Vigyan Navneet

Dr. Ramesh Dutt Sharma

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Arya Prakashan Mandal

  • ISBN No: 978-81-89982-77-5

विज्ञान नवनीत
लगभग आधी सदी पहले डा. रमेश दत्त शर्मा ने विज्ञान संबंधी विषयों पर लिखना शुरू किया था और जल्द ही वे विज्ञान से जुड़े हर महत्त्वपूर्ण विषय पर लिखने लगे। अब तक हिंदी की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में हजार से अधिक श्रेष्ठ रचनाएं उनकी छप चुकी हैं, लेकिन रचनाओं के छपने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण उन रचनाओं का पढ़ा जाना है। विज्ञान को अकसर नीरस विषय कहा जाता है, लेकिन डा. रमेश दत्त शर्मा का लेखन किसी भी दृष्टि से नीरस नहीं कहा जा सकता। छात्रा भले ही वे विज्ञान के थे, पर साहित्य से हमेशा जुड़े रहे। स्वभाव से कवि तो थे ही, इसलिए उनके लेखन में एक ऐसी रंजकता है, जिसमें पाठकों को भीतर तक छूने और उनका मन जीत लेने की अद्भुत विशेषता रही है। गंभीर वैज्ञानिक विषयों को रोचक कहानी की तरह परोसना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन रमेश जी ने यह काम प्रस्तुत पुस्तक में बड़ी आसानी से किया है। 
‘विज्ञान नवनीत’ ढंगदार लेखों का संकलन है, जो देश की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे। यह संयोग भी है कि पुस्तक के बहुत से लेख ‘नवनीत’ में छपे थे। अपनी इस पुस्तक के शीर्षक के साथ लेखक ने लिखा है—‘विज्ञान को मथकर निकाली गई लुभावनी लोनी। बड़ी स्वादिष्ट होती है लोनी। देर तक जीभ पर स्वाद बना रहता है। ऐसा ही स्वाद इन लेखों का भी है।’ 
प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत लेखों से यह बात सहज ही समझ आ जाती है कि लेखक सिर्फ लिखना ही नहीं चाहता, कुछ सार्थक रचना चाहता है। सार्थकता की गंध इस पुस्तक के हर पन्ने पर अनुभव की जा सकती है। 
—विश्वनाथ सचदेव

Dr. Ramesh Dutt Sharma

पुराने जमाने के अमीर खुसरो और इस जमाने के बलवीर सिंह रंग के जिला एटा के शहर जलेसर में 4 मार्च, 1939 को जन्मे रमेश दत्त शर्मा वनस्पति- विद्वान में डॉक्टरेट करके पिछले पचास सालों से पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो और टी.वी. के माध्यम से वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रचार-प्रसार करते रहे । जलेसर में शायरों और कविता का उन दिनों अच्छा माहौल था, सी सातवीं-आठवीं से ही तुकें  भिड़ने लगे और स्थानीय मुशायरों में 'चचा जलेसरी' के नाम से शिरकत करने लगे तो लोग 'वाह-वाह, चचा गालिब की याद देना दी' जैसी अतिशयोक्ति भरी दाद देने लगे । लेकिन दिल्ली से एक कवि-गोष्ठी के दौरान बच्चन जी ने कहा कि 'तुम्हें विज्ञान आता है, विज्ञान लिखो, कवि तो वहुत है ।' कविता छुटी तो नहीं, वह तो न जाने कहां से उतरती रही, पर फिर कवि के रूप मेँ रमेश जी ने स्वयं को यादों की महफिलों तक ही सीमित रखा । इस बीच विज्ञान-लेखन के दर्जन से अधिक राष्ट्रीय  पुरस्कार मिल चुके हैं, जिनमें डॉ. शंकर दयाल शर्मा के हाथों राष्ट्रपति भवन में मिला डॉ. आत्माराम पुरस्कार, विद्वान मंत्रालय का मीडिया में बेस्ट साइंस कवरेज का राष्ट्रीय पुरस्कार, आई.सी.ए.आर. का सर्वश्रेष्ठ कृषि पत्रकारिता का पुरस्कार तथा इंडियन नेशनल साइंस एकेडेमी का इंदिरा गांधी साइंस पॉपुलराइजेशन अवार्ड तथा दिल्ली हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान उल्लेखनीय है । जहाँ रवि नहीं पहुंच पाता, वहां कवि और वैज्ञानिक यों ही पहुंच पाते हैं, फिर भी रमेश जी अपने कवित्व को गुस्ताखी ही मानते थे ।

स्मृति-शेष : 6 फरवरी, 2012

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