Ek Sur Mera-Ek Saarangi Ka

Pandit Ram Narayan

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  • Year: 2010

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788190722124

एक सुर मेरा-एक सारंगी का
पंडित रामनारायण ऐसे पहले कलाकार हैं, जिनके माध्यम से सारंगी वाद्य का पुनर्जन्म हुआ, इस वाद्य को लंबे समय से खोई हुई अपनी सांस्कृतिक पहचान मिली ।
सारंगी वाद्य को लेकर यदि इस महापुरुष की सही में किसी से तुलना की जा सकती है तो पाश्चात्य संगीत के महान् वॉयलिनवदक पागानीनी, जिन्होंने वॉयलिन की वादनशेली में आमूलचूल परिवर्तन कर नये सिरे से वादनशैली को स्थापित किया । दूसरे महान संगीतज्ञ रेस्ट्रो पस्वीज और तीसरे यहूदी मेनुहिन जैसे महारथी संगीतज्ञों से ही उनकी तुलना की जा सकती है । 
 यदि धनुर्वाद्य के इस महापंडित एवं आचार्य के बारे में  संक्षेप से कुछ कहा जाए तो उनकें वाद्य से जिस तरह की ध्वनि  (साउंड) संचारित हुई, वैसी आज तक किसी अन्य वादक के वाद्य में नहीं सुनी गई । गज के संचालन को लेकर सार्थक अनुसंधान करते हुए पंडित जी ने जो तकनीक विकसित की वो किसी अन्य वादक की क्षमता और कल्पना से बाहर की बात सिद्ध हुई । फिर आलाप की बात करें तो पंडित जी ने अपनी अद्भुत सोच से इसमें एक-एक स्वर का प्रयोग समझदारी के साथ करते हुए संपूर्ण आलाप में लय का समावेश करते हुए उसे नए ढंग से परिभाषित किया और विलक्षण जोड़ की परिकल्पना सारंगी जैसे वाद्य से साकार किया । पंडित जी ने जिस राग को छुआ, उसकी शुद्धता को कायम रखते हुए उसे नए आयाम दिए। इसके अतिरिक्त विलंबित 'गत' अथवा रचनाओं को बजाने का उन्होंने अपना अलग कौशल और इन रचनाओं से बजने वाले एक-एक 'बोल' का लय में कुशलता के साथ गुँथा होना, तानों की विविधता और उनमें विलक्षण द्रुतगति, जो आज तक न देखी, न सुनी गई और इस सब पर आत्मा को छू जाने वाले स्वरों जैसी कुछ चंद विशेषताओं ने उन्हें इस वाद्य का आचार्य एवं महापंडित बना दिया ।

Pandit Ram Narayan

पं० रामनारायण
भारत की वीर भूमि कहे जाने वाले राजस्थान के एक छोटे-से  गाँव अम्बेर में जनमे पंडित रामनारायण दुनिया-भर के गज के वाद्यों के धुरंधर संगीतज्ञों में इतने सम्मान और आदर की दृष्टि से देखे जाएंगे, इसकी कल्पना उनके जन्म के समय संभवतया क्रिसी को नहीं थी । घर से संतों की सेवा में रत उनके पिता श्री नाथू जी बियावत और माता दरियाव बाई के अलावा ज्येष्ठ भ्राता पंडित चतुरलाल और अन्य सदस्य एक साधारण पारिवारिक इकाई के रूप में उपस्थित थे ।
जन्म के कुछ ही वर्षों बाद उनका परिवार राजस्थान के प्रसिद्ध शहर उदयपुर में स्थापित हो गया और यहाँ घर में ही उनके पिता श्री नाथूजी बियावत और पंडित उदयलाल जी के सान्निध्य में उनकी संगीत की शिक्षा प्रारंभ हुई । उसके पश्चात् संयोग से तत्कालीन वरिष्ट और योग्य संगीतज्ञ पंडित महादेव प्रसाद महियरवाले की उन पर कृपा हुई और उन्हें उनके माध्यम से संगीत की गहराइयों से साक्षात्कार हुआ ।
कुछ वर्षों बाद पंडित जी ने उस समय के सबसे बडे सूफी संगीतज्ञ उस्ताद बेहरे साहब से लाहौर जाकर अग्रिम शिक्षा प्राप्त की । कई लोग इस बात से परिचित हैं कि पंडित जी को गायन से भी वही दक्षता हासिल रही जो कि सारंगीवादन में विद्यमान थी । परंतु उन्होंने गायक बनना ही स्वीकार नहीं किया वरन् सारंगी वाद्य को शास्त्री संगीत के संपूर्ण वाद्य के रूप में स्थापित करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया ।
पंडित जी के बारे में सारांश में यह कहा जाना सर्वथा उपयुक्त होगा कि अपने प्रारंभिक जीवन की तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए उन्होंने सारंगी को ही अपना जीवन माना और पुरे विश्व में इस वाद्य को उच्चतम स्थान दिलाया ।
सारंगी वाद्य के प्रति अपने अगाध पेम, निष्ठा एवं समर्पण के फलस्वरूप जो सम्मान उन्हें मिले, उनमें से कुछ सम्मान ये हैं : महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन पुरस्कार ० महाराणा कुभा समिति द्वारा आचार्य पुरस्कार ० महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार ० संगीत नाटक अकादमी (राजस्थान) ० संगीत नाटक अकादमी (दिल्ली) ० कालिदास सम्मान (म० प्र०) ० आदित्य बिरला (कला शिखर) ० पद्मश्री ० पद्मभूषण ० पद्मविभूषण ।

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