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  • Prourh Shiksharthion Ki Shiksha-Prapti Ke Vaataavaran Ke Ghatak Tatva
    Naseem Ahmed
    140 126

    Item Code: #KGP-9129

    Availability: In stock

    यह पुस्तक ‘दिल्ली में एक शहरी स्लम बस्ती की परिस्थिति में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण को निर्धारित करने वाले तत्त्वों के अध्ययन’ विषय पर लेख के पी-एच.डी. के सोध-प्रबंध का परिणाम है। इस प्रयास पर दिल्ली विश्वविद्यालय ने डाॅक्टर आॅफ फिलाॅसफी (पी-एच.डी.) की उपाधि प्रदान की है।
    पुस्तक ‘प्रौढ़ शिक्षार्थियों’ की ‘शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण’ तथा विशिष्टताओं की अवधारणा को समझने पर अपना ध्यान केंद्रित करती है। भारत के संदर्भ में शहरी स्लम बस्तियों में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण की रूपरेखा को पुस्तक में दर्शाया गया है। एक स्लम बस्ती की परिस्थिति में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की विशिष्टताआं तथा शिक्षा-प्राप्ति के आसपास के वातावरण के संदर्भ में उन्हें विस्तार से समझने के लिए पुस्तक उपयोगी है। इस प्रकार की समझ प्रौढ़ों में साक्षरता को बढ़ावा देने के प्रयासों का सफल बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए बढ़ी हुई संभावनाओं को उत्पन्न करने में सहायक होगी।
    साथ ही शहरी क्षेत्रों में सामान्य रूप से तथा शहरी स्लम बस्तियों के वातावरण में विशेष रूप से साक्षरता तथा प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों की योजना बनाने और उसका प्रबंध करने की प्रक्रिया के लिए यह उपयोगी सूचनाओं की एक स्रोत-पुस्तिका भी हो सकती है।
  • Kavi Ne Kaha : Manglesh Dabral
    Manglesh Dabral
    250 213

    Item Code: #KGP-1875

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: मंगलेश डबराल
    मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से अपनी सृजनात्मक प्रेरणा ग्रहण करती हुई हिंदी कविता की आज जो पीढ़ी उपस्थित है, उसमें मंगलेश डबराल जैसे समर्थ कवि इतने वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी होते जा रहे हैं कि उनके किसी एक या चुनिंदा पहलुओं को पकड़कर बैठ जाना अपनी समझ और संवेदना की सीमाएं उघाड़कर रख देना होगा। एक ऐसे संसार और समय में जहां ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्हीं भी शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को उसके हाशिये से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचोबीच लाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, ईषर्यालु अथवा आत्मदयाग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोज़ख़ को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इनकार करता है।
    मंगलेश की इन विचलित कर देने वाली कविताओं में गहरी, प्रतिबद्ध, अनुभूत करुणा है, जिसमें दैन्य, नैराश्य या पलायन कहीं नहीं है। करुणा, स्नेह, मानवीयता, प्रतिबद्धता--उसे आप किसी भी ऐसे नाम से पुकारें, लेकिन वही जज़्बा मंगलेश की कविता में अपने गांव, अंचल, वहां के लोगों, अपने कुटुंब और पैतृक घर और अंत में अपनी निजी गिरस्ती के अतीत और वर्तमान, स्मृतियों और स्वप्नों, आकांक्षाओं और वस्तुस्थितियों से ही उपजता है। उनकी सर्जना का पहला और ‘अंतिम प्रारूप’ वही है।
    आज की हिंदी कविता में मंगलेश डबराल की कलात्मक और नैतिक अद्वितीयता इस बात में भी है कि अपनी शीर्ष उपस्थिति और स्वीकृति के बावजूद उनकी आवाज़ में उन्हीं के ‘संगतकार’ की तरह एक हिचक है, अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की कोशिश है, लेकिन हम जानते हैं वे ऐसे विरल सर्जक हैं जिनकी कविताओं में उनकी आवाज़ें भी बोलती-गूंजती हैं जिनकी आवाज़ों की सुनवाई कम होती है।
    -विष्णु खरे
  • Anhad Naad
    Pratap Sehgal
    250 225

    Item Code: #KGP-35

    Availability: In stock


  • Dwidhaa (Paperback)
    Bhairppa
    275

    Item Code: #KGP-502

    Availability: In stock

    कन्नड़ भाषा के यशस्वी उपन्यासकार भैरप्पा की रचनाएं पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं। उनके उपन्यास कथानक की दृष्टि से उल्लेखनीय होते हैं। वे सामाजिक संदर्भों से प्रेरित हों अथवा प्राचीन प्रसंगों को पुनः परिभाषित करते हों—अपने पाठकों को भाव व विचार की एक नई दुनिया में ले जाते हैं। भैरप्पा का नया उपन्यास ‘द्विधा’ को पढ़कर कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है।
    प्रस्तुत उपन्यास स्त्री-पुरुष के मध्य मौजूद प्रश्नों व प्रसंगों से उद्वेलित है। देह, प्रेम, सहवास, गर्भ, गर्भपात, अधिकार, पत्नी, प्रेमिका, रखैल आदि जाने कितने ऐसे प्रश्न जिनको अनेक बार भिन्न-भिन्न तरीकों से कथा-साहित्य में प्रस्तुत किया जा चुका है। ...किंतु जिस सामाजिक धरातल पर भैरप्पा ने इन्हें ‘द्विधा’ में विस्तार दिया है वह अनूठा है। शारीरिक संपर्क और स्त्री-पुरुष प्रेम के विषय में उपन्यास का एक पात्र कहता है, 
    ‘...जिन्होंने शारीरिक संबंध की मृदुता का अनुभव किया हो, वे शारीरिक संबंध को तजकर, केवल मानसिक रूप से स्नेह-संबंध बनाए रखने का प्रयत्न करेंगे, तब भी स्नेह शुष्क हो जाता है।’ उपन्यास में ऐसे उन्मुक्त विवरण एक नई बहस छेड़ते हैं।
    यह उपन्यास ‘स्त्री मुक्ति’ की जटिल व सूक्ष्म व्याख्याओं में भी ले जाता है। क्या ‘स्त्री मुक्ति’ के आधार पर प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग नहीं होता, क्या इससे परिवार नाम की संस्था को कोई खतरा नहीं प्रतीत होता; ऐसे बहुत से ज्वलंत मुद्दे हैं जिनको भैरप्पा ने उपन्यास में शामिल किया है। मानवीय दुर्बलताओं और उनसे उत्पन्न संकटों/विसंगतियों/दुष्परिणामों को भलीभांति चित्रित किया है। कथानक विस्तृत है। लेखक ने विभिन्न चरित्रों के द्वारा समकालीन समाज की प्रवृत्तियों को रेखांकित किया है। समग्रतः एक ऐसा उपन्यास जो हमारे समय की सच्चाइयों व समस्याओं का आईना है।
  • Delhi
    Khushwant Singh
    400 340

    Item Code: #KGP-818

    Availability: In stock

    उपन्यास का नाम शहर के नाम से ! जी हाँ, यह दिल्ली की कहानी है। छह सौ साल पहले से लेकर आज तक की खुशवंत सिंह की अनुभवी कलम ने इतिहास के ढाँचे को अपनी रसिक कल्पना की शिराओं और मांस-मज्जा से भरा। यह शुरू होती है सन् 1265 के ग़यासुद्दीन बलबन के शासनकाल से तैमूर लंग, नादिरशाह, मीर तक़ी मीर, औरंगज़ेब, अमीर खुसरो, बहादुर शाह ज़फ़र आदि के प्रसंगों के साथ कहानी आधुनिक काल की दिल्ली तक पहुँचती है कैसे हुआ नयी दिल्ली का निर्माण ! और अंत होता है 1984 के दंगों के अवसानमय परिदृश्य में !

    कहानी का नायकमुख्य वाचक हैदिल्ली को तहेदिल से चाहने वाला एक व्यभिचारी किस्म का चरित्रजिसकी प्रेयसी भागमती कोई रूपगर्विता रईसज़ादी नहींवरन् एक कुरूप हिंजड़ा है।दिल्ली और भागमती दोनों से ही  नायक को समान रूप से प्यार है। देश-विदेश के सैर-सपाटों के बाद जिस तरह वह बार-बार अपनी चहेती दिल्ली के पास लौट-लौट आता हैवैसे ही देशी-विदेशीऔरतों के साथ खाक छानने के बाद वह फिर-फिर अपनी भागमती के लिए बेकरार हो उठता है। तेल चुपड़े बालों वालीचेचक के दागों से भरे चेहरे वालीपान से पीले पड़े दाँतों वाली भागमती केवास्तविक सौंदर्य को उसके साथ बिताए अंतरंग क्षणों में ही देखा-महसूसा जा सकता है। यही बात दिल्ली के साथ भी है। भागमती और दिल्ली दोनों ही ज़ाहिलों के हाथों रौंदी जाती रहीं। भागमतीको उसके गँवार ग्राहकों ने रौंदादिल्ली को बार-बार उजाड़ा विदेशी लुटेरों और आततायियों के आक्रमणों ने। भागमती की तरह दिल्ली भी बाँझ की बाँझ ही रही     
  • Shiksha Tatha Lok Vyavhar
    Maharishi Dayanand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1213

    Availability: In stock

    जब मनुष्य धार्मिक होता है, तब उसका विश्वास और मान्य शत्रु भी करते हैं और जब अधर्मी होता है, तब उसका विश्वास और मान्य मित्र भी नहीं करते। इससे जो थोडी विद्या वाला भी मनुष्य श्रेष्ठ शिक्षा पाकर सुशील होता है, उसका कोई भी कार्य नहीं बिगड़ता ।
    इसलिए मैं मनुष्यों को उत्तम शिक्षा के अर्थ सब वेदादिशास्त्र और सत्याचारी विद्वानों की रीति से युक्त इस ग्रंथ को बनाकर प्रकट करता हूँ की जिसको देख-दिखा, पढ़-पढाकर मनुष्य अपने और अपनी संतान तथा विद्यार्थियों का आचार अत्युत्तम करें, कि जिससे आप और वे सब दिन सुखी रहें ।
    इस ग्रंथ में कहीं-कहीं प्रमाण के लिए संस्कृत और सुगम भाषा और अनेक उपर्युक्त दृष्टान्त देकर सुधार का अभिप्राय प्रकाशित किया, जिसको सब कोई सुख से समझ अपना-अपना स्वाभाव सुधार, उत्तम व्यवहार को सिद्ध किया करें । 

  • Namvar Hone Ka Arth (Paperback)
    Bharat Yayavar
    225

    Item Code: #KGP-392

    Availability: In stock

    नामवर होने का अर्थ
    प्रस्तुत पुस्तक नामवर सिंह के जीवन एवं साहित्य का एक पाश्र्वचित्र या प्रोफाइल है। इसे सही मायनों में ‘जीवनी’ भी नहीं कहा जा सकता। कोशिश यह रही है कि उनके जीवन एवं साहित्य का एक सामान्य परिचय इस पुस्तक के द्वारा प्रस्तुत हो जाए। इस कोशिश में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह स्वयं नहीं कह सकता। बस निश्चयपूर्वक इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उनके जीवन एवं साहित्य को जानने-समझने का यह मेरा विनम्र प्रयास है।
    बात उस समय की है, जब मैं साहित्य की दुनिया में अपनी आँखें खोल रहा था। यह बीसवीं शताब्दी का आठवाँ दशक था और मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी था। उन्हीं दिनों मैंने नामवर जी की तीन पुस्तकें खरीदीं और पढ़ी थीं-- ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’। इनमें उनकी ‘छायावाद’ पुस्तक मुझे तब बहुत अच्छी लगी थी और आज भी उनकी सभी पुस्तकों में यही मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। 
    1982 ई. की गर्मियों में मैं दिल्ली गया। उन्हीं दिनों एक दिन मुझसे त्रिलोचन जी ने कहा कि नामवर अपने समय के एक समर्थ कवि थे, उनकी कविताओं को खोजकर पुस्तक-रूप में प्रकाशित कीजिए। इन कविताओं की खोज के साथ-साथ तभी मैंने प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने का मन बना लिया था। खोज की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर यह पुस्तक तैयार की।
    मैं यह भी स्पष्टीकरण कर देना चाहता हूँ कि यह पुस्तक एक सहयोगी प्रयास है। इसमें सबसे ज्यादा नामवर जी की विलुप्त रचनाएँ दी गई हैं। उनसे संबंध रखने वाले लेखकों के संस्मरण एवं पत्रों का भी उपयोग इसमें हुआ है। इस सहयोगी प्रयास में जिन लेखकों के वक्तव्य या कथन का इसमें प्रयोग किया गया है, उनके प्रति मैं आभार स्वीकार करता हूँ।
  • Virajbahu
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-80

    Availability: In stock


  • Andher Nagari : Srijan-Vishleshan Aur Paath
    Ramesh Gautam
    80 72

    Item Code: #KGP-9131

    Availability: In stock


  • Dushyant Ke Jaane Par Doston Ki Yadein (Paperback)
    Kamleshwar
    90

    Item Code: #KGP-1381

    Availability: In stock


  • Hausale Buland Hain (Paperback)
    Suraj Nagar
    100

    Item Code: #KGP-372

    Availability: In stock

    संसार में जो कुछ भी अनूठे, अद्वितीय, अविस्मरणीय, अतुलनीय एवं अद्भुत काम हुए हैं, वे चाहे किसी भी क्षेत्र में क्यों न हों, जैसे- स्थापत्यकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, साहित्य-सृजन हो या कोई वैज्ञानिक आविष्कार, सब बुलंद हौसले का परिणाम है। हौसले की उड़ान से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, हर सपना साकार होता है। हौसले बुलंद होना जीवन में प्रसन्नता का सूर्योदय होने जैसा है और हौसले पस्त होना सूर्यास्त होने जैसा है। बचपन से ही मेरे मन में कविताओं की ऐसी पुस्तक लिखने की इच्छा थी, जो निराशा को आशा में बदल दे। गम के काँटों में खुशियों के फूल खिला दे। अमावस की काली रात को दीपावली की तरह जगमगा दे। देश के प्रतिष्ठित किताबघर प्रकाशन, दिल्ली ने मेरे गीतों को पुस्तक का आकार दिया है। जिसका नाम है-‘हौसले बुलंद हैं’।
    ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक के सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय गीतों को साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डा. अलका तोमर ने अपनी अनूठी शैली में अंग्रेजी भाषा में रूपांतरित कर सार्वदेशिक बनाकर चार चाँद नहीं चालीस चाँद लगा दिए हैं। नई ऊर्जा, नया जोश, नई उमंग का संचार करने वाली इस पुस्तक के पहले गीत की रचना मंदोदरी का मायका, कालिदास द्वारा रचित मेघदूत में वर्णित दशपुर, शिवना तट पर स्थित पशुपतिनाथ की नगरी मंदसोर में हुई। रचना का यह क्रम क्षिप्रा तट स्थित ज्योतिर्लिंग मृत्युंजय महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल, झारखंड की राजधानी राँची देश की राजधानी दिल्ली, शंकर के त्रिशूल पर बसी अविनाशी काशी, त्रिवेणी संगम प्रयागराज, यमुना तट स्थित मथुरा गोवर्धन, देवी अहल्या की नगरी इंदौर, नर्मदा तट स्थित ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर, सागर तट स्थित मायानगरी मुंबई से चलकर ऐतिहासिक एवं पुरातत्त्व संपदा से भरपूर सूर्य पुत्री ताप्ती तट स्थित बुरहानपुर में पूर्ण हुआ।
    ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक प्रेरणा का पथ पराक्रम का रथ प्रसन्नता की गंगा है। इस पुस्तक की रचना में मुझे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरणा, सहयोग एवं मार्गदर्शन देने वाले सभी बुलंद हौसले वालों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक पढ़ने वालों के हौसले अवश्य बुलंद होंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।
    -सूरज नागर
  • 20-Best Stories From Spain & Portugal
    Prashant Kaushik
    395 356

    Item Code: #KGP-9311

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Spanish & Portuguese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories 
    open up a new world on each page.

    With stories like Vain Queen, Maid and the Negress, Three Citrons of Love, Daughter of the Witch, Pedro and the Prince, Tower of ill Luck, this book is a compilation of 20 famous Spanish & Portuguese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Spain & Portugal.
  • Kavi Ne Kaha : Shriprakash Shukla (Paperback)
    Shri Prakash Shukla
    140

    Item Code: #KGP-7017

    Availability: In stock

    रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि हैं। इनके पहले कविता संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ (1999) से लेकर पाँचवें कविता संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ (2014) तक की कविताओं से गुजरकर कविता प्रेमियों को काव्य स्वाद का सुखद अहसास होता है। अपनी कविताओं में ये बिना किसी नारेबाजी व आयातित विमर्श का हौवा खड़ा किए सधे हुए स्वर में सामाजिक  विसंगतियों, क्रूरताओं, धार्मिक ढकोसलों, आर्थिक पराभवों और सांस्कृतिक क्षरण पर सीधे वार करते हैं। इनकी कविता की दुनिया में राजनीति व विचारधारा की एक पक्षधर दुनिया गुँथी हुई होती है जिसमें गरीब, पीड़ित व उपेक्षित वर्ग के प्रति गहरी रागात्मक चेतना मौजूद है।
    लेकिन उपर्युक्त बातों के साथ-साथ जिस वैशिष्ट्य के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता में ज्यादा चर्चित हैं वह हैं इनकी विषयगत वैविध्यता और गहरी लोकोन्मुखता। अपनी कविताओं में वे महज लोक का चित्रण नहीं करते बल्कि लोक के क्षरण के कारणों की शिनाख्त भी करते हैं। नवउदारवाद और पूँजीवादी शक्तियों के आक्रमण, दमन, शोषण और चालाकियों का प्रतिरोध करने वाली इनकी कविता जनोन्मुखी व लोकोन्मुखी तो है ही, इसमें स्थानीयता के साथ वैश्विकता के तत्त्व भी समाहित हैं जहाँ पुराने के साथ परंपरा से रिश्ते रखने वाला नया समाज तो है ही, एक आधुनिक चेतना भी मौजूद है।
    इसी के साथ गौरतलब है कि प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के चित्रों से भरपूर कवि का कविता संसार विविध वर्णों से युक्त है जहाँ कविता की धार अपनी भाषिक व्यंजना के रेडिकल भावभूमि पर विकसित होती है। यहाँ कहते हुए ख़ुशी होती है कि इस कवि ने अपने को कहीं रिपीट नहीं किया है और इसी कारण इनकी कविता बहुवस्तुस्पर्शी उध्र्वमुखी चेतना से संपन्न है जो एक समर्थ कवि का लक्षण है। भाषा की सादगी और बिंबों की निजता इनके कवि- स्वभाव की विलक्षण विशेषता है। कह सकते हैं कि भाषा के लोक स्वीकृत विन्यास को चुनौती देती इनकी कविताओं में व्यंग्य व वक्रता का एक सघन संसार उपस्थित होता है जहाँ भाषायी मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर का औदात्य भी मिलता है जो इनकी कविताओं को रेडिकल बनाता है।
    उम्मीद की जानी चाहिए कि कविता का यह संचयन कवि की काव्य संपदा और उनकी सामर्थ्य से अपने पाठकों को परिचित कराने में समर्थ होगा।
  • Ila (Paperback)
    Prabhakar Shrotiya
    35

    Item Code: #KGP-1093

    Availability: In stock


  • Mannu Bhandari : Srijan Ke Shikhar
    Sudha Arora
    550 495

    Item Code: #KGP-801

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी : सृजन के शिखर
    हिन्दी साहित्य का समृद्ध करने में जिन कथा-लेखिकाओं  का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, मन्नू भंडारी उनमें एक अग्रणी नाम हैं । पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय मन्नू भंडारी हिंदी भाषा के साथ-साथ अनेक देशी-विदेश भाषाओं में एक से आदर-सम्मान के साथ पढी जाने वाली रचनाकार हैं ।
    मन्नू भंडारी के दो उपन्यास 'आपका बंटी' और  'महाभोज' हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर और सृजनात्मकता शिखर पर प्रतिष्ठित हैं । ये दोनों  उपन्यास अपने समय से आगे की कहानी कहत्ते और एक लंबे कालखंड का सच होने के कारण कालजयी उपन्यास, की श्रेणी में आते हैं ।
    मीडिया लेखन में भी मन्नू जी की पटकथाओं ने और  धारावाहिकों में 'रजनी' ने अपनी धाक जमाई । मन्नू  जी  व्यक्तित्व व रचनात्मक पक्ष  सभी कोणों का इस  पुस्तक में विश्लेषण है।
    एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी मन्नू जी का जीवन एक दृढ़ और जिजीविषा की अद्भुत  मिसाल हैं । हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में पहले एक पग्म स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं. जो पहली  ही मुलाकात में आपका बनावट आया दिखावट से पर अपने आत्मीय घेरे में  ले लेता है   ।
    बंगाल की सर्वाधिक लोकप्रिय लेखिका और  सामाजिक कार्यकर्ता महास्वेता देवी से लेकर ? वरिष्ट चिंतक-समीक्षक नामवर सिंह, निर्मला जैन, राजेद्र यादव, गिरिराज किशोर, विश्वनाथ त्रिपाटी, विजयमोहन सिंह, अजितकुमार, देवेंद्रराज अंकुर, स्वयं प्रकाश, राजी सेठ, अर्चना वर्मा तथा मन्नू जी का करीब से जानने वाले उनके अध्याय स्वजनों ने अपने वक्तव्यों, आलेखों और  विश्लेषण से इम पुस्तक को समृद्ध बनाया है । आशा है  पाठकों की कसौटी पर भी यह पुस्तक खरी उतरेगी ।
    -सुधा अरोड़ा
  • Mere Saakshatkaar : Amrit Lal Nagar
    Amritlal Nagar
    490 417

    Item Code: #KGP-478

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sainikon Ki Veergaathayen
    Ram Kumar Bhramar
    350 315

    Item Code: #KGP-526

    Availability: In stock

    हिंदी में युद्ध-कथाओं के पाठक बहुत हैं, किन्तु युद्धकथाओं की संख्या उतनी नहीं है । कारण संभवत: यह  कि भारतीय मानस और उसका लेखक, युद्ध अथवा घटना क्रो लेकर स्तब्धता-बोध की जितनी अनुभूति करता है, उतनी उस बोध को दस्तावेजी तौर पर सुरक्षित करने में रुचि नहीं ले पाता । इस अरुचि का कारण यह भी हो सकता है कि वह संभवत: युद्ध-कथा को साहित्य का बहुत महत्वपूर्ण अंग नहीं मानता । पर मुझे लगता है कि साहित्य के बहुआयामी विधा-रूप में युद्ध-कथाओं का भी अपना एक महत्त्व है और उनसे राष्ट्रीय-बोध के साथ-साथ भूलों का भी इतिहास दर्ज होता रहता है । मैं जब-जब इस विचार और दृष्टि से उद्वेलित हुआ हूं, तब-तब मैंने इन रचनाओं को रचा । यह 'सामयिक साहित्य' होता है, मैं यह भी नहीं मानता, क्योंकि स्नेह-संबंधों में यदि शाश्वतता होती है तब युद्ध की पीडा अथवा राष्ट्रभक्ति की शहीदी में भी एक शाश्वत सत्य छिपा है  यह राष्ट्र-पूज़न है, अत: इस पूजन के फूल अपने पाठक-बंधुओं के लिए समर्पित करता हूं-शब्दपुष्पों का यह संग्रह देशभक्ति की महक देता रहे—इसी कामना के साथ ।
    —रामकुमार भ्रमर
  • Sahitya Ka Naya Soundaryashastra
    Devendra Chaubey
    600 540

    Item Code: #KGP-527

    Availability: In stock


  • Debt-Free Forever (Personal Finance)
    Gail Vax-Oxlade
    495 446

    Item Code: #KGP-9015

    Availability: In stock

    TIRED OF GETTING TO THE END OF THE MONEY BEFORE YOU GET TO THE END OF THE MONTH? WISH YOU WERE IN CONTROL?
    If you are afraid to open your bills, if you’ve never added up how much you owe, if you can’t even imagine being debt-free, it’s time to join thousands of people Gail Vaz-Oxlade has helped. Her straightforward approach to money management is based on self-control, hard work, and prioritizing what’s really important. Debt-Free Forever is Gail’s step-by-step guide, and she’ll show you how to
    ~ figure out how much you’ve actually been spending
    ~ calculate how much you owe—and what it’s costing you
    ~ build a budget that works
    ~ maximize your debt repayments so you can be consumer debt-free
    in 3 years or less
    ~ prepare for a rainy day so it doesn’t mean a major setback
    ~ set goals for your new, debt-free life
    Make no mistake, getting out of debt isn’t easy. But in Debt-Free Forever, Gail gives you a clear strategy and the steps needed to implement it. So if you’re finished with excuses, overdue notices, and maxed-out credit cards, pick up this book, follow Gail’s plan, and start becoming Debt-Free Forever.
  • Krantikari
    Roshan Premyogi
    260 234

    Item Code: #KGP-1943

    Availability: In stock

    क्रांतिकारी
    दलित परिवार में जन्म लेने के कारण सामाजिक अस्पृश्यता और उत्पीड़न का दंश मैंने भी सहा है, इसलिए ‘क्रांतिकारी’ को पढ़ते हुए यह सवाल मेरे मन में कई बार उठा कि जिस तरह इस उपन्यास में चंद्रशेखर और केवलानंद जैसे सचेत सवर्ण लड़के दलित रामकरन के साथ खड़े हैं, मेरे साथ क्यों नहीं खड़े हुए ?
    चंद्रशेखर मुख्य पात्र है, जो चाहता है कि इलाके के गाँवों में दलितों का जीवन-स्तर ऊँचा उठे, वे संगठित हों और बराबरी पर आने के लिए लड़ें। दलितों की लड़ाई में वह अपना एक हाथ गँवा बैठता है। अंत में उसके विचारों की विजय होती है। विजय इस तरह कि दो मेधावी युवा अपने-अपने गाँव यह सोचकर आए थे कि वे यहीं पर रोजगार करेंगे और अपने साथ दलित समाज का भी जीवन-स्तर ऊँचा उठाएँगे। उनकी राह में क्षेत्रीय विधायक काँटा बोते हैं, इसलिए कि यदि रामकरन जैसे हरिजन दलितों के सर्वमान्य नेता बन जाएँगे तो हम सवर्णों का वोट बैंक टूट जाएगा। उधर चंद्रशेखर और रामकरन मिलकर दलितों को यह अहसास कराते हैं कि यदि संगठित और शिक्षित बनोगे तो कोई भी तुम्हारा उत्पीड़न नहीं कर पाएगा।
    ईशावस्या, माला और संध्या जैसे स्त्री-पात्रों को उपन्यास में महत्त्व नहीं मिला है, लेकिन सबकी कमी पूरी कर देती हैं सुन्नरी देवी। उनका संघर्ष समूची दलित स्त्री जाति का संघर्ष है। वे किसी देवी की तरह समाजियों का नेतृत्व सँभालती हैं। दरअसल दलित क्रांति की मशक्कत तीन युवा मिलकर करते हैं, लेकिन जब क्रांति होती है तो वे युवा पीछे रह जाते हैं और सुन्नरी देवी विजय का परचम लहरा देती हैं।  

  • Aadarsh Ghar-Parivaar Aur Mahilayen
    Sudha Gautam
    180 162

    Item Code: #KGP-187

    Availability: In stock

    'आदर्श घर-परिवार और महिलाएँ' पुस्तक में सुधा गौतम ने अपने अनुभवों के आधार पर जिन शीर्षकों के अंतर्गत जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण बातों की जानकारी दी है, उनमें से कुछ शीर्षकों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है । आशा है, यह पुस्तक महिलाओं के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध होगी :
    ० जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए
    ० छोटी-छोटी बातों से न हो परेशान
    ० बाँधे रखें पति को
    ० कड़वी यादे भुला दें
    ० जब आप फोटो खिंचवाने जाएं
    ० आप और आपकी शारीरिक गठन
    ० आप और आपका परिधान
    ० आप और आपकी नींद
    ० वर्तमान में जीना सीखें
    ० यदि आपके घर में नौकर है
    ० आप और आपकी खरीदारी
    ० आप और आपके घर के कीड़े-मकोड़े
    ० आपकी बढती उम्र और आप
    ० बच्चों के सुन्दर भविष्य के लिए
    ० जब आप सफर पर जाएं
    ० जब आपके मेहमान आपके घर आएं
    ० आप और आपकी सेहत
    ० बच्चों के लिए नाश्ता 
    ० चमकदार त्वचा के लिए
    ० खूबसूरत होंठों के लिए
    ० त्वचा में निखार के लिए
    ० गर्मियों में आपका मेकअप
    ० मुँहासों से छुटकारा
    ० खूबसूरत बालों के लिए
    ० आपकी गर्दन रहे सुंदर
    ० धूप का चश्मा
    ० आप और आपके गहने
    ० आपके घर का फर्श
    ० महिलाएँ और रसोई
    ० आपके गरम कपडे
    ० कैसे छुड़ाएँ कपडों के दाग
    ० अपने बच्चों के मित्र बनिए
    ० जब बच्चा स्कूल जाने लगे
    ० जिद्दी बच्चा
    ० माँ-बेटी का रिश्ता
    ० बच्चे कैसे बनाएं अपनी अलग पहचान
    ० बच्चे अपना काम स्वयं करें
    ० बच्चे भोजन बेकार न करें
    ० शरारती बच्चों को कैसे सुधारें
    ० बच्चों के ज्ञानवर्द्धन के लिए
    ० जब आपका बच्चा आपसे दूर रहे
    ० छात्र और परीक्षा
    ० बच्चे कैसे रहें परीक्षा के दिनों में  तनावमुक्त
    ० कैसे लिखे प्रश्नों के उत्तर
    ० कैसे मिले परीक्षा में सफलता
    ० आपका कंप्यूटर
    ० आप और आपके छोटे बच्चे
    ० बच्चों की छोटी-मोटी तकलीफें
    ० घरेलू दवाइयाँ
    ० छोटी-छोटी काम की बातें

  • Marg Tatha Anya Kavitayen
    Ganga Prasad Vimal
    100 90

    Item Code: #KGP-9084

    Availability: In stock


  • Ramayan Bharantiyan Aur Samadhaan
    Swami Vidya Nand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1115

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के पढ़ने से पता चलेगा कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम राज्य पाने के इच्छुक थे, वे पिता के कहने से वन नहीं गए, राम दीपावली के दिन नहीं बल्कि चैत्र शुक्ला 6 को अयोध्या लौटे थे, सीता का स्वयंवर नहीं हुआ था, कौशल्या की स्थिति घर में दासियों से भी बुरी थी, राम ने धोबी या किसी के भी कहने से सीता को वनवास नहीं दिया था, उन्होंने तपस्या करते तथाकथित शुद्र शम्बूक का वध नहीं किया था, हनुमान बंदर नहीं बल्कि व्याकरणाचार्य तथा चारों वेदों के विद्वान् थे, बालि की पत्नी तारा वेदों के रहस्य को जानने वाली थी, उसका पुत्र अंगद बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ था और उसके श्वसुर सुषेण बड़े कुशल सर्जन और प्लास्टिक सर्जरी में निष्णात थे, हनुमान, जटायु, रावण आदि छोटे-छोटे निजी हेलीकाॅप्टरों में यात्रा करते थे, शबरी भीतनी नहीं, उच्च कुल की तपोनिष्ठ देवी थी, अयोध्या तथा लंका की राजभाषा संस्कृत थी इत्यादि...
  • Teesara Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    180 162

    Item Code: #KGP-301

    Availability: In stock


  • Sulagati Inton Ka Dhuaan
    Poonam Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-9196

    Availability: In stock

    सुलगती ईंटों का धुआं कहानीकार पूनम सिंह का नया संग्रह है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मंे प्रकाशित इन कहानियों को पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त हो चुकी है। पूनम सिंह नए बनते समाज को आलोचनात्मक दृष्टि के साथ कहानियों के कंेद्र में रखती हैं, यह एक सामान्य कथन है। यह उपयुक्त कथन है कि वे भाषा और शैली से पाठक के मन में भी खुशी और खलिश पैदा कर देती हैं। विकास के नाम पर लुटती जमीन, परंपरा और अस्मिता विमर्श से जूझती स्त्री, जिम्मेदारियों से घिरा ‘नैतिक बेरोजगार’, ग्रहों के अंधविश्वास में उलझे आधुनिक, उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़ी हुईं स्त्रियां, अकेलेपन से आक्रांत व आत्मीयता को तलाशती वृद्धवस्था और व्यवस्था के खिलाफ एकजुट जनता-इन कहानियों के यही सूत्र-संदर्भ हैं। देखा जाए तो रचनाशीलता को चारों तरफ से घेरे इन सूत्र-संदर्भों को पूनम सिंह ने अपने रचाव से विशेष बना दिया है। उनमें स्थानीयता का एक मोहक अंदाज है। यह अंदाज केवल भाषा में ही नहीं, कहानी कहने के मिजाज में भी समाया है। इन कहानियों के कई चरित्र मन में कहानी समाप्त हो जाने के बाद भी उद्विग्न रहते हैं। कहानी पाठक के मन में दुबारा-तिबारा लिखी जाती है शायद।
  • Gulmohar Phir Khilega
    Kamleshwar
    300 270

    Item Code: #KGP-46

    Availability: In stock


  • Vigyan Navneet
    Dr. Ramesh Dutt Sharma
    290 261

    Item Code: #KGP-563

    Availability: In stock

    विज्ञान नवनीत
    लगभग आधी सदी पहले डा. रमेश दत्त शर्मा ने विज्ञान संबंधी विषयों पर लिखना शुरू किया था और जल्द ही वे विज्ञान से जुड़े हर महत्त्वपूर्ण विषय पर लिखने लगे। अब तक हिंदी की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में हजार से अधिक श्रेष्ठ रचनाएं उनकी छप चुकी हैं, लेकिन रचनाओं के छपने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण उन रचनाओं का पढ़ा जाना है। विज्ञान को अकसर नीरस विषय कहा जाता है, लेकिन डा. रमेश दत्त शर्मा का लेखन किसी भी दृष्टि से नीरस नहीं कहा जा सकता। छात्रा भले ही वे विज्ञान के थे, पर साहित्य से हमेशा जुड़े रहे। स्वभाव से कवि तो थे ही, इसलिए उनके लेखन में एक ऐसी रंजकता है, जिसमें पाठकों को भीतर तक छूने और उनका मन जीत लेने की अद्भुत विशेषता रही है। गंभीर वैज्ञानिक विषयों को रोचक कहानी की तरह परोसना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन रमेश जी ने यह काम प्रस्तुत पुस्तक में बड़ी आसानी से किया है। 
    ‘विज्ञान नवनीत’ ढंगदार लेखों का संकलन है, जो देश की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे। यह संयोग भी है कि पुस्तक के बहुत से लेख ‘नवनीत’ में छपे थे। अपनी इस पुस्तक के शीर्षक के साथ लेखक ने लिखा है—‘विज्ञान को मथकर निकाली गई लुभावनी लोनी। बड़ी स्वादिष्ट होती है लोनी। देर तक जीभ पर स्वाद बना रहता है। ऐसा ही स्वाद इन लेखों का भी है।’ 
    प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत लेखों से यह बात सहज ही समझ आ जाती है कि लेखक सिर्फ लिखना ही नहीं चाहता, कुछ सार्थक रचना चाहता है। सार्थकता की गंध इस पुस्तक के हर पन्ने पर अनुभव की जा सकती है। 
    —विश्वनाथ सचदेव
  • Khushboo Ka Libas
    Kanhiya Lal Nandan
    1500 1350

    Item Code: #KGP-907

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    380 342

    Item Code: #KGP-9341

    Availability: In stock

    कालजयी कृति ‘राग दरबारी’ के महान् रचनाकार श्रीलाल शुक्ल युगांतरकारी व्यंग्यकार हैं। उनका व्यंग्य लेखन ‘सुबुक सुबुक वादी’ भावुकता और जड़ीभूत जीवनदृष्टि के प्रतिरोध से प्रारंभ होता है। साहित्य में ‘प्रतिभा’ क्या होती है, यह श्रीलाल शुक्ल को पढ़कर जाना जा सकता है। वे पूर्वानुमानित या राजनीति से उत्सर्जित विषयों की ओर कभी नहीं गए। उनके द्वारा रचे गए व्यंग्यों के शीर्षक ही यह बताने के लिए यथेष्ट हैं कि समाज, संस्कृति, साहित्य और साहित्य के धूसर धुंधली इलाकों से होकर वे किस तरह गुजरते हैं। क्लासिक व्यंग्य लेखन के सर्वोत्तम उदाहरण देतीं श्रीलाल शुक्ल की रचनाएं अविस्मरणीय हैं। भाषा के अनेक विस्मयकारी प्रयोग उन्होंने  किए हैं। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल और ज्ञान चतुर्वेदी व्यंग्य रचना में प्रत्युत्पन्नमति, वचनवक्रता, समासोक्ति, अन्योक्ति आदि के लिए विशेषतः उल्लेखनीय हैं। श्रीलाल शुक्ल विश्व साहित्य में व्यंग्य की परंपरा के अद्भुत ज्ञाता थे। उनके व्यंग्य विश्वस्तरीय व्यंग्य साहित्य में प्रसन्नतापूर्वक शामिल किए जा सकते हैं। मनुष्य मन के अतल में छिपी प्रवृत्तियों को उजागर करते हुए उन्होंने व्यापक सभ्यता समीक्षा की है। 
    ‘व्यंग्य समय’ में श्रीलाल शुक्ल के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और उन्हें पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Usane Kaha Tha Aur Anya Kahaniyan
    Shri Chandra Dhar Sharma Guleri
    150 135

    Item Code: #KGP-9078

    Availability: In stock


  • Bonsai
    Bhagwan Vaidya 'Prakhar'
    250 225

    Item Code: #KGP-BONSAI

    Availability: In stock

    आर्य स्मृति साहित्य सम्मान(2018) से सम्मानित लघुकथा-संग्रह 
  • Samagra Naatak : Kusum Kumar
    Kusum Kumar
    1200 1080

    Item Code: #KGP-9379

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता के बाद हिंदी नाटक के इतिहास में कुसुम कुमार एक अत्यंत प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। इनके नाटक सुविधाजनक रचनाकर्म नहीं, निरंतर संघर्ष, संताप आदि प्रयोगों का परिणाम हैं। इनमें महज स्त्री-स्वर ही मुखर नहीं हुआ बल्कि अपने समय, समाज और परिवेश के अनिवार्य प्रसंगों से बराबर जूझते नजर आते हैं। 
    समग्र नाटक में संकलित कुसुम कुमार के आठों नाटक समय-समय पर देश भर में चर्चित व प्रशंसित रहे हैं और अनुभवी निर्देशकों द्वारा बार-बार मंचित हुए हैं। ‘रावण-लीला’, ‘संस्कार को नमस्कार’, ‘दिल्ली ऊंचा सुनती है’, ‘सुनो शेफाली’ तथा ‘लश्कर चैक’ आदि ये सभी नाटक अपने साथ एक नवीन कथ्य और परिवेश की खोज करते हुए रचनात्मक परिणाम देते हैं। 
    कुसुम कुमार के नाटकों को श्रेष्ठतम नाटकों में गिना जाता है। इसीलिए इनका कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुआ है, जिससे इनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। ये नाटक सामाजिक सरोकारों की कथावस्तु को एक ऐसा ज्वलंत और साथ ही रोचक स्वरूप देते हैं जो दर्शकों को लगातार बांधे रखता है। मानवीय समस्याएं और मानव संबंधों की गहन पड़ताल भी इनके नाटकों की विशेषता है। इनका बहिरंग प्रायः काॅमेडी होते हुए भी, सरोकार बेहद मानवीय और संवेदनशील है। एक ओर यहां समाज में चला आ रहा नाटक के पीछे का नाटक बेनकाब होता है तो दूसरी ओर दमित वर्ग अपनी विशिष्ट पहचान के साथ मुखर होता है। यह कहना आवश्यक है कि इन नाटकों का स्वर और स्वरूप आधुनिक सोच की खुली भाषा और चुस्त संवादों में सहज ग्राह्य और दर्शकों के बीच प्रिय है। 
    डाॅ. कुसुम कुमार के नाटकों का संकलन पाठकों की सुविधा के लिए एक जिल्द में पहली बार प्रकाशित हो रहा है। समग्र नाटक सभी सांस्कृतिक संस्थाओं, नाट्य मंडलियों, अकादमियों, पुस्तकालयों एवं शोधर्थियों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक। 
  • Akshardveep
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    425 383

    Item Code: #KGP-2013

    Availability: In stock

    अक्षरद्वीप
    अक्षरद्वीप’ आज के मूल्यों के अंतर्गत रामकथा के ‘सुंदरकांड’ का एक पुनर्पाठ है। इस उपन्यास में वैदेही, रावण और महावीर की भूमिकाएँ जिन सीमाओं तक संघातपूर्ण हैं, वे आज के अतिरिक्त अतीत की भी पहचान हैं। यह मनुष्य का निरंतर जारी एक असमाप्य प्रयास है। अगर आज हम ‘अक्षरद्वीप’ की कथाभूमि को कुछ सीमा तक व्याख्यायित कर पाए, कथाकार शायद किसी न किसी तरह पंक्ति-दो पंक्ति तक कुछ आगे निकल गया।
    प्रणव कुमार वंद्योपाध्याय आज के तमाम हिंदी कथाकारों में कहाँ खड़े हैं, कहना कठिन होगा। फिर भी, हम कह सकते हैं कि आज के परिप्रेक्ष्य में लेखक को मनुष्य और समय की पहचान किसी सीमा तक आकर खड़ी हो गई। कल की प्रतीक्षा में। संभवतः किसी न किसी प्रकार की लाग-लपेट के बिना कथाकार अपनी खोज से उस बिंदु तक पहुँच गया, जो है संसार का आदि आख्यान। असमाप्य भी।
    अक्षरद्वीप’ किसी हद तक मनुष्य की एक यात्रा भी है। यात्रा के अतिरिक्त पृथ्वी का एक अनकहा इतिहास भी, जो प्रतिक्षण अपना सब कुछ बदल रहा है।
  • Vah Chhathavan Tattva
    Om Bharti
    125 113

    Item Code: #KGP-1861

    Availability: In stock

    वह छठवाँ तत्त्व 
    जिसे मेरी कविताएँ पसंद नहीं
    उसकी भी कोई कविता
    पसंद है ज़रूर मुझे—
    ओम भारती के नए संग्रह की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ विनम्रता नहीं, उसकी रचनात्मक सचाई की सूचक हैं। इन कविताओं से गुज़रने के बाद मुझे लगा कि यह एक ऐसे वयस्क कवि का संग्रह है, जिसमें चीज़ों को निकट से जानने, चुनने और अपनी संवेदना का हिस्सा बनाने की एक उत्कट इच्छा है और अपने आज़माए हुए नुस्ख़ों और औज़ारों को फिर से जाँचने-परखने की एक सच्ची ललक भी। यही बात संग्रह की कविताओं को पठनीय बनाती है। इस कवि के अनुसार– कविता वह होती है, जिसमें भेद छुपे हेते हैं, जो भेद खोल देते हैं। इसका सबसे विश्वसनीय उदाहरण है इस संग्रह की वह कविता, जिसका शीर्षक है ‘इस संशय के समय में’। विक्रम सेठ के ‘सुटेबुल ब्वाय’ की तरह यह बहन के लिए एक अच्छे वर की तलाश की कविता है—
    अच्छे लड़के नहीं हैं कहीं भी
    हों भी तो शायद खुद उन्होंने
    असंभव कर रखा है ढूँढ़ लिया जाना अपना।
    और फिर कविता के उत्तरार्द्ध में निष्कर्षतः यह कि—
    इस संशय के समय में
    क्या अच्छाई खो चुकी तमाम आकर्षण?
    इस कविता का अंत दिलचस्प है और थोड़ा विडंबनापूर्ण भी, क्योंकि कवि को लगता है—‘अच्छे लड़के नहीं हैं अथवा हैं तो वे इस कवि से कहेंगे—बेवकूफ़, हमसे तो मिला होता लिखने से पहले।’ यह एक गंभीर विषय को हलके-फुलके ढंग से कहने का अंदाज़ है, जो कविता को एक नया तेवर देता है।
    इस संग्रह की अनेक कविताओं में एक चुभता हुआ व्यंग्य है और कवि के पास उसे व्यक्त करने का चुहलभरा कौशल भी। इस दृष्टि से कई और कविताओं के साथ-साथ ‘निरापद’ कविता ख़ास तौर से पठनीय है, जो इस प्रगतिकामी कवि की लगभग एक आत्मव्यंग्य जैसी कविता है। कवि की यह खेल जैसी शैली एक तरह से इस पूरे संग्रह के चरित्र-लक्षण को निर्धारित करती है। ‘इस तरह भोपाल’ कविता इसका एक प्रतिनिधि नमूना है, जिसकी शुरू की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
    जहाँ भोपाल—
    वहाँ अब संख्या और किलोमीटर नहीं हैं
    मगर वहाँ भी एक तीर की नोक से,
    आगे है भोपाल
    उस जगह न कोई खंभा,
    न कोई तख़्ती और न ही संकेत
    कि यह है, क़सम हुज़ूर, यही तो है—
    भोपाल!
    मध्यप्रदेश की कहन-शैली के रंग में ढली हुई ये कतिवाएँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करेंगी और बेशक काव्य-मर्मज्ञों का भी।
  • Vipradas (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    90

    Item Code: #KGP-1404

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Savyam Prakash
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-56

    Availability: In stock

    भारतीय श्रमिक तथा वंचित वर्ग के कथा-नायकों को जो सत्कार तथा पक्षधरता स्वयं प्रकाश की कहानियों में मिली है, वैसे उजले उदाहरण समकालीन हिंदी कहानी में गिने-चुने ही हैं । इन वंचित वर्गों के स्वपनों को दुःस्वप्नों में बदलने वाली कुव्यवस्था को यह कथाकार केवल चिन्हीत ही नहीं करता, बल्कि इसके मूल में बसे कुकारणों को पारदर्शी बनाकर दिखाता है तथा उस जाग्रति को भी रेखांकित करता है जो कि अंतत: लोक-चेतना का अनिवार्य तत्त्व है । और खास बात यह है कि इस सबके उदघाटन-प्रकाशन में यहाँ लेखक जीवन के हर स्पंदन और उसके आयामों पर कहानी लिखने को उद्यत दिखाई पाता है । अर्थात् सम्यक् लोकचेतना की 'साक्षरता' इन कहानियों में वर्णित जीवन में यथोचित पिरोई गई है ।
    कहानी की कला की गुणग्राहकता से लबरेज ये कहानियां विचारधारा के प्रचार और सदेश के 'उपलक्ष्य' को मिटाकर व्यवहार के धरातल तक पाठक को सहज ही ले जाती है । पात्रों की आपबीती को जगबीती बनाने का संकल्प यहाँ प्रामाणिक रूप में उपस्थित हुआ है।
    स्वयं प्रकाश द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं-'नीलकांत का सफर', 'सूरज कब निकलेगा', 'पार्टीशन', 'क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा ?', 'नैनसी का धूड़ा', 'बलि', 'संहारकर्ता', 'अगले जनम', 'गौरी का गुस्सा' तथा 'संधान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक स्वयं प्रकाश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshatkaar : Nagarjun
    Nagaarjun
    300 270

    Item Code: #KGP-15

    Availability: In stock


  • Dus Baal Naatak (Paperback)
    Pratap Sehgal
    120

    Item Code: #KGP-376

    Availability: In stock

    दस बाल नाटक
    ये नाटक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जिन कहानियों से प्रेरित हैं, उन कहानियों का समय वह समय है, जिसे हम भारत के  पुनर्जागरण और आजादी के संघर्ष का समय कहते हैं। भारत के अन्य इलाकों की अपेक्षा बंगाल में शिक्षा को व्यवस्था बेहतर थी, लेकिन आज के मुकाबले में उस शिक्षा-व्यवस्था को भी हम पिछड़ा हुआ ही कहेंगे।  ऐसे ही समय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व दुनिया को  चौका देता हैं। अपनी अन्य कलात्मक कियाओं के साथ-साथ वे बच्चों को कभी नहीं भूले। उन्होंने एक जगह कहा भी है कि बच्चा बडों का पिता होता है। यानी हम आने वाली हर पीढ़ी से कुछ सीखते हैं और कुछ सिखाते हैं।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बाल-कहानियों में सन्देश स्पष्ट हैं। ये संदेश बच्चों की अपेक्षा उनके अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अधिक हैं। अपना संदेश समाज तक पहुँचाने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर बच्चे को भी एक व्हीकल की तरह से इस्तेमाल करले हैं। कहानी का पाठक भल ही मौजूद हो, लेकिन उसका दर्शक नहीं होता। इसलिए प्रताप सहगल ने इन कहानियों को यहाँ लघु नाटकों के माध्यम से रखा है।  प्रताप सहगल हिंदी के जाने-माने कवि-नाटककार हैं। उन्हें भी अपन बहुविध लेखन के लिए जाना जाता हैं। इससे पूर्व उनके बाल-नाटकों की एक किताब 'छूमंतर' ( किताबघर प्रकाशान) प्रकाशित होकर मकबूल साबित हुई है। इसका प्रमाण उसके लगातार छपने चाल संस्करण हैं। इस बार प्रताप सहगल ने गुरुदेव की बाल-कहानियों का अपनेबाल-नाट्य-लेखन का आधार बनाया है। ये नाटक जहाँ अपने समय में अवस्थित हैं, वहीं वे हमारे समय के साथ भी जुड़ जाते हैं और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इनकी उपयोगिता बनी रहेगी।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रताप सहगल-दोनों के कन्सर्न्स का जानने के लिए दस बाल-नाटकों का यह संग्रह हर बड़े  और हर बच्चे के लिए एक जरूरी किताब बन जाता है।
  • Yaadon Ke Galiyaare Se
    Ramesh Chandra Diwedi
    180 162

    Item Code: #KGP-9321

    Availability: In stock

    साहित्य समाज का दर्पण है। काव्य समाज का स्वरूप है। समाज के अनुरूप ही काव्य की रचना होती है। यह धारणा अनादिकाल से चली आ रही है, जो आज भी चरितार्थ है। काव्य और साहित्य का अन्योन्याश्रय संबंध है। अद्यतन कवि की रचना संसर्ग से प्रभावित होती है। चूँकि कवि भ्रमणशील होते हैं, इसलिए संसर्ग गुणों का प्रभाव उन पर पड़ता ही है। ‘संसर्गजा दोष गुणा भवंति’ यह सूक्ति सार्थक प्रतीत होती है। साथ ही आज काव्य की रचना समाज की माँग के अनुरूप होती है। कवि जब आत्मा की आवाज को सुनकर रचना करता है, तब वह हृदयस्पर्शी हो जाता है। कवि की कवित्व शक्ति अनंत होती है। यह पूर्व संस्कारों से मिलती है। ‘नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा, कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा’।
    ब्रह्मा की सृष्टि में केवल छह रस होते हैं—कटु, अम्ल,कषाण, लवण, तिक्त तथा मधुर किंतु कवि की सृष्टि में  शृंगार, हास, करुण, रौद्र, वीर, बीभत्स, अद्भुत, भयानक और शांत नौ रस होते हैं। कवि अपने संकल्प मात्र से ही किसी रस का आवाहन कर सकता है, पर ब्रह्मा के रस को प्राप्त करने के लिए अन्यान्य उपकरणों की आवश्यकता होती है। कवि का अपना एक काव्य लोक होता है। काव्य कल्पना पर आधरित है। कल्पना का आधर सत्य है। यह आधर कवि को समाज से प्राप्त होता है।
    कविता, कवि के हृदय की वह ध्वनि है, जो मुँह से अथवा लेखनी से निकलते समय कवि को भी अचेत कर देती है। सुनने के बाद ही कवि को भी पता चलता है कि उसने क्या कहा। ऐसी ही कविता काव्य लोक में समादृत होती है।
    आज शहरी सामाजिक जीवन तथा संस्कृति में सिमटा भारत गाँव की ओर उन्मुख हो रहा है। ग्रामीण भारत को शहर में लाने का प्रयास कर रहा है। सरकारी तंत्रा भी ग्रामीण विकास पर अधिकाधिक बल दे रहा है। महात्मा बुद्ध ने भी राजभवन छोड़कर शांति के लिए ग्राम और वन की ओर प्रस्थान किया था। इस सामाजिक परिवेश में रचित यह काव्य संग्रह समाज और परिवारों के उन अनछुए स्वरूप को सामने लाया है, जो बुध जन हृदय के किसी कोने में दम तोड़ रहा था।
    —रमेश चन्द्र द्विवेदी

  • Bhartiya Naitik Shiksha : 2
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-266

    Availability: In stock

    जीवन एक अनुपम उपहार है। इसमें आपत्तियों से घबराकर कायरों की भाँति पलायन करने की अपेक्षा समस्याओं का नीतिपूर्वक सामना करने से सुख-शांति व समृद्धि का सृजन होता है। नीतिपूर्वक व्यवहार करने की शिक्षा देने का कार्य नैतिक शिक्षा का है। नैतिक शिक्षा ही वास्तव से वह शिक्षा है, जो विद्यार्थी को समाज तथा राष्ट्र यहाँ तक कि संपूर्ण मानवता के लिए अपना जीवन उपयोगी बनाने की शिक्षा देती है, अर्जित ज्ञान को व्यावहारिक रूप प्रदान कर जीवन के संघर्षों को समझने और उनसे जूझने की क्षमता देती है । मूल्यों एवं संस्कृति की सुरक्षा के साथ वांछित ज्ञान प्रदान करने की दक्षता नैतिक शिक्षा में ही अंतर्निहित है।
    नैतिक शिक्षा की यह जो पुस्तक आपके हाथ में है, वह स्वाध्याय के लिए है, मनन के लिए है और बार-बार चिंतन करने के लिए है। केवल छात्र जीवन के लिए ही नहीं अपितु संपूर्ण जीवन के लिए है ।
    जीवन की समस्याओं और चुनौतियों का सामना महापुरुषों ने किस प्रकार किया, इस पुस्तक द्वारा आप उसका अध्ययन कर अपना हौसला बढा सकेंगे ताकि उनका समाधान करने में आप सशक्त हो सकें । इस पुस्तक का अध्ययन इस दृष्टि से आपको स्वयं करना है।
    अपने अन्तर्मन में झांककर देखने में हममें बहुत-सी कमियां और अच्छइयां देखने को मिलेंगी। इनके शोध से ही हम अपने व्यक्तित्व को पहचान सकते हैं । स्वयं को जानकर ही हम अपने लक्ष्य को जान सकते हैं ।
  • Guru Nanak Dev
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-131

    Availability: In stock

    मानवता को सत्पथ पर ले जाने के लिए ईश्वर महान् आत्माओं को धरती पर भेजता है । गुरू नानक देव एक ऐसे ही महान् आत्मा थे, जिन्होंने मानव मात्र के कल्याण के लिए अपने जीवन को तपाया । उन्होंने जग की भलाई के लिए स्वयं नाना प्रकार के कष्ट झेले । वे ऐसे महापुरुष थे, जो जाति-पांति के भेदभाव से दूर रहते थे । उनका सादा जीवन लोक-कल्याण के लिए ही था । वे जीवन को सोने की भाँति तपाकर विश्व का कल्याण करते थे ।
    गुरू नानक देव की शिक्षाएं हमें जीवन में उत्तम मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं । उन्होंने मनुष्य मात्र को अच्छाइयों को स्वीकार करने की प्रेरणा दी । बुराइयों से दूर रहने की बात उन्होंने सर्वत्र कही । वे दया, क्षमा, करुणा, प्रेम और बंधुत्य  शिक्षा देते थे ।
    वे मानव मात्र को भलाई के मार्ग पर चलने की शिक्षा देते थे । उनकी दृष्टि में न काई छोटा था, न बड़ा, सभी समान थे ।
  • Kanhaiyalal Nandan : Rachna-Sanchayan
    Krishna Dutt Paliwal
    595 536

    Item Code: #KGP-9047

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rabindra Nath Thakur
    Rabindra Nath Thakur
    250 225

    Item Code: #KGP-622

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रस्तुत संकलन में जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अनधिकार प्रवेश', 'मास्टर साहब', 'पोस्टमास्टर', 'जीवित और मृत', 'काबुलीवाला', 'आधी रात में', 'क्षुधित पाषाण', 'अतिथि', 'दुराशा' तथा 'तोता-कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar
    Ajit Kumar
    160 144

    Item Code: #KGP-419

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'अपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Saadat Hasan Manto
    Saadat Hasan Manto
    350 315

    Item Code: #KGP-823

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सआदत हसन मंटो ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'स्वराज्य के लिए', 'हतक', 'मेरा नाम राधा है', 'बाबू गोपीनाथ', 'मम्मी', 'मम्मद भाई', 'जानकी', "मोजेल', 'सियाह हाशिए' तथा 'टोबा टेकसिंह'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सआदत हसन मंटो की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Swami Punitachari
    Chandrika Prasad Sharma
    90 81

    Item Code: #KGP-1868

    Availability: In stock

    अचानक, सदगुरु भगवान दत्त के शरीर से एक तेजस्वी प्रकाश पुंज निकलकर पुनीताचारी जी के शरीर में समा गया । भगवान दत्तात्रेय ने अपना तेज, अपना ओज, अपनी आभा पुनीताचारी जी में प्रविष्ट कराकर पुनीताचारी जी को अपने समान ओजस्वी बना लिया । आज एक गुरु ने अपने शिष्य को सम आसन पर बैठा लिया । बारंबार नमनीय हैं ऐसे सदगुरु भगवान दतात्रेय महाराज और धन्य हैं ऐसे शिष्य पुनीताचारी जी महाराज ।
    ---
    बापूश्री इतना कहकर दो पल रुके और पुन: बोले, "फिर सत्य क्या है? स्वरुप तो कोई भी सत्य नहीं है, चाहे वह मानव का हो, दानव का हो, या कि ब्रह्मराक्षस का ही क्यों न हो। यह सभी स्वरूप जीवन का प्रतीक हैं । और यदि जीवन है तो मरण भी है । मरण का अर्थ किसी भी स्वरूप के अस्थायित्व से है, उसके मिट जाने से है । अमरत्व तो किसी भी स्वरूप में नहीं है । मिट जाना ही उसकी नियति है । यानी दृष्टि की परिधि में बँधे सभी स्वरूप अस्थायी हैं । अजरता और अमरता तो किसी में भी नहीं है ।"
  • Manjhi Na Bajao Vanshi
    Om Bharti
    225 203

    Item Code: #KGP-1883

    Availability: In stock

    माँझी! न बजाओ वंशी
    केदारनाथ अग्रवाल के जीवन और कविता दोनों में एक अनिंद्य प्रेम का भाव विराजता है। जो जीवन में है वह कविता की परिधि से बाहर नहीं है। जहां लोग दांपत्य प्रेम को जीते हुए अपने उत्तरवर्ती जीवन तक आकर ऊब का अनुभव करने लगते हैं, वहीं केदार जी आजीवन इस प्यार से बँधे-बिंधे रहे। हिंदी की काव्य परंपरा में प्रेम का अनूठा और अद्वितीय स्थान है पर है वह परकीया प्रेम से बँधा हुआ। आधुनिक कवियों में  केदारनाथ अग्रवाल का एक विरल उदाहरण है जहाँ वे दांपत्य प्रेम में ही लौकिक-अलौकिक सुखों की अपूर्व व्यंजना कविताओं में संभव करते हैं। जमुन जल तुम जैसा संग्रह तथा अन्य संकलनों की प्रेम कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने प्रेम को दांपत्य की सुखद अनुभूतियों और संवेदना से भरा है। छायावादियों में जो प्रेम लौकिक धरातल से ऊपर उठकर दार्शनिक उपपत्तियों में पर्यवसित हो गया था, सूफी कवियों के यहाँ जो प्रेम ईश्वरीय सत्ता से लगन का पर्याय बन गया है, वह केदारनाथ अग्रवाल जैसे प्रगतिवादी कवि के यहाँ लोक में उपलब्ध प्रेम की कर्मठ जिजीविषा का पर्याय है।
    प्रेम केदारनाथ अग्रवाल की दिनचर्या का ही एक अंग रहा है। वह जीवन की मांसपेशियों में रुधिर की तरह प्रवाहित है। प्रेममय जीवन के सारे काम जीवन के काम हैं। कुरते में बटन नहीं लगी, ऊपर से वह फटा हुआ है, सारा घर अस्त-व्यस्त हो उठा है, न सोपकेस में साबुन, न तेल की एक बूँद, न खोजने से मिल पाता रूमाल, मेजपोश पर धूल, किताब पर प्याला, कॉपी पर औंधा रखा गिलास-कवि अधीर होकर संबोधित करता है पत्नी को कि घर सँवारने कब आओगी। घर की सारी शिष्ट सँवरन पत्नी की देन है-पत्नी जो प्रिय है, जिसके होने से जीवन है।
    कभी ठाकुर प्रसाद सिंह ने ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’ लिखकर रोमानी अनुभूतियों के प्रदेश में एक हलचल मचा दी थी। ‘वंशी और मादल’ के इस गीत को नवगीत के स्थापत्य में नवता के उन्मेष के रूप में देखा गया। गीत स्निग्धता के लिए जाने जाते रहे हैं, उनकी कोमल पदावलियों को केदारनाथ अग्रवाल ने अपने कवि-जीवन में एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में ग्रहण किया है। आज भी हम उनकी कविताएँ पढ़ते हैं तो लगता है, माँझी कहीं दूर वंशी बजा रहा है और उसकी टेर हमारे भीतर सुनाई दे रही है। वह किसी कान्हा की बाँसुरी से कम नहीं है। जीवन में प्रेम हो तो समूची कविता मानवीय प्रेम की व्यंजना में बदल जाती है। केदार जी ने कविता में यही किया है।
     यह संग्रह केदारनाथ अग्रवाल की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Saakshi
    Bhairppa
    295 266

    Item Code: #KGP-875

    Availability: In stock

    यह उपन्यास 1986 की सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ कृति के रूप में स्वीकृत होकर 'ग्रंथलोक' पुरस्कार से सम्मानित।
  • Raakshas
    Shanker Shesh
    75 68

    Item Code: #KGP-9107

    Availability: In stock

    राक्षस
    राक्षस एक जातिवाचक शब्द ही नहीं, मानसिकता द्योतक शब्द भी है। राक्षस वह है, जो सामान्य मानवीय स्वरूप के विरोध में रहता है ।
    इस नाटक में शंकर शेष ने मनुष्य की इसी वृत्ति को उभारा है । यहाँ रणछोड़दास, सुकालू और दुकालू ऐसे चरित्र हैं जो मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम और द्वेष के संघर्ष को तीव्र करते है और फिर इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि–
    अब नहीं रुकेगा कमल फूल
    अब नहीं गिरेगी
    आने वाले कल की आँखों में धूल
    अब गाँव हमारा नहीं रहेगा
    जड़ पत्थर की नाँव 
    राक्षस अपनी पूरी अमानवीय स्थिति के साथ हमें इस आशा की स्थिति तक एहुंचाता है ।
    शकर शेष द्वारा लिखा गया एक सशक्त नाटक ।

  • Nanaji Deshmukh : Jeevan Darshan (Paperback)
    Gaurav Chauhan
    160

    Item Code: #KGP-481

    Availability: In stock

    इस जीवात्मा ने अपने व्यक्तित्व की कुछ ऐसी अमिट छाप समाज पर छोड़ी कि उनके विषय में समाज और देश को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या साधारण मनुष्य भी दलित, शोषित, पीड़ित व वंचित के दुःखों को दूर कर उनके हृदय में एक ईश्वर, गुरु, प्रेरक, श्रद्धा का स्थान ले सकता है। ऐसी ही एक पवित्र जीवात्मा थे जिन्हें हम नानाजी देशमुख के नाम से जानते हैं। 
    "हम अपने लिए नहीं अपनों के लिए हैं। अपने वे हैं जो सदियों से पीड़ित, शोषित व उपेक्षित हैं।" यह कथन इन्हीं जीवात्मा का था जो आज नानाजी के नाम से इस संसार में याद किए जाते हैं। ऐसा ही कोई विरला व्यक्तित्व इस धरा पर जन्म लेकर इस धरा को पवित्र बनाता है।

  • The Hanuman Factor (Self-Help)
    Anand Krishna
    345 311

    Item Code: #KGP-593

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrilal Shukla (Paperback)
    Shree Lal Shukla
    120

    Item Code: #KGP-44

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : श्रीलाल शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार श्रीलाल शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इस उम्र में', ‘सुखांत', "सँपोला', 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल', 'शिष्टाचार', 'दंगा', 'सुरक्षा', 'छुट्टियाँ', 'यह घर मेरा नहीं' तथा 'अपनी पहचान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mori Ki Int
    Madan Dikshit
    150 135

    Item Code: #KGP-9073

    Availability: In stock


  • Datta
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-575

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    215 194

    Item Code: #KGP-2033

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : नरेन्द्र कोहली
    ऐसा कभी-कभी ही होता है कि आपका कोई पाठक, मित्र, समीक्षक, छात्र या कोई वास्तविक जिज्ञासु किसी प्रयोजन से या मात्र अपनी जिज्ञासा-शांति के लिए अपने सतह को कुछ छीलकर आपको तह तक नहीं तो कम से कम आपकी त्वचा के नीचे तक जानना चाहता है । वह लेखक के मानसिक संसार को उघाड़ना चाहता है । और मैंने प्रायः देखा है कि उस प्रकार की जिज्ञासा लिए हुए प्रश्नों का उत्तर मेरे पास भी बना-बनाया, तैयार नहीं होता । मुझे भी स्वयं अपने आप को टटोलना पाता है । अपने मानसिक संसार को पढ़ना पड़ता है । आश्चर्य होता से कि मैं तो स्वयं ही अपने आप को नहीं जानता था । नहीं जानता था कि मेरा 'स्व' क्या है । वे ऐसे प्रश्न होते हैं, जिनके माध्यम से लेखक स्वयं अपना आविष्कार करता है । अपने 'स्व' से परिचित होता है । उन प्रश्नों का उपकार मानता है कि उन्होंने उसे स्वयं अपने आप से परिचित कराया ।
    मेरा प्रयत्न है कि इस पुस्तक के माध्यम से कुछ ऐसे ही साक्षात्कार अपने पाठकों तक पहुंचा सकूँ । समय है कि वे उस लेखक नरेन्द्र कोहली को कुछ जान सकें, जो सामने पड़ने पर, मिलने-जुलने पर सामान्यत: आपसे मिलता नहीं है । वह नरेन्द्र कोहली अपने एकांत से है, जो सामान्यता सार्वजनिक रूप से सामने आना नहीं चाहता । आत्मीय जनों से मिलना और बात है और राह चलते लोगों को दिखना और । फिर भी...
    -नरेन्द्र कोहली
  • Kavi Ne Kaha : Naresh Saxena
    Naresh Saxena
    190 171

    Item Code: #KGP-446

    Availability: In stock

    नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के ऐसे कवि हैं, जिनकी गिनती बिना कविता-संग्रह के ही अपने समय के प्रमुख कवियों में की जाने लगी।
    एक संग्रह प्रकाशित होते-होते उच्च माध्यमिक कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाए जाने लगे। पेशे से इंजीनियर और फिल्म निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही संगीत, नाटक आदि विधाओं में गहरा हस्तक्षेप। संभवतः यही कारण है कि उनकी कविताएँ अपनी लय, ध्वन्यात्मकता और भाषा की सहजता के कारण अनगिनत श्रोताओं, पाठकों की शुबान पर चढ़ गई हैं। वैज्ञानिक संदर्भों ने न सिर्फ उनकी कविताओं को मौलिकता प्रदान की है बल्कि बोलचाल की भाषा में उनके मार्मिक कथन, अभूतपूर्व संवेदना जगाने में सपफल होते हैं। निम्न उद्धरण इसका प्रमाण है--
    पुल पार करने से, पुल पार होता है
    नदी पार नहीं होती
    या 
    शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है
    बाद में सीखेगा भाषा
    अभी वह अर्थ समझता है
    या 
    बहते हुए पानी ने पत्थरों पर, निशान छोड़े हैं
    अजीब बात है
    पत्थरों ने, पानी पर
    कोई निशान नहीं छोड़ा
    या 
    दीमकों को पढ़ना नहीं आता 
    वे चाट जाती हैं / पूरी किताब
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Malti Joshi
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-55

    Availability: In stock


  • Navjaagran Aur Mahadevi Verma Ka Rachana-Karm Stri-Vimarsh Ke Svar
    Krishna Dutt Paliwal
    445 401

    Item Code: #KGP-624

    Availability: In stock

    नवजागरण और  महादेवी वर्मा का रचना-कर्म स्त्री-विमर्श के स्वर
    महादेवी वर्मा के जन्मशताब्दी वर्ष में यह सोचकर हृदय में  पीडा होती है कि उन जैसी भारतीय स्वाधीनता-आंदोलन की लय से निमग्न कवयित्री के साथ हिंदी-आलोचना के मर्दवाद ने ऐसा सलूक क्यों किया?
    उनके सृजन के नवजागरणवादी  पक्ष को अनदेखा करते हुए 'रहस्यवाद-अध्यात्मवाद' में लपेटकर उसे पूरी तरह छिपा दिया गया । आखिरकार क्यों?
    ऐसा क्यों हुआ कि देश और समाज के लिए किया गया उनका मौन-मुखर विद्रोह पूरी तरह 'विस्मृति' के अंधकार में धकेल दिया गया ?
    आज इस स्थिति पर दूर तक स्त्री-विमर्श की अवधारणाओं से सोचने की ज़रूरत है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheep Singh (Paperback)
    Mahip Singh
    80

    Item Code: #KGP-7016

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : महीप सिंह
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार महीप सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उलझन', 'पानी और पुल', 'कील', ‘सीधी रेखाओं का वृत्त', 'शोर', 'सन्नाटा', 'सहमे हुए', 'धूप के अंगुलियों के निशान', 'दिल्ली कहाँ है?' तथा 'शोक'। 
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महीप सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Shankar Shesh : Samagra Naatak (3 Vols.)
    Shanker Shesh
    1600 1440

    Item Code: #KGP-725

    Availability: In stock

    शंकर शेष: समग्र नाटक (3 खण्डों में)
    डॉ. शंकर शेष हिंदी नाट्य साहित्य के अत्यंत प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। पार्थिव शरीर से हमारे साथ न होते हुए भी अपनी रचनाओं के माध्यम से वे निरंतर अपने पाठकों के मन में रहते हुए एक संवाद में लीन अनुभूत होते हैं। 
    डॉ. शेष ने लगभग बीस पूर्ण अंकी नाटक, एकांकी, उपन्यास और कुछ लेख आदि लिखकर साहित्यिक जगत् में जितनी प्रतिष्ठा अर्जित की, चलचित्र जगत् में पटकथा लेखक के रूप में वे उससे कम चर्चित नहीं रहे, बल्कि उनकी विशेषता रही कि उन्होंने सिनेमा जगत् में कम काम किया, किंतु उसके लिए कोई समझौता नहीं किया।
    प्रस्तुत ‘शंकर शेष: समग्र नाटक’ (तीन खंड) में उनके प्रकाशित-अप्रकाशित सभी नाटक-एकांकी संकलित हैं। केवल शेष वही रहा है, जिसका रूप इतना अधूरा था कि उसे पूरा करते तो फिर वह डॉ.  शेष का न रहकर संशोधक या पूरा करने वाले का हो जाता।
    डॉ.  शेष के जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ उनकी रचनाधर्मिता में भी वह उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है और वह व्यक्ति जितना सहज था, इसका प्रमाण भी उनकी रचनाओं में बिखरा पड़ा है। प्रस्तुत तीन खंडों में उनका नाटककार रूप संश्लिष्ट होकर पाठक के सामने आता है। 
    हमें आशा ही नहीं, विश्वास है कि इन खंडों में पाठकों को शंकर शेष की रचनात्मकता के कई स्तर और आयाम मिलेंगे।
  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan
    Sudha Arora
    400 360

    Item Code: #KGP-909

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है।
  • Mere Saakshatkaar : Prabhakar Shrotriya
    Prabhakar Shrotiya
    175 158

    Item Code: #KGP-2035

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : प्रभाकर श्रोत्रिय
    मैं एक लेखक से अधिक एक मनुष्य होना श्रेयस्कर मानता हूँ। अध्यापन तो अपने में ही एक बादशाहत है, परंतु यहीं से हटकर प्रशासन में संयोगवश मुझे दूसरे नंबर पर नहीं रहना पड़ता । फिर वह भोपाल हो, कलकत्ता हो या दिल्ली । चाहा यही कि इन सर्वोच्च पदों की गरिमा को न गिरने दूं, लेकिन अपने को ऐसा ढालूँ कि इन पदों से उतरने पर मुझे ऐसा न लगे कि किसी पद पर था, जिस पर अब नहीं हूँ। और इस 'पद' का अर्थ मेरे लिए सिर्फ पाँव हो-जो अपनी ज़मीन पर टिका है ।
    मैं अकसर उन लोगों पर लिखना चाहता रहा हूँ जो चुनौती बनते है या उपेक्षित होते हैं । शमशेर बहादुर सिह की कविता पर इसीलिए लिखा। वह हिंदी के सबसे जटिल कवि हैं। मैथिलीशरण गुप्त को कोई कवि नहीं मान रहा था, तब उन पर एक पुस्तक अलग ढंग की लिखी । छायावाद के मूल्यांकन में जब बेहद बीहड़ता थी, तब छायावाद पर लिखा । प्रसाद पर लिखा, नरेश मेहता पर लिख रहा हूँ ।
    ० 
    पत्रिका के स्तरीय पाठक के अलावा भी पाठकों का एक वर्ग होता है, जो साहित्य के प्रति उत्सुक होता है । इसलिए कुछ ऐसी रचनाएँ भी होनी चाहिए, जिनके जरिए ऐसे पाठक पत्रिका में प्रवेश कर सकें, उनका संस्कार हो सके । पत्रिका के महत्त्व की एक कसौटी यह भी है कि वह कितनी प्रतिभाओं को सिरजती और प्रोत्साहित करती है । कई अच्छे लेखक पत्रिकाओं के निर्माण होते है ।
    ० 
    व्यावसायिक पत्रिकाओं से जुडी हुई संपादक की संस्था भी बहुत कमजोर हो गई है। पत्रिकाएं हमेशा संपादक के बलबूते पर ही निकलती और यशस्वी होती है । 'सरस्वती' से लेकर 'सारिका' और 'धर्मयुग' का यहीं इतिहास रहा है । लोकप्रिय पत्रिकाओं को भी दोयम और दृष्टिहीन संपादक नष्ट का देते हैं । 

    [प्रभाकर श्रोत्रिय द्वारा प्रश्नोंत्तर के कुछ अंश]
  • Hindi Bhasha Prakriti, Prayog Aur Shikshan
    Hiralal Bachhotia
    200 180

    Item Code: #KGP-714

    Availability: In stock

    भाषा वह है, जिसे हम बोलते हैं। वह हमें उत्तराधिकार में मिली चीज हैं। इसलिए हम उसकी कम परवाह करते हैं। उसकी प्रकृति और प्रकार्य जानने की कोशिश भी कम ही की जाती है। लेकिन हिंदी बोलने और सीखने की इच्छा रखने वालों की संख्या विभिन्न कारणों से निरंतर बढ़ भी रही है। दुनिया-भर में इसके बोलने/सीखने वाले बढ़ रहे हैं। वह दिन भी दूर नहीं, जब हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यताप्राप्त भाषा होगी। अतः हिंदी की प्रयोग संबंधी बारीकी जानने की उत्सुकता बढ़ रही है। भाषा का मुख्य प्रयोजन संप्रेषण है। प्रभावशाली संप्रेषण के लिए भाषा के प्रायोगिक बिंदुओं, ध्वनिव्यवस्था आदि की जानकारी अपेक्षित है। वाक् (स्पीच) घटना (इवंेट) के रूप में घटित होती है। विचार या भाव शब्द का जामा पहने हैं। अतः ध्वनि या उच्चारण के ठीक रहने पर ही सही संप्रेषण घटित होता है। हिंदी भाषा की ध्वनि-व्यवस्था अत्यंत वैज्ञानिक है, जिसकी समझ सही उच्चारण में सहायक होती है। हिंदी की एक विशेषता यह भी है कि हम जैसा बोलते हैं, प्रायः वैसा ही लिखते हैं। अतः थोड़े से प्रयास से भाषा के सही प्रयोग पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है। शिक्षण द्वारा बच्चे भाषा-प्रयोग में महारत हासिल कर सकते हैं। पाठ-अध्यापन भाषा के हर तरह के प्रयोग को सीखने और अभ्यास करने का अवसर देते हैं। इसलिए भाषा की प्रकृति, प्रयोग और शिक्षण में अंतर्संबंध के परिप्रेक्ष्य में यह एक विनम्र प्रयास है।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Yashpal
    Yash Pal
    250 225

    Item Code: #KGP-9155

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं यशपाल की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘मक्रील’, ‘नई दुनिया’, ‘प्रतिष्ठा का बोझ’, ‘परदा’, ‘मंगला’, ‘उत्तमी की मां’, ‘ओ भैरवी!’, ‘वैष्णवी’, ‘कलाकार की आत्महत्या’ तथा ‘भूख के तीन दिन’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Sau Baal Kavitayen
    Atri Garg
    75

    Item Code: #KGP-1450

    Availability: In stock


  • Ek Rang Hota Hai Neela
    Meera Sikri
    180 162

    Item Code: #KGP-496

    Availability: In stock

    यात्राएं मनुष्यता का विस्तार करती है। सभ्यता और संस्कृति के जाने कितने सूत्र यात्राओं से जुड़े है। अनुभव, बोध और वैविध्य का सहज समावेश जीवन को प्रशस्त बनाता है; यात्राएं यह अवसर भी देती हैं। 'एक रग होता है नीला' मीरा सीकरी का यात्रा संस्मरण है।
    मीरा सीकरी एक संवेदनशील रचनाकार के रूप में जानी जाती है। स्वाभाविक है कि जब एक रचनात्मक व्यक्ति यात्रा करता है तो केवल भूगोल में प्रवेश या पदार्पण नहीं करता। वह जीवन के न जाने कितने व्यक्त अकथनीय आयामों में यात्रा कर आता है। इस यात्रा संस्मरण में केन्या, अमेरिका, मलेशिया, मॉरीशास के साथ पोर्ट ब्लेयर, लेह-लद्दाख, केरल, अमरकंटक, पांडिचेरी, बनारस आदि से जुड़ी बातें हैं। इन देशी-विदेशी स्थलों पर घूमते हुए वहीं के तमाम प्रसिद्ध प्राकृतिक वैभव का साक्षात्कार करते हुए और समय के कई सिरों को एक जगह मिलते देखते हुए लेखिका एक अनिर्वचनीय आनंद में खो जाती है। लेखिका का विचारशील मन जाने कहां-कहां घुम आता है। वह आलोचनात्मक मन भी है और सौंदर्य-प्रेमी भी। एक जगह मीरा सीकरी लिखती है, 'पोर्ट ब्लेयर की भूमि अपने जख्मों को लाख छिपाने की कोशिश करे, वे छिप नहीं पाते। यद्यपि वे जख्म सूख गए हैं, पर उनके दाग यह बता रहे हैं कि यहां को सांस तो सामान्य हो चुकी है, पर उसके साथ निकलती टीस की ध्वनि को सुने बिना आप रह नहीं सकते।' ये ध्वनियां  वही व्यक्ति सुन सकता है जिसके भीतर इतिहासबोध हो। कहना जरूरी है कि मीरा सीकरी ने देश और काल का तार्किक साक्षात्कार किया है।
    यह पुस्तक उस तरह की डायरी नहीं जिसमें अव्यर्थ और व्यर्थ सब टंका रहता है। इसमें वे अंश है जो भावनात्मक तीव्रता के कारणा स्मृति का हिस्सा बन गए हैँ।
  • Manu Ko Banaati Manaii
    Gyanendrapati
    250 225

    Item Code: #KGP-821

    Availability: In stock


  • Vishnugupta Chanakya
    Virendra Kumar Gupt
    700 560

    Item Code: #KGP-1969

    Availability: In stock

    विष्णुगुप्त चाणक्य
    "वत्स यवन ! मैं सत्यान्वेषी अध्येता और अध्यापक हूँ। यही मेरी मूल वृत्ति और साधना है ।
    इसी सत्य-शोध की साधना के बीच अनायास ही चन्द्रगुप्त मुझे मिला, नंद-वंश के विनाश और नए साम्राज्य के निर्माण का संकल्प मुझे मिला; संकल्प की पूर्ति मिली और इस विशाल आर्य साम्राज्य का महामंत्रित्व मिला । पर सदैव ये सब मेरे लिए माध्यम ही रहे, सत्य ही लक्ष्य रहा ।"
    -(इसी उपन्यास से)
  • Agyey Sahachar
    Vishwanath Prasad Tiwari
    695 626

    Item Code: #KGP-1940

    Availability: In stock

    अज्ञेय सहचर
    छायावादोत्तर हिंदी साहित्य में अज्ञेय का व्यक्तित्व एक स्वाधीन चिंतक और प्रयोगधर्मी रचनाकार के रूप में अद्वितीय है। इस संदर्भ में एक-दो लेखक ही उनकी पंक्ति में बैठते हैं। उनकी सर्जनात्मक प्रयोगशीलता और नवीनता तथा अनेक कलाओं में उनकी दक्षता को देखते हुए उन्हें हिंदी का ‘रवींद्रनाथ’ कहना उपयुक्त है। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं (कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, संस्मरण, यात्रावृत्त, आलोचना और अन्य लघु विधाएँ) को अपनी प्रतिभा से समृद्ध किया है। कुछ नवीन गद्य विधाओं को जन्म देने का श्रेय भी उन्हें है, जिन्हें उन्होंने ‘अंतःप्रक्रिया’, ‘लॉग बुक’ और ‘टीप’ आदि कहा है। ये ‘डायरी’ विधा के निकट हैं, मगर उनसे भिन्न और नवीन। इस प्रसंग में मुझे यह भी कहना चाहिए कि हिंदी की साहित्यिक भाषा को जितने नए शब्द अज्ञेय ने दिए हैं, उनके किसी समकालीन लेखक ने नहीं दिए। यह एक ऐसा रेखांकित करने योग्य कार्य है, जिसे कोई महान् लेखक ही कर पाता है। वस्तुतः अज्ञेय हिंदी के एक युग-प्रवर्तक साहित्यकार हैं। उन्होंने अनेक रूपों में छायावादोत्तर हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को प्रभावित किया है तथा उसे नई दिशाओं की ओर प्रेरित और संचालित भी किया है।
    अज्ञेय का जितना बड़ा योगदान रचना और चिंतन के क्षेत्र में है, उतना ही या उससे थोड़़ा ही कम हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध करने और अपने समय में एक साहित्यिक वातावरण निर्मित करने वाले व्यक्तित्वसंपन्न लेखक के रूप में। उन्होंने न केवल स्वयं लिखा, बल्कि प्रतिभावान लेखकों की एक पूरी पीढ़ी को मंच देने और सामने लाने का प्रयास किया। 
    आज हिंदी के एक बड़े और वास्तविक पाठक-वर्ग में अज्ञेय प्रतिष्ठित हैं और उन पर लिखा भी कम नहीं गया है, जिसका प्रमाण है यह पुस्तक।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma (Paperback)
    Tajendra Sharma
    170

    Item Code: #KGP-441

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : तेजेन्द्र शर्मा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavya Shatabdi
    Anamika
    350 315

    Item Code: #KGP-789

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।
  • Viklango Ke Liye Rojgar
    Vinod Kumar Mishra
    175 158

    Item Code: #KGP-7845

    Availability: In stock

    आम विकलांग कर्मचारी अत्यंत परिश्रम और अनुशासनप्रिय होते हैं । बढ़ते तकनिकी विकाश ने जहाँ विभिन्न कार्यों में शारीरिक श्रम की आवश्यकता को काम किया है वहीँ विकलांगों की कार्यक्षमता को नए-नए सहायक उपकरणों और बेहतर कृत्रिम उपकरणों के जरिये लगातार बढ़ाया है और आगे इसका और विस्तार होगा । 
    बदलते आर्थिक परिवेश में विकलांगों के लिए नयी रोजगार संभावनाओं की विशेष रूप से निजी क्षेत्र में तलाश आवश्यक है । इसके लिए उद्योग जगत, राष्ट्रीय संस्थानों, स्वयंसेवी संगठनों और विकलांग युवक-युवतियों को एक जगह आना होगा और इस तरह प्रयास करना होगा ताकि विकलांग व्यक्ति बड़ी संख्या में रोजगार पा सकें और समाज को अपनी योग्यता का लाभ दें । 
  • Agyaat Ka Nimantran
    Amrita Pritam
    275 248

    Item Code: #KGP-1973

    Availability: In stock

    अज्ञात का निमंत्रण 

    यह कौन-सी रात है
    जो मुझे दावत देने आई है
    आर सितारों के चावल फटककर
    यह टेग किसने राँधी है... 

    आज यह चाँद की सुराही-
    कौन आया है!
    कि इस चाँदनी को पीकर
    आसमान बौरा गया है... 

    जाने खुदा वह कौन-सो रात होती है
    जो किसी सपने का मस्तक चूम लेती है
    और फिर ख़यालों के पैरों में
    एक पायल., बजने लगती है... 

    प्रेम भी ईश्वर की तरह अज्ञात का नाम है
    उसकी बात जितनी भर--
    किसी संकेत में उतरती है
    वही संकेत इस पुस्तक के अक्षरों में है...
  • Shaantidoot Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    300 270

    Item Code: #KGP-644

    Availability: In stock

    भारत के इतिहास में फिर एक बार वैसा ही समय आया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक बार फिर कुछ वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग करके देश का विभाजन करने की मांग की। गांधी जी ने मुस्लिम लीग को देश के विभाजन से विरत करने के लिए मुहम्मद अली जिन्ना के हाथ पर कोरा चैक रखकर संपूर्ण देश पर शासन करने का अधिकार मुस्लिम लीग को दे दिया, किंतु मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान से कम पर समझौता करने से इनकार कर दिया। सन् 1999 में पाकिस्तान ने देश पर आक्रमण कर दिया। इससे पूर्व भी पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण करके देश को हथियाने का प्रयत्न किया था, किंतु इस बार पाकिस्तान से बातचीत न करके पाकिस्तान को ईंटों का जवाब पत्थरों से देकर देश की रक्षा करने मंे सफलता प्राप्त कर ली, किंतु इसे युद्ध की समाप्ति नहीं माना जाना चाहिए। पाकिस्तान की ओर से फिर भी युद्ध की स्थिति पैदा की जाती रहेगी। वस्तुतः देश की समस्या समय-समय पर होने वाले आक्रमण नहीं हैं। जब तक पाकिस्तान रहेगा तब तक युद्ध की स्थिति बनी रहेगी। महाभारत की तरह एक निर्णायक युद्ध होकर अखंड भारत की स्थापना ही इस समस्या का समाधान है।
    -इस पुस्तक के ‘गांधी जी के शांति-प्रयासों की असफलता के कारण’ अध्याय से
  • Shrikant
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    600 540

    Item Code: #KGP-764

    Availability: In stock


  • Shiksha : Lakshya Aur Siddhant
    Jagat Ram Arya
    60 54

    Item Code: #KGP-9128

    Availability: In stock

    भारत की आजादी के लिए लाखों लोग शहीद हुए। उनके मन में यही तमन्ना थी कि अपना राज्य आएगा और हम अपने ढंग से देश में शिक्षा-नीति का निर्धारण करेंगे, बाल एवं युवा शक्ति में चरित्र-निर्माण द्वारा नई जागृति पैदा करेंगे, राष्ट्रभाषा हिंदी को पूरा प्रोत्साहन देंगे और वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी भाषा को लागू किया जाएगा ताकि हम अपनी ही राष्ट्रभाषा में इसे तैयार कर सकें। आजादी के लिए शहीद हुए लोगों के दिलों में तड़प भी कि हम अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाकर समान विद्यालय पद्धति को अपनाएंगे। सभी वर्गों के लोगों के लिए शिक्षा के समान अवसर दिए जाएंगे। हम अपनी धरोहर संपत्ति ‘वेदों’ से नए-नए आविष्कार करेंगे जैसाकि विदेशों में जर्मनी, इटली, फ्रांस इत्यादि देशों ने संस्कृत में लिखे वेदों में से कई खोजें कीं। जर्मनी, फ्रांस, चीन और जापान ने अपनी ही भाषा में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रा में उन्नति की है तो हम भी अपनी भाषा हिंदी में ही इस शिक्षा को अनिवार्य बनाएंगे और अपनी ही भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली तैयार करके प्रत्येक क्षेत्र में अपनी ही भाषा द्वारा उन्नति करेंगे। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य के लिए हमारे पास न कोई ठोस लक्ष्य है और न कोई सिद्धांत है।
    प्रस्तुत पुस्तक में सरल व रुचिकर शैली में इन्हीं समकालीन समस्याओं का खुलासा तथा विश्लेषण किया गया है।
  • Hindi Turkey Dictionary
    Sita Laxmi
    495 446

    Item Code: #KGP-2039

    Availability: In stock


  • Anandmay Jeevan Kaise Payen
    Swed Marten
    200 180

    Item Code: #KGP-282

    Availability: In stock


  • Dus Baal Naatak
    Pratap Sehgal
    240 216

    Item Code: #KGP-759

    Availability: In stock

    दस बाल नाटक
    ये नाटक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जिन कहानियों से प्रेरित हैं, उन कहानियों का समय वह समय है, जिसे हम भारत के  पुनर्जागरण और आजादी के संघर्ष का समय कहते हैं। भारत के अन्य इलाकों की अपेक्षा बंगाल में शिक्षा को व्यवस्था बेहतर थी, लेकिन आज के मुकाबले में उस शिक्षा-व्यवस्था को भी हम पिछड़ा हुआ ही कहेंगे।  ऐसे ही समय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व दुनिया को  चौका देता हैं। अपनी अन्य कलात्मक कियाओं के साथ-साथ वे बच्चों को कभी नहीं भूले। उन्होंने एक जगह कहा भी है कि बच्चा बडों का पिता होता है। यानी हम आने वाली हर पीढ़ी से कुछ सीखते हैं और कुछ सिखाते हैं।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बाल-कहानियों में सन्देश स्पष्ट हैं। ये संदेश बच्चों की अपेक्षा उनके अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अधिक हैं। अपना संदेश समाज तक पहुँचाने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर बच्चे को भी एक व्हीकल की तरह से इस्तेमाल करले हैं। कहानी का पाठक भल ही मौजूद हो, लेकिन उसका दर्शक नहीं होता। इसलिए प्रताप सहगल ने इन कहानियों को यहाँ लघु नाटकों के माध्यम से रखा है।  प्रताप सहगल हिंदी के जाने-माने कवि-नाटककार हैं। उन्हें भी अपन बहुविध लेखन के लिए जाना जाता हैं। इससे पूर्व उनके बाल-नाटकों की एक किताब 'छूमंतर' ( किताबघर प्रकाशान) प्रकाशित होकर मकबूल साबित हुई है। इसका प्रमाण उसके लगातार छपने चाल संस्करण हैं। इस बार प्रताप सहगल ने गुरुदेव की बाल-कहानियों का अपने बाल-नाट्य-लेखन का आधार बनाया है। ये नाटक जहाँ अपने समय में अवस्थित हैं, वहीं वे हमारे समय के साथ भी जुड़ जाते हैं और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इनकी उपयोगिता बनी रहेगी।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रताप सहगल-दोनों के कन्सर्न्स का जानने के लिए दस बाल-नाटकों का यह संग्रह हर बड़े और हर बच्चे के लिए एक जरूरी किताब बन जाता है।
  • Doosara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    100

    Item Code: #KGP-1203

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Rang-Saakshatkaar
    Jai Dev Taneja
    650 585

    Item Code: #KGP-817

    Availability: In stock


  • Vishwa Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-3
    Shuk Deo Prasad
    545 491

    Item Code: #KGP-699

    Availability: In stock

    विज्ञान कथाओं को कथा की एक विधा के रूप में मान्यता मिले, ह्यूगो गन्र्सबैक ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई और उन्होंने ही इसे ‘साइंटीफिक्शन’ नाम से अभिहित किए जाने का परामर्श दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने इस विधा को अपनी तरह से परिभाषित भी किया। ‘अमेजिंग स्टोरीज’ के प्रथमांक में संपादकीय टिप्पणी में गन्र्सबैक ने लिखा-‘साइंटीफिक्शन’ से मेरा अभिप्राय जूल्स वर्न, एच.जी. वेलस और एडगर एलन पो द्वारा लिखी गई ऐसी कहानियों से है, जिसमें आकर्षक रोमांच के साथ वैज्ञानिक तथ्य और युगद्रष्टा की दूरदर्शिता का सम्मिश्रण हो। ....आज विज्ञान कथा-साहित्य में चित्रित किए गए किसी आविष्कार के कल सत्य हो जाने में असंभव जैसा कुछ नहीं है।’
    गन्र्सबैक की इसी परिभाषा के कारण विज्ञान-गल्पों को ‘भविष्यद्रष्टा साहित्य’ भी कहा जाने लगा और लेखकों से ऐसी अपेक्षाएं की जाने लगीं जो निंतात अव्यावहारिक थीं।
    तो क्या विज्ञान कथाओं में आज के कल्पित आविष्कार कल के सच हैं? जी नहीं! ऐसा कदापि नहीं हो सकता। किसी भी गल्प में परिकल्पित कोई भी आविष्कार तदनुरूप कभी भी साकार नहीं हुआ। ऐसे सारे दावे मिथ्या हैं। हां, आविष्कारकों ने विज्ञान-गल्पों से प्रेरणाएं अवश्य ली हैं, इसकी स्वीकारोक्तियां हैं।
    ऐसा इसलिए असंभव है कि गल्पकार आविष्कारक नहीं है और आविष्कारक की गल्प-लेखन में मति-गति नहीं है। विज्ञान-गल्प-लेखन एक विरल विधा है, जिसमें विज्ञानसिद्धि और रससिद्धि दोनों वांछनीय हैं। और ऐसा संयोग विरल ही है।
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 1 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    195

    Item Code: #KGP-295

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (1)
    (व्यक्तित्व और परिवार)
    एक नहीं अनेक गांधी हैं--गांधी के  अकेले एक व्यक्तित्व से समाए हुए ।
    गत पूरी एक शताब्दी गांधी की शताब्दी थी । इतना महान् व्यक्तित्व संभवत: विश्व में कोई दूसरा नहीँ था । उनके अवसान के पश्चात उनका विशाल स्वरूप धुँधलाया नहीं, बल्कि और प्रखर, और अधिक प्रासंगिक होकर उभरा । अतीत के गांधी की अपेक्षा आज का गांधी अधिक व्यापक एव विराट, है ।  हिंसा की आग में झुलसते, आज के इस भयाक्रांत वानावरण में गांधी की आवश्यकता अधिक गहराई से अनुभव की जा रही है ।
    यों तो अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है गांधी जी पर, उनके जीवन-दर्शन पर, परंतु बहन सुमित्रा जी ने अपने पितामह का जिस रूप में रेखांकित किया है, वह उन सबसे भिन्न है । बापू के जीवन की पारदर्शिता उसमें झलके बिना नहीं रहती । सुपित्रा जी ने नि:स्पृह एवं निष्पक्ष भाव स सारी स्थितियों का गहन विवेचन किया है । अपने पितामह को भी क्षमा नहीं किया ।
    इस संपूर्ण कृति में हरिलाल भाई वाला प्रसंग सबसे करुण एवं दारुण है--दिल की दहला देने वाला । तब बापू मात्र बापू न रहकर एक संवेदनशून्य पिता की भूमिका में दीखते हैं । हरिलाल भाई सारा गरल चुपचाप पी जाते हैं, पर किसी से कोई शिकायत नहीं । इतना प्रखर, मेधावी, आज्ञाकारी सुपुत्र पिता की उपेक्षा का शिकार बनकर अपनी आहुति दे टेना है । तब गांधी से बडा गांधी लगता है वह--एक निपट मानव के रूप में । अपनी परदादी माँ 'पुतली माँ' पर भी सुपित्रा जी न विस्तार स लिखकर 'गांधी-परिवार' की इस पुण्य-गाथा को एक युग-गाथा का नया आयाम प्रदान किया है । संयुक्त परिवार में पद्म-पत्रवत् रहने की उनकी तपश्चर्या कितनी प्रेरक थी ! इस कृति में ऐसा बहुत कुछ  जो गंभीरता के साथ सोचने के लिए विवश करता है ।  सुमित्रा जी की यह रचना इसलिए अनेक अर्थों में अद्वितीय बन गई है ।
    --हिमाशु जोशी
    13 अगस्त, 2009
  • Natyachintan Aur Rangdarshan Antarsambandh
    Girish Rastogi
    475 356

    Item Code: #KGP-707

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में व्यापक, आधुनिकतम और गहन विश्वदृष्टि उल्लेखनीय है। इस अर्थ में बर्तोल्त ब्रेख्त का नाट्यचिंतन और रंगदर्शन बहुत गंभीर है। पश्चिमी नाट्यचिंतन के साथ-साथ यह भारतीय नाटककार और रंगमंच को भी परखती चलती है। लेखिका प्राचीन नाटककारों को नई दृष्टि से देखती है तो साहित्य और रंगमंच के साथ ही आलोचना को भी नए ढंग से देखती है।
    कई मानों में नाटक का साहित्य और रंगमंच से जो रिश्मा टूटता-बनता रहा और प्रश्न पर प्रश्न उठते रहे चिंतन और रंगदर्शन के अंतर्संबंध बनते-बदलते रहे। यह पुस्तक उन सबसे साक्षात्कार कराती है-चाहे संस्मरणों के जरिए, चाहे पत्र के जरिए या द्वंद्वात्मकत संवेदना के जरिए। कुछ महत्वपूर्ण नाटककारों का विशद अध्ययन-चिंतन भी यह स्थापित करता है कि मंचनां से ही नाट्यचिंतन और रंगदर्शन की अंतरंगता विकसित होती जाती है, क्योंकि नाटक और रंगमंच एक जीवित माध्यम हैं, अन्यथा वह कुंठित हो जाती है। दर्शक, पाठक, आलोचक सभी को उत्सुक करने वाली है यह पुस्तक।
  • Kavi Ne Kaha : Uday Prakash
    Uday Prakash
    240 216

    Item Code: #KGP-1954

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : उदय प्रकाश
    सादगी उदय प्रकाश की कविताओं की जान है जो हर उस आदमी से तुरंत रिश्ता कायम कर लेती है जो सामाजिक अन्याय और शोषण की मार उन लोगों के बीच बैठा सह रहा है, जिनके पास आंदोलन और नारे नहीं हैं, सिर्फ खाली अकेले न होने का अहसास भर है। ये कविताएँ पाठक की संवेदना में बहुत कुछ ऐसा तोड़फोड़ कर जाती हैं, जिनके सहारे वह फिर कुछ नया रचने की ज़रूरत महसूस करने लगता है । किसी भी यातना को कवि बिना उस यातना से मानसिक रुप से गुज़रे हुए प्रेषित नहीं कर सकता । उदय प्रकाश की कविताएँ काफी कुछ इसकी दुर्लभ मिसाल है । -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
    कविताओं में उदय प्रकाश की एक और कलात्मक विशेषता गौरतलब है । वे एक ओर वर्तमान के अलग-अलग संदर्भों और  स्थितियों को लेते हैं, पृथक और विच्छिन्न दुनियाओं को साथ-साथ रख देते हैं, ये पिघलकर एक इकाई बन जाते हैं । इनके 'फ्यूजन' से एक समग्र समय बनता है हम इन पृथक और विभिन्न दिखते संदर्भों और स्थितियों के भीतर की तारतम्यता तक पहुंचते हैं। यहीं कविता का अभीष्ट है। कुछ कविताओं में उदय प्रकाश ने बीज से वृक्ष बनने तक की पूरी प्रक्रिया को उलट दिया है । जैसे कोई विपरीत दिशा में चलती फ़िल्म हो । यह एक रचनाकार का नियति के क्रम में हस्तक्षेप है । -विजय कुमार 
    क्यों ऐसा नहीं हुआ कि उदय प्रकाश की कविताओं में छिपे उनके कथाकार और उनकी कहानियों में छिपी कविता पर सतर्क पाठको का ध्यान जाता और मूल्यांकन की कोई और नई समावेशी पद्धति जन्म लेती ! जिस जादुई यथार्थवाद के लिए …. उदय प्रकाश की कहानियों अनेकार्थी जान पड़ती हैं और एक से अधिक पाठ के लिए पाठकों को उत्युक बनाती हैं उससे मिलती-जुलती अपरिचयीकरण (डिफेमिलियराइजेशन) सरीखी काव्ययुक्ति का इस्तेमाल करके ही उनकी कविताएँ अधिक सार्थक बन सकी हैं । -परमानंद श्रीवास्तव
  • Sun Mutiyare
    Santosh Shelja
    450 405

    Item Code: #KGP-133

    Availability: In stock

    सुन मुटियारे
    ‘सुन मुटियारे’ उपन्यास उस तरुणी (मुटियार) की कहानी है, जो जन्मी-पली पंजाब के गाँव में और पढ़ी-गुनी देश की राजधानी में। पंजाब भी ‘बंटवारे’ से पहले का पंजाब-जब अनबँटी जमीन थी और अनबँटे ही दिल थे...जब खेतों में भरपूर अनाज था और दिलों में भरपूर प्यार था...जब ‘पंज दरिया’ की धरती गाती-नाचती रहती थी।
    कथानक की धुरी तो है ‘मुटियार’, लेकिन उसके इर्द-गिर्द एक भरा-पूरा परिवार है, समाज है, जिसमें विविध पात्र हैं—गाँव के भी, शहर के भी। उनकी हँसी और आँसू, समस्याएँ और समाधन, सुख और दुःख—सब कुछ ऐसे साथ जुड़ा चला आता है, जैसे कवि के शब्दों में—‘जस केले के पात में छुपे पात दर पात।’ इस प्रकार कथानक का मुख्य पात्र एक नहीं रहता, बल्कि अनके पात्रों के रूप में प्रकट होता हैं अतएव यह कहानी जीवन के विराट् पट पर रंग-बिरंगे धगों से बुनी रंगीन चादर ‘फुलकारी’ की तरह उभरती है। इसका एक सिरा पंजाब के गाँव से जुड़ा है तो दूसरा राजधानी के महानगर से। इसीलिए कहानी में गाँव के लोकगीत और पंजाबी भाषा के शब्द स्वयमेव ही आ गए हैं, जैसे सावन की घटाओं के साथ मोर का नृत्य और कोयल की कुहुक आ जाती है।
  • Saarth (Paperback)
    Bhairppa
    300 285

    Item Code: #KGP-7042

    Availability: In stock

    सार्थ
    सार्थ अर्थात् व्यापारियों का काफिला । नागभट्ट नामक एक वैदिक अपने राजा द्वारा एक सार्थ के साथ उच्च अध्ययन के लिए भेजा जाता है । कथा के वाचक नागभट्ट द्वारा आठवीं शती के भारत का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया गया है । उस समय वैदिक धर्म पतनोन्मुख था, भले ही शकरचार्य, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, भारती देवी आदि जैसी विभूतियां उसके प्रचार-प्रसार में लगी थीं। दूसरी ओर बौद्ध धर्म अपने उत्कर्ष पर था । उसके आचार्य धर्म-प्रचार के लिए स्तूपों, चैत्यों और विहारों के निर्माण में जुटे थे । साथ ही, योग साधना और तंत्र साधना में भी आकर्षण बना हुआ था । भारत के पूर्वी भाग में इस्लाम धर्म तलवार की नोक से अपने धर्म और संस्कृति की लकीर खींच रहा था। डॉ. भैरप्पा ने तत्कालीन समाज और धर्म का सजीव चित्रण अपनी पैनी लेखनी से अपनी विशिष्ट शैली में इस उपन्यास में किया है । संभवत: साधारण जन उस समय भी ऊहापोह की उसी स्थिति में था, जिसमें आज अपने को पा रहा है । इसी कारण पाठक इस उपन्यास को एक बार प्रारंभ करके छोड़ नहीं पाएगा, जब तक कि इसे समाप्त न कर ले ।
    डॉ. भैरप्पा की यह विशिष्ट ऐतिहासिक कृति 'सार्थ' अब आपके सन्मुख प्रस्तुत है ।

  • Jangli-Mangli
    Chang Tain-Pi
    180 162

    Item Code: #KGP-409

    Availability: In stock

    1963 में मैंने चांग तइन-यी के बाल-उपन्यास ‘करामाती कद्दू’ का रूपांतर किया था, जो धारावाहिक रूप से ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुआ।
    चांग तइन-यी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह बहुत ही सरल और रोचक ढंग से कहानी कहते हैं, जो मनोरंजक होने के साथ उपदेशपरक ही नहीं, कलात्मक ढंग से अच्छा रास्ता दिखाती है।
    ‘करामाती कद्दू’ की लोकप्रियता देखकर ही मैंने 1967 में लेखक की एक और रचना ‘जंगली-मंगली’ शीर्षक से रूपांतकर किया है। पाठकों की सुविधा के लिए मैंने कहानी के पात्रों और वातावरण को भारतीय रूप देना उचित समझा।
    चांग तइन-यी का जन्म 1906 में हुआ था। पच्चीस वर्ष की अवस्था में उन्होंने यह कहानी लिखी थी। निर्धनता के कारण उन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी। निर्वाह के लिए उन्होंने तरह-तरह की नौकरियां कीं। कभी-कभी दफ्तर में क्लर्की तो कभी अध्यापन। संघर्ष करते हुए भी उन्होंने लिखना सारी रखा और कई पुस्तकों की रचना की। चांग तइन-यी की बालोपयोगी और किशोरापेयोगी रचनाएं विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
    —द्रोणवीर कोहली
  • Vansh Vriksha
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-103

    Availability: In stock

    कन्नड़ के विख्यात उपन्यासकार भैरप्पा ने प्रस्तुत उपन्यास में वंशावली के आदि और जटिल प्रश्नों पर आधारित जिस गहन एवं मर्मस्पर्शी कथा का ताना-बाना बुना है, वह भारतीय मनीषा की प्रश्नाकुलता की ऊर्जा है और हमारी वंशीय परंपरा का राग-अनुराग एवं विराग भी। जीवन के लिए निर्धारित लक्ष्यों को अर्जित कर लेना, अपने वंशको आगे बढ़ाने का स्वस्थ संकेत है, अथवा संतति के माध्यम से ही वंशीय परंपरा का वहन सहज संभव हो सकता हैअपने उपलक्ष्य में यह कृति इन प्रश्नों से जूझती है। वंशजों के रक्त-संबंधों की शुचिता की आशंकाएं तथा सरोकार भी इस कथा में जहां-तहां तैरते हुए नए भावबोध और अवधारणाओं से हमारा सामना कराते हैं।

    भैरप्पा के उपन्यासों के पाठक जानते हैं कि अपने पात्रें की बहुविध दुनिया का जैसा सजीव शब्दांकन वह करते हैं, वह विलक्षण है। वंशवृक्षके सभी पात्र स्वयं में संपूर्ण हैंमनुष्यगत अपूर्णताओं के साथ। वे परंपरा के एक साथ संवाहक और भंजक हैं तथा उनकी यही अनायासताउन्हें एक सच्चे और खरे आदमी के चरित्र में कायांतरित कर देती है। इसी कारण यह कृति-कथा हम सबकी देह और आत्मा को बारंबार छूकर निकलती है। इसमें वर्णित देह और नेह की फुहारों से आप-हम रोमांचित और संवेदनशील हो उठते हैं। लक्ष्यार्जजन के पश्चात् मृत्यु को जिस सहजता और क्रमिकता के साथ लेखक यहां अवतरित करता है, वह यमलीला सहज स्वीकार्य प्रतीत होती है इस उपन्यास में।

    एक अंचल विशेष का वर्णन होते हुए भी यह कृति अखिल भारतीय या कहें कि वैश्विक मनोजगत् की प्रतिनिधि रचना है जो जीवन के संबंधों, संयोगों और सहभावों से संरचित है। जीवनगत निर्णयों के उद्दाम स्रोतों से प्रस्फुटित कई जीवनलीलाओं के तटों को निर्धारित और ध्वस्त करती इस कथा में लेखक के द्वंद्वों को स्वर देने का काम उसके नायक करते हैं तथा मानो यह सब घटित होते हैं पाठक के साथ। कृति, कृतिकार और पाठक के त्रिकोण का यह अंतरंग संबंध वंशवृक्षकी एक अन्य तथा अन्यतम उपलब्धि है।

  • Janmanmayi Subhadra Kumari Chauhan
    Rajendra Upadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-180

    Availability: In stock


  • KUCH SAMAY BAAD
    Devendra Chaubey
    180 162

    Item Code: #KGP-1563

    Availability: In stock

    कुछ समय बाद
    पहले कहानी-संग्रह से ही देवेन्द्र चौबे इस रूप में आश्वस्त करते नजर आते है कि वह मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कथाकार हैं । 'कुछ समय बाद’ की अधिकांश रचनाएं पाठक को विभ्रम से निकालकर यथार्थ से जोड़ने का काम करती हैं। 'उत्तर-कथा' के नेपाली के हों या 'छोटे-छोटे सपने' के करीमना के, कहानीकार पात्रों के जीवनानुभवों को समझते हुए उनके मन में उतर जाने की सामर्थ्य रखता है । कहीं वह मन की शांति की सच्ची खोज करता है तो कहीं व्यक्ति के सपनों के दरकने के कारणों की खोज करता नजर आता है ।
    शहर और गाँव के बीच प्रभावित होते जीवन को तो देवेन्द्र अपनी कहानियों में  लाते ही हैं, सामूहिक राजनीतिक चेतना का विवेकशील स्फुरण भी यहीं मौजूद है, जो स्थानीय हितों को अदेखा नहीं करता । चरित्रों, स्थितियों और जीवन के विविध ऐसे प्रसंगों से कहानी की जमीन अपनी ही भाषा से तलाशना देवेन्द्र को भाता है, जो व्यक्ति के अनुभव को समृद्ध करते हुए उसे और अधिक संवेदनशील बनाते हैं । उनकी रचनाओं की यह सहज विशेषता है कि वे समाज के कोनों-अंतरों में चल रहे छोटे-छोटे महायुद्धों की टोह लेती नजर आती हैं । जीवन की सहजता यहाँ उसकी विसंगतियों के साथ मौजूद है ।
    अव्यवस्थित और मनुष्य-विरोधी व्यवस्था पर कहानियों के जरिए कमेंट करना देवेन्द्र चौबे के कथाकार को अच्छा लगता है । अपनी पहली कहानी से ही जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था लिए यह कथाकार जब 'सजा' जैसी बड़ी कहानी पर पहुंचता है तो यह संकेत भी दे जाता है कि यथार्थ को पकड़ने के लिए दूरी भी कभी-कभी सहायक साबित होती है । सोवियत संघ के विघटन के बहाने लिखी गई यह कहानी गौरतलब तो है ही, गंभीर बहस भी आमंत्रित करती है ।
  • Tinke-Tinke
    Nisha Bhargva
    165 149

    Item Code: #KGP-1806

    Availability: In stock

    निशा भार्गव के लघु कथा संग्रह, 'तिनके-तिनके' में परिवर्तित जीवन मूल्यों के छोटे-छोटे सच हैं, स्त्री प्रश्न, परिवारिक-सामाजिक वैषम्य और संबंधों की आइरनी दर्शाती छोटी-छोटी घटनायें हैं, जिन्हें अर्थकेंद्रित जीवन की आपाधापी में रोज़मर्रा की बाते समझकर, 'यह सब तो होता ही रहता है', वाले खाने में डालकर अदेखा किया जाता है ।
    हमारी आसपास की दुनिया में आए दिन काफी कुछ घटता रहता है। चौतरफ हेर फेर, अनाचार, स्कैम्स, आतंकी हमलों से लेकर, स्त्रियों से दुराचार, वृद्धों की अवमानना एवं आत्महत्याओं से टीवी और समाचार पत्र भरे रहते है । ऐसे में देखने सुनते में साधारण और औसत, पर चीन्हने में अर्थगर्भित ये बातें महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि गुट्ठिल होते जीवन में हमारा दिलोदिमाग, जो अशुभ और अनाचार सुनने का आदी हो गया है उसे हुन रोज़मर्रा के सुख-दु:ख, राग-विराग, प्रेम, ईषर्या और ईमानदारी की छोटी-छोटी घटनाओं से रू-ब-रू करा कर, उसकी संवेदनशीलता को टहोका जाय । शायद नज़र अंदाज होती ये छोटी-छोटी घटनाएं उन्हें अपने भीतर झांकने को प्रेरित करें । इनमें उन्हें खुशहाल जिन्दगी के कुछ छोटे-बड़े नुस्खे मिल जाये, जिनसे आए दिन के तनावों और घरेलू कलहों से कुछ तो मुक्ति मिले ।
    निशा नाउम्मीदी में भी संस्कारशील व्यक्ति और स्वस्थ समाज की उम्मीद नहीं छोड़ती । उसे अच्छाई पर भरोसा है यह भरोसा वह अपने पाठकों को सौंपना चाहती है । सीधी-सादी बोलचाल की भाषा में निशा बडे प्रश्न उठाती है । कैंसर की मरीज चारु, मौत के  इंतजार में सजना-संवरना क्यों छोडे? पचपन की उम्र में अकेली पडी शशि का पुनर्विवाह उसका गुनाह क्यों साबित किया जाय ? इस छोटे से जीवन को बयों भरपूर न जिया जाय ?
    बिना किसी भाषायी करिश्मे और दावे के निशा इस तिनके-तिनके  संग्रह में, स्मृतियों में अटके , यादों-स्थितियों के कुछ तिनके संजोकर बतकहियों और किस्सों के माध्यम से पाठकों से संवाद करती है, देखे जिए क्षणों को, छोटे-छोटे अनुभवों को सहज संवेदना से रेखांकित कर संधि पाठक तक पहुंचती है । इनकी सादगी ही इनकी खूबी हैं ।
  • Naitik Abhinay Gaan
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1192

    Availability: In stock


  • Hum Yahan The
    Madhu Kankria
    590 472

    Item Code: #KGP-9351

    Availability: In stock

    ‘जंगल कुमार! सफलता-असफलता कुछ नहीं होती। असली चीज होती है आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा। जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना।’ दीपशिखा वेफ ये वाक्य मधु कांकरिया के नवीनतम उपन्यास हम यहां थे की सैद्धांतिकी है। इस उपन्यास के दो केंद्रीय चरित्रा हैं–दीपशिखा और जंगल कुमार। दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग-अलग शहर से आए–लेकिन लक्ष्य की समानता उनको जीवन पथ पर अभिन्न बना देती है।
    ‘हम यहां थे’ जीवन में व्याप्त करुणा, प्रतिरोध, संघर्ष, स्वप्न, संकल्प और समर्पण का अनुसंधन है। किसी ने कहा था कि लक्ष्यहीन जीवन भ्रष्ट और दयनीय होता है। यह जीवन सत्य धीरे-धीरे उपन्यास की नायिका या केंद्रीय अस्मिता दीपशिखा के भीतर आकार लेता है। इसको वृत्तांत का रूप देने के लिए मधु कांकरिया ने डायरी का शिल्प अपनाया है। ‘दीपशिखा की डायरी: अपने अपने जंगल’ से ‘ओ जिंदगी! ओ प्राण!’ जैसे कई उपशीर्षकों में दीपशिखा के बहाने एक सामान्य स्त्री के भीषण संघर्ष और कोलकाता की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्थितियों का वर्णन किया गया है। ‘उत्तराधर’ में जंगल कुमार के पक्ष से दीपशिखा के वृत्तांत को संपूर्ण किया गया है। अर्थात् आदिवासियों के बीच जाकर उनके संघर्ष में सहभागी बनकर दीपशिखा ‘कैदी नंबर 989’ बन गई। मधु कांकरिया ने अद्भुत ढंग से आदिवासी अस्मिता और संघर्ष को शब्द दिए हैं। प्रकृति और प्रकृतिसंतानों के साथ व्यवस्था और बाजार के सुलूक हृदय को विचलित कर देते हैं। जंगलों की अंधधुंध कटाई और जंगली जानवरों को बेघर होते देख जिस खतरे की ओर वे इशारा करती हैं उसकी अनदेखी कर भविष्य की ओर देखना संभव नहीं है। मानव मन के गहरे स्तरों को छूती यह कहानी जीवन के दर्द और सौंदर्य, प्रेम और उदासी को अद्भुत ढंग से रचती है। पूरे उपन्यास में भाषा के अनेक रचाव हैं, लेकिन जब दीपशिखा और जंगल कुमार का साहचर्य आता है तब भाषा सचमुच सहृदय हो उठती है।
    ‘हम यहां थे’ एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन के कठोर सत्य को वर्तमान के तीखे प्रकाश में परिभाषित करता है।
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Khare (Paperback)
    Vishnu Khare
    80

    Item Code: #KGP-1322

    Availability: In stock

    मैंने जब विष्णु खरे की कविताओं को यह जानने के उद्देश्य से पढ़ना शुरू किया कि उनकी कविता का संसार किन तत्त्वों से बना है तो मुझे अत्यंत स्फूर्तिदायक अनुभव हुआ। एक के बाद एक काफ़ी दूर तक मुझे ऐसी कविताएँ मिलती रहीं जिन्होंने मुझे समकालीन जीवन के त्रासद से लेकर सुखद अनुभव तक से प्रकंपित किया। सबसे अधिक कविताएँ सांप्रदायिकता और फ़ासिस्ट मनोवृत्ति के जोर पकड़ते जाने को लेकर लिखी गई हैं। ‘शिविर में शिशु’ गुजरात के दंगे से संबंधित है, ‘चुनौती’ शीर्षक कविता में धर्म-भावना के ख़तरनाक रूप का संकेत है, ‘न हन्यते’ में दंगाइयों का रोंगटे खड़े कर देने वाला बयान है, ‘गुंग महल’ भी धार्मिक कट्टरता को ही सामने लाती है और ‘हिटलर की वापसी’ शीर्षक कविता जर्मनी की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। विष्णु खरे की ख़ूबी है कि उनकी कविताएँ अधिकांश वामपंथी कवियों की तरह सिर्फ़ जज़्बे का इज़हार नहीं करतीं बल्कि अपने साथ सोच को भी लेकर चलती हैं, जिससे उनमें स्थिति की जटिलता का चित्राण होता है और वे सपाट नहीं रह जातीं।...
    विष्णु खरे की असली कला और उनका तेवर ‘गुंग महल’ शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है, जिसका अंत जितना ही सशक्त है उतना ही कलात्मक--पाठकों को अनुभूति, सोच और कल्पना तीनों ही स्तर पर उत्तेजित करने वाला। ‘विनाशग्रस्त इलाके से एक सीधी टी.वी. रपट’ कविता में टी.वी. रपट शैली में अनुमानतः गुजरात के भूकंप का ज़िक्र है। अंतर्वस्तु की दृष्टि से इसमें भारत के नैतिक विनाश का ऐसा चित्रण है कि एक बार तो यह प्रतीति होती है कि विष्णु खरे हमारे नैतिक विनाश के ही कवि हैं।...
    विष्णु खरे का गहरा लगाव इस देश की साधारण जनता और साधारण जीवन से है, जिसे वे आधुनिक सभ्यता के बड़े परिप्रेक्ष्य में भी रखकर देखते हैं।...इन्हीं साधारण जनों में औरतों को भी गिनना चाहिए। आकस्मिक नहीं कि इस संग्रह में औरतों पर भी तीन-चार बहुत अच्छी कविताएँ हैं। विष्णु खरे का यथार्थ चित्रण इतना गहरा होता है कि उन्हें फैंटेसी में लिखने की कोई जरूरत नहीं। उन्होंने उस गद्य को आवश्यकतानुसार अनेक रूप प्रदान करके उसे ऐसा बना दिया है कि किसी काव्य और कला-मर्मज्ञ को उससे कोई शिकायत न हो।  
    -नंदकिशोर नवल
  • The 10-Pound Shred (Paperback)
    Tommy Europe
    295

    Item Code: #KGP-346

    Availability: In stock

    The 10-Pound Shred lets you bring Tommy Europe's tough-love, bootcamp-style workouts home. In just 31 days, Tommy will take you from flab to fit, helping you shed 10 poundsor more in the process. Each day has complete, easy-to- understand exercise instructions with step-by-step photos. There's no complicated flipping around to figure out what you need to be doing–and no free breaks, either! You don't need fancy equipment or even a gym membership–just a good pair of shoes and the willingness to get moving. There's also a nutritious, flexible meal plan designed to help you set a new, lifelong pattern of healthy eating. And through it all, Tommy's there with his signature blend of drill sergeant and inspiring friend, pushing you to reach higher, go faster and shred a little harder.
    Whether you have a wedding coming up, want to look great at the beach or just want to have more energy, Tommy will help you lose those 10 pounds. You're going to sweat, you're going to hurt–but you're going to love the results. So stop making excuses, put down that cupcake and pick up The 10-Pound Shred.
  • Bistar Aur Aakaash
    Ramakant
    50 45

    Item Code: #KGP-2094

    Availability: In stock

    बिस्तर और आकाश
    रमाकांत को निम्नमध्यवर्ग के जीवन का चितेरा कहा जाता रहा है । उनकी रचनाओं में शहरी निम्नमध्यवर्ग को जितना स्थान मिला, उतना और किसी के साहित्य में दुर्लभ है ।
    समस्या नई बस्तियों में बसने आये कमजोर आय वर्ग के लोगों की हो या कस्बों से नौकरी के सिलसिले में आये लोगों की-रमाकांत ने अपनी रचनाओं में उनकी आर्थिक, मानसिक, सामाजिक स्थितियों-परिस्थितियों का बारीकी से चित्रण किया है ।
    आकस्मिक मृत्यु से पूर्व के कई वर्ष रमाकांत ने स्वतंत्र लेखन में गुजारे, और इस दौर में साम्यवाद के पतन और असफलता के कारणों की पड़ताल कर एक बृहद उपन्यास लिखा ।
    संभवत: उस बडे प्रयोजन में जुट जाने के चलते इन तीन लघु उपन्यासों को पुस्तक रूप में प्रकाशित नहीं किया जा सका । बहरहाल, बिस्तर और आकाश, मैं, अकेले में, और एक विपरीत कथा शीर्षक ये आकार से छोटे लेकिन कथा में बडे तीन उपन्यास पाठको को अपने जाने-माने रचनाकार की मकम्मल मौजूदगी का अहसास करवाएँगे ।
  • Shivani Ka Katha Sahitya Yug-Parivesh-Sanskriti Ka Sandarbh
    Sushil Bala
    1100 990

    Item Code: #KGP-743

    Availability: In stock

    कोई भी सक्षम रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से युग-परिवेश-संस्कृति की विभिन्न व विशिष्ट छवियां निर्मित करता है। इन छवियों में उसकी वैचारिकी तथा भावसंपदा समाहित होती है। शिवानी के प्रचुर कथा साहित्य को पढ़ते हुए इस तथ्य का अनुभव शब्द-शब्द में किया जा सकता है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘शिवानी का कथा साहित्य: युग-परिवेश- संस्कृति का संदर्भ’ में सुशील बाला ने अत्यंत लोकप्रिय लेखिका शिवानी के कथा-संदर्भ रेखांकित किए हैं। शिवानी अपनी परिनिष्ठित अभिरुचियों के लिए जानी जाती हैं। विशद वैदुष्य की गरिमा से आलोकित उनकी रचना-शैली एक अलग मार्ग का अन्वेषण करती रही। वे भारतीयता को समझकर उसे व्यापक मानवता के हित में व्याख्यायित करती रहीं। सुशील बाला ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही लिखा है कि ‘वे क्षेत्रवाद, प्रांतवाद, जातिवाद, भाषावाद, सांप्रदायिकता जैसी देश को खंडित करने वाली नकारात्मक वृत्तियों का प्रबल विरोध कर सौहार्दपूर्ण वातावरण को उद्घाटित करती हैं।’ यह सच है कि शिवानी के कथा साहित्य में मानव मनोविज्ञान की उपस्थिति का विश्लेषण करते हुए उसमें सकारात्मक सोच के अनेक आयाम तलाशे जा सकते हैं। 
    चैदह अध्यायों में विभाजित प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका ने व्यवस्थित ढंग से शिवानी के व्यक्तित्व के नियामक तत्त्वों को रेखांकित करते हुए उनके रचना-परिवेश को उद्घाटित किया है। इसके पश्चात् उन्होंने शिवानी के कथा साहित्य (कहानी व उपन्यास) में पारिवारिक स्थिति, सामाजिक चेतना, नारी की स्थिति, राजनीतिक परिदृश्य, आर्थिक पक्ष, धर्मिक मान्यताएं और जीवन-दृष्टि, नैतिक मान्यताएं, कला साहित्य और ज्ञान-विज्ञान, प्राकृतिक परिवेश एवं भाषा का आलोचनात्मक अनुसंधन किया है। सुशील बाला के पास उपयुक्त भाषा है, जिस कारण पाठक तक उनका मंतव्य पहुंच जाता है। यह पुस्तक शिवानी पर केंद्रित आलोचनात्मक लेखन की नई संभावनाएं खोलती है। आज जब नए-नए संदर्भों में साहित्य का मूल्यांकन किया जा रहा है तब इस पुस्तक का विशेष महत्त्व है। यह निश्चित रूप से एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Rigveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    400 360

    Item Code: #KGP-115

    Availability: In stock

    ऋग्वेद : युवाओं के लिए यहाँ ऋग्वेद के मन्त्रों की व्याख्याएँ उसे सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं, जिनसे आज का 'कंप्यूटर-सेवी' युवा किसी भी स्थिति में निरपेक्ष नहीं रह सकेगा । पारंपरिक ज्ञान की अमूल्य धरोहर उसके हाथों में रखने का प्रयास है यह पुस्तक ।
  • Mere Saakshatkaar : Devendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    200 180

    Item Code: #KGP-548

    Availability: In stock


  • Khananbadosh (Paperback)
    Ajeet Kaur
    120

    Item Code: #KGP-7032

    Availability: In stock

    दर्द ही जिंदगी का आखिरी सच है । दर्द और अकेलापन । और आप न दर्द साझा कर सकने हैं, न अकेलापन । अपना-अपना दर्द और अपना-अपना  अकेलापन हमें अकेले ही भोगना होता है । फर्क सिर्फ इतना, कि अपनी सलीब जब अपने कंधों पर उठाकर हम जिंदगी की गलियों में से गुज़रे, तो हम रो रहे थे या मुस्करा रहे थे, कि हम अपने ज़ख्मी कंधों पर उठाए अपनी मौत के ऐलान के साथ, लोगों की भीडों से तरस माँग रहे थे, कि उस हालत में भी उन्हें एक शहंशाह की तरह मेहर और करम के तोहफे बाँट रहे थे । दर्द और अकेलापन अगर अकेले ही जाना होता है, तो फिर यह दास्तान आपको क्यों सुना रही हूँ ?
    मैं तो जख्मी बाज़ की तरह एक बहुत पुराने, नंगे दरख्त की सबसे ऊपर की टहनी पर बैठी थी—अपने जख्मों से शार्मसार, हमेशा  उन्हें छुपाने की कोशिश करती हुई। सुनसान अकेलेपन और भयानक खामोश से घबराकर यह दास्तान कब कहने लग पडी ?
    यसु मसीह तो नहीं हूँ दोस्तों, उनकी तरह आखिरी सफर में भी एक नज़र से लोगों की तकलीफों को पोंछकर सेहत का, रहम का दान नहीं दे सकनी 1 पर लगता है, अपनी दास्तान इस तरह कहना एक छोटा-सा मसीही करिश्मा है जरूर! नहीं ?
    पर अब जब इन लिखे हुए लफ्जों को फिर से पढ़ती हुँ तो लगता है, वीरान बेकिनार रेगिस्तान में मैंने जैसे जबरन लफ्जों को यह नागफनी बोई है । पर हर नागफनी के आसपास बेशुमार खुश्क रेत है तो तप रही है, बेलफ़्ज खामोश।
    -अजीत कौर 
  • Anuvad Vigyan : Siddhant Evam Pravidhi (Paperback)
    280 252

    Item Code: #KGP-230

    Availability: In stock

    अनुवाद विज्ञान : सिद्धांत एवं प्रविधि
    लंबे समय से अनुवाद पर एक ऐसी प्रामाणिक पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी जो सभी प्रकार के पाट्यक्रमों की ज़रूरत को तो पूरा करती ही हो, साथ ही शोधार्थियों, अनुवाद के शिक्षकों, प्राध्यापकों के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ अनुवाद कार्य से जुडे अनुवादकों तया अनुवाद व्यवसाय से जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए उपयोगी हो ।
    इस पुस्तक में अनुवाद विद्वान की समस्त प्रविधियों व सिद्धांतों का विवेचन-विशलेषण भी किया गया है तथा जुत्ताई, 2008 तक अनुवाद के क्षेत्र से हुए चिंतन एव शोधों को समाहित करते हुए इस अनुवाद पर अद्यतन एवं प्रामाणिक पुस्तक के रूप में तैयार किया गया है । इसलिए इसका पुराना नाम 'अनुवाद विज्ञान' न रखकर इसे अनुवाद विज्ञान : सिंद्धांत एवं प्रविधि' नाम दिया गया है, क्योंकि  यह पुस्तक नवीनतम उदभावनाओं व विचारों से युक्त है तथा  मेरे 30 वर्षों से भी अधिक के अनुवाद के अनुभवों को समेटे हुए है । मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफल होगी तथा विद्यार्थियों, प्राध्यापकों, अनुवादकों व अनुवाद के गंभीर अध्येताओं के लिए भी समान रूप से उपादेय सिद्ध होगी ।
    -डों० जयन्तीप्रसाद नौटियाल
    (संपादक)
  • Hum Yahan The (Paperback)
    Madhu Kankria
    300

    Item Code: #KGP-7232

    Availability: In stock

    ‘जंगल कुमार! सफलता-असफलता कुछ नहीं होती। असली चीज होती है आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा। जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना।’ दीपशिखा वेफ ये वाक्य मधु कांकरिया के नवीनतम उपन्यास हम यहां थे की सैद्धांतिकी है। इस उपन्यास के दो केंद्रीय चरित्रा हैं–दीपशिखा और जंगल कुमार। दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग-अलग शहर से आए–लेकिन लक्ष्य की समानता उनको जीवन पथ पर अभिन्न बना देती है।
    ‘हम यहां थे’ जीवन में व्याप्त करुणा, प्रतिरोध, संघर्ष, स्वप्न, संकल्प और समर्पण का अनुसंधन है। किसी ने कहा था कि लक्ष्यहीन जीवन भ्रष्ट और दयनीय होता है। यह जीवन सत्य धीरे-धीरे उपन्यास की नायिका या केंद्रीय अस्मिता दीपशिखा के भीतर आकार लेता है। इसको वृत्तांत का रूप देने के लिए मधु कांकरिया ने डायरी का शिल्प अपनाया है। ‘दीपशिखा की डायरी: अपने अपने जंगल’ से ‘ओ जिंदगी! ओ प्राण!’ जैसे कई उपशीर्षकों में दीपशिखा के बहाने एक सामान्य स्त्री के भीषण संघर्ष और कोलकाता की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्थितियों का वर्णन किया गया है। ‘उत्तराधर’ में जंगल कुमार के पक्ष से दीपशिखा के वृत्तांत को संपूर्ण किया गया है। अर्थात् आदिवासियों के बीच जाकर उनके संघर्ष में सहभागी बनकर दीपशिखा ‘कैदी नंबर 989’ बन गई। मधु कांकरिया ने अद्भुत ढंग से आदिवासी अस्मिता और संघर्ष को शब्द दिए हैं। प्रकृति और प्रकृतिसंतानों के साथ व्यवस्था और बाजार के सुलूक हृदय को विचलित कर देते हैं। जंगलों की अंधधुंध कटाई और जंगली जानवरों को बेघर होते देख जिस खतरे की ओर वे इशारा करती हैं उसकी अनदेखी कर भविष्य की ओर देखना संभव नहीं है। मानव मन के गहरे स्तरों को छूती यह कहानी जीवन के दर्द और सौंदर्य, प्रेम और उदासी को अद्भुत ढंग से रचती है। पूरे उपन्यास में भाषा के अनेक रचाव हैं, लेकिन जब दीपशिखा और जंगल कुमार का साहचर्य आता है तब भाषा सचमुच सहृदय हो उठती है।
    ‘हम यहां थे’ एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन के कठोर सत्य को वर्तमान के तीखे प्रकाश में परिभाषित करता है।
  • Mere Mitra : Kuchh Mahilayen, Kuchh Purush (Paperback)
    Khushwant Singh
    100

    Item Code: #KGP-1458

    Availability: In stock

    मेरे मित्र : कुछ महिलाएँ, कुछ पुरुष
    प्रस्तुत पुस्तक के विषय-व्यक्तित्व मैंने बिना कसी तरतीब के चुने है । इनमें भी वे महिलाएँ और पुरुष विशेष है, जिनसे कि 60 और 70 के दशकों में मेरी दोस्ती हुई । अपने बारे में मेरे इन उद्गारों को पाकर कुछ तो इतने नाराज हुए कि उनसे बोलचाल ही बंद हो गई, पर कुछ खुश भी हुए । उन्होंने माना के उनके प्रति मैंने अपने स्नेह का ही इजहार किया है । कुछ ऐसे भी है, जिन्होंने अपने बारे में मेरे लिखे को पढ़ने की जहमत उठाना भी गवारा नहीं किया और कहा कि मैं उनके बारे में चाहे जो सोचता रहूँ उससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं है । पर अब आप ही बताएं कि उनके बारे में मेरा यह लिखना किसी काम का है या नहीं । -खुशवंत सिंह
  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    150 135

    Item Code: #KGP-479

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधारस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • Khanabadosh
    Ajeet Kaur
    250 225

    Item Code: #KGP-81

    Availability: In stock

    दर्द ही जिंदगी का आखिरी सच है । दर्द और अकेलापन । और आप न दर्द साझा कर सकने हैं, न अकेलापन । अपना-अपना दर्द और अपना-अपना  अकेलापन हमें अकेले ही भोगना होता है । फर्क सिर्फ इतना, कि अपनी सलीब जब अपने कंधों पर उठाकर हम जिंदगी की गलियों में से गुज़रे, तो हम रो रहे थे या मुस्करा रहे थे, कि हम अपने ज़ख्मी कंधों पर उठाए अपनी मौत के ऐलान के साथ, लोगों की भीडों से तरस माँग रहे थे, कि उस हालत में भी उन्हें एक शहंशाह की तरह मेहर और करम के तोहफे बाँट रहे थे । दर्द और अकेलापन अगर अकेले ही जाना होता है, तो फिर यह दास्तान आपको क्यों सुना रही हूँ ?
    मैं तो जख्मी बाज़ की तरह एक बहुत पुराने, नंगे दरख्त की सबसे ऊपर की टहनी पर बैठी थी—अपने जख्मों से शार्मसार, हमेशा  उन्हें छुपाने की कोशिश करती हुई। सुनसान अकेलेपन और भयानक खामोश से घबराकर यह दास्तान कब कहने लग पडी ?
    यसु मसीह तो नहीं हूँ दोस्तों, उनकी तरह आखिरी सफर में भी एक नज़र से लोगों की तकलीफों को पोंछकर सेहत का, रहम का दान नहीं दे सकनी 1 पर लगता है, अपनी दास्तान इस तरह कहना एक छोटा-सा मसीही करिश्मा है जरूर! नहीं ?
    पर अब जब इन लिखे हुए लफ्जों को फिर से पढ़ती हुँ तो लगता है, वीरान बेकिनार रेगिस्तान में मैंने जैसे जबरन लफ्जों को यह नागफनी बोई है । पर हर नागफनी के आसपास बेशुमार खुश्क रेत है तो तप रही है, बेलफ़्ज खामोश।
    -अजीत कौर 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamleshwar
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-736

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमलेश्वर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "कोहरा', 'राजा निरबंसिया', 'चप्पल', 'गर्मियों के दिन', 'खोई हुई दिशाएँ', 'नीली झील', 'इंतजार', 'दिल्ली में एक मौत' , 'मांस का दरिया' तथा 'बयान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमलेश्वर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Manas Manthan
    Braj Bhushan
    250

    Item Code: #KGP-104

    Availability: In stock

    अपने आपको जानने का काम मश्किल इसलिए माना गया है कि मनुष्य स्वभाव से ही पक्षपाती है। वह निष्पक्ष होकर अपने बारे में कभी विचार कर ही नहीं सकता। अपने विषय में सोचते हुए वह निष्पक्ष रह ही नहीं सकता। दुर्बल होते हुए भी कोई भी अपने को गामा और रुस्तम से कम नहीं समझता। दो हड्डी का आदमी भी कभी-कभी कह उठता है ‘‘ऐसा दूंगा हाथ कि जाकर दस कदम दूर गिरेगा।’’ ऐसे व्यक्ति को अपने बारे में कितनी गलत जानकारी है, यह सहज ही ज्ञात हो जाता है। अज्ञानी होते हुए भी कोई अपने को अरस्तू और चाणक्य से कम नहीं समझता। ऐसे व्यक्ति भी प्रायः कहते सुने जाते हैं ‘‘अरे, अरस्तू जैसे दस को मैं अपनी जेब में रखता हूं।’’ जबकि ऐसे व्यक्ति को मैट्रिक पास करने में चार साल लग गए थे। गहन अध्ययन, आत्मनिरीक्षण और सूक्ष्म विवेचना के द्वारा ही अपने आपको जानने के मार्ग की ओर बढ़ा जा सकता है।
  • Kavi Ne Kaha : Gyanendrapati
    Gyanendrapati
    150 135

    Item Code: #KGP-163

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ज्ञानेन्द्रपति
    ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है । जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है ।  वे  कविता के नहीं, उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिसकी प्रस्तावना की थी । उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है । बेशक, यह हर बार एक नये छन्द का अन्वेषण हैं जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-द्रव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मता से सम्भव होता है । हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहां खूब बन पडा है । तदभव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है न देशज अस्मृश्य; अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक और तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जनमत भूमि पर दृढ़ता से पाँव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है । धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता-वह किसी को नहीं बख्शती । उसकी दीठ प संतप्त भूगोल है । साम्राज्यबाद के नए पैंतरों का वह पहचानती है । अभय में पगी हूई करुणा उसे विरासत में मिली है । वह एक महान् परम्परा की परिणति है ।
    स्वयं ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं ही, आयामी संग्रेहों से भी कविताएँ शामिल है, बल्कि अनेक तो पहली बार यही प्रकाशित हो रही हैं । बिला शक अपने समाज-समय को कविता को आँख से देखना-समझना चाहने वालों के लिए एक अनिवार्य-किताब नहीं-सहचर!
  • Chhatrapati Shivaji
    Lala Lajpat Rai
    150 135

    Item Code: #KGP-1876

    Availability: In stock

    छत्रपति शिवाजी

    हम शिवाजी की जीवनी संक्षेप में लिख रहे है । इसे पढ़कर पाठकों को ज्ञात होगा कि शिवाजी में महान् पुरुष होने के सभी गुण विद्यमान थे । शिवाजी प्रबंध में जितने निपुण थे, संगठन की शक्ति को भी भली-भांति जानते थे । वह संगठन के सिद्धात का ज्ञान रखते थे । यदि शिवाजी आज़ होते तो वह यूरोपियनसेनापतियों और विद्वानों से बाजी मार लेते । वह युद्धविद्या में निपुण थे । शत्रु को निर्बल करने का ढंग वह भली-भाँति जानते थे । शिवाजी बहुत धैर्य वाले व्यक्ति थे । वह किसी के व्यंग्य-बाण सहन नहीं कर पाते थे । वह वीरता और बहादुरी में अद्वितीय थे । वह औरंगजेब के प्रधानमंत्री की जरा-सी बात
    पर आगबबूला हो गए और विरोध करने से जरा-सा भी भयभीत नहीं हुए । अपने धर्म में उनका अटूट विश्वास था ।  इस संबंध में वह औरंगजेब को भी मात देते थे । वह वीरों का बहुत सम्मान करते थे । अपने सदाचार के सामने किसी को नहीं टिकने देते थे । वह अदभुत व्यक्तित्व के धनी थे । इसी कारण हम उस महापुरुष की जीवन-कहानी अपने नवयुवकों को सुनाते है । आशा है, आज के नवयुवक अपने कर्त्तव्य का पालन करेंगे और सदाचारी रहकर प्रमाण प्रस्तुत करेंगे । परमेश्वर हमरि देश के लोगों के हृदय में देशभक्ति की भावना भर दे । उन्हें देश और जाति से प्रेम करना सिखाए, साथ ही शुद्ध, पवित्र आचरण एवं आदर्श जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दे । 
    --लाजपतराय 

  • Is Jantantra Mein
    Prabhakar Shrotiya
    980 882

    Item Code: #KGP-645

    Availability: In stock

    यह पुस्तक हमारी दुनिया के लोकतंत्र की अनेक विसंगतियों का बारीक रूपायन करती है। आज जब अनेक देशों में अखबारों का मुंह तक बंद करा दिया जाता है, आंग सान सूकी जैसी बड़ी नेता और कार्यकर्ता जेल की अनावश्यक और थोपी हुई सजा काटने को विवश होती हैं तो श्रोत्रिय जी के ये लेख बड़े प्रासंगिक लगते हैं।
    यह पुस्तक पिछले कुछ वर्षों की नहीं, बल्कि पिछली कुछ शताब्दियों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक लकीरों की पड़ताल करती है...
    –प्रांजल धर 
  • Domnic Ki Vaapasi
    Vivek Mishra
    350 315

    Item Code: #KGP-9359

    Availability: In stock

    ‘डाॅमनिक की वापसी’ वर्ष 2015 के ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ से अलंकृत उपन्यास है। इसके लेखक विवेक मिश्र समकालीन हिंदी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। विवेक ने रचना के लिए सदा ऐसे कथानक चुने हैं जो समाज के किसी न किसी व्यापक सत्य को प्रकट करते हैं। इसीलिए वे लोकप्रिय रचना-पद्धतियों से अलग रास्ता तलाशते हैं। प्रस्तुत उपन्यास इसका प्रमाण है।

    इस उपन्यास के केंद्र में ‘डाॅमनिक की वापसी’ नामक नाटक है, डाॅमनिक का चरित्र निभाने वाला अभिनेता दीपांश इसका प्रेरक पात्र है। दीपांश यथार्थ और नियति के बीच झूलता अपना मार्ग तय करता है। वह उस समय रंगमंच से अदृश्य हो जाता है जब अभिनय के शीर्ष पर उसका नाम चमक रहा होता है। उपन्यास अभिनय में जीवन और जीवन में अभिनय का द्वंद्व उपस्थित करता है। प्रेम पर आधारित नाटक तो सफल होता है लेकिन जीवन में प्रेम पराजय की छायाओं से घिर जाता है।

    ‘डाॅमनिक की वापसी’ प्रेम, मानवीय संबंध, कला और जीवन की सघन बुनावट से निर्मित हुआ है। अनूठा कथानक, रचनात्मक भाषा, शिल्प सौष्ठव और दार्शनिक आभा इस रचना के उल्लेखनीय तत्त्व हैं। युवा पीढ़ी में उपन्यास रचना की सिद्धि के लिए इस उपन्यास को उदाहरणार्थ देखा जा सकता है। विश्वास है कथानक और कहन के आधार पर ‘डाॅमनिक की वापसी’ व्यापक पाठक समुदाय की प्रियता अर्जित करेगा।
  • Goonj Uthin Thaliyan
    Dr. Kusum Meghwal
    590 502

    Item Code: #KGP-GUT HB

    Availability: In stock

    मेरी लगभग 60 पुस्तकें प्रकाशित होने के बाद मेरे जीवन का यह पहला उपन्यास है–‘गूँज उठीं थालियाँ’, जो कल्पना पर आधारित नहीं है बल्कि पूरी तरह सत्य घटना पर आधारित है। इतना ही नहीं, इससे जुड़ी हुई अन्य सभी घटनाएँ भी सत्य पर आधारित हैं। केवल पात्रों के नाम, स्थानों के नामों में परिवर्तन अवश्य किया गया है।

    यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मेरी हर पुस्तक का जन्म किसी घटना के आधार पर ही हुआ है और यह उपन्यास भी उसका अपवाद नहीं है।

    इस उपन्यास का जन्म जिस घटना के आधार पर हुआ है, उसके पात्र ने तो आसमान की ऊँचाइयों को छू लिया है। उसने पूरी दुनिया को अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया है। वर्षों पूर्व उसे जिदा जमीन में गाड़ देने का फोटो तो मैं नहीं ले पाई, किंतु उसी घटना को पुनः दोहराने वाला फोटो मुझे उपलब्ध हो गया और तब से ही मेरे मस्तिष्क के गर्भ में पल रहे संबंधित विचारों को, उसके चित्रों को कोरे कागज पर उकेरने के लिए मेरी कलम उतावली हो गई तो उस घटना ने इस उपन्यास के रूप में जन्म लेकर अपने पाठकों तक पहुँचने का पक्का इरादा कर लिया।

    कोई भी काम अकारण नहीं होता। उसके करने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। इस पुरुषप्रधान अन्यायपरक, असमानतापरक समाज व्यवस्था के विरोध का कीड़ा तो मेरे दिमाग में बचपन से ही कुलबुलाने लग गया था, कितु उसे निकालने का काम अब कई वर्षों बाद अर्थात् मेरे जीवन के उत्तरार्द्ध में हो रहा है।

    वैसे तो अपनी खुद की समझ आने के बाद से अर्थात् लगभग पाँच वर्ष की उम्र से लड़की के पैदा होने से लेकर मरने तक के पूरे जीवन में कदम-कदम पर उसके साथ होने वाले भेदभाव, अन्याय, अत्याचार, उसके हर कदम पर लगाए गए प्रतिबंधों को मैंने न केवल पढ़ा और सुना है वरन् स्वयं भोगा भी है और वे सभी कष्ट, पीड़ाएँ एवं दर्द मेरी कहानियों, कविताओं के माध्यम से बह निकले, जिन्होंने हिंदी साहित्य के विशाल समुद्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

    यह उपन्यास भी नारी व्यथाओं तथा उसके कष्ट, दर्द, पीड़ाओं को अभिव्यक्ति देता हुआ नारी को क्रांतिकारी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली मेरी कहानियों, कविताओं की श्रृंखला में एक और कड़ी के रूप में जुड़ गया है, जो मेरे पाठकों को मेरी पूर्व की पुस्तकों की तरह ही पसंद आएगा, ऐसी मेरी उम्मीद है।

    वैसे तो लेखक की हर रचना की सफलता-असफलता का निर्णायक पाठक वर्ग ही होता है, कितु अपने पाठक वर्ग की मानसिकता को पहचानते हुए मुझे यह लिखने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती कि यह भी उन्हें पसंद ही आएगा।

    मेरे जीवन का यह प्रथम उपन्यास हिंदी उपन्यास जगत् में लाते हुए, अपने पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे अतीव हर्ष हो रहा है।

    मुझे यहाँ यह लिखने में भी कोई आपत्ति नहीं है कि हिंदी साहित्य जगत् के ठेकेदार, आलोचक व समालोचक इसे चाहे किसी भी दृष्टि से लें, किंतु अपने लेखकीय दायित्व को मैंने पूरी ईमानदारी से निभाया है, इसे कोई झुठला नहीं सकता। वैसे भी खरा-सच्चा लेखक, समाज की खरी-सच्ची बातें लिखने वाला लेखक किसी की आलोचना की परवाह नहीं करता। वह अपने जीवन के महान् लक्ष्य की प्राप्ति में लगा रहता है और मैं भी अपने जीवन के महान् लक्ष्य पुरुषों द्वारा नारी को भी एक इनसान मान लेने के लक्ष्य को पूरा करने में लगी हुई हूँ और आजीवन लगी रहूँगी। मुझे अपने इस दृढ़ निश्चय से कोई हटा नहीं सकता।

    मुझे आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि अपने आपको इनसान के तराजू में तौलने और उस पर खरे उतरने वाले इनसानी पुरुषों की भागीदारी, उनका स्नेह, सहकार तथा प्रोत्साहन मुझे अवश्य मिलेगा।

    इसी उम्मीद के साथ---

    डॉ. कुसुम मेघवाल

  • Shiksha : Maanaviya Samvednayen Evam Sarokar
    Jagmohan Singh Rajput
    380 342

    Item Code: #KGP-729

    Availability: In stock

    ‘शिक्षा: मानवीय संवेदनाएँ एवं सरोकार’ में वर्ष 2011 के बाद विभिन्न आयामों पर लिखे गए लेख शामिल किए गए हैं। अधिकांश शिक्षा के विभिन्न पक्षों पर वर्तमान स्थिति तथा उसमें परिवर्तन की आवश्यकता तथा संभावित समाधानों की चर्चा करते हैं। इस संग्रह में ऐसे लेख भी रखे गए हैं जो सीधे-सीधे शिक्षा व्यवस्था से जुड़ते नहीं लगते थे। उन्हें रखा इसलिए गया था कि शिक्षा व्यवस्था को केवल विभागीय या मंत्रलय स्तर पर ही नहीं देखा जाना चाहिए। समाज के हर पक्ष तथा परिवर्तन का शिक्षा व्यवस्था से जीवंत जुड़ाव है। इसमें आर्थिक, सांस्कृतिक तथा नैतिकता के परिवर्तन भी प्रमुखता से आते हैं। राष्ट्रीयता तथा वैश्विकता के हर आयाम से शिक्षा स्पष्ट रूप से जुड़ती है। विकास और प्रगति की गति शिक्षा की गतिशीलता तथा परिपूर्णता पर ही निर्भर करती है। भारत की कृषि व्यवस्था में आई शिथिलता से लेकर सिलिकान वैली में युवा भारतीयों द्वारा नाम कमाया जाना शिक्षा की गुणवत्ता की श्रेष्ठता या कमजोरी से ही जुड़ते हैं। हिंसा, अविश्वास, शोषण, आतंकवाद, पंथिक उन्माद जैसी विभीषिकाओं ने विश्व में असुरक्षा की स्थिति पैदा की है। इसका समाधान भी शिक्षा की सुदृढ़ता, गुणवत्ता तथा नैतिकता को आत्मसात् कराने की क्षमता पर ही निर्भर करेगा।
    इसी पृष्ठभूमि में इस पुस्तक में लेखों को शामिल किया गया है। इसमें समस्याएँ वर्णित हैं, व्यक्तियों के योगदान भी निहित हैं, भाषा की बातें हैं, अध्यापकों पर विवेचन हैं, माता-पिता, संस्कारों, मूल्य शिक्षा, शिक्षा के मूल अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन की चर्चा है और प्रयास यह रहा है कि सभी महत्त्वपूर्ण पक्ष पाठक के सामने उभरकर आ जाएँ। वे अपेक्षाएँ भी उभरी हैं जो सामान्यजन की अवधारणा में शिक्षा को प्रभावित करती हैं। 
  • Sunanda Ki Dairy (Paperback)
    Raj Kishore
    195

    Item Code: #KGP-903

    Availability: In stock

    एक थी सुनंदा  ।
    संपन्न परिवार की लड़की । मित्र से पति बने मलय के  साथ नहीं बनी, तो वह किसी नीहारिका की तरह शून्य में विचरण करने लगी । कभी इस शहर में, कभी  उस शहर में  । उसने कई नौकरियाँ कीं, परंतु स्वतंत्रता की उसकी चेतना ने उसे कहीं भी टिकने नहीं दिया । यह एक अदृश्य बेचैनी का शिकार थी । उसके मन में कई तरह के सवाल उमड़ते-घुमड़ते रहते थे, पर किसी भी उत्तर से उसे संतोष नहीं होता था । उसकी यह खोज ही उसे नैनीताल ले आई, जहाँ वह कुछ दिनों तक विश्राम करना चाहती थी, ताकि आगे की जिंदगी की कोई रूपरेखा उभर सके ।
    एक था सुमित ।
    मस्त, फक्कड़ और विचारशील । माँ-बाप नहीं रहे, तो पारिवारिक संपत्ति को अपने गाँव के कल्याण के लिए समर्पित कर वह आवारगी करने लगा । उसकी एक अंतरंग मित्र मंडली थी, जिसके आर्थिक सहयोग से वह अपनी मनचाही जिंदगी बिता रहा था । उसकी जिंदगी में किताब, शराब और सिगरेट के अलावा और कुछ नहीं था । घुमते-फिरते वह भी नैनीत्ताल आ गया । संयोग से यह उसी गेस्ट हाउस में ठहरा जहाँ सुनंदा ठहरी हुई थी ।
    दोनों की मुलाकात दोनों  के ही लिए एक अविस्मरणीय घटना बन गई । सुनंदा और सुमित विभिन्न विषयों पर बातचीत करने लगे, जैसे ईश्वर, धर्म, नैतिकता, प्रेम, विवाह, स्त्री, लोकतंत्र, मानव अधिकार आदि । इसके साथ ही, दोनों के हृदय अनुराग की आभा से भरते चले गए । लेकिन परिपाक की ऐश्वर्यमयी रात के तुरंत बाद जुदाई का मुहूर्त आ पहुंचा - दोनों की जिंदगी को एक नई दिशा प्रदान करने के लिए ।
    'सुनंदा की डायरी' विचार-विमर्श के इन्हें घटनापूर्ण दिनों का दिलचस्प दस्तावेज है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nasera Sharma
    Nasera Sharma
    200 180

    Item Code: #KGP-618

    Availability: In stock

    अपनी कहानियों में इंसानी पीड़ाओं के अहसास को जीवंत अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली लेखिका नासिरा शर्मा जीवन के विविध कार्य एवं अनुभव-क्षेत्रों से विषय अर्जित करके, रचाव की संपूर्ण प्रयोगनिपुणता के साथ रचना प्रस्तुत करती हैं । कथा-संसार की यह विविधता जहाँ उनके पाठकों के लिए उपहार-सम है यहीं आलोचकों-समीक्षकों के लिए एक चुनौती भी-कि ऐसे में उन्हें किस कद-पद का कहानीकार मान्य किया जाए ? विगत छवि की निर्मिति-भंजन का काम वे स्वयं अपनी प्रत्येक नई रचना में करती प्रतीत होती हैं तथा इस प्रकार पाठक की ताजा आश्वस्ति भी पाती हैं ।
    इन कहानियों में नासिरा शर्मा इंसानी देह-नेह की आदिम इच्छाओं की विचारणाओं के साथा-साथ राष्ट्र, इतिहास, धर्म और प्रकृति की अभिव्यक्ति के पर्यावरण से भी संबोधित हैं । जन की कथाओं की व्यापक परिधि पर जड़ित ये कहानियाँ संपूर्ण मानवीय प्रवृति की संस्कृति और उसकी रसभंगता को पाठकों के सामने रखती हैं। नवरसों को समान कूतित्व देती ये कहानियाँ कालांतर में हमारे मनो-मस्तिष्क से उड़ नहीं जाती, बल्कि यहीं अपनी स्मृति का स्थान निर्धारित कर लेती है ।
    नासिरा शर्मा द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं-'जोड़ा', 'बावली', 'कशीदाकारी', 'पाँचवाँ बेटा', 'दूसरा ताजमहल', 'आमोख़्ता', 'तीसरा मोर्चा', ‘मिस्टर ब्राउनी', 'अपनी कोख' तथा 'चार बहनें शीशमहल की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका नासिरा शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे ।
  • Naamdev Rachanavali
    Govind Rajnish
    320 272

    Item Code: #KGP-146

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • Mera Paigaam Muhabbat Hai Jahan Tak Pahunche (Paperback)
    Jigar Muradabadi
    150

    Item Code: #KGP-7111

    Availability: In stock

    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
    'जिगर' साहब इंसानियत और शेरियत दोनों का पैकर थे । उनकी शायराना अजमत का बडा राज उनकी मखसूस सज-धज, तर्जेअदा और तरन्नुम था । उनकी मासूम जोर दिलकश शखसियत ने उन्हें अपने दौर का महबूब-तरीन शायर बना दिया था । उनकी बड़ाई को इस पैमाने से भी नापा जा सकता है कि दौरे जदीद में कितनों ने जिगर बनने की कोशिश की, इसलिए कि शेर की दुनिया के वह एक तर्ज थे। असलूब थे, एक स्टाइल थे ।
    'जिगर' ने गजल को एक नई जिंदगी बख्शी । उनकी गजले मदहोशी व रंगीनी के छलकते हुए सागर  हैं, जिससे तरह-तरह के रंग मौजूद है और किस्म-किस्म के जजबात जलवागर हैं,
    जिनका मुताअला जिंदगी के नशे को गहरा कर देता है, कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और हयात नये रूप में जलवागर होकर दिल की धड़कन में जज्ब हो जाती है । खून को रवानी तेज हो जाती है और शायरी के तारों से आहंग हो जाती है। ये इंतेखाबे गजल के अशआर ऐसे है जिनमें नई जिंदगी और वक्त की धड़कनों की आवाजें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख 'जिगर' को कभी भुला नहीं सकेंगी ।
  • Neend Se Pahale
    Soma Bharti
    195 176

    Item Code: #KGP-373

    Availability: In stock

    नींद से पहले
    सोमा भारती की कहानियां हमें उस जानी-पहचानी निम्न- मध्यमवर्गीय दुनिया में ले चलती हैं, जिनसे हम जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जिन्हें हम देखकर भी अनदेखा किए रहते हैं।
    इनके पात्र, चाहे वह ‘जस्सो मासी मर गई’ की जस्सो मासी हों या ‘नींद से पहले’ के रमापति, ‘किराये के मकान’ की पेइंग गेस्ट हो या कोई अन्य, मोमबत्तियों की तरह हवाओं में जूझते, जलते-गलते रहते हैं। वे आपसे दया की भीख नहीं मांगते, लेकिन समय, संयोग और नियति ने उन्हें जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, उसका दीदार जरूर कराती हैं कि देखो, यह मैं हूं, यह तुम भी हो सकते थे।
    सोमा ने अभिनय और एंकरिंग आदि अभिव्यक्ति के जिन मंचों पर काम किया है, उसका लाभ उनकी भाषा-भंगिमा, भाव और बोध को मिला है। कहानियों के रचाव-रसाव के लिए सोमा को किसी सायासता की जरूरत नहीं पड़ती, भाषा-शिल्प के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते, न ही चैंकाने वाले चमत्कारों के टोने-टोटके टटोलने की आवश्यकता होती है। कहानियों की सहज संवेदना ही उनकी शक्ति है, जिनकी तासीर खुद-ब-खुद आपको पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
    सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ! सोमा ने दूसरी कहानियां न भी लिखी होतीं, उनकी अकेली कहानी ‘जस्सो मासी मर गई’ ही उन्हें अमर बना सकती है।
    --संजीव
  • Aur Ant Mein Ishu
    Madhu Kankria
    120 108

    Item Code: #KGP-160

    Availability: In stock

    ...और अंत में ईशु
    मधु कांकरिया के प्रस्तुत नव्य कथा-संग्रह की कहानियाँ समसामयिक भारतीय जीवन के ऐसे व्यक्तिव के कथामयी रेखाचित्र हैं, जो समाज के मरणासन्न और पुनरुज्जीवित होने की समांतर कथा कहते हैं । इनमें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के वैसे विरोधाभास और वैपरीत्य के दर्शन-दिग्दर्शन होते हैं, जिनसे उत्पन्न विसंगतियों के ही चलते 'दीये तले अँधेरे' वाला मुहावरा प्रामाणिक बना हुआ है।
    आज का जागरुक पाठक सर्जनात्मक कथा-साहित्य में वर्ण और नारी आदि के विमर्शों की अनंत बाढ़ की चपेट में है और ऐसे 'हवा महलों' के संभवत: खिलाफ भी, जो कि उसे ज्ञान जोर संज्ञान के स्तर पर कहीं शून्य में ले जाकर छोड़ देते है । इसके उलट प्रस्तुत कहानियों में जीवन की कालिमा और लालिमा, रति और यति, दीप्ति और दमन एवं प्रचार और संदेश को उनके सही-सही पदासन पर बैठाकर तोला, खोला और परखा गया है । अभिव्यक्ति के स्तर पर विचारों का कोरा रूखापन तारों न रहे, इसलिए लेखिका ने प्रकृति और मनोभावों की शब्दाकृतियों को भी लुभावने ढंग और दुश्यांकन से इन कहानियों में पिरोया है । धर्मांतरण  का विषय हो या कैरियर की सफलता के नाम पर पैसा कमाने की 'मशीन' बनते बच्चों के जीवन की प्रयोजनहीनता ...या फिर स्त्री के नए अवतार में उसके लक्ष्मी भाव और उर्वशीय वांछनाओं की दोहरी पौरुषिक लोलुपताएँ-कथाकार की भाषागत जुलाहागीरी एकदम टिच्च मिलती है। इसे इन कहानियों का महायोग भी कहा जा सकता है ।
    सृजन को जो कथाकार अपने कार्यस्थल के रूप में कायांतरित का देता है, वह अपने शीर्ष की ओर जा रहा सर्जक होता है । विश्वास है कि पाठक को भी यह कृति पढ़कर वेसा ही महसूस होगा। ऐसा अनुभव इसलिए अर्जित हो सका है, क्योंकि ये कहानियाँ जीवन के अभिनंदन पत्र नहीं, बल्कि माननीय अपमान और सम्मान की श्री श्री 1008 भी हैं।
  • Veshya
    Ajay Kumar Singh
    395 356

    Item Code: #KGP-1979

    Availability: In stock

    वेश्या
    अच्छे समाज के निर्माण की प्रक्रिया में स्वयं समाज को अनेक अंतर्विरोधों से जूझना पड़ता है। समाज का उत्थान हर व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत लाभों के त्याग द्वारा ही सुगम बनता है। मनुष्य का स्वार्थी होना स्वाभाविक गुण है, जो उसे सीमित करता है। वही त्याग का आदर्श है, जिससे निर्माण एवं सृजन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। समाज जब अपने वेश्यापन को छोड़ आदर्श की ओर बढ़ेगा तभी हम सभ्य समाज का निर्माण कर सकेंगे।
    आज के समय में समाज का बहुसंख्यक वर्ग निजी लाभ को समाज के लाभ से श्रेयस्कर समझता है। यह रीति ही हमें तृतीय विश्व के देशों का हिस्सा बनाती है। हमारी सोच प्रथम विश्व एवं द्वितीय विश्व के समाज के समान नहीं है। यही हमारा दुर्भाग्य है। ऐसे में कुछेक ऊँची सोच वाले लोग अंत में अपने को ठगा हुआ-सा महसूस करते हैं।
  • Path Prajya (Paperback)
    Veena Sinha
    100

    Item Code: #KGP-7062

    Availability: In stock

    ‘पथ प्रज्ञा' श्रीमती वीणा सिन्हा की एक उल्लेखनीय औपन्यासिक कृति है। प्रागैतिहासिक काल की एक प्रचलित कथा का पुनर्पाठ करती लेखिका ने ‘पथ प्रज्ञा' माधवी के माध्यम से समाज के नियंताओं द्वारा नारी-शोषण की अद्यतन प्रवृत्ति का सूत्र पकड़ा है। वैदिक राजाओं के यहाँ और आश्रमों में व्याप्त नारी-शोषण की कथा इस उपन्यास के केन्द्र में है। यहाँ उदात्त कर्मों के लिए समर्पित दिखने वाले ऋषि आश्रमों के नियंता हैं। ययाति जैसे दानवीर एवं ऋषियों का सम्मान करने वाले धर्म-प्रवण यशस्वी राजा हैं। गालव अपने गुरु विश्वामित्र को गुरुदक्षिणा दे सके, इसके लिए अपनी पुत्री माधवी को देह के उपयोग का आदेश देने वाले ययाति हैं। राजा के इस मनमाने आदेश पर शास्त्र-सम्मति की मुहर लगाने वाली दरबारी व्यवस्था है। राजकन्या की देह को एक समयावधि तक भोग कर एक यशस्वी पुत्र एवं गुरुदक्षिणा का एक अंश वसूलने वाले स्वयं ऋषि विश्वामित्र भी हैं।
    इस उपन्यास की देह में भोग-विलास में डूबे रहने वाले हर्यश्व से लेकर एकपत्नीनिष्ठ दिवोदास और सच्चे प्रेमी तथा शास्त्र-सम्मत कर्म करने वाले उशीनर जैसे अयोध्या, काशी और भोजनगर राज्यों के राजा चित्रित हैं। मगर यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि माधवी की देह का एक निश्चित अवधि तक शुल्क देकर भोग करना इन तीनों ही राज्यों में नियमविरुद्ध नहीं है। नारी-शोषण के इस सनातन रूप को लेखिका मानो आज की तिथि में शपथ-पत्र की तरह प्रस्तुत करती है। सत्य-संरक्षण की ऐसी विश्वसनीयता समकालीन लेखन में दुर्लभ है। इसीलिए इस उपन्यास को एक उल्लेखनीय कृति कहा गया है।
    इस उपन्यास में स्त्री-पुरुष के स्थूल और सूक्ष्म स्तर के परस्पर संबंधों, व्यष्टि-समष्टि तथा व्यक्ति और राज्य के रिश्तों एवं ज्योतिष और दर्शन जैसे गूढ़ विषयों पर सार्थक और पारिभाषिक वार्तालाप इस कृति का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
    उपन्यास के अंत में माधवी द्वारा लिया गया निर्णय समाज द्वारा नारी के अपपाठ की एक प्रतिक्रिया है जहाँ माधवी सक्रिय नहीं, सार्थक होती है।
    और अंत में यह भी कि वैदिक काल के सूक्ष्म और गहन अध्ययन-विश्लेषण के कारण ही लेखिका ने भाषा में संस्कृतनिष्ठता तथा बाणभट्ट के जैसे भाषा-लालित्य का समावेश करके उसे युगानुरूप बनाने की चेष्टा की है।
  • Teesara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    50

    Item Code: #KGP-7051

    Availability: In stock

    ग़ज़ल शतकों में सम्मिलित कवि
    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उदयप्रताप सिंह ०  कुमार शिव ०  गोपालदास ‘नीरज’ ०   चिरंजीत ०  ज़हीर कुरैशी ०  ज्ञानप्रकाश विवेक ०  त्रिलोचन ०  दुष्यंत कुमार ०  देवेंद्र माँझी ०  प्रमोद तिवारी ०  बलबीर सिंह ‘रंग’ ०  बालस्वरूप राही ० भवानी शंकर ०  मासूम ग़ाज़ियाबादी ०  मृदुला अरुण ०  राजनारायण बिसारिया ०   रामकुमार कृषक ०  रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’ ०  रामदरश मिश्र ०  रामावतार त्यागी ०  शलभ श्रीराम सिंह ०  शिव ओम ‘अंबर’ ०  शेरजंग गर्ग ०  सुरेंद्र श्लेष ०  सूर्यभानु गुप्त।
    दूसरा ग़ज़ल शतक
    अशोक वर्मा ०  आचार्य सारथी ०  उपेन्द्र कुमार ०  उर्मिलेश ०  ओमप्रकाश चतुर्वेदी ‘पराग’ ०  कमल किशोर ‘भावुक’ ०  कमलेश भट्ट ‘कमल’ ०  कुँअर बेचैन ०  ज्योति शेखर ०   नरेन्द्र वसिष्ठ ०  पुरुषोत्तम ‘वज्र’ ०  प्रभात शंकर ०  महेश जोशी ०  योगेन्द्र दत्त शर्मा ०  रंजना अग्रवाल ०  रामनारायण स्वामी ०  रामनिवास ‘मानव’ ०  लक्ष्मण ०   विजय किशोर ‘मानव’ ०  विनीता गुप्ता ०  शिवबहादुर सिंह भदौरिया ०  श्रवण राही ०  सरोज व्यास ०  हरजीत ०   हरिओम।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh (Paperback)
    Mohan Rakesh
    90

    Item Code: #KGP-1359

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मोहन राकेश
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकु' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Antarvartayen
    Kanhiya Lal Nandan
    240 216

    Item Code: #KGP-802

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक में सम्मिलित लगभग सभी बातचीतें किसी न किसी प्रतिष्ठित पत्रिका के माध्यम से पहले भी पाठकों के सन्मुख आ चुकी हैं, लेकिन समवेत रूप में दिनकर और अज्ञेय से लेकर कामतानाथ तक कई पीढ़ियों के रचनाकारों के अंतरंग मन में पैठा जा सके और उस पैठ के ज़रिए साहित्यिक जिज्ञासुओं की प्रश्नाकुल उत्कंठाएँ शांत हो सकें, इस दृष्टि से इस पुस्तक का विशेष महत्त्व मैं मानता रहा हूँ । फिल्मकार बासु भट्टाचार्य, चित्रकार कृष्ण हेब्बार और छायाकार रघु राय भी बातचीत के इस समवेत क्रम में सम्मिलित कर लिए गए हैं ताकि संवेदना के धरातल पर अनेक माध्यमों से जुड़े हुए लोगों की एकसूत्रता की प्रतिच्छवि भी आँकी जा सके ।
    कोई भी रचनाकार अपने युग को सिर्फ अपनी विधा के चश्मे से नहीं देखता । यह अगर कहानीकार है तो उसके साथ-साथ एक संघर्ष करता हुआ सामाजिक प्राणी भी है; जो कि ट्रेन-यात्रा में टिकट के लिए धक्के खाता भी हो सकता है, समाज में फैली किसी बुराई विशेष के प्रति एक आदमी की तरह सोच भी सकता है और उसकी प्रतिक्रिया में हिस्सेदार भी हो सकता है । रचनाकार को उसके समूचे रंगों में टटोलने की इसी जद्दोजहद से मैंने इन बातचीतों के क्रम में कुछ ऐसे ढंग से यह बार सवाल रखे हैं जो पूर्वापर संबंध के साथ असंगत दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उस बातचीत के समूचे प्रभाव में मुख्य उद्देश्य यहीं रहा है कि यह रचनाकार अपने मन के अछूते पहलुओं को पाठकों के सामने खोले; खासकर ऐसे पहलू जिन पर बहुत कम प्रकाश पड़ा है ।
    इस पुस्तक में सम्मिलित सभी रचनाकार व्यक्तित्व मुझे अंतरंग आत्मीयता प्रदान करते रहे हैं । संबंधों की यह अंतरंग आत्मीयता मेरी इन सभी बातचीतों का मूल आधार रही है । शायद इसीलिए जब-जब ये बातचीतें पहली बार प्रकाश में आई हैं, मुझे इनकी शैली के लिए पाठकों का अतिरिक्त स्नेह मिलता रहा है ।
    -कन्हैयालाल नंदन


  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal
    Indira Mishra
    390 351

    Item Code: #KGP-734

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
  • Maalish Mahapuran (Paperback)
    Sushil Sidharth
    150

    Item Code: #KGP-514

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    -[इसी पुस्तक से]
  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal (Paperback)
    Indira Mishra
    180

    Item Code: #KGP-410

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
    --राजेश जैन
  • Chune Huye Nibandh
    Hazari Prasad Dwivedi
    195 176

    Item Code: #KGP-850

    Availability: In stock


  • Kammi Or Nanda
    Amrita Pritam
    200 180

    Item Code: #KGP-7836

    Availability: In stock

    कम्मी और नन्दा
    नन्दा यूनिवर्सिटी की बाहरी दीवार के पास
    पहुँची ही थी कि उसने देखा कि दीवार
    के साथ  ढासना लगाकर खडी हुई एक
    औरत ने पैसे मांगने के लिए अपना हाथ
    आगे किया हुआ है—
    वह हाथ नन्दा की तरफ बढ़ता हुआ
    नन्दा की कमीज़ से छू गया... 
    नन्दा ने उस माँगने वाली औरत की तरफ
    देखा—उस औरत का चेहरा उजड़ा
    हुआ था, बाल खुश्क और माथे
    पर बिखरे हुए थे, सिर पर
    एक लीर-सा दुपट्टा थाµपर
    आँखों में एक अजीब सी चमक
    और हसरत थी-नक्श रुले हुए थे,
    बुरे नहीं थे—वह हाथ के नन्दा के
    आगे पसारकर-एकटक नन्दा के
    मुँह को देखे जा रही थी…
    नन्दा उकताई-सी तेज कदमों से घर
    जाने वाली बस क्रो तरफ़ चल दी ।
    लेकिन बस के पायदान पर
    एक पॉव रखा ही था कि
    अचानक नन्दा को खयाल आया—
    'कौन जाने यह माँगने वाली
    औरत ही मेरी माँ हो...'
    -नन्दा का एक सपना
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    185 167

    Item Code: #KGP-2080

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार निर्मल वर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दहलीज', 'लवर्स', 'जलती झाड़ी', 'लंदन की एक रात', 'उनके कमरे'', 'डेढ़ इंच ऊपर', 'पिता और प्रेम', 'वीकएंड', जिंदगी यहाँ और वहाँ' तथा 'आदमी और लड़की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक निर्मल वर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jal Jo Jeevan Hai
    Harish Chandra Vyas
    300 270

    Item Code: #KGP-520

    Availability: In stock

    जल, जो जीवन है 
    विश्व-स्टार पर गहराते जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्षा 2003 को 'अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छ जल वर्ष' घोषित किया है । यही भारत सहित दुनिया के देशों ने अपना रवैया नहीं बदला तो जल विभिन्न देशों में तनाव और जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता का विषय बने बगैर नहीं रह सकता। अतः जल-संसाधनों के प्रति सचेत होने की परम आवश्यकता है । 'जल, जो जीवन है' का सर्जन लेखक ने दो प्रतिमानों को सामने रखकर किया है— प्रथम, जल-संकट की गंभीरता के बारे में जागरूकता में वृद्धि करना और द्वितीय इस समस्या के निदान व समाधान हेतु सर्जनात्मक सुझाव पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करना। 
    प्रस्तुत पुस्तक में जल से संबंधित उभरते समस्त संकटों तथा उनके समाधान हेरु सरल भाषा में जानकारी प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न किया गया है। 
  • Aadarsh Saamaanya Hindi (Paperback)
    Vijay Agarwal
    40

    Item Code: #KGP-7105

    Availability: In stock


  • Chor Darvaazaa
    Jiten Thakur
    225 203

    Item Code: #KGP-292

    Availability: In stock

    जितेन ठाकुर की कहानियां यह स्थापित करती हैं कि कहानी एक निरंतर बदलने वाली विधा है जो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती क्योंकि कहानी अपने समय को यदि रूपायित नहीं करती और अपने काल की त्रसदी को नहीं पहचानती, तो उस समय और उस दौर का पाठक भी कहानी को पहचानने से इनकार कर देता है।
    जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।
    लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।
    क्या इतना बहुत नहीं है कि अपने समय के इस मित्र रचनाकार ने कहानी की विगलित और परंपरापूरक अपेक्षाओं से हटकर, अपने समय के मनुष्य का साथ दिया है?
  • Sant Raidas
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-276

    Availability: In stock

    दलित वंश में संभूत रैदास अपने समय में एक श्रेष्ठ चमत्कारी संत माने जाते थे। उनका आदर राजा से लेकर रंक तक करते थे। रैदास विचित्र संत थे। वे जूते सिलते जाते थे और भजन गुनगुनाते जाते थे। उनका अधिकांश काव्य इसी प्रकार रच गया ।
    संत रैदास का जीवन आर्थिक तंगी में कटा, किंतु उन्होंने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया । उन्हें पारस पत्थर तक प्राप्त हुआ। वे चाहते तो चाहे जितना सोना बना लेते किंतु उन्होंने उस पारस पत्थर का उपयोग कभी नहीं किया । वे अत्यंत संतोषी जीव थे। फाकेमस्त और फक्कड़ रैदास चमत्कारी संत थे।
    यह विशेष उल्लेख्य है कि वे इतने यशस्वी बन गए कि चर्मकार बिरादरी अपने आप को 'रैदास' कहने लगी। आज भी गाँवों में चर्मकार अपने को रैदास बताते हैं।
    धन्य थे रैदास ! पूज्य थे रैदास !!
  • Vichardhara Naye Vimarsh Aur Samkaleen Kavita
    Jitendra Shrivastva
    500 450

    Item Code: #KGP-831

    Availability: In stock

    विचारधरा, नए विमर्श और समकालीन कविता
    इन दिनों भारतीय समाज अनेक संकटों से जूझ रहा है। आज समाज, राजनीति, साहित्य और नैतिकता को परिभाषित करने के लिए नवाचार की गंभीर जरूरत है। ऐसे में जितेन्द्र श्रीवास्तव का आलोचना-कर्म उफधर्वता और मूलगतता, दोनों ही स्तरों पर समकालीन प्रश्नों से सक्रिय व उफर्जस्वित मुठभेड़ करता है और वास्तविकता में इस कार्य की परिणति साहित्य की इयत्ता खोजने में होती है। संक्रमण के इस भयावह युग में जितेन्द्र अपने आलोचना-कर्म के माध्यम से उफधर्वता में कवियों के मूल्यांकन के साथ नई विचारधाराओं और विमर्शों के अंतर्द्वद्वों को चिन्हित करते हैं, तो दूसरी ओर अपनी मूलगामिता में साहित्य को नए मूल्यों और मौजूदा संकटों की धार पर परिभाषित भी करते हैं।
    कभी संकट और संशय के वक्त में निराला से लेकर मुक्तिबोध तक और विजयदेवनारायण साही से लेकर अस्सी के दशक तक हमारी भाषा के महत्त्वपूर्ण कवियों ने आलोचना-कर्म के लिए कलम उठाई थी। जितेन्द्र श्रीवास्तव का आलोचना-कर्म इसी परंपरा का विस्तार है। जितेन्द्र की आलोचना एक अच्छी कविता की तरह आत्मा की त्वचा का स्पर्श करती है। उसमें विद्वत्ता के प्रदर्शन की कहीं कोई अभिलाषा नहीं है। कह सकते हैं कि सृजन- विरोधी समय में यह सृजनधर्मी आलोचना का प्राणवान और विनम्र उदाहरण है। जितेन्द्र अपनी आलोचना में ‘रचना की अद्वितीयता’ का संधन करते हैं। वे ऊपर- झापर करके आगे बढ़ जाने वाले आलोचकों में नहीं हैं। रचना का गहन उत्खनन उनका अभीष्ट है।
    यहां यह कहने में कोई दुविध नहीं है कि यह पुस्तक काव्यालोचना के क्षेत्र में छाए हुए सन्नाटे को भंग करते हुए एक बड़ी कमी को पूरा करती है।
  • Teri Roshanai Hona Chahati Hoon
    Alka Sinha
    140 126

    Item Code: #KGP-524

    Availability: In stock

    तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ
    प्रतिष्ठित कवयित्री अलका सिन्हा की नवीनतम काव्यकृति 'तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ' की पेम कविताएँ उस कोमल और अमूल्य अहसास की पावन कराती हैं, जिसका अभाव किसी को वहशी बना देता है तो किसी को संन्यासी । इन कविताओं में महानगरीय जीवन की आपाधापी के बीच एक भावात्मक विस्तार की अनुभूति होती है और यह विस्तार कहीं-कहीं तो दार्शनिकता पर जा टिकता है । इसीलिए पूरी कृति में बिखेरे प्रेम-प्रसंगो के वावजूद नितात निजी और आत्मीय क्षणों का यह अहसास कहीं भी छिछला या बेपर्दा नहीं होता । कवयित्री आम जिंदगी की मामूली घटनाओं को सरल और सधी भाषा में अपनी कविताओं में इस प्रकार गुंफित करती है मानो कविता की गलबहियां डाले कोई कहानी साथ-साथ चलती हो ।
    ये कविताएं एक ओर प्रकृति में जीवन की अनंत संभावनाओं की तलाश करती हैं तो दूसरी ओर युगीन विषमताओं पर व्यंग्य भी कसती हैं । सामाजिक चेतना से संबद्ध एक स्वस्थ विमर्श इन कविताओं को लोकमंगल की भावना से जोड़ता है ।
    हर किसी को अपनी-सी लगती ये कविताएं तमाम तनावों, परेशानियों और नाकामियों के बीच जीवन के प्रति आस्था और विश्वास जगाती है और आश्वस्त करती है कि सचमुच कीमती है हमारे बीच बची प्रेम की तरलता !
  • Chehre Aur Chehre
    Ram Kumar Bhramar
    60 54

    Item Code: #KGP-1809

    Availability: In stock

    चेहरे और चेहरे
    'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के जिन स्तम्भों को हिन्दी पाठक का अपूर्व स्नेह और लोकप्रियता मिली, उनमें 'इस बार' का विशेष महत्त्व रहा है । 'चेहरे और चेहरे' रामकुमार भ्रमर द्वारा विभिन्न क्षेनों में समय-समय पर बहुचर्चित रहे व्यक्तियों के उन्हीं चरित्र-व्यंग्यों का संकलन है, जो उन्होंने 'इस बार' के अन्तर्गत लिखे थे । सुप्रसिद्ध कार्दूनिस्ट रंगा द्वारा इन चरित्रों के जो कार्टून उन लेखों के साथ बनाये गए थे, उन्हें भी प्रस्तुत पुस्तक में सहेजा गया है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के इन व्यक्तियों को लेकर लेखक ने समय-समय पर जो कुछ लिखा, वह बहुत पसंद किया गया । इन चरित्रों को लेकर भ्रमर के व्यंग्यपूर्ण लेखन की गुदगुदी पाठक का मन लुभा लेती है और अनायास ही चेहरे और चेहरे की मुस्कान बन जाती है ।

  • Chhota-Sa Break
    Vishnu Nagar
    300 270

    Item Code: #KGP-9242

    Availability: In stock

    छोटा-सा ब्रेक
    विष्णु नागर अपनी कविताओं के लिए जितने जाने जाते हैं, अपने व्यंग्यों के लिए भी कम नहीं जाने जाते। ‘छोटा-सा ब्रेक’ में समसामयिक घटनाओं पर छोटे-छोटे व्यंग्य संकलित हैं, जो उन्होंने (दैनिक) ‘नई दुनिया’ में प्रतिदिन ‘गरमागरम’ स्तंभ के अंतर्गत लिखे थे और जिन्हें पाठकों द्वारा बहुत पसंद किया गया था। अधिकतर पाठक तो अखबार खोलकर पहले ‘गरमागरम’ स्तंभ ही पढ़ते थे। जैसा कि आप देखेंगे, ये व्यंग्य-आलेख भले ही समसामयिक घटनाओं- चरित्रों पर हों, मगर इनमें समय की सीमा में रहकर भी उस सीमा के पार जाया गया है। एक सच्चा रचनाकार यही करता है, इसलिए ये व्यंग्य हमारा खयाल है कि कभी पुराने नहीं पड़ेंगे। इसके अलावा ये व्यंग्य उस समय-विशेष का राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज भी हैं, एक ऐसा दस्तावेज, जो सत्ताधीशों की तरफ से नहीं, बल्कि साधारण जनता की तरफ से लिखा गया है, जिसमें उसके तमाम दुःख-तकलीफ दर्ज हैं, उसका व्यंग्य-विनोद भाव अंकित है। ये व्यंग्य परसाई और शरद जोशी दोनों की परंपरा में हैं। उस परंपरा में हैं और अपनी एक अलग परंपरा भी ये बनाते हैं। इनमें शैलियों का अद्भुत वैविध्य है, भाषा की अनोखी सहजता और प्रवाह है। इन्हें पढ़कर नहीं लगता कि व्यंग्य करने के नाम पर शाब्दिक खिलवाड़ की गई है। ये असली चिंता से उपजे व्यंग्य-आलेख हैं। इन्हें पढ़कर समाज को देखने-परखने की एक नई—ऊर्जस्वित दृष्टि भी मिलती है, मात्रा हलका-फुलका मनोरंजन नहीं होता, जैसा कि सामान्यतः व्यंग्य आजकल करते पाए जाते हैं। कैसे गंभीर से गंभीर बात को, जटिल से जटिल विषय को, सहजता-सरलता और व्यंग्यात्मकता से उठाया जाए, इस बात का उदाहरण बनते हैं ये व्यंग्य। इन्हें पढ़कर लगेगा कि व्यंग्य की मौजूदा स्थिति से निराश होने की नहीं, फिर से उत्साहित होने की जरूरत है।
  • Dr. Ambedkar : Chintan Aur Vichaar
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    320 288

    Item Code: #KGP-1922

    Availability: In stock

    डॉ० अम्बेडकर : चिंतन और विचार
    प्रवंचित, दलित, विसंगठित, शोषित और पीडित जन-जन के जननायक निर्वासित और बहिष्कृत जनता के प्रणधन  महामहिम डॉ. अम्बेडकर की वैचारिक भूमिका ज्ञान-विज्ञान की अन्तश्वेतना और जीवन-व्यवहार की नैसर्गिक पृष्ठभूमि एक ऐसे दिव्य अध्याय का प्रारंभ है, जिससे सर्त्स समाज में नवजीवन का संचार हुआ और जिससे जीवन-धर्म की पृनर्स्थापना संभव हो सकी ।
    डॉ० अम्बेडकर की चिंतन पृष्ठभूमि सत्याहिंसा पर आधृत थी, और लोकतांत्रिक इयत्ताओँ एवं मर्यादाओं की संपोषक थी । यथार्थत: डॉ० अम्बेडकर एक ऐसी वैचारिक संस्था के रूप में सामने जाए जिससे लोकतंत्र की सहज प्रवृत्तियों की विविध धाराएं प्रस्फुटित होकर विकसित होती है और एक प्राणवान् तथा उदात्त समाज की संस्थापना करती हुई मांगलिक धर्म, अर्थ व काम नीति की त्रिवेणी के रूप में निर्बाध प्रवाहित होती हैं । इस ग्रंथ में इन्हीं मूल्यवान और सहजीवनीय अंतर्वत्तियों के संयोजन का दिशा-निर्देश प्राप्त करने का एक मिला-जुला प्रयास है जो महात्मा बुद्ध से डॉ० अम्बेडकर तक एक अबाध ज्योति-धारा के रूप में सहज सामने आया है ।
  • Prati Shurti
    Shree Naresh Mehta
    350 315

    Item Code: #KGP-1955

    Availability: In stock

    प्रति श्रुति : श्रीनरेश मेहता की समय कहानियाँ 
    श्रीनरेश मेहता का कथा-गद्य, जैनेंद्र और अज्ञेय की परंपरा मेँ रखकर देखा जाए तो समाज और अध्यात्म, राष्ट्र और राजनीति, जीवन और दर्शन से संपृक्त वाद्य है । वे न तो जैनेंद्र का प्रतिबिंब बने और न ही अज्ञेय की छाया । उन्होंने सर्वथा स्वायत्त और स्वाधीन कथा साहित्य लिखा जिसमें काव्यात्मक रस भी है और जिसका आस्वाद हमारे सामाजिक और संस्कृतिक भाव-बौधों को प्रगल्भ भी बनाता है। श्री मेहता जी की भाव-दृष्टि, अंतर्दृष्टि और जीवन-दृष्टि उनके कथा-गद्य में जिस प्रकार प्रकट हुई है उससे लगता है कि श्रीनरेश जी ने नई कथा-भाषा रचकर हिंदी को एक सांस्कृतिक शक्ति का लोक संस्करण सौंपा है। भाषा अपनी सर्जनात्मक शक्ति में जब सार्थक होती है तो वह स्वयं ही समाज और संस्कृति को अपने में समा लेती है । श्रीनरेश जी ने अपने कथा-शिल्प से भाषा की संभावनाओं को विराट बनाया, गद्य की एक नई शैली विकसित की और यह सिद्ध किया कि एक जीवंत भाषा और सजीव भाषा किस पवार अपनी सांस्कृतिकता और आंचलिक नास्टिलजिया को एक साथ एकाकार कर सकती है । श्रीनरेश जी का समूचा गद्य-साहित्य और विशेष रूप से कथा-साहित्य अपने ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों ही परिप्रेक्ष्यों में गहन शोध और विमर्श की माँग करता है । एक कवि और सर्जक को मात्र 'वैष्णव' कहकर ब्रांड नाम से सज्जित कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनकी वैष्णवता के पीडालोक को किसी गांधी की तरह बाहर निकाल नरसिंह मेहता के गीत 'वैष्णव जन' की तरह लोकव्यापी बनाना होगा । श्रीनरेश मेहता जैसा सर्जक अतीत की इतिहास-वस्तु बनकर, वर्तमान की संज्ञा से पृथक नहीं किया जा सकता और इसीलिए उनकी सर्जन-यात्रा की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हिंदी मानस उनमें निहित समस्त संभावनाओं को समय स्मृति और अवकाश तीनो में रखकर एक ऐसे श्रीनरेश मेहता का अन्वेषण करे जो हिंदी साहित्य की चेतना का नरेश हो, सृजन की उस्कृष्टता का प्रतिमान हो और अपनी सांस्कृतिक सामाजिकता का अद्वितीय उदाहरण हो ।
  • Bhagwan Mahaveer
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-127

    Availability: In stock

    भगवान महावीर विश्व के उन महापुरुषों में थे, जो मानव-श्रेणी से ऊपर उठकर देव-कोटि में पहुंच जाते हैं । भगवान महावीर के उपदेशों, सिद्धांतों और शिक्षाओं को लोगों ने हृदय से स्वीकार किया । वे अहिंसा के साक्षात् अवतार थे । उनका हृदय करुणा से आपूरित था । वे मानव मात्र के कल्याण के लिए विश्व-बंधुत्व के भाव को जन-जन  तक पहुंचना चाहते थे ।
    आज़ विश्व से चारों ओर हिंसा का तांडव फैला है । सर्वत्र मार-काट मची है । एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करने की घात लगाए रहता है। ऐसी दशा में भगवान महावीर की शिक्षाएँ बहुत ही उपयोगी हैं। उनका बताया हुआ शांति का मार्ग सारे विश्व के लिए कल्याणकारी है । वे जन-जन में अहिंसा, सत्य, करुणा और प्रेम की उदात्त भावनाएँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं । 
    प्रस्तुत पुस्तक में भगवान महावीर के जीवन-परिचय के साथ-साथ उनके सिद्धांतो, उपदेशों और शिक्षाओं का भी उल्लेख किया गया है । समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उनकी शिक्षाओं पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए ।
    विश्वास है कि पाठक-समूह भगवान महावीर के जीवन और उपदेशों से प्रेरणा लेकर पूरे समाज का जीवन सुखी बना सकेगा ।
  • Bindu-Bindu Vichar
    Atal Bihari Vajpayee
    400 320

    Item Code: #KGP-9022

    Availability: In stock

    बिन्दु-बिन्दु विचार
    राष्ट्रीय एकता के सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें । राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड- तोड़कर नहीं बनाया जा सकता । इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है । उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसके संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है । इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र का, अच्छे-बुरे का और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है । जीवन की इन निष्ठाओँ तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास राष्ट्रीयत्व की भावना घनी- भूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है । उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की] पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है । -इसी पुस्तक से

  • Kuchh Lekh Kuchh Bhaashan
    Atal Bihari Vajpayee
    400 360

    Item Code: #KGP-703

    Availability: In stock

    कुछ लेख, कुछ भाषण
    समूचा भारत हमारी निष्ठाओं का केंद्र और हमारा कार्यक्षेत्र है। भारत की जनता हमारा आराध्य है। हमें अपनी स्वाधीनता को अमर बनाना है, राष्ट्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखना है और विश्व में स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीवित रहना है। इसके लिए हमें भारत को सुदृढ़, शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बनाना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो साधन आवश्यक होगा, हम अपनाएंगे, जो नीति उपयोगी होगी, उसका अवलंबन लेंगे, जो कार्यक्रम हितावह होगा, उसका निर्धारण तथा कार्यान्वयन करेंगे।
    कंधे से कंधा लगाकर, कदम से कदम मिलाकर हमें अपनी जययात्रा को ध्येय-सिद्धि के शिखर तक ले जाना है। भावी भारत हमारे प्रयत्नों और परिश्रम पर निर्भर करता है। हम अपना कर्तव्य पालन करें, हमारी सफलता सुनिश्चित हैं।
    -इसी पुस्तक से
  • Trishpathga
    Irawati
    400 360

    Item Code: #KGP-2020

    Availability: In stock

    त्रिशपथगा
    साहित्य इतिहास को वाणी देता है, इसलिए इतिहास से साहित्य का संबंध बहुत पुराना है। अपने अतीत के ज्ञान की ललक प्रायः हर व्यक्ति में होती है और उनकी इस जिज्ञासा की तृप्ति इतिहास करता है; परंतु ऐसे व्यक्तियों की संख्या भी कम नहीं जो विभिन्न कारणों से इतिहास का अध्ययन पूरी रुचि से नहीं कर पाते। ऐसे लोग ऐतिहासिक तथ्यों के ज्ञान के साथ-साथ उन तथ्यों को जीवंत बनाने वाले अभिव्यक्ति-सौंदर्य के आनंद की भी इच्छा रखते हैं। अतः वे साहित्य, विशेषकर उपन्यास की ओर देखते हैं। इसी से ऐसे साहित्य की मांग सदैव बनी रहती है जो पाठकों को अतीत से परिचित कराने के साथ-साथ उनकी साहित्य-तृषा को भी तृप्त करे। 
    डॉ. इरावती के इस उपन्यास ‘त्रिशपथगा’ में इतिहास और साहित्य का मणिकांचन संयोग है। उपन्यास की पृष्ठभूमि भारतीय इतिहास का सैंधव सभ्यता काल है जो भारतीय इतिहास और संस्कृति की उन कड़ियों को अपने में समेटे हुए है जो अब हमारे मनोमस्तिष्क से विस्मृत हो चुकी हैं। उपन्यास में अतीत को पुनर्जीवित करना सरल नहीं है किंतु यह उपन्यास भारत की प्राचीनतम संस्कृति के एक प्रतीक ‘लोथल’ को केंद्र बनाकर उस युग की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, दैनिक जीवन, रीति-रिवाज और परंपराओं को जीवंत कर एक ओर हमें उसी युग में ऐसे पहुंचा देता है कि हम पात्रों के सुख-दुःख का सीधा अनुभव करने लगते हैं तो दूसरी ओर एक अत्यंत उदात्त प्रेम और त्याग की कथा सुनकर भावविह्नल हो उठते हैं। हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यासों का अभाव नहीं है परंतु ऐसे उपन्यासकार कम रहे हैं जो इतिहास का भी यथोचित ज्ञान रखते हों और साहित्य की सरसता का भी निर्वाह कर सकें। डॉ. इरावती एक ऐसी ही उपन्यासकार हैं। अतः ‘त्रिशपथगा’ में तीन शपथों के मार्ग का अनुसरण करती नायिका वन्हि की कथा सुनाने में साहित्य की ‘मसि’ में डूब-डूबकर इरावती की इतिहास की लेखनी ने एक अत्यंत रुचिकर उपन्यास की रचना कर दी है। इस उपन्यास में सुधी पाठकों के लिए ऐसा बहुत कुछ है कि एक बार हाथ में लेकर पूरा पढ़े बिना वे इसे रख नहीं पाएंगे।
  • Preeti Katha
    Narendra Kohli
    120 108

    Item Code: #KGP-2052

    Availability: In stock

    प्रीति-कथा 
    नरेन्द्र कोहली की प्रत्येक नई कृति उनके लेखकीय व्यक्तित्व का एक नया आयाम उदघाटित करती है । जब तक पाठक उन्हें किसी एक वर्ग अथवा धारा से जोड़कर, किसी एक घेरे  में घेरकर, देखने का अभ्यस्त होने लगता है, तब तक वे उन घेरों को तोड़कर आगे बढ जाते हैं और कुछ नया तथा मौलिक लिखने लगते है । सृज़नधर्मा व्यक्ति प्रयोग और वैविध्य की चुनौती को स्वीकार करता ही है ।
    प्रीति-कथा नरेन्द्र कोहली का नया उपन्यास है । यह एक प्रेम-कथा है । नरेन्द्र कोहली ने  प्रेम-कथा  लिखी है, यह सूचना कुछ लोगों के लिए विस्मयकारिणी भी हो सकती है; किन्तु अधिक विस्मयकारी तथ्य तो यह है कि यह प्रेमाख्यानक उपन्यास, जीवन के कुछ मूलभूत सत्यों का स्वरूप स्पष्ट करता है । कुछ लोग इसे चिंतन-प्रधान ही नहीं, दार्शनिक उपन्यास भी कहना चाहेंगे । प्रेम का विश्लेषण करते-करते ही, मनुष्य अपनी प्रकृति और ईश्वर के स्वरूप तक को पहचान पाया है । किसी भी वर्ग में रखें, किन्तु है यह उपन्यास ही, पहले से भिन्न, नया, ताजा और आकर्षक ।
  • Paani Ka Svaad
    Nilesh Raghuvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9089

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