Anveshak

Pratap Sehgal

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170160984

अन्वेषक
महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम अतीत की ओर मुँह करके खडे को जाएँ और खडे रहें। हाथ में अतीत का झंडा उठा लें और गौरव को मीनारों पर चढ़कर खुद को बडा महसूस करें। महत्वपूर्ण यह है कि अतीत को खँगालें, अतीत की मीनारों को ओर देखें, पर अपने पैरों तले को जमीन न छोड़ें।
'अन्वेषक' को रचना का मूल बिंदु यहीँ से शुरु होता है। इसी अर्थ में यह नाट्य-रचना पाँचवीं शती के उत्तरार्द्ध में हुए आर्यभट और उसके अन्वेषणों के बहाने समकालीन प्रश्नों यर विचार करती है। प्रगतिकामी और प्रतिगामी शक्तियों के बीच को रहे संघर्ष को नाटकीय तनावों के साथ अभिव्यक्त करती है। अवरोधकारी और अंधविश्वासी शक्तियों के सामने क्रांतिकारी अन्वेषण करने वाले किसी भी अन्वेषक को जिस मानसिक यातना से गुजरना पड़ सकता है और अंततः  उसकी क्या नियति हो सकती है इस सवाल पर भी यह नाटक गौर करता है।
इतिहास नाटक की पृष्ठभूमि है इसलिए यह ऐतिहासिक नाटक नहीं है। इसका मकसद की जानकारी देना भी नहीं, बल्कि इतिहास के एक कालखंड, उस कालखंड में जन्मे आर्यभट के अन्वेषणों के बहाने परिवर्तन-, शक्तियों के संघर्ष को रेखाकित करना है। इसी के साथ जुड़ते है प्रेम, ईष्यों, स्मृहा, देश-प्रेम और वैज्ञानिक-टैम्पर से जुडे तमाम सवाल । 
इन अर्थों में 'अन्वेषक' हिंदी नाटकों की उस परंपरा को आगे बढाता है जो प्रसाद से शुरू होकर मोहन राकेश में बदल जाती है। यहीं इतिहास पर उतना आग्रह नहीं, जितना प्रसाद को था पर नाटय-व्यापार पर आग्रह है। इतिहास के महीन तंतु को एक प्रभावी नाटक में रचने की क्षमता यहाँ साफ झलकती है। आशा है प्रताप सहगल का यह नाटक रंगकर्मियों  एवं नाट्य प्रेमियों की अदम्य रंग-पिपासा को एक सीमा तक अवश्य ही शांत करेगा।

Pratap Sehgal

प्रताप सहगल
जन्म : 10 मई, 1945
प्रकाशित रचनाएँ :- कविता-संग्रह : 'सवाल अब भी मौजूद है', 'आदिम आग', 'अँधेरे में देखना', 'इस तरह से', 'नचिकेतास ओडिसी', 'छवियाँ और छवियाँ', मुक्तिद्वार के सामने  ० नाटक : 'अन्वेषक', 'रंग बसंती', 'नहीं कोई अंत', 'मौत क्यों रात- भर नहीं आती', 'चार रूपांत',  'नौ लघु नाटक',  'पाँच रंग नाटक', 'अपनी-अपनी भूमिका', 
'कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक है', 'कोई और रास्ता', 'मेरे श्रेष्ठ लघु नाटक', 'अंधेरे में' (पीटर शेफर के नाटक ब्लैक कॉमेडी का रूपांतर), 'किस्सा तीन गुलाबों का' (बल्गेरियन नाटक का अनुवाद), 'छू मंतर' (बाल नाटक), 'दस बाल नाटक', 'दो बाल नाटक' ०  उपन्यास : 'अनहद नाद', 'प्रियकांत' ० कहानी-संग्रह : 'अब तक', 'मछली-मछली  कितना पानी' ० आलोचना : 'समय के सवाल', 'रंग चिंतन', 'समय के निशान', ० विविध : 'अंशतः' (चुनिंदा रचनाओं का संग्रह)
सम्मान एवं पुरस्कार : साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली ० सौहार्द सम्मान, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ ० मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार ० 'रंग बसंती' पर साहित्य कला परिषद द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख पुरस्कार ० 'अपनी-अपनी भूमिका' शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत  ० 'आदिम आग' व 'अनहद नाद' हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत ० राजभाषा सम्मान, भारत सरकार एवं हिंदीसेवी राजभाषा सम्मान रोटरी क्लब, दिल्ली

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