Bhartiya Rajneeti Mein Modi Factor Tatha Anya Prasang (Paperback)

Bhagwan Singh

Availability: In stock

Seller: KGPBOOKS

Qty:
300 +


  • Year: 2018

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-936159-6-6

भगवान सिंह हमारे समय के ऐसे चिंतक हैं जिन्होंने दलगत राजनीति से दूर रहकर संपूर्ण राजनीतिक विवेक के साथ  समकालीन भारतीय सत्ता और व्यवस्था का तार्किक विश्लेषण किया है। उनकी यह नई पुस्तक भारतीय राजनीति में मोदी फैक्टर तथा अन्य प्रसंग एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विमर्श को व्यक्त करती है।
बिना किसी राजनीतिक व्यक्तित्व का नामोल्लेख किए यह कहा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति का चरित्र बहुत बदल गया है। सत्तापक्ष और विपक्ष की अनवरत सक्रियताएं कभी देश की आर्थिक स्थिति का विवेचन करती हैं और कभी सांस्कृतिक संदर्भों पर बहस छेड़ती हैं।
इस विवेचन और बहस को अत्यंत गतिशील बनाने का श्रेय भारतीय राजनीति के नए सत्ता समीकरणों को है। जाहिर है जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व राष्ट्र को मिला है तब से ऐसी बहुत सारी बातें उभरकर सामने आई हैं जो वर्षों से सुप्तावस्था में थीं। वे प्रश्न जो एक ‘मौन मंत्रणा’ के तहत जाने किन तहखानों में छिपा दिए गए थे। भगवान सिंह ने एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति को केंद्रीयता देते हुए राजनीतिक और सामाजिक परिवेश पर बहस छेड़ी है। यह उल्लेखनीय है कि भगवान सिंह कभी भी एकांगी चिंतन नहीं करते। वे तथ्यों और तर्कों के साथ अपनी बात रखते हैं। एक प्रसंग में लिखते हैं, ‘वह अवसर की समानता की नींव डाल रहा है। अपनी भाषा के माध्यम से ही सारे कामकाज के लिए अभियान चला रहा है और तुम समानता की बात करते हुए अंग्रेजी के हिमायती और स्वभाषा शिक्षा और समान अवसर वेफ विरोधी रहे हो।’
पुस्तक को पढ़ते हुए समकालीन परिवेश में चारों ओर फैले वे सवाल दस्तक देने लगते हैं जिनका उत्तर देना आज एक बुद्धिजीवी का दायित्व है। कहना होगा कि भगवान सिंह ने तुलनात्मक प्रविधि का इस्तेमाल करते हुए संवादधर्मिता के साथ इस दायित्व का निर्वाह किया है। भारत और भारतीयता में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए यह एक अनिवार्य पुस्तक है।

Bhagwan Singh

भगवान सिंह
जन्म: 1 जुलाई, 1931, गगहा, गोरखपुर, किसान परिवार।
शिक्षा: एम.ए. हिंदी, गोरखपुर।
कृतियां: काले उजले पीले, 1964 (उपन्यास) ०  अपने समानान्तर, 1970 (कविता-संग्रह) ०  महाभिषग, 1973 (उपन्यास) ०  आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता, 1973 (भाषाशास्त्रा) ०  हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य, 1987 (इतिहास) ०  अपने अपने राम, 1992 (उपन्यास) ०  उपनिषदों की कहानियां 1993 ०  पंचतंत्र की कहानियां 1995 (पुनर्लेखन) ०  परमगति, 1997 (उपन्यास) ०  उन्माद 1999 (उपन्यास) ०  शुभ्रा, 2000 (उपन्यास) ०  द वेदिक हड़प्पन्स, 1995 (इतिहास) ०  इंद्रधनुष के रंग, 1996 (आलोचना) ०  भारत: तब से अब तक, 1996 (इतिहास) ०  भारतीय परंपरा, 2011 ०  प्राचीन भारत के इतिहासकार, 2011 ०  कोसंबी: कल्पना से यथार्थ तक (2012)।
गतिविधि: अध्ययन-लेखन। मौलिक इतिहास चिंतन में विशिष्ट नाम।
सम्मान: हिंदी अकादमी का पहला पुरस्कार 1986-87 में ‘हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य’ पर तथा दूसरा पुरस्कार 1999-2000 में ‘उन्माद’ पर।

Scroll