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  • Bayabaan Mein Bahaar
    Urmila Shirish
    450 338

    Item Code: #KGP-594

    Availability: In stock


  • Kavya Shatabdi
    Anamika
    350 315

    Item Code: #KGP-789

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।
  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Paperback) (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    600 540

    Item Code: #KGP-912

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खंड)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है। इसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई। आशा है, पाठक इस ग्रंथ को तत्काल प्रकाशित देखना चाहेंगे और अपने पुस्तकालय में अग्रणी स्थान देंगे।
    —परमानंद श्रीवास्तव (भूमिका से)
  • Buniad Ali Ki Bedil Dilli
    Dronvir Kohli
    400 300

    Item Code: #KGP-263

    Availability: In stock

    बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली
    यह अपूर्व संग्रह 'धर्मयुग' के लोकप्रिय स्तंभ बेदिल दिल्ली में प्रकाशित लेखों का है। डॉ० धर्मवीर भारती के विशेष आग्रह पर इसे लिखा करते थे उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली बुनियाद अली के छद्म नाम से। स्तंभ में जाने वाली सामग्री के बारे में प्राय: तीखी प्रतिक्रिया होती थी। साहित्यिक गोष्ठियों वाले लेखों को लेकर कुछ लेखक लाल-पीले भी होने लगते थे। ऐसी स्थिति में स्तभ-लेखक के बारे में तरह तरह के कयास लगाए जाते थे। लेकिन भारती जी ने लेखक की पहचान को निरंतर गुप्त रखा इतना कि 'धर्मयुग' में उनके सहयोगी तक नहीं जान पाते थे कि इसे लिख कौन रहा है। भारती जी लेखक के साथ पत्र-व्यवहार भी स्वयं करते थे। जैसे, उनका 25.3.83 को यह पत्र : "Message for Shri Buniad Ali : दोनों किस्तें मिलीं"बहुत जोरदार और to the point हैं। इस बार दिल्ली में बहुत से लोगों (सामान्य पाठक तक) ने बेदिल दिल्ली की चर्चा की।Bravo! Keep it up."
    यही नहीं, इस स्तंभ के लेखों का संपादन-संशोधन भी भारती जी स्वयं करते थे। जैसे, 17 जनवरी, '83 के अपने पत्र में उनकी यह विस्मयकारी टिप्पणी :"पार्लियामेंट वाली किस्त मिल गई है। गृहमंत्री के रूप में ज्ञानी जी वाली घटना निकालनी पड़ेगी। उसके कुछ कारण हैं-गैर-राजनीतिक। कभी मिलने पर बताऊँगा"
    कहना न होगा कि ये सारे लेख ऐतिहासिक महत्व है। दिल्ली की तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक गतिविधियों का ये आईना हैं। उन दिनों यहाँ की साहित्यिक गोष्ठियों में किस तरह एक-दूसरे की टाँग खींची जाती थीं, इसका प्रामाणिक विवरण इन लेखों में ही मिलेगा। आजादी से पहले गर्मियों में राजधानी शिमला जाती थी, तो कनॉट प्लेस के आगे केंद्रीय सचिवालय का सारा इलाका इतना सुनसान-बियाबान हो जाता था कि लोग दिन-दिहाडे उधर जाने से भय खाते थे; फिर शिमला- प्रवास के दौरान कर्मचारी कैसी-कैसी हरकतें करते थे, इसका शायद पहली बार इतना दिलचस्प वर्णन इस स्तंभ में किया गया है।
    डॉ० धर्मवीर भारती इस स्तंभ के बारे में इतने उत्साहित थे कि लेखक को उन्होंने अपने 4.4.81 के पत्र में यह कहकर प्रोत्साहित किया था : ""स्तंभ जोरदार जा रहा है। अपने ढंग का बिलकुल अलग।"
  • Chandragiri Ke Kinare
    Sara Aboobkar
    75

    Item Code: #KGP-1958

    Availability: In stock


  • Jal Jo Jeevan Hai
    Harish Chandra Vyas
    300 249

    Item Code: #KGP-520

    Availability: In stock

    जल, जो जीवन है 
    विश्व-स्टार पर गहराते जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्षा 2003 को 'अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छ जल वर्ष' घोषित किया है । यही भारत सहित दुनिया के देशों ने अपना रवैया नहीं बदला तो जल विभिन्न देशों में तनाव और जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता का विषय बने बगैर नहीं रह सकता। अतः जल-संसाधनों के प्रति सचेत होने की परम आवश्यकता है । 'जल, जो जीवन है' का सर्जन लेखक ने दो प्रतिमानों को सामने रखकर किया है— प्रथम, जल-संकट की गंभीरता के बारे में जागरूकता में वृद्धि करना और द्वितीय इस समस्या के निदान व समाधान हेतु सर्जनात्मक सुझाव पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करना। 
    प्रस्तुत पुस्तक में जल से संबंधित उभरते समस्त संकटों तथा उनके समाधान हेरु सरल भाषा में जानकारी प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न किया गया है। 
  • Kavi Ne Kaha : Neelesh Raghuvanshi (Paperback)
    Nilesh Raghuvanshi
    140

    Item Code: #KGP-7020

    Availability: In stock

    किसी कवि का कथन है कि कविता हमारे चारों ओर चीज़ों, घटनाओं, गतियों, स्थितियों, ध्वनियों, आहटों और अंतरालों में हर समय मौजूद होती है, वह हमारे आसपास तैरती रहती है और एक समर्थ कवि उसे पहचानकर एक परिचित शक्ल दे देता है। नीलेश रघुवंशी अपने दौर के पुरुष और महिला कवियों से इस रूप में अलग हैं कि उनके लिए कविता हमारे सामान्य निम्नमध्यवर्गीय जीवन से अलग, विभिन्न या उससे उच्चतर काम नहीं है बल्कि वह उसी जीवन के भीतर घटित होती है। उनकी कविता अपने समय के भौतिक और मानसिक द्वंद्वों को अनदेखा करके अभिव्यक्ति का कोई अपरिचित लोक नहीं रचती। वह जीवन को जारी रखने वाले कामों का निषेध नहीं करती बल्कि उन्हीं कामों में से अपने को उत्पन्न करती रहती है।
    जीने की उष्मा और ललक से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में नीलेश की नई पहचान को रेखांकित करती हैं। ‘पहली रुलाई तक की डायरी’ जैविक स्त्री-बोध का क्रमिक दस्तावेज है, जो शायद हिंदी में पहली बार इतनी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुआ है। इस काव्यात्मक डायरी को जो बात सबसे अधिक  विश्वसनीय बनाती है, वह अजन्मे शिशु के साथ माँ की वह चुहल है, जो प्रायः इसके हर टुकड़े में मिल जाएगी। ‘जन्म देना एक यातना से गुजरना है’--इस पंक्ति को लिखने वाली यह कवयित्री ही यह क्रीड़ाभरी पंक्ति भी लिख सकती है--‘मैं लिख रही हूँ डायरी और तुम बंदर बने हुए हो--तुमने तो मेरे पेट को खेल का मैदान बना रखा है।’ जन्म देने के सर्जनात्मक उल्लास से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में कुछ नया जोड़ती हैं।   
  • Aur Aagey Badhatey Raho (Paperback)
    Dr. Rashmi
    135

    Item Code: #KGP-467

    Availability: In stock

    जीवन व साहित्य में सदुपदेश, सत्संग और सुभाषित का विशेष महत्त्व है। इनमें अनुभवों का ऐसा खजाना होता है जो किसी को भी समृद्ध कर सकता है। यही कारण है कि साहित्य में प्रारंभ से ही नीति-कथाओं का प्रचलन है। ये कथाएं प्रेरणा देती हैं, संघर्ष करना सिखाती हैं, असमंजस में उलझे मन को उचित निर्णय लेने की शक्ति देती हैं और समग्रतः जीना सिखाती हैं। ‘...और आगेबढ़ते रहो’ प्रेरक प्रसंगों की एक ऐसी ही रोचक पुस्तक है। लेखिका डॉ. रश्मि ने बड़ी कुशलता से उपयोगी जीवन सूत्रों को प्रस्तुत करते हुए उनमें निहित संदेश भी रेखांकित कर दिया है।
    इन प्रेरक प्रसंगों में मूलतः नैतिक शिक्षा छिपी है। वह नैतिकता जिसके बिना सार्थक, संतुलित और स्वस्थ मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी प्रेरक कथाएं वर्षों से समाज में सत्य, प्रेम, अहिंसा, त्याग और सहनशीलता के बीज बोती रही हैं। पहले घर-परिवार में बड़े बुजुर्ग, जैसे--दादी-दादा, नानी-नाना ऐसी बहुत सारी कहानियां सुनाते थे। बहाने-बहाने से बच्चे उनसे बहुत कुछ ऐसी बातें सीखते थे जो जीवनपर्यंत याद रहती थीं। आज समय बदल गया है। क्या बड़े, क्या बच्चे--सब अपनी-अपनी जगह व्यस्त हैं। प्रेरक प्रसंगों से भरी कहानियां सुनाने का जिम्मा पुस्तकों ने ले लिया है। इस बात का अनुभव पाठक यह पुस्तक पढ़ते हुए करेंगे। सीधी सुगम भाषा और प्रवाहपूर्ण शैली में लिखी ये रचनाएं पाठकों को प्रभावित व प्रेरित करेंगी--ऐसा हमारा विश्वास है।
  • Mere Saakshatkaar : Mridula Garg
    Mridula Garg
    225 203

    Item Code: #KGP-870

    Availability: In stock


  • Postmortem (Paperback)
    Ajeet Kaur
    100

    Item Code: #KGP-1310

    Availability: In stock


  • Parineeta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1353

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है परिणीता और दूसरा है मझली दीदी।
  • Kuchh Yaaden Bachpan Ki
    Ramdarash Mishra
    100

    Item Code: #Kgp-kybk

    Availability: In stock


  • Goonj Uthin Thaliyan
    Dr. Kusum Meghwal
    590 443

    Item Code: #KGP-GUT HB

    Availability: In stock

    मेरी लगभग 60 पुस्तकें प्रकाशित होने के बाद मेरे जीवन का यह पहला उपन्यास है–‘गूँज उठीं थालियाँ’, जो कल्पना पर आधारित नहीं है बल्कि पूरी तरह सत्य घटना पर आधारित है। इतना ही नहीं, इससे जुड़ी हुई अन्य सभी घटनाएँ भी सत्य पर आधारित हैं। केवल पात्रों के नाम, स्थानों के नामों में परिवर्तन अवश्य किया गया है।

    यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मेरी हर पुस्तक का जन्म किसी घटना के आधार पर ही हुआ है और यह उपन्यास भी उसका अपवाद नहीं है।

    इस उपन्यास का जन्म जिस घटना के आधार पर हुआ है, उसके पात्र ने तो आसमान की ऊँचाइयों को छू लिया है। उसने पूरी दुनिया को अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया है। वर्षों पूर्व उसे जिदा जमीन में गाड़ देने का फोटो तो मैं नहीं ले पाई, किंतु उसी घटना को पुनः दोहराने वाला फोटो मुझे उपलब्ध हो गया और तब से ही मेरे मस्तिष्क के गर्भ में पल रहे संबंधित विचारों को, उसके चित्रों को कोरे कागज पर उकेरने के लिए मेरी कलम उतावली हो गई तो उस घटना ने इस उपन्यास के रूप में जन्म लेकर अपने पाठकों तक पहुँचने का पक्का इरादा कर लिया।

    कोई भी काम अकारण नहीं होता। उसके करने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। इस पुरुषप्रधान अन्यायपरक, असमानतापरक समाज व्यवस्था के विरोध का कीड़ा तो मेरे दिमाग में बचपन से ही कुलबुलाने लग गया था, कितु उसे निकालने का काम अब कई वर्षों बाद अर्थात् मेरे जीवन के उत्तरार्द्ध में हो रहा है।

    वैसे तो अपनी खुद की समझ आने के बाद से अर्थात् लगभग पाँच वर्ष की उम्र से लड़की के पैदा होने से लेकर मरने तक के पूरे जीवन में कदम-कदम पर उसके साथ होने वाले भेदभाव, अन्याय, अत्याचार, उसके हर कदम पर लगाए गए प्रतिबंधों को मैंने न केवल पढ़ा और सुना है वरन् स्वयं भोगा भी है और वे सभी कष्ट, पीड़ाएँ एवं दर्द मेरी कहानियों, कविताओं के माध्यम से बह निकले, जिन्होंने हिंदी साहित्य के विशाल समुद्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।

    यह उपन्यास भी नारी व्यथाओं तथा उसके कष्ट, दर्द, पीड़ाओं को अभिव्यक्ति देता हुआ नारी को क्रांतिकारी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली मेरी कहानियों, कविताओं की श्रृंखला में एक और कड़ी के रूप में जुड़ गया है, जो मेरे पाठकों को मेरी पूर्व की पुस्तकों की तरह ही पसंद आएगा, ऐसी मेरी उम्मीद है।

    वैसे तो लेखक की हर रचना की सफलता-असफलता का निर्णायक पाठक वर्ग ही होता है, कितु अपने पाठक वर्ग की मानसिकता को पहचानते हुए मुझे यह लिखने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती कि यह भी उन्हें पसंद ही आएगा।

    मेरे जीवन का यह प्रथम उपन्यास हिंदी उपन्यास जगत् में लाते हुए, अपने पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे अतीव हर्ष हो रहा है।

    मुझे यहाँ यह लिखने में भी कोई आपत्ति नहीं है कि हिंदी साहित्य जगत् के ठेकेदार, आलोचक व समालोचक इसे चाहे किसी भी दृष्टि से लें, किंतु अपने लेखकीय दायित्व को मैंने पूरी ईमानदारी से निभाया है, इसे कोई झुठला नहीं सकता। वैसे भी खरा-सच्चा लेखक, समाज की खरी-सच्ची बातें लिखने वाला लेखक किसी की आलोचना की परवाह नहीं करता। वह अपने जीवन के महान् लक्ष्य की प्राप्ति में लगा रहता है और मैं भी अपने जीवन के महान् लक्ष्य पुरुषों द्वारा नारी को भी एक इनसान मान लेने के लक्ष्य को पूरा करने में लगी हुई हूँ और आजीवन लगी रहूँगी। मुझे अपने इस दृढ़ निश्चय से कोई हटा नहीं सकता।

    मुझे आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि अपने आपको इनसान के तराजू में तौलने और उस पर खरे उतरने वाले इनसानी पुरुषों की भागीदारी, उनका स्नेह, सहकार तथा प्रोत्साहन मुझे अवश्य मिलेगा।

    इसी उम्मीद के साथ---

    डॉ. कुसुम मेघवाल

  • Mere Saakshatkaar : Ram Vilas Sharma
    Ram Vilas Sharma
    450 360

    Item Code: #KGP-712

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Shri Prakash Shukla
    Shri Prakash Shukla
    240 216

    Item Code: #KGP-7815

    Availability: In stock

    श्रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि हैं। इनके पहले कविता संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ (1999) से लेकर पाँचवें कविता संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ (2014) तक की कविताओं से गुजरकर कविता प्रेमियों को काव्य स्वाद का सुखद अहसास होता है। अपनी कविताओं में ये बिना किसी नारेबाजी व आयातित विमर्श का हौवा खड़ा किए सधे हुए स्वर में सामाजिक  विसंगतियों, क्रूरताओं, धार्मिक ढकोसलों, आर्थिक पराभवों और सांस्कृतिक क्षरण पर सीधे वार करते हैं। इनकी कविता की दुनिया में राजनीति व विचारधारा की एक पक्षधर दुनिया गुँथी हुई होती है जिसमें गरीब, पीड़ित व उपेक्षित वर्ग के प्रति गहरी रागात्मक चेतना मौजूद है।
    लेकिन उपर्युक्त बातों के साथ-साथ जिस वैशिष्ट्य के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता में ज्यादा चर्चित हैं वह हैं इनकी विषयगत वैविध्यता और गहरी लोकोन्मुखता। अपनी कविताओं में वे महज लोक का चित्रण नहीं करते बल्कि लोक के क्षरण के कारणों की शिनाख्त भी करते हैं। नवउदारवाद और पूँजीवादी शक्तियों के आक्रमण, दमन, शोषण और चालाकियों का प्रतिरोध करने वाली इनकी कविता जनोन्मुखी व लोकोन्मुखी तो है ही, इसमें स्थानीयता के साथ वैश्विकता के तत्त्व भी समाहित हैं जहाँ पुराने के साथ परंपरा से रिश्ते रखने वाला नया समाज तो है ही, एक आधुनिक चेतना भी मौजूद है।
    इसी के साथ गौरतलब है कि प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के चित्रों से भरपूर कवि का कविता संसार विविध वर्णों से युक्त है जहाँ कविता की धार अपनी भाषिक व्यंजना के रेडिकल भावभूमि पर विकसित होती है। यहाँ कहते हुए ख़ुशी होती है कि इस कवि ने अपने को कहीं रिपीट नहीं किया है और इसी कारण इनकी कविता बहुवस्तुस्पर्शी उध्र्वमुखी चेतना से संपन्न है जो एक समर्थ कवि का लक्षण है। भाषा की सादगी और बिंबों की निजता इनके कवि- स्वभाव की विलक्षण विशेषता है। कह सकते हैं कि भाषा के लोक स्वीकृत विन्यास को चुनौती देती इनकी कविताओं में व्यंग्य व वक्रता का एक सघन संसार उपस्थित होता है जहाँ भाषायी मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर का औदात्य भी मिलता है जो इनकी कविताओं को रेडिकल बनाता है।
    उम्मीद की जानी चाहिए कि कविता का यह संचयन कवि की काव्य संपदा और उनकी सामर्थ्य से अपने पाठकों को परिचित कराने में समर्थ होगा।
  • Bhartiya Vangmay Per Divyadrishti
    Kashiram Sharma
    400 300

    Item Code: #KGP-9137

    Availability: In stock

    भारतीय वाड्मय का एक बहुत बड़ा भाग चार महास्तंभों पर आरित है। वे हैं: रामायण, पुराण और बड्ढकहा (बुहत्कथा)। सभी भारतीय भाषाओं के रचनाकारों ने आदिकाव्य रामायण, जयकाव्य महाभारत और पुराणों को अपना उपजीव्य बनाया है। संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का पर्याप्त वाड्मय ‘बड्ढ कहा’ पर भी आश्रित है। अतः इन चार महास्तंभों का सम्यक् परिचय प्राप्त किए बिना भारतीय वाड्मय का सुचारु अध्ययन संभव नहीं है। इस बात को तो लोग प्रायः स्वीकृत कर लेते हैं कि भारतीय वाड्मय भवन का बहुत बड़ा भाग इन चार स्तंभों पर टिका है पर ये महास्तंभ किस ‘घातु’ के बने हैं, यह जानारी बहुत ही कम लोगों को है। इस पुस्तका में उस धातु का परिचय कराने का विनम्र प्रयास है। वह धातु क्या है और उसका उद्गम स्थान कहा हैं, यह भी बताने का प्रयास किया गया है।
  • Chintan Karen Chintan Mukt Rahen
    Swed Marten
    250 213

    Item Code: #KGP-279

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं ।
  • Path Ke Daavedaar
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 249

    Item Code: #KGP-866

    Availability: In stock


  • Nayee Samiksha Ke Pratimaan
    Nirmla Jain
    400 320

    Item Code: #KGP-654

    Availability: In stock

    "1930–1960 तक से समय को जॉन हॉलावे ने ‘साहित्यिक आलोचना में क्रांति’ का युग कहा है। कहना न होगा कि इस समय की सबसे महत्त्वपूर्ण और समृद्ध आलोचनात्मक प्रवृत्ति नयी समीक्षा है। प्रवृत्ति विशेष के लिए यह नाम 1941 में प्रकाशित जॉन क्रो रैंसम की इसी शीर्षक की रचना से रूढ़ हुआ।" प्रस्तुत पुस्तक ‘नयी समीक्षा के प्रतिमान’ की संपादक सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन ने भूमिका के इन शब्दों में उस समीक्षा पद्धति का उल्लेख किया जिसने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। रचना और आलोचना के अंतःकरण को संशोध्ति / परिवर्तित करने में ‘नयी समीक्षा’ के सूत्रों व समीकरणों ने ऐतिहासिक कार्य किया। दोनों विश्वयुद्धों के बीच का समय नयी समीक्षा के प्रारंभ, विकास और सिमटाव का भी समय है।
    नयी समीक्षा के अंतर्गत स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति समूह और विक्टोरियन साहित्य की नैतिकता के प्रति विरोध दर्ज हुआ। इससे जुड़े समीक्षक कविता के अध्कि शुद्ध मूल्यांकन के लिए उसको ऐतिहासिक सामाजिक विवरणों व रचनाकार की निजता से काट देना उचित समझते थे। इससे विश्लेषण का क्षेत्र रूपात्मक विलक्षणताओं तक सीमिति हो गया।
    हर आरोह का एक अवरोह होता है। ‘नयी समीक्षा’ की सीमाएं 1950 के आसपास उभरने लगीं। निर्मला जैन के शब्दों में, फ्नयी समीक्षा की सभी महत्त्वपूर्ण कृतियां पहले ही प्रकाशित हो चुकी थीं और आलोचक जैसे अपने ऐतिहासिक दायित्व को पूरा कर विराम की मुद्रा में थे। आलोचना का एक प्रमुख दौर, एक विशेष युग मानो समाप्त हो गया था।
    प्रस्तुत पुस्तक इस महत्त्वपूर्ण आलोचना युग की उल्लेखनीय विशेषताओं को मूल रचनाओं के अनुवाद द्वारा उपलब्ध कराती है। रेने वेलेक, क्लींथ बु्रक्स, आइवर विन्टर्स, टी. एस. इलियट, आई. ए. रिचड्र्स, ऐलन टेट और डब्ल्यू. के. विमसाट के लेखों का अनुवाद अजितकुमार, निर्मला जैन व चंचल चैहान ने किया है। अपने ढब की अकेली पुस्तक, जिसमें जाने कितनी बहसों के प्रस्थान अंतर्निहित हैं। पाठकों की सुविध के लिए दो परिशिष्टों में हिंदी-अंग्रेजी और अंग्रेजी-हिंदी शब्दावली भी दी गई है।
  • Hashiye Par Harf
    Prem Bhardwaj
    400 320

    Item Code: #KGP-450

    Availability: In stock

    लक्ष्मण रेखा लांघने वाली बात मीडिया के साथ कैसे कुछ हद तक सही बैठती है, इसे भी समझने की जरूरत है। एक जमाने से पत्रकारिता को पवित्र पेशा या मिशन माना गया है। किसी लक्ष्मण ने नहीं, उससे पवित्रता की इसी जन-अपेक्षा ने लक्ष्मण रेखा न जाने कब, क्यों और कैसे खींच दी? सत्ता का यह चरित्र होता है कि वो अपने समय में पवित्र चीजों को भ्रष्ट करती है और मन को भाने वाली वस्तु या इंसान को भोग की चीज मानती है। सर्वत्र पर मालिकाना हक ही उसका स्वभाव है। लिहाजा उसे गवारा नहीं कि वो गलत है तो सामने वाला सही रहकर उसके लिए ‘गलत’ की परिधि को बरकरार रखे। खुद को इस परिधि से बाहर निकालने या अच्छाई की लकीर को मिटाने के मकसद से ही वो तरह-तरह का छल-प्रपंच करती है। कई दफा वो अपनी ताकत का जौहर दिखाकर जबरदस्ती भी करती है। जरूरत पड़ने पर ‘मायाजाल’ भी रचने से गुरेज नहीं करती। राडिया प्रकरण में कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने भी मायाजाल रचा। मीडियारूपी सीता के मन में ‘स्वर्णमृग’ (धन, संपन्नता और सुविधाएं) का लोभ जन्मा। और वह किसी को कुछ देने (एक राजा को मंत्रालय देने) की खातिर लक्ष्मण रेखा को लांघ गई। बदले में उसे क्या मिला, यह अभी सामने नहीं आया है। बहुत संभव है बाद में कुछ पता चले।
  • Veerendra Mishra : Geet-Samagra-(4 Vols.)
    Pradeep Pant
    2500 1875

    Item Code: #KGP-816

    Availability: In stock

    वीरेन्द्र मिश्र : गीत-समग्र (4 भागों में)
    नई कविता के आगमन के साथ काव्य-जगत् का पूरा परिदृश्य बदल गया । कारण कि छंदमुक्त कविता ने गीत को सबसे अधिक प्रभावित किया । यद्यपि नई कविता के अनेक कवियों ने स्वयं भी गीतो की रचना की और छंदों का सहारा लिया, किंतु नई कविता के उदय के साथ ही गीत की उपेक्षा भी आरंभ हो गई । गीत के उपेक्षित होने के अपने कारण भी थे । जैसे कि गीत के नाम पर तुकबंदी हावी होती गई, गीत प्रायः रूमानियत तक सिमट गया, उसने अपने को मंच या कवि-सम्मेलनों तक सीमित कर लिया । कालांतर में नई कविता के बाद जो कविता सामने आई, उसके चलते गीत और भी उपेक्षित हुआ, लेकिन यह भी सच्चाई है कि नई कविता के बाद की छंदमुक्त कविता प्राय: नई कविता की रूढि बनकर रह गई और आज तो ऐसी अधिकांश कविताएँ कवियों के सपाट वक्तव्य सरीखी प्रतीत होती हैं । बहरहाल कविता के रूप-स्वरूप के परिवर्तन के दौर में कुछेक कवि समस्त ऊर्जा और सर्जनात्मकता के साथ गीतों की रचना करते रहे । वीरेन्द्र मिश्र ऐसे ही कवियों में है, बल्कि वे गीतों के प्रमुख और अत्यंत स्मरणीय रचनाकार हैं। इसका मुख्य कारण है उनकी गहरी सामाजिक संलग्नता और प्रगतिशील सोच, जिस वजह से वे किशोर वय से युवावस्था की ओर बढ़ने के दौर में बंगाल के भीषण अकाल पर सशक्त छांदिक रचना प्रस्तुत कर सके । उन्होंने जहाँ एक ओर मछुआरों, कामगारों, मध्यवर्गीय जीवन के सुख-दु:खों और हर्ष-विषाद पर सार्थक गीत लिखे, वहीं एशिया के नव-स्ततंत्र राष्ट्रों पर मंडराते युद्ध के खतरे, साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं और विश्व-शांति के प्रश्नों को भी गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया । साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में प्रदूषण आदि भी उनकी चिंत्ता के केंद्र में थे । बडे पैमाने पर उन्होंने गीतों के माध्यम से विसंगतियों पर व्यंग्य किए, जबकि गीत से व्यंग्य का इस्तेमाल अधिकांश कवियों के यहाँ बहिष्कृत-सा  ही रहा है । अदभुत शब्द-संयोजन, असंख्य छांदिक प्रयोग, संगीतात्मकता आदि ऐसे उपकरण है, जिन्होंने उनके गीतों को उजास ही । वीरेन्द्र मिश्र की गीत-यात्रा सही अर्थों से अप्रतिम हैं ।
  • Lokmanya Baalgangadhar Tilak : Jivan Darshan
    M.A. Sameer
    280 238

    Item Code: #KGP-809

    Availability: In stock

    1857 की क्रांति ने जो बयार बहाई, उसने घर-घर में मन को छुआ और अगले स्वातंत्र्य समर की—जो अनवरत था और शांत भले ही था, लेकिन थमा नहीं था—रूपरेखा बना दी। इस उत्तरार्द्ध में केवल जोशीले राष्ट्रभक्त ही नहीं हुए बल्कि बौद्धक क्रांति का बिगुल बजाने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक असाधारण चिंतक और वक्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।
    यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।
  • Hindustan Ki Diary
    Dirgha Narayan
    350 298

    Item Code: #KGP-HKD HB

    Availability: In stock

    'हिंदुस्तान की डायरी' में दीर्घ नारायण के कहानीकार का वह रूप सहज ही नजर आ जाता है जिसमें वह कहानी को अपने समय, समाज व बदलती संस्कृति की धड़कन बना देना चाहते हैं। यहाँ अनुभव जिंदगी से निकलकर चौदह कहानियों में इस तरह प्रविष्ट हो गए हैं कि विविध पक्षीय संबंधों-मूल्यों पर संजीदगी से विचार होता चलता है। वर्तमान को तो ये कहानियाँ गहराई से अंकित करती ही हैं, एक गंभीर व सकारात्मक भविष्य-दृष्टि भी सृजित करती हैं जिससे हमारे समाज को संचालित करने वाली शक्तियाँ सचेत हो सकेंगी। लेखक की यह एक वाजिब चिंता है कि भारत का हर नागरिक तो पाकिस्तान में अमन-चैन व तरक्की ही चाहता है किंतु दुर्भाग्य यह है कि पाकिस्तान की नजर में सबसे बड़ा शत्रु भारत बना हुआ है। भारत की ओर से दरअसल यह एक ईमानदार डायरी है जिससे दोनों ओर के हुक्मरानों को सही दिशा मिल सकती है। अपने यथार्थ में एक मुख्य अधिशासी अधिकारी की ये कहानियाँ बदलते समय में उन दस्तकों की शिनाख्त हैं। जो परिवार, शहर, देश और समाज के दरवाजों पर सुनाई पड़ रही हैं। यहाँ भाषा ऐसी दोस्ताना है कि कथा के पात्रों और स्थितियों का मूल भाव बड़ी सहजता से संप्रेषित हो जाता है। रूपवादी लटकों-झटकों से संघर्ष कर रही आज की हिंदी कहानी के लिए दीर्घ नारायण जी की ये कहानियाँ एक सार्थक मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं क्योंकि यहाँ हर कहानी एक नया कथ्य खोजकर लाती है और यथार्थ से सीधी मुठभेड़ करती है 
  • Vyangya Samay : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    380 285

    Item Code: #KGP-9341

    Availability: In stock

    कालजयी कृति ‘राग दरबारी’ के महान् रचनाकार श्रीलाल शुक्ल युगांतरकारी व्यंग्यकार हैं। उनका व्यंग्य लेखन ‘सुबुक सुबुक वादी’ भावुकता और जड़ीभूत जीवनदृष्टि के प्रतिरोध से प्रारंभ होता है। साहित्य में ‘प्रतिभा’ क्या होती है, यह श्रीलाल शुक्ल को पढ़कर जाना जा सकता है। वे पूर्वानुमानित या राजनीति से उत्सर्जित विषयों की ओर कभी नहीं गए। उनके द्वारा रचे गए व्यंग्यों के शीर्षक ही यह बताने के लिए यथेष्ट हैं कि समाज, संस्कृति, साहित्य और साहित्य के धूसर धुंधली इलाकों से होकर वे किस तरह गुजरते हैं। क्लासिक व्यंग्य लेखन के सर्वोत्तम उदाहरण देतीं श्रीलाल शुक्ल की रचनाएं अविस्मरणीय हैं। भाषा के अनेक विस्मयकारी प्रयोग उन्होंने  किए हैं। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल और ज्ञान चतुर्वेदी व्यंग्य रचना में प्रत्युत्पन्नमति, वचनवक्रता, समासोक्ति, अन्योक्ति आदि के लिए विशेषतः उल्लेखनीय हैं। श्रीलाल शुक्ल विश्व साहित्य में व्यंग्य की परंपरा के अद्भुत ज्ञाता थे। उनके व्यंग्य विश्वस्तरीय व्यंग्य साहित्य में प्रसन्नतापूर्वक शामिल किए जा सकते हैं। मनुष्य मन के अतल में छिपी प्रवृत्तियों को उजागर करते हुए उन्होंने व्यापक सभ्यता समीक्षा की है। 
    ‘व्यंग्य समय’ में श्रीलाल शुक्ल के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और उन्हें पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Afrika Road Tatha Anya Kahaniyan
    Urmila Jain
    300 249

    Item Code: #KGP-610

    Availability: In stock

    अफ्रीका रोड तथा अन्य कहानियां 
    अफ्रीकी देशों से प्रवास के दौरान, फिर लंदन में अफ्रीकी लेखकों और उनकी कहानियों से रूबरू होती रही, पड़ती रही । वे इतनी क्यों कि दिल हुआ वे हिंदी पाठकों तक पहुंचें । रास्ता था अनुवाद । और अनुवाद में आसानी इसलिए हुई कि लगभग सभी कहानियां मूल अंग्रेजी में ही लिखी गई है ।
    -उर्मिता जैन
  • Virajbahu (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1246

    Availability: In stock


  • The Hanuman Factor (Self-Help)
    Anand Krishna
    345 286

    Item Code: #KGP-593

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
  • Kab Tak Pukarun
    Shanta Kumar
    200

    Item Code: #KGP-9335

    Availability: In stock

    ‘कब तक पुकारूं’ शान्ता कुमार और संतोष शैलजा की कुछ महत्त्वपूर्ण कहानियों का संग्रह है। हिंदी साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां पति व पत्नी दोनों लेखक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। जैसे—धर्मवीर भारती-पुष्पा भारती, राजेन्द्र यादव-मन्नू भंडारी, रवीन्द्र कालिया-ममता कालिया। इसी क्रम में शान्ता कुमार और संतोष शैलजा का नाम भी लिया जाना चाहिए। दोनों अत्यंत संवेदनशील, विचारवान और अभिव्यक्ति-निपुण रचनाकार हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियों को पढ़कर इस बात की तसदीक की जा सकती है।
    ये कहानियां विषयवस्तु की दृष्टि से पर्याप्त समृद्ध हैं। आधुनिक समाज की विसंगतियों से लेकर चंद्रगुप्त मौर्य-ध्रुवस्वामिनी व नेपोलियन के कथासूत्रों तक रचनाओं का विस्तार है। लेखकद्वय ने मानवता के दृष्टिकोण से कथा-स्थितियों और चरित्रों को विस्तार दिया है। उदाहरण के लिए ‘गोल दायरा’ में नेपोलियन विश्वमानवता एवं सृष्टि-सत्य को उपेक्षित करने के कारण ‘सेंट हेलना’ द्वीप में अंतिम सांस लेने के लिए विवश हुआ था। ‘समर्पण’ में ‘भामति टीकाकार’ वाचस्पति और भामति का अद्भुत दांपत्य मन को छू लेता है। ‘बेतवा की लहरें’, ‘कलाई’, ‘ज्योतिर्मयी’ और ‘जरी-पटका’ कहानियां इतिहास-रस से आप्लावित हैं। ‘कलाई’ की भाषा विशेषतः उल्लेखनीय है—‘प्रकाश की धीमी लौ में ध्रुवस्वामिनी की मानिनी आकृति दमक रही थी। इस साहस व दृढ़ता ने उसके सौंदर्य को सौ गुना बढ़ा दिया था।’
    लेखकद्वय मानव मनोविज्ञान के गहरे पारखी हैं। अपनी-अपनी कहानियों में उन्होंने यह सिद्ध भी किया है। ‘जब फूल खिल उठे’ कहानी वैसे तो एक मीठी प्रेम कहानी है, मगर इसमें घर के बच्चों का मनोविज्ञान सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है। इस संग्रह की कुछ रचनाएं अतीत को वर्तमान संदर्भों में देखते हुए विकसित हुई हैं। ‘न्यू सीता’ में स्त्राी जीवन का एक नया आयाम है जो पौराणिक सीता से जुदा है। ‘रज्जो काकी’ भी स्त्राी विमर्श का एक मार्मिक पक्ष है।
    समग्रतः यह कहानी संग्रह दो उत्कृष्ट रचनाकारों की रचनाओं से समृद्ध है। इसे पढ़ते हुए संवेदना, विचार और इतिहास के अनेक पक्ष झिलमिलाने लगते हैं।
  • Mere Saakshatkaar : Rajendra Yadav
    Rajendra Yadav
    300 249

    Item Code: #KGP-858

    Availability: In stock


  • Jyotipunj Himalaya
    Vishnu Prabhakar
    400 300

    Item Code: #KGP-568

    Availability: In stock

    ज्योतिपुंज हिमालय
    किन्हीं के लिए हिमालय प्रणव की भूमि है, किन्हीं के लिए प्रणय की रम्यस्थली, कोई यहाँ प्रेरणा पाता है तो किसी के लिए यह पलायन का स्थान है। ये सब तो मानव की सीमित कल्पना की सीमा-रेखा के रूप हैं। अपने आप में तो यह मूक तपस्वी सौंदर्य और साधना में कोई अंतर नहीं मानता। इसीलिए किसी भी कारण से हो, सर-सरिताओं, वृक्ष-पादपों, पशु- पक्षियों और औषधियों के समान ही मानव को भी उसने सदा शरण दी है। शरण के वे स्थान आज भी वर्ष में आठ मास तक मानवीय क्रीड़ा से गूँजते रहते हैं। उसकी छोटी-छोटी चोटियों पर तो वर्ष-भर बस्तियाँ बसी रहती हैं, परंतु सर्वोच्च शिखरों पर भी मनुष्य के चरण-चिह्न अंकित हो गए हैं। 
    हिमालय आयु की दृष्टि से संभवतः सबसे तरुण गिरिमाला है, परंतु प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से कदाचित् यह सर्वोच्च पर्वत संसार में सर्वश्रेष्ठ है।
    इसकी विशिष्टता अर्थात् झीलों और नदियों की प्रमुखता, प्राकृतिक वैभव की संपन्नता, अनुपम सुंदरता और सुषमा के कारण ही न केवल भारतवासी, बल्कि दूसरी जातियों के लोग भी इसे देवताओं का आवासगृह मानते रहे हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक में उत्तरकाशी, गंगोत्री, गोमुख और तपोवन की यात्राएँ इसके महत्त्व को और भी बढ़ा देती हैं।
  • Apna Hi Desh (Paperback)
    Madan Kashyap
    90

    Item Code: #KGP-1301

    Availability: In stock

    यह चर्चित कवि मदन कश्यप का पांचवां संग्रह है। मदन कश्यप आम आदमी का शोषण करने वाले और उसे उसके हक़ से दूर करने वाले तंत्र पर कड़ी नज़र रखते हैं और उसे बेनक़ाब करने का कोई मौका नहीं चूकते। बाज़ार उनके निशाने पर है, जिसने बड़ी बारीकी से मनुष्य को उपभोक्ता में बदलने का अभियान चला रखा है। उसने न सिर्फ सत्ता को अपने चंगुल में ले लिया है बल्कि सामाजिक मूल्यों पर भी गहरा आघात किया है। उसकी कोशिश है कि सब कुछ उसी के रंग में रंग जाए ताकि हर कोई बाज़ार के मुताबिक ही सोचे ‘कुछ ऐसा चल निकला रंगों का खेल कि बेरंग ज़िंदगियों को भी बदरंग करने लगे हैं रंगों के सौदागर/अब हमारी आकांक्षा, हमारे संघर्ष, हमारी करुणा पर कालिख नहीं रंग-बिरंगे रंग पोते जाते हैं।’ बाज़ार कई रूपों में, कई स्तरों पर सक्रिय है। वह एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें कोई विचार न हो, संघर्ष की कोई बात न हो। वह तकलीफ को भी एक उत्सव में बदल देना चाहता है। आज का समय ऐसा है कि ‘जिसमें कोई बहस नहीं/केवल गिरोहबंदियां हैं/मतभेदों के लिए कोई जगह नहीं।’ यह स्थिति बाज़ार ने ही पैदा की है। उसने एक ऐसा नवधनाढ्य वर्ग तैयार किया है जिसका शेष समाज से कोई संवाद नहीं है, किसी और के प्रति उसके भीतर कोई संवेदना भी नहीं है। यह तबका ग़रीबों की त्रासदी में भी अपने लिए मनोरंजन ढूंढ़ता है। उसके लिए निठारी की त्रासदी भी महज़ एक सूचना है, सनसनी से भरी हुई। वह उसे तटस्थ होकर एक रियलिटी शो की तरह देखता है--‘दूर खड़े तालियां बजा रहे थे/भूसंपदा की उछाल से/रातोरात खरबपति बन चुके धनपशु/उन्हें भा रहा था यह रियलिटी शो।’ निठारी की तरह देश की असंख्य ग़रीब बच्चियों का दर्द इस वर्ग को दिखाई नहीं देता। इसे बस अपनी तरक्की और मुनाफे से मतलब है। यह नया सौदागर है, ‘इन्हें सखुए के बीज नहीं पूरा जंगल चाहिए/हड़िया के लिए भात नहीं सारा खेत चाहिए।’ यह वर्ग आज देश का नियंता बना हुआ है। हमारा शासक वर्ग सीधे या परोक्ष रूप से इसकी दलाली में लगा हुआ है। वह इसी के हित के लिए आदिवासियों से जंगल और ज़मीन छीनने पर आमादा है और इसके लिए हिंसा तक का सहारा लेता है। पर विडंबना यह है कि यह सब वह लोकतंत्र का मुखौटा लगाकर करता है--‘महोदय! लूट और हिंसा के अलावा/और क्या बचा है आपके लोकतंत्र में/आपने पहाड़ बेच डाले/नदियां बेच डालीं जंगल बेच दिया...आपको जिसने भी वोट दिया देश चलाने के लिए दिया होगा देश बेचने के लिए तो नहीं।’ दुर्भाग्य से पढ़ा-लिखा और अपने को बुद्धिजीवी कहने वाला मध्यवर्ग भी नवधनाढ्य तबके की नकल करता है और उसमें शामिल होना चाहता है हालांकि ऊपर से वह बदलाव और क्रांति की बड़ी-बड़ी बातें करता रहता है। इस पर व्यंग्य करते हुए मदन कश्यप कहते हैं--‘आप क्रांति करना नहीं चाहते/लेकिन क्रांति होते देखना चाहते हैं/आपके बारे में सिर्फ यह तय है/कि कुछ भी तय नहीं है।’ पर इन सबके बावजूद कवि में निराशा नहीं है। उसे जनता की ताक़त पर पूरा भरोसा है क्योंकि वह बड़े-बड़े तानाशाहों को उनकी औकात बता देती है--‘लेकिन यह क्या कि एक जोड़े जूते के उछलते ही/खिसक गयी उसके पांव के नीचे दबी दुनिया/चारों तरपफ से फेंके जाने लगे जूते।’ मदन कश्यप संघर्ष में ही सौंदर्य देखते हैं। वंचितों और पीड़ितों के लिए संघर्ष करती हुई स्त्री उन्हें औरों से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती है। गुजरात के दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्षरत समाजसेवी तीस्ता सीतलवाड़ के लिए वह कहते हैं--‘जब हवा में तनी तुम्हारी मुट्ठी/तुम सबसे ख़ूबसूरत लगी।’ यह निश्चय ही एक अलग सौंदर्यदृष्टि है जो स्त्री की गरिमा को प्रतिष्ठित करती है। उनका दृढ़ विश्वास है कि कोई समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब वह स्त्री को स्वतंत्रता और सम्मान दे। इस संग्रह की प्रायः सभी कविताएं बदलाव की गहरी आकांक्षा से भरी हुई हैं।
    --संजय कुंदन
  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    240 216

    Item Code: #KGP-235

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • Facebook Ke Janak : Mark Zuckerberg
    M.A. Sameer
    240 216

    Item Code: #KGP-7806

    Availability: In stock

    अमरीकी युवा मार्क जुकरबर्ग ने किस प्रकार अपनी विलक्षण प्रतिभा से आधुनिक जगत में लोगों को सरलता से आपस में जुड़ने का अवसर दिया, यह एक अत्यंत रोचक विषय है। प्रस्तुत पुस्तक ‘फेसबुक के जनक: मार्क जुकरबर्ग’ उनके विलक्षण मस्तिष्क के अद्भुत कारनामे को प्रेरक रूप में सामने लाने का प्रयास है। यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठकों के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होगी और उन्हें अनेक रोचक तथ्यों से अवगत भी कराएगी।
  • Meri Ekyavan Kavitayen
    Atal Bihari Vajpayee
    200

    Item Code: #KGP-1849

    Availability: In stock


  • Kharra Aur Anya Kahaniyan
    Subhash Sharma
    460 368

    Item Code: #KGP-9366

    Availability: In stock

    ‘आजादी! वह भी औरतों की! क्या होती है यह आजादी? इसका रंग क्या होता है? बू क्या होती है? स्वाद क्या होता है? काश, एक बार मिल जाती तो मैं उसे छूकर, सूंघकर, चखकर देखती। फिर उसे पकड़कर कलेजे से भींचकर रोती...।’—प्रस्तुत कहानी संग्रह खर्रा और अन्य कहानियां की कहानी ‘कुहुकि कुहुकि जिया जाय’ की इन पंक्तियों में जो प्रश्नाकुलता है, वह बहुत मूल्यवान है। कोई भी रचना यदि सलीके से सवाल उठाने में कामयाब हो जाए तो वह अपने सामाजिक दायित्व की पूर्ति कर लेती है। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की सभी कहानियां समकालीन जीवन के छोटे-छोटे संदर्भों को बड़े परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करती हैं। इन कहानियों के लेखक सुभाष शर्मा यथार्थवादी लेखक हैं। कहानी में कथानक, सामाजिक सरोकार, विवरणधर्मिता और युक्तिसंगत समापन में उनका भरोसा है। यही कारण है कि सुभाष की कहानियां बेहद पठनीय हैं और पाठक की चेतना को झकझोरती हैं।
    इस संग्रह की लगभग सभी कहानियां व्यवस्था और सत्ता के भीतरी सच को बयान करती हैं। अनेक कहानियां शिक्षा तंत्र के तहखानों को रोशनी में लाती हैं। योग्यता, अवसर और दायित्व का उपहास करती स्थितियों व मनोवृत्तियों को पूरी संवेदनशीलता के साथ कहानीकार ने उजागर किया है। इस संग्रह में स्त्री के  संघर्षमय संसार को चित्रित किया गया है। बिना किसी विमर्श के जाल में उलझे हुए लेखक ने स्मरणीय कहानियां लिखी हैं।
    ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि बिना लाउड हुए या बिना प्रचारात्मक हुए सुभाष शर्मा ने वर्तमान राजनीति के बहुलांश चरित्र को कहानियों में उतार दिया है। इस चरित्र को चित्रित करने में लेखक की अर्थगर्भित भाषा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ‘दास्तान-ए-सुबूत’ में लेखक कहता है, ‘पहले कार्यकाल में वह जान गए थे कि खजाना कहां-कहां है। चुनाव, मुकदमा, राजनीतिक षड्यंत्र आदि में जितना खर्च हुआ था, उसकी भरपाई उन्होंने सुपरसोनिक गति से करना शुरू कर दिया।’ ऐसी व्यंजक भाषा में रची गईं ये कहानियां यथार्थ को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ निश्चित रूप से एक पठनीय और उल्लेखनीय कहानी संग्रह है।
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Nagar
    Vishnu Nagar
    150

    Item Code: #KGP-1872

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: विष्णु नागर
    कविता की दुनिया में तीन दशक से भी अधिक सक्रिय विष्णु नागर की प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में आपको उनकी कविताओं में समय के साथ आता बदलाव तो दिखाई देगा ही, यह भी दिखाई देगा कि वह सिर्फ व्यंग्य और विडंबना के कवि नहीं हैं। उनकी कविता में जीवन के अनेक पक्ष हैं, क्योंकि वह जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने का प्रयास करते हैं। वह अपने समय की राजनीति और समाज की विडंबनाओं को भी देखते हैं और जीवन के विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली करुणा, प्रेम, हताशा, विनोद को भी। उनके यहाँ जीवन की आपाधापी में लगे लोगों पर भी कविता है और अपने प्रिय की मृत्यु की एकांतिक वेदना को सहते लोगों पर भी। उनकी कविता से गुजरना छोटी कविता की ताकत से भी गुजरना है जो अपनी पीढ़ी में सबसे ज्यादा उन्होंने लिखी है। उनकी कविता से गुजरना कविता की सहजता को फिर से हासिल करना है। उनकी कविता से गुजरना व्यंग्य और करुणा की ताकत से गुजरना है। उनकी कविता से गुजरना अपने समय की राजनीति से साहसपूर्ण साक्षात्कार करना है। उनकी कविता से गुजरना विभिन्न शिल्पों, अनुभवों, संरचनाओं से गुजरना है और इस अहसास से गुजरना है कि विष्णु नागर सचमुच अपनी तरह के अलग कवि हैं। उनकी कविता को पढ़कर यह नहीं लगता कि यह किसी के अनुकरण या छाया में लिखी गई कविता है। यह मुक्ति के स्वप्न की कविता है, संसार के बदलने की आकांक्षा की कविता है। यह इतनी स्वाभाविक कविता है, जितनी कि हिंदी हमारे लिए है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Govind Mishra
    Govind Mishra
    180 162

    Item Code: #KGP-170

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार गोविन्द मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'जनतंत्र', 'फांस', 'सिर्फ इतनी रोशनी', 'सुनंदो की खोली', 'खुद के खिलाफ', 'युद्ध', 'खाक इतिहास', 'पगला बाबा', 'वरणांजलि' तथा 'मायकल लोबो' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक गोविन्द मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • She (Stories)
    Dixy Gandhi
    425 340

    Item Code: #KGP-783

    Availability: In stock

    A first ever collection of stories centered around Women’s lives in Modern Times
    Society in modern times is changing very fast, and so is changing the situation and role of women in facing and dealing with them. With the expansion of education among them, they are taking things with gusto and intelligence, at times coming out with unexpected results. Their understanding is different, approach is different and what they present is also not only engrossing but also enlightening.
    It is time women wrote with themselves at the centre of happenings and here is perhaps the first such collection of exciting stories by the upcoming author Dixy Gandhi who shows great promise and quality.

  • Shivani Ka Katha Sahitya Yug-Parivesh-Sanskriti Ka Sandarbh
    Sushil Bala
    1100 770

    Item Code: #KGP-743

    Availability: In stock

    कोई भी सक्षम रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से युग-परिवेश-संस्कृति की विभिन्न व विशिष्ट छवियां निर्मित करता है। इन छवियों में उसकी वैचारिकी तथा भावसंपदा समाहित होती है। शिवानी के प्रचुर कथा साहित्य को पढ़ते हुए इस तथ्य का अनुभव शब्द-शब्द में किया जा सकता है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘शिवानी का कथा साहित्य: युग-परिवेश- संस्कृति का संदर्भ’ में सुशील बाला ने अत्यंत लोकप्रिय लेखिका शिवानी के कथा-संदर्भ रेखांकित किए हैं। शिवानी अपनी परिनिष्ठित अभिरुचियों के लिए जानी जाती हैं। विशद वैदुष्य की गरिमा से आलोकित उनकी रचना-शैली एक अलग मार्ग का अन्वेषण करती रही। वे भारतीयता को समझकर उसे व्यापक मानवता के हित में व्याख्यायित करती रहीं। सुशील बाला ने पुस्तक की भूमिका में उचित ही लिखा है कि ‘वे क्षेत्रवाद, प्रांतवाद, जातिवाद, भाषावाद, सांप्रदायिकता जैसी देश को खंडित करने वाली नकारात्मक वृत्तियों का प्रबल विरोध कर सौहार्दपूर्ण वातावरण को उद्घाटित करती हैं।’ यह सच है कि शिवानी के कथा साहित्य में मानव मनोविज्ञान की उपस्थिति का विश्लेषण करते हुए उसमें सकारात्मक सोच के अनेक आयाम तलाशे जा सकते हैं। 
    चैदह अध्यायों में विभाजित प्रस्तुत पुस्तक में लेखिका ने व्यवस्थित ढंग से शिवानी के व्यक्तित्व के नियामक तत्त्वों को रेखांकित करते हुए उनके रचना-परिवेश को उद्घाटित किया है। इसके पश्चात् उन्होंने शिवानी के कथा साहित्य (कहानी व उपन्यास) में पारिवारिक स्थिति, सामाजिक चेतना, नारी की स्थिति, राजनीतिक परिदृश्य, आर्थिक पक्ष, धर्मिक मान्यताएं और जीवन-दृष्टि, नैतिक मान्यताएं, कला साहित्य और ज्ञान-विज्ञान, प्राकृतिक परिवेश एवं भाषा का आलोचनात्मक अनुसंधन किया है। सुशील बाला के पास उपयुक्त भाषा है, जिस कारण पाठक तक उनका मंतव्य पहुंच जाता है। यह पुस्तक शिवानी पर केंद्रित आलोचनात्मक लेखन की नई संभावनाएं खोलती है। आज जब नए-नए संदर्भों में साहित्य का मूल्यांकन किया जा रहा है तब इस पुस्तक का विशेष महत्त्व है। यह निश्चित रूप से एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Kash, Pankh Hamaare Hote
    Priya Sharma
    220 209

    Item Code: #KGP-9338

    Availability: In stock

    डाॅ. प्रिया शर्मा की ये कविताएँ बच्चों के सरल चित्त पर समय की चेतावनियाँ लाल-हरे रंग में झिलमिलाती चलने वाली हँसती-बोलती सी कविताएँ हैं। ‘फास्ट फूड’ या ‘ब्यूटी पार्लर’ या ‘कविताएँ न पढ़ने की प्रवृत्ति’ बाल जगत् में भी प्रवेश पा गए हैं। एक से एक रोचक विज्ञापन मायानगर के ऐयार की तरह टीवी पर आते हैं और फास्ट फूड,  शृंगार प्रसाध्न आदि के प्रति बाल-मन में भी ऐसा आकर्षण भर देते हैं कि घर का पौष्टिक और संतुलित आहार उन्हें अखाद्य लगने लगता है और नहाया-धोया, सादा-सा चेहरा भी ‘ब्यूटी पार्लर’ का प्रत्याशी! गुड़ियानुमा वे ही मम्मियाँ अच्छी लगने लगती हैं जो ‘सुपर बायर्स’ हों-महाखरीदार-रंगीन पैकेटों में जहर खरीदकर घर लाने वाले। परीकथा के जंगलों में भी उन्हें ‘ब्यूटी पार्लर’ चाहिए।
    आंतरिक सौंदर्य, शांति, सौहार्द और प्रेम से भरे सहकारितामूलक जीवन की प्रेरणा सहज ही मन में जगाने वाले ये बालगीत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं कि पर्यावरण की चुनौतियों का सामना करते हुए पशु-पक्षी और वनस्पति जगत् से तादात्म्य रखने की उमंग ये मन में भरते हैं। पशु-पक्षी, वनस्पति और बच्चे-ये ही युद्ध और आतंक की छाया में पल रहे इस अतिशय भौतिक युद्ध का सच्चा वैकल्पिक प्रतिपक्ष रचेंगे इन कविताओं के दम से। 
    -अनामिका
  • Rang Aakash Mein Shabd
    Narendra Mohan
    1500 1200

    Item Code: #KGP-674

    Availability: In stock

    रंग आकाश में शब्द नरेन्द्र मोहन और शामा की एक ऐसी अपूर्व संस्कृति है जिसमें रंग और शब्द, चित्र और कविता परस्पर जुडे होते हुए भी अपना एक मौलिक उत्कर्ष रचते है । यहीं एक साथ कई सौंदर्य-छवियां, रंग-रेखाएँ और शब्द प्रकाशमान हैं। हिंदी में, भारतीय कविता में इसे अपनी तरह का पहला और अनूठा प्रयोग माना जा सकता है ।
    कविता और चित्र यहाँ विंब-प्रतिबिंब रूप ने आमने-सामने नहीं हैं, साथ-साथ हैं । उनमें अनुपात बैठाना या अर्थों-आशयों की समांतरता दूँढ़ना दोनों कलाओं को कमतर आँकना होगा, हालाँकि दोनों ने छिपे रचना-सूत्रों की खोज की जा सकती है । दरअसल, कविता और कला संबंधी यह एक बिलकूल नई तरह का अंतरावलंबन है । चित्रों  के रंग-संकेत, छवियां और छायाएँ यहाँ कविता के अंतरंग का हिस्सा बनी हैं।
    चित्र के संवेदन धरातलों और सौंदर्य-रूपों को, अमूर्तन में लिपटी हुई रंग-रेखाओं के शिल्प को अपनी संवेदना में ढाल कवि ने यहाँ अपनी कल्पना शक्ति से कविता के शब्द में रचा है। चित्रों की रंग-गतियों में प्राकृतिक बिंबो और दृश्यावलियों में झाँकने की चित्रकार की ललक को, रंगों की कंपकंपाहट और थरथराहट को, दौड़ते भागते रंगों में लिपटी उदासी, पीड़ा, खामोशी और खोए हुए वजूद को कवि ने कविता की लय, बिंब-विधान और संरचना का हिस्सा बना दिया है । चित्रों के रंग कवि को अँधेरे ने लपटों की तरह उठते दिखे हैं । ऐसा भी लगा जैसे अँधेरे का एक उफनता समुद्र हो जिसकी उत्ताल तरंगें आग से दीप्त हों। ऐसे ही किसी क्षण में उसे महसूस हुआ :
    रंगों के पीछे आग है
    और रेखाएँ चुप नहीं है


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan (Paperback)
    Usha Kiran Khan
    140

    Item Code: #KGP-504

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उषाकिरण खान
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pranidhini Kahaniyan : S.R. Harnot
    S. R. Harnot
    280 238

    Item Code: #KGP-9333

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Gauri
    Ajeet Kaur
    125

    Item Code: #KGP-2050

    Availability: In stock

    गौरी धीरे-धीरे उठी। चावलों वाले कोठार के एकदम नीचे हाथ मारा और टोहकर एक छोटी-सी पोटली बाहर निकाल ली। धीरे-धीरे उसे मैले-से चिथड़े की गाँठें खोलीं। बीच में से दो बालियाद्द निकालीं, जिनमें एक-एक सुर्ख मोती लटक रहा था।
    उसने बालियाँ काँसे की एक रकाबी में रखकर चूल्हे पर रख दीं। जो भी सुबह रसोई का दरवाजा खोलेगा, उसे सबसे पहले वही दिखेंगी और उससे कहेंगी, ‘इस घर में से एक ही चीज मुझे मिली थी, तुझे पैदा करने का इनाम। तूने उस जन्म को अस्वीकार कर दिया है। तूने उसी कोख को गाली दी है, जिसने तुझे अपने सुरक्षित घेरे में लपेटकर और अपना लहू पिलाकर जीवन दिया। ले ये बालियाँ। ये मैं तुझे देती हूँ। ये गाली हैं, मेरे जन्म पर, तेरे जीवन पर। गाली भी और बद्दुआ भी। ले ले इन्हें, बेचकर दारू पी लेना। मेरे बाप को दे दिए। मुफ्त में दान में। ले मेरा दान और मेरी बद्दुआ, जो पृथ्वी के हर कोने तक तेरा पीछा करेगी।’
    गौरी ने अपनी छोटी-सी कपड़ों की पोटली भी चूल्हे के पास रख दी और बाहर निकल आई।
    पिछले आँगन का दरवाजा खोला और गली में बाहर निकल आईं।
    -इसी उपन्यास से
  • Dr. Siddharth
    Kavita Surabhi
    260 221

    Item Code: #KGP-1950

    Availability: In stock

    डॉ० सिद्धार्थ
    'डॉ० सिद्धार्थ' लेखिका का पहला उपन्यास है। उनकी दृढ मान्यता है कि जहाँ समाज में विडंबनाएं, विसंगतियां, अपराध, पीडा, विकृतियाँ और भोगवादी  राक्षसी अपसंस्कृति है, वहीं डॉ० सिद्धार्थ जैसी निर्मापाधर्मा शक्तियां भी हैं। सच्चे, निर्मल और सात्यिक जीवन में बहुत आकर्षण है; किंतु उसे अंगीकार करने का मूल्य असाधारण है । अत: एक शाश्वत प्रश्न हमारे सामने है कि क्या कोई व्यक्ति धर्म की राह पर चलकर भी सामाजिक दृष्टि से सफल हो सकता है ?
    शिष्या  के रूप से दामिनी, अपने गुरु के स्नेह का सुख पाती हे। समय के साथ डॉ० सिद्धार्थ की बौद्धिकता, उसकी प्रतिभा को ही नहीं, उसकी आत्मा को भी सँवारती है । वह समझ पाती है कि चमक और दिव्यता में अंतर होता है । लौकिक सफलताओं की चमक हमारी आँखों को चौंधियाती है और आत्मिक विकास हमें दिव्यता से भर देता है। अध्यापक की बुद्धि से उच्च है उसका विवेक, और विवेक से उच्चतर  है उसका आचरण । आचार्य वही है, जो आचरण को शुद्ध ही नहीं दिव्य भी कर दे । डॉ. सिद्धार्थ का चरित्र इन सिद्धांतों का मूर्तिमंत रूप है ।
  • Desh-Videsh Ki Lokkathayen
    Vishv Nath Gupta
    250 225

    Item Code: #KGP-122

    Availability: In stock

    पाठकों से
    प्रस्तुत पुस्तक में दुनिया के देशों की लोककथाएँ संगृहीत हैं । पुस्तक अत्यंत उपयोगी है-केवल बच्चों के लिए ही नहीं बल्कि बड़ों के लिए भी ।
    लोककथाओं की रचना कोई व्यक्ति नहीं करता बल्कि तत्संबंधी देश की धरती से जुडे हुए रीति-रिवाज, सामाजिक- आर्थिक व्यवस्थाएं और वहां के लोगों का चिंतन करता है । लोककथाएँ शनै:-शनै: विकसित होती हैं-गढ़ी जाती हैं ।
    अगर ध्यान से पढा जाए तो एक लोककथा में उसका पूरा देश और समाज बोलता है ।
    इन तमाम दृष्टियों से प्रस्तुत लोककथा-संग्रह एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है ।
    -विश्वनाय गुप्त
  • Sant Kavi Dadu
    Baldev Vanshi
    220

    Item Code: #KGP-100

    Availability: In stock

    संत कवि दादू
    श्री दादूजी महाराज की वाणी काव्यमयी है । अतः  महाराज की वाणी काव्य है । श्री दादूजी महाराज और कबीर जी में प्रकृति भेद के कारण दोनों के व्यक्तित्व में स्वभावत: भेद आ गया है । वैसे उनके विचारों और सिद्धांतों में कोई भेद नहीं है । दोनों ही संत ज्ञानश्रयी  धारा के अग्रणी संत हैं । दोनों का मार्ग भक्तिमार्ग है । दोनों में ही जहाँ हिंदू और मुसलमानी मजहबों की आलोचना की है वहीं दोनों ने भारतीय दार्शनिकों और भक्तों के विचारों को स्वीकार किया है ।
    हम पहले ही कह चुके है कि यद्यपि श्री महाराज ने अपनी वाणी में बार-बार भक्तों और संतों के नामों का आदरपूर्वक संस्मरण किया है, उनकी वाणी में गोरखनाथ, नामदेव, कबीर, पीपा, रैदास आदि के नाम बार-बार आए हैं, किंतु उनकी श्रद्धा कबीर में अधिक है :
    साँचा शब्द कबीर का, मीठा लागे मोय । 
    दादू सुनताँ परम सुख, केता आनंद होय ।
  • Kathin Samay Mein
    Ramesh Chandra Shah
    300 270

    Item Code: #KGP-9383

    Availability: In stock

    हिंदी की वरिष्ठतम पीढ़ी के अनूठे रचनाकार रमेशचन्द्र शाह की डायरी पढ़ना एक विशेष अनुभव से गुजरना है। डायरी लेखन की इनकी प्रथम कृति ‘अकेला मेला’ के पाठक जानते हैं कि इसमें 1981 से 1985 तक की अवधि के अनुभवों का संसार शामिल था। इस विधा की शाह जी की दूसरी कृति ‘इस खिड़की से’ 1986 से 2004 तक का उनका संसार समाहित किए हुए थी। डायरी की तीसरी कृति का शीर्षक है ‘आज और अभी’। इसका फलक 2004 से 2009 तक फैला हुआ है। अंतःप्रक्रियाओं का यह क्रम चैथी डायरी कृति ‘जंगल जुही’ में 2013 तक का कालखंड आबद्ध करता है। इस कृति में रमेशचन्द्र शाह रामप्पा, ऋषियों की घाटी, यादगिरिगुट्टा और भोंगीर का किला, नागार्जुनकोंडा, हम्पी आदि की यात्राओं वेफ बहाने एक अद्भुत संसार से अंतरंग परिचय कराते हैं। इस तरह कि देखना, सुनना, स्पर्श करना, सूंघना और आस्वाद वेफ साथ आत्मसात् करना एक रचना की विधा ही बन जाए। अकारण नहीं कि इस कोलाजमय डायरी में प्राग का यात्रा-प्रसंग भी आ जुड़ा था। यहाँ एक नाट्य वृत्तांत इसका आधर बना।
    पाठकों द्वारा सराही गई और आलोचकों द्वारा बहुप्रशंसित इन डायरी कृतियों का नव्यतम पड़ाव है ‘कठिन समय में’। यहाँ 15 सितंबर, 2009 में जयपुर से प्रारंभ हुई बाह्य व अंतर्यात्रा अंततः 23 फरवरी, 2017 को भोपाल के हिंदी भवन में हुए शरद व्याख्यान तक चली आई है। पाठक यहाँ भी वही रस, प्रवाह, गहराई और अंतरंगता अनुभव करेंगे।
    शाह जी की मान्यता इस विधा पर सटीक है—‘डायरी ऐसी विधा है जिस पर परनिर्भरता लागू नहीं होती।’ वह इसे दैनंदिन घटनाओं, चरित्रों और यात्रा-प्रसंगों के लिए सही जगह मानते हैं। यहाँ आत्मसंवाद भी है और संवाद भी, किंतु एक बहुपठित, निश्छल साहित्यिक, रसिक और खोजी व्यक्ति उसमें इस तरह संलग्न रहता है कि पढ़ने वाले की समझ का आकाश और विस्तृत हो जाता है। कारण यह कि रमेशचन्द्र शाह, वस्तुतः व्यक्ति को नहीं, उसे उसकी पूरी परंपरा में देखना पसंद करते हैं। यही कारण है कि उन्हें सीमन्तनी को देख रांगेय राघव और उनकी स्फूर्ति याद हो आती है। ‘आइडेंटिफिकेशन आॅफ वुमेन’ जैसी फिल्म देखकर वह इस महाप्रश्न से जूझते हैं कि नायक को आखिर चाहिए क्या था?
    उनका संवाद समय के अपने सरीखे शिखर व्यक्तियों से चलता रहता है। वह किताबों पर टिप्पणियाँ करते हैं, तो ऐसे कि पाठक उन्हें पढ़ने की कुंजी ही पा जाएँ। जैसे श्री अरविंद वेफ ‘लाइफ डिवाइन’ और प्लेटो के ‘दि रिपब्लिक’ पर एक साथ विचार करते हुए वह अतिमानस के अवतरण की चर्चा करते हैं। सच बात तो यह है कि रमेशचन्द्र शाह की इस पाँचवीं डायरी कृति में विश्व वेफ आधुनातन व पुरातन सभी कला-क्षेत्र सहजता से आ जाते हैं। पढ़ते-पढ़ते आप समझ जाएँगे कि यह रचनाकार अपने शेष समय को ‘ही हैज रिटन द बुक आॅफ हिज लाइफ’ सरीखे रचनात्मक काम में ‘आत्मा’ नाम की असलियत का पता लगाते हुए व्यतीत करना चाहते हैं। कहना आवश्यक है कि शाह जी की यह डायरी कृति हिंदी साहित्य को अपनी तरह से समृद्ध करती है।
  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-5)
    Shyam Singh Shashi
    600 450

    Item Code: #KGP-892

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chitra Mudgal (Paperback)
    Chitra Mudgal
    120

    Item Code: #KGP-7005

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : चित्रा मुद्गल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चित्रा मुद्गल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'गेंद', 'लेन', 'जिनावर', 'जगदंबा बाबू गांव आ रहे हैं', 'भूख', 'प्रेतयोनि', 'बलि', 'दशरथ का वनवास', 'केंचुल' तथा 'बाघ'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चित्रा मुद्गल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ballabh Dobhal (Paperback)
    Ballabh Dobhal
    90

    Item Code: #KGP-1460

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : बल्लभ डोभाल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बल्लभ डोभाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उतरा हुआ', 'जय जगदीश हरे', 'चुनाव चक्रम्', 'काठ की टेबुल', 'दूर का दर्शन', 'दर्द अपनेपन का', 'तन का देश : मन का देश', 'खेड़ा गांव', 'बुलडोजर' तथा 'समाधान'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बल्लभ डोभाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Nikka Nimana
    Sushil Kalra
    400 320

    Item Code: #KGP-550

    Availability: In stock

    ...आजादी के पैरोकार जो जमीन तैयार कर रहे थे उसकी उपजनिक्का निमाणा' के अतिरिक्त और हो ही क्या सकती थी। तिरस्कृत, लांछित, अपमानित चरित्र-एक ऐसा चरित्र जो भ्रष्ट आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक प्रक्रिया का कुल योग है।

    पंजाब का पिण्ड घोपलू उन लाखों गांवों में से एक है जो चीख रहे हैं-हमें पानी दो। खाद दो। बीज और बिजली दो। शिक्षा और संस्कार दो। भूरी, नंबर, मद्दी, वड्डी मां, निक्काया, मेंहदीरत्तो, चाचे कृष्णा, कहां नहीं हैं? भरे पड़े हैं सारे देश में संसद की जड़ों में खाद बनकर जी रहे हैं।

    दरियाई घोड़े की तरह मुंह फाड़े राजतंत्र, देह और दौलत की घोर अमानवीय अराजक परिणति के अतिरिक्त और कुछ नहीं। मूल्य ह्रास, नैतिक पतन, नारकीय जीवन को गांधी टोपी के नीचे छिपाए, जनता को लगातार रौंदता

    और भटकाता सत्ताधारी वर्ग औरत, शराब और पैसे की त्रिवेणी में सदा सर्वदा पवित्र है! जो इस कला में जितना पारंगत है, उतना ही ऊंचा पद, सत्ता में, उसके लिए सुरक्षित है। निक्का इसी गंगा का शालिग्राम है। लेकिन इस प्रतियोगिता में निक्का एक हद तक ही विजयी होता है। धीरे-धीरे डोर उसके हाथ से छूटती जाती है। वह महज एक मोहरा रह जाता है। उभरता है फिर एक अत्यंत क्रूर, अमानवीय, स्वार्थाध शासक वर्ग। लेकिन साथ-साथ ही एक नियामिका शक्ति भी उभरती है-जनता।

    यथार्थ की तहों तक पहुंचतासृजनात्मक प्रवहमान भाषा का माध्यम और सुस्पष्ट दृष्टि का प्रमाण देने वाला यह उपन्यास निश्चित ही अपने समय का दस्तावेज लगता है।    

  • Narsi Mehta
    Hari Krishna Devsare
    150

    Item Code: #KGP-9291

    Availability: In stock

    नरसी मेहता अपने समय के एक परम भागवत गृहस्थ संत थे। गुजरात की पवित्र भूमि का यह परम सौभाग्य था कि वहां ऐसे भगवान् के प्रेमी संत ने जन्म लिया। उनकी भगवत्भक्ति ने सिर्फ गुजरात ही नहीं, अपितु समस्त भारत को प्रभावित किया। महात्मा गांधी को नरसी मेहता का निम्न पद बहुत प्रिय था, क्योंकि इसमें वैष्णव होने की जो व्याख्या की गई है, वह मानव-प्रेम का सच्चा संदेश देती है। आज लोग नरसी मेहता के इस पद से बहुत परिचित हैं-
    वैष्णवजन तो तेने कहिए, जे पीड पराई जाणे रे,
    पर दुःखे उपकार करे तोय, मन अभिमान न आणे रे।
    सकल लोक मां सहुन वंदे, निंदा न करे केनी रे,
    वाच काछ मन निश्चल राखे, धन धन जननी तेनी रे।
    समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, पर स्त्री जेने मात रे,
    जिव्हा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे।
    मोहमाया व्यापे नहिं जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मन मां रे,
    राम नाम शंुताली लागी, सकल तीरथ तेना मन मां रे।
    वण लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निवार्या रे,
    भणे ‘नरसैयो’ तेनुं दरसन करतां, कुल इकोतेरे तर्या रे।
  • Baadalon Mein Barood
    Madhu Kankria
    300 249

    Item Code: #KGP-474

    Availability: In stock

    हिंदी में यात्रा-वृत्तांत लिखने की उल्लेखनीय परंपरा रही है। कथाकार मधु कांकरिया ने ‘बादलों में बारूद’ के द्वारा इस परंपरा को एक सार्थक समकालीनता प्रदान की है। यह कहना मुनासिब होगा कि अपने को खोजते हुए लेखिका ने भूगोल, इतिहास, संस्कृति, पुरातत्त्व, आदिजीवन, पुरातन प्रकृति, अलक्षित लोकमन और अदम्य अस्तित्व के कई कोने-अंतरे झांक लिए हैं। मधु कांकरिया ने परिवर्तन की पदचाप भी सुनी है। उन्होंने ‘अभावों के लोकतंत्र’ को भी देखा है और इस प्रक्रिया में जो वृत्तांत रचा है वह इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर जीवंत है। 
    लोहरदगा और गुमला के आदिवासी अंचल, धरधरी की चढ़ाई और पलामू, यूमथांग और हिमालय-प्रांतर, नेपाल, शिलांग, सुंदरवन और सजनारवाली टापू, चेन्नई, लद्दाख और पैनगोंग, कालडी--इन जगहों पर घूमते हुए मधु कांकरिया ने अनुभवों का एक ख़ज़ाना एकत्रा किया है। अपने अनुभवों को पारदर्शी बनाकर बेहद रचनात्मक भाषा में उन्होंने पाठकों तक पहुंचाया है। इस यायावरी में कहीं कोई पूर्वाग्रह नहीं है। यथार्थ को उसके अधिकाधिक आयामों में देखने, परखने व सहेजने की ईमानदार कोशिश है।
    लेखिका ने रूप और विरूप दोनों को देखा है; शब्दांकित किया है। यात्रा करते हुए ज़रूरी विमर्शों पर ठहरकर उन्होंने ‘सभ्यताओं’ के सच पर भी रोशनी डाली है। असम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश जैसी जगहों पर कई तरह की नाइंसाफियां देखकर वे लिखती हैं, ‘सभ्यता की इन महायात्राओं की नींव में हमारी उदासियां भरी हुई हैं। हर सभ्यता वहां के मूल निवासियों...वहां के आदिवासियों को कुरूप बनाकर ही इतना आगे बढ़ी है। आज हम जाग रहे हैं और चाहते हैं ऐसी व्यवस्था कि इतिहास के वे काले पृष्ठ फिर दोबारा न खुलें।’ इस पुस्तक की ऐसी अनेक विशेषताएं इसे अन्य यात्रा-वृत्तांतों में विशेष बनाती हैं।
  • Bantadhar
    Nisha Bhargva
    150

    Item Code: #KGP-1804

    Availability: In stock

    निशा भार्गव की कविताएँ गहरे मानवीय सरोकारों का प्रतिनिधित्व करती हैं । गम्भीरता से, सपाट भाव से किसी बात या संदेश को व्यक्त कर देना शायद हमें आसान लगे लेकिन हास्य-व्यंग्य के माध्यम से 'सर्व' को अभिव्यक्ति 'स्व' से आसान नहीं । यहीं निशा भार्गव अपनी कविताओं की भाषा-शैली और प्रवृति से भीड में अपना अलग स्थान बनाती हैं । उनकी अपनी खास शैली है जो अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ती । छंदमुक्त, इन कविताओं में एक प्रवाह होता है, गीत जैसी लयात्मकता होती है। यथा -
    "सड़क पर चक्का जाम हो गया
    ये अंजाम बहुत आम हो गया
    मीडिया भगवान हो गया
    देश का कर्णधार हो गया ।" 
    निशा भार्गव की कविताएँ सामाजिक मुददों को जीवंतता से उठाती हैं, समाधान ढूंढती हैं, व्यवस्था पर प्रहार करती हैं, लाचारी पर हँसती हैं, समाधान का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं । यथा -
    "मँहगाई ने सबका दिल तोडा
    घर-घर का बजट मरोड़ा
    फिर सबको दी सीख
    छोडो ये शिकायत ये खीझ
    समस्या का समाधान करना सीखो
    बिन बात यूँ ही मत खीझो ।"
    इसी तरह 'बंटाधार' कविता वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्थाओं पर जमकर प्रहार करती है । 'बंटाधार' ही क्यों संग्रह को अन्य कविताओं में भी अलग-अलग प्रसंग हैं, व्यंग्य की अनूठी छटा हैं । ये कविताएँ मन को लम्बे समय तक गुदगुदाने के साथ-साथ कुछ सोचने पर भी बाध्य करती हैं ।
    —डा. अमर नाथ 'अमर'
  • Mere Saakshatkaar : Nagarjun
    Nagaarjun
    300 249

    Item Code: #KGP-15

    Availability: In stock


  • Doosara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    100

    Item Code: #KGP-1203

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Sansar Ke Prasiddha Vyaktiyon Ke Prem-Patra (Paperback)
    Virendra Kumar Gupt
    350 298

    Item Code: #KGP-1424

    Availability: In stock

    स्त्रियों-पुरुषों के हृदयों में एक-दूसरे के प्रति उठते-बैठते ज्वारभाटों की सबसे सच्ची, ईमानदारी शाब्दिक अभिव्यक्ति प्रेम पत्रों में ही हो पाई है । इसका कारण स्पष्ट है । जब भी व्यक्ति ने, स्त्री या पुरुष ने प्रेम-पत्र लिखा है, वह अनायास ही धन-पद-विद्वत्ता या सामाजिक प्रतिष्ठा की ऊंचाइयों से नीचे उतर आया है और स्त्रीत्व-पुरुषत्व की यथार्थ धरती पर खड़े होकर ही उसने अपने प्रेमी या प्रेमिका को संबोधित किया है । तब शरीर की सभी साज-सज्जाएं और चेहरे के सभी मुख़ौटे उतर जाते हैं और धड़कता हृदय ही सामने होता है । इस स्तर पर लिंकन, बायरन, क्रामवेल, नेपोलियन, विस्मार्क,शॉ और गांधी एक ही सुर में बोलते दिखाई पड़ते हैं ।
  • Bhaykaal
    Ashok Gupta
    200 180

    Item Code: #KGP-483

    Availability: In stock

    अशोक गुप्ता का उपन्यास ‘भयकाल’ मूलतः सामाजिक उपन्यास है। कथाविन्यास को देखें तो यह मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणात्मक है। मनुष्य अपने संस्कार और रुचियों में ऐसी ग्रंथियां पाल लेता है कि वह अपने प्रिय परिवारजनों, यहां तक कि अपने वंशजों से भी भयाक्रांत रहता है और निरंतर अपनी दुर्गति की कल्पना से व्यथित रहता है। अशोक गुप्ता ने उपन्यास के एक चरित्र मिलकीत तनेजा के माध्यम से इस मनोवैज्ञानिक ग्रंथि के वैयक्तिक और पारिवारिक परिणाम का चित्रण किया है।
    दूसरी ओर, जानकी बल्लभ और भानुमती (भानुमती के कई नाम हैं। ये नाम परिस्थितियों और उसके चरित्र के घात-प्रतिघात से उसे मिल गए हैं। उसका एक नाम ‘करिया छबीली’ भी है) के साहसिक और संघर्षमय जीवन कथा के माध्यम से स्वातंत्र्योत्तर भारत के मानवीय और प्रगतिशील बदलाव या विकास का भी चित्रण किया गया है। दोनों प्रकार की कथाएं समांतर शैली में साथ-साथ चलती हैं। पात्र परस्पर टकराते भी हैं। इससे कथा रस का आस्वाद पाठकों को मिलता है और मोनोटोनी नहीं आने पाती है।
    गांवों में गैरजिम्मेदार और बिगड़ैल किशोर किस तरह के कुकृत्य करते हैं और कमजोर तबके के लोगों को सताते हैं इसका मार्मिक और मनोरंजक (भी) वर्णन है। समाज में बुरे लोग हैं तो अहेतु की सहायता करने वाले भी हैं।
    मुझे इस कथाकृति में यह बात विशेष रूप से अच्छी लगी कि आज जब हताशा और दिशाहारा प्रवृत्तियां हमारे साहित्य में आसन जमाए बैठी हैं, अशोक गुप्ता की यह रचना सामाजिक यथार्थ के आधार पर, रचनात्मकता से स्तर पर बने रहते हुए, प्रगतिशीलता और विकास की कथा कहती है।
    उपन्यास की भाषा और संवाद अपनी ताजगी से पढ़ने वालों और विचारकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। अशोक गुप्ता मूलतः कहानीकार हैं और यह कृति उपन्यास होने के साथ बिखराव के बावजूद कहानी का भी रस देती है।
  • Kasbe Ka Aadmi
    Kamleshwar
    180 162

    Item Code: #KGP1560

    Availability: In stock

    ‘नयी कहानी’ आंदोलन ने हिंदी साहित्य को जो बड़े रचनाकार दिए उनमें कमलेश्वर का नाम प्रमुख है। इस आंदोलन ने सहसा एक नई पीढ़ी की ऊर्जावान, क्षमताशील और नवताप्रिय रचनाशीलता को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया। इसके प्रमुख रचनाकार व सिद्धांत-शिल्पी के रूप में कमलेश्वर का ऐतिहासिक योगदान सर्वस्वीकार्य है। कमलेश्वर ने अपनी कहानियों में किस्सागोई और आधुनिक जीवनदृष्टि का ऐसा सहमेल किया कि एक व्यापक पाठक वर्ग में उनको आदर प्राप्त हुआ। स्थानीयता के प्रति उनमें सहज प्रीति थी। इसलिए जब उन्हें और उनके समकालीन कुछ कहानीकारों को ‘कस्बे का कहानीकार’ कहा गया तो उन्हें कुछ खास एतराज न हुआ। कमलेश्वर तो बस सामान्य जनजीवन के कुछ अनछुए सत्य अपनी कहानियों में प्रकट करना चाहते थे।
    ‘कस्बे का आदमी’ कमलेश्वर की उन कहानियों का संग्रह है जिन्होंने उनके कहानीकार के सरोकार विस्तृत किए। एक सुसंपादित शिल्प, भाषा, संवाद, विवरण आदि के साथ सामने आई रचनाओं में नए युग का तेज था। कमलेश्वर जनसमुद्र में उठने-गिरने वाली लहरों पर लिखी इच्छाओं, हताशाओं, स्वप्नावलियों और कोशिशों को बखूबी पहचानते थे। वे परंपरा भंजक भी थे और नवीन प्रस्तावों के प्रेरक भी। यही कारण है कि प्रस्तुत संग्रह में शामिल कहानियां जीवन का नया आस्वाद देती हैं। हालांकि जीवन जाना-पहचाना है लेकिन जिस कोण से लेखक ने इसे देखा-परखा वह चैंकाता है। कहानियों में जीवन संवाद करता है। एक कहानी के वाक्य हैं, ‘व्यक्ति इत्र छिड़ककर फूल सूंघता हुआ इन फटेहालों के बीच से निरपेक्ष होकर गुजर सकता है, आदमी नहीं। व्यक्ति सुरक्षा चाहता है, आदमी स्वतंत्रता चाहता है। सुरक्षा और स्वतंत्रता में बड़ा अंतर है।’ यह संग्रह ‘नयी कहानी’ की आंदोलनधर्मी सक्रियताओं से उत्पन्न चेतना से ओतप्रोत है। कमलेश्वर की जादुई भाषा जैसे इनमें बोलती है। अपने समय के तमाम उद्वेलनों को व्यक्त करता एक महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Akhilesh
    Sushil Sidharth
    500 375

    Item Code: #KGP-9217

    Availability: In stock

    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है वे हैं-चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, शृंखला तथा अँधेरा । 
  • Aise Hamaare Harda
    Pradeep Pant
    350 280

    Item Code: #KGP-587

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Africa (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7202

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. African short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Two Skin Woman, Slave Girl, South Winds, Apprentice, Allah’s Will, Green Leaves, this book is a compilation of 20 famous African short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Africa.
  • Dharmik Kathayen
    Jagat Ram Arya
    175

    Item Code: #KGP-108

    Availability: In stock

    धार्मिक कथाएं

    एक दन ब्राह्मण ने मार्ग पर चलते हुए एक हीरा, जिसकी कीमत एक लाख थी, पड़ा आया। वह साधारण रूप से ही हरे को लिए हुए जा रहा था कि उधर आगे की ओर से एक जौहरी जगह-जगह भूमि को देखता हुआ आ रहा था और विशेष व्याकुल था। इतने में ब्राह्मण ने उसे व्याकुल देखकर कहा कि जौहरी भाई, तू व्याकुल क्यों है? देख, एक हीरा हमने पाया है। तेरा हो तो तू ले ले। यह कहकर जौहरी को हीरा दे दिया। अब जौहरी कहने लगा कि मेरे तो दो हीरे थे, इसलिए एक तो तूने दे दिया, दूसरा भी दे दे, तब मैं तुझे छोड़ूंगा। उस जौहरी ने ब्राह्मण को पुलिस के हवाले कर अपना मुकदमा अदालत में दे दिया। वहां अफसर ने उस ब्राह्मण से पूछा कि कहो भाई, क्या मामला है? उसने कहा कि मैं मार्ग में आ रहा था कि मुझे एक हीरा पड़ा मिला। मैं साधारण रूप से जा रहा था तभी उधर से यह कुछ ढूंढ़ता हुआ व्याकुल सा आ रहा था। मैंने इससे पूछा, क्या हे? तब इसने कहा कि मेरा एक हीरा खो गया है। मैंने वह हीरा इसे देकर कहा कि देखो, यह एक हीरा मैंने पाया है। यदि तुम्हारा हो तो ले लो। तब इसने ले लिया और अब यह कहता है कि मेरे तो दो हीरे थे। पुनः अफसर ने सेठ जी से पूछा। तब सेठ जी बोले कि मेरे तो दो हीरे थे जो मार्ग में गिर पड़े थे। उनमें से एक तो इसने दे दिया, पर एक नहीं देता है। अफसर ने समझाया कि यह ब्राह्मण यदि अपने ईमान का पक्का न होता, तो इतना दीन होते हुए एक भी क्यांे देता? अतः यह फैसला किया कि वह हीरा ब्राह्मण को दे दिया जाए। वह जौहरी का नहीं, क्योंकि इसके तो दो हीरे एक साथ गिरे थे, सो इसके कहीं और होंगे। तब तो सेठ बोले कि सरकार, तो मुझे एक ही दिला दिया जाए। तब अफसर ने कहा कि अब तुमहो नहीं मिल सकता।
    —इस संग्रह की ‘सत्यमेव जयते’ कथा
  • Bhartiya Bhaashaaon Ki Shreshtha Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    260 221

    Item Code: #KGP-73

    Availability: In stock

    भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कहानियां 
    प्रस्तुत संकलन में भारत की सोलह प्रमुख भाषाओं की सोलह प्रतिनिधि कहानियां समाविष्ट की गई हैं । कश्मीर से कन्याकुमारी तक का परिवेश किसी हद तक इनमें प्रतिबिंबित हुआ है । ये कहानियां हमें मात्र छूती-छेड़ती ही नहीं, बल्कि हँसाती, गुदगुदाती और कहीं-कहीं रुलाती भी हैं । साथ ही बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करती हैं ।
    इनमें भारत के स्थूल स्वरूप का प्रतिबिंबन ही नहीँ, भारत की अंतश्वेतना का स्पंदन भी मिलेगा और भारत की माटी की गंध भी ।
    क्या है भारत ? क्या है उसकी अस्मिता की पहचान ? क्या हैं उसकी खूबियाँ ? खूबियों के साथ-साथ खामियां भी। यथार्थ के धरातल पर अंकित ऐसे अनेक ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर इन जीती-जागती, बोलती-बतियाती कालजयी कृतियों में अनायास उपलब्ध हुए बिना नहीं रहेंगे ।
    इनमें अतीत या वर्तमान ही नहीं, भविष्य का अंधकार से उबरता उजास भी है । अपने समग्र रूप में एक बृहुत् समाज, जो कहीं एक देश का ही नहीं, महादेश की पर्याय  भी बन जाता है। ये साधारण-सी कहानियां अपने में  अनेक असाधारण संसार सहेजे हैं ।
  • Plot Ka Morcha
    Shamsher Bahadur Singh
    450 338

    Item Code: #KGP-588

    Availability: In stock


  • Himanshu Joshi Rachana Sanchayan
    Himanshu Joshi
    995 647

    Item Code: #KGP-589

    Availability: In stock


  • Reverse Your Thoughts Reverse Your Diseases (Paperback)
    Anil Bhatnagar
    245 221

    Item Code: #KGP-337

    Availability: In stock

    Like an artist who expresses herself on canvas with colors, our thoughts do so on the canvas of life (health included). Health or diseases, therefore, do not come by chance; they are created through our mental processes—though unknowingly.
    As per Psychoneuroimmunology, a new branch of science that studies the mind-body connection, the thoughts and emotions that we choose get instantly transformed into chemicals. These chemicals are, effectively, either self- administered injections of ‘slow poisons’ or of ‘healing medicines’ that eventually freeze into and become our physical states, i.e. the way we feel physically in our bodies—dis-eased or eased (i.e., healthy).
    Reverse Your Thoughts, Reverse Your Diseases is your guide to retrace your path back towards health from diseases through the same route whence these came from, i.e. through the route of your thoughts, emotions, beliefs and imagination. The book shares with you symptoms, emotional causes, metaphysical reasons, affirmations and dietary suggestions for averting and curing over 150 diseases . . . along with power-packed strategies for liberating you from corrosive thoughts and emotions.
  • Mere Saakshatkaar : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    250 225

    Item Code: #KGP-861

    Availability: In stock


  • Ramayan Bharantiyan Aur Samadhaan
    Swami Vidya Nand Saraswati
    100

    Item Code: #KGP-1115

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के पढ़ने से पता चलेगा कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम राज्य पाने के इच्छुक थे, वे पिता के कहने से वन नहीं गए, राम दीपावली के दिन नहीं बल्कि चैत्र शुक्ला 6 को अयोध्या लौटे थे, सीता का स्वयंवर नहीं हुआ था, कौशल्या की स्थिति घर में दासियों से भी बुरी थी, राम ने धोबी या किसी के भी कहने से सीता को वनवास नहीं दिया था, उन्होंने तपस्या करते तथाकथित शुद्र शम्बूक का वध नहीं किया था, हनुमान बंदर नहीं बल्कि व्याकरणाचार्य तथा चारों वेदों के विद्वान् थे, बालि की पत्नी तारा वेदों के रहस्य को जानने वाली थी, उसका पुत्र अंगद बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ था और उसके श्वसुर सुषेण बड़े कुशल सर्जन और प्लास्टिक सर्जरी में निष्णात थे, हनुमान, जटायु, रावण आदि छोटे-छोटे निजी हेलीकाॅप्टरों में यात्रा करते थे, शबरी भीतनी नहीं, उच्च कुल की तपोनिष्ठ देवी थी, अयोध्या तथा लंका की राजभाषा संस्कृत थी इत्यादि...
  • Dr. K.B. Hedgewar : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    190

    Item Code: #KGP-487

    Availability: In stock

    निडर और साहस के धनी डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार भारत की उन महान् विभूतियों में से एक हैं, जिन्होंने राष्ट्रसेवा के पथ पर चलते हुए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। अपनी जीवनशैली में सदैव अनुशासन और राष्ट्रप्रेम को अधिक महत्त्व देने वाले डॉ. केशवराव ने बाल्यावस्था में ही अपने अंग्रेजविरोधी तेवर दिखाने आरंभ कर दिए थे।
    डॉ. केशवराव उन विलक्षण व्यक्तियों में से थे, जो युवाओं की मानसिकता को भलीभांति जानते थे और उनकी क्षमताओं को विकसित करने के नए-नए तरीके खोजते रहते थे।
    देश की युवा पीढ़ी को भारत की सनातन संस्कृति और आदर्शों से जोड़े रखने के लिए 28 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के पर्व पर ‘संघ’ नामक नए राष्ट्रीय हिंदूवादी संगठन की स्थापना की गई। साहस और अनुशासन पर आधारित इस संगठन को खड़ा करने का पूरा श्रेय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार को जाता है। इस स्थापना-समूह के अन्य सदस्यों में डॉ. वी. एस. मुंजे, बापूजी सोनी तथा डॉ. परांजपे आदि वरिष्ठ नेता शामिल थे।
  • Qabra Tatha Anya Kahaniyan
    Raj Kumar Gautam
    150

    Item Code: #KGP-1845

    Availability: In stock


  • Boomraing
    Rekha Rajvanshi
    225 203

    Item Code: #KGP-877

    Availability: In stock

    बूमरैंग
    इस पुस्तक की संपादक रेखा राजवंशी को आस्ट्रेलिया के प्रमुख कवियों को जोड़ने और पुस्तक-प्रकाशन का विचार तब सूझा जब कैनबरा और सिडनी में आयोजित कवि-सम्मेलनों में किशोर नंगरानी, अब्बास रजा अलवी, शैलजा चतुर्वेदी, हरिहर झा तथा सुभाष शर्मा जी से उनकी मुलाकात हुई । पर्थ के प्रेम माथुर जी व अनिल वर्मा जी की कविताएं भी उन्हें यहीं सुनने को मिली । बाद में जब वह होली के कवि-सम्मेलन में मेलबर्न गईं तो सुभाष जी से इस बारे से चर्चा हुई और उनके सहयोग तथा ई-पत्रों के माध्यम से इस विचार को आकार मिला । बाद में एडीलेड से राय कूकणा जी व पर्थ से रेनू शर्मा जी को भी इसने सम्मिलित किया गया । 
    रेखा राजवंशी के अनुसार, पुस्तक का नाम 'बूमरैंग' इसलिए रखा गया, क्योंकि 'बूमरैंग' आस्ट्रेलिया की आदिवासी देशीय जनजाति का प्रतिनिधित्व करता है । यह एक ऐसा हथियार है, जिसे किसी भी दिशा में फेंका जाए, यह फेंकने वाले के पास ही वापस आ जाता है । तात्पर्य यह कि भारतीय कवि कहीं भी रहें, उनका हृदय बार-बार अपने देश भारत की और ही वापस जाता है। यानी हर भारतीय प्रवासी चाहे- अनचाहे ही 'बूमरैंग' बन जाता है ।
  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti
    Hemant Kukreti
    240 216

    Item Code: #KGP-7814

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Mushkil Kaam (Paperback)
    Asghar Wajahat
    90

    Item Code: #KGP-1454

    Availability: In stock

    मुश्किल काम
    लघुकथा के संबंध में फैली भ्रांतियों को तोड़ती असग़र वजाहत की लघुकथाएँ अपनी विशिष्ट शैलियों तथा व्यापक कथ्य प्रयोगों के कारण चर्चा में रही हैं। वे पिछले पैंतीस साल से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ इन अर्थों में अन्य लघुकथाओं से भिन्न हैं कि उनकी लघुकथाएँ  किसी विशेष शैली के सामने समर्पण नहीं करती है। पंचतंत्र की शैली से लेकर अत्याधुनिक अमूर्तन शैलियों की परिधि को अपने अंदर समेटे असग़र वजाहत की लघुकथाएँ पाठक का व्यापक अनुभव जगत् से साक्षात्कार कराती हैं। प्रस्तुत लघुकथाएँ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विषयों तक फैली हुई हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता इन लघुकथाओं की एक विशेषता है, जो किसी प्रकार के अतिरिक्त आग्रह से मुक्त है। इन लघुकथाओं के माध्यम से मानवीय संबंधों, सामाजिक विषमताओं और राजनीतिक ऊहापोह को सामने लाया गया है।
    निश्चित रूप से प्रस्तुत लघुकथाएँ हिंदी लघुकथा की विकास-प्रक्रिया को समझने में भी सहायक सिद्ध होती हैं।
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-4
    Balram
    350 291

    Item Code: #KGP-826

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-4
    समकालीन लघुकथाओं से गुजरते हुए इधर जिस खास बात पर ध्यान अटक गया है, वह है ‘लघुकथा में प्रवेश कर रहे काव्य-तत्त्व’। लघुकथा के इतिहास पर गौर करें तो पता चलेगा कि इस विधा के अंकुरण-काल में ही प्रेमचंद ने इसे गद्य-काव्य और कहानी के बीच की विधा कह दिया था, जिसका उल्लेख कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने अपने लघुकथा-संग्रह ‘आकाश के तारे, धरती के फूल’ की भूमिका में किया है। प्रेमचंद के अनुसार ‘लघुकथा में गद्य-काव्य का चित्र और कहानी का चरित्र होता है’। अज्ञेय इसे ‘छोटी कहानी’ कहते थे तो कमल गुप्त ने ‘लघुकहानी’ का झंडा फहरा रखा है और विनायक अपनी लघुकहानियों के लिए अलग से पहचाने जाते हैं। बालेंदुशेखर तिवारी, हरीश नवल, प्रेम जनमेजय और दामोदर दत्त दीक्षित आदि लघु-व्यंग्य के शामियाने तले गुफ्तगू करते रहे हैं। महेश दर्पण का संग्रह ‘लघुकहानी-संग्रह’ के रूप में छपा है, न कि लघुकथा-संग्रह के रूप में। मुकेश वर्मा की ऐसी रचनाओं को विष्णु नागर ने ‘छोटी कहानियां’ कहते हुए इस समय को छोटी कहानी का समय कहा है और हममें से अधिसंख्य लोग मुकेश वर्मा की छोटी कहानियों को उच्चस्तरीय लघुकथा के नमूने कहेंगे। उदय प्रकाश अपनी ऐसी रचनाओं को किस्से, छोटे किस्से कहकर पुकारना पसंद करते हैं अर्थात् छोटी कथा-रचनाओं की अहमियत तो निर्विवाद है, विवाद सिर्फ नाम पर है और काम सभी छोटी कथाएं प्रायः एक ही करती हैं : पाठक पर त्वरित प्रभाव, जैसे तुरंता भोजन, पाठक की मानसिक तृप्ति। परम। पाठक को परम मानसिक तृप्ति देने वाला चैतन्य त्रिवेदी का लघुकथा-संग्रह ‘उल्लास’ बीसवीं सदी की ढलती शाम में लोकार्पित हुआ तो विष्णु प्रभाकर से लेकर राजकुमार गौतम तक प्रायः सभी पीढ़ियों के लोग उस पर लट्टू हो गए और कमलेश्वर ने तो कह ही दिया कि आज लघुकथा एक विधा के रूप में स्थापित हो गई। उसी विधा की एक सदी की संघर्ष-यात्रा का प्रतीक-वृत्तांत पाठकों को सौंपकर अब हम आश्वस्त हैं कि इस कारवां में मुकेश वर्मा जैसे सिद्ध नाम दिन-प्रतिदिन जुड़ते चले जाएंगे और अंततः एक दिन कहानी और उपन्यास जैसी प्रतिष्ठा लघुकथा को भी हासिल हो जाएगी।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 7 (paperback)
    Shrinivas Vats
    180 144

    Item Code: #GAES-7

    Availability: In stock

    प्रिय बाल पाठको!

     

    आपने इस उपन्यास के  छह खंडों को जिस तत्परता से पढ़ा, उनका लेखन भी उतनी ही तत्परता से हुआ है। लेखन के  दौरान कई अनूठे अनुभव हुए। ऐसी ही एक घटना का उल्लेख यहाँ करना चाहूँगा। 

    ग्रीष्म ऋतु थी। तिनके  चोंच में दबाए पक्षियों का एक जोड़ा घोंसला बनाने के  लिए उपयुक्त स्थान की तलाश में इधार-उधार भटक रहा था। बरामदे में कुर्सी पर बैठा मैं उन्हें काफ़ी देर तक निहारता रहा। वे शायद यह सोचकर शांत बैठ गए कि यह व्यक्ति उठे तो बात बने।

     

    हुआ भी ऐसा ही। ज्यों ही मैं उठकर अंदर कमरे में गया, वे उड़कर बरामदे में उस टाँड़ पर  बैठे जहाँ मेरा निजी सामान रखा रहता था। मसलन संदूकची, किताबों के बंडल, दवा की पुरानी शीशियाँ डिब्बे।

     

    संभवतः परिंदे इस स्थान का पहले कई बार मुआयना कर चुके होंगे। तभी तो तिनके  एकत्र करने से पूर्व आश्वस्त हो गए थे कि घोंसले के  लिए यह एकदम सही स्थान है। घोंसला बनानेअंडे देने के  लिए उनकी दृष्टि में वही स्थान सर्वोत्तम हो सकता था जहाँ बिल्ली या अन्य हिंसक जीव पहुँच सके।

     

    इस प्रयोजन के लिए यह स्थान सर्वोत्तम था। पशु-पक्षियों से ही नहीं, वर्षा, सर्दी, गर्मी तीनों ऋतुओं के प्रतिकूल मौसम में भी यहाँ उनकी संतति सुरक्षित रह सकती थी। खैर! मैंने इस ओर अधिक ध्यान  नहीं दिया और अपने नित्य प्रति के कार्यों से निवृत्त हो मैं कार्यालय चला गया। घर वापसी तक सूर्यास्त हो चुका था। ऐसे में मेरी अनुपस्थिति में यह बरामदा दिन भर निर्जन रहा। खग-युगल के लिए तब यह जगह किसी अभयारण्य से कम थी।

    अस्तु! किताबों के बंडल के पीछे कब उनका नीड़ पूरा हुआ और कब मादा पक्षी ने उसमें अंडे दे दिए, मुझे पता तक नहीं चल पाया। संभव था, मुझे पता चलता तो मैं घोंसला बनने देता। जाहिर है तिनकों से गंदगी फैलाती और पंछियों की बीट गिरने से किताबें खराब हो जातीं।


    एक दिन जब मैं बरामदे में पहुँचा तो टाँड़ पर उस पक्षी को बैठे देख मेरा माथा ठनका। मैंने सीढ़ी लगाई और यह देखने के लिए ऊपर चढ़ा कि माजरा क्या हैमेरा अंदाजा सही निकला। घोंसले में मादा ने दो अंडे दिए थे और उन्हें सेने के लिए वह उन पर बैठी थी। मुझे सीढ़ी पर चढ़ा देख नर पक्षी डरकर भाग गया। मादा वहीं बैठी रही। मैंने उसे डंडे से डराया। वह बड़ी मुश्किल से वहाँ से हटी। घोंसले में अंडे देख मैं नीचे उतर आया। मुझे समझ नहीं रहा था, क्या करूँ? घोंसले को तोड़ना एवं अंडों को बाहर फेंकना  मेरी आस्था के विरुध था। यदि इन्हें वहीं रहने दूँ तो विष्टा एवं टूटे पंखों की गंदगी की कल्पना मात्र से अभी मितलाई आने लगी थी। हाँ, घोंसले में अंडे नहीं होते तो मैं अपनी संवेदनशीलता से समझौता करते हुए सभी तिनके बाहर फ़ेंक देता।

     

    किंकर्तव्यविमूढ़ मैं कुछ  निर्णय लेता, इससे पहले मादा पक्षी पुनः वहाँ बैठी। इस बार वह यह सोचकर आई थी कि चाहे जो हो जाए उठूँगी नहीं। उसकी भाव-भंगिमाओं और मातृत्व के सम्मुख मैंने आत्मसमर्पण कर दिया।

     

    दो-तीन दिन बाद अंडों से चूजे निकल आए। अब स्थिति यह हो गई कि नीचे आसन पर बैठा मैं लेखन की कोशिश करता और ऊपर दोनों पक्षी बारी-बारी से चुग्गा लाने के  लिए उड़ान भरते। जब मादा जाती तो नर बच्चों को अपने पंखों की गरमाहट का अहसास देता और जब नर जाता तो मादा उनके पास रहती थी।

     

    यह सिलसिला दो-ढाई माह तक चलता रहा। इस दौरान नीचे बैठे हुए मेरा ध्यान साहित्य-सृजन में कम पक्षियों की चुहलबाजी देखने में ज्यादा बीतता था। हर रोज खगशावकों को बड़े होते देखना, माँ की चोंच से पहले चुग्गा पाने की होड़ में एक-दूसरे को धकेलते खगशावकों की प्रतिद्वंद्विता बरबस मेरा ध्यान बँटा देती। खग परिवार वहाँ रहने का इतना अभ्यस्त हो गया किउसे मनुष्य की उपस्थिति से अब कोई फर्क  नहीं पड़ता था। मेरी उपस्थिति में भी वह उतना हीनिर्भय रहता जितना अनुपस्थिति में।

     

    मैं चाहता था जल्दी से इनके  बच्चे बड़े हों और ये यहाँ से उड़ जाएँ। इसीलिए मैं उन्हें दाने डालता और पानी का बर्तन भी रखवा दिया। इसका परिणाम यह निकला कि मेरे वहाँ आते ही वे मुझसे दानों की अपेक्षा करने लगते। मुझे लगा वे मेरे भाव इशारे समझ रहे हैं। तदनुसार प्रतिक्रियास्वरूप उनका आहार-व्यवहार देख मुझे लगता वे प्रत्युत्तर में कुछ समझा भी रहे हैं।

     

    उन्हीं दिनों मैं बृहद् बाल उपन्यास लेखन की शुरुआत करने का मन बना चुका था। इस उपन्यास के नायक गुल्लू का चरित्र तो मेरे मस्तिष्क में काफ़ी समय से घूम रहा था लेकिन उसके मित्र के पात्र का निर्णय अभी नहीं कर पाया था। अब इन अर्ध-पालतू पक्षियों को देख सतरंगीपक्षी की कल्पना मन में आकार लेने लगी।

     

    जिस दिन उपन्यास का पहला खंड पूरा हुआ। उस दिन मादा पक्षी के  व्यवहार में मुझे कुछ परिवर्तन लगा। वह धीरे से उड़ी और मुँडेर पर जाकर बैठ गई। थोड़ी देर बाद उसका एक बच्चा भी उसी के पीछे उड़ान भरकर मुँडेर तक जा पहुँचा। उस खगशावक ने पहली बार बरामदे से बाहर की दुनिया देखी थी। आनंदित  होकर उसने पुनः पंख खोले और लंबी उड़ान भर सामने हवेली के छज्जे पर पहुँच गया। दूसरा बच्चा अभी घोंसले में ही था। वह पहले बच्चे की अपेक्षा थोड़ा कमजोर था। मादा पुनः आई, दूसरे बच्चे को कुछ समझाया। परिणामतः शाम होने से पहले वह भी उड़ान भर गया। मैं दफ्तर से लौटा। बेटे ने बताया, ”पक्षी घोंसला छोड़कर चले गए।वियोग की एक मद्धिम-सी लहर के बावजूद मैंने राहत की साँस ली। मेरी किताबों के बंडल उनकी बीट टूटे पंखों के गिरने से खराब हो गए थे। समय बीता। दीपावली आने वाली थी। मैंने निर्णय किया टाँड़ की सफ़ाई कर दूँ। एक सुबह ज्यों ही मैं उठा, फि़र वहाँ मादा पक्षी को बैठे देखा। संभव है अपने पुराने घर को देखने आई हो, यह सोच मैंने उस ओर अधिक ध्यान नहीं दिया था। मेरे मुँह से बस इतना ही निकला कि अब ये इस घर को अधिक दिन नहीं देख पाएँगे। मैंने घोंसले को नष्ट करने का निर्णय ले लिया था।

     

    अगले रविवार को झाड़ू लेकर जब मैं सीढ़ी पर चढ़ा तो देखकर हैरान था, वहाँ पुनः अंडे रखे थे तथा मादा पक्षी उन पर बैठी थी।

     

    मैंने माथा पीट लिया। मुझे क्रोधित होते देख मेरी पत्नी ने कहा, ”नहीं, घोंसला मत तोड़ना। आप पक्षी को सिर्फ  पक्षी की दृष्टि से नहीं, प्रसव के दौर से गुजर रही मादा की नजर से देखिए।“ सृजन मेरी सबसे बड़ी कमजोरी रही है। प्रकृति में हो रहे अंकुरण के  सम्मुख विध्वंश की बातमैं नहीं सोच सकता था। आदिकवि का स्वरमा निषाद---काम मोहितम् मेरे कानों में गूँजने लगा। मैं नीचे उतर आया। यह सोचकर कि दो-तीन माह तक फि़र पंखों की फ़ड़फ़ड़ाहट झेलनी पड़ेगी।

     

    धीरे-धीरे उपन्यास का दूसरा खंड भी पूरा हो गया। नए खगशावक उड़ना सीख उड़ गए। मैंने घोंसला नहीं तोड़ा। हाँ, बरामदे के द्वार पर चिक लगाकर उसे ढाँप दिया।

     

    उपन्यास के तीसरे खंड की शुरुआत हो चुकी थी परंतु लेखन की गति काफ़ी धाीमी हो गई। पहले जब मैं पक्षियों को देखता, अंतर्मन में नए विचार जागृत हो उठते। अब कथानक आगे नहीं बढ़ रहा था। मुझे पक्षियों की कमी खलने लगी। मन उदास हो उठा। कुछ ही दिन बीते कि यकायक एक दिन मैंने पक्षियों को पुकारा। चिक के अगल-बगल खाली स्थान से पक्षी अंदर घुस गए। मैंने देखा तो चिक को हटा दिया। अब परिंदे आसानी से -जा सकते थे। समय के साथ खग-युगल ने वहाँ एक जोड़ी बच्चे और पैदा किए। मैंने इस टाँड़ पर छह बच्चों को बड़े होते देखा था। इस दौर में एक के बाद एक इस बाल उपन्यास के छह खंड पूरे होते गए। मैंने मन से मान लिया था कि परिंदे वाले इस उपन्यास के पूर्ण होने तक घोंसले को अब नहीं हटाऊँगा।

     

    अब मैं उपन्यास के समापक खंड पर कार्य कर रहा था। उपन्यास लगभग पूरा होने वाला था। पक्षियों को जाने कैसे  इसका आभास हो गया। उस दिन वे उड़े तो फि़र कभी बरामदे की तरफ़ लौटकर नहीं आए।

     

    सोचता हुए शायद नीड़ नष्ट करने के कारण उस खग-परिवार की मेरे प्रति शुभकामनाएँ रहीं जो उपन्यास आकार ले पाया अन्यथा पहली बार ही घोंसला तोड़ देने पर संभव था कि उपन्यास में निराले सतरंगी पक्षी की कल्पना मस्तिष्क में पाती। तब सतरंगी जैसे अनूठे पात्र के बिना उपन्यास कैसा बनता, इस कृति के पाठक स्वयं अनुमान लगा सकते हैं। अस्तु! संपूर्ण उपन्यास पर अपनी प्रतिक्रिया देना मत भूलना।

  • Antarmilan Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 280

    Item Code: #KGP-754

    Availability: In stock

    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    प्रस्तुत कहानियाँ मैंने विशाल भारतीय पौराणिक साहित्य में से चुनी हैं। इनको मैंने इसलिए लिखा कि इनमें मुझे इतिहास की बहुत-सी गुत्थियाँ सुलझती मिलीं। हमारी संस्कृति में एक ही स्रोत की प्रेरणा नहींहै। महाभारत युद्ध के बाद से गौतम बुद्ध तक, फिर गौतम बुद्ध से गुप्त सम्राटों के काल तक, निरंतर भारत में जातियों का अंतर्मिलन चला। इन दो दौरों में-
    पहली बार-आर्य, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, नाग, गरुड़, पिशाच, असुर तथा अनेक जातियाँ परस्पर घुल-मिल गईं। इनके मिलन से इनके देवता भी परस्पर मिल गए। विष्णु, शिव, गरुड़, पार्वती, वासुकि, कुबेर, पुलस्त्य, वृत्र, शाक्त इत्यादि भी परस्पर मैत्री भाव से स्थित हुए।
    दूसरी बार-भारत में यवन, शक, कुषाण, पहलव इत्यादि जातियाँ आईं, जो भी भारत में घुल-मिल गईं।
    यहाँ मैंने पहले दौर के अंतर्मिलन को प्रकट करने वाली कथाएँ रखी हैं, जो प्रकट करती हैं कि हिंदू धर्म कितनी व्यापक भूमि पर बना था।
    -रांगेय राघव

  • Antrang Saakshatkar
    Krishna Dutt Paliwal
    200 180

    Item Code: #KGP-621

    Availability: In stock


  • Hanste Nirjhar Dahakti Bhatthi
    Vishnu Prabhakar
    190

    Item Code: #KGP-697

    Availability: In stock

    हँसते निर्झर, दहकती भट्ठी
    देश-विदेश में, नगरों में और प्रकृति के प्रांगण में जब-जब भी और जहाँ-जहाँ भी मुझे की यात्रा करने का अवसर मिला है, उस सबकी चर्चा मैंने प्रस्तुत पुस्तक में की है । इसमें जानकारी देने का प्रयत्न इतना नहीं है, जितना अनुभूति  का वह चित्र प्रस्तुत करने का है, जो मेरे मन पर अंकित हो गया है । इन अर्थों में ये सब चित्र मेरे अपने है । कहीं मैं कवि हो उठा लगता हूँ, कहीं दार्शनिक, कहीं आलोचक, कहीं मात्र एक दर्शक । मैं जानता हूँ कि हुआ मैं कुछ नहीं हूँ ।  मुझे मात्र दर्शक रहना चाहिए था, लेकिन मन की दुर्बलता कभी-कभी इतनी भारी हो उठती है कि उससे मुक्त होना असंभव हो जाता है । शायद यही किसी लेखक की असफलता है । मेरी भी है । लेकिन एक बात निश्चय ही कही जा सकती है कि इस पुस्तक में विविधता की कमी पाठकों को नहीं मिलेगी । कहीं विहँसते निर्झर, मुस्कराते उद्यान उनका स्वागत करेंगे तो कहीं विगत के खंडहर उनकी ज्ञानपिपासा को शांत करेंगे, कहीं उन्हें भीड के अंतर में झाँकने की दृष्टि मिलेगी तो कहीं नई सभ्यता का संगीत भी वे सुनेंगे। वे पाएंगे कि कहीं वे मेरे साथ कंटकाकीर्ण दुर्गम पथों पर चलते-चलते सुरम्य उद्यानों से पहुँच गए हैं, कहीं विस्तृत जलराशि पर नावों में तैर रहे हैं, कहीं पृथ्वी के नीचे तीव्रगामी रेलों से दौड रहे हैं तो कहीं वायु के पंखों पर सवार होकर विद्युत् और मेघों द्धारा निर्मित तूफान को झेल रहे है । मुझे विश्वास है कि इससे जो अनुभूति उन्हें प्राप्त होगी, वह निरी निराशाजनक ही न होगी ।

    —विष्णु प्रभाकर
  • Mere Saakshaatkaar : Mannu Bhandari
    Mannu Bhandari
    350 280

    Item Code: #KGP-678

    Availability: In stock


  • Naav Na Baandho Aisi Thaur
    Dinesh Pathak
    315 261

    Item Code: #KGP-277

    Availability: In stock

    नाव न बाँधो ऐसी ठौर
    हिंदी के सुपरिचित कथाकार दिनेश पाठक के इस उपन्यास का केंद्रीय विषय है प्रेम।  यह विवाहेतर प्रेम है, जिसका अपना अलग रंग है और अलग संघर्ष भी। नारी-पुरुषजन्य आकर्षण प्रकृति का सहज स्वभाव है। यह स्वभाव इतना प्रबल है, इतना अदम्य कि बावजूद तमाम वर्जनाओं के इसकी धार सतत प्रवाहित रहती है। इस आकर्षण में न तो कोई उम्र होती है और न ही कोई शर्त। कब, कहाँ और कैसे दो विपरीत एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट होकर साडी वर्जनाओं को चुनौती देने लगेंगे, कहना मुश्किल है। आज के दौर में जब स्त्री-पुरुष साथ-साथ काम कर रहे हैं, कंधे से कंधा मिलकर, तब इस आकर्षण की परिधि और व्यापक हो उठी है। साथ-साथ काम करते हुए कब दो प्राणी चुपके से एक-दूसरे की भावनाओं में भी शामिल हो जाते हैं, ज्ञात नहीं पद्त। और यदि वे दोनों ही पहले से विवाहित हों तो भावनाओ का यह ज्वार एक नयी समस्या को जन्म देता है - सामाजिक दृष्टि से कदाचित यह अवैध प्रेम है, एकदम वर्जित व निषिद्ध प्रेम, विवाह-व्यवस्था के नितांत विपरीता उपन्यास में एक साथ दो धुरियां हैं-एक में समाज के विखंडन का भय है, परंपरागत मान्यताओं-मूल्यों के साथ परिवारों के टूटने व समाज के अराजक होने का डर है तो दूसरे में व्यक्ति स्वातंत्र्य के आगे सामाजिक मूल्यों के प्रति अस्वीकार का भाव। प्रश्न है विवाहित स्त्री-पुरुष के बीच क्या यह विवाहेतर प्रेम-सम्बन्ध सही है ? निष्कर्ष पर तो पाठकों को पहुंचना है।
  • Sanetary Pad
    Sayed Javed Hasan
    250 225

    Item Code: #KGP-1885

    Availability: In stock

    बस्ती का खुदा उठा । मैदान की ओर देखकर मुस्कुराया और धीरे-धीरे चबूतरे की सीढी चढ़ने लगा ।
    दो चढ़ता रहा । तालियां बजनी रहीं।
    अचानक तालियां रुक गई ।
    लोगों ने बस्ती के खुदा को एकाएक बीच सीढी पर रुकते हुए देखा । '
    सबकी धडकने तेज हो गई । उसे अपने इस खुदा पर पूरा  विश्वास था । ताली बजाने वालों में अब मैदान के एक- आध हिस्से को छोडकर बाकी लोग भी शामिल हो गए थे । वे पहले के तीन खुदाओं की छवि से बुरी तरह निराश थे और चाहते थे कि कम से कम इस खुदा की छवि दुरुस्त रहे ।  बस्ती का यह खुदा औरों के मुकाबले अधिक सौम्य, संजींदा और भरोसेमंद था ।
    बस्ती के खुदा ने बस्ती के लोगों को मुड़ के देखा । मुस्कुराया । हाथ हिलाया और फिर सीढी चढने लगा ।
    तालियां फिर बजनी शुरू हुई ।
    तालियां बजती रहीं . . . . बजती रहीं ।
    और फिर . . . . पूरे मैदान में मरघट-सा सन्नाटा छा गया ।
    आईने के सामने बस्ती का खुदा खडा था और उसमें मुखौटों का अक्स उभर आया था ।
    बस्ती के लोग पागलों की तरह अपना सिर धुन रहे थे । उसे अपने जिस खुदा पर सबसे ज्यादा भरोसा था, वो  बहरूपिया बना उनके सामने खड़ा था ।
    - इसी पुस्तक से
  • Yathartha Se Samvad
    B.L. Gaur
    400 300

    Item Code: #KGP-449

    Availability: In stock

    बेख़ौफ अंगारे
    साहित्य को अब रास नहीं आता निरा रस 
    उससे भी ज़रूरी है कलमकार में साहस 
    ये काम अदब का है–अदब करना सिखाए 
    उनको जो बनाए हैं हरिक काम को सरकस
    दम घुट रहा अवाम का, फनकार बचा लो
    सब मूल्य तिरोहित हुए, दो-चार बचा लो
    सच्चे की शुबां पर हैं जहां शुल्म के ताले
    हर ओर लगा झूठ का दरबार, बचा लो
    संपादकीय ऐसे हैं ऐ दोस्त, तुम्हारे
    जैसे अंधेरी रात में दो-चार सितारे
    गुणगान में सत्ता के जहां रत हैं सुखनवर
    तुम ढाल रहे शब्द में बेख़ौफ अंगारे
    मैं ख़ुश हूं बड़े यत्न से धन, तुमने कमाया
    उससे भी अधिक ख़ुश हूं कि फन तुमने कमाया
    मेरी ये दुआ है कि सलामत रहो बरसों
    सदियों रहे ज़िंदा जो सृजन तुमने कमाया।
    —बालस्वरूप राही

  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-3)
    Kamleshwar
    625 500

    Item Code: #KGP-1578

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sabhyata Ki Nirmiti
    Bhagwan Singh
    540 405

    Item Code: #KGP-401

    Availability: In stock

    भारतीय सभ्यता की निर्मिति भगवान सिंह की रचनाओं में ही भारतीय इतिहासलेखन के इतिहास में एक नया कीर्तिमान इस विशेष अर्थ में है कि इससे पहले इतिहासकारों की दृष्टि हड़प्पा के नगरों या ऋग्वेद तक जाकर रुक जाती थी, इससे आगे कुछ दीखता नहीं था और बहुत से प्रश्नों का हमें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता था। 
    प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार उन्होंने हड़प्पा काल से भी आठ-दस हजार पीछे के सांस्कृतिक विकासों और सभ्यता के उन नियामक तत्त्वों की खोज की, जिनका उपयोग विविध सभ्यताओं ने अपने निर्माण में गारे और पलस्तर के रूप में किया। विषय गंभीर होते हुए भी उन्होंने इसे इतना सरल और बहुजनग्राह्य रूप में प्रस्तुत किया है कि अखबार पढ़ने की योग्यता रखने वाला व्यक्ति भी इसे पढ़ते हुए किसी तरह के भारीपन या उलझाव का अनुभव नहीं करता। इस पुस्तक में उनकी विवेचनशैली भी उनकी अन्य कृतियों से भिन्न है। नृतत्त्व, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान और साहित्य की सामग्री का इतनी कल्पनाशीलता से उपयोग किसी अन्य कृति में देखने में नहीं मिलता।
  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan (Paperback)
    Surendra Tiwari
    450 360

    Item Code: #KGP-391

    Availability: In stock


  • Vichaar Bindu
    Atal Bihari Vajpayee
    300 249

    Item Code: #KGP-9019

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।

    राष्ट्रीय जीवन में एक असहिष्णुता जाग रही है, दूसरे को सहन न करने की प्रवृत्ति । लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति नहीं चल सकती । हमने हमेशा चारों तरफ से आने वाली हवाओं का स्वागत किया । इस देश के द्वार सबके लिए खुले रहे है । जब और जगह आतंक था, शोषण था, भय था, मजहब के नाम पर उत्पीड़न था, तो लोग अपनी पवित्र अग्नि को जलाए हुए भारत में आए । और यहाँ भारतमाता के आँचल में उन्होंने विश्राम पाया । किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि यहाँ कैसे आए, क्यों आए, पराए हो । यह इस देश की मिट्टी का रंग है, यह इस देश की संस्कृति का गुण है ।
    -अटल  बिहारी वाजपेयी
  • Mujhse Kaisa Neh
    Alka Sinha
    200 180

    Item Code: #KGP-395

    Availability: In stock

    मुझसे कैसा नेह
    बहुचर्चित कहानीकार अलका सिन्हा ने अपने पहले ही कहानी-संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उडान' की टेक्नोलिटररी कहानियों से अपनी अलग पहचान बनाई । इस संग्रह के लगातार प्रकाशित हो रहे संस्करणों और इस पर संपन्न शोध-कार्य आदि पाठकों की पुरजोर स्वीकृति के प्रमाण हैं ।
    अलका सिन्हा का दूसरा कहानी-संग्रह 'मुझसे कैसा नेह' भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में आधुनिक संदर्भों  और बदलते समीकरणों का खुलासा करता है, बहुत कुछ हासिल कर चुकने के बाद भी भीतर से रिक्त होते जा रहे व्यक्ति की पहचान कराता है । आज के जटिल यथार्थ से उपजे संघर्ष, तनाव और एकाकीपन के धरातल पर खडी ये कहानियां घर-परिवार के बीच से निकलती हुई वैश्विक परिदृश्य की साक्षी बन जाती हैं ।
    मानवीय मूल्यों की पक्षधर इन कहानियों के पात्र तयशुदा ढर्रे से हटकर नए विकल्पों की खोज करते हैं । बेहतरी के नाम पर ये अपने देशकाल या परिस्थितियों से पलायन नहीं करते, न ही अपने स्त्री-पात्रों को जबरन 'बोल्ड' बनाकर स्त्री-विमर्श का झंडा उठाते हैं । दैहिक विमर्श से आगे अपनी अस्मिता के प्रति चेतना संपन्न ये स्त्रियां आधुनिकता की ओट में अमर्यादित नहीं होती तथा उच्छ्रंखल  और उन्मुक्त हुए बिना भी स्त्री मुक्ति की अवधारणा को संपुष्ट करती हैं ।
    स्फीति से बचती दूश्य-प्रधान भाषा-शैली पाठक को एक नई दुनिया का हिस्सा बना देती है और वह सहज ही इन पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । भाव प्रवणता के साथ-साथ वैचारिक चिंतन से दीप्त ये कहानियाँ साधारण व्यक्ति की असाधारण भूमिका की संस्तुति करती हैं और अपने यथार्थ को कोसने के बदले अभिनव संकल्पनाओं की जमीन तोड़ती हैं ।
  • Badalte Rang
    Ram Swaroop Arora
    150

    Item Code: #KGP-1826

    Availability: In stock

    बदलते रंग
    समय परिवर्तनशील है। समयानुसार सभी प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य जाति की जीवन शैली एवं संस्कृति भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही है। जो जीवन पद्धति, सभ्यता-संस्कृति आज से कुछ ही वर्ष पूर्व तक थी, वह आज परिवर्तित होकर कहाँ की कहाँ पहुँच गई है। हमारा राष्ट्र कालचक्र के प्रवाह से एक नए युग की ओर बढ़ रहा है। कहा नहीं जा सकता कि परिवर्तन का यह रंग उसे किस प्रकार के विकास की ओर ले जाएगा अथवा पतन के गर्त में पहुँचा देगा। इक्कीसवीं शताब्दी का कालक्रम इसका साक्षी होगा।
    प्रस्तुत संग्रह में कुछ कहानियाँ भारतीय स्वतंत्रता के भूले-बिसरे क्रांतिकारियों के जीवन-वृत्त से, कुछ सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन, निजी अनुभव एवं राजस्थान के ग्रामीण कृषि संबंधी कार्यकलापों से तथा कतिपय कथागल्पों से संबंधित हैं, जो हमारे आसपास के जनजीवन पर गहन प्रभाव डालती हैं।
    विद्वान् पाठक इन्हें पढ़कर विचार करें कि हम, हमारा राष्ट्र व समाज तब कहाँ थे और आज कहाँ आ पहुँचे हैं ? क्या हमारा वास्तविक विकास हुआ है ? या अब तक विकास के नाम पर किया गया समस्त कार्य एक छलावा मात्र है तथा अनैतिक, भ्रष्ट एवं पतन की ओर ले जाने वाले कार्यों का एक पुलिंदा है ? मैं अपनी बुद्धि-कल्पना एवं भावनाओं के अनुरूप जो कुछ लिख सका, वह सब आपकी सेवा में समर्पित है।               
    --रामस्वरूप अरोड़ा
  • Kavi Ne Kaha : Manglesh Dabral (Paperback)
    Manglesh Dabral
    140

    Item Code: #KGP-1411

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: मंगलेश डबराल
    मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से अपनी सृजनात्मक प्रेरणा ग्रहण करती हुई हिंदी कविता की आज जो पीढ़ी उपस्थित है, उसमें मंगलेश डबराल जैसे समर्थ कवि इतने वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी होते जा रहे हैं कि उनके किसी एक या चुनिंदा पहलुओं को पकड़कर बैठ जाना अपनी समझ और संवेदना की सीमाएं उघाड़कर रख देना होगा। एक ऐसे संसार और समय में जहां ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्हीं भी शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को उसके हाशिये से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचोबीच लाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, ईषर्यालु अथवा आत्मदयाग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोज़ख़ को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इनकार करता है।
    मंगलेश की इन विचलित कर देने वाली कविताओं में गहरी, प्रतिबद्ध, अनुभूत करुणा है, जिसमें दैन्य, नैराश्य या पलायन कहीं नहीं है। करुणा, स्नेह, मानवीयता, प्रतिबद्धता--उसे आप किसी भी ऐसे नाम से पुकारें, लेकिन वही जज़्बा मंगलेश की कविता में अपने गांव, अंचल, वहां के लोगों, अपने कुटुंब और पैतृक घर और अंत में अपनी निजी गिरस्ती के अतीत और वर्तमान, स्मृतियों और स्वप्नों, आकांक्षाओं और वस्तुस्थितियों से ही उपजता है। उनकी सर्जना का पहला और ‘अंतिम प्रारूप’ वही है।
    आज की हिंदी कविता में मंगलेश डबराल की कलात्मक और नैतिक अद्वितीयता इस बात में भी है कि अपनी शीर्ष उपस्थिति और स्वीकृति के बावजूद उनकी आवाज़ में उन्हीं के ‘संगतकार’ की तरह एक हिचक है, अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की कोशिश है, लेकिन हम जानते हैं वे ऐसे विरल सर्जक हैं जिनकी कविताओं में उनकी आवाज़ें भी बोलती-गूंजती हैं जिनकी आवाज़ों की सुनवाई कम होती है।
  • 20-Best Stories From Spain & Portugal (Paperback)
    Prashant Kaushik
    125

    Item Code: #KGP-7198

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics 
    from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Spanish & Portuguese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories 
    open up a new world on each page.

    With stories like Vain Queen, Maid and the Negress, Three Citrons of Love, Daughter of the Witch, Pedro and the Prince, Tower of ill Luck, this book is a compilation of 20 famous Spanish & Portuguese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Spain & Portugal.
  • Tabdeel Nigahein
    Maitreyi Pushpa
    300 255

    Item Code: #KGP-396

    Availability: In stock

    तबदील निगाहें
    किसी भी व्यक्ति, विषय या कृति के संबंध में जो सिद्धांत, मान्यताएं और अवधारणाएं, वर्षों या सदियों पहले सही मान ली गई थीं, जरूरी नहीं कि हर युग में उनको उसी रूप में स्वीकार किया जाए। समय और परिस्थितियों से उपजे सवाल, उसे अपने मानकों पर कसते हैं। हालांकि सच यह भी है कि साहित्य और समाज में वर्षों से चली आ रही मान्यताओं और प्रतिमानों को खंडित करने का साहस यदा-कदा ही किया जाता है, क्योंकि बहुजन के दबाव और विरोध को सहकर अपनी बात कहने से प्रायः बुद्धिजीवी लोग बचने में ही अपनी भलाई समझते हैं। बावजूद इसके कुछ रचनाकार अपवाद रहे हैं।
    सच को पूरे साहस से कहने वाली रचनाकारों में सम्मिलित मैत्रेयी पुष्पा ने इस पुस्तक के संकलित लेखों में कुछ ऐसा ही प्रयास किया है। ‘उसने कहा था’, ‘गोदान’, ‘चित्रालेखा’, ‘धु्रवस्वामिनी’, ‘त्यागपत्र’, ‘मैला आंचल’ और ‘राग दरबारी’ जैसी अपने समय की कालजयी रचनाओं को बिलकुल अलग निगाह से देखतीं और उसके स्त्री-पात्रों के मन में सोए पड़े सवालों को उघाड़कर उन्होंने एक नई बहस को आधार प्रदान किया है। इन कृतियों के संदर्भ में लेखिका द्वारा उठाए गए सवाल, न केवल पढ़ने वाले को बेचैन कर सकते हैं बल्कि इन्हें नए तरह से तबदील निगाहों के जरिए पुनर्मूल्यांकित करने की मांग भी करते हैं। 
    कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके और कुछ अवसरों पर दिए गए इन वक्तव्यों में मैत्रेयी पुष्पा के भीतर की आलोचकीय दृष्टि भी सघन रूप से प्रकट हुई है। बनी-बनाई धारणाओं और अपनी कूपमंडूकता में आनंदित रहने वाले आलोचकों के लिए यह पुस्तक एक सबक की तरह हो सकती है।
    –विज्ञान भूषण
  • Suno Manu (Paperback)
    Vishva Mohan Tiwari
    100

    Item Code: #KGP-1488

    Availability: In stock

    सुनो मनु
    आज का युवा तेज़ी से आगे बढ़ना चाहता है, किंतु अपने माता-पिता या दादा-दादी से उचित सलाह न मिल सकने के कारण उसे शीघ्र ही भोगवादी बाज़ार के दलदल में फँस जाने का खतरा रहता है। 
    एक युवक को ऐसे खतरे से बचाने के लिए एक पिता ने होस्टल में रहने वाले अपने पुत्र को लगातार पत्र लिखे, जिससे न केवल उसे वरन् उसकी मित्रमंडली के समुचित विकास में, उन्हें जीवन में सोच-विचार कर आगे बढ़ने में सहायता मिली। 
    उन पत्रों की सफलता का रहस्य था पुत्रा एवं पिता में मित्रवत् व्यवहार। पिता में एक ओर तो अपनी जड़ों से जुड़े रहने का विवेक है तथा दूसरी ओर आधुनिकता की पर्याप्त समझ है। 
    पत्रों में पुत्र की सामान्य समस्याओं से लेकर जीवन-मूल्य संबंधी प्रश्नों पर आपस में विचार- विमर्श है। 
    इस पुस्तक में युवाओं के लिए वे संदेश हैं, जिनसे उनमें इतनी मानसिक, बौद्धिक, नैतिक शक्ति आ सकेगी कि वे भारत को और इसलिए स्वयं को सचमुच ही विश्व में सम्मानप्रद स्थान दिला सकें। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya (Paperback)
    Ravindra Kalia
    120

    Item Code: #KGP-430

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रवीन्द्र कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Ravindra Kalia
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Pakshi Avlokan
    Dr. Anand Saxena
    950 618

    Item Code: #KGP-562

    Availability: In stock

    पक्षियों के अवलोकन तथा उनकी पहचान करने के संबंध में हिंदी में पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। यह पुस्तक इस कमी को पूरा करने का प्रयास है। पक्षियों की स्पष्ट फोटो तथा पक्षी की जाति (species) पहचानने के विषय में संकेतों को देने पर विशेष ध्यान दिया गया है। अनेक पक्षियों के नर और मादा में काफी अंतर होता है। इसका उल्लेख करते हुए अकसर उनकी पफोटो भी दी गई है।
  • Nanaji Deshmukh : Jeevan Darshan
    Gaurav Chauhan
    280 224

    Item Code: #KGP-1864

    Availability: In stock

    इस जीवात्मा ने अपने व्यक्तित्व की कुछ ऐसी अमिट छाप समाज पर छोड़ी कि उनके विषय में समाज और देश को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या साधारण मनुष्य भी दलित, शोषित, पीड़ित व वंचित के दुःखों को दूर कर उनके हृदय में एक ईश्वर, गुरु, प्रेरक, श्रद्धा का स्थान ले सकता है। ऐसी ही एक पवित्र जीवात्मा थे जिन्हें हम नानाजी देशमुख के नाम से जानते हैं। 
    "हम अपने लिए नहीं अपनों के लिए हैं। अपने वे हैं जो सदियों से पीड़ित, शोषित व उपेक्षित हैं।" यह कथन इन्हीं जीवात्मा का था जो आज नानाजी के नाम से इस संसार में याद किए जाते हैं। ऐसा ही कोई विरला व्यक्तित्व इस धरा पर जन्म लेकर इस धरा को पवित्र बनाता है।
  • Kavi Ne Kaha : Gyanendrapati
    Gyanendrapati
    150

    Item Code: #KGP-163

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ज्ञानेन्द्रपति
    ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है । जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है ।  वे  कविता के नहीं, उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिसकी प्रस्तावना की थी । उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है । बेशक, यह हर बार एक नये छन्द का अन्वेषण हैं जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-द्रव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मता से सम्भव होता है । हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहां खूब बन पडा है । तदभव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है न देशज अस्मृश्य; अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक और तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जनमत भूमि पर दृढ़ता से पाँव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है । धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता-वह किसी को नहीं बख्शती । उसकी दीठ प संतप्त भूगोल है । साम्राज्यबाद के नए पैंतरों का वह पहचानती है । अभय में पगी हूई करुणा उसे विरासत में मिली है । वह एक महान् परम्परा की परिणति है ।
    स्वयं ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं ही, आयामी संग्रेहों से भी कविताएँ शामिल है, बल्कि अनेक तो पहली बार यही प्रकाशित हो रही हैं । बिला शक अपने समाज-समय को कविता को आँख से देखना-समझना चाहने वालों के लिए एक अनिवार्य-किताब नहीं-सहचर!
  • Arddhnaarishwar
    Vishnu Prabhakar
    495 446

    Item Code: #KGP-2002

    Availability: In stock

    अर्द्धनारीश्वर 
    'अर्द्धनारीश्वर ' व्यक्तिमन, समाजमन एवं अंतर्मन के विविध स्तरों पर नारी और नर थे इन्हीं के एकमएक सुर और स्वर-मिलन की प्राप्ति का प्रयास है यह उपन्यास । वही जाति-पाति और धर्म को समस्या, वही विवाह, तलाक, बलात्कार की समस्या, वही नारी-शोषण, उत्पीडन, वही टूटते-बिखरतें जीवन की कहानी, किन्तु मुक्ति के लिए 'कोई तो' की प्रतीक्षा नहीं है । यहीं लेखक ने समाधान के रूप में एक वृहत्तर रूपरेखा की सर्जना की है ।
    'अर्द्धनारीश्वर ' का अभिप्रेत नारी और नर की समान सहभागिता को प्राप्त करना है । इसके लिए जरूरी है, एक-दूसरे को अपनी-अपनी दुर्बलताओं व सबलताओं के साथ स्वीकार करना तथा मान लेना कि रचना के लिए प्रकृति व पुरुष का मिलन भी जरूरी है ।
    मूल समस्या तो पुरुष की है, उसके पौरुषिक अहम् की, जो उसे 'बेचारा' बना देती है । सहज तो इसे ही बनाना है । इसी की असहजता से स्त्री बहुत-से बंधन तोड़कर आगे निकल आई है । लेकिन बंधनहीन होकर किसी उच्छ्रंखल को रचना करना लेखक का अभिप्रेत नहीं है, बल्कि बंधनो की जकड़न को समाप्त कर प्रत्येक सुर को उसका यथोचित स्थान देकर जीवन-राग का निर्माण करना है । अजित के शब्दों में लेखक कहता है :
    "मैं सुमिता को अपनी दासता से मुक्त कर दूँगा । मैं उसकी दासता से मुक्त हो जाऊँगा। तभी हम सचमुच पति-पत्नी हो सकेंगे।"
    इसी स्वयं की दासता से मुक्ति का नाम है, 'अर्द्धनारीश्वर'।
  • Dek Par Andhera
    Hira Lal Nagar
    400 300

    Item Code: #KGP-402

    Availability: In stock


  • Gorakhdhandha
    Jaivardhan
    160 144

    Item Code: #Kgp-gd

    Availability: In stock


  • Sambhavami
    Asha Rani Vhora
    150

    Item Code: #KGP-9136

    Availability: In stock

    श्रीमती आशारानी व्होरा की यह रचना ‘संभवामि’ सामयिक भी है, प्रासंगिक भी। सामयिक इस दृष्टि से कि ‘संभवामि’ की विषयवस्तु इन दिनों चर्चा में है। प्रासंगिक इसलिए कि इस विषय पर अभी जो कुछ लिखा जा रहा है उसमें से अधिकांश में गहराई और दृष्टि का अभाव है। ‘संभवामि’ इन दोनों की पूर्ति करता है।
    लेखिका ने उन्मुक्त दृष्टि से पक्ष-विपक्ष दोनों को संतुलित दृष्टि से प्रस्तुत कर अपना सुचिंतित मंतव्य भी दिया है जो उनकी लेखकीय जिम्मेवारी बनती है।
    संधि-युग का आज का मानव-मन संशयालु हो उठा है। वह राह की खोज में है। ‘संभवामि’ में उसे आशा की वह किरण दिख सकती है, जो उसके मन को संशय से मुक्त करने में सहायक हो।
    अभी इतना ही पर्याप्त होगा क्योंकि पाठकों का स्वयं का निर्णय ही आगे आने वाली सदी में उनकी भूमिका निर्धारित करेगा।
    -सिद्धेश्वर प्रसाद
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghava (Paperback)
    Rangey Raghav
    140

    Item Code: #KGP-461

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रांगेय राघव 
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रांगेय राघव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'पंच परमेश्वर', 'नारी का विक्षोभ', 'देवदासी', 'तबेले का धुँधलका', 'ऊँट की करवट', 'भय', 'जाति और पेशा, 'गदल', 'बिल और दाना' तथा 'कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेकनीक्स'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रांगेय राघव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Haashiye Per
    Raj Budhiraja
    100

    Item Code: #KGP-1963

    Availability: In stock

    हाशिये यर
    सुपरिचिन संवेदनशील लेखिका राज़ बुद्धिराजा की नवीन कृति है 'हाशिये पर' । अत्याधुनिक भारतीय प्तमाज़ ने जिस प्राचीन संस्कृति को हाशिये पर ला बैठाया है उसे  लेखिका ने शब्दों के मोतियों में पिरोकर भव्य रूप प्रदान किया है । लेखिका को पैनी और सूक्ष्म दृष्टि छोटी से छोटी और बडी से बडी बात, घटनास्थल पर आकर टिक जाती है । आज के टूटते परिवेश और बिखरते मानव-मूल्यों ने आहत होकर कभी विदेशी मित्रों और कभी पास-पडौस के माध्यम से इनकी सशक्त कलम पूरे समाज पर प्रहार करती है । प्रहार इतना तीव्र होता है कि पाठक के सामने हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं होता । धर्म, धर्म, अध्यात्प, शिक्षा, परिवार, समाज, मानवीय संबंध सभी पर लेखनी चलती चली जाती है । इनके दिल की गहराई पाठकों के पटल पर रेशमी मोती बिखेरती है और कभी पाठकों के सामने सवालिया निशान छोड़ती है । वस्तुत: उनके मन के पनीले तट पर वर्णों के संबंध आसन लगाए बैठे हैं । उन्हें तिरोहित होता देख वे पाठकों को ही कठघरे में ला खडा करती हैं । 'अब कहाँ है आनंदी', 'नमस्कार नहीं की जाती यहाँ', 'एक बेगम बादशाह बिन' ऐसे ललित संस्मरण हैं जिनमें पाठक पूरो तरह डूब जाता है और वह भी लेखिका के सुर में सुर मिलाकर कहता है 'मैं हूँ न !'
  • Vipradas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 249

    Item Code: #KGP-852

    Availability: In stock


  • Jeet Ki Raah
    Swed Marten
    200

    Item Code: #KGP-857

    Availability: In stock

    पुस्तक में स्वेट मार्डन जैसे महान् व्यक्तित्व के आधुनिक विचारों के साथ भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से प्रेरित विचारों का मिला-जुला संगम है, ठीक गंगा-यमुना की भाँति पावन व पवित्र । एक जोर से विद्धान् स्वेट मार्डेन की विचाररूपी गंगा एवं दूसरी ओर से भारतीय विचारों की सरिता यमुना का जल आकर मिल गया है इस 'जीत की राह' में।
    इस पुस्तक का वास्तविक शीर्षक है 'जीत की राह', परंतु इससे
    अधिक आकर्षक है 'स्वेट मार्डन : सूक्तियाँ व प्रेरक विचार'।  इस पुस्तक
    में स्वेट मार्डन की तीन पुस्तकों क्रमश 'The Conquest of Worry', 'He can who think he can', 'To succeed in Life' में से उनकी
    सूक्तियाँ व प्रेरक विचार संगृहीत किए गए हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdarash Mishra
    Ramdarash Mishra
    200

    Item Code: #KGP-766

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रामदरश मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमा', 'सड़क', 'एक औरत एक जिदगी', 'खँडहर की आवाज', 'मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’, 'निर्णयों के बीच एक निर्णय', 'मुर्दा मैदान', 'अकेला मकान', 'शेष यात्रा' तथा 'दिन के साथ' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dohra Abhishaap
    Kaushlya Baisntari
    220

    Item Code: #KGP-2011

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
  • Kaag Ke Bhaag Bare
    Prabha Shanker Upadhayaye
    145

    Item Code: #KGP-1811

    Availability: In stock

    काग के भाग बड़े
    व्यंग्य को भले ही लेटिन के ‘सेटुरा’ से व्युत्पन्न बताया गया हो, किंतु भारत के प्राचीन साहित्य में व्यंग्य की बूझ रही है। ऋग्वेद में मंत्रवाची मुनियों को टर्राने वाले मेढकों की उपमा दी गई है। भविष्येतर पुराण तथा भर्तृहरिशतकत्रयं में खट्टी-मीठी गालियों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य प्रसंग उत्पन्न किए हैं— ‘गालिदानं हास्यं ललनानर्तनं स्फुटम्’, ‘ददतु ददतु गालीर्गालिगन्तो भवन्तो’। वाल्मीकि रामायण में मंथरा की षड्यंत्र बुद्धि की कायल होकर, कैकेयी उसकी अप्रस्तुत प्रशंसा करती है, "तेरे कूबड़ पर उत्तम चंदन का लेप लगाकर उसे छिपा दूँगी, तब तू मेरे द्वारा प्रदत्त, सुंदर वस्त्र धारण कर देवांगना की भाँति विचरण करना।" रामचरितमानस में भी ‘तौ कौतुकिय आलस नाहीं’ (कौतुक प्रसंग) तथा राम कलेवा में हास्य-व्यंग्य वार्ताएँ हैं। संस्कृत कवियों कालिदास, शूद्रक, भवभूति ने विदूषक के ज़रिए व्यंग्य-विनोद का कुशल संयोजन किया है, "दामाद दसवाँ ग्रह है, जो सदा वक्र व क्रूर रहता है। जो सदा पूजा जाता है और सदा कन्या राशि पर स्थित है।"
    लोक-जीवन में तमाशेबाज़ी, बातपोशी, रसकथाओं, गालीबाज़ों, भांडों और बहुरुपियों ने हास्य-व्यंग्य वृत्तांत वर्णित किए हैं। विवाह और होली पर्व पर हमारा विनोदी स्वभाव उभर आता है। अतः दीगर यह कि विश्व में हास्य-व्यंग्य के पुरोधा हम ही हैं।
    अस्तु, इस व्यंग्य-संग्रह को विषय एवं शैली-वैविध्य के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें व्यंग्य- कथा, निबंध, गोष्ठी, प्रश्नोत्तरी, प्रेस कॉन्फ्रेंस, संवाद, साक्षात्कार, सर्वे आदि शिल्पों की चौंतीस व्यंग्य रचनाएँ संकलित की गई हैं।
  • Grih Daah
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 280

    Item Code: #KGP-753

    Availability: In stock


  • Anandmay Jeevan Kaise Payen
    Swed Marten
    200

    Item Code: #KGP-282

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Italy (Classics)
    GLOBAL VISION PRESS
    395 316

    Item Code: #KGP-365

    Availability: In stock

    Imagine reading a 20-page introduction about an author and their times before we even start reading a story. Wait… do not imagine… just pick up any classic available, and the imagination will transform into reality. In all possibility, we 'reject' these classics outright but our grandparents still swear by their narrations and their plots. They say a good story can never be put down… what happened to these? Younger generation, wrong choices—is it?
    A good story lives and touches our hearts but only in the form the author wrote it, and not with editorial notes. What is an enjoyable tale today is a classic tomorrow. Over generations, each piece of literary classic has received newer interpretations, perceptions and proportions. The 21st century world too needs a dollop of the classics of the yesteryears, which still stand relevant to our present conditions, even though the times have changed, be it only historically.
    Keeping this thought in mind, each classic in this collection comes to the reader just as the original piece; meaning, neither the publisher nor the editor have tampered with the authors' original writings. Each classic stands untouched and unabridged—just like it was years back, fresh from the author, fresh from the press!
  • Pride And Prejudice (Paperback)
    Jane Austen
    125

    Item Code: #KGP-347

    Availability: In stock

    Boy meets girl, Girl meets boy—how boring. 
    Girl hates boy, Boy loves her not—equally boring. 
    Put in some minor love tornadoes, now you are talking. That makes for the romance of the century.
    19th century England is in the midst of love-filled storms! Welcome
    to Meryton and to Elizabeth Bennet, who by the way hates Darcy. And Darcy thinks she is a part of 'Rich Groom Hunters' (at least her mother seems so)! A dozen fights, misunderstandings, and romantic musings later, will pride and prejudice fly out of the ‘English’ window for love to breathe?
    A romance mesh in a 'spoon and fork society' with drama to put Bollywood to shame. Nothing tugs at the heart like love does—and 'Pride and Prejudice' with love stories entangled all over, still tugs at our hearts in this 21st century just as it did way back in the 19th century. Meet the ‘you’ and 'your love story' in this tale of the haughty Darcy and the hotheaded Elizabeth.
    Read Jane Austen as she places life knowledge into an excellent plot to illustrate the negatives of pride and prejudice where relationships are concerned.  
    You will agree—love surely never ages!
  • Vyavaharik Shailivigyan (Hindi)
    Dr. Bhola Nath Tiwari
    400 320

    Item Code: #Kgp-vs

    Availability: In stock


  • 23 Lekhikayen Aur Rajendra Yadav (Paperback)
    Geeta Shree
    195

    Item Code: #KGP-262

    Availability: In stock

    23 लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव
    अपने ढंग की अद्भुत पुस्तक है यह '23 लेखिकाएं और  राजेन्द्र यादव' । शायद किसी भी भारतीय भाषा में अकेली । इसे गीताश्री के पत्रकार-जीवन की एक उपलब्धि भी कह सकते  हैं । यहाँ गीता ने समय-समय पर लिखे गए समकालीन महिला-रचनाकारों के इम्प्रैशन (प्रभाव-चित्रों) का संयोजन किया है । कहीं ये साक्षात्कार हैं तो कहीं संस्मरण, कहीं राजेन्द्र जी के रचनाकार को समझने की कोशिश है तो कहीँ 'हंस' के संपादकीय, को लेकर उन पर बाकायदा मुकदमे । यहाँ अगर मन्नू भंडारी, मृदुता गर्ग, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोडा, ममता कालिया, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका तथा कविता हैं तो निर्मला जैन, जयंती  रंगनाथन, पुष्पा सक्सेना, वीना उनियाल और रचना यादव भी अपने वक्तव्यों के साथ उपस्थित है । राजेन्द्र यादव अपने समय के सबसे महत्त्वपूर्ण कथाकार, नई कहानी आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तक और कथा-समीक्षा के विलक्षण व्याख्याकार हैं । इ