Bhartiya Sahitya Par Ramayan Ka Prabhav

Dr. Chandrakant Bandiwadekar

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Arya Prakashan Mandal

  • ISBN No: 9788189982690

भारतीय साहित्य पर रामायण का प्रभाव
रामकथा से संबद्ध काव्य-रचना की एक सुदीर्घ परंपरा है, जिसका उद्गम वैदिक वाङ्मय से माना जाता है। लौकिक संस्कृत में इस परंपरा का विधिवत् सूत्रपात आदिकवि वाल्मीकि से हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने रामकथा को जो व्यवस्था, उदात्तता, महनीयता और कालजयिता प्रदान की उसके लिए साहित्य जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। विश्व मानचित्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को रामकथा ने अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। भारत के अतिरिक्त आज भी मिस्र और रोम से लेकर वियतनाम, मंगोलिया, इग्नेशिया तक रामकथा की अमिट छाप देखी जा सकती है। भारत और भारतीय मूल के लोगों के लिए रामकथा शक्तिशाली सांस्कृतिक आधार है। भारतीय भाषाओं में रामकथा का स्वरूप अनेक रूपों में विद्यमान है जो भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता को सिद्ध करता है।
रामकथा की नित्य-प्रवाही पुण्यसलिला की अजस्र धारा अनादि काल से भारतीय मनीषा को सम्मोहित और भारतीय जीवन को संस्कारित करती रही है।
रामकथा के सार्वदेशिक स्वरूप को विभिन्न भारतीय भाषाओं में जांचना-परखना ही इस उपक्रम का अभीष्ट है।
विश्वास है कि रामकथा और रामकथा से संबद्ध साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए इसमें प्रचुर सामग्री मिल सकेगी।

Dr. Chandrakant Bandiwadekar

चंद्रक्रांत बांदिवडेकर
वरिष्ठ आलोचक
नाम: चंद्रकांत महादेव बांदिवडेकर
जन्मतिथि: 4 नवंबर, 1932
शैक्षणिक अर्हताएँ: बी० ए०, पुणे विश्वविद्यालय, 1954 (मराठी/संस्कृत)  ०  एम.ए., मुंबई विश्वविद्यालय, 1956 (हिंदी/संस्कृत) ० पी-एच.डी., मुंबई विश्वविद्यालय, 1964 (हिंदी और मराठी के सामाजिक उपन्यासों का तुलनात्मक अध्ययन: 1920-1947)
पद: अवकाशप्राप्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय (1988-92) ० अवकाश- प्राप्त टैगोर प्रोफेसर आफ कंपेरेटिव लिटरेचर, मुंबई विश्वविद्यालय (1984-88) ० ऐमेरिटस फेलो, यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन, दिल्ली (1993-95)
प्रकाशित लेखन: हिंदी में समीक्षात्मक मौलिक ग्रंथ--बारह ० मराठी में--समीक्षात्मक मौलिक ग्रंथ--छह ० हिंदी/मराठी में संपादित ग्रंथ--ग्यारह ० हिंदी/मराठी में अनूदित ग्रंथ--सात ० 250 से अधिक आलेख प्रतिष्ठित हिंदी/मराठी पत्रिकाओं में प्रकाशित ० पचास से अधिक राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय परिसंवादों में आलेखवाचन एवं सहभाग ० बीस ग्रंथों में प्रकाशित लेख ० पंद्रह ग्रंथों की प्रस्तावनाएँ।
पुरस्कार/सम्मान: महाराष्ट्र साहित्य परिषद पुरस्कार, पंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार, अखिल भारतीय हिंदी संस्थान, लखनऊ की ओर से ‘साहित्य भूषण पुरस्कार’ आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित।

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