Bhartiya Sabhyata Ki Nirmiti

Bhagwan Singh

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  • Year: 2016

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789382114147

भारतीय सभ्यता की निर्मिति भगवान सिंह की रचनाओं में ही भारतीय इतिहासलेखन के इतिहास में एक नया कीर्तिमान इस विशेष अर्थ में है कि इससे पहले इतिहासकारों की दृष्टि हड़प्पा के नगरों या ऋग्वेद तक जाकर रुक जाती थी, इससे आगे कुछ दीखता नहीं था और बहुत से प्रश्नों का हमें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता था। 
प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार उन्होंने हड़प्पा काल से भी आठ-दस हजार पीछे के सांस्कृतिक विकासों और सभ्यता के उन नियामक तत्त्वों की खोज की, जिनका उपयोग विविध सभ्यताओं ने अपने निर्माण में गारे और पलस्तर के रूप में किया। विषय गंभीर होते हुए भी उन्होंने इसे इतना सरल और बहुजनग्राह्य रूप में प्रस्तुत किया है कि अखबार पढ़ने की योग्यता रखने वाला व्यक्ति भी इसे पढ़ते हुए किसी तरह के भारीपन या उलझाव का अनुभव नहीं करता। इस पुस्तक में उनकी विवेचनशैली भी उनकी अन्य कृतियों से भिन्न है। नृतत्त्व, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान और साहित्य की सामग्री का इतनी कल्पनाशीलता से उपयोग किसी अन्य कृति में देखने में नहीं मिलता।

Bhagwan Singh

भगवान सिंह
जन्म: 1 जुलाई, 1931, गगहा, गोरखपुर, किसान परिवार।
शिक्षा: एम.ए. हिंदी, गोरखपुर।
कृतियां: काले उजले पीले, 1964 (उपन्यास) ०  अपने समानान्तर, 1970 (कविता-संग्रह) ०  महाभिषग, 1973 (उपन्यास) ०  आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता, 1973 (भाषाशास्त्रा) ०  हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य, 1987 (इतिहास) ०  अपने अपने राम, 1992 (उपन्यास) ०  उपनिषदों की कहानियां 1993 ०  पंचतंत्र की कहानियां 1995 (पुनर्लेखन) ०  परमगति, 1997 (उपन्यास) ०  उन्माद 1999 (उपन्यास) ०  शुभ्रा, 2000 (उपन्यास) ०  द वेदिक हड़प्पन्स, 1995 (इतिहास) ०  इंद्रधनुष के रंग, 1996 (आलोचना) ०  भारत: तब से अब तक, 1996 (इतिहास) ०  भारतीय परंपरा, 2011 ०  प्राचीन भारत के इतिहासकार, 2011 ०  कोसंबी: कल्पना से यथार्थ तक (2012)।
गतिविधि: अध्ययन-लेखन। मौलिक इतिहास चिंतन में विशिष्ट नाम।
सम्मान: हिंदी अकादमी का पहला पुरस्कार 1986-87 में ‘हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य’ पर तथा दूसरा पुरस्कार 1999-2000 में ‘उन्माद’ पर।

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