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  • Us Desh Ka Yaaron Kaya Kahana
    Manohar Shyam Joshi
    345 311

    Item Code: #KGP-554

    Availability: In stock

    उस देश का यारो क्या कहना
     हिंदी की तमाम अनसुलझी बहसों में से एक यह  भी रही है की व्यंग्य को विधा माना जाय कि वस्तु ? मनोहर जोशी के यहाँ व्यंग्य एक दृष्टि या दृष्टिकोण, एक धजा या अदा की शक्ल अख्तियार  करता है। वे किसी भी स्थिति और व्यक्ति को, विधा और वस्तु को, पवित्र या अस्पृश्य  नहीं मानते । जिस तरह वे अपने को, उसी तरह और सब कुछ को धो-धाकर ठिकाने लगा देने में यकीन करते है । यही उनका कथा है यहीं उनका शिल्प ।
    कोई गुब्बारा दिखा नहीं कि मश्जो उसमें पिन चुभोने के लिए बेताब हो उठते है, गोकि वे इसे बडी तरतीब और तरकीब से करते हैं-- कुछ इस तरह कि वह भड़ाक से न फूटे, हवा धीरे-धीरे फुस्स करती निकले । गुब्बारे को अच्छी बरह पिचकाकर ही मश्जो चैन पाते हैं, जो उनकी ममता का सूचक है या निर्ममता का, यह अपने-आप में विवाद का विषय हो सकता है ।
    हिन्दी व्यंग्य-लेखन के आरंभिक उदाहरण और प्रतिमान यदि शिवशंभु के चिट्ठों में देखे जा सकते हैं तो उनके लगभग सौ वर्षों बाद लिखित 'नेताजी-कक्काजी संवाद' हमें एक बार फिर समय और समाज के आमने-सामने लाते है । तब इस विडंबना की ओर ध्यान जाए बिना नहीँ रहता कि चीजे और स्थितियां जितनी बदलती है, उतनी ही वे पहले जैसी रहती है ।
    इसलिए, लार्ड कर्जन और नैताजी और मुंगेरीलाल एक ही सिक्के के अलग-अलग पहलू जैसे नजर आएँ नो क्या आश्चर्य ।
    यह समझ चुकने के बाद केवल जीना ही समझना बाकी बचना है कि तिथियों, नामों और प्रसंगों के बासीपन के बावजूद, उनके पीछे मौजूद बहुत कुछ तरोताजा बना रहता है । मश्जो उसे कई तरह से झलकाते हैं, यहाँ तक कि छद्म गंभीरता के आवरण में छिपाकर भी ।
    हिन्दी ये एक समय अनेक तात्कालिक कारणों से जिस तरह 'एकांकी' का विस्फोट हुआ था, उसी तरह पत्रकारिता के पिछले दौर में 'व्यंग्य' की भरपूऱ खेती हुई है । कोई चाहे तो इस 'बम्पर क्राप' को 'स्वाधीनता के पचास वर्षों की देन' भी कह सकता है और उम्मीद बाँधी जा सकती है कि जश्न के इस मौके पर संसद का जो विशेष अधिवेशन हुआ था, उसके अनन्तर 'शान्तं पापम्’ नामक एक नया सीरियल शुरु होगा । वह मात्र पचास दिनों का होकर न रह जाय,
    बल्कि आगामी पचास वर्षों तक चलता हुआ, स्वाधिनता का शतक भी धूमधाम से मना सके, इस गुन्ताड़े में हमारे सुपर स्क्रिप्ट-राइटर मश्जो  इन दिनों-बाकी सभी हास्य-व्यंग्यकारों सहित- लगे हुए है ।
    यही वह वजह है कि सूचना मुझ जैसे मुहर्रमी व्यक्ति को देनी पड़ रही है कि आत्मसाक्षात्कार से लेकर आत्मधिक्कार  क्या आत्मशोधन तक की तमाम संभावित छवियों को समेटने वाली उस अखंड राष्ट्रीय गाथा के एल धमाकेदार ट्रेलर की भाँति अब आपके सामने पेश है--'उस देश का यारो क्या कहना ।'
    -अजितकुमार
  • Brahm Kamal
    Swati Tiwari
    300 270

    Item Code: #KGP-497

    Availability: In stock


  • Baitaal Suno
    Rajendra Tyagi
    250 225

    Item Code: #KGP-123

    Availability: In stock

    बैताल सुनो 
    'बैताल सुनो' की रचनाओं का इतिहास भी अजीब है । अच्छी हास्य-रचनाएँ पाठकों को पढ़ने को मिलें, इस दृष्टि से मैंने इन्हें 'कादम्बिनी' में विशेष रूप से लिखना शुरु किया। एक संपादक के नाते मैं नहीं चाहता था कि मेरे नाम से कई रचनाएँ एक अंक में प्रकाशित हो । फिर मेरे लेखन की दृष्टि पाठकों के लिए अलग है । चाहे वे कहानियां हों अथवा 'कालचिंतन' जैसा विशिष्ट दार्शनिक स्तंभ या फिर 'आखिर कब तक' या 'समय के हस्ताक्षर' ये सब एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं । एक स्तंभ चिंतन के लिए है तो दूसरा राजनीतिक और सामाजिक अभिव्यक्ति के लिए ।
    एक गंभीर लेखक हास्य-व्यंग्य की रचनाएं भी बहुत सटीक ढंग से लिख सकता है, पाठकों के लिए यह आश्चर्य का विषय होगा । ऐसी स्थिति में, मैं यानी राजेन्द्र अवस्थी हास्य-व्यंग्य की दुनिया से जाकर 'सेवकराम ओखाडू' बन गया ।
    तो इन्हीं 'सेवकराम ओखाडू' की हास्य-रचनाएँ है इस संग्रह में ।

  • Sant Meeranbai Aur Unki Padaavali (Paperback)
    Baldev Vanshi
    90

    Item Code: #KGP-7071

    Availability: In stock

    संत मीराँबाई और उनकी पदावली
    मीराँबाई  की गति अपने मूल की ओर है । बीज-भाव की ओर है । भक्ति, निष्ठा, अभिव्यक्ति सभी स्तरों पर मीराँ ने अपने अस्तित्व को, मूल को अर्जित किया है। आत्मिक, परम आत्त्मिक उत्स (कृष्ण) से जुड़कर जीवन को उत्सव बनाने में वह धन्य हुई । अस्तित्व की गति, लय, छंद को उसने निर्बंध के मंच पर गाया है। जीया है । 
    मीराँ उफनती आवेगी बरसाती नदी की भाँति वर्जनाओं की चटूटानें  राह बनाती अपने गंतव्य की ओर बे-रोक बढती चली गई । वर्जनाओं के टूटने की झंकार से मीराँ की कविता अपना श्रृंगार करती है। मीराँ हर स्तर पर लगातार वर्जनाओं को क्रम-क्रम तोड़ती चली गई । राजदरबार की, रनिवास की, सामंती मूल्यों की, पुरुष-प्रधान ममाज द्वारा थोपे गए नियमों की कितनी ही वर्जनाओं की श्रृंखलाएँ मीराँ ने तोड़ फेंकीं और मुक्त हो गई । इतना ही नहीं, तत्कालीन धर्म-संप्रदाय की वर्जनाओं को भी अस्वीकार कर दिया । तभी मीराँ, मीराँ बनी ।
  • Vah Chhathavan Tattva
    Om Bharti
    125 113

    Item Code: #KGP-1861

    Availability: In stock

    वह छठवाँ तत्त्व 
    जिसे मेरी कविताएँ पसंद नहीं
    उसकी भी कोई कविता
    पसंद है ज़रूर मुझे—
    ओम भारती के नए संग्रह की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ विनम्रता नहीं, उसकी रचनात्मक सचाई की सूचक हैं। इन कविताओं से गुज़रने के बाद मुझे लगा कि यह एक ऐसे वयस्क कवि का संग्रह है, जिसमें चीज़ों को निकट से जानने, चुनने और अपनी संवेदना का हिस्सा बनाने की एक उत्कट इच्छा है और अपने आज़माए हुए नुस्ख़ों और औज़ारों को फिर से जाँचने-परखने की एक सच्ची ललक भी। यही बात संग्रह की कविताओं को पठनीय बनाती है। इस कवि के अनुसार– कविता वह होती है, जिसमें भेद छुपे हेते हैं, जो भेद खोल देते हैं। इसका सबसे विश्वसनीय उदाहरण है इस संग्रह की वह कविता, जिसका शीर्षक है ‘इस संशय के समय में’। विक्रम सेठ के ‘सुटेबुल ब्वाय’ की तरह यह बहन के लिए एक अच्छे वर की तलाश की कविता है—
    अच्छे लड़के नहीं हैं कहीं भी
    हों भी तो शायद खुद उन्होंने
    असंभव कर रखा है ढूँढ़ लिया जाना अपना।
    और फिर कविता के उत्तरार्द्ध में निष्कर्षतः यह कि—
    इस संशय के समय में
    क्या अच्छाई खो चुकी तमाम आकर्षण?
    इस कविता का अंत दिलचस्प है और थोड़ा विडंबनापूर्ण भी, क्योंकि कवि को लगता है—‘अच्छे लड़के नहीं हैं अथवा हैं तो वे इस कवि से कहेंगे—बेवकूफ़, हमसे तो मिला होता लिखने से पहले।’ यह एक गंभीर विषय को हलके-फुलके ढंग से कहने का अंदाज़ है, जो कविता को एक नया तेवर देता है।
    इस संग्रह की अनेक कविताओं में एक चुभता हुआ व्यंग्य है और कवि के पास उसे व्यक्त करने का चुहलभरा कौशल भी। इस दृष्टि से कई और कविताओं के साथ-साथ ‘निरापद’ कविता ख़ास तौर से पठनीय है, जो इस प्रगतिकामी कवि की लगभग एक आत्मव्यंग्य जैसी कविता है। कवि की यह खेल जैसी शैली एक तरह से इस पूरे संग्रह के चरित्र-लक्षण को निर्धारित करती है। ‘इस तरह भोपाल’ कविता इसका एक प्रतिनिधि नमूना है, जिसकी शुरू की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
    जहाँ भोपाल—
    वहाँ अब संख्या और किलोमीटर नहीं हैं
    मगर वहाँ भी एक तीर की नोक से,
    आगे है भोपाल
    उस जगह न कोई खंभा,
    न कोई तख़्ती और न ही संकेत
    कि यह है, क़सम हुज़ूर, यही तो है—
    भोपाल!
    मध्यप्रदेश की कहन-शैली के रंग में ढली हुई ये कतिवाएँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करेंगी और बेशक काव्य-मर्मज्ञों का भी।
  • Maalish Mahapuran
    Sushil Sidharth
    300 270

    Item Code: #KGP-782

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    [इसी पुस्तक से]
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Balram
    Balram
    230 207

    Item Code: #KGP-692

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बलराम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'शुभ दिन', 'गोआ में तुम', 'शिक्षाकाल', 'पालनहारे', 'सामना', 'कलम हुए हाथ ', 'कामरेड का सपना ', 'मालिक के मित्र', 'अनचाहे सफर' तथा 'पहला सबक' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बलराम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mera Jamak Vapas Do (Paperback)
    Vidya Sagar Nautiyal
    150

    Item Code: #KGP-7073

    Availability: In stock


  • Rigveda : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-7109

    Availability: In stock

    ऋग्वेद : युवाओं के लिए
    यहाँ ऋग्वेद के मन्त्रों की व्याख्याएँ उसे सर्वथा नवीन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रही हैं, जिनसे आज का 'कंप्यूटर-सेवी' युवा किसी भी स्थिति में निरपेक्ष नहीं रह सकेगा । पारंपरिक ज्ञान की अमूल्य धरोहर उसके हाथों में रखने का प्रयास है यह पुस्तक । 
  • Swami Vivekanand Ki Shreshth Kahaniyan
    Jagnnath Prabhakar
    140

    Item Code: #KGP-7847

    Availability: In stock

    स्वामी विवेकानंद की श्रेष्ठ कहानियाँ
    स्वामी विवेकानंद की श्रेष्ठ कहानियां के इस संग्रह में अधिक कहानियाँ तो वे हैं जो उनके भाषणों में  बिखरी पड़ी हैं । ये कहानियाँ उन्होंने अमेरिका में अपने भाषणों के गंभीर आध्यात्मिक तत्त्वों को समझाने के  लिए दृष्टान्त या उदारणों के रूप में सुनायी थीं । कुछ एक कहानियां उनके जीवन की घटनाओं से सम्बन्ध रखती हैं । इन सबके निर्वाचन में इस बात का ध्यान रखा गया है कि इनकी विषय-वस्तु केवल शिक्षाप्रद ही न हो, अपितु साधारण विशेष पढे-लिखे बालक से बूढ़े तक सभी पाठकों के लिए रुचिकर, आकर्षक और मर्मस्पर्शी हो । इनके अनुवाद में सरल और मुहावरा-रंजित भाषा के प्रयोग का प्रयास किया गया है । इन कहानियों के विषय में इससे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती, क्योंकि इनके साथ विश्वविख्यात महापुरुष विवेकानंद का परम विवेकशील, धर्मपरायण, तपस्वी, विचारक, भारतीय दर्शनशास्त्रों के अद्वितीय ज्ञाता, देशभक्त, वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न एवं सांसारिक विपत्ति- विघ्नों को तो क्या मृत्यु की विभिषिका को भी पद-दलित करके लक्ष्य की और बढ़ते चले जाने वाला मृत्युंजय व्यक्तित्व जुड़ा हुआ है । 
    हमें पूरी आशा है की ये कहानियां पाठकों के लिए केवल मनोरंजन ही के तत्तव प्रस्तुत नहीं करेंगी, प्रत्येक नयी चेतना, शाश्वत आनंद और अविरत अविरल सहस प्रवाह से भी उनके हृदयों को प्लावित कर देंगी। 
  • Avadh Narain Mudgal Samgra (2 Vols.)
    Mahesh Darpan
    750 675

    Item Code: #KGP-216

    Availability: In stock

    अवधनारायण मुद्गल समग्र (2 खण्डों में)
    'अवधनारायरए मुद्गल समग्र' में कवि-कथाकार  संपादक ही नहीं, एक सिद्धहस्त यात्रावृत्त लेखक, लघुकथाकार, साक्षात्कारकर्ता और अनुवादक के साथ-साथ श्री मुद्गल का विचारक रूप भी सामने आया है । आगरा, लखनऊ, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में साहित्य और पत्रकारिता के रचनाकार- संपादक के अनुभव विविधरंगी रहे हैं । अपने समय की हलचल को बड़े संजीदा ढंग से देखने वाले\ श्री मुद्गल को समय के अनेक बड़े रचनाकारों व संपादकों का सान्निध्य तो मिला ही, वह उनके साथ रहते हुए भी स्वयं को उनसे अप्रभावित रख अपनी अलग राह बना सके । इस राह को पहचानना ही इस समग्र कृतित्व से होकर गुज़रना है। यहीं दैनिक जीवन के तनाव, इतिहास से मनुष्य का संबंध, देश-काल के भीतर और पार होती दृष्टि, सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक व व्यक्तिगत प्रसंगों में भाषा का सहज आत्मीय स्वरूप और मिथकों के साथ-साथ दैनंदिन जीवन से आए प्रतीक एक नई रचना की दुनिया में ले जाते हैं, जो निरंतर  पास आने को आमंत्रित करती है । इस ग्रंथ का पाथ, एक तरह से एक विशिष्ट काल-खंड को तटस्थ दृष्टि से समझने का अवसर भी देता है । रचनाकार मुद्गल की यह सृष्टि विचार और विरार-सघर्ष की एक ऐसी दुनिया है, जिससे गुजरते हुए पाठक खुद को उसका एक सहयात्री पाता है ।

  • Vaigyanik Pura Kathayen
    Dr. Rajiv Ranjan Upadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-236

    Availability: In stock

    वैज्ञानिक पुरा कथाएँ
    भारत में विज्ञान के विकास के इस युग में पुराकालीन विज्ञान कथाओं पर विज्ञानसम्मत दृष्टि से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि अनेक कथाओं में भविष्यद्रष्टा ऋषियों की दृष्टि में रचा-बसा विज्ञान प्रत्यक्ष दिखाई देता है। इस संग्रह की विमान संबंधित त्रिपुर: अंतरिक्ष में तीन नगर, मनचालित विमान: सौभ, हिरण्यनगर नामक कथाएँ इनके पुराकालीन अस्तित्व की साक्षी हैं।
    भारत का आयुर्विज्ञान कितना विकसित था, सर्जरी कितनी विकसित थी, इसके प्रभाव चरक संहिता और सुश्रुत संहिता तथा आयुर्वेद संबंधित अन्य ग्रंथों में उपलब्ध हैं। संजीवनी, महर्षि भृगु का चमत्कार, महर्षि च्यवन, विशल्या, अश्विद्वय, गणेश, महर्षि दध्यङ तथा उपमन्यु नामक कथाएँ हमारे पुराकालीन आयुर्वेदीय ज्ञान की परिचायक हैं।
    बुढ़ापा एवं मृत्यु का भय मनुष्य को सदैव से सताता रहा है। दीर्घ और अमर जीवन तथा सदैव यौवनयुक्त रहने की मानव की अनादिकाल से कामना रही है। इसी प्रभाव का प्रतिबिंब समुद्र-मंथन और राजा ययाति नामक कथाओं में विद्यमान है। 
    लिंग-परिवर्तन की घटनाएँ पुराकाल में भी होती रही होंगी, इस तथ्य की ओर इंगित करती कथाएँ हैं शिखंडी तथा इला।
    द्रोणाचार्य, कौरवों तथा बेन से उत्पन्न पुत्र की कथा प्राचीन आख्यानों में सुरक्षित है, जो उस युग में भी मौजूद कृत्रिम गर्भाधान विधि की ओर संकेत करती है।
    पुरुष-शरीर में निहित स्तन-वृद्धि नियंत्राक और यौन-कार्य संपादन में प्रभावी जैव रसायनों के स्रोव में परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप, आधुनिक विज्ञान में उपलब्ध विवरणों के अनुसार, पुरुष में स्तन-वृद्धि ही नहीं होती वरन् उसके स्तनों से दुग्ध- स्रोव भी हो सकता है–राजा मांधाता की कथा इसी तथ्य को प्रदर्शित करती है।
    वैदिककाल के भारतीय गणितज्ञों में श्रेष्ठ महर्षि गृत्समद ने शून्य तथा संख्याओं का आविष्कार किया। गणित में निहित वैज्ञानिक तर्कशील पद्धति के उपयोग को प्रदर्शित करती कथाएँ हैं–धु्रव, राजा ककुघ्न, राजा त्रिशंकु और असुर-त्रित की ऋग्वेदिक कथा।                      
    यह निर्विवाद तथ्य है कि क्लोनिंग, विशेषकर मानवीय संदर्भ में, पुराकाल के चिंतकों, वैज्ञानिकों को अज्ञात थी, परंतु उनके उर्वर मस्तिष्क में संभवतः इस विधा के भविष्य में विकसित हो जाने के बिंब थे, जिसके कारण उन्होंने नृसिंह के रूप की कल्पना की थी। यह कथा एक प्रभावी, भविष्योन्मुखी विज्ञान कथा है।
    भारतीय ऋषियों के रसायन ज्ञान का दर्शन कराती कथा है महर्षि आरुणि उद्दालक की। बहुवर्णित मृत्यु के पूर्व अथवा मृत्यु के अवसर पर मानव-शरीर के रहस्य को तंत्रिका वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है। आधुनिक विज्ञान की संदेशवाहक बहुश्रुत कथा है सत्यवान की।
    एक वस्तु को अनेक स्वरूप प्रदान करना शिल्प है। वज्र के निर्माण में निहित शिल्प का प्रयोग वृत्रसुर-विनाश, सुदर्शन चक्र तथा महर्षि दधीचि की कथाओं में हुआ है।
    भारतीय ऋषि भूगर्भीय परिवर्तन, उनके परिणाम एवं प्रभाव से अछूते नहीं थे। उन्होंने पृथ्वी पर उभरते और पुनः धरा में लोप होते पर्वतों को देखा था। विंध्यगिरि, श्वेत वराह, खंड-प्रलय एवं और्व-अग्नि नामक कथाएँ भूगर्भ के विविध पक्षों को चित्रित करती हैं।
    नारद के ब्रह्मांड-भ्रमण में पदार्थ-पारण तथा परमाणु- विस्फोट का आश्चर्यजनक वर्णन, जो हमारे पुराणों, रामायण एवं महाभारत में उपलब्ध है, वह आँखों द्वारा देखा हुआ प्रतीत होता है। क्या यह ऋषियों की कल्पना-शक्ति का प्रतिबिंब है अथवा इस प्रकार के लघु परमाणु-विस्फोट करने की (ब्रह्मास्त्र के माध्यम से) विधि ज्ञात थी ? परीक्षित के जन्म की कथा इसी प्रकार के प्रभाव से संबद्ध है।
    वामन अवतार की कथा सूर्य के प्रकाशपुंज विवर्तन के प्रभाव से जुड़ी है। वास्तव में आलंकारिक वैदिक भाषा में उर्वशी-उषा का प्रतीक है, इस पक्ष में अहल्या, सरमा की कथाओं से कम लोग परिचित हैं। इनसे संबंधित भ्रांतियों के निराकरण तथा इनकी कथाओं में निहित तथ्यों के स्पष्टीकरण को ध्यान में रखकर ये कथाएँ संगृहीत की गई हैं।
    इस संग्रह की कथाओं का अनुशीलन करने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि ऋग्वेद में वर्णित असुर-त्रित की गणित संबंधी कथा प्राचीनतम विज्ञान कथा है जो निर्विवाद रूप से प्रमाणित करती है कि विज्ञान कथाओं का उद्गम-स्थल भारत है, न कि योरोप।
  • Kaag Ke Bhaag Bare
    Prabha Shanker Upadhayaye
    145 131

    Item Code: #KGP-1811

    Availability: In stock

    काग के भाग बड़े
    व्यंग्य को भले ही लेटिन के ‘सेटुरा’ से व्युत्पन्न बताया गया हो, किंतु भारत के प्राचीन साहित्य में व्यंग्य की बूझ रही है। ऋग्वेद में मंत्रवाची मुनियों को टर्राने वाले मेढकों की उपमा दी गई है। भविष्येतर पुराण तथा भर्तृहरिशतकत्रयं में खट्टी-मीठी गालियों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य प्रसंग उत्पन्न किए हैं— ‘गालिदानं हास्यं ललनानर्तनं स्फुटम्’, ‘ददतु ददतु गालीर्गालिगन्तो भवन्तो’। वाल्मीकि रामायण में मंथरा की षड्यंत्र बुद्धि की कायल होकर, कैकेयी उसकी अप्रस्तुत प्रशंसा करती है, "तेरे कूबड़ पर उत्तम चंदन का लेप लगाकर उसे छिपा दूँगी, तब तू मेरे द्वारा प्रदत्त, सुंदर वस्त्र धारण कर देवांगना की भाँति विचरण करना।" रामचरितमानस में भी ‘तौ कौतुकिय आलस नाहीं’ (कौतुक प्रसंग) तथा राम कलेवा में हास्य-व्यंग्य वार्ताएँ हैं। संस्कृत कवियों कालिदास, शूद्रक, भवभूति ने विदूषक के ज़रिए व्यंग्य-विनोद का कुशल संयोजन किया है, "दामाद दसवाँ ग्रह है, जो सदा वक्र व क्रूर रहता है। जो सदा पूजा जाता है और सदा कन्या राशि पर स्थित है।"
    लोक-जीवन में तमाशेबाज़ी, बातपोशी, रसकथाओं, गालीबाज़ों, भांडों और बहुरुपियों ने हास्य-व्यंग्य वृत्तांत वर्णित किए हैं। विवाह और होली पर्व पर हमारा विनोदी स्वभाव उभर आता है। अतः दीगर यह कि विश्व में हास्य-व्यंग्य के पुरोधा हम ही हैं।
    अस्तु, इस व्यंग्य-संग्रह को विषय एवं शैली-वैविध्य के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें व्यंग्य- कथा, निबंध, गोष्ठी, प्रश्नोत्तरी, प्रेस कॉन्फ्रेंस, संवाद, साक्षात्कार, सर्वे आदि शिल्पों की चौंतीस व्यंग्य रचनाएँ संकलित की गई हैं।
  • Naamdev Rachanavali
    Govind Rajnish
    320 272

    Item Code: #KGP-146

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • 20-Best Stories From Russia (Paperback)
    Prashant Kaushik
    125

    Item Code: #KGP-351

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words? 
    In this first in the 20-BEST series, we bring to you short stories and classics from a land that is as enigmatic as intriguing. Russian short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious—as well as the equally famous Russian authors. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.  
    With stories like The Bet and Vanka by Chekhov, God sees the truth but waits by Leo Tolstoy, The Queen of Spades by Alexander Pushkin, Her Lover and One Autumn Night by Gorky, The Cloak by Gogol, The Signal by Garshin, this book is a compilation of 20 famous Russian short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.
    Time to indulge in some old-world charm all the way from Russia.  
  • Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri (Paperback)
    Leeladhar Jaguri
    80

    Item Code: #KGP-1442

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
    अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।
  • Parv (Paperback)
    Bhairppa
    300

    Item Code: #KGP-7195

    Availability: In stock

    भारतीय वाडमय में पंचम वेद के रूप में अधिष्टित महाभारत पर आधारित भैरप्पा की महान् औपन्यासिक कृति । इस उपन्यास में लेखक ने महाभारत के पात्रों, स्थितियों और घटनाओं का जो वस्तुनिष्ठ आलेखन प्रस्तुत किया है, वह अदभुत और अनुपम है । महापारतकालीन भारत की सामाजिक संरचना क्या तत्कालीन इतिहास और परंपराओं के लंबे अरसे तक अनुसंघान, व्यापक भ्रमण और अध्ययन पर आधारित यह उपन्यास भारतीय साहित्य की महान् उपलब्धि है । अतीतोन्मुखी भारतीय जनमानस के साथ जुडे महाभारत के पात्रों के अलंकरण और चमत्कारों एवं अतिशयोक्तियों की कैचुली उतारकर उन्हें मानवीय धरातल पर साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करने के कारण यह उपन्यास वस्तुत: एक क्रांतिकारी जाते है । संक्षेप में इतना कहना ही शायद पर्याप्त हो कि 'पर्व' आधुनिक संदर्मों से जुडा महाभास्त का पुनराख्यान है ।
    'पर्व' का फलक भले ही महाभारत पर आधारित हो, लेकिन यह एक साहित्यिक कृति है-एक उपन्यास । पाठक इसे एक उपन्यास के रूप में ही स्वीकार करेंगे-ऐसा लेखक का अनुरोध है । 

  • Triya Hath (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    100

    Item Code: #KGP-7046

    Availability: In stock


  • Kammi Or Nanda
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-7836

    Availability: In stock

    कम्मी और नन्दा
    नन्दा यूनिवर्सिटी की बाहरी दीवार के पास
    पहुँची ही थी कि उसने देखा कि दीवार
    के साथ  ढासना लगाकर खडी हुई एक
    औरत ने पैसे मांगने के लिए अपना हाथ
    आगे किया हुआ है—
    वह हाथ नन्दा की तरफ बढ़ता हुआ
    नन्दा की कमीज़ से छू गया... 
    नन्दा ने उस माँगने वाली औरत की तरफ
    देखा—उस औरत का चेहरा उजड़ा
    हुआ था, बाल खुश्क और माथे
    पर बिखरे हुए थे, सिर पर
    एक लीर-सा दुपट्टा थाµपर
    आँखों में एक अजीब सी चमक
    और हसरत थी-नक्श रुले हुए थे,
    बुरे नहीं थे—वह हाथ के नन्दा के
    आगे पसारकर-एकटक नन्दा के
    मुँह को देखे जा रही थी…
    नन्दा उकताई-सी तेज कदमों से घर
    जाने वाली बस क्रो तरफ़ चल दी ।
    लेकिन बस के पायदान पर
    एक पॉव रखा ही था कि
    अचानक नन्दा को खयाल आया—
    'कौन जाने यह माँगने वाली
    औरत ही मेरी माँ हो...'
    -नन्दा का एक सपना
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Om Dhingra
    Sudha Om Dhingra
    250 225

    Item Code: #KGP-9378

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ सुधा ओम ढींगरा
    ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से  स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा ओम ढींगरा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘पासवर्ड’, ‘टाॅरनेडो’, ‘बेघर सच’, ‘कमरा नंबर 103’, ‘सूरज क्यों निकलता है?’, ‘क्षितिज से परे...’, ‘वह कोई और थी...’, ‘विकल्प’, ‘अनुगूँज’ तथा ‘काश! ऐसा होता...’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार सुधा ओम ढींगरा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    160 144

    Item Code: #KGP-13

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', 'क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Baal Naatak
    Pratap Sehgal
    240 216

    Item Code: #KGP-759

    Availability: In stock

    दस बाल नाटक
    ये नाटक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जिन कहानियों से प्रेरित हैं, उन कहानियों का समय वह समय है, जिसे हम भारत के  पुनर्जागरण और आजादी के संघर्ष का समय कहते हैं। भारत के अन्य इलाकों की अपेक्षा बंगाल में शिक्षा को व्यवस्था बेहतर थी, लेकिन आज के मुकाबले में उस शिक्षा-व्यवस्था को भी हम पिछड़ा हुआ ही कहेंगे।  ऐसे ही समय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व दुनिया को  चौका देता हैं। अपनी अन्य कलात्मक कियाओं के साथ-साथ वे बच्चों को कभी नहीं भूले। उन्होंने एक जगह कहा भी है कि बच्चा बडों का पिता होता है। यानी हम आने वाली हर पीढ़ी से कुछ सीखते हैं और कुछ सिखाते हैं।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बाल-कहानियों में सन्देश स्पष्ट हैं। ये संदेश बच्चों की अपेक्षा उनके अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अधिक हैं। अपना संदेश समाज तक पहुँचाने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर बच्चे को भी एक व्हीकल की तरह से इस्तेमाल करले हैं। कहानी का पाठक भल ही मौजूद हो, लेकिन उसका दर्शक नहीं होता। इसलिए प्रताप सहगल ने इन कहानियों को यहाँ लघु नाटकों के माध्यम से रखा है।  प्रताप सहगल हिंदी के जाने-माने कवि-नाटककार हैं। उन्हें भी अपन बहुविध लेखन के लिए जाना जाता हैं। इससे पूर्व उनके बाल-नाटकों की एक किताब 'छूमंतर' ( किताबघर प्रकाशान) प्रकाशित होकर मकबूल साबित हुई है। इसका प्रमाण उसके लगातार छपने चाल संस्करण हैं। इस बार प्रताप सहगल ने गुरुदेव की बाल-कहानियों का अपने बाल-नाट्य-लेखन का आधार बनाया है। ये नाटक जहाँ अपने समय में अवस्थित हैं, वहीं वे हमारे समय के साथ भी जुड़ जाते हैं और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इनकी उपयोगिता बनी रहेगी।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रताप सहगल-दोनों के कन्सर्न्स का जानने के लिए दस बाल-नाटकों का यह संग्रह हर बड़े और हर बच्चे के लिए एक जरूरी किताब बन जाता है।
  • Kasturigandh Tatha Anya Kahaniyan
    Poonam Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-302

    Availability: In stock

    कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ
    ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ पूनम सिंह का दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह की कहानियों में व्यक्ति भी है, परिवार भी और समाज भी। विस्तार, गहराई और संपूर्णता के साथ। इसलिए ये कहानियाँ स्त्री द्वारा रचित होने पर भी सिर्फ स्त्री-समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। इनमें स्त्रीवादी लेखन की शक्ति का स्वीकार भी है और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण भी। इस तरह हिंदी में हो रहे स्त्री-कथा-लेखन को ये कहानियाँ नया आयाम देती हैं।
    प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व की उपज हैं। इनमें परंपरा के जीवित तत्त्वों का स्वीकार आधुनिकता के दायरे में किया गया है। ‘कस्तूरीगंध’, ‘उससे पूछो सोमनाथ’ तथा ‘पालूशन मानिटरिंग’ जैसी कहानियाँ इस कथन के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में देखी जा सकती हैं। इनमें परंपरा के उस पक्ष का अस्वीकार है, जो आधुनिक सोच के विरुद्ध है। इन कहानियों की आधुनिकता नई जीवन स्थितियों के बेहतर रूप का सृजनधर्मी आयाम है, जिसे कहानी-लेखिका ने सीधे, पर सधे शिल्प में उपलब्ध किया है।
    पूनम सिंह की कथा-चेतना बृहत्तर मानवीय और सामाजिक सरोकारों से आत्मीय जुड़ाव का प्रतिफल है, जिसके कारण उनकी कहानियाँ घर-आँगन और सेक्स के भूगोल तक सीमित नहीं हैं। इसके साथ इनमें सादगी से भरा प्यारा घरेलूपन भी है, जो उनकी निजता के संस्पर्श के साथ आंतरिक लहर-सा मंद-मंद प्रवाहित होता रहता है। उनकी कथा-चेतना सामान्यीकृत होकर अपने समय के साथ है तो विशिष्टीकृत होकर अलग से रेखांकित करने लायक भी है। इसका उदाहरण इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं।
    कहा जा सकता है कि ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ समकालीन हिंदी कहानी में नए सृजन का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
  • Aranya
    Himanshu Joshi
    125 113

    Item Code: #KGP-2051

    Availability: In stock

    अरण्य
    बर्फ ! पहाड़ ! शीत ! ठिठुरन ! अभाव ! दुख ! शोषण ! कुहासा ! इन सारे शब्दों को मिलाकर जो बनता है, वही है इनके जीवन की भी परिभाषा। कावेरी की यह व्यथा मात्र एक कावेरी की नहीं, अनेक काल-खंडों में, अनेक तरह से, अनेक रूपों में जी रहीँ अनेक कावेरियों की व्यथा-कथा है । हिम-शीतल सुरजों से ताप कहाँ से आएगा ? कहाँ से आएगी वह ऊष्मा, यह ऊर्जा, जो किसी को जीने-भर के लिए प्रेरित कर सके ? फिर भी लोग जीते हैं, जी-जी कर मरते हैं … इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है ?
    अग्नि को साक्षी रखकर तो सभी जीते हैं, विन्तु एक निर्धूम अग्नि-ज्वाला अपने सीने से समेटे, जीने का जीवट कितनों में होता है ? अनाम रिश्तों के भी कुछ नाम हुआ करते हैं । स्वयं की अपेक्षा पर के लिए जीने का भी एक और सुख होता है । शायद इसीलिए कावेरी हर संकट को सहज कर, हर गरल को अमृत मानकर पीती रही । पल्लवित वृक्ष की तरह, सदानीरा सरिता की भाँति सबको सब कुछ देती हुई भी विनिमय में ही रिक्त रही ।
    कावेरी, मानिक, माधव मामा पधान भले ही आज़ जीवित नहीं, पर नाना रूपों में हमारे सामने कभी-कभी प्रकट होते रहते हैं … अनेक  प्रश्न बनकर । उन यंत्रणाओं का क्या होगा, जो किसी निर्दोष/निरपराध को मिलती हैं? न्याय की परिभाषा क्या है ? समाज किसके लिए है ? हम क्यों जीते है ? बार-बार बिना मौत क्यों मरते है ? हमारी अकालमृत्यु क्यों होती है ?
  • Saleem Ke Shanidev
    Pankaj Prashar
    100 90

    Item Code: #KGP-9100

    Availability: In stock


  • Mera Paigaam Muhabbat Hai Jahan Tak Pahunche
    Jigar Muradabadi
    250 225

    Item Code: #KGP-98

    Availability: In stock

    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
    'जिगर' साहब इंसानियत और शेरियत दोनों का पैकर थे । उनकी शायराना अजमत का बडा राज उनकी मखसूस सज-धज, तर्जेअदा और तरन्नुम था । उनकी मासूम जोर दिलकश शखसियत ने उन्हें अपने दौर का महबूब-तरीन शायर बना दिया था । उनकी बड़ाई को इस पैमाने से भी नापा जा सकता है कि दौरे जदीद में कितनों ने जिगर बनने की कोशिश की, इसलिए कि शेर की दुनिया के वह एक तर्ज थे। असलूब थे, एक स्टाइल थे ।
    'जिगर' ने गजल को एक नई जिंदगी बख्शी । उनकी गजले मदहोशी व रंगीनी के छलकते हुए सागर  हैं, जिससे तरह-तरह के रंग मौजूद है और किस्म-किस्म के जजबात जलवागर हैं,
    जिनका मुताअला जिंदगी के नशे को गहरा कर देता है, कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और हयात नये रूप में जलवागर होकर दिल की धड़कन में जज्ब हो जाती है । खून की रवानी तेज हो जाती है और शायरी के तारों से आहंग हो जाती है। ये इंतेखाबे गजल के अशआर ऐसे है जिनमें नई जिंदगी और वक्त की धड़कनों की आवाजें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख 'जिगर' को कभी भुला नहीं सकेंगी ।
  • Nanhe Haath Khoj Mahan
    Hari Krishna Devsare
    190 171

    Item Code: #KGP-109

    Availability: In stock

    एक पुरानी कहावत है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात। विज्ञान के आविष्कारों में अनेक ऐसी कथाएं छिपी हुई हैं, जिनके बीज बचपन में ही पड़ गए थे। उन वैज्ञानिकों के बचपन में ही कुछ ऐसा हुआ था, जिसने आगे चलकर एक महान आविष्कार, अनुसंधान या खोज का रूप लिया। इस पुस्तक में कुछ ऐसी ही विशिष्ट कथाएं दी गई हैं, जो बाल-पाठकों को प्रेरणा देंगी कि उनका हर काम महत्वपूर्ण है। कौन जाने, उनका कौन-सा काम बड़े होने पर प्रेरणा देगा और उन्हें महानता की सीढ़ियों पर चढ़ाकर विशिष्ट बना देगा। ये कहानियां रोचक हें, ज्ञानवर्धक हैं और प्रेरक हैं। आशा है, सभी आयु के पाठक इनसे प्रेरणा लेंगे।
    —हरिकृष्ण देवसरे
  • Adakara Madhubala : Dard Bhari Jeevan Katha
    Shashi Kant Kinikar
    390 351

    Item Code: #KGP-569

    Availability: In stock

    भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग में कुछ नायिकाओं ने दर्शकों के दिल में एक विशिष्ट स्थान बना लिया था, उनमें से प्रमुख कलाकार मधुबाला अपनी सुंदरता, अपने मुस्कराते चेहरे व विभिन्न तरह के रोल करने के कारण दर्शकों की चहेती कलाकार थीं, विशेषकर जो फिल्म जगत् को पसंद करते थे।
    मधुबाला का जन्म 1933 में और देहांत 1969 में हुआ था। मधुबाला ने मात्र 9 वर्ष की आयु से ही अभिनय करना शुरू कर दिया और तो और लड़कपन में ही फिल्मों में नायिका का रोल करना शुरू कर दिया था। सन् 1950 और 1960 के दशकों में मधुबाला ने उस समय के सारे मुख्य अभिनेताओं के साथ अभिनय किया। मधुबाला इस युग में अपनी लोकप्रियता की चरम सीमा पर थीं और इसी युग को भारतीय सिनेमा का स्वर्णकाल कहा जाता है।
    मधुबाला का जीवन उनकी सुंदरता और मुस्कराहट की तरह अच्छा नहीं था। सारा दिन फिल्मों में कार्य करने के बाद भी उन्हें अपने बड़े परिवार को पालने के लिए कार्य करना पड़ता था। अपने बड़े परिवार में वह अकेली जीविका कमाने वाली सदस्य थी और सबका ठीक प्रकार से पालन-पोषण करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करती थीं जिस कारण वह बहुत दुखी रहा करती थीं।
    दिलीप कुमार, जो उस समय के शोकाकुल अभिनय के सम्राट माने जाते थे, से प्रेम व कलाकार किशोर कुमार से विवाह दोनों ही विफल रहे। इन विफलताओं ने उनकी पीड़ा को और बढ़ा दिया था। इस सबके अतिरिक्त वह बालपन से ही बहुत दुर्बल थीं और इसी शारीरिक दुर्बलता के कारण भी उन्होंने बहुत कष्ट झेले। शायद इन सब कारणों के होते उनका देहांत इतनी छोटी आयु में हो गया।
    मधुबाला का स्वयं का जीवन भी एक फिल्म की पटकथा के समान ही था। प्रख्यात लेखक शशिकांत किणीकर ने इस पुस्तक में मधुबाला का जीवन-दर्शन बहुत ही निपुणता से प्रस्तुत किया है जो पाठकों के दिलों को छू लेगा।
  • Aur Aagey Badhatey Raho...
    Dr. Rashmi
    200 180

    Item Code: #KGP-466

    Availability: In stock

    जीवन व साहित्य में सदुपदेश, सत्संग और सुभाषित का विशेष महत्त्व है। इनमें अनुभवों का ऐसा खजाना होता है जो किसी को भी समृद्ध कर सकता है। यही कारण है कि साहित्य में प्रारंभ से ही नीति-कथाओं का प्रचलन है। ये कथाएं प्रेरणा देती हैं, संघर्ष करना सिखाती हैं, असमंजस में उलझे मन को उचित निर्णय लेने की शक्ति देती हैं और समग्रतः जीना सिखाती हैं। ‘...और आगे बढ़ते रहो’ प्रेरक प्रसंगों की एक ऐसी ही रोचक पुस्तक है। लेखिका डॉ. रश्मि ने बड़ी कुशलता से उपयोगी जीवन सूत्रों को प्रस्तुत करते हुए उनमें निहित संदेश भी रेखांकित कर दिया है।
    इन प्रेरक प्रसंगों में मूलतः नैतिक शिक्षा छिपी है। वह नैतिकता जिसके बिना सार्थक, संतुलित और स्वस्थ मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी प्रेरक कथाएं वर्षों से समाज में सत्य, प्रेम, अहिंसा, त्याग और सहनशीलता के बीज बोती रही हैं। पहले घर-परिवार में बड़े बुजुर्ग, जैसे--दादी-दादा, नानी-नाना ऐसी बहुत सारी कहानियां सुनाते थे। बहाने-बहाने से बच्चे उनसे बहुत कुछ ऐसी बातें सीखते थे जो जीवनपर्यंत याद रहती थीं। आज समय बदल गया है। क्या बड़े, क्या बच्चे--सब अपनी-अपनी जगह व्यस्त हैं। प्रेरक प्रसंगों से भरी कहानियां सुनाने का जिम्मा पुस्तकों ने ले लिया है। इस बात का अनुभव पाठक यह पुस्तक पढ़ते हुए करेंगे। सीधी सुगम भाषा और प्रवाहपूर्ण शैली में लिखी ये रचनाएं पाठकों को प्रभावित व प्रेरित करेंगी--ऐसा हमारा विश्वास है।

  • Kokh
    Roshan Premyogi
    300 255

    Item Code: #KGP-287

    Availability: In stock

    कोख
    सन् 1984 से एक किशोरी एक राजा की हवश का शिकार बनती है । उसकी कोख से जन्मे बच्चे के मन से करीब 25 साल बाद अपने सांवले रंग और नयन-नक्श को लेकर संदेह पैदा होता है । सदेह पुख्ता होता है तो वह पिता से लड़ता है अपनी माँ के लिए ।
    उपन्यास में तीन महिला पात्र हैं । इनमें मधुरिमा सिंह ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया । वह पहले मुझे सौतेली मां की तरह लगी, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती  गई, वह धरती की तरह धैर्यवान और समुद्र की तरह गरमाहट से भरपूर मां लगी । आई.ए.एस. प्रभुनाथ सिंह  पहले खलनायक लगते हैं, लेकिन जब कहानी खुलती है तो तमाम पूर्वाग्रह ध्वस्त हो जाते है । शैलजा तो बहुत ही प्यारी और समझदार लड़की है, वह सीमान्त को बिखरने से बचाती है । दरअसल शैलजा खंड-खंड होकर नष्ट होने को तत्पर कुछ लोगों को फिर से एक परिवार बनने के लिए प्रेरित करती है । देखा जाए तो अपने व्यक्तित्व से शैलजा ही इस उपन्यास को बडा बनाती है । उसके प्यार को थोड़ा और स्पेस मिलना चाहिए था ।
    गायत्री देवी का संघर्ष और दंश मन को झकझोर देता है । कहानी अंत तक बांधे रखती है मन को, लेकिन यह थोड़ा अजीब लगता है कि गायत्री देवी के दंश को लेखक ने बेटे के प्यार और नैतिकता के बोझ तले दबा दिया, वैसे यह पुरुषप्रधान समाज की रीति है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar
    Ramdhari Singh Diwakar
    250 225

    Item Code: #KGP-8006

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    रामधारी सिंह दिवाकर

    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिछड़ेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न होता है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भी दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।

    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।

    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार', 'खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानी', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पुल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।

    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 1 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7059

    Availability: In stock

    गुल्लू कर्णपुर गांव के किसान विजयपाल का बेटा है। उसका असली नाम गुलशन है, पर सब उसे प्यार से ‘गुल्लू’ ही कहते हैं। उसकी उम्र है लगभग बारह साल। उसकी एक छोटी बहन है राधा। उसकी उम्र आठ साल है। परंतु वह स्कूल नहीं जाती। कारण, उनके गांव में कोई स्कूल नहीं है। उनकी मां को मरे आठ साल हो गए। राधा को जन्म देने के बाद मां चल बसी थी।
    गुल्लू की मां की मृत्यु के बाद उनके पिता ने पास के गांव की सविता नामक एक महिला से पुनः विवाह कर लिया। सौतेली मां घर में आई तो गुल्लू खुश था। उसे भरोसा था कि उसे और उसकी छोटी बहन को मां का प्यार मिल जाएगा। पर सौतेली मां बहुत कठोर स्वभाव की थी। शुरू में कुछ दिन तो ठीक रहा, पर बाद में उसने बच्चों को पीटना शुरू कर दिया। बात-बात में भला-बुरा कहती। यद्यपि किसान के सामने वह लाड़-प्यार का नाटक करती, पर उसके खेत में जाते ही वह बच्चों को डांटना शुरू कर देती।

    -इसी पुस्तक से
  • 20-Best Stories From Scandinavia (Paperback)
    Prashant Kaushik
    125

    Item Code: #KGP-7201

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics  from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Scandinavian short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new 
    world on each page.

    With stories like Shortshanks, Priest and The Clerk, Golden Castle in the Air, Two Stepsisters, Princess on the Glass Hill, Master-smith, this book is a compilation of 20 famous Scandinavian short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Scandinavia.
  • Rangon Ki Gandh-2
    Govind Mishra
    595 536

    Item Code: #KGP-9161

    Availability: In stock

    रंगों की गंध

    यात्रा जीवन के दूसरे अनुभवों से थोड़े अलग किस्म का अनुभव है। जहां दूसरे अनुभव हमें साफ-साफ जोड़ते-तोड़ते हैं, अपनी अंतरंगता में चरमरा डालते हैं या फिर सूखा-सूखा और दूर-दूर रखते हैं...वहां यात्रा दूसरी रखते हुए भी पास लाती हे, हम अपने खोल से बाहर निकलकर संसार की व्यापकता को छूते होते हैं। व्यापकता की यह छांह दुखी व्यक्ति को टूटने से बचाती है। स्वयं से थोड़ा वैराग्य और बाहर से जुड़ना दोनों एक साथ होता चलता है। मेरे लिए जो इससे बड़ी बात है, वह यह कि यात्रा में हम चलते हैं, हर हाल में चलते रहना-यह मेरी जिद दृढ़तर करती है यात्रा।
    -गोविन्द मिश्र
  • Manohar Shyam Joshi Ke Teen Upanyas
    Manohar Shyam Joshi
    300 270

    Item Code: #KGP-819

    Availability: In stock

    मनोहर श्याम जोशी के तीन उपन्यास

    हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी: ‘कुरु-कुरु स्वाहा’ और ‘कसप’ उपन्यासों से मनोहर श्याम जोशी ने उत्तर आधुनिक शिल्प और चिंतन की प्रतिष्ठा करने का जो सिलसिला शुरू किया था उसी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इस उपन्यास में कथा को ही कथानक बनाते हुए सत्य और गल्प की सीमा-रेखा को संशय के रंग में रँग दिया है।
    ० 
    ट-टा प्रोफेसर: इस उपन्यास में मनोहर श्याम जोशी ने एक साधारण पात्र को महानायक और महामूढ़ के मिथकीय फ्रेम में मढ़ दिखाने वाले अपने कथा-कौशल का प्रभावशाली प्रदर्शन किया है। विशिष्ट बनने के प्रयास में मामूली लोगों की दुनिया में गैर-मामूली ढंग से हास्यास्पद प्रतीत होने वाले मामूली प्रोफेसर ट-टा की हास्यास्पद लगने वाली मामूली प्रेम-कहानी में भी लेखक अमर प्रेम-कहानी के तत्त्व देखता और दिखाता है।
    ० 
    हमज़ाद: मनोहर श्याम जोशी की पिछली कथाकृतियों की ही तरह यह उपन्यास भी कथ्य और शिल्प की दृष्टि से हिंदी कथा-संसार में एक नयी सड़क बनाता है। भाषा की बहुरंगी नोक-पलक पर अपने सर्वविदित अधिकार को भी फिर प्रमाणित करते हुए उन्होंने इस बार घटिया शाइर तख़तराम का भेस बनाकर ऐसा गद्य लिखा है जो निश्चय ही उर्दू को हिंदी की ही शैली मानने वाले हिंदी-प्रेमियों को और देवनागरी में फ़ारसी सही लिखने का आग्रह करने वाले उर्दूपरस्तों को समान रूप से सुखी-दुखी करेगा।
  • Abdul Majeed Ka Chhura
    Krishna Kumar
    180 162

    Item Code: #KGP-1925

    Availability: In stock

    अब्दुल मजीद का छुरा
    हम पुस्तक में कृष्ण कुमार के चुने हुए यात्रा-संस्मरण और रिपोर्ताज शामिल है । इन निबंधों में उनकी सुपरिचित गद्य शैली का एक अलग, बहुत आकर्षक रूप देखने को मिलता । कहानियों और शिक्षा संबंधी लेखों में  अभिव्यक्त होने वाली उनकी विशिष्ट निगाह यात्रा व लचीले फलक पर पाठक के साथ बहुत आत्मीय और उत्साह भरा रिश्ता बनाने में समर्थ होती हैं ।
    कृष्ण कुमार की अपनी रुचियों और दृष्टिक्षमता के अलावा पिछले र्टा-ढ़ाई दशकों के देश-विदेश के अनेक जीवन्त संदर्भों की पहचान भी इन निबंधों में समाई है । बिहार आंदोलन के सिलसिले में लिखे गए तीन रिपोर्ताज आपात्काल के ठीक पूर्व की स्थिति का विहंगम जायजा लेते हैं ।  एकदम हाल में लिखा गया  नर्मदा का संस्मरण भी यहाँ  शामिल किया गया है ।
  • Doosara Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    200 160

    Item Code: #KGP-775

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Chaak Par Charhi Maati
    Baldev Vanshi
    200 180

    Item Code: #KGP-631

    Availability: In stock

    धरती पर माटी का अम्बार, अनेकानेक रूपों में बढ़ता जा रहा है । माटी का विस्तार संवेदना-शून्य, मरी माटी का । पांवों तले बेदर्दी से कुचली-गूंधी माटी/खेतों की/नदी-नालों के बहते पानियों की/कहाँ-कहाँ से आई बहकर / रोते हुए भूखे कण/दुविधा में दुखते क्षण/अकाल के मारे । पानी-पानी जागने/पत्थर-पत्थर सोने के/उनींदे-विदीर्ण सपनों के/कैसा लेंगे रूप? यही वर्तमान इक्कीसवीं सदी की भयसनी, भयंकर त्रासदियों की नियति है । लगता है किन्हीं अलक्ष्य ग्रहों से पीड़ाएँ इस धरती पर मृत्यु, युद्ध, हिंसा, हत्या के रूप में बरस रही हैं या इस धरती की माटी से ही उग-उगकर बाहर निकल रही हैं ।
  • Mere Saakshatkaar : Amrit Lal Nagar
    Amritlal Nagar
    490 417

    Item Code: #KGP-478

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maitreyi Pushpa (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    180

    Item Code: #KGP-431

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : मैत्रेयी पुष्पा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फैसला', 'तुम किसकी हो बिन्नी', 'उज्रदारी', 'छुटकारा', 'गोमा हँसती है', 'बिछुड़े हुए', 'पगला गई है भागवती', 'ताला खुला है पापा', 'रिजक' तथा 'राय प्रवीण' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मैत्रेयी पुष्पा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Face Your Fears (Paperback)
    David Tolin
    245

    Item Code: #KGP-356

    Availability: In stock

    Everyone experiences fear and anxiety, but when fear begins to dominate your life, it can be devastating. You don’t have to live that way. Whether you suffer from moderate anxiety or debilitating fear, a specific phobia, obsessive- compulsive disorder, panic disorder, social anxiety, posttraumatic stress disorder, generalized anxiety disorder, or any other form of anxiety, Face Your Fears will change the way you think about fear and what to do about it.
    This up-to-date, evidence-based, user-friendly self-help guide to beating phobias and over-coming anxieties walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear. In Face Your Fears, celebrated therapist Dr. David Tolin introduces a highly effective and scientifically proven treatment called exposure therapy, in which you gradually confront your fears. Drawing on moving stories from the hundreds of patients he has treated successfully, Dr. Tolin defines the six different types of anxiety and helps you determine which type you need to overcome. He guides you step by step through the gradual exposure process as you learn how to eliminate crutches and safety behaviors, address scary thoughts, and examine the evidence. You’ll learn how to track your progress and you’ll feel yourself taking back control of your life one exposure at a time.
    With Dr. Tolin’s gentle, confident guidance, you will learn to face and beat:
    • Fears of specific situations or objects (such as animals, heights, and blood)
    • Fears of body sensations (including panic attacks and health anxieties)
    • Social and performance fears (fears of social interaction, public speaking, and asserting yourself)
    • Obsessive fears (including fears of contamination and imperfection as well as scary thoughts)
    • Excessive worries (such as worrying about everything and intolerance of uncertainty)
    • Post-traumatic fears (fears of trauma-related situations and painful memories)
    Once you feel better, Dr. Tolin helps you maintain your newfound freedom for years to come. By understanding and preparing for circumstances that might cause your fear to return, you can take practical steps to prevent it from coming back and to overcome it quickly if it does.
    You know what it feels like to live in fear. Now it’s time to rediscover what life feels like without it. Face Your Fears delivers the no-nonsense, scientifically proven tools you need to take control of your life and your future. Dr. Tolin walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear.
  • SWAPNAPAASH
    Manisha Kulshreshtha
    240 216

    Item Code: #KGP-1572

    Availability: In stock

    'स्वप्नपाश' नृत्य और अभिनय से आजीविका-स्तर तक संबद्ध माँ-बाप की संतान गुलनाज फरीबा के मानसिक विदलन और अनोखे सृजनात्मक विकास व उपलब्धियों की कथा है । समकालीन सनसनियों में से एक से शुरु हुई यह कथा हमें एक बालिका, एक किशोरी और एक युवती के उस आरिम अरण्य में ले जाती है जहाँ 'नर्म' और 'गर्म' डिल्युजंस और हैल्युसिनैशरेन का वास्तविक मायालोक है। मायालोक और वास्तविक? जी हाँ, वास्तविक क्योंकि स्वप्न-दु:स्वप्न जिस पर बीतते है उसके लिए कुछ भी 'वर्चुअल' नहीं-न सुकून , न सितम । उस पीडा को सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि खुली दुनिया में जीती-जागती काया की चेतना एक अमोघ पाश में आबद्ध हो जाए और अधिकांश अपने किसी सपने के पीछे भागते नज़र आएँ। पाश में बँधे व्यक्ति की मुक्ति तब तक संभव नहीं होती जब तक कोई और आकर खोल न दे। मगर जब एक सम-अनुभूति-संपन्न खोलने वाले की तलाशा त्रासद हो तो? दोतरफा यातना से गुज़रने के खाद अगर कोई मिले और वह भी हौलै-हौले एक नए पाश में बंध चले तो ? अनोखे रोमांसों से भरी इस कथा में एक नए तरह की रोमांचकता है जो एक ही बैठक में पढ़ जाने के लिए बाध्य कर देती है ।
    गुलनाज़ एक चित्रकार है और वह भी 'प्राडिजी'।  ऐसे  चरित्र का बाहरी और भीतरी संसार कला की चेतना और आलोचनात्मक समझ के बगैर नहीं रचा जा सकता था। कथा में पेंटिंग  की दुनिया के प्रासंगिक नमूने और ज्ञात-अल्पज्ञात नाम ऐसे आते हैं गोया वे रचनाकार के पुराने पड़ोसी हों। आश्चर्य तो तब होता है जब हम नायिका की सृजन-प्रविधि और उसको पेंटिग्स के चमत्कृत (कभी-कभी आतंकित) कर देने वाले विवरण से गुजरते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ मूलत: चित्रकार हैं। उनकी रचनात्मक शोधपरकता का आलम यह है कि वे इसी क्रम में यह वैज्ञानिक तथ्य भी संप्रेषित कर जाती है कि स्किजोफ्रेनिया किसी को ग्रस्त भर करता है, उसे एक व्यक्ति के रूप में पूरी तरह खारिज नहीं करता ।
    स्किजोफ्रेनिया पर केंद्रीय यह उपन्यास ऐसे समय में  आया है जब वैश्वीकरण की अदम्यता और अपरिहार्यता के नगाड़े बज रहे हैं। स्थापित तथ्य है कि वैश्वीकरण अपने दो अनिवार्य घटकों-शहरीकरण और विस्थापन- के द्वारा परिवारिक ढाँचे को ध्वस्त करता है। मनोचिकित्सकीय शोधों के अनुसार शहरीकरण स्किजोफ्रेनिया के होने की दर को बढ़ाता है और पारिवारिक ढाँचे में टूट रोग से मुक्ति में बाधा पहुँचाती है। ध्यातव्य है कि गुलनाज पिछले ढाई दशकों में बने ग्लोबल गाँव की बेटी है । अस्तु, इस कथा को एक गंभीर चेतावनी की तरह भी पढे जाने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन, कला और मनोविज्ञान-मनोचिकित्सा की बारीरिज्यों को सहजता से चित्रित करती समर्थ और प्रवहमान भाया में लिखा यह उपन्यास बाध्यकारी विखंडनों से ग्रस्त समय में हर सजग पाठक के लिए एक अनिवार्य पाठ है ।
  • Panchtantra Ke Natak
    Shri Prasad
    125 113

    Item Code: #KGP-316

    Availability: In stock


  • Ek Aur Chandrakanta (2nd Part)
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-900

    Availability: In stock


  • Sannate Se Muthbher
    Ganga Prasad Vimal
    60 54

    Item Code: #KGP-1884

    Availability: In stock

    'सन्नाटे से मुठभेड़' में गंगाप्रसाद विमल की नई कविताएँ संकलित हैं।
    इन कविताओं में समकालीन कविताओं से जो भिन्नता है , उसे रेखांकित करना आसान है । समकालीन कविताओं की एक धारा में पूर्ववर्ती परम्परा का अनुगमन है तो दूसरी धारा में कथन का चमत्कार । इन दोनों धाराओं में ‘भाषा के नये गणित की वह विरल उपस्थिति नहीं है जो सहजता के गुण से अलंकृत 'सन्नाटे से मुठभेड़' में है ।
    केवल शब्दों के संयोजन में कविता पाना आसान नहीं है । अर्थों के सुनियोजित क्रम में भी उसका अनुभावन दुष्कर है । एक सही काव्य विवेक अर्थों के भीतर उपजाने वाले प्रतिसंसार की प्रतीति में है । बाहर की चिंताओं से उपजने वाले त्रास या प्रताड़ में मामूली किस्म का वास्तव अंकित होता है । बीसवीं शताब्दी के हाहाकार को उन विमानवीय स्वरों में ही पहचाना जा सकता है जिसके लिए समकालीन कविताएँ  वास्तविकता की अदेखी धुरियों को अनावृत करने में लगी हैं । बल्कि कहना होगा, अर्थवान कविताएँ अपने समकाल से इसी मायने में विग्रहरत्त है कि वे आद्य जिज्ञासाओं से लेकर वर्तमान की अन्तर्धाराओँ में हस्तक्षेप करती है ।
  • Khule Gagan Ke Lal Sitare (Paperback)
    Madhu Kankria
    120

    Item Code: #KGP-222

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Sharad Joshi (Paperback)
    Sharad Joshi
    225

    Item Code: #KGP-7225

    Availability: In stock

    शरद जोशी हिंदी व्यंग्य के सार्वकालिक महान् रचनाकार हैं। विसंगति के ड्डोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों व लोकप्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धातिक व व्यावहारिक अंतर्विरोधें पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार व अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। उनका एक वाक्य है—‘प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीबी की पीड़ा उससे भी गहरी होती है।’ यही विरल यथार्थबोध है जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है। वे महत्त्वपूर्ण संदर्भों के व्यंग्य लेखक हैं। साहित्य, पत्रकारिता, टी. वी. और सिनेमा में उनके लेखन ने कीर्तिमान बनाए हैं। ‘मासूमियत में निहित मर्म और मुस्कान’ शरद जोशी के लेखन का मूल मंत्रा है। व्यंग्य समय में शरद जोशी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
  • Tukara-Tukara Waqt
    Shashi Sahgal
    60 54

    Item Code: #KGP-1866

    Availability: In stock

    टुकड़ा-टुकड़ा वक्त
    शशि सहगल की कविताओं के केन्द्रीय स्वर को जानने के लिए उनकी एक कविता 'असर' पर नज़र डाले :
    झाड़ा-पोंछा
    दिखने में साफ
    कलफ लगी साडी-सा
    कड़क व्यक्तित्व ओढ
    बाहर जाना अच्छा लगता है ।

    ढ़ीले-ढाले वजूद के
    घर के पायदान पर ही छोड़
    हीन भावना से उबरती हुई देह
    दो कदम बाहर रखते ही
    आत्मविश्वास से भर उठती है
    कलफ़ का असर
    कुछ ऐसा ही होता है ।

    शशि जी की कविताएँ घर के अन्दर की कविताएँ जरूर है, लेकिन वे घर में बंद नहीं हैं और ना ही घर और परिवार के संबंध मात्र ही उनकी कविताओं की सीमा हैं । वे घर से बाहर भी झाँकती है और अपने से बाहर भी । अपने भीतर और बाहर तथा घर के अन्दर और घर से बाहर के द्वन्द्वात्मक रिश्तों की वजह से आई दरारें उनकी कविताओं का विषय बनती हैं । उनके पहले कविता-संग्रह में भी इस संवेदन के पहचान बड़े गहरे स्तर पर रही है । इस कविता-संग्रह में यह संवेदन और भी गहराया है । इसमें कहीं मूल्य तलाशने की उत्कटता भी है, 'बाजार' होते रिश्तों में कहीं खुद को बचाकर रखने की केशिश भी । यही इन कविताओं के शक्ति है ।

  • Bharatvanshi : Bhasha Evam Sanskriti
    Pushpita Awasthi
    450 405

    Item Code: #KGP-708

    Availability: In stock

    डॉ.. पुष्पिता अवस्थी की किताब ‘भारतवंशी: भाषा एवं संस्कृति’ प्रत्यक्ष अनुभव के आलोक में रची ऐसी कृति है जिसमें रचनाकार की संवेदना का परिसर व्यापक है। भारतवंशियों के इतिहास का अध्ययन यहां धर्म, दर्शन, भाषा, संस्कृति और कलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। इतिहास की जड़ों में भारत से निर्वासित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों, यथा--सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, मॉरीशस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे। 
    डॉ. अवस्थी ने इन्हीं पर दशकों तक काम किया। यह काम से अधिक राग है, प्रतिबद्ध समर्पण है। इसमें प्रवासी भारतीयों के इलाकों की भी छवियां हैं। मूलतः यह कृति उन भारतवंशियों के अंधेरों को रोशनी में लाती है जो बहुत हद तक अलक्षित रहा। 
    भारतवंशियों की वैश्विक भारतीयता को सच्ची पहचान दिलाने में एक ऐतिहासिक पहल की तरह यह किताब अपनी मुकम्मल जगह बनाती है। संस्कृति और भाषा का यह गहन-गंभीर अध्ययन कदाचित् पहली बार वैज्ञानिक दृष्टि से सामने आ रहा है। इसमें सृजनशील लेखक और इतिहासविद् की अनूठी जुगलबंदी है। 
    डॉ. अवस्थी ने भारतवंशियों की अलग-अलग धर्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और जातीय पहचानों में हिंदुस्तानियत की शिनाख्त करते हुए उन तत्त्वों का अन्वेषण किया है जो उन्हें भारतवंशी होने के सांस्कृतिक स्वाभिमान में एकसूत्र करते हैं। यह एकसूत्रता संस्कृति और भाषा की अंतर्तहों में किस तरह अंतर्भुक्त है, इसे अकेले दम पर लेखक ने घूम-घूमकर चिन्हित किया है। वे भारतीय आर्यों और पारसीक आर्यों के सांस्कृतिक और भाषायी इतिहास के रास्तों से वैचारिक यात्रा करती हैं और मोटे तौर पर 19वीं से 20वीं सदी के बीच बनी संस्कृति और भाषा की जड़ों को टटोलकर अपनी स्थापनाओं के लिए रास्ता निर्मित करती हैं। इस प्रक्रिया में वे यूरोपीय उपनिवेशों में भारतवंशियों के तत्कालीन दारुण इतिहास, यातनाओं, यंत्राणाओं के वास्तविक चित्रों को क्रमशः सजीव करती हैं। 
    डॉ. अवस्थी ने संस्कृति और भाषा को उस संजीवनी के रूप में खोजा है जिनके कारण ही भारतवंशियों का जीवन है। ये दोनों उनके प्राण तत्त्व बने हुए हैं। इन्हीं दो तत्त्वों से विश्व में उनकी भारतीय अस्मिता का स्थापन हुआ। यह अस्मिता उन भारतीयों से अलग है जो पिछले 30-40 सालों में प्रवास पर पहुंचे। प्रवासी और अप्रवासी के भेद को, भ्रम को अनावृत्त करती यह किताब एक उपलब्धिकी तरह सामने है।
    भूमंडलीकरण के भयावह आक्रमण के दौर में जबकि संस्कृतियों और भाषाओं, बोलियों और लिपियों को बचाना कठिन होता जा रहा है तब यह एक किताब भाषा एवं संस्कृति को बचाने का मेटाफर रचती है। यही इसका मानीख़ेज हासिल है।
  • Betava Bahati Rahee (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    95

    Item Code: #KGP-7045

    Availability: In stock

    बेतवा बहती रही
    एक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी !
    नही-नहीं, यह अनेक उर्वशियों, अनेक मीराओं, अनेक बेतवाओं की कहानी है ।
    बेतवा के किनारे जंगल की तरह उगी मैली बस्तियों । भाग्य पर भरोसा रखने वाले दीन-हीन किसान । शोषण के सतत प्रवाह में डूबा समाज । एक अनोखा समाज, अनेक प्रश्नों, प्रश्नचिन्हों से घिरा ।
    प्राचीन रूढियां है जहाँ सनातन । अंधविश्वास हैं अंतहीन । अशिक्षा का गहरा अंधियारा । शताब्दियों से चली आ रही अमानवीय यंत्रणाएँ । फिर जीने के लिए कोई किंचित ठौर खोजे भी तो कहाँ ! हाँ, इन अंधेरी खोहों और खाइयों में कभी-कभी मुट्ठी-भर किरणों के प्रतिबिंब का अहसास भी कितना कुछ नहीं दे जाता ।
    उर्वशी का दु:ख है कि वह उर्वशी है । साधारण में भी असाधारण । इसीलिए सब तरह से अभिशप्त रही । तिल-तिल मिटती रही चुपचाप ।
    प्रेम, वासना, हिंसा, घृणा से भरी एक हृदयद्रावक अछूती कहानी ! पूरे एक अंचल को व्यथा-कथा ।
  • Aranya-Tantra
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-659

    Availability: In stock


  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-637

    Availability: In stock

    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
  • Hindu Sanskars
    M.L. Ahuja
    395 356

    Item Code: #KGP-768

    Availability: In stock

    The SANSKARAS are rites of passage finding varied acceptance among religious adherents of Hinduism, Jainism and some schools of thought in Buddhism. Hinduism prescribes norms to groom youngsters with values. The values as reflected in sanskaras facilitate the process of adaptation of the behaviour patterns of our children and the process of their socialization. These sanskaras should inculcate in our children the norms to purify, refine and adorn their inner conscience.
    The book, Hindu Sanskaras Sacraments and Rituals in Life’s Journey, is an exposition of the principles enunciated in the Hindu scriptures. This profusely illustrated book provides guidelines for young boys and girls on the threshold of conjugal life. It provides them lucid explanation of sanskaras and human life, Hindu beliefs and rituals, essence of Hindu sanskaras, the Vedic and astrological concepts of garbadharan or conception of a child, naming of the baby, baby's first tonsure, importance of sacred thread ceremony, the process of conducting puja or veneration, the significance of idol worship, The underlying purpose of using bindi or tilak, the ritual of observing Karva Chaauth by married women  to pray for the longevity of their husbands, funeral rites and the system of ancestral worship yet form an essential ingredient of the book. The book also provides explanation of rituals like parikarma, ringing of bell, hovering of hands on lighted lamp after concluding prayer, the importance of 108 and breaking of coconut. 
    It is a useful book for all those wishing to know Indian culture, traditions and mythology. It needs to be read by parents for inculcating values among their children, and young boys and girls to carve an ideal approach in life.
  • Neatherland Diary
    Pushpita Awasthi
    600 540

    Item Code: #KGP-9349

    Availability: In stock

    वैश्विक एकीकरण की दौड़ में आत्मनिष्ठ और व्यक्तिवादी होते जा रहे निष्ठुर समय में नीदरलैंड देश ने सरलता और सहजता की ऐसी आत्मीय शैली विकसित की है जिसमें जीवन की सरसता का स्वाद मिलता है। विश्व में पसर रहे अमानवीय सांस्कृतिक प्रदूषण के भयानक समय में भी कई देशों की विभिन्न संस्कृतियों को साधे हुए यह देश किस तरह से अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए और बचाए हुए है। इसकी झलक भी पुस्तक से उझकती रहती है।
    ‘नीदरलैंड-डायरी’ पुस्तक से गुजरते हुए महसूस होता है कि देश ने ट्यूलिप फूलों की व्यावसायिक किसनई से आत्मनिर्भर होकर फूलों की खेती के नवीन प्रतिमान स्थापित किए हैं। सड़कों के किनारे गायों, भेड़ों और घोड़ों के चरागाहों से इस देश के ग्रामीण चरित्र की सरलता का आभास होता है। वाहनों के आधुनिक उपभोक्तावादी युग में साइकिलों को, आम से खास नागरिकों के वाहन के रूप में पहचान दिलाकर पर्यावरण संरक्षित करने की आचरण संहिता की जानकारी भी दी है।
    एक ओर यदि चीज (कास) मार्केट का व्यवसाय स्थापित करने वाले अलकमार शहर में चीज बाजार के साप्ताहिक अनुष्ठान का वैश्विक आकर्षण के रूप में उल्लेख है तो दूसरी ओर खेलों की संस्कृति रचाने वाले देश में फुटबाल खेल के संदर्भ में रोमांचकारी जानकारी है जिससे लेखिका के फुटबाल प्रेम और फुटबाल ज्ञान की गहराई का अनुमान होता है।
    पहली बार, हिंदी भाषा में नीदरलैंड देश पर इतनी जीवंत पुस्तक का प्रकाशित होना ही सौभाग्य की बात है। प्रो. पुष्पिता अवस्थी ने नीदरलैंड देश पर इतनी आत्मीयता से लिखकर इस देश के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव की सार्थक पहल की है। देश की सामाजिक संस्कृति की संवेदनशील बारीकियों को बहुत सूक्ष्मता से उजागर किया है कि देश के तकनीकी उत्थान और भौतिकीकरण के बावजूद देश में बसे यूरोपीय ग्रामीणता के सोंधेपन की संस्कृति का अहसास होता है और महसूस होता है कि भूमंडलीकरण और पर्यावरण संरक्षण का यही वास्तविक तरीका है जिससे मनुष्यता के गंतव्य तक पहुंचा जा सकता है।
    —प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
    अध्यक्ष साहित्य अकादमी
  • 1128 Mein Crime 27
    C. J. Thomas
    100

    Item Code: #KGP-1817

    Availability: In stock

    1128 में क्राइम 27
    '1128 में क्राइम 27' थॉमस का दूसरा नाटक है । उसकी समस्या सार्वदेशीय है । उन्होंने मौत को एक विशेष प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है । नाटक में जिंदगी और मृत्यु के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है । कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सिनिक है, क्योंकि उनका यह नाटक सिनिसिज्म की सृष्टि है।... 
    तत्कालीन रंगमंच पर जमी हुई हास्य रूढियों के प्रति विद्रोह, प्रबोधन की शक्ति पर विश्वास रखकर संसार का उद्धार करने की मूर्खता आदि पर भी उन्होंने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। असली जिंदगी और जीवन की व्याख्या करने वाले नाटक टेकनीक के वैभवों क द्वारा उनकी असली भिन्नताओं को उसी तरह रहने देकर रंगमंच पर प्रस्तुत करने का उनका कौशल आश्चर्यजनक ही है। जिंदगी मिथ्या है, यह दार्शनिक आशय दर्द-भरी हँसी के साथ वे मंच पर प्रस्तुत करते हैं। नाटक चलाने वाला और नाटक की व्याख्या करने वाला गुरु एक तरफ़, नाटक खेलने वाले, नेपथ्य, प्रोप्टर, स्टेज मैनेजर आदि का एक ढेर दूसरी तरफ, अखबार का दफ्तर, संपादक, चक्की आदि का एक ढेर तीसरी तरफ।  इन सबके सम्मुख गुरु के लिए जब चाहे तब इशारा कर सकने वाला एक प्रेक्षक समूह । इस प्रकार नाटक और जिंदगी को उनके असली रूप में अपने-अपने व्यक्तित्व से युक्त एक ही स्टेज पर एक साथ इस नाटक में प्रस्तुत करता है । नाटकीय प्रभाव एवं आंतरिक संघर्षों की दृष्टि से यह नाटक अत्यंत सफल है।
  • Ai Ganga Tum Bahati Ho Kyoon
    Vivek Mishra
    180 162

    Item Code: #KGP-507

    Availability: In stock

    ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ’ युवा कथाकार विवेक मिश्र का तीसरा कहानी-संग्रह है। ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’ और ‘पार उतरना धीरे से’ कहानी संग्रहों से विवेक ने पाठकों के बीच प्रियता व प्रामाणिकता अर्जित की है। उन्होंने बहुत शाइस्तगी और रचनात्मक विनम्रता के साथ यह सिद्ध किया है कि आसपास पसरा यथार्थ हर रचनाकार के लिए समान नहीं होता। यह रचनाकार पर है कि वह ‘दिखते’ के पीछे छिपे जीवन सत्य और ‘दिखते’ में वास्तविक को कितना देख-समझ पाता है। विवेक वास्तविक और प्रायोजित का अंतर समझने वाले समर्थ कहानीकार हैं। यही कारण है कि आज जब संपादकों, संगठनों, प्रायोजकों के कंधें पर बेतालवत् सवार कुछ कहानीकार ठस व ठूँठ हो रहे हैं तब विवेक मिश्र की कहानियाँ अपना महत्त्व असंदिग्ध रूप से प्रकाशित कर रही हैं।
    विवेक मिश्र सुस्पष्ट सामाजिक सरोकारों से लैस लेखक हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ साबित करती हैं कि परिवार में बद्धमूल अप्रासंगिक धारणाओं से लेकर सामाजिक परंपराओं में घुसपैठ करती अमानवीय प्रवृत्तियों तक लेखक की पैनी नजर है। परिवेश विवेक के यहाँ एक पात्र सरीखा है। मैत्रेयी पुष्पा के बाद बुंदेलखंड का जीवन-जगत् उनके यहाँ सर्जनात्मक संदर्भ प्राप्त करता है। साथ ही, वे महानगरों की संधियाँ-दुरभिसंधियाँ भी परखते हैं।
    संग्रह में शामिल ‘घड़ा’, ‘चोरजेब’, ‘निर्भया नहीं मिली’ तथा ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं’ सरीखी कहानियाँ रेखांकित करती हैं कि लेखक मन के अतल में व्याप्त ध्वनियों को सुनने की अद्भुत क्षमता रखता है। उसके पास अर्थ को अनेक स्तरों पर वहन करने वाली भाषा है, जैसे--‘पनरबा कस्बे के किसी कागज को माचिस की तीली से जलाकर देखिएगा। शायद उससे उठती लपटों में आपको विश्रांत अनल की कुछ कहानियाँ मिलें।’ यह कहानी संग्रह वर्तमान हिंदी कहानी में मूल्यवान उपस्थिति की तरह स्वागत योग्य है।
  • Dushyant Ke Jaane Par Doston Ki Yadein
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-771

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mannu Bhandari
    Mannu Bhandari
    220 198

    Item Code: #KGP-845

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मन्नू भंडारी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अकेली', 'मजबूरी', 'तीसरा आदमी', 'नई नौकरी', 'असामयिक मृत्यु', 'बन्द दराजों का साथ', 'क्षय', 'तीसरा हिस्सा', 'त्रिशंकु' तथा 'शायद' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मन्नू भंडारी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Katha Aur Samay Ka Sach
    Nirmla Jain
    325 293

    Item Code: #KGP-776

    Availability: In stock

    हिंदी कथा साहित्य में ऐसी अनेक रचनाएं हैं जिन्होंने रचनात्मक उत्कर्ष के कीर्तिमान निर्मित किए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह विचित्र लग सकता है कि आज तक कथा आलोचना के सर्वमान्य प्रतिमान निर्मित नहीं हो सके। अनेक वाचिक वैभव संपन्न और विमर्श निष्णात आचार्यों ने असहमति व्यक्त करते हुए भी कविता के प्रचलित प्रतिमानों से ही प्रायः कथा साहित्य का मूल्यांकन किया। इस दिशा में मौलिक कार्य करने का श्रेय जिन आलोचकों को दिया जा सकता है उनमें डा. निर्मला जैन का नाम अग्रणी है। निर्मला जैन ने साहित्य का अनुशासित अध्ययन करते हुए कथा रचना के चित्त व चरित्र को परखने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। आज उनकी प्रतिष्ठा गंभीर, तर्कसंपन्न, आधुनिक व प्रखर आलोचक के रूप में है। ‘कथा और समय का सच’ पुस्तक इस संदर्भ में रेखांकित करने योग्य है।
    यह गौरतलब है कि रचनाकार पर बेजा प्रश्न उठाने के स्थान पर डा. जैन आलोचना के संकट पर बात करते हुए ‘आलोचक का दुःख: बतौर भूमिका’ में लिखती हैं, ‘जाहिर है संकट आलोचक के सामने भी है–विज्ञापनधर्मी भाषिक छल और पैंतरेबाजी से बचते हुए–सही-गलत, अच्छे-बुरे, वास्तविक छद्म, महत्त्वपूर्ण-महत्त्वहीन, जरूरी-गैरजरूरी के बीच अंतर करने का विवेक, और चाहिए मूल्यपरक निर्णय की अभिव्यक्ति का साहस। ऐसे निर्णय से बचने की कोशिश आलोचकीय पाखंड के अलावा कुछ नहीं हो सकती।’
    पुस्तक में प्रेमचंद, निराला, जैनेन्द्र की कहानियों के अतिरिक्त अनेक चर्चित उपन्यासों पर डा. निर्मला जैन ने विस्तृत विचार किया है। महिला कथाकारों के बहाने उत्तरशती के उपन्यासों पर भी चर्चा है। यह पुस्तक कृति का अंतरंग खोलने के साथ पाठक में आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करती है। महत्त्वपूर्ण व मूल्यवान पुस्तक।
  • Jangli-Mangli
    Chang Tain-Pi
    180 162

    Item Code: #KGP-409

    Availability: In stock

    1963 में मैंने चांग तइन-यी के बाल-उपन्यास ‘करामाती कद्दू’ का रूपांतर किया था, जो धारावाहिक रूप से ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुआ।
    चांग तइन-यी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह बहुत ही सरल और रोचक ढंग से कहानी कहते हैं, जो मनोरंजक होने के साथ उपदेशपरक ही नहीं, कलात्मक ढंग से अच्छा रास्ता दिखाती है।
    ‘करामाती कद्दू’ की लोकप्रियता देखकर ही मैंने 1967 में लेखक की एक और रचना ‘जंगली-मंगली’ शीर्षक से रूपांतकर किया है। पाठकों की सुविधा के लिए मैंने कहानी के पात्रों और वातावरण को भारतीय रूप देना उचित समझा।
    चांग तइन-यी का जन्म 1906 में हुआ था। पच्चीस वर्ष की अवस्था में उन्होंने यह कहानी लिखी थी। निर्धनता के कारण उन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यहां तक कि पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी। निर्वाह के लिए उन्होंने तरह-तरह की नौकरियां कीं। कभी-कभी दफ्तर में क्लर्की तो कभी अध्यापन। संघर्ष करते हुए भी उन्होंने लिखना सारी रखा और कई पुस्तकों की रचना की। चांग तइन-यी की बालोपयोगी और किशोरापेयोगी रचनाएं विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
    —द्रोणवीर कोहली
  • Adhunantik Bangla Kavita
    Om Nishchal
    300 270

    Item Code: #KGP-9013

    Availability: In stock

    अधुनांतिक बाँग्ला कविता
    हमारे समय में यदि आधुनिकता का बोलबाला रहा है तो आज उत्तर-आधुनिकता का । यह जानते हुए कि उत्तर-आधुनिकता उत्तर-औपनिवेशिक सोच का ही एक दूसरा नाम है, बुद्धिजीवियों ने इसके प्रत्याख्यान का कोई ऐसा सर्जनात्मक रुख नहीं अपनाया, जिससे भारतीय परिस्थितियों और पारिस्थितिकी के अनुरूप साहित्य का सृजन हो सके और हमारे समय की बहुलतावादी मानवीय सभ्यता केंद्रीय जगह हासिल कर सके । अभी तक न केवल बाँग्ला में, बल्कि सभी भाषाओं में महानगर-केंद्रीत और सत्ता-विमर्शों में भागीदार लेखको का वर्चस्व रहा है जिसके चलते लेखकों-कवियों की एक पीढी साहित्य में वैसे ही उपेक्षित रही है, जैसे आज भी हमारे विराट भौगोलिक क्षेत्रफल में साँस लेने वाली कई आवाजें अनसुनी हैं । 
    ऐसे कवियों की कविताओं को बाँग्ला और अंग्रेजी में प्रकाशित करने की पहल समीर रायचौधुरी व मलय रायचौधुरी न पिछले कुछ वर्षों से की है । पोस्ट माडर्न पोयट्री-2001 व पोस्ट माडर्न पोयट्री- 2003 के अलावा पोस्ट माडर्न बाँग्ला शार्ट स्टोरीज के संचयन भी उनकी इन्हीं कोशिशों का परिणाम है । मलय रायचौधुरी के भूखी पीढी के आंदोलन को हिंदी कवित्ता के पाठक भूले न होंगे । हिंदी में अधुनांतिक (उत्तर-आधुनिक) बाँग्ला कविता का संचयन पश्चिम बंगाल की लगभग छह सौ लघु पत्रिकाओं से किया गया प्रतिनिधिक चयन है। इनमें सच्चे अर्थों में आधुनिकता से मुक्त अधुनांतिक अवधारणा नींव रखी गई है ।  पहली बार हम देख पाते हैं कि बाँग्ला की मुख्य धारा के कवियों से अलग कवियों की एक बडी दुनिया है जो पूरे बंगाल में छिटकी हुई है और अपनी सांस्कृतिक विरासत और बहुविध जीवन-मूल्यों को एक नई पहचान दे रही है ।
    आज जबकि हमारी काव्यरूचियाँ पश्चिमी मानदंडों से परिचालित हैं आलोचना के मानदंड भी पश्चिमी और औपनिवेशिक हैं, संपादकों की दृष्टि में अधुनांतिक बाँग्ला कविता वैश्विक संवेदना की अभिव्यक्ति है । खंड-खंड और भेदवादी वृष्टि से देखे जाने के विपरीत मनुष्य ने सदैव समुचे विश्व को एक कविता के रूप में देखा है ।  इसलिए औपनिवेशिकता के साथ आयातित आधुनिकता ने साहित्य के लिए जो खाँचे तैयार किए, अधुनांतिक अवधारणा के कवियों को वे खांचे स्वीकार्य नहीं हैँ । वे सहज ही पारिस्थितिकी से अपना सघन रिश्ता बनाने वाले बहुलतावाटी, सह-अस्तित्ववादी तथा साहित्य में भी लेबल प्लेइंग फील्ड के हिमायती ऐसे कवि हैं, जिनकी आवाजें आज अनसुनी नहीं हैं । शिल्पगत चकाचौंध से अलग किन्तु अपने कथ्य में मार्मिक आधुनिक बाँग्ला कविता का यह चयन महत्त्वपूर्ण है ।

  • Jalti Chhaya
    Prabha Saxena
    50 45

    Item Code: #KGP-9068

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan (Paperback)
    Usha Kiran Khan
    140

    Item Code: #KGP-504

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उषाकिरण खान
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Paanch Absord Upanyas
    Narendra Kohli
    80 72

    Item Code: #KGP-2084

    Availability: In stock

    पाँच एब्सर्ड उपन्यास
    जब एक उपन्यासकार की कलम, कार्टूनिस्ट की दृष्टि पा जाती है तो एब्सर्ड उपन्यासों की रचना होती है । नरेन्द्र कोहली की इन पाँच रचनाओं में आपको उपन्यास का गठन, व्यंग्य-चित्रकार की पैनी दृष्टि, एक अनोखा अप्रस्तुत विधान, तीखा-करारा व्यंग्य तथा समकालीन जीवन की कुतर्कशीलता अपनी समग्रता में उपलब्ध होगी । सर्वथा नवीन कथ्य, शिल्प, शैली और विधा ! व्यंग्य-लेखन का एक सर्वथा नवीन आयाम ! इन रचनाओं में आपको व्यंग्य अपनी संपूर्ण गंभीरता में मिलेगा और आप समझ पाएँगे कि व्यंग्य हँसाने के साथ-साथ रुला भी सकता है, घावों को कुरेद भी सकता है और व्यक्ति को उसके आक्रोश का जीवन्त साक्षात्कार भी करा सकता है ।
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 1 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    195

    Item Code: #KGP-295

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (1)
    (व्यक्तित्व और परिवार)
    एक नहीं अनेक गांधी हैं--गांधी के  अकेले एक व्यक्तित्व से समाए हुए ।
    गत पूरी एक शताब्दी गांधी की शताब्दी थी । इतना महान् व्यक्तित्व संभवत: विश्व में कोई दूसरा नहीँ था । उनके अवसान के पश्चात उनका विशाल स्वरूप धुँधलाया नहीं, बल्कि और प्रखर, और अधिक प्रासंगिक होकर उभरा । अतीत के गांधी की अपेक्षा आज का गांधी अधिक व्यापक एव विराट, है ।  हिंसा की आग में झुलसते, आज के इस भयाक्रांत वानावरण में गांधी की आवश्यकता अधिक गहराई से अनुभव की जा रही है ।
    यों तो अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है गांधी जी पर, उनके जीवन-दर्शन पर, परंतु बहन सुमित्रा जी ने अपने पितामह का जिस रूप में रेखांकित किया है, वह उन सबसे भिन्न है । बापू के जीवन की पारदर्शिता उसमें झलके बिना नहीं रहती । सुपित्रा जी ने नि:स्पृह एवं निष्पक्ष भाव स सारी स्थितियों का गहन विवेचन किया है । अपने पितामह को भी क्षमा नहीं किया ।
    इस संपूर्ण कृति में हरिलाल भाई वाला प्रसंग सबसे करुण एवं दारुण है--दिल की दहला देने वाला । तब बापू मात्र बापू न रहकर एक संवेदनशून्य पिता की भूमिका में दीखते हैं । हरिलाल भाई सारा गरल चुपचाप पी जाते हैं, पर किसी से कोई शिकायत नहीं । इतना प्रखर, मेधावी, आज्ञाकारी सुपुत्र पिता की उपेक्षा का शिकार बनकर अपनी आहुति दे टेना है । तब गांधी से बडा गांधी लगता है वह--एक निपट मानव के रूप में । अपनी परदादी माँ 'पुतली माँ' पर भी सुपित्रा जी न विस्तार स लिखकर 'गांधी-परिवार' की इस पुण्य-गाथा को एक युग-गाथा का नया आयाम प्रदान किया है । संयुक्त परिवार में पद्म-पत्रवत् रहने की उनकी तपश्चर्या कितनी प्रेरक थी ! इस कृति में ऐसा बहुत कुछ  जो गंभीरता के साथ सोचने के लिए विवश करता है ।  सुमित्रा जी की यह रचना इसलिए अनेक अर्थों में अद्वितीय बन गई है ।
    --हिमाशु जोशी
    13 अगस्त, 2009
  • Bengal Shaili Ki Chitrakala
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    400 360

    Item Code: #KGP-9044

    Availability: In stock

    भारत दो चित्रकला शैलियों में बंगाल चित्रकला शैली को एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है । उसका यह वेश्मिष्ट्रय विगत शती के बंगाल रिनेसां' अर्थात् माक्षतीय नवजागरण से उसकं संबद्ध होने के कारण भी है । बंगाल शैली देशज निजत्व को पल्लवित और विकसित करनेवाली शैली तो थी ही लेकिन, उसमें ऐसे विरोधाभास भी थे जिससे उसकं समसामयिक मूल्यद्देकन ने दो परस्पर विरोधी अभिमत सामने आये। जहा इस शेली के समर्थक कहय-समीक्षकों ने भावनात्मक लगाव रखते हुए इसे अतिश्योक्तिपूर्ण महत्व दिया यहीं दूसरी और अन्य कला-समीक्षकों ने वस्तुनिष्ठ और दिष्टलेषणमृत्मक मूल्यग्रेकन कर इसकी अनेकानेक कमियों व खामियों को भी उजागर जिया, साथ ही कुछ गंभीर आरोप भी लगाये और इसकी उपलब्धियों के सामने ग्रहन-चिहन खडे किये। आज यह शैली इतिहास का विषय बन चुकी है अत: इस अध्ययन में प्रस्तुत है उसका सर्वागीण सष्टमुक विवेचन, जो अनेक अनछुए पहलुओं को उजागर यता है ।
  • Ukaav
    Kshitij Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-765

    Availability: In stock

    उकाव
    'उकाव' पहाडी जिंदगी की गाथा है। एक मायने में उपन्यास की कथा पुरुष-नियंत्रण समाज द्वारा नारी पर थोपे गए उत्पीडक नियमों की भर्त्सना है । नैतिकता के इकहरे मानदंडों के कारण किन्हीं कमजोर क्षणों में हुई एक तथाकथित 'गलती' के प्रतिकार में श्यामा किस तरह सारा जीवन होम कर देती है, लेखक ने इस संघर्ष को इतने मार्मिक और प्रामाणिक ढंग से चित्रित किया है कि यह पहाडी औरत की जिंदगी का ही दस्तावेज बन गया है । कुमाऊँ के पहाडों का ग्रामीण जीवन जितनी अंतरंगता  और विविधता में इस उपन्यास में चित्रित हुआ है, यह बरबस रेणु और शैलेश मटियानी की याद दिला देता है । संभवत: किसी रचना का आंचलिक बनना इस बात पर निर्भर है कि वह किसी स्थान विशेष के लोगों का चित्रण करते हुए यहीं की भौगोलिक ही नहीं वक्ति सांस्कृतिक और मूल्यगत विशिष्टताओं को कितनी उत्कटता व सघनता से अभिव्यक्त करती है । इस संदर्भ में देखें तो 'उकाव' निश्चित ही एक आंचलिक रचना है, पर तब दुनिया की कौन-प्ती ऐसी रचना है जो इस बात से न पहचानी जाती हो कि उसमें कितनी गहराई और मजबूती से अपने समय और स्थान की पहचान छिपी है ?
    सही मायनों में देखा जाए तो प्रेम, प्रतिकार, बलिदान और संघर्ष की यह गाथा अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई पहाडी औरत के ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय नारी के बहुआयामी व विराट, स्वरूप का दर्शन कराती है । और यही लेखक की सृजनात्मकता की कसौटी है ।
    यह इत्तफाक नहीं है कि क्षितिज शर्मा लेखन की उस परंपरा के अधिक निकट पड़ते है जिसका स्रोत शैलेश मटियानी है । मटियानी जी की रचनाओं में पहाडी जीवन की झाँकी सबसे ज्यादा वास्तविक और प्रामाणिक ढंग से नजर जाती है । क्षितिज शर्मा उस परंपरा को आगे बताते हुए पहाडी गाँवों के संघर्षमय जीवन को जिस तरह से चित्रित करते है, वह मुझ जैसे तथाकथित पहाडियों के लिए भी एक 'रिबिलेशना से कम नहीं है ।
    -पंकज बिष्ट
  • Kahani Samgra : Govind Mishra (3rd Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1583

    Availability: In stock


  • Sant Ka Divya Sansaar
    Deep Shikha Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-1870

    Availability: In stock

    संत का दिव्य संसार
    पारलौकिक जगत् में विचरण करते भक्तों ने देखा-एक हरा-भरा प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त पर्वत-शिखर, जिस पर सूर्य-रश्मियां बिखरी पडी थीं, स्निग्ध पवन की स्निग्धता से विभोर पर्वत-शिखर परम शति में डूबा हुआ था ।
    उस शांत, एकांत, मानवीय पदचापों एवं कोलाहल से पूर्णत: मुक्त पर्वत के उत्तुंग शिखर पर एक जर्जर शरीर- धारी तपस्वी तपस्यारत था । स्वच्छ-सुगंधित-शीतल पवन उन्मुक्त हो बह रहा था । अवरोधरहित पवन तपस्वी के शरीर से टकरा तपस्वी को अपनी प्रशंसा करने के लिए बाध्य-सा करता प्रतीत हो रहा था ।
    किंतु, तपस्वी पवन के प्रफुल्लकारी स्पर्श से पूर्णत: प्रभावहीन था । उस पर पवन की स्निग्धता का, उसकी कोमलता का, उसकी प्रफुल्लता का और उसकी शीतलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था । वह पूर्णतया नि:संग था, तटस्थ था, निर्विकार था, अचल था, स्थिर था ।
    सूर्य-रशिमयों की गरिमामयी प्रखरता भी तपस्वी में किसी भी प्रकार का विक्षोभ उत्पन्न करने में असफल-सी जान पड़ रही थी । तपस्वी अविचल समाधिस्थ बैठा हुआ था ।
    तपस्वी की स्थिर अवस्था, तपस्वी के सैकडों वर्षों से निरंतर एक ही आसन में बैठे रहने का संकेत-सी करती प्रतीत हो रही थी । संभवत: तपस्वी सदियों से एक ही मुद्रा में, एक ही आसन में, एक ही स्थान पर बैठा प्रभु से एकात्म की स्थापना का प्रयास कर रहा था ।
    उसके मुखमंडल से झरती अपूर्व शांति उसके प्रयास की सफलता का जयघोष-सी करती प्रतीत हो रही थी । कदाचित् तपस्वी अपने प्रयास में सफल हो चुका था । तभी तो उसके मुखमंडल को चारों ओर से एक विशिष्ट आभा ने घेर रखा था । वह जितेन्द्रिय-सा लग रहा था ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Robin Shaw Pushp
    Robin Shaw Pushp
    150 135

    Item Code: #KGP-2081

    Availability: In stock


  • Haashiye Per
    Raj Budhiraja
    100 90

    Item Code: #KGP-1963

    Availability: In stock

    हाशिये यर
    सुपरिचिन संवेदनशील लेखिका राज़ बुद्धिराजा की नवीन कृति है 'हाशिये पर' । अत्याधुनिक भारतीय प्तमाज़ ने जिस प्राचीन संस्कृति को हाशिये पर ला बैठाया है उसे  लेखिका ने शब्दों के मोतियों में पिरोकर भव्य रूप प्रदान किया है । लेखिका को पैनी और सूक्ष्म दृष्टि छोटी से छोटी और बडी से बडी बात, घटनास्थल पर आकर टिक जाती है । आज के टूटते परिवेश और बिखरते मानव-मूल्यों ने आहत होकर कभी विदेशी मित्रों और कभी पास-पडौस के माध्यम से इनकी सशक्त कलम पूरे समाज पर प्रहार करती है । प्रहार इतना तीव्र होता है कि पाठक के सामने हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं होता । धर्म, धर्म, अध्यात्प, शिक्षा, परिवार, समाज, मानवीय संबंध सभी पर लेखनी चलती चली जाती है । इनके दिल की गहराई पाठकों के पटल पर रेशमी मोती बिखेरती है और कभी पाठकों के सामने सवालिया निशान छोड़ती है । वस्तुत: उनके मन के पनीले तट पर वर्णों के संबंध आसन लगाए बैठे हैं । उन्हें तिरोहित होता देख वे पाठकों को ही कठघरे में ला खडा करती हैं । 'अब कहाँ है आनंदी', 'नमस्कार नहीं की जाती यहाँ', 'एक बेगम बादशाह बिन' ऐसे ललित संस्मरण हैं जिनमें पाठक पूरो तरह डूब जाता है और वह भी लेखिका के सुर में सुर मिलाकर कहता है 'मैं हूँ न !'
  • Fantasia (Novel)
    Vaughn Petterson
    495 446

    Item Code: #KGP-605

    Availability: In stock

    Touching on a wide range of different themes, Fantasia on a Theme of Thomas Tallis is a truly compelling read. Throughout the pages of his thought-provoking novel, the author, Vaughn Petterson, presents readers with a vivid portrait of the best and worst that humanity has to offer, inviting them to form their own conclusions about the respective moral weight of our various social folkways and mores. Written in a deeply lyrical style, Fantasia successfully incorporates the transformative media of art, music, and literature as a figurative backdrop for Joe’s personal metamorphosis—highlighting the significance of the arts in helping to change us in ways we could hardly imagine. Petterson also skillfully invokes higher levels of deeper thought in the reader, chiefly by inviting them to consider the deeper spiritual ramifications of the issues with which his characters are forced to contend—issues that rest at the core of our collective existence.
  • Mahadevi Ki Kavita Ka Nepathya
    Vijay Bahadur Singh
    125 113

    Item Code: #KGP-9115

    Availability: In stock

    महादेवी की कविता का नेपथ्य
    मुझे लगता है, समकालीन स्त्री-जीवन के भीतर रचे-बसे आदिम राग का सबसे सघन, तीव्र और सूक्ष्म प्रतिबिंबन इस कविता में बतौर एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ के रूप में उपलब्ध है। स्त्री अपने आसपास को किन आँखों से देखती है, उसके प्रति कैसी ऐंद्रिक प्रतिक्रियाएँ करती है और सृजन की भूमि पर उतरकर किस असाधारण खूबसूरती से उसकी पुनर्सृष्टि करती है, वह समूची प्रक्रिया यहाँ परखी और महसूस की जा सकती है।
    महादेवी के गीत आदिम स्त्री-मन के भी गीत हैं और उस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक मन के भी, जो सभ्यताओं के कई-कई वार झेलकर भी अविकृत रह सका है। स्त्री का यह मन कितना तरल, मृदुल, कितना विनयी, समर्पण- शील किंतु कितना आत्मचेतस और आत्मविश्वासी है, इसे महादेवी के शब्द-शब्द में अनुभव किया जा सकता है। निसर्ग और जीवन, उसकी सारी गतियाँ और भंगिमाएँ कुछ भी तो उसकी पहुँच से बाहर नहीं है। आधुनिक पुरुष की भाँति वह इस जीवन को केवल उपभोग का साधन मानने को तैयार नहीं। महादेवी की कविता उसमें एक रागपूर्ण कृतज्ञता का अनुभव कराती है और उस राग सम्मोहन का भी, जिसके बगैर कविता ही नहीं, जीवन भी बेमानी है। महादेवी की कविता इसी विराट् राग की सबसे सम्मोहक अनुगूँज है।
    वह जीवन के स्थूल व्यापारों से उन सूक्ष्म गतिविधियों तक व्यापी हुई है, जहाँ लोक और लोकोत्तर एक होकर रहस्यमय हो उठे हैं, किंतु यह रहस्यमयता जीवन का निषेध नहीं, उसकी उन उदात्त ऊँचाइयों की ओर इशारे करती है, जहाँ कविता मनुष्यता की परिभाषा ही नहीं, उसकी जीवंत पहचान भी बन जाती है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar (Paperback)
    Ramdhari Singh Diwakar
    125

    Item Code: #KGP-7007

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : रामधारी सिंह दिवाकर
    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिल्लेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न अपना है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भा दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।
    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।
    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार','खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानो', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Manas Manthan
    Braj Bhushan
    250

    Item Code: #KGP-104

    Availability: In stock

    अपने आपको जानने का काम मश्किल इसलिए माना गया है कि मनुष्य स्वभाव से ही पक्षपाती है। वह निष्पक्ष होकर अपने बारे में कभी विचार कर ही नहीं सकता। अपने विषय में सोचते हुए वह निष्पक्ष रह ही नहीं सकता। दुर्बल होते हुए भी कोई भी अपने को गामा और रुस्तम से कम नहीं समझता। दो हड्डी का आदमी भी कभी-कभी कह उठता है ‘‘ऐसा दूंगा हाथ कि जाकर दस कदम दूर गिरेगा।’’ ऐसे व्यक्ति को अपने बारे में कितनी गलत जानकारी है, यह सहज ही ज्ञात हो जाता है। अज्ञानी होते हुए भी कोई अपने को अरस्तू और चाणक्य से कम नहीं समझता। ऐसे व्यक्ति भी प्रायः कहते सुने जाते हैं ‘‘अरे, अरस्तू जैसे दस को मैं अपनी जेब में रखता हूं।’’ जबकि ऐसे व्यक्ति को मैट्रिक पास करने में चार साल लग गए थे। गहन अध्ययन, आत्मनिरीक्षण और सूक्ष्म विवेचना के द्वारा ही अपने आपको जानने के मार्ग की ओर बढ़ा जा सकता है।
  • Himalaya Gaatha-6 (Itihaas)
    Sudarshan Vashishath
    995 896

    Item Code: #KGP-788

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-6 (इतिहास)
    इधर इतिहास, परंपरा और संस्कृति में लेखन कम हो रहा है । सुदर्शन वशिष्ठ एक ऐसे साहित्यकार हैं जो सशक्त कहानीकार और कवि होने के साथ संस्कृति, इतिहास एवं पुरातत्त्व में भी बराबर की पैठ रखते हैं । सरकारी सेवा में रहने के कारण संस्कृति और पुरातत्त्व से वर्षों तक इनका जुड़ाव रहा जिसने इन्हें इस क्षेत्र में  कुछ करने के  लिए प्रेरित किया ।
    इतिहास, परंपरा और संस्कृति पर लिखने वाले बिरले लेखकों में हैं वशिष्ठ, जो अपनी यायावर प्रवृत्ति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते हैं । जहाँ इतिहास की बात आई है, वशिष्ठ ने निरपेक्ष होकर तथ्यों के आधार पर केवल ऐसी बात की है जो प्रामाणिक हो । यूरोपियन इतिहासकारों की टिप्पणियां ज्यों की त्यों न उतारकर उन पर तर्कसंगत विवेचन के साथ साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना  है ।
    बहुत बार तथाकथित किंवदंतियां या लोकवार्ता भी इतिहास बनती हैं । अत: पौराणिक आख्यान, स्थान विशेष के माहात्म्य, वीरगाथाओं तथा कथाओं को भी यर्थाचित स्थान देकर प्रस्तुत किया गया है ताकि आसानी शोधकर्ता कार्य कर सकें ।
    इस क्षेत्र के उपलब्ध इतिहास में आज तक मात्र यूरोपियन इतिहासकारों की पुस्तकों के ज्यों के त्यों उतारे रूपांतर मिलते हैं । प्रस्तुत इतिहास लेखन में वशिष्ठ न कई ऐसी पुरातन दुर्लभ पुस्तकों और 'पांडुलिपियों के संदर्भ दिए हैं जो आज तक किसी ने नहीं दिए । भारतीय विद्वानों द्धारा लिखी गई  वंशावलियां, ऐतिहासिक पुस्तकें, पांडुलिपियां इस इतिहास लेखन का आधार रही हैं जिस कारण इसमें नए-नए तथ्यों का उदघाटन हुआ।  यूरोपियन विद्वानों के अलावा मियां अक्षर सिंह, मियां रघुनाथ सिंह, दीवान सर्वदयाल, उगर सिंह, बिहारी लाल, मियां रणजोर सिंह, बालकराम शाद आदि भारतीय इतिहासकारों को समाविष्ट कर नए निष्कर्ष निकाले गए हैं । इस दृष्टि से यह इतिहास एक नई खोज हमारे सामने प्रस्तुत करता है । 
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत छठे खंड में पर्वतीय क्षेत्र के इतिहास पर ऐसी दुर्लभ सामग्री दी जा रही है, जो पहले कहीं उदघाटित नहीं हुई । 


  • Chinhaar
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-110

    Availability: In stock

    चिन्हार 
    "माँ, लगाओ अँगूठा !" मँझले ने अँगूठे पर स्याही लगाने की तैयारी कर ली, लेकिन उन्होंने चीकू से पैन माँगकर टेढ़े-मेढे अक्षरों में बडे मनोयोग से लिख दिया-'कैलाशो  देवी"।  उन्हें क्या पता था कि यह लिखावट उनके नाम चढ़ी दस बीघे जमीन को भी छीन ले जाएगी और आज से उनका बुढापा रेहन चढ जाएगा ।
    रेहन में चढा बुढापा, बिकी हुई आस्थाएँ, कुचले हुए सपने, धुंधलाता भविष्य-इन्हीं दुख-दर्द की घटनाओं के ताने-बाने ने चुनी ये कहानियाँ इक्कीसवीं शताब्दी की देहरी पर दस्तक देते भारत के ग्रामीण समाज का आईना हैं । एक ओर आर्थिक प्रगति, दूसरी ओर शोषण का यह सनातन स्वरुप! चाहे 'अपना-अपना आकाश' की अम्मा हो, 'चिन्हार' की सरजू या 'आक्षेप' की रमिया, या 'भंवर' की विरमा-सबकी अपनी-अपनी व्यथाएँ हैं, अपनी-अपनी सीमाएँ ।
    इन्हीं सीमाओं से बँधी, इन मरणोन्मुखी मानव-प्रतिमाओं का स्पंदन सहज ही सर्वत्र अनुभव होता है--प्राय: हर कहानी में ।
    लेखिका ने अपने जिए हुए परिवेश को जिस सहजता से प्रस्तुत किया है, जिस स्वाभाविकता से, उससे अनेक रचनाएँ, मात्र रचनाएं न बनकर, अपने समय का, अपने समाज का एक दस्तावेज बन गई हैं।
  • Moldeviya Ki Lokkathayen
    Sanjiv Thakur
    275 220

    Item Code: #KGP-195

    Availability: In stock

    मोल्देविया की लोककथाएँ
    मोल्देविया (वर्तमान नाम मोलदोव (Moldova)) उक्रेन के पास एक छोटा-सा देश है। वहाँ  लोककथाओं की अच्छी-खासी परंपरा रही है। लोककथाओं के साथ-साथ वहीं लंबी-लंबी परीकथाएँ भी कही-सुनी जाती रही हैं। इस संग्रह मेँ उनमें से कुछ लोककथाएँ और परीकथाएँ प्रस्तुत की गई हैं। संग्रह में प्रस्तुत लोककथाओं में जहाँ जनजीवन से जुडी बाते है, वहीँ परीकथाओं में अदभुत कल्पनालोक दिखाई देता है । इन्हें पढ़कर मोल्देविया के सामान्य लोगों के कल्पनाशील होने का पता चलता है तो अपने समाज के यथार्थ के प्रति उनके जागरूक होने का पता भी चलता है। एक तीसरी धारा हास्य की है जो मोल्देविया के जन-मानस में बहती दिखाई देती है ।
    राजा, राजकुमारी, राजकुमार, जमींदार, पादरी, गरीब आदमी, गड़रिया, ड्रैगन, दैत्य आदि अच्छे-बुरे पात्रों के द्वारा कही गई ये कथाएँ अच्छाई, बुराई, चालाकी, दुष्टता, बुद्धिमानी, मूर्खता, शत्रुता, मित्रता जैसी चीजो से पाठकों का परिचय अनायास करवा सकती है ।
    मोल्देविया के लोक-मानस की थाह दिलाने वाली ये कथाएँ बच्चों और बडों को समान रूप से आकर्षित करने की सामर्थ्य रखती हैं ।
  • Paisa Aapka Bhavishya Aapka
    Ajay Shukla
    240 216

    Item Code: #KGP-9362

    Availability: In stock

    ‘अर्थ’ (धन) इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसे ‘पुरुषार्थ चतुष्टय’ में शामिल किया गया है। कोई भी युग हो, कोई भी देश, कोई भी सभ्यता हो या कोई भी संस्कृति—रुपयों के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन रहा है। आज तो चारों ओर पैसे का बोलबाला है। उसकी चमक और खनक के सामने सब फीका है। ...और यह जरूरी भी है कि सुखपूर्वक जीवन की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए किसी भी व्यक्ति के पास यथेष्ट पैसा हो।
    प्रश्न है कि पैसा किस तरह बचाया और बढ़ाया जाए। सीमित आय वालों को ‘मनी मैनेजमेंट’ सिखाने के लिए ही अजय शुक्ला ने पैसा आपका भविष्य आपका नामक पुस्तक लिखी। आसान भाषा और दिलचस्प शैली में यह पुस्तक पाठकों को बताती है कि छोटी-छोटी बचतों और कुछ सावधानियों से भविष्य के लिए पैसा बचाया जा सकता है। बुढ़ापे में जब कमाने की शक्ति नहीं रहती, अनेक तरह की हारी-बीमारी घेर लेती हैं और कई बार जब अपने भी मुंह मोड़ लेते हैं तब बचाया हुआ पैसा ही काम आता है। किसी ने कहा है कि पैसा भगवान् तो नहीं है, पर भगवान् से कम भी नहीं है।
    प्रस्तुत पुस्तक को जिन अध्यायों में संयोजित किया गया, वे हैं—बचत प्रबंधन, बीमा, इंटरनेट का प्रयोग, मुद्रास्फीति, आयकर, निवेश के मूल सिद्धान्त, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, निवेश के साधन, स्वर्ण में निवेश, घर/प्राॅपर्टी में निवेश, पोर्टफोलियो बनाना, वसीयतनामा, रिटायरमेंट प्रबंधन। इन अध्यायों को पढ़कर सुखी, निश्चिंत  व धन संपन्न भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
  • Sikhon Ka Itihaas (2 Vol.)
    Khushwant Singh
    1295 1166

    Item Code: #KGP-9302

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Krishan Baldev Vaid
    Krishna Baldev Vaid
    70 63

    Item Code: #KGP-9056

    Availability: In stock


  • Faaltu Aurat
    Ajeet Kaur
    320 288

    Item Code: #KGP-9373

    Availability: In stock

    पंजाबी की प्रख्यात लेखिका अजीत कौर फेमिनिज्म में यकीन रखती हैं पर वह हर बात में पुरुषों का विरोध करने वाली फेमिनिस्ट नहीं हैं, वह ख़ुद को विचारों से फेमिनिस्ट मानती हैं। वह जब-जब स्त्री पर लिखती हैं, अपनी इस बात को पुख्ता भी करती हैं। फालतू औरत कहानी संग्रह में स्त्री  केंद्रित कहानियों की बहुलता है।
    प्रस्तुत कहानियाँ भारतीय समाज में जिस स्त्री का प्रतिनिधित्व करती हैं, वह पत्नी, प्रेमिका, बेटी, माँ तो है ही, पर पुरुषवादी समाज में वह ‘फालतू औरत’ होने का अभिशाप भी झेल रही है। न वह पूरी तरह पत्नी है, न प्रेमिका, न माँ, न बेटी। वह है महज एक ‘फालतू औरत’। इसी ‘फालतू औरत’ के दर्द, उसकी पीड़ा, उसके संघर्ष को अजीत कौर संवेदना के स्तर पर बड़ी शिद्दत से रेखांकित करते हुए हमें समाज का वह चेहरा दिखाने की ईमानदार कोशिश करती हैं जो अपने स्वार्थ की खातिर इस औरत को कभी उसका पूरा ‘स्पेस’ नहीं देना चाहता। ‘फालतू औरत’ की गीता, ‘एक मरा हुआ पल’ की शालिनी, ‘कमरा नंबर आठ’ की दो स्त्रियाँ, ‘हाॅट वाॅटर बोतल’ की मंजरी, ‘बुतशिकन’ की मिसेज़ चौधरी और ‘महक की मौत’ की मोनिका, ‘माँ-पुत्र’ की शांता, ‘एक पोट्र्रेट’ की तारा दीदी ऐसी ही स्त्रियाँ हैं जो प्रेम की दुनिया में, परिवार में, समाज में, देश में अपने लिए एक मुकम्मल स्पेस की चाहत रखती हैं।
    अजीत कौर की प्रस्तुत कहानियाँ सतत प्रवाहमय नदी की तरह हैं जो पाठक को अपने संग बहा ले जाने की पूरी ताकत और सामर्थ्य रखती हैं।
  • Samrat Ashok
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-250

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sahitya Par Ramayan Ka Prabhav
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    275 248

    Item Code: #KGP-595

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य पर रामायण का प्रभाव
    रामकथा से संबद्ध काव्य-रचना की एक सुदीर्घ परंपरा है, जिसका उद्गम वैदिक वाङ्मय से माना जाता है। लौकिक संस्कृत में इस परंपरा का विधिवत् सूत्रपात आदिकवि वाल्मीकि से हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने रामकथा को जो व्यवस्था, उदात्तता, महनीयता और कालजयिता प्रदान की उसके लिए साहित्य जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। विश्व मानचित्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को रामकथा ने अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। भारत के अतिरिक्त आज भी मिस्र और रोम से लेकर वियतनाम, मंगोलिया, इग्नेशिया तक रामकथा की अमिट छाप देखी जा सकती है। भारत और भारतीय मूल के लोगों के लिए रामकथा शक्तिशाली सांस्कृतिक आधार है। भारतीय भाषाओं में रामकथा का स्वरूप अनेक रूपों में विद्यमान है जो भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता को सिद्ध करता है।
    रामकथा की नित्य-प्रवाही पुण्यसलिला की अजस्र धारा अनादि काल से भारतीय मनीषा को सम्मोहित और भारतीय जीवन को संस्कारित करती रही है।
    रामकथा के सार्वदेशिक स्वरूप को विभिन्न भारतीय भाषाओं में जांचना-परखना ही इस उपक्रम का अभीष्ट है।
    विश्वास है कि रामकथा और रामकथा से संबद्ध साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए इसमें प्रचुर सामग्री मिल सकेगी।
  • Kashmkash (Paperback)
    Manoj Singh
    240

    Item Code: #KGP-378

    Availability: In stock


  • Bhartiya Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-2
    Shuk Deo Prasad
    450 405

    Item Code: #KGP-9152

    Availability: In stock

    सत्तरादि के आरंभ में हिंदी और हिंदीतर भाषाओं में वैज्ञानिक कहानियां प्रभूत मात्रा में लिखी जाने लगीं। बंगला में सत्यजित राय और प्रेमेन्द्र मित्र के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इन्होंने अपनी लेखनी को विराम क्यों दिया? क्या विज्ञान कथाएं कथा की एक विधा के रूप में जनमानस में अपनी पैठ नहीं बना सकीं?
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Jainendra Kumar
    Jainendra Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-2070

    Availability: In stock

    जैनेन्द्र कुमार

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फांसी', 'पाजेब, 'फोटोग्राफी', 'मास्टर जी', 'अपना-अपना भाग्य', 'जाह्नवी', 'एक रात', 'साधु की हठ', 'नीलम देश की राजकन्या' तथा 'चलित-चित'  ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक जैनेन्द्र कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshaatkaar : Malti Joshi
    Malti Joshi
    180 162

    Item Code: #KGP-1298

    Availability: In stock


  • Saahasi Bachchon Ke Kaarnaame
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-52

    Availability: In stock

    जब मैं छोटा था तो दूसरे बच्चों की तरह खुद भी काॅमिक्स वगैर पढ़ने का शौक रखता था। कुछ बड़ा हुआ तो सोचा कि ये काॅमिक्स बच्चों का मनोरंजन भले ही करते हों, लेकिन न तो उनका चरित्र-निर्माण ही कर पाते हैं और न उन्हें सही राह ही दिखा पाते हैं। मुझे लगा कि बच्चों के लिए ऐसे साहित्य की रचना होनी चाहिए जो वास्तवित धरातल से जुड़ा हो, उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दे तथा एक अच्छा मनुष्य बनाए।
    पत्रकारिता से जुड़ा और प्रतिवर्ष राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों से बात करने, उनकी कवरेज करने का अवसर मिला तो मन में दबी यह इच्छा फिर से बलवती होने लगी।
    वर्ष 2003 के प्रारंभ में बहादुर बच्चों से मिलने का अवसर मिला तो सोचा कि इस बार उसी प्रयास को और बेहतर ढंग से अंजाम दिया जाए। इस बारमैंने कहानियों को बहादुर बच्चों से बातचीत की शैली में तैयार कियाताकि उनमें और अधिक वास्तविकता आ सके। कहानियों की संख्या भी दस से बढ़कर उन्नीस है और उनका प्रस्तुतिकरण भी अधिक आकर्षक हैं पहली पुस्तक की तुलना में यह पुस्तक और भी कई मायनों में बेहतर स्वरूप संजोए है। 
    —संजीव गुप्ता
  • Toro Kara Toro-5 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-505

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Ravindranath Tyagi (Paperback)
    Ravindra Nath Tyagi
    225

    Item Code: #KGP-7218

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ त्यागी का रंग व्यंग्य में सबसे निराला है। उनका अध्ययन व्यापक था। स्मृति अच्छी होने से संदर्भ सामने रहते थे। संदर्भों को प्रसंग देकर रचने की विलक्षण योग्यता उनके पास थी। यही कारण है कि त्यागी के व्यंग्य पढ़ते हुए पाठक को आनंद के साथ ज्ञान भी उपलब्ध होता है। बतरस इतना है कि गांव की गोरी पर लिखते हुए प्राकृत से लेकर पेरिस तक अभिव्यक्ति का विस्तार हो सकता है। व्यंग्य में सहज हास्य के वे आचार्य हैं। दफ्रतरशाही,  शृंगार, प्रकृति और अद्भुत तथ्य–प्रायः इन क्षेत्रों से वे विषय चुनते हैं। संस्कृत और अन्य भाषाओं से उद्धरण देते हुए त्यागी व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय प्रश्नों तक बात करते हैं। कई बार लगता है कि उनके लेखन का उद्देश्य निर्मल हास्य की सृष्टि करना है। यह कठिन काम उन्होंने सरलता से किया है। हास्य में आ जाने वाली दुराग्रही वृत्ति उनके लेखन में नहीं है। वे सिद्धांतो से नहीं, आसपास के तथ्यों या व्यक्ति वैचित्रय से हास्य के क्षण निर्मित करते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में रवीन्द्रनाथ त्यागी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Mere Saakshatkaar : Pooran Chandra Joshi
    Pooran Chandra Joshi
    150 135

    Item Code: #KGP-2031

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : पूरनचन्द्र जोशी
    वरिष्ठ समाजशास्वी प्रोफेरुवृर फूनचद्ध जोशी के साथ पिछले बीस वर्षों के सऊक्षात्कार इस स्थापन में पाठकों के लिए प्रस्तुत है । यह संकलन वास्तव में साक्षात्कार के माध्यम से आजादी की आधी सदी में भारतीय समाज की दूरगामी महत्त्व की प्रक्रियाओं और परिवर्तनों, उनके अंतर्सबंधों और अंतर्द्धंद्वों, उपलब्धियों और संभावनाओं, आग्रहों और अवरोधों पर प्रकाश डालता है । साथ ही बीसवीं सदी के अंत और इक्लीसवीं सदी की पूर्व संध्या पर नए गतिशील क्षितिजों और दिशाओं का भी संकेत देता है । यह अकादमिक समाज के लिए नई दृष्टि और व्याख्याएँ प्रस्तुत करता है, तो जिज्ञासु और प्रबुद्ध नागरिको के लिए भारत के बदलते परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य को भी आलोकित करता है ।
    यह संकलन यदि नई दृष्टि और जानकारी देता है तो पाठकों को अपने लिए सोचने को प्रेरित भी करता है और उनमें अपने दायित्व का बोध भी जाता है ।
    'मेरे साक्षात्कार' में योगदान उन श्रेष्ठ पत्रकारों और लेखकों का भी है जो विचारशील प्रश्चकर्ताओं के रूप में प्रोफेसर जोशी की बहुआयामी दृष्टि और वर्तमान भारत की समस्याओं पर उनकी गहरी सोच और चिंतन-प्रकिया को पाठकों तक सम्प्रेषण। में सफल हुए हैं।
    पुस्तक तीन खंडों में विभाजित है : ( 1) आधी सदी का सफर, (2) नई चुनौतियां नया एजेंडा, (3) कुछ वक्तव्य । प्रथम दो खंडों में प्रोफेसर जोशी से साक्षात्कार प्रश्न और उत्तर क्या प्रस्तुतियों के रूप में दिए गए है । तीसरे खंड में कुछ महत्त्वपूर्ण सामयिक विषयों पर प्रोफेसर जोशी के विचार कुछ वक्तव्यों के रूप में प्रस्तुत है ।
  • Dek Par Andhera
    Hira Lal Nagar
    400 360

    Item Code: #KGP-402

    Availability: In stock


  • Jhoothe Aakash
    Rajesh Jain
    50 45

    Item Code: #KGP-9063

    Availability: In stock


  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 2 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7060

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdarash Mishra
    Ramdarash Mishra
    200 180

    Item Code: #KGP-766

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रामदरश मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमा', 'सड़क', 'एक औरत एक जिदगी', 'खँडहर की आवाज', 'मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’, 'निर्णयों के बीच एक निर्णय', 'मुर्दा मैदान', 'अकेला मकान', 'शेष यात्रा' तथा 'दिन के साथ' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Saanch Kahoon To…
    Prabhakar Shrotiya
    35 32

    Item Code: #KGP-9105

    Availability: In stock

    'साँच कहूँ तो' राजस्थानी रासो-कथा पर आधारित स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का एक नया लीला-नाटक है । इसमें धारा-नरेश भोज परमार की पुत्री राजमती और अजमेर के चौहान राजा बीसलदेव के विवाह, वियोग एवं पुनर्मिलन की मार्मिक कथा को मारवाड़ और मालवा की लोक-रंग-परम्परा की रंगत के कल्पनाशील प्रयोग से एक दिलचस्प मौलिक नाटक का रूप प्रदान किया गया है ।
    यह नाटक आधुनिक भारतीय रंग मुहावरे की रचनात्मक खोज में लगे प्रतिभावान साहसी रंगकर्मियों को न केवल अपनी ओर आकृष्ट कोमा बल्कि समकालीन हिन्दी नाटय-लेखन एवं रंगकर्म के लिए एक महत्वपूर्ण रचना भी सिद्ध होगा । 
    -जयदेव तनेजा

  • Manzil Abhi Door Hai
    Shanta Kumar
    225 203

    Item Code: #KGP-9030

    Availability: In stock

    मंजिल अभी दूर है
    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमने एक मंजिल तय की, एक संकल्प लिया उस मंजिल तक पहुँचने का, परंतु आधी सदी बीत जाने के बाद भी हम उस मंजिल तक पहुँचे नहीं है । इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि या तो हम चले ही नहीं या फिर मंजिल के लिए जो रास्ता चुना, वह ठीक नहीं था ।
    लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली और उस प्रणाली को चलाने वाले नेता-दोनो ही आज की इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। आधी सदी पूरी हो चुकी है। एक प्रणाली का परीक्षण हो चुका है । अब इस बात की आवश्यकता है कि उस संसदीय प्रणाली पर पुनर्विचार किया जाए और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उचित संशोधन किया जाए ।
    जब भारत का संविधान बनाया गया तो संविधान निर्माताओं ने विश्व की अन्य प्रणालियों की सार्थकता तथा उपयोगिता पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया । उन सबके मन में ऐतिहासिक कारणों से एक बात घर कर गई थी कि भारत के लिए ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली ही उपयोगी है क्योंकि पिछले लगभग 200 वर्षों से भारत किसी न किसी प्रकार से इस प्रणाली से जुडा रहा ।
  • Vanya Jeevon Ki Romanchak Kahaniyan
    Shivani Chaturvedi
    80

    Item Code: #KGP-1057

    Availability: In stock


  • Nanaji Deshmukh : Jeevan Darshan
    Gaurav Chauhan
    280 252

    Item Code: #KGP-1864

    Availability: In stock

    इस जीवात्मा ने अपने व्यक्तित्व की कुछ ऐसी अमिट छाप समाज पर छोड़ी कि उनके विषय में समाज और देश को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या साधारण मनुष्य भी दलित, शोषित, पीड़ित व वंचित के दुःखों को दूर कर उनके हृदय में एक ईश्वर, गुरु, प्रेरक, श्रद्धा का स्थान ले सकता है। ऐसी ही एक पवित्र जीवात्मा थे जिन्हें हम नानाजी देशमुख के नाम से जानते हैं। 
    "हम अपने लिए नहीं अपनों के लिए हैं। अपने वे हैं जो सदियों से पीड़ित, शोषित व उपेक्षित हैं।" यह कथन इन्हीं जीवात्मा का था जो आज नानाजी के नाम से इस संसार में याद किए जाते हैं। ऐसा ही कोई विरला व्यक्तित्व इस धरा पर जन्म लेकर इस धरा को पवित्र बनाता है।
  • Shake-Up India
    Jayant V. Narlikar
    395 356

    Item Code: #KGP-906

    Availability: In stock

    The need of The Times 
    India has lived over sixty years of its independence, but it still seems to be floating rudderless. It does not know what to accept and what to discard.
    The well known Astrophysicist and science writer Jayant V. Narlikar provides in this significant work well thought out ideas in various life and work-areas for us to take up in right earnest and do the needful to build up the nation as well as our own lives.
    He is a rare Indian who writes science fiction which is closer to the truth. A few of his ideas have already come true. Like the social problems created by the possibility of knowing the sex of the child while in the womb which he wrote up in a story in the 1970s.
    The shake-up and change are caused by The likes of These meteors:
    • ‘India that is Bharat…..’ – Why two names?
    • Get rid of the scientifically rejected superstitions.
    • No more Ramans, Boses, Sahas – Why?
    • Ignoring higher education–Why?
    • Science is significant, develop its temper.
    • Come out of the population trap.
    • Don’t litter, clean up your surroundings, it’s easy.
    • Technology is for the 21 st century.
    • Teach astronomy in schools; it will develop students’ minds.
    • Be professional in achieving your goal.
    • Media must come forward in presenting science to the masses.
    • Take a leaf out of the life of Michael Faraday.

  • Basant Bayar
    Nisha Bhargva
    200 180

    Item Code: #KGP-1807

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य की एक सशक्त विधा है। नवरसों को संजोए ये कहानियां पाठक के मन को हलराती-दुलराती, हंसाती, रुलाती, गुदगुदाती और स्पंदित करती हैं । आसपास की विसंगतियों को रेखांकित करती, दलदल में भी जीवन के पद और सूत्र ढ़ूंढ लेती है । विभिन्न जीवन दशाओं के उकेरती, जीने की सही दिशा देती हैं । कहानी कहना भी एक कला है ।
    हंसाना एक कला है । जो हंसा सकता है, उसमें रुलाने की भी भरपूर ताकत होती है। आँसू, भावनाओं का सिंचन करते है । रचना के लिए भावों का सिंचन आवश्यक है । इसलिए तो मनुष्य जीवन में हंसने-हंसाने के साथ रोने-रुलाने का भी महत्व है।
    निशा भार्गव को कहानियां, मानो हंसाते-हंसाते रुला देती हैं । जीवन की विसंगतियों पर हंसाती, जीवन का सत्य बखान कर जाती हैं । 'बसंत बयार' संग्रह की कहानियां निशा भार्गव के दादी बनने को उम्र में भले ही प्रकाशित हो रही हैं, लेखिका की उम्र के विभिन्न पड़ावों पर उसे ही उद्वेलित, रोमांचित और सुखाश्चर्य से भरती रहीं हैं । आसपास में बिखरे, टूटते-बिखरते-जुड़ते पारिवारिक ताने-बानों की ये कहानियां हैं। संग्रह को यही विशेषता है।
    एक-एक कुटुम्ब (परिवार) को दुरुस्त करके ही पुन: "वसुधैव-कुंटुम्बकम्" का भारतीय सनातन आदर्श सार्थक होया।  ये कहानियां कुछ ऐसा ही प्रयास करती दिखती हैं। निशा भार्गव की उनकी अर्थवान कहानियां और लेखकीय ईमानदार प्रयास के लिए बधाइयाँ । पाठकों से अपेक्षा है कि वे पढे, गुने और पन्नों पर बिखरे जीवन जोड़ने वाले तत्वों को सहेज लें ।
  • Dushyant Ke Jaane Par Doston Ki Yadein (Paperback)
    Kamleshwar
    90

    Item Code: #KGP-1381

    Availability: In stock


  • Hum Yahan The
    Madhu Kankria
    590 472

    Item Code: #KGP-9351

    Availability: In stock

    ‘जंगल कुमार! सफलता-असफलता कुछ नहीं होती। असली चीज होती है आपके जीवन का ताप कितनों तक पहुंचा। जीवन का अर्थ है अपने पीछे कुछ निशान छोड़ जाना।’ दीपशिखा वेफ ये वाक्य मधु कांकरिया के नवीनतम उपन्यास हम यहां थे की सैद्धांतिकी है। इस उपन्यास के दो केंद्रीय चरित्रा हैं–दीपशिखा और जंगल कुमार। दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि और अलग-अलग शहर से आए–लेकिन लक्ष्य की समानता उनको जीवन पथ पर अभिन्न बना देती है।
    ‘हम यहां थे’ जीवन में व्याप्त करुणा, प्रतिरोध, संघर्ष, स्वप्न, संकल्प और समर्पण का अनुसंधन है। किसी ने कहा था कि लक्ष्यहीन जीवन भ्रष्ट और दयनीय होता है। यह जीवन सत्य धीरे-धीरे उपन्यास की नायिका या केंद्रीय अस्मिता दीपशिखा के भीतर आकार लेता है। इसको वृत्तांत का रूप देने के लिए मधु कांकरिया ने डायरी का शिल्प अपनाया है। ‘दीपशिखा की डायरी: अपने अपने जंगल’ से ‘ओ जिंदगी! ओ प्राण!’ जैसे कई उपशीर्षकों में दीपशिखा के बहाने एक सामान्य स्त्री के भीषण संघर्ष और कोलकाता की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्थितियों का वर्णन किया गया है। ‘उत्तराधर’ में जंगल कुमार के पक्ष से दीपशिखा के वृत्तांत को संपूर्ण किया गया है। अर्थात् आदिवासियों के बीच जाकर उनके संघर्ष में सहभागी बनकर दीपशिखा ‘कैदी नंबर 989’ बन गई। मधु कांकरिया ने अद्भुत ढंग से आदिवासी अस्मिता और संघर्ष को शब्द दिए हैं। प्रकृति और प्रकृतिसंतानों के साथ व्यवस्था और बाजार के सुलूक हृदय को विचलित कर देते हैं। जंगलों की अंधधुंध कटाई और जंगली जानवरों को बेघर होते देख जिस खतरे की ओर वे इशारा करती हैं उसकी अनदेखी कर भविष्य की ओर देखना संभव नहीं है। मानव मन के गहरे स्तरों को छूती यह कहानी जीवन के दर्द और सौंदर्य, प्रेम और उदासी को अद्भुत ढंग से रचती है। पूरे उपन्यास में भाषा के अनेक रचाव हैं, लेकिन जब दीपशिखा और जंगल कुमार का साहचर्य आता है तब भाषा सचमुच सहृदय हो उठती है।
    ‘हम यहां थे’ एक ऐसा उपन्यास है जो जीवन के कठोर सत्य को वर्तमान के तीखे प्रकाश में परिभाषित करता है।
  • Kavi Ne Kaha : Shriprakash Shukla (Paperback)
    Shri Prakash Shukla
    140

    Item Code: #KGP-7017

    Availability: In stock

    रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि हैं। इनके पहले कविता संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ (1999) से लेकर पाँचवें कविता संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ (2014) तक की कविताओं से गुजरकर कविता प्रेमियों को काव्य स्वाद का सुखद अहसास होता है। अपनी कविताओं में ये बिना किसी नारेबाजी व आयातित विमर्श का हौवा खड़ा किए सधे हुए स्वर में सामाजिक  विसंगतियों, क्रूरताओं, धार्मिक ढकोसलों, आर्थिक पराभवों और सांस्कृतिक क्षरण पर सीधे वार करते हैं। इनकी कविता की दुनिया में राजनीति व विचारधारा की एक पक्षधर दुनिया गुँथी हुई होती है जिसमें गरीब, पीड़ित व उपेक्षित वर्ग के प्रति गहरी रागात्मक चेतना मौजूद है।
    लेकिन उपर्युक्त बातों के साथ-साथ जिस वैशिष्ट्य के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता में ज्यादा चर्चित हैं वह हैं इनकी विषयगत वैविध्यता और गहरी लोकोन्मुखता। अपनी कविताओं में वे महज लोक का चित्रण नहीं करते बल्कि लोक के क्षरण के कारणों की शिनाख्त भी करते हैं। नवउदारवाद और पूँजीवादी शक्तियों के आक्रमण, दमन, शोषण और चालाकियों का प्रतिरोध करने वाली इनकी कविता जनोन्मुखी व लोकोन्मुखी तो है ही, इसमें स्थानीयता के साथ वैश्विकता के तत्त्व भी समाहित हैं जहाँ पुराने के साथ परंपरा से रिश्ते रखने वाला नया समाज तो है ही, एक आधुनिक चेतना भी मौजूद है।
    इसी के साथ गौरतलब है कि प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के चित्रों से भरपूर कवि का कविता संसार विविध वर्णों से युक्त है जहाँ कविता की धार अपनी भाषिक व्यंजना के रेडिकल भावभूमि पर विकसित होती है। यहाँ कहते हुए ख़ुशी होती है कि इस कवि ने अपने को कहीं रिपीट नहीं किया है और इसी कारण इनकी कविता बहुवस्तुस्पर्शी उध्र्वमुखी चेतना से संपन्न है जो एक समर्थ कवि का लक्षण है। भाषा की सादगी और बिंबों की निजता इनके कवि- स्वभाव की विलक्षण विशेषता है। कह सकते हैं कि भाषा के लोक स्वीकृत विन्यास को चुनौती देती इनकी कविताओं में व्यंग्य व वक्रता का एक सघन संसार उपस्थित होता है जहाँ भाषायी मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर का औदात्य भी मिलता है जो इनकी कविताओं को रेडिकल बनाता है।
    उम्मीद की जानी चाहिए कि कविता का यह संचयन कवि की काव्य संपदा और उनकी सामर्थ्य से अपने पाठकों को परिचित कराने में समर्थ होगा।
  • Karmveer Pt. Sunderlal : Kuch Sansmaran
    Sudhir Vidyarthi
    125 113

    Item Code: #KGP-1964

    Availability: In stock


  • Path Pragya
    Veena Sinha
    240 216

    Item Code: #KGP-171

    Availability: In stock


  • Betva Ki Lehrein
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-400

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar
    Kamal Kumar
    230 207

    Item Code: #KGP-688

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Toro Kara Toro-2 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-513

    Availability: In stock


  • Main Aur Meri Shrimati
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    100 90

    Item Code: #KGP-7813

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hridayesh
    Hridyesh
    200 180

    Item Code: #KGP-90

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार हृदयेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'खेत', 'जो भटक रहे हैं', 'कोई एक दूसरा', 'मृगया', 'जीवन राग', 'उसकी कहानी', 'जहर', 'मनु', 'पूँजी'  तथा 'सत्तर पार का वह बूढ़ा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक हृदयेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Kedar Nath Singh (Paperback)
    Kedarnath Singh
    90

    Item Code: #KGP-1307

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के अब तक प्रकाशित संपूर्ण कृतित्व से उनकी प्रतिनिधि कविताओं को छाँट निकालना एक कठिन काम है और चुनौती भरा भी। इस संकलन को तैयार करने में पहली कसौटी मेरी अपनी पसंद ही रही है। पचास वर्षों में फैले कृतित्व में से श्रेष्ठतर को छाँटकर यहाँ प्रस्तुत कर दिया है, ऐसा दावा मेरा बिलकुल नहीं है। हाँ, इतनी कोशिश अवश्य की है कि केदार जी की कविता के जितने रंग है, जितनी भगिमाएँ है उनकी थोडी-बहुत झलक और आस्वाद पाठक को मिल सके...यूँ चयन-दृष्टि का पता तो कविताएँ खुद देंगी ही।
    कविताओं को चुनने और उन्हें अनुक्रम देने में यह कोशिश जरूर रहीं है कि पाठकों को ऐसा न लगे कि कविताओं को यहाँ किसी विशिष्ट श्रेणीबद्ध क्रम में बाँटकर सजाया गया है। भिन्न भाव बोध, रंग और मूड्स की कविताओं को एक साथ रखकर बस घंघोल भर दिया है-एक निरायासज़न्य सहजता के साथ पाठकों को पढ़ते समय जिससे किसी क्रम विशेष में आबद्ध होकर पढने जैसी प्रतीति न हो, बल्कि तरतीब में बनावटी साज-सज्जा से दूर एक मुक्त विचरण जैसा प्रकृत आस्वाद मिल सके ।
  • Aalochna Ka Samay
    Dr. Jyotish Joshi
    320 288

    Item Code: #KGP-687

    Availability: In stock

    आलोचना का समय ग्यारह महत्त्वपूर्ण लेखकों के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करने का प्रयत्न है जिसमें उनके ‘रचना समय’ के साथ ‘आज के समय’ को देखने की कोशिश की गई है। आलोचना महज रचना के बोध और अर्थ को समझने वाली विध ही नहीं होती, वह अपने समय की रचनाशीलता को अपने वर्तमान की चुनौतियों में देखती है और इस तरह एक विमर्श को भी जन्म देती है। पुस्तक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, नेमिचन्द्र जैन, केदारनाथ सिंह, भुवनेश्वर, सुदामा पांडेय ‘धूमिल’, मैनेजर पांडेय तथा उदय प्रकाश जैसे लेखकों के अवदान को रेखांकित करते हुए उनके उन पक्षों को विशेष रूप से विवेचन का आधर बनाया गया है जिनके कारण उनकी महती उपादेयता है। विवेच्य लेखकों में मूल रूप से रचनाकार और आलोचक दोनों हैं जो अपने लेखन में ‘समय’ को देखते हैं तथा समय की अपेक्षाओं के अनुरूप अपने लेखकीय दायित्व का निर्वाह करते हैं।
    अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप आलोचक डॉ. ज्योतिष जोशी ने बहुत मनोयोग से पुस्तक में कृती लेखकों के योगदान को विवेचित किया है। इसमें उनकी भाषा, विवेचन की पद्धति तथा अपने समय की चुनौतियों से टकराने की दृष्टि आपको बहुत प्रभावित करेगी। कहना न होगा कि यह कृति पठनीय ही नहीं वरन् संग्रहणीय भी है।
  • Haadase Aur Hausle
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-8001

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार हैं । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती हैं कि कहानी पाठक को आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझतीं ।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हुई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानियां ।

  • Buddha Ka Chakravarti Saamrajya (Paperback)
    Rajesh Chandra
    140

    Item Code: #KGP-85

    Availability: In stock

    श्री राजेश चन्द्रा की किताब बुद्ध पर हिंदी में लिखी हुई अनेक पुस्तकों के बीच एक ऐसी रचना है जो न सिर्फ पठनीय है बल्कि संग्रहणीय है। इसमें बहुत-सी सामग्री ऐसी है जो बहुतों के लिए संदर्भ सामग्री सिद्ध होगी।
    भारत में लगभग लुप्त हो चुकी बौद्ध संस्कृति डाॅ. अंबेडकर के बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद एक बार नई चेतना के रूप में दिखाई देने लगी है, पर विश्वस्तर पर बौद्ध धर्म का विस्तार आश्चर्यजनक रहा है। बृद्ध के समय से लेकर लगभग डेढ़ हजार बरसों से ज्यादा की अवधि में विश्व की लगीाग एक-तिहाई से ज्यादा जमीन बुद्धमय हुई। चीन, जापान और कोरिया जैसे बौद्ध देशों ने आर्थिक, सामाजिक और विज्ञान के क्षेत्र में आश्चर्यजनक इतिहास बनाया। आज समूचा पश्चिम एशिया अगर तकनीकी क्षेत्र में विश्वशक्ति बना तो इसलिए कि उसे बौद्ध विचारधारा ने ऊर्जस्वित किया था। भारत अगर एक पिछड़ा और प्रतिगामी देश बना रहा तो इसीलिए कि उसने बौद्ध धर्म का सम्मान करना पिछली अनेक सदियों से छोड़ दिया था।
    राजेश चन्द्रा की प्रस्तुत पुस्तक एक बार फिर नए सिरे से याद दिलाती है कि विश्व सभ्यता में बौद्ध धर्म और संस्कृति की धरोहर कितनी विराट् है। इसकी विराटता और विविधता की एक प्रामाणिक और विश्वसनीय तस्वीर सुधी पाठकों को इस किताब में मिलेगी। कई अर्थो में यह एक जरूरी किताब साबित होगी।
    —मुद्राराक्षस
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash (Paperback)
    Uday Prakash
    175

    Item Code: #KGP-377

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kucha E Kaatil
    Ram Lal
    175 158

    Item Code: #KGP-2067

    Availability: In stock

    कूचा-ए-कातिल

    यह एक बहुत ही मामूली आदमी की खुदनोश्त
    दास्तान है, जिसने काफी गुरबत देखी है
    और यह महरूमियों का भी शिकार हुआ है ।
    कौमी और समाजी सतह पर इसने
    बेशुमार मसायब का खामोशी से मशाहदा
    किया है और दर-बदरी इसके
    खुन में हमेशा मोजूद रहीं हे।

    मैं इस शख्स को बहुत करीब से जानता हूँ,
    क्योंकि वह मैं ही हूँ। मैंने 1943 से अब तक
    जितने अफ़साने, नावल, ड्रामे, सफरनामे,
    मजामीन वगैरह लिखे हैं, इनमें मेरी
    जाती कैफियतें मुख्तलिफ शक्लों और रवैयों 
    का रूप धारकर हमेशा मौजूद रही हैं ।
    मेरे नज़दीक खुदनोश्त भी एक तरह का
    तखलीकी इजहार है, लेकिन इसमें 
    बयान की गई सच्चाइयाँ
    दूसरी असनाफ़ के मुकाबले में कुछ
    ज्यादा ही खुरदरी और तकलीफदेह हैं।
    -रामलाल
  • Naya Vidhaan (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    120

    Item Code: #KGP-203

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash
    Uday Prakash
    395 356

    Item Code: #KGP-904

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Rituraj
    Rituraaj
    150 135

    Item Code: #KGP-224

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ऋतुराज
    ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही हैं । बहुराष्ट्रीय निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे हैं और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है; वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
    ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कम दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते हैं और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
    आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।
  • Mere Saakshatkaar : Bhawani Prasad Mishra
    Bhawani Prasad Mishra
    280 252

    Item Code: #KGP-413

    Availability: In stock


  • Vrihat Hindi Lokokti Kosh
    Bholanath Tiwari
    795 716

    Item Code: #KGP-2107

    Availability: In stock

    वृहत् हिन्दी लोकोक्ति कोश
    हमारी प्रभावी, पूर्ण और आकर्षक अभिव्यक्ति का सबसे समर्थ साधन लोकोक्तियाँ होती हैं। वे वह गागर होती हैं, जिनमें अर्थ के सागर भरे होते हैं। अभी तक हिन्दी लोकोक्तियों का कोई ऐसा बड़ा कोश प्रकाशित नहीं हुआ है, जिसमें अधिकाधिक लोकोक्तियों को लिया गया हो। प्रस्तुत कोश इसी दिशा में एक महत् प्रयास है।
    इस प्रसंग में यह ध्यान देने की बात है कि ‘लोकोक्ति’ लोक की उक्ति होती है, इसलिए मानक भाषा की तुलना में लोकभाषा में लोकोक्तियों का प्रयोग कहीं अधिक होता है और मानक भाषा में भी काफी लोकोक्तियाँ लोकभाषा से ही छनकर आती हैं, जिन्हें संक्षेप में यहाँ देखा जा सकता है।
    प्रस्तुत ‘लोकोक्ति कोश’ में उपर्युक्त दृष्टि से कई विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। एक तो यह कि इसमें हिन्दी में प्रचलित और प्रयुक्त काफी लोकोक्तियाँ ले ली गई हैं। निश्चय ही इस दृष्टि से अब तक प्रकाशित हिन्दी लोकोक्ति कोशों में यह सबसे बड़ा लोकोक्ति कोश है।
    दूसरे, इसमें हिन्दी की अधिकांश बोलियों की अनेक लोकोक्तियाँ भी ली गई हैं, जैसे—अवधी, कन्नौजी, कौरवी, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी, निमाड़ी, मालवी, मैथिली, राजस्थानी, हरियाणवी, हाड़ौती आदि।
    तीसरे, मानक हिन्दी की अधिकाधिक तथा हिन्दी की प्रायः सभी लोकोक्तियों तथा हिन्दी की बोलियों की अधिकाधिक लोकोक्तियों को लेने के अतिरिक्त अपने देश की असमिया, उर्दू, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, बंगला, मराठी, मलयालम, सिंधी, संस्कृत आदि से भी काफी लोकोक्तियाँ तुलनात्मक रूप में यथास्थान दी गई हैं।
    चौथी विशेषता यह है कि उपर्युक्त लोकोक्तियों के अतिरिक्त इसमें देश के बाहर की अंग्रेज़ी, अरबी, उज़बेक, तुर्की, फारसी, रूसी आदि की भी जो तुलनात्मक लोकोक्तियाँ मिल सकी हैं, शामिल कर ली गई हैं।
    इस तरह यह कोश अपने आयाम में अब तक के लोकोक्ति कोशों से काफी अलग भी है और बड़ा भी।
    डॉ. तिवारी के लगभग 32-33 वर्षों के परिश्रम का परिणाम यह कोश निश्चय ही हिन्दी में अद्वितीय है। 

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Upendranath Ashq
    Upender Nath Ashq
    150 135

    Item Code: #KGP-2071

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पलंग', 'आकाशचारी', 'काकड़ां का तेली', 'उबाल', 'मि० घटपाण्डे', 'बैंगन का पौधा', 'डाची', 'पिजरा', 'काले साहब' और  'अजगर' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Metamorphosis (Paperback)
    Franz Kafka
    99

    Item Code: #KGP-1130

    Availability: In stock

    The Metamorphosis is one of Franz Kafka's most well-known works. It is the story of a young man, Gregor Samsa, who transformed overnight into a giant beetle-like insect, becomes an object of disgrace to his family, an outsider in his own home, a quintessentially alienated man. 
    A harrowing—though absurdly comic — meditation on human feelings of inadequacy, guilt, and isolation, The Metamorphosis has taken its place as one of the most widely read and influential works of twentieth-century fiction.
  • Agale Saal December Mein
    Anat Ramesh
    50 45

    Item Code: #KGP-9101

    Availability: In stock


  • Goma Hansti Hai
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-1991

    Availability: In stock

    गोमा हंसती है
    शहरी मध्यवर्ग के सीमित कथा-संसार में मैत्रीय पुष्पा का कहानियाँ उन लोगों को लेकर आई हैं, जिन्हें आज समाजशास्त्री 'हाशिए के लोग' कहते है । वे अपनी 'कहन' और 'कथन' में ही अलग नहीं हैं, भाषा और मुहावरे में भी ‘मिट्टी की गंध' समेटे हैं ।
    'गोमा हंसती है' की कहानियों के केंद्र में है नारी, और वह अपन सुख-दु:खों, यंत्रणाओं और यातनाओं में तपकर अपनी स्वतंत्र पहचान माँग रही है । उसका अपने प्रति ईमानदार होना ही 'बोल्ड' होना है, हालाँकि यह बिलकुल नहीँ जानती कि वह क्या है, जिसे 'बोल्ड होने' का नाम दिया जाता है । नारी-चेतना की यह पहचान या उसके सिर उठाकर खड़े होने में ही समाज की पुरुषवादी मर्यादाएं या महादेवी वर्मा के शब्दों में 'श्रृंखला की कडियाँ' चटकने-टूटने लगती है । वे औरत को लेकर बनाई गई शील और नैतिकता पर पुनर्विचार की मजबूरी पैदा करती है । 'गोमा हंसती है' की कहानियों की नारी अनैतिक नहीं, नई नैतिकता को रेखांकित करती है ।
    इन साधारण और छोटी-छोटी कथाओं को 'साइलैंट रिवोल्ट' (निश्शब्द विद्रोह) की कहानियाँ भी कहा जा सकता है क्योंकि नारीवादी घोषणाएँ इनसे कहीं नहीं है । ये वे अनुभव-खंड है जो स्वयं 'विचार' नहीं हैं, मगर उन्हीं के आधार पर 'विचार' का स्वरूप बनता है ।
    कलात्मकता की शर्तों के साथ बेहद पठनीय ये कहानियाँ निश्चय ही पाठको को फिर-फिर अपने साथ बॉंधेंगी, क्योंकि  इनमें हमारी जानी-पहचानी दुनिया का वह 'अलग' और 'अविस्मरणीय' भी है जो हमारी दृष्टि को माँजता है।
    इन कहानियों की भावनात्मक नाटकीयता निस्संदेह हमें चकित भी करेगी और मुग्ध भी। ये सरल बनावट की जटिल कहानियां है ।

    'गोमा हँसती है' सिर्फ एक कहानी नही, कथा-जगत्की एक 'घटना' भी है । -राजेन्द्र यादव

  • Gitanjali : Rabindranath Thakur
    Rabindra Nath Thakur
    300 270

    Item Code: #KGP-908

    Availability: In stock


  • Papa, Muskuraiye Na! (Paperback)
    Prahlad Shree Mali
    100

    Item Code: #KGP-1486

    Availability: In stock

    मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं औ वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंतके पास।
    मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।
    -इसी पुस्तक से
  • Shiksha Tatha Lok Vyavhar
    Maharishi Dayanand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1213

    Availability: In stock

    जब मनुष्य धार्मिक होता है, तब उसका विश्वास और मान्य शत्रु भी करते हैं और जब अधर्मी होता है, तब उसका विश्वास और मान्य मित्र भी नहीं करते। इससे जो थोडी विद्या वाला भी मनुष्य श्रेष्ठ शिक्षा पाकर सुशील होता है, उसका कोई भी कार्य नहीं बिगड़ता ।
    इसलिए मैं मनुष्यों को उत्तम शिक्षा के अर्थ सब वेदादिशास्त्र और सत्याचारी विद्वानों की रीति से युक्त इस ग्रंथ को बनाकर प्रकट करता हूँ की जिसको देख-दिखा, पढ़-पढाकर मनुष्य अपने और अपनी संतान तथा विद्यार्थियों का आचार अत्युत्तम करें, कि जिससे आप और वे सब दिन सुखी रहें ।
    इस ग्रंथ में कहीं-कहीं प्रमाण के लिए संस्कृत और सुगम भाषा और अनेक उपर्युक्त दृष्टान्त देकर सुधार का अभिप्राय प्रकाशित किया, जिसको सब कोई सुख से समझ अपना-अपना स्वाभाव सुधार, उत्तम व्यवहार को सिद्ध किया करें । 

  • Antim Pankti Mein
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1900

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी की ये कविताएँ गवाह हैं कि इधर वे कविता की प्रगीतात्मक संरचना से आगे बढ़कर उसके आख्यानात्मक शिल्प की ओर आई हैं । इस प्रक्रिया में दोनों तरह की संरचनाओं के द्वंद्व और सहकार, उनकी अंत:क्रिया से ऐसा शिल्प विकसित करने में वे कामयाब हुई हैं, जो दोनों की प्रमुख विशेषताओं का सारभूत और संशिलष्ट रूप है । कविता के ढाँचे में लगातार चलती तोड़-फोड़, कुछ नया सिरज सकने की उनकी बेचैनी, प्रयोगधर्मिता के साहस और शिल्प को लेकर उनके जेहन में जारी बहस का समेकित नतीजा है ! बहुत-से कवियों की लगता है कि जीवन में जोखिम उठाना पर्याप्त है और कविता बिना जोखिम के लिखी जा अकती है। मगर नीलेश से हम कला की दुनिया का यह अनिवार्य सबक सीख सकते हैं कि जीवन से भी ज्यादा जोखिम है कला में । इसलिए वे आत्म-तत्त्व की कीमत पर साज-सज्जा में नहीं जाना चाहतीं। वह तो सच का अन्यथाकरण और अवमूल्यन है ! मानो वे स्वयं कहती हैं-जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को अरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते।
    विगत वर्षों में कुछ युवा कवियों के आख्यान की बनावट चेतना और प्रतिबद्धता के विस्तार के रूप में आकृष्ट करती रही है ! दरअसल या शिल्प कविता को चीजों का महज़ भावुक, एकांगी और सरल पाठ बन जाने से रोकता है और उसे भरसक वस्तुनिष्ठ, बहुआयामी और जटिल यथार्थ में ले जाता है ।  कवियों को 'पूरा वाक्य' लिखने की त्रिलोचन को सलाह पर अमल तो यहाँ है ही, कार्य-कारण-संबंध का विवेक भी और एक किस्म के गद्य की प्रचुरता वास्तविकता के काफी हद तक शुष्क और दारुण होने की साक्ष्य है! इसलिए रोजमर्रा की बातचीत की लय, व्याख्या और किस्सागोई का अंदाज और अनुभव का विषम धरातल-ये तत्व मिलकर इस कविता का निर्माण करते हैँ। यहाँ किसी अप्रत्याशित  सौंदर्य-लोक, कल्पना के नायाब उत्कर्ष या संवेदना की सजल पृष्ठभूमि की उम्मीद करना बेमानी है; क्योंकि इस शिल्प के चुनाव में ही कविता की पारंपरिक भूमि और भूमिका से एक प्रस्थान निहित है ! यह भी नहीं कि वह स्वप्नशील नहीं है! नीलेश रघुवंशी इस बदरंग और ऊबड़-खाबड़ दुनिया को एक खेत में बदलने और उसमें मनुष्यता को रोपने का सपना देखती हैं, मगर उसी समय यथार्थ की जटिल समस्या उन्हें घेर लेती है-एक स्वप्न है जाती हूँ जिसमें बार-बार/लौटती हूँ हर बार/मकडी के  जाले-सी बुनी इस दुनिया के भीतर !
    सच्चाई से सचेत और उसके प्रति ईमानदार होने की बुनियादी प्रतिश्रुति की बदौलत कविता किसी स्वप्निल, कोमल, वायवीय संसार में नहीं भटकती, बल्कि इच्छा और परिस्थिति के विकट द्वंद्व को साकार करती है ! नीलेश की नजर में अपने लिए किसी स्वप्न क्रो स्वायत्त करना और उसकी वैयक्तिक साधना करना गुनाह है ! उनके यहाँ सामान्य जन-जीवन ही स्वप्न की कसौटी है ! यही इस कविता का साम्यवाद है, जिसके चलते वे अपनी ही उत्साहित वस्तु से श्रमिक-वर्ग की चेतना के अलगाव और अपरिचय की विडंबना को पहचान पाती हैं-वे जो घर बनाते हैं उसके स्वप्न भी नहीं आते उन्हें !
    सवाल है कि प्रेमचंद के जिस होरी को किसान से भूमिहीन मजदुर बनने को विवश होना पड़ा और जिसकी एक दिन लू लगने से अकाल मृत्यु हुई, वह आज कहाँ है ? यह जानना हो तो नीलेश की अत्यंत मार्मिक और सांद्र कविता किसान पढ़नी चाहिए, जिसके किसी एक अंशा को उद्धृत करना कविता से अन्याय होगा ? फिर भी सारे ब्यौरे की प्रामाणिक लहजे में इस निष्कर्ष तक ले आते हैं-ये हमारे समय का किसान है न कि किसान का समय है ये । कोई पूछ सकता है कि किसान का समय था ही कब, पर कहने की जरूरत नहीं कि यह समय उसके लिए ज्यादा क्रूर और कठिन है । नीलेश साधारण जन-समाज से आवयविक रिश्ता कायम करती हैं, क्योंकि वे काव्य-वस्तु के लिए ही नहीं, भाषा और भाव के लिए भी उसके पास जाती हैं। सच है कि जो लोग सबसे अरक्षित और साधनहीन हैं, वे ही हँसते-हँसते मृत्यु की कामना कर सकते हैं । कबीर ने जिसे आकाश से अमृत निचोड़ना कहा था, उस तरह ये मृत्यु के हाथों से जिन्दगी छीन  लेते हैं । लेकिन जो मौत से डरते हैं, वे अपना सब कुछ बचाने की फिराक में जिन्दगी से ही कतराकर निकल जाते हैं । नीलेश की कविता प्रश्न करती है-क्यों खुटने से डरते हो ? हम तो रोज़ खुटते हैं ।
  • Mere Saakshatkaar : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    215 194

    Item Code: #KGP-2033

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : नरेन्द्र कोहली
    ऐसा कभी-कभी ही होता है कि आपका कोई पाठक, मित्र, समीक्षक, छात्र या कोई वास्तविक जिज्ञासु किसी प्रयोजन से या मात्र अपनी जिज्ञासा-शांति के लिए अपने सतह को कुछ छीलकर आपको तह तक नहीं तो कम से कम आपकी त्वचा के नीचे तक जानना चाहता है । वह लेखक के मानसिक संसार को उघाड़ना चाहता है । और मैंने प्रायः देखा है कि उस प्रकार की जिज्ञासा लिए हुए प्रश्नों का उत्तर मेरे पास भी बना-बनाया, तैयार नहीं होता । मुझे भी स्वयं अपने आप को टटोलना पाता है । अपने मानसिक संसार को पढ़ना पड़ता है । आश्चर्य होता से कि मैं तो स्वयं ही अपने आप को नहीं जानता था । नहीं जानता था कि मेरा 'स्व' क्या है । वे ऐसे प्रश्न होते हैं, जिनके माध्यम से लेखक स्वयं अपना आविष्कार करता है । अपने 'स्व' से परिचित होता है । उन प्रश्नों का उपकार मानता है कि उन्होंने उसे स्वयं अपने आप से परिचित कराया ।
    मेरा प्रयत्न है कि इस पुस्तक के माध्यम से कुछ ऐसे ही साक्षात्कार अपने पाठकों तक पहुंचा सकूँ । समय है कि वे उस लेखक नरेन्द्र कोहली को कुछ जान सकें, जो सामने पड़ने पर, मिलने-जुलने पर सामान्यत: आपसे मिलता नहीं है । वह नरेन्द्र कोहली अपने एकांत से है, जो सामान्यता सार्वजनिक रूप से सामने आना नहीं चाहता । आत्मीय जनों से मिलना और बात है और राह चलते लोगों को दिखना और । फिर भी...
    -नरेन्द्र कोहली
  • Akkhar Kund
    Padma Sachdev
    125 113

    Item Code: #KGP-1989

    Availability: In stock

    अक्खर कुंड 
    यूँ तो पद्मा सचदेव डोगरी की कवयित्री हैं, पर अनुवाद के माध्यम से जब वह प्रकट होती हैं , तो उनकी कविता में पूरे हिंदुस्तान की महक आती है । इससे सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि वह संपूर्ण भारतीय समाज और संस्कृति को शब्द देने वाली कुशल कवियत्री हैं ।
    पद्मा जी की कविता प्रकृति की कविता है और मनुष्य की संवेदना और करुणा की भी...। इनकी कविता में मिथकों की बानगी अदभुत और अलग पहचान से समृद्ध है । यहाँ वह सूक्ष्म में जाती हैं और उसे रूहानी भावों से जोड़ते हुए जो चित्रांकन करती है, वह जीवंत तो है ही, बल्कि अपनी जड़ों से जोडने का वास्तविक अहसास कराती हैं । इसलिए इनमें आत्मिक आनंद की अनुभूति भी है ।
    पद्मा जी की कविताओं में कश्मीर का बेमिसाल सौंदर्य  तो है ही, वहाँ की जातीय संस्कृति का सबल रेखांकन  भी है, यानी इनमें कश्मीरियत समूचे आकार में यहीं होती है । इन्हें शब्द-चित्रों को बनाते हुए उन्हें घाटी में बारूद की गंध भी आती है । इससे उनका संवेदनशील मन विचलित होता है, लेकिन वह इसे यूँ ही नहीं छोड़ देतीं, पीड़ितों-वंचितों को आशा और विश्वास भेंटती है । उनमें 'एक दिन लौटने का अहसास' जगाती हैं ।
  • Prerak Kathayen
    Shambhu Nath Panedy
    125 113

    Item Code: #KGP-145

    Availability: In stock


  • Bayabaan Mein Bahaar
    Urmila Shirish
    450 405

    Item Code: #KGP-594

    Availability: In stock


  • Lalmaniyan
    Maitreyi Pushpa
    220 198

    Item Code: #KGP-20

    Availability: In stock

    ललमनियाँ
    अपने पहले कहानी-संग्रह के प्रकाशन के साथ ही न केवल चर्चित बल्कि वरिष्ठ रचनाकारों में शामिल होने का गौरव मैत्रयी पुष्पा से पहले संभवतः किसी रचनाकार को हासिल नहीं हुआ होगा।
    मैत्रयी पुष्पा का किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित पहला कहानी-संग्रह ‘चिन्हार’ न केवल चर्चित रहा, हिंदी अकादमी ने पुरस्कृत भी किया। इसके बाद आए दो उपन्यास ‘बेतवा बहती रही’ और ‘इदन्नमम’ भी चर्चित और पुरस्कृत हुए।
    आज कोई भी कथा-पत्रिका, कथा-संकलन बिना मैत्रयी पुष्पा के रचनात्मक योगदान के अधूरा माना जाता है और आज की कहानी का कोई भी सर्वेक्षण इनके जिक्र के बिना अपूर्ण। अपनी हर कथा-रचना के साथ विषय-वैविध्य और परिपक्वता का परिचय देता कथाकार का यह दूसरा कहानी-संग्रह पाठकों तक पहुँचाते हुए किताबघर प्रकाशन उम्मीद करता है कि इस संग्रह को भी वही चर्चा और प्रशंसा हासिल होगी जो इन कहानियों के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के दौरान हुई थी।
  • Keet, Kitnay Rangeelay : Kitnay Niralay
    Premanand Chandola
    40 36

    Item Code: #KGP-9145

    Availability: In stock

    कीट : कितने रंगीले : कितने निराले
    जमीन, हवा, पानी-हर जगह रंगीले और निराले भाँति-भाँति के कीट अवश्य मौजूद मिलेंगे । छोटे-बड़े, नन्हे-मोटे, रेंगते-उडते हजारों प्रकार के कीट इस सृष्टि में भरे पड़े हैं। सचमुच ही बडे विचित्र हैं ये । हर प्रकार के वातावरण में रह लेते हैं और अपने आपको प्रकृति के अनुकूल ढाल लिया करते है । बड़े अजीबोगरीब प्राणी है ये कीट । सांस लेते हैं, लेकिन फेफडे नहीं । सुरीली तान छेड़ते हैं, लेकिन मुँह का कतई इस्तेमाल नहीं । सूँघते हैं, लेकिन नाक नदारद । सुनते हैं, लेकिन कान कहाँ । ये कोट मानव प्राणी के शत्रु भी हैं और मित्र भी । शत्रु वे, जो रोगकारी हैं और फसलों, पौधों, जानवरों-मवेशियों आदि को हानि पहुँचाते हैं । मित्र वे, जो हमारे लिए शहद, रेशम, लाख का उत्पादन करने, फूलों में परागण करने तथा हानिकारक कीटों को खाने, नष्ट करने का मोर्चा सँभालते है । मित्र कीटों का लालन-पालन मनुष्य अपने लाभ के लिए बड़े चाव से करता है और शत्रु कीटों के विनाश के लिए वह अनेक उपाय किया करता है ।
    प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने शत्रु और मित्र कीटों का बहुत रोचक वर्णन किया है और उनके बारे में वैज्ञानिक तथा खोजपूर्ण जानकारी दी है ।
  • Tale Of A Wasteland (Paperback)
    Phanishwarnath Renu
    495 446

    Item Code: #KGP-338

    Availability: In stock

    Phaneeshwar Nath Renu, a true son of the soil, has created in Parti Parikatha, rendered here in English as ‘Tale of a Wasteland’; a major modern classic through the original genius he brought to bear upon his theme. Renu’s deeply moving cry against an unjust social order coupled with his compassion for men; his freedom from bitterness against the establishment, and his love of common humanity backed by his creation of half a dozen powerful, living authentic figures with whom he peoples his world set against the Wasteland perpetrated by Nature on man sets him apart as a major creative genius who has come to stay. Every reader of this ‘epic in prose’ will feel real life throbbing and pulsating through each page of this book. On its broad canvas, the life of two generations has been inimitably presented by Renu with his exquisite art which creates unforgettable characters through episodes and dialogues in an idiom that shows his power over words. Indeed, no reader, once he has gone through this book, can help missing some of these characters that he has lived with while reading this saga, lighted by Renu’s vision of hope which ‘no depth of despair, no height of cynicism can possibly defeat’.
  • The Great Horizon (Biography)
    Debabrata Dasgupta
    345 311

    Item Code: #KGP-342

    Availability: In stock

    The Great Horizon is a biographical novel on Sir Alexander Fleming, a Scottish biologist and pharmacologist. His best-known discoveries are the discovery of the enzyme lysozyme and the antibiotic substance penicillin from the mold Penicillium notatum, for which he shared the Nobel Prize in Physiology or Medicine in 1945 with Howard Florey and Ernst Chain.
    Discovery of penicillin has come naturally as a life-giver to mankind. Disease-torn distressed humans have got a means of longevity through this life-saver. It has contributed in no less measure, to the average human longevity crossing the figure of seventies. The bright rays of the antibiotics have dispersed the dark clouds of sickness and diseases, which overcast the sky of human destiny. All this has been made possible due to the physician named Alexander Fleming who discovered it in 1928 and unfolded a new horizon.
  • Dainik Jeevan Mein Ayurveda
    Vinod Verma
    500 450

    Item Code: #KGP-9149

    Availability: In stock

    दुर्भाग्य की बात है कि आयुर्वेद का असीमित ज्ञान इस देश की संचालन-व्यवस्था में समुचित प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आयुर्वेद के विकास तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। हमारी शासन-व्यवस्था भी इस ओर उदासीन रही। आयुर्वेद को ‘देशी’ कहकर उपेक्षित कर दिया गया। किंतु आज जिस नए युग का प्रारंभ हो रहा है उसमें हमारा पुनर्जागरण सुनिचित है जिसमें हमें आभास होगा कि जिसे हमारे देशवासियों ने ‘देशी’ कहकर त्याग दिया था उसी को विदेशी लोग अच्छे आवरण में डालकर हमें बेच रहे हैं। ‘दादी मां’ की परंपरा अर्थात् आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान, जो हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है, उसे हमारी शिक्षा-प्रणाली में सम्मिलित किया जाय। इस दृष्टि से स्कूलों तथा मेडिकल काॅलेजों के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के कुछ महत्वपूर्ण अंश पढ़ाए तथा सिखाए जाने चाहिए। आयुर्वेद के जिज्ञासुओं और अनुसंधित्सुओं के लिए उपयोगी जानकारी देने और तत्संबंधी अज्ञान को दूर करने में सहायक प्रस्तुत ग्रंथ इस विषय की विदुषी सुश्री विनोद वर्मा की अनूठी कृति है।
  • Lalit Nibandh : Swaroop Evam Parampara
    Dr. Shri Ram Parihar
    750 675

    Item Code: #KGP-781

    Availability: In stock


  • Seema
    Ramkrishna Sudhakar
    125 113

    Item Code: #KGP-9090

    Availability: In stock


  • Apajas Apne Naam
    Ram Kumar Krishak
    190 171

    Item Code: #KGP-1895

    Availability: In stock

    कवि केदारनाथ अग्रवाल ने एक बार मुझसे कहा था—'जब लोग पैसे कमा रहे थे, तब मैं बदनामी कमा रहा था। ' ठीक यहीं भावार्थ देता है कृषक का यह नया ग़ज़ल-संग्रह—'अपजस अपने नाम' । केदार जी की 'बदनामी' और कृषक जी का 'अपजस' क्या है? रचना की खेती करनेवालों और रचना-कर्म में जीवन होमनेवालों को 'दुनियादार लोग' बेकार ही तो समझते है । कबीर और उनके समकालीनों के प्रति भी धन्नासेठों और श्रीमती का यही रवैया था।
    कृषक जी का साहित्य और उनका जीवन एक-दूजे से अलग नहीं है, इसीलिए उनकी ग़ज़लें विश्वसनीय हैं । उनमें वर्णित सच किसी भी तरह की पॉलिमिक्स नहीं है । तरह-तरह के अभावों में जीते, धारा के विरुद्ध संघर्ष करते उन्होंने एक लंबी और बहुस्तरीय रचना-यात्रा की है, जिसमें हमेशा ही उनके कथ्य ने नई और माकूल भाषा बरती है ।
    वर्तमान सामाजिक जीवन में व्यवस्थाजन्य अनेक जहरीली गुत्थियाँ हैं,  जिन्हें खोलते-खोलते रचनाकार बार-बार हँसा जाता है, लेकिन मरता नहीं और आत्यंतिक सच सामने रख देता है । सच कहने के एवज में हर युग, हर समय में कवियों-कलाकारों-विचारकों-जननायकों को अपार कष्ट झेलना पडा, लेकिन वे न झुके, न टूटे । यही कारण है कि कृषक जी की ग़ज़लें हमारे समय के रोज पैदा होनेवाले यक्ष प्रश्नों से गुत्थमगुत्था हैं। वे कहीं संकेतों में अपनी बात कहते है, कहीं सीधे-सीधे ।
    दरअसल कृषक उन कवियों में नहीं है, जो रचना और आलोचना के बने-बनाए खाँचों और ठप्पो में फिट बैठते हों। जन-प्रतिबद्ध कोई कवि ऐसा हो भी नहीं सकता। वे एक सजग और निडर सामाजिक कवि है । कवियों की उस जमात से कत्तई अलग, जहाँ सब कुछ ज़गमग-ज़गमग होता है। इसीलिए उनके यहीं अनुपयोगी सजावट, पच्चीकारी या कला-कोविदी नहीं है। इसीलिए वे 'अदबी नसीहतों' पर कुर्बान नहीं होते, बल्कि न्याय और इंसानियत के लिए लड़ रही जनता पर कुर्बान होते हैं ।
    उम्मीद है, 'नीम की पतियां' के बाद कृषक जी का यह ग़ज़ल-संग्रह पाठकों को ज़रूर कुछ नया देगा ।
    -कुबेरदत्त
  • Bharat Main Panchayti Raaj
    Vishv Nath Gupta
    160 144

    Item Code: #KGP-321

    Availability: In stock

    हमारे देश में पंचायती राज व्यवस्था किसी न किसी रूप में वैदिक काल में भी विद्यमान थी, लेकिन वर्तमान स्थिति तक पहुंचने में इसे एक बहुत लंबी यात्रा तय करनी पड़ी। संविधान 73वां संशोधन अधिनियम, 1992 लागू होने के बाद इसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ।
    प्रस्तुत पुस्तक में पंचायती राज का संक्षिप्त इतिहास देते हुए, 1992 में बने कानून के प्रावधनों पर विस्तार से चर्चा की गई है। वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था का जो त्रि-स्तरीय ढांचा है, उसके बारे में यथासंभव संपूर्ण जानकारी दी गई है। त्रि-स्तरीय ढांचे के बाहर होने पर भी महत्त्वपूर्ण होने के कारण ‘ग्राम-सभा’ पर भी अलग से चर्चा की गई है। साथ ही पंचायती राज संस्थाओं को मीडिया का समर्थन, ई-पंचायत तथा पंचायती राज संस्थाओं को समर्थन देने वाली संस्थाओं के बारे में भी उपयोगी जानकारी दी गई है।
    पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की एक तिहाई भागीदारी सुनिश्चित की गई है और महिलाएं पंचायती राज व्यवस्था में अच्छा काम कर रही हैं। इसलिए महिलाओं की भागीदारी पर एक विशेष अध्याय पुस्तक में जोड़ा गया है। महिलाओं के समक्ष क्या-क्या चुनौतियां हैं—इस बात की चर्चा भी की गई है। इसके साथ ही एक अध्याय पंचायत महिला एवं युवा शक्ति अभियान पर भी है।
    इस पुस्तक से संबंधित सामग्री जुटाने में मुझे मेरे पुत्र अरविंद कुमार, दामाद कमल अग्रवाल, अजय कुमार रूंगटा, पुत्री कुसुम और सुमन के अलावा पड़ोसी मित्र श्री रामकृष्ण से सहयोग प्राप्त हुआ है। सामग्री अधिकांशतः इंटरनेट तथा पंचायती राज मंत्रालय के कार्यालय से प्राप्त हुई है।
    पर्याप्त ध्यान रखने के बावजूद कुछ त्रुटियां पुस्तक में रह सकती हैं, जिनके लिए मैं स्वयं क्षमाप्रार्थी हूं।
  • The Story Of My Experiments With Truth (Paperback)
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    199

    Item Code: #KGP-349

    Availability: In stock

    A face we see all around us… everyday, even if we do not visit government offices. Teachings people swear by and entertained to in films. We still see his style being imitated in the political circles—that is Mohandas Karamchand Gandhi. One of the influencers of the millennium, the ‘half naked’ Indian man who shook the mightiest empire of the modern world, has a story to tell—his story. 
    An autobiography of Gandhi, the book starts with his birth, and ends with his experiences till 1921. The original manuscript was written in weekly installments in Gujarati by Gandhi, and was published weekly in his journal Navjivan from 1925 to 1929. It was later translated by Mahadev Desai in English, which too was published in installments in his other journal Young India.
    Unlike most autobiographies or biographies, Gandhi’s autobiography speaks about his fears, regrets, failures, struggles, and all that went through his mind while initiating and going through the experiments he conducted, in his and his immediate family’s lives. Gandhi hides nothing from his readers; he wants his experiences and experiments to reach out to people so that their life becomes worth living.
    Gandhi, through his lucid and simple style of writing, honest opinions, and candid narrations, takes us to the man who was ‘mahatma’ in his thoughts and actions.    
  • Man Mirza Tan Sahiban
    Amrita Pritam
    90 81

    Item Code: #KGP-1967

    Availability: In stock


  • Devinder Ki Kahaniyan
    Devindra
    125 113

    Item Code: #KGP-1828

    Availability: In stock


  • Teen Tare
    Himanshu Joshi
    100 90

    Item Code: #KGP-1103

    Availability: In stock

    किशोर मन की उड़ानों के लिए सारा आकाश ही छोटा पड़ जाता है। किशारों की इस दुनिया में जड़ और जंगल, पशु और पक्षी सभी कुछ तो मनुष्यों के मित्र और सहायक होते हैं। इस मनोरंजक कहानी में गधे के दो नन्हे-मुन्ने बच्चे एक मानव किशोर के परम मित्र बनकर बड़ी ही रोमांचक और साहसपूर्ण यात्रा पर निकल पड़े हैं। पग-पग पर आपदाएं आती हैं। चोर-लुटेरे हैं, हिंसक जंतु और उनसे भी डरावने डाकू हैं। पर तीनों मित्र अपनी सूझ-बूण् और हिम्मत से सबको छकाते हुए अपना उद्धार करते हैं और दूसरे कई बालकों का उद्धार भी करते हैं। और इस बहुत बड़ी दुनिया में घूम-भटक कर घर लौट आते हैं। जिस शान से वे घर लौटे, अपनी यात्रा में जो ज्ञान और साहस उन्होंने संचित किया, आपदाओं की भट्ठी में मैत्री के सोने को उन्होंने कंचन बनाया, वह सभी किशोर पाठकों को भी प्राप्त हो।
  • Dwidhaa (Paperback)
    Bhairppa
    275

    Item Code: #KGP-502

    Availability: In stock

    कन्नड़ भाषा के यशस्वी उपन्यासकार भैरप्पा की रचनाएं पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं। उनके उपन्यास कथानक की दृष्टि से उल्लेखनीय होते हैं। वे सामाजिक संदर्भों से प्रेरित हों अथवा प्राचीन प्रसंगों को पुनः परिभाषित करते हों—अपने पाठकों को भाव व विचार की एक नई दुनिया में ले जाते हैं। भैरप्पा का नया उपन्यास ‘द्विधा’ को पढ़कर कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है।
    प्रस्तुत उपन्यास स्त्री-पुरुष के मध्य मौजूद प्रश्नों व प्रसंगों से उद्वेलित है। देह, प्रेम, सहवास, गर्भ, गर्भपात, अधिकार, पत्नी, प्रेमिका, रखैल आदि जाने कितने ऐसे प्रश्न जिनको अनेक बार भिन्न-भिन्न तरीकों से कथा-साहित्य में प्रस्तुत किया जा चुका है। ...किंतु जिस सामाजिक धरातल पर भैरप्पा ने इन्हें ‘द्विधा’ में विस्तार दिया है वह अनूठा है। शारीरिक संपर्क और स्त्री-पुरुष प्रेम के विषय में उपन्यास का एक पात्र कहता है, 
    ‘...जिन्होंने शारीरिक संबंध की मृदुता का अनुभव किया हो, वे शारीरिक संबंध को तजकर, केवल मानसिक रूप से स्नेह-संबंध बनाए रखने का प्रयत्न करेंगे, तब भी स्नेह शुष्क हो जाता है।’ उपन्यास में ऐसे उन्मुक्त विवरण एक नई बहस छेड़ते हैं।
    यह उपन्यास ‘स्त्री मुक्ति’ की जटिल व सूक्ष्म व्याख्याओं में भी ले जाता है। क्या ‘स्त्री मुक्ति’ के आधार पर प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग नहीं होता, क्या इससे परिवार नाम की संस्था को कोई खतरा नहीं प्रतीत होता; ऐसे बहुत से ज्वलंत मुद्दे हैं जिनको भैरप्पा ने उपन्यास में शामिल किया है। मानवीय दुर्बलताओं और उनसे उत्पन्न संकटों/विसंगतियों/दुष्परिणामों को भलीभांति चित्रित किया है। कथानक विस्तृत है। लेखक ने विभिन्न चरित्रों के द्वारा समकालीन समाज की प्रवृत्तियों को रेखांकित किया है। समग्रतः एक ऐसा उपन्यास जो हमारे समय की सच्चाइयों व समस्याओं का आईना है।
  • Tumhare Pyar Ki Paati
    Shanta Kumar
    95 86

    Item Code: #KGP-1986

    Availability: In stock

    तुम्हारे प्यार की पाती
    कविता लिखने की सोचकर मैंने कभी भी कविता नहीं लिखी। शायद सोचकर कविता लिखी भी नहीं जाती। कविता तो भावनाओं की धारा बनकर स्वयं ही प्रवाहित होती है। स्वयं ही लिखी जाती है।
    मैं 1953 में कश्मीर आंदोलन में सत्याग्रह करके हिसार की जेल में गया। हिसार की तपती गर्मी व जेल की यातनाओं से बाल-मन में कुछ भावनाएँ कविता बनकर उतरती रहीं। उसके बाद लंबे 22 वर्ष बीत गए। सार्वजनिक जीवन की व्यस्तता और संघर्ष में मुझसे मेरे कवि का कोई संपर्क न हुआ। फिर 1975 में आपातकाल के समय नाहन जेल में मुझे मेरा कवि मिला। कुछ कविताएँ लिखी गईं।
    श्री जयप्रकाश नारायण मुंबई में अपने जीवन के अंतिम पहर में थे। कुछ दिन बाद उनका स्वर्गवास हो गया। उनके अंतिम संस्कार में पटना गया। पटना से दिल्ली लौटा। एक कविता ‘फूल लेकर आए थे’ लिखी गई। ‘धर्मयुग’ के संपादक श्री धर्मवीर भारती जी ने मुझे फोन करके उस कविता पर बधाई भेजी थी।
    मैं दो बार हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा और एक बार केंद्र में मंत्री रहा। विकास की सारी प्रक्रिया में ‘अंत्योदय’ का मंत्र मेरी प्रेरणा रहा। उसी संबंध में मेरी कविता ‘अंत्योदय’ को भी श्री धर्मवीर भारती और अन्य मित्रों ने बहुत सराहा था।
    इन कविताओं के माध्यम से जो कुछ मन में उमड़ा वही इन शब्दों में उतर आया और अब पाठकों को समर्पित है।
    —शान्ता कुमार
  • Kavi Ne Kaha : Ekant Shrivastava (Paperback)
    Ekant Shrivastva
    140

    Item Code: #KGP-7021

    Availability: In stock

    एकान्त वस्तुतः छत्तीसगढ़ की ‘कन्हार’ के कवि हैं। एकान्त का काव्य-संसार एक ओर माँ-बाप, भाई-बहन का भरा-पूरा परिवार है तो दूसरी ओर अंधी लड़की, अपाहिज और बधिर जैसे असहाय लोगों का शरण्य भी और ‘कन्हार’ जैसी लंबी कविता तो एक तरह से नख-दर्पण में आज के भारत का छाया-चित्र ही है। ‘अन्न हैं मेरे शब्द’ से अपनी काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले एकान्त उन थोड़े से कवियों में हैं जो ‘शब्द’ को अपनी कविताओं से एक नया अर्थ दे रहे हैं। निश्चय ही एकान्त का काव्य एक लंबी छलाँग है और ऊँची उड़ान भी--कवि के ही शब्दों में एक भयानक शून्य की भरपाई। ---नामवर सिंह
    काली मिट्टी से कपास की तरह उगने की आकांक्षा से उद्वेलित यह कवि अपनी हर अगली कविता में मानो पाठक को आश्वस्त करता है कि वह अपने भाव-लोक में चाहे जितनी भी दूर चला जाए, अंततः लौटकर वहीं आएगा जो उसके अनुभव की तपी हुई काली मिट्टी है। यह एक ऐसी दुनिया है जो एक किसानी परिवेश के चमकते हुए बिंबों और स्मृतियों से भरी है। एक अच्छी बात यह कि गहरे अर्थ में पर्यावरण-सजग इस कवि के पास एक ऐसी देखती-सुनती, छूती और चखती हुई भाषा है, जो पाठक की संवेदना से सीध संलाप करती है।   ---केदारनाथ सिंह
    एकान्त की कविता और कवि-कर्म की खूबी है कि उन्होंने अपने को औपनिवेशिक आधुनिकता के पश्चिमी कुप्रभाव से बचाया है। यही कारण है कि उनकी कविता कलावादी और रूपवादी प्रभाव से मुक्त है। ऐसा इसलिए कि एकान्त अपने जनपद, अपनी जड़ों और अपनी ज़मीन को कभी नहीं छोड़ते। उनकी कविता हमें भारतीय समृद्ध काव्य-परंपरा की याद दिलाती है जो आज की अधिकांश कविता से विलुप्तप्राय है। एकान्त, निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा के सशक्त कवि हैं। एकान्त की कविता में कोई ठहराव नहीं है। वे आज भी नित नवीन और सारगर्भित कविताएँ बिना किसी विचलन या दोहराव के रच रहे हैं। क्योंकि उनका गहरा रिश्ता भारतीय लोक और जनमानस से बना हुआ है। सही अर्थों में वे लोकधर्मी कवि हैं। ‘नागकेसर का देश यह’ हिंदी में एकान्त की सर्वाधिक लंबी कविता है जिसके कई अर्थ-ध्वनिस्तर हैं और बड़ी संश्लिष्टता है।      ---विजेन्द्र
  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh
    Shravan Kumar
    795 596

    Item Code: #KGP-596

    Availability: In stock


  • Hashiye Par Harf
    Prem Bhardwaj
    400 360

    Item Code: #KGP-450

    Availability: In stock

    लक्ष्मण रेखा लांघने वाली बात मीडिया के साथ कैसे कुछ हद तक सही बैठती है, इसे भी समझने की जरूरत है। एक जमाने से पत्रकारिता को पवित्र पेशा या मिशन माना गया है। किसी लक्ष्मण ने नहीं, उससे पवित्रता की इसी जन-अपेक्षा ने लक्ष्मण रेखा न जाने कब, क्यों और कैसे खींच दी? सत्ता का यह चरित्र होता है कि वो अपने समय में पवित्र चीजों को भ्रष्ट करती है और मन को भाने वाली वस्तु या इंसान को भोग की चीज मानती है। सर्वत्र पर मालिकाना हक ही उसका स्वभाव है। लिहाजा उसे गवारा नहीं कि वो गलत है तो सामने वाला सही रहकर उसके लिए ‘गलत’ की परिधि को बरकरार रखे। खुद को इस परिधि से बाहर निकालने या अच्छाई की लकीर को मिटाने के मकसद से ही वो तरह-तरह का छल-प्रपंच करती है। कई दफा वो अपनी ताकत का जौहर दिखाकर जबरदस्ती भी करती है। जरूरत पड़ने पर ‘मायाजाल’ भी रचने से गुरेज नहीं करती। राडिया प्रकरण में कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने भी मायाजाल रचा। मीडियारूपी सीता के मन में ‘स्वर्णमृग’ (धन, संपन्नता और सुविधाएं) का लोभ जन्मा। और वह किसी को कुछ देने (एक राजा को मंत्रालय देने) की खातिर लक्ष्मण रेखा को लांघ गई। बदले में उसे क्या मिला, यह अभी सामने नहीं आया है। बहुत संभव है बाद में कुछ पता चले।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Dharamvir Bharti
    Dharamvir Bharti
    300 270

    Item Code: #KGP-9159

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’ शृंखला में प्रस्तुत हैं धर्मवीर भारती की दस प्रतिनिधि कहानियांµ ‘कुलटा’, ‘गुलकी बन्नो’, ‘धुआं’, ‘सावित्री नंबर दो’, ‘यह मेरे लिए नहीं’, ‘हिंदू या मुसलमान’, ‘बंद गली का आखिरी मकान’, ‘हरिनाकुस और उसका बेटा’, ‘आश्रम’ तथा ‘एक छोटी मछली की कहानी’ (हस्तलिखित)।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Pyar Botsavana Kee Baarish Jaisa Hey (African Stories)
    Urmila Jain
    350 315

    Item Code: #KGP-9028

    Availability: In stock

    ‘प्यार बोत्सवाना की बारिश जैसा है’ अत्यंत संवेदनशील अफ्रीकी कहानियों का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद और संपादन उर्मिला जैन ने किया है। वे देशी और विदेशी साहित्य की मर्मज्ञ हैं। पाठक के रूप में जिन रचनाओं ने उनके हृदय को छुआ उन्हें व्यापक पाठक वर्ग के लिए वे इस संकलन में प्रस्तुत कर रही हैं। अनूदित रचनाओं की लोकप्रियता के बावजूद हिंदी में अफ्रीकी कहानियां बहुत कम उपलब्ध हैं। विश्व का यह भाग अपनी संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए रेखांकित किया जाता है। केन्या, गांबिया, गिनी, नाइज़ीरिया, सेनेगल, बोत्सवाना आदि की रचनाशीलता से उर्मिला जैन ने बारह कहानियां चुनी हैं।
    ये कहानियां बताती हैं कि भाषा, देश, पहनावा, आचार, परंपरा आदि की भिन्नताओं के बाद भी मूलभूत समस्याएं और संवेदनाएं तो एक जैसी हैं। अभाव, उपेक्षा, गुलामी, अपमान, निराशा से हर जगह मनुष्य जूझ रहा है। व्यक्ति के भीतर छिपे पाखंड भी हर स्थान पर लगभग समान हैं। संकलन की शीर्षक कहानी के वाक्य हैं, ‘मैंने अपनी पोशाक सावधानी से चुनी थी। अपने भय को सम्मानित रूप में ढका था।’ अनुवाद करते समय उर्मिला जैन ने मूल भाषा के प्रवाह और आशय को भली-भांति संप्रेषित किया है। ‘काली लड़की’ कहानी की डिऔआना का संताप इन पंक्तियों में प्रकट हुआ है, ‘उस रात उसने अपना सूटकेस खोला। उसके अंदर की चीजों को देखा और रोई। किसी ने परवाह नहीं की। फिर भी वह उसी प्रवाह में बहती रही और दूसरों से वैसे ही दूर रही जैसे उसके गांव कासामांस में समुद्र किनारे घोंघे पड़े रहते हैं।’
    अपनी प्रखर कथाभूमि और मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण ये कहानियां पाठकों को खूब अच्छी लगेंगी। ऐसा लगेगा जैसे वे अपने ही समाज या देश का वृत्तांत पढ़ रहे हैं। ये रचनाएं विचार और संवेदना के वैश्विक सूत्र प्रदान करती हैं।
  • Munna Ro Raha Hai
    Prahlad Shree Mali
    280 252

    Item Code: #KGP-590

    Availability: In stock

    "सच कहूं तो इन नेता-अफसरों के चरित्र और आचरण ने मेरा मनोबल बढ़ाया है। जैसे औलाद नालायक निकल जाए तो समझदार मां-बाप खुद में नई ताकत पैदा कर लेते हैं अपनी सार-संभाल की। वैसे ही जब मैंने यह देखा कि इन नेता-मंत्रियों, सरकारी कर्मचारियों से देश-समाज और नागरिक का भला होना मुश्किल है, तो बस अपना मनोबल ऊंचा कर लिया। रही बात आशा-चिंता की तो यदि आप आशा-अपेक्षा रखेंगे तो चिंता होगी ही। साथ ही दुःख भी मिलेगा। मेरे खयाल से पति-पत्नी या संतान से हमेशा किसी को मनचाहा सुख नहीं मिलता। इसके लिए तो मन को मनाकर संतोष रखना पड़ता है। मेरे दादा की छह संतानें थीं। चार लड़के, दो लड़कियां। बेचारे उनके पीछे अपना पूरा जीवन घिसते रहे। न बेटों ने सुख दिया, न बेटियों ने चैन। पर इसमें उनका भी क्या दोष! वे सब भी तो अपनी-अपनी गृहस्थी की गाड़ी चलाने की खींचतान में लगे हुए थे। यही हाल मेरे पिताजी का रहा। उन्हें न तो मैं कोई सुख दे पाया, न मेरा भाई। और यह अकेले मेरी नहीं, लगभग हर घर की कहानी है। फिर भला मैं अपने बेटे से कोई सुख पाने की अपेक्षा रखने की नादानी क्यों करूं!"
    -इसी पुस्तक से  
  • Rahiman Dhaaga Prem Ka (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-7039

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    [इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]

  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Jaishankar Prasad
    Jaishankar Prasad
    180 162

    Item Code: #KGP-9158

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं जयशंकर प्रसाद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘आकाश-दीप’, ‘ममता’, ‘आंधी’, ‘मधुआ’, ‘व्रत-भंग’, ‘पुरस्कार’, ‘इंद्रजाल’, ‘गुंडा’, ‘देवरथ’ तथा ‘सालवती’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Maansik Svasthya Aur Manahchikitsa
    Asha Rani Vhora
    160 144

    Item Code: #KGP-1095

    Availability: In stock

    मानसिक स्वास्थ्य और मन:चिकित्सा 
    विसंगतियों और विद्रूपताओं, भागदौड़ और आपाधापी के संघर्ष और तनाव के माहौल में व्यक्ति या तो भीड़ का अंग होकर रह गया है या फिर आत्मकेंद्रित हो अकेले जूझने के लिए विवश हो गया है । आज लगभग हर व्यक्ति को अपना मानसिक संतुलन कायम रखने में कठिनाई आ रही है । यही संतुलन अधिक गडबडा जाने पर वह अनेक मानसिक आधियों-व्याधियों से घिरने लगता है । अधियां, यानी मानसिक समस्याएँ और व्याधियां, यानी मानसिक रोग । लेकिन दूर मानसिक रोग पागलपन नहीं होता, न ही लाइलाज, जबकि हमारे समाज में फैली अनेक भ्रांतियों के कारण एक ओर लोग सामान्य मानसिक रोगों को भूत-प्रेत-बाधा मान लेते हैं और झाढ़-फूँक के चक्कर में बिना इलाज रोग को और बढा लेते हैं, दूसरी और मामूली मानसिक समस्या के समाधान के लिए भी मानसिक विशेषज्ञ के पास जाने पर व्यक्ति को संदेह की वृष्टि से देखा जाने लगता है । एक स्वस्थ समाज की रचना के लिए पहले व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक होना चाहिए । अत: मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, सभी स्तरों पर अपेक्षित है । इसी अपेक्षा, आकांक्षा, आवश्यकता-पूर्ति की दिशा में एक सदप्रयास है प्रस्तुत पुस्तक ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Qurratulain Hyder
    Qurratulain Hyder
    260 234

    Item Code: #KGP-833

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कुर्रतुलऐन हैदर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो', 'फोटोग्राफ़र', 'कारमिन', 'पतझड़ की आवाज़', 'जुगनुओं की दुनिया', 'कलंदर', 'कोहरे के पीछे', 'कुलीन', 'डालनवाला' तथा 'यह दाग-दाग उजाला' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कुर्रतुलऐन हैदर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Namvar Hone Ka Arth (Paperback)
    Bharat Yayavar
    225

    Item Code: #KGP-392

    Availability: In stock

    नामवर होने का अर्थ
    प्रस्तुत पुस्तक नामवर सिंह के जीवन एवं साहित्य का एक पाश्र्वचित्र या प्रोफाइल है। इसे सही मायनों में ‘जीवनी’ भी नहीं कहा जा सकता। कोशिश यह रही है कि उनके जीवन एवं साहित्य का एक सामान्य परिचय इस पुस्तक के द्वारा प्रस्तुत हो जाए। इस कोशिश में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह स्वयं नहीं कह सकता। बस निश्चयपूर्वक इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उनके जीवन एवं साहित्य को जानने-समझने का यह मेरा विनम्र प्रयास है।
    बात उस समय की है, जब मैं साहित्य की दुनिया में अपनी आँखें खोल रहा था। यह बीसवीं शताब्दी का आठवाँ दशक था और मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी था। उन्हीं दिनों मैंने नामवर जी की तीन पुस्तकें खरीदीं और पढ़ी थीं-- ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’। इनमें उनकी ‘छायावाद’ पुस्तक मुझे तब बहुत अच्छी लगी थी और आज भी उनकी सभी पुस्तकों में यही मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। 
    1982 ई. की गर्मियों में मैं दिल्ली गया। उन्हीं दिनों एक दिन मुझसे त्रिलोचन जी ने कहा कि नामवर अपने समय के एक समर्थ कवि थे, उनकी कविताओं को खोजकर पुस्तक-रूप में प्रकाशित कीजिए। इन कविताओं की खोज के साथ-साथ तभी मैंने प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने का मन बना लिया था। खोज की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर यह पुस्तक तैयार की।
    मैं यह भी स्पष्टीकरण कर देना चाहता हूँ कि यह पुस्तक एक सहयोगी प्रयास है। इसमें सबसे ज्यादा नामवर जी की विलुप्त रचनाएँ दी गई हैं। उनसे संबंध रखने वाले लेखकों के संस्मरण एवं पत्रों का भी उपयोग इसमें हुआ है। इस सहयोगी प्रयास में जिन लेखकों के वक्तव्य या कथन का इसमें प्रयोग किया गया है, उनके प्रति मैं आभार स्वीकार करता हूँ।
  • Toro Kara Toro-2 (Sadhna)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-763

    Availability: In stock


  • Jauhar Ke Akshar
    Santosh Shelja
    160 144

    Item Code: #KGP-9075

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-4 (Nirdesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-740

    Availability: In stock


  • Theekare Ki Mangani
    Nasera Sharma
    300 270

    Item Code: #KGP-24

    Availability: In stock


  • Maitreyi Pushpa : Stri Hone Ki Katha
    Vijay Bahadur Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-9041

    Availability: In stock


  • Mathuradas Ki Diary
    Mudra Rakshes
    50 45

    Item Code: #KGP-2089

    Availability: In stock

    थुरादास की डायरी' शीर्षक से ही  कुछ बरस पहले एक अत्यन्त विवादास्पद लगभग विस्फोटक व्यंग्य लेख श्रृंखला छपी थी । पता यहीं वह इन लेखों की सफलता थी या असफलता कि लोगों ने इसे बंद कराकर ही दम लिया । इसके बाद एक दूसरी श्रृंखला छपी 'राक्षस उवाच' नाम से । इसके वैसे हो अन्त से पहले घर पर  पथराव हुए, कुछ धमकियाँ भी आई ।  बदमाशा मित्र इसे सौभाग्य बताते रहे पर संपादक नेक साबित हुए । श्रृंखला फिर बन्द हो गई ।
    मगर कुछ लोगों का शुभ विचार है कि श्रृंखलाएँ बंद करवाने की इतनी सफल कोशिशों कें बाद भी ये लेख गड़बड़ी  फैलाने में खासे कामयाब हुए ।

    –मुद्राराक्षस
  • Mere Saakshaatkaar : Vidya Sagar Nautiyal
    Vidya Sagar Nautiyal
    250 225

    Item Code: #KGP-635

    Availability: In stock


  • Jan, Samaaj Aur Sanskriti
    Vishnu Prabhakar
    35 32

    Item Code: #KGP-9141

    Availability: In stock

    वे कुछ भी क्यों न हों पर उनमें से अधिकांश के पीछे एक समान दृष्टि है । वह दृष्टि परंपरा को नकारती नहीं, बल्कि उसके मध्य से भावात्मक एकता की कल्पना की एकता-मूलक संस्कृति को समझने-पहचानने की कोशिश करती है । वह दृष्टि धर्म, समाज, संस्कृति और संप्रदाय के मोहातीत सही अर्थ जानने को भी व्यग्र है । उसमें न पूर्वाग्रह है, न विद्वत्ता का उदघोष, बल्कि जो उपलब्ध है, उसकी सहायता से खोज की, निरंतर खोज की छह है । इससे अधिक का दावा किया भी नहीं जा सकता क्योंकि सर्जक के सामने मंजिल होती ही नहीं, तलाश होती है । 
    तलाशो तलब में वह लज्जत मिली है 
    दुआ कर रहा हूँ की मंज़िल न आवे । 
  • Main Jasdev Singh Bol Raha Hoon
    Jasdev Singh
    480 432

    Item Code: #KGP-40

    Availability: In stock


  • Jangal Se Shahar Tak
    Rajendra Avasthi
    260 234

    Item Code: #KGP-9099

    Availability: In stock

    जंगल से शहर तक
    अपने को मैं सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे मध्य प्रदेश और बस्तर से लेकर पूरे देश के आदिवासियों के बीच काम करने, रहने और उनके जीवन को गहराई से समझने का अवसर मिला है। मुझे बहुत ही सुखद आश्चर्य हुआ था कि आज की दुनिया से अलग इनकी अपनी जिंदगी है और उस जिंदगी के प्रति कभी उन्होंने शिकायत नहीं की। उनके लिए जो कुछ संभव था, कई तरह किया गया। बस्तर उस समय के मध्य प्रदेश का ही नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा जिला था। जगदलपुर इसका मुख्यालय आज भी है। इतने बड़े क्षेत्र को संभालना आसान नहीं है। मैं कृतज्ञता ज्ञापन करूंगा कि जगदलपुर अब ढाई जिलों में कंट गया है। धीरे-धीरे अब वहां सुधार हो रहा है और वहां के निवासियों की उन्नति के लिए सरकार प्रयत्नशील है। यही बात नागा, गोंड़, टोडा, कोरकू, उराव, खोंड इत्यादि क्षेत्रों की है। मुझे याद है कि एक समय इनके बीच में पहुंचना बहुत कठिन था। स्थिति अब बदल गई है और वे प्रसन्नतापूर्वक इस समूचे देश के अंग हैं। यह ज्ञान उन्हें हो रहा है।
    मैंने कुछ भी चीज कल्पना से नहीं लिखी। इनके बीच में इनका बनकर, रहकर मैंने काम किया है। सारी व्यस्तताओं के बावजूद मुझे जंगलों में घूमनो हमेशा पसंद रहा है। कहा जा सकता है कि मैं जंगली भी हूं और शहरी भी।
    इतिहास, साहितय-जीवन, देश और काल का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। वह अपने अतीत के माध्यम से आज का चित्र प्रस्तुत करता है।
    —राजेन्द्र अवस्थी
  • Shyamlal Ka Akelapan
    Sanjay Kundan
    300 270

    Item Code: #KGP-686

    Availability: In stock

    संजय कुंदन ने अपनी कथारचनाओं से पाठकों और आलोचकों का ध्यान समान रूप से आकृष्ट किया है। ‘श्यामलाल का अकेलापन’ उनकी कहानियों का नवीनतम संग्रह है। संग्रह में मौजूद कहानियों से कुछ बातें उभरकर सामने आती हैं। संजय सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को बिना किसी ‘सीमित पक्षधरता’ के विश्लेषित करते हैं। इस विश्लेषण में वे उस मनुष्य को केंद्र में रखते हैं जिससे समाज बनता है और कहानी भी।
    यह कहना मुनासिब होगा कि संजय  कुंदन एक अद्भुत किस्सागो हैं। ‘कहन’ की परंपरागत विशेषताओं से वे लाभ उठाते हैं और उसे नवीनतम उत्सुकताओं से जोड़ते हैं। वे कस्बों, छोटे शहरों और महानगरों से विषयवस्तु जुटाते हैं। फिर भी, एक अदद ‘देसी मन’ हमेशा सक्रिय रहता है।
    इस संग्रह की 11 कहानियों में लेखक ने उन प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष बंदिशों, साजिशों, ख्वाहिशों को उद्घाटित किया है जिनसे वर्तमान समाज संचालित है। यह कहना अधिक उचित होता कि समाज जिनकी गिरफ्त में है। साधारण आदमी जहां असहज हो जाता है, अपना मूल स्वभाव बिसार बैठता है और जड़ों से कटने लगता है। ‘श्यामलाल का अकेलापन’ कहानी का प्रारंभ इस प्रकार होता है, ‘क्या इनसान और होर्डिंग में कोई समानता हो सकती है? भले ही यह एक बेतुका सवाल लगे पर श्यामलाल का