Gorakhdhandha

Jaivardhan

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  • Year: 2020

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-942160-9-4

जब पैसा ही धर्म बन जाए, पैसा ही कर्म बन जाए तो सारे संबंध, सारी नैतिकता अर्थहीन हो जाते हैं। जब पैसा कमाना ही एक मात्र उद्देश्य हो तो इंसान का खु़राप़फ़ाती दिमाग़ कोई न कोई तिकड़म करता रहता है। कुछ ऐसे भी लोग होते है जो रेत में तेल निकाल लेते हैं। इस नाटक का मुख्य किरदार ऐसा ही व्यक्ति है, जो लोगों से पैसा ऐंठने के लिए सारे रास्ते अपनाता है और गिरगिट की तरह रंग बदलता है। देखने और सुनने से लगता है कि वह मदद कर रहा है, परोपकार कर रहा है, दूसरों का भला कर रहा है। दरअसल वह भलाई की आड़ में अपना भला कर रहा होता है। उसका कहना है कि बेईमानी भी ईमानदारी से करता है। कुल मिलाकर ‘गोरखधंधा’ सत्य कथाओं पर आधारित एक असत्य हास्य नाटक है।

Jaivardhan

जयवर्धन
जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988µ94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।

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