Kabir Ka Samagra Anbhai Sansar (2nd Part)

Govind Rajnish

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  • Year: 2015

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Amarsatya Prakashan

  • ISBN No: 9789383234370

संत कबीर भारतीय चेतना का ऐसा शिखर है जिसके सम्मुख शब्द और शब्दातीत नतमस्तक होते हैं। उनकी बानी ‘अनहद का अनुभव’ है। ऐसा अनुभव; जिसमें जीव, जगत् और परमात्मा की सघन अभिव्यक्ति है। कबीर की बानी साखी, सबद, रमैनी के अंतर्गत रखकर पढ़ने व विश्लेषित करने की सुदीर्घ परंपरा है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ में मर्मज्ञ आलोचक प्रो. गोविंद रजनीश ने इस परंपरा को संवधिर्त किया है।
कबीर-काव्य के तीन स्रोत हैं—राजस्थानी, पंजाबी और पूरबी की प्राचीन पांडुलिपियाँ। इनके तुलनात्मक विवेचन द्वारा मूल व प्रामाणिक पाठ तक पैठने का यत्न किया गया है। कबीर के नाम से प्रचलित ‘बानियों’ और ‘क्षेपकों’ का तार्किक परीक्षण किया गया है। इससे कबीर-काव्य का आस्वाद दुगुना हो गया, ऐसा पाठक महसूस करेंगे।
प्रो. रजनीश ने भावार्थ, पाठांतर और टिप्पणी के द्वारा कबीर के अनेक आयामों को उद्घाटित किया है। कबीर लोक में समाए संत-कवि हैं। उनसे संबंधित बहुतेरे तथ्य दंतकथाओं, जनश्रुतियों और अन्य शब्द-प्रपंच में ओझल होते रहे हैं। यहाँ एक प्रयास यह भी है कि ‘चिनगी’ को ‘राख’ से निकाल लिया जाए। तभी यह सिद्ध हो सका कि कबीर-काव्य समकालीन संदर्भों में एक नयी प्रासंगिकता अर्जित कर रहा है। झूठ, कपट, पाखंड के खिलाफ सदियों पहले गूँजे शब्द आज भी चुनौती और चेतावनी दे रहे हैं।
‘संसकिरत है कूप जल भाखा बहता नीर’ ऐसा कहने वाले कबीर की अंतरात्मा को थाहना बेहद कठिन रहा है। ‘ढाई आखर’ के बल पर पंडिताई को ललकारने वाले कालजयी कबीर के प्रामाणिक पाठ को अर्थ-विस्तार से पढ़कर पाठक निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे। शोध्कर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध पाठकों तक समानरूपेण उपयोगी। मानव जीवन के उन्नयन व परिष्कार के साथ भक्ति और अध्यात्म की रश्मियाँ बिखेरती कबीर बानी को विद्वान् लेखक ने ‘पुनः पाठ की सार्थकता’ प्रदान की है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ वस्तुतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है

Govind Rajnish

डॉ० गोविन्द रजनीश
जन्म : 10 सितंबर, 1938 को राजस्थान के वैर कसी में 
शिक्षा : राजस्थान विश्वविद्यालय से एम०ए० आगरा विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० और डी०लिट्० सैंतीस वर्षों तक विश्वविद्यालयों में अध्यापन 1 जुलाई, 1999 को प्रोफेस-पद से सेवानिवृत्त इस दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के भाषा-सलाहकार तथा क० मुं० हिंदी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ के निदेशक रहे।  जाने-माने साहित्यकार । तीस पुस्तकें प्रकाशित । पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लेखन
प्रमुख रचनाएँ-
समकालीन हिंदी कविता की संवेदना', 'साहित्य का सामाजिक यथार्थ', 'पुनश्चितन', 'समसामयिक हिंदी कविता : विविध परिदृश्य', 'रांगेय राघव का रचना-संसार', 'नयी कविता : परिवेश, प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति' (आलोचना) ० 'रहीम ग्रंथावली', 'सत्यनारायण ग्रंथावली', 'रैदास रचनावली', 'नामदेवर चनावली', 'पंचामृत और पंचरंग', 'बखना रचनावली', 'हिंदी की आदि और मध्यकालीन फागु कृतियां' (संपादन) ०  'लोक महाकाव्य : आल्हा', 'हरदौल लोकगाथा', 'राजस्थान के पूर्वी अंचल का लोकसाहित्य', 'ब्रज की लोकगाथाएँ' (लोकसाहित्य) ० साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित 'इनसाइक्लोपीडिया आंफ इंडिया लिट्रेचर' के छह खंडों के लिए लेखन
सहस्राब्दी विश्व हिंदी सम्मेलन, केंद्र साकार, उ०प्र० सरकार, उ०प्र० हिंदी संस्थान, सत्यनारायण-स्मारक-समिति, आगरा विश्वविद्यालय तथा लोक परिषद से सम्मानित एवं पुरस्कृत ।

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