Kavi Ne Kaha : Manglesh Dabral (Paperback)

Manglesh Dabral

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  • Year: 2016

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-85054-52-5

कवि ने कहा: मंगलेश डबराल
मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से अपनी सृजनात्मक प्रेरणा ग्रहण करती हुई हिंदी कविता की आज जो पीढ़ी उपस्थित है, उसमें मंगलेश डबराल जैसे समर्थ कवि इतने वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी होते जा रहे हैं कि उनके किसी एक या चुनिंदा पहलुओं को पकड़कर बैठ जाना अपनी समझ और संवेदना की सीमाएं उघाड़कर रख देना होगा। एक ऐसे संसार और समय में जहां ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्हीं भी शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को उसके हाशिये से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचोबीच लाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, ईषर्यालु अथवा आत्मदयाग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोज़ख़ को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इनकार करता है।
मंगलेश की इन विचलित कर देने वाली कविताओं में गहरी, प्रतिबद्ध, अनुभूत करुणा है, जिसमें दैन्य, नैराश्य या पलायन कहीं नहीं है। करुणा, स्नेह, मानवीयता, प्रतिबद्धता--उसे आप किसी भी ऐसे नाम से पुकारें, लेकिन वही जज़्बा मंगलेश की कविता में अपने गांव, अंचल, वहां के लोगों, अपने कुटुंब और पैतृक घर और अंत में अपनी निजी गिरस्ती के अतीत और वर्तमान, स्मृतियों और स्वप्नों, आकांक्षाओं और वस्तुस्थितियों से ही उपजता है। उनकी सर्जना का पहला और ‘अंतिम प्रारूप’ वही है।
आज की हिंदी कविता में मंगलेश डबराल की कलात्मक और नैतिक अद्वितीयता इस बात में भी है कि अपनी शीर्ष उपस्थिति और स्वीकृति के बावजूद उनकी आवाज़ में उन्हीं के ‘संगतकार’ की तरह एक हिचक है, अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की कोशिश है, लेकिन हम जानते हैं वे ऐसे विरल सर्जक हैं जिनकी कविताओं में उनकी आवाज़ें भी बोलती-गूंजती हैं जिनकी आवाज़ों की सुनवाई कम होती है।

Manglesh Dabral

मंगलेश डबराल

मंगलेश डबराल का जन्म 16 मई 1948 को उत्तराखंड में टिहरी जिले के काफलपानी गांव में हुआ। वे लंबे समय तक ‘हिंदी पेट्रियट’, ‘प्रतिपक्ष’, ‘आसपास’, ‘पूर्वग्रह’, ‘जनसत्ता’ और ‘सहारा समय’ आदि समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में काम करते रहे और इन दिनों नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से जुड़े हैं। उनके पांच कविता-संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’, ‘घर का रास्ता’, ‘हम जो देखते हैं’, ‘आवाज़ भी एक जगह है’, ‘मुझे दिखा एक मनुष्य’ और तीन गद्य-संग्रह ‘एक बार आयोवा’, ‘लेखक की रोटी’ और ‘कवि का अकेलापन’ प्रकाशित हैं। उन्होंने बेर्टोल्ट ब्रेष्ट, हांस माग्नुस ऐंत्सेंसबर्गर (जर्मन), यानिस रित्सोस (यूनानी), ज़्बग्नीयेव हेर्बेत, तादेऊष रूजे़विच (पोल्स्की), पाब्लो नेरूदा, एर्नेस्तो कार्देनल (स्पानी), डोरा गाबे, स्तांका पेंचेवा (बल्गारी) आदि की कविताओं का अनुवाद किया है। जर्मन उपन्यासकार हेर्मन हेस्से के उपन्यास ‘सिद्धार्थ’ और बांग्ला कवि नवारुण भट्टाचार्य के संग्रह ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’ के सह-अनुवादक भी हैं। उन्होंने नागार्जुन, निर्मल वर्मा, महाश्वेता देवी, यू. आर. अनंतमूर्ति, गुरदयाल सिंह, कुर्रतुल ऐन हैदर पर वृत्तचित्रों पर पटकथा-लेखन किया है। 
प्रायः सभी भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन, डच, फ्ऱांसीसी, स्पानी, इतालवी, पोल्स्की और बल्गारी आदि विदेशी भाषाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हैं। कुछ अंग्रेज़ी अनुवाद डेनियल वाइसबोर्ट और अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा द्वारा संपादित ‘पेरीप्लस’, वाइसबोर्ट और गिरधर राठी द्वारा संपादित ‘जेस्वर्स’, एक सौ भारतीय कवियों के संकलन ‘सिग्नेचर्स’ और कैलाश वाजपेयी के संपादन में रूपा एंड कंपनी की ‘एंथोलॉजी ऑफ हिंदी पोयट्री’ में संकलित। 
मंगलेश डबराल ने बल्गारिया, अमेरिका, मॉरीशस, रूस, नेपाल, जर्मनी आदि शहरों में काव्यपाठ किये और उन्हें ओमप्रकाश स्मृति सम्मान, शमशेर सम्मान, पहल सम्मान, साहित्य अकादेमी पुरस्कार और हिंदी अकादमी, दिल्ली का साहित्यकार सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं।

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