Bhartiya Snaskriti Ke Samajik Sopan

Shardendu

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Arya Prakashan Mandal

  • ISBN No: 9788189982553

भारतीय संस्कृति के सामाजिक सोपान
प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति अनुराग जगाया आदरणीय श्री वियोगी हरि ने। आकर्षण पैदा किया रामायणकालीन स्थलों (डॉ. बी.बी. लाल), समुद्र के गर्भ में सोई द्वारिका (प्रो। एस.आर. राव), दुर्गम प्रकृति की गोद में रक्षित भीमबेटका शैलाश्रय (डॉ. श्रीधर विष्णु वाकणकर), सरस्वती के लुप्त मार्ग तथा बनावली, धौलावीरा आदि भूगर्भ में दबे सिंधु सभ्यताकालीन अवशेषों की खोज ने। हर नई खोज ने सोचने को प्रेरित किया कुछ अनुत्तरित प्रश्नों के हल और हर हल के साथ खुलती गईं प्राचीन भारतीय संस्कृति की नई-नई परतें।
इस कार्य में साक्षी बने प्राचीन वाङ्मय के साथ-साथ अतीतान्वेषण में संलग्न अन्य माध्यम, यथा: मानव- विज्ञान, पुरातत्त्व, भूगर्भविज्ञान, भूगोल, इतिहास, मौसम-विज्ञान, समाजविज्ञान, माक्र्सवाद, ज्योतिष आदि। इन क्षेत्रों में इस शती के नवें दशक तक पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से सामने आईं नवीनतम खोजों का एक समन्वित रूप मिलेगा। लेखक का दावा है कि इस प्रकार का यह प्रथम प्रयास है, क्योंकि प्रत्येक क्षेत्रा का पंडित केवल अपने विषय को ही सिद्ध करना चाहता है और अन्य विषयों से या तो वह अनजान रहा आता है अथवा उनकी उपेक्षा करता है। लेखक ने इस एकांगी दृष्टि से स्वयं को मुक्त रखने का प्रयास किया है।
भारतीय संस्कृति का अब तक जो अनुशीलन हुआ है, उसमें उसके दार्शनिक, धार्मिक तथा भावनात्मक पक्षों पर ही अधिक बल है, सामाजिक पक्ष की प्रायः उपेक्षा हुई है। लेखक का विश्वास है कि केवल भारतीय संस्कृति ही नहीं, वरन् संपूर्ण मानव संस्कृति के सामाजिक अतीत में पैठने और उसके भविष्य में झाँकने के लिए पाठक को इसमें रुचिकर जानकारी के साथ-साथ एक सर्वथा नवीन, तर्कपूर्ण, विज्ञानसम्मत दृष्टि मिलेगी, जो करवट लेते वर्तमान समाज की नई संरचना में उपयोगी, सहायक और महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकेगी। इति कल्याणमस्तु।

Shardendu

शरदेन्दु
विज्ञान में स्नातक, किंतु कर्मक्षेत्र के लिए पत्रकारिता का वरण। सैंतीस वर्ष (मई, 1949 से फरवरी, 1986 तक) दैनिक तथा साप्ताहिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली से संबद्ध। तत्पश्चात् जुलाई, 1990 तक भोपाल तथा लखनऊ में दैनिक नवजीवन के संपादक-पद पर कार्यरत।
साहित्य के प्रति छात्रा जीवन से ही अनुराग। प्रायः सभी विधाओं पर कलम चलाई-काव्य, कथा-कहानी, व्यंग्य, ललित लेखन, सामयिक समस्याएँ। प्रागैतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व में विशेष अभिरुचि। अनेक वर्षों तक ‘दैनिक हिंदुस्तान’ में साहित्य परिशिष्ट का संपादन। ‘यत्रा तत्रा सर्वत्रा’ (व्यंग्य), ‘इंद्रधनुष’ (विविध), ‘रविवासरीय अग्रलेख’ (काव्योदाहरणों युक्त) जैसे लोकप्रिय स्तंभों का नियमित लेखन।
‘राम की अयोध्या’ (दैनिक हिंदुस्तान में 13.10.1980 को प्रकाशित) शोधपूर्ण लेख द्वारा अयोध्या की वास्तविक भौगोलिक स्थिति की ओर ध्यान आकृष्ट करने वाले प्रथम लेखक।
प्रकाशित ग्रंथ-
‘राजघाट’ (काव्य); ‘मैमसाब का दस्ताना’, ‘हम हड़ताली जनम के’, ‘चम्पतलालजी’ (व्यंग्य); ‘आपकी राशि भविष्य की झाँकी’, ‘डिक्शनरी ऑफ  एस्ट्रोलॉजी’, ‘संकेत निधि’ (ज्योतिष, संपादित); ‘अंकों में छिपा भविष्य’ (कीरो, अनुवाद) आदि।

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