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  • Aatm Raksha Ka Adhikaar
    Narendra Kohli
    375 338

    Item Code: #KGP-737

    Availability: In stock

    आत्मरक्षा का अधिकार
    हमारा देश विकट परिस्थितियों में से गुजर रहा है । शासक कहते हैं कि देश के सामने कोई समस्या ही नहीं है और देश देख रहा है कि समस्याएँ ही समस्याएँ हैं  ।
    जो देख सकता है, वह देख रहा है कि देशद्रोह पुरस्कृत हो रहा है । जो भी देश और शासन से द्रोह करता है, उसे पुरस्कार देकर शांत करने का प्रयत्न किया जाता है । परिणामत: देश-प्रेम निरंतर वंचित होता चलता है ।
    सरकार देश को बाँट रही है और देश का संविधान देश को बाँटने का उपकरण बन गया है । उसे वह रूप दे दिया गया है कि वह चाहे भी तो देश की रक्षा नहीं कर सकता । स्पष्ट है कि देश की जनता समझ रही है कि न शासक उसके प्रतिनिधि  हैं, न देश का संविधान । सब उसके विरोधी हैं और उन नीतियों पर चल रहे हैं, जो देश के लिए कल्याणकारी नहीं है । वे अपने स्वार्थ के लिए देश के भविष्य की हत्या करने पर तुले हुए हैं । जनता स्वयं को असहाय पाती है, जैसे अपने देश को किसी माफिया की जकडन में अनुभव कर रही हो ।
    नरेन्द्र कोहली देश और समाज को समस्याओं से मुँह नहीं मोड़ते । वे पाठको के मनोरंजन का दावा भी नहीं करते ।  वे व्यंग्यकार हैं, अत: अपने धर्म का निर्वाह करते हैं । वे देश को जगाने का प्रयत्न करते हैं-अपनी लेखनी से उसे खरोंच लगाकर, कुछ चीरकर, कुछ चुभोकर । वे मानते है कि साहित्यकार का काम अपने धर्म का निर्वाह है, अपने स्वार्थ की पूर्ति नहीं । लोभ और त्रास लेखक के लिए नहीं हैं ।
  • Bindu-Bindu Vichar
    Atal Bihari Vajpayee
    400 300

    Item Code: #KGP-9022

    Availability: In stock

    बिन्दु-बिन्दु विचार
    राष्ट्रीय एकता के सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें । राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड- तोड़कर नहीं बनाया जा सकता । इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है । उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसके संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है । इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र का, अच्छे-बुरे का और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है । जीवन की इन निष्ठाओँ तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास राष्ट्रीयत्व की भावना घनी- भूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है । उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की] पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है । -इसी पुस्तक से

  • Ek Sadaa Aati To Hai
    Pramod Beria
    150 135

    Item Code: #KGP-9307

    Availability: In stock


  • Kuchh Kharaa Kuchh Khotaa
    Raj Budhiraja
    100

    Item Code: #KGP-1877

    Availability: In stock

    सुविख्यात शिक्षाविद एवं साहित्यकार राज बुद्धिराजा की नवीन कृति है यह । दूटते-बिखरते अत्याधुनिक भारतीय समाज ने जिस प्राचीन संस्कृति की लुटिया को कुएँ में ला डुबोया है, उसे लेखिका ने अपने मन के रहट में भरा है और फिर जल-रूप प्रदान किया है । लेखिका के मन में अपार पीडा है जो उनकी कलम पर धीरे-धीरे उतरकर, कोरे कागजों पर आबदार मोती-रूप बन जाती है । लेखिका की सूक्ष्म-पैनी दृष्टि से छोटी से छोटी बात बच नहीं पाती और वह कलम के हथौड़े से पूरे समाज पर लगातार प्रहार करती चली जाती है और उसके पास हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं होता । लेखनी कभी धर्म की बात करती है, कभी दर्शन-अध्यात्म की, कभी बिखरती मानवीय संवेदना की और कभी जंग खाए रिश्तों की ।
    लगता है कि उनके दिल की गहराई पाठकों पर अमिट छाप छोड़ती है और उनकी आँखें झरने-सी झरने लगती हैँ । ढेर सारे अनुत्तरित प्रश्न सामने आ खड़े होते हैं । इन संस्मरणों का अंत प्रश्नचिह्नों से होता है । ये सभी संस्मरण लेखिका के एकाकीपन के गवाह हैं । लेखन की अंतहीन राह पर चलते-चलते कभी-कभी उन्हें एकाकीपन का अहसास होता है और वे एक बूँद प्यार के लिए तरसती रह जाती हैं । उन्हें अपनेपन की तलाश रहती है । कभी विदेशी मित्र, कभी बाल सखी, कभी युवा मित्र और कभी अनजाने रिश्तों में वे बहुत कुछ ढूँढ़ने का प्रयास करती है और उन्हें यदि एक पल के लिए कुछ मिलता है तो वे उस सुखद पल को अपनों में बाँट देती हैं । यही उनके लेखन की सफलता है, खासकर जब पाठक उनके सुर में सुर मिलाकर झूमते-झामते वृक्षों की तरह झूमने लगता है ।
  • Aapad Dharm Tatha Anya Kahaniyan
    Deepak Sharma
    90 81

    Item Code: #KGP-1933

    Availability: In stock

    आपदधर्म क्या अन्य कहानियाँ
    'यह दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि हमरे समाज में विवाह केवल सामाजिक समाकलन का एक यंत्र योग है ? या किर विधिक विषयासक्ति का एक रचनातंत्र ? इसके अतिरिक्त क्या हमारे समाज में विवाह कोई तीसरा सत्व भी रखता है ?' रोहिणी एलबम का वह पृष्ट सामने ले आई जहाँ विवाह के पारंपरिक वस्त्रों एवं आभूषणों से सजे तथा विवाह संबंधी स्वाभाविक उमंगों एवं अचरजों से लदे अठारहवर्षीय मधु तथा चौबीसवर्षीय अशोक एक-दूसरे की ओर संपूर्ण समर्पण की दृष्टि से निहार रहे थे ।
    अशोक के हाथों में अपना भाग्य एवं अपना भविष्य सौंप चुकी मधु के हाथों से उस लोक का भाग्य एवं भविष्य छीनने वाली रोहिणी का उस लोक में प्रवेश क्या अतिक्रमण न था ? निषिद्ध न था ? विवाह तोड़ने की उसे लत लग गई थी क्या ?
    “बच्चे है तीसरा सत्व, रोहिणी ।"
    पहली बार गर्भवती हुई मधु के मन में बच्चों के प्रति ढेरों उत्माह रहा ।
    "द सीमेंट ? द शटल कॉक ? द प्लेइंग फील्ड ?” रोहिणी हँस पडी ।
    “मतलब ?"
    "स्ट्रिंडबर्ग र्ग के अनुसार बच्चों से माता-पिता सीमेंट का काम लेने है । हैनरी जेम्स सोचते है, माता-पिता की फूट में बच्चे बैडमिंटन को चिडिया की भांति इधर से उधर फहराए जाते हैं और नोरा एफ़रोन अपने उपन्यास "हार्टबर्न’ में लिखती हैं कि बच्चे के जन्म के साथ माता-पिता की बल-परीक्षा को एक नई क्रीड़ा-भूमि मिल जाती है... ।'
    -[इस संग्रह की एक कहानी 'स्त्रियाँ' से]
  • Deshbhakat Bane
    Jagat Ram Arya
    140 126

    Item Code: #KGP-9249

    Availability: In stock

    हम अपने सुंदर देश को दिल से प्यार करते हैं। इसके बीते हुए दिन, इसकी पुरानी शान भी हमें प्यारी है। इसके दुःख हमारे दुःख हैं। इसका दर्द हमारा अपना दर्द है। जैसे हम अपने जीवन वृक्ष को फलता-फूलता देखना चाहते हैं वैसे ही हम कामना करते हैं कि हमारा देश भी फले और फूले।
    इसके लिए हम अपना तन-मन-धन बलिदान करने को तैयार हैं। हमने भारतमाता की सहनशीलता को देखकर क्षमा करने की प्रेरणा ली है। हम केवल इसे प्रेम ही नहीं करते अपितु हर क्षेत्र में इसकी उन्नति के लिए कंधा भी लगाएंगे। हमारे शरीर की रग-रग में रक्त का एक-एक कण इसी मातृभूमि की नदियों का दिया हुआ रस है और इसके खेतों में उपजे हुए अनाजों से हमारा शरीर बलवान बना है। यह हमारी जन्मदायिनी मां है। यही हमारा भगवान है। हम इसके चरणों में अपना सिर झुकाते हें। इसका प्यार पाने के लिए हम इसकी वंदना करते हैं और दिन-रात पवित्र मन से इसी का स्मरण करते हैं। भारत माता की जय हो।
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Khare (Paperback)
    Vishnu Khare
    80

    Item Code: #KGP-1322

    Availability: In stock

    मैंने जब विष्णु खरे की कविताओं को यह जानने के उद्देश्य से पढ़ना शुरू किया कि उनकी कविता का संसार किन तत्त्वों से बना है तो मुझे अत्यंत स्फूर्तिदायक अनुभव हुआ। एक के बाद एक काफ़ी दूर तक मुझे ऐसी कविताएँ मिलती रहीं जिन्होंने मुझे समकालीन जीवन के त्रासद से लेकर सुखद अनुभव तक से प्रकंपित किया। सबसे अधिक कविताएँ सांप्रदायिकता और फ़ासिस्ट मनोवृत्ति के जोर पकड़ते जाने को लेकर लिखी गई हैं। ‘शिविर में शिशु’ गुजरात के दंगे से संबंधित है, ‘चुनौती’ शीर्षक कविता में धर्म-भावना के ख़तरनाक रूप का संकेत है, ‘न हन्यते’ में दंगाइयों का रोंगटे खड़े कर देने वाला बयान है, ‘गुंग महल’ भी धार्मिक कट्टरता को ही सामने लाती है और ‘हिटलर की वापसी’ शीर्षक कविता जर्मनी की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। विष्णु खरे की ख़ूबी है कि उनकी कविताएँ अधिकांश वामपंथी कवियों की तरह सिर्फ़ जज़्बे का इज़हार नहीं करतीं बल्कि अपने साथ सोच को भी लेकर चलती हैं, जिससे उनमें स्थिति की जटिलता का चित्राण होता है और वे सपाट नहीं रह जातीं।...
    विष्णु खरे की असली कला और उनका तेवर ‘गुंग महल’ शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है, जिसका अंत जितना ही सशक्त है उतना ही कलात्मक--पाठकों को अनुभूति, सोच और कल्पना तीनों ही स्तर पर उत्तेजित करने वाला। ‘विनाशग्रस्त इलाके से एक सीधी टी.वी. रपट’ कविता में टी.वी. रपट शैली में अनुमानतः गुजरात के भूकंप का ज़िक्र है। अंतर्वस्तु की दृष्टि से इसमें भारत के नैतिक विनाश का ऐसा चित्रण है कि एक बार तो यह प्रतीति होती है कि विष्णु खरे हमारे नैतिक विनाश के ही कवि हैं।...
    विष्णु खरे का गहरा लगाव इस देश की साधारण जनता और साधारण जीवन से है, जिसे वे आधुनिक सभ्यता के बड़े परिप्रेक्ष्य में भी रखकर देखते हैं।...इन्हीं साधारण जनों में औरतों को भी गिनना चाहिए। आकस्मिक नहीं कि इस संग्रह में औरतों पर भी तीन-चार बहुत अच्छी कविताएँ हैं। विष्णु खरे का यथार्थ चित्रण इतना गहरा होता है कि उन्हें फैंटेसी में लिखने की कोई जरूरत नहीं। उन्होंने उस गद्य को आवश्यकतानुसार अनेक रूप प्रदान करके उसे ऐसा बना दिया है कि किसी काव्य और कला-मर्मज्ञ को उससे कोई शिकायत न हो।  
    -नंदकिशोर नवल
  • Imandaari Ka Swaad
    Harish Kumar 'Amit'
    180 162

    Item Code: #KGP-9367

    Availability: In stock


  • Mahan Vibhutiyon Ka Adhura Bachpan
    Vinod Kumar Mishra
    200 180

    Item Code: #KGP-247

    Availability: In stock

    महान् विभूतियों का अधूरा बचपन
    विश्व की अनेक महान् विभूतियाँ बचपन में ही गंभीर विकलांगता का शिकार हो गई थीं। विकलांगता अपने साथ शारीरिक कष्ट के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक व सामाजिक दुःख भी लाती है। इन विभूतियों ने विकलांगता का सामना एक सामान्य चुनौती की भाँति किया और समस्त संसार उनकी उपलब्धियों व योगदानों के समक्ष नतमस्तक हो गया।
    दूसरी ओर एक आम अच्छा-भला व्यक्ति मामूली समस्याओं से झुँझला जाता है और लक्ष्य पूरा न हो पाने  के लिए परिस्थितियों को अधिक दोष देने का प्रयास करता है।
    प्रस्तुत पुस्तक न केवल इन महान् व्यक्तियों का उदाहरण देते हुए आम बच्चों को चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करती है वरन् यह भी बताती है कि किस प्रकार आम बच्चों व विकलांग बच्चों के बीच सम्मानजनक समन्वय होना चाहिए।
    वास्तव में विकलांगता बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करती है और यदि परिस्थितियाँ अनुकूल बना दी जाएँ तो विकलांगता का प्रभाव न्यूनतम हो जाता है। अतः यह आवश्यक है कि भौगोलिक परिस्थितियों के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था को भी अनुकूल बनाया जाए ताकि विकलांगजनों व शेष समाज के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो और उनकी अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित हो।
  • Veerendra Mishra : Geet-Samagra-(4 Vols.)
    Pradeep Pant
    2500 2250

    Item Code: #KGP-816

    Availability: In stock

    वीरेन्द्र मिश्र : गीत-समग्र (4 भागों में)
    नई कविता के आगमन के साथ काव्य-जगत् का पूरा परिदृश्य बदल गया । कारण कि छंदमुक्त कविता ने गीत को सबसे अधिक प्रभावित किया । यद्यपि नई कविता के अनेक कवियों ने स्वयं भी गीतो की रचना की और छंदों का सहारा लिया, किंतु नई कविता के उदय के साथ ही गीत की उपेक्षा भी आरंभ हो गई । गीत के उपेक्षित होने के अपने कारण भी थे । जैसे कि गीत के नाम पर तुकबंदी हावी होती गई, गीत प्रायः रूमानियत तक सिमट गया, उसने अपने को मंच या कवि-सम्मेलनों तक सीमित कर लिया । कालांतर में नई कविता के बाद जो कविता सामने आई, उसके चलते गीत और भी उपेक्षित हुआ, लेकिन यह भी सच्चाई है कि नई कविता के बाद की छंदमुक्त कविता प्राय: नई कविता की रूढि बनकर रह गई और आज तो ऐसी अधिकांश कविताएँ कवियों के सपाट वक्तव्य सरीखी प्रतीत होती हैं । बहरहाल कविता के रूप-स्वरूप के परिवर्तन के दौर में कुछेक कवि समस्त ऊर्जा और सर्जनात्मकता के साथ गीतों की रचना करते रहे । वीरेन्द्र मिश्र ऐसे ही कवियों में है, बल्कि वे गीतों के प्रमुख और अत्यंत स्मरणीय रचनाकार हैं। इसका मुख्य कारण है उनकी गहरी सामाजिक संलग्नता और प्रगतिशील सोच, जिस वजह से वे किशोर वय से युवावस्था की ओर बढ़ने के दौर में बंगाल के भीषण अकाल पर सशक्त छांदिक रचना प्रस्तुत कर सके । उन्होंने जहाँ एक ओर मछुआरों, कामगारों, मध्यवर्गीय जीवन के सुख-दु:खों और हर्ष-विषाद पर सार्थक गीत लिखे, वहीं एशिया के नव-स्ततंत्र राष्ट्रों पर मंडराते युद्ध के खतरे, साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं और विश्व-शांति के प्रश्नों को भी गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया । साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में प्रदूषण आदि भी उनकी चिंत्ता के केंद्र में थे । बडे पैमाने पर उन्होंने गीतों के माध्यम से विसंगतियों पर व्यंग्य किए, जबकि गीत से व्यंग्य का इस्तेमाल अधिकांश कवियों के यहाँ बहिष्कृत-सा  ही रहा है । अदभुत शब्द-संयोजन, असंख्य छांदिक प्रयोग, संगीतात्मकता आदि ऐसे उपकरण है, जिन्होंने उनके गीतों को उजास ही । वीरेन्द्र मिश्र की गीत-यात्रा सही अर्थों से अप्रतिम हैं ।
  • Nanaji Deshmukh : Jeevan Darshan (Paperback)
    Gaurav Chauhan
    160

    Item Code: #KGP-481

    Availability: In stock

    इस जीवात्मा ने अपने व्यक्तित्व की कुछ ऐसी अमिट छाप समाज पर छोड़ी कि उनके विषय में समाज और देश को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या साधारण मनुष्य भी दलित, शोषित, पीड़ित व वंचित के दुःखों को दूर कर उनके हृदय में एक ईश्वर, गुरु, प्रेरक, श्रद्धा का स्थान ले सकता है। ऐसी ही एक पवित्र जीवात्मा थे जिन्हें हम नानाजी देशमुख के नाम से जानते हैं। 
    "हम अपने लिए नहीं अपनों के लिए हैं। अपने वे हैं जो सदियों से पीड़ित, शोषित व उपेक्षित हैं।" यह कथन इन्हीं जीवात्मा का था जो आज नानाजी के नाम से इस संसार में याद किए जाते हैं। ऐसा ही कोई विरला व्यक्तित्व इस धरा पर जन्म लेकर इस धरा को पवित्र बनाता है।

  • Jeevan Hamara (Paperback)
    Bebi Kambley
    60

    Item Code: #KGP-1509

    Availability: In stock

    जीवन हमारा
    मराठी लेखिका बेबी कांबले दलित साहित्य की प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । दलित लोगों के विपन्न, दयनीय और दलित जीवन को आधार बनाकर लिखे गए इस आत्मकथात्मक उपन्यास ने मराठी साहित्य में तहलका मचा दिया था। महाराष्ट्र के पिछडे इलाके के सुदूर गाँवों में अस्मृश्य माने जाने वाले आदिवासी समाज ने जो नारकीय, अमानवीय और लगभग घृणित जीवन का जहर घूँट-घूँट पिया उसका मर्मांतक  आख्यान है यह उपन्यास । शुरु से अंत तक लगभग सम्मोहन की तरह बाँधे रखने वाले इस उपन्यास में दलितो के जीवन में जड़ें जमा चुके अंधविश्वास पर तो प्रहार किया ही गया है, उस अंधविश्वास को सचेत रूप से उनके जीवन में प्रवेश दिलाने और सतत पनपाने वाले सवर्णो की साजिश का भी पर्दाफाश किया गया है । इस उपन्यास को पढ़ना महाराष्ट्र के डोम समाज ही नहीं वरन् समस्त पददलित जातियों के हाहाकार और विलाप को अपने रक्त में बजता अनुभव करना है । शोषण, दमन और रुदन का जीवंत दस्तावेज है यह उपन्यास, जो बेबी कांबले ने आत्मकथात्मक लहजे में रचा है ।
  • Dharmkshetre Kurukshetre
    Shanker Shesh
    70 63

    Item Code: #KGP-2014

    Availability: In stock

    धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे 
    धृतराष्ट्र का विवाह! अंधे को चतुर्भुज बनाना ! कोण देगा अनंत अँधेरे को अपनी कन्या ? कौन करेगा अपंग जीवन का वरण ? प्रश्न टेढा था । सत्यवती दबाव डाल रही यी। लगातार पडी थी  मेरे पीछे ।
    माँ को तो एक बार समझा भी लो, दादी को समझाना कठिन होता है । पौत्र चाहे लूला हो, लँगडा हो, अपाहिज हो, लेकिन उसका ब्याह होना बहुत जरूरी है । आज़ तक समझ में नहीं आया, मौका पाते ही एक स्त्री दूसरी स्त्री पर अत्याचार क्यों करने लगती है । सत्यवती क्यों नहीं सोचती ।  अंधे से ब्याह करने वाली लड़की को आजन्म कारावास भोगना पडेगा । सारी जिदगी अंधे की पत्नी कहाना होया । राजघराने का आदमी हुआ तो क्या हुआ, अंधा तो अंधा है,  रहेगा । लेकिन सत्यवती को समझाता कौन ! मेरा पिता तो उसे समझा नहीं सका, फिर मैं किस खेत की मूली था !
    इच्छा  हुई अपना उदाहरण सामने क्यों न रखूँ। आखिर मैं भी पूरे जीवन बिना स्वी के रह सका या नहीं । सशक्त ददेवपुत्र-सा दिखाई देन वाला में । तो यह 'अंधा क्यों नहीं रह सकता । मेरे मामले में  सत्यवती इतनी कठोर क्यों हो गई थी और अब पौत्र  के मामले में। (इसी उपन्यास से)
  • Buniad Ali Ki Bedil Dilli
    Dronvir Kohli
    400 300

    Item Code: #KGP-263

    Availability: In stock

    बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली
    यह अपूर्व संग्रह 'धर्मयुग' के लोकप्रिय स्तंभ बेदिल दिल्ली में प्रकाशित लेखों का है। डॉ० धर्मवीर भारती के विशेष आग्रह पर इसे लिखा करते थे उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली बुनियाद अली के छद्म नाम से। स्तंभ में जाने वाली सामग्री के बारे में प्राय: तीखी प्रतिक्रिया होती थी। साहित्यिक गोष्ठियों वाले लेखों को लेकर कुछ लेखक लाल-पीले भी होने लगते थे। ऐसी स्थिति में स्तभ-लेखक के बारे में तरह तरह के कयास लगाए जाते थे। लेकिन भारती जी ने लेखक की पहचान को निरंतर गुप्त रखा इतना कि 'धर्मयुग' में उनके सहयोगी तक नहीं जान पाते थे कि इसे लिख कौन रहा है। भारती जी लेखक के साथ पत्र-व्यवहार भी स्वयं करते थे। जैसे, उनका 25.3.83 को यह पत्र : "Message for Shri Buniad Ali : दोनों किस्तें मिलीं"बहुत जोरदार और to the point हैं। इस बार दिल्ली में बहुत से लोगों (सामान्य पाठक तक) ने बेदिल दिल्ली की चर्चा की।Bravo! Keep it up."
    यही नहीं, इस स्तंभ के लेखों का संपादन-संशोधन भी भारती जी स्वयं करते थे। जैसे, 17 जनवरी, '83 के अपने पत्र में उनकी यह विस्मयकारी टिप्पणी :"पार्लियामेंट वाली किस्त मिल गई है। गृहमंत्री के रूप में ज्ञानी जी वाली घटना निकालनी पड़ेगी। उसके कुछ कारण हैं-गैर-राजनीतिक। कभी मिलने पर बताऊँगा"
    कहना न होगा कि ये सारे लेख ऐतिहासिक महत्व है। दिल्ली की तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का ये आईना हैं। उन दिनों यहाँ की साहित्यिक गोष्ठियों में किस तरह एक-दूसरे की टाँग खींची जाती थीं, इसका प्रामाणिक विवरण इन लेखों में ही मिलेगा। आजादी से पहले गर्मियों में राजधानी शिमला जाती थी, तो कनॉट प्लेस के आगे केंद्रीय सचिवालय का सारा इलाका इतना सुनसान-बियाबान हो जाता था कि लोग दिन-दिहाडे उधर जाने से भय खाते थे; फिर शिमला- प्रवास के दौरान कर्मचारी कैसी-कैसी हरकतें करते थे, इसका शायद पहली बार इतना दिलचस्प वर्णन इस स्तंभ में किया गया है।
    डॉ० धर्मवीर भारती इस स्तंभ के बारे में इतने उत्साहित थे कि लेखक को उन्होंने अपने 4.4.81 के पत्र में यह कहकर प्रोत्साहित किया था : ""स्तंभ जोरदार जा रहा है। अपने ढंग का बिलकुल अलग।"
  • Face Your Fears (Paperback)
    David Tolin
    245

    Item Code: #KGP-356

    Availability: In stock

    Everyone experiences fear and anxiety, but when fear begins to dominate your life, it can be devastating. You don’t have to live that way. Whether you suffer from moderate anxiety or debilitating fear, a specific phobia, obsessive- compulsive disorder, panic disorder, social anxiety, posttraumatic stress disorder, generalized anxiety disorder, or any other form of anxiety, Face Your Fears will change the way you think about fear and what to do about it.
    This up-to-date, evidence-based, user-friendly self-help guide to beating phobias and over-coming anxieties walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear. In Face Your Fears, celebrated therapist Dr. David Tolin introduces a highly effective and scientifically proven treatment called exposure therapy, in which you gradually confront your fears. Drawing on moving stories from the hundreds of patients he has treated successfully, Dr. Tolin defines the six different types of anxiety and helps you determine which type you need to overcome. He guides you step by step through the gradual exposure process as you learn how to eliminate crutches and safety behaviors, address scary thoughts, and examine the evidence. You’ll learn how to track your progress and you’ll feel yourself taking back control of your life one exposure at a time.
    With Dr. Tolin’s gentle, confident guidance, you will learn to face and beat:
    • Fears of specific situations or objects (such as animals, heights, and blood)
    • Fears of body sensations (including panic attacks and health anxieties)
    • Social and performance fears (fears of social interaction, public speaking, and asserting yourself)
    • Obsessive fears (including fears of contamination and imperfection as well as scary thoughts)
    • Excessive worries (such as worrying about everything and intolerance of uncertainty)
    • Post-traumatic fears (fears of trauma-related situations and painful memories)
    Once you feel better, Dr. Tolin helps you maintain your newfound freedom for years to come. By understanding and preparing for circumstances that might cause your fear to return, you can take practical steps to prevent it from coming back and to overcome it quickly if it does.
    You know what it feels like to live in fear. Now it’s time to rediscover what life feels like without it. Face Your Fears delivers the no-nonsense, scientifically proven tools you need to take control of your life and your future. Dr. Tolin walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear.
  • 20-Best Stories From China
    Prashant Kaushik
    295 221

    Item Code: #KGP-9312

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Chinese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Taoist Novice, Chang And Cheng, Supernatural Wife, Taoist Priest, Man Thrown In A Well, Rat Wife, this book is a compilation of 20 famous Chinese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from China.
  • Rangon Ki Gandh-2
    Govind Mishra
    595 536

    Item Code: #KGP-9161

    Availability: In stock

    रंगों की गंध

    यात्रा जीवन के दूसरे अनुभवों से थोड़े अलग किस्म का अनुभव है। जहां दूसरे अनुभव हमें साफ-साफ जोड़ते-तोड़ते हैं, अपनी अंतरंगता में चरमरा डालते हैं या फिर सूखा-सूखा और दूर-दूर रखते हैं...वहां यात्रा दूसरी रखते हुए भी पास लाती हे, हम अपने खोल से बाहर निकलकर संसार की व्यापकता को छूते होते हैं। व्यापकता की यह छांह दुखी व्यक्ति को टूटने से बचाती है। स्वयं से थोड़ा वैराग्य और बाहर से जुड़ना दोनों एक साथ होता चलता है। मेरे लिए जो इससे बड़ी बात है, वह यह कि यात्रा में हम चलते हैं, हर हाल में चलते रहना-यह मेरी जिद दृढ़तर करती है यात्रा।
    -गोविन्द मिश्र
  • Pracheen Bharat Ki Neetiyan
    Acharya Dina Nath Sidhantalankar
    450 405

    Item Code: #KGP-851

    Availability: In stock

    प्राचीन भारत की नीतियाँ
    हमारे आर्यावर्त्त देश में जनतंत्र और लोकतंत्र चलाने के लिए कैसी नीतियाँ थीं, उसके बाद कैसी नीतियाँ रहीं और अब कौन-सी नीतियाँ हैं, इस दिशा में इस ग्रंथ के संपादन एवं प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण प्रयास किया गया है। विद्वान् सुधी लेखक ने युक्ति, तर्क, औचित्य और वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की दृष्टि से इस ग्रंथ में उन सब संदर्भों को अलग कर दिया है, जो भेदसूचक, ऊंच-नीच द्योतक और समाज के किसी भी वर्ग के प्रति तनिक भी घृणा, विषमता व हीनतासूचक हैं।
    इस ग्रंथ के संकलन के लिए भारतीय दर्शनशास्त्रों का गहराई से अध्ययन किया गया है और उसमें वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की पृष्ठभूमि में उन ही सर्वोपयोगी नीतियों का संकलन किया है, जो समय और औचित्य की दृष्टि से आज की परिस्थितियों में भी उतनी ही तर्कसंगत और मूल्यवान हैं, जितनी प्राचीन युग में थीं। 
    देश की स्वतंत्रता के बाद अंतर्देशीय और अंतर्राष्ट्रीय नीति-निर्धारण में मानवीय पक्ष को ही हमारे राष्ट्र-नायकों ने सामने रखा। किसी एक वर्ग, जाति, संप्रदाय अथवा धर्म के वर्चस्व के स्थान पर उसे समानता का प्रबल आधार प्रदान किया। इसके लिए हमने चार आदर्श अपनाए। प्रथम है–लोकतंत्र, द्वितीय है—समाजवाद, तृतीय है–धर्म-निरपेक्षता और चैथा है गुट-निरपेक्षता। इस नीति-निर्धारण में हमें सबसे बड़ी सहायता भारतीय वाङ्मय की अमूल्य निधि से मिली है। हम यदि अपने प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध जीवन-मूल्यों का आधुनिक युग के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन कर सकें तो समाज उनसे लाभ उठा सकता है।
    इस परिपेक्ष्य में यह ग्रंथ नेताओं, प्रशासकों और आज के प्रबुद्ध पाठक-वर्ग के लिए विशेष स्फूर्तिप्रद होता हुआ भारत के नव-समाज-निर्माण के लिए दिशा-निर्देश करने में अनवरत उपयोगी सिद्ध होगा।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Savyam Prakash
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-56

    Availability: In stock

    भारतीय श्रमिक तथा वंचित वर्ग के कथा-नायकों को जो सत्कार तथा पक्षधरता स्वयं प्रकाश की कहानियों में मिली है, वैसे उजले उदाहरण समकालीन हिंदी कहानी में गिने-चुने ही हैं । इन वंचित वर्गों के स्वपनों को दुःस्वप्नों में बदलने वाली कुव्यवस्था को यह कथाकार केवल चिन्हीत ही नहीं करता, बल्कि इसके मूल में बसे कुकारणों को पारदर्शी बनाकर दिखाता है तथा उस जाग्रति को भी रेखांकित करता है जो कि अंतत: लोक-चेतना का अनिवार्य तत्त्व है । और खास बात यह है कि इस सबके उदघाटन-प्रकाशन में यहाँ लेखक जीवन के हर स्पंदन और उसके आयामों पर कहानी लिखने को उद्यत दिखाई पाता है । अर्थात् सम्यक् लोकचेतना की 'साक्षरता' इन कहानियों में वर्णित जीवन में यथोचित पिरोई गई है ।
    कहानी की कला की गुणग्राहकता से लबरेज ये कहानियां विचारधारा के प्रचार और सदेश के 'उपलक्ष्य' को मिटाकर व्यवहार के धरातल तक पाठक को सहज ही ले जाती है । पात्रों की आपबीती को जगबीती बनाने का संकल्प यहाँ प्रामाणिक रूप में उपस्थित हुआ है।
    स्वयं प्रकाश द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं-'नीलकांत का सफर', 'सूरज कब निकलेगा', 'पार्टीशन', 'क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा ?', 'नैनसी का धूड़ा', 'बलि', 'संहारकर्ता', 'अगले जनम', 'गौरी का गुस्सा' तथा 'संधान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक स्वयं प्रकाश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Delhi (Paperback)
    Khushwant Singh
    290 247

    Item Code: #KGP-518

    Availability: In stock

    उपन्यास का नाम शहर के नाम से ! जी हाँ, यह दिल्ली की कहानी है। छह सौ साल पहले से लेकर आज तक की खुशवंत सिंह की अनुभवी कलम ने इतिहास के ढाँचे को अपनी रसिक कल्पना की शिराओं और मांस-मज्जा से भरा। यह शुरू होती है सन् 1265 के ग़यासुद्दीन बलबन के शासनकाल से तैमूर लंग, नादिरशाह, मीर तक़ी मीर, औरंगज़ेब, अमीर खुसरो, बहादुर शाह ज़फ़र आदि के प्रसंगों के साथ कहानी आधुनिक काल की दिल्ली तक पहुँचती है कैसे हुआ नयी दिल्ली का निर्माण ! और अंत होता है 1984 के दंगों के अवसानमय परिदृश्य में !

    कहानी का नायकमुख्य वाचक हैदिल्ली को तहेदिल से चाहने वाला एक व्यभिचारी किस्म का चरित्रजिसकी प्रेयसी भागमती कोई रूपगर्विता रईसज़ादी नहींवरन् एक कुरूप हिंजड़ा है।दिल्ली और भागमती दोनों से ही  नायक को समान रूप से प्यार है। देश-विदेश के सैर-सपाटों के बाद जिस तरह वह बार-बार अपनी चहेती दिल्ली के पास लौट-लौट आता हैवैसे ही देशी-विदेशीऔरतों के साथ खाक छानने के बाद वह फिर-फिर अपनी भागमती के लिए बेकरार हो उठता है। तेल चुपड़े बालों वालीचेचक के दागों से भरे चेहरे वालीपान से पीले पड़े दाँतों वाली भागमती केवास्तविक सौंदर्य को उसके साथ बिताए अंतरंग क्षणों में ही देखा-महसूसा जा सकता है। यही बात दिल्ली के साथ भी है। भागमती और दिल्ली दोनों ही ज़ाहिलों के हाथों रौंदी जाती रहीं। भागमतीको उसके गँवार ग्राहकों ने रौंदादिल्ली को बार-बार उजाड़ा विदेशी लुटेरों और आततायियों के आक्रमणों ने। भागमती की तरह दिल्ली भी बाँझ की बाँझ ही रही     
  • Lokmanya Baalgangadhar Tilak : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    160

    Item Code: #KGP-490

    Availability: In stock

    1857 की क्रांति ने जो बयार बहाई, उसने घर-घर में मन को छुआ और अगले स्वातंत्र्य समर की—जो अनवरत था और शांत भले ही था, लेकिन थमा नहीं था—रूपरेखा बना दी। इस उत्तरार्द्ध में केवल जोशीले राष्ट्रभक्त ही नहीं हुए बल्कि बौद्धक क्रांति का बिगुल बजाने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक असाधारण चिंतक और वक्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।
    यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।
  • Nasha Jeevan Ka Saar Nahin
    Jagat Ram Arya
    50

    Item Code: #KGP-1228

    Availability: In stock

    नशा करने वाला अपना मनुष्यत्व खो बैठता है, स्वास्थ्य व पैसे की बरबादी कर गृह-कलह को जन्म देता है और समाज में अपनी प्रतिष्ठा भी गंवा बैठता है। जिस दिन से व्यक्ति नशा करने लगता है, समझिए कि उसी दिन से वह अपने विनाश का मार्ग प्रशस्त कर लेता है। अगर बीच ही में समय रहते संभलकर वह नशे से किनारा कर लेता है तब तो ठीक है वरना यह मार्ग अंततः उसे दुर्दशा और दुर्गति के कंटीले रास्तों पर घसीटता हुआ मौत के अंधेरे गहरे गर्त में धकेल देता है। इस पुस्तक में नशाखोरी के दुष्परिणामों को उजागर करने और उनसे बचने से संबंधित एक प्रेरणादायी, शिक्षाप्रद कथा है।
    —जगतराम आर्य
  • Videshi Mahilaon Ka Bharatprem
    M.A. Sameer
    280 252

    Item Code: #KGP-7809

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक ‘विदेशी महिलाओं का भारतप्रेम’ उन महिलाओं के विषय में लिखी गई है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारतभूमि की तथा भारत के लोगों की तन मन धन से सेवा एवं सहायता की। चाहे वे कोक्को सोमा हों या उनकी बेटी तोशिको, उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से भारत की सेवा की। इसी क्रम में आगे श्रीमती एनीबेसेंट, मारग्रेट कजिंस और एमिली शैंकल के नाम भी उल्लेखनीय हैं। इन महिलाओं ने जन्म भले ही भारतभूमि पर न लिया हो, लेकिन उनके भारतप्रेम को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनका भारत से घनिष्ठ संबंध है। उनके द्वारा दिए गए अविस्मरणीय योगदान को इस पुस्तक में सरल, सरस और रोचक शैली में उल्लिखित किया गया है। 
  • Dainik Jeevan Mein Ayurveda (Paperback)
    Vinod Verma
    240

    Item Code: #KGP-26

    Availability: In stock

    दुर्भाग्य की बात है कि आयुर्वेद का असीमित ज्ञान इस देश की संचालन-व्यवस्था में समुचित प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आयुर्वेद के विकास तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। हमारी शासन-व्यवस्था भी इस ओर उदासीन रही। आयुर्वेद को ‘देशी’ कहकर उपेक्षित कर दिया गया। किंतु आज जिस नए युग का प्रारंभ हो रहा है उसमें हमारा पुनर्जागरण सुनिचित है जिसमें हमें आभास होगा कि जिसे हमारे देशवासियों ने ‘देशी’ कहकर त्याग दिया था उसी को विदेशी लोग अच्छे आवरण में डालकर हमें बेच रहे हैं। ‘दादी मां’ की परंपरा अर्थात् आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान, जो हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है, उसे हमारी शिक्षा-प्रणाली में सम्मिलित किया जाय। इस दृष्टि से स्कूलों तथा मेडिकल काॅलेजों के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के कुछ महत्वपूर्ण अंश पढ़ाए तथा सिखाए जाने चाहिए। आयुर्वेद के जिज्ञासुओं और अनुसंधित्सुओं के लिए उपयोगी जानकारी देने और तत्संबंधी अज्ञान को दूर करने में सहायक प्रस्तुत ग्रंथ इस विषय की विदुषी सुश्री विनोद वर्मा की अनूठी कृति है।
  • Seedhi Qalam Sadhe Na
    Sunita Jain
    75 68

    Item Code: #KGP-9285

    Availability: In stock

    सुपरिचित कवयित्री सुनीता जैन की नव्यतम कविताओं के प्रस्तुत संकलन सीधी कलम सधे न की कविताओं का स्वभाव और स्वाद समकालीन हिंदी कविता की सामान्य छवि से थोड़ा अलग है। इन कविताओं में असंभव को संभव कर डालने का न तो बड़बोलापन है और न ही जीवनगत यथार्थ को चुनौती देती काव्य-पंक्तियों का बरबस ‘उत्पादन’ हैं कवयित्री ने समग्र प्रकृति और मन को स्वविवेक के अभिव्यक्त किया है। साथ ही जीवन की विराट अवधारणा को इन कविताओं में संबोधित भी किया गया है। कवयित्री जीवनपरक महाप्रश्नों से व्यक्तिगत स्तर पर जूझते हुए इन कविताओं को सरल, सहज, सुगम्य, पारदर्शी, तथा एक सीमा तक गेय बनाये रखती हैं। यहां ऐसी निजता है जो सार्वजनिकता भी है। इसीलिए इन कविताओं की खुशबू, समकालीन कविताओं की तत्सम खुशबू से थोड़ा अलग हे।
    इन कविताओं की एक काव्य-विशेषता और है-इनमें छिपा आत्मीय राग। संकलन की अनेक कविताएं ऐसी हैं जिनमें असंबोधित रागों की लय मिलती है। समकालीन हिंदी कविता का पाठक उत्कृष्ट काव्य के लिए मानो तरसा हुआ है। कविता में मनःभूमि की प्रतिच्छवियों के ऐसे समर्थ संकलन का प्रकाशन एक सुखद काव्य-घटना है।
  • Abdul Majeed Ka Chhura
    Krishna Kumar
    180 162

    Item Code: #KGP-1925

    Availability: In stock

    अब्दुल मजीद का छुरा
    हम पुस्तक में कृष्ण कुमार के चुने हुए यात्रा-संस्मरण और रिपोर्ताज शामिल है । इन निबंधों में उनकी सुपरिचित गद्य शैली का एक अलग, बहुत आकर्षक रूप देखने को मिलता । कहानियों और शिक्षा संबंधी लेखों में  अभिव्यक्त होने वाली उनकी विशिष्ट निगाह यात्रा व लचीले फलक पर पाठक के साथ बहुत आत्मीय और उत्साह भरा रिश्ता बनाने में समर्थ होती हैं ।
    कृष्ण कुमार की अपनी रुचियों और दृष्टिक्षमता के अलावा पिछले र्टा-ढ़ाई दशकों के देश-विदेश के अनेक जीवन्त संदर्भों की पहचान भी इन निबंधों में समाई है । बिहार आंदोलन के सिलसिले में लिखे गए तीन रिपोर्ताज आपात्काल के ठीक पूर्व की स्थिति का विहंगम जायजा लेते हैं ।  एकदम हाल में लिखा गया  नर्मदा का संस्मरण भी यहाँ  शामिल किया गया है ।
  • Sampoorn Baal Vigyan Kathayen
    Hari Krishna Devsare
    600 480

    Item Code: #KGP-824

    Availability: In stock

    जो बच्चे परीकथाएँ, भूत-प्रेतों की कहानियाँ आदि पढ़ते हैं, उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण जागृत होने में बाधा पड़ सकती है, क्योंकि वे अंधविश्वासी अधिक बन सकते हैं। और हमारे देश में अंधविश्वास ने अपनी जड़ें कितनी गहरी जमा रखी हैं कि यह वे लोग अच्छी तरह जानते हैं, जो विज्ञान-प्रसारक हैं। इसलिए मैं ऐसे बच्चों को सलाह दूँगा कि वे विज्ञान कथाएँ अवश्य पढ़ें, क्योंकि जब हम विज्ञान की नजर से कुछ पढ़ते हैं तो समझ में आ जाता है कि संभव क्या है, असंभव क्या है। विज्ञान कथाएँ उन्हें नई दृष्टि, नई सोच और भविष्य की सार्थक कल्पना देती हैं।"
    बच्चों के लिए डॉ. हरिकृष्ण देवसरे विगत पचास वर्षों से विज्ञान लेखन कर रहे हैं। विज्ञान कथा लेखन में डॉ. देवसरे का प्रशस्य योगदान रहा है। आपके कई बाल विज्ञान उपन्यास ‘होटल का रहस्य’, ‘ला-वेनी’ आदि बहुत लोकप्रिय हुए। यहाँ उनकी संपूर्ण बाल विज्ञान कथाएँ प्रस्तुत हैं।  आशा है, यह प्रस्तुति सभी वर्ग के पाठकों के लिए रुचिकर और पठनीय सिद्ध होगी।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Aabid Surti
    Aabid Surti
    200 180

    Item Code: #KGP-49

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है । इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है । 'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार आबिद सुरती ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आतंकित', 'तीसरी आँख', 'सांताक्लोज़ के तीन क्लोज़अप', 'बिज्जू', 'सतह', 'अंधा', 'रहस्य एक बालक के जन्म पूर्व हुए अपहरण का', 'भैंसोंवाली गली', 'कैनाल' तथा 'अनाड़ी नंबर वन'। हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार आबिद सुरती की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal (Paperback)
    Indira Mishra
    180

    Item Code: #KGP-410

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
    --राजेश जैन
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh (Paperback)
    Mohan Rakesh
    90

    Item Code: #KGP-1359

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मोहन राकेश
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकु' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Hausale Buland Hain (Paperback)
    Suraj Nagar
    100

    Item Code: #KGP-372

    Availability: In stock

    संसार में जो कुछ भी अनूठे, अद्वितीय, अविस्मरणीय, अतुलनीय एवं अद्भुत काम हुए हैं, वे चाहे किसी भी क्षेत्र में क्यों न हों, जैसे- स्थापत्यकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, साहित्य-सृजन हो या कोई वैज्ञानिक आविष्कार, सब बुलंद हौसले का परिणाम है। हौसले की उड़ान से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, हर सपना साकार होता है। हौसले बुलंद होना जीवन में प्रसन्नता का सूर्योदय होने जैसा है और हौसले पस्त होना सूर्यास्त होने जैसा है। बचपन से ही मेरे मन में कविताओं की ऐसी पुस्तक लिखने की इच्छा थी, जो निराशा को आशा में बदल दे। गम के काँटों में खुशियों के फूल खिला दे। अमावस की काली रात को दीपावली की तरह जगमगा दे। देश के प्रतिष्ठित किताबघर प्रकाशन, दिल्ली ने मेरे गीतों को पुस्तक का आकार दिया है। जिसका नाम है-‘हौसले बुलंद हैं’।
    ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक के सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय गीतों को साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डा. अलका तोमर ने अपनी अनूठी शैली में अंग्रेजी भाषा में रूपांतरित कर सार्वदेशिक बनाकर चार चाँद नहीं चालीस चाँद लगा दिए हैं। नई ऊर्जा, नया जोश, नई उमंग का संचार करने वाली इस पुस्तक के पहले गीत की रचना मंदोदरी का मायका, कालिदास द्वारा रचित मेघदूत में वर्णित दशपुर, शिवना तट पर स्थित पशुपतिनाथ की नगरी मंदसोर में हुई। रचना का यह क्रम क्षिप्रा तट स्थित ज्योतिर्लिंग मृत्युंजय महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल, झारखंड की राजधानी राँची देश की राजधानी दिल्ली, शंकर के त्रिशूल पर बसी अविनाशी काशी, त्रिवेणी संगम प्रयागराज, यमुना तट स्थित मथुरा गोवर्धन, देवी अहल्या की नगरी इंदौर, नर्मदा तट स्थित ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर, सागर तट स्थित मायानगरी मुंबई से चलकर ऐतिहासिक एवं पुरातत्त्व संपदा से भरपूर सूर्य पुत्री ताप्ती तट स्थित बुरहानपुर में पूर्ण हुआ।
    ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक प्रेरणा का पथ पराक्रम का रथ प्रसन्नता की गंगा है। इस पुस्तक की रचना में मुझे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरणा, सहयोग एवं मार्गदर्शन देने वाले सभी बुलंद हौसले वालों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक पढ़ने वालों के हौसले अवश्य बुलंद होंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।
    -सूरज नागर
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan
    Kamlesh Pandey
    220 198

    Item Code: #KGP-1838

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Maafiya
    Girish Pankaj
    175 158

    Item Code: #KGP-2041

    Availability: In stock

    माफिया
    जानते सब हैं, पर लिखते बहुत कम है कि राजनीति के समान साहित्य में भी दल ही दल हैं, तिकड़पबाजियाँ और सौदेबाजियाँ हैं, अवसरवाद और खिलाऊ-पिलाऊवद है, अफसरों और नेताओं के 'साहित्यिक' हथकंडे हैं और संपादकों तथा सम्मानों के बिकाऊ झंडे हैं । गिरीश पंकज ने इस उपन्यास में संगोष्टियों आदि के माध्यम से बिना 'लोक-लाज' के भय के इन सबके कपडे उतार दिए हैं । अब यह पाठकों पर निर्भर करता है कि वे इस 'नंगेपन' पर 'कैसी नजर डालते हैं! उपन्यास का प्रमुख कथ्य बहुरूपी साहित्य-माफिया है, जिसके बीच-बीच से शोध-माफिया, विज्ञापन-पुराण, छंद-हत्या, ठेका-लेखन आदि पर भी लटके-झटके सफाई किए गए है । दूसरी ओर, एक आदर्शवादी साहित्यकार की मनोव्यथा, आकांक्षाएं-अपेक्षाएं और सपने भी फूट-फूटकर निकले हैं।
    उपन्यास इस दृष्टि से अंकों का काफी ऊँचा प्रतिशत अर्जित करता है कि इसके दर्जनों अच्छे-बुरे पात्र ऐसे हैं, जिनसे हम रोज़ मिलते हैं, और इसका घटनाक्रम ऐसा है, जैसा हमारे सामने दिन-रात घटित होता रहता है। कथानक का यह सामाजिक सरोकार साहित्य पर हावी होते माफिया राज से जुड़कर आज शायद हर सही-गलत साहित्यकार के रास्ते को किसी न किसी तरह प्रभावित कर रहा है ।
    गिरीश पंकज साहित्य की धारा में काफी तैर चुके हैं, इसलिए इनकी भाषाभिव्यक्ति के प्रवाह में एक कुशल तैराक की गति है । तय समझिए कि यह उपन्यास साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े हर स्तर के पाठकों को पसंद आएगा, क्योकि वे इसके किसी न किसी पात्र से अपना तादात्म्य स्थापित किए बिना नहीं रह सकेंगे
  • 20-Best Stories From Russia (Classics)
    GLOBAL VISION PRESS
    495 446

    Item Code: #KGP-571

    Availability: In stock

    Aleksandr Pushkin undoubtedly heads the list of the Russian writers, and is credited with making Russian literature world famous. His reputation rests on his poetry, and in the field of the long novels. 
    While Leo Tolstoy was called the ‘greatest writer of Russia’ by Turgenev, and ‘second Shakespeare’ by Flaubert, Mikhail Saltykov, wrote under the pseudonym ‘Shchedrin’ and achieved the great success and popularity. 
    Aleksandr Kuprin was called the Russian Kipling by Vladimir Nabokov for his stories about pathetic adventure-seekers, and Ivan Turgenev’s A Sportsman's Sketches was a milestone of Russian Realism.
    While Fyodor Sologub gave us the namesake of a favourite snack today—Hide and Seek, Anton Pavlovich Chekhov’s famous line is still quote-worthy: “Medicine is my lawful wife and literature is my mistress.”
    All these writers and many more in this classic anthology of the 20-BEST Stories from Russia.
  • Guru Nanak Dev
    Chandrika Prasad Sharma
    160 144

    Item Code: #KGP-131

    Availability: In stock

    मानवता को सत्पथ पर ले जाने के लिए ईश्वर महान् आत्माओं को धरती पर भेजता है । गुरू नानक देव एक ऐसे ही महान् आत्मा थे, जिन्होंने मानव मात्र के कल्याण के लिए अपने जीवन को तपाया । उन्होंने जग की भलाई के लिए स्वयं नाना प्रकार के कष्ट झेले । वे ऐसे महापुरुष थे, जो जाति-पांति के भेदभाव से दूर रहते थे । उनका सादा जीवन लोक-कल्याण के लिए ही था । वे जीवन को सोने की भाँति तपाकर विश्व का कल्याण करते थे ।
    गुरू नानक देव की शिक्षाएं हमें जीवन में उत्तम मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं । उन्होंने मनुष्य मात्र को अच्छाइयों को स्वीकार करने की प्रेरणा दी । बुराइयों से दूर रहने की बात उन्होंने सर्वत्र कही । वे दया, क्षमा, करुणा, प्रेम और बंधुत्य  शिक्षा देते थे ।
    वे मानव मात्र को भलाई के मार्ग पर चलने की शिक्षा देते थे । उनकी दृष्टि में न काई छोटा था, न बड़ा, सभी समान थे ।
  • Kavi Ne Kaha : Vijendra
    Vijendra
    150 135

    Item Code: #KGP-1874

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विजेन्द्र
    विजेन्द्र हमारे समय के विशिष्ट और बडे समर्थ कवि हैं । उनमें नवीनता के साथ अपनी जातीय स्मृतियों को कविता से कलात्मक ढंग से गूँथने का विरल कौशल है । अतः वे कविता अपने समय की लिखकर अपनी महान् काव्य-परंपरा को भी अपने अंदर सहेजे-समेटे रहते हैं । निराला और त्रिलोचन की परंपरा में उन्हें देखने के पीछे एक तर्क यह भी है कि वे सृजन और व्यवहार को अलग-अलग नहीं मानते । उनका काव्य उनकी जीवनचर्या से अलग नहीं है ।
    विजेन्द्र की काव्य भाषा सदा नए विवाद उठाती रही है, क्योंकि यह लोक-चेतन कवि सदा भाषा के बने-बनाए ढाँचों को तोड़ता रहा है। उनकी भाषा लोक और जनपदों की और सहज भ्रमण करती है । इसलिए उनकी कविता में लोक संस्कृति की विकासोन्मुख छवियों और बिंब बराबर दिखाई पडते हैं । इससे विजेन्द्र की कविता का संसार व्यापक और विस्तृत ही नहीं हुआ, बल्कि उसमें अपने समय के बहुआयामी यथार्थ को कहने की शाक्ति भी पैदा हुई है ।
    विजेन्द्र जैसे कवि की अनन्य सहजता अलग से पहचानी जाती है । इस कवि ने एक लंबी तनाव-भरी संघर्षपूर्ण यात्रा तय की है । उनके अब तक छपे दस संकलनों की कविताओं को मिलाकर पढ़ने से एक ऐसी रचना-प्रक्रिया से हमारा सामना होता है जो एक साथ बहुआयामी और विकसनशील है । ज्यों-ज्यों कवि उग्र और अनुभव में परिपक्व होता गया है उसकी संवेदना भी त्यों-त्यों अधिक सघन और समृद्ध होती गई है ।
  • Saamanya Paryavaran Gyan
    Rajendra Chandrakant Rai
    180 144

    Item Code: #KGP-9146

    Availability: In stock

    पर्यावरण अब एक जाना-पहचाना और जीवन से सम्बद्ध विषय है। पर्यावरण पर गंभीर और वैज्ञानिक ग्रंथ तो उपलब्ध हैं, किंतु सहज और सरल तरीके से पर्यावरण की समग्रता का परिचय कराने वाली एक ऐसी पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी, जो सर्वसाधारण के लिए उपयोगी हो। इस पुस्तक के प्रकाशन के पीछे यही दृष्टि मुख्य रूप से मौजूद रही है।
    विद्यार्थियों, गृहिणियों, ग्रामीणों, सामाजिव कार्यकर्ताओं, पर्यावरणों-प्रेमियों तथा गैरसरकारी संगठनों के लिए यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी, यह विश्वास है।
  • Bhagwan Mahaveer
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-127

    Availability: In stock

    भगवान महावीर विश्व के उन महापुरुषों में थे, जो मानव-श्रेणी से ऊपर उठकर देव-कोटि में पहुंच जाते हैं । भगवान महावीर के उपदेशों, सिद्धांतों और शिक्षाओं को लोगों ने हृदय से स्वीकार किया । वे अहिंसा के साक्षात् अवतार थे । उनका हृदय करुणा से आपूरित था । वे मानव मात्र के कल्याण के लिए विश्व-बंधुत्व के भाव को जन-जन  तक पहुंचना चाहते थे ।
    आज़ विश्व से चारों ओर हिंसा का तांडव फैला है । सर्वत्र मार-काट मची है । एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करने की घात लगाए रहता है। ऐसी दशा में भगवान महावीर की शिक्षाएँ बहुत ही उपयोगी हैं। उनका बताया हुआ शांति का मार्ग सारे विश्व के लिए कल्याणकारी है । वे जन-जन में अहिंसा, सत्य, करुणा और प्रेम की उदात्त भावनाएँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं । 
    प्रस्तुत पुस्तक में भगवान महावीर के जीवन-परिचय के साथ-साथ उनके सिद्धांतो, उपदेशों और शिक्षाओं का भी उल्लेख किया गया है । समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उनकी शिक्षाओं पर चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए ।
    विश्वास है कि पाठक-समूह भगवान महावीर के जीवन और उपदेशों से प्रेरणा लेकर पूरे समाज का जीवन सुखी बना सकेगा ।
  • Janhit Tatha Anya Kavitayen
    Hiralal Bachhotia
    85 77

    Item Code: #KGP-1856

    Availability: In stock

    जनहित तथा अन्य कविताएँ
    हीरालाल बाछोतिया की कविताओं में आज के मनुष्य की जिजीविषा, करुणा एवं मनस्ताप अभिव्यक्त हुआ है । कविताओं में एक ताजगी है, अन्य समकालीनों से अलगाव, जिसे है कवि का एक आवश्यक गुण मानता है । अपने परिवेश, अपनी धरती और अपनी आंतरिक अन्विति इन कविताओं में सजीव रूप में ध्वनित हुई है ।
    इस संग्रह की कविताएँ चार खंडों में विभाजित हैं । इन चारों खंडों में वैविध्य भी है और एक आंतरिक सामंजस्य भी । जो विशेष बात इन तमाम कविताओं में दिखाई दी, वह है मनुष्य के संताप को दूर करने के लिए कविता के द्वारा अक्रिय प्रयास । इसे मैं मानव-मुक्ति को कविता कह सकता हूँ ।
    इस संग्रह में कहीं-कहीं प्रकृति के अछूते बिंब है और ऐसा लगता है कि महानगर के विषाक्त वातावरण में रहकर भी कवि अपने अतीत को और अपने आत्मीय क्षणों को भूल नहीं पाया है । किंतु यह अतीतजीवी होना नहीं, नित नवीन की और अग्रसर होते हुए अपनी स्मृतियों को भी सहेजकर रखने जैसा है ।
    हिंदी पाठकों को ये कविताएँ आकृष्ट भी करेंगी और एक नई काव्य-संवेदना से भी उनका साक्षात्कार होगा ।

  • Narsi Mehta
    Hari Krishna Devsare
    150 135

    Item Code: #KGP-9291

    Availability: In stock

    नरसी मेहता अपने समय के एक परम भागवत गृहस्थ संत थे। गुजरात की पवित्र भूमि का यह परम सौभाग्य था कि वहां ऐसे भगवान् के प्रेमी संत ने जन्म लिया। उनकी भगवत्भक्ति ने सिर्फ गुजरात ही नहीं, अपितु समस्त भारत को प्रभावित किया। महात्मा गांधी को नरसी मेहता का निम्न पद बहुत प्रिय था, क्योंकि इसमें वैष्णव होने की जो व्याख्या की गई है, वह मानव-प्रेम का सच्चा संदेश देती है। आज लोग नरसी मेहता के इस पद से बहुत परिचित हैं-
    वैष्णवजन तो तेने कहिए, जे पीड पराई जाणे रे,
    पर दुःखे उपकार करे तोय, मन अभिमान न आणे रे।
    सकल लोक मां सहुन वंदे, निंदा न करे केनी रे,
    वाच काछ मन निश्चल राखे, धन धन जननी तेनी रे।
    समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, पर स्त्री जेने मात रे,
    जिव्हा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे।
    मोहमाया व्यापे नहिं जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मन मां रे,
    राम नाम शंुताली लागी, सकल तीरथ तेना मन मां रे।
    वण लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निवार्या रे,
    भणे ‘नरसैयो’ तेनुं दरसन करतां, कुल इकोतेरे तर्या रे।
  • Vrihat Hindi Lokokti Kosh
    795 716

    Item Code: #KGP-2107

    Availability: In stock

    वृहत् हिन्दी लोकोक्ति कोश
    हमारी प्रभावी, पूर्ण और आकर्षक अभिव्यक्ति का सबसे समर्थ साधन लोकोक्तियाँ होती हैं। वे वह गागर होती हैं, जिनमें अर्थ के सागर भरे होते हैं। अभी तक हिन्दी लोकोक्तियों का कोई ऐसा बड़ा कोश प्रकाशित नहीं हुआ है, जिसमें अधिकाधिक लोकोक्तियों को लिया गया हो। प्रस्तुत कोश इसी दिशा में एक महत् प्रयास है।
    इस प्रसंग में यह ध्यान देने की बात है कि ‘लोकोक्ति’ लोक की उक्ति होती है, इसलिए मानक भाषा की तुलना में लोकभाषा में लोकोक्तियों का प्रयोग कहीं अधिक होता है और मानक भाषा में भी काफी लोकोक्तियाँ लोकभाषा से ही छनकर आती हैं, जिन्हें संक्षेप में यहाँ देखा जा सकता है।
    प्रस्तुत ‘लोकोक्ति कोश’ में उपर्युक्त दृष्टि से कई विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। एक तो यह कि इसमें हिन्दी में प्रचलित और प्रयुक्त काफी लोकोक्तियाँ ले ली गई हैं। निश्चय ही इस दृष्टि से अब तक प्रकाशित हिन्दी लोकोक्ति कोशों में यह सबसे बड़ा लोकोक्ति कोश है।
    दूसरे, इसमें हिन्दी की अधिकांश बोलियों की अनेक लोकोक्तियाँ भी ली गई हैं, जैसे—अवधी, कन्नौजी, कौरवी, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी, निमाड़ी, मालवी, मैथिली, राजस्थानी, हरियाणवी, हाड़ौती आदि।
    तीसरे, मानक हिन्दी की अधिकाधिक तथा हिन्दी की प्रायः सभी लोकोक्तियों तथा हिन्दी की बोलियों की अधिकाधिक लोकोक्तियों को लेने के अतिरिक्त अपने देश की असमिया, उर्दू, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, बंगला, मराठी, मलयालम, सिंधी, संस्कृत आदि से भी काफी लोकोक्तियाँ तुलनात्मक रूप में यथास्थान दी गई हैं।
    चौथी विशेषता यह है कि उपर्युक्त लोकोक्तियों के अतिरिक्त इसमें देश के बाहर की अंग्रेज़ी, अरबी, उज़बेक, तुर्की, फारसी, रूसी आदि की भी जो तुलनात्मक लोकोक्तियाँ मिल सकी हैं, शामिल कर ली गई हैं।
    इस तरह यह कोश अपने आयाम में अब तक के लोकोक्ति कोशों से काफी अलग भी है और बड़ा भी।
    डॉ. तिवारी के लगभग 32-33 वर्षों के परिश्रम का परिणाम यह कोश निश्चय ही हिन्दी में अद्वितीय है। 

  • Shringaar Shatak
    Basant Kumar Mahapatra
    40 36

    Item Code: #KGP-9104

    Availability: In stock

    'श्रृंगार शतक' नाटक का एक संक्षिप्त अंश
    नयना : लेकिन ऐसा क्यों हुआ महाराज !!! यह युग हठात इस तरह को बदल गया ?
    सूर्यभानु : हर चीज हमेशा एक-सी नहीं रहती सुनयना! बीस साल पहले मैने तुझे जिस रूप में देखा था-क्या तुम आज वैसी ही हो ? ठीक उसी तरह समय के साथ-साथ न जाने कितना कुछ बदल जाता है । राजा सूर्यभानु आज भिखारी है और मेरा गुमाश्ता सनातन राजा । वह देखो, मेरे घर के आगे सिर उठाए खडी है उसकी तिमंजिली कोठी। बिजली की रोशनी से किस कदर झिलमिला रही है वह कोठी । जानती हो, आज उसके लड़के की शादी है । इसीलिए उसके दरवाजे पर इतनी गाड़ियां खडी है । कितनी भीड़ है । सारे ऑफिसर और मंत्री आज़ उसके यहीं आए है । पूरी रात वे जश्न मनाएँगे । आज जैसे दिन में यदि मैं चिल्ला-चिल्लाकर कहूँ-सना मेरा गुमाश्ता था-मेरे गोदाम से धान चोरी करते समय पकडे जाने पर वह बर्खास्त हुआ था–मेरी बात पर कौन विश्वास करेगा ? दिन बदल गए हैं सुनयना, सब कुछ उलट-पलट गया है ।
    नयना : किंतु ऐसा कब तक चलेगा महाराज ?
    सूर्यभानु : राजा है जुल्म किया, इसलिए प्रजा ने राजतंत्र तोड़कर गणतंत्र की स्थापना की । गणतंत्र में जुल्म हुआ तो लोग फिर इसके विरुद्ध विद्रोह करेंगे । उस विद्रोह में पैदा होगी–और किसी तरह की नवीन शासन पद्धति । खैर, छोडो–यह सब सोचकर कोई लाभ नहीं । जब तक कोई परिवर्तन आएगा हम लोग नहीं होंगे ।

  • Saadat Hasan Manto Ki Kahaniyan
    Narendra Mohan
    490 441

    Item Code: #KGP-1953

    Availability: In stock

    सआदत हसल मंटो उर्दू के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, चर्चित और विवादास्पद लेखक हैं। इस एक लेखक को लेकर जितनी चर्चाएं उठी हैं, उतनी अन्य किसी लेखक को लेकर नहीं। मंटो की खासियत है कि उसने नये विषयों पर ही नहीं लिखा, नये अन्दाजेबयां और नजरिये से भी लिखा। इस एक बात ने उन्हें अपने समय का ही नहीं, आज के समय का भी एक बड़ा कहानीकार बना दिया है।
    मंटो की कहानियां पाठकों की अन्तश्चेतना को बुरी तरह झकझोरने वाली, तिलमिला देने वाले विचारों तक ले जाने वाली हैं। यह बेचैनी महज व्यक्तिगत नहीं है, मुल्क और कौम की बेचैनी से जुड़ी हुई है जो कहानियों की मार्फत पाठकों तक सीधे पहुंचती है। उनकी कहानियों में गहरी मानवीय दृष्टि के साथ-साथ तीव्र आक्रोश और प्रतिकार भी है। हरारत और रोशनी, स्वप्न और दुःस्वप्न उनकी सृजनात्मक प्रेरणा के हिस्से हैं। इन कहानियों के जरिये मंटो हमें विसंगति-भरी जिन्दगी में जीने की शर्त का गहरा एहसास कराते हैं।
    सआदत हसन मंटो की कहानियां पुस्तक में मंटो के कथा-संसार में झांकने का, उनकी कहानियों को चुनकर, एक परिप्रेक्ष्य देकर हमारे सामने पेश करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है हिन्दी के जाने-माने कवि, नाटककार और आलोचक डाॅ. नरेन्द्र मोहन ने। मंटो की सृजनात्मक प्रेरणा और संपादकीय दृष्टि में आश्चर्यजनक साम्य है-एक-दूसरी में खुलती गई हैं और उन्हें अलगाया नहीं जा सकता। इससे यह पुस्तक कहानियों का संकलन-भर नहीं रही है, एक दस्तावेज बन गई है।

  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 1 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    195

    Item Code: #KGP-295

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (1)
    (व्यक्तित्व और परिवार)
    एक नहीं अनेक गांधी हैं--गांधी के  अकेले एक व्यक्तित्व से समाए हुए ।
    गत पूरी एक शताब्दी गांधी की शताब्दी थी । इतना महान् व्यक्तित्व संभवत: विश्व में कोई दूसरा नहीँ था । उनके अवसान के पश्चात उनका विशाल स्वरूप धुँधलाया नहीं, बल्कि और प्रखर, और अधिक प्रासंगिक होकर उभरा । अतीत के गांधी की अपेक्षा आज का गांधी अधिक व्यापक एव विराट, है ।  हिंसा की आग में झुलसते, आज के इस भयाक्रांत वानावरण में गांधी की आवश्यकता अधिक गहराई से अनुभव की जा रही है ।
    यों तो अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है गांधी जी पर, उनके जीवन-दर्शन पर, परंतु बहन सुमित्रा जी ने अपने पितामह का जिस रूप में रेखांकित किया है, वह उन सबसे भिन्न है । बापू के जीवन की पारदर्शिता उसमें झलके बिना नहीं रहती । सुपित्रा जी ने नि:स्पृह एवं निष्पक्ष भाव स सारी स्थितियों का गहन विवेचन किया है । अपने पितामह को भी क्षमा नहीं किया ।
    इस संपूर्ण कृति में हरिलाल भाई वाला प्रसंग सबसे करुण एवं दारुण है--दिल की दहला देने वाला । तब बापू मात्र बापू न रहकर एक संवेदनशून्य पिता की भूमिका में दीखते हैं । हरिलाल भाई सारा गरल चुपचाप पी जाते हैं, पर किसी से कोई शिकायत नहीं । इतना प्रखर, मेधावी, आज्ञाकारी सुपुत्र पिता की उपेक्षा का शिकार बनकर अपनी आहुति दे टेना है । तब गांधी से बडा गांधी लगता है वह--एक निपट मानव के रूप में । अपनी परदादी माँ 'पुतली माँ' पर भी सुपित्रा जी न विस्तार स लिखकर 'गांधी-परिवार' की इस पुण्य-गाथा को एक युग-गाथा का नया आयाम प्रदान किया है । संयुक्त परिवार में पद्म-पत्रवत् रहने की उनकी तपश्चर्या कितनी प्रेरक थी ! इस कृति में ऐसा बहुत कुछ  जो गंभीरता के साथ सोचने के लिए विवश करता है ।  सुमित्रा जी की यह रचना इसलिए अनेक अर्थों में अद्वितीय बन गई है ।
    --हिमाशु जोशी
    13 अगस्त, 2009
  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh
    Shravan Kumar
    995 746

    Item Code: #KGP-596

    Availability: In stock


  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-1)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1576

    Availability: In stock


  • Papa, Muskuraiye Na! (Paperback)
    Prahlad Shree Mali
    100

    Item Code: #KGP-1486

    Availability: In stock

    मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं औ वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंतके पास।
    मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।
    -इसी पुस्तक से
  • Dekho Samjho Karo
    Jagat Ram Arya
    160 144

    Item Code: #KGP-105

    Availability: In stock

    बालकों, अपने चारों ओर की दुनिया को देखो। इसमें भगवान ने हजारों वस्तुएं बनाई हैं-हवा, पानी, सूर्य, पृथ्वी, अग्नि आदि। इनमें से हर एक में सैकड़ों-हजारों शक्तियां भरी पड़ी हैं जिनमें से कुछ एक को हम-तुम जानते हैं। कइयों को हम बिलकुल नहीं जानते। कुछेक को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। अपनी दुनिया के बारे में यह हमारा अधूरा ज्ञान है। इसीलिए हम उन शक्तियों से लाभ नहीं उठा पाते। जैसे किसी निर्धन की खाट के नीचे धरती में सोने-चांदी का खजाना दबा हो, किंतु जिसका उसे पता न हो और वह भूखा नंगा रहकर दिन-रात दुख सहता हो। काश, वह उस छिपे खजाने को जान पाता और उसका प्रयोग करके सुखी बन जाता। इसी प्रकार अपने आसपास की वस्तुओं के बारे में भी हम बहुत कम जानते हें। ओर उसका कम लाभ उठाते हें। उनका पूरा लाभ हम तभी उठा सकते हैं जब उनहें अच्छी तरह जान लें। इस प्रकार वस्तुओं के ‘विशेष ज्ञान’ को ही विद्या कहते हैं।
    आज हम मोटर, हवाई जहाज, राकेट आदि के अजब अनोखे आविष्कार देखते हैं, जो विज्ञान के सहारे ही बनाए गए। बड़े-बड़े आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक भी हमारे-तुम्हारे जैसे दो हाथ, दो पांव वाले मनुष्य होते हैं। उनमें केवल तीन विशेष गुण होते हैं। वे हर वस्तु को ध्यान से देखते हैं, गहराई से समझते हैं और हाथ से करके देखते हैं। यदि हम भी विज्ञान पढ़ना चाहते हैं तो हमें भी इनहीं तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए-
    1. हम अपने प्रयोग की वस्तुओं को ध्यान से देखें।
    2. हम वस्तुओं में छिपी शक्तियों और गुणों को समझें।
    3. हम उन वस्तुओं के नित्य नए प्रयोग करना सीखें।
    इस पुस्तक में वैज्ञानिकों की सच्ची और रोचक घटनाओं के आधार पर विज्ञान के इन्हीं तीन अंगों पर बल दिया गया है। इनका प्रयोग हर बालक अपने घर और विद्यालय में कर सकता है। 
    —लेखक
  • Nirogyogsadhna (Paperback)
    Manoj Kumar Chaturvedi
    180

    Item Code: #KGP-7070

    Availability: In stock

    निरोगयोगसाधना
    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और दिन-रात उसके लिए प्रयास करते रहते हैं। इस आपाधापी में व्यक्ति सबसे अहम चीज को जो नकार देता है वह है ‘स्वयं का स्वास्थ्य’। वह यह नहीं समझते कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु तभी आपके लिए उपयोगी होगी जब आप उसका आनंद लेने के लिए तैयार होंगे। व्यक्ति यदि स्वस्थ नहीं तो संसार की कीमती से कीमती वस्तु भी उसके लिए बेकार है। स्वस्थ जीवन है तो जहान है। 
    योग द्वारा कैसे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से संपूर्णतया स्वस्थ रह सकता है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन इस ‘निरोगयोगसाधना’ नामक पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
    योग दर्शनशास्त्र में वर्णित सूत्र षड्दर्शन का ही छठा अंग है। ये षड्दर्शन वेदों के उपांग माने गए हैं। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निशक्त, छंद, ज्योतिष आदि वेदों के अंग कहलाते हैं जिनके द्वारा वेद मंत्रों के अर्थ का ज्ञान होता है।
    योग ऐसी कला है जो प्रकृति और मनुष्य के बीच के अंतर को स्पष्ट कर व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत करती है। अर्थात् व्यक्ति योग के माध्यम से इंद्रियों को अपने वश में करने लायक बन जाता है और माया के बंधन से भी स्वयं को तोड़कर मुक्त हो जाता है। योग अनादिकाल से चला आ रहा है और इसकी उपयोगिता व्यक्ति तभी समझ सकता है जब वह योग को स्वयं पर लागू करे, उसमें रम जाए। योग करने वाला व्यक्ति कभी बूढ़ा या बीमारी से ग्रसित नहीं होता।
    —भूमिका से
  • Kavi Ne Kaha : Anamika (Paperback)
    Anamika
    120

    Item Code: #KGP-1317

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : अनामिका
    अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करती ।
    भारतीय स्त्रियों के जीवन-संघर्ष तथा हास-परिहास और गीत-अनुष्ठान आदि के जरिए पीड़ा को सह पाने की उनकी परंपरागत युक्तिहीन युक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर अनामिका की कविताओं के नए अर्थ खुलते हैं, जिन तक कविता को देखने-परखने के रूढ़ ढाँचे को तोड़कर ही पहुंचा जा सकता है ।
    उनकी संवेदना का फैलाव उन वंचित जनों तक है, जिनसे एक स्त्री की करुणा सहज रूप से जुड़ जाती है । लोकभाषा के शब्द उनके यहाँ किसी गुर की तरह नहीं आते, बल्कि वे उनके अनुभव का अनिवार्य हिस्सा हैं । 'जनमतुआ' बच्चे की 'चानी' की तरह 'पुलपुल' कविताओं में परिपक्व कठोरता की विपुल संभावनाएं अंतर्निहित हैं । हिंस्र  समय के प्रतिरोध का उनका अपना ढंग है, जो भारतीय स्त्रियों की प्रतिरोध की परंपरा की गहरी समझ और संवेदनात्मक जुड़ाव से उपजा है ।
    समस्याओं और घटनाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण एक ऐसी संवेदनशील स्त्री का दृष्टिकोण है, जिसके भीतर अभी भी निष्पाप बचपन बचा हुआ है । संवेदना का यही वह धरातल है, जो हमारे समय से उन्हें विशिष्ट बनाता है ।
  • Charitraheen (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    280

    Item Code: #KGP-727

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Amrit Lal Nagar
    Amritlal Nagar
    490 417

    Item Code: #KGP-478

    Availability: In stock


  • Guleri Rachanawali (Two Vol.)
    Manohar Lal
    1600 1440

    Item Code: #KGP-02

    Availability: In stock

    पं. चंद्रधर  शर्मा गुलेरी उन महान् रचनाकारों और मनीषियों में अग्रगण्य हैं जिन्हें ‘हिंदी का निर्माता’ कहा जाता है। खड़ी बोली हिंदी के प्रारंभिक काल में गुलेरी ने कहानी और निबंध् सहित अनेक विधओं में संवेदना व शिल्प की बुनियाद तैयार की। लेखक, पत्रकार, विमर्शकार, अनुसंधनकर्ता और शास्त्राज्ञ आदि अनेक रूपों में गुलेरी ने भाषा और साहित्य को समृद्ध किया। 
    ‘गुलेरी रचनावली’ (दो खंड) कालजयी साहित्यकार 
    पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा विरचित साहित्य का प्रामाणिक संकलन है। डाॅ. मनोहर लाल ने अत्यंत परिश्रम, विद्वत्ता व निष्ठा के साथ इस रचनावली का संपादन किया है। इसमें कहानी, निबंध्, शोध्, पांडुलिपि विवरण, संस्मरण, साक्षात्कार, पौराणिक विवेचन, लोककला, राजनीति, धर्म, साहित्य समीक्षा, पत्रकारिता, काव्य, जीवन चरित, भूमिका लेखन, भाषा विवेचन, अनुसंधन, इतिहास, पुरातत्त्व, विज्ञान, ललित निबंध्, संपादकीय, पत्र साहित्य में निहित गुलेरी की रचनाओं को संजोया गया है। उनके व्यक्तित्व का विशद विवेचन है। उनके द्वारा संस्कृत और अंग्रेजी में लिखी रचनाएं हैं।
    गुलेरी इस बात के उदाहरण हैं कि किसी लेखक की केवल एक रचना उसे अमरत्व प्रदान कर सकती है। ‘उसने कहा था’ एक ऐसी अपूर्व अविस्मरणीय कहानी, जिसने भारतीय साहित्य में गुलेरी को अक्षय कीर्ति प्रदान की। अज्ञेय के शब्दों में, ‘गुलेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं, पर उन तीनों में से एक ऐसी सर्वांग सुंदर रचना हुई कि कोई भी कहानी संग्रह उसे लिए बिना प्रतिनिध्त्वि का दावा नहीं कर सकता।’ यह कहानी है ‘उसने कहा था।’ नामवर सिंह के अनुसार, ‘गुलेरी जी हिंदी में सिर्फ एक नया गद्य या नई शैली नहीं गढ़ रहे थे बल्कि वे वस्तुतः एक नई चेतना का निर्माण कर रहे थे।’ यह उल्लेखनीय है कि गुलेरी के ‘कछुआ धर्म’ और ‘मारेसि मोहि कुठाउं’ जैसे निबंध् भी अत्यंत प्रसिद्ध  हुए। भाषाविद् और प्राचीन साहित्य के अचूक मर्मज्ञ के रूप में गुलेरी अद्वितीय सि( हुए।
    स्वाभाविक है कि डाॅ. मनोहर लाल द्वारा सुसंपादित ‘गुलेरी रचनावली’ का ऐतिहासिक महत्त्व है। पाठक, आलोचक, शोध्कर्ता—सबके लिए संग्रहणीय। पुस्तकालयों को समृद्ध  करतीं ऐसी पुस्तकें ही राष्ट्रभाषा हिंदी की पहचान हैं।
  • Bharat Ke Ateet Ki Khoj
    Om Prakash Kejariwal
    550 468

    Item Code: #KGP-592

    Availability: In stock

    भारत के अतीत की खोज
    आज का करीब-करीब हर शिक्षित भारतवासी सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, कनिष्क तथा बुद्ध जैसे ऐतिहासिक चरित्रों से परिचित है, परंतु जो बात अधिकतर शिक्षाविद् तथा विद्वान् अभी भी नहीं जानते, वह यह है कि करीब 200 वर्ष पहले ये सभी नाम या तो अपरिचित थे या इनके बारे में बहुत कम जानकारी थी। वस्तुतः 18वीं शताब्दी के आते-आते भारत अपने इतिहास को विस्मृति के गर्भ में खो चुका था। एक प्रकार से हम कह सकते हैं कि 18वीं शताब्दी में हमारे पास एक समृद्ध अतीत तो था, परंतु इतिहास नहीं। यह अतीत किस प्रकार हमारे इतिहास में परिवर्तित हुआ, यही इस पुस्तक का मूल विषय है।
    इस काम को करने वाले महत्त्वपूर्ण अंग्रेज विद्वान् थे--सर विलियम जोन्स, जिन्होंने 1784 में कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की, जो इन सारे अध्ययनों का केंद्र बनी। इसी के अंतर्गत आधी शताब्दी के दौरान जो काम हुआ, उसके परिणाम-स्वरूप ही हमारा अधिकांश प्राचीन इतिहास प्रकाश में आया।
    प्रस्तुत पुस्तक में इसी आधी शताब्दी की कहानी है। साथ ही इसमें इस विषय की भी विवेचना है कि ये सभी विद्वान् अपने अध्ययन-कार्यों में मात्रा साम्राज्यवाद की भावना से प्रेरित थे अथवा नहीं।
  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    595 476

    Item Code: #KGP-1985

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे।
  • Chasing Maya (Novel)
    Rohan Gagoi
    395 356

    Item Code: #KGP-606

    Availability: In stock

    Better jobs, bigger salaries, expensive cars, exclusive homes, exotic vacations, shopping abroad, admiration and jealousy of peers... What more can you expect from life! Or, may be, you can…! Come; explore your truth with ‘Chasing Maya’!
    ‘Chasing Maya’ is about thirty-two-year old Siddhartha Kumar, who in spite of his evident material success finds himself trapped in the grip of mediocrity – the distress and despair of being no different from millions of others in this world. Bemused, he sets on a quest to rediscover the zeal that once fuelled his dreams and passion and comes across with situations and people that lead him to astounding revelations.
    Share the anxiety, live the excitement and experience the magical transcendence as ‘Chasing Maya’ takes you on an incredible journey that every human soul instinctively seeks to undertake but only a negligible few truly succeed to accomplish!
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rabindra Nath Thakur
    Rabindra Nath Thakur
    250 225

    Item Code: #KGP-622

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रस्तुत संकलन में जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अनधिकार प्रवेश', 'मास्टर साहब', 'पोस्टमास्टर', 'जीवित और मृत', 'काबुलीवाला', 'आधी रात में', 'क्षुधित पाषाण', 'अतिथि', 'दुराशा' तथा 'तोता-कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Premchand Ki Shresth Kahaniyan
    Premchand
    150 135

    Item Code: #KGP-7801

    Availability: In stock

    यद्यपि प्रेमचंद ने नाटक, जीवनी, अनुवाद, निबंध तथा बाल-साहित्य की रचना भी की किंतु उनकी अक्षय कीर्ति का आधर उनके उपन्यास और कहानियां ही हैं। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूति, काया-कल्प, गबन, कर्मभूमि तथा गोदान जैसे प्रसिद्ध उपन्यासों एवं प्रायः तीन सौ कहानियों की रचना कर अपने को अमर करने वाले प्रेमचंद की गुल्ली-डंडा, नमक का दारोगा, प्रेरणा, दो बैलों की कथा, मंदिर, ईश्वरीय न्याय, सवा सेर गेहूं, रामलीला, पूस की रात, महातीर्थ, जुलूस, पशु से मनुष्य, दुस्साहस, आत्माराम, नशा, गृह-दाह आदि लोकप्रिय कहानियां हैं। प्रेमचंद ने अपने समय और समाज के ज्वलंन प्रश्नों को अपनी कहानियों के माध्यम से चित्रित किया है। ग्रामीण जीवन-परिवेश और पात्रों का इतना जीवंत चित्रण करने वाला कथाकार हिंदी में तो क्या अन्य भारतीय भाषाओं में भी कदाचित् ही कोई हुआ हो। यही कारण है कि वे उस समय के सर्वप्रमुख भारतीय कथाकार हैं। विद्वानों ने बीसवीं शती के विश्व-साहितय के तीन बड़े शीर्ष कथाकारों में प्रेमचंद की गणना की है।
  • Ramayan Bharantiyan Aur Samadhaan
    Swami Vidya Nand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1115

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के पढ़ने से पता चलेगा कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम राज्य पाने के इच्छुक थे, वे पिता के कहने से वन नहीं गए, राम दीपावली के दिन नहीं बल्कि चैत्र शुक्ला 6 को अयोध्या लौटे थे, सीता का स्वयंवर नहीं हुआ था, कौशल्या की स्थिति घर में दासियों से भी बुरी थी, राम ने धोबी या किसी के भी कहने से सीता को वनवास नहीं दिया था, उन्होंने तपस्या करते तथाकथित शुद्र शम्बूक का वध नहीं किया था, हनुमान बंदर नहीं बल्कि व्याकरणाचार्य तथा चारों वेदों के विद्वान् थे, बालि की पत्नी तारा वेदों के रहस्य को जानने वाली थी, उसका पुत्र अंगद बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ था और उसके श्वसुर सुषेण बड़े कुशल सर्जन और प्लास्टिक सर्जरी में निष्णात थे, हनुमान, जटायु, रावण आदि छोटे-छोटे निजी हेलीकाॅप्टरों में यात्रा करते थे, शबरी भीतनी नहीं, उच्च कुल की तपोनिष्ठ देवी थी, अयोध्या तथा लंका की राजभाषा संस्कृत थी इत्यादि...
  • Kavi Ne Kaha : Arun Kamal (Paperback)
    Arun Kamal
    90

    Item Code: #KGP-1524

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: अरुण कमल
    यहाँ जो कविताएँ संकलित हैं वे मेरी सभी चार प्रकाशित कविता-पुस्तकों एवं आने वाली पुस्तक से ली गई हैं। कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जो इन पुस्तकों के बाहर की हैं जो लिखी तो पहले गईं परंतु जिनका समावेश नहीं हो सका। ये कविताएँ मैंने खुद चुनी हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बाकी कविताएँ जो यहाँ नहीं हैं वे इनसे हीनतर हैं या उनसे मेरा स्नेह कम है। हो सकता है कुछ लोगों को वे ही अधिक पसंद आवें। चाहिए तो यह कि किसी भी कवि की सभी रचनाओं को यानी पहली से लेकर अब तक एक साथ पढ़ा जाए। तब जाकर चित्र पूरा होता है क्योंकि कोई भी एक कविता अपने में पूरी नहीं होती, उसकी नाल किसी पिछली में होती है और मंजरी आगे बहुत दूर चलकर दिखलाई पड़ती है। इसलिए कई बार ओझल रह जाने वाली कविताएँ ध्यान देने पर बहुत महत्त्वपूर्ण लगती हैं।
  • Kavi Ne Kaha : Manglesh Dabral (Paperback)
    Manglesh Dabral
    100

    Item Code: #KGP-1411

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: मंगलेश डबराल
    मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से अपनी सृजनात्मक प्रेरणा ग्रहण करती हुई हिंदी कविता की आज जो पीढ़ी उपस्थित है, उसमें मंगलेश डबराल जैसे समर्थ कवि इतने वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी होते जा रहे हैं कि उनके किसी एक या चुनिंदा पहलुओं को पकड़कर बैठ जाना अपनी समझ और संवेदना की सीमाएं उघाड़कर रख देना होगा। एक ऐसे संसार और समय में जहां ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्हीं भी शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को उसके हाशिये से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचोबीच लाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, ईषर्यालु अथवा आत्मदयाग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोज़ख़ को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इनकार करता है।
    मंगलेश की इन विचलित कर देने वाली कविताओं में गहरी, प्रतिबद्ध, अनुभूत करुणा है, जिसमें दैन्य, नैराश्य या पलायन कहीं नहीं है। करुणा, स्नेह, मानवीयता, प्रतिबद्धता--उसे आप किसी भी ऐसे नाम से पुकारें, लेकिन वही जज़्बा मंगलेश की कविता में अपने गांव, अंचल, वहां के लोगों, अपने कुटुंब और पैतृक घर और अंत में अपनी निजी गिरस्ती के अतीत और वर्तमान, स्मृतियों और स्वप्नों, आकांक्षाओं और वस्तुस्थितियों से ही उपजता है। उनकी सर्जना का पहला और ‘अंतिम प्रारूप’ वही है।
    आज की हिंदी कविता में मंगलेश डबराल की कलात्मक और नैतिक अद्वितीयता इस बात में भी है कि अपनी शीर्ष उपस्थिति और स्वीकृति के बावजूद उनकी आवाज़ में उन्हीं के ‘संगतकार’ की तरह एक हिचक है, अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की कोशिश है, लेकिन हम जानते हैं वे ऐसे विरल सर्जक हैं जिनकी कविताओं में उनकी आवाज़ें भी बोलती-गूंजती हैं जिनकी आवाज़ों की सुनवाई कम होती है।
  • Nahin Koi Ant
    Pratap Sehgal
    80 72

    Item Code: #KGP-1300

    Availability: In stock


  • Debt-Free-Forever (Paperback)
    Gail Vax-Oxlade
    245

    Item Code: #KGP-344

    Availability: In stock

    Imagine waking up in the morning and knowing that no matter what happens today, you can cope. Imagine that you’ve got enough money to take care of the expenses that need to be paid regularly and to have some fun too. Imagine the sense of peace that comes from knowing you’re in control of your life.
    If you’ve been frantically trying to cover your butt because there just never seems to be enough money, I can help you. If you’re up to your eyeballs in debt and can’t even imagine being debt-free, I can help you. If you’re at your wits’ end because you’ve made a huge mess and don’t have a clue how to fix it, I can help you.
    —from the book
    FIGURE OUT WHERE YOU STAND MAKE A PLAN CHANGE YOUR HABITS PREPARE FOR THE FUTURE STAY THE COURSE
  • Keral Ka Krantikari (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    40

    Item Code: #KGP-1122

    Availability: In stock


  • Priyakant
    Pratap Sehgal
    160 144

    Item Code: #KGP-2043

    Availability: In stock

    प्रियकांत
    प्रताप सहगल उन लेखकों में से हैं, जिन्होंने अपने लड़कपन से ही दिल्ली नगर को महानगर और महानगर को सर्वदेशीय नगर (Cosmopolitan City) बनते हुए देखा है। इस बदलाव के साथ जुड़े आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक पहलुओं के बदलते रंगों को भी महसूस किया है। इन बदलते रंगों के साथ बदलते वैयक्तिक संबंधों और मूल्य-मानों पर उनकी पैनी निगाह रहती है। इसीलिए उनके लेखन में निरा वर्णन नहीं होता, बल्कि उसके साथ समय के कई सवाल जुड़े रहते हैं। कभी यथार्थ के धरातल पर तो कभी दर्शन के स्तर पर ।
    उनका नया उपन्यास 'प्रियकांत' भी कोई अपवाद नहीं है। पिछले तीस-चालीस सालों में धर्म का व्यापारीकरण और बाजारीकरण हुआ है। इसके लिए आम-जन को अपने परोसने के लिए धर्म के नए-नए मंच बने और नए-नए धर्मगुरु तथा धर्माचार्य फिल्मी सितारों की तरह चमकने लगे।
    'प्रियकांत' एक ऐसे ही धर्माचार्य के उदय और उसके साथ जुड़ी महत्वाकांक्षाओं और विसंगतियों की कथा है। पात्र पौराणिक हो, ऐतिहासिक हों या समकालीन-प्रताप सहगल की नज़र हमेशा उनके माध्यम से समय के साथ मुठभेड़ मर ही रहती है। और इस उपन्यास में भी धर्म, धर्मगुरु, ज्ञान एवं अनुभव से जुड़े कुछ सवाल ही रेखांकित होते हैं...शेखर, नीहार और गुलशन के साथ...आप पढ़ेंगे तो आपको भी लगेगा कि इस कथा में आप भी कहीं न कहीं ज़रूर हैं।
  • Thank You Idi Amin (Paperback)
    Mohezin Tejani
    395

    Item Code: #KGP-324

    Availability: In stock

    Through adversity, a new life emerges
    Bouncing back from one of the horrific episodes of world history—Idi Amin’s expulsion of 80,000 Asians from Uganda— Mohezin Tejani presents a collection of true stories about being a global Muslim refugee.
    Liberated from the confines of his own culture by political realities, Tejani sets out to learn how to be rooted in the absence of a place to call home. His writing is a hypnotic bhangra dance through time and space where he deftly explores both geographical and psychological displacement. Yet it is precisely through such disorientation and a host of intercultural encounters that he eventually finds solace in being a ‘global village on two legs.’
    Thank You, Idi Amin portrays the intersecting points of congruence among humans that are neither from the East nor the West, nor the North or South, but are all part of a global compass navigating the new world of tomorrow.
  • Vishva Ke Mahaan Aavishkaarak Aur Unke Aavishkaar (Paperback)
    Laxman Prasad
    260

    Item Code: #KGP-51

    Availability: In stock

    आज संसार का जो स्वरूप है, उसे बनाने में हजारों-लाखों आविष्कारकों ने अपना जीवन लगाया है। इनमें से कुछ का योगदान इतना ज्यादा है कि उनहें महान् कहा जाता है। इन आविष्कारकों ने कृषि, उद्योग, यातायात (जल, थल, नभ, अंतरिक्ष), दूरसंचार (टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेडियो, टी.वी.), उपयोगी उपकरण (कम्प्यूटर, कैमरा), चिकित्सा, युद्धक सामग्री, परमाणु ऊजा, विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक सिद्धांतों आदि को इस कदर विकसित किया कि संसार नए युग में प्रवेश कर गया। प्रस्तुत पुस्तक में पिछले ढाई हजार सालों के ऐसे 40-45 महान् आविष्कारकों का व्यक्तित्व व कृतित्व समाहित है।
  • Mera Paigaam Muhabbat Hai Jahan Tak Pahunche (Paperback)
    Jigar Muradabadi
    150

    Item Code: #KGP-7111

    Availability: In stock

    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
    'जिगर' साहब इंसानियत और शेरियत दोनों का पैकर थे । उनकी शायराना अजमत का बडा राज उनकी मखसूस सज-धज, तर्जेअदा और तरन्नुम था । उनकी मासूम जोर दिलकश शखसियत ने उन्हें अपने दौर का महबूब-तरीन शायर बना दिया था । उनकी बड़ाई को इस पैमाने से भी नापा जा सकता है कि दौरे जदीद में कितनों ने जिगर बनने की कोशिश की, इसलिए कि शेर की दुनिया के वह एक तर्ज थे। असलूब थे, एक स्टाइल थे ।
    'जिगर' ने गजल को एक नई जिंदगी बख्शी । उनकी गजले मदहोशी व रंगीनी के छलकते हुए सागर  हैं, जिससे तरह-तरह के रंग मौजूद है और किस्म-किस्म के जजबात जलवागर हैं,
    जिनका मुताअला जिंदगी के नशे को गहरा कर देता है, कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और हयात नये रूप में जलवागर होकर दिल की धड़कन में जज्ब हो जाती है । खून को रवानी तेज हो जाती है और शायरी के तारों से आहंग हो जाती है। ये इंतेखाबे गजल के अशआर ऐसे है जिनमें नई जिंदगी और वक्त की धड़कनों की आवाजें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख 'जिगर' को कभी भुला नहीं सकेंगी ।
  • Bhakt Soordas
    Chandrika Prasad Sharma
    190 171

    Item Code: #KGP-140

    Availability: In stock


  • Pratidin (3 Vols.)
    Sharad Joshi
    1350 1215

    Item Code: #KGP-859

    Availability: In stock

    प्रतिदिन (तीन खंड)
    शरद जोशी के व्यंग्य कॉलम 'प्रतिदिन' पर लिखते हुए बहुत- सी बातें मेरे मन मैं हैं ।
    सबसे पहले मेरे मन से वे दिन आ रहे हैं, जब ‘नवभारत टाइम्स' के आखिरी पन्ने के कोने में, शरद जोशी की फोटो के साथ बमुश्किल तमाम दस-पंद्रह पंक्तियों से लेकर पच्चीस- तिस पंक्तियों तक का छोटा-सा व्यंग्य कॉलम लगभग रोज आता था । इस छोटे-से कोने ने तब देश में अखबार पढ़ने के तरीके बदल दिए थे । हम जैसे तमाम लोग पिछले पन्ने से अखबार शुरू करने लगे थे । उत्सुकता रहती थी कि शरद जोशी ने आज किस विषय पर कैसा, क्या लिखा होगा? किस कोण से ? क्या उठाया ? तुमने पढा ? वाह यार !
    शरद जोशी ने सात सालों तक रोज एक नया विषय उठाया, उसे एकदम नईं दृष्टि से देखा और फिर उसे एकदम नई भाषा-शैली के प्रयोग से ऐसा बनाया कि उन दिनो 'नवभारत टाइम्स' का वह कोना मानो फैलकर 'पूरे अखबार पर छा गया था । और अखबार पर ही क्यों, यह तो मानो पाठको की पूरी कायनात पर छा गया था । ऐसा व्यंग्य कॉलम न तो पहले लिखा गया था, न सोचा ही गया था । कुछ ही दिनो से वह इतना लोकप्रिय हो गया था कि यह अफवाह रहती थी कि एक जमाने में शरद जोशी का पेमेंट राजेन्द्र माथुर (जो अखबार के संपादक थे) से ज्यादा हो गया था । उसकी लोकप्रियता के चलते 'टाइम्स आँफ इंडिया' से उसके अंग्रेजी अनुवाद देने की कोशिश भी की गई । तब यह बात और भी विहित से सामने आई कि शरद जोशी जैसे जमीनी लेखक की मुहावरेदार और स्थानीय गमक से समृद्ध भाषा का अनुवाद करना लगभग असंभव बात है ।
    आज सालों के अंतराल के बाद 'प्रतिदिन' में लिखी ये अद्भुत व्यंग्य रचनाएं जब एक साथ इस संकलन से जा रही हैं-तब इनका पुनर्पाठ आपको शरद जोशी की ऐसी विलक्षण प्रतिभा से साक्षात्कार कराता है, जिसकी याद उसके जाने के बाद व्यंग्य में उत्पन्न और व्याप्त बियाबान में और भी शिद्दत से आ रही है। -ज्ञानचतुर्वेदी
  • Madhavi Kannagi
    Chitra Mudgal
    90 81

    Item Code: #KGP-975

    Availability: In stock

    लगभग दो हजार वर्ष पुराना तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पधिकारम्’ को विषय बनाकर मैं तुम्हारे लिए एक उपन्यास लिखना चाह रही थी। अचानक एक दिन एन. सी. ई. आर. टी. से डाॅ. रामजन्म शर्मा का फोन आया। उनका आग्रह हुआ कि ‘पढ़ें और सीखें’ योजना के अंतर्गत मैं बाल-पाठकों के लिए ‘शिलप्पधिकारम्’ को आधार बनाकर एक बाल-उपन्या लिखूं। किन्हीं कारणों से डाॅ. रामजन्म शर्मा के दुबारा आग्रह पर मुझे दूसरी पुस्तक लिखनी पड़ी। 
    पिछले वर्ष संयोग से कंेद्रीय हिंदी निदेशालय के नव-लेखन प्रशिक्षण शिविर में दक्षिण जाना हुआ। वहां कुछ मित्रों ने उलाहना दिया कि तमिल साहित्य की समृद्धि के बारे में उत्तर भारत के बाल-पाठक कुछ नहीं जानते। बस, इस उलाहने ने मुझे बेचैन कर दिया। पुरानी इच्छा जाग उठी। पाण्डिचेरी से लौटकर मैंने ‘माधवी कन्नगी’ तुरंत लिखना शुरू कर दिया। उपन्यास पूरा हो गया।
    —चित्रा मुद्गल
  • Brunch Tatha Anya Kahaniyan
    Shailendra Sagar
    225 203

    Item Code: #KGP-452

    Availability: In stock

    सुपरिचित वरिष्ठ कथाकार शैलेन्द्र सागर के इस संग्रह में आज की उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते उभरती सामाजिक-सांस्कृतिक टूट-फूट के तहत जटिल विसंगतियों के दुष्चक्र में फंसे पात्रों की कहानियां दर्ज हैं। अधिकांश कहानियों में स्त्री-पुरुष की परंपरागत छवियों के बरक्स उपभोक्तावादी दौर में बुनते-घुनते संबंधें में दिनोदिन पसरते तनावों, अलगावों और नए पनपते रिश्तों की ऐसी अलक्षित सच्चाइयां पूरी प्रामाणिकता के साथ नजर आती हैं जहां पुराने समय की रूढ़ भूमिकाएं धूमिल हैं और बाजारवाद के बदलते दौर में रिश्ते पहले से ज्यादा जटिल, यथार्थपरक और अवसरवादी होते जा रहे हैं। घर-परिवार से लेकर बाहर की दुनिया में संघर्षरत पात्रों की उद्विग्नता, बेचैनी और संवेदना के क्षरित होने की दास्तां यहां पूरी बेबाकी से उकेरी गई है। सच तो यह है कि संक्रमण के इस संवेदनहीन समय में निष्प्रभ पड़ते संबंधें की बारीकी से पड़ताल करती ये कहानियां आश्वस्त करती हैं कि अचूक अवसरवाद की अंदरूनी चालों को समझने के लिए हमें संवेदना संसार में लौटना पड़ेगा जहां आपको दरारों के बीच दिखेगी मुस्कराहट, अनकही टकराहटों के बीच दिखेगी मनुष्यता और हताशा के बीच कहीं से खिल उठेंगी आशा-उल्लास की कोंपलें भी...।
    विडंबनापूर्ण स्थितियों से उबरने के लिए रिश्तों की कोमलता को बचाए रखने की मुहिम छेड़ती हैं ये कहानियां...
  • Usane Kaha Tha Aur Anya Kahaniyan
    Shri Chandra Dhar Sharma Guleri
    150 135

    Item Code: #KGP-9078

    Availability: In stock


  • Pahli Gustakhi
    Ramesh Dutt
    190 171

    Item Code: #KGP-772

    Availability: In stock

    पहली गुस्ताखी
    संग्रह की कविताएं अत्यंत सहज, सरल और सीधे-सीधे पाठकों तक संप्रेषित होने वाली हैं । उनमें प्रायः एक अनगढ़पन भी है, लेकिन कवि अपने सामाजिक एवं मानवीय सरोकारों के प्रति अत्यंत गंभीर है । आज जबकि पूरी दुनिया समूची धरती को बचाने के लिए चिंतित है, डॉ. शर्मा की ग़ज़लनुमा कविताओं में पर्यावरणीय चिंताओं के बिंब, संग्रह को उल्लेखनीय बनाते हैं ।
    वर्तमान समय की शायद ही कोई भी समस्या हो, जिस पर कवि ने अपनी कलम न चलाई हो । चाहे गरीबी हो या बेकारी, भ्रष्टाचार हो या सांप्रदायिकता, हिंसा हो या अपराध, राजनीति की गिरावट हो या नौकरशाही की सुविधापरस्ती, समाज में टूटते- बिखरते रिश्तों एवं मानवीय मूल्यों के क्षरण पर कवि का ध्यान बार-बार जाता है और वह बार-बार अपनी रचनाओं में उन्हें पिरोता है ।
  • Kambakht Nindar
    Narendra Mohan
    350 315

    Item Code: #KGP-793

    Availability: In stock


  • Hamare Jeevan Moolya-1
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1145

    Availability: In stock


  • Kash, Pankh Hamaare Hote
    Priya Sharma
    220 198

    Item Code: #KGP-9338

    Availability: In stock

    डाॅ. प्रिया शर्मा की ये कविताएँ बच्चों के सरल चित्त पर समय की चेतावनियाँ लाल-हरे रंग में झिलमिलाती चलने वाली हँसती-बोलती सी कविताएँ हैं। ‘फास्ट फूड’ या ‘ब्यूटी पार्लर’ या ‘कविताएँ न पढ़ने की प्रवृत्ति’ बाल जगत् में भी प्रवेश पा गए हैं। एक से एक रोचक विज्ञापन मायानगर के ऐयार की तरह टीवी पर आते हैं और फास्ट फूड,  शृंगार प्रसाध्न आदि के प्रति बाल-मन में भी ऐसा आकर्षण भर देते हैं कि घर का पौष्टिक और संतुलित आहार उन्हें अखाद्य लगने लगता है और नहाया-धोया, सादा-सा चेहरा भी ‘ब्यूटी पार्लर’ का प्रत्याशी! गुड़ियानुमा वे ही मम्मियाँ अच्छी लगने लगती हैं जो ‘सुपर बायर्स’ हों-महाखरीदार-रंगीन पैकेटों में जहर खरीदकर घर लाने वाले। परीकथा के जंगलों में भी उन्हें ‘ब्यूटी पार्लर’ चाहिए।
    आंतरिक सौंदर्य, शांति, सौहार्द और प्रेम से भरे सहकारितामूलक जीवन की प्रेरणा सहज ही मन में जगाने वाले ये बालगीत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं कि पर्यावरण की चुनौतियों का सामना करते हुए पशु-पक्षी और वनस्पति जगत् से तादात्म्य रखने की उमंग ये मन में भरते हैं। पशु-पक्षी, वनस्पति और बच्चे-ये ही युद्ध और आतंक की छाया में पल रहे इस अतिशय भौतिक युद्ध का सच्चा वैकल्पिक प्रतिपक्ष रचेंगे इन कविताओं के दम से। 
    -अनामिका
  • Naath Siddhon Ki Rachnayen
    Hazari Prasad Dwivedi
    295 266

    Item Code: #KGP-209

    Availability: In stock


  • Manikin Aur Anya Kahaniyan
    Gouri Shankar Raina
    200 160

    Item Code: #KGP-MKAAK

    Availability: In stock

    आधुनिक संवेदना की अलग-अलग मिज़ाज की इन कहानियों में मानवीय स्थिति की सच्चाइयों को विषय-भूमि बनाकर जीवन की विभिन्न स्थितियों में व्यक्ति की संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं की प्रस्तुति की गई है। मानवीय संबंधों के संक्रमित यथार्थ को पकड़ने की कोशिश भी इन कथाओं में नज़र आती है। कहीं-कहीं ये तीखे रंगों के साथ उपस्थित होती हैं और कथा-दृष्टि के नए धरातल उभरते दिखाई देते हैं।

    कथाकार ने कहानी-लेखन की अपनी यात्रा में सभी मंज़िलें खुद चलकर तय की हैं और अपनी कुछ कहानियों को अन्य भाषाओं में विशेषकर जर्मन (यू टर्न), स्पानी (हाइवे), तेगु मराठी, गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी तथा उर्दू में अनूदित होकर मुख़्तलिफ़ समाजों के विभिन्न पाठकों तक जाने दी है।

    आलोचकों का मानना है कि गौरीशंकर रैणा आधुनिक जीवन का एक प्रामाणिक परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं और एक किस्सागो का रचना-व्यक्तित्व उनकी कहानियों से उभरता है।

  • Haadase Aur Hausle
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-8001

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार हैं । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती हैं कि कहानी पाठक को आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझतीं ।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हुई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानियां ।

  • Badalate Ahsaas
    Birsen Jain Saral
    225 180

    Item Code: #KGP-9384

    Availability: In stock

    बदलते अहसास

    जीवन की कहानियों की भूमि प्रायः परिवार होता है। इस अर्थ में बीरसेन जैन पारिवारिक परिवेश की कहानियों के कहानीकार हैं। परिवार के भीतर के जीवंत दृश्य, स्थितियाँ, तनाव, अलगाव और अकेले रह जाने की पीड़ा से भरे पात्रों को उन्होंने बहुत करीब से देखा है। वह प्रकारांतर से अपनी कहानियों के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि दूसरों के जीवन से प्रेरणा लेकर हम चाहें तो अपना जीवन सफल, संतोषमय व सुखी बना सकते हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक बदलते अहसास की सातों कहानियाँ अपने आसपास के परिवेश से निकली हैं। यहाँ हम परिवार और समाज के परिवर्तित होते स्वरूप के बीच कथा-चरित्रों पर पड़ते प्रभाव को अनुभव कर सकते हैं। सच पूछें, तो ये कहानियाँ एक नया जीवन बनाने की प्रेरणा देती हैं। इन्हें पढ़ते हुए आप अनुभव करेंगे कि इनकी आवाज कहीं आपके भीतर भी दबी पड़ी है। कारण यह है कि यहाँ मनुष्य के अनेक रूपों के मध्य दरकते संबंध ही नहीं, पश्चात्ताप के आँसू भी नजर आएँगे। कहानीकार की यह विशेषता है कि वह उन स्थितियों को भी उजागर करता है जो समाज का स्याह चेहरा सामने रखती हैं।
  • Gulmohar Phir Khilega
    Kamleshwar
    300 270

    Item Code: #KGP-46

    Availability: In stock


  • Main Aur Meri Shrimati
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    100 90

    Item Code: #KGP-7813

    Availability: In stock


  • Koi Aur Raasta Tatha Anya Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    200 180

    Item Code: #KGP-731

    Availability: In stock

    कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक
    यह नया नाट्य-संग्रह आपके हाथों में है । एकांकी के बंधनों को तोड़ने वाले इन नौ लघु नाटकों के विषय अलग-अलग हैं।
     'अंक-दृष्टा' जहाँ रामानुजन की जीनियस को रेखांकित करता है तो 'अंतराल के बाद' में बदलते मूल्यों के बीच माँ एवं पुत्र के संवेदनात्मक संबंधी के बदलने की गाथा है । 'दफ्तर में एक दिन' एक सरकारी दफ्तर के कर्मचारियों की कार्यशैली एवं उबाऊ माहौल को उकेरता है तो 'कोई और रास्ता' संस्कारों से बँधी एक आधुनिक लड़की की संघर्ष-गाथा है । 'फैसला' में नारी- सम्मान का प्रश्च है तो 'लडाई' जाति के बंधनों के विरोध की दास्तान है । 'वापसी' अपनी जड़ों से उखड़ विदेश बसने की आकांक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते युवा पीढी का बयान है तो 'लम्हों ने खता की थी' एड्स के खतरों से आगाह करने की कोशिश है । इसी तरह से 'मेरी-तेरी सबकी गंगा' में गंगा की पौराणिक कथा को आधुनिक दृष्टि से देखने का प्रयास है ।
    यानी कुल मिलाकर सभी नाटकों का रंग अलग, मिजाज अलग, समस्या अलग है । मामूली लोगों के जीवन के विविध पक्षों को पकड़ते, परखते ये लधु नाटक आपको बाँधेंगे भी, कोंचेंगे भी ।

  • Yah Ant Naheen
    Mithileshwar
    500 450

    Item Code: #KGP-812

    Availability: In stock

    यह अंत नहीं

    अंतहीन बनती समस्याओं के खिलाफ मानवीय संघर्ष की विजयगाथा का जीवंत उपन्यास। जीवन की सकारात्मक चेतना और अपराजेय मानवीय जिजीविषा का सार्थक उद्घोष। ग्रामीण जीवन की जमीनी सच्चाई का बेबाक चित्रण। चुनिया और जोखन के रूप में अविस्मरणीय चरित्रों का सृजन। हिंसा, द्वेष और नफरत के विरुद्ध सहज मानवीय संबंधों की स्थापना। गहन मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज। हिंदी उपन्यास के समकालीन दौर में कलावाद और यथार्थवाद के द्वंद्व को पाटने वाला एक मजबूत सेतु। एक तरफ भाषा की रवानगी और खिलंदड़पन तो दूसरी तरफ जमीनी सच्चाइयों का अंकन। भाषा, शिल्प और कथ्य के स्तर पर एक सशक्त कृति। बीसवीं शताब्दी को एक स्तरीय और यादगार उपन्यास

  • Kavi Ne Kaha : Shriprakash Shukla (Paperback)
    Shri Prakash Shukla
    140

    Item Code: #KGP-7017

    Availability: In stock

    रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि हैं। इनके पहले कविता संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ (1999) से लेकर पाँचवें कविता संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ (2014) तक की कविताओं से गुजरकर कविता प्रेमियों को काव्य स्वाद का सुखद अहसास होता है। अपनी कविताओं में ये बिना किसी नारेबाजी व आयातित विमर्श का हौवा खड़ा किए सधे हुए स्वर में सामाजिक  विसंगतियों, क्रूरताओं, धार्मिक ढकोसलों, आर्थिक पराभवों और सांस्कृतिक क्षरण पर सीधे वार करते हैं। इनकी कविता की दुनिया में राजनीति व विचारधारा की एक पक्षधर दुनिया गुँथी हुई होती है जिसमें गरीब, पीड़ित व उपेक्षित वर्ग के प्रति गहरी रागात्मक चेतना मौजूद है।
    लेकिन उपर्युक्त बातों के साथ-साथ जिस वैशिष्ट्य के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता में ज्यादा चर्चित हैं वह हैं इनकी विषयगत वैविध्यता और गहरी लोकोन्मुखता। अपनी कविताओं में वे महज लोक का चित्रण नहीं करते बल्कि लोक के क्षरण के कारणों की शिनाख्त भी करते हैं। नवउदारवाद और पूँजीवादी शक्तियों के आक्रमण, दमन, शोषण और चालाकियों का प्रतिरोध करने वाली इनकी कविता जनोन्मुखी व लोकोन्मुखी तो है ही, इसमें स्थानीयता के साथ वैश्विकता के तत्त्व भी समाहित हैं जहाँ पुराने के साथ परंपरा से रिश्ते रखने वाला नया समाज तो है ही, एक आधुनिक चेतना भी मौजूद है।
    इसी के साथ गौरतलब है कि प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के चित्रों से भरपूर कवि का कविता संसार विविध वर्णों से युक्त है जहाँ कविता की धार अपनी भाषिक व्यंजना के रेडिकल भावभूमि पर विकसित होती है। यहाँ कहते हुए ख़ुशी होती है कि इस कवि ने अपने को कहीं रिपीट नहीं किया है और इसी कारण इनकी कविता बहुवस्तुस्पर्शी उध्र्वमुखी चेतना से संपन्न है जो एक समर्थ कवि का लक्षण है। भाषा की सादगी और बिंबों की निजता इनके कवि- स्वभाव की विलक्षण विशेषता है। कह सकते हैं कि भाषा के लोक स्वीकृत विन्यास को चुनौती देती इनकी कविताओं में व्यंग्य व वक्रता का एक सघन संसार उपस्थित होता है जहाँ भाषायी मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर का औदात्य भी मिलता है जो इनकी कविताओं को रेडिकल बनाता है।
    उम्मीद की जानी चाहिए कि कविता का यह संचयन कवि की काव्य संपदा और उनकी सामर्थ्य से अपने पाठकों को परिचित कराने में समर्थ होगा।
  • Pride And Prejudice (Novel)
    Jane Austen
    495 446

    Item Code: #KGP-572

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • Neeraj Ke Prem Geet (Paperback)
    Gopal Das Neeraj
    140 126

    Item Code: #KGP-7063

    Availability: In stock

    नीरज के प्रेमगीत
    लड़खड़ाते हो उमर के पांव,
    जब न कोई दे सफ़र में साथ,
    बुझ गए हो राह के चिराग़
    और सब तरफ़ हो काली रात,
    तब जो चुनता है डगर के खार-वह प्यार है ।
    ० 
    प्यार में गुजर गया जो पल वह
    पूरी एक सदी से कम नहीं है,
    जो विदा के क्षण नयन से छलका
    अश्रु वो नदी से कम नहीं है,
    ताज से न यूँ लजाओ
    आओं मेरे पास आओ
    मांग भरूं फूलों से तुम्हारी
    जितने पल हैं प्यार करो 
    हर तरह सिंगार करो,
    जाने कब हो कूच की तैयारी !
    ० 
    कौन श्रृंगार पूरा यहाँ कर सका ?
    सेज जो भी सजी सो अधूरी सजी,
    हार जो भी गुँथा सो अधूरा गुँथा,
    बीना जो भी बजी सो अधूरी बजी,
    हम अधुरे, अधूरा हमारा सृजन,
    पूर्ण तो एक बस प्रेम ही है यहाँ
    काँच से ही न नज़रें मिलाती रहो,
    बिंब का मूक प्रतिबिंब छल जाएगा ।
    [इसी पुस्तक से ]
  • Hanfata Huaa Shor
    Nesar Naaz
    200 180

    Item Code: #KGP-9350

    Availability: In stock

    हांफता हुआ शोर नेसार नाज़ की बेहद पठनीय कहानियों का संग्रह है। आज के दौर में जब कहानी से कहानीपन गायब होता जा रहा है तब नेसार नाज़ की कहानियां पढ़ना अलग प्रकार का अनुभव देता है। नेसार की कहानी कला इतनी पुरकशिश है कि पाठक या श्रोता कहानी के पहले वाक्य से कथाकार के साथ जुड़ जाता है। नेसार नाज़ समाज की मूल इकाई लोग यानी मनुष्य और उसकी फितरत के साथ तारतम्य बिठाकर अद्भुत किस्सागो की तरह कहानी सुनाने लगते हैं। उनकी चिंताएं हमें मुंशी प्रेमचंद के समय से जोड़ती हैं। तब भी इनसानी बिरादरी के बीच असमानता, विद्वेष, घृणा और अपमान से बचाने की मुहिम थी और आज भी ये हमारी सबसे पहली प्राथमिकता है। नाज़ की लड़ाई इनसानियत को बचाए रखने की लड़ाई है और उनके सामाजिक सरोकार सिर्फ इनसान की बेहतरी के लिए हैं। 
    नेसार नाज़ की कहानियों का परिवेश हमारा-आपका कस्बाई संसार है जहां लोग एक-दूसरे से ऐसे परिचित रहते हैं, एक बहुत बड़े परिवार के सदस्य लगते हैं। उनकी कहानियां सन् 1992 से पूर्व की कहानियां हैं जब इन कस्बों की संरचना उतनी जटिल नहीं थी जितनी कि आज है। इन कहानियों में गजब की रवानी है। आंचलिक भाषा में पात्र और परिवेश जैसे चहक-चहक कर बोलता है। यह एक सिद्धहस्त किस्सागो के लक्षण हैं। इन कहानियां की विशेषता है कि इनमें परिवेश और पात्र अपनी जुबान बोलते हैं। विद्वत्ता के आतंक से परहेज करतीं ये कहानियां सहज-सरल और प्रभावी हैं। हर कहानी नए मुहावरे गढ़ती है और कहीं से आयातित विचारों की खेप नहीं लगती। एक संग्रहणीय कहानी संग्रह।
  • Michal Jackson Ki Topi
    Madhukar Singh
    50 45

    Item Code: #KGP-1931

    Availability: In stock

    माइकल जैक्सन की टोपी
    स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद प्रेमचंद की ग्राम्य चेतना की साहित्यिक विरासत को अपने लेखन के बल पर जिन लेखकों ने जीवित रखा है तथा इमे विकसित किया है उनमें मधुकर सिंह का नाम उल्लेखनीय है । यह कहानीकार न केवल अपनी सामाजिक-राजनितिक  चेतना को अपनी कथाओं में अनुगुंफित करता है बल्कि जीवन की सम्यक् प्रगतिशीलता का आलोक भी उसे गंभीरता से आकर्षित क्रग्या है । इसीलिए उसकी कहानियाँ वंचितों के जीवन की केवल लपट की नहीं, लौ की भी कहानियाँ हैं ।
    अपने कथाकर्म के बारे में मधुकर सिंह का कहना है कि उनकी 'दर्जनो कहानियाँ समाज और इतिहास- विरोधी उन ताकतों से लड़ती हुई मामूली और कमजोर आदमी को चेतना के स्तर पर जागृत करने की कोशिश करती हैं-यानी, इतिहास-विरोधी ताकतों द्वारा सताए जा रहे आदमी को अपनी पहचान कराने की क्षमता भी ये कहानियां रखती है ।'
    मधुकर सिंह के प्रस्तुत कहानी-संग्रह में शामिल दस कहानियां हैं- 'माइकल जैक्सन की टोपी’, 'युग' . ‘नस्ल-दंश', ‘बेली रोड के पत्ते' , 'कउड़ा' , 'कमीना', 'जालिम मिह उसका बाप था', 'कविता भी आदमी', 'सनहा' तथा पोखर नया गाँव' । प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपी ये कहानियाँ इस  बात की प्रमाण है कि यह कथाकार नये भारत के निर्माण के लिए, चेतना-सम्पन्न विचार-पुरुष की तलाश में तन्मय है ।
  • Tatvadarshi (Translation Of 'The Prophet)
    Khalil Jibran
    125

    Item Code: #KGP-153

    Availability: In stock

    तत्वदर्शी
    'The Prophet' के अनुवाद के पीछे मेरी मूल भावना इतनी ही थी कि इसे पढते हुए जो अनुभव और आनंद मैंने पाया, उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाऊँ । 
    यह सच है कि कोई भी व्यक्ति विश्व के किसी कोने का हो या किसी धर्म को मानने वाला हो, अपनी आध्यात्मिक यात्रा में उन्हें सत्यों का उदघाटन करता दीखता है जिन्हें पहले भी कहा जा चुका हैं और आगे भी कहने की कोशिश होगी । प्रकाश का स्वभाव तो एक ही रहता है,  चाहे वह दीये में हो या सूर्य में। हाँ, सत्य तो शाश्वत है, लेकिन उसकी अनुभूति की व्याख्याएँ अलग-अलग शैली अख्तियार करती हैं। और खलील जिब्रान जो एक कवि और चित्रकार भी थे, शायद इसलिए ही  शब्दों में शहद की मधुरता भी थी और तितलियों के परों के रंग भी । उनके शब्द स्थिर नहीं थे, वे उड़ते हुए एक तथ्य से दूसरे तथ्य पर बैठते और उसका सत्य संगृहीत करते जाते ।
    प्रेम में असफलता ने उनके हृदय को इतना खोखला किया कि वह एक कुआँ बन गया और फिर इसमें करुणा भर गई-पूरी मानव जाति नहीं, पूरी सृष्टि के लिए । तभी तो उनके शब्द इतने चमत्कारी और समर्थ लगते हैं, जैसे वे शब्द नहीं, एक-एक आत्मा हों और हमारी ओर निहार रहे हो । इतने प्राणवान शब्द कि हर शब्द अपने अंदर एक ब्रह्मांड समेटे हो जैसे । और वह, जिसकी आत्मा पूर्णत: निष्कलुष एवं निष्पाप हो जाती है, वही समर्थ हो जाता है शरीर के सौंदर्य का देख पाने में, और तब उसके लिए शरीर में छिपाने जैसा न कुछ रह जाता  है, न ही कुछ दिखाने जैसा । मानव शरीर भी उसके लिए सृष्टि के अन्य जीवों के  शरीर की तरह ही हो जाता है- अपने स्वरूप में सुंदर, पवित्र !
    –विजयलक्ष्मी  शर्मा
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajeet Cour (Paperback)
    Ajeet Kaur
    175

    Item Code: #KGP-7010

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अजीत कौर
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजीत कौर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "वन जीरों वन', 'सूरज, चिड़ियां और रब्ब', 'ना मारो', 'मौत अलीबाबा की', 'चौरासी का नवंबर है', 'कसाईबाड़ा', 'पिछले बसंत की पतंग' , 'हरी चिडिया’ , 'चीख एक उकाब की हैं' तथा 'नया साल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजीत कौर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Vansh Vriksha
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-103

    Availability: In stock

    कन्नड़ के विख्यात उपन्यासकार भैरप्पा ने प्रस्तुत उपन्यास में वंशावली के आदि और जटिल प्रश्नों पर आधारित जिस गहन एवं मर्मस्पर्शी कथा का ताना-बाना बुना है, वह भारतीय मनीषा की प्रश्नाकुलता की ऊर्जा है और हमारी वंशीय परंपरा का राग-अनुराग एवं विराग भी। जीवन के लिए निर्धारित लक्ष्यों को अर्जित कर लेना, अपने वंशको आगे बढ़ाने का स्वस्थ संकेत है, अथवा संतति के माध्यम से ही वंशीय परंपरा का वहन सहज संभव हो सकता हैअपने उपलक्ष्य में यह कृति इन प्रश्नों से जूझती है। वंशजों के रक्त-संबंधों की शुचिता की आशंकाएं तथा सरोकार भी इस कथा में जहां-तहां तैरते हुए नए भावबोध और अवधारणाओं से हमारा सामना कराते हैं।

    भैरप्पा के उपन्यासों के पाठक जानते हैं कि अपने पात्रें की बहुविध दुनिया का जैसा सजीव शब्दांकन वह करते हैं, वह विलक्षण है। वंशवृक्षके सभी पात्र स्वयं में संपूर्ण हैंमनुष्यगत अपूर्णताओं के साथ। वे परंपरा के एक साथ संवाहक और भंजक हैं तथा उनकी यही अनायासताउन्हें एक सच्चे और खरे आदमी के चरित्र में कायांतरित कर देती है। इसी कारण यह कृति-कथा हम सबकी देह और आत्मा को बारंबार छूकर निकलती है। इसमें वर्णित देह और नेह की फुहारों से आप-हम रोमांचित और संवेदनशील हो उठते हैं। लक्ष्यार्जजन के पश्चात् मृत्यु को जिस सहजता और क्रमिकता के साथ लेखक यहां अवतरित करता है, वह यमलीला सहज स्वीकार्य प्रतीत होती है इस उपन्यास में।

    एक अंचल विशेष का वर्णन होते हुए भी यह कृति अखिल भारतीय या कहें कि वैश्विक मनोजगत् की प्रतिनिधि रचना है जो जीवन के संबंधों, संयोगों और सहभावों से संरचित है। जीवनगत निर्णयों के उद्दाम स्रोतों से प्रस्फुटित कई जीवनलीलाओं के तटों को निर्धारित और ध्वस्त करती इस कथा में लेखक के द्वंद्वों को स्वर देने का काम उसके नायक करते हैं तथा मानो यह सब घटित होते हैं पाठक के साथ। कृति, कृतिकार और पाठक के त्रिकोण का यह अंतरंग संबंध वंशवृक्षकी एक अन्य तथा अन्यतम उपलब्धि है।

  • Mere Saakshatkaar : Kedarnath Agrawal
    Kedar Nath Agrawal
    200 180

    Item Code: #KGP-544

    Availability: In stock


  • Suraj Kiran Ki Chhanv
    Rajendra Avasthi
    100 90

    Item Code: #KGP-SKCM

    Availability: In stock


  • Tale Of A Wasteland (Paperback)
    Phanishwarnath Renu
    495 446

    Item Code: #KGP-338

    Availability: In stock

    Phaneeshwar Nath Renu, a true son of the soil, has created in Parti Parikatha, rendered here in English as ‘Tale of a Wasteland’; a major modern classic through the original genius he brought to bear upon his theme. Renu’s deeply moving cry against an unjust social order coupled with his compassion for men; his freedom from bitterness against the establishment, and his love of common humanity backed by his creation of half a dozen powerful, living authentic figures with whom he peoples his world set against the Wasteland perpetrated by Nature on man sets him apart as a major creative genius who has come to stay. Every reader of this ‘epic in prose’ will feel real life throbbing and pulsating through each page of this book. On its broad canvas, the life of two generations has been inimitably presented by Renu with his exquisite art which creates unforgettable characters through episodes and dialogues in an idiom that shows his power over words. Indeed, no reader, once he has gone through this book, can help missing some of these characters that he has lived with while reading this saga, lighted by Renu’s vision of hope which ‘no depth of despair, no height of cynicism can possibly defeat’.
  • Kokh
    Roshan Premyogi
    300 255

    Item Code: #KGP-287

    Availability: In stock

    कोख
    सन् 1984 से एक किशोरी एक राजा की हवश का शिकार बनती है । उसकी कोख से जन्मे बच्चे के मन से करीब 25 साल बाद अपने सांवले रंग और नयन-नक्श को लेकर संदेह पैदा होता है । सदेह पुख्ता होता है तो वह पिता से लड़ता है अपनी माँ के लिए ।
    उपन्यास में तीन महिला पात्र हैं । इनमें मधुरिमा सिंह ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया । वह पहले मुझे सौतेली मां की तरह लगी, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती  गई, वह धरती की तरह धैर्यवान और समुद्र की तरह गरमाहट से भरपूर मां लगी । आई.ए.एस. प्रभुनाथ सिंह  पहले खलनायक लगते हैं, लेकिन जब कहानी खुलती है तो तमाम पूर्वाग्रह ध्वस्त हो जाते है । शैलजा तो बहुत ही प्यारी और समझदार लड़की है, वह सीमान्त को बिखरने से बचाती है । दरअसल शैलजा खंड-खंड होकर नष्ट होने को तत्पर कुछ लोगों को फिर से एक परिवार बनने के लिए प्रेरित करती है । देखा जाए तो अपने व्यक्तित्व से शैलजा ही इस उपन्यास को बडा बनाती है । उसके प्यार को थोड़ा और स्पेस मिलना चाहिए था ।
    गायत्री देवी का संघर्ष और दंश मन को झकझोर देता है । कहानी अंत तक बांधे रखती है मन को, लेकिन यह थोड़ा अजीब लगता है कि गायत्री देवी के दंश को लेखक ने बेटे के प्यार और नैतिकता के बोझ तले दबा दिया, वैसे यह पुरुषप्रधान समाज की रीति है ।
  • Naya Vidhaan
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-633

    Availability: In stock


  • Main Or Mera Man
    Dr. Sharad Nagar
    480 432

    Item Code: #KGP-7851

    Availability: In stock

    मैं और मेरा मन जीवन के एक विलक्षण साधक और रसिक की कलम से निकली हुई यादों, बातों, दास्तानों और दस्तावेज़ों का अनूठा सम्मिश्रण है। इस पुस्तक में हम मिलते हैं एक ऐसे सर्जक से जो अपनी गहरी से गहरी तकलीफें भूलने की कोशिश करता तथा तमाम जगहों और लोगों को दिए हुए अपने वायदों को निभाता हुआ उनके इतिहास और भूगोल को, उनकी बातों और वि़फस्सों को जिलाए रखने के काम में पूरे यव़फीन और मोहब्बत से जुटकर अपने जीने की ख़ुराक ढूँढ़ता है।
    डॉ. शरद नागर के मन में समाए इन लोगों और लोकों के किस्सों में हमें मिलते हैं घने पारिवारिक रिश्ते, गली-मोहल्लों के यादगार चित्रा और चरित्रा तथा अनदेखे पूर्वज। साथ ही हमें मिलती हैं बीसवीं सदी के सामाजिक इतिहास की कुछ ऐसी बारीकियाँ जिनके आज की पाठ्यपुस्तकों में पहुँचने की नौबत ही नहीं आती-जैसे, 1918 के इन्फ्ऱलूएन्ज़ा के प्रकोप की दिल को दहला देने वाली यादें; आगरा में बसे गुजराती नागरों के मोहल्लों-टोलों की भूली-बिसरी आवाज़ें; आज़ादी की जंग के दौर में मिले सृजन और सौहार्द के संस्कार; मैकॉले की नीति का शिक्षा और सामाजिक स्तरीकरण पर प्रभाव; समाज के बदलते उसूलों और खुलती-कसती बेड़ियों के बीच औरतों की स्थिति ही नहीं, बल्कि उनका श्रम, उनकी रचनात्मकता, उनकी जंग; तथा भारतीय रंगमंच के इतिहास से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ाव।
    शरद जी एक साहित्यकार और ज़िंदगी तथा समाज की तहों में गहरे उतरकर रमने वाले आराधक और कलाकार के रूप में अमृतलाल नागर के बहुत बड़े उपासक थे। इस पुस्तक में प्रस्तुत उनका लेखन अमृतलाल नागर जी को लेखक और पिता के रूप में बड़े निराले ढंग से जिलाता है। हम न केवल लेखक बनने से जुड़ी अमृतलाल नागर जी की निजी और उनके परिवार की अनेक संघर्ष यात्राओं को पहचान पाते हैं बल्कि आज़ादी के पहले के तीन दशकों में और आज़ादी के बाद के चार दशकों में साहित्य और रंगमंच समाज से किस व़फदर गुँथकर अपनी दिशाएँ खोज रहे थे, उसका अहसास भी हमें ख़ूब होता है।
  • Sanetary Pad
    Sayed Javed Hasan
    250 225

    Item Code: #KGP-1885

    Availability: In stock

    बस्ती का खुदा उठा । मैदान की ओर देखकर मुस्कुराया और धीरे-धीरे चबूतरे की सीढी चढ़ने लगा ।
    दो चढ़ता रहा । तालियां बजनी रहीं।
    अचानक तालियां रुक गई ।
    लोगों ने बस्ती के खुदा को एकाएक बीच सीढी पर रुकते हुए देखा । '
    सबकी धडकने तेज हो गई । उसे अपने इस खुदा पर पूरा  विश्वास था । ताली बजाने वालों में अब मैदान के एक- आध हिस्से को छोडकर बाकी लोग भी शामिल हो गए थे । वे पहले के तीन खुदाओं की छवि से बुरी तरह निराश थे और चाहते थे कि कम से कम इस खुदा की छवि दुरुस्त रहे ।  बस्ती का यह खुदा औरों के मुकाबले अधिक सौम्य, संजींदा और भरोसेमंद था ।
    बस्ती के खुदा ने बस्ती के लोगों को मुड़ के देखा । मुस्कुराया । हाथ हिलाया और फिर सीढी चढने लगा ।
    तालियां फिर बजनी शुरू हुई ।
    तालियां बजती रहीं . . . . बजती रहीं ।
    और फिर . . . . पूरे मैदान में मरघट-सा सन्नाटा छा गया ।
    आईने के सामने बस्ती का खुदा खडा था और उसमें मुखौटों का अक्स उभर आया था ।
    बस्ती के लोग पागलों की तरह अपना सिर धुन रहे थे । उसे अपने जिस खुदा पर सबसे ज्यादा भरोसा था, वो  बहरूपिया बना उनके सामने खड़ा था ।
    - इसी पुस्तक से
  • Ek Thi Sara
    Amrita Pritam
    240 192

    Item Code: #KGP-1978

    Availability: In stock

    एक थी सारा

    मेरी तहरीरों से कई घरों ने मुझे थूक दिया है
    लेकिन मैं उनका जायका नहीं बन सकती
    मैं टूटी दस्तकें झोली में भर रही हूँ
    ऐसा लगता है पानी में कील ठोक रही हूँ
    हर चीज़ बह जाएगी—मेरे लफ्ज, मेरी औरत
    यह मशकरी गोली किसने चलाई है अमृता !
    जुबान एक निवाला क्यूँ कुबूल करती है ?
    भूख एक और पकवान अलग-अलग
    देखने के लिए सिर्फ 'चाँद सितारा' क्यूँ देखूँ ?
    समुंदर के लिए लहर ज़रूरी है
    औरत के लिए जमीन जरूरी है
    अमृता ! यह ब्याहने वाले लोग कहाँ गए ?
    यह कोई घर है ?
    कि औरत और इजाजत में कोई फर्क नहीं रहा... 
    मैंने बगावत की है, अकेली ने,
    अब अकेली आंगण में रहती हूँ
    कि आजादी से बड़ा कोई पेशा नहीं
    देख ! मेरी मज़दूरी, चुन रही हूँ लूँचे मास
    लिख रहीं हूँ
    कभी मैं दीवारों में चिनी गई,
    कभी बिस्तर से चिनी जाती हूँ... 
    [इसी पुस्तक से]

  • Shaantidoot Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    300 270

    Item Code: #KGP-644

    Availability: In stock

    भारत के इतिहास में फिर एक बार वैसा ही समय आया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक बार फिर कुछ वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग करके देश का विभाजन करने की मांग की। गांधी जी ने मुस्लिम लीग को देश के विभाजन से विरत करने के लिए मुहम्मद अली जिन्ना के हाथ पर कोरा चैक रखकर संपूर्ण देश पर शासन करने का अधिकार मुस्लिम लीग को दे दिया, किंतु मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान से कम पर समझौता करने से इनकार कर दिया। सन् 1999 में पाकिस्तान ने देश पर आक्रमण कर दिया। इससे पूर्व भी पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण करके देश को हथियाने का प्रयत्न किया था, किंतु इस बार पाकिस्तान से बातचीत न करके पाकिस्तान को ईंटों का जवाब पत्थरों से देकर देश की रक्षा करने मंे सफलता प्राप्त कर ली, किंतु इसे युद्ध की समाप्ति नहीं माना जाना चाहिए। पाकिस्तान की ओर से फिर भी युद्ध की स्थिति पैदा की जाती रहेगी। वस्तुतः देश की समस्या समय-समय पर होने वाले आक्रमण नहीं हैं। जब तक पाकिस्तान रहेगा तब तक युद्ध की स्थिति बनी रहेगी। महाभारत की तरह एक निर्णायक युद्ध होकर अखंड भारत की स्थापना ही इस समस्या का समाधान है।
    -इस पुस्तक के ‘गांधी जी के शांति-प्रयासों की असफलता के कारण’ अध्याय से
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrilal Shukla (Paperback)
    Shree Lal Shukla
    120

    Item Code: #KGP-44

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : श्रीलाल शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार श्रीलाल शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इस उम्र में', ‘सुखांत', "सँपोला', 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल', 'शिष्टाचार', 'दंगा', 'सुरक्षा', 'छुट्टियाँ', 'यह घर मेरा नहीं' तथा 'अपनी पहचान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Maalish Mahapuran
    Sushil Sidharth
    300 270

    Item Code: #KGP-782

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    [इसी पुस्तक से]
  • Kabir Ka Samagra Anbhai Sansar (1st Part)
    Govind Rajnish
    1000 900

    Item Code: #KGP-689

    Availability: In stock

    संत कबीर भारतीय चेतना का ऐसा शिखर है जिसके सम्मुख शब्द और शब्दातीत नतमस्तक होते हैं। उनकी बानी ‘अनहद का अनुभव’ है। ऐसा अनुभव; जिसमें जीव, जगत् और परमात्मा की सघन अभिव्यक्ति है। कबीर की बानी साखी, सबद, रमैनी के अंतर्गत रखकर पढ़ने व विश्लेषित करने की सुदीर्घ परंपरा है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ में मर्मज्ञ आलोचक प्रो. गोविंद रजनीश ने इस परंपरा को संवधिर्त किया है।
    कबीर-काव्य के तीन स्रोत हैं—राजस्थानी, पंजाबी और पूरबी की प्राचीन पांडुलिपियाँ। इनके तुलनात्मक विवेचन द्वारा मूल व प्रामाणिक पाठ तक पैठने का यत्न किया गया है। कबीर के नाम से प्रचलित ‘बानियों’ और ‘क्षेपकों’ का तार्किक परीक्षण किया गया है। इससे कबीर-काव्य का आस्वाद दुगुना हो गया, ऐसा पाठक महसूस करेंगे।
    प्रो. रजनीश ने भावार्थ, पाठांतर और टिप्पणी के द्वारा कबीर के अनेक आयामों को उद्घाटित किया है। कबीर लोक में समाए संत-कवि हैं। उनसे संबंधित बहुतेरे तथ्य दंतकथाओं, जनश्रुतियों और अन्य शब्द-प्रपंच में ओझल होते रहे हैं। यहाँ एक प्रयास यह भी है कि ‘चिनगी’ को ‘राख’ से निकाल लिया जाए। तभी यह सिद्ध हो सका कि कबीर-काव्य समकालीन संदर्भों में एक नयी प्रासंगिकता अर्जित कर रहा है। झूठ, कपट, पाखंड के खिलाफ सदियों पहले गूँजे शब्द आज भी चुनौती और चेतावनी दे रहे हैं।
    ‘संसकिरत है कूप जल भाखा बहता नीर’ ऐसा कहने वाले कबीर की अंतरात्मा को थाहना बेहद कठिन रहा है। ‘ढाई आखर’ के बल पर पंडिताई को ललकारने वाले कालजयी कबीर के प्रामाणिक पाठ को अर्थ-विस्तार से पढ़कर पाठक निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे। शोध्कर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध पाठकों तक समानरूपेण उपयोगी। मानव जीवन के उन्नयन व परिष्कार के साथ भक्ति और अध्यात्म की रश्मियाँ बिखेरती कबीर बानी को विद्वान् लेखक ने ‘पुनः पाठ की सार्थकता’ प्रदान की है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ वस्तुतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
  • Charitra-Nirmaan : Kya? Kyon? Kaise?
    Dhram Pal Shastri
    150 120

    Item Code: #KGP-142

    Availability: In stock

    चरित्र-निर्माण : क्या ? क्यों ? कैसे ?
    लोगों का यह वहम है कि संत-महात्माओं को ही चरित्र  को आवश्यकता है, गृहस्थियों और दुनियादारी को नहीं । सब जानते है कि संत लोग जंगल के एकांत में रहते हैं। न उन्हें ऊधो का लेना, न माधो का देना । न किसी से मिलना-मिलना, न किसी प्रकार का व्यापार- व्यवहार करना । इस प्रकार जो रहता ही अकेला है, भला वह किसी को सतायेगा क्या ? झूठ बोले तो किससे ? धोखा दे तो किसे ? अत:, उनके जीवन में शान्ति-संतोष और भगवदभजन के अतिरिक्त अन्य चारित्रिक गुणों का व्यवहार करने के अवसर ही बहुत कम आते हैं।
    इसके विपरीत हम दुनियादारों का तो लोगों से दिन-रात का संबंध है । बच्चे से लेकर बूढे तक हर एक को दिन में बीसियों, पचासों और सैकड़ों लोगों से निपटना पड़ता है, जिनमें कुछ अच्छे लोग भी होने है, कुछ बुरे भी; नरम भी, गरम भी; पढे-लिखे भी, अनपढ़ भी; भोले-भाले भी, चतुर-चालाक भी, सच्चे भी, झूठे भी, मीठे भी, कड़वे भी । इस प्रकार अनगिनत प्रकार के और रंग-बिरंगे स्वभाव के लोगों के साथ व्यवहार करना कोई खालाजी का घर नहीं । यहीं मनुष्य के चरित्र की असली परख होती हैं । यहीं उसके चारित्रिक गुण प्रकट करने के पर्याप्त स्थान और अवसर आते हैं। ऐसे अवसरों पर कदम-कदम  पर उसे चरित्र की अनावश्यकता पड़ती है । हम तो कहते हैं कि चरित्र के बिना दुनिया में किसी भी आदमी का कोई भी काम नहीं चल सकता । 

  • Nirogyogsadhna
    Manoj Kumar Chaturvedi
    300 270

    Item Code: #KGP-677

    Availability: In stock

    निरोगयोगसाधना
    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और दिन-रात उसके लिए प्रयास करते रहते हैं। इस आपाधापी में व्यक्ति सबसे अहम चीज को जो नकार देता है वह है ‘स्वयं का स्वास्थ्य’। वह यह नहीं समझते कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु तभी आपके लिए उपयोगी होगी जब आप उसका आनंद लेने के लिए तैयार होंगे। व्यक्ति यदि स्वस्थ नहीं तो संसार की कीमती से कीमती वस्तु भी उसके लिए बेकार है। स्वस्थ जीवन है तो जहान है। 
    योग द्वारा कैसे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से संपूर्णतया स्वस्थ रह सकता है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन इस ‘निरोगयोगसाधना’ नामक पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
    योग दर्शनशास्त्र में वर्णित सूत्र षड्दर्शन का ही छठा अंग है। ये षड्दर्शन वेदों के उपांग माने गए हैं। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निशक्त, छंद, ज्योतिष आदि वेदों के अंग कहलाते हैं जिनके द्वारा वेद मंत्रों के अर्थ का ज्ञान होता है।
    योग ऐसी कला है जो प्रकृति और मनुष्य के बीच के अंतर को स्पष्ट कर व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत करती है। अर्थात् व्यक्ति योग के माध्यम से इंद्रियों को अपने वश में करने लायक बन जाता है और माया के बंधन से भी स्वयं को तोड़कर मुक्त हो जाता है। योग अनादिकाल से चला आ रहा है और इसकी उपयोगिता व्यक्ति तभी समझ सकता है जब वह योग को स्वयं पर लागू करे, उसमें रम जाए। योग करने वाला व्यक्ति कभी बूढ़ा या बीमारी से ग्रसित नहीं होता।
    —भूमिका से
  • Bharat Ki Vishva Prasiddh Mahilaye
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-bkvpm

    Availability: In stock


  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-1
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-847

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-1
    इतिहास अगर अतीत की शव-साधना हो तो ऐसे इतिहास में जाने का हमारा कोई  इरादा नहीं, लेकिन लघुकथा के इतिहास में जाना लघुकथाओं के शवों के बीच से गुजरना भर नहीं है। बेशक एक समय बहुत शक्तिशाली मानी जाने वाली अनेक रचनाएं कालांतर में रचनाओं के शव भर रह जाती हैं और बड़े रचनाकारों की ऐसी शव-रूप रचनाओं को भी साहित्य के आचार्य बहुत समय तक विक्रमादित्य की मुद्रा में ढोते रहते हैं, लेकिन कुछ रचनाएं दीर्घजीवी होती हैं, कालजयी। सदियों पुरानी ऐसी दीर्घजीवी रचनाओं के बीच से गुजरने वाला इतिहास अतीत में समकालीनता की प्रतिष्ठा-पुनर्प्रतिष्ठा का श्रम-साध्य उपक्रम होता है और दुर्भाग्य से हिंदी लघुकथा में यह जरूरी काम अभी तक नहीं हो सका है। और शायद इसीलिए इतनी रचना-बुहलता के बावजूद लघुकथा को विधा का दर्जा अभी तक हासिल नहीं हो सका है। अभी हम विधा और उपविधा के द्वंद्व से ही नहीं निकल पाए हैं। हम लेकिन इस बहस में पड़े बगैर सिर्फ निवेदन यह करना चाहते हैं कि बीसवीं सदी की आंख खुलते हिंदी लघुकथा ने भी आंख-कान खोलकर मुलुर-मुलुर इस दुनिया-जहान को देखना, सुनना और समझना शुरू कर दिया था। बीसवीं सदी के शुरू होने से 20-25 साल पहले लिखी गई भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुस्तिका ‘परिहासिनी’ की चुटकियों को चुटकुला कहकर उड़ा दें और सन् 1900 के आसपास लिखी गई माखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ के काल-निर्णय पर मतैक्य न हो सके, ऋषि जैमिनी कौशिक ‘बरुआ’ को बोलकर लिखाई गई माखनलाल चतुर्वेदी की इस लघुकथा की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए तो भी 1901 में लिखी गई माधव सप्रे की लघुकथा ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ से हम हिंदी लघुकथा का आरंभ बेहिचक स्वीकार कर सकते हैं। बीसवीं सदी के खत्म होते न होते हिंदी लघुकथा ने अपनी जड़ और जमीन पर मजबूत तर्कों के साथ जो दावे ठोंक दिए हैं, उन्हें खारिज कर सकना अब किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। हिंदी लघुकथा का अब तक का सबसे बड़ा यह संचयन दो सौ से अधिक कथाकारों की चुनी हुई लघुकथाओं का ऐसा गुलदस्ता है, जो हिंदी के प्रांगण में मह-मह महकेगा, देर तक और दूर तक, ऐसी उम्मीद हमें है।
  • Kavi Ne Kaha : Neelesh Raghuvanshi
    Nilesh Raghuvanshi
    240 216

    Item Code: #KGP-7816

    Availability: In stock

    किसी कवि का कथन है कि कविता हमारे चारों ओर चीज़ों, घटनाओं, गतियों, स्थितियों, ध्वनियों, आहटों और अंतरालों में हर समय मौजूद होती है, वह हमारे आसपास तैरती रहती है और एक समर्थ कवि उसे पहचानकर एक परिचित शक्ल दे देता है। नीलेश रघुवंशी अपने दौर के पुरुष और महिला कवियों से इस रूप में अलग हैं कि उनके लिए कविता हमारे सामान्य निम्नमध्यवर्गीय जीवन से अलग, विभिन्न या उससे उच्चतर काम नहीं है बल्कि वह उसी जीवन के भीतर घटित होती है। उनकी कविता अपने समय के भौतिक और मानसिक द्वंद्वों को अनदेखा करके अभिव्यक्ति का कोई अपरिचित लोक नहीं रचती। वह जीवन को जारी रखने वाले कामों का निषेध नहीं करती बल्कि उन्हीं कामों में से अपने को उत्पन्न करती रहती है।
    --मंगलेश डबराल

    जीने की उष्मा और ललक से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में नीलेश की नई पहचान को रेखांकित करती हैं। ‘पहली रुलाई तक की डायरी’ जैविक स्त्री-बोध का क्रमिक दस्तावेज है, जो शायद हिंदी में पहली बार इतनी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुआ है। इस काव्यात्मक डायरी को जो बात सबसे अधिक  विश्वसनीय बनाती है, वह अजन्मे शिशु के साथ माँ की वह चुहल है, जो प्रायः इसके हर टुकड़े में मिल जाएगी। ‘जन्म देना एक यातना से गुजरना है’--इस पंक्ति को लिखने वाली यह कवयित्री ही यह क्रीड़ाभरी पंक्ति भी लिख सकती है--‘मैं लिख रही हूँ डायरी और तुम बंदर बने हुए हो--तुमने तो मेरे पेट को खेल का मैदान बना रखा है।’ जन्म देने के सर्जनात्मक उल्लास से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में कुछ नया जोड़ती हैं।    
    --केदारनाथ सिंह


  • Hamare Jeevan Moolya-2
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1157

    Availability: In stock


  • Hindi Natya-Kavya : Punarmoolyankan
    Hukum Chand Rajpal
    250 225

    Item Code: #KGP-856

    Availability: In stock

    हिन्दी नाट्य-काव्य: पुनर्मूल्यांकन
    प्रस्तुत आलोचना-ग्रंथ में लेखक ने ‘अंधायुग’, ‘संशय की एक रात’, ‘एक कण्ठ विषपायी’ तथा ‘एक प्रश्न मृत्यु’ सरीखी कृतियों के रूपाकार-विधा की चर्चा सविस्तार की है। ऐसी रचनाओं को एक साथ प्रबंध-काव्य, नाटक, गीति नाट्य, पद्य नाटक, काव्य नाटक तथा नाट्य-काव्य आदि नामों से विवेचित-विश्लेषित करना विचित्र प्रतीत होता है। लेखक ने नाट्य-काव्य विधा की सैद्धान्तिक चर्चा करते हुए कविता और नाटक दोनों विधाओं के सुमेल पर आधारित इस नवीन एवं सार्थक विधा की प्रतिष्ठा करने का प्रयास किया है। उनका मानना है कि ऐसी रचनाएँ कोई स्थापित कवि ही कर सकता है, जिसे नाटकीय विधान की सही समझ हो। इसमें दोनों साहित्य-विधाओं की सम्यक् एवं सहज प्रस्तुति अपेक्षित है। यही कारण है कि धर्मवीर भारती को इस विशिष्ट विधा का प्रथम सफल रचनाकार स्वीकार किया गया है। लेखक की स्पष्ट धारणा है कि ऐसी कृतियाँ एक विशिष्ट मानसिकता पर आधारित होती हैं—इनकी रचना-प्रक्रिया के अनेक सोपान एवं पड़ाव होते हैं—काव्यात्मकता इसका मूलाधार है तथा नाटकीयता इसका बाह्य विधान। ये इसे अधिक ग्राह्य एवं प्रभावोत्पादक बनाते हैं। इस ग्रंथ में पहली बार नाट्य-काव्य, संश्लिष्ट नाट्य-काव्य (लम्बी कविता) और रंग-काव्य सरीखी रचनाओं के अन्तर्सम्बन्धों को सोदाहरण रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। अपनी धारणाओं-स्थापनाओं को प्रामाणिक-तार्किक आधार प्रदान करने हेतु शोध-प्रविधि के नियमों की सटीक प्रस्तुति के साथ ही इस विधा के सभी विद्वानों की चर्चा यथास्थान की गई है। लेखक की विशिष्टता इस बात में है कि वे स्थापित समीक्षकों के साथ ही नवोदित रचनाधर्मियों का उल्लेख एवं उन्हें महत्त्व प्रदान करने में उदार रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि इस ग्रंथ से इस विवादास्पद विधा को सही धरातल पर समझने का मार्ग प्रशस्त होगा। 
  • Maitreyi Pushpa : Stri Hone Ki Katha
    Vijay Bahadur Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-9041

    Availability: In stock


  • Vo Tera Ghar Ye Mera Ghar
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-181

    Availability: In stock

    वो तेरा घर, ये मेरा घर
    इस बंगले के गृह-प्रवेश पर मां-पिताजी दोनो आए थे । बंगले की भव्यता देखकर खुश भी बहुत हुए थे, पर माँ ने उसांस भरकर कहा था, 'सोचा था, कभी-कभार छुट्टियों में तुम लोग आकर रहोगे, पर अब यह महल छोड़कर तुम उस कुटिया में तो आने से रहे।'
    उन्होने कहा था, 'हम यहाँ भी कहाँ रह पाते है मां । नौकरी के चक्कर में रोज तो यहाँ से वहाँ भागते रहते हैं। यहाँ तो शायद पेंशन के बाद ही रह पाएंगे । मैं तो कहता हूँ आप लोग वह घर बेच दो । पैसे फिक्स डिपॉजिट में रख दो या लड़कियों को दे दो और ठाठ से यहाँ आकर रहो ।'
    'न बेटे! मेरे जीते-जी तो वह मकान नहीं बिकेगा,' पिताजी ने दृढ़ता के साथ कहा था, 'हमने बड़े अरमानों से यह घर बनाया था । इसे लेकर बहुत सपने संजोए थे । अब वे सारे सपने हवा हो गए, यह बात और है।'
    'ऐसा क्यों कह रहे है पिताजी । इस घर ने आपको क्या नहीं दिया ! हम सब इसी घर से पलकर बड़े हुए हैं। हम चारों की शादियां इसी घर से हुई हैं। बच्चों की शिक्षा- दीक्षा और शादियां—मां-बाप के यही तो सपने होते हैं ।'
    'हाँ, यह भी तुम ठीक ही कह रहे हो । मैं ही पागलों की तरह सोच बैठा था कि यह घर हमेशा इसी तरह गुलजार रहेगा। भूल ही गया था कि लडकियों को एक दिन ससुराल जाना है । लड़कों को रोजगार के लिए बाहर निकलना है । और एक बार उड़ना सीख जाते है तो पखेरू घोंसले में कहाँ लौटते हैं। अब मुझें अम्मा-बाबूजी की पीड़ा समझ में आ रही है ।'
    "कैसी पीडा?'
    ‘पाँच-पाँच बेटों के होते हुए अंत में अकेले ही रह गए थे दोनों । अम्मा तो हमेशा कहती थी, अगर मैं जानती कि पढ-लिखकर तुम लोग बेगाने हो जाओगे तो किसी को स्कूल नहीं भेजती । अपने आँचल से छुपाकर रखती ।'
    और अपने अम्मा-बाबूजी की याद में पिताजी की आँखें छलछला आई थी ।
    -[इसी संग्रह की कहानी 'साँझ की बेला, पंछी अकेला' से]

  • Mahasagar (Paperback)
    Himanshu Joshi
    25

    Item Code: #KGP-1212

    Availability: In stock


  • Viklango Ke Liye Rojgar
    Vinod Kumar Mishra
    175 158

    Item Code: #KGP-7845

    Availability: In stock

    आम विकलांग कर्मचारी अत्यंत परिश्रम और अनुशासनप्रिय होते हैं । बढ़ते तकनिकी विकाश ने जहाँ विभिन्न कार्यों में शारीरिक श्रम की आवश्यकता को काम किया है वहीँ विकलांगों की कार्यक्षमता को नए-नए सहायक उपकरणों और बेहतर कृत्रिम उपकरणों के जरिये लगातार बढ़ाया है और आगे इसका और विस्तार होगा । 
    बदलते आर्थिक परिवेश में विकलांगों के लिए नयी रोजगार संभावनाओं की विशेष रूप से निजी क्षेत्र में तलाश आवश्यक है । इसके लिए उद्योग जगत, राष्ट्रीय संस्थानों, स्वयंसेवी संगठनों और विकलांग युवक-युवतियों को एक जगह आना होगा और इस तरह प्रयास करना होगा ताकि विकलांग व्यक्ति बड़ी संख्या में रोजगार पा सकें और समाज को अपनी योग्यता का लाभ दें । 
  • Naya Gyan Ki Anokhi Baatein
    Vishv Nath Gupta
    250 200

    Item Code: #KGP-9237

    Availability: In stock

    ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। किसी ने कहा भी है कि ‘जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ’। यह सच है कि जो जितना गहराई में जाएगा, उसे उतना ही ज्यादा मिलेगा।
    इस पुस्तक में जो बातें बतलाई गई हैं उनके बारे में हमारे बाल और किशोर पाठक कुछ-कुछ जानते भी होंगे, लेकिन बाल और किशोर मन में बहुत जिज्ञासा भरी रहती है, वह बहुत कुछ जानने और समझने को उत्सुक व इच्छुक रहता है। इस पुस्तक में जिन विषयों के बारे में लिखा गया है, उनके बारे में उन्हें कुछ नई बातें मालूम होंगी। इससे उनकी जिज्ञासा बढ़ेगी और उनमें और ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा जागृत होगी। वे और पढ़ेंगे तथा और ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। यही इस पुस्तक का उद्देश्य है।
    -विश्वनाथ गुप्त
  • Kalanidhi Kaustubh
    Har Govind Gupt
    100 90

    Item Code: #KGP-9201

    Availability: In stock

    कलानिधि-कौस्तुभ स्व. राय कृष्णदास के जन्मशती के अवसर पर संकलित अनेक प्रकार के संस्मरणों और मूल्यांकनों का अनूठा गुलदस्ता है। कई वर्ष तक लगातार चिरगांव के मौन साहित्य पर श्री हरगोविन्द गुप्त ने परिश्रम किया और अपने व्यक्तिगत संपर्कों के बल पर अनूठे लेख एकत्रित किए हैं।
    ‘कलानिधि’ संज्ञा श्री राय कृष्णदास को कई कारणों से मिली। वे सभी कलाओं के मर्मज्ञ तो थे ही, साहित्य के सृजक और लेखक भी थे। कवि, लेखक, कहानीकार, निबंधकार, उनके जिस रूप को देखेंगे वही अपने-आप में अनूठा लगेगा। श्री हरगोविन्द गुप्त ने प्रयत्न किया है कि यह कलानिध के योग्य स्मृति उपहार बने और इसीलिए उसका नाम कौस्तुभ रखा है। कौस्तुभ मणि समुद्र-मंथन में अमृत के साथ मिली थी। यह संकलन केवल स्मृति-मंजूषा नहीं है, भारत कलानिधि जैसे विश्व के अनन्यतम कला-संग्रहों के निर्माण की ऐतिहासिक गाथा भी है।
    इस संकलन में अनेक ऐसी विभूतियों के लेख हैं जो आज नहीं हैं। उनमें मैथिलीशरण गुप्त, डाॅ. वायुदेवशरण अग्रवाल, डाॅ. हजारीप्रसाद द्विवेदी और अज्ञेय जैसे लोग हैं। इसलिए यह अपने-आप में रत्नमालिका है। श्री हरगोविन्द गुप्त हिंदी जगत और कला-जगत की बधाई के पात्र हैं। उन्होंने निःस्पृह भाव से बड़े मनोयोग से इस पुस्तक को तैयार किया है।
    -विद्यानिवास मिश्र
  • Patra-Samvad : Ageya Aur Rameshchandra Shah
    Krishna Dutt Paliwal
    240 216

    Item Code: #KGP-698

    Availability: In stock


  • Khilafat
    Govind Mishra
    430 344

    Item Code: #KGP-9374

    Availability: In stock

    ‘‘अब्बा हुजूर! हम पढ़े-लिखे लोग हैं, तो कभी मज़हबी नज़रिये से थोड़ा अलग हटकर भी हमें देखना चाहिए, अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए। दुनिया में मुसलमान जो इस वक्त एक तरह के तूफान में फँसा हुआ है, उसमें हम मुसलमानों ने ही खुद को डाला है...मिडिल ईस्ट की पाक ज़मीं पर इस्लाम के  कितने फिरके  आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, मुसलमान ही मुसलमानों को मार रहे हैं...
    हिन्दुस्तान में जिहादी, हमारे अशरफ जैसे एक-दो ही हुए। यह इसलिए कि यहाँ कितने मज़हब, कितनी जातियाँ, कितने खयालात...कितने-कितने सालों...पहले तो साथ रहने को मजबूर हुए, फिर रहने लगे, रहते-रहते एक दूसरे से लेने-देने सीखने लगे। सदियों की इस ‘चर्निंग’ को हमें पहचानना चाहिए... 
    सऊदी इस्लाम की जगह हिन्दुस्तानी इस्लाम क्यों नहीं...जो हिन्दुस्तान में कुदरतन ईजाद हो चुका है...जिस तरह इतने मज़हब यहाँ साथ रहते हैं, वैसे ही इस्लाम के मुख्तलिफ फिरके मिडिल ईस्ट या कहीं भी क्यों नहीं रह सकते...’’
    इस्लामिक स्टेट...अबूबकर बगदादी की ‘खिलाफत’ के परिवेश पर लिखा गया हिन्दी का पहला उपन्यास...आई.एस. सम्बन्धी विस्तृत जानकारियों के बीच, यहाँ कई अहं सवालों को उठाया गया है, जैसे कि आज अगर इस्लाम को दुनिया अपने सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती को रूप में देख रही है तो क्यों...इस्लाम अमन का मज़हब है या कि जंग का...दूसरे मज़हबों की तरह वक्त के साथ-साथ इस्लाम भी क्यों नहीं बदलता या खुद को बदलने देता... नौजवानों की जि़न्दगी बेहतर बनाने की बजाय वह उन्हें जिहाद की आग में क्यों झोंक देता है, लड़कियों की शिक्षा, आज़ादी...और इस सबके नीचे अन्डरकरैन्ट की तरह कश्मीर की समस्या। 
    कश्मीर की शिया लड़की, सुन्नी लड़का...दोनों में बचपन से प्रेम, उनके निष्कलुष सपने...उल्टी बहती हवा उन्हें किस तरह अपनी जद में ले लेती है और वे किस तरह बाहर निकलने की कोशिश करते हैं...अबूबकर की खिलाफत के खिलाफ उनकी खिलाफत क्या शक्ल इख्तियार करती है... 
    हर बार की तरह गोविन्द मिश्र अपने इस नये उपन्यास में फिर नये परिवेश, नये विषय के साथ प्रस्तुत हैं।
  • Vishwa Ke Mahaan Shikshavid (Paperback)
    M.A. Sameer
    250

    Item Code: #KGP-7209

    Availability: In stock

    जीवन में सफलता व अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था और अपेक्षा–इन तीन शक्तियों को भलीभांति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित कर लेना चाहिए।
    यह विचार एक ऐसे शिक्षक का है, जिसके एक शिष्य ने इन विचारों को न केवल आयुध बनाकर अपने जीवनयुद्ध में प्रयोग किया, अपितु इनसे जीवनयुद्ध का विजेता बनकर संसार के सर्वश्रेष्ठ आयुध्-निर्माताओं में से एक बना। जी हां, यह विचार है इयादुराई सोलोमन नाम के दक्षिण भारतीय शिक्षक और उनका यह शिष्य भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का, जिन्होंने वैज्ञानिकी में स्वयं को समर्पित करके ‘मिसाइलमैन’ की उपाधि प्राप्त की।
    पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद डाॅ. अब्दुल कलाम भारत के ऐसे पहले राजनेता थे, जिन्हें बच्चों का स्नेह प्राप्त था और ‘काका कलाम’ कहकर संबोधित किया जाता था। बच्चों को देश का भविष्य मानने वाले डाॅ. अब्दुल कलाम अकसर समय निकालकर छात्रों के बीच जाते और बच्चों के प्रश्नों के उत्तर बड़ी सहजता से देते और उन्हें भविष्य में कुछ करने के लिए प्रेरित करते। जीवन के मूल्य, आदर्श और सफलता के मंत्र बड़ी रोचक वाणी में बताते। उनके द्वारा लिखित आत्मकथा ‘विंग्स आॅफ फायर’ में उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने विचारों और दृष्टिकोण से मार्ग दिखाया है। उनकी एक-एक बात प्रेरणादायी है। उनका समूचा जीवन ही प्रेरणादायी है।
    आज तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं की बढ़ती संख्या का कारण डाॅ. अब्दुल कलाम की वह प्रेरणा ही है, जिसने देश को आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में सक्षम किया है। डाॅ. कलाम भारतीय तकनीकी विकास को विज्ञान के हर क्षेत्र में लाने का समर्थन करते थे। उनका कहना था कि साॅफ्टवेयर का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए, जिससे अधिक संख्या में लोग इसकी उपयोगिता का लाभ उठा सकें। इसी से सूचना तकनीक का विकास तीव्र गति से हो सकेगा। डाॅ. कलाम का राष्ट्रपति काल भारत के स्वर्णिम काल में से एक है। बिना किसी राजनीतिक विवाद के उन्होंने यूरोपीय देशों और पड़ोसी देशों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे और देश की विकास गति को थमने नहीं दिया। 25 जुलाई, 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ और वे फिर से वैज्ञानिकी एवं तकनीक के क्षेत्र में आ गए।
    ऐसा कहा जाता है कि जब डाॅ. कलाम राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के रूप में प्रवेश कर रहे थे तो उनके एक हाथ में एक थैला था, जो पांच वर्ष बाद जब वे वहां से कार्यमुक्त हुए तो उनके साथ ही था। वे शाकाहारी थे और अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे। समय का उनकी दृष्टि में बड़ा महत्त्व था और इसके सदुपयोग के लिए वे व्यवस्थित चर्या का पालन करते थे।
    –इसी पुस्तक से
  • Arvacheen Kavya-Sudha (Paperback)
    Pushp Pal Singh
    30

    Item Code: #KGP-950

    Availability: In stock


  • Vaigyanik Sahitya Ke Anuvad Ki Samasyayen
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    400 280

    Item Code: #Kgp-vskaks

    Availability: In stock


  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh (Paperback)
    Shravan Kumar
    240

    Item Code: #KGP-136

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain (Paperback)
    Kunwar Narayan
    90

    Item Code: #KGP-1217

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।

  • Sapnon Ka Shahar : Dubai
    Manoj Singh
    260

    Item Code: #KGP-7221

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के कई नाम हो सकते हैं...‘दुबई: वंडर वल्र्ड’, ‘कमर्शियल कैपिटल’, ‘भविष्य का शहर’, ‘एक केस स्टडी’, ‘एक सफल राजतंत्र’, ‘एक विश्व मेला’, ‘एक आधुनिक बाजार’, ‘सिटी आॅफ माॅल्स’... लेकिन मैंने नाम दिया था ‘दुबई: एक मानवीय चमत्कार’...रेगिस्तान में सुंदर बाग-बगीचे और आइसफील्ड किसी चमत्कार से कम नहीं...मगर अंत में नाम रखा गया ‘सपनों का शहर: दुबई’...सपने अकल्पनीय होते हैं, अविश्वसनीय, रहस्य रोमांच से भरपूर और अति सुंदर भी...(इसी पुस्तक से)
  • Kaag Ke Bhaag Bare
    Prabha Shanker Upadhayaye
    145 131

    Item Code: #KGP-1811

    Availability: In stock

    काग के भाग बड़े
    व्यंग्य को भले ही लेटिन के ‘सेटुरा’ से व्युत्पन्न बताया गया हो, किंतु भारत के प्राचीन साहित्य में व्यंग्य की बूझ रही है। ऋग्वेद में मंत्रवाची मुनियों को टर्राने वाले मेढकों की उपमा दी गई है। भविष्येतर पुराण तथा भर्तृहरिशतकत्रयं में खट्टी-मीठी गालियों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य प्रसंग उत्पन्न किए हैं— ‘गालिदानं हास्यं ललनानर्तनं स्फुटम्’, ‘ददतु ददतु गालीर्गालिगन्तो भवन्तो’। वाल्मीकि रामायण में मंथरा की षड्यंत्र बुद्धि की कायल होकर, कैकेयी उसकी अप्रस्तुत प्रशंसा करती है, "तेरे कूबड़ पर उत्तम चंदन का लेप लगाकर उसे छिपा दूँगी, तब तू मेरे द्वारा प्रदत्त, सुंदर वस्त्र धारण कर देवांगना की भाँति विचरण करना।" रामचरितमानस में भी ‘तौ कौतुकिय आलस नाहीं’ (कौतुक प्रसंग) तथा राम कलेवा में हास्य-व्यंग्य वार्ताएँ हैं। संस्कृत कवियों कालिदास, शूद्रक, भवभूति ने विदूषक के ज़रिए व्यंग्य-विनोद का कुशल संयोजन किया है, "दामाद दसवाँ ग्रह है, जो सदा वक्र व क्रूर रहता है। जो सदा पूजा जाता है और सदा कन्या राशि पर स्थित है।"
    लोक-जीवन में तमाशेबाज़ी, बातपोशी, रसकथाओं, गालीबाज़ों, भांडों और बहुरुपियों ने हास्य-व्यंग्य वृत्तांत वर्णित किए हैं। विवाह और होली पर्व पर हमारा विनोदी स्वभाव उभर आता है। अतः दीगर यह कि विश्व में हास्य-व्यंग्य के पुरोधा हम ही हैं।
    अस्तु, इस व्यंग्य-संग्रह को विषय एवं शैली-वैविध्य के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें व्यंग्य- कथा, निबंध, गोष्ठी, प्रश्नोत्तरी, प्रेस कॉन्फ्रेंस, संवाद, साक्षात्कार, सर्वे आदि शिल्पों की चौंतीस व्यंग्य रचनाएँ संकलित की गई हैं।
  • Himalaya Gaatha-6 (Itihaas)
    Sudarshan Vashishath
    995 896

    Item Code: #KGP-788

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-6 (इतिहास)
    इधर इतिहास, परंपरा और संस्कृति में लेखन कम हो रहा है । सुदर्शन वशिष्ठ एक ऐसे साहित्यकार हैं जो सशक्त कहानीकार और कवि होने के साथ संस्कृति, इतिहास एवं पुरातत्त्व में भी बराबर की पैठ रखते हैं । सरकारी सेवा में रहने के कारण संस्कृति और पुरातत्त्व से वर्षों तक इनका जुड़ाव रहा जिसने इन्हें इस क्षेत्र में  कुछ करने के  लिए प्रेरित किया ।
    इतिहास, परंपरा और संस्कृति पर लिखने वाले बिरले लेखकों में हैं वशिष्ठ, जो अपनी यायावर प्रवृत्ति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते हैं । जहाँ इतिहास की बात आई है, वशिष्ठ ने निरपेक्ष होकर तथ्यों के आधार पर केवल ऐसी बात की है जो प्रामाणिक हो । यूरोपियन इतिहासकारों की टिप्पणियां ज्यों की त्यों न उतारकर उन पर तर्कसंगत विवेचन के साथ साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना  है ।
    बहुत बार तथाकथित किंवदंतियां या लोकवार्ता भी इतिहास बनती हैं । अत: पौराणिक आख्यान, स्थान विशेष के माहात्म्य, वीरगाथाओं तथा कथाओं को भी यर्थाचित स्थान देकर प्रस्तुत किया गया है ताकि आसानी शोधकर्ता कार्य कर सकें ।
    इस क्षेत्र के उपलब्ध इतिहास में आज तक मात्र यूरोपियन इतिहासकारों की पुस्तकों के ज्यों के त्यों उतारे रूपांतर मिलते हैं । प्रस्तुत इतिहास लेखन में वशिष्ठ न कई ऐसी पुरातन दुर्लभ पुस्तकों और 'पांडुलिपियों के संदर्भ दिए हैं जो आज तक किसी ने नहीं दिए । भारतीय विद्वानों द्धारा लिखी गई  वंशावलियां, ऐतिहासिक पुस्तकें, पांडुलिपियां इस इतिहास लेखन का आधार रही हैं जिस कारण इसमें नए-नए तथ्यों का उदघाटन हुआ।  यूरोपियन विद्वानों के अलावा मियां अक्षर सिंह, मियां रघुनाथ सिंह, दीवान सर्वदयाल, उगर सिंह, बिहारी लाल, मियां रणजोर सिंह, बालकराम शाद आदि भारतीय इतिहासकारों को समाविष्ट कर नए निष्कर्ष निकाले गए हैं । इस दृष्टि से यह इतिहास एक नई खोज हमारे सामने प्रस्तुत करता है । 
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत छठे खंड में पर्वतीय क्षेत्र के इतिहास पर ऐसी दुर्लभ सामग्री दी जा रही है, जो पहले कहीं उदघाटित नहीं हुई । 


  • Hindi : Rashtrabhasha : RajBhasha : Janbhasha
    Shanker Dayal Singh
    350 263

    Item Code: #KGP-9247

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal (Paperback)
    Bhagwan Das Morwal
    150

    Item Code: #KGP-476

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भगवानदास मोरवाल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aacharya Chanakya
    Vishv Nath Gupta
    160 144

    Item Code: #KGP-251

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-2 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-513

    Availability: In stock


  • Bharat Ke Mahan Swatantrata Senani
    A.W.I.C.
    70 63

    Item Code: #Kgp-bkmss

    Availability: In stock


  • Sarla : Ek Vidhva Ki Aatmjeevani
    Pragya Pathak
    100 90

    Item Code: #KGP-2062

    Availability: In stock


  • Gulloo Aur Ek Satrangi (Part 5)
    Shrinivas Vats
    300 240

    Item Code: #GAES-5

    Availability: In stock

    वक़्त कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता।  पहले खंड से पड़ना शुरू कर आप पाँचवें खंड तक आ पहुँचे।
    कल स्वप्न में मुझे वह लड़की दिखाई दी जिसने वर्षों पहले मुझसे कहा था, ''अंकल ! हमारे लिए एक और ऐसा उपन्यास लिखें, जिसे पढ़ते जाएँ, पढ़ते जाएँ।'' इस बार उसके साथ सतरंगी भी था।  
    मैंने मन में सोचा, 'वह लड़की तो अब बड़ी हो चुकी होगी। संभव है, उसकी शादी भी हो गई हो। यह भी संभव है कि वह अपने स्कूल और इस अंकल को भूल चुकी हो।'
    फिर भी मैंने पूछ लिया, ''तुमने सतरंगी वाला उपन्यास पढ़ा क्या?''
    हँसते हुए बोली, ''अंकल ! सतरंगी ने मुझे पूरी कहानी सुना दी है। मैं तो पूरा उपन्यास पढ़ चुकी हूँ।''
    मैं हैरान था, ऐसा कैसे हो गया?
    मैंने देखा, वह सतरंगी संग वैसे ही घुल-मिल गई थी जैसे राधा और श्वेता।  
    बच्चों ! बचपन में घटित कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनकी समृतियाँ जीवनपर्यंत ताजा बनी रहती हैं।  आपकी तरह मुझे भी अपने बचपन की बहुत सी घटनाएं याद हैं।  
    सोचो, क्या कभी राधा और गुल्लू विष्णु संग बिताएं पल भूल पाएंगे ? कभी नहीं न ! 
    बचपन खरे सोने जैसा होता है।  इसकी मधुर समृतियाँ जितनी दोहराओगे, उतने खुश रहोगे।  
    मुझे कई पाठकों के फोन आए।  उन्होंने बताया कि वे जब किसी विशाल सुंदर पक्षी को देखते हैं, सतरंगी की पूरी कहानी उनके मस्तिष्क में घूमने लगती है।  
    मैंने कहा, ''चुलबुला सतरंगी है ही इतना प्यारा, जिससे एक बार मिल ले उसे अपना प्रशंसक बना लेता हैं।''
    Attachments area
  • Kavi Ne Kaha : Viren Dangwal (Paperback)
    Viren Dangwal
    90

    Item Code: #KGP-1540

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : वीरेन डंगवाल
    वैश्वीकरण भाषाओं, संस्कृतियों और कविता का शत्रु है। उसका स्वप्न एक ऐसी मनुष्यता है जो उसी गांव में बसती है, उसी तरह रहती-सोचती- पहनती, हाव-भाव रचती और खाती-पीती है । एक रासायनिक संस्कृति-बोध से लैस इस वैश्विक  मनुष्यता का आदर्श भी अंतर्राष्ट्रीयवाद है मगर अपने मूल मानवीय अर्थ के बिलकुल उलटे अर्थ में। यह वैश्विक मनुष्य तो पारंपरिक संस्कृतियों और ज्ञान को नष्ट करने वाला और अधिनायकवादी है जो केवल बाजार और उपभोग को मान्यता देता है । यह बहुत पूंजी के प्रचंड विचार का वाहक और यथास्थिति का घनघोर पोषक है । जीवन की अनुकृति बनने वाली कविता उसे रास नहीं आती। वह तो सारे जीवन को अपनी अनुकृति बना देना चाहता है । कविता अगर हमारे समय में पाठकों का रोना रो रही है तो उसकी एक बडी वजह भी बाजार और उपभोग का सारथी वही वैश्विक मनुष्य है ।

  • Marg Tatha Anya Kavitayen
    Ganga Prasad Vimal
    100 90

    Item Code: #KGP-9084

    Availability: In stock


  • Viklangta : Samsyain V Samadhan
    Vinod Kumar Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-7846

    Availability: In stock

    विकलांगता : समस्याएं व समाधान 
    विकलांगता एक विश्वव्यापी समस्या है, पर विकसित देशों में इस समस्या के हल के लिए काफी उपाय किए गए हैं । दूसरी ओर विकासशील देशों में अभी बहुत कुछ करना बाकि है । पुस्तक में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तैयार किये गए दिशा-निर्देश, संयुक्त राज्य अमेरिका में लंबी अवधि में किये गए प्रयास, बनाए गए कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया और इसमें सफलता तथा भारत में 1995 में पारित किये गए कानून और इस कानून को देखते हुए विकलांगों की वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक वर्णन किया गया है, जो साफ़ दर्शाता है कि सरकार की इच्छाशक्ति, विकलांगों और उनके लिए कार्य करने वाले संस्थाओं की सजगता विकलांगता की समस्या को काफी हद तक हल कर सकती है और विकलांगों को इस लायक बना सकती है कि वे सामान्य लोगों के समान ही समाज को अपना योगदान दे सकते हैं । 
  • Dinkar : Vyaktitva Aur Rachana Ke Aayam
    Gopal Rai
    425 383

    Item Code: #KGP-259

    Availability: In stock

    दिनकर: व्यक्तित्व और रचना के आयाम
    प्रस्तुत पुस्तक दिनकर को नए परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करती है। दिनकर का काव्य-संसार लगभग पाँच दशकों, 1924 से 1974 तक फैला हुआ है। बीसवीं शती के आरंभिक दशक में राष्ट्रीय आंदोलन जुझारू रुख अख्तियार करने लगा था और गांधी जी के हाथों में नेतृत्व आने के बाद तो राष्ट्रीय आंदोलन जनांदोलन के रूप में परिणत होने लगा। दिनकर की काव्य-चेतना और काव्य-चिंतन के निर्माण में राष्ट्रवादी आंदोलन के जुझारूपन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उनकी कविताओं में भारतीय किसानों का श्रम, उनकी आशाएँ और अभिलाषाएँ लिपटी हुई हैं। 
     दिनकर साहित्य में समकालीनता और सामयिकता को वरेण्य मानते हैं। वही साहित्य दिनकर के लिए काम्य है, जो दलितों, उपेक्षितों और समाज के मान्य वर्ग की दृष्टि से असभ्य लोगों का पक्षधर बनकर खड़ा हो सके। दिनकर राजनीतिक विषयों को भी महत्त्व देते हैं और मानते हैं कि राजनीतिक कविता श्रेष्ठ कविता होती है। 
    दिनकर ने अकबर इलाहाबादी का एक शे’र उद्धृत किया है जो उनके काव्य-चिंतन का निचोड़ है:
    ‘‘मानी को छोड़कर जो हों नाजुक-बयानियाँ,
    वह शे’र नहीं, रंग है लफ़्ज़ों के ख़ून का।’’
  • Aadhunik Nibandh
    Shyam Chandra Kapoor
    350 263

    Item Code: #KGP-741

    Availability: In stock


  • Gorakhdhandha
    Jaivardhan
    160 128

    Item Code: #Kgp-gd

    Availability: In stock


  • Yatra Ke Panne
    Rahul Sankrityayan
    425 298

    Item Code: #KGP-1923

    Availability: In stock

    यात्रा के पन्ने
    कालजयी व्यक्तिव के स्वामी महापंडित राहुल सांकृत्यायन  की प्रस्तुत पुस्तक 'यात्रा के पन्ने' से उनके द्वारा की गई तिब्बत-यात्राओं को शामिल किया गया है । अपनी प्रमुख कर्मस्थली तिब्बत से लेखक का अत्यंत गहरा एवं भावनात्मक लगाव रहा है । तिब्बत की पहली, दूसरी तथा तीसरी यात्राओं का विवरण इस पुस्तक में आने  से राहुल जी के यात्रा-साहित्य की यह एक उल्लखनीय कृति बन गई है । 'यात्रा  के पन्ने' में जहाँ राहुल जी तिब्बत के सर्वस्व को अपनी चेतस दृष्टि से जान और पहचान पाए है, वहीं इन यात्राओं में उनकी जन-प्रतिबद्धता की झलक भी दिखाई पड़ती हैं । इतिहास-दृष्टि के आलोक में आधुनिक जीवन-दृष्टि को वैज्ञानिक विस्तार देती उनकी यात्राएं पाठक को समृद्ध करने में सक्षम है । तिब्बत की शताब्दियों की स्मृति, निर्माण और ध्वंस को यहीं महसूस किया जा सकता है ।
    इस पुस्तक में संकलित लेखक के पत्रों का भी विशिष्ट महत्त्व हैं । पेरिस, जर्मनी, लंका तथा स्वदेश से लिखे उनके पत्रों में न केवल लेखक का 'वर्तमान' रचा-बसा है बल्कि अपन समय तथा समाज का दस्तावेजीकरण भी हुआ है । इन संकलित पत्रों को इतिहास के संभवत: सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज माना जा सकता है ।
    'यात्रा के पन्ने' पुस्तक का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष है स्वदेशी यात्राओं का । राहुल जी की इस प्रस्तुति में राजस्थान तथा बिहार के अनेक ऐतिहासिक नगरों का यात्रा-वर्णन है, जो इन स्थलों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक निधियों को सामने लाता है
  • Netaji Subhash Chandra Bose : Sooktiyan Evam Sandesh
    Shravan Kumar
    75 68

    Item Code: #KGP-9199

    Availability: In stock

    नेताजी सुभाषचंद्र बोस: सूक्तियां एवं संदेश
    यह हमारा प्रथम कर्तव्य है कि हम स्वतंत्रता की इच्छा पहले अपने-आप में और देशवासियों में जाग्रत करें। यदि हम अपने हृदय की गहराइयों से स्वतंत्रता का नारा लगाना चाहते हैं तब हमें बंधनों की कसक और दासता की चुभन की अनुभूति करनी चाहिए। जब यह भावना तीव्र हो जाएगी तब हम अनुभव करेंगे कि स्वतंत्रता के बिना जीवन जीने के योग्य नहीं है। इस अनुभूति के पश्चात् ही एक ऐसा समय आएगा जब हमारी संपूर्ण आत्मा स्वाधीनता के लिए बेचैन हो उठेगी।

    हमारी लड़ाई केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ ही नहीं है, हमारा युद्ध विश्व साम्राज्यवाद के साथ भी है, जिसका एक महत्त्वपूर्ण अंग ब्रिटिश साम्राज्यवाद है। इसलिए हम केवल भारत के लिए ही नहीं लड़ रहे हैं, हम मानवता के लिए लड़ रहे हैं। भारत की मुक्ति मानवता की मुक्ति है।
    -इसी पुस्तक से
  • Hashiye Par Harf
    Prem Bhardwaj
    400 360

    Item Code: #KGP-450

    Availability: In stock

    लक्ष्मण रेखा लांघने वाली बात मीडिया के साथ कैसे कुछ हद तक सही बैठती है, इसे भी समझने की जरूरत है। एक जमाने से पत्रकारिता को पवित्र पेशा या मिशन माना गया है। किसी लक्ष्मण ने नहीं, उससे पवित्रता की इसी जन-अपेक्षा ने लक्ष्मण रेखा न जाने कब, क्यों और कैसे खींच दी? सत्ता का यह चरित्र होता है कि वो अपने समय में पवित्र चीजों को भ्रष्ट करती है और मन को भाने वाली वस्तु या इंसान को भोग की चीज मानती है। सर्वत्र पर मालिकाना हक ही उसका स्वभाव है। लिहाजा उसे गवारा नहीं कि वो गलत है तो सामने वाला सही रहकर उसके लिए ‘गलत’ की परिधि को बरकरार रखे। खुद को इस परिधि से बाहर निकालने या अच्छाई की लकीर को मिटाने के मकसद से ही वो तरह-तरह का छल-प्रपंच करती है। कई दफा वो अपनी ताकत का जौहर दिखाकर जबरदस्ती भी करती है। जरूरत पड़ने पर ‘मायाजाल’ भी रचने से गुरेज नहीं करती। राडिया प्रकरण में कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने भी मायाजाल रचा। मीडियारूपी सीता के मन में ‘स्वर्णमृग’ (धन, संपन्नता और सुविधाएं) का लोभ जन्मा। और वह किसी को कुछ देने (एक राजा को मंत्रालय देने) की खातिर लक्ष्मण रेखा को लांघ गई। बदले में उसे क्या मिला, यह अभी सामने नहीं आया है। बहुत संभव है बाद में कुछ पता चले।
  • Jeet Ki Raah (Paperback)
    Swed Marten
    100

    Item Code: #KGP-1312

    Availability: In stock

    पुस्तक में स्वेट मार्डन जैसे महान् व्यक्तित्व के आधुनिक विचारों के साथ भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से प्रेरित विचारों का मिला-जुला संगम है, ठीक गंगा-यमुना की भाँति पावन व पवित्र । एक जोर से विद्धान् स्वेट मार्डेन की विचाररूपी गंगा एवं दूसरी ओर से भारतीय विचारों की सरिता यमुना का जल आकर मिल गया है इस 'जीत की राह' में।
    इस पुस्तक का वास्तविक शीर्षक है 'जीत की राह', परंतु इससे अधिक आकर्षक है 'स्वेट मार्डन : सूक्तियाँ व प्रेरक विचार'।  इस पुस्तक में स्वेट मार्डन की तीन पुस्तकों क्रमश 'The Conquest of Worry', 'He can who think he can', 'To succeed in Life' में से उनकी सूक्तियाँ व प्रेरक विचार संगृहीत किए गए हैं।
  • Jharkhand Ki Sanskritik Dharohar Saraikela Chhau
    Yogendra Prasad
    190 171

    Item Code: #KGP-398

    Availability: In stock

    झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर सरायकेला छऊ
    सरायकेला छऊ झारखंड की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है। इस नृत्य में मुखौटों का प्रयोग किया जाता है। इस नृत्य की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि बिना संवाद के ही नर्तक पूरी कथा समझा देते हैं। इसकी ताल और गति लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
    सरायकेला छऊ 1930 के दशक से ही कलाप्रेमियों के लिए जिज्ञासा और आकर्षण का केंद्र रहा है। चाहे कला संस्कृति से जुड़ी हस्ती हो, बुद्धिजीवी या फिर राजनीति से ताल्लुक रखने वाली शख्सियत–सभी इस छऊ नृत्य के कायल रहे हैं। इंदिरा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘इटरनल इंडिया’ में सरायकेला छऊ को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। सरायकेला राजपरिवार ने भी इस कला के संरक्षण और संवर्द्धन में अपनी विशेष भूमिका का निर्वाह किया है। इस अनमोल कला के महत्त्व को देखते हुए राज्य सरकार प्रत्येक वर्ष चैत्र पर्व के अवसर पर ‘छऊ महोत्सव’ का आयोजन करने लगी है।
    इस नृत्य ने अपने चारू प्रदर्शन से न सिर्फ देश के कोने-कोने में अपितु विदेशों में भी अपनी धाक जमाई है। 1938 में यहाँ के कलाकारों ने इंग्लैंड, इटली, फ्रांस आदि देशों में इस कला का प्रदर्शन किया और अब तो यह भारत सरकार के सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों का अभिन्न अंग बन चुकी है। इस कला से प्रभावित होकर विदेशों से भी लोग यहाँ प्रशिक्षण के लिए आते हैं।
    भारत सरकार ने भी इस कला का सम्मान किया है। अब तक इस नृत्य से जुड़े छह कलाकारों को ‘पद्मश्री’ से नवाजा जा चुका है। झारखंड की इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत के महत्त्व को देखते हुए सन् 2010 में यूनेस्को ने सरायकेला छऊ को ‘इंटेजिबल कल्चरल हैरिटेज’ की सूची में शामिल कर लिया है। झारखंड राज्य तथा भारतवर्ष की लोकसंस्कृति में सरायकेला छऊ नृत्य शैली गौरवमयी स्थान रखती है।                  
  • Repartee : Khushwant Singh
    Khushwant Singh
    395 356

    Item Code: #KGP-634

    Availability: In stock

    KHUSHWANT SINGH, India's iconic journalist and writer, whose works secured largest readership in the country, remains an enigma beyond his writings. His immense popularity and connectivity with his readers made him the common man's idol but his real persona remained in wraps. The 'dirty old man' ensconced in a bulb with a wicked grin and a fountain pen in hand was a far cry in real life.
    This collection of interviews and articles attempts to bring to light the real Khushwant as his family and close friends knew him. 
    A man who was constantly surrounded by beautiful women but remained faithfully wedded to his wife Kaval for 62 years  till she passed away, a man who wrote about wine, women and sex, but lived a life more simple and austere than a commoner, a man who was more disciplined in his fitness regime than men even half his age, a person  who wrote more books, articles and columns than any other journalist or writer in this country, and in a language, so simple that the common reader could comprehend. 
    Little do his readers know that the man famous for his jokes, his love for wine and women and his fierce agnosticism, was a great scholar in real life who wrote classics like A History of the Sikhs, taught comparative religion at Princeton University, was a passionate nature lover who wrote books like Nature Watch, was an art critic and had dabbled in sitar and painting at Shantiniketan in his youth.
    Khushwant Singh voiced his opinions openly and spoke his mind fearlessly through his column's for which he was honoured in 1998, with 'Honest Man of the Year Award and later in 2007 with Padma Vibhushan award.
    He remained reticent about his personal life while he lived. It is about time his loyal fans knew who the real Khushwant was.
  • Nayee Samiksha Ke Pratimaan
    Nirmla Jain
    400 360

    Item Code: #KGP-654

    Availability: In stock

    "1930–1960 तक से समय को जॉन हॉलावे ने ‘साहित्यिक आलोचना में क्रांति’ का युग कहा है। कहना न होगा कि इस समय की सबसे महत्त्वपूर्ण और समृद्ध आलोचनात्मक प्रवृत्ति नयी समीक्षा है। प्रवृत्ति विशेष के लिए यह नाम 1941 में प्रकाशित जॉन क्रो रैंसम की इसी शीर्षक की रचना से रूढ़ हुआ।" प्रस्तुत पुस्तक ‘नयी समीक्षा के प्रतिमान’ की संपादक सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन ने भूमिका के इन शब्दों में उस समीक्षा पद्धति का उल्लेख किया जिसने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। रचना और आलोचना के अंतःकरण को संशोध्ति / परिवर्तित करने में ‘नयी समीक्षा’ के सूत्रों व समीकरणों ने ऐतिहासिक कार्य किया। दोनों विश्वयुद्धों के बीच का समय नयी समीक्षा के प्रारंभ, विकास और सिमटाव का भी समय है।
    नयी समीक्षा के अंतर्गत स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति समूह और विक्टोरियन साहित्य की नैतिकता के प्रति विरोध दर्ज हुआ। इससे जुड़े समीक्षक कविता के अध्कि शुद्ध मूल्यांकन के लिए उसको ऐतिहासिक सामाजिक विवरणों व रचनाकार की निजता से काट देना उचित समझते थे। इससे विश्लेषण का क्षेत्र रूपात्मक विलक्षणताओं तक सीमिति हो गया।
    हर आरोह का एक अवरोह होता है। ‘नयी समीक्षा’ की सीमाएं 1950 के आसपास उभरने लगीं। निर्मला जैन के शब्दों में, फ्नयी समीक्षा की सभी महत्त्वपूर्ण कृतियां पहले ही प्रकाशित हो चुकी थीं और आलोचक जैसे अपने ऐतिहासिक दायित्व को पूरा कर विराम की मुद्रा में थे। आलोचना का एक प्रमुख दौर, एक विशेष युग मानो समाप्त हो गया था।
    प्रस्तुत पुस्तक इस महत्त्वपूर्ण आलोचना युग की उल्लेखनीय विशेषताओं को मूल रचनाओं के अनुवाद द्वारा उपलब्ध कराती है। रेने वेलेक, क्लींथ बु्रक्स, आइवर विन्टर्स, टी. एस. इलियट, आई. ए. रिचड्र्स, ऐलन टेट और डब्ल्यू. के. विमसाट के लेखों का अनुवाद अजितकुमार, निर्मला जैन व चंचल चैहान ने किया है। अपने ढब की अकेली पुस्तक, जिसमें जाने कितनी बहसों के प्रस्थान अंतर्निहित हैं। पाठकों की सुविध के लिए दो परिशिष्टों में हिंदी-अंग्रेजी और अंग्रेजी-हिंदी शब्दावली भी दी गई है।
  • Andher Nagari : Srijan, Vishleshan Aur Paath (Paperback)
    Ramesh Gautam
    35

    Item Code: #KGP-1035

    Availability: In stock

    शोषक व्यवस्था के अस्त-व्यस्त और ध्वस्त होने की चिरंतन बोध कथा है ‘अंधेर नगरी’, केवल तर्कशून्य मूर्ख राजे-रजवाड़ों का तत्कालीन प्रदर्शन ही नहीं। भारतेन्दु की पैनी नजर बकरी-प्रकरण के माध्यम से विदेशी उपनिवेश में हैरान-परेशान जनता की त्रासदी को समाज की आंखों के सामने रखकर उसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रहारात्मक प्रतिघात के लिए उकसाने पर थी, क्योंकि भारतेन्दु का मानना था कि ‘बिना कोई उत्तम शिक्षा निकले जो नाटक खेला ही गया तो इसका फल क्या?’ इसलिए भारतेन्दु का यह रचनात्मक प्रयास प्रहसन के रूप में केवल परिहास प्रिय रसिकजनों को परितृष्ट करने के लिए ही नहीं था बल्कि इससे भी ज्यादा बहुत कुछ था। सांस्कृतिक मोर्चे और तर्कशून्य औपनिवेशिक धरातल पर साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासन-व्यवस्था का संचालन करने वाली खोखली हाकिमी मानसिकता को सूली पर चढ़ाने की जन आकांक्षाओं की भविष्य कल्पना इस प्रहसन में की गई है। कहना न होगा, जो 1947 में जनप्रयत्नों से फलीभूत हुई भी। अतः न्याय व्यवस्था के बौद्धिक दिवालिएपन और राजनीतिक अव्यवस्था के खिलाफ यह भारतेन्दु का ‘एकदिनी घोषणा-पत्र’ है, प्रासंगिकता में जिसकी अनुगूंज आज तक सुनाई दे रही है।µ
  • Vichaar Bindu
    Atal Bihari Vajpayee
    300 225

    Item Code: #KGP-9019

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।

    राष्ट्रीय जीवन में एक असहिष्णुता जाग रही है, दूसरे को सहन न करने की प्रवृत्ति । लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति नहीं चल सकती । हमने हमेशा चारों तरफ से आने वाली हवाओं का स्वागत किया । इस देश के द्वार सबके लिए खुले रहे है । जब और जगह आतंक था, शोषण था, भय था, मजहब के नाम पर उत्पीड़न था, तो लोग अपनी पवित्र अग्नि को जलाए हुए भारत में आए । और यहाँ भारतमाता के आँचल में उन्होंने विश्राम पाया । किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि यहाँ कैसे आए, क्यों आए, पराए हो । यह इस देश की मिट्टी का रंग है, यह इस देश की संस्कृति का गुण है ।
    -अटल  बिहारी वाजपेयी
  • Samagra Naatak : Kusum Kumar
    Kusum Kumar
    1200 840

    Item Code: #KGP-9379

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता के बाद हिंदी नाटक के इतिहास में कुसुम कुमार एक अत्यंत प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। इनके नाटक सुविधाजनक रचनाकर्म नहीं, निरंतर संघर्ष, संताप आदि प्रयोगों का परिणाम हैं। इनमें महज स्त्री-स्वर ही मुखर नहीं हुआ बल्कि अपने समय, समाज और परिवेश के अनिवार्य प्रसंगों से बराबर जूझते नजर आते हैं। 
    समग्र नाटक में संकलित कुसुम कुमार के आठों नाटक समय-समय पर देश भर में चर्चित व प्रशंसित रहे हैं और अनुभवी निर्देशकों द्वारा बार-बार मंचित हुए हैं। ‘रावण-लीला’, ‘संस्कार को नमस्कार’, ‘दिल्ली ऊंचा सुनती है’, ‘सुनो शेफाली’ तथा ‘लश्कर चैक’ आदि ये सभी नाटक अपने साथ एक नवीन कथ्य और परिवेश की खोज करते हुए रचनात्मक परिणाम देते हैं। 
    कुसुम कुमार के नाटकों को श्रेष्ठतम नाटकों में गिना जाता है। इसीलिए इनका कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुआ है, जिससे इनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। ये नाटक सामाजिक सरोकारों की कथावस्तु को एक ऐसा ज्वलंत और साथ ही रोचक स्वरूप देते हैं जो दर्शकों को लगातार बांधे रखता है। मानवीय समस्याएं और मानव संबंधों की गहन पड़ताल भी इनके नाटकों की विशेषता है। इनका बहिरंग प्रायः काॅमेडी होते हुए भी, सरोकार बेहद मानवीय और संवेदनशील है। एक ओर यहां समाज में चला आ रहा नाटक के पीछे का नाटक बेनकाब होता है तो दूसरी ओर दमित वर्ग अपनी विशिष्ट पहचान के साथ मुखर होता है। यह कहना आवश्यक है कि इन नाटकों का स्वर और स्वरूप आधुनिक सोच की खुली भाषा और चुस्त संवादों में सहज ग्राह्य और दर्शकों के बीच प्रिय है। 
    डाॅ. कुसुम कुमार के नाटकों का संकलन पाठकों की सुविधा के लिए एक जिल्द में पहली बार प्रकाशित हो रहा है। समग्र नाटक सभी सांस्कृतिक संस्थाओं, नाट्य मंडलियों, अकादमियों, पुस्तकालयों एवं शोधर्थियों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक। 
  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    995 647

    Item Code: #KGP-580

    Availability: In stock


  • Betva Ki Lehrein
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-400

    Availability: In stock


  • Gitanjali : Rabindranath Thakur
    Rabindra Nath Thakur
    350 280

    Item Code: #KGP-908

    Availability: In stock