Gai Jhulani Toot

Usha Kiran Khan

Availability: In stock

Seller: KGPBOOKS

Qty:
270.00 243 +


  • Year: 2018

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-936159-7-3

उषाकिरण खान हिंदी की ऐसी रचनाकार हैं जिन्हें असंख्य पाठकों का साथ मिला है। वे चालू फैशन की ओर या प्रायोजित विमर्श की ओर कभी नहीं जातीं। उनके  पास बेशुमार कहानियां हैं जो पाठकों को व्यापक संवेदना से जोड़ती हैं।
उषाकिरण खान का यह नया उपन्यास गई झुलनी टूट उनकी प्रसिद्धि को एक कदम आगे लेकर जाता है। इसमें उन्होंने एक सीधा-सादा मगर मार्मिक सवाल उठाया है, 
‘...जीवन केवल संग-साथ नहीं है। संग-साथ है तो वंचना क्यों है?’ इस रचना में उन्होंने सामान्य भारतीय परिवेश में एक स्त्री की जीवन-दशा का मार्मिक चित्रण किया है। वे अपने अनुभवों का इतना विस्तार करती हैं जैसे पूरा उपन्यास उनके आसपास जीवित किसी पात्र की दास्तान है। वे धरती की ध्वनियों को सुनती हैं और जीवन की जय-पराजय महसूस करती हैं।
अथाह संघर्षों के बीच भी उषाकिरण खान जिजीविषा का संदेश देती हैं, ‘किसी एक व्यक्ति के सुख से न तो खेतों में हरियाली छा जाती है, न उसके दुःख के ताप से खेत, नदियां, तालाब सूख जाते हैं। जब मन में पीड़ा का आलोड़न हिलोरें लेने लगता है तब भी चेहरे पर मुस्कान रखना पड़ता है सामने की पौध के लिए।’
लोकजुड़ाव उषाकिरण खान की शक्ति है। यह उपन्यास सिद्ध करता है कि वे मैथिली और हिंदी की अद्वितीय कथाकार हैं। ऐसी कथाकार जिन्होंने नारी मन को पहचाना है और बिना स्त्री-विमर्श के कुलीन झंझट में पड़े उसके मन की सच्चाइयों को व्यक्त किया है। इसमें विशेषता यह है कि उपन्यास जीवन की सहजता को कहीं से खंडित नहीं करता और न ही यह लगता है कि अमुक कथा प्रसंग या पात्र गढ़कर पेश किया गया है। प्रस्तुत उपन्यास ‘भारतीय उपन्यास’ का एक प्रतिनिधि रूप है। इसमें जीवन-जगत् की अनुपम अनुगूंज है।

Usha Kiran Khan

उषाकिरण खान जन्म : लहेरिया सराय, दरभंगा, बिहार शिक्षा : एम. ए., पी-एच. डी हिंदी रचनाएं : विवश विक्रमादित्य, दूब-धान, कासवन, गीली पांक, जनम अवधि, घर से घर तक, जलधार, संकलित कहानियां (कहानी संग्रह) फागुन के बाद, सीमांत कथा, रतनारे नयन, पानी पर लकीर, सिरजनहार, अगन हिण्डोला (उपन्यास); कहा गए मेरे उगना, हीरा डोम (नाटक); डैडी बदल गए हैं, नानी की कहानी, सात भाई और चंपा, चिडिया चुग गई खेत (बाल नाटक); एक बम हजार गम (नुक्कड़ नाटक); उड़ाकू जनमेजय (बाल उपन्यास); लेख एवं रिपोर्ताज संग्रह लगभग सौ के करीब प्रकाशित, अनेक बाल कथाएं प्रकाशित एवं प्रसारित । चित्रकथा वीर कुंअर सिंह। मैथिली रचनाएं : कॉचहि बांस (कहानी-संग्रह); अनुत्तरित प्रश्न, हसीना मंजिल, भामती, दूर्वाक्षत, पोखरि रजोखरि (उपन्यास); जाइ संपहिने (काव्य); आलेख एवं रिपोर्ताज लगभग दो दर्जन; फागुन, एकसरि ठाढ़, मुसकौल बला (नाटक); नवतुरिया (लेखक नागार्जुन यात्री), मर्यादाक भंग (लेखक हरिमोहन झा) (नाट्य दरूपांतर); घंटी से बान्हल राजू, बिरड़ो आबिगेल (बाल नाटक); दूरदर्शन के क्लासिक श्रृंखला से 'हसीना मंजिल' का प्रसारण। पुरस्कार : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का हिंदी सेवी सम्मान, बिहार राजभाषा विभाग का महादेवी वर्मा सम्मान, दिनकर राष्टीय पुरस्कार, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, कुसुमांजली पुरस्कार, विद्यानिवास मिश्र पुरस्कार । संप्रति : लेखन में सलंग्न।

Scroll