Swami Vivekanand Ki Shreshth Kahaniyan

Jagnnath Prabhakar

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Jagat Ram & Sons

  • ISBN No: 978-81-88125-32-6

स्वामी विवेकानंद की श्रेष्ठ कहानियाँ
स्वामी विवेकानंद की श्रेष्ठ कहानियां के इस संग्रह में अधिक कहानियाँ तो वे हैं जो उनके भाषणों में  बिखरी पड़ी हैं । ये कहानियाँ उन्होंने अमेरिका में अपने भाषणों के गंभीर आध्यात्मिक तत्त्वों को समझाने के  लिए दृष्टान्त या उदारणों के रूप में सुनायी थीं । कुछ एक कहानियां उनके जीवन की घटनाओं से सम्बन्ध रखती हैं । इन सबके निर्वाचन में इस बात का ध्यान रखा गया है कि इनकी विषय-वस्तु केवल शिक्षाप्रद ही न हो, अपितु साधारण विशेष पढे-लिखे बालक से बूढ़े तक सभी पाठकों के लिए रुचिकर, आकर्षक और मर्मस्पर्शी हो । इनके अनुवाद में सरल और मुहावरा-रंजित भाषा के प्रयोग का प्रयास किया गया है । इन कहानियों के विषय में इससे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती, क्योंकि इनके साथ विश्वविख्यात महापुरुष विवेकानंद का परम विवेकशील, धर्मपरायण, तपस्वी, विचारक, भारतीय दर्शनशास्त्रों के अद्वितीय ज्ञाता, देशभक्त, वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न एवं सांसारिक विपत्ति- विघ्नों को तो क्या मृत्यु की विभिषिका को भी पद-दलित करके लक्ष्य की और बढ़ते चले जाने वाला मृत्युंजय व्यक्तित्व जुड़ा हुआ है । 
हमें पूरी आशा है की ये कहानियां पाठकों के लिए केवल मनोरंजन ही के तत्तव प्रस्तुत नहीं करेंगी, प्रत्येक नयी चेतना, शाश्वत आनंद और अविरत अविरल सहस प्रवाह से भी उनके हृदयों को प्लावित कर देंगी। 

Jagnnath Prabhakar

श्री  जगन्नाथ प्रभाकर
जगन्नाथ प्रभाकर का  जन्म, जिला लायलपुर (वर्तमान पाकिस्तानस्थ, फैसलाबाद) के एक कस्बा के समृद्ध व्यापारी ब्राह्मण परिवार में हुआ, शिक्षा लायलपुर में ग्रहण  की । माता-पिता चाहते थे कि यह लड़का कॉलेज में न जाकर मंडी के कपड़ा व्यापार में अपने बडे भाई का साथ दे । परन्तु इन्हें इस काम में रुचि न थी । ये प्राय: सारा समय सामाजिक कार्यों और विशेषता कांग्रेस कमेटी के, जिसके यह सचिव थे, कार्यों में खपा देते थे । यह हालत देखकर इन्हें नहर के विभाग में एक अच्छी सरकारी नौकरी में लगवा दिया गया । परन्तु कुछ ही महीनों के बाद यह नौकरी भी छोड़ दी । इसके बाद लिखने-पढ़ने का शौक इन्हें लाहौर ले आया । जहाँ ये हिन्दी के साप्ताहिक पत्र "विश्वबन्धु" के मैनेजर नियुक्त हो गये और जब यह पत्र दैनिक हुआ, तो इन्हें समाचार विभाग और साप्ताहिक संस्करण का इंचार्ज बना दिया गया । इसके अतिरिक्त यह एक उर्दू साप्ताहिक 'ब्रह्म संदेश' का और विख्यात उर्दू धार्मिक पत्रिका "ओम" के विशेषांकों का सम्पादन भी करते रहे । पाकिस्तान बनने के बाद इन्हीं ने दिल्ली से उर्दू मासिक पत्रिका 'विज्ञान' का प्रकाशन आरभ किया । बालोपयोगी साहित्य का भी निर्माण किया है । इन्हें भारत सरकार के शिक्षा विभाग की ओर से नवसाक्षरों के उपयोगी साहित्य की सातवी प्रतियोगिता से पुरस्कृत किया गया ।  यह बहुत वर्षों तक उर्दू दैनिक 'मिलाप' के विशेष धार्मिक कालम लिखते रहे ।

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