशुमार कहानियां हैं जो पाठकों को व्यापक संवेदना से जोड़ती हैं।
    उषाकिरण खान का यह नया उपन्यास गई झुलनी टूट उनकी प्रसिद्धि को एक कदम आगे लेकर जाता है। इसमें उन्होंने एक सीधा-सादा मगर मार्मिक सवाल उठाया है, 
    ‘...जीवन केवल संग-साथ नहीं है। संग-साथ है तो वंचना क्यों है?’ इस रचना में उन्होंने सामान्य भारतीय परिवेश में एक स्त्री की जीवन-दशा का मार्मिक चित्रण किया है। वे अपने अनुभवों का इतना विस्तार करती हैं जैसे पूरा उपन्यास उनके आसपास जीवित किसी पात्र की दास्तान है। वे धरती की ध्वनियों को सुनती हैं और जीवन की जय-पराजय महसूस करती हैं।
    अथाह संघर्षों के बीच भी उषाकिरण खान जिजीविषा का संदेश देती हैं, ‘किसी एक व्यक्ति के सुख से न तो खेतों में हरियाली छा जाती है, न उसके दुःख के ताप से खेत, नदियां, तालाब सूख जाते हैं। जब मन में पीड़ा का आलोड़न हिलोरें लेने लगता है तब भी चेहरे पर मुस्कान रखना पड़ता है सामने की पौध के लिए।’
    लोकजुड़ाव उषाकिरण खान की शक्ति है। यह उपन्यास सिद्ध करता है कि वे मैथिली और हिंदी की अद्वितीय कथाकार हैं। ऐसी कथाकार जिन्होंने नारी मन को पहचाना है और बिना स्त्री-विमर्श के कुलीन झंझट में पड़े उसके मन की सच्चाइयों को व्यक्त किया है। इसमें विशेषता यह है कि उपन्यास जीवन की सहजता को कहीं से खंडित नहीं करता और न ही यह लगता है कि अमुक कथा प्रसंग या पात्र गढ़कर पेश किया गया है। प्रस्तुत उपन्यास ‘भारतीय उपन्यास’ का एक प्रतिनिधि रूप है। इसमें जीवन-जगत् की अनुपम अनुगूंज है।
  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan (Paperback)
    Mannu Bhandari
    150

    Item Code: #KGP-1426

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है। 
  • Antarmilan Ki Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    150

    Item Code: #KGP-498

    Availability: In stock

    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    ऐसी उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह, जिनमें भारतीय साहित्य के उन अमर पात्रों के चित्र उतारे गए हैं जिन्होंने सदियों से भारतीय आत्मा क्रो 'जियो और जीने दो' की प्रेरणा दी ।
  • Dekho Samjho Karo
    Jagat Ram Arya
    160 144

    Item Code: #KGP-105

    Availability: In stock

    बालकों, अपने चारों ओर की दुनिया को देखो। इसमें भगवान ने हजारों वस्तुएं बनाई हैं-हवा, पानी, सूर्य, पृथ्वी, अग्नि आदि। इनमें से हर एक में सैकड़ों-हजारों शक्तियां भरी पड़ी हैं जिनमें से कुछ एक को हम-तुम जानते हैं। कइयों को हम बिलकुल नहीं जानते। कुछेक को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। अपनी दुनिया के बारे में यह हमारा अधूरा ज्ञान है। इसीलिए हम उन शक्तियों से लाभ नहीं उठा पाते। जैसे किसी निर्धन की खाट के नीचे धरती में सोने-चांदी का खजाना दबा हो, किंतु जिसका उसे पता न हो और वह भूखा नंगा रहकर दिन-रात दुख सहता हो। काश, वह उस छिपे खजाने को जान पाता और उसका प्रयोग करके सुखी बन जाता। इसी प्रकार अपने आसपास की वस्तुओं के बारे में भी हम बहुत कम जानते हें। ओर उसका कम लाभ उठाते हें। उनका पूरा लाभ हम तभी उठा सकते हैं जब उनहें अच्छी तरह जान लें। इस प्रकार वस्तुओं के ‘विशेष ज्ञान’ को ही विद्या कहते हैं।
    आज हम मोटर, हवाई जहाज, राकेट आदि के अजब अनोखे आविष्कार देखते हैं, जो विज्ञान के सहारे ही बनाए गए। बड़े-बड़े आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक भी हमारे-तुम्हारे जैसे दो हाथ, दो पांव वाले मनुष्य होते हैं। उनमें केवल तीन विशेष गुण होते हैं। वे हर वस्तु को ध्यान से देखते हैं, गहराई से समझते हैं और हाथ से करके देखते हैं। यदि हम भी विज्ञान पढ़ना चाहते हैं तो हमें भी इनहीं तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए-
    1. हम अपने प्रयोग की वस्तुओं को ध्यान से देखें।
    2. हम वस्तुओं में छिपी शक्तियों और गुणों को समझें।
    3. हम उन वस्तुओं के नित्य नए प्रयोग करना सीखें।
    इस पुस्तक में वैज्ञानिकों की सच्ची और रोचक घटनाओं के आधार पर विज्ञान के इन्हीं तीन अंगों पर बल दिया गया है। इनका प्रयोग हर बालक अपने घर और विद्यालय में कर सकता है। 
    —लेखक
  • Lalachi Brahman
    Dharmpal Gupta
    50

    Item Code: #KGP-1188

    Availability: In stock


  • Kirti Choudhary Ki Kahaniyan
    Kirti Chaudhary
    150 135

    Item Code: #KGP-9087

    Availability: In stock


  • Nirogyogsadhna
    Manoj Kumar Chaturvedi
    300 270

    Item Code: #KGP-677

    Availability: In stock

    निरोगयोगसाधना
    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और दिन-रात उसके लिए प्रयास करते रहते हैं। इस आपाधापी में व्यक्ति सबसे अहम चीज को जो नकार देता है वह है ‘स्वयं का स्वास्थ्य’। वह यह नहीं समझते कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु तभी आपके लिए उपयोगी होगी जब आप उसका आनंद लेने के लिए तैयार होंगे। व्यक्ति यदि स्वस्थ नहीं तो संसार की कीमती से कीमती वस्तु भी उसके लिए बेकार है। स्वस्थ जीवन है तो जहान है। 
    योग द्वारा कैसे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से संपूर्णतया स्वस्थ रह सकता है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन इस ‘निरोगयोगसाधना’ नामक पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
    योग दर्शनशास्त्र में वर्णित सूत्र षड्दर्शन का ही छठा अंग है। ये षड्दर्शन वेदों के उपांग माने गए हैं। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निशक्त, छंद, ज्योतिष आदि वेदों के अंग कहलाते हैं जिनके द्वारा वेद मंत्रों के अर्थ का ज्ञान होता है।
    योग ऐसी कला है जो प्रकृति और मनुष्य के बीच के अंतर को स्पष्ट कर व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत करती है। अर्थात् व्यक्ति योग के माध्यम से इंद्रियों को अपने वश में करने लायक बन जाता है और माया के बंधन से भी स्वयं को तोड़कर मुक्त हो जाता है। योग अनादिकाल से चला आ रहा है और इसकी उपयोगिता व्यक्ति तभी समझ सकता है जब वह योग को स्वयं पर लागू करे, उसमें रम जाए। योग करने वाला व्यक्ति कभी बूढ़ा या बीमारी से ग्रसित नहीं होता।
    —भूमिका से
  • Kohare Se Lipe Chahre
    Suryakant Nagar
    130 117

    Item Code: #KGP-1802

    Availability: In stock

    कोहरे से लिपे चेहरे
    सूर्यकांत नागर उन कथाकारों से हैं जो आधुनिक संवेदना की जटिलता और उसकी सहज अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाते हैं। उनके रचनाकार की मार्मिकता मनुष्य के विशिष्ट स्वभाव र्ताक्वे स्थितियों में उतरकर उन्हें पहचानने के गुणों में निहित है । वे अपनी कहानियों में इनके अन्तर्सम्बंधों के प्रति व्यग्र दिखाई देने हैं ।
    उनको चिंता के केंद्र में मनुष्यता है । मानवीय मूल्यों में उनकी गहरी आस्था है । अपनी कहानियों में मनुष्य के दोहरे और दोगलेपन का उजागर करने का वे कोई अवसर नहीं छोडते । दूसरों  द्वारा अपमानित होने के बजाय जब  मनुष्य स्वयं की नजरों में लज्जित होता है तो अधिक ग्लानि का अनुभव करता है । संग्रह की 'तमाचा', 'अँधेरे से उजास', 'एक और विभाजन' तथा 'अब अब और नहीं' कहानियाँ इसी श्रेणी की हैं । नागर जी के पास एक सहज, प्रवाहमयी भाषा है, जिनमें कहीँ-कहीँ व्यंग्य का मार्मिक और अनायास स्पर्श है-वर्णन, संवाद और चरित्रांकन तीनों में ।
    सूर्यकांत नागर किसी विचारधारा से ज़कड़े लेखक नहीं है कि विचारधारा का सहारा लेकर वैतरणी पार कर लें । वे स्वाधीनता का मार्ग चुनते हुए अपनी राह स्वयं बनाते है । उनकी हर कहानी सौद्देश्य और उत्तरदायी है । कथा-कथन में वे सिद्ध हैं । कहानियों की नोकें भले उतनी उभरी दिखाई न दें, परंतु भीतरी चुभन प्राय: हर कहानी में मौजूद है । सादा तबियत र्वश्च अंतर्मुखी नागर जी ने विविध विषयों में खूब लिखा है, लेकिन वे अभी भी अपने विशिष्ट होने का मान नहीं होने देते ।
  • Toro Kara Toro-1 (Paperback)
    Narendra Kohli
    350 315

    Item Code: #KGP-7041

    Availability: In stock


  • Prem Chand Ki Amar Kahaniyan (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    70

    Item Code: #KGP-7049

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
    -कमलेश पाण्डेय
  • Jahaanoon
    Manorma Jafa
    240 216

    Item Code: #KGP-197

    Availability: In stock

    कॉलेज में रक्षाबंधन की छुट्टी थी। अनुराधा सुबह-सुबह ही तैयार होकर निकल गई। मैं उसे फाटक तक पहुँचाने गई। हरसिंगार के पेड़ के नीचे खड़ी थी। जमीन पर बिखरे फूल महक रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने फूल बीनकर अपने दुपट्टे के एक कोने में रखने शुरू कर दिए कि तभी एक मोटरसाइकिल बराबर में आकर रुक गई। मैंने मुड़कर देखा, अनुराधा के राजू भैया थे।

    "क्यों भई, किसके लिए फूल बीन रही हो?"

    मन में तो आया कह दूँ ‘आपके लिए।’ पर  जबान नहीं खुली।

    "अनुराधा को लेने आया था। आज रक्षाबंधन है। बुआ जी के यहाँ उसे मैं ही पहुँचा दूँगा।"

    "पर वह तो अभी-अभी वहीं चली गई।"

    "मैंने तो उससे कहा था कि मैं आऊँगा! बड़ी बेवकूफ है।"

    "भूल गई होगी।"

    "तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? तुम भी उसके साथ क्यों नहीं चली गईं? रक्षाबंधन में सब लड़कियाँ बहनें और सब लड़के उनके भैया," और वह हँसने लगे।

    "क्या मतलब?"

    "मेरा कोई मतलब नहीं था। तुम चलो तो मैं तुम्हें भी अनुराधा की बुआ के यहाँ ले चलता हूँ।"

    "नहीं, मुझे पढ़ाई करनी है। यहीं रहूँगी।"
    —इसी उपन्यास से
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal (Paperback)
    Bhagwan Das Morwal
    150

    Item Code: #KGP-476

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भगवानदास मोरवाल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rang-Saakshatkaar
    Jai Dev Taneja
    650 488

    Item Code: #KGP-817

    Availability: In stock


  • Naya Vidhaan
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-633

    Availability: In stock


  • Parv (Paperback)
    Bhairppa
    350 298

    Item Code: #KGP-7195

    Availability: In stock

    भारतीय वाडमय में पंचम वेद के रूप में अधिष्टित महाभारत पर आधारित भैरप्पा की महान् औपन्यासिक कृति । इस उपन्यास में लेखक ने महाभारत के पात्रों, स्थितियों और घटनाओं का जो वस्तुनिष्ठ आलेखन प्रस्तुत किया है, वह अदभुत और अनुपम है । महापारतकालीन भारत की सामाजिक संरचना क्या तत्कालीन इतिहास और परंपराओं के लंबे अरसे तक अनुसंघान, व्यापक भ्रमण और अध्ययन पर आधारित यह उपन्यास भारतीय साहित्य की महान् उपलब्धि है । अतीतोन्मुखी भारतीय जनमानस के साथ जुडे महाभारत के पात्रों के अलंकरण और चमत्कारों एवं अतिशयोक्तियों की कैचुली उतारकर उन्हें मानवीय धरातल पर साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करने के कारण यह उपन्यास वस्तुत: एक क्रांतिकारी जाते है । संक्षेप में इतना कहना ही शायद पर्याप्त हो कि 'पर्व' आधुनिक संदर्मों से जुडा महाभास्त का पुनराख्यान है ।
    'पर्व' का फलक भले ही महाभारत पर आधारित हो, लेकिन यह एक साहित्यिक कृति है-एक उपन्यास । पाठक इसे एक उपन्यास के रूप में ही स्वीकार करेंगे-ऐसा लेखक का अनुरोध है । 

  • Satta Ke Aar-paar
    Vishnu Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9106

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    —इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Kavi Ne Kaha : Naresh Saxena
    Naresh Saxena
    190 152

    Item Code: #KGP-446

    Availability: In stock

    नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के ऐसे कवि हैं, जिनकी गिनती बिना कविता-संग्रह के ही अपने समय के प्रमुख कवियों में की जाने लगी।
    एक संग्रह प्रकाशित होते-होते उच्च माध्यमिक कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाए जाने लगे। पेशे से इंजीनियर और फिल्म निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही संगीत, नाटक आदि विधाओं में गहरा हस्तक्षेप। संभवतः यही कारण है कि उनकी कविताएँ अपनी लय, ध्वन्यात्मकता और भाषा की सहजता के कारण अनगिनत श्रोताओं, पाठकों की शुबान पर चढ़ गई हैं। वैज्ञानिक संदर्भों ने न सिर्फ उनकी कविताओं को मौलिकता प्रदान की है बल्कि बोलचाल की भाषा में उनके मार्मिक कथन, अभूतपूर्व संवेदना जगाने में सपफल होते हैं। निम्न उद्धरण इसका प्रमाण है--
    पुल पार करने से, पुल पार होता है
    नदी पार नहीं होती
    या 
    शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है
    बाद में सीखेगा भाषा
    अभी वह अर्थ समझता है
    या 
    बहते हुए पानी ने पत्थरों पर, निशान छोड़े हैं
    अजीब बात है
    पत्थरों ने, पानी पर
    कोई निशान नहीं छोड़ा
    या 
    दीमकों को पढ़ना नहीं आता 
    वे चाट जाती हैं / पूरी किताब
  • Doob Aur Pani
    Bhagwati Sharan Mishra
    50 45

    Item Code: #KGP-9036

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Rajesh Joshi
    Rajesh Joshi
    190 171

    Item Code: #KGP-384

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : राजेश जोशी
    राजेश जोशी अपने अनुभव को कविता में सिरजते वक्त शोकगीत की लयात्मकता नहीं छोड़ते । लय उनकी कविताओं में अत्यंत सहज भाव से आती है जैसे कोई कुशल सरोदवादक धीमी गति में आलाप द्वारा भोपाल राग का विस्तार कर रहा हो । इस दृष्टि से राजेश जोशी के शिल्प को एक सांगीतिक संरचना कहा जा सकता है । वे स्थानीयता के रंग में डूबकर भी कविता के सार्वजनिक प्रयोजनों को रेखांकित करते हैं । उनकी कविता अपने उत्कृष्ट रूप में एक शहर की कविता होते हुए भी मनुष्य के व्यापक संकट का बयान है । -ऋतुराज़
    समकालीन हिंदी कविता में राजेश जोशी की उपस्थिति एक दिलेर उपस्थिति है-कविता लिखना और उसके लिए लड़ना भी । उनमें एक काव्य व्यक्तित्व भी है, जो कविताएं लिखने वाल कई कवियों में नहीं भी हुआ करता है । उनकी यह उपस्थिति एक लोकतांत्रिक उपस्थिति है, जहां आप ढेर सारा संवाद कर सकते हैं।
    राजेश जोशी की कविता में एक टूट-फूट और संगीत का अवसाद है, लेकिन उठ खड़े होने की कोई मूलगामी संरचना भी  है । पस्ती का महिमामंडन नहीं है और पराजय में पराजित की उधेड़बुन नहीं है । इसलिए कौन-सी भंगिमा कब प्रतिकार में बदल जाएगी और एक कॉस्मिक रुप अख्तियार कर लेगी कोई नहीं जानता । तो साधारण की, पिछडे हुए की, मिटा दिए गए की, भुला दिए गए की, विजय होगी ऐसा कोई यूटोपियाई प्रतिवाद उनमें निरंतर मिलता  है। तो नैतिक श्रेष्ठता में विश्वास कभी खंडित नहीं होता।
  • Mere Saakshatkaar : Rajendra Yadav
    Rajendra Yadav
    300 270

    Item Code: #KGP-858

    Availability: In stock


  • Udne Ko Aakash Mile
    Madhav Kaushik
    350 280

    Item Code: #ukam

    Availability: In stock

    हिंदी के सुविख्यात एवं चर्चित गजलकार माधव कौशिक की ग़जलों की पृष्ठभूमि में वर्तमान समाज तथा समय अपनी संपर्ण जटिलताओंविषमताओं तथा विसंगतियों के साथ उपस्थित है। भूमंडलीय तथा बाजारवाद जनित उपभोक्तावादी अपसंस्कृति ने मानव मूल्यों को हाशिये पर धकेल दिया है। अंतराष्ट्रीय आतंकवाद ने इस विषैले वातावरण को रक्तरंजित कर और अधिक भयावह बना दिया है।

    उड़ने को आकाश मिले संग्रह की गज़लों में ऐसी ही विषम परिस्थितियों में फँसे आम आदमी के जीवन संघर्ष को पूरी मार्मिकता और संवेदनशीलता के साथ अंकित किया गया है। सामान्यजन की प्रत्येक आह और कराह को दर्ज करते हुए रचनाकार ने उनकी अदम्य जिजीविषासंघर्षशीलता तथा अटूट आस्था को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। ग़ज़लकार का विश्वास है कि यदि हाशिये पर खडे़ लोगों को उड़ने के लिए आकाश मिले तो वे सामाज में आमूलचूल परिवर्तन लाने की क्षमता रखते हैं।

    सहजसरल तथा सृजनात्मक भाषा में लिखी इस संग्रह की ग़जलें पाठकों की संवेदना तथा सोच के आसमान को और अधिक विस्तार देने में सफल रहेगीइस विश्वास के साथ यह गजल-संग्रह आपको सौंप रहे हैं।
        

  • Rahiman Dhaaga Prem Ka
    Malti Joshi
    150 128

    Item Code: #KGP-1992

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]
  • Badalte Rang
    Ram Swaroop Arora
    150 135

    Item Code: #KGP-1826

    Availability: In stock

    बदलते रंग
    समय परिवर्तनशील है। समयानुसार सभी प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य जाति की जीवन शैली एवं संस्कृति भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही है। जो जीवन पद्धति, सभ्यता-संस्कृति आज से कुछ ही वर्ष पूर्व तक थी, वह आज परिवर्तित होकर कहाँ की कहाँ पहुँच गई है। हमारा राष्ट्र कालचक्र के प्रवाह से एक नए युग की ओर बढ़ रहा है। कहा नहीं जा सकता कि परिवर्तन का यह रंग उसे किस प्रकार के विकास की ओर ले जाएगा अथवा पतन के गर्त में पहुँचा देगा। इक्कीसवीं शताब्दी का कालक्रम इसका साक्षी होगा।
    प्रस्तुत संग्रह में कुछ कहानियाँ भारतीय स्वतंत्रता के भूले-बिसरे क्रांतिकारियों के जीवन-वृत्त से, कुछ सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन, निजी अनुभव एवं राजस्थान के ग्रामीण कृषि संबंधी कार्यकलापों से तथा कतिपय कथागल्पों से संबंधित हैं, जो हमारे आसपास के जनजीवन पर गहन प्रभाव डालती हैं।
    विद्वान् पाठक इन्हें पढ़कर विचार करें कि हम, हमारा राष्ट्र व समाज तब कहाँ थे और आज कहाँ आ पहुँचे हैं ? क्या हमारा वास्तविक विकास हुआ है ? या अब तक विकास के नाम पर किया गया समस्त कार्य एक छलावा मात्र है तथा अनैतिक, भ्रष्ट एवं पतन की ओर ले जाने वाले कार्यों का एक पुलिंदा है ? मैं अपनी बुद्धि-कल्पना एवं भावनाओं के अनुरूप जो कुछ लिख सका, वह सब आपकी सेवा में समर्पित है।               
    --रामस्वरूप अरोड़ा
  • Gujrati Katha Sanchayan
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    100 90

    Item Code: #KGP-7812

    Availability: In stock

    कथा साहित्य ही क्या कोई भी  साहित्य किसी देश, काल और समाज की सीमाओं में आबद्ध नहीं होता, वह तो जीवन-जगत का व्याख्यान होने के नाते सार्वजनीन और सार्वभौमिक होता है । हां, इतना अवश्य होता है कि देशज व् क्षेत्रीय परम्पराएं, संस्कार, मान-मूल्य और रीति-रिवाज उसमें सहज ही अपना स्थान बना लेते है, जो उसे एक निजी पहचान देते हैं, लेकिन उसके वैचारिक या भावनात्मक आंतरिक अनुभव मात्र क्षेत्रीय न होकर भूमंडलीय होते हैं, मानवीय होते हैं । इस संचयन की प्रस्तुत कहानियां गुजरात की निजी संस्कृति की विशिष्ट पहचान बनाये रखती हुईं मानवीय संवेदनाओं की मुखर प्रवक्ता हैं, जो पाठकों से बहुत कुछ कहना चाहती हैं, साथ ही गुजराती कहानी की विकास-यात्रा के पड़ावों को भी रेखांकित करती चलती हैं । 
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-3)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1578

    Availability: In stock


  • Bengal Shaili Ki Chitrakala
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    400 360

    Item Code: #KGP-9044

    Availability: In stock

    भारत दो चित्रकला शैलियों में बंगाल चित्रकला शैली को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है । उसका यह वेश्मिष्ट्रय विगत शती के बंगाल रिनेसां' अर्थात् माक्षतीय नवजागरण से उसकं संबद्ध होने के कारण भी है । बंगाल शैली देशज निजत्व को पल्लवित और विकसित करनेवाली शैली तो थी ही लेकिन, उसमें ऐसे विरोधाभास भी थे जिससे उसकं समसामयिक मूल्यद्देकन ने दो परस्पर विरोधी अभिमत सामने आये। जहा इस शेली के समर्थक कहय-समीक्षकों ने भावनात्मक लगाव रखते हुए इसे अतिश्योक्तिपूर्ण महत्व दिया यहीं दूसरी और अन्य कला-समीक्षकों ने वस्तुनिष्ठ और दिष्टलेषणमृत्मक मूल्यग्रेकन कर इसकी अनेकानेक कमियों व खामियों को भी उजागर जिया, साथ ही कुछ गंभीर आरोप भी लगाये और इसकी उपलब्धियों के सामने ग्रहन-चिहन खडे किये। आज यह शैली इतिहास का विषय बन चुकी है अत: इस अध्ययन में प्रस्तुत है उसका सर्वागीण सष्टमुक विवेचन, जो अनेक अनछुए पहलुओं को उजागर यता है ।
  • Munna Ro Raha Hai
    Prahlad Shree Mali
    280 252

    Item Code: #KGP-590

    Availability: In stock

    "सच कहूं तो इन नेता-अफसरों के चरित्र और आचरण ने मेरा मनोबल बढ़ाया है। जैसे औलाद नालायक निकल जाए तो समझदार मां-बाप खुद में नई ताकत पैदा कर लेते हैं अपनी सार-संभाल की। वैसे ही जब मैंने यह देखा कि इन नेता-मंत्रियों, सरकारी कर्मचारियों से देश-समाज और नागरिक का भला होना मुश्किल है, तो बस अपना मनोबल ऊंचा कर लिया। रही बात आशा-चिंता की तो यदि आप आशा-अपेक्षा रखेंगे तो चिंता होगी ही। साथ ही दुःख भी मिलेगा। मेरे खयाल से पति-पत्नी या संतान से हमेशा किसी को मनचाहा सुख नहीं मिलता। इसके लिए तो मन को मनाकर संतोष रखना पड़ता है। मेरे दादा की छह संतानें थीं। चार लड़के, दो लड़कियां। बेचारे उनके पीछे अपना पूरा जीवन घिसते रहे। न बेटों ने सुख दिया, न बेटियों ने चैन। पर इसमें उनका भी क्या दोष! वे सब भी तो अपनी-अपनी गृहस्थी की गाड़ी चलाने की खींचतान में लगे हुए थे। यही हाल मेरे पिताजी का रहा। उन्हें न तो मैं कोई सुख दे पाया, न मेरा भाई। और यह अकेले मेरी नहीं, लगभग हर घर की कहानी है। फिर भला मैं अपने बेटे से कोई सुख पाने की अपेक्षा रखने की नादानी क्यों करूं!"
    -इसी पुस्तक से  
  • Rajani Din Nitya Chala Hi Kiya
    Hazari Prasad Dwivedi
    250 213

    Item Code: #KGP-1908

    Availability: In stock

    रजनी-दिन नित्य चला ही किया
    गुरुवर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक विधाओं में रचना की है। उनका कवि रूप अपेक्षाकृत अल्पज्ञात है ।  उनकी कविताओं में, उनके निबंधों की ही भाँति, सर्वत्र एक विनोद-भाव मिलता है। गंभीर चिंतन और व्यापक अध्ययन को सहज तौर पर हलके-फुलके ढंग से पाठक श्रोता पर बोझ डाले बिना प्रकट करना उनके व्यक्तित्व और लेखक की विशेषता और क्षमता है । द्विवेदी जी लोकवादी विशेषण को पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वे लौकवाद का संस्कृत में क्या अर्थ होता है, समझते थे । लेकिन वे महत्व सबसे अधिक लोक को देते थे । वे बोलियों, लोक-साहित्य, लोक-धुनों और जन-प्रचलित लोक-साहित्य रूपों पर अतीव गंभीरता से विचार करते थे । द्विवेदी जी ने संस्कृत और अपभ्रंश में भी कविता की है । उनकी काव्य-दृष्टि मनुष्य की उच्चता और नीचता दोनों को देखती है, इसीलिए उनकी कविताओं में संवेदना और समझ का संयोग है ।
  • Cement Nagar (Paperback)
    VIJAY
    130

    Item Code: #KGP-258

    Availability: In stock


  • Sarla : Ek Vidhva Ki Aatmjeevani
    Pragya Pathak
    100 90

    Item Code: #KGP-2062

    Availability: In stock


  • Boojho To Jaanen
    Vinod Sharma
    60

    Item Code: #KGP-1107

    Availability: In stock


  • Ek Svich Tha Bhopal Mein
    Narendra Nagdev
    215 194

    Item Code: #KGP-379

    Availability: In stock


  • Sant Tiruvalluvar
    Hari Krishna Devsare
    120 108

    Item Code: #KGP-9325

    Availability: In stock

    संत वळ्ळूवर
    हे दरिद्रता के आराधक-
    सहज पुजारी
    दिव्य तुम्हारा, बंधा नहीं है उन शब्दों में
    कोई वाणी तुमको व्यक्त नहीं कर पाई अब तक-
    यह संसार, परिवर्तनशील हे, सभी मत्य हैं
    किंतु तुम्हारी सुकीर्ति अमर है
    क्योंकि तुम हो विश्व मानव के चारण
    वन प्रांतर के ताड़-पत्र सी
    निःसृत ध्वनि से
    भरा हुआ है जिसका अंतर, हे वळ्ळुवर
    इन कुरलों में भरा हुआ है
    आदि सत्य, पूरा भविष्य, पूरा आगत ही
    सुख का स्वप्नातीत सत्य सब
    जन्म जन्मांतर के रहस्य-क्रम बंदी है
    यह चिंतन को क्षेत्र
    तुम विराट हो, तुम व्यापक हो
    जो शाश्वत स्वर प्रतिगुंजित है
    सहज पदों में,
    वे उज्ज्वत हें, परिच्छेद सब
    सदा रहेंगे शाश्वत
    अनुगायक होकर मनुष्य के;
    जो रहस्य है, भरा कुरल में
    शब्द-रंध्र में भाव संधि में
    सागर का उद्वेलन जिसमें
    नभ में छाए श्यामल घन में (भी दिखते तुम)
    दूर-दूर तक तुम प्रतिगुंजित
    दूर-दूर तक, अणु-अणु क्रम में
    व्याप्त तुम्हारे गीतों के स्वर
    विश्व की मानवता के तुम पथबंधु,
    निष्कलंक आत्म-द्रष्टा!

    -डाॅ जी. यू. पोप (हिंदी अनुवाद: एन. सुंदरम)
  • Devtaon Ki Ghaati
    Dronvir Kohli
    60 54

    Item Code: #KGP-1919

    Availability: In stock

    परीक्षा की घड़ी
    कोई-कोई यही बडी मनहूस होती है । ऐसी ही एक घडी आई थी हिमाचल की 'देवताओं की घाटी' में, जब वहीं के सीधे-सादे, भाले-भाले, निरीह प्राणियों पर, सचमुच, मुसीबत के पहाड़ टूटे थे।
    यह डरावनी वेला भुलाए नहीं भूलेगी इस घाटी के लोगों को । और दुनिया भी याद करेगी कि इन असहाय लोगों ने कितने धीरज से इतनी बड़ी विपदा का सामना किया ।
    बड़े जीवट के लोग है 'देवताओं की घाटी' के निवासी ।
    'देवताओं की घाटी' और उस घाटी में आई उस भयंकर विपति से जूझने का यह अद्भुत सच्चा वृत्तांत मैंने  बालय-बालिकाओं के लिए विशेष रूप से लिखा है ।
    -द्रोणवीर कोहली

  • Ardhavritt (Paperback)
    Mudra Rakshes
    340

    Item Code: #KGP-388

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Ashok Vajpayee (Paperback)
    Ashok Vajpayee
    90

    Item Code: #KGP-1432

    Availability: In stock


  • Kasturigandh Tatha Anya Kahaniyan
    Poonam Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-302

    Availability: In stock

    कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ
    ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ पूनम सिंह का दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह की कहानियों में व्यक्ति भी है, परिवार भी और समाज भी। विस्तार, गहराई और संपूर्णता के साथ। इसलिए ये कहानियाँ स्त्री द्वारा रचित होने पर भी सिर्फ स्त्री-समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। इनमें स्त्रीवादी लेखन की शक्ति का स्वीकार भी है और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण भी। इस तरह हिंदी में हो रहे स्त्री-कथा-लेखन को ये कहानियाँ नया आयाम देती हैं।
    प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व की उपज हैं। इनमें परंपरा के जीवित तत्त्वों का स्वीकार आधुनिकता के दायरे में किया गया है। ‘कस्तूरीगंध’, ‘उससे पूछो सोमनाथ’ तथा ‘पालूशन मानिटरिंग’ जैसी कहानियाँ इस कथन के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में देखी जा सकती हैं। इनमें परंपरा के उस पक्ष का अस्वीकार है, जो आधुनिक सोच के विरुद्ध है। इन कहानियों की आधुनिकता नई जीवन स्थितियों के बेहतर रूप का सृजनधर्मी आयाम है, जिसे कहानी-लेखिका ने सीधे, पर सधे शिल्प में उपलब्ध किया है।
    पूनम सिंह की कथा-चेतना बृहत्तर मानवीय और सामाजिक सरोकारों से आत्मीय जुड़ाव का प्रतिफल है, जिसके कारण उनकी कहानियाँ घर-आँगन और सेक्स के भूगोल तक सीमित नहीं हैं। इसके साथ इनमें सादगी से भरा प्यारा घरेलूपन भी है, जो उनकी निजता के संस्पर्श के साथ आंतरिक लहर-सा मंद-मंद प्रवाहित होता रहता है। उनकी कथा-चेतना सामान्यीकृत होकर अपने समय के साथ है तो विशिष्टीकृत होकर अलग से रेखांकित करने लायक भी है। इसका उदाहरण इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं।
    कहा जा सकता है कि ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ समकालीन हिंदी कहानी में नए सृजन का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
  • Sampurna Baal Kavitayen : Sherjung Garg
    Sher Jung Garg
    300 270

    Item Code: #KGP-469

    Availability: In stock

    हिंदी में सबसे चटख, चुटीली और नटखटपन से भरपूर बाल कविताएँ लिखने वाले डॉ. शेरजंग गर्ग उन उस्ताद बाल कवियों में से हैं, जो उचित ही आज बाल कविता के पर्याय बन चुके हैं। समूची हिंदी बाल कविता के ग्राफ को बदलकर उसके मिजाज में बड़ी तबदीली लाने वाले बाल कवियों की छोटी से छोटी सूची बनाएँ, तो भी उसमें डॉ. शेरजंग गर्ग का नाम जरूर होगा। वे हिंदी बाल कविता में पहली बार वह नटखटपन, चुस्ती और शरारती अंदाज लेकर आए, जिसने हजारों बाल पाठकों को रिझा लिया। उनके ‘गाय’, ‘दादी अम्माँ’, ‘गुड़िया’, ‘ईंट’, ‘चिड़िया’, ‘पवनचक्की’, ‘चूहा-बिल्ली’, ‘उल्लू मियाँ’ और ‘टीचर गुड़िया’ सरीखे खिलंदड़े और चुस्त-दुरुस्त शिशुगीत इस कदर चर्चित हुए कि बच्चों के साथ-साथ बड़े भी उनकी नटखटपन से भरी कोमल भावनाओं के साथ बहे और उनके जरिए फिर से अपने बचपन को जिया। खासकर गाय पर भी ऐसा नटखटपन से भरपूर शिशुगीत लिखा जा सकता है, यह डॉ. शेरजंग गर्ग को पढ़ने के बाद ही समझ में आ सकता है। 
    हिंदी में डॉ. गर्ग के अलबेले शिशुगीतों ने ही पहले-पहल यह करिश्मा किया कि वे बदलते समय और बच्चे के मन, सपने और इच्छाओं से जुड़े और वे हर बच्चे के होंठों पर थिरकते नजर आए। और यही बात उनकी गूँजदार लय वाली अपेक्षाकृत लंबी बाल कविताओं के बारे में कही जा सकती है। ‘खिड़की’, ‘नए साल का गीत’, ‘शरारत का मौसम’, ‘यदि पेड़ों पर उगते पैसे’ तथा ‘तीनों बंदर महाधुरंधर’ डॉ. गर्ग की बिलकुल नए शिल्प में ढली अद्भुत कविताएँ हैं, जिनका कोई जोड़ नहीं है। उनके यहाँ बात कहने का जो उस्तादाना अंदाज और सफाई है, वह देखते ही बनती है। 
    सच तो यह है कि हिंदी में भी विश्वस्तरीय बाल साहित्य मौजूद है, यह डॉ. गर्ग की कविताओं से गुजरते हुए ही पहले-पहल समझ में आता है, और यह भी कि हिंदी में मानक शिशुगीत और बाल कविताएँ कौन सी हैं, जिन्हें सामने रखकर बाल साहित्य लिखा जाना चाहिए। 
    डॉ. शेरजंग गर्ग की बेहद तराशी हुई बाल कविताओं की जादुई लय ही नहीं, उनकी कविताओं में हास्य और व्यंग्य की मीठी गुदगुदी भी बाल पाठकों को रिझाती है और वे एक बार पढ़ने के बाद, कभी उन्हें भूल नहीं पाते। उनके गीतों में जैसी पूर्णता है, वैसी कम-बहुत कम नजर आती है। इस लिहाज से वे अपनी नजीर खुद हैं और उन थोड़े से बाल कवियों में से हैं जिनका कविता पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते हैं कि यह कविता इन्हीं की है।
    डॉ. गर्ग की कविताओं का यह जादुई असर ही है कि एक पूरी पीढ़ी उन्हें गाते-गुनगुनाते हुए बड़ी हुई, तो उनके बच्चे---यानी अगली पीढ़ी भी उनकी जादुई कविताओं की उसी तरह मुरीद है। देश के किसी भी हिस्से में हम जाएँ, डॉ. शेरजंग गर्ग की कविताएँ सबसे ज्यादा बच्चों के होंठों पर नाचती नजर आती हैं। बच्चों के वे सर्वाधिक चहेते और दोस्त कवि हैं।
    डॉ. शेरजंग गर्ग सिर्फ एक बालकवि नहीं, वे बाल कविता का इतिहास रचने वाले दिग्गजों में से हैं। लिहाजा उनकी समूची बाल कविताएँ एक जिल्द में सामने आएँ, यह बरसों से बच्चों की ही नहीं, बाल साहित्य के गंभीर अध्येताओं और शोधार्थियों की भी इच्छा थी। इस पुस्तक के जरिए यह सपना पूरा हो रहा है, यह बाल साहित्य के लिए एक यादगार और ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। आशा है, बच्चे और बाल साहित्यकार ही नहीं, हिंदी के स्वनामधन्य आलोचक और सहृदय पाठक भी बाल कविता की शिखर उपलब्धियों और कलात्मक लाघव से पूर्ण इस संचयन को बड़ी रुचि से पढ़ेंगे और खूब सराहेंगे।
  • Bhaykaal
    Ashok Gupta
    200 160

    Item Code: #KGP-483

    Availability: In stock

    अशोक गुप्ता का उपन्यास ‘भयकाल’ मूलतः सामाजिक उपन्यास है। कथाविन्यास को देखें तो यह मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणात्मक है। मनुष्य अपने संस्कार और रुचियों में ऐसी ग्रंथियां पाल लेता है कि वह अपने प्रिय परिवारजनों, यहां तक कि अपने वंशजों से भी भयाक्रांत रहता है और निरंतर अपनी दुर्गति की कल्पना से व्यथित रहता है। अशोक गुप्ता ने उपन्यास के एक चरित्र मिलकीत तनेजा के माध्यम से इस मनोवैज्ञानिक ग्रंथि के वैयक्तिक और पारिवारिक परिणाम का चित्रण किया है।
    दूसरी ओर, जानकी बल्लभ और भानुमती (भानुमती के कई नाम हैं। ये नाम परिस्थितियों और उसके चरित्र के घात-प्रतिघात से उसे मिल गए हैं। उसका एक नाम ‘करिया छबीली’ भी है) के साहसिक और संघर्षमय जीवन कथा के माध्यम से स्वातंत्र्योत्तर भारत के मानवीय और प्रगतिशील बदलाव या विकास का भी चित्रण किया गया है। दोनों प्रकार की कथाएं समांतर शैली में साथ-साथ चलती हैं। पात्र परस्पर टकराते भी हैं। इससे कथा रस का आस्वाद पाठकों को मिलता है और मोनोटोनी नहीं आने पाती है।
    गांवों में गैरजिम्मेदार और बिगड़ैल किशोर किस तरह के कुकृत्य करते हैं और कमजोर तबके के लोगों को सताते हैं इसका मार्मिक और मनोरंजक (भी) वर्णन है। समाज में बुरे लोग हैं तो अहेतु की सहायता करने वाले भी हैं।
    मुझे इस कथाकृति में यह बात विशेष रूप से अच्छी लगी कि आज जब हताशा और दिशाहारा प्रवृत्तियां हमारे साहित्य में आसन जमाए बैठी हैं, अशोक गुप्ता की यह रचना सामाजिक यथार्थ के आधार पर, रचनात्मकता से स्तर पर बने रहते हुए, प्रगतिशीलता और विकास की कथा कहती है।
    उपन्यास की भाषा और संवाद अपनी ताजगी से पढ़ने वालों और विचारकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। अशोक गुप्ता मूलतः कहानीकार हैं और यह कृति उपन्यास होने के साथ बिखराव के बावजूद कहानी का भी रस देती है।
  • Avinashi
    Dr. Vishv Narayan Shastri
    150 135

    Item Code: #KGP-2046

    Availability: In stock

    अविनाशी
    संस्कृत वाड्मय में यद्यपि कथा-साहित्य का प्रचार है, किंतु आधुनिक रीती से लिखित उपन्यास की न्यूनता परिलक्षित होनी है । 'अविनाशी' संस्कृत-साहित्य का सर्वप्रथम ऐतिहासिक उपन्यास है, ऐसा कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । सप्तम शताब्दी के प्राग्ज्योनिष- पुर अर्थात असम राज्य के राजा कुमार भास्कर वर्मा के साथ कनौजाधिपति हर्षवर्धन की मित्रता तथा दोनों का परस्पर मिलकर गौड़ राज्य पर आक्रमण करना मुख्यतया इस उपन्यास का वर्ण्य विश्व है । उक्त ऐतिहासिक आधार पर औपन्यासिक कल्पना करने एवं चरित्र-चित्रण  युक्त सामाजिक, सांस्कृतिक विषयों पर प्रकाश डालने से उपन्यास का कलेवर परिपुष्ट हुआ है । मूल उपन्यास सन 1984 में संस्कृत भाषा में प्रकाशित हुआ था, तत्पश्चात् साहित्य अकादेमी आदि विभिन्न संस्थान- प्रतिष्ठानों ने पुरस्कृत भी किया था । इतिहास एवं कल्पना-संभूत होने पर भी इसका चारित्रिक चित्रण हृदयावर्जक एवं सामाजिकता से ओतप्रोत है । मानवोचित पारस्परिक प्रेम, ईष्यों, द्वेषादि गुणों, अवगुणों का भी सम्यक प्रकाशन हुआ है ।
    इस उपन्यास को सर्वसुलभ और बोधगम्य बनाने के लिए असमिया, बाँग्ला प्रभृति प्रादेशिक भाषाओं में भी इसका अनुवाद हुआ है और प्रकाशित भी किया जा रहा है । यह हिंदी संस्करण हिंदी-प्रेमी पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रकाशित किया जा रहा है ।
  • Pagdangi Chhip Gayi Thee : Chhattisgarh Par Ekagra Kavitayen
    Sanjay Alung
    200 180

    Item Code: #KGP-512

    Availability: In stock

    संजय अलंग की कविताएँ छत्तीसगढ़ के जनजीवन पर एकाग्र हैं। इस दृष्टि से ये अपने होने को अलग से देखने की सहज माँग करती हैं। पहले-पहल पाठ से गुजरते हुए ये कविताएँ छत्तीसगढ़ की आबरू को कई कोणों से उद्घाटित करती हैं। इनमें प्रकृति और मनुष्य के बीच का राग-विराग है, जिसे आधुनिक संदर्भ में देखा गया है। सांस्कृतिकबोध और जीवन की दुश्वारियों को समझती इन कविताओं में गहरी स्थानीयता के यथार्थ बिंब व चित्र हैं। वस्तु वर्णन की जगह भाव चित्रण की उपस्थिति आश्वस्त करती है। इसलिए मनुष्य के दुःख-सुख, आशा-हताशा और जय-पराजय को कविता में अनुभव किया जा सकता है। कविताओं में जिन शब्दों की सहज आवाजाही हुई है, उनमें लोकल और आब्जेक्ट का विरल संस्पर्श है। ये शब्द काव्यभाषा में अतिरिक्त इजाफा करते हैं। उदाहरण के लिए काँदो, गेंडी, गँवर, सरई, लुरकी, फुल्ली आदि। इसके अलावा कई अनूठे शब्द हैं, जो छत्तीसगढ़ की माटी के रंग में डूबे हैं और कविता को विश्वसनीय बनाते हैं। 
    संजय अलंग की कविताओं में सामाजिक, मानवीय सोच और दृष्टि की उजास का परिचय मिलता है। इसी रास्ते वे जनसामान्य की कठिनाइयों और कठोर सच्चाइयों को प्रत्यक्ष करते हैं, जिससे संघर्ष के रास्ते खुलते हैं। जीवन के सच को समय से जोड़ देने की कला भी इन कविताओं में सहज उपस्थित है बिना किसी अतिरिक्त शोर के। कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में संघर्षरत अस्मिताओं का विमर्श कविताओं की तहों में बावस्ता है जिसे धैर्य से पढ़ना अपेक्षित है। 
    संजय अलंग की कविताओं में भरोसे के स्वर विन्यस्त हैं। उनका अगला संग्रह इस जमीन के राग से अधिक परिपक्व होगा, ऐसी उम्मीद है।
  • Chintan Karen Chintan Mukt Rahen
    Swed Marten
    250 213

    Item Code: #KGP-279

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं ।
  • Interview (Hindi Interviews)
    Majda Asad
    60 54

    Item Code: #KGP-2022

    Availability: In stock

    इंटरव्यू
    इस किताब में इंटरव्यू विधा, उसके विकास और विभिन्न व्यक्तियों से वार्तालाप को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है ।
    लेखिका ने बातचीत के माध्यम से विभिन्न वर्गों के विशिष्ट व्यक्तियों से साक्षात्कार कराया है । प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ-साथ समाज-सेवा से लगे सामान्य व्यक्तियों की विशेषताओं का निरूपण किया गया है । राजनीति, साहित्य, कला और समाज-सेवा से संबंधित व्यक्तियों के इंटरव्यू लिये गये हैं । उपराष्ट्रपति, केन्दीय मंत्री, साहित्यकार, संगीताचार्य, गाइड और रसोइया एक साथ नजर आते हैं । इन सबसे बडे आत्मीय ढंग से बातचीत कर इनके व्यक्तित्व को बहुत सहज ढंग से उजागर किया गया है । यह भी स्पष्ट रूप से बताया है कि अपनी-अपनी जगह पर हर व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है और समाज में अपना विशेष स्थान रखता है । यह पुस्तक दो हिस्सों में विभाजित है । पहले खंड में व्यक्तिगत इंटरव्यू है । दूसरे में विषयगत, जिसके अन्तर्गत किसी एक विषय पर अनेक व्यक्तियों से बातचीत कर उनके विचार प्रस्तुत किये गये हैं । सन् 1971 से लेकर 1991 तक लिये गये इंटरव्यू यहाँ संकलित है । इनमें से अधिकांश समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं । बातचीत के दौरान व्यक्तित्व तो उभरा ही, साथ ही बहुत-से रोचक प्रसंग भी उभरकर सामने आये हैं जो पाठको के लिए उपयोगी और प्रेरणादायक सिद्ध होंगे ।  यह पुस्तक अपने ढंग का अनूठा प्रयास है । इंटरव्यू विधा में अपना विशेष स्थान रखती है । पाठको द्वारा इसका स्वागत होगा ।
  • Pracheen Prem Aur Neeti Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    400 340

    Item Code: #KGP-01

    Availability: In stock

    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
  • Kaagaz Ki Naav (Paperback)
    Nasera Sharma
    340 289

    Item Code: #KGP-KKN PB

    Availability: In stock

    "नवंबर,2019 में व्यास सम्मान से सम्मानित उपन्यास" 

    नासिरा शर्मा हिंदी कथा साहित्य में अपनी अनूठी रचनाओं के लिए सुप्रसिद्ध हैं। उनकी कथा रचनाएं समय और समाज की भीतरी तहों में छिपी सच्चाइयां प्रकट करने के लिए पढ़ी व सराही जाती हैं। ‘काग़ज़ की नाव’ नासिरा शर्मा का नया और विशिष्ट उपन्यास है। यह उपन्यास बिहार में रहने वाले उन परिवारों का वृत्तांत है, जिनके घर से कोई न कोई पुरुष खाड़ी मुल्कों में नौकरी करने गया हुआ है। वतन से दूर रहने वाले यहां छोड़ जाते हैं बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक का भरा-पूरा संसार। खाड़ी मुल्कों से आने वाले रुपए...और रिश्तों के अंधेरे उजाले। ‘काग़ज़ की नाव’ शीर्षक एक रूपक बन जाता है, यानी ज़रूरतों और ज़िम्मेदारियों के समंदर को चंद रुपयों के सहारे पार करने की कोशिश।
    उपन्यास महजबीं और अमजद की बड़ी बेटी महलकष के पारिवारिक तनाव को केंद्र में रखकर विकसित हुआ है। महलकष के ससुर ज़हूर और ख़ाविन्द ज़ाकिर के बीच भावनाओं का जो चित्रण है वह पढ़ने योग्य है। मुख्य कथा के साथ भोलानाथ, कैलाश, बिंदू, सुधा, कांता, राजेश, त्रिसुलिया, क्रांति झा और मुक्ति झा आदि चरित्रों की बेहद मानीख़ेज़ उपकथाएं हैं।
    सबसे मार्मिक गाथा है मलकषनूर की। मलकषनूर यानी प्रकाश की देवी। मलकषनूर अपने अस्तित्व की रोशनी तलाश कर रही है, उन अंधेरों के बीच जो सदियों से औरत के नसीब का हिस्सा बने हुए हैं। मलकषनूर की इस तलाश का अंजाम क्या है, इसे लिखते हुए नासिरा शर्मा ने विमर्श और वृत्तांत की ऊंचाइयों को छू लिया है।
    नासिरा शर्मा यथार्थ के पथरीले परिदृश्य में उम्मीद की हरी दूब बखूबी पहचान लेती हैं। किस्सागोई उनका हुनर है। उनके पास बेहद रवां दवां भाषा है। सोने पर सुहागा यह कि इस उपन्यास में तो भोजपुरी भी खिली हुई है।
    ‘काग़ज़ की नाव’ ज़िंदगी और इनसानियत के प्रति हमारे यकीन को पुख़्ता करने वाला बेहद ख़ास उपन्यास है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajee Seth (Paperback)
    Raji Seth
    130

    Item Code: #KGP-416

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजी सेठ 
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राराजी सेठ ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'उसका आकाश', 'तीसरी हथेली', 'अंधे मोड़ से आगे', 'पुल' , 'अमूर्त कुछ', 'तुम भी...?', 'अपने दायरे', 'ठहरो, इन्तजार हुसैन', 'उतनी दूर' तथा 'यह कहानी नहीं'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजी सेठ की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Qaidi
    Shanta Kumar
    120 108

    Item Code: #KGP-1996

    Availability: In stock

    कैदी
    "राजीव ! इस देश में हर आदमी के
    माथे पर उसकी कीमत लिखी रहती है ।
    वह कीमत चुकाओ और उसे खरीद लो ।
    यहां बाज़ार में सरेआम इंसान
    नीलामी पर चढते है और जाहिर
    में भगवान बेचे जाते है ।
    बड़ा अनुभव है मुझे जिंदगी का ।
    जेल में वार्डर पैसे लेकर क्या नहीं
    ले आते ? बस, इतनी बात है कि
    दुगुना-तिगुना मूल्य चुकाना पड़ता है ।
    जब उन्हें पता चल गया कि मेरे पास
    धन है तब मेरो इज्जत होने लगी ।

    'मैंने कैद पूरी की । छूटकर बाहर आया,
    पर जाता कहाँ? फिर से वही धंधा,
    पुलिस और जेल । इसी प्रकार अब
    सातवीं बार यहाँ आया हूँ ।
    अब यह कैद समाप्त हो रही है
    तो फिर मेरे सामने सवाल
    खडा हो गया है कि बाहर जाकर
    कहाँ जाऊंगा व क्या  करूँगा ?
    जानता हूँ कि कुछ भी और
    नहीं कर सकता । यह जिंदगी अब
    जेल की ही हो गई है ।”
    [इसी उपन्यास से]
  • Vichaar-Bindu (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    200 170

    Item Code: #KGP-456

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।
    -अटल बिहारी वाजपेयी
  • Andher Nagari : Srijan, Vishleshan Aur Paath (Paperback)
    Ramesh Gautam
    35

    Item Code: #KGP-1035

    Availability: In stock

    शोषक व्यवस्था के अस्त-व्यस्त और ध्वस्त होने की चिरंतन बोध कथा है ‘अंधेर नगरी’, केवल तर्कशून्य मूर्ख राजे-रजवाड़ों का तत्कालीन प्रदर्शन ही नहीं। भारतेन्दु की पैनी नजर बकरी-प्रकरण के माध्यम से विदेशी उपनिवेश में हैरान-परेशान जनता की त्रासदी को समाज की आंखों के सामने रखकर उसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रहारात्मक प्रतिघात के लिए उकसाने पर थी, क्योंकि भारतेन्दु का मानना था कि ‘बिना कोई उत्तम शिक्षा निकले जो नाटक खेला ही गया तो इसका फल क्या?’ इसलिए भारतेन्दु का यह रचनात्मक प्रयास प्रहसन के रूप में केवल परिहास प्रिय रसिकजनों को परितृष्ट करने के लिए ही नहीं था बल्कि इससे भी ज्यादा बहुत कुछ था। सांस्कृतिक मोर्चे और तर्कशून्य औपनिवेशिक धरातल पर साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासन-व्यवस्था का संचालन करने वाली खोखली हाकिमी मानसिकता को सूली पर चढ़ाने की जन आकांक्षाओं की भविष्य कल्पना इस प्रहसन में की गई है। कहना न होगा, जो 1947 में जनप्रयत्नों से फलीभूत हुई भी। अतः न्याय व्यवस्था के बौद्धिक दिवालिएपन और राजनीतिक अव्यवस्था के खिलाफ यह भारतेन्दु का ‘एकदिनी घोषणा-पत्र’ है, प्रासंगिकता में जिसकी अनुगूंज आज तक सुनाई दे रही है।µ
  • Hamare Jeevan Moolya-2
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1157

    Availability: In stock


  • Mahaan Yoddha Prithviraaj Chauhan : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    190 171

    Item Code: #KGP-492

    Availability: In stock

    भारतवर्ष के इतिहास में क्षत्रिय राजवंशों की गौरवगाथा इतनी लोमहर्षक है कि उन्हें बारंबार पढ़ने को मन करता है। पौराणिक काल से ही क्षत्रिय वंश ने राष्ट्र और समाज की रक्षा में अपनी तलवार उठाए रखी और अपने कर्तव्य का पालन किया।
    अजमेर चैहान वंश की राजधनी रहा है, जिसके प्रतापी राजा सोमेश्वर चैहान थे। सोमेश्वर चैहान के पुत्र पृथ्वीराज चैहान थे, जिनकी वीरता को आज भारतवर्ष में बड़े गर्व से याद किया जाता है। प्रस्तुत पुस्तक ‘महान् योद्धा पृथ्वीराज चैहान: जीवन दर्शन’ में पृथ्वीराज चैहान के जीवन से जुड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाओं को सरल, सरस व सुबोध् शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
  • Yogiraj Shri Krishna
    Lala Lajpat Rai
    250 225

    Item Code: #KGP-101

    Availability: In stock

    योगिराज श्रीकृष्ण
    परवर्ती काल में कृष्ण के उदात्त तथा आर्योचित चरित्र को समझने में चाहे लोगों ने अनेक भूलें ही क्यों न की हों, उनके समकालीन तथा अत्यन्त आत्मीय जनों ने उस महाप्राण व्यक्तित्व का सही मूल्यांकन किया था । सम्राट युधिष्ठिर उनका सम्मान कस्ते थे तथा उनके परामर्श को सर्वोपरि महत्व देते थे । पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण तथा कृपाचार्य जैसे प्रतिपक्ष के लोग भी उन्हें भरपूर आदर देते थे ।
    आर्य जीवनकला का सर्वांगीण विकास हमें कृष्ण के पावन चरित्र में दिखाई देता है । जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली । सर्वत्र उनकी अदभुत मेधा क्या सर्वग्रासिनी प्रतिभा के दर्शन होते हैं । वे एक ओर महान् राजनीतिज्ञ, क्रान्तिबिधाता, धर्म पर आधारित नवीन साम्राज्य के स्रष्टा राष्ट्रपुरुष के रूप में दिखाई पडते हैं तो दूसरी ओर धर्म, अध्यात्म, दर्शन और नीति के सूक्ष्म चिन्तक, विवेचक क्या प्रचारक भी हैं। उनके समय में भारत देश सुदूर गांधार से लेकर दक्षिण की सह्याद्री पर्वतमाला तक क्षत्रियों के छोटे-छोटे, स्वतंत्र किन्तु निरंकुश राज्यों में विभक्त हो चुका था । उन्हें एकता के सूत्र में पिरोकर समय भरतखण्ड को एक सुदृढ़ राजनीतिक इकाई के रूप में पिरोने वाला कोई नहीं था ।
    एक चक्रवर्ती सम्राट के न होने से विभिन्न माण्डलिक राजा नितान्त स्वेच्छाचारी तथा  प्रजापीड़क हो गये थे । मथुरा का कंस, मगध का जरासंध, चेदिदेश का शिशुपाल तथा हस्तिनापुर के दुर्योधन प्रमुख, कौरव सभी दुष्ट, विलासी, ऐश्वर्य-मदिरा में प्रमत्त तथा दुराचारी थे । कृष्ण ने अपनी नीतिमत्ता, कूटनीतिक चातुर्य तथा अपूर्व सूझबूझ से इन सभी अनाचारियों का मूलोच्छेद किया तथा धर्मराज कहलाने वाले अजातशत्रु युधिष्ठिर को आर्यावर्त के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर आर्यों के अखण्ड, चक्रवर्ती, सार्वभौम साम्राज्य  को साकार किया ।
    जिस प्रकार वे नवीन सामाज-निर्माता तथा  स्वराज्यस्रष्ठा युगपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हुए, उसी प्रकार अध्यात्म तथा तत्त्व-चिन्तन के क्षेत्र में भी उनकी प्रवृतियाँ चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुकी थीं । सुख-दु:ख को समान समझने वाले, लाभ और हानि, जय और पराजय जैसे द्वंद्वो  को एक-सा मानने वाले, अनुद्विग्न, वीतराग तथा जल में रहने वाले कमल पत्र के समान सर्वथा निर्लेप, स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को यदि हम साकार रूप में देखना चाहें तो वह कृष्ण से भिन्न अन्य कौन-सा होगा ? प्रवृत्ति और निवृत्ति, श्रेय और प्रेय, ज्ञान और कर्म, ऐहिक और पारलौकिक जैसी आपातत: विरोधी दीखने वाली प्रवृत्तियों में अपूर्व सामंजस्य स्थापित का उन्हें स्वजीवन में चरितार्थ करना कृष्ण जैसे महामानव के लिए ही सम्भव था । उन्होंने धर्म के दोनों लक्ष्यों अभ्युदय और नि:श्रेयस के उपलब्धि की । अत: यह निरपवाद रूप से कहा जा सकता है कि कृष्ण का जीवन आर्य आदर्शों  की चरम परिणति है ।
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    425 383

    Item Code: #KGP-248

    Availability: In stock

    अथर्ववेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की अन्तिम कड़ी ‘अथर्ववेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें अथर्ववेद के 120 मन्त्रों को दस शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। अथर्ववेद की विषयवस्तु अत्यन्त रोचक तथा विविधता लिए हुए है। यही नहीं--ज्ञान, शिक्षा तथा गुरु-शिष्य के सम्बन्धों पर भी यहाँ प्रकाश डाला गया है। परिवार में अतिथि की महत्ता का उल्लेख हुआ है तो अन्य पारिवारिक सम्बन्धों की समरसता का महत्त्व बताया गया है। शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य दोनों ही जीवन में रहते हैं। अथर्ववेद का यथार्थवाद दोनों का वर्णन भी करता है तथा अशुभ से, पाप से मुक्ति की राह बताता है, प्रायश्चित्त का विधान भी करता है।
    यद्यपि व्यक्तिगत सौख्य के लिए यहाँ शत्रुनाशविषयक मन्त्र भी हैं तथा कुछ जादू-टोने जैसी क्रियाएँ भी वर्णित हैं परन्तु तब भी समष्टिगत कल्याण की उपेक्षा नहीं हुई है। आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ होने के नाते यहाँ रोगों के नाम, लक्षण तथा उपचार विधियाँ वर्णित हैं। इन विधियों की विविधता व्यक्त करती है कि शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए अथर्ववेद के ऋषि कितना सजग थे। वनस्पतियों, औषधियों के नाम, उनके गुण तथा रोग-विशेष में उनके उपचारात्मक प्रयोग भी बहुधा वर्णित हुए हैं।
    राजनीति पर यहाँ विशिष्ट सामग्री उपलब्ध है। राजा, उसकी सेना, अस्त्र-शस्त्र, युद्धनीति और शत्रुनाशपरक प्रार्थनाओं का अपना महत्त्व है। विभिन्न वृक्ष, लताओं, वनादि के वर्णन तथा जल, वायु को सम्बोधित सूक्तों से पर्यावरण- विषयक चिन्तन झलकता है। ‘भूमिसूक्त’ में प्रथम बार ‘धरती माँ’ का उल्लेख है--‘माता भूमिः पुत्रोअह पृथिव्याः’--‘भूमि माता है मैं पृथिवी का पुत्र हूँ।’ यह माता-पुत्र के गहन सम्बन्ध धरती का पर्यावरण संरक्षण करता है तथा राष्ट्र की रक्षा के लिए सन्नद्ध भी करता है। सबके भीतर दिव्यता है, सब प्रेमभाव से जुड़े हैं, जुड़े रहें। विश्व संरक्षण, विश्व कल्याण के तत्त्व सत्य, ऋत, दीक्षा, ज्ञान, तप, यज्ञादि हैं। आतंक हिंसा से जूझते विश्व में अभयता का साम्राज्य हो--यही कामना व्यक्त हुई है।
    यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो ‘मन से युवा’ हैं तथा प्राचीन सभ्यता व संस्कृति को आधुनिक संदर्भों में समझना चाहते हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chandrakanta
    Chandrakanta
    250 225

    Item Code: #KGP-716

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चन्द्रकान्ता ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पोशनूल की वापसी', 'आवाज़', 'चुप्पी की धुन', 'पत्थरों के राग', "अलग-अलग इंतजार', 'भीतरी सफाई', 'आत्मबोध', 'सिद्धि का कटरा' , 'लगातार युद्ध' तथा 'रात में सागर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चन्द्रकान्ता की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Vaigyanikon Ke Saras Prasang
    Shuk Deo Prasad
    180 153

    Item Code: #KGP-9150

    Availability: In stock

    ये प्रसंग साक्षी हैं कि सत्य की खोज में जीवन होम करने वाले वैज्ञानिक समाज के अंतरंग प्राणी, मानवीय मूल्यों के पोषक और संकल्पनिष्ठ ईमानदार इंसान हैं। 
    विज्ञान-विभूतियों के जीवन से चुने हुए रंग-बिरंगे, खुशबूदार फूलों का यह बेशकीमती गुलदश्ता निश्चय ही अपनी सुरभि से आपके जीवन में नए उत्साह का संचार एवं स्वस्थ दृष्टिकोण का निर्माण करेगा । 
    हमारे चारों ओर प्रेरणा-पुरुष बिखरे पड़े हैं । प्रश्न है इनसे कुछ सीखने का, ग्रहण करने का । विज्ञानं विभूतियों के ये 'सरस प्रसंग' हास-परिहास के साथ पाठकों के जीवन में आशा और नवीन उत्साह का भी संचार करेंगे, ऐसी आशा है ।