Koorha Kabaarha

Ajeet Kaur

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  • Year: 2016

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170164500

कूड़ा-कबाड़ा
इतनी भयानक दूट-फूट में से, इतनी नकारा, बेकार, बेवकूफ़ और डरी-सहमी औरत में से कैसे और कब एक निडर, बेखौफ, अपने जीवन के सभी फैसले खुद लेने की हिम्मत और हौसला करने वाली औरत पैदा हो गई, इसी ट्रांसफॉर्मेशन यानी काया- कल्प की दास्तान सुनाना चाहती हूँ आप सबको ।
औरत, जिसे हमेशा कूड़ा-कबाड़ा समझा जाता है ।
औरत, जो खुद भी अपने आपको  कूड़ा-कबाड़ा समझती रहती है उम्र-भर । क्योंकि यही समझकर ही तो जीवन से, जीवन की तमाम कड़वाहटों से समझौता किया जा सख्या है ।
कि सहना, समझोता करना और अपना अस्तित्व मिटा देना, किसी भी तकलीफ की शिकायत जुबान पर नहीं लाना ही औरत का आदर्श मॉडल समझा जाता है । हर औरत को इसी आदर्श की घुट्टी दी जाती है । समाज में औरत का स्वीकृत  मॉडल यही है । कि वह निगाह नीची रखे, हर जुल्म को चुपचाप सहे, खामोश रहे बेटे पैदा कर ससुराल के खानदान का नाम जीवित रखे और वंश-परंपरा को आगे चलाए । पति के हर आदेश का पालन करे ।
औरत, जिसे पहले माता-पिता के घर से 'पराई अमानत' समझकर पाला-पोसा जाता है । औरत, जो विवाह के बाद पति के घर की और ससुराल की 'धरोहर' यानी जायदाद होती है । औरत, जिसे उसका पिता दानस्वरूप एक अजनबी पुरुष के हाथों में सौंप देता है कि ले जा, आज से यह गाय तेरी है । इसका दूध निकाली, बछड़े पैदा करवाओ, मारो-पीटो, चाहे चमडी उधेड़ दो इसकी ।
जा, ले जा, पाल-पोसकर तुझे दान में दी अपनी बेटी हमने । आज से इसके लिए यह घर पराया है । आज से तेरा घर ही इसके सिर छुपाने की जगह है ।
जा बेटी, जा अपने घर । आज से ये घर तेरे लिए पराया हुआ । चावलों की मुट्ठी भरकर सिर के ऊपर से पीछे फेंक । मखानों की मुट्ठी भरकर पीछे फेंक । तेरे भाई सुखी रहें, और सुखी बसे उनका घर-परिवार । भाइयों का घर हरा-भरा रहे । दूध-पूत से भरा रहे ।
औरत, जिसके लिए पिता का घर हमेशा पराया रहता है, और विवाह के बाद पति का घर भी अपना नहीं होता ।
'बेटी, घर जा अपने...'
अपने घर ।
कौन-सा घर उसका अपना होता है ?

Ajeet Kaur

अजीत कौर पंजाबी की वरिष्ठ कथाकार हैं और दो खंडों में प्रकाशित उनकी आत्मकथा बेजोड़ है जो न तो नॉस्टैल्जिया है, न रोमांटिक क्षणों के जुगनू पकड़ने को लालसा। यह बीते समय की चिर-फाड़ है जो आखिर में निजी अंधेरों की ओर पीठ कर लेती है और वर्तमान से रूबरू होती हैं। उनकी आत्मकथा गुज़रे वक़्त की राख में से जलते पंखों वाले पक्षी की तरह उठती है और नई दिशाओं की खीज में उड़ान भरती है। अनेक कहानी-संग्रह तथा उपन्यास प्रकाशित। उल्लेखनीय : 'गुलबानो', 'महिक दी मौत', 'बुतशिकन', 'फालतू औरत', 'सावियां चिड़ियां', 'मौत अली बाबे दी', 'काले कुएं', 'ना मारो', 'नवंबर चौरासी', 'नहीं सानू कोई तकलीफ नहीं', 'कसाईबाड़ा' (कहानी-संग्रह), 'धुप्प वाला शहर', 'पोस्टमार्टम', 'गौरी' (उपन्यास), 'तकिये दा पीर' (रेखाचित्र), 'कच्चे रंगां दा शहर : लंदन', (यात्रावृत्त), 'खानाबदोश', 'कूड़ा-कबाड़ा' (आत्मकथा) । उनकों कृतियों के अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चूके हैं और उनकी रचनाओं की कई अंतर्राष्ट्रीय संकलनों में शामिल किया गया है। 1986 का साहित्य अकादमी पुरस्कार अजीत कौर को उनकी आत्मकथा 'खानाबदोश' के लिए दिया गया और 2006 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया । पूरी दुनिया से जब एक हजार प्रतिबद्ध महिलाओं को अमन के लिए जिदगी समर्पित कर देन के उपलक्ष्य में, दो साल की खोजबीन के बाद, नोबेल शांति पुरस्कार के लिए इकट्ठा किया गया तो अजीत कौर भी उनमें शामिल थीं। अजीत कौर कहती हैं : मैं तो 'मैड ड्रीमर' हूँ। पागल, सपने-साज़ । सिर्फ नासमझी के काम किए हैं, सिवाय इसके कि विलक्षण प्रतिभासंपन्न बेटी अर्पणा कौर को जन्म देकर, उसे बड़ी मुहब्बत से तराशा है। उसका नाम लेकर वह गर्व से कहती हैं : हां, मैं अर्पणा की माँ हूं । एक विशिष्ट कथाकार, जुझारू महिला और अद्धभुत इंसान का नाम है अजीत कौर।

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