Shiksha Ki Sarthakta

Jagmohan Singh Rajput

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  • Year: 2019

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788194092131

प्रस्तुत पुस्तक शिक्षा की सार्थकता में उन सभी पक्षों को सम्मिलित किया गया है जो देश में वर्ष 2015-17 के बीच चर्चित होते रहे। लगभग हर स्तर पर मूल्यों के क्षरण तथा गुणवत्ता के ”ास और संस्थाओं की गिरती साख पर चिंता प्रकट की गई है।
पुस्तक के विभिन्न लेखों में जिस भी पक्ष या संदर्भ को उठाया गया है, उसमें अध्यापकों, छात्रें तथा प्रशासकों का योगदान अवश्य दिखाई देगा क्योंकि इन्हें अनेक प्रकार की चर्चाओं तथा लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर ही लिखा गया है। लेखक के अनेकानेक विद्यार्थी देश के विभिन्न भागों में स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक शिक्षा दे रहे हैं। उनके साथ अनेक बार नई जानकारियाँ मिलती रहती हैं। उन सबके अनुभवों का भी इस पुस्तक के बनाने में विशेष योगदान है।
अच्छी गुणवत्ता, कौशल तथा मानव-मूल्य देने वाली शिक्षा से अधिक प्रभावशाली अन्य कोई मार्ग मनुष्य को उपलब्ध नहीं है जो शांति, सद्भाव, समेकित विकास और प्रगति के रास्ते सभी के लिए खोल सके। अपेक्षा है कि सामान्य भाषा में परिचित संदर्भों को उठाने वाली यह पुस्तक शिक्षा जगत् में और गहन मनन और चिंतन को बढ़ाएगी और इस प्रकार शिक्षा की उपयोगिता बढ़ाने में अपना योगदान भी करेगी।



Jagmohan Singh Rajput

जगमोहन सिंह राजपूत
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में सन् 1943 में जन्मे 
प्रो०  जगमोहन सिंह राजपूत ने प्रयाग विश्वविद्यालय से भौतिकी में शोध-उपाधि अर्जित कर सन् 2002 में शिक्षा 
में डी० लिट्०  की मानद उपाधि प्राप्त की। उनके भौतिकी के शोधपत्रों ने उन्हें सन् 1974 में प्रोफेसर-पद पर नियुक्ति दिलाई। भारत सरकार में संयुक्त शिक्षा सलाहकार (1989-94), राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्, एन० सी०  टी० ई०  के अध्यक्ष (1994-99) व एन० सी० ई० आर० टी०  के निदेशक (1999-2004) पदों पर रहे प्रो०  राजपूत अपने कार्यों के लिए सराहे गए तथा आलोचनाओं से कभी दूर नहीं रहे। बी० एड०  पत्राचार के पाठ्यक्रमों को नियंत्रित करने तथा दो वर्षीय बी० एड०  पाठ्यक्रमों को प्रारंभ कर उन्होंने अध्यापक शिक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। स्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम परिवर्तन के लिए जो दृढ़ता तथा आत्मविश्वास उन्होंने पाँच वर्षों में अपने विरोधियों को निरुत्तर करने में दिखाया उसकी सराहना विरोधियों ने भी की। अनुशासन, समयपालन तथा कार्य में गुणवत्ता लाने के सजग पक्षधर प्रो०  राजपूत ने अनेक विषयों पर शोध कराए और पुस्तकें लिखी हैं। इनमें कविताओं की पुस्तक भी शामिल है। इधर के वर्षों में उन्होंने हिंदी तथा अंग्रेजी में सैकड़ों लेख लिखने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोधपत्र लिखे तथा अतिथि संपादक रहे। श्रेष्ठ शोध तथा नवाचार के लिए यूनेस्को ने उन्हें सन् 2004 में जॉन एमोस कोमेनियस पदक के लिए चुना। वे मूल्यों की शिक्षा, सामाजिक सद्भाव तथा शिक्षा में सभी धर्मों के मूलभूत तत्त्वों की जानकारी के पक्षधर हैं।

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