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  • Alif Laila Hazar Dastan
    Amrita Pritam
    120 108

    Item Code: #KGP-7822

    Availability: In stock


  • Kangaruon Ke Desh Mein
    Rekha Rajvanshi
    250 225

    Item Code: #KGP-887

    Availability: In stock

    कंगारुओं के देश में
    रेखा राजवंशी की ये कविताएं डायरी हैं उन स्मृतियों की, जो कवयित्री के मन में भारत को लेकर बसी हुई है । ये कविताएँ हैं तुलनात्मक अध्ययन की कि भारत में कैसा था, आंरट्रेलिया में कैसा है । ये कविताएं हैं दो संस्कृतियों को आमने-सामने रखकर उनसे स्वयं  को तलाशने की कि वे कहीं है । इन कविताओं में बचपन है, विभीशेरावस्था है, वृद्धावस्था है । माँ की कॉंपती उँगलियों में कभी त्वरित गति से चलती हुई सलाइयों का सौर्य है । कवि-मन को ये सलाइयाँ मिल जाएं तो दिल की उँगलियाँ अतीत का स्वेटर कभी बुनने लगती  कभी उधेड़ने लगती है । इन सलाइयों ने कंगारुओं के देश का एक कोलाज़ बनाया है और रंग भारत के भरे हैं । एक विकास-यात्रा है पिछले एक दशक की, जिससे धीरे-धीरे हमारी धरती एक ग्लोबल गाँव में बदल गई है ।
    अपना वतन छोड़कर रेखा राजवंशी चली गई ऑस्ट्रेलिया, लेकिन इन कविताओं में उन्होंने हर पल भारत को जिया है । भारत में अगर अन्याय के परिदृश्य हैं तो ऑस्ट्रेलिया में भी कम नहीं । वे यहीं के आदिवासी लोगों पर हुए अत्याचारों के अतीत को जानकर विचलित हो जाती हैं । डिजरीडू नामक लंबे वाद्य-जितनी लंबी पीड़ा उनको होने लगती है । पीड़ा का संगीत कविताओं की शक्ल से ढलकर सामने आ जाता है ।
  • 1857 : Samar Gatha
    Sudrashan Kumar Chetan
    100 90

    Item Code: #KGP-9010

    Availability: In stock

    1857 समर गाथा
    विद्रोह सुधार माँगता है, क्रांति परिवर्तन।  सन् 1857 का जन-आंदोलन विद्रोह नहीँ था । वह तो गत सौ वर्षों (1757-1857) के विदेशी शासन के विरुद्ध जनता की शिकायतों का परिणति था । इस जनक्रांति को सैनिकों ने प्रारंभ किया और जनता के विभिन्न वर्गों ने उसमें सहयोग दिया। इस क्रांति में हिंदू और मुसलमानों ने कंधे से कंधा मिलाकर भागीदारी की । यह दूसरी बात है कि आंदोलन विफल हो गया और अंग्रेजों ने पूरी शक्ति से उसे कुचल दिया ।
    सफलता से बडी कोई उपलब्धि नहीं और विफलता से बड़ा कोई अपराध नहीं । यदि 1857 का यह सैनिक- आंदोलन सफल हो जाता तो समस्त विश्व स्वतंत्रता- आंदोलन के नाम से उसे ससम्मान पुकारता किन्तु उसके विफल हो जाने के कारण ही इतिहासकारों ने उसे विभिन्न नामों से संबोधित किया, यथा किसी ने इसे देशी राज्यों द्वारा अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का असफल प्रयास बताया तो किसी ने उसे सैनिक-विद्रोह का नाम दिया । किसी ने गदर की संज्ञा दी तो अन्यों ने स्वतंत्रता- आन्दोलन के नाम से अभिहित किया ।
    स्वतंत्रता-आंदोलन का यह प्रथम प्रयास असफल हो गया, उसे कुचल दिया गया और देश से ऊपरी सतह पर शांति भी स्थापित हो गई, किन्तु क्रांति के बीज मरे नहीं । देशवासी यह मानने को कदापि तैयार नहीं थे कि अंग्रेज़ अजेय हैं । तभी तो समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग भीतर ही भीतर सशस्त्र विद्रोह की तैयारी में जुट गया । परिणामत: देश के विभिन्न भागों में समय-समय पर अंग्रेजो की विरोधिता जारी रही । सच तो यह है कि 1857 की क्रांति के बाद से अगस्त, 1947 तक भारत से अंग्रेजी सरकार एक क्षण के लिए भी चैन से शासन नहीं का पाई ।
  • Shivani Ke Kathetar Sahitya Ka Saanskritik Adhyayan
    Sushil Bala
    700 630

    Item Code: #KGP-773

    Availability: In stock

    जिन कुछ लेखकों ने गद्य की विविध् विधओं में अपनी रचनाशीलता से हिंदी को समृद्ध व गौरवान्वित किया है उनमें शिवानी का नाम अग्रगण्य है। कहानीकार व उपन्यासकार के रूप में तो उन्होंने असंख्य पाठकों का मन मोहा ही; निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्तांत व लोकसाहित्य के द्वारा अनेक अनछुए-अनकहे व्यक्तियों-प्रसंगों-स्थानों की आंतरिकता व्यक्त की। स्वाभाविक है ऐसे रचनाकार के मूल्यांकन हेतु धैर्य, लगन और बुद्धिमत्ता की आवश्यकता होती है। कहना न होगा कि सुशील बाला ने ‘शिवानी के कथेतर साहित्य का सांस्कृतिक अध्ययन’ पुस्तक में इन गुणों का परिचय देते हुए विषय का भलीभांति प्रतिपादन किया है। वे भूमिका में लिखती हैं, ‘शिवानी के कथेतर साहित्य में सामाजिक चेतना, नैतिक मान्यताएं, राजनीतिक परिदृश्य इत्यादि सभी बिंदुओं में परंपरागत और नवागत तत्त्वों का रेखांकन किया गया है। आधुनिक, राजनीतिक एवं आर्थिक यथार्थ कथेतर साहित्य का तीव्र स्वर है।’ पुस्तक छह अध्यायों में विभक्त है। इनमें क्रमशः शिवानी के निबंध, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्तांत व लोक साहित्य का विवेचन है। पुस्तक के प्रारंभ में शिवानी के कथेतर साहित्य का भलीभांति परिचय दिया गया है।
    पुस्तक की विशेषता यह है कि लेखिका ने उन उज्ज्वल पक्षों को खोज लिया है जो शिवानी के लेखन का आलोक हैं। पाठक सुपरिचित हैं कि वैसे तो शिवानी की रचनाशीलता का अनिवार्य चरित्र है सूक्तिप्रियता। वे वाक्यों का गठन इस तरह करती हैं कि वे सुभाषित में ढल जाते हैं। सुशील बाला ने इस तथ्य को समझते हुए शिवानी के कथेतर साहित्य का अवगाहन किया है। जैसे महाबलिपुरम की मूर्तिकला पर शिवानी लिखती हैं, ‘कौन कह सकता है कि ये सातवीं शताब्दी की बनी मूर्तियां हैं। लगता है अभी-अभी मूर्तिकार यहां से छेनी-हथौड़ी उठाकर विदा हुआ है।’ यह पुस्तक पढ़कर सहजरूपेण समझा जा सकता है कि कथेतर विधाओं में शिवानी का प्रदेय कितना महत्त्वपूर्ण है। अपनी अनूठी भाषा शैली से उन्होंने जो रचना-संसार निर्मित किया, उसका सांगोपांग विवेचन सुशील बाला ने यहां किया है। सामान्य पाठकों और अनुसंधनकर्ताओं के लिए समान रूप से उपयोगी पुस्तक।
  • Shiksha Mein Moolyon Ke Sarokar
    Jagmohan Singh Rajput
    340 306

    Item Code: #KGP-896

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक में सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं तथा संबंधों में हो रहे बदलाव को देखने और परखने के लिए आवश्यक दृष्टिकोण परिवर्तन क्यों और कैसे संभव है, इसे समझने का प्रयास किया गया है । इसके बाद शैक्षिक पाठ्यक्रम पर समग्रता से निगाह डालते हुए पाठ्यक्रम परिवर्तन की आवश्यकता तथा उसके मूल तत्त्वों पर चर्चा की गयी है । इसमें उस प्रकार की पाठ्यसामग्री के सम्बन्ध में भी चर्चा हैं, जो पाठ्यपुस्तकों में उपलब्ध है तथा जिसमें अन्य मूल्यों के साथ परिवार तथा पीढ़ियों के संबंधों के विभिन्न पक्षों पर विवेचना की जा सकती है – केवल उसे पहचानने तथा विद्यार्थियों को उचित समय पर तथा उचित विधि से इंगित करने की आवश्यकता होती है । यदि वह नहीं है या काम है तो अध्यापक कैसे तथा किन स्रोतों से उसे ढूंढ़ सकता है तथा शिक्षण में शामिल कर सकता है । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Rao (Paperback)
    Rajendra Rao
    150

    Item Code: #KGP-503

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजेन्द्र राव
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र राव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उत्तराधिकार', 'लोकी का तेल', 'अमर नहीं यह प्यार', 'वैदिक हिंसा', 'बाकी इतिहास', 'घुसपेट','छिन्नमस्ता' 'असत्य के प्रयोग', 'शिफ्ट' तथा 'नौसिखिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजेन्द्र राव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajee Seth
    Raji Seth
    230 207

    Item Code: #KGP-798

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजी सेठ ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'उसका आकाश', 'तीसरी हथेली', 'अंधे मोड़ से आगे', 'पुल' , 'अमूर्त कुछ', 'तुम भी...?', 'अपने दायरे', 'ठहरो, इन्तजार हुसैन', 'उतनी दूर' तथा 'यह कहानी नहीं'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजी सेठ की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Aagaami Ateet
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-210

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Egypt (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7200

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Egyptian short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Re’s Story, Isis, Osiris, The Greek Princess, The Shipwrecked Sailor, The Book of Thoth, Egypt’s Great Magician, this book is a compilation of 20 famous Egyptian short stories. 
    Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Egypt.
  • Shaantidoot Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    300 270

    Item Code: #KGP-644

    Availability: In stock

    भारत के इतिहास में फिर एक बार वैसा ही समय आया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक बार फिर कुछ वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग करके देश का विभाजन करने की मांग की। गांधी जी ने मुस्लिम लीग को देश के विभाजन से विरत करने के लिए मुहम्मद अली जिन्ना के हाथ पर कोरा चैक रखकर संपूर्ण देश पर शासन करने का अधिकार मुस्लिम लीग को दे दिया, किंतु मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान से कम पर समझौता करने से इनकार कर दिया। सन् 1999 में पाकिस्तान ने देश पर आक्रमण कर दिया। इससे पूर्व भी पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण करके देश को हथियाने का प्रयत्न किया था, किंतु इस बार पाकिस्तान से बातचीत न करके पाकिस्तान को ईंटों का जवाब पत्थरों से देकर देश की रक्षा करने मंे सफलता प्राप्त कर ली, किंतु इसे युद्ध की समाप्ति नहीं माना जाना चाहिए। पाकिस्तान की ओर से फिर भी युद्ध की स्थिति पैदा की जाती रहेगी। वस्तुतः देश की समस्या समय-समय पर होने वाले आक्रमण नहीं हैं। जब तक पाकिस्तान रहेगा तब तक युद्ध की स्थिति बनी रहेगी। महाभारत की तरह एक निर्णायक युद्ध होकर अखंड भारत की स्थापना ही इस समस्या का समाधान है।
    -इस पुस्तक के ‘गांधी जी के शांति-प्रयासों की असफलता के कारण’ अध्याय से
  • Qissa Maujpur Ka (Paperback)
    Jaivardhan
    80

    Item Code: #KGP-1378

    Availability: In stock

    'किस्सा मौजपुर का' नाटक को वर्ष 2012 के दस श्रेष्ठ नाटकों में से एक श्रेष्ठ नाटक चुना गया । 'भारतेंदु नाट्य उत्सव' के अंतर्गत 23 मार्च, 2013 को इसका पुनः जोरदार प्रदर्शन हुआ । नाटक देखकर लेखक और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रेवती सरन शर्मा ने कहा था कि इस विषय पर कोई नाटक ऐसे भी लिखा जा सकता है, काम से काम मैं नहीं सोच सकता । 
  • Tatvadarshi (Translation Of 'The Prophet)
    Khalil Jibran
    125

    Item Code: #KGP-153

    Availability: In stock

    तत्वदर्शी
    'The Prophet' के अनुवाद के पीछे मेरी मूल भावना इतनी ही थी कि इसे पढते हुए जो अनुभव और आनंद मैंने पाया, उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाऊँ । 
    यह सच है कि कोई भी व्यक्ति विश्व के किसी कोने का हो या किसी धर्म को मानने वाला हो, अपनी आध्यात्मिक यात्रा में उन्हें सत्यों का उदघाटन करता दीखता है जिन्हें पहले भी कहा जा चुका हैं और आगे भी कहने की कोशिश होगी । प्रकाश का स्वभाव तो एक ही रहता है,  चाहे वह दीये में हो या सूर्य में। हाँ, सत्य तो शाश्वत है, लेकिन उसकी अनुभूति की व्याख्याएँ अलग-अलग शैली अख्तियार करती हैं। और खलील जिब्रान जो एक कवि और चित्रकार भी थे, शायद इसलिए ही  शब्दों में शहद की मधुरता भी थी और तितलियों के परों के रंग भी । उनके शब्द स्थिर नहीं थे, वे उड़ते हुए एक तथ्य से दूसरे तथ्य पर बैठते और उसका सत्य संगृहीत करते जाते ।
    प्रेम में असफलता ने उनके हृदय को इतना खोखला किया कि वह एक कुआँ बन गया और फिर इसमें करुणा भर गई-पूरी मानव जाति नहीं, पूरी सृष्टि के लिए । तभी तो उनके शब्द इतने चमत्कारी और समर्थ लगते हैं, जैसे वे शब्द नहीं, एक-एक आत्मा हों और हमारी ओर निहार रहे हो । इतने प्राणवान शब्द कि हर शब्द अपने अंदर एक ब्रह्मांड समेटे हो जैसे । और वह, जिसकी आत्मा पूर्णत: निष्कलुष एवं निष्पाप हो जाती है, वही समर्थ हो जाता है शरीर के सौंदर्य का देख पाने में, और तब उसके लिए शरीर में छिपाने जैसा न कुछ रह जाता  है, न ही कुछ दिखाने जैसा । मानव शरीर भी उसके लिए सृष्टि के अन्य जीवों के  शरीर की तरह ही हो जाता है- अपने स्वरूप में सुंदर, पवित्र !
    –विजयलक्ष्मी  शर्मा
  • Vishwa Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-3
    Shuk Deo Prasad
    545 491

    Item Code: #KGP-699

    Availability: In stock

    विज्ञान कथाओं को कथा की एक विधा के रूप में मान्यता मिले, ह्यूगो गन्र्सबैक ने इस दिशा में अग्रणी भूमिका निभाई और उन्होंने ही इसे ‘साइंटीफिक्शन’ नाम से अभिहित किए जाने का परामर्श दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने इस विधा को अपनी तरह से परिभाषित भी किया। ‘अमेजिंग स्टोरीज’ के प्रथमांक में संपादकीय टिप्पणी में गन्र्सबैक ने लिखा-‘साइंटीफिक्शन’ से मेरा अभिप्राय जूल्स वर्न, एच.जी. वेलस और एडगर एलन पो द्वारा लिखी गई ऐसी कहानियों से है, जिसमें आकर्षक रोमांच के साथ वैज्ञानिक तथ्य और युगद्रष्टा की दूरदर्शिता का सम्मिश्रण हो। ....आज विज्ञान कथा-साहित्य में चित्रित किए गए किसी आविष्कार के कल सत्य हो जाने में असंभव जैसा कुछ नहीं है।’
    गन्र्सबैक की इसी परिभाषा के कारण विज्ञान-गल्पों को ‘भविष्यद्रष्टा साहित्य’ भी कहा जाने लगा और लेखकों से ऐसी अपेक्षाएं की जाने लगीं जो निंतात अव्यावहारिक थीं।
    तो क्या विज्ञान कथाओं में आज के कल्पित आविष्कार कल के सच हैं? जी नहीं! ऐसा कदापि नहीं हो सकता। किसी भी गल्प में परिकल्पित कोई भी आविष्कार तदनुरूप कभी भी साकार नहीं हुआ। ऐसे सारे दावे मिथ्या हैं। हां, आविष्कारकों ने विज्ञान-गल्पों से प्रेरणाएं अवश्य ली हैं, इसकी स्वीकारोक्तियां हैं।
    ऐसा इसलिए असंभव है कि गल्पकार आविष्कारक नहीं है और आविष्कारक की गल्प-लेखन में मति-गति नहीं है। विज्ञान-गल्प-लेखन एक विरल विधा है, जिसमें विज्ञानसिद्धि और रससिद्धि दोनों वांछनीय हैं। और ऐसा संयोग विरल ही है।
  • Baarish Ke Baad
    Radhey Shyam Tiwari
    125 113

    Item Code: #KGP-1990

    Availability: In stock

    बारिश के बाद
    राधेश्याम तिवारी हिंदी के एक ऐसे कवि हैं, जो अपने आसपास के साधारण-सामान्य और लगभग घटनाविहीन जीवन से मार्मिकता को बड़े अचूक ढंग से पकडने की क्षमता रखते हैं। उनकी कविताओं में कल्पना की ऊँचाइयाँ हैं, लेकिन जैसा कि वे अपनी एक कविता 'बीज-मंत्र' में कहते हैं कि बीज का बाहर निकलकर भी धरती से जुडाव कम नहीं होता, उसी तरह उनकी कविता  का लगाव भी किसी भी हालत में इस धरती से, यहाँ के इंसान से, यहाँ के मौसमों से, अभावों और स्मृतियों से कम नहीं होता, बल्कि और सघन होता जाता है । उनकी हर कविता जीवन के बीच सहज ही मिलने वाला एक मार्मिक प्रसंग बन जाती है । यह मार्मिकता शब्द-क्रीड़ा से हासिल नहीं की गई है बल्कि जीवन की परिस्थितियों से प्राप्त की गई है। शहर तथा गाँव के बीच हिलगी हुई राधेश्याम तिवारी की कविता कई जगह गीतात्मक हो जाती है बल्कि कहीं-कहीं वे अपनी बात कहने के लिए गीत का सहारा भी लेते है, मगर दिलचस्प बात यह है कि यह कवि जीवन के प्रति हमेशा बहुत सकारात्मक है, कटु और कठोर नहीं । उसका लहजा शिकायत-भरा नहीं, ललक-भरा है । उनकी कविताओं से जीवन के दबावों-तनावों को दरगुजर नहीं किया गया है, अभावों की चर्चा से परहेज नहीं किया गया है, मगर विवशता की बजाय एक दार्शनिक ऊँचाई दी गई है । उनकी एक कविता है 'न्यूटन', जिसमें वह कहते हैं कि "न्यूटन ने यह तो सोच लिया कि सेब पेड़ से नीचे क्यों गिरता है, लेकिन यह नहीं सोचा कि नीचे गिरकर भी वह नीचे के लोगों को क्यों नहीं मिलता?" इतना ही नहीं, वे आगे कहते हैं कि "यह तो ठीक है कि गुरुत्वाकर्षण सबको अपनी ओर खींचता है, मगर जमीन में दबा हुआ बीज कैसे ऊपर उठ जाता है, न्यूटन ने यह नहीं सोचा ।" यहीं अभावों की चर्चा है, लेकिन यहाँ बेचैनी का स्वर और स्तर भिन्न है तथा इसी के साथ यह सकारात्मक स्वर भी है ।
    इस संग्रह में अनेक ऐसी कविताएँ हैं जैसे 'बाकी सब माया हैं, 'पुराना पता', 'सर्कस में बाघ', ‘संबंध', 'घर', 'किराए का मकान' आदि जो हमारे इस दैनिक संसार की कविताएँ हैं मगर उससे बाहर ले जाकर विचलित करने वाली कविताएँ भी हैं। ये कविताएँ सहज हैं, क्योकि मर्मभेदी हैं । वे सहज हैं, क्योंकि मनुष्य के साथ ये प्रकृति से भी सघन रूप से जुड़ती हैं। ये सहज हैं, क्योंकि इनमें हमारा सहजात मनुष्य है, उसकी मानवीयता है, उसका राग और विराग है ।
  • Haadase Aur Hausle
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-8001

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार हैं । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती हैं कि कहानी पाठक को आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझतीं ।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हुई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानियां ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajeet Kaur
    Ajeet Kaur
    350 315

    Item Code: #KGP-442

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजीत कौर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "वन जीरो वन', 'सूरज, चिड़ियां और रब्ब', 'ना मारो', 'मौत अलीबाबा की', 'चौरासी का नवंबर है', 'कसाईबाड़ा', 'पिछले बसंत की पतंग' , 'हरी चिड़िया’ , 'चीख एक उकाब की है' तथा 'नया साल'।

    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजीत कौर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • The Transfer (Paperback)
    Vibhuti Narain Rai
    150

    Item Code: #KGP-354

    Availability: In stock

    What a time for a transfer!
    He had not collected even a tenth of the money he had invested in getting this posting, not to talk of saving anything. And so, Kamalakant Varma, who is called Bara Sahib in the office, was downcast, and was in the process of discussing with his specially chosen juniors and subordinates, behind closed doors, the transfer order which a messenger from the Head Office had handed to him just now.
    In this state, transfer orders in the bureaucracy were on auction anyway: there could be a change in the order several times in course of a day!
    Like other government offices, in this one too, whether work was done or not, politicking was quite rampant. Thousands of years ago, Kautilya had defined the relationship between politics and spying, and this office here believed in it too, with full faith. Unlike the state intelligence agencies, secret information here were not produced from newspaper clippings, but were rather obtained with great labour, and therefore had often some worth in them.
    — from the book
  • Dohra Abhishaap (Paperback)
    Kaushlya Baisntari
    120

    Item Code: #KGP-290

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
    —मस्तराम कपूर 
  • Mahaan Guru Gobind Singh
    Satayendra Pal Singh
    300 270

    Item Code: #KGP-9219

    Availability: In stock

    हिंदू धर्म की रक्षा के लिए पिता गुरु तेग बहादुर जी के दिल्ली में बलिदान के बाद मात्र नौ वर्ष की आयु में गुरुगद्दी पर आसीन होने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी का एक ही संकल्प था 'सुभ करमन ते कबहू न टरों'। इसे सिद्ध करने के लिए उन्होंने अनंत शक्ति 'सवा लाख सों एक लड़ाऊं" का आहवान किया और विकारों से मुक्त सशक्त अंतर और अन्याय से रहित धर्मानुकूल समाज बनाने के लिए खालसा की साजना की। विचार और आचार की शुद्धता को स्थापित करने में अपना पूरा जीवन लगा देने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी की गुरु शबद की देग और गुरु कृपा की तेग दोनों साथ-साथ चलीं और एक अभूतपूर्व इतिहास बना। यह कैसे संभव हुआ इसे समझने और अहसास करने में यह पुस्तक सहायक है। गुरु गोबिंद सिंह जी के बरे में समग्र दृष्टि प्रदान करने वाली, राष्ट्र भाषा हिंदी में लिखी गई यह पहली पुस्तक है जो भावनाओं से जोड़ने वाली है ।
  • Khule Gagan Ke Lal Sitare (Paperback)
    Madhu Kankria
    120

    Item Code: #KGP-222

    Availability: In stock


  • Tale Of A Wasteland (Paperback)
    Phanishwarnath Renu
    495 446

    Item Code: #KGP-338

    Availability: In stock

    Phaneeshwar Nath Renu, a true son of the soil, has created in Parti Parikatha, rendered here in English as ‘Tale of a Wasteland’; a major modern classic through the original genius he brought to bear upon his theme. Renu’s deeply moving cry against an unjust social order coupled with his compassion for men; his freedom from bitterness against the establishment, and his love of common humanity backed by his creation of half a dozen powerful, living authentic figures with whom he peoples his world set against the Wasteland perpetrated by Nature on man sets him apart as a major creative genius who has come to stay. Every reader of this ‘epic in prose’ will feel real life throbbing and pulsating through each page of this book. On its broad canvas, the life of two generations has been inimitably presented by Renu with his exquisite art which creates unforgettable characters through episodes and dialogues in an idiom that shows his power over words. Indeed, no reader, once he has gone through this book, can help missing some of these characters that he has lived with while reading this saga, lighted by Renu’s vision of hope which ‘no depth of despair, no height of cynicism can possibly defeat’.
  • Kavi Ne Kaha : Bhagwat Ravat (Paperback)
    Bhagwat Rawat
    90

    Item Code: #KGP-1379

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : भगवत रावत
    यह कविता पर निर्भर करता है कि वह अपने पाठक को कितनी देर अपने पास बिठाए रख सकती है, अथवा पहली बार के बाद दोबारा अपने पास बुलाने को कितना विवश कर सकती है। इस तरह कविता के पास जाने की पहल तो पाठक ही करता है। इसके बाद की जिम्मेदारी कविता पर आ जाती है कि वह कितनी अपने पाठक की हो पाती है। कितनी उसके अनुभव-संसार का रचनात्मक हिस्सा बन पाती है, जो सब कुछ छोड़कर कविता के पास कुछ पाने की गरज से आता है। 
    समाज के जिस अनुभव-संसार में पाठक रहता है, उसी समाज से रचनाकार भी आता है। जीवन की तमाम अच्छाइयों, बुराइयों, समानता, असमानताओं, विसंगतियों और जटिलताओं आदि के बीच रचनाकार जो भी कुछ ऐसा देखता है जिसे प्राप्त भाषा के माध्यम से परिभाषित या अभिव्यक्त करना संभव नहीं होता, तो उसी प्राप्त भाषा को रचनाकार न, सिरे से गढ़ता है और उसके इस प्रयत्न का प्रतिफल ही उसकी रचना होती है।
  • The Great Gatsby (Novel)
    F. Scott Fitzgerald
    345 311

    Item Code: #KGP-364

    Availability: In stock

    Nick Carraway, the narrator of the novel, takes us back to the spring in 1922, when Wall Street was booming, and bootleggers were in business due to the alcohol ban. Nick travels to New York from the mid-west in order to become a bondsman. He takes residence in West Egg, next to a huge mansion which belongs to a mysterious Mr. Gatsby.  Nick is reacquainted with Daisy and Tom Buchanan, a wealthy couple who lives across the bay from him. Nick befriends Gatsby, who is revealed to be infatuated with Daisy. Nick arranges for them to meet, and they began to have an affair.  Tom, who is also having an affair with a married woman, confronts Daisy and Tom, and Daisy is forced to return to Tom. As Daisy and Gatsby drive off afterwards, they run over and kill Myrtle Wilson, Tom's mistress. Tom lies to Myrtle's husband, and tells him that Gatsby was the driver, when in reality, Daisy was driving. Wilson shoots Gatsby at his home afterwards, and then commits suicide. Nick is disillusioned with the life he planned for in New York, and returns west to his home town.
    Nick reflects that just as Gatsby's dream of Daisy was corrupted by money and dishonesty, the American dream of happiness and individualism has disintegrated into the mere pursuit of wealth. Though Gatsby's power to transform his dreams into reality is what makes him “great,” Nick reflects that the era of dreaming—both Gatsby's dream and the American dream—is over.
  • Saadat Hasan Manto Ke Natak
    Narendra Mohan
    400 360

    Item Code: #KGP-3

    Availability: In stock

    सआदत हसन मंटो के नाटक
    सआदत हसन मंटो के नाटकों से हिंदी पाठकों का उतना परिचय नहीं है जितना उनकी कहानियों से, जब कि उन्होंने उच्चकोटि के नाटक लिखे हैं । उनके नाटकों में विडम्बनापूर्ण  स्थितियों के दृश्यात्मक संयोजन के आधार पर चरमबिंदु  की रचना की गई है और फिर उसी में से उभरता है एंटी क्लाइमेक्स । कार्य-व्यापार को आलोकित करने की यह पद्धति, चरमबिंदु के साथ इस ढंग का सलूक मंटो के नाटय-कर्म का अहम हिस्सा है ।
    मंटो के नाटकों में व्यंग्य-दृष्टि और फार्स के साथ-साथ हास्य और क्रीडा का भी विधान हुआ है । इनमें मंटो की संवेदना और सोच का दायरा काफी विस्तृत है-वैयक्तिक कुंठाओं, आकांक्षाओं और सरोकारों से लेकर सामाजिक- राजनीतिक चिंताओं और विदूपताओं तक । ये नाटक श्रव्य माध्यम द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, अत: उर्दू हिंदी भाषाओं की साँझी विरासत हैं ।
    सआदत हसन मंटो के नाटक पुस्तक से मंटो के नाटकों को, उनके नाटककार रूप को पहली बार हिंदी पाठकों के सामने लाने का महत्त्वपूर्ग कार्य किया है हिंदी के जाने-माने नाटककार, कवि और आलोचक डॉ० नरेन्द्र मोहन ने । संपादकीय दृष्टि की वजह से यह मंटो के नाटकों का एक संकलन भर नहीं है, यह एक ऐसा दस्तावेज बन गया है जो पीढियों के फासले को पाटता हुआ हमसे आ जुड़ता है ।
    मंटो ने न आघुनिक्तावादी सांचा कबूल किया, न प्रगतिवादी । यह जिंदगी की जुराब के धागे को एक सिरे से पकड़कर उघेड़ता रहा और उसके साथ हम सब उधड़ते चले गए ।
  • Hanste Nirjhar Dahakti Bhatthi
    Vishnu Prabhakar
    190 171

    Item Code: #KGP-697

    Availability: In stock

    हँसते निर्झर, दहकती भट्ठी
    देश-विदेश में, नगरों में और प्रकृति के प्रांगण में जब-जब भी और जहाँ-जहाँ भी मुझे की यात्रा करने का अवसर मिला है, उस सबकी चर्चा मैंने प्रस्तुत पुस्तक में की है । इसमें जानकारी देने का प्रयत्न इतना नहीं है, जितना अनुभूति  का वह चित्र प्रस्तुत करने का है, जो मेरे मन पर अंकित हो गया है । इन अर्थों में ये सब चित्र मेरे अपने है । कहीं मैं कवि हो उठा लगता हूँ, कहीं दार्शनिक, कहीं आलोचक, कहीं मात्र एक दर्शक । मैं जानता हूँ कि हुआ मैं कुछ नहीं हूँ ।  मुझे मात्र दर्शक रहना चाहिए था, लेकिन मन की दुर्बलता कभी-कभी इतनी भारी हो उठती है कि उससे मुक्त होना असंभव हो जाता है । शायद यही किसी लेखक की असफलता है । मेरी भी है । लेकिन एक बात निश्चय ही कही जा सकती है कि इस पुस्तक में विविधता की कमी पाठकों को नहीं मिलेगी । कहीं विहँसते निर्झर, मुस्कराते उद्यान उनका स्वागत करेंगे तो कहीं विगत के खंडहर उनकी ज्ञानपिपासा को शांत करेंगे, कहीं उन्हें भीड के अंतर में झाँकने की दृष्टि मिलेगी तो कहीं नई सभ्यता का संगीत भी वे सुनेंगे। वे पाएंगे कि कहीं वे मेरे साथ कंटकाकीर्ण दुर्गम पथों पर चलते-चलते सुरम्य उद्यानों से पहुँच गए हैं, कहीं विस्तृत जलराशि पर नावों में तैर रहे हैं, कहीं पृथ्वी के नीचे तीव्रगामी रेलों से दौड रहे हैं तो कहीं वायु के पंखों पर सवार होकर विद्युत् और मेघों द्धारा निर्मित तूफान को झेल रहे है । मुझे विश्वास है कि इससे जो अनुभूति उन्हें प्राप्त होगी, वह निरी निराशाजनक ही न होगी ।

    —विष्णु प्रभाकर
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan Alpana Mishra (Paperback)
    Alpana Mishra
    225

    Item Code: #KGP-7223

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां अल्पना मिश्र

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अल्पना मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भीतर का वक्त’, ‘कथा के गैरजरूरी प्रदेश में’, ‘मिड डे मील’, ‘बेतरतीब’, ‘उनकी व्यस्तता’, ‘बेदखल’, ‘भय’, ‘उपस्थिति’, ‘मुक्ति-प्रसंग’ तथा ‘छावनी में बेघर’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार अल्पना मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Vrihat Hindi Lokokti Kosh
    Bholanath Tiwari
    795 716

    Item Code: #KGP-2107

    Availability: In stock

    वृहत् हिन्दी लोकोक्ति कोश
    हमारी प्रभावी, पूर्ण और आकर्षक अभिव्यक्ति का सबसे समर्थ साधन लोकोक्तियाँ होती हैं। वे वह गागर होती हैं, जिनमें अर्थ के सागर भरे होते हैं। अभी तक हिन्दी लोकोक्तियों का कोई ऐसा बड़ा कोश प्रकाशित नहीं हुआ है, जिसमें अधिकाधिक लोकोक्तियों को लिया गया हो। प्रस्तुत कोश इसी दिशा में एक महत् प्रयास है।
    इस प्रसंग में यह ध्यान देने की बात है कि ‘लोकोक्ति’ लोक की उक्ति होती है, इसलिए मानक भाषा की तुलना में लोकभाषा में लोकोक्तियों का प्रयोग कहीं अधिक होता है और मानक भाषा में भी काफी लोकोक्तियाँ लोकभाषा से ही छनकर आती हैं, जिन्हें संक्षेप में यहाँ देखा जा सकता है।
    प्रस्तुत ‘लोकोक्ति कोश’ में उपर्युक्त दृष्टि से कई विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। एक तो यह कि इसमें हिन्दी में प्रचलित और प्रयुक्त काफी लोकोक्तियाँ ले ली गई हैं। निश्चय ही इस दृष्टि से अब तक प्रकाशित हिन्दी लोकोक्ति कोशों में यह सबसे बड़ा लोकोक्ति कोश है।
    दूसरे, इसमें हिन्दी की अधिकांश बोलियों की अनेक लोकोक्तियाँ भी ली गई हैं, जैसे—अवधी, कन्नौजी, कौरवी, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी, निमाड़ी, मालवी, मैथिली, राजस्थानी, हरियाणवी, हाड़ौती आदि।
    तीसरे, मानक हिन्दी की अधिकाधिक तथा हिन्दी की प्रायः सभी लोकोक्तियों तथा हिन्दी की बोलियों की अधिकाधिक लोकोक्तियों को लेने के अतिरिक्त अपने देश की असमिया, उर्दू, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, बंगला, मराठी, मलयालम, सिंधी, संस्कृत आदि से भी काफी लोकोक्तियाँ तुलनात्मक रूप में यथास्थान दी गई हैं।
    चौथी विशेषता यह है कि उपर्युक्त लोकोक्तियों के अतिरिक्त इसमें देश के बाहर की अंग्रेज़ी, अरबी, उज़बेक, तुर्की, फारसी, रूसी आदि की भी जो तुलनात्मक लोकोक्तियाँ मिल सकी हैं, शामिल कर ली गई हैं।
    इस तरह यह कोश अपने आयाम में अब तक के लोकोक्ति कोशों से काफी अलग भी है और बड़ा भी।
    डॉ. तिवारी के लगभग 32-33 वर्षों के परिश्रम का परिणाम यह कोश निश्चय ही हिन्दी में अद्वितीय है। 

  • Kavi Ne Kaha : Ekant Shrivastava
    Ekant Shrivastva
    240 216

    Item Code: #KGP-7817

    Availability: In stock

    एकान्त वस्तुतः छत्तीसगढ़ की ‘कन्हार’ के कवि हैं। एकान्त का काव्य-संसार एक ओर माँ-बाप, भाई-बहन का भरा-पूरा परिवार है तो दूसरी ओर अंधी लड़की, अपाहिज और बधिर जैसे असहाय लोगों का शरण्य भी और ‘कन्हार’ जैसी लंबी कविता तो एक तरह से नख-दर्पण में आज के भारत का छाया-चित्र ही है। ‘अन्न हैं मेरे शब्द’ से अपनी काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले एकान्त उन थोड़े से कवियों में हैं जो ‘शब्द’ को अपनी कविताओं से एक नया अर्थ दे रहे हैं। निश्चय ही एकान्त का काव्य एक लंबी छलाँग है और ऊँची उड़ान भी--कवि के ही शब्दों में एक भयानक शून्य की भरपाई। -नामवर सिंह

    काली मिट्टी से कपास की तरह उगने की आकांक्षा से उद्वेलित यह कवि अपनी हर अगली कविता में मानो पाठक को आश्वस्त करता है कि वह अपने भाव-लोक में चाहे जितनी भी दूर चला जाए, अंततः लौटकर वहीं आएगा जो उसके अनुभव की तपी हुई काली मिट्टी है। यह एक ऐसी दुनिया है जो एक किसानी परिवेश के चमकते हुए बिंबों और स्मृतियों से भरी है। एक अच्छी बात यह कि गहरे अर्थ में पर्यावरण-सजग इस कवि के पास एक ऐसी देखती-सुनती, छूती और चखती हुई भाषा है, जो पाठक की संवेदना से सीध संलाप करती है।   -केदारनाथ सिंह

    एकान्त की कविता और कवि-कर्म की खूबी है कि उन्होंने अपने को औपनिवेशिक आधुनिकता के पश्चिमी कुप्रभाव से बचाया है। यही कारण है कि उनकी कविता कलावादी और रूपवादी प्रभाव से मुक्त है। ऐसा इसलिए कि एकान्त अपने जनपद, अपनी जड़ों और अपनी ज़मीन को कभी नहीं छोड़ते। उनकी कविता हमें भारतीय समृद्ध काव्य-परंपरा की याद दिलाती है जो आज की अधिकांश कविता से विलुप्तप्राय है। एकान्त, निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा के सशक्त कवि हैं। एकान्त की कविता में कोई ठहराव नहीं है। वे आज भी नित नवीन और सारगर्भित कविताएँ बिना किसी विचलन या दोहराव के रच रहे हैं। क्योंकि उनका गहरा रिश्ता भारतीय लोक और जनमानस से बना हुआ है। सही अर्थों में वे लोकधर्मी कवि हैं। ‘नागकेसर का देश यह’ हिंदी में एकान्त की सर्वाधिक लंबी कविता है जिसके कई अर्थ-ध्वनिस्तर हैं और बड़ी संश्लिष्टता है।      -विजेन्द्र
  • Pracheen Brahman Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-169

    Availability: In stock

    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।

  • Sant Ka Divya Sansaar
    Deep Shikha Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-1870

    Availability: In stock

    संत का दिव्य संसार
    पारलौकिक जगत् में विचरण करते भक्तों ने देखा-एक हरा-भरा प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त पर्वत-शिखर, जिस पर सूर्य-रश्मियां बिखरी पडी थीं, स्निग्ध पवन की स्निग्धता से विभोर पर्वत-शिखर परम शति में डूबा हुआ था ।
    उस शांत, एकांत, मानवीय पदचापों एवं कोलाहल से पूर्णत: मुक्त पर्वत के उत्तुंग शिखर पर एक जर्जर शरीर- धारी तपस्वी तपस्यारत था । स्वच्छ-सुगंधित-शीतल पवन उन्मुक्त हो बह रहा था । अवरोधरहित पवन तपस्वी के शरीर से टकरा तपस्वी को अपनी प्रशंसा करने के लिए बाध्य-सा करता प्रतीत हो रहा था ।
    किंतु, तपस्वी पवन के प्रफुल्लकारी स्पर्श से पूर्णत: प्रभावहीन था । उस पर पवन की स्निग्धता का, उसकी कोमलता का, उसकी प्रफुल्लता का और उसकी शीतलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था । वह पूर्णतया नि:संग था, तटस्थ था, निर्विकार था, अचल था, स्थिर था ।
    सूर्य-रशिमयों की गरिमामयी प्रखरता भी तपस्वी में किसी भी प्रकार का विक्षोभ उत्पन्न करने में असफल-सी जान पड़ रही थी । तपस्वी अविचल समाधिस्थ बैठा हुआ था ।
    तपस्वी की स्थिर अवस्था, तपस्वी के सैकडों वर्षों से निरंतर एक ही आसन में बैठे रहने का संकेत-सी करती प्रतीत हो रही थी । संभवत: तपस्वी सदियों से एक ही मुद्रा में, एक ही आसन में, एक ही स्थान पर बैठा प्रभु से एकात्म की स्थापना का प्रयास कर रहा था ।
    उसके मुखमंडल से झरती अपूर्व शांति उसके प्रयास की सफलता का जयघोष-सी करती प्रतीत हो रही थी । कदाचित् तपस्वी अपने प्रयास में सफल हो चुका था । तभी तो उसके मुखमंडल को चारों ओर से एक विशिष्ट आभा ने घेर रखा था । वह जितेन्द्रिय-सा लग रहा था ।
  • Repartee : Khushwant Singh
    Khushwant Singh
    395 356

    Item Code: #KGP-634

    Availability: In stock

    KHUSHWANT SINGH, India's iconic journalist and writer, whose works secured largest readership in the country, remains an enigma beyond his writings. His immense popularity and connectivity with his readers made him the common man's idol but his real persona remained in wraps. The 'dirty old man' ensconced in a bulb with a wicked grin and a fountain pen in hand was a far cry in real life.
    This collection of interviews and articles attempts to bring to light the real Khushwant as his family and close friends knew him. 
    A man who was constantly surrounded by beautiful women but remained faithfully wedded to his wife Kaval for 62 years  till she passed away, a man who wrote about wine, women and sex, but lived a life more simple and austere than a commoner, a man who was more disciplined in his fitness regime than men even half his age, a person  who wrote more books, articles and columns than any other journalist or writer in this country, and in a language, so simple that the common reader could comprehend. 
    Little do his readers know that the man famous for his jokes, his love for wine and women and his fierce agnosticism, was a great scholar in real life who wrote classics like A History of the Sikhs, taught comparative religion at Princeton University, was a passionate nature lover who wrote books like Nature Watch, was an art critic and had dabbled in sitar and painting at Shantiniketan in his youth.
    Khushwant Singh voiced his opinions openly and spoke his mind fearlessly through his column's for which he was honoured in 1998, with 'Honest Man of the Year Award and later in 2007 with Padma Vibhushan award.
    He remained reticent about his personal life while he lived. It is about time his loyal fans knew who the real Khushwant was.
  • Kaale Kuyen
    Ajeet Kaur
    225 203

    Item Code: #KGP-18

    Availability: In stock

    काले कुएँ
    इस संग्रह की कहानी 'बाजीगरनी' से-
    वह औरत जो तमाम उम्र एक कसी हुई रस्सी पर बाजीगरनी की तरह अपने बोझ का संतुलन कायम रखने की कोशिश में सारी ताकत और समूची एकाग्रता खर्च करती हुई चलती रही थी, आज ज़मीन पर खडी थी । रस्सी के दोनों सिरे कभी उनके सास-ससुर और खाविंद के दरम्यान तने रहे थे, कभी उनके खाविंद और बच्चों के दरम्यान । बहुत बरसों से एक सिरा भाइया जी के वजूद से बँधा था और दूसरा सिरा बड़े मामा जी के साथ । भाइया जी नहीं रहे तो रस्सी कड़क करके टूट गई । भाभी जी चक्कर खाकर ज़मीन पर आ गिरी । ज़मीन पर खडे होना तो वह भूल ही गई थीं ।  लडखड़ाती, काँपती, चकराती, हिचकोले खाती वह नए सिरे से छोटे बच्चे की तरह ज़मीन पर खडी होना सीखेंगी । शायद छोटे मामा जी का हाथ पकड़कर यह पैर बढाना सीखेंगी । पर फिलहाल तो वह चारों खाने चित गिरी पडी थीं ।
    भाइया जी नहीं रहे, तो बड़े मामा जी भी चले जाएँ-चले जाएँ..
    और उन्होंने दो-दो पुरानी सोने की चूडियों अपने हाथों से उतारी । उठीं और वे चारों चूडियाँ मामा जी के कोट की जेब में डाल दी, "बस, यही है मेरे पास । इसे ले ले और चला जा । पैंशनों वाले चले गए । रोटी खत्म । चूल्हा बुझ गया । तोड़ दिया है मैंने चूल्हा । तोड़ दिया है । तूने सुना ? चूल्हा तोड़ दिया है मैंने । चला जा । ”
    हिंदी और पंजाबी में समान रूप से रचनारत, साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार की मानव-मन के सच को उकेरती कहानियों का नया संग्रह ।

  • Boo Toon Raaji
    Padma Sachdev
    150 135

    Item Code: #KGP-60

    Availability: In stock

    बू तूँ राजी
    मैं मूलत: कवयित्री हूँ । जो बात कविता से बहुत बडी हो जाती है, वह कहानी बनकर मेरे हाथों में छोटे बच्चे की तरह कुलबुलाने लगती है । कहानी की यह मेरी दूसरी किताब है । कभी-कभी लिखती हूँ कहानियाँ, वह भी उस वक्त, जब कहानियों के पात्र मेरे आँचल का कोना पकडे-पकडे मेरी गरदन तक आकर मुझे दाब लेते है । और ये पात्र जब मेरे जीवन का हिस्सा हो जाते हैं तब में लफ्जों के दोने में इन्हें फूलों की तरह सजाकर अपने पाठकों की झोली में डाल देती हूँ फिर वे इसका हार बनाएँ, फूलों को मंदिर के आगे सजाएँ या अपनी आँखों की पतली काजल की लकीर से पिरोकर अपने गले में डालें-ये उनकी खुशी है । मेरी कहानियों के पात्र मेरे घर के सदस्यों की तरह हो जाते हैं । मैं चाहती हूँ, आप भी इन्हें अपनी बैठक में बैठने का स्वान दें ।
  • Shake-Up India (Paperback)
    Jayant V. Narlikar
    245 221

    Item Code: #KGP-331

    Availability: In stock

    The need of The Times 
    India has lived over sixty years of its independence, but it still seems to be floating rudderless. It does not know what to accept and what to discard.
    The well known Astrophysicist and science writer Jayant V. Narlikar provides in this significant work well thought out ideas in various life and work-areas for us to take up in right earnest and do the needful to build up the nation as well as our own lives.
    He is a rare Indian who writes science fiction which is closer to the truth. A few of his ideas have already come true. Like the social problems created by the possibility of knowing the sex of the child while in the womb which he wrote up in a story in the 1970s.
    The shake-up and change are caused by The likes of These meteors:
    • ‘India that is Bharat…..’ – Why two names?
    • Get rid of the scientifically rejected superstitions.
    • No more Ramans, Boses, Sahas – Why?
    • Ignoring higher education–Why?
    • Science is significant, develop its temper.
    • Come out of the population trap.
    • Don’t litter, clean up your surroundings, it’s easy.
    • Technology is for the 21 st century.
    • Teach astronomy in schools; it will develop students’ minds.
    • Be professional in achieving your goal.
    • Media must come forward in presenting science to the masses.
    • Take a leaf out of the life of Michael Faraday.
  • Dhoop Dhalne Ke Baad
    Mahip Singh
    225 203

    Item Code: #KGP-627

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Saadat Hasan Manto (Paperback)
    Saadat Hasan Manto
    250

    Item Code: #KGP-7011

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सआदत हसन मंटो
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सआदत हसन मंटो ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'स्वराज्य के लिए', 'हतक' हैं 'मेरा नाम राधा हैं', 'बाबू गोपीनाथ', 'मम्मी', 'मम्मद भाई', 'जानकी', "मोजेल', 'सियाह हाशिए' तथा 'टोबा टेकसिंह'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सआदत हसन मंटो की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Vishva-Kavita Ki Or
    Shyam Singh Shashi
    140 126

    Item Code: #KGP-9082

    Availability: In stock


  • In Dinon Ve Udhas Hain
    Dinesh Pathak
    75 68

    Item Code: #KGP-1930

    Availability: In stock

    इम दिनों वे उदास हैं
    'इन दिनों वे उदास हैं ' दिनेश पाठक की नौ बहुचर्चित कहानियों का संकलन है । इस संकलन की कहानियों में जीवन के कई रंग, कईं अनुभव है । लेखक की विशेषता जीवनानुभवों को वस्तुगत रूप में प्रस्तुत करना नहीं, वरन उन्हें रचना के दायरे में लाकर उनका सामाजिक अर्थ पाने की स्पष्ट एवं सार्थक कोशिश करना है । कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ अनुभव-संबद्धता से पैदा हुई आत्मीय संस्पर्श की ऊष्मा से  परिपूर्ण कहानियाँ है । प्रस्तुति के स्तर पर इनमें न कोई बौद्धिक आडंबर है, न चमचमाता वाग्जाल । जो कुछ है, वह अनुभव के स्वायत्त वेग से उत्पन्न शिल्प है, भाषा है । एकदम सहज-सरल और स्वत स्फूर्त ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shaani
    Shaani
    200 180

    Item Code: #KGP-29

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार शानी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दोज़खी', 'जहाँपनाह जंगल', 'जली हुई रस्सी', 'जगह दो, रहमत के फरिश्ते आएंगे', डाली नहीं फूलती', 'बिरादरी', 'बोलने वाले जानवर', 'एक नाव के यात्री', 'चहल्लुम' तथा 'युद्ध'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक शानी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nanak Singh (Paperback)
    Nanak Singh
    80

    Item Code: #KGP-7003

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : नानक सिंह
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नानक सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कुचले हुए पुष्प', 'लक्ष्मी-पूजा', 'अंतर्ज्ञान', ‘अछूते आम', 'चक्षुहीन संत', 'जर्जर खपरैल की एक स्लेट', 'स्नोफॉल', 'इनसान-हैवान', 'लंबा सफ़र' तथा 'जब हम में 'इनसान' प्रकट होता है' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नानक सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bhartiya Sant Parampara
    Baldev Vanshi
    500 450

    Item Code: #KGP-750

    Availability: In stock

    भारतीय संत परंपरा
    भावी विश्व का सच्चा विकास आर्थिक भूमंडलीकरण के साथ-साथ नैतिक-आध्यात्मिक चेतना को समाहित कर पूर्ण व संतुलित बनाया जा सकता है। आज भारत तथा समूचे विश्व को केवल संत ही बचा सकते हैं, क्योंकि वे केवल मनुष्य की नैतिक-आध्यात्मिक चेतना के प्रति बद्ध हैं, किन्हीं धर्मग्रंथों, संप्रदायों से नहीं।
    महात्मा बुद्ध ने जो उपदेश दिए वे आधुनिक मानवता के लिए अत्यधिक उपयोगी हैं, बल्कि वे उत्तरोत्तर अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं। लोभ, मोह, घृणा की आग में व्यक्ति, समूह और देश जल-झुलस रहे हैं। सभी जगह जड़वाद, भौतिकवाद के परिणामस्वरूप भोगवाद, तृष्णा, लिप्सा, संग्रह की असीम लालसा के वशीभूत जगत् जलता हुआ जंगल बन चुका है। इनसे बचने के उपदेश तथागत ने दिए थे। बौद्ध संस्कृति का यह सार्वभौम आधार सब देशों-समाजों को ग्राह्य, प्रीतिकर एवं स्पृहणीय लगेगा। फ्रांस के दार्शनिक बर्गसां, जर्मनी के दार्शनिक कांट ने इसे तात्त्विक दृष्टि से उपयोगी बताया है तो चेतनाद्वैतवादी ब्रेडले ने बुद्ध के तर्कवाद-विज्ञानवाद को युग-व्याधियों का उपयुक्त निदान माना है। 
    महात्मा बुद्ध के मूल उपदेशों में प्रज्ञा, शील, ध्यान पातंजलि के ध्यान-योग के अति निकट हैं तो मध्ययुगीन संतों की वाणी में इन्हीं का विस्तार है। अतः ‘भारतीय संत परंपरा’ वर्तमान विश्व मानव के लिए अमृततुल्य है।
  • Gardish Ke Din
    Kamleshwar
    250 225

    Item Code: #KGP-794

    Availability: In stock

    गर्दिश के दिन
    ‘गर्दिश के दिन’ बारह भारतीय लेखकों के अपने आत्मकथ्य हैं--केवल उनकी अपनी भीतरी दुनिया के नहीं बल्कि बाहर की दुनिया से जुड़ने और लड़ने के दौरान जो कुछ उन्होंने अनुभव किया है और रचनात्मक संघर्ष के जिस दौर से वे लगातार गुज़रे हैं--उसी सिलसिले का एक आत्मिक और समयगत कथन इन रचनाओं का आधार है।
    इस गर्दिश से सभी गुज़रे हैं--और अभी बहुत से संघर्षशील लेखकों को इससे गुज़रना पड़ेगा, उन लेखकों को खास तौर से जो ‘ललित-लेखन’ 
    के पक्षधर नहीं हैं बल्कि दलित लेखन के लिए प्रतिबद्ध हैं।
    यह ऐसे ही भारतीय लेखकों की अपनी गर्दिश की विवरण-भरी कहानियां हैं।
    ‘सारिका’ के संपादन-काल में यह धारावाही स्तंभ प्रकाशित करना मेरे लिए अपने समकालीन लेखकों के माध्यम से समय की धड़कन को पहचानने का ‘कुतुबनुमा’ रहा है--जिससे मुझे दृष्टि भी मिलती रही है और मैं अपने समकालीनों से देश की हर भाषा की आत्मीय आवाज़ का साक्ष्य पाता रहा हूं और भारतीय युवा रचना की पहचान का जायज़ा भी लेता रहा हूं।
    --कमलेश्वर
  • Baron Ki Baatein
    Shuk Deo Prasad
    240 216

    Item Code: #KGP-244

    Availability: In stock

    आराम कहां?
    चीनी हमले के बाद हार की वजह से नेहरू जी कुछ हिल से गए थे। एक दिन मौका देखकर उनके सहकारी टी.एन. कौल ने कहा--‘पंडित जी, आप कुछ दिन के लिए विश्राम क्यों नहीं कर लेते? एक सप्ताह आप आराम कर लें तब तक आप काफी तनावरहित महसूस करने लगेंगे।’
    नेहरू जी ने छूटते ही कहा--‘तुमने भी खूब कहा। विश्राम और वह भी एक सप्ताह का? यदि मैं एक सप्ताह बिस्तर पर पड़ गया तो कभी उठ नहीं पाऊंगा। मेरे जीवन में विश्राम कहां?’
    सचमुच पं. जवाहरलाल नेहरू के जीवन का मंत्र ही था चरैवेति-चरैवेति। उन्होंने ही नारा दिया था-- ‘आराम हराम है।’ और जीवन की आखिरी सांस तक वे इस पर अमल करते रहे।
    उनकी मेज पर राबर्ट फ्रास्ट की ये कविताएं लिखी हुई सदा विराजमान रहती थीं: ‘वुड्स आर लवली डार्क एंड डीप। बट आई हैव प्रामिसेस टू कीप। माइल्स टू गो बिफोर आई स्लीप। माइल्स टू गो बिफोर आई स्लीप।’
    सघन ये वन सुंदर भरपूर
    पर मुझे तो रखनी बात जरूर।
    सोने से पहले तो मुझे जाना
    है मीलों दूर।
    मुझे जाना है मीलों दूर।
    --इसी पुस्तक से
  • Grameen Samaj
    Shuk Deo Prasad
    340 306

    Item Code: #KGP-717

    Availability: In stock


  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Shuk Deo Prasad
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Vigyan Navneet
    Dr. Ramesh Dutt Sharma
    290 261

    Item Code: #KGP-563

    Availability: In stock

    विज्ञान नवनीत
    लगभग आधी सदी पहले डा. रमेश दत्त शर्मा ने विज्ञान संबंधी विषयों पर लिखना शुरू किया था और जल्द ही वे विज्ञान से जुड़े हर महत्त्वपूर्ण विषय पर लिखने लगे। अब तक हिंदी की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में हजार से अधिक श्रेष्ठ रचनाएं उनकी छप चुकी हैं, लेकिन रचनाओं के छपने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण उन रचनाओं का पढ़ा जाना है। विज्ञान को अकसर नीरस विषय कहा जाता है, लेकिन डा. रमेश दत्त शर्मा का लेखन किसी भी दृष्टि से नीरस नहीं कहा जा सकता। छात्रा भले ही वे विज्ञान के थे, पर साहित्य से हमेशा जुड़े रहे। स्वभाव से कवि तो थे ही, इसलिए उनके लेखन में एक ऐसी रंजकता है, जिसमें पाठकों को भीतर तक छूने और उनका मन जीत लेने की अद्भुत विशेषता रही है। गंभीर वैज्ञानिक विषयों को रोचक कहानी की तरह परोसना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन रमेश जी ने यह काम प्रस्तुत पुस्तक में बड़ी आसानी से किया है। 
    ‘विज्ञान नवनीत’ ढंगदार लेखों का संकलन है, जो देश की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे। यह संयोग भी है कि पुस्तक के बहुत से लेख ‘नवनीत’ में छपे थे। अपनी इस पुस्तक के शीर्षक के साथ लेखक ने लिखा है—‘विज्ञान को मथकर निकाली गई लुभावनी लोनी। बड़ी स्वादिष्ट होती है लोनी। देर तक जीभ पर स्वाद बना रहता है। ऐसा ही स्वाद इन लेखों का भी है।’ 
    प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत लेखों से यह बात सहज ही समझ आ जाती है कि लेखक सिर्फ लिखना ही नहीं चाहता, कुछ सार्थक रचना चाहता है। सार्थकता की गंध इस पुस्तक के हर पन्ने पर अनुभव की जा सकती है। 
    —विश्वनाथ सचदेव
  • Chhotoo Ustaad
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-728

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में संकलित कथाकार स्वयं प्रकाश की कहानियां आकार में छोटी हैं लेकिन प्रभाव में ‘बड़ी’। ये लघुकथाएं नहीं हैं। लघुकथा अकसर एकायामी कथ्य की वाहक होती है और एक निश्चित बिंदु पर प्रहार करती है। जबकि ये कहानियां बहुपर्ती हैं और आपकी पूरी विचार प्रक्रिया को प्रभावित बल्कि परिवर्तित कर देती हैं। मसलन ‘हत्या’ एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो जंगल के राजा शेर को सर्कस में रिंग मास्टर के इशारे पर भीत गुलामों की तरह व्यवहार करते देख रो पड़ता है तो ‘बिछुड़ने से पहले’ सड़क और पगडंडी की बातचीत के बहाने विकास के पूंजीवादी मॉडल को प्रश्नांकित करती है। रेटोरिक का इस्तेमाल जिन बहुत ही कम कहानीकारों ने हथियार की तरह किया है उनमें स्वयं प्रकाश एक हैं। ‘सुलझा हुआ आदमी’ में बहुत बोलने वाले और व्यवहार में इससे उलट आचरण करने वाले लोगों पर ‘कहता है’ के माध्यम से बड़ी तीखी गुम चोट की गई है।
    ये कहानियां किसी बड़े कलाकार--मसलन--यामिनी रॉय या मकबूल फिदा हुसैन के रेखाचित्रों की याद दिलाती हैं जिनमें न डिटेल्स की पेशकश होती है, न रंगों का पसारा, लेकिन फिर भी जिनमें कम से कम रेखाओं के माध्यम से एक अभिभूत कर डालने वाली माया का सृजन हो जाता है! और यही इन रचनाओं की सबसे बड़ी खूबी है। पाठकों को इन कहानियों को पढ़ते समय परसाई जी की या आचार्य अत्रो की या पु. ल. देशपांडे की याद आए तो इसे अपनी परंपरा में सुरभित पारिजात के नन्हे फूलों की पावन सुगंध् ही समझना चाहिए। कथाकार स्वयं प्रकाश की ये अद्भुत कहानियां पहली बार किसी संकलन में प्रकाशित हो रही हैं।
  • Bhasha Vigyan Pravesh Evam Hindi Bhasha
    Bholanath Tiwari
    500 450

    Item Code: #KGP-636

    Availability: In stock

    भाषा विज्ञान प्रवेश एवं हिंदी भाषा
    डॉ.  भोलानाथ तिवारी लब्धप्रतिष्ठ भाषाविज्ञानी हैं। प्रस्तुत पुस्तक में उन्होंने भाषा विज्ञान को सरल और सहज रूप में प्रस्तुत किया है। भाषा विज्ञान के पारंपरिक विषयों के साथ-साथ नए विषयों व भाषा विज्ञान के नए आयामों को शामिल करते हुए उन्होंने पुस्तक की उपादेयता बढ़ा दी है।
    यह पुस्तक भाषा विज्ञान हेतु भारत के सभी विश्वविद्यालयों के लिए तो उपयोगी होगी ही, साथ ही केंद्र सरकार, सार्वजनिक उपक्रमों व बैंकों के राजभाषा अनुभागों तथा उनमें कार्यरत हिंदी से जुड़े अधिकारियों, सहायकों, अनुवादकों व भाषा से जुड़े प्रौद्योगिकीविदों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध होगी, क्योंकि इसमें भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा से जुड़े अद्यतन ज्ञान को सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। 
    यह पुस्तक भाषा से सरोकार रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए भी उपयोगी होगी, यह हमारा विश्वास है।
    इस पुस्तक में अद्यतन जानकारियाँ तथा जटिल संकल्पनाओं को भी इतने सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि भाषा विज्ञान में रुचि रखने वाले सामान्य पाठक के लिए भी यह उपादेय सिद्ध होगी।
  • Dharati Mata, Pita Aakash
    Pushpa Sinha
    175 158

    Item Code: #KGP-228

    Availability: In stock

    धरती माता, पिता आकाश
    आज पर्यावरण प्रदूषण के कारण पर्यावरण असंतुलन हो रहा है। इससे न केवल जीवन प्रक्रिया बाधित हो रही है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक प्रगति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इतना ही नहीं अब पर्यावरण प्रदूषण के कारण प्राकृतिक आपदाओं की वृद्धि हो रही है, जिसके कारण प्रचुर मात्र में जन-धन की हानि हो रही है। भूमंडलीय ताप बढ़ रहा है, जिसके कारण हिमाच्छादित क्षेत्रों की काफी बर्फ पिघलने से भविष्य में समुद्रतल में वृद्धि होगी और महत्त्वपूर्ण तटीय क्षेत्र डूब जाएँगे। साथ ही पर्यावरण प्रदूषण से अब जलवायु परिवर्तन का खतरा मँडरा रहा है, जिसके कारण कई जीव विलुप्त हो जाएँगे और खाद्य संकट की आशंका भी जताई जा रही है। हो सकता है कि एक दिन भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण डाइनोसोरस की तरह पृथ्वी से मानव भी विलुप्त हो जाएँ।
    अतः इस पुस्तक में पर्यावरण को बचाने के लिए विभिन्न उपाय सुझाए गए हैं, जिनको अपनाकर हम पर्यावरण को संतुलित कर सकते हैं और भयंकर संकट से हमारा बचाव हो सकता है।
  • Daadoo Samgra (2 Vols.)
    Govind Rajnish
    1195 1076

    Item Code: #KGP-1584

    Availability: In stock

    दादू समग्र : 1
    भक्तिकाल के निर्गुण संप्रदाय में कबीर के पश्चात सबसे महत्त्वपूमृर्प सर्जनात्मक व्यक्तित्व संत दादू दयाल (दादू अवधूत जोग्यन्द्र) का है । पुरे भारत से सामाजिक, धार्मिक और दार्शनिक चेतना को जगाने तथर विराट सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने में इनकी अग्रणी भूमिका रही है । इन्होंने मनुष्य के भीतर सोए हुए विराट अनुराग को जगाने तथा ज्ञानात्मक संवेदनाओं और आध्यात्मिक अनुभवों से संपन्न करने का प्रयास किया था। इनके 'न्रिपख' दर्शन ने हिंदू और मुसलमानों की कुरीतियों, बाह्याडंबरों, जड़ताओं, रूढियों और विसंगतियों की आलोचना करते हुए, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठने का संदेश दिया था ।
    दादू महान् संत, रचनाकार, नीतिज्ञ और उपदेशक ही नहीं थे, विश्व-बोध और मानवीयता से ओतप्रोत समाज-सुधारक भी थे । इन्होंने मजहब और जाति-भेद से ऊपर उठकर मानवीय भावों को परखकर विशाल मानवीय बोध जगाया था। इनकी साधना-भूमि, काव्य-भूमि एवं भाव-भूमि अत्यंत व्यापक और संवेदना जन-मन-स्पर्शिनी थी । इन्होंने भेदों से अभेद और नानात्व में एकता का संधान तथा आत्म-बोध और जगत्-बोध को एकाकार किया था । दादू का काव्य कबीर के वैचारिक क्षितिज को व्यापक किंतु धीर-गंभीर बनाने का उपक्रम है।
    दादू अपने सहज, निश्छल भगवत्प्रेम के सोपान से ब्रह्म-द्वार की उस सीमा तक पहुंचे, जहाँ परम तत्त्व के यथार्थ स्वरूप को पहचानने और पाने का मार्ग संसार को दिखा सके । इन्होंने ऐसे व्यक्ति और समाज की रचना का प्रयास किया था, जो सच्चाई, समता, प्रेम, भाईचारे और मानवीयता से ओतप्रोत था।
    अनेक प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर पहली बार इनकी समग्र रचनाओं का प्रामाणिक और पूर्ण वैज्ञानिक पाठ-संपादन करके तथा पुनरावृत्ति तथा भ्रमपूर्ण पाठों का निराकरण करते हुए, दादू की मूल रचना का पाठ प्रस्तुत किया गया है । विद्वतजनों के अतिरिक्त सामान्य पाठकों को इनका सृजन सहज बोधगम्य हो सके, इसके लिए भावार्थ और शब्दार्थ भी दिए गए हैं।

    दादू समग्र : 2
    महिमामय व्यक्तित्व और रचनात्मक प्रतिभा से संपन्न निर्गुणपंथी  कवियों में कबीर के पश्चात् दूसरा स्थान संत दादू दयाल का है । स्वयं सक्रिय रचनाशील रहते हुए अपने शिष्यों की रचनात्मक प्रतिभा को आगे बढाने वाले प्रेरक के रूप से उनका विशिष्ट महत्त्व रहा है । इसी कारण से मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के समस्त संप्रदायों में सर्वाधिक रचनाकार दादू-पंथ मेँ हुए थे।
    दादू दयाल की रचनाओं का समग्र एवं प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत करना, अन्य कवियों की अपेक्षा जटिल, समय-साध्य एवं चुनौतीपूर्ण कार्य था। संत-काव्य-मर्मज्ञ डॉ० रजनीश ने 14 वर्षों की निरंतर साधना से विभिन्न स्थानों, दादू-द्वारों और सांस्थानों में जाकर, वहाँ से प्राप्त सर्वाधिक प्राचीन 29 पांडुलिपियों के आधार पर दादू-काव्य का पूर्णिया वैज्ञानिक, मूल एवं विश्वसनीय पाठ प्रस्तुत किया है।
    दादू 'जोग्यन्द्र' की अज्ञात, लुप्तप्राय और अपूर्व रचना 'आदि बोध-सिद्धांत-ग्रंथ' के साथ उनकी अन्य रचनाएँ पहली  बार इसमें दी जा रही हैं। 'समग्र' में समग्रत: पुनरावृत्ति और प्रक्षिप्त साखियों को छाँटकर पाद-टिप्पणियों या अतिरिक्त साखियों के अंतर्गत रखकर, कथ्य द्वार संदर्भ की दृष्टि से उनका उपयुक्त स्थान निर्धारित किया गया है ।
    ग्रंथ की विस्तृत भूमिका और यथार्थपरक विवेचना से अनेक लोक-प्रवादों और भ्रांत धाराओं का निराकरण करते हुए इस प्रस्तुति में दादू के जीवन और रचनाधर्मिता के बारे में नई दिशाएं दी गई हैं।
    जन-सामान्य को दादू दयाल की कविता का मर्म सहज ग्राह्य हो सके, इसके लिए साखियों और पदों के साथ भावार्थ और शब्दार्थ भी दिए गए है, जिससे यह ग्रंथ विद्वानों, सुधी पाठकों और जन-सामान्य के लिए समान रूप से उपयोगी हो गया है ।
  • Bhartiya Naitik Shiksha : 2
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-266

    Availability: In stock

    जीवन एक अनुपम उपहार है। इसमें आपत्तियों से घबराकर कायरों की भाँति पलायन करने की अपेक्षा समस्याओं का नीतिपूर्वक सामना करने से सुख-शांति व समृद्धि का सृजन होता है। नीतिपूर्वक व्यवहार करने की शिक्षा देने का कार्य नैतिक शिक्षा का है। नैतिक शिक्षा ही वास्तव से वह शिक्षा है, जो विद्यार्थी को समाज तथा राष्ट्र यहाँ तक कि संपूर्ण मानवता के लिए अपना जीवन उपयोगी बनाने की शिक्षा देती है, अर्जित ज्ञान को व्यावहारिक रूप प्रदान कर जीवन के संघर्षों को समझने और उनसे जूझने की क्षमता देती है । मूल्यों एवं संस्कृति की सुरक्षा के साथ वांछित ज्ञान प्रदान करने की दक्षता नैतिक शिक्षा में ही अंतर्निहित है।
    नैतिक शिक्षा की यह जो पुस्तक आपके हाथ में है, वह स्वाध्याय के लिए है, मनन के लिए है और बार-बार चिंतन करने के लिए है। केवल छात्र जीवन के लिए ही नहीं अपितु संपूर्ण जीवन के लिए है ।
    जीवन की समस्याओं और चुनौतियों का सामना महापुरुषों ने किस प्रकार किया, इस पुस्तक द्वारा आप उसका अध्ययन कर अपना हौसला बढा सकेंगे ताकि उनका समाधान करने में आप सशक्त हो सकें । इस पुस्तक का अध्ययन इस दृष्टि से आपको स्वयं करना है।
    अपने अन्तर्मन में झांककर देखने में हममें बहुत-सी कमियां और अच्छइयां देखने को मिलेंगी। इनके शोध से ही हम अपने व्यक्तित्व को पहचान सकते हैं । स्वयं को जानकर ही हम अपने लक्ष्य को जान सकते हैं ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrit Lal Nagar (Paperback)
    Amritlal Nagar
    90

    Item Code: #KGP-7008

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अमृतलाल नागर
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अमृतलाल नागर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'किस्सा बी सियासत भठियारिन और एडीटर बुल्लेशाह का', 'एक दिल हजार अफसाने', 'जंतरर्-मंतर', 'मन के संकेत', 'लंगूर का बच्चा', ‘शकीला की माँ', 'सती का दूसरा ब्याह', 'ओढ़री सरकार', 'सूखी नदियाँ' तथा 'पाँचवाँ दस्ता' । संपादक द्वारा लिखी गई पुस्तक की भूमिका के माध्यम ते अमृतलाल नागर की समग्र कथा-यात्रा और उसके महत्त्व से भी सहज ही परिचित हुआ जा सकता है ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अमृतलाल नागर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Maharishi Dayanand Saraswati Aur Stree-Vimarsh
    Dr. Meena Sharma
    165 149

    Item Code: #KGP-1243

    Availability: In stock

    महर्षि दयानंद सरस्वती और स्त्री-विमर्श
    महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श में वैचारिकता से अधिक रचनात्मकता है। अपनी रचनात्मकता के कारण उसकी मूल्यवत्ता एवं सार्थकता है। मूल्य और सार्थकता की तलाश हर युग में होती है। आज के स्त्री-विमर्श की दिशाहीनता की स्थिति एवं चुनौतियों के आलोक में दिशा-निर्देशक के रूप में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श, बल्कि यूँ कहें कि स्त्री के दयानंदीय विमर्श की आवश्यकता कल से अधिक आज है। इतिहास में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श की जो भूमिका थी, वर्तमान में स्त्री-विमर्श की उस भूमिका को इतिहास-बोध के साथ युगानुरूप विस्तार दिया जा सकता है।
  • Tantu
    Bhairppa
    695 626

    Item Code: #KGP-158

    Availability: In stock


  • Parvatiye Lokkathayen
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1935

    Availability: In stock


  • Lakeer Tatha Anya Kahaniyan
    Urmila Shirish
    250 225

    Item Code: #KGP-242

    Availability: In stock

    लकीर तथा अन्य कहानियाँ
    उर्मिला शिरीष की कथाभूमि उनका परिवेश, समाज और वह पर्यावरण है, जिनमें वे एक साथ तीन तत्त्वों का समावेश करती हैं। एक है पात्र या मनुष्य, जो उनकी संवेदना का अस्तित्व है; दूसरा है उनकी विषयवस्तु, जो एक कथा में कथा की उपस्थिति की तरह है और तीसरा है उनका शिल्प, जो उनकी भाषा-चेतना और शब्द-सत्ता से निर्मित होकर जीवन-संबोधी बनता है।
    उर्मिला की ये दस कहानियाँ मृत्यु-पर्व से शुरू होती हैं तो पाठक को एक प्रकार के सदमे में ले जाती हैं, लेकिन मृत्यु का पर्व या जश्न संवेदना के कितने धरातल एक साथ हिला देता है, यह कहानी की आंतरिक काया से प्रकट होता है। एक बहुत ही ध्यातव्य तथ्य इन कहानियों के बारे में यह है कि कथाकार के आग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह कहीं नहीं हैं--न यथार्थ के स्तर पर, न शिल्प और भाषा के स्तर पर। जीवन के सारे सामान्य, सामान्य की तरह ही हर कहानी में मौजूद हैं, लेकिन जब उनके मर्म की मृदुलता में उतरते हैं तो कहानी हमें अंदर तक भिगो देती है।
    ‘अग्निरेखा’ से ‘लकीर’ तक की ये कहानियाँ घटनाओं की न होकर घटित होते जीवन की कहानियाँ हैं। यह भी दावा नहीं है कि कथाकार कथा की कोई कारीगरी कर रही हो। कहानियाँ कहीं विडंबना में बोलती हैं, कहीं व्यथा में, कहीं व्यंग्य में तो कहीं विषमतागत व्यग्रता में। इसलिए कहा जा सकता है कि इन कहानियों के अंदर एक ऐसी अनुभूति है, जो एक तरफ पाठक को कहानी से जोड़ती है, तो दूसरी ओर अपने ऐसे जीवन-क्षणों, स्पंदनों और संवेदनों से, जो पराये भी नहीं लगते और निजी बनाने की कोशिश में निजत्व से भी पृथक् हो जाते हैं।
    कहानियों में रचा गया जो संसार है, वह एक कथाकार की व्याकुलता से भरा-भरा है, इसलिए ये कहानियाँ पाठक के मन को अपनी ओर खींचने और अपने अंदर टिकाए रहने की कोशिशभरी कोशिश की तरह हैं।

  • Ghar Nikaasi
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1890

    Availability: In stock


  • Saaksharta Aur Samaj
    Vinod Das
    125 113

    Item Code: #KGP-9122

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में साक्षरता की महिमा और संबंधित सामाजिक द्वंद्वों और इसके प्रसार में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, जनसंचार माध्यमों की भूमिकाओं, तत्संबंधी सांस्कृति-उपभोक्तावादी ऊहापोहों, स्त्री-साक्षरता के महत्त्व जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को पहचानने का प्रयास किया गया है, वहीं उन वर्गीय पूर्वाग्रहों को भी अनोखी अंतर्दृष्टि और वयस्क विवेक से चिह्नित किया गया है, जिनके कारण साक्षरता का आलोक देश की धूसर और मटमैली झुग्गियों-झोंपड़ियों में अभी तक नहीं पहुंच पाया है। यह सही है कि लेखक के इन विमर्शों और स्थापनाओं में तीखापन और तुर्शी है। कई बार सामाजिक जड़ता और धीमी गति को लेकर यहां गुस्सा, क्षोभ और अवसाद भी मिलता है। लेकिन विनोद दास हिंदी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जो एक संवेदनशील बुद्धिजीवी की तरह शिक्षा से जुड़े गंभीर सवालों पर वैचारिक हस्तक्षेप करते हुए अपनी परंपरा को पहचानकर मूल्यवान की खोज करते हैं। इस संकलन में उनका एक ऐसा व्यक्तिपरक निबंध भी है, जिसमें वह जमीन से जुड़े उन दो अक्षरवंचित विभूतियों को आत्मीयता से स्मरण करते हैं, जिन्होंने मूल रूप से उन्हें साक्षरता की दिशा में कार्य करने के लिए उत्प्रेरित किया है। एक तरफ इन निबंधों में साक्षरता के बारे मंे व्याप्त भ्रांतियों और धुंध को छांटने की कोशिश है, वहीं उस उम्मीद की लौ को तेज करने की कोशिश है, जो मनुष्य में समाज को बेहतर बनाने के लिए भीतर-भीतर ही सुलगती रहती है।
  • Hindustan Ki Diary
    Dirgha Narayan
    350 315

    Item Code: #KGP-HKD HB

    Availability: In stock

    'हिंदुस्तान की डायरी' में दीर्घ नारायण के कहानीकार
    का वह रूप सहज ही नजर आ जाता है जिसमें वह
    कहानी को अपने समय, समाज व बदलती संस्कृति की
    धड़कन बना देना चाहते हैं। यहाँ अनुभव जिंदगी से
    निकलकर चौदह कहानियों में इस तरह प्रविष्ट हो गए हैं।
    कि विविध पक्षीय संबंधों-मूल्यों पर संजीदगी से विचार
    होता चलता है। वर्तमान को तो ये कहानियाँ गहराई से
    अंकित करती ही हैं, एक गंभीर व सकारात्मक
    भविष्य-दृष्टि भी सृजित करती हैं जिससे हमारे समाज
    को संचालित करने वाली शक्तियाँ सचेत हो सकेंगी।
    लेखक की यह एक वाजिब चिंता है कि भारत का हर
    नागरिक तो पाकिस्तान में अमन-चैन व तरक्की ही
    चाहता है किंतु दुर्भाग्य यह है कि पाकिस्तान की नजर
    में सबसे बड़ा शत्रु भारत बना हुआ है। भारत की ओर से
    दरअसल यह एक ईमानदार डायरी है जिससे दोनों ओर
    के हुक्मरानों को सही दिशा मिल सकती है।
    अपने यथार्थ में एक मुख्य अधिशासी अधिकारी की ये ।
    कहानियाँ बदलते समय में उन दस्तकों की शिनाख्त हैं।
    जो परिवार, शहर, देश और समाज के दरवाजों पर
    सुनाई पड़ रही हैं। यहाँ भाषा ऐसी दोस्ताना है कि कथा ।
    के पात्रों और स्थितियों का मूल भाव बड़ी सहजता से
    संप्रेषित हो जाता है। रूपवादी लटकों-झटकों से संघर्ष
    कर रही आज की हिंदी कहानी के लिए दीर्घ नारायण
    जी की ये कहानियाँ एक सार्थक मार्ग प्रशस्त कर।
    सकती हैं क्योंकि यहाँ हर कहानी एक नया कथ्य
    खोजकर लाती है और यथार्थ से सीधी मुठभेड़ करती
    है
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 3 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7061

    Availability: In stock

    तीसरा खंड लिखते समय मुझे आनंद की विशेष अनुभूति हुई। कारण, चुलबुला विष्णु कर्णपुर जो लौट आया। इस खंड को पढ़ते हुए आपको भी ऐसा लगेगा कि विष्णु की उपस्थिति हमें आव्हादित करती है। मैंने विभिन्न विधाओं में अब तक लगभग तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं, लेकिन इस किशोर उपन्यास से मुझे विशेष लगाव है। भला क्यों?
    आपके मम्मी-पापा की तरह मेरे पिताजी भी मुझे डाॅक्टर बनाना चाहते थे। मैंने विज्ञान पढ़ा भी। पर जीवित मेढक, खरगोश के ‘डाइसेक्शन’ मन खिन्न हो उठा। मैंने अपनी दिशा बदल ली। मेरी अलमारी में जीवविज्ञान की जगह कालिदास, शेक्सपियर, टैगोर, प्रेचंद की पुस्तकें आ गई। साहित्य पढ़ना और लिखना अच्छा लगने लगा। सोचता हूं, भले ही मैं डाॅक्टर न बन सका, लेकिन विज्ञान और कल्पना के बीच संतुलन बनाते हुए बालकों के लिए लिखना चिकित्सकीय अनुभव जैसा ही है। संभव है चिकित्सक बनकर बच्चों से उतना घुल-मिल न पाता, जितना उन्हें अब समझ पा रहा हूं।
    सतरंगी की चतुराई ने तो मेरा मन ही मोह लिया। डाॅक्टर बनने की राह आसान हो गई। पूछो, कैसे? पढ़िए चैथे खंड में।
    -श्रीनिवास वत्स
  • Sau Baal Kavitayen
    Atri Garg
    75

    Item Code: #KGP-1450

    Availability: In stock


  • Manav Adhikar Aur Ham (Paperback)
    Urmila Jain
    140

    Item Code: #KGP-285

    Availability: In stock

    मानव अधिकार और हम
    हिंदी में प्रति वर्ष एक हज़ार से अधिक पुस्तकें छपती  हैं, पर अभी तक कोई ऐसी पुस्तक मेरे देखने में नहीं  आई है जिससे जन-सामान्य को सहज-सरल भाषा में मानव अधिकार संबंधी जानकारी प्राप्त हो सके। हिंदी की इस कमी का ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक में मानव अधिकार की धारणा सहित अन्य विषयों के संबंध में भी चर्चा की गई है । 
    मानव अधिकार का उल्लंघन कब, कैसे और क्यों  होता है और हो सकना है—इसके कुछ उदाहरण देते हुए यह भी बतलाया गया है कि अधिकांश देश किस प्रकार सैद्धांतिक रूप से तो मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा का समर्थन करते हैं और इसी के आधार पर उन्होंने अपने-अपने देश में तरह-तरह के कानून भी बनाए हैं, पर जहाँ नक उन पर अमल  करने की बात है-इस संबंध में अधिकांश, देशों का रिकॉर्ड बहून ही निराशाजनक है ।
    प्रस्तूत पुस्तक में बाल अधिकार उल्लंघन और बालकों के यौन शोषण का उल्लेख करते हुए बतलाया गया है कि किस प्रकार अपराधियों का दोष सिद्ध होने के बावजूद उनके विरुद्ध कोई ऐसी कार्यवाई नहीं की जाती, उन्हें ऐसा दंड नहीं दिया जाता कि इस प्रकार के अपराधों पर रोक लगे ।
    -उर्मिला जैन

  • Khaadi Mein Polyester
    Rajendra Tyagi
    260 221

    Item Code: #KGP-144

    Availability: In stock

    यह अनायास  नहीं है कि पूरे संग्रह में कई रचनाएँ गाँधी जी पर  केंद्रित हैं । आज़ादी के बाद इस देश का जो राजनितिक अर्थशास्त्र रहा है, उसे समझने के लिए गांधी के नाम पर चले गांधीवाद के छद्म को समझना जरुरी है । गांधीवाद जीवनशैली बनने के बजाय एक ऐसी फिलॉसफी हो लिया है, जिसमें माल काटने की अब भरपूर गुंजाइश है ।
  • Shiksha : Lakshya Aur Siddhant
    Jagat Ram Arya
    60 54

    Item Code: #KGP-9128

    Availability: In stock

    भारत की आजादी के लिए लाखों लोग शहीद हुए। उनके मन में यही तमन्ना थी कि अपना राज्य आएगा और हम अपने ढंग से देश में शिक्षा-नीति का निर्धारण करेंगे, बाल एवं युवा शक्ति में चरित्र-निर्माण द्वारा नई जागृति पैदा करेंगे, राष्ट्रभाषा हिंदी को पूरा प्रोत्साहन देंगे और वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी भाषा को लागू किया जाएगा ताकि हम अपनी ही राष्ट्रभाषा में इसे तैयार कर सकें। आजादी के लिए शहीद हुए लोगों के दिलों में तड़प भी कि हम अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाकर समान विद्यालय पद्धति को अपनाएंगे। सभी वर्गों के लोगों के लिए शिक्षा के समान अवसर दिए जाएंगे। हम अपनी धरोहर संपत्ति ‘वेदों’ से नए-नए आविष्कार करेंगे जैसाकि विदेशों में जर्मनी, इटली, फ्रांस इत्यादि देशों ने संस्कृत में लिखे वेदों में से कई खोजें कीं। जर्मनी, फ्रांस, चीन और जापान ने अपनी ही भाषा में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रा में उन्नति की है तो हम भी अपनी भाषा हिंदी में ही इस शिक्षा को अनिवार्य बनाएंगे और अपनी ही भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली तैयार करके प्रत्येक क्षेत्र में अपनी ही भाषा द्वारा उन्नति करेंगे। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य के लिए हमारे पास न कोई ठोस लक्ष्य है और न कोई सिद्धांत है।
    प्रस्तुत पुस्तक में सरल व रुचिकर शैली में इन्हीं समकालीन समस्याओं का खुलासा तथा विश्लेषण किया गया है।
  • Computer Yaani Masheeni Dimaag
    Shuk Deo Prasad
    125

    Item Code: #KGP-1159

    Availability: In stock

    कम्प्यूटर यानी एक मशीन —'मशीनी दिमाग' (Electronic brain) , जिसके अंदर बिछा होता है अनगिनत तारों का मायाजाल। 
  • Sampurna Upnanayas : Himanshu Joshi ( 2Vols.)
    Himanshu Joshi
    2100 1680

    Item Code: #KGP-SUHJ HB

    Availability: In stock


  • Jyotipunj Himalaya
    Vishnu Prabhakar
    300 270

    Item Code: #KGP-568

    Availability: In stock

    ज्योतिपुंज हिमालय
    किन्हीं के लिए हिमालय प्रणव की भूमि है, किन्हीं के लिए प्रणय की रम्यस्थली, कोई यहाँ प्रेरणा पाता है तो किसी के लिए यह पलायन का स्थान है। ये सब तो मानव की सीमित कल्पना की सीमा-रेखा के रूप हैं। अपने आप में तो यह मूक तपस्वी सौंदर्य और साधना में कोई अंतर नहीं मानता। इसीलिए किसी भी कारण से हो, सर-सरिताओं, वृक्ष-पादपों, पशु- पक्षियों और औषधियों के समान ही मानव को भी उसने सदा शरण दी है। शरण के वे स्थान आज भी वर्ष में आठ मास तक मानवीय क्रीड़ा से गूँजते रहते हैं। उसकी छोटी-छोटी चोटियों पर तो वर्ष-भर बस्तियाँ बसी रहती हैं, परंतु सर्वोच्च शिखरों पर भी मनुष्य के चरण-चिह्न अंकित हो गए हैं। 
    हिमालय आयु की दृष्टि से संभवतः सबसे तरुण गिरिमाला है, परंतु प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से कदाचित् यह सर्वोच्च पर्वत संसार में सर्वश्रेष्ठ है।
    इसकी विशिष्टता अर्थात् झीलों और नदियों की प्रमुखता, प्राकृतिक वैभव की संपन्नता, अनुपम सुंदरता और सुषमा के कारण ही न केवल भारतवासी, बल्कि दूसरी जातियों के लोग भी इसे देवताओं का आवासगृह मानते रहे हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक में उत्तरकाशी, गंगोत्री, गोमुख और तपोवन की यात्राएँ इसके महत्त्व को और भी बढ़ा देती हैं।
  • Vikalang Vibhutiyon Ki Jeevan Gaathayen
    Vinod Kumar Mishra
    700 616

    Item Code: #KGP-38

    Availability: In stock


  • Saagar Aur Uski Apaar Sampada Evam Oorja
    Vinod Kumar Mishra
    240 216

    Item Code: #KGP-128

    Availability: In stock

    सागर और उसकी अपार संपदा एवं ऊर्जा
    सुनामी लहरों ने सागर का प्रलयंकारी रूप उजागर किया । इस प्रक्रिया में द्वीप अपनी जगहों से हिल गए । कई जगह नीचे दबी सामग्री ऊपर आ गई और अनेक जगहों पर बहुमूल्य सामग्री के भंडार लोगों के हाथ लग गए। 
    इस आपदा ने अनायास ही लोगों के मन से सागर के प्रति जिज्ञासा बढा दी । सागर की उत्पत्ति, उसका विकास, उसके विभिन्न पहलुओं के बारे में जानने की आवश्यकता बढ़ गई और बढ़ती आबादी के मद्देनज़र भविष्य में सागर स्थित जैविक व अजैविक संपदा के दोहन और सागा में छिपी प्रचंड ऊर्जा के उपयोग की संभावनाओं की तलाश अनिवार्य हो गई है ।
    हालाँकि कवियों ने सदियों से ग्रंथों से सागर का वर्णन किया है, पर इस पुस्तक में सागर के विभिन्न रूपों का रोचक व उपयोगी वृत्तांत है ।
  • Maanush Gandh
    Suryabala
    200 180

    Item Code: #KGP-53

    Availability: In stock

    मानुष-गंध
    अपने इस कथा-संग्रह में सूर्यबाला फिर से कथ्य और शिल्प के अपने पुराने प्रतिमानों को तोड़ती नजर आती हैं।
    एक तरफ ‘क्रासिंग’ और ‘क्या मालूम’ जैसी कहानियाँ स्त्री-पुरुष संबंधों के कुछ अनूठे और अबोध रहस्यों को थहाती हैं तो दूसरी तरफ ‘जश्न’ और ‘तिलिस्म’ भावुकता को थिराते हुए एक विरल कथा-रस की सृष्टि करती हैं।
    कुछ ऐसा लगता है जैसे लेखन में चलने वाले ट्रेंड, फैशन से सूर्यबाला को परहेज-सा है। लेकिन इसका अर्थ, समय की तल्ख सच्चाइयों से मुकरना या उन्हें नकारना हर्गिज नहीं है। इसी तरह अपनी कहानियों के कैनवस पर, ‘लाउड’ और अतिमुखर रंग-रेखाओं के प्रयोग से भी बचती हैं वे। उनके पात्रों के विरोध और संघर्ष मात्र विध्वंसक न होकर विश्वसनीय और विवेकसम्मत होने पर ज्यादा जोर देते हैं।
    सिद्धांतों, वादों और आंदोलनों के ऊपरी घटाटोपों से बचती हुई जिजीविषा की भरपूर मानुष-गंध लेकर चलती हैं इस संग्रह की कहानियाँ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash (Paperback)
    Uday Prakash
    175

    Item Code: #KGP-377

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshaatkaar : Nasera Sharma
    Nasera Sharma
    350 315

    Item Code: #KGP-664

    Availability: In stock


  • Khushabu To Bacha Li Jaaye
    Laxmi Shankar Vajpayee
    80

    Item Code: #KGP-1905

    Availability: In stock

    खुशबू तो बचा ली जाए
    तमाम आडंबरों, विडंबनाओं और त्रासदियों के रहते, घुटते हुए माहौल में, एक ताजा हवा का झोंका है— खुशबू तो बचा ली जाए । विवशताओं के चलते, खुद से जूझते और अँधेरों के लंबे रेगिस्तान में रोशनी की फिक्र, आस्थाओं की नदी और नूर की बारिश की प्रार्थनाएँ हैं इसकी गज़लें । कभी आगाह करती हैं तो कभी आह्वान । कभी अंतस में टीस भरती हैं तो कभी चेतना में उजास—और अपने होने का असर लेकर दूर तक साथ चलती हैं।
    ओस में बंद सूरज, शंख में समाए नाद की तरह, दो मिसरों के बीच कहीं क्रांति की आग है तो कहीं विश्वास का चंदन । कहीं सांस्कृतिक सुरभि है तो कहीं वक्त की छटपटाहट-कहीं दहकते हुए सवाल हैं तो कहीं सुलगती हुई चिंताएँ ।
    न कोई लाग-लपेट, न बनावट, सीधी-सच्ची बात, आप लोगों की बात, आमफहम भाषा में, जो हदय से चलकर हृदय से उतरती है। शायद इसीलिए इन ग़ज़लों ने, राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं के संपादकीय लेखों, महत्वपूर्ण अभियानों, आन्दोलनों से लेकर  दार्शनिकों के प्रवचन तक सक्रिय भूमिका निभाई है । संक्रांति के इस युग में, मूल्यवान एवं पवित्र परंपराओं, मर्यादाओं और मानवीय संवेदनाओं को सहेजने की ईमानदार कोशिश है—'खुशबू तो बचा ली जाए' ।
  • Namvar Singh Ka Aalochna-Karm : Ek Punah Paath
    Bharat Yayavar
    250 225

    Item Code: #KGP-791

    Availability: In stock

    नामवर सिंह की लिखित आलोचना की पुस्तकें काफी पुरानी हो गयी हैं, फिर भी उनका गहन अवगाहन करने के  बाद यह कहा जा सकता है कि उनमें आज भी कई नई उद्भावनाएं और स्थापनाएं ऐसी हैं, जिनमें नयापन है और भावी आलोचकों के लिए वे प्रेरक हैं । उनकी पुनर्व्याख्या और पुनर्विश्लेषण की काफी गुंजाइश है । नामवर सिंह ने अपने वरिष्ठ आलोचकों की तुलना में कम लिखा है, पर गुणवत्ता की दृष्टि से  वे महान कृतियाँ हैं । तथ्यपरक, समावेशी और जनपक्षधरता से युक्त उनकी आलोचना बहुआयामी है । उनकी आलोचना आज के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक है । पुरानी होकर भी उसमे ताजापन है । वह साहित्य की अनगिनत अनसुलझी गुत्थियों  को सुलझाती है और साहित्य-पथ में रोशनी दिखती है । 
  • Maitreyi Pushpa : Stri Hone Ki Katha
    Vijay Bahadur Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-9041

    Availability: In stock


  • Svadharma Aur Kaalgati
    Ramesh Chandra Shah
    75 68

    Item Code: #KGP-9123

    Availability: In stock

    स्वधर्म और कालगति
    ‘मनुष्य सत्य को नहीं जान सकता किंतु उसे जीवन में अवतरित अवश्य कर सकता है’
    आधुनिक कवि येट्स ने लिखा था, अपनी मृतयु से एकाध दिन पहले ही। जैसे उसके कुल जीवानानुभव और कवि-कर्म का निचोड़ इस वाक्य में आ गया हो। प्रकारांतर से क्या यह ‘सब होकर सबको देखने’ वाले दर्शन से ही जुड़ी हुई बात नहीं लगती? रचना भी ज्ञान का ही एक प्रकार है; पर रचना का ‘जानना’ ज्ञान के अन्य अनुशासनों के ‘जानने’ की प्रक्रिया से मूलतः भिन्न है। इसलिए कि वह स्वयं जीकर के, स्वयं होकर के जानना है। ‘जानना’ यहां ‘होने’ पर अवलंबित है। रचना का सच अस्तित्वात्मक और रागदीप्त सच है। किंतु क्या इसीलिए वह सत्य के दूसरे किस्म के खोजियों और दावेदारों को उनकी तथाकथित वस्तुपरक कसौटी के चलते संदिग्ध नहीं लगता होगा? आयोनेस्को से पूछा गया कि तुम क्यों लिखते हो? उसने उत्तर का प्रारंभ ही इस वाक्य से किया कि ‘मैं क्यों लिखता हूं-यदि मैं सचमुच यह जानता होता तो मुझे लिखने की कोई प्रेरणा ही नहीं होती, यही जानने के लिए तो मैं लिखता हूं कि मैं क्यांे लिखता हूं?’ जाहिर है कि इस तरह का लगातार जानना भी लेखक होने से छुटकारा नहीं दिलाता। यदि लेखन-कर्म को व्यापक जीवन और सृष्टि के प्रति एक तरह के ऋणशोध या आत्मदान की प्रक्रिया के रूप में देखें तो भी इससे यह कहां निकलता है कि इस जीवनव्यापी प्रयिा की परिणति आत्मज्ञान और आत्मोपलब्धि में होगी ही। हो भी तो वह आत्मज्ञान और आत्मोपलब्धि-सब होकर सबको जानने का अनुभव-सचमुच ‘ज्ञान’ की है और दूसरे वस्तुपरक ज्ञान की तरह ही उपयोगी और समर्थ ज्ञान है, इसका भरोसा दूसरे को कैसे हो?
    (पुस्तक के एक निबंध से)
  • Neend Se Pahale
    Soma Bharti
    195 176

    Item Code: #KGP-373

    Availability: In stock

    नींद से पहले
    सोमा भारती की कहानियां हमें उस जानी-पहचानी निम्न- मध्यमवर्गीय दुनिया में ले चलती हैं, जिनसे हम जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जिन्हें हम देखकर भी अनदेखा किए रहते हैं।
    इनके पात्र, चाहे वह ‘जस्सो मासी मर गई’ की जस्सो मासी हों या ‘नींद से पहले’ के रमापति, ‘किराये के मकान’ की पेइंग गेस्ट हो या कोई अन्य, मोमबत्तियों की तरह हवाओं में जूझते, जलते-गलते रहते हैं। वे आपसे दया की भीख नहीं मांगते, लेकिन समय, संयोग और नियति ने उन्हें जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, उसका दीदार जरूर कराती हैं कि देखो, यह मैं हूं, यह तुम भी हो सकते थे।
    सोमा ने अभिनय और एंकरिंग आदि अभिव्यक्ति के जिन मंचों पर काम किया है, उसका लाभ उनकी भाषा-भंगिमा, भाव और बोध को मिला है। कहानियों के रचाव-रसाव के लिए सोमा को किसी सायासता की जरूरत नहीं पड़ती, भाषा-शिल्प के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते, न ही चैंकाने वाले चमत्कारों के टोने-टोटके टटोलने की आवश्यकता होती है। कहानियों की सहज संवेदना ही उनकी शक्ति है, जिनकी तासीर खुद-ब-खुद आपको पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
    सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ! सोमा ने दूसरी कहानियां न भी लिखी होतीं, उनकी अकेली कहानी ‘जस्सो मासी मर गई’ ही उन्हें अमर बना सकती है।
    --संजीव
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Jaishankar Prasad
    Jaishankar Prasad
    180 162

    Item Code: #KGP-9158

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं जयशंकर प्रसाद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘आकाश-दीप’, ‘ममता’, ‘आंधी’, ‘मधुआ’, ‘व्रत-भंग’, ‘पुरस्कार’, ‘इंद्रजाल’, ‘गुंडा’, ‘देवरथ’ तथा ‘सालवती’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Shrikant
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    600 540

    Item Code: #KGP-764

    Availability: In stock


  • Triya Hath (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    100

    Item Code: #KGP-7046

    Availability: In stock


  • Metamorphosis (Novel)
    Franz Kafka
    395 356

    Item Code: #KGP-361

    Availability: In stock

    The Metamorphosis is one of Franz Kafka's most well-known works. It is the story of a young man, Gregor Samsa, who transformed overnight into a giant beetle-like insect, becomes an object of disgrace to his family, an outsider in his own home, a quintessentially alienated man. 
    A harrowing—though absurdly comic — meditation on human feelings of inadequacy, guilt, and isolation, The Metamorphosis has taken its place as one of the most widely read and influential works of twentieth-century fiction.
  • Rangey Ghazal
    Om Prakash Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-151

    Availability: In stock

    रंगे ग़ज़ल
    यह एक अनूठा दस्तावेज है, जिसे एक प्रयोग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।  इस संकलन की कुछ गज़लें जहां अपनी परम्पराओं के साथ नजर आयेंगी, वहीं कुछ ग़ज़लों का रूप रूढियों और परम्पराओं से हटकर जमाने के नयेपन को छूता नजर आयेगा ।
    इस संकलन में पुराने शाइरों की ग़ज़लों के साथ ही कुछ नये शाइरों की ग़ज़लें भी सम्मिलित की गयी हैं, जो आज लोगों के दिलों में अपनी जगह बना रहे हैं तथा ग़ज़ल के प्रगतिवादी स्वरूप को नयी दिशा ध्यान कर रहे हैं । इन शाइरों में प्रमुख हैं-डा० बशीर 'बद्र', निदा फाजली, अख्तर शीरानी, ताहिर अली 'ताहिर', यूसुफ हसन, मुनीर नियाजी, मुजफ्फर हनफी, परवीन 'शाकिर', शोहरत बुखारी, शह्रयार, महकूर ‘खिजां', जिगर श्योपुरी, तस्नीम सिद्दीकी, अहमद 'कमाल', जफर 'इक्बाल', खालिद अहमद, जावेद शाहीँ, कतील शिफ़ाई, कर्रार 'नूरी', 'जोश' मलीहाबादी, साहिर होशियारपुरी, निश्तर खानकाही, मजीद अमजद, कुमार 'पाशी' और गुलशन मदान आदि ।
  • Dainik Jeevan Mein Ayurveda
    Vinod Verma
    500 450

    Item Code: #KGP-9149

    Availability: In stock

    दुर्भाग्य की बात है कि आयुर्वेद का असीमित ज्ञान इस देश की संचालन-व्यवस्था में समुचित प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आयुर्वेद के विकास तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। हमारी शासन-व्यवस्था भी इस ओर उदासीन रही। आयुर्वेद को ‘देशी’ कहकर उपेक्षित कर दिया गया। किंतु आज जिस नए युग का प्रारंभ हो रहा है उसमें हमारा पुनर्जागरण सुनिचित है जिसमें हमें आभास होगा कि जिसे हमारे देशवासियों ने ‘देशी’ कहकर त्याग दिया था उसी को विदेशी लोग अच्छे आवरण में डालकर हमें बेच रहे हैं। ‘दादी मां’ की परंपरा अर्थात् आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान, जो हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है, उसे हमारी शिक्षा-प्रणाली में सम्मिलित किया जाय। इस दृष्टि से स्कूलों तथा मेडिकल काॅलेजों के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के कुछ महत्वपूर्ण अंश पढ़ाए तथा सिखाए जाने चाहिए। आयुर्वेद के जिज्ञासुओं और अनुसंधित्सुओं के लिए उपयोगी जानकारी देने और तत्संबंधी अज्ञान को दूर करने में सहायक प्रस्तुत ग्रंथ इस विषय की विदुषी सुश्री विनोद वर्मा की अनूठी कृति है।
  • Zindagi-Zindagi
    Harish Kumar 'Amit'
    250 225

    Item Code: #KGP-ZNDG HB

    Availability: In stock

    आर्य स्मृति साहित्य सम्मान(2018) से सम्मानित लघुकथा-संग्रह 
  • Pracheen Bharat Ki Kathayen
    Mangal Dev Upadhyaya
    60 54

    Item Code: #KGP-9108

    Availability: In stock

    ऋषि ने अश्विनी कुमार की ओर देखते हुए कहा, ‘‘कहिये, आपको क्या चाहिए?’’
    अश्विनीकुमार ने निवेदन किया, ‘‘मधु-विद्या का रहस्य।’’
    ऋषि विस्मय-चकित हो उठे। उनके मुख से विस्मय भरे स्वर में अपने आप निकल पड़ा ‘‘मधु-विद्या का रहस्य!’’
    अश्विनीकुमार ने कहा, ‘‘हां ऋषिश्रेष्ठ, मधु-विद्या का रहस्य। मधु-विद्या के रहस्य से ही हमारा दैन्य दूर हो सकता है, हमारी व्यथाग्नि शान्त हो सकती है।’’
    ऋषि विचारों में डूब गए। उन्होंने सोचते हुए कहा, ‘‘पर मैं मधु-विद्या का रहस्य किसी अन्य पर प्रकट नहीं कर सकता। यदि मै। प्रकट करूंगा तो...।’’
    अश्विनी कुमार बीच में ही बोल उठे, ‘जानते हैं ऋषिश्रेष्इ! यदि आप प्रकट करेंगे, तो देवराज के द्वारा आपको शिरोच्छेद कर दिया जाएगा।’’
    ऋषि ने सोचते हुए कहा, ‘‘हां, यही बात है इस बात को जानते हुए भी आप मुझससे मधु-विद्या का रहस्य प्रकट करने के लिए कह रहे हैं?’’
    -इसी पुस्तक से
  • Bhartiya Naari Aur Pashchimikaran
    Shanti Kumar Syal
    300 270

    Item Code: #KGP-602

    Availability: In stock

    भारतीय नारी और पश्चिमीकरण 
    पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति और सभ्यता के दुष्प्रभाव ने भारतीय समाज में नारी समाज के यथार्थ को बदल दिया है। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित नारी स्वयं वंदनीय न मानकर स्वयं को पुरुषों के समान बनने के लिए आंदोलनरत है। सदियों से पीडित नारी का सब्र का बांध टूट गया है। प्राचीन परंपराओं की पकड़ से बाहर आ गई है। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही है। आज की शिक्षित नारी अत्याचार के विरोध में बलपूर्वक खड़ी हो रही है। आधुनिक माहौल में तमाम लड़कियां घर की देहरी लांघकर स्वावलंबी हो रही है । आधुनिक भारतीय नारी अन्याय और अत्याचार को चुपचाप नहीं सहती, बल्कि उसका प्रतिकार कर समाज  में अपने लिए अलग जगह बनाती है। आज की नारी स्वतंत्रता चाहती है। वह पुरुष की अधीनता में रहना नहीं चाहती। वह पुरे प्राणवेग के साथ जाग उठी है।
    पश्चिमीकरण से नारी की दुनिया बदल रही है । उसके सपने, उसकी इच्छाएं, आकाक्षाएं, उसके जीने और सोचने का ढंग बदल रहा है। वह अब जानने लगी है कि अपने सपनों को कैसे पूरा किया जा सकता है । अब वह अपनी तरह अपनी शर्तों पर जीना चाहती है। वर्तमान युग में शिक्षित एवं अशिक्षित नारियां अकेलेपन की शिकार होने लगी हैं। यह समस्या आधुनिक युग की देन है। नारी घर की चारदीवारी को लांघकर पुरुषों से बराबरी करने, नौकरी करने निकली है किन्तु वह अपनी लज्जा, संस्कृति, सदाचारिता को पीछे छोड़ आई है। इस नारी स्वतंत्रयुग की नारियां पश्चिमी दौड़ में दौड़ती हुई, अपनी संस्कृति की मान-मर्यादा को पीछे छोड़ती हुई कहीं अंधकारमय युग में खो न जाएं... ।
  • Suraj Kiran Ki Chhanv
    Rajendra Avasthi
    100 90

    Item Code: #KGP-SKCM

    Availability: In stock


  • Akkhar Kund
    Padma Sachdev
    125 113

    Item Code: #KGP-1989

    Availability: In stock

    अक्खर कुंड 
    यूँ तो पद्मा सचदेव डोगरी की कवयित्री हैं, पर अनुवाद के माध्यम से जब वह प्रकट होती हैं , तो उनकी कविता में पूरे हिंदुस्तान की महक आती है । इससे सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि वह संपूर्ण भारतीय समाज और संस्कृति को शब्द देने वाली कुशल कवियत्री हैं ।
    पद्मा जी की कविता प्रकृति की कविता है और मनुष्य की संवेदना और करुणा की भी...। इनकी कविता में मिथकों की बानगी अदभुत और अलग पहचान से समृद्ध है । यहाँ वह सूक्ष्म में जाती हैं और उसे रूहानी भावों से जोड़ते हुए जो चित्रांकन करती है, वह जीवंत तो है ही, बल्कि अपनी जड़ों से जोडने का वास्तविक अहसास कराती हैं । इसलिए इनमें आत्मिक आनंद की अनुभूति भी है ।
    पद्मा जी की कविताओं में कश्मीर का बेमिसाल सौंदर्य  तो है ही, वहाँ की जातीय संस्कृति का सबल रेखांकन  भी है, यानी इनमें कश्मीरियत समूचे आकार में यहीं होती है । इन्हें शब्द-चित्रों को बनाते हुए उन्हें घाटी में बारूद की गंध भी आती है । इससे उनका संवेदनशील मन विचलित होता है, लेकिन वह इसे यूँ ही नहीं छोड़ देतीं, पीड़ितों-वंचितों को आशा और विश्वास भेंटती है । उनमें 'एक दिन लौटने का अहसास' जगाती हैं ।
  • Indian Education : Beyond Headlines (Education)
    Jagmohan Singh Rajput
    595 536

    Item Code: #KGP-9016

    Availability: In stock

    The contents of this volume are essentially an attempt to catch up with the stakeholders in education, study and analyze their perceptions and the manner these are articulated. These are primarily based on observations, interactions and analysis that emerged from the lecture tours, discussions with experts, teachers, parents and informed citizens. There is a general impression that even when major educational reforms are planned and announced, there is little motivation in the system ensures that these are effectively implemented in the right spirit. It would be seen that the major national concerns in education centre on quality improvement, skill orientation, and value development and nurturance. Everyone expects an environment in school that would be attractive to the learner and let him interact with his 'role models'. It would be a place where every teacher realizes that he is being watched and observed by the innocent young ones who imitate him and treat him as an icon!
    The education system must create learning conditions that lead to the internalization of the democratic values enshrined in the Constitution of India. The process of teaching and learning must consistently strive to inculcate the eternal and universally accepted values of Truth, Peace, Nonviolence, Dharma (Righteous Conduct) and Love. This is necessary to sustain social cohesion and religious amity in the country. Education alone has the unique strength to promote the desire to live together which is critical to the unity and identity of India. Citizenship education must begin at the right stage and can continue all along during education as it would become an asset in the working life. India would enhance its cognitive capital manifold if all of its children get good quality school education of comparable and acceptable quality. It would lead to improvement in the quality of research and innovations which at present is an area of considerable concern.
  • Afrika Road Tatha Anya Kahaniyan
    Jagmohan Singh Rajput
    300 270

    Item Code: #KGP-610

    Availability: In stock

    अफ्रीका रोड तथा अन्य कहानियां 
    अफ्रीकी देशों से प्रवास के दौरान, फिर लंदन में अफ्रीकी लेखकों और उनकी कहानियों से रूबरू होती रही, पड़ती रही । वे इतनी क्यों कि दिल हुआ वे हिंदी पाठकों तक पहुंचें । रास्ता था अनुवाद । और अनुवाद में आसानी इसलिए हुई कि लगभग सभी कहानियां मूल अंग्रेजी में ही लिखी गई है ।
    -उर्मिता जैन
  • Hum Yahan The (Paperback)
    Madhu Kankria
    300

    Item Code: #KGP-7232

    Availability: In stock

    ‘जंगल कुमार! सफलता-असफलता कुछ नहीं होती। असली चीज होती है आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा। जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना।’ दीपशिखा वेफ ये वाक्य मधु कांकरिया के नवीनतम उपन्यास हम यहां थे की सैद्धांतिकी है। इस उपन्यास के दो केंद्रीय चरित्रा हैं–दीपशिखा और जंगल कुमार। दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग-अलग शहर से आए–लेकिन लक्ष्य की समानता उनको जीवन पथ पर अभिन्न बना देती है।
    ‘हम यहां थे’ जीवन में व्याप्त करुणा, प्रतिरोध, संघर्ष, स्वप्न, संकल्प और समर्पण का अनुसंधन है। किसी ने कहा था कि लक्ष्यहीन जीवन भ्रष्ट और दयनीय होता है। यह जीवन सत्य धीरे-धीरे उपन्यास की नायिका या केंद्रीय अस्मिता दीपशिखा के भीतर आकार लेता है। इसको वृत्तांत का रूप देने के लिए मधु कांकरिया ने डायरी का शिल्प अपनाया है। ‘दीपशिखा की डायरी: अपने अपने जंगल’ से ‘ओ जिंदगी! ओ प्राण!’ जैसे कई उपशीर्षकों में दीपशिखा के बहाने एक सामान्य स्त्री के भीषण संघर्ष और कोलकाता की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्थितियों का वर्णन किया गया है। ‘उत्तराधर’ में जंगल कुमार के पक्ष से दीपशिखा के वृत्तांत को संपूर्ण किया गया है। अर्थात् आदिवासियों के बीच जाकर उनके संघर्ष में सहभागी बनकर दीपशिखा ‘कैदी नंबर 989’ बन गई। मधु कांकरिया ने अद्भुत ढंग से आदिवासी अस्मिता और संघर्ष को शब्द दिए हैं। प्रकृति और प्रकृतिसंतानों के साथ व्यवस्था और बाजार के सुलूक हृदय को विचलित कर देते हैं। जंगलों की अंधधुंध कटाई और जंगली जानवरों को बेघर होते देख जिस खतरे की ओर वे इशारा करती हैं उसकी अनदेखी कर भविष्य की ओर देखना संभव नहीं है। मानव मन के गहरे स्तरों को छूती यह कहानी जीवन के दर्द और सौंदर्य, प्रेम और उदासी को अद्भुत ढंग से रचती है। पूरे उपन्यास में भाषा के अनेक रचाव हैं, लेकिन जब दीपशिखा और जंगल कुमार का साहचर्य आता है तब भाषा सचमुच सहृदय हो उठती है।
    ‘हम यहां थे’ एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन के कठोर सत्य को वर्तमान के तीखे प्रकाश में परिभाषित करता है।
  • The Great Horizon (Biography)
    Debabrata Dasgupta
    345 311

    Item Code: #KGP-342

    Availability: In stock

    The Great Horizon is a biographical novel on Sir Alexander Fleming, a Scottish biologist and pharmacologist. His best-known discoveries are the discovery of the enzyme lysozyme and the antibiotic substance penicillin from the mold Penicillium notatum, for which he shared the Nobel Prize in Physiology or Medicine in 1945 with Howard Florey and Ernst Chain.
    Discovery of penicillin has come naturally as a life-giver to mankind. Disease-torn distressed humans have got a means of longevity through this life-saver. It has contributed in no less measure, to the average human longevity crossing the figure of seventies. The bright rays of the antibiotics have dispersed the dark clouds of sickness and diseases, which overcast the sky of human destiny. All this has been made possible due to the physician named Alexander Fleming who discovered it in 1928 and unfolded a new horizon.
  • Bhaasha Vigyan Pravesh (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    50

    Item Code: #KGP-998

    Availability: In stock

    यदि यह कहा जाए कि सच्चे अर्थों में भाषाविज्ञान का प्रारंभ भारत में हुआ तो अत्युक्ति न होगी, किंतु आधुनिक काल में अपने देश में इसके प्रति रुचि बहुत बाद में जगी और वह भी यूरोपीय प्रभाव ओर प्रेरणा के फलस्वरूप। यह प्रसन्नता की बात है कि इधर लगभग तीन-चार दशकों से यह विषय यहां काफी लोकप्रिय हुआ है और होता जा रहा है।
    हिंदी में उच्चतम कक्षा के उपयुक्त इस विषय की कुछ पुस्तकें तो हैं किंतु ऐसी कोई प्रारंभिक पुस्तक नहीं थी जो इस विषय में रुचि रखने वाले सामान्य लोगों तथा विषय की प्रारंभिक जानकारी चाहने वाले छोटी या बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों आदि के लिए उपयोगी हो। इसी कमी की पूर्ति की दिशा में यह एक प्रयास है। 
    इस संस्करण में कुछ नई सामग्री भी जोड़ दी गई है तथा शेष का संशोधन कर दिया गया है, जिसके कारण यह पुस्तिका अधिक उपयोगी हो गई है।
    —भोलानाथ तिवारी
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Arora (Paperback)
    Sudha Arora
    180

    Item Code: #KGP-420

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सुधा अरोड़ा 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा अरोड़ा  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महानगर की मैथिली', 'सात सौ का कोट', 'दमनचक्र', 'दहलीज पर संवाद', 'रहोगी तुम वहीं', 'बिरादरी बाहर', 'जानकीनामा', 'यह रास्ता उसी अस्पताल को जाता है', ‘कांसे का गिलास' तथा 'कांच के इधर-उधर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सुधा अरोड़ा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • The Hanuman Factor (Paperback)
    Anand Krishna
    195

    Item Code: #KGP-336

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
    Let us explore together…..
  • Zindgi Ka Zaayaka
    Sadiq
    180 162

    Item Code: #KGP-196

    Availability: In stock

    जिंदगी का जायका 
    पिछले कई वर्षों से मैं हिंदी ही में ग़ज़लें लिख रहा हूँ। बीच में कभी-कभार यूँ भी होता है कि उर्दू में ग़ज़ल हो जाती है। 1999 की एक रात जब कुछ लिखने का मूड बना और मैंने एक ग़ज़ल लिखी जो हास्य-व्यंग्य से भरपूर थी। फिर उसी मूड में कई दिन तक ऐसी ही ग़ज़लें लिखता रहा। ये ग़ज़लें लिखकर मुझे एक अजीब-सा संतोष मिलता था और ख़ुशी होती थी। ऐसा लगता था कि मैं अपने और अपने समय के बारे में ईमानदारी, सच्चाई और निर्भीकता के साथ वह सभी कुछ लिखता जा रहा हूँ जो कि मुझे लिखना चाहिए। मैंने जब इसका ज़िक्र कमलेश्वर जी से किया तो उन्होंने ‘दैनिक भास्कर’ के रविवारीय परिशिष्ट में हर हफ्ते उनके प्रकाशन का सिलसिला शुरू कर दिया। प्रचलित ग़ज़ल से पृथक् और विशेष पहचान बनाने के लिए ‘हज़ल’ शीर्षक दिया गया और इस तरह काफी समय तक मेरी हज़लें ‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित होती रहीं और मैं उनमें प्रत्यक्ष रूप से अपने समय का इतिहास रकम करता रहा। फिर अचानक वह मूड ख़त्म हो गया। सिर्फ छपने के लिए लिखते रहना मैंने पसंद नहीं किया। कुछ समय बाद फिर मूड बना तो फिर बहुत-सी ‘ग़ज़लें’ लिख डालीं, जो ‘जिंदगी का ज़ायका’ में शामिल हैं।
    -सादिक
  • Hindustan Aur Pakistan Ki Behatreen Urdu Haasya-Vyang Shaaeree
    T.N. Raj
    395 356

    Item Code: #kgp-1910

    Availability: In stock

    उर्दू ज़बान अपनी शीरीनी, लताफ़त और नज़ाकत के सबब सदियों से लोगों के दिलों पर राज कर रही है। उर्दू शायरी ख़ास तौर पर ग़ज़ल लिखने, पढ़ने, सुनाने या गाने वाला शख्स हमें कहीं न कहीं मिल ही जाता है । मीर, ग़ालिब, इकबाल, दाग, फ़ैज, फ़िराक़, जिगर और साहिर वग़ैरा की शायरी का जादू हमेशा बरकरार रहेगा । यह मानने में कोई हरज नहीं कि उर्दू की संजीदा शायरी के मुकाबले में अभी हास्य व्यंग्य कविता में बहुत-सी गुंजाइशें बाक़ी हैं । जहाँ तक उर्दू नस्र (गद्य) में हास्य-व्यंग्य का तआल्लुक है यह बात पूरे यकीन से कही जा सकती है कि इसमें अनमोल हीरों और मोतियों की कोई कमी नहीं ।
  • Ek Aur Lal Tikon (Paperback)
    Narendra Kohli
    50

    Item Code: #KGP-7099

    Availability: In stock


  • Dus Baal Naatak
    Pratap Sehgal
    240 216

    Item Code: #KGP-759

    Availability: In stock

    दस बाल नाटक
    ये नाटक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जिन कहानियों से प्रेरित हैं, उन कहानियों का समय वह समय है, जिसे हम भारत के  पुनर्जागरण और आजादी के संघर्ष का समय कहते हैं। भारत के अन्य इलाकों की अपेक्षा बंगाल में शिक्षा को व्यवस्था बेहतर थी, लेकिन आज के मुकाबले में उस शिक्षा-व्यवस्था को भी हम पिछड़ा हुआ ही कहेंगे।  ऐसे ही समय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व दुनिया को  चौका देता हैं। अपनी अन्य कलात्मक कियाओं के साथ-साथ वे बच्चों को कभी नहीं भूले। उन्होंने एक जगह कहा भी है कि बच्चा बडों का पिता होता है। यानी हम आने वाली हर पीढ़ी से कुछ सीखते हैं और कुछ सिखाते हैं।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बाल-कहानियों में सन्देश स्पष्ट हैं। ये संदेश बच्चों की अपेक्षा उनके अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अधिक हैं। अपना संदेश समाज तक पहुँचाने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर बच्चे को भी एक व्हीकल की तरह से इस्तेमाल करले हैं। कहानी का पाठक भल ही मौजूद हो, लेकिन उसका दर्शक नहीं होता। इसलिए प्रताप सहगल ने इन कहानियों को यहाँ लघु नाटकों के माध्यम से रखा है।  प्रताप सहगल हिंदी के जाने-माने कवि-नाटककार हैं। उन्हें भी अपन बहुविध लेखन के लिए जाना जाता हैं। इससे पूर्व उनके बाल-नाटकों की एक किताब 'छूमंतर' ( किताबघर प्रकाशान) प्रकाशित होकर मकबूल साबित हुई है। इसका प्रमाण उसके लगातार छपने चाल संस्करण हैं। इस बार प्रताप सहगल ने गुरुदेव की बाल-कहानियों का अपने बाल-नाट्य-लेखन का आधार बनाया है। ये नाटक जहाँ अपने समय में अवस्थित हैं, वहीं वे हमारे समय के साथ भी जुड़ जाते हैं और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इनकी उपयोगिता बनी रहेगी।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रताप सहगल-दोनों के कन्सर्न्स का जानने के लिए दस बाल-नाटकों का यह संग्रह हर बड़े और हर बच्चे के लिए एक जरूरी किताब बन जाता है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Agyey
    Agyey
    260 221

    Item Code: #KGP-662

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अज्ञेय ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मेजर चौधरी की वापसी', 'गैंग्रीन (रोज)', 'नगा पर्वत की एक घटना', 'हीली-बोन की बत्तखें', 'पठार का धीरज', 'जयदोल', 'विवेक से बढ़कर', 'साँप', 'शरणदाता' तथा 'कोठरी की बात'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अज्ञेय की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Satya Ke Prayog
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    350 315

    Item Code: #KGP-9055

    Availability: In stock


  • Kosh Vigyan (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    150

    Item Code: #KGP-7076

    Availability: In stock


  • Hamse Hai Paryavaran
    Anku Shree
    140 126

    Item Code: #KGP-495

    Availability: In stock

    पर्यावरण के अनेक घटकों में मनुष्य भी एक है। मनुष्यरूपी बुद्धिमान प्राणी द्वारा पर्यावरण की अन्य इकाइयों का उपयोग किया जाता है। यह उपयोग ही पर्यावरण का संचालन है। इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। यह प्रभाव कुप्रभाव भी हो सकता है। इसी कुप्रभाव को हम पर्यावरण का प्रदूषण कहते हैं।
    प्रदूषण नहीं होना और उसके प्रभाव से पर्यावरण को बचाना मनुष्य का कर्तव्य है। आज का बालक की कल का मनुष्य है। इसलिए बालकों और युवाओं को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक ऐसे ही पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। हालांकि यह सभी वर्ग के पाठकों के लिए समान रूप से रुचिकर और उपयोगी लगेगी।
    पुस्तक को बाईस शीर्षकों में बांटा गया है। प्रतयेक शीर्षक अलग-अलग आलेख हैं। फिर भी कुछ बातें प्रसंगवश एक से अधिक आलेखों में आ गई हैं किंतु सारे तथ्य प्रसंगवश रहने के कारण आलेख की रोचकता में कमी नहीं आने पाई है।
    —अंकुश्री
  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    240 216

    Item Code: #KGP-235

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • Head Office Ke Girgit
    Arvind Tiwari
    300 255

    Item Code: #KGP-463

    Availability: In stock


  • Saakshi
    Bhairppa
    295 266

    Item Code: #KGP-875

    Availability: In stock

    यह उपन्यास 1986 की सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ कृति के रूप में स्वीकृत होकर 'ग्रंथलोक' पुरस्कार से सम्मानित।
  • Yatrayen
    Himanshu Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-1928

    Availability: In stock

    यात्राएँ
    कहानियों, उपन्यासों की तरह हिमांशु जोशी के यात्रा-वृत्तांतों  की भी अपनी विशेषता है। पढ़ते-पढ़ते पाठक को कहीं लगने लगता है कि इन यात्राओं में लेखक के साथ-साथ वह भी यात्रा कर रहा है । लेखक जिस तरह से इन सबको देख रहा है, जिस तरह की अनुभूति उसे हो रही है, कुछ-कुछ वैसी ही उसे भी होने लगती है । सरलता, सहजता, स्वाभाविकता हिमांशु जोशी की रचनाओं के सहज, स्वाभाविक गुण हैं । संभवत: ये ही मूल गुण किसी रचना को जीवंत बनाने में सफल होते है ।
    इन यात्राओं से कश्मीर के बर्फीले दुर्गम सीमा-क्षेत्र शामिल हैं तो पूर्व में बाँग्लादेश और भारत को विभाजित करती सुदूर हरित वंगा या इच्छामती के कूल-कगार भी । कहीं कन्याकुमारी तथा केरल की मनोरम हरित दुश्यावलियाँ हैं तो कुमाऊँ के पर्वतीय प्रदेश की अनेक अज्ञात, अछूती मनोरम झाँकियाँ भी। मॉरिशस का नीलवर्णी निर्मल स्वच्छ सागर है कहीं तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश की हिमशीतल सफेद हवाएँ भी अपने अस्तित्व का अहसास जताने लगती है । हिमांशु जोशी संभवत: वह हिंदी के पहले लेखक है, जिन्होंने विश्वविख्यात नाटककार हैनरिक इब्सन के घर सीयन की साहित्यिक यात्रा की थी । उसी तरह नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नार्वेजियन लेखक सीगरी उनसत तथा ब्यौर्नसन के घरों की तीर्थयात्राएँ भी।
    ये यात्रा-विवरण मात्र यात्रा के विवरण ही नहीं, कहीं इनमें  इतिहास भी है, भूगोल के साथ-साथ साहित्य भी । कला एवं संस्कृति की मार्मिक छुअन भी। इसीलिए ये वृतांत कहीं  दस्तावेज भी बन गए हैँ-जीए हुए अतीत के। पाठको को इनसे एक संपूर्ण जीवन का अहसास होने लगता है। एक साथ वह बहुत कुछ ग्रहण करने में सफल होता है-शायद यह भी इन वृत्तात्तों की एक सबसे बडी सफलता है ।
  • Chasing Maya (Paperback)
    Rohan Gagoi
    150

    Item Code: #KGP-335

    Availability: In stock

    Better jobs, bigger salaries, expensive cars, exclusive homes, exotic vacations, shopping abroad, admiration and jealousy of peers... What more can you expect from life! Or, may be, you can…! Come; explore your truth with ‘Chasing Maya’!
    ‘Chasing Maya’ is about thirty-two-year old Siddhartha Kumar, who in spite of his evident material success finds himself trapped in the grip of mediocrity – the distress and despair of being no different from millions of others in this world. Bemused, he sets on a quest to rediscover the zeal that once fuelled his dreams and passion and comes across with situations and people that lead him to astounding revelations.
    Share the anxiety, live the excitement and experience the magical transcendence as ‘Chasing Maya’ takes you on an incredible journey that every human soul instinctively seeks to undertake but only a negligible few truly succeed to accomplish!
  • Bhartiya Sahitya Par Mahabharat Ka Prabhav
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    275 248

    Item Code: #KGP-811

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य पर महाभारत का प्रभाव
    ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मूलाधार हैं। जीवन के आदर्श और यथार्थ का इतना व्यापक और विश्वसनीय अनुभव विश्व में अन्यत्र असंभव है। इनमें जहाँ पूर्ववर्ती गतिशील मनीषा का अक्षय कोष है, वहीं पर परवर्ती चिंतन-सरणियों को प्रेरित और प्रभावित करने की विलक्षण क्षमता है। 
    ‘महाभारत’ के संबंध में कहा जाता है--"जो महाभारत में नहीं है, वह भारत में भी नहीं है।" अर्थात् भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक आदि विशेषताओं का सर्वस्व ‘महाभारत’ में विद्यमान है। लोककथाओं से लेकर शिष्ट साहित्य की विविध विधाओं तक ‘महाभारत’ के जीवंत प्रतिबिंब को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 
    ‘गीता’ के आध्यात्मिक चिंतन से लेकर विभिन्न सामाजिक घटनाओं और पात्रों से सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य ने अपना उपजीव्य ग्रहण किया है। मिथकीय संभावनाओं की व्यापकता के कारण भारतीय साहित्य की विभिन्न विधाओं में युगबोधी संवेदना को अभिव्यक्त करने के लिए प्रभूत लेखन किया गया है।
    ‘महाभारत’ पर आधारित विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य को जाँचने-परखने पर यह रोचक तथ्य सामने आता है कि इस विपुल लेखन में भौगोलिक अंतराल और भाषा-भेद के होने पर भी हमारी चिंतन धारा में अद्भुत समता है। यह हमारी सांस्कृतिक एकता और भावात्मक अखंडता का प्रमाण है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mahesh Darpan
    Mahesh Darpan
    250 225

    Item Code: #KGP-9382

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : महेश दर्पण

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार महेश दर्पण ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘दिग्विजय’, ‘पछाड़’, ‘जाल’, ‘लेकिन...’, ‘नेवर टु डाइ’, ‘जाने जिगर’, ‘जख्म’, ‘किस्सा सीताराम’, ‘मेरी जगह’ तथा ‘चिड़िया की उड़ान’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महेश दर्पण की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Himalaya Gaatha-5 (Lokvarta)
    Sudarshan Vashishath
    600 480

    Item Code: #KGP-693

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-5 (लोकवार्ता)
    अदभुत है लोक वाड्मय। यह जितना गहन है, उतना ही तर्कशील और विवेकशील है । इसके रचयिता वे अनाम रचनाकार रहे हैं, जिन्होंने कभी अपने नाम नहीं दिए । लोक की रचना जितनी मारक रही है, उतनी ही काव्यमयी । हालाँकि उन रचयिताओं ने कहीँ से छंदविधान नहीं सीखा, किसी काव्यशास्त्र की शिक्षा नहीं ली । सबसे बडी बात यह कि राजाओं के निरंकुश शासन के समय भी उन्होंने बड़ी से बडी बात अपने ढंग से निडर होकर कही । वे काल और स्थिति के अनुसार नए-नए छंद रचते रहे । लोक की रचना में अपनी परंपरा के वहन के साथ समाज- सुधार की एक धारा भी निखार बहती रही । अपनी संस्कृति का संरक्षण, अपने संस्कारों का समादर इनका अभीष्ट रहा ।
    हमारी लोकवार्ता लोकगीत, लोकसंगीत, लोकनाट्य, लोकोक्ति-मुहावरे, लोककथा और लोकगाथा के रूप में सुरक्षित रही है। यह मात्र मनोरंजन का साधन न होकर संस्कृति के संवाहक और संरक्षक के रूप में अधिक जानी गई । समाज के विश्वास, आस्थाएँ, धारणाएं और समस्त क्रियाकलाप लोकवार्ता में परोक्ष रूप से छिपे रहते हैं, जो हमारी थाती को बुढ़िया की गठडी की भाँति सिरहाने रखे रहते हैं।
    लेकिन आज हमारी यह संपदा लुप्त होने के कगार पर है । भौतिकवाद, बाजारवाद और समाज के बदलते परिवेश और मूल्यों ने पुरानी परंपराओं को धराशायी कर दिया । लोकगायकों, वादकों ने अपना कर्म छोड़ दिया । आज न किसी के पास कथा या गाथा सुनने का समय है और न सुनने का । दादी-नानी दूरदर्शन में सास-बहू की कहानी देखती हैं । हम अपनी भाषा, वेशभूषा से विमुख हुए । ऐसे अपसंस्कृति के कुसमय में इस दुर्लभ साहित्य का संग्रहण आवश्यक हो जाता है ।
    कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अमूल्य थाती का संग्रह कर एक अति महत्त्वपूर्ण काम किया है, जिसके लिए कल का इंतजार नहीं किया जा सकता था । लोकवार्ता की मात्र प्रस्तुति न देकर उसका सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण विषय को और भी गहनता प्रदान करता है । 'हिमालय गाथा' के पाँचवें खंड में दी गई दुर्लभ सामग्री हमारी परंपराओं के अध्ययन के लिए एक मील का पत्यर साबित होगी, ऐसा विश्वास है ।

  • A Coders Cocktail
    Shashwat Rai
    595 536

    Item Code: #KGP-853

    Availability: In stock

    An excerpt...
    My dreams had always been extravagant and seemingly more enjoyable to me than my real life. The strange world of 
    imaginations where I rescued the POWs from Somalia to making love to the 
    Hollywood babes was like a daily chore. 
    I would often reach the climax on a high note and would wake up with my heart pounding and sinking like the low-high tides of the moving ridges of the sea.
    My dreams were the answers to my real life questions. I was more than me, a kind of superhero, the Robin Hood alike in my dreams. Like the Iraqi shoe-throw journalist Muntader al-zaidi who was renowned for his dare devil act on Bush, I would somehow find ways while stargazing to flutter woman’s heart or make political revolutions worthy of being termed and credited for cultural turnarounds too. 
    Maybe I always dreamt in lieu of waking up as someone else. Maybe I wanted to be somebody that I wasn’t already now. 
    I loved my dreams more than I loved myself.
  • Kavi Ne Kaha : Vijendra
    Vijendra
    150 135

    Item Code: #KGP-1874

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विजेन्द्र
    विजेन्द्र हमारे समय के विशिष्ट और बडे समर्थ कवि हैं । उनमें नवीनता के साथ अपनी जातीय स्मृतियों को कविता से कलात्मक ढंग से गूँथने का विरल कौशल है । अतः वे कविता अपने समय की लिखकर अपनी महान् काव्य-परंपरा को भी अपने अंदर सहेजे-समेटे रहते हैं । निराला और त्रिलोचन की परंपरा में उन्हें देखने के पीछे एक तर्क यह भी है कि वे सृजन और व्यवहार को अलग-अलग नहीं मानते । उनका काव्य उनकी जीवनचर्या से अलग नहीं है ।
    विजेन्द्र की काव्य भाषा सदा नए विवाद उठाती रही है, क्योंकि यह लोक-चेतन कवि सदा भाषा के बने-बनाए ढाँचों को तोड़ता रहा है। उनकी भाषा लोक और जनपदों की और सहज भ्रमण करती है । इसलिए उनकी कविता में लोक संस्कृति की विकासोन्मुख छवियों और बिंब बराबर दिखाई पडते हैं । इससे विजेन्द्र की कविता का संसार व्यापक और विस्तृत ही नहीं हुआ, बल्कि उसमें अपने समय के बहुआयामी यथार्थ को कहने की शाक्ति भी पैदा हुई है ।
    विजेन्द्र जैसे कवि की अनन्य सहजता अलग से पहचानी जाती है । इस कवि ने एक लंबी तनाव-भरी संघर्षपूर्ण यात्रा तय की है । उनके अब तक छपे दस संकलनों की कविताओं को मिलाकर पढ़ने से एक ऐसी रचना-प्रक्रिया से हमारा सामना होता है जो एक साथ बहुआयामी और विकसनशील है । ज्यों-ज्यों कवि उग्र और अनुभव में परिपक्व होता गया है उसकी संवेदना भी त्यों-त्यों अधिक सघन और समृद्ध होती गई है ।
  • Parvat-Gatha
    Hari Krishna Devsare
    425 383

    Item Code: #KGP-617

    Availability: In stock

    पर्वत गाथा
    पर्वतों और मनुष्य का रिश्ता आदिकाल से चला आ रहा है। पर्वतों पर उगने वाले वन, उनसे प्राप्त होने वाले खनिज, वनोपज आदि मनुष्य के उपयोग की वस्तुएँ रही हैं। आज भी आदिवासी और गाँवों के लोग वनोपजों से अपनी जीविका अर्जित करते हैं। पर्वतों के जंगलों से लकड़ी मिलती है। पर्वतों से देश की जलवायु अत्यधिक प्रभावित होती है। यदि भारत के उत्तर में हिमालय न होता तो मानसूनी हवाएँ सीधे मध्य तथा उत्तरी एशिया में पहुँचकर पानी बरसातीं और भारत एक रेगिस्तान बन जाता। हिमालय पर्वत सर्दियों में उत्तरी एशिया से आने वाली बेहद ठंडी हवाओं से भी भारत की रक्षा करता है।
    पर्वत मनुष्य के जीवन में विभिन्न रूपों में जुड़े रहे हैं और उनका महत्त्व आज भी है। ‘महानता’ के अर्थ में ‘पर्वत’ के अलावा कोई दूसरी उपमा नहीं दी जाती। आज मनुष्य ने पर्वतों को काटकर रास्ते बनाने में सफलता पा ली है।
    जीवन में सफलता की ऊँचाइयों की तुलना पर्वत शिखरों से की गई है। हमारे देश में अनेक गौरवशाली पर्वत हैं और उनके प्रति लोगों में अटूट आस्था है। उन पर्वतों पर लोग पूजा करते हैं, मेले लगते हैं और मन की मुराद पूरी करते हैं। भारत के ऐसे ही पूज्य, गौरवशाली, इतिहास- प्रसिद्ध और धार्मिक आस्था के प्रतीक पर्वतों की गाथा है यह पुस्तक।

  • Anuvadvigyan (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    200

    Item Code: #KGP-174

    Availability: In stock

    अनुवादविज्ञान
    अनुवाद को उसके पूरे परिप्रेक्ष्य में लें तो वह मूलतः अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है। साथ ही अनुवाद करने में व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से भी हमें बड़ी सहायता मिलती है। इस तरह अनुवाद भाषाविज्ञान से बहुत अधिक संबद्ध है।...
    जहाँ तक अनुवाद का प्रश्न है, विद्यार्थी-जीवन में पाठ्यक्रमीय अनुवाद की बात छोड़ दें तो सबसे पहले अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘नेहरू अभिनंदन ग्रंथ’ में मुझे अनुवाद करने का अवसर मिला। उसी समय कुछ भाषा-संबंधी लेखों के मैंने अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किए। ‘गुलनार और नज़ल’ नाम से एक अंग्रेज़ी पुस्तक का संक्षिप्तानुवाद 1952 में पुस्तकाकार भी छपा था। 1962-64 में रूस में अपने प्रवास-काल में कुछ उज़्बेक, रूसी तथा इस्तोनियन कविताओं का भी मैंने हिंदी-अनुवाद किया था। ताशकंद रेडियो में 1962 में मेरे सहयोग से हिंदी विभाग खुला था। वहाँ प्रतिदिन आध घंटे के कार्यक्रम के लिए रूसी, उज़्बेक, अंग्रेज़ी आदि से हिंदी में अनुवाद किया जाता था, जिसका पुनरीक्षण मुझे करना पड़ता था। 1968 में भारतीय अनुवाद परिषद् ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका ‘अनुवाद’ के संपादन का भार मुझे सौंपा और समयाभाव के कारण, न चाहते हुए भी, कई मित्रों के आग्रह से मुझे यह दायित्व लेना पड़ा।
    प्रस्तुत पुस्तक की सामग्री के लेखन का प्रारंभ मूलतः ‘अनुवाद’ पत्रिका का सिद्धांत विशेषांक निकालने के लिए कुछ लेखों के रूप में हुआ था। विशेषांक के लिए कहीं और से अपेक्षित सामग्री न मिलने पर धीरे-धीरे मुझे अपनी सामग्री बढ़ानी पड़ी, किंतु अंत में सामग्री इतनी हो गई कि विशेषांक में पूरी न जा सकी। वह पूरी सामग्री कुछ अतिरिक्त लेखों के साथ प्रस्तुत पुस्तक के रूप में प्रकाशित की जा रही है।        
    --भोलानाथ तिवारी
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramesh Bakshi
    Ramesh Bakshi
    200 180

    Item Code: #KGP-66

    Availability: In stock

    हिंदी के विवादास्पद एवं विख्यात कथाकार रमेश बक्षी की दस प्रतिनिधि कहानियों का यह संचयन कथाकार की उस दुनिया का साक्ष्य भी है, जिससे पैठकर वह असंभव कथ्यों को पाठक वर्ग के समक्ष उदघाटित एवं प्रकाशित करता है । आत्मबोध से उपजी इन कहानियों से लेखक का जो आत्मज्ञान झसता है, वह समकालीन स्त्री-पुरुष संबंधों के संसार को नई परिभाषा, व्याख्या और नैतिकता में रूपायित करने का समुन्नत कथा-उपक्रम है, जिसे सम्यक अर्थों में हम प्रगतिशील कथाक्रम के वर्ग से रख सकते हैं ।
    ये कहानियाँ किसी विरक्त, त्यागी या सन्यासी व्यक्तित्व के विषयमुक्त होने के कथा-चित्र, नहीं है, बल्कि संबंधों के बीच पनपते उपद्रवों का सामना करते चरित्रों की सच्चाइयां है । समकालीन समाज ने अपने जीने के लिए जिस परिवेश की सृष्टि कर ली है, उसमें क्या ठोस है, क्या खोखला तथा क्या मान्य और क्या त्याज्य है-इन विषयों पर बेधक संकेत और संदेश इन कहानियों के मूल में समाहित और प्रवाहित हैं ।
    रमेश बक्षी की सजग कथाकार-दृष्टि को समेटे जिन दस कहानियों को यहीं प्रस्तुत किया जा रहा है, वे हैं- 'मेज़ पर टिकी हुई कुहनियाँ', 'जिनके स्थान ढहते हैं....', 'एक अमूर्त तकसीफ', 'राख', 'खाली', 'आम-नीम-बरगद', 'पैरोडी', 'थर्मस  में कैद कुनकुना पानी', 'अगले मुहर्रम की तैयारी' और 'उतर' । संकलन के प्रस्तोता डॉ. बलदेव वंशी ने अपने इस समकालीन लेखक की कहानियों पर विस्तृत एवं आत्मीय टिप्पणी भी प्रस्तुत की है ।
    आशा है हिंदी कथा-जगत का संवेदनशील पाठक-समाज अपने समय के इस महत्त्वपूर्ण कथाकार को किताबघर प्रकाशन की महत्त्वाकांक्षी  कथा-श्रृंखला 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' की एक कड़ी के रूप में पाकर निश्चय ही संतुष्ट होगा ।
  • Bhaasaa Vigyan Pravesh Evam Hindi Bhaasaa (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    230

    Item Code: #KGP-7065

    Availability: In stock

    भाषा विज्ञान प्रवेश एवं हिंदी भाषा
    डॉ.  भोलानाथ तिवारी लब्धप्रतिष्ठ भाषाविज्ञानी हैं। प्रस्तुत पुस्तक में उन्होंने भाषा विज्ञान को सरल और सहज रूप में प्रस्तुत किया है। भाषा विज्ञान के पारंपरिक विषयों के साथ-साथ नए विषयों व भाषा विज्ञान के नए आयामों को शामिल करते हुए उन्होंने पुस्तक की उपादेयता बढ़ा दी है।
    यह पुस्तक भाषा विज्ञान हेतु भारत के सभी विश्वविद्यालयों के लिए तो उपयोगी होगी ही, साथ ही केंद्र सरकार, सार्वजनिक उपक्रमों व बैंकों के राजभाषा अनुभागों तथा उनमें कार्यरत हिंदी से जुड़े अधिकारियों, सहायकों, अनुवादकों व भाषा से जुड़े प्रौद्योगिकीविदों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध होगी, क्योंकि इसमें भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा से जुड़े अद्यतन ज्ञान को सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। 
    यह पुस्तक भाषा से सरोकार रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए भी उपयोगी होगी, यह हमारा विश्वास है।
    इस पुस्तक में अद्यतन जानकारियाँ तथा जटिल संकल्पनाओं को भी इतने सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि भाषा विज्ञान में रुचि रखने वाले सामान्य पाठक के लिए भी यह उपादेय सिद्ध होगी।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Govind Mishra
    Govind Mishra
    180 162

    Item Code: #KGP-170

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार गोविन्द मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'जनतंत्र', 'फांस', 'सिर्फ इतनी रोशनी', 'सुनंदो की खोली', 'खुद के खिलाफ', 'युद्ध', 'खाक इतिहास', 'पगला बाबा', 'वरणांजलि' तथा 'मायकल लोबो' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक गोविन्द मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Isro Ke Rocket Evam Unki Vikas Sanskriti (Paperback)
    Dr. Suresh Chandra Gupta
    250

    Item Code: #KGP-582

    Availability: In stock

    भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जैसी उपलब्धि, देश में अन्य क्षेत्रों में कम ही दिखाई पड़ती है । ऐसा क्यों ?  प्रश्न स्वाभाविक है। वास्तव में, पूर्ण उत्तर लिए एक गंभीर खोज और अध्ययन की आवश्यकता है । लेखक का मानना है कि कार्य-संस्कृति की कमियां इसके प्रमुख कारण हैं । हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम ने इस तथ्य को समझा और उसके निराकरण का भरपूर प्रयत्न किया, और फलस्वरूप एक प्रभावी कार्य संस्कृति का आविर्भाव हुआ । लेखक के अनुसार, इस संस्कृति का विवरण देना उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि रॉकेट विज्ञानं की चर्चा करना, क्योंकि, देश की प्रगति के लिए सभी कार्यक्रमों की सफलता अत्यावश्यक है और उसके लिए एक प्रभावशाली कार्य संस्कृति को अपनाना होगा । ऐसी एक कार्य संस्कृति का विवरण देना भी इस पुस्तक का उद्देश्य है । संक्षेप में, मानव संसाधन को संजोना, सामर्थ्य प्रदायक वातावरण निर्माण करना, पुरे देश को भागीदार बनाना तथा गुणता एवं विश्वसनीयता पर पूरा ध्यान देना, इस कार्य संस्कृति के मुख्य अंग हैं । 
  • Utho Annapoorna Saath Chalen
    Usha Mahajan
    100 90

    Item Code: #KGP-9127

    Availability: In stock

    दांपत्य दो समान व्यक्तियों एकीकरण का नाम है। दंपति का संधिविच्छेद करें तो बनता है दम् (घर) $ पति। अर्थात् दोनों ही घर के बराबर के पति हैं। लेकिन कितनी समानता है हमारे समाज में आज भी पति और पत्नी के स्तर में? किस प्रवृत्ति का प्रतीक है सत्तर के दशक से दहेज-हत्याएं कही जाने वाली शादीशुदा औरतों की अप्राकृतिक मौतों का दौर? क्या कारण हैं हिंदू समाज में दांपत्य-संबंधों में बढ़ती दरारों के? जिस समाज मंे स्त्री के लिए पति परमेश्वर के समान माना जाता है, वहीं दिल्ली-मद्रास जैसे महानगरों में डेढ़ से दो हजार कुंवारी लड़कियां हर माह डाॅक्टरों से गर्भपात करवाती हैं, सगे पिता अपनी मासूम बेटियों का यौन-शोषण करते हैं। सेक्स विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों से मिलंे, तो वे बताते हैं कि पहले पुरुषों के ही अवैध संबंध हुआ करते थे, पर अब औरतें भी उनके मुकाबले में विवाहेत्तर और विवाह-पूर्व संबंध रख रही हैं। अदालतों में जाकर देखें तो अनगिनत दंपति एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते, गाली-गलौज करते और यहां तक कि जूते-चप्पल चलाते भी आपको मिल जाएंगे।
  • Pahiye Ki Vikaas Katha (Paperback)
    Chetan Kumar
    60

    Item Code: #KGP-7089

    Availability: In stock


  • Akshardveep
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    425 383

    Item Code: #KGP-2013

    Availability: In stock

    अक्षरद्वीप
    अक्षरद्वीप’ आज के मूल्यों के अंतर्गत रामकथा के ‘सुंदरकांड’ का एक पुनर्पाठ है। इस उपन्यास में वैदेही, रावण और महावीर की भूमिकाएँ जिन सीमाओं तक संघातपूर्ण हैं, वे आज के अतिरिक्त अतीत की भी पहचान हैं। यह मनुष्य का निरंतर जारी एक असमाप्य प्रयास है। अगर आज हम ‘अक्षरद्वीप’ की कथाभूमि को कुछ सीमा तक व्याख्यायित कर पाए, कथाकार शायद किसी न किसी तरह पंक्ति-दो पंक्ति तक कुछ आगे निकल गया।
    प्रणव कुमार वंद्योपाध्याय आज के तमाम हिंदी कथाकारों में कहाँ खड़े हैं, कहना कठिन होगा। फिर भी, हम कह सकते हैं कि आज के परिप्रेक्ष्य में लेखक को मनुष्य और समय की पहचान किसी सीमा तक आकर खड़ी हो गई। कल की प्रतीक्षा में। संभवतः किसी न किसी प्रकार की लाग-लपेट के बिना कथाकार अपनी खोज से उस बिंदु तक पहुँच गया, जो है संसार का आदि आख्यान। असमाप्य भी।
    अक्षरद्वीप’ किसी हद तक मनुष्य की एक यात्रा भी है। यात्रा के अतिरिक्त पृथ्वी का एक अनकहा इतिहास भी, जो प्रतिक्षण अपना सब कुछ बदल रहा है।
  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal
    Indira Mishra
    390 351

    Item Code: #KGP-734

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
  • Saamanya Paryavaran Gyan
    Rajendra Chandrakant Rai
    100 90

    Item Code: #KGP-9146

    Availability: In stock

    पर्यावरण अब एक जाना-पहचाना और जीवन से सम्बद्ध विषय है। पर्यावरण पर गंभीर और वैज्ञानिक ग्रंथ तो उपलब्ध हैं, किंतु सहज और सरल तरीके से पर्यावरण की समग्रता का परिचय कराने वाली एक ऐसी पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी, जो सर्वसाधारण के लिए उपयोगी हो। इस पुस्तक के प्रकाशन के पीछे यही दृष्टि मुख्य रूप से मौजूद रही है।
    विद्यार्थियों, गृहिणियों, ग्रामीणों, सामाजिव कार्यकर्ताओं, पर्यावरणों-प्रेमियों तथा गैरसरकारी संगठनों के लिए यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी, यह विश्वास है।
  • Parineeta
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-78

    Availability: In stock


  • Shesh Ant Mein
    Ashwani Kumar Dubey
    275 248

    Item Code: #KGP-2019

    Availability: In stock

    शेष अंत में
    'शेष अंत में' सामाजिक पूष्ट्रभूमि पर आधारित एक यथार्थवादी पारिवारिक उपन्यास है । सन् '42 के 'भारत छोडों’ अन्दोलन से लेकर बीसवीं सदी के अंत तक के समय को शिद्दत के साथ  पकड़ने और उसको जीवंत चित्रण की कोशिश इस उपन्यास में  हम पाते हैं  । बीजापुर गांव के एक संयुक्त परिवार की कथा के माध्यम से  मध्यवर्गीय जीवन के सरोकारों, आदर्शों, विडंबनाओं और परिणतियों से हमारा साक्षात्कार होता है । समकालीन उपन्यास लिखने के दौर में जहाँ एक ओर निम्नवर्गीय जीवन और उसकी आकांक्षाओं पर खूब लिखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उच्चवर्गीय जीवन के मृत्युबोद्य, काल्पनिक चिंतन और वायवीय क्षणों पर । इसके विपरीत यह उपन्यास इस अर्थ में विशिष्ट है कि मध्यवर्गीय जीवन को उसकी संपूर्ण विशेषताओं एवं असंगतियों के साथ चित्रित करता है । उपन्यास को पढ़ते हुए संयुक्त परिवार की इस विलक्षणता से हम रू-ब-रू होते है, जहाँ घर में छोटे-छोटे सुख भी बड़े लगते हैं और बड़े दुख भी राई जितने छोटे । संयुक्त परिवार के विघटन के बाद नई परेशानियों और स्थितियों का विस्तार हम इस उपन्यास में पाते  जहाँ सन् '42 से 2000 तक के समय और संयुक्त परिवार से अकेले होते परिवार की त्रासदी प्रश्न  बनकर उभरती है कि शताब्दी के अंत तक पहुंचते-पहुँचते हमने क्या पाया, क्या खोया ? 
    बीजापुर गांव के बब्बा जी के चार बेटों में संयुक्त परिवार के कपहैंधार बने गिरधर, उसके अन्य छोटे भाई मदन, श्याम और राधे के साथ गिरधर की पत्नी और भवहों (छोटे भाई की पत्नियां) के चरित्र विश्वसनीय रूप में उभरकर सामन जाते है, लेकिन सथा-नायक गिरधर और उसकी पत्नी के चरित्रांकन में अश्विनीकुमार दुबे को विशेष सफलता हाथ लगी हे। वे इस उपन्यास के यादगार चरित्र बन गए हैं । आर्थिक महत्वाकांक्षाओं और समय की राजनीतिक उथल-पुथल को यह उपन्यास अधिक कारगर ढंग से प्रस्तुत करता है । विकास के नाम पर अंधी दौड़  में टूटते और मिटते भारतीय जीवन-मूल्य हमें सोचने के लिए बाध्य करते  हैं ।
    उपन्यास की रोचक पाठकीयता, घटनाओं की विश्वसनीयता और भाषा की रवानगी से निर्मित हुई है । भाषा की जीवंतता और सजगता उल्लेखनीय है । आंचलिक शब्दों के स्थानीय स्पर्श  में गहराइयां हैं । लेखकीय संवेदना ने इसे एक यादगार उपन्यास बनाया है । -मिथिलेश्वर
  • Vyangya Samay : Hari Shankar Parsai (Paperback)
    Hari Shankar Parsai
    225

    Item Code: #KGP-7227

    Availability: In stock

    हरिशंकर परसाई हिंदी व्यंग्य के शीर्ष रचनाकार के रूप में व्यापक स्वीकृति प्राप्त कर चुके हैं। कथा साहित्य में जो स्थान मुंशी प्रेमचंद का है, व्यंग्य साहित्य में वही प्रतिष्ठा परसाई की है। व्यंग्य को उन्होंने ‘विधिवत विधा’ के रूप में अंगीकार किया। अन्यान्य विधाओं के  बीच व्यंग्य ने जो अकूत यश प्राप्त किया है उसके मूल में परसाई का बहुविधा लेखन ही है। व्यंग्य लेखन के लिए अनिवार्य विशेषताएं उनके व्यक्तित्व में सहज विद्यमान थीं, अपने अनुभव-अध्ययन और अपनी अंतर्दृष्टि से उन्होंने विशेषताओं को क्षमता में रूपांतरित किया। तमाम पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन करते हुए उन्होंने तात्कालिक मुद्दों पर भी व्यापक सोच के साथ लिखा। आज यह देखकर किसी को आश्चर्य हो सकता है परसाई ने तत्कालीन राजनीति का कितना सघन व तार्किक विश्लेषण अपने लेखन में किया है। राजनीति, समाज, धर्म, संस्कृति, अर्थ आदि के भीतरी स्याह- सफेद का जितना बोध परसाई को था वह बहुत कम लेखकों में संभव हुआ है। किसी लेखक में ‘साहस’ किस सीमा तक सक्रिय हो सकता है, इसके उदाहरण परसाई हैं। अपने मित्र मुक्तिबोध की बात उनके हृदय में सहज समाई थी कि अभिव्यक्ति वेफ खतरे उठाने ही होंगे। स्वातंत्रयोत्तर भारतीय समाज और उसके अंतर्विरोधों की पड़ताल करता परसाई का व्यंग्य लेखन हिंदी गद्य साहित्य की स्थायी निधि है। लेख, स्तंभ, कहानी, लघु उपन्यास आदि के रूप में उनकी रचनाएं एक जीवन दर्शन बनकर हमारे साथ चलती हैं।
  • Boojho To Jaanen
    Vinod Sharma
    60

    Item Code: #KGP-1107

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Yadav
    Rajendra Yadav
    180 162

    Item Code: #KGP-2077

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र यादव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिंहवाहिनी', 'मैं तुन्हें मार दूँगा', 'वहाँ तक पहुँचने की दौड़', 'रोशनी कहीं है?', 'संबंध', 'सीज फायर', 'मेहमान', 'एक कटी हुई कहानी', 'छोटे-छोटे ताजमहल' तथा 'तलवार पंचहजारी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Puraan Gatha
    Sudarshan Vashishath
    90 81

    Item Code: #KGP-1842

    Availability: In stock

    पुराण गाथा
    हमारे देश में हिमालय वह भू-भाग है, जहाँ वेद-पुराण रचयिता ऋषि-मुनियों ने वास किया । हमारा पौराणिक साहित्य भी विवित्र है । जितना काल्पनिक लगता है, उतना ही व्यावहारिक है । जितना यथार्थवादी है, उतना ही प्रतीकात्मक भी है । समस्त साहित्य काव्यमय होने के कारण कई बार अतिजशयोक्ति का भ्रम देता है, किंतु कल्पना त्तत्त्व को हटा देने पर एकाग्र यथार्थवादी से जाता है । इस साहित्य में सर्वाधिक यथार्थवादी रचना महाभारत है, जिसमें हर पात्र, हर घटना को यथार्थवादी दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है । किसी भी आदर्श पात्र को कहीं पर बक्शा नहीं गया है ।
    प्रस्तुत है, सहज-सरल भाषा में हिमालय क्षेत्र की रोचक गाथाएँ ।
  • Bimla
    Jagnnath Prabhakar
    75 68

    Item Code: #KGP-2023

    Availability: In stock

    राजा समरसिंह को उनके दीवान सतीशचन्द्र ने अपने एक विश्वस्त नौकर के उकसाने पर मरवा डाला । उनकी रानी ने उसके विरुद्ध अति भयंकर व्रत धारण किया । वह व्रत क्या था ? इन्द्रनाथ को महाश्वेता की बेटी सरला से प्रेम हो गया, पर ब्याह महाश्वेता का व्रत पूरा हुए बिना नहीं हो सकता था । इस व्रत को पूरा करने के लिये इन्द्रनाथ घर से चल पडा । महेश्वर मन्दिर में एक अद्वितीय सुन्दरी उस पर मोहित हो गयी । सुन्दरी ने अपना नाम भिखारिन बताया ।  उसने एक भिक्षा इन्द्रनाथ से सतीशचन्द्र का वध न करने की माँग ली और सतीशचन्द्र के नौकर को हत्यारा बताया । इन्द्रनाथ मुंगेर पहुँच कर राजा टोडरमल की सेना में भरती हो गया । संध्या समय वह गंगा-तट पर शत्रुओं से लड़ता हुआ बेहोश हो कर गंगा से गिर पड़ा । एक युवक! अपनी नाव से कूदा, उसे उठाकर अपनी नाव में डाल लिया । होश आने पर उसने देखा, इस युवक के भेस में वही भिखारिन थी । उधर दीवान के उसी शबित-सम्पन्न नौकर ने महाश्वेता को सरला सहित चतुर्वेष्ठित दुर्ग में कैद कर लिया था । भिखारिन उन्हें काल कोठरी से निकालकर अपने मकान में ले आयी । इधर टोडरमल ने पठानों के दुर्ग पर हमला किया । गुड़सवार नायक इन्द्रनाथ लड़ाई में घायल व बेहोश होकर गिर पडा । शात्रुओं ने उसे उठा कर दुर्ग में कैद कर लिया । भिखारिन ने वहाँ पहुँच कर उसे दुर्ग से कैसे बाहर भेज दिया और स्वय इन्द्रनाथ बन कर कैद हो गयी ? भेद खुलने पर भिखारिन को मृत्यु दण्ड देने के लिये वृक्ष के साथ बांध दिया गया । परन्तु इन्द्रनाथ ने किस प्रकार उसे बचा लिया ? इतने में दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली गयी ।  इसके बाद सतीशचन्द्र के उसी नौकर ने उन्हें मार डाला । विजेता इन्द्रनाथ अपने वचन के अनुसार निश्चित दिन सरला के पास पहुँच गया ।
    राजा टोडरमल की सभा लगी थी । सतीशचन्द्र का हत्यारा कैदी के रूप में राजा के सामने पेश किया गया । उसे मृत्यु दण्ड सुनाया गया । कैदी ने कहा, "मैं ब्राह्मण हूँ । ब्राह्यण को मृत्यु दण्ड देना शास्त्र-विरुद्ध है । धार्मिक टोडरमल सोच में पड़ गये । इतने में एक निहत्थी महिला तेजी से सभा मण्डल में घुसी और छुरी से सतीशचन्द्र के हत्यारे कैदी की हत्या कर डाली । वह महिला कौन थी और उसने छुरी कैसे प्राप्त कर ली ?
    अपने ब्याह के निश्चित दिन इन्द्रनाथ भिखारिन के पास गया और कहा, "भिखारिन । तुमने मुझे चार बार मौत से बचाया, जिसका बदला मैं चुका नहीं सकता । मेरी प्रार्थना है, तुम मेरे पास पटरानी की तरह रहो । सरला तुम्हारी सेवा करेगी ।" इस प्रकार जाने क्या-क्या स्नेह-भरी बाते कह रहा था, परन्तु वास्तव में भिखारिन वहाँ नहीं थी, था उस का प्राणहीन पार्थिव शरीर । वह इन्द्रनाथ के प्रति शाश्वत प्रेम रखती थी, उसी प्रेम की ज्वाला में वह आत्म- बलिदान कर चुकी थी । हाँ तो यह भिखारिन वास्तव में थी कौन?
    उपर्युक्त समस्त रहस्यमय प्रश्नों के उत्तर विविध रोमांचकारी विवरणों सहित यह पुस्तक प्रस्तुत कर रही है ।
  • Yada-Kada
    Ramesh Chandra Diwedi
    195 176

    Item Code: #KGP-638

    Availability: In stock

    यदा-कदा
    धर्म, परंपरा और सामाजिक मूल्य-बोधों का मिश्रण पुस्तक की विशेषता है। समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और मानवीय मूल्यों के क्षरण की ओर ध्यान आकृष्ट करके लेखक ने अपने दायित्व का निर्वहन किया है। रोचक शैली में लिखी पुस्तक सामान्य पाठक और विद्वत्त समाज दोनों के लिए पठनीय है।                
    -अशोक कुमार नायक (दिल्ली विश्वविद्यालय)

    एक सहृदय लेखक की संवेदनशीलता, एक सैनिक का अगाध देशाभिमान और भ्रमणशील परिव्राजक के अनुभवों की समधुर अनुगूँज है-‘यदा-कदा’ (निमेष जी की डायरी)। आशा है, पुस्तक विद्वानों और सामान्य वर्ग के पाठकों में समुचित समादृत होगी।
    -प्रो० गिरजाप्रसाद दुबे (म० गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी  )

    सरल और स्पष्ट भाषा में पुस्तक की प्रस्तुति वास्तविकता का सुखद अनुभव है। मनुष्य की प्रकृति की विभिन्नताएँ इस रचना से रूबरू कराने में सफल हैं। शहरी और ग्रामीण जीवन का तुलनात्मक अध्ययन सुंदर है। हमारे पूर्वजों, संतों, धर्मात्माओं द्वारा प्रदत्त शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और भौतिकवादी समाज को आईना दिखाती हैं। विद्वान् लेखक से हम ऐसी ही और रचनाओं की प्रस्तुति की कामना 
    करते हैं। 
    -प्रो० पी० डी० सहारे, डॉ० गीता सहारे (दिल्ली विश्वविद्यालय)

    डायरी-लेखन की विधा पं० रमेशचन्द्र द्विवेदी (स्वामी श्रद्धानंद) द्वारा हिंदी साहित्य हेतु एक नूतन श्लाघनीय प्रयास है। यायावरी एवं जीवन के गूढ़ तत्त्वों की मीमांसा सहसा सांकृत्यायन जी की स्मृतियों को जीवंत कर देती है। सुधी जन निश्चित रूप से यदा-कदा इस ‘यदा-कदा’ का पारायण करके अपने व्यक्तित्व और राष्ट्र-निर्माण में योगदान देंगे। लेखक निश्चयतः साधुवाद के पात्र हैं। मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
    -राकेशकुमार सिंह (वरिष्ठ आचार्य, (अंग्रेजी) इलाहाबाद वि० वि०)
  • Pracheen Prem Aur Neeti Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-01

    Availability: In stock

    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
  • Namaskar Bharat Mera Mahan
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-314

    Availability: In stock

    नमस्कार! भारत मेरा महान!
    अमृतलाल नागर और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का शिष्य कहने में मनोहर श्याम जोशी बहुत गौरव का अनुभव करते थे। जोशी जी के निजी जीवन, साहित्य, पत्राकारिता और सिनेमा के पन्नों में उक्त दोनों आचार्यों की छाप देखी जा सकती है। 
    भारतीय राजनीति और समाज पर मनोहर श्याम जोशी की बेबाक टिप्पणियाँ हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। राजेंद्र माथुर की तरह उनके पत्रकारीय लेखन से लोग चकित और कुछ भ्रमित हो जाते थे, क्योंकि किसी टिप्पणी में वह मार्क्सवादी-समाजवादी, किसी लेख में हिंदूवादी, किसी विश्लेषण में कांग्रेसी विचारों से ओतप्रोत लगते थे। प्रगतिशील होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी या डॉ. कर्णसिंह से अच्छे संवाद और संबंध की क्षमता उनमें थी। 
    अमृतलाल नागर की तरह उनके व्यंग्य और कहानी- उपन्यास में सामाजिक कुप्रथाओं, बंधनों पर पैना प्रहार पढ़ने को मिलता है। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभ-लेखन में जोशी जी देश-विदेश के किसी नेता, पूँजीपति या बड़ी हस्ती की कमियों पर सीधे प्रहार करने में नहीं चूके। शरद जोशी की तरह मनोहर श्याम जोशी प्रतिदिन स्तंभ लिखने की क्षमता रखते थे। इसीलिए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने जोशी जी को एक नियमित स्तंभ लिखने का निमंत्रण दिया। सत्ता और प्रबंधन का भय इन संपादकों को कभी नहीं रहा। इसलिए जोशी जी ने भारत की सामाजिक-राजनीतिक दशा पर ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ लिखना शुरू किया। 
    ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ की विशेषता यह थी कि इस स्तंभ की टिप्पणियों पर पत्र आमंत्रित किए जाते थे और सैकड़ों पत्रों में से चुनिंदा छाँटकर अगली किस्त में स्तंभ के साथ छपते थे। यह स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुआ। जोशी जी ने जीवन की अंतिम साँस तक यह स्तंभ लिखा, जिसकी रचनाएँ दशकों तक कई पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
  • Main Aur Meri Shrimati
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    100 90

    Item Code: #KGP-7813

    Availability: In stock


  • Pakshi Avlokan
    Dr. Anand Saxena
    950 855

    Item Code: #KGP-562

    Availability: In stock

    पक्षियों के अवलोकन तथा उनकी पहचान करने के संबंध में हिंदी में पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। यह पुस्तक इस कमी को पूरा करने का प्रयास है। पक्षियों की स्पष्ट फोटो तथा पक्षी की जाति (species) पहचानने के विषय में संकेतों को देने पर विशेष ध्यान दिया गया है। अनेक पक्षियों के नर और मादा में काफी अंतर होता है। इसका उल्लेख करते हुए अकसर उनकी पफोटो भी दी गई है।
  • The Transfer
    Vibhuti Narain Rai
    495 446

    Item Code: #KGP-353

    Availability: In stock

    Despite the growing presence of multinationals and the ongoing emphasis on work-culture in the corporate world, if the first preference of the Indian middle classes continues to be government service even today, it is largely related to the pleasures of irresponsibility, idleness, graft, bribery and other forms of corruption. So in the last six decades since independence, government service has turned into a synonym of all the above vices. This is how transfers and postings among the services have become an ‘industry’ which is thriving and flourishing among us more than many others, from government offices to the bungalows of politicians in power.
    The finer details of this ‘industry’, which only an insider can access, are presented to us by this novel with a satire so trenchant and powerful that we begin to look at our bureaucracy during recent years with something close to despair. A delightful reading as it offers, the reader is compelled to begin asking whither we as a nation are headed.
  • Yuva Sanchetna
    Prem Vallabh Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-9132

    Availability: In stock

    युवा संचेतना
    यह युग प्रगतिवादी युग है । उत्थान का युग है विज्ञान का युग है, नवीन चेतना और स्फूर्ति का युग है । अत: मानसिक शक्तियों के जगाने का समय है। इस युग की धारा विद्युत् गति से भी तेज बह रही है । मनुष्य जल, थल, नभ में स्वच्छन्द विचरण कर रहा है और प्रकृति, आकाश, पाताल पर दिन-रात अधिकार जमाता जा रहा है । वह शक्ति की खोज में आकाश-पातालको एक करता जा रहा है । अत: आप अपने को इन सबसे अलग रखकर प्रसन्न और सुखी अनुभव नहीं कर सकते।
    (इसी पुस्तक से)
  • Comprehensive English-Hindi Dictionary_495
    Bholanath Tiwari
    495 446

    Item Code: #KGP-32

    Availability: In stock

    COMPREHENSIVE ENGLISH-HINDI DICTIONARY

     The present comprehensive English-Hindi Dictionary stands as the crowning work of the four decade long effort of the well known Hindi linguist-cuin-lexicographer Dr. Bhola Nath Tiwari and Dr. Amar Nath Kapoor, a distinguished scholar of English language studies.

     The main merit of the present dictionary is its practical and explanatory character. The editors have illustrated the proper and contextual usage of each and every word, phrase, idiom and expression through sentences and this goes to make the lexicon a work of tremendous relevance for the entire gamut of bilingual activity being undertaken in the country at almost all levels of our social system, educational institutions and government departments.

     Basically meant for the average Indian reader who goes to a dictionary to find correct spelling, correct usage and the most common present meaning of all the live words of English usage, the chief function of die present dictionary is to present not only comprehensiveness, accuracy and simplicity but also to record usage as pan of a perfect language.

     Simple form and the most pragmatic approach as far as the spelling and pronunciation of words is concerned has been adopted wit‘: 2 view to make the average educated Indian use English—both written and spoken word—in such a way that the listener or the reader is able to under- stand and appreciate what is being said in its correct parlance.

  • Charaiveti-Charaiveti
    Shyam Singh Shashi
    75 68

    Item Code: #KGP-1892

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Shiv Murti
    Shivmurti
    380 342

    Item Code: #KGP-745

    Availability: In stock


  • Jinavar
    Chitra Mudgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1998

    Availability: In stock


  • TORO KARA TORO : PRASAR (6TH PART)
    Narendra Kohli
    560 504

    Item Code: #KGP-668

    Availability: In stock


  • Raakshas
    Shanker Shesh
    75 68

    Item Code: #KGP-9107

    Availability: In stock

    राक्षस
    राक्षस एक जातिवाचक शब्द ही नहीं, मानसिकता द्योतक शब्द भी है। राक्षस वह है, जो सामान्य मानवीय स्वरूप के विरोध में रहता है ।
    इस नाटक में शंकर शेष ने मनुष्य की इसी वृत्ति को उभारा है । यहाँ रणछोड़दास, सुकालू और दुकालू ऐसे चरित्र हैं जो मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम और द्वेष के संघर्ष को तीव्र करते है और फिर इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि–
    अब नहीं रुकेगा कमल फूल
    अब नहीं गिरेगी
    आने वाले कल की आँखों में धूल
    अब गाँव हमारा नहीं रहेगा
    जड़ पत्थर की नाँव 
    राक्षस अपनी पूरी अमानवीय स्थिति के साथ हमें इस आशा की स्थिति तक एहुंचाता है ।
    शकर शेष द्वारा लिखा गया एक सशक्त नाटक ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar
    Kamal Kumar
    230 207

    Item Code: #KGP-688

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kahanikar Kamleshwar : Punarmulyankan
    Pushp Pal Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-879

    Availability: In stock

    ‘नयी कहानी’ की प्रसिद्ध त्रयी के प्रमुख पुरोधा रूप में उभरे कमलेश्वर निश्चय ही प्रेमचंदोत्तर समय के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अत्यंत लोकप्रिय कहानीकार हैं। ‘नयी कहानी’ के समय से लेकर नयी शती के प्रथम दशक तक अपने को उन्होंने निरंतर सृजनशील रखा, एक से एक बढ़कर उम्दा और सशक्त कहानियां रचकर। ‘राजा निरबंसिया’, ‘खोई हुई दिशाएं’, ‘जार्ज पंचम की नाम’, ‘मांस का दरिया’ से लेकर ‘मानसरोवर के हंस’, ‘इतने अच्छे दिन’, ‘तुम्हारा शरीर मुझे पाप क लिए पुकारता है’, ‘सफेद सड़क’ जैसी कितनी ही कालजयी और विश्वस्तरीय श्रेण्य कहानियां उनके खाते में हैं जिन्होंने हिंदी कहानी का चेहरा पूरी तरह बदलकर रख दिया। सहास विश्वास नहीं होता कि कहानी के ललित कोमल स्वरूप में उन्होंने बौद्धिकता का ऐसा निर्मोक प्रदान कर दिया कि वह चिंतन-स्तर पर पाठक को इतना उद्वेलित कर सकने की क्षमता से युक्त हो सकी है। 
    प्रख्यात कथा-समीक्षक डाॅ. पुष्पपाल सिंह ने अपनी प्रखर और पूर्ण निष्पक्ष दृष्टि से कमलेश्वर के समग्र कहानी-साहित्य का यह अत्यंत सुचिंतित अध्ययन प्रस्तुत किया है, यदि वे कमलेश्वर की कहानियों के श्रेष्ठ पर रीझकर उनका पूर्ण निस्संग और उन्मुकत भाव से विश्लेषण करते हैं तो उनके श्याम पक्ष और न्यूनताओं का भी रेखांकन इसी बेबाकी से करते हैं।
  • Nadi Phir Laut Aaee
    Rajjan Trivedi
    90 81

    Item Code: #KGP-2015

    Availability: In stock

    उपन्यास
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 1 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7059

    Availability: In stock

    गुल्लू कर्णपुर गांव के किसान विजयपाल का बेटा है। उसका असली नाम गुलशन है, पर सब उसे प्यार से ‘गुल्लू’ ही कहते हैं। उसकी उम्र है लगभग बारह साल। उसकी एक छोटी बहन है राधा। उसकी उम्र आठ साल है। परंतु वह स्कूल नहीं जाती। कारण, उनके गांव में कोई स्कूल नहीं है। उनकी मां को मरे आठ साल हो गए। राधा को जन्म देने के बाद मां चल बसी थी।
    गुल्लू की मां की मृत्यु के बाद उनके पिता ने पास के गांव की सविता नामक एक महिला से पुनः विवाह कर लिया। सौतेली मां घर में आई तो गुल्लू खुश था। उसे भरोसा था कि उसे और उसकी छोटी बहन को मां का प्यार मिल जाएगा। पर सौतेली मां बहुत कठोर स्वभाव की थी। शुरू में कुछ दिन तो ठीक रहा, पर बाद में उसने बच्चों को पीटना शुरू कर दिया। बात-बात में भला-बुरा कहती। यद्यपि किसान के सामने वह लाड़-प्यार का नाटक करती, पर उसके खेत में जाते ही वह बच्चों को डांटना शुरू कर देती।

    -इसी पुस्तक से
  • Naamdev Rachanavali
    Govind Rajnish
    320 272

    Item Code: #KGP-146

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • Subhash : Ek Khoj (Paperback)
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    295

    Item Code: #KGP-464

    Availability: In stock

    आज भी वह प्रश्न अपनी जगह पर है और प्रायः तब तक रहेगा जब तक उसका हल नहीं हो जाता कि सुभाषा द्वितीय विश्व समर के अंत हो जाने पर हवाई दुर्घटना में गोलोकवासी नहीं हुए तो कहां गए? क्यों शाहनवाज खां और खोसला आयोग की रिपोर्ट रद्द हुई? क्यों यह प्रश्न ठंडे बस्ते मं डालने की साजिश चलती रही? इसके पीछे कौन लोग थे और हैं? अब मैंने यह जानना चाहा है कि उन पर क्या हो रहा है? इस दृष्टि से मैंने भारत-भ्रमण किया। भारत के अनेक महानगरों, नगरों आदि का दौरा किया। उनमंे वे नगर विशिष्ट थे, जिनका संबंध आज भी नेताजी से है। अनेक स्थानों पर मेरे व्याख्यान हुए।
    अंत में प्रायः मुझसे यह प्रश्न किया गया कि क्या सुभाषा की मृत्यु हवाई दुर्घटना से जापान जाते समय हुई थी? कतिपय जगह यह थी पूछा गया कि क्यों अनेक बार नेताजी के जीवित होने और भारत में प्रकट होने का प्रसंग सुखर््िायों में रहा? इसमें कितना सत्य है? मैंने अपने व्याख्यानों में नेताजी की मृत्यु की चर्चा कहीं भी नहीं की थी। फिर भी श्रोताओं की रुचि इस प्रसंग में बराबर सामने आती रही। 
    आइए, अब इस जटिल प्रश्न पर हम और आप आमने-सामने बैठें और इस बहस को तब तक जारी रखें, जब तक किसी तह तक नहीं पहुंच जाएं। 
    —राजेन्द्रमोहन भटनागर
  • Ikkisveen Sadi : Kavita Aur Samaj
    Jagdish Narayan Shrivastva
    690 621

    Item Code: #KGP-1550

    Availability: In stock

    ‘आज जैसा कष्ट है, उसमें सबसे बड़ी चुनौती तो कवि की ही है। हर युग के कवि को कोई न कोई चुनौती मिलती रही है, चाहे समाज की परंपरा दे, चाहे दर्शन दे, चाहे राजनीति दे लेकिन सबको मिलाकर इतनी बड़ी चुनौती कभी नहीं मिली, जो आज मिली है। हर देश के कवि को मिली है, हमारे देश के कवि को ही नहीं मिली है। ‘अस्ति-नस्ति’ के बीच में अगर हम रोक सकें ध्वंस को तो जीवन बच जाएगा। न रोक सकेंगे तो जीवन जाता रहेगा।...
    यहां नई पीढ़ी के कवि हैं, पुरानी के भी हैं।...दो पीढ़ियां न सामने हों तो चलता नहीं है।...कवियों की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी जब मित्र की तरह सामने होती हैं तब शायद बड़ा साहित्य बनता है और अगर दोनों लड़ते हैं तो उनकी लड़ाई ही समाप्त हो जाती है।
    जो आज का कवि है वह आज की परिस्थिति को देखे लेकिन युगबोध के साथ वह युगांतरबोध को भी जाने। कविता लिखना एक सामाजिक कर्म तो है ही। समान गति रखता हो वह समाज है, कवि उसी से आता है और उसकी व्यथा जानता है। सुख-दुःख जानता है। चेतना के अनेक स्तर हैं, उनमें एक सहचेतना है। अपने युग को समझने के लिए और बहुत से कर्म के संस्कार इनमें हैं, जो अब चेतना है। अपने युग को समझने के लिए एक पराचेतना भी है। ये सब चेतनाएं एक साथ कविताओं में मिल जाती हैं, तब हमें एक बड़ा कवि मिलता है। इसलिए युगबोध तो है ही आपका, युगांतरबोध भी होगा आपके पास।...जब ये सब मिलते हैं तो एक महान् कवि आता है।
    चिंतन सिर्फ बुद्धि की प्रक्रिया है पर अनुभूति सिर्फ बुद्धि की प्रक्रिया नहीं है। बड़ा कवि होने के लिए विशाल अनुभूति होती है, भाषा-संवेदना होती है, आंसू भी होंगे, हंसी भी होगी।
    ‘कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू’--इससे बड़ी परिभाषा नहीं है कवि की क्योंकि वह मनीषी है, सब कालों को मिलाकर देखता है, वह परिभू है, सबमें, सबके हृदय को जानता है और स्वयंभू होता है।...
    भाषा-भाव-अनुभूति विलक्षण हो तो आप पूरी समष्टि को बना सकेंगे। पर उसके पहले आपकी कविता पहले आपको बनाएगी। जो कविता आपको नहीं बना सकती, वह किसी को नहीं बनाएगी।’
    ---महादेवी
  • Jeevan Hamara (Paperback)
    Bebi Kambley
    60

    Item Code: #KGP-1509

    Availability: In stock

    जीवन हमारा
    मराठी लेखिका बेबी कांबले दलित साहित्य की प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । दलित लोगों के विपन्न, दयनीय और दलित जीवन को आधार बनाकर लिखे गए इस आत्मकथात्मक उपन्यास ने मराठी साहित्य में तहलका मचा दिया था। महाराष्ट्र के पिछडे इलाके के सुदूर गाँवों में अस्मृश्य माने जाने वाले आदिवासी समाज ने जो नारकीय, अमानवीय और लगभग घृणित जीवन का जहर घूँट-घूँट पिया उसका मर्मांतक  आख्यान है यह उपन्यास । शुरु से अंत तक लगभग सम्मोहन की तरह बाँधे रखने वाले इस उपन्यास में दलितो के जीवन में जड़ें जमा चुके अंधविश्वास पर तो प्रहार किया ही गया है, उस अंधविश्वास को सचेत रूप से उनके जीवन में प्रवेश दिलाने और सतत पनपाने वाले सवर्णो की साजिश का भी पर्दाफाश किया गया है । इस उपन्यास को पढ़ना महाराष्ट्र के डोम समाज ही नहीं वरन् समस्त पददलित जातियों के हाहाकार और विलाप को अपने रक्त में बजता अनुभव करना है । शोषण, दमन और रुदन का जीवंत दस्तावेज है यह उपन्यास, जो बेबी कांबले ने आत्मकथात्मक लहजे में रचा है ।
  • Chhor
    Bhairppa
    400 360

    Item Code: #KGP-886

    Availability: In stock

    छोर
    कुशाग्र बुद्धि अमृता ने चाची के कुचक्र की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया और अपनी पढ़ाई-लिखाई में ही व्यस्त रही। कुछ समय उपरांत पिता भी स्वर्गवासी हुए और तब घर-परिवार तथा व्यापार पर चाची का वर्चस्व स्थापित हो गया। अमृता की संपत्ति धीरे-धीरे और भीतर ही भीतर चाची तथा उसके बच्चों की ओर खिसकने लगी। अमृता की संपत्ति पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चाची ने अमृता को बहला-फुसलाकर उसका ब्याह अपने छोटे भाई से करा दिया।
    हालात को स्वीकार करके मजबूर अमृता एक कॉलिज में अध्यापन करने लगी और अपने दो बच्चों के साथ बागान से दूर पिता की एक पुरानी कोठी में रहने लगी। वहीं उसकी मुलाकात वास्तुकार सोमशेखर से हुई जो बंबई छोड़कर मैसूर आ गया था। दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर आकृष्ट होने लगे। इस बीच अमृता को चाची के कुचक्रों का भी आभास होने लगा। परिस्थितियों ने उसके स्वभाव में अजीब चिड़चिड़ापन, जीवन के प्रति अरुचि, कुंठा और विकर्षण को जन्म दिया। उसे जीवन बेमानी लगने लगा किंतु बेटों के प्रति मोह और सोमशेखर के प्रति अस्पष्ट आकर्षण उसे बार-बार आत्महत्या की कगार से लौटा लाता। अमृता की जिंदगी में जीवन और मृत्यु की ऊहापोह, उसकी कुंठा ही उसकी जिंदगी के दो छोर हैं जिनके बीच वह बार-बार झोंटे खाती रहती है।
    यह उपन्यास रोचक होने के साथ-साथ एक विशेष मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ पैदा करता है। जो यथार्थ के साथ-साथ विचित्र भी हो गई हैं। यहाँ है भैरप्पा की कल्पनामय यथार्थ शैली का अद्भुत चमत्कार!
  • Maitreyi Uwach
    Sushil Sidharth
    500 425

    Item Code: #KGP-MU HB

    Availability: In stock

    मैत्रेयी पुष्पा को पढ़ते हुए मुंशी प्रेमचंद का वह अविस्मरणीय भाषण याद आता रहता है जिसमें उन्होंने सौंदर्य का मेयार बदलने का आह्नान किया था। मनोरंजन और बेचैनी केबीच एक निर्णायक रेखा खींची थी। मैत्रेयी ने सौंदर्य की व्याख्या नहीं कीउसका मेयार बदल दिया। ऐसे कथानक और पात्र कथा साहित्य में आए कि कुलीनतंत्र में भगदड़ मच गई।अनुभवों की रेशमी चादरों में लिपटे लोग भरोसा नहीं कर पाए कि यह जीवन इसी देश का हैये पात्र इसी समाज के हैं। कायदनमैत्रेयी की रचनाओं का समाजशास्त्रीय अध्ययनहोना चाहिए।

    इस अध्ययन में इस पुस्तक में संग्रहीत 39 संवाद अनेक अर्थों में उपयोगी साबित होंगे। यहां मैत्रेयी उवाच की एक ऐसी छटा देखने को मिलेगी जिसमें उनका लेखकविचारकएक्टिविस्ट और स्त्री विमर्शकार खुलकर बात करता है। इससे प्रश्नकर्ताओं और मैत्रेयी जी के बीच एक ऐसी विचारधारा बही है जिसमें पाठक भी स्वयं को रससिक्त पाएंगे।


  • Khaamoshi Se Pahale
    Amrita Pritam
    120 108

    Item Code: #KGP-1848

    Availability: In stock

    अज़ल का वह वीर आया था 
    और मुझे—
    एक किरण का तावीज़ दे गया 
    वह तावीज़ पहन लेती हूँ 
    तो सारे आसमान पर 
    उसकी दरगाह देखती हूँ 
    और इश्क़ की शीरनी लेकर 
    दरगाह पर जाती हूँ.... 
  • Shesh Parichay (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    200

    Item Code: #KGP-155

    Availability: In stock


  • Aakhet
    Jagdish Godbole
    125 113

    Item Code: #KGP-9072

    Availability: In stock


  • Faaltu Aurat
    Ajeet Kaur
    320 288

    Item Code: #KGP-9373

    Availability: In stock

    पंजाबी की प्रख्यात लेखिका अजीत कौर फेमिनिज्म में यकीन रखती हैं पर वह हर बात में पुरुषों का विरोध करने वाली फेमिनिस्ट नहीं हैं, वह ख़ुद को विचारों से फेमिनिस्ट मानती हैं। वह जब-जब स्त्री पर लिखती हैं, अपनी इस बात को पुख्ता भी करती हैं। फालतू औरत कहानी संग्रह में स्त्री  केंद्रित कहानियों की बहुलता है।
    प्रस्तुत कहानियाँ भारतीय समाज में जिस स्त्री का प्रतिनिधित्व करती हैं, वह पत्नी, प्रेमिका, बेटी, माँ तो है ही, पर पुरुषवादी समाज में वह ‘फालतू औरत’ होने का अभिशाप भी झेल रही है। न वह पूरी तरह पत्नी है, न प्रेमिका, न माँ, न बेटी। वह है महज एक ‘फालतू औरत’। इसी ‘फालतू औरत’ के दर्द, उसकी पीड़ा, उसके संघर्ष को अजीत कौर संवेदना के स्तर पर बड़ी शिद्दत से रेखांकित करते हुए हमें समाज का वह चेहरा दिखाने की ईमानदार कोशिश करती हैं जो अपने स्वार्थ की खातिर इस औरत को कभी उसका पूरा ‘स्पेस’ नहीं देना चाहता। ‘फालतू औरत’ की गीता, ‘एक मरा हुआ पल’ की शालिनी, ‘कमरा नंबर आठ’ की दो स्त्रियाँ, ‘हाॅट वाॅटर बोतल’ की मंजरी, ‘बुतशिकन’ की मिसेज़ चौधरी और ‘महक की मौत’ की मोनिका, ‘माँ-पुत्र’ की शांता, ‘एक पोट्र्रेट’ की तारा दीदी ऐसी ही स्त्रियाँ हैं जो प्रेम की दुनिया में, परिवार में, समाज में, देश में अपने लिए एक मुकम्मल स्पेस की चाहत रखती हैं।
    अजीत कौर की प्रस्तुत कहानियाँ सतत प्रवाहमय नदी की तरह हैं जो पाठक को अपने संग बहा ले जाने की पूरी ताकत और सामर्थ्य रखती हैं।
  • Naath Siddhon Ki Rachnayen
    Hazari Prasad Dwivedi
    295 266

    Item Code: #KGP-209

    Availability: In stock


  • Paryavarneeya Pradushan
    Vishnu Dutt Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-111

    Availability: In stock

    पर्यावरणीय प्रदूषण
    बीसवीं शताब्दी के आरंभ से ही विज्ञान तथा टेक्नोलाॅजी ने मानव को प्राकृतिक स्रोतों के उपयोग के लिए अधिक संख्या में अपूर्व शक्ति के साधन उपलब्ध कराए हैं। इन साधनों के निरंतर उपयोग ने पर्यावरण में परिवर्तन कर दिया है। टेक्नोलाॅजी के बेलगाम प्रसारण तथा विकास ने परिस्थितिविज्ञान के संतुलन को खराब कर दिया। वे बड़े-बड़े उद्योग, जो हमें समृद्ध बनाते हैं, बोनस के रूप में हमें प्रदूषण देते हैं। किंतु हम अपने उद्योगधंधे तो बंद नहीं कर सकते। अतः आवश्यकता इस बात की है कि औद्योगिक व्यर्थों का समुचित उपचार करके या तो उसका पुनः उपयोग किया जाए अथवा सर्वथा अहानिकर बना दिया जाए।
    जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गई, मनुष्य का कार्यक्षेत्र भी बढ़ता गया और उसके साथ-साथ प्रदूषण भी बढ़ता गया। यह एक गंभीर समस्या है किंतु औद्योगिक क्रांति के बाद प्रदूषण अत्यधिक तेज हो गया। आज प्रदूषण इस सीमा तक पहुंच गया है कि सूर्य की प्रखर विकिरणों से हमारी रक्षा करने वाली ओजोन परत भी झीनी हो रही है, फलस्वरूप इस कवच में सूराख हो चुका है जो संपूर्ण प्राणी जगत् को न केवल विलुप्तिकरण की ओर ले जाएगा अपितु प्रलय का स्पष्ट संकेत देता है। अतः व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से मनुष्य अपने अस्तित्व के प्रत्येक खण के लिए स्वयं ही उत्तरदायी है।
    डाॅ. विष्णुदत्त शर्मा की कृति ‘पर्यावरणीय प्रदूषण’ समय की आवश्यकता के अनुरूप है तथा एक गंभीर समस्या की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। इसमें पर्यावरणीय प्रदूषण के कारणों, कारकों तथा तत्जनित समस्याओं के विषय में प्रकाश डाला गया है। सचित्र एवं सरल भाषा में लिखी यह पुस्तक प्रदूषण की समस्या को समझने और उसके समाधान में कार्यरत वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, उत्पादकों, जनस्वास्थ्य अधिकारियों, विधायकों तथा उद्योगपतियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। 
  • Raag Viraag
    Shree Lal Shukla
    150 135

    Item Code: #KGP-42

    Availability: In stock


  • The Luck Of The Jews (Novel)
    Michael Benanav
    595 536

    Item Code: #KGP-893

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai (Paperback)
    Ubaid Siddqi
    200

    Item Code: #KGP-200

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
    इस संग्रह के प्रकाशन से मैं बहुत ख़ुश हूं और उम्मीद करता हूं कि उबैद की शाइरी के रसास्वादन के बाद आप ख़ुद को भी इस ख़ुशी में मेरा शरीक पाएंगे।
    दशहरयार 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan (Paperback)
    Usha Kiran Khan
    140

    Item Code: #KGP-504

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उषाकिरण खान
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Yatra Ke Panne
    Rahul Sankrityayan
    350 315

    Item Code: #KGP-1923

    Availability: In stock

    यात्रा के पन्ने
    कालजयी व्यक्तिव के स्वामी महापंडित राहुल सांकृत्यायन  की प्रस्तुत पुस्तक 'यात्रा के पन्ने' से उनके द्वारा की गई तिब्बत-यात्राओं को शामिल किया गया है । अपनी प्रमुख कर्मस्थली तिब्बत से लेखक का अत्यंत गहरा एवं भावनात्मक लगाव रहा है । तिब्बत की पहली, दूसरी तथा तीसरी यात्राओं का विवरण इस पुस्तक में आने  से राहुल जी के यात्रा-साहित्य की यह एक उल्लखनीय कृति बन गई है । 'यात्रा  के पन्ने' में जहाँ राहुल जी तिब्बत के सर्वस्व को अपनी चेतस दृष्टि से जान और पहचान पाए है, वहीं इन यात्राओं में उनकी जन-प्रतिबद्धता की झलक भी दिखाई पड़ती हैं । इतिहास-दृष्टि के आलोक में आधुनिक जीवन-दृष्टि को वैज्ञानिक विस्तार देती उनकी यात्राएं पाठक को समृद्ध करने में सक्षम है । तिब्बत की शताब्दियों की स्मृति, निर्माण और ध्वंस को यहीं महसूस किया जा सकता है ।
    इस पुस्तक में संकलित लेखक के पत्रों का भी विशिष्ट महत्त्व हैं । पेरिस, जर्मनी, लंका तथा स्वदेश से लिखे उनके पत्रों में न केवल लेखक का 'वर्तमान' रचा-बसा है बल्कि अपन समय तथा समाज का दस्तावेजीकरण भी हुआ है । इन संकलित पत्रों को इतिहास के संभवत: सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज माना जा सकता है ।
    'यात्रा के पन्ने' पुस्तक का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष है स्वदेशी यात्राओं का । राहुल जी की इस प्रस्तुति में राजस्थान तथा बिहार के अनेक ऐतिहासिक नगरों का यात्रा-वर्णन है, जो इन स्थलों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक निधियों को सामने लाता है
  • Agyey Sahachar
    Vishwanath Prasad Tiwari
    695 626

    Item Code: #KGP-1940

    Availability: In stock

    अज्ञेय सहचर
    छायावादोत्तर हिंदी साहित्य में अज्ञेय का व्यक्तित्व एक स्वाधीन चिंतक और प्रयोगधर्मी रचनाकार के रूप में अद्वितीय है। इस संदर्भ में एक-दो लेखक ही उनकी पंक्ति में बैठते हैं। उनकी सर्जनात्मक प्रयोगशीलता और नवीनता तथा अनेक कलाओं में उनकी दक्षता को देखते हुए उन्हें हिंदी का ‘रवींद्रनाथ’ कहना उपयुक्त है। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं (कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, संस्मरण, यात्रावृत्त, आलोचना और अन्य लघु विधाएँ) को अपनी प्रतिभा से समृद्ध किया है। कुछ नवीन गद्य विधाओं को जन्म देने का श्रेय भी उन्हें है, जिन्हें उन्होंने ‘अंतःप्रक्रिया’, ‘लॉग बुक’ और ‘टीप’ आदि कहा है। ये ‘डायरी’ विधा के निकट हैं, मगर उनसे भिन्न और नवीन। इस प्रसंग में मुझे यह भी कहना चाहिए कि हिंदी की साहित्यिक भाषा को जितने नए शब्द अज्ञेय ने दिए हैं, उनके किसी समकालीन लेखक ने नहीं दिए। यह एक ऐसा रेखांकित करने योग्य कार्य है, जिसे कोई महान् लेखक ही कर पाता है। वस्तुतः अज्ञेय हिंदी के एक युग-प्रवर्तक साहित्यकार हैं। उन्होंने अनेक रूपों में छायावादोत्तर हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को प्रभावित किया है तथा उसे नई दिशाओं की ओर प्रेरित और संचालित भी किया है।
    अज्ञेय का जितना बड़ा योगदान रचना और चिंतन के क्षेत्र में है, उतना ही या उससे थोड़़ा ही कम हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध करने और अपने समय में एक साहित्यिक वातावरण निर्मित करने वाले व्यक्तित्वसंपन्न लेखक के रूप में। उन्होंने न केवल स्वयं लिखा, बल्कि प्रतिभावान लेखकों की एक पूरी पीढ़ी को मंच देने और सामने लाने का प्रयास किया। 
    आज हिंदी के एक बड़े और वास्तविक पाठक-वर्ग में अज्ञेय प्रतिष्ठित हैं और उन पर लिखा भी कम नहीं गया है, जिसका प्रमाण है यह पुस्तक।
  • Samvad
    Prabhakar Shrotiya
    200 180

    Item Code: #KGP-9116

    Availability: In stock

    इसमें संदेह नहीं कि ‘संवाद’ एक सार्थक कृति है। इसका श्रेय आलोच्य और आलोचक के बीच (सु) संवाद को तो है ही, स्वयं आलोचक की कविता की गहरी समझ, कवि के अंतरंग और रचना शक्ति की पहचान की क्षमता और निष्पक्ष तथा संतुलित भाव के आलोच्य की रचना की कमजोरियों पर उंगली रख पाने की सामथ्र्य भी इस श्रेय की भागी हैं यह एक न्यायिक जांच ही नहीं, न्यायपूर्ण जांच भी है। ये आलेख श्रोत्रिय की भाषा की कवितत्वपूर्ण भंगिमा के साथ-साथ बीच-बीच में उनकी कबीरदासी व्यंग्य मुद्रा और उनकी तेजस्विता या जिंदादिली का भी प्रमाण उपस्थित करते हैं।
    -डाॅ. आनंद प्रकाश दीक्षित, दिनमान दिल्ली
  • Akbar-Beerbal Ki Praamaanik Kahaniyan
    Hari Krishna Devsare
    290 247

    Item Code: #KGP-194

    Availability: In stock

    अकबर-बीरबल की प्रामाणिक कहानियां 
    अकबर-बीरबल की इन कहानियों में केवल मनोरंजक, हाजिरजवाबी और चतुराई की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इनमें भारतीय इतिहास की दो महान् विभूतियों के व्यक्तित्व के विविध गुणों और विशेषताओं के भी दर्शन होते हैं । इन कहानियों में विद्वानों-गुणी  ज़नों का आदर है, कुशल प्रशासन है, न्याय की तराजू पर किए गए फैसले और सामान्य जनता के कल्याण हेतु कार्यों जैसे पहलू भी उजागर होते हैं ।
    यों तो अकबर-बीरबल के किस्सों में काफी मिलावट हुई है, फिर भी उससे बचकर कुछ ऐसी चुनिंदा कहानियां ही यहाँ प्रस्तुत हैं, जो इतिहास की इन दोनों महान् विभूतियों की गरिमामयी छवि प्रस्तुत कर  सकें । आशा है, पाठक इन्हें रुचिकर पाएंगे ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chitra Mudgal (Paperback)
    Chitra Mudgal
    120

    Item Code: #KGP-7005

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : चित्रा मुद्गल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों