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  • Aadarsh Ghar-Parivaar Aur Mahilayen
    Sudha Gautam
    180 162

    Item Code: #KGP-187

    Availability: In stock

    'आदर्श घर-परिवार और महिलाएँ' पुस्तक में सुधा गौतम ने अपने अनुभवों के आधार पर जिन शीर्षकों के अंतर्गत जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण बातों की जानकारी दी है, उनमें से कुछ शीर्षकों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है । आशा है, यह पुस्तक महिलाओं के साथ-साथ पूरे परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध होगी :
    ० जिंदगी को खूबसूरत बनाने के लिए
    ० छोटी-छोटी बातों से न हो परेशान
    ० बाँधे रखें पति को
    ० कड़वी यादे भुला दें
    ० जब आप फोटो खिंचवाने जाएं
    ० आप और आपकी शारीरिक गठन
    ० आप और आपका परिधान
    ० आप और आपकी नींद
    ० वर्तमान में जीना सीखें
    ० यदि आपके घर में नौकर है
    ० आप और आपकी खरीदारी
    ० आप और आपके घर के कीड़े-मकोड़े
    ० आपकी बढती उम्र और आप
    ० बच्चों के सुन्दर भविष्य के लिए
    ० जब आप सफर पर जाएं
    ० जब आपके मेहमान आपके घर आएं
    ० आप और आपकी सेहत
    ० बच्चों के लिए नाश्ता 
    ० चमकदार त्वचा के लिए
    ० खूबसूरत होंठों के लिए
    ० त्वचा में निखार के लिए
    ० गर्मियों में आपका मेकअप
    ० मुँहासों से छुटकारा
    ० खूबसूरत बालों के लिए
    ० आपकी गर्दन रहे सुंदर
    ० धूप का चश्मा
    ० आप और आपके गहने
    ० आपके घर का फर्श
    ० महिलाएँ और रसोई
    ० आपके गरम कपडे
    ० कैसे छुड़ाएँ कपडों के दाग
    ० अपने बच्चों के मित्र बनिए
    ० जब बच्चा स्कूल जाने लगे
    ० जिद्दी बच्चा
    ० माँ-बेटी का रिश्ता
    ० बच्चे कैसे बनाएं अपनी अलग पहचान
    ० बच्चे अपना काम स्वयं करें
    ० बच्चे भोजन बेकार न करें
    ० शरारती बच्चों को कैसे सुधारें
    ० बच्चों के ज्ञानवर्द्धन के लिए
    ० जब आपका बच्चा आपसे दूर रहे
    ० छात्र और परीक्षा
    ० बच्चे कैसे रहें परीक्षा के दिनों में  तनावमुक्त
    ० कैसे लिखे प्रश्नों के उत्तर
    ० कैसे मिले परीक्षा में सफलता
    ० आपका कंप्यूटर
    ० आप और आपके छोटे बच्चे
    ० बच्चों की छोटी-मोटी तकलीफें
    ० घरेलू दवाइयाँ
    ० छोटी-छोटी काम की बातें

  • Mere Saakshatkaar : Mamta Kaliya
    Mamta Kalia
    200 180

    Item Code: #KGP-558

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sanskriti Aur Hindi-Pradesh-1
    Ram Vilas Sharma
    750 675

    Item Code: #KGP-9024

    Availability: In stock

    भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश : 1
    महाभारत और रामायण में सभागारों और बड़े-बड़े भवनों का वर्णन है । वे हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों में प्रत्यक्ष है । पाटलिपुत्र एक बड़े साम्राज्य की राजधानी बना । वहां के भवन चीनी यात्री फाहियान ने देखे तो उसने सीधा, ये मनुष्यों के नहीं, देवों के बनाए हुए होंगे । पाटलिपुत्र, काशी, मथुरा और उज्जयिनी, ये भारत के प्राचीन नगर थे । आज भी ये संसार के ऐसे प्राचीनतम नगर हैं, जिनका इतिहास अब तक अटूट चला आ रहा है । भारतीय संस्कृति का बहुत गहरा संबंध इन चार महानगरों से है । इन नगरों पर ध्यान देते ही यह प्रचलित धारणा खंडित हो जाती है कि भारत ग्राम समाजों का देश है, यहाँ के लोग कला-कौशल में पिछडे हुए थे और हमें उन्हें ग्राम समाजों की ओर लौट जाना चाहिए । ये चारों महानगर विभिन्न युगों में व्यापारिक संबंधों से परस्पर जुड़े रहे हैं । इन्होंने दक्षिण जनपदों के मदुरै आदि नगरों से भी संबंध कायम किया था । मगध से मालवा तक अब जातीय भाषा के रूप में हिन्दी का व्यवहार होता है । नगरों के बिना हिन्दी का यह प्रसार भारत के सबसे बडे जातीय क्षेत्र में असंभव था । इन नगरों के द्वारा हिन्दी प्रदेश के जनपद प्राचीन काल से परस्पर संबद्ध हुए और दक्षिण भारत से उन्होंने अपना संबंध जोड़ा । इसलिए भारत राष्ट्र के निर्माण में और भारतीय संस्कृति के विकास में हिन्दी प्रदेश की निर्णायक भूमिका स्वीकार करनी चाहिए । दक्षिण में तमिलनाडु, उत्तर में कश्मीर, पूर्व में असम और पश्चिम में गुजरात, दूर-दूर के इन प्रदेशों को जोड़ने वाला, इनके बीच स्थित विशाल हिन्दी प्रदेश है । ऋग्वेद, अथर्ववेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, अर्थशास्त्र की रचना यहीं हुई । यहीं कालिदास और भवभूति ने अपने ग्रंथ रचे और मौर्य तथा गुप्त साम्राज्यों की आधारभूमि यही प्रदेश था । उत्तरकाल से दिल्ली, आगरा इस प्रदेश के बहुत बड़े नगर बने । ये व्यापार के बहुत बड़े केंद्र थे और सांस्कृतिक केंद्र भी थे । तुर्कवंशी राजाओं ने यहीं रहकर शताब्दियों तक एक बहुत बड़े राज्य का संचालन किया था । विद्यापति, कबीर, सूरदास, तुलसीदास जैसे कवि इसी क्षेत्र में हुए । इसी प्रदेश में प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन का जन्म हुआ । अपने स्थापत्य सौन्दर्य से संसार को चकित कर देने वाला ताजमहल इसी प्रदेश के आगरा नगर में है । इसलिए इस पुस्तक का नाम भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश है ।
  • Seema
    Ramkrishna Sudhakar
    125 113

    Item Code: #KGP-9090

    Availability: In stock


  • Ek Jala Huaa Ghar
    Iqbal Mazeed
    140 126

    Item Code: #KGP-1837

    Availability: In stock

    एक जला हुआ घर
    आज के पाठक को जिन चीज़ों को दुनिया में, अपने आसपास या अपने भीतर भी देखकर जो हैरत-सी होती है, यह उन्हीं हैरतों की कहानियाँ हैं।
    साहित्य को इनसान से, समाज से, जीवन से, संस्कृति और राजनीति से नए संबंध स्थापित करने पर प्रगतिशील आंदोलन ने जो ज़ोर दिया था यह उन्हीं संबंधों द्वारा जीवन के सौंदर्य, उसकी उठान और उभार को समझने का एक प्रयास है।
    कहानी का यथार्थ समाचार-पत्रों और अदालतों में प्रस्तुत किए गए यथार्थ से कैसे अलग होता है उसके लिए यह अंतर जानना, जो फिक्शन से जुड़ाव नहीं रखता, मुश्किल है। इसके अतिरिक्त कोई दावा करना या कहानियों से यह उम्मीद करना कि वह गलत होने वाली चीजों को ठीक कर देंगी, मूर्खता है; क्योंकि हर चीज़ साहित्य से ठीक नहीं की जा सकती। देखना यह होगा कि साहित्य, जिसका आधार Joy of understanding होता है, ये कहानियाँ अपने पाठक को वह आनंद कितना दे पाने में समर्थ हैं और इस काम में लेखक की ओर से डंडी तो नहीं मारी गई है। अगर इन कहानियों में उस सुंदरता और शक्ति की खोज मिल जाए, जिनको नए सांस्कृतिक मूल्यों में स्थान मिल सके तो यह लेखन सफल है।
  • Tantu
    Bhairppa
    695 626

    Item Code: #KGP-158

    Availability: In stock


  • Jhansi Ki Rani
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1821

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand
    Shanta Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-1865

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापक विवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-1
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-847

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-1
    इतिहास अगर अतीत की शव-साधना हो तो ऐसे इतिहास में जाने का हमारा कोई  इरादा नहीं, लेकिन लघुकथा के इतिहास में जाना लघुकथाओं के शवों के बीच से गुजरना भर नहीं है। बेशक एक समय बहुत शक्तिशाली मानी जाने वाली अनेक रचनाएं कालांतर में रचनाओं के शव भर रह जाती हैं और बड़े रचनाकारों की ऐसी शव-रूप रचनाओं को भी साहित्य के आचार्य बहुत समय तक विक्रमादित्य की मुद्रा में ढोते रहते हैं, लेकिन कुछ रचनाएं दीर्घजीवी होती हैं, कालजयी। सदियों पुरानी ऐसी दीर्घजीवी रचनाओं के बीच से गुजरने वाला इतिहास अतीत में समकालीनता की प्रतिष्ठा-पुनर्प्रतिष्ठा का श्रम-साध्य उपक्रम होता है और दुर्भाग्य से हिंदी लघुकथा में यह जरूरी काम अभी तक नहीं हो सका है। और शायद इसीलिए इतनी रचना-बुहलता के बावजूद लघुकथा को विधा का दर्जा अभी तक हासिल नहीं हो सका है। अभी हम विधा और उपविधा के द्वंद्व से ही नहीं निकल पाए हैं। हम लेकिन इस बहस में पड़े बगैर सिर्फ निवेदन यह करना चाहते हैं कि बीसवीं सदी की आंख खुलते हिंदी लघुकथा ने भी आंख-कान खोलकर मुलुर-मुलुर इस दुनिया-जहान को देखना, सुनना और समझना शुरू कर दिया था। बीसवीं सदी के शुरू होने से 20-25 साल पहले लिखी गई भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुस्तिका ‘परिहासिनी’ की चुटकियों को चुटकुला कहकर उड़ा दें और सन् 1900 के आसपास लिखी गई माखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ के काल-निर्णय पर मतैक्य न हो सके, ऋषि जैमिनी कौशिक ‘बरुआ’ को बोलकर लिखाई गई माखनलाल चतुर्वेदी की इस लघुकथा की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए तो भी 1901 में लिखी गई माधव सप्रे की लघुकथा ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ से हम हिंदी लघुकथा का आरंभ बेहिचक स्वीकार कर सकते हैं। बीसवीं सदी के खत्म होते न होते हिंदी लघुकथा ने अपनी जड़ और जमीन पर मजबूत तर्कों के साथ जो दावे ठोंक दिए हैं, उन्हें खारिज कर सकना अब किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। हिंदी लघुकथा का अब तक का सबसे बड़ा यह संचयन दो सौ से अधिक कथाकारों की चुनी हुई लघुकथाओं का ऐसा गुलदस्ता है, जो हिंदी के प्रांगण में मह-मह महकेगा, देर तक और दूर तक, ऐसी उम्मीद हमें है।
  • Shiksha Mein Moolyon Ke Sarokar
    Jagmohan Singh Rajput
    340 306

    Item Code: #KGP-896

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक में सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं तथा संबंधों में हो रहे बदलाव को देखने और परखने के लिए आवश्यक दृष्टिकोण परिवर्तन क्यों और कैसे संभव है, इसे समझने का प्रयास किया गया है । इसके बाद शैक्षिक पाठ्यक्रम पर समग्रता से निगाह डालते हुए पाठ्यक्रम परिवर्तन की आवश्यकता तथा उसके मूल तत्त्वों पर चर्चा की गयी है । इसमें उस प्रकार की पाठ्यसामग्री के सम्बन्ध में भी चर्चा हैं, जो पाठ्यपुस्तकों में उपलब्ध है तथा जिसमें अन्य मूल्यों के साथ परिवार तथा पीढ़ियों के संबंधों के विभिन्न पक्षों पर विवेचना की जा सकती है – केवल उसे पहचानने तथा विद्यार्थियों को उचित समय पर तथा उचित विधि से इंगित करने की आवश्यकता होती है । यदि वह नहीं है या काम है तो अध्यापक कैसे तथा किन स्रोतों से उसे ढूंढ़ सकता है तथा शिक्षण में शामिल कर सकता है । 
  • Moldeviya Ki Lokkathayen
    Sanjiv Thakur
    275 220

    Item Code: #KGP-195

    Availability: In stock

    मोल्देविया की लोककथाएँ
    मोल्देविया (वर्तमान नाम मोलदोव (Moldova)) उक्रेन के पास एक छोटा-सा देश है। वहाँ  लोककथाओं की अच्छी-खासी परंपरा रही है। लोककथाओं के साथ-साथ वहीं लंबी-लंबी परीकथाएँ भी कही-सुनी जाती रही हैं। इस संग्रह मेँ उनमें से कुछ लोककथाएँ और परीकथाएँ प्रस्तुत की गई हैं। संग्रह में प्रस्तुत लोककथाओं में जहाँ जनजीवन से जुडी बाते है, वहीँ परीकथाओं में अदभुत कल्पनालोक दिखाई देता है । इन्हें पढ़कर मोल्देविया के सामान्य लोगों के कल्पनाशील होने का पता चलता है तो अपने समाज के यथार्थ के प्रति उनके जागरूक होने का पता भी चलता है। एक तीसरी धारा हास्य की है जो मोल्देविया के जन-मानस में बहती दिखाई देती है ।
    राजा, राजकुमारी, राजकुमार, जमींदार, पादरी, गरीब आदमी, गड़रिया, ड्रैगन, दैत्य आदि अच्छे-बुरे पात्रों के द्वारा कही गई ये कथाएँ अच्छाई, बुराई, चालाकी, दुष्टता, बुद्धिमानी, मूर्खता, शत्रुता, मित्रता जैसी चीजो से पाठकों का परिचय अनायास करवा सकती है ।
    मोल्देविया के लोक-मानस की थाह दिलाने वाली ये कथाएँ बच्चों और बडों को समान रूप से आकर्षित करने की सामर्थ्य रखती हैं ।
  • Vipradas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-852

    Availability: In stock


  • Rang Aakash Mein Shabd
    Narendra Mohan
    1500 1350

    Item Code: #KGP-674

    Availability: In stock

    रंग आकाश में शब्द नरेन्द्र मोहन और शामा की एक ऐसी अपूर्व संस्कृति है जिसमें रंग और शब्द, चित्र और कविता परस्पर जुडे होते हुए भी अपना एक मौलिक उत्कर्ष रचते है । यहीं एक साथ कई सौंदर्य-छवियां, रंग-रेखाएँ और शब्द प्रकाशमान हैं। हिंदी में, भारतीय कविता में इसे अपनी तरह का पहला और अनूठा प्रयोग माना जा सकता है ।
    कविता और चित्र यहाँ विंब-प्रतिबिंब रूप ने आमने-सामने नहीं हैं, साथ-साथ हैं । उनमें अनुपात बैठाना या अर्थों-आशयों की समांतरता दूँढ़ना दोनों कलाओं को कमतर आँकना होगा, हालाँकि दोनों ने छिपे रचना-सूत्रों की खोज की जा सकती है । दरअसल, कविता और कला संबंधी यह एक बिलकूल नई तरह का अंतरावलंबन है । चित्रों  के रंग-संकेत, छवियां और छायाएँ यहाँ कविता के अंतरंग का हिस्सा बनी हैं।
    चित्र के संवेदन धरातलों और सौंदर्य-रूपों को, अमूर्तन में लिपटी हुई रंग-रेखाओं के शिल्प को अपनी संवेदना में ढाल कवि ने यहाँ अपनी कल्पना शक्ति से कविता के शब्द में रचा है। चित्रों की रंग-गतियों में प्राकृतिक बिंबो और दृश्यावलियों में झाँकने की चित्रकार की ललक को, रंगों की कंपकंपाहट और थरथराहट को, दौड़ते भागते रंगों में लिपटी उदासी, पीड़ा, खामोशी और खोए हुए वजूद को कवि ने कविता की लय, बिंब-विधान और संरचना का हिस्सा बना दिया है । चित्रों के रंग कवि को अँधेरे ने लपटों की तरह उठते दिखे हैं । ऐसा भी लगा जैसे अँधेरे का एक उफनता समुद्र हो जिसकी उत्ताल तरंगें आग से दीप्त हों। ऐसे ही किसी क्षण में उसे महसूस हुआ :
    रंगों के पीछे आग है
    और रेखाएँ चुप नहीं है


  • Aalochna Ka Samay
    Dr. Jyotish Joshi
    320 288

    Item Code: #KGP-687

    Availability: In stock

    आलोचना का समय ग्यारह महत्त्वपूर्ण लेखकों के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करने का प्रयत्न है जिसमें उनके ‘रचना समय’ के साथ ‘आज के समय’ को देखने की कोशिश की गई है। आलोचना महज रचना के बोध और अर्थ को समझने वाली विध ही नहीं होती, वह अपने समय की रचनाशीलता को अपने वर्तमान की चुनौतियों में देखती है और इस तरह एक विमर्श को भी जन्म देती है। पुस्तक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, नेमिचन्द्र जैन, केदारनाथ सिंह, भुवनेश्वर, सुदामा पांडेय ‘धूमिल’, मैनेजर पांडेय तथा उदय प्रकाश जैसे लेखकों के अवदान को रेखांकित करते हुए उनके उन पक्षों को विशेष रूप से विवेचन का आधर बनाया गया है जिनके कारण उनकी महती उपादेयता है। विवेच्य लेखकों में मूल रूप से रचनाकार और आलोचक दोनों हैं जो अपने लेखन में ‘समय’ को देखते हैं तथा समय की अपेक्षाओं के अनुरूप अपने लेखकीय दायित्व का निर्वाह करते हैं।
    अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप आलोचक डॉ. ज्योतिष जोशी ने बहुत मनोयोग से पुस्तक में कृती लेखकों के योगदान को विवेचित किया है। इसमें उनकी भाषा, विवेचन की पद्धति तथा अपने समय की चुनौतियों से टकराने की दृष्टि आपको बहुत प्रभावित करेगी। कहना न होगा कि यह कृति पठनीय ही नहीं वरन् संग्रहणीय भी है।
  • Nanhe Haath Khoj Mahan
    Hari Krishna Devsare
    190 171

    Item Code: #KGP-109

    Availability: In stock

    एक पुरानी कहावत है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात। विज्ञान के आविष्कारों में अनेक ऐसी कथाएं छिपी हुई हैं, जिनके बीज बचपन में ही पड़ गए थे। उन वैज्ञानिकों के बचपन में ही कुछ ऐसा हुआ था, जिसने आगे चलकर एक महान आविष्कार, अनुसंधान या खोज का रूप लिया। इस पुस्तक में कुछ ऐसी ही विशिष्ट कथाएं दी गई हैं, जो बाल-पाठकों को प्रेरणा देंगी कि उनका हर काम महत्वपूर्ण है। कौन जाने, उनका कौन-सा काम बड़े होने पर प्रेरणा देगा और उन्हें महानता की सीढ़ियों पर चढ़ाकर विशिष्ट बना देगा। ये कहानियां रोचक हें, ज्ञानवर्धक हैं और प्रेरक हैं। आशा है, सभी आयु के पाठक इनसे प्रेरणा लेंगे।
    —हरिकृष्ण देवसरे
  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    595 476

    Item Code: #KGP-1985

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे।
  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    995 896

    Item Code: #KGP-580

    Availability: In stock


  • Shesh Parichay
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-704

    Availability: In stock


  • Aastha Ka Raasta
    Dr. Arsu
    160 144

    Item Code: #KGP-9002

    Availability: In stock

    आस्था का रास्ता 
    हर युग की समस्याएं और संवेदना, बदलती रहती हैं । इसका असर साहित्य पर पड़ना सहज स्वाभाविक है, लेकिन बाहरी तौर की विकास योजनाएं हमेशा हमें अंतर्दृष्टि नहीं देती हैं । अंतर्दृष्टि ही आस्था की नीव है । विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के युग में साहित्य में आए परिवर्तन के स्वरूप पर साहित्यकार के मन में आशंकाएं बढ़ रही हैं ।
    आस्था का आलोक बुझ रहा है । बुद्धि-विकास के अनुपात में अनाज हृदय-विकास नहीं होता है । परंपरा, संस्कृति, साहित्य, धरोहर और विरासत का महत्त्व आज फीका पढ़ रहा है ।
    इसके कारणों-परिणामों पर सोच-विचार करने वाले अट्ठारह लेखों का संकलन ।
    मलयालमभाषी हिंदी लेखक और अनुवादक डॉ० आरसु की अद्यतन कृति । इसमें चिंतन का इंधन है । आस्था और आशंकाओं की धड़कन है ।
  • Kahani Samagra : Nasera Sharma(3Vols.)
    Nasera Sharma
    2100 1785

    Item Code: #KGP-375

    Availability: In stock

    प्रख्यात कथा-लेखिका नासिरा शर्मा की कहानियाँ  समकालीन स्त्री रचनाकारों की कहानियों से कई मायनों में अलग और सर्वथा नई परिभाषा गढ़ती हुई नजर आती हैं । उनके यहाँ इनसानी रिश्ते केवल खून से ही नहीं, संवेदनाओं के उन तंतुओं से निर्मित होते हैं, जो इनसानियत के वजूद को बचाए रखने के लिए जारी हैं ।
    पहले खंड की कहानियाँ परिवार, देश-समाज की सीमा को लाँघते हुए ईरान तक की यात्रा कराती हैं । ईरान के अपने प्रवास काल के दौरान लेखिका ने जिस शिद्दत से वहाँ की जीवनशैली, संस्कृति को आत्मसात् किया, उसको बहुत प्रभावी ढंग से उन्होंने इन कहानियों में अभिव्यक्त भी किया है ।  इस बहाने भारत और ईरान के प्राचीन रिश्तों की भी लेखिका शिनाख्त करती हैँ। इस खंड की कई कहानियों में लेखिका अपने अतीत के पन्ने उलटते हुए उन क्षणों को वर्तमान संदर्भों से पुन: जीवंत करने का प्रयत्न करती है, जिन पर समय की बेशुमार परतें चढ़ चुकी हैं । दरअसल इन कहानियों के जरिए लेखिका अपने अतीत में घटित उन सामाजिक-राजनीतिक घटनाओँ की पड़ताल बदले हुए समय में करती हैं, जिनका संबंध वर्तमान से विच्छेद नहीं हुआ है ।
    दूसरे खंड की कहानियाँ इनसान के भीतर मौजूद शैतान को बाहर खींच निकालती हैं। सत्तालोलुपता की हवस में इनसान के हैवान में रूपांतरण की ये कहानियाँ अनेक सवालों को उठाती हैं। धर्म-स्थापना के नाम पर किसी भी प्रकार के अधार्मिक और अमानवीय क्रियाकलापों को जायज़ ठहराने वाली बीमार मानसिकता को भी ये कहानियाँ अनावृत करती हैं। इन कहानियों में समाज के निचले तबके के उन लोगों के दारुण यथार्थ की तस्वीर भी मौजूद है, जो अपना सब कुछ न्योछावर करके किसी भी देश-समाज की सांस्कृतिक नींव तैयार करते हैं। बावजूद इसके शक्तिसंपन्न और सामंती मानसिकता के लोग उनका शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं।
    तीसरे खंड में लेखिका द्वारा पिछले तीन दशक में लिखी गई कहानियाँ सम्मिलित हैं । इनमें कुछ लंबी और कुछ लघु कथाएँ भी हैं । कथानक और घटनाक्रम के आधार पर इस खंड की कहानियाँ पूर्ववर्ती दो खंडों की कहानियों से कूछ अलग नजर आती हैं । इसका कारण यह है कि इस खंड की कहानियों में लेखिका ने अपनी दृष्टि के  विस्तार को थोड़ा संघनित किया है । यही वजह है कि इनमें देश-समाज-राजनीति-इतिहास से जुड़ी कहानियों के स्थान पर इनसानी नस्ल की प्रवृतियों पर आधारित कहानियाँ पढ़ने को मिलती हैं । बहुत कम लेखक ऐसे होते हैं, जिनकी आँखें बारीक़ से बारीक रेशे को पकड़ती हैं, जिनके कान महीन से महीन आवाज को सुनते हैं और नाक हलकी से हलकी गंध ग्रहण करती है । ऐसे लेखकों को हम सहस्राक्षी लेखक भी कह सकते हैं । नासिरा शर्मा भी ऐसी ही लेखिका ।
    इनसानी मनोविज्ञान का गहन विश्लेषण करती ये कहानियाँ लेखिका के भाषा-प्रवाह और ट्रीटमेंट के प्रति सजगता को भी प्रमाणित करती हैं ।
  • Shakti Kanon Ki Leela
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-1993

    Availability: In stock

    शक्ति कणों की लीला
    सोच की इकाई के तोड़ने की पहली साजिश दुनिया में जाने किसने की थी... 
    बात चाहे जिस्म की किसी काबलियत की हो, या मस्तक की किसी काबलियत की पर दोनों तरह की काबलिया के एक दूसरी की मुखालिफ़ करार देकर, एक को 'जीत गई' और एक को 'हार गई' कहने वाली यह भयानक साजिश थी, जो इकाई के चाँद सूर्य को हमेशा के लिए एक ग्रहण लगा गई... 
    और आज हमारी दुनिया मासूम खेलों के मुकाबले से लेकर भयानक युद्धों के मुकाबले तक ग्रहणित है... 
    पर इस समय मैं जहनी काबलियत के चाँद सूर्य को लगे हुए ग्रहण की बात करूँगी, जिसे सदियों से 'शास्त्रार्थ' का नाम दिया जा रहा है ।
    अपार ज्ञान के कुछ कण जिनकी प्राप्ति होते हैं, वे कण आपस में टकराने  के लिए नहीं होते । वे तो एक मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति को, दूसरो मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति में मिलाने के लिए होते हैं ताकि हमारी प्राप्तियां बड़ी हो जाएँ ... 
    अदबी मुलाकातें दो नदियों के संगम हो सकते है पर एक भयानक साजिश थी कि वे शास्त्रार्थ हो गए... 
    ज्ञान की नदियों को एक-दूसरे में समाना था, और एक महासागर बनना था पर जब उनके बहाव के सामने हार-जीत के बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए, तो वे नदियां सूखने लगीं...  नदियों की आत्मा सूखने लगी... 
    जीत अभिमानित हो गई, और हार क्रोधित हो गई... 
    अहम् भी एक भयानक अग्नि है, जिसकी तपिश से आत्मा का पानी सूख जाता है, और क्रोध भी एक भयानक अग्नि है, जो हर प्राप्ति को राख कर देता है... 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar
    Ajit Kumar
    160 144

    Item Code: #KGP-419

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'अपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Patra-Samvad : Ageya Aur Nand Kishore Aacharya
    Krishna Dutt Paliwal
    175 158

    Item Code: #KGP-2018

    Availability: In stock

    पत्र-संवाद  : अज्ञेय और नंदकिशोर आचार्य
    अज्ञेय जी ने पुराने-नए लेखकों को अनगिनत पत्र लिखे हैं। यहीं मैंने नंदकिशोर आचार्य और अज्ञेय के पत्रों को एक साथ दिया है। इन पत्रों का मूल स्वर आत्मीयता से भरा-पूरा है। सार संक्षेप यह कि एक-दूसरे के प्रति स्नेह, आदर का इन पत्रों में एक संसार है। आचार-विचार में मतांतर रहते हुए भी आत्मीय संबंधों की मिठास में कोई कमी नहीं है।
    अज्ञेय जी की अंतरंगता तो बहुतों से रही लेकिन नंदकिशोर आचार्य से उनकी अंतरंगता की कोई सीमा नहीं रही। कभी यात्रा के बहाने, कभी शिविर के बहाने, कभी कार्यक्रमों की योजना के बहाने, कभी व्याख्यान माला के बहाने, कभी कार्यक्रमों में प्रतिभाशाली युवकों को आमंत्रित करने के बहाने अज्ञेय का अकेलापन नंदकिशोर आचार्य से भराव पाता रहा। इस दृष्टि से आचार्य उनके जीवन के 'कीमती' सखा रहे हैं।
    इन पत्रों की कथ्य-कला का सौंदर्य निजता के परम क्षणों का विस्तार है। इस विस्तार ने ही अज्ञेय जी और आचार्य जी के बीच एक अटूट संवाद-सेतु निर्मित किया है । -संपादक
  • Dena Paavna
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-71

    Availability: In stock


  • Sun Mutiyare
    Santosh Shelja
    450 405

    Item Code: #KGP-133

    Availability: In stock

    सुन मुटियारे
    ‘सुन मुटियारे’ उपन्यास उस तरुणी (मुटियार) की कहानी है, जो जन्मी-पली पंजाब के गाँव में और पढ़ी-गुनी देश की राजधानी में। पंजाब भी ‘बंटवारे’ से पहले का पंजाब-जब अनबँटी जमीन थी और अनबँटे ही दिल थे...जब खेतों में भरपूर अनाज था और दिलों में भरपूर प्यार था...जब ‘पंज दरिया’ की धरती गाती-नाचती रहती थी।
    कथानक की धुरी तो है ‘मुटियार’, लेकिन उसके इर्द-गिर्द एक भरा-पूरा परिवार है, समाज है, जिसमें विविध पात्र हैं—गाँव के भी, शहर के भी। उनकी हँसी और आँसू, समस्याएँ और समाधन, सुख और दुःख—सब कुछ ऐसे साथ जुड़ा चला आता है, जैसे कवि के शब्दों में—‘जस केले के पात में छुपे पात दर पात।’ इस प्रकार कथानक का मुख्य पात्र एक नहीं रहता, बल्कि अनके पात्रों के रूप में प्रकट होता हैं अतएव यह कहानी जीवन के विराट् पट पर रंग-बिरंगे धगों से बुनी रंगीन चादर ‘फुलकारी’ की तरह उभरती है। इसका एक सिरा पंजाब के गाँव से जुड़ा है तो दूसरा राजधानी के महानगर से। इसीलिए कहानी में गाँव के लोकगीत और पंजाबी भाषा के शब्द स्वयमेव ही आ गए हैं, जैसे सावन की घटाओं के साथ मोर का नृत्य और कोयल की कुहुक आ जाती है।
  • Baapu Qaid Mein
    Rajendra Tyagi
    120 108

    Item Code: #KGP-1824

    Availability: In stock

    बापू कैद में
    आवाज : ठीक, बहुत ठीक । वैसे भी तुम लोग अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, क्योंकि अब मैं आजाद हूँ देहमुक्त हूँ। (विराम) तुन्हीं ने तो अपनी गोली से मुझे आजाद किया था । हाँ-हाँ, मुझे आजाद किया था और बापू को कैद !
    (कुछ देर रुकने के बाद) हाँ, मैं ठीक कह रहा हूँ बापू तुम्हारी ही कैद में है । तुन्हीं ने उन्हें कैद कर रखा है और तुम्ही बापू की समाधि पर… ! (बल देते हुए) हाँ-हाँ-हाँ! आत्मविहीन समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित का रहे हो । है ना मजाक ! "तुम नेता ही नहीं, अव्वल दर्जे के अभिनेता भी हो । जाओ, पहले बापू को आजाद करो और फिर आना उन्हें  श्रद्धांजलि अर्पित करने ।
    (क्षण-भर रुकने के बाद, अटटहास का स्थान सिसकियाँ ले लेती हैं और रुंधे गले से वही आवाज पुन: आती है) 'नहीं-नहीँ, तुम बापू को अभी आजाद नहीं करोगे, क्योकि तुममें इतना साहस ही नहीं है। तुम डरपोक हो। तुम जानते हो, बापू यदि आजाद हो गए तो देश में क्रांति आ जाएगी और तुम्हारी दुकानदारी बंद हो जाएगी ।
    (रुदन बंद और पुन: अटटहास) जाओ अपने-अपने घर लौट जाओ। नाटक बंद करो। सिंहासन तुम्हारी प्रतीक्षा में है। बापू जब तक कैद हैं, तब तक तुम्हारा सिंहासन अटल है । क्यों गृहमंत्री जी, ठीक कहा ना मैंने ? मैं भी जा रहा के तुम भी लौट जाओं ।
    बापू आज भी प्रासंगिक है । आम जन के हदय से उनके प्रति श्रद्धा है, उनके आदर्शों व सिद्धांतों के प्रति आस्था; किंतु बापू की इस लोकप्रियता का नेता अनुचित लाभ उठा रहे हैं । उनके लिए बापू एक ब्रांड हैं । ऐसा ब्रांड, मार्केट में जिसकी साख हैं । क्योकि साख है, इसलिए उसे कैश करना वे अपना धर्म समझते है । निहित स्वार्थ व दूषित राजनीति के अनुरूप वे बापू के आदर्शों व सिद्धांतों को जैसा चाहे उसी रूप में परिभाषित कर रहे हैं । केवल आम जन को सम्मोहित करने के लिए वे बापू की दुहाई देते हैं, उनके आदर्श व सिद्धांतों की दुहाई देते है । उनके लिए बापू की बस यही उपयोगिता है। यथार्थ में बापू की हत्या किसी गोड़से ने नहीं की थी । इसी दूषित राजनीति ने की थी और अब स्वार्थ-पूर्ति के लिए इसी राजनीति ने बापू की आत्मा को कैद कर रखा है ।
  • Pracheen Prem Aur Neeti Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-01

    Availability: In stock

    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
  • Bhartiya Naitik Shiksha : 4
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-267

    Availability: In stock

    नैतिक शिक्षा का प्रत्यक्ष पाठ बचपन में माता-पिता से तथा विद्यालयों में गुरुजनों के सान्निध्य में बैठकर मिलता है । धीरे-धीरे समझ विकसित होने पर धर्म और संस्कृति द्धारा भी हमें नैतिक शिक्षा का सैद्धान्तिक पक्ष स्वाध्याय के माध्यम से सीखने को मिलता है । फिर समाज और राष्ट्र के लिए किए गए सेवा-कार्यों के लिए समर्पण के प्रति हमारे मन में जो भावना निरंतर उठती रहती है, उससे हम यह जान सकते हैं कि हमारी नैतिक शिक्षा के संबंध में धारणा कितनी व्यावहारिक है।
    माता-पिता एवं गुरुजनों के प्रति बढ़ती अश्रद्धा, वैज्ञानिक दुष्टिकोण
    के नाम पर धर्म एव संस्कृति के प्रति घटती निष्ठा ने नैतिक शिक्षा को
    विवादों के घेरे में ला दिया है। सरकार द्वारा पाठयक्रम में भले ही उसे
    पढाने का संकेत दिया जाता रहा है, किन्तु ऐसे कितने शिक्षक एवं
    विधालय है जो इसके प्रति गंभीर हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव समाज एवं
    राष्ट्र में बढ़ती चोरी, लूटमारी, बेईमानी, हिंसा और भ्रष्टाचार के रूप में
    दिखाई देने लगा है।
    घर में माता-पिता को समयाभाव के कारण नैतिक शिक्षा का पाठ पढाने का समय भी नहीं मिलता । अत: विद्यालयों को ही इसका दायित्व संभालना होगा । यह ठीक है कि विद्यालयों में भी पठन-पाठन एवं परीक्षा- कार्यों की अधिकता के कारण समयाभाव रहता है, किन्तु तीन स्तरों पर यह संभव है…एक तो विषयों के पठन-पाठन के अंतर्गत ही जो नैतिक संदर्भ आते है, उन प्रसंगों का सदुपयोग कर, दूसरे, नैतिक शिक्षा के अन्य कार्यक्रम बनाकर, जैसे-प्रार्थना, पुस्तकालय, पत्रिका, संग्रह-पुस्तिका, दुश्य-श्रव्य सामग्री तथा दिनचर्या आदि सभी माध्यमों का प्रयोग करने का वातावरण  बनाकर।  तीसरे, विद्यालय की दैनिक गतिविधियों में ऐसे अवसर प्रदान कर जिससे बालको में नैतिक विचारों को व्यावहारिक रूप से अपनाने की भावना जगे ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheshwar
    Maheshwar
    120 108

    Item Code: #KGP-2083

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार माहेश्वर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सम्राट', 'ठिठुरन', 'अजनबी सुख', 'भूख', 'मृत्युदंड', 'अजगर', 'साहब, बीबी, गुलाम', 'सबूत', 'राजा और चिड़िया' तथा 'बंद"।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार माहेश्वर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Is Daur Mein Hamsafar
    Amar Goswami
    350 315

    Item Code: #KGP-1999

    Availability: In stock

    इस दौर में हमसफ़र
    अमर गोस्वामी उन थोड़े से कथाकारों में से है जिनकी कहानियों पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते है कि यह कहानी अमर गोस्वामी ही लिख सकते थे । आज के दौर में जबकि रचनाएँ ही नहीँ, लेखक भी एक-दूसरे की 'जेरोक्स कापियों' से तबदील हो रहे है, अमर गोस्वामी की यह पहचान और कूवत-या कहिए कि रचनात्मक सामर्थ्य काबिलेगौर है । इस सामर्थ्य के बूते ही अपनी लंबी कथा-यात्रा से कभी रचना पर उनका विश्वास डिगा नहीं और वे उन हड़बडिए लेखकों की पाँत में शामिल नहीं हुए, जो सिर्फ चर्चित होने के लिए लिखते है और अपने आसपास की हर चीज, हर संबंध को 'कैश' कर लेते के लिए उतावले दिखते है ।
    इन बातों की ओर ध्यान दिलाना इसलिए जरूरी लगा क्योंकि  अमर गोस्वामी का पहला उपन्यास ‘इस दौर में हमसफ़र' उनकी इस लंबी और धीरज-भरी यात्रा का ही स्वाभाविक फ़ल है-और  अमर जी का पहला उपन्यास होते हुए भी, गंभीर चर्चा और विश्लेषण की माँग करता है। ऊपर से देखने पर 'इस दौर में हमसफ़र' भले ही प्रेमचंदीय वर्णनात्पक शैली में लिखा उपन्यास नजर आए, पर थोडा भीतर उतरते ही समझ में आ जाता है फि यह सिर्फ एक उपन्यास ही नहीं, हमारे दौर की एक गहरी और स्तब्ध कर देने वाली 'एक्स-रे पड़ताल' भी है । यह दीगर बात है कि यह लिखा गया है इतनी जानदार भाषा और पुरलुत्फ अंदाज में कि जब तक आप इसे खत्म नहीं कर लेते, यह आपको चैन  नहीं लेने देता । बल्कि उपन्यास खत्म होने के बाद भी लंबे अरसे तक पाठकों का 'हमसफ़र' बना रहता है ।
    इसकी वजह शायद यह है कि एक उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी नई कथा-प्रविधियों के दास नहीं है और उन्हें उथले रूप से जैसे-तैसे जहाँ-तहाँ टाँक लेने को हरगिज पसंद नहीं करते । उनके यहाँ जो कुछ है, वह अपने ठेठ मौलिक अंदाज में है और अमर गोस्वामी का निहायत अपना है । इसीलिए वे बगैर दिखावटी स्त्री-विमर्श के शोर-शराबे के, अनन्या के रूप से हमें एक ऐसी विलक्षण और शक्तिशाली स्त्री से मिलवाते हैं जो अपनी बेबनाव शख्सियत से अति आधुनिक ही नहीं, 'नई पीढी की नई नारी’ लगती है, जिसकी धमक आगे आने वाले युगों में और ज्यादा साफ सुनी जा सकेगी । अनन्या के मित्र और सहयात्री के
    रूप में अनिरुद्ध बागची का 'विचलन' या हार, सिर्फ उसी की हार नहीं, आधुनिकता के उन तमाम नकली प्रत्ययों की हार भी है जो आधुनिकता को सिर्फ 'देह-भोग के सुख' तक सीमित कर देना चाहते हैं । अनन्या  के माई मधुसूदन के चेहरे में मुझे तो जगह-जगह स्वयं अमर गोस्वामी का दर्द से तिलपिलाता चेहरा नजर आया । यह दीगर बात है कि मधुसूदन की कहानी अपनी है, और वह अमर जी की नहीं, अपनी ही राह पर आगे बढ़ता दिखाई देता है ।
    ‘इस दौर में हमसफ़र' में आधुनिकता की 'विकृत' और 'रचनात्मक' दोनों ही शक्लें है और अपने पुरे विश्वसनीय रूप से है । इस लिहाज से यह एक ऐसा उपन्यास भी है जिसे कई किस्म के 'कंफ्यूज़न' और मतिभ्रम-भरे आज के समाज से सही दिशा की ओर  इशारा करने वाली एक पहल के रूप में भी देखा जा सकता है । हाँ, यह जरूर है कि अमर गोस्वामी कहीं-कहीं ज्यादा खुल गए है और जहाँ सिर्फ इशारों से काम चल सकता था, वहाँ भी 'रस' लेते नजर आते है । शायद महानगरीय समाज के 'रंगीन विकारों, की ओर ध्यानाकर्षण की यह उनकी अपनी शैली हो ।
    उपन्यास के अंत में मधुसूदन और हेमंती ही नहीं, शर्वाणी की चोट झेलकर अंतत: फिर से सागरिका की ओर मुड़ा शांतनु जिस नए समाज की नींव रखना चाहता है, उसमें मूल्यों के उपहास वाली 'मजावादी' दुष्टि नहीं, बल्कि विडंबनाओं को पहचानकर उनके  बीच से रास्ता खोजती 'मनुष्य की जय-यात्रा' का अगला पडाव नजर आ सकता है ।
    'इस दौर से हमसफ़र' में बेहद तीव्र गति और हलचल है तो विचारों का तेज संघर्ष भी । लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि ये तेज बहसें दिल्ली से मीरजापुर और चुनार तक फैली उपन्यास की प्रदीर्घ कथा का एक सहज हिस्सा बनकर आती हैं । दिल्ली जैसे महानगरों की बनिस्बत छोटे शहरों, कस्बों में अब भी इंसानी संवेदना और आर्द्रता कैसे बनी हुई है, इसकी परख उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी जगह-जगह करवाते हैं । कोई हैरत की बात नहीं कि इसी कोशिश में वे डॉ० प्रशांत सिन्हा जैसे बड़े कद के इंसान से हमें रू-ब-रू होने का मौका देते हैं, जिनके आगे सारी महानगरीय भभ्भड़ और चमक-दमक फीकी लगती है ।
    अलबता अमर गोस्वामी 'इस दौर में हमसफ़र' को एक उपन्यास के साथ-साथ सहज ही बहुरंगी छवियों और गतियों वाले हमारे दौर का 'एक विशद समाजशास्त्रीय अध्ययन' भी बना सके-यह एक बडी सफलता है । अपने पहले ही उपन्यास से अमर गोस्वामी आज के महत्वपूर्ण रचनाकारों की पाँत में आ गए हैं, यह बात उनकी रचनात्मक सामर्थ्य के प्रति मन में 'आश्वस्ति' के साथ-साथ आदर भी पैदा करती है ।
  • Qasaaibaaraa
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-43

    Availability: In stock

    कसाईबाड़ा
    नोनी बुझ-सा गया । निढाल-सा हो गया । मरी हुई आवाज़ में कहने लगा, “न्यूरमबर्ग में क्या रखा है जी ! कुछ भी तो देखने लायक नहीं है । वह भी शहरों में से एक शहर है । बस, एक पुराना जेलखाना है । बैरकों जैसा। जहाँ नाजियों पर मुकदमे चले थे । जब लडाई ख़त्म हुई तो जुल्म करने वाले नाजियों को उन्होंने धर दबोचा।  हिटलर ने तो आत्महत्या करके मुक्ति पा ली।  बाद में जिनके पास धन-दौलत थी, वे सोने से लदी गाडियों देकर  भाग-भूग गए । सुना है, अभी तक कई नाजी अमेरिका में और दूसरे मुल्कों में नाम बदलकर रह रहे है । लेकिन जो पकडे गए, उनको उन्होंने न्यूरमबर्ग की जेल में कैद कर दिया।  उसे फाँसी पर लटकाया गया । बस, यहीं है न्यूरमबर्ग ।  जेलखाने, और फाँसी देने वाला शहर ।"
    “पर नोनी, साठ लाख यहूदियों को जिन्होंने वहशी दरिंदों की तरह ख़त्म  कर दिया था, उन्हें फाँसी तो होनी ही थी।"
    "बडे दरिंदे हमेशा बच जाते है छोटे ही फँसते है ।"
    "ठीक कहते हो।"
    "पर लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने वाले नाजियों के लिए जो जेलें बनी थीं, उनमें आजकल उन्होंने मासूम मेमने रखे हुए है ।"
    "कौन से मेमने ?”
    “बस, गंदुमी रंग के मेमने । उनके बीच कभी-कभी कोई गोरा या पीला मेमना भी आ फँसता है । . . वह देखिए, वह सामने जो जेल-सी बिल्डिंग नज़र आ रही है । "
    अजीब इमारत थी, जिसकी एकमात्र लंबी मोटी दीवार जमीन से उठी हुई थी । ऊ …पर तक ।  पुराने किले की तरह ।
    लेकिन किलों में कोई धोखा  नहीं होता । वे दूर से ही एलान कर देते है कि हम किले है ।  पुराने वक्तों के । अपनी फौजों को, अपने आपको, अपनी रानियों को, अफसरों. दरबारियों, कर्मचारियों को, और राज्य का अन्न-भंडार सुरक्षित रखने के लिए तथा आक्रमणों से बचने के लिए राजे-महाराजे किलों का निर्माण करवाते थे ।  अब इनके भीतर केवल पुरानी हवाएँ बाल खोले घूमती है । चमगादड़ बसेरा करते हैं, घोंसले बनाते है क्योंकि उन्हें अभी भी इन दीवारों में हुए छेद सुरक्षित नजर आते है । [इसी संग्रह से]
  • Apna Raag
    Pushpa Mehra
    140 126

    Item Code: #KGP-176

    Availability: In stock

    अपना राग
    जिस युग में सब अपना-अपना राग आलापना चाह रहे हों, श्रीमती पुष्पा मेहरा का ‘अपना राग’ जितना उनका, उतना ही मेरा-आपका, बल्कि हम सबका राग है। उसके इस लक्षण की ओर आपका ध्यान अवश्य जाएगा कि भले ही वह रग-रग में समाया प्रतीत न हो, पर वह घुन की तरह भीतर पैठा रोग कदापि नहीं। 
    पुष्पा मेहरा ने हिंदी कविता के समसामयिक मुहावरे को अपनाने या आधुनिकता की होड़ में शामिल होने की जगह अपने आसपास की दुनिया को ऐसी सीधी, सरल शैली में चित्रित किया है कि उनकी अनुभूति सहृदय पाठक को अपनी वह अनुभूति मालूम होगी, जिसे हम-आप व्यस्तता या लापरवाही के कारण भले लिपिबद्ध न कर पाएँ, किंतु पुष्पा मेहरा ने सँजोकर हमारे लिए सुलभ कर दिया है। यह कुछ-कुछ वैसा है, जैसे तड़क- भड़क-भरे माहौल में किसी का बिलकुल सीधे-सादे परिधान में प्रकट हो, कइयों को इस पछतावे से भर देना कि वे नाहक ही इतना सजे-सँवरे।
    वैसे तो कविता के बहुतेरे प्रयोजन होते हैं–उनमें से एक यह भी कि वह जहाँ उपजे, उससे कहीं अन्यत्र उसकी शोभा झलके। आशा करनी चाहिए कि पुष्पा मेहरा की कविताएँ अंधी दीवार से टकराकर लौट आने वाली बंद कविताएँ होने के बजाय विभिन्न हृदयों में खुलने-खिलने वाली कविताएँ सिद्ध होंगी।
  • Ek Qatara Khoon
    Ismat Chugatai
    400 360

    Item Code: #KGP-694

    Availability: In stock


  • Yogkshem
    Rajendra Tyagi
    540 432

    Item Code: #KGP-286

    Availability: In stock

    योगक्षेम
    काफी विचार करने के उपरान्त मैंने गीता को उपन्यास के रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया । इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों के साथ विचार-विमर्श किया । कुछ ने मेरे विचार की सराहना की तो कुछ ने यह कहते हुए कि गीता स्वयं ही एक उपन्यास है, मेरे विचार को नकार दिया । कुछ का मत था कि विचार तो उचित है, किन्तु रचना में मौलिकता का अभाव रहने का खतरा है। समझाया उनका आशय गीता के मूलपाठ की सुरक्षा से था । गीता के मूलपाठ के साथ यदि छेड़छाड़ की गई तो उसका मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा और यदि मूलपाठ के साथ छेड़छाड़ नहीं की तो उपन्यास में मौलिकता का अभाव रहने की पूरी सम्भावना है । इस प्रकार यह मौलिक कृति नहीं कहलाएगी । उनकी आशंका अपने स्थान पर उचित थी किन्तु मेरे लिए चुनौती । चुनौती स्वीकारते हुए मैंने गीता पर आधारित उपन्यास ही लिखने का अन्तिम निर्णय लिया ।
    लक्ष्यप्राप्ति के लिए मैं चिन्तन-मनन में व्यस्त हो गया और महत्त्वपूर्ण दो विचार मेरे चिन्तन में अवतरित हुए । प्रथम-गीता के विभिन्न श्लोकों के सम्बन्ध में व्याप्त भ्रान्तियों का निराकरण ।  द्वितीय—गीता में निहित शिक्षा का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में विस्तृत व्याख्या । इसके अतिरिक्त एक प्रमुख विचार यह था कि जब तक कृष्ण और अर्जुन के मध्य वार्तालाप चलता रहा, तब तक कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध के लिए तत्पर सेनानायक व सैनिक क्या करते रहे ! मुझे यह अनुभव हुआ कि प्रथम दो विचार तो गीता को सरल व सर्वग्रासी बनाने में सहायक सिद्ध होंगे और अन्तिम विचार गीता की रोचक प्रस्तुति में सहायक सिद्ध होगा ।
    इस प्रकार गीता के मूलपाठ से खिलवाड़ न करते हुए अर्जुन व धृतराष्ट्र के माध्यम से गीता को सर्वग्राही व उपन्यास का रूप और विस्तार प्रदान करने का प्रयास किया गया है । -लेखक
  • Himalaya Gaatha (2) Parv-Utsav
    Sudarshan Vashishath
    300 270

    Item Code: #KGP-167

    Availability: In stock


  • Mannu Bhandari : Srijan Ke Shikhar
    Sudha Arora
    550 495

    Item Code: #KGP-801

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी : सृजन के शिखर
    हिन्दी साहित्य का समृद्ध करने में जिन कथा-लेखिकाओं  का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, मन्नू भंडारी उनमें एक अग्रणी नाम हैं । पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय मन्नू भंडारी हिंदी भाषा के साथ-साथ अनेक देशी-विदेश भाषाओं में एक से आदर-सम्मान के साथ पढी जाने वाली रचनाकार हैं ।
    मन्नू भंडारी के दो उपन्यास 'आपका बंटी' और  'महाभोज' हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर और सृजनात्मकता शिखर पर प्रतिष्ठित हैं । ये दोनों  उपन्यास अपने समय से आगे की कहानी कहत्ते और एक लंबे कालखंड का सच होने के कारण कालजयी उपन्यास, की श्रेणी में आते हैं ।
    मीडिया लेखन में भी मन्नू जी की पटकथाओं ने और  धारावाहिकों में 'रजनी' ने अपनी धाक जमाई । मन्नू  जी  व्यक्तित्व व रचनात्मक पक्ष  सभी कोणों का इस  पुस्तक में विश्लेषण है।
    एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी मन्नू जी का जीवन एक दृढ़ और जिजीविषा की अद्भुत  मिसाल हैं । हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में पहले एक पग्म स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं. जो पहली  ही मुलाकात में आपका बनावट आया दिखावट से पर अपने आत्मीय घेरे में  ले लेता है   ।
    बंगाल की सर्वाधिक लोकप्रिय लेखिका और  सामाजिक कार्यकर्ता महास्वेता देवी से लेकर ? वरिष्ट चिंतक-समीक्षक नामवर सिंह, निर्मला जैन, राजेद्र यादव, गिरिराज किशोर, विश्वनाथ त्रिपाटी, विजयमोहन सिंह, अजितकुमार, देवेंद्रराज अंकुर, स्वयं प्रकाश, राजी सेठ, अर्चना वर्मा तथा मन्नू जी का करीब से जानने वाले उनके अध्याय स्वजनों ने अपने वक्तव्यों, आलेखों और  विश्लेषण से इम पुस्तक को समृद्ध बनाया है । आशा है  पाठकों की कसौटी पर भी यह पुस्तक खरी उतरेगी ।
    -सुधा अरोड़ा
  • Kavi Ne Kaha : Neelesh Raghuvanshi
    Nilesh Raghuvanshi
    240 216

    Item Code: #KGP-7816

    Availability: In stock

    किसी कवि का कथन है कि कविता हमारे चारों ओर चीज़ों, घटनाओं, गतियों, स्थितियों, ध्वनियों, आहटों और अंतरालों में हर समय मौजूद होती है, वह हमारे आसपास तैरती रहती है और एक समर्थ कवि उसे पहचानकर एक परिचित शक्ल दे देता है। नीलेश रघुवंशी अपने दौर के पुरुष और महिला कवियों से इस रूप में अलग हैं कि उनके लिए कविता हमारे सामान्य निम्नमध्यवर्गीय जीवन से अलग, विभिन्न या उससे उच्चतर काम नहीं है बल्कि वह उसी जीवन के भीतर घटित होती है। उनकी कविता अपने समय के भौतिक और मानसिक द्वंद्वों को अनदेखा करके अभिव्यक्ति का कोई अपरिचित लोक नहीं रचती। वह जीवन को जारी रखने वाले कामों का निषेध नहीं करती बल्कि उन्हीं कामों में से अपने को उत्पन्न करती रहती है।
    --मंगलेश डबराल

    जीने की उष्मा और ललक से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में नीलेश की नई पहचान को रेखांकित करती हैं। ‘पहली रुलाई तक की डायरी’ जैविक स्त्री-बोध का क्रमिक दस्तावेज है, जो शायद हिंदी में पहली बार इतनी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुआ है। इस काव्यात्मक डायरी को जो बात सबसे अधिक  विश्वसनीय बनाती है, वह अजन्मे शिशु के साथ माँ की वह चुहल है, जो प्रायः इसके हर टुकड़े में मिल जाएगी। ‘जन्म देना एक यातना से गुजरना है’--इस पंक्ति को लिखने वाली यह कवयित्री ही यह क्रीड़ाभरी पंक्ति भी लिख सकती है--‘मैं लिख रही हूँ डायरी और तुम बंदर बने हुए हो--तुमने तो मेरे पेट को खेल का मैदान बना रखा है।’ जन्म देने के सर्जनात्मक उल्लास से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में कुछ नया जोड़ती हैं।    
    --केदारनाथ सिंह


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hari Shankar Parsai
    Hari Shankar Parsai
    200 180

    Item Code: #KGP-9305

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    हरिशंकर परसाई

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित दिवंगत कथाकारों की कहानियों के चयन के लिए उनके कथा-साहित्य के प्रतिनिधि एवं अधिकारी विद्वानों तथा मर्मज्ञों को संपादन-प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया है। यह हर्ष का विषय है कि उन्होंने अपने प्रिय कथाकार की दस प्रतिनिधि कहानियों को चुनने का दायित्व गंभीरता से निबाहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Sachitra Rashtriya Pratik Evam Gaurav Kosh
    GLOBAL VISION PRESS
    495 446

    Item Code: #KGP-2108

    Availability: In stock


  • Seedhi Qalam Sadhe Na
    Sunita Jain
    75 68

    Item Code: #KGP-9285

    Availability: In stock

    सुपरिचित कवयित्री सुनीता जैन की नव्यतम कविताओं के प्रस्तुत संकलन सीधी कलम सधे न की कविताओं का स्वभाव और स्वाद समकालीन हिंदी कविता की सामान्य छवि से थोड़ा अलग है। इन कविताओं में असंभव को संभव कर डालने का न तो बड़बोलापन है और न ही जीवनगत यथार्थ को चुनौती देती काव्य-पंक्तियों का बरबस ‘उत्पादन’ हैं कवयित्री ने समग्र प्रकृति और मन को स्वविवेक के अभिव्यक्त किया है। साथ ही जीवन की विराट अवधारणा को इन कविताओं में संबोधित भी किया गया है। कवयित्री जीवनपरक महाप्रश्नों से व्यक्तिगत स्तर पर जूझते हुए इन कविताओं को सरल, सहज, सुगम्य, पारदर्शी, तथा एक सीमा तक गेय बनाये रखती हैं। यहां ऐसी निजता है जो सार्वजनिकता भी है। इसीलिए इन कविताओं की खुशबू, समकालीन कविताओं की तत्सम खुशबू से थोड़ा अलग हे।
    इन कविताओं की एक काव्य-विशेषता और है-इनमें छिपा आत्मीय राग। संकलन की अनेक कविताएं ऐसी हैं जिनमें असंबोधित रागों की लय मिलती है। समकालीन हिंदी कविता का पाठक उत्कृष्ट काव्य के लिए मानो तरसा हुआ है। कविता में मनःभूमि की प्रतिच्छवियों के ऐसे समर्थ संकलन का प्रकाशन एक सुखद काव्य-घटना है।
  • Namvar Singh Ka Aalochna-Karm : Ek Punah Paath
    Bharat Yayavar
    250 225

    Item Code: #KGP-791

    Availability: In stock

    नामवर सिंह की लिखित आलोचना की पुस्तकें काफी पुरानी हो गयी हैं, फिर भी उनका गहन अवगाहन करने के  बाद यह कहा जा सकता है कि उनमें आज भी कई नई उद्भावनाएं और स्थापनाएं ऐसी हैं, जिनमें नयापन है और भावी आलोचकों के लिए वे प्रेरक हैं । उनकी पुनर्व्याख्या और पुनर्विश्लेषण की काफी गुंजाइश है । नामवर सिंह ने अपने वरिष्ठ आलोचकों की तुलना में कम लिखा है, पर गुणवत्ता की दृष्टि से  वे महान कृतियाँ हैं । तथ्यपरक, समावेशी और जनपक्षधरता से युक्त उनकी आलोचना बहुआयामी है । उनकी आलोचना आज के सन्दर्भ में भी प्रासंगिक है । पुरानी होकर भी उसमे ताजापन है । वह साहित्य की अनगिनत अनसुलझी गुत्थियों  को सुलझाती है और साहित्य-पथ में रोशनी दिखती है । 
  • Ek Sadaa Aati To Hai
    Pramod Beria
    150 135

    Item Code: #KGP-9307

    Availability: In stock


  • Mohan Rakesh Ke Jaane Par Doston Ki Yadein
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-681

    Availability: In stock


  • Samgra Kahaniyan : Ab Tak
    Maitreyi Pushpa
    695 556

    Item Code: #KGP-271

    Availability: In stock

    समग्र कहानियाँ: अब तक
    आँधी की तरह अपने उपन्यासों से पाठकों को झकझोर देने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री के अपने फैसलों की विचारोत्तेजक कहानियाँ-उपन्यास लिखे हैं। शहरी मध्यवर्गीय कहानियों के संसार को गाँव के उभरते मेहनतकश समाज से जोड़ा है, जहाँ अपनी परंपराएँ हैं, रूढ़ियाँ हैं और सबसे ऊपर है ‘खानदान की नाक’ और सब कुछ टिका है स्त्री के कंधों पर--जमीन और स्त्री ही उलझनों के केंद्र हैं और दोनों के ‘उत्पादन’ आपस में गुँथे हैं। सब मालिक की कृपा पर साँस लेते हैं। मैत्रेयी की स्त्रियों की सारी शिकायतें इसी मालिक से हैं कि वह साथी और हमसफर क्यों नहीं हो सकता--क्यों मालिक बनकर ढोर-डंगर की तरह औरत को ही हाँके रखता है। 
    स्त्री का अपनी नियति को अस्वीकार करना ही सामाजिक मर्यादाओं का टूटना है।
    स्त्री के उत्थान और सबलीकरण की ये कहानियाँ यथास्थिति से विद्रोह ही नहीं, भविष्य की दृष्टि से समाज-परिवर्तन की ध्वजवाहिनी भी हैं। मैत्रेयी ने कहानियाँ शहरी जीवन को लेकर भी लिखी हैं, मगर जिस आत्मीयता और गहराई से उन्होंने गाँव के जीवन को देखा है वह हिंदी में प्रेमचंद और रेणु 
    के सिवा शायद ही किसी को नजर आया हो। ये बेजुबानी स्त्री की यातनाओं, उसके संघर्षों और सपनों के बेआवाज विद्रोह की दस्तावेज हैं।
  • In Dinon
    Vinita Gupta
    60

    Item Code: #KGP-1909

    Availability: In stock

    इन दिनों
    ग़ज़लों में छन्द का अनुशासन काकी दूर तक दिखाई देता है । इसके साथ-साथ ग़ज़ल के मुहावरे, व्याकरण, अंदाज़े-बयां, भाषा और विभिन्न बहरों को भी अपने जीवनानुभव तथा अभ्यास से उपलब्ध करने की सफ़ल कोशिश है । ग़ज़लों में एक ओर व्यक्तिगत अनुभूतियों तथा राग-विराग की स्थितियों के प्रस्तुति है तो दूसरी ओर समष्टिगत वेदनाएं, व्यथाएँ भी अंकित हुई हैं। विनीता के पास हिन्दी मुहावरे और शब्दावली का भण्डार तो है ही, उर्दू का रंग भी देखने को मिलता है । हिंदी, उर्दू के सहीं अनुपात ने इन ग़ज़लों को और भी निखार दिया है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nirmal Verma
    Nirmal Verma
    185 167

    Item Code: #KGP-2080

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार निर्मल वर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दहलीज', 'लवर्स', 'जलती झाड़ी', 'लंदन की एक रात', 'उनके कमरे'', 'डेढ़ इंच ऊपर', 'पिता और प्रेम', 'वीकएंड', जिंदगी यहाँ और वहाँ' तथा 'आदमी और लड़की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक निर्मल वर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aapki Pratiksha
    Shyam Vimal
    270 243

    Item Code: #KGP-555

    Availability: In stock

    आपकी प्रतीक्षा
    सच भी कई बार कल्पना को ओढ़कर नई भंगिमा अपनाकर कागज की पीठ पर सवार होने को आतुर हो उठता है। अथवा यूं भी कहा जा सकता है कि कल्पना कभी-कभी सच-सी भ्रमित करने लगती है और रिश्ते बदनाम होने लगते हैं।
    जैसे होता है न, मरे हुए कीट-पतिंगे को, गिरे हुए मिठाई के टुकड़े को समग्रतः घेरे हुए लाल चींटियां आक्रांत वस्तु की पहचान को भ्रमित कर देती हैं। यदि ऐसा भ्रम मृत कीट या मिठाई-सा इस रचना से बने तो समझ लो आपने रचना का मज़ा लूट लिया।
    उपन्यासकार को आश्वासन दिया गया था पत्रा का सिलसिला जारी रहने का इस वाक्य के साथ--
    ‘यह वह धारा है जो क्षीण हो सकती है, पर टूटेगी नहीं।
    परंतु वह सारस्वत धारा तो लुप्त हो गई!
    क्या प्रतीक्षा में रहते रहा जाए?
    अंजना की दूसरी जिंदगी कैसे निभ रही होगी?’
  • Facebook Ke Janak : Mark Zuckerberg
    M.A. Sameer
    240 216

    Item Code: #KGP-7806

    Availability: In stock

    अमरीकी युवा मार्क जुकरबर्ग ने किस प्रकार अपनी विलक्षण प्रतिभा से आधुनिक जगत में लोगों को सरलता से आपस में जुड़ने का अवसर दिया, यह एक अत्यंत रोचक विषय है। प्रस्तुत पुस्तक ‘फेसबुक के जनक: मार्क जुकरबर्ग’ उनके विलक्षण मस्तिष्क के अद्भुत कारनामे को प्रेरक रूप में सामने लाने का प्रयास है। यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठकों के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होगी और उन्हें अनेक रोचक तथ्यों से अवगत भी कराएगी।
  • Teen Taal
    Sanjay Kundan
    335 302

    Item Code: #KGP-9340

    Availability: In stock

    सुप्रसिद्ध कथाकार संजय कुंदन का नवीनतम उपन्यास तीन ताल समकालीन यथार्थ को उसके समुचित कद में चित्रित करती रचना है। संजय अपने लेखन में जनप्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। व्यवस्था और सत्ता के अंतर्विरोध वे कलात्मक कुशलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं।
    ‘तीन ताल’ के केंद्र में तीन चरित्रा हैं—सुमित, पारुल और अभिषेक। उनमें मित्राता की अद्भुत लय है। सुमित पत्रकारिता के संकटों का सामना कर रहा है, पारुल अपनी सार्थकता हासिल करने के लिए छटपटा रही है और अभिषेक एक बड़ी कंपनी में काम करते हुए पाखंड का नग्न रूप देख रहा है। इन व्यक्तियों, संघर्षों के साथ देश-समाज की ज्वलंत समस्याएं गुंथी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार। इसने राष्ट्र की समृद्धि और उन्नति को पंगु-सा कर दिया है। संजय एक स्थान पर लिखते हैं—‘लड़ाइयां चल रही थीं। छोटी-बड़ी कितनी लड़ाइयां। हो सकता है ये सब मिलकर एक दिन बड़ी लड़ाई का रूप ले लें। इसलिए संघर्ष रुकना नहीं चाहिए।’ क्योंकि तभी ‘नीला निरभ्र आकाश’ और ‘एक महीन चंपई-सी रेखा’ दिखने की संभावना निर्मित हो सकती है।
    यह उपन्यास रोचक कथानक के साथ कई जरूरी सवालों से भी गुजरता है। ध्वस्त होती पत्रकारिता, इंटेलेक्चुअल दलाल, भीषण बेरोजगारी, एनजीओ की लूटपाट, जनजागरूकता और काॅमर्स के बीच मारक संघर्ष, स्त्राी-पुरुष संबंधों का तनाव, योग्यता की उपेक्षा...आदि-इत्यादि। सवालों के साथ समाधन के लिए उठ खड़ा एक जन आंदोलन भी है, जिसकी अगुआई ‘छोटे गांधी’ ने की। एक हालिया इतिहास भी इस रचना में दर्ज है।
    संजय कुंदन सच को सूक्तियों में बयान करते हैं। जैसे—‘अब नौकरी का अर्थ है व्यक्ति का अनुकूलन बाजार के प्रति।’ ऐसे ही यथार्थ का मुकाबला करने के लिए ‘तीन ताल’ नाट्यदल का गठन होता है। उद्देश्य है जनजागरण। क्योंकि भविष्य संकटों से घिरा है। उपन्यासकार लिखता है—‘मुझे तो डर है कि एक दिन सब कुछ काॅरपोरेट के हाथ में हो जाएगा।’ इसलिए चेतना में ‘नवगति नवलय ताल छंद नव’ की आवश्यकता है। यानी, एक नया स्वप्न!
    ‘तीन ताल’ एक नए स्वप्न की शुरुआत है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Om Prakash Valmiki
    Om Prakash Valmiki
    175 158

    Item Code: #KGP-432

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : ओमप्रकाश वाल्मीकि
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘बैल की खाल’, ‘अम्मा’, ‘बंधुआ लोकतंत्रा’, ‘पीटर मिश्रा’, ‘शवयात्रा’, ‘छतरी’, ‘घुसपैठिए’, ‘प्रमोशन’, ‘बपतिस्मा’ तथा ‘पच्चीस चैका डेढ़ सौ’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Chunmun Aur Gopa
    Tanu Malkotia
    40

    Item Code: #KGP-1239

    Availability: In stock


  • Saaksharta Aur Samaj
    Vinod Das
    125 113

    Item Code: #KGP-9122

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में साक्षरता की महिमा और संबंधित सामाजिक द्वंद्वों और इसके प्रसार में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, जनसंचार माध्यमों की भूमिकाओं, तत्संबंधी सांस्कृति-उपभोक्तावादी ऊहापोहों, स्त्री-साक्षरता के महत्त्व जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को पहचानने का प्रयास किया गया है, वहीं उन वर्गीय पूर्वाग्रहों को भी अनोखी अंतर्दृष्टि और वयस्क विवेक से चिह्नित किया गया है, जिनके कारण साक्षरता का आलोक देश की धूसर और मटमैली झुग्गियों-झोंपड़ियों में अभी तक नहीं पहुंच पाया है। यह सही है कि लेखक के इन विमर्शों और स्थापनाओं में तीखापन और तुर्शी है। कई बार सामाजिक जड़ता और धीमी गति को लेकर यहां गुस्सा, क्षोभ और अवसाद भी मिलता है। लेकिन विनोद दास हिंदी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जो एक संवेदनशील बुद्धिजीवी की तरह शिक्षा से जुड़े गंभीर सवालों पर वैचारिक हस्तक्षेप करते हुए अपनी परंपरा को पहचानकर मूल्यवान की खोज करते हैं। इस संकलन में उनका एक ऐसा व्यक्तिपरक निबंध भी है, जिसमें वह जमीन से जुड़े उन दो अक्षरवंचित विभूतियों को आत्मीयता से स्मरण करते हैं, जिन्होंने मूल रूप से उन्हें साक्षरता की दिशा में कार्य करने के लिए उत्प्रेरित किया है। एक तरफ इन निबंधों में साक्षरता के बारे मंे व्याप्त भ्रांतियों और धुंध को छांटने की कोशिश है, वहीं उस उम्मीद की लौ को तेज करने की कोशिश है, जो मनुष्य में समाज को बेहतर बनाने के लिए भीतर-भीतर ही सुलगती रहती है।
  • Nimaadi Lokokti Kosh
    Dr. Manjula Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-9189

    Availability: In stock

    निमाड़ी लोकसाहित्य में लोकोक्तियों का श्रेष्ठतम स्थान है। ये संपन्न वाचिक परंपरा की परिचायक हैं। इनमें ‘गागर में सागर’ भरने की अद्भुत क्षमता है। इन कहावतों का जन्म कब कहां और कैसे हुआ, इसके संबंध में प्रामाणिक रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। ऐसी लोकमान्यता है कि लोक मनीषा की कोख से लोकोक्तियों का जन्म हुआ। निमाड़ी जनमानस उठते-बैठते अहर्निश बात-बात पर ‘सूत्र-वाक्य’ के रूप में इन कहावतों का प्रयोग करता है। जिसे पढ़कर, सुनकर, गुनकर अच्छे-अच्छे ‘एजुकेटेड’ की बुद्धि चकरा जाती है। सीधे-सादे, भोले-भाले, सच्चे, सरल, माटी से जुड़े अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों का जीवनानुभव से जुड़ा सच, अभिव्यकित का पैनापन, अकाट्य तर्क प्रस्तुत करता है, सौ टंच (खरा सोना) है जिसे चुनौती देने का साहस हम में नहीं है।
  • Mans Ka Dariya
    Kamleshwar
    80 72

    Item Code: #KGP-9061

    Availability: In stock


  • Kangaruon Ke Desh Mein
    Rekha Rajvanshi
    250 225

    Item Code: #KGP-887

    Availability: In stock

    कंगारुओं के देश में
    रेखा राजवंशी की ये कविताएं डायरी हैं उन स्मृतियों की, जो कवयित्री के मन में भारत को लेकर बसी हुई है । ये कविताएँ हैं तुलनात्मक अध्ययन की कि भारत में कैसा था, आंरट्रेलिया में कैसा है । ये कविताएं हैं दो संस्कृतियों को आमने-सामने रखकर उनसे स्वयं  को तलाशने की कि वे कहीं है । इन कविताओं में बचपन है, विभीशेरावस्था है, वृद्धावस्था है । माँ की कॉंपती उँगलियों में कभी त्वरित गति से चलती हुई सलाइयों का सौर्य है । कवि-मन को ये सलाइयाँ मिल जाएं तो दिल की उँगलियाँ अतीत का स्वेटर कभी बुनने लगती  कभी उधेड़ने लगती है । इन सलाइयों ने कंगारुओं के देश का एक कोलाज़ बनाया है और रंग भारत के भरे हैं । एक विकास-यात्रा है पिछले एक दशक की, जिससे धीरे-धीरे हमारी धरती एक ग्लोबल गाँव में बदल गई है ।
    अपना वतन छोड़कर रेखा राजवंशी चली गई ऑस्ट्रेलिया, लेकिन इन कविताओं में उन्होंने हर पल भारत को जिया है । भारत में अगर अन्याय के परिदृश्य हैं तो ऑस्ट्रेलिया में भी कम नहीं । वे यहीं के आदिवासी लोगों पर हुए अत्याचारों के अतीत को जानकर विचलित हो जाती हैं । डिजरीडू नामक लंबे वाद्य-जितनी लंबी पीड़ा उनको होने लगती है । पीड़ा का संगीत कविताओं की शक्ल से ढलकर सामने आ जाता है ।
  • Jalti Chhaya
    Prabha Saxena
    50 45

    Item Code: #KGP-9068

    Availability: In stock


  • Roya Nahin Tha Yaksh
    Hari Ram Meena
    140 126

    Item Code: #KGP-1847

    Availability: In stock


  • Bharatratna Se Sammanit Mahaan Vyaktitva
    Dr. Rashmi
    760 684

    Item Code: #KGP-519

    Availability: In stock

    भारतरत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। अति सम्माननीय एवं विशिष्ट व्यक्तियों को राष्ट्रीय सेवा हेतु प्रदान किया जाने वाला यह सम्मान संपूर्ण व्यक्तित्व व देश के प्रति समग्र समर्पण भावना का आदर करते हुए समर्पित किया जाता है। इस सम्मान से अलंकृत व्यक्ति ‘भारतीय नागरिकता की वरीयता सूची’ में सातवें स्थान पर सुशोभित होते हैं। यह आवश्यक है कि 2 जनवरी, 1954 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा स्थापित ‘भारतरत्न’ सम्मान के विषय में प्रत्येक नागरिक सुपरिचित हो। कला, साहित्य, विज्ञान, राजनीति, विचार, उद्योग, लेखन, सार्वजनिक सेवा एवं खेल आदि के क्षेत्रों में ‘भारतरत्न’ से सम्मानित विभूतियों के जीवन तथा कृतित्व से प्रेरणा पाकर कोई भी अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
    अनेक प्रेरक रचनाओं की लेखिका डा. रश्मि ने परिश्रम व निष्ठापूर्वक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पुस्तक का लेखन किया है। सम्मानित व्यक्तित्व के सभी आयामों का परिचय देते हुए उन्होंने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों को रेखांकित किया है। प्रथम बार ‘भारतरत्न’ (1954) से अलंकृत चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से लेकर 2015 में सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी एवं पं. मदन मोहन मालवीय तक सभी महान् व्यक्तित्वों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी इस पुस्तक में समाहित है।
    राष्ट्रप्रेम, जीवन मूल्य और समर्पित कृतित्व को परिभाषित करती पुस्तक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पठनीय व संग्रहणीय है। सरल-सुगम भाषा तथा प्रवाहपूर्ण शैली इसे अत्यंत रोचक बना देती है।
  • Science Ki Karamaat
    Dhram Pal Shastri
    100 90

    Item Code: #KGP-9204

    Availability: In stock

    यह युग विज्ञान का युग है अर्थात् साइंस की करामात का युग। विज्ञान की नवीनतम उपलब्धियों से सारा संसार चकित है और साथ ही चिंतित भी; क्योंकि आज का विज्ञान कल्याणकारी भी है और विनाशकारी भी। विश्व-भर में वैज्ञानिक अनुसंधानों-आविष्कारों की होड़ लगी हुई है। विज्ञान की इस प्रतिस्पद्र्धा ने मानव-कल्याण के बहुत-से आयाम प्रस्तुत किए हैं, लेकिन साथ ही संपूर्ण मानव जाति को विनाश के कगार पर भी ला खड़ा किया है। विनाशकारी अणु बमों, उद्जन बमों, प्रक्षेपास्त्रों, ध्वंसक राॅकेटों तथा समुद्री पनडुब्बियों का निर्माण वैज्ञानिकों की खोज का ही परिणाम है।
    इस पुस्तक में इन सभी की प्रारंभ से लेकर अब तक की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की गई है तथा विज्ञान-क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान और उपलब्धियों पर सरल एवं रोचक शैली में प्रकाश डाला गया है। अंतरिक्ष के बारे में जिज्ञासु पाठकों के लिए यह पुस्तक निःसंदेह उपयोगी सिद्ध होगी।
  • Vipathgami
    Mastram Kapoor
    80 72

    Item Code: #KGP-2044

    Availability: In stock

    विपथगामी
    विपथगामी उस युवा पीढ़ी की कहानी है जिसे डॉ० राममनोहर लोहिया कुजात पीढ़ी  कहते थे । यह ऐसी पीढ़ी है जो अतीत की जकड़नों से मुक्त होकर भविष्य की तलाश करना चाहती है । जो समाज की वर्तमान नैतिकता का संदेह की नजर से देखती है और उस नैतिकता की खोज में भटकती है जो मानय की जन्मजात आकांक्षाओं  स्वतंत्रता, समता और बंधुता को न कुचले । 
    पचास के दशक के प्रारंभिक वर्षों में महानगर बंबई के क्रूर वातावरण से अपने लिए जमीन तलाशती यह पीढी सद्य:प्राप्त स्वतन्त्रता से मोह-भंग की स्थिति से गुजरती है जब वह यह देखती है कि कही कुछ नहीं बदला है । वह पाती है कि कानून की नजर में हर आदमी अपराधी है जब तक यह अपने को निर्दोष सिद्ध नहीं करता न कि (जैसा कि कानून दावा करता है) हर आदमी निर्दोष है जब तक कि वह अपराधी सिद्ध नहीं होता ।
  • Sapt Aadarsh Mahilayen
    Chandrika Prasad Sharma
    90 81

    Item Code: #KGP-9298

    Availability: In stock

    भारत वर्ष की महिलाएं विश्व में अपने त्याग, तपस्या और औदार्य के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका गौरवशाली व्यक्तित्व प्रत्येक क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ता रहा है। अपने अद्ीाुत त्याग, तपस्या और सेवा-भाव के कारण उन्हें ‘देवी’ की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। यहां यह उक्ति प्रसिद्ध है ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः।’
    सीता ने वन-वन अपने प्राणनथ राम के साथ कष्ट झेलकर भारतीय नारी के गोरवपूर्ण चरित्र को विश्व के सम्मुख प्रस्तुत किया। सावित्री के तपोबल ने यमराज से अपने पति को वापस ले लिया। गार्गी ने शास्त्रज्ञान को प्रस्तुत करके याज्ञवल्क्य को दुविधा में डाल दिया था। अपाला ने तपोवन से अपने शरीर को स्वर्ण जेसा सुंदर बना लिया था। अनसूया ने सतीत्व की महिमा के बल पर त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु, महेश को शिशु रूप देकर पालने में झुलाया था। भारती देवी ने अपने अद्भुत ज्ञान के बल पर शंकराचार्य को असमंजस की स्थिति में डाल दिया था और राम को जूठे-मीठे बेर खिलाकर शबरी ने नवधा शक्ति का ज्ञान प्राप्त किया था।
    इस पोथी में इन उपर्युक्त महिमापूर्ण महिलाओं का आदर्श चरित्र प्रस्तुत कर लेखक ने भारतीय नारी के श्रद्धा रूप को प्रस्तुत किया है।
    —चन्द्रिकाप्रसाद शर्मा
  • Pratiraksha Aur Saamrik Neeti
    Narendra Mohan
    495 446

    Item Code: #KGP-899

    Availability: In stock

    प्रतिरक्षा व सामरिक नीति
    भारत आज एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है । भारत की मंशा अपनी परमाणु शक्ति  उपयोग शांतिपूर्ण कार्यों व आत्मरक्षा के लिए है । किसी भी देश की प्रतिरक्षा व सामरिक नीति वर्तमान और भावी खतरों के आयामों के निरंतर विश्लेषण पर आधारित होती है और भारत को भी इन्हीं आधारों को दृष्टिगत रखते हुए अपने को तैयार रखना होगा । निश्चित रूप से भारत के समक्ष पग-पग पर चुनौतियाँ हैं, लेकिन अपनी संकल्पशक्ति से विद्यमान  सभी चुनौतियों का सामना दृढ़ता व आत्मविश्वास से करेंगे । 
    –अटल बिहारी वाजपेयी 

  • Parineeta
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-78

    Availability: In stock


  • Thank You! Saddaam Husain
    Kshma Sharma
    75 68

    Item Code: #KGP-9076

    Availability: In stock


  • Premchand Kee Kahaniyon Kaa Kaalkramanusar Adhyayan
    Kamal Kishore Goyenka
    1100 990

    Item Code: #KGP-671

    Availability: In stock

    प्रेमचंद पराधीन भारत के स्वाधीनताकामी कालजयी कहानीकार हैं। वे विराट् भारतीय जीवन के महागाथाकार हैं तथा उनकी कथा-सृष्टि में महाकाव्यीय चेतना है। वे भारत राष्ट्र एवं स्वराज्य, भारतीय विवेक एवं अस्मिता तथा भारतीय चेतना एवं भारतीयता के कथाकार हैं। प्रेमचंद कथाकार के रूप में वाल्मीकि, व्यास, तुलसीदास, कबीर, भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी की परंपरा में आते हैं। ये देश के ऐसे राष्ट्रीय साहित्यकार हैं, जिन्होंने उच्च कोटि के मानवीय जीवन-मूल्यों, आत्म-बोध, स्वत्व तथा अस्मिता की प्रतिष्ठा तथा रक्षा करके भारतीयता को स्वरूप प्रदान करके उसे भारत की आत्मा के रूप में सदैव के लिए प्रतिष्ठित कर दिया। प्रेमचंद का कहानीकार इसी भारतीयता का अन्वेषक, उद्घोषक तथा प्रस्थापक है। प्रेमचंद की कहानी-यात्रा में प्रमुखतः राष्ट्रीय-सांस्कृतिक नवजागरण, गांधीवाद, कभी-कभी माकर्स का साम्यवाद, भारत का अद्वैत-दर्शन इत्यादि उनकी इस यात्रा को अपनी-अपनी दर्शन-दृष्टि के अनुसार आलोकित करते हैं, परंतु प्रेमचंद सभी को अपने भारतीय भाव एवं विवेक से देखते और ग्रहण करते हैं और देश-संस्कृति-मानवता के अनुकूल तत्त्वों को ग्रहण करके अपनी भारतीयता में संग्रथित-संश्लिष्ट करके पराधीन भारत को मुक्ति का एक संदेश तथा एक स्वप्न देते हैं। प्रेमचंद की कालक्रमानुसार कहानी-यात्रा को इस पुस्तक में इसी दृष्टि से देखने का प्रयत्न किया गया है। यदि हम भारत को ‘इंडिया’ के स्थान पर ‘भारत’ बनाए रखना चाहते हैं तो प्रेमचंद के कहानी-संसार की मूल आत्मा भारतीयता को अपने राष्ट्रीय-सांस्कृतिक जीवन का अंग बनाना होगा।
    प्रेमचंद की कहानियों के कालक्रमानुसार अध्ययन का यह पहला प्रयास है। इससे पूर्व किसी आलोचक ने न तो इस दृष्टि से सोचा है और न कहानियों को कालक्रम में पढ़ने तथा परखने की ही चेष्टा की है। 
    यहां तक कि हिंदी का कोई आलोचक यह दावा नहीं कर सकता कि उसने प्रेमचंद की कहानियों पर जो कुछ लिखा है, वह उनकी संपूर्ण कहानियों के अध्ययन के बाद ही लिखा है। जिन आलोचकों ने ‘मानसरोवर’ के आठ खंडों की कहानियों को अध्ययन का आधार बनाया है, वे भी उनमें संकलित 203 कहानियों तक ही सीमित रहे हैं और लगभग 95 कहानियां उनकी पकड़ से बाहर रही हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ‘मानसरोवर’ के आठ खंडों में भी कहानियां कालक्रमानुसार संकलित नहीं हैं, अतः किसी भी आलोचक के कालक्रम से कहानियों के अध्ययन की कोई संभावना भी नहीं रह गई थी। अतः कहानियों पर दिए गए उनके निष्कर्ष एवं आलोचनात्मक अवधरणाएं भी निर्मूल, निरर्थक तथा भ्रमोत्पादक बनकर रह जाती हैं।
    ‘प्रेमचंद की कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन’—यह पहला प्रामाणिक अध्ययन है, जो प्रत्येक कहानी को कालक्रम में देखता और परखता है तथा कहानी के पूर्वापर संबंधें के रहस्यों को भी उद्घाटित करता है। कोई भी कहानी हो, श्रेष्ठ या साधरण, अच्छी या बुरी, उसे इस अध्ययन में समान रूप से महत्त्व दिया गया है और कहानी की संवेदना, उसकी आत्मा तथा लेखकीय दृष्टिकोण का विवेचन किया गया है और इस प्रकार उनकी उपलब्ध 298 कहानियों की रचना-प्रक्रिया, उनकी मूल चेतना, उनके युग-संदर्भ तथा लेखकीय अभिप्रेत की, कहानी के पाठ के आधार पर, समीक्षा की गई है तथा पुरानी मान्यताओं की परीक्षा के साथ कुछ नई अवधारणाएं स्थापित की गई हैं, किंतु यह काम प्रमाणों तथा तथ्यों एवं तर्कों के आधर पर किया गया है।...
    अतः मेरा विश्वास है कि यह अध्ययन पाठकों को एक नए प्रेमचंद से परिचित कराएगा, जिसे इससे पूर्व न तो खोजा गया था, न देखा गया था, बल्कि उसे दबा दिया गया था।
    –भूमिका से
  • Mahayaatra Gaatha (1 & 2) (Paperback)
    Rangey Raghav
    500

    Item Code: #KGP-22

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)

    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    240 216

    Item Code: #KGP-235

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • Heeraman High School
    Kusum Kumar
    500 450

    Item Code: #KGP-577

    Availability: In stock


  • Kya, Kab, Kahan?
    Mahendra Raja Jain
    1100 990

    Item Code: #KGP-702

    Availability: In stock

    ‘क्या, कब, कहाँ?’ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ-ग्रन्थ है। यह राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित ‘हंस’ पत्रिका के समस्त अंकों (अगस्त 1986-अक्टूबर 2013) की विषय सूची है। लेखक, शीर्षक, विषयानुक्रमणिका के रूप में इसे तैयार किया है ‘सन्दर्भिका निर्माण’ के विशेषज्ञ महेन्द्र राजा जैन ने। उन्होंने सर्जनात्मक रुचि के साथ अत्यन्त परिश्रमपूर्वक ‘क्या, कब, कहाँ?’ को आकार दिया है। डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के शब्दों में, ‘मैं सचमुच महेन्द्र राजा जैन को हृदय से धन्यवाद देना चाहूँगा—एक पाठक के नाते, एक लेखक के नाते कि वे अपनी भाषा और साहित्य के लिए इतना महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं।’
    कई वर्षों के अथक परिश्रम से ‘हंस’ के इन अंकों की विषय सूची तैयार की गई है। लेखक, शीर्षक और विषयों के अकारादि क्रम से संयोजित इस सूची से तत्काल पता चलेगा कि ‘हंस’ में—
    ० किसी लेखक की, किसी शीर्षक की कोई रचना छपी या नहीं या कब छपी?
    ० किसी विषय की कौन-कौन सी रचनाएँ छपीं या वे किसकी लिखी हुई हैं?
    ० किसी पुस्तक की समीक्षा छपी या नहीं या कब छपी या वह किसकी लिखी हुई है?
    ० ‘हंस’ में छपी किसी रचना पर किसकी क्या प्रतिक्रिया कब छपी?
    ० ‘मेरी-तेरी उसकी बात’ में कब किस विषय पर चर्चा की गई है या किसी विषय पर कुछ लिखा गया है या नहीं?
    ० ‘काँटे की बात’ में कब किस-किस विषय पर लिखा गया है?
    ० ‘हंस’ में किसी महत्त्वपूर्ण गोष्ठी, सेमिनार आदि की रिपोर्ट छपी या नहीं या कब छपी?
    ० ‘बात बोलेगी’ और ‘समकालीन सृजन-सन्दर्भ’ में कब किस विषय पर लिखा गया है?
    इसके साथ और भी बहुत कुछ जानने योग्य।
    राजेन्द्र यादव की कीर्ति के स्थायी स्मारक ‘हंस’ के प्रत्येक पृष्ठ का अवगाहन करता यह ग्रन्थ समस्त हिन्दी प्रेमियों, पाठकों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों और बौद्धिकों के लिए पठनीय व संग्रहणीय है।
  • Shishu Seekhen Achchhi Baaten-1
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1116

    Availability: In stock


  • Kharra Aur Anya Kahaniyan
    Subhash Sharma
    460 414

    Item Code: #KGP-9366

    Availability: In stock

    ‘आजादी! वह भी औरतों की! क्या होती है यह आजादी? इसका रंग क्या होता है? बू क्या होती है? स्वाद क्या होता है? काश, एक बार मिल जाती तो मैं उसे छूकर, सूंघकर, चखकर देखती। फिर उसे पकड़कर कलेजे से भींचकर रोती...।’—प्रस्तुत कहानी संग्रह खर्रा और अन्य कहानियां की कहानी ‘कुहुकि कुहुकि जिया जाय’ की इन पंक्तियों में जो प्रश्नाकुलता है, वह बहुत मूल्यवान है। कोई भी रचना यदि सलीके से सवाल उठाने में कामयाब हो जाए तो वह अपने सामाजिक दायित्व की पूर्ति कर लेती है। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की सभी कहानियां समकालीन जीवन के छोटे-छोटे संदर्भों को बड़े परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करती हैं। इन कहानियों के लेखक सुभाष शर्मा यथार्थवादी लेखक हैं। कहानी में कथानक, सामाजिक सरोकार, विवरणधर्मिता और युक्तिसंगत समापन में उनका भरोसा है। यही कारण है कि सुभाष की कहानियां बेहद पठनीय हैं और पाठक की चेतना को झकझोरती हैं।
    इस संग्रह की लगभग सभी कहानियां व्यवस्था और सत्ता के भीतरी सच को बयान करती हैं। अनेक कहानियां शिक्षा तंत्र के तहखानों को रोशनी में लाती हैं। योग्यता, अवसर और दायित्व का उपहास करती स्थितियों व मनोवृत्तियों को पूरी संवेदनशीलता के साथ कहानीकार ने उजागर किया है। इस संग्रह में स्त्री के  संघर्षमय संसार को चित्रित किया गया है। बिना किसी विमर्श के जाल में उलझे हुए लेखक ने स्मरणीय कहानियां लिखी हैं।
    ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि बिना लाउड हुए या बिना प्रचारात्मक हुए सुभाष शर्मा ने वर्तमान राजनीति के बहुलांश चरित्र को कहानियों में उतार दिया है। इस चरित्र को चित्रित करने में लेखक की अर्थगर्भित भाषा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ‘दास्तान-ए-सुबूत’ में लेखक कहता है, ‘पहले कार्यकाल में वह जान गए थे कि खजाना कहां-कहां है। चुनाव, मुकदमा, राजनीतिक षड्यंत्र आदि में जितना खर्च हुआ था, उसकी भरपाई उन्होंने सुपरसोनिक गति से करना शुरू कर दिया।’ ऐसी व्यंजक भाषा में रची गईं ये कहानियां यथार्थ को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ निश्चित रूप से एक पठनीय और उल्लेखनीय कहानी संग्रह है।
  • Kaagaz Ki Naav
    Nasera Sharma
    495 446

    Item Code: #KGP-472

    Availability: In stock


  • Natyachintan Aur Rangdarshan Antarsambandh
    Girish Rastogi
    475 428

    Item Code: #KGP-707

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में व्यापक, आधुनिकतम और गहन विश्वदृष्टि उल्लेखनीय है। इस अर्थ में बर्तोल्त ब्रेख्त का नाट्यचिंतन और रंगदर्शन बहुत गंभीर है। पश्चिमी नाट्यचिंतन के साथ-साथ यह भारतीय नाटककार और रंगमंच को भी परखती चलती है। लेखिका प्राचीन नाटककारों को नई दृष्टि से देखती है तो साहित्य और रंगमंच के साथ ही आलोचना को भी नए ढंग से देखती है।
    कई मानों में नाटक का साहित्य और रंगमंच से जो रिश्मा टूटता-बनता रहा और प्रश्न पर प्रश्न उठते रहे चिंतन और रंगदर्शन के अंतर्संबंध बनते-बदलते रहे। यह पुस्तक उन सबसे साक्षात्कार कराती है-चाहे संस्मरणों के जरिए, चाहे पत्र के जरिए या द्वंद्वात्मकत संवेदना के जरिए। कुछ महत्वपूर्ण नाटककारों का विशद अध्ययन-चिंतन भी यह स्थापित करता है कि मंचनां से ही नाट्यचिंतन और रंगदर्शन की अंतरंगता विकसित होती जाती है, क्योंकि नाटक और रंगमंच एक जीवित माध्यम हैं, अन्यथा वह कुंठित हो जाती है। दर्शक, पाठक, आलोचक सभी को उत्सुक करने वाली है यह पुस्तक।
  • Meri Pratinidhi Kahaniyan
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1949

    Availability: In stock

    मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ
    राकेश के घर पर जैसे आँसुओं का समंदर ही उमड़ आया था। सुदर्शना को उस समुद्र में डूबते जहाज-सा वह ताबूत दिखाई दिया, जिसमें उसका ‘सब कुछ’ था। आज उसे न माँ-बाप की ममता बाँध सकी, न ही सास-ससुर की लाज रोक सकी। आँधी की तरह वह आगे बढ़ी और ससुर के साथ खड़ी हो गई, "मैं भी कंधा दूँगी।"
    दुल्हन-सी सजी सुदर्शना को देख सैनिक भी हक्के-बक्के रह गए। सब चौंक उठे, "क्या कहती है लाड़ी ? पगला गई है ? ऐसा भी कभी हुआ है आज तक ?"
    जवाब में सुदर्शना ने और कसकर अरथी को पकड़ लिया। उसकी चुप्पी जैसे बोल उठी, ‘आज तक ऐसा शहीद भी न हुआ था कभी। मैंने बचपन से हर पल जिसका साथ दिया, आज उसकी अंतिम यात्रा में साथ कैसे छोड़ दूँ ?’
    अरथी उठाकर लोग चल पडे़। ‘कारगिल का शहीद राकेश अमर रहे!’ के घोष से गूँज उठा धरती-आकाश।
    तभी वह रुक गई, "ठहरो, जरा...स्वेटर...स्वेटर..."
    उसने माँ की ओर देखते हुए पुकारा। माँ तीर की तरह आगे आई और एक नया बुना स्वेटर लाकर उसे दे दिया। उसने उसे खोला और बड़े प्यार से अपने पति की छाती पर सजा दिया। बोली, "तुमने चिट्ठी में लिखा था। मैंने तैयार कर रखा है। इसे पहनकर जाओ। अब ठंड न लगेगी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी ‘स्वेटर’ से]
  • Hamare Prerna Srot
    Sharan
    170 153

    Item Code: #KGP-955

    Availability: In stock

    हमारे प्रेरणा-स्रोत
    प्रस्तुत पुस्तक उन महापुरुषों के श्रेष्ठ विचारों व उत्तम आचरण का जीता-जागता प्रमाण हैं, जिन्होंने उच्च विचारों के लिए सादा जीवन बिताना परमावश्यक समझा । उनका खान-पान, रहन-सहन तो सादा था, पर विचार बहुत ऊँचे थे । आचरण महान् था । वास्तव में अगर जीवन में सादगी है, छल-कपट, लोभ, मोह, झूठ और रिश्वतखोरी से हम दूर हैं तो हमारा मन-मस्तिष्क स्थिर होगा, उसमें नए-नए सुंदर व उच्च विचार पैदा होंगे । यदि हम विलासिता की ओर दौड़ेंगे तो हमारा जीवन बनावटी हो जाएगा । हम सदैव हो अनुचित ढंग से धन व पद पाने की लालसा रखेंगे । सहयोग, सहानुभूति और राष्ट्र-प्रेम की भावना का हमारे अंदर अभाव हो जाएगा । आशा है, पाठकों को यह कृति पसंद आएगी और इससे उन्हें अपना जीवन संवारने में सफ़लता मिलेगी ।

  • Shiksha Tatha Lok Vyavhar
    Maharishi Dayanand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1213

    Availability: In stock

    जब मनुष्य धार्मिक होता है, तब उसका विश्वास और मान्य शत्रु भी करते हैं और जब अधर्मी होता है, तब उसका विश्वास और मान्य मित्र भी नहीं करते। इससे जो थोडी विद्या वाला भी मनुष्य श्रेष्ठ शिक्षा पाकर सुशील होता है, उसका कोई भी कार्य नहीं बिगड़ता ।
    इसलिए मैं मनुष्यों को उत्तम शिक्षा के अर्थ सब वेदादिशास्त्र और सत्याचारी विद्वानों की रीति से युक्त इस ग्रंथ को बनाकर प्रकट करता हूँ की जिसको देख-दिखा, पढ़-पढाकर मनुष्य अपने और अपनी संतान तथा विद्यार्थियों का आचार अत्युत्तम करें, कि जिससे आप और वे सब दिन सुखी रहें ।
    इस ग्रंथ में कहीं-कहीं प्रमाण के लिए संस्कृत और सुगम भाषा और अनेक उपर्युक्त दृष्टान्त देकर सुधार का अभिप्राय प्रकाशित किया, जिसको सब कोई सुख से समझ अपना-अपना स्वाभाव सुधार, उत्तम व्यवहार को सिद्ध किया करें । 

  • Antarvartayen
    Kanhiya Lal Nandan
    240 216

    Item Code: #KGP-802

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक में सम्मिलित लगभग सभी बातचीतें किसी न किसी प्रतिष्ठित पत्रिका के माध्यम से पहले भी पाठकों के सन्मुख आ चुकी हैं, लेकिन समवेत रूप में दिनकर और अज्ञेय से लेकर कामतानाथ तक कई पीढ़ियों के रचनाकारों के अंतरंग मन में पैठा जा सके और उस पैठ के ज़रिए साहित्यिक जिज्ञासुओं की प्रश्नाकुल उत्कंठाएँ शांत हो सकें, इस दृष्टि से इस पुस्तक का विशेष महत्त्व मैं मानता रहा हूँ । फिल्मकार बासु भट्टाचार्य, चित्रकार कृष्ण हेब्बार और छायाकार रघु राय भी बातचीत के इस समवेत क्रम में सम्मिलित कर लिए गए हैं ताकि संवेदना के धरातल पर अनेक माध्यमों से जुड़े हुए लोगों की एकसूत्रता की प्रतिच्छवि भी आँकी जा सके ।
    कोई भी रचनाकार अपने युग को सिर्फ अपनी विधा के चश्मे से नहीं देखता । यह अगर कहानीकार है तो उसके साथ-साथ एक संघर्ष करता हुआ सामाजिक प्राणी भी है; जो कि ट्रेन-यात्रा में टिकट के लिए धक्के खाता भी हो सकता है, समाज में फैली किसी बुराई विशेष के प्रति एक आदमी की तरह सोच भी सकता है और उसकी प्रतिक्रिया में हिस्सेदार भी हो सकता है । रचनाकार को उसके समूचे रंगों में टटोलने की इसी जद्दोजहद से मैंने इन बातचीतों के क्रम में कुछ ऐसे ढंग से यह बार सवाल रखे हैं जो पूर्वापर संबंध के साथ असंगत दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उस बातचीत के समूचे प्रभाव में मुख्य उद्देश्य यहीं रहा है कि यह रचनाकार अपने मन के अछूते पहलुओं को पाठकों के सामने खोले; खासकर ऐसे पहलू जिन पर बहुत कम प्रकाश पड़ा है ।
    इस पुस्तक में सम्मिलित सभी रचनाकार व्यक्तित्व मुझे अंतरंग आत्मीयता प्रदान करते रहे हैं । संबंधों की यह अंतरंग आत्मीयता मेरी इन सभी बातचीतों का मूल आधार रही है । शायद इसीलिए जब-जब ये बातचीतें पहली बार प्रकाश में आई हैं, मुझे इनकी शैली के लिए पाठकों का अतिरिक्त स्नेह मिलता रहा है ।
    -कन्हैयालाल नंदन


  • Pakshi Avlokan
    Dr. Anand Saxena
    950 855

    Item Code: #KGP-562

    Availability: In stock

    पक्षियों के अवलोकन तथा उनकी पहचान करने के संबंध में हिंदी में पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। यह पुस्तक इस कमी को पूरा करने का प्रयास है। पक्षियों की स्पष्ट फोटो तथा पक्षी की जाति (species) पहचानने के विषय में संकेतों को देने पर विशेष ध्यान दिया गया है। अनेक पक्षियों के नर और मादा में काफी अंतर होता है। इसका उल्लेख करते हुए अकसर उनकी पफोटो भी दी गई है।
  • Prasiddha Vyaktiyon Ke Prem-Patra
    Virendra Kumar Gupt
    190 171

    Item Code: #KGP-9034

    Availability: In stock

    स्त्रियों-पुरुषों के हृदयों में एक-दूसरे के प्रति उठते-बैठते ज्वारभाटों की सबसे सच्ची, ईमानदारी शाब्दिक अभिव्यक्ति प्रेम पत्रों में ही हो पाई है । इसका कारण स्पष्ट है । जब भी व्यक्ति ने, स्त्री या पुरुष ने प्रेम-पत्र लिखा है, वह अनायास ही धन-पद-विद्वत्ता या सामाजिक प्रतिष्ठा की ऊंचाइयों से नीचे उतर आया है और स्त्रीत्व-पुरुषत्व की यथार्थ धरती पर खड़े होकर ही उसने अपने प्रेमी या प्रेमिका को संबोधित किया है । तब शरीर की सभी साज-सज्जाएं और चेहरे के सभी मुख़ौटे उतर जाते हैं और धड़कता हृदय ही सामने होता है । इस स्तर पर लिंकन, बायरन, क्रामवेल, नेपोलियन, विस्मार्क,शॉ और गांधी एक ही सुर में बोलते दिखाई पड़ते हैं । 
  • Maharishi Dayanand Saraswati Aur Stree-Vimarsh
    Dr. Meena Sharma
    165 149

    Item Code: #KGP-1243

    Availability: In stock

    महर्षि दयानंद सरस्वती और स्त्री-विमर्श
    महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श में वैचारिकता से अधिक रचनात्मकता है। अपनी रचनात्मकता के कारण उसकी मूल्यवत्ता एवं सार्थकता है। मूल्य और सार्थकता की तलाश हर युग में होती है। आज के स्त्री-विमर्श की दिशाहीनता की स्थिति एवं चुनौतियों के आलोक में दिशा-निर्देशक के रूप में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श, बल्कि यूँ कहें कि स्त्री के दयानंदीय विमर्श की आवश्यकता कल से अधिक आज है। इतिहास में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श की जो भूमिका थी, वर्तमान में स्त्री-विमर्श की उस भूमिका को इतिहास-बोध के साथ युगानुरूप विस्तार दिया जा सकता है।
  • Samrat Ashok
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-250

    Availability: In stock


  • Swami Ram Tirath Ki Shreshtha Kahaniyan
    Jagnnath Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9140

    Availability: In stock

    स्वामी रामतीर्थ की श्रेष्ठ कहानियां जहाँ अत्यंत रूचि-मोहक है, वहां उसका दामन उज्ज्वल प्रेरणाओं और सुनहले शिक्षा-तत्वों से जगमगा रहा है तथा ह्रदय व मन को आलोकित किये देता है । 
    प्रत्येक कहानी के अंत में कुछ शब्दों द्वारा कहानी में निहित शिक्षा-तत्त्व का संकेत दिया  गया है । यही ऐसा न किया जाता, तो इन कहानियों एवं स्वामी जी के उद्देश्य से न्याय नहीं हो सकता था । स्वामी जी ने प्रत्येक कहानी का उद्भावना केवल इसीलिए किया था की उसके रोचक माध्यम से अपने श्रोताओं एवं पाठकों के निकट विषय की गंभीरता तथा दुरूहता बोधगम्य व सरल हो जाये और साथ ही साथ शिक्षा के तत्त्व भी उजागर हो उठें । 
  • Buddha Charitam (Paperback)
    Hari Krishna Taileng
    120

    Item Code: #KGP-7226

    Availability: In stock

    बुद्ध चरितम्
    संस्कृत के सात श्रेष्ठ महाकाव्यों और नाटकों पर आधारित हिंदी कथाएँ
    बुद्ध चरितम् की विशेषता यह है कि इसमें भगवान बुद्ध के जन्म से निर्वाण तक का जीवन-चरित्र तो है ही, साथ ही  महाकवि ने बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों को रुचिकर कथा में पिरोकर मधुर और सहज ग्राह्य बना दिया है ।
    सौंदर नंद में बोद्ध धर्म के सिद्धांतों और साधना-रीति को कथा में गूँथकर महाकवि ने सहज और बोधगम्य बना दिया है । इस महाकाव्य में गौतम बुद्ध की विमाता से उत्पन्न भाई नंद और उसकी अतीव सुंदर पत्नी सुंदरी की मनोहारी कथा है ।
    नागानंद में नागों की रक्षा में प्राणोत्सर्ग कर देने वाले परोपकारी नायक जीमूतवाहन की कथा है । संयत और उदात्त प्रेम, लोकहित और प्राणीत्सर्ग की यह कथा मानवीय गुणों से परिपूर्ण और प्रभावशाली है ।
    मालती-माधवम में मालती और माधव की प्रणय गाथा है, जो अनेक बाधाओं के आते रहने के बावजूद सफलता प्राप्त करती है । कथा बडी रोचक है ।
    प्रतिमा नाटक में पुरुषोत्तम राम के वनगमन से लेकर राज्यारोहण की कथा कही गई है । कथावस्तु का प्रस्तुतीकरण अत्यंत कलापूर्ण और मनोहारी है । यह नाटक बड़ा आदर- प्राप्त और विशिष्ट है । इसमें भरत का उदात्त चरित्र और महारानी कैकेयी का मार्मिक व सहानुभूतिपूर्ण चित्रण हुआ है । कैकेयी महाकवि द्वारा निर्दोष सिद्ध की गई है ।
    रत्नावली नाटक में वत्सराज उदयन से सिंहल की राजकुमारी रत्नावली के विवाह की रोचक व सरस कथा है ।
    विक्रमोर्वशी नाटक में चंद्रवंश के इंद्र के समान प्रतापी महाराज पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी की प्रेमकथा प्रस्तुत की गई है।
  • Aur Aagey Badhatey Raho...
    Dr. Rashmi
    200 180

    Item Code: #KGP-466

    Availability: In stock

    जीवन व साहित्य में सदुपदेश, सत्संग और सुभाषित का विशेष महत्त्व है। इनमें अनुभवों का ऐसा खजाना होता है जो किसी को भी समृद्ध कर सकता है। यही कारण है कि साहित्य में प्रारंभ से ही नीति-कथाओं का प्रचलन है। ये कथाएं प्रेरणा देती हैं, संघर्ष करना सिखाती हैं, असमंजस में उलझे मन को उचित निर्णय लेने की शक्ति देती हैं और समग्रतः जीना सिखाती हैं। ‘...और आगे बढ़ते रहो’ प्रेरक प्रसंगों की एक ऐसी ही रोचक पुस्तक है। लेखिका डॉ. रश्मि ने बड़ी कुशलता से उपयोगी जीवन सूत्रों को प्रस्तुत करते हुए उनमें निहित संदेश भी रेखांकित कर दिया है।
    इन प्रेरक प्रसंगों में मूलतः नैतिक शिक्षा छिपी है। वह नैतिकता जिसके बिना सार्थक, संतुलित और स्वस्थ मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी प्रेरक कथाएं वर्षों से समाज में सत्य, प्रेम, अहिंसा, त्याग और सहनशीलता के बीज बोती रही हैं। पहले घर-परिवार में बड़े बुजुर्ग, जैसे--दादी-दादा, नानी-नाना ऐसी बहुत सारी कहानियां सुनाते थे। बहाने-बहाने से बच्चे उनसे बहुत कुछ ऐसी बातें सीखते थे जो जीवनपर्यंत याद रहती थीं। आज समय बदल गया है। क्या बड़े, क्या बच्चे--सब अपनी-अपनी जगह व्यस्त हैं। प्रेरक प्रसंगों से भरी कहानियां सुनाने का जिम्मा पुस्तकों ने ले लिया है। इस बात का अनुभव पाठक यह पुस्तक पढ़ते हुए करेंगे। सीधी सुगम भाषा और प्रवाहपूर्ण शैली में लिखी ये रचनाएं पाठकों को प्रभावित व प्रेरित करेंगी--ऐसा हमारा विश्वास है।

  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale
    Chanderkant Deotale
    190 171

    Item Code: #KGP-549

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।
    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।
    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
  • Ved Kya Hain ?
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-8002

    Availability: In stock

    पुस्तक के प्रारम्भ में यह बताने की कोशिश की गई है कि वेद का अर्थ क्या है तथा वेदों का निर्माण कब हुआ । फिर चारों वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के बारे में अलग-अलग बताया है कि उनमें से प्रत्येक में क्या-क्या है। इसके साथ ही यह भी बताया है की प्रत्येक वेद के चार भाग हैं —संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद । फिर इन चारों भागों के बारे में विस्तृत चर्चा की गयी है।
    इसके उपरांत वेदांगों के बारे में जानकारी दी गयी है । वेदांग छह हैं — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंदशास्त्र । इन छह वेदांगों के बारे में पुस्तक में सविस्तार चर्चा की गयी है । 
    चारों वेदों के आलावा चार उपवेद भी हैं । ये हैं—आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्व वेद तथा स्थापत्य वेद । इनके बारे में भी आवश्यक जानकारी पुस्तक में दी गयी है ।
  • Bhartiya Sahitya Par Ramayan Ka Prabhav
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    275 248

    Item Code: #KGP-595

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य पर रामायण का प्रभाव
    रामकथा से संबद्ध काव्य-रचना की एक सुदीर्घ परंपरा है, जिसका उद्गम वैदिक वाङ्मय से माना जाता है। लौकिक संस्कृत में इस परंपरा का विधिवत् सूत्रपात आदिकवि वाल्मीकि से हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने रामकथा को जो व्यवस्था, उदात्तता, महनीयता और कालजयिता प्रदान की उसके लिए साहित्य जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। विश्व मानचित्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को रामकथा ने अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। भारत के अतिरिक्त आज भी मिस्र और रोम से लेकर वियतनाम, मंगोलिया, इग्नेशिया तक रामकथा की अमिट छाप देखी जा सकती है। भारत और भारतीय मूल के लोगों के लिए रामकथा शक्तिशाली सांस्कृतिक आधार है। भारतीय भाषाओं में रामकथा का स्वरूप अनेक रूपों में विद्यमान है जो भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता को सिद्ध करता है।
    रामकथा की नित्य-प्रवाही पुण्यसलिला की अजस्र धारा अनादि काल से भारतीय मनीषा को सम्मोहित और भारतीय जीवन को संस्कारित करती रही है।
    रामकथा के सार्वदेशिक स्वरूप को विभिन्न भारतीय भाषाओं में जांचना-परखना ही इस उपक्रम का अभीष्ट है।
    विश्वास है कि रामकथा और रामकथा से संबद्ध साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए इसमें प्रचुर सामग्री मिल सकेगी।
  • Nihatthi Raat Mein
    Indira Mishra
    150 135

    Item Code: #KGP-9134

    Availability: In stock


  • Domnic Ki Vaapasi
    Vivek Mishra
    350 315

    Item Code: #KGP-9359

    Availability: In stock

    ‘डाॅमनिक की वापसी’ वर्ष 2015 के ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ से अलंकृत उपन्यास है। इसके लेखक विवेक मिश्र समकालीन हिंदी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। विवेक ने रचना के लिए सदा ऐसे कथानक चुने हैं जो समाज के किसी न किसी व्यापक सत्य को प्रकट करते हैं। इसीलिए वे लोकप्रिय रचना-पद्धतियों से अलग रास्ता तलाशते हैं। प्रस्तुत उपन्यास इसका प्रमाण है।

    इस उपन्यास के केंद्र में ‘डाॅमनिक की वापसी’ नामक नाटक है, डाॅमनिक का चरित्र निभाने वाला अभिनेता दीपांश इसका प्रेरक पात्र है। दीपांश यथार्थ और नियति के बीच झूलता अपना मार्ग तय करता है। वह उस समय रंगमंच से अदृश्य हो जाता है जब अभिनय के शीर्ष पर उसका नाम चमक रहा होता है। उपन्यास अभिनय में जीवन और जीवन में अभिनय का द्वंद्व उपस्थित करता है। प्रेम पर आधारित नाटक तो सफल होता है लेकिन जीवन में प्रेम पराजय की छायाओं से घिर जाता है।

    ‘डाॅमनिक की वापसी’ प्रेम, मानवीय संबंध, कला और जीवन की सघन बुनावट से निर्मित हुआ है। अनूठा कथानक, रचनात्मक भाषा, शिल्प सौष्ठव और दार्शनिक आभा इस रचना के उल्लेखनीय तत्त्व हैं। युवा पीढ़ी में उपन्यास रचना की सिद्धि के लिए इस उपन्यास को उदाहरणार्थ देखा जा सकता है। विश्वास है कथानक और कहन के आधार पर ‘डाॅमनिक की वापसी’ व्यापक पाठक समुदाय की प्रियता अर्जित करेगा।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-3)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1578

    Availability: In stock


  • Nepathya Se
    Ramesh Chandra Shah
    175 158

    Item Code: #KGP-9117

    Availability: In stock

    इस पुस्तक का प्रारंभ एक आत्मनिबंध-सी लगने वाली रचना से होता है और उपसंहार एक ऐसे पत्र-संवाद से, जो दरअसल समूची पुस्तक में अंतव्र्याप्त विषयवस्तु से ही संबद्ध विचारों का वाद्य-वृंद अथवा ‘ड्रामा’ है। इस तरह यह एक ओर मेरे विशुद्ध व्यक्ति-व्यंजक निबंध-संग्रहों ‘रचना के बदले’, ‘आडू का पेड़’ और ‘शैतान के बहाने’ से और दूसरी ओर मेरे वैचारिक निबंध-संकलनों ‘सबद निरंतर’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ तथा ‘स्वाधीन इस देश में’ से जुड़ता है; हालांकि है यह कुल मिलाकर वैचारिक निबंधों का संग्रह ही। पाठक लक्ष्य करेंगे कि विशुद्ध साहित्यिक आलोचना जिसे कहा जाता है, उससे भिनन कोटि का उपक्रम होते हुए भी यह लेखन ‘आलोचना’ को हर जगह स्पर्श करता चलता है अलगपन इसमें यह, कि आलोचना का यह स्वर संस्कृति के व्यापक सरोकारों का, कहंे कि एक तरह की सभ्यता-समीक्षा का स्वर है।
    पिछले तीन-चार बरसों के दौरान लिखे गए इन निबंधों में सुधी पाठक को कुछ न कुछ तारतम्य और पूर्वापर-संबंध की प्रतीति भी अवश्य होगी जो इनके पुस्तकाकार प्रकाशन को संकलन की तरह ही नहीं, अंतग्र्रथित गं्रथ के रूप में भी यथेष्ट औचित्य प्रदान करती है। इस अवसर पर लेखक उन समस्त संस्थाओं और पत्रिकाओं के प्रति आभार व्यक्त करना अपना कर्तव्य समझता है, जिन्होंने इन निबंधों को प्रेरित या प्रकाशित किया।
    —रमेशचंद्र शाह
  • Sahitya : Vividh Vidhayen
    Shashi Sahgal
    240 216

    Item Code: #KGP-755

    Availability: In stock

    साहित्य: विविध विधाएं
    हिंदी साहित्य का संसार जितना विपुल है, उसी अनुपात में साहित्य की विधाओं का भी विस्तार हुआ है। साहित्य की विकास-यात्रा में भले ही एक विधा का प्रवेश दूसरी विधा में हो रहा है, फिर भी प्रत्येक विधा के कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे हम उस विधा की पहचान करते हैं। मसलन नाटक और उपन्यास या फिर कहानी और डायरी आदि सभी विधाओं के कुछ ऐसे बुनियादी तत्त्व हैं जो साहित्य की एक विधा से दूसरी विधा को अलग पहचान देते हैं। शशि सहगल की पहचान एक कवि, आलोचक एवं अनुवादक के रूप में है। 
    एक लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पठन-पाठन करते हुए उन्होंने जिस जरूरत को खुद महसूस किया, यह पुस्तक उन्हीं बिंदुओं एवं अनुभवों से प्रेरित है और साहित्य की विविध विधाओं के बुनियादी तत्त्वों से जुड़े भारतीय एवं पाश्चात्य विचारकों की धारणाओं को संक्षेप रूप में सामने रखती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक का महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इसमें बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करने के साथ-साथ कुछ प्रमुख लेखकों या प्रमुख रचनाओं के बहाने प्रत्येक विधा की अद्यतन जानकारी भी दी गई है। इस मायने में यह किताब साहित्य की प्रत्येक विधा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने रखती है। 
    इस प्रकार ‘साहित्य: विविध विधाएं’ साहित्य के आम जिज्ञासु पाठकों, छात्रों, शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी और जरूरी किताब बन जाती है।
  • Jangal Se Shahar Tak
    Rajendra Avasthi
    260 234

    Item Code: #KGP-9099

    Availability: In stock

    जंगल से शहर तक
    अपने को मैं सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे मध्य प्रदेश और बस्तर से लेकर पूरे देश के आदिवासियों के बीच काम करने, रहने और उनके जीवन को गहराई से समझने का अवसर मिला है। मुझे बहुत ही सुखद आश्चर्य हुआ था कि आज की दुनिया से अलग इनकी अपनी जिंदगी है और उस जिंदगी के प्रति कभी उन्होंने शिकायत नहीं की। उनके लिए जो कुछ संभव था, कई तरह किया गया। बस्तर उस समय के मध्य प्रदेश का ही नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा जिला था। जगदलपुर इसका मुख्यालय आज भी है। इतने बड़े क्षेत्र को संभालना आसान नहीं है। मैं कृतज्ञता ज्ञापन करूंगा कि जगदलपुर अब ढाई जिलों में कंट गया है। धीरे-धीरे अब वहां सुधार हो रहा है और वहां के निवासियों की उन्नति के लिए सरकार प्रयत्नशील है। यही बात नागा, गोंड़, टोडा, कोरकू, उराव, खोंड इत्यादि क्षेत्रों की है। मुझे याद है कि एक समय इनके बीच में पहुंचना बहुत कठिन था। स्थिति अब बदल गई है और वे प्रसन्नतापूर्वक इस समूचे देश के अंग हैं। यह ज्ञान उन्हें हो रहा है।
    मैंने कुछ भी चीज कल्पना से नहीं लिखी। इनके बीच में इनका बनकर, रहकर मैंने काम किया है। सारी व्यस्तताओं के बावजूद मुझे जंगलों में घूमनो हमेशा पसंद रहा है। कहा जा सकता है कि मैं जंगली भी हूं और शहरी भी।
    इतिहास, साहितय-जीवन, देश और काल का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। वह अपने अतीत के माध्यम से आज का चित्र प्रस्तुत करता है।
    —राजेन्द्र अवस्थी
  • Nai Chetana Ki Disha
    Rajeshwar Prasad Kaushik
    90 81

    Item Code: #KGP-9133

    Availability: In stock

    ध्यान, मनन, चिंतन
    ध्यान करने का उद्देश्य है ध्याता को खोजना । ध्याता (वह सत्ता जो ईश्वर, सत्य या निर्वाण का दर्शन करना चाहती है) को खोजे बिना ध्यान केवल भ्रम का एक यंत्र बनता है । ध्याता को खोजना उसकी परिसमाप्ति है । वह सत्य, जो यह कहे कि मुझे ईश्वर को या सत्य को खोजना है, पाना है, वह उसे कमी भी नहीं पा सकता । बुद्धि स्वयं सीमित है, वह उस असीम या शाश्वत की कभी अनुभूति नहीं कर सकती । बुद्धि की सर्वोच्च अनुभूति केवल यह हो सकती है कि वह सीमित तथा प्रतिबद्ध है और इसलिए वह सत्य का दर्शन पाने में असमर्थ है।  इस विवेक का उदय होने पर बुद्धि शांत हो जाती है । बुद्धि के पूर्ण शांत होने का अर्थ है-ध्याता की समाप्ति और ध्यान की भी समाप्ति । ध्यान की ही समाप्ति में से ही प्रेम प्रस्फुटित होता है ।
    यदि कोई व्यक्ति भावुक और गम्भीर है तो इसी क्षण इस प्रस्फुटन के अनुभूति हो सकती है । अन्यथा मनुष्य को ध्यान के अनेक भिन्न-भिन्न  उपायों और पद्धतियों के बीच से होकर गुजरना होता है और उनकी सीमाएँ देखनी होगी । ये उपाय और पद्धतियां बुद्धि की उपज है, इसलिए वे अधिक सूक्ष्म रूपों में 'मैं' और 'मेरा' को जीवित बनाये रखती है । इन पद्धतियों के द्वारा सत्य की खोज की व्यर्थता की जब अनुभूति होती है तब विवेक का आरम्भ होता है ।
  • Vyangya Samay : Sharad Joshi
    Sharad Joshi
    380 342

    Item Code: #KGP-9347

    Availability: In stock

    शरद जोशी हिंदी व्यंग्य के सार्वकालिक महान् रचनाकार हैं। विसंगति के ड्डोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों व लोकप्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धातिक व व्यावहारिक अंतर्विरोधें पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार व अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। उनका एक वाक्य है—‘प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीबी की पीड़ा उससे भी गहरी होती है।’ यही विरल यथार्थबोध है जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है। वे महत्त्वपूर्ण संदर्भों के व्यंग्य लेखक हैं। साहित्य, पत्रकारिता, टी. वी. और सिनेमा में उनके लेखन ने कीर्तिमान बनाए हैं। ‘मासूमियत में निहित मर्म और मुस्कान’ शरद जोशी के लेखन का मूल मंत्रा है। व्यंग्य समय में शरद जोशी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
  • Vyangya Samay : Ravindranath Tyagi
    Ravindra Nath Tyagi
    380 342

    Item Code: #KGP-9342

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ त्यागी का रंग व्यंग्य में सबसे निराला है। उनका अध्ययन व्यापक था। स्मृति अच्छी होने से संदर्भ सामने रहते थे। संदर्भों को प्रसंग देकर रचने की विलक्षण योग्यता उनके पास थी। यही कारण है कि त्यागी के व्यंग्य पढ़ते हुए पाठक को आनंद के साथ ज्ञान भी उपलब्ध होता है। बतरस इतना है कि गांव की गोरी पर लिखते हुए प्राकृत से लेकर पेरिस तक अभिव्यक्ति का विस्तार हो सकता है। व्यंग्य में सहज हास्य के वे आचार्य हैं। दफ्रतरशाही,  शृंगार, प्रकृति और अद्भुत तथ्य–प्रायः इन क्षेत्रों से वे विषय चुनते हैं। संस्कृत और अन्य भाषाओं से उद्धरण देते हुए त्यागी व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय प्रश्नों तक बात करते हैं। कई बार लगता है कि उनके लेखन का उद्देश्य निर्मल हास्य की सृष्टि करना है। यह कठिन काम उन्होंने सरलता से किया है। हास्य में आ जाने वाली दुराग्रही वृत्ति उनके लेखन में नहीं है। वे सिद्धांतो से नहीं, आसपास के तथ्यों या व्यक्ति वैचित्रय से हास्य के क्षण निर्मित करते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में रवीन्द्रनाथ त्यागी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Toro Kara Toro-3 (Parivrajak)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #Kgp-1575

    Availability: In stock


  • Swarajya
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    600 510

    Item Code: #KGP-626

    Availability: In stock

    स्वराज्य
    'स्वराज्य' डॉ० राजेन्द्र मोहन भटनागर का नवीनतम उपन्यास है, जो 1942 की क्रांति पर आधारित है । तब गांधी जी ने अंग्रेजो से कहा था कि 'भारत छोडो' और इसके लिए जनता से अपील की थी, 'करो या मरो' ।
    गांधी जी और उनके साथियों को तत्कालीन सरकार ने नज़रबंद कर दिया था अथवा कारागार में डाल दिया था । जयप्रकाश नारायण, डॉ० लोहिया, अरुणा आसफअली जैसे युवा नेता भूमिगत हो गए थे ।
    प्राय: जनता नेताविहीन थी, लेकिन उसके अंत:करण में 'करो या मरो' का मंत्र अनुगूँज रहा था । वह उससे अनुप्रेरित होकर दुर्द्धर्ष संघर्ष कर रही थी । उसने अनेक स्थानों की बागडोर स्वयं संभाल लो थी । यथार्थतः तब देश जनक्रांति के दौर से गुजर रहा था। 
    अनेक अनाम व्यक्तियों के हाथ में उस क्रांति का संचालन था । उसे उन्होंने अपनी शैली, मुद्रा और अदा से संपन्न किया था । इस उपन्यास में उनको लेकर ताना-बाना बुना गया है और उनकी लडाई को पेश किया गया है तत्कालीन ऐतिहासिक संदर्भों में । फलत: अनेक भूले-बिसरे चित्र जीवंत हो उठे हैं और अनेक प्रसंग सजीव । 
    दरअसल वह लडाई किसानो, विद्यार्थियों, डॉक्टरों, वकीलों, मज़दूरों, नौकरीपेशा परिवार के लोगों ने लडी थी । कैसे? इसी के लिए यह उपन्यास है ।
  • Man Manthan Ki Gaatha
    Amrita Pritam
    275 248

    Item Code: #KGP-1966

    Availability: In stock

    इन तकरीरों में से-

    कलम का कर्म अनेकरूप होता है---
    वह बचकाना शौक में से निकले---
    तो जोहड़ का पानी हो जाता है.... 
    सिर्फ पैसे की कामना में से निकले---
    तो नकली माल हो जाता है... 
    सिर्फ शोहरत की लालसा में से निकले---
    तो कला का कलंक हो जाता है... 
    अगर बीमार मन में से निकले---
    तो जहरीली आबोहवा हो जाता है... 
    अगर किसी सरकार की खुशामद में से निकले-
    तो जाली सिंक्का हो जाता है…

    जो कुछ गलत है, वह सिर्फ एक लफ्ज में गलत है
    फिरकापरस्ती लफ्ज में ।
    उस गलत को उठाकर हम कभी इसे
    हिन्दू लफ्ज के कंधों पर रख देते हैं
    कभी सिक्ख लफ्ज के कंधों पर
    और कभी मुसलमान लफ्ज के कंधों पर
    इस तरह कंधे बदलने से कुछ नहीं होगा---

    धर्म तो मन की अवस्था का नाम है
    उसकी जगह मन में होती है, मस्तक में होती है,
    और घर के आँगन में होती है
    लेकिन हम उसे मन-मस्तक से निकालकर
    और घर के आँगन से उठाकर---
    बाजार में ले आये हैं... 

    सुर्ख खून सड़कों पर बहता हुआ भी
    उतना ही भयानक होता है,
    जितना फिरकापरस्ती के ज़हर से काला खून
    किसी की रगों में चलता हुआ

    काया का जन्म माँ की कोख से होता है
    दिल का जन्म अहसास की कोख से होता है
    मस्तक का जन्म इल्म की कोख से होता है
    और जिस तहजीब की शाखाओं पर-
    अमन का बौर पड़ता है,
    उस तहजीब का जन्म अन्तर्चेतना की कोख से होता है ।

    बात तो अपनी इसी धरती की होती है,
    लेकिन जब तक उसे एक टुकडा पाताल
    और एक टुकड़ा आसमान न मिले,
    बात बनती नहीं,
    और अमृता अपनी बात में

    एक टुकडा पाताल और एक टुकडा आसमान
    मिलाना जानती है ।
    इसीलिए अमृता की तकरीरें
    वक्त का एक दस्तावेज है ।
  • Mere Mitra : Kuchh Mahilayen Kuchh Purush
    Khushwant Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-1881

    Availability: In stock

    मेरे मित्र : कुछ महिलाएँ, कुछ पुरुष
    प्रस्तुत पुस्तक के विषय-व्यक्तित्व मैंने बिना कसी तरतीब के चुने है । इनमें भी वे महिलाएँ और पुरुष विशेष है, जिनसे कि 60 और 70 के दशकों में मेरी दोस्ती हुई । अपने बारे में मेरे इन उद्गारों को पाकर कुछ तो इतने नाराज हुए कि उनसे बोलचाल ही बंद हो गई, पर कुछ खुश भी हुए । उन्होंने माना के उनके प्रति मैंने अपने स्नेह का ही इजहार किया है । कुछ ऐसे भी है, जिन्होंने अपने बारे में मेरे लिखे को पढ़ने की जहमत उठाना भी गवारा नहीं किया और कहा कि मैं उनके बारे में चाहे जो सोचता रहूँ उससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं है । पर अब आप ही बताएं कि उनके बारे में मेरा यह लिखना किसी काम का है या नहीं । -खुशवंत सिंह
  • Zindgi Ka Zaayaka
    Sadiq
    180 162

    Item Code: #KGP-196

    Availability: In stock

    जिंदगी का जायका 
    पिछले कई वर्षों से मैं हिंदी ही में ग़ज़लें लिख रहा हूँ। बीच में कभी-कभार यूँ भी होता है कि उर्दू में ग़ज़ल हो जाती है। 1999 की एक रात जब कुछ लिखने का मूड बना और मैंने एक ग़ज़ल लिखी जो हास्य-व्यंग्य से भरपूर थी। फिर उसी मूड में कई दिन तक ऐसी ही ग़ज़लें लिखता रहा। ये ग़ज़लें लिखकर मुझे एक अजीब-सा संतोष मिलता था और ख़ुशी होती थी। ऐसा लगता था कि मैं अपने और अपने समय के बारे में ईमानदारी, सच्चाई और निर्भीकता के साथ वह सभी कुछ लिखता जा रहा हूँ जो कि मुझे लिखना चाहिए। मैंने जब इसका ज़िक्र कमलेश्वर जी से किया तो उन्होंने ‘दैनिक भास्कर’ के रविवारीय परिशिष्ट में हर हफ्ते उनके प्रकाशन का सिलसिला शुरू कर दिया। प्रचलित ग़ज़ल से पृथक् और विशेष पहचान बनाने के लिए ‘हज़ल’ शीर्षक दिया गया और इस तरह काफी समय तक मेरी हज़लें ‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित होती रहीं और मैं उनमें प्रत्यक्ष रूप से अपने समय का इतिहास रकम करता रहा। फिर अचानक वह मूड ख़त्म हो गया। सिर्फ छपने के लिए लिखते रहना मैंने पसंद नहीं किया। कुछ समय बाद फिर मूड बना तो फिर बहुत-सी ‘ग़ज़लें’ लिख डालीं, जो ‘जिंदगी का ज़ायका’ में शामिल हैं।
    -सादिक
  • Swatantarata Sangharsh Ka Itihaas_100
    Hazari Prasad Dwivedi
    100 90

    Item Code: #KGP-1061

    Availability: In stock

    स्व. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक गं्रथों द्वारा हिंदी साहित्य की अभूतपूर्व सेवा की है। उन्होंने जहां एक तरफ अत्यंत श्रेष्ठ उपन्यासों की रचना की वहीं दूसरी तरफ शोधपरक ग्रंथों की। निबंध-लेखन के क्षेत्रा में भी उन्होंने ललित निबंधों के सृजन द्वारा हिंदी को अत्यंत सुंदर निबंध दिए। प्रस्तुत पुस्तक स्व. आचार्य द्विवेदी के चिंतन को समझने में एक महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करती है। सैकड़ों साल की गुलामी से सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ था। भारत के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। जागरूक एवं संवेदनशील साहित्यकार इस घटना की उपेक्षा नहीं कर सकता था। स्व. आचार्य जी ने स्वतंत्रता-संघर्ष के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इसमें नामांे की भरमार नहीं है। यह उनकी अपनी दृष्टि थी। इस पुस्तक का रचनाकाल सन् 1948 के बरी है। इसमें हमने किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया है। नई पीढ़ी को हमारी यह एक विनम्र भेंट है।
    —मुकुंद द्विवेदी
  • Computer Kosh
    Dr. Rajeshwar Gangwar
    500 450

    Item Code: #KGP-175

    Availability: In stock


  • Teri Roshanai Hona Chahati Hoon
    Alka Sinha
    140 126

    Item Code: #KGP-524

    Availability: In stock

    तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ
    प्रतिष्ठित कवयित्री अलका सिन्हा की नवीनतम काव्यकृति 'तेरी रोशनाई होना चाहती हूँ' की पेम कविताएँ उस कोमल और अमूल्य अहसास की पावन कराती हैं, जिसका अभाव किसी को वहशी बना देता है तो किसी को संन्यासी । इन कविताओं में महानगरीय जीवन की आपाधापी के बीच एक भावात्मक विस्तार की अनुभूति होती है और यह विस्तार कहीं-कहीं तो दार्शनिकता पर जा टिकता है । इसीलिए पूरी कृति में बिखेरे प्रेम-प्रसंगो के वावजूद नितात निजी और आत्मीय क्षणों का यह अहसास कहीं भी छिछला या बेपर्दा नहीं होता । कवयित्री आम जिंदगी की मामूली घटनाओं को सरल और सधी भाषा में अपनी कविताओं में इस प्रकार गुंफित करती है मानो कविता की गलबहियां डाले कोई कहानी साथ-साथ चलती हो ।
    ये कविताएं एक ओर प्रकृति में जीवन की अनंत संभावनाओं की तलाश करती हैं तो दूसरी ओर युगीन विषमताओं पर व्यंग्य भी कसती हैं । सामाजिक चेतना से संबद्ध एक स्वस्थ विमर्श इन कविताओं को लोकमंगल की भावना से जोड़ता है ।
    हर किसी को अपनी-सी लगती ये कविताएं तमाम तनावों, परेशानियों और नाकामियों के बीच जीवन के प्रति आस्था और विश्वास जगाती है और आश्वस्त करती है कि सचमुच कीमती है हमारे बीच बची प्रेम की तरलता !
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-2075

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका में यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुड़िया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rupantar
    Muni Rupchandra
    75 68

    Item Code: #KGP-1858

    Availability: In stock

    रूपान्तर
    कविता सृष्टि का रूपान्तर है । मुनि रूपचन्द्र जी इस रूपान्तर के अनोखे भाष्यकार है जो प्रचलित काव्यशैलियों में निरन्तर उस गहरे, अनिर्वच आत्म- गोपन को वाणी दे रहे है ।
    प्रचलित शब्दार्यों से आन्तरिक ध्वन्यार्थों को व्यंजित करने का चामत्कारिक कौशल इन कविताओं में है। इनमें अतिरिक्त रूप से कोई प्रदर्शन नहीं है। अत्यन्त सहज भाव से मानवीय आर्द्रता को रूप देने की साधना का ही जैसे यह प्रतिफल है ।
    एक लंबे अर्से से शब्दों के द्वारा मुनिश्री लयबद्ध या लेयमुक्त आधारों पर आन्तरिक लय का सृजन कर उस सेतु का निर्माण कर रहे है जिस पर चढ़कर आप लोकोत्तर अनुभवों का स्पर्श भी कर सकते हैं और लौटकर जैविक सृष्टि के सौन्दर्य का अनुभावन भी कर सकते हैं ।
    विचित्र सृष्टि विधान में क्रूरतम के बीच भी अविश्वसनीय रसधारा बहती है किन्तु मुनिश्री क्रूरतम के रसमय रुपाख्यान के रूपान्तर को वाणी देते हैं । सदियों से कवि साधना की पूर्णता की खोज में लगे है । और एक साधक सदियों की खोज के अनुभव के भीतर आवेग के उफनते सागर को शब्द, अर्थ, लय, इंगित के बीचोबीच आकृति में बाँधने, आत्मा के वर्णहीन रूप में ढालने में निरत है…क्या कविता भी साधना नहीं है...
  • Jahaanoon
    Manorma Jafa
    240 216

    Item Code: #KGP-197

    Availability: In stock

    कॉलेज में रक्षाबंधन की छुट्टी थी। अनुराधा सुबह-सुबह ही तैयार होकर निकल गई। मैं उसे फाटक तक पहुँचाने गई। हरसिंगार के पेड़ के नीचे खड़ी थी। जमीन पर बिखरे फूल महक रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने फूल बीनकर अपने दुपट्टे के एक कोने में रखने शुरू कर दिए कि तभी एक मोटरसाइकिल बराबर में आकर रुक गई। मैंने मुड़कर देखा, अनुराधा के राजू भैया थे।

    "क्यों भई, किसके लिए फूल बीन रही हो?"

    मन में तो आया कह दूँ ‘आपके लिए।’ पर  जबान नहीं खुली।

    "अनुराधा को लेने आया था। आज रक्षाबंधन है। बुआ जी के यहाँ उसे मैं ही पहुँचा दूँगा।"

    "पर वह तो अभी-अभी वहीं चली गई।"

    "मैंने तो उससे कहा था कि मैं आऊँगा! बड़ी बेवकूफ है।"

    "भूल गई होगी।"

    "तुम्हारा क्या प्रोग्राम है? तुम भी उसके साथ क्यों नहीं चली गईं? रक्षाबंधन में सब लड़कियाँ बहनें और सब लड़के उनके भैया," और वह हँसने लगे।

    "क्या मतलब?"

    "मेरा कोई मतलब नहीं था। तुम चलो तो मैं तुम्हें भी अनुराधा की बुआ के यहाँ ले चलता हूँ।"

    "नहीं, मुझे पढ़ाई करनी है। यहीं रहूँगी।"
    —इसी उपन्यास से
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 3
    Shrinivas Vats
    280 252

    Item Code: #KGP-567

    Availability: In stock

    तीसरा खंड लिखते समय मुझे आनंद की विशेष अनुभूति हुई। कारण, चुलबुला विष्णु कर्णपुर जो लौट आया। इस खंड को पढ़ते हुए आपको भी ऐसा लगेगा कि विष्णु की उपस्थिति हमें आव्हादित करती है। मैंने विभिन्न विधाओं में अब तक लगभग तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं, लेकिन इस किशोर उपन्यास से मुझे विशेष लगाव है। भला क्यों?
    आपके मम्मी-पापा की तरह मेरे पिताजी भी मुझे डाॅक्टर बनाना चाहते थे। मैंने विज्ञान पढ़ा भी। पर जीवित मेढक, खरगोश के ‘डाइसेक्शन’ मन खिन्न हो उठा। मैंने अपनी दिशा बदल ली। मेरी अलमारी में जीवविज्ञान की जगह कालिदास, शेक्सपियर, टैगोर, प्रेचंद की पुस्तकें आ गई। साहित्य पढ़ना और लिखना अच्छा लगने लगा। सोचता हूं, भले ही मैं डाॅक्टर न बन सका, लेकिन विज्ञान और कल्पना के बीच संतुलन बनाते हुए बालकों के लिए लिखना चिकित्सकीय अनुभव जैसा ही है। संभव है चिकित्सक बनकर बच्चों से उतना घुल-मिल न पाता, जितना उन्हें अब समझ पा रहा हूं।
    सतरंगी की चतुराई ने तो मेरा मन ही मोह लिया। डाॅक्टर बनने की राह आसान हो गई। पूछो, कैसे? पढ़िए चैथे खंड में।
    -श्रीनिवास वत्स
  • Rang Basanti
    Pratap Sehgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1913

    Availability: In stock

    रंग बसंत
    आजादी के आंदोलन के संभवत: ऐसे दो ही क्रांतिकारी महानायक है, जो सैक्टेरियन सोच से परे जाकर व्यापक स्तर पर सामाजिक एवं राजनीतिक विकास का स्वरूप सामने रखते है । किसी भी भारतीय से पूछिए, वह नेताजी सुभाषचंद्र बोस और भगतसिंह का नाम लेगा । प्रताप सहगल का ‘रंग बसंती' नाटक भगतसिंह के जीवन का आख्यान मात्र नहीं, बल्कि उसके समय को भी पूरी शक्ति एवं जीवंतता के साथ हमारे सामने रखता है । भगतसिंह अपने जीवनकाल में ही लीजेंड बन गया था । उसके क्रांतिकारी कृत्यों को तो बार-बार सामने लाया गया, लेकिन उसके समाजवादी चिंतन को हमेशा नेपथ्य में ही रखा गया । भगतसिंह न सिर्फ अपने एक्शन में, बल्कि अपनी सोच में भी एक रैडिकल व्यक्तिव के रूप में सामने आता है । प्रस्तुत नाटक भगतसिंह के इसी रूप को हमारे सामने रखता है ।
    नाटक का ढाँचा दृश्यों में बाँधा गया है, जो इसे बेहद लचीला बना देता है । मुक्ताकाशी रंगमंच हो या प्रेक्षागृह का मंच, शैली यथार्थवादी से या प्रतीकवादी- हर तरह से नाटक को खेलने की संभावनाएँ इसमें मौजूद हैं । बई बार मंचित होकर तथा साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख के रूप में समादृत हो चुका 'रंग बसंती' नए रंग में पाठकों के हाथ में देते हुए सार्थकता का ही अनुभव किया जा सकता है । वस्तुत: गंभीर रंग-कर्म करने वालों के लिए यह एक उपहार है ।
  • Us Raat Ki Baat
    Amrendra Mishra
    50 45

    Item Code: #KGP-9062

    Availability: In stock


  • Aanvla Or Uski Baagbani
    Darshna Nand
    180 162

    Item Code: #KGP-7848

    Availability: In stock

    वास्तव में आंवले का ताजा फल भी सीमित मात्रा में ही खाया जा सकता है । मुरब्बे के अतिरिक्त इसके अनेक उत्पाद भी निर्माण किये जाते हैं । इसकी उपयोगिताएं अनन्य हैं । यह औषधीय गुणों का भंडार है । 
    इस विशिष्ट फल पर कोई संकलित साहित्य उपलब्ध नहीं था, जिससे इसकी वैज्ञानिक विधि से बागबानी करने और इसके उपयोग करने में सहायता मिल पाती । प्रस्तुत की पुस्तक की हिंदी में रचना करके लेखक ने इन अभावों की पूर्ति की है । 
  • Michal Jackson Ki Topi
    Madhukar Singh
    50 45

    Item Code: #KGP-1931

    Availability: In stock

    माइकल जैक्सन की टोपी
    स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद प्रेमचंद की ग्राम्य चेतना की साहित्यिक विरासत को अपने लेखन के बल पर जिन लेखकों ने जीवित रखा है तथा इमे विकसित किया है उनमें मधुकर सिंह का नाम उल्लेखनीय है । यह कहानीकार न केवल अपनी सामाजिक-राजनितिक  चेतना को अपनी कथाओं में अनुगुंफित करता है बल्कि जीवन की सम्यक् प्रगतिशीलता का आलोक भी उसे गंभीरता से आकर्षित क्रग्या है । इसीलिए उसकी कहानियाँ वंचितों के जीवन की केवल लपट की नहीं, लौ की भी कहानियाँ हैं ।
    अपने कथाकर्म के बारे में मधुकर सिंह का कहना है कि उनकी 'दर्जनो कहानियाँ समाज और इतिहास- विरोधी उन ताकतों से लड़ती हुई मामूली और कमजोर आदमी को चेतना के स्तर पर जागृत करने की कोशिश करती हैं-यानी, इतिहास-विरोधी ताकतों द्वारा सताए जा रहे आदमी को अपनी पहचान कराने की क्षमता भी ये कहानियां रखती है ।'
    मधुकर सिंह के प्रस्तुत कहानी-संग्रह में शामिल दस कहानियां हैं- 'माइकल जैक्सन की टोपी’, 'युग' . ‘नस्ल-दंश', ‘बेली रोड के पत्ते' , 'कउड़ा' , 'कमीना', 'जालिम मिह उसका बाप था', 'कविता भी आदमी', 'सनहा' तथा पोखर नया गाँव' । प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपी ये कहानियाँ इस  बात की प्रमाण है कि यह कथाकार नये भारत के निर्माण के लिए, चेतना-सम्पन्न विचार-पुरुष की तलाश में तन्मय है ।
  • Samay Mein Vichar
    Prabhakar Shrotiya
    575 518

    Item Code: #KGP-830

    Availability: In stock

    समय में विचार
    ऐसी यथार्थपूर्ण, गहन, तर्कपुष्ट एवं झकझोरकर रख देने वाली अभिव्यक्ति हिंदी में कम ही हुई है। यह आश्चर्यचकित कर देने वाला तथ्य है कि शायद श्रोत्रिय जी का साहित्यिक पाठक इन आलेखों को पढ़ने के बाद सहसा विश्वास न कर सकेगा कि एक आलोचक अपने काल के प्रवहमान विचार-बिंदुओं पर भी इतनी गहराई, तन्मयता एवं राग से लिख सकता है। हमारे राष्ट्रीय जीवन की विडंबनाएं यदि यहां रेखांकित हैं तो सामाजिक जीवन की विसंगतियां भी उद्घाटित हैं। एक ओर अंतर्राष्ट्रीय जीवन की धड़कनों पर नज़र है तो दूसरी ओर वैश्वीकरण के छल-छद्म एवं राजनीतिक बिसात पर बिछे कूटनीतिक मोहरों की चालें भी लेखक की दृष्टि से नहीं बची हैं।...वर्तमान के अंतर्विरोध पर गहरी नज़र के साथ-साथ भविष्य की चिंताकुलता इन आलेखों का वैशिष्ट्य है।
    –पश्यंती
    ये निबंध जहां एक ओर पाठकों की कसौटी पर पहले से ही परीक्षित हैं, वहीं अपने समय के फलक पर वस्तुनिष्ठ चिंतन की एक ऐसी निर्मिति हैं, जिन्हें अपने समय, समाज और साहित्य के प्रति सजग एक लेखक का तत्त्व-चिंतन माना जाना चाहिए और यदि हम सुपरिचित लेखक शुकदेव सिंह के मत का आश्रय लें तो ‘ये निबंध (आज व्यक्तिवादी चित्तवृत्ति को केंद्र में लेकर लिखे जा रहे संपादकीयों के सापेक्ष) निबंधों के विकल्प के रूप में एक सात्त्विक विधा का आविष्कार हैं।’  
    –जनसत्ता, सबरंग
    श्रोत्रिय जी अकेले दम पर सच लिख रहे हैं, एक भारतीय मनुष्य के नैतिक विजन के साथ। उनकी निर्भीकता तीसरी दुनिया की मनीषा की निर्भीकता है, प्रदत्त स्थितियों और प्रयोजन की परिस्थितियों से मुठभेड़ की यह मनीषा उम्मीद जगाती है।...संरचना में आश्चर्यजनक अनुशासन का परिचय देते हुए कथ्यगत क्रांतिकारी आशय भर देना कोई श्रोत्रिय जी से सीखे। यह गद्यकला का नागर स्वभाव उन्होंने बड़ी साधना से अर्जित किया है।...यह उन रचनाकारों-आलोचकों का पथ है, जो स्वतंत्रता की बात करते हैं, आत्मा और विवेक को गिरवी नहीं रखना चाहते।...श्रोत्रिय जी जड़ सूत्रवादियों और अंध मतवादियों के उन तमाम विभ्रमों का खंडन करते हैं, जो स्वाधीनता को विचारहीनता मानते हैं। स्वाधीनता का तर्क विचारहीनता का पर्याय नहीं है, न ही हर बार अचूक अवसरवाद। स्वाधीनता व्यक्ति हो, समाज हो, राष्ट्र हो, सबसे अपना मूल्य मांगती है।...                      
    –समीक्षा
  • Aakhet
    Jagdish Godbole
    125 113

    Item Code: #KGP-9072

    Availability: In stock


  • Dharmkshetre Kurukshetre
    Shanker Shesh
    70 63

    Item Code: #KGP-2014

    Availability: In stock

    धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे 
    धृतराष्ट्र का विवाह! अंधे को चतुर्भुज बनाना ! कोण देगा अनंत अँधेरे को अपनी कन्या ? कौन करेगा अपंग जीवन का वरण ? प्रश्न टेढा था । सत्यवती दबाव डाल रही यी। लगातार पडी थी  मेरे पीछे ।
    माँ को तो एक बार समझा भी लो, दादी को समझाना कठिन होता है । पौत्र चाहे लूला हो, लँगडा हो, अपाहिज हो, लेकिन उसका ब्याह होना बहुत जरूरी है । आज़ तक समझ में नहीं आया, मौका पाते ही एक स्त्री दूसरी स्त्री पर अत्याचार क्यों करने लगती है । सत्यवती क्यों नहीं सोचती ।  अंधे से ब्याह करने वाली लड़की को आजन्म कारावास भोगना पडेगा । सारी जिदगी अंधे की पत्नी कहाना होया । राजघराने का आदमी हुआ तो क्या हुआ, अंधा तो अंधा है,  रहेगा । लेकिन सत्यवती को समझाता कौन ! मेरा पिता तो उसे समझा नहीं सका, फिर मैं किस खेत की मूली था !
    इच्छा  हुई अपना उदाहरण सामने क्यों न रखूँ। आखिर मैं भी पूरे जीवन बिना स्वी के रह सका या नहीं । सशक्त ददेवपुत्र-सा दिखाई देन वाला में । तो यह 'अंधा क्यों नहीं रह सकता । मेरे मामले में  सत्यवती इतनी कठोर क्यों हो गई थी और अब पौत्र  के मामले में। (इसी उपन्यास से)
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Arora
    Sudha Arora
    280 238

    Item Code: #KGP-701

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा अरोड़ा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महानगर की मैथिली', 'सात सौ का कोट', 'दमनचक्र', 'दहलीज पर संवाद', 'रहोगी तुम वहीं', 'बिरादरी बाहर', 'जानकीनामा', 'यह रास्ता उसी अस्पताल को जाता है', ‘कांसे का गिलास' तथा 'कांच के इधर-उधर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सुधा अरोड़ा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Maalish Mahapuran
    Sushil Sidharth
    300 270

    Item Code: #KGP-782

    Availability: In stock

    मैं समदर्शी हूं। योग्यता को अयोग्यता पीटती रहे, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। सड़क के किनारे कोई सहायता के लिए तड़पता रहे तो मैं समझता हूं कि वह आत्मशक्ति बटोरने का अभ्यास कर रहा है। किसी भी मरते हुए व्यक्ति में मुझे मोक्ष या निर्वाण के अगोचर बिंब दिखने लगते हैं। ...कोई व्यक्ति अपनी देह की भूख मिटाने का प्रयास कर रहा है और स्त्री चीख रहीं है। मैं यह नहीं देख सकता। स्त्री कितनी बुरी और नासमझ लग रही है। अरे इक दिन बिक जाएगा माटी के मोला यह नश्वर शरीर किसी काम तो आए। ...मुझे जो दिख रहा है वह नई सभ्यता का प्रसाद है। प्रसाद को प्रमादग्रस्त लोग ही समस्या कह रहे हैं।
    उनके जीवन में बहुत संघर्ष है ऐसा उन्होंने एक अवसरवादी आह भरकर कहा। दरअसल इस देश में कुछ लोगों ने दु:ख और संघर्ष को अच्छी नस्ल वाले कुत्ते पाल रखे है, जिले वे सुबह-शाम टहलाने ले जाते है। कोई गोष्ठी हुई तो उसमें ले आते हैं ।
    सच में भारतीय संस्कृति की यह उत्तर आधुनिकता नहीं, दक्षिण आधुनिकता है । बहू को जलाने/मारने के बाद इसी मंदिर पर अखंड रामायण का आयोजन होता है। यही लड़किया प्रार्थना करती है कि है प्रभु। हमें सुरक्षित रखो। यहीं उसी प्रभु से अरदास होती है कि हमें बलात्कार के लिए लड़कियां दो । प्रभु सबकी सुनता है । 
    [इसी पुस्तक से]
  • Jeevanopayogi Jari-Bootiyan
    Dr. Rajiv Sharma
    450 405

    Item Code: #KGP-9018

    Availability: In stock

    जीवनोपयोगी जड़ी-बूटियाँ 
    जड़ी-बूटियाँ शब्द सुनते ही हमें लगना है कि सुदूर जंगल में पहुँचकर कुछ पेड़-पौधों की खोज करनी पडेगी, जबकि हमारे आसपास दैनिक उपयोग की इतनी वनस्पतियां  मौजूद है कि उनके द्वारा सामान्य रोगों का उपनार हम स्वयं घर पर ही आसानी से कर सकते है ।
    तुलसी, लहसुन, अश्वगंधा, अशोक, अर्जुन. हींग, बिल्व (बेल), कनेर, मुलहठी, त्रिफला, सौंठ, कुकरौंदा, शिलाजीत, आँवला नीम, महुआ, हुरहुर, अरण्ड, सर्पगंधा, अमलतास आदि सैकडों जड़ी-बूटियाँ हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी हैं और आसानी ये उपलब्ध भी ।
    प्रस्तुत पुस्तक में प्रख्यात चिकित्साविज्ञ ने लगभग ढाई सौ उपयोगी जड़ी-बूटियों के गुणों, उपयोग तथा उनकी प्रकृति आदि के बारे में विस्तार से बताया है । पुस्तक को संपूर्ण सूचनाप्रद बनाते हुए सैकड़ों जड़ी-बूटियाँ के चित्र भी पुस्तक में ममाहित किए गए है ।
    निस्संदेह, यह पुस्तक आम पाठक के लिए तो स्वास्थ्य-रक्षा व घरेलू नुस्खों को जानने की दृष्टि से उपयोगी है ही, जिज्ञासु पाठकों की ज्ञान-पिपासा को संतुष्ट करने में भी सक्षम है, क्योंकि इसमें ज़डी-बूटियों के बारे में अत्यंत  सरल भाषा में विस्तृत जानकारी दी गई है । कहना न होगा कि निजी एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए तो यह अनिवार्य ग्रंथ है ।

  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap
    M.A. Sameer
    250 225

    Item Code: #KGP-9331

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Agale Saal December Mein
    Anat Ramesh
    50 45

    Item Code: #KGP-9101

    Availability: In stock


  • Imandaari Ka Swaad
    Harish Kumar 'Amit'
    180 162

    Item Code: #KGP-9367

    Availability: In stock


  • Rajendra Yadav Ne Jyoti Kumari Ko Bataye Swastha Vyakti Ke Beemar Vichar
    Rajendra Yadav
    290 261

    Item Code: #KGP-838

    Availability: In stock

    राजेन्द्र यादव ने ज्योति कुमारी को बताए स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार 
    लेखक के अनुसार यह पुस्तक इस अर्थ में विलक्षण है कि न तो यह आत्मकथा है, न आत्मवृत्त और न ही संस्मरणों का संकलन । तीन महीने बिस्तर पर निष्क्रिय पड़े रहने के दौरान जो कुछ उल-जलूल असंबद्ध तरीके से दिमाग में आता गया उसे ही कागज पर उतारने की कोशिश है । कोई भूला हुआ क्षण, गूंजता हुआ अनुभव या संपर्क में आए किसी का व्यक्तित्व । अंग्रेजी में ऐसे लेखन को रैम्बलिंग कहते हैं । हिंदी में शायद इसे भटकाव कहेंगे । बिना किसी सूत्र का सहारा लिए जहाँ मन हुआ वहां टहल आना । इस तरह की किसी और किताब का ध्यान सहसा नहीं आता । सब कुछ जो लिखा गया है बहुत तार्किक, सुसंबद्ध और विचारपक्व है ।
  • Taaki Desh Mein Namak Rahe
    Asghar Wajahat
    390 351

    Item Code: #KGP-475

    Availability: In stock

    ताकि देश में नमक रहे पुस्तक में कुल 42 लेख संकलित हैं, जिन्हें दो खंडों में विभाजित किया गया है। पहले खंड के अंतर्गत साहित्यिक लेख हैं, जब कि दूसरे खंड में सामाजिक-सांस्कृतिक लेख संकलित हैं। साहित्यिक लेखों में सिर्फ साहित्यिक विधाओं या सरोकारों की ही बात नहीं की गई है बल्कि कई ऐसी साहित्यिक विभूतियों पर भी लेखक ने पूरी आत्मीयता से लिखा है, जिन्होंने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। मुज़फ्फर अली के साथ बिताए ख़ूबसूरत दिन हों या बेगम अख़्तर, शैलेन्द्र और शहरयार के लिए मन में मौजूद दीवानगी का अहसास, प्रमोद जोशी और ब्रजेश्वर मदान जैसे अपनी तरह की विशिष्ट-सामान्य शख़्सियतों की बातें हों या कुर्रतुलऐन हैदर और मंटो जैसे अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों के प्रति आदर-भाव प्रकट करना हो, हर लेख में असग़र वजाहत कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर दे जाते हैं जिसे पाठक अपने मन से कभी विस्मृत नहीं कर सकता। 
    पुस्तक के दूसरे खंड में संकलित लेख हालांकि सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े हैं लेकिन उनका वैचारिक धरातल अत्यंत विस्तृत है। इनमें भाषा से जुडे़ सवाल, सिनेमा और साहित्य के अंतर्संबंध, आने वाले समय में हिंदी सिनेमा की दशा-दिशा का आकलन, भारतीय गणतंत्र से जुड़े दशकों पुराने अनुत्तरित सवाल और लगातार छीजते जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहन चिंताएं मौजूद हैं। असग़र वजाहत इन लेखों के जरिए वर्तमान समय के जटिल सवालों को न केवल उभारते हैं बल्कि उनसे मुठभेड़ कर उनकी तहों में जाकर कारण भी तलाशते हैं। 
    इन विविध लेखों को क्रमिक रूप से पढ़ने पर हम अतीत से शुरू कर वर्तमान को पार करते हुए भविष्य के संभावित सवालों से भी रूबरू हो सकते हैं। यह असग़र वजाहत के लेखन की कलात्मकता ही है कि वह छोटे तथा मामूली से दिखने वाले मुद्दे या सवाल से अपनी बात शुरू कर उसे पूरे समाज और व्यवस्था के लिए एक ज़रूरी सवाल का स्वरूप प्रदान कर देते हैं।
    भूमिका से 
  • Gulaha- E- Parishaan
    A.M. Nayar
    395 356

    Item Code: #KGP-76

    Availability: In stock

    गुलहा-ए-परीशाँ 
    एक जमाने में हर पढ़ा-लिखा काव्य-प्रेमी अच्छे-अच्छे और पसंदीदा अशआर को एक बयाज (संग्रह) रखता था, जिसमें दर्ज शेर जिंदगी की कशमकश, प्रतिकूल परिस्थितियों, सुख और दु:ख  क्षणों में उसे याद आते थे और उनको दोहराकर वह अपना दु:ख घटाता या सुख में वृद्धि कर लेता था ।  आज का जीवन व्यस्ततर है और हर व्यक्ति अस्तित्व के संघर्ष में ऐसा गूँथा हुआ है कि जिंदगी की लताफ़त अब उसे आकर्षित नहीं कर पाती । ऐसे में यदि काव्य-सागर के मंथन से निकले कुछ काव्य-रत्न उसे दिए जाएं तो वह अपनी जिंदगी को कटुता और वेदना में कुछ कमी महसूस कर सकता है । इसी विचार से प्रस्तुत संकलन में तीन सौ से अधिक विषयों पर कहे गए शेर एकत्रित किए गए हैं, जिनके साथ हमारे जीवन के अनेकानेक अनुभव जुड़े हुए हैं और यह कोशिश की गई है कि तवज्जो शाइर के नाम पर नहीं, उसके द्वारा किसी विषय विशेष पर रचे हुए शेर पर ही दी गयी है ।  शेर के चयन में रदीफ-क्राफिया, कल्पना-शक्ति, उपमा-अलंकार पर इतना बल नहीं दिया गया है, जितना शाइर की आत्मा की व्याकुलता या उसकी मनोदशा की तीव्रता को मद्देनजर रखा गया है।
    उर्दू के सभी या अधिकतर शाइरों के प्रतिनिधि शेरों का यह संकलन अपने में एक अनूठा प्रयास है, जिसका हिंदी जगत् में निश्चय ही स्वागत किया जाएगा ।
  • Dushyant Kumar Rachanavali (Four Vols.)
    Vijay Bahadur Singh
    2250 2025

    Item Code: #KGP-834

    Availability: In stock

    Complete Set of 4 Volumes.
  • Abhang-Gaatha
    Narendra Mohan
    140 126

    Item Code: #KGP-9138

    Availability: In stock

    ‘खोए हुए शब्द को, अभंग को, सृजनशक्ति को पुनः पाने की तुकाराम की बेचैनी अभूतपूर्व है जो उसे हर युग के कवि की बेचैनी के मिथक के रूप में खड़ा कर देती है। शब्द, सृजन और जिंदगी उनके लिए अलग-थलक नहीं, एक ही हैं। शब्द की इस कैफियत के साथ तुकाराम का मुझ तक पहुंचना एक कवि के एक नए पाठ के खुलने के बराबर है जिसके लिए एक क्या, कई नाटक लिखे जा सकते हैं।’
    ये शब्द हैं डाॅ नरेन्द्र मोहन के जिन्होंने अभंग-गाथा नाटक में तुकाराम की जिंदगी और अभंग-रचना को आज के दहकते हुए संदर्भों से जोड़ दिया है। नाटक के निर्देशक सतीश दवे ने अपने वक्तव्य में ठीक ही कहा है ‘पहली बार जब मैंने अभंग-गाथा का नाट्य आलेख उनसे सुना तो मुझे महसूस हुआ जैसे तुकाराम का मानवीय व्यक्तित्व कई दृश्यों की श्रृंखला में मेरे सामने मूर्तिमान हो गया हो और एक साथ कई रूपाकारों ने मुझे घेर लिया हो। मुझे लगा तुकाराम अपने युग से बाहर आकर मेरे सामने आ खड़े हुए हों और उस वक्त की परिस्थिति, समय और इतिहास मेरी परिस्थिति, समय और इतिहास से जुड़ने-टकराने लगा हो।’
    अभंग-गाथा में शब्द और रंग साथ-साथ हैं। एक-दूसरे को प्रकाशित-स्पंदित करते हुए। इस नाटक को खेलना, इसीलिए, रंगकर्म का एक सांझा अनुभव बनता गया है। अभंग को यहां रंग-संगीत शैली का हिस्सा ही बना दिया गया है और यह शैली नाटक के भीतरी रंग-संयोजनों से मिलकर ही मंच पर आई है। 
  • Anandmay Jeevan Kaise Payen
    Swed Marten
    200 180

    Item Code: #KGP-282

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghav
    Rangey Raghav
    225 203

    Item Code: #KGP-92

    Availability: In stock


  • Svasthya Evam Chikitsa
    Dr. Rakesh Singh
    300 270

    Item Code: #KGP-566

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य एवं चिकित्सा 
    पुस्तक में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर लगभग 41 लेख संकलित हैं। जो लोग यह कहते हैं कि चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम से ही पकाया जा सकता है, उनके लिए ये लेख चुनौती हैं और सिद्ध करते हैं कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा को उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को हिंदी माध्यम से पढाया जा सकता है।
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है। इन लेखों में अधिकांशत: इस बात की ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग कुछ दवाओं का नाम याद कर लेते हैं और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते हैं। उससे कितनी जानि हो सकती है, यह 'दवाओं के उपयोग में सावधानियाँ शीर्षक से स्पष्ट है। इसी प्रकार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारता से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है। 'हदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हृदय-रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इसमें अधुनातन चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है। अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-संपन्न है। कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्व एवं उनके सफ़ल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतीक है।
  • Vah Chhathavan Tattva
    Om Bharti
    125 113

    Item Code: #KGP-1861

    Availability: In stock

    वह छठवाँ तत्त्व 
    जिसे मेरी कविताएँ पसंद नहीं
    उसकी भी कोई कविता
    पसंद है ज़रूर मुझे—
    ओम भारती के नए संग्रह की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ विनम्रता नहीं, उसकी रचनात्मक सचाई की सूचक हैं। इन कविताओं से गुज़रने के बाद मुझे लगा कि यह एक ऐसे वयस्क कवि का संग्रह है, जिसमें चीज़ों को निकट से जानने, चुनने और अपनी संवेदना का हिस्सा बनाने की एक उत्कट इच्छा है और अपने आज़माए हुए नुस्ख़ों और औज़ारों को फिर से जाँचने-परखने की एक सच्ची ललक भी। यही बात संग्रह की कविताओं को पठनीय बनाती है। इस कवि के अनुसार– कविता वह होती है, जिसमें भेद छुपे हेते हैं, जो भेद खोल देते हैं। इसका सबसे विश्वसनीय उदाहरण है इस संग्रह की वह कविता, जिसका शीर्षक है ‘इस संशय के समय में’। विक्रम सेठ के ‘सुटेबुल ब्वाय’ की तरह यह बहन के लिए एक अच्छे वर की तलाश की कविता है—
    अच्छे लड़के नहीं हैं कहीं भी
    हों भी तो शायद खुद उन्होंने
    असंभव कर रखा है ढूँढ़ लिया जाना अपना।
    और फिर कविता के उत्तरार्द्ध में निष्कर्षतः यह कि—
    इस संशय के समय में
    क्या अच्छाई खो चुकी तमाम आकर्षण?
    इस कविता का अंत दिलचस्प है और थोड़ा विडंबनापूर्ण भी, क्योंकि कवि को लगता है—‘अच्छे लड़के नहीं हैं अथवा हैं तो वे इस कवि से कहेंगे—बेवकूफ़, हमसे तो मिला होता लिखने से पहले।’ यह एक गंभीर विषय को हलके-फुलके ढंग से कहने का अंदाज़ है, जो कविता को एक नया तेवर देता है।
    इस संग्रह की अनेक कविताओं में एक चुभता हुआ व्यंग्य है और कवि के पास उसे व्यक्त करने का चुहलभरा कौशल भी। इस दृष्टि से कई और कविताओं के साथ-साथ ‘निरापद’ कविता ख़ास तौर से पठनीय है, जो इस प्रगतिकामी कवि की लगभग एक आत्मव्यंग्य जैसी कविता है। कवि की यह खेल जैसी शैली एक तरह से इस पूरे संग्रह के चरित्र-लक्षण को निर्धारित करती है। ‘इस तरह भोपाल’ कविता इसका एक प्रतिनिधि नमूना है, जिसकी शुरू की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
    जहाँ भोपाल—
    वहाँ अब संख्या और किलोमीटर नहीं हैं
    मगर वहाँ भी एक तीर की नोक से,
    आगे है भोपाल
    उस जगह न कोई खंभा,
    न कोई तख़्ती और न ही संकेत
    कि यह है, क़सम हुज़ूर, यही तो है—
    भोपाल!
    मध्यप्रदेश की कहन-शैली के रंग में ढली हुई ये कतिवाएँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करेंगी और बेशक काव्य-मर्मज्ञों का भी।
  • Mere Saakshatkaar : Leeladhar Jaguri
    Leeladhar Jaguri
    175 158

    Item Code: #KGP-2036

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : लीलाधर जगूडी
    हर दशा में इंटरव्यू ज्यादातर बोलकर ही देने होते हैं और अमूमन यह सुकून रहता है कि जो बोला गया है, वह लिख लिया गया है या अंकित हो गया है; क्योंकि एक लेखक शायद बोलकर उतना अलग नहीं हो सकता जितना लिखे जाने के बाद अलग हो सकता है । अलग होना माने मुकर जाना नहीं बल्कि रचनात्मक रूप में अपनी किसी विचाराभिव्यक्ति से मुक्त होना है । मुझे कभी-कभी पूरा ब्रह्मांड भागता हुआ टेप लगता है और इसमें ग्रह-नक्षत्रों की आपसी दूरी और दिन-रात भी बड़े-बड़े पॉज की तरह दिखाई देते हैं । इतने सारे अवकाश के बावजूद धूलकणों की तरह मूझे भी कहीं अंकित होने के लिए अपने लायक स्पेस की खोज करनी होती है ।
    सोचना और बोलना एकसाथ हो जाए तो सोच के बोलों की भी सार्थकता और बढ़ जाए । सोच की बोली-भाषा, लिखी और सँजोई जाए तो विचार की भी टहनियाँ व फुनगियाँ स्पष्ट होती चली जाती हैं ।
    बोलना भले ही अकेले भी हो उकता है, लेकिन वह बोलना कम बड़बड़ाना ज्यादा होता है । अपने बोले हुए को आलोचनाविहीन होकर खुद ही सुनना, उस एक ही बोलने-सुनने वाले को और भी अकेला कर  देता है । इसलिए बोले हुए को सुनने वाला और लिखे हुए को पढ़ने वाला कोई दूसरा जरूर चाहिए ।
    शब्द की चित्रात्मवक्ता लिपि से लेकर अर्थरंजन तक फैली दिखती है । अंतर्सगीत, नृत्य, नाट्य और रंगबोध भी शब्द के व्यवितत्व की विशेषताएँ हैं । इसीलिए शब्दों को जितने प्रकार की वाक्य संगतियों में  जितनी बार लिखते हैं उतनी बार जाने हुए को फिर से जानने का और अनजाने को पहली बार जानने का मौका मिलता है ।
    कभी यह भी लगता है कि लिखना और बोलना दोनों ही, जो कुछ अब तक अनुभव किया, आत्मसात किया--उसी की पुनर्रचना है । जो अच्छा बोलना जानते हैं कभी-कभी उनका बोलना ही लिखने जैसा हो  जाता है । शरद ऋतु की प्रवाहपूर्ण स्वच्छ नदी के जल में विस्तार के साथ-साथ गहराई भी साफ दिखाई देती है । फर्क इतना ही है कि लिए हुए में पकड़े जाने का डर है; बोले हुए को बोलने वाला भी दुबारा नहीं पकड़ सकता ।
  • Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri
    Leeladhar Jaguri
    150 135

    Item Code: #KGP-1871

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
    अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।
  • Kya Haal Sunaavaan
    Narendra Mohan
    390 351

    Item Code: #KGP-696

    Availability: In stock


  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh
    Shravan Kumar
    795 596

    Item Code: #KGP-596

    Availability: In stock


  • Jansampark : Avadharana Evam Badalata Svaroop
    Kri. Shi. Mehta
    250 225

    Item Code: #KGP-297

    Availability: In stock

    जनसंपर्क, जनसंचार का एक ऐसा घटक है जो एक ओर तो जनसंचार को जीवंत रखता है, वहीं दूसरी ओर उसके प्रभाव अथवा परिणाम के संबंध में विषय विशेषज्ञ भी कोई निश्चित दावा नहीं कर सकते। उसके इस अनिश्चित चरित्र का प्रमुख कारण जनसंपर्क के भागीदार त्रिमूर्ति के बीच विचित्र संगम, समन्वय एवं संप्रेक्षण के अभाव में निहित है। जनसंपर्क वह सूत्र है जो इस त्रिमूर्ति-यानी संदेश, माध्यम तथा हितग्राही को सक्रिय करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह करता है। आज तक किसी ऐसे नियम या मंत्र की खोज नहीं हो पाई है जो जनसंपर्क के प्रभाव ओर उसके परिणाम की सफलता अथवा असफलता का पूर्वानुमान लगा सके।
    जनसंपर्क निरंतर प्रवाहित होने वाली ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर उस देश की भौगोलिक संरचना, ऐतिहासिक परंपरा, संस्कृति, स्थानीय बोलियां एवं भाषा, सामाजिक एवं धार्मिक आचार-विचार, स्थानीय मान्यताओं इत्यादि अनेक बातों तथा घटनाओं का प्रभाव उस परिवेश की त्रिमूर्ति पर निरंतर प्रतिबिंबित होता रहता है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से यह जनसंपर्क के अनिश्चित चरित्र के कारण हो सकते हैं।
    आज एक ओर मीडिया के आधुनिक उपकरणों ने अनायास ही जनसंपर्क के सर्वथा नए द्वार खोल दिए हैं और भविष्य में भी ऐसे अनेक द्वार खुलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, वहीं दूसरी ओर भारत की तेजी से बढ़ती हुई आर्थिक एवं औद्योगिक प्रगति के साथ शैक्षणिक विकास ने हितग्राहियों की रुचि, सामाजिक जीवन एवं संस्कृति के क्षेत्र में उथल-पुथल मचा रखी है।
  • Baal Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-4
    Shuk Deo Prasad
    600 540

    Item Code: #KGP-608

    Availability: In stock

    विज्ञान कथाओं के अधिष्ठाता वर्न जब अवसान की ओर अग्रसर थे, तभी विज्ञान कथाकाश में एक ब्रितानी नक्षत्र एच. जी. वेल्स उभरा, जिसने इस विधा को त्वरा तो दी ही, वर्न की परंपरा का नैरंतर्य भी भंग न होने दिया । वस्तुतः आधुनिक काल में वर्न  और वेल्स ने  विज्ञान कथाओं की आधारभूमि के लिए जो विचार-सरणियाँ निर्मित कीं, फलस्वरूप दुनिया की तमाम भाषाओं में विज्ञान कथाएं लिखी जाने लगीं। 
    निस्संदेह विज्ञान-गल्प-लेखन एक ऐसी सरस और रोचक विधा है, जो बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान करने के साथ-साथ ज्ञान के नए-नए गवाक्ष खोलने में सक्षम है बशर्त वैज्ञानिक तथ्यों का अतिरेक न हो । विज्ञानं गल्पकारों का दायित्व रंजन-मनोरंजन के साथ अंधकार कारा का निवारण भी है । 
  • Yaadon Ke Galiyaare Se
    Ramesh Chandra Diwedi
    180 162

    Item Code: #KGP-9321

    Availability: In stock

    साहित्य समाज का दर्पण है। काव्य समाज का स्वरूप है। समाज के अनुरूप ही काव्य की रचना होती है। यह धारणा अनादिकाल से चली आ रही है, जो आज भी चरितार्थ है। काव्य और साहित्य का अन्योन्याश्रय संबंध है। अद्यतन कवि की रचना संसर्ग से प्रभावित होती है। चूँकि कवि भ्रमणशील होते हैं, इसलिए संसर्ग गुणों का प्रभाव उन पर पड़ता ही है। ‘संसर्गजा दोष गुणा भवंति’ यह सूक्ति सार्थक प्रतीत होती है। साथ ही आज काव्य की रचना समाज की माँग के अनुरूप होती है। कवि जब आत्मा की आवाज को सुनकर रचना करता है, तब वह हृदयस्पर्शी हो जाता है। कवि की कवित्व शक्ति अनंत होती है। यह पूर्व संस्कारों से मिलती है। ‘नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा, कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा’।
    ब्रह्मा की सृष्टि में केवल छह रस होते हैं—कटु, अम्ल,कषाण, लवण, तिक्त तथा मधुर किंतु कवि की सृष्टि में  शृंगार, हास, करुण, रौद्र, वीर, बीभत्स, अद्भुत, भयानक और शांत नौ रस होते हैं। कवि अपने संकल्प मात्र से ही किसी रस का आवाहन कर सकता है, पर ब्रह्मा के रस को प्राप्त करने के लिए अन्यान्य उपकरणों की आवश्यकता होती है। कवि का अपना एक काव्य लोक होता है। काव्य कल्पना पर आधरित है। कल्पना का आधर सत्य है। यह आधर कवि को समाज से प्राप्त होता है।
    कविता, कवि के हृदय की वह ध्वनि है, जो मुँह से अथवा लेखनी से निकलते समय कवि को भी अचेत कर देती है। सुनने के बाद ही कवि को भी पता चलता है कि उसने क्या कहा। ऐसी ही कविता काव्य लोक में समादृत होती है।
    आज शहरी सामाजिक जीवन तथा संस्कृति में सिमटा भारत गाँव की ओर उन्मुख हो रहा है। ग्रामीण भारत को शहर में लाने का प्रयास कर रहा है। सरकारी तंत्रा भी ग्रामीण विकास पर अधिकाधिक बल दे रहा है। महात्मा बुद्ध ने भी राजभवन छोड़कर शांति के लिए ग्राम और वन की ओर प्रस्थान किया था। इस सामाजिक परिवेश में रचित यह काव्य संग्रह समाज और परिवारों के उन अनछुए स्वरूप को सामने लाया है, जो बुध जन हृदय के किसी कोने में दम तोड़ रहा था।
    —रमेश चन्द्र द्विवेदी

  • Gadya Ka Parivesh
    Vishwanath Prasad Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-814

    Availability: In stock

    गद्य का परिवेश
    प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी के महत्त्वपूर्ण गद्य लेखकों (प्रेमचंद, निराला, महादेवी वर्मा, नंददुलारे वाजपेयी, लक्ष्मीनारायण मिश्र, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नेमिचंद्र जैन, विद्यानिवास मिश्र, निर्मल वर्मा आदि) पर नई दृष्टि से गंभीर विचार हुआ है। इसमें आलोच्य लेखकों को नए कोणों से देखने तथा उनकी शक्ति और सामर्थ्य को पहचानने की कोशिश की गई है। इसमें कुछ विशिष्ट गद्यकारों के उन पक्षों पर लिखा गया है, जिन पर प्रायः कम विचार हुआ है। जैसे कि प्रेमचंद की दलित संदर्भ की कहानियों पर या निराला, अज्ञेय, जैनेंद्र कुमार, निर्मल वर्मा के आलोचक और विचारक रूप पर। यह एक तटस्थ और निर्भीक विश्लेषण तथा सहृदय मूल्यांकन करने वाली कृति है। 
    प्रसिद्ध कवि-आलोचक डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी स्वयं एक सर्जनात्मक गद्यकार हैं, जिन्होंने संस्मरण और यात्रा की कई मूल्यवान कृतियां लिखी हैं। उनके इन आलोचनात्मक निबंधों में उनकी रचनात्मक अंतर्दृष्टि के दर्शन होते हैं। साथ ही एक गंभीर पाठक की संतुलित बेधक दृष्टि के भी। हिंदी गद्य के एक मूल्यवान अंश का साक्षात्कार करने वाली यह पुस्तक निश्चय ही पाठकों के लिए उपयोगी और मूल्यवान होगी।
  • Rahiman Dhaaga Prem Ka
    Malti Joshi
    150 143

    Item Code: #KGP-1992

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]
  • Mere Saakshatkaar : Ramnika Gupta
    Ramnika Gupta
    240 216

    Item Code: #KGP-623

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Anamika
    Anamika
    150 135

    Item Code: #KGP-223

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : अनामिका
    अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करतीं ।
    भारतीय स्त्रियों के जीवन-संघर्ष तथा हास-परिहास और गीत-अनुष्ठान आदि के जरिए पीड़ा को सह पाने की उनकी परंपरागत युक्तिहीन युक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर अनामिका की कविताओं के नए अर्थ खुलते हैं, जिन तक कविता को देखने-परखने के रूढ़ ढाँचे को तोड़कर ही पहुंचा जा सकता है ।
    उनकी संवेदना का फैलाव उन वंचित जनों तक है, जिनसे एक स्त्री की करुणा सहज रूप से जुड़ जाती है । लोकभाषा के शब्द उनके यहाँ किसी गुर की तरह नहीं आते, बल्कि वे उनके अनुभव का अनिवार्य हिस्सा हैं । 'जनमतुआ' बच्चे की 'चानी' की तरह 'पुलपुल' कविताओं में परिपक्व कठोरता की विपुल संभावनाएं अंतर्निहित हैं । हिंस्र  समय के प्रतिरोध का उनका अपना ढंग है, जो भारतीय स्त्रियों की प्रतिरोध की परंपरा की गहरी समझ और संवेदनात्मक जुड़ाव से उपजा है ।
    समस्याओं और घटनाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण एक ऐसी संवेदनशील स्त्री का दृष्टिकोण है, जिसके भीतर अभी भी निष्पाप बचपन बचा हुआ है ।
  • Bhaykaal
    Ashok Gupta
    200 180

    Item Code: #KGP-483

    Availability: In stock

    अशोक गुप्ता का उपन्यास ‘भयकाल’ मूलतः सामाजिक उपन्यास है। कथाविन्यास को देखें तो यह मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषणात्मक है। मनुष्य अपने संस्कार और रुचियों में ऐसी ग्रंथियां पाल लेता है कि वह अपने प्रिय परिवारजनों, यहां तक कि अपने वंशजों से भी भयाक्रांत रहता है और निरंतर अपनी दुर्गति की कल्पना से व्यथित रहता है। अशोक गुप्ता ने उपन्यास के एक चरित्र मिलकीत तनेजा के माध्यम से इस मनोवैज्ञानिक ग्रंथि के वैयक्तिक और पारिवारिक परिणाम का चित्रण किया है।
    दूसरी ओर, जानकी बल्लभ और भानुमती (भानुमती के कई नाम हैं। ये नाम परिस्थितियों और उसके चरित्र के घात-प्रतिघात से उसे मिल गए हैं। उसका एक नाम ‘करिया छबीली’ भी है) के साहसिक और संघर्षमय जीवन कथा के माध्यम से स्वातंत्र्योत्तर भारत के मानवीय और प्रगतिशील बदलाव या विकास का भी चित्रण किया गया है। दोनों प्रकार की कथाएं समांतर शैली में साथ-साथ चलती हैं। पात्र परस्पर टकराते भी हैं। इससे कथा रस का आस्वाद पाठकों को मिलता है और मोनोटोनी नहीं आने पाती है।
    गांवों में गैरजिम्मेदार और बिगड़ैल किशोर किस तरह के कुकृत्य करते हैं और कमजोर तबके के लोगों को सताते हैं इसका मार्मिक और मनोरंजक (भी) वर्णन है। समाज में बुरे लोग हैं तो अहेतु की सहायता करने वाले भी हैं।
    मुझे इस कथाकृति में यह बात विशेष रूप से अच्छी लगी कि आज जब हताशा और दिशाहारा प्रवृत्तियां हमारे साहित्य में आसन जमाए बैठी हैं, अशोक गुप्ता की यह रचना सामाजिक यथार्थ के आधार पर, रचनात्मकता से स्तर पर बने रहते हुए, प्रगतिशीलता और विकास की कथा कहती है।
    उपन्यास की भाषा और संवाद अपनी ताजगी से पढ़ने वालों और विचारकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। अशोक गुप्ता मूलतः कहानीकार हैं और यह कृति उपन्यास होने के साथ बिखराव के बावजूद कहानी का भी रस देती है।
  • Mahayaatra Gaatha (3 & 4) (Paperback)
    Rangey Raghav
    500

    Item Code: #KGP-23

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)

    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Saleem Ke Shanidev
    Pankaj Prashar
    100 90

    Item Code: #KGP-9100

    Availability: In stock


  • In Sabke Baavajood
    Manohar Bandhopadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-545

    Availability: In stock

    इन सबके बावजूद
    प्राइवेट कॉलेज के असुरक्षित कार्य को छोड़कर अजय एक संपन्न व्यापारी की ‘भानजी’ रति को ट्यूशन पढ़ाता है। यहाँ उसे प्रॉपर्टी डीलिंग का भी काम मिल जाता है। इस व्यापार के दाँव-पेच सीख वह रति को हथियाकर धनवान बनने के स्वप्न देखता है। इस कोशिश में वह बुरी तरह पिटता ही नहीं, अपनी जान भी खतरे में डाल देता है। व्यापारी को उसके शोषण की फिक्र है और लड़की उसे झटककर किसी और की हो जाती है। हताश अजय तब रेनु की ओर मुड़ता है, जिसे वह किसी समय चाहने लगा था। 
    कहानी वर्तमान युग के नवयुवकों की त्रासदी को उजागर करती है, जिसमें वे वैवाहिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर जोखिम-संघर्ष में स्वयं को झोंक देते हैं। यह मर्मस्पर्शी उपन्यास आज की अस्तित्ववादी वास्तविकता को समझने के लिए पाठकों को विवश करता है।
  • Aakash Ke Deeye
    Sharan
    30 27

    Item Code: #KGP-9148

    Availability: In stock

    हिंदी में ज्ञान-विज्ञान का विविध साहित्य उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय पुस्तक प्रस्थान की अनेक योजनाओं पर कार्य कर रहा है । इनमें से एक योजना प्रकाशकों के सहयोग से हिंदी से लोकप्रिय पुस्तको के प्रकाशन की है । सन् 1961 से कार्यान्वित की जा रही इस योजना का मुख्य उद्देश्य जनसाधारण में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार करना और साथ ही हिंदीतर भाषाओ के भी साहित्य की लोकप्रिय पुस्तकों को हिंदी में सुलभ कराना है ताकि ज्ञान-विज्ञान की जानकारी पाठकों को सुबोध शैली में मिल सके । इस योजना के अधीन प्रकाशित पुस्तकों में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार द्वारा निर्मित शब्दावली का प्रयोग किया जाता है ताकि हिंदी के विकास में ऐसी पुस्तकें उपयोगी सिद्ध हो सके । इन पुस्तकों में व्यक्त विचार लेखक के अपने होते है ।
  • Bharat Main Panchayti Raaj
    Vishv Nath Gupta
    160 144

    Item Code: #KGP-321

    Availability: In stock

    हमारे देश में पंचायती राज व्यवस्था किसी न किसी रूप में वैदिक काल में भी विद्यमान थी, लेकिन वर्तमान स्थिति तक पहुंचने में इसे एक बहुत लंबी यात्रा तय करनी पड़ी। संविधान 73वां संशोधन अधिनियम, 1992 लागू होने के बाद इसे संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ।
    प्रस्तुत पुस्तक में पंचायती राज का संक्षिप्त इतिहास देते हुए, 1992 में बने कानून के प्रावधनों पर विस्तार से चर्चा की गई है। वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था का जो त्रि-स्तरीय ढांचा है, उसके बारे में यथासंभव संपूर्ण जानकारी दी गई है। त्रि-स्तरीय ढांचे के बाहर होने पर भी महत्त्वपूर्ण होने के कारण ‘ग्राम-सभा’ पर भी अलग से चर्चा की गई है। साथ ही पंचायती राज संस्थाओं को मीडिया का समर्थन, ई-पंचायत तथा पंचायती राज संस्थाओं को समर्थन देने वाली संस्थाओं के बारे में भी उपयोगी जानकारी दी गई है।
    पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की एक तिहाई भागीदारी सुनिश्चित की गई है और महिलाएं पंचायती राज व्यवस्था में अच्छा काम कर रही हैं। इसलिए महिलाओं की भागीदारी पर एक विशेष अध्याय पुस्तक में जोड़ा गया है। महिलाओं के समक्ष क्या-क्या चुनौतियां हैं—इस बात की चर्चा भी की गई है। इसके साथ ही एक अध्याय पंचायत महिला एवं युवा शक्ति अभियान पर भी है।
    इस पुस्तक से संबंधित सामग्री जुटाने में मुझे मेरे पुत्र अरविंद कुमार, दामाद कमल अग्रवाल, अजय कुमार रूंगटा, पुत्री कुसुम और सुमन के अलावा पड़ोसी मित्र श्री रामकृष्ण से सहयोग प्राप्त हुआ है। सामग्री अधिकांशतः इंटरनेट तथा पंचायती राज मंत्रालय के कार्यालय से प्राप्त हुई है।
    पर्याप्त ध्यान रखने के बावजूद कुछ त्रुटियां पुस्तक में रह सकती हैं, जिनके लिए मैं स्वयं क्षमाप्रार्थी हूं।
  • Suraj Men Lage Dhabba
    Ramesh Bakshi
    65 59

    Item Code: #KGP-9092

    Availability: In stock


  • In Dinon Ve Udhas Hain
    Dinesh Pathak
    75 68

    Item Code: #KGP-1930

    Availability: In stock

    इम दिनों वे उदास हैं
    'इन दिनों वे उदास हैं ' दिनेश पाठक की नौ बहुचर्चित कहानियों का संकलन है । इस संकलन की कहानियों में जीवन के कई रंग, कईं अनुभव है । लेखक की विशेषता जीवनानुभवों को वस्तुगत रूप में प्रस्तुत करना नहीं, वरन उन्हें रचना के दायरे में लाकर उनका सामाजिक अर्थ पाने की स्पष्ट एवं सार्थक कोशिश करना है । कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ अनुभव-संबद्धता से पैदा हुई आत्मीय संस्पर्श की ऊष्मा से  परिपूर्ण कहानियाँ है । प्रस्तुति के स्तर पर इनमें न कोई बौद्धिक आडंबर है, न चमचमाता वाग्जाल । जो कुछ है, वह अनुभव के स्वायत्त वेग से उत्पन्न शिल्प है, भाषा है । एकदम सहज-सरल और स्वत स्फूर्त ।
  • Abhi Shesh Hai
    Mahip Singh
    350 315

    Item Code: #KGP-746

    Availability: In stock


  • Ullanghan
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-810

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Agyey
    Agyey
    260 221

    Item Code: #KGP-662

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अज्ञेय ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मेजर चौधरी की वापसी', 'गैंग्रीन (रोज)', 'नगा पर्वत की एक घटना', 'हीली-बोन की बत्तखें', 'पठार का धीरज', 'जयदोल', 'विवेक से बढ़कर', 'साँप', 'शरणदाता' तथा 'कोठरी की बात'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अज्ञेय की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aadhunik Hindi Kavita_225
    Dr. Hardyal
    225 203

    Item Code: #KGP-888

    Availability: In stock

    आधुनिक हिंदी कविता अनेक दृष्टियों से विशिष्ट कविता है। उसकी विशिष्टता इस बात में है कि उसमें अनुभूति और अभिव्यक्ति से संबंधित इतनी विविधता है जितनी आधुनिक काल से पहले की किसी भी काल की कविता में नहीं रही। उसकी इस विविधता में अंतःसलिला के रूप में ऐसी एकरूपता भी है जो उसे एक स्वतंत्र इकाई बनाती है। उसकी विभिन्न प्रवृत्तियों को विशिष्टता और उसकी समग्र एकरूपता को पकड़ने और रेखांकित करने के अनेक प्रयत्न विभिन्न विद्वानों ने किए हैं। उन्हीं प्रयत्नों की शृंखला में एक प्रयत्न यह पुस्तक है। ‘इस पुस्तक की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें भारतेन्दु-युग से लेकर नवें दशक तक की हिंदी कविता की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों की क्रमिक चर्चा है। इस कारण कोई चाहे तो इसे आधुनिक हिंदी कविता का प्रवृत्यात्मक इतिहास भी कह सकता है।’ पाठकों को इस पुस्तक में हिंदी के सुख्यात आलोचक डाॅ. हरदयाल की स्पष्ट और निभ्र्रान्त शैली में आधुनिक हिंदी कविता का तटस्थ विवेचन और निष्पक्ष मूल्यांकन मिलेगा। हमारा विश्वास है कि यह पुस्तक पाठकों की बहुत-सी जिज्ञासाओं को शांत करेगी और उन्हें आधुनिक हिंदी कविता के संबंध में नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित करेगी।
  • Afrika Road Tatha Anya Kahaniyan
    Dr. Hardyal
    300 270

    Item Code: #KGP-610

    Availability: In stock

    अफ्रीका रोड तथा अन्य कहानियां 
    अफ्रीकी देशों से प्रवास के दौरान, फिर लंदन में अफ्रीकी लेखकों और उनकी कहानियों से रूबरू होती रही, पड़ती रही । वे इतनी क्यों कि दिल हुआ वे हिंदी पाठकों तक पहुंचें । रास्ता था अनुवाद । और अनुवाद में आसानी इसलिए हुई कि लगभग सभी कहानियां मूल अंग्रेजी में ही लिखी गई है ।
    -उर्मिता जैन
  • Naye Sire Se
    Govind Mishra
    195 176

    Item Code: #KGP-723

    Availability: In stock


  • Aashcharya Ki Tarah Khula Hai Sansar
    Govind Mishra
    290 261

    Item Code: #KGP-551

    Availability: In stock

    आश्चर्य की तरह खुला है संसार 
    आधुनिक कवियों में अशोक वाजपेयी अरसे से प्रेम के एकाधिकारी कवि बने हुए हैं और यह उत्सवता सत्तर पार की उनकी शब्दचर्या में भी उतना ही दखल रखती है जितना कभी उनके युवा समय में। सच कहें तो प्रेम का कवि कभी बूढ़ा नहीं होता। वे कभी यह नहीं भूलना चाहते कि जीवन राग-अनुराग, सौन्दर्यबोध और सौष्ठवता का प्रफुल्ल विस्तार है।
    अशोक वाजपेयी के यहाँ प्रेम का यूटोपियाई स्वप्न नहीं देखा गया है बल्कि वह उनके लेखे जीवन का अध्यात्म है। उसे भाषा में खोजना व्यर्थ है क्योंकि वह शब्दों के बीच की चुप्पियों में/चाहत के अर्धविरामों में/संकोच के विरामों में/प्रेम की असम्भव संस्कृत में बसता है। रति से उनकी कविता की अनुरक्ति पुरानी है। रतिमुक्त प्रेम के बारे में कविता लिखना आसान है जबकि रति के रूपक रचना कठिन। अशोक वाजपेयी ने रति के सुघर और शिष्ट विन्यास में सफलता पाई है। इसीलिए कविता की लम्बी पारी खेलने वाले वाजपेयी के प्रेम और रति के रूपकों को भाषा के नेपथ्य में कौंधती अन्तध्र्वनियों में ही महसूस किया जा सकता है।
    कविता व ललित कलाओं के भव्य भुवन में रमते हुए अशोक वाजपेयी को कोई अर्धशती से ऊपर होने को आए। सेंट स्टीफेंस कालेज में पढ़ने वाला वह युवा अब अपनी परिपक्व वयस् में है। उसकी कविता एक अकेले की सृष्टि लगती है जहाँ वह सदियों से कवि-परंपरा को गाता चला आ रहा है। यह कवि अज्ञेय की तरह सुरुचिवान है तो श्रीकांत वर्मा की तरह स्मृतिसंपन्न। मुक्तिबोध के प्रति उसमें अनन्य अनुराग और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता है। गोष्ठियों-सभाओं-अनुष्ठानों- महफिलों का यह निर्विकल्प नायक शब्दों का कुशल कारीगर है। वह देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण की तरह जैसे अनंत समय से आदि कवि का ऋण अदा कर रहा है।
    अशोक वाजपेयी की कविता की तहें वैसे ही खुलती हैं, जैसे आश्चर्य की तरह खुलता है संसार। उन्हें पढ़ते हुए अकसर लगता है कि हम कविता की किसी साफ-सुथरी कालोनी से होकर गुजर रहे हैं जहाँ की आबोहवा हमारे निर्मल चित्त को एक नई आनुभूतिक बयार से भर रही है। यह नया रचने की उत्कंठा है जो उनसे कहलवाती है: मैं उम्मीद को दूसरे नाम से पुकारना चाहता हूँ/मैं इस गहरी कामना को एक उपयुक्त संज्ञा देना चाहता हूँ/मैं पलटता हूँ कामना का कोश/एक नया शब्द पाने के लिए। जो कवि अपनी माँ को महसूस करते हुए लिख सकता है: तुम्हारी बाँहें ऋतुओं की तरह युवा हैं, तुम्हारे होठों पर नई बोली की पहली चुप्पी है, तुम्हारी उँगलियों के पास कुछ नए स्पर्श हैं-वह अपनी कविता को सदैव नई बोली, नए स्पर्श देने के लिए प्रतिश्रुत रहेगा, इसमें संशय नहीं। अशोक वाजपेयी की कविताएँ-प्रेम कविताएँ बार-बार एक नया शब्द पाने, रचने और गढ़ने का उद्यम हैं।
    यह संग्रह अशोक वाजपेयी की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Himalaya Gaatha-3 (Janjati Sanskriti)
    Sudarshan Vashishath
    600 510

    Item Code: #KGP-639

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-3 (जनजाति संस्कृति)
    न जाने कब फहराने लगीं धर्म पताकाएँ हिमप्रदेश के बीहडों में । कब बौद्ध मंत्र भोटी में गूँजने लगे । तथागत कब महाविरोचन, अक्षोभ्य, अमिताभ, अमोधसिद्धि बने । कब आए पदूमसम्भव, रत्नभद्र । इस अभियान में कौन भिक्षु त्यागी हुए । और बौद्ध  वाड़मय से पहले गुफाओं मेँ कौन लोग वास करते थे । क्या कहते हैं, हजारों वर्ष से भी पुराने ताबो मठ के पास चट्टानों पर खुदे गुफा चित्र । ये बाते अभी पूर्णतया स्पष्ट नहीं है । इतिहास ग्लेशियर में छिपी नदी की तरह है ।
    तथापि ए० एच० फ्रेंके तथा दुची जैसे यूरोपीय विद्वानो ने खोले हैं । आज तक इन्हीं का अनुसरण करते जाए शोधकर्ता । हिमालय की संस्कृति पर गंभीरता से मौलिक कार्य नहीं हुआ । कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाई है । 'आँखिन देखी’ के आधार पर संस्मरण, यात्रा और कथात्मक शैली में वर्णन इन का गुण है । सरल, सुरुचिपूर्ण और स्पष्ट भाषा में रोचकता के साथ गंभीर पहलुओं का विवेचन, वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।
    संस्कृति पर लिखने वाले ऐसे बिरले साहित्यकारों में है वशिष्ठ । जो अपनी यायावर प्रवृति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते है । संस्कृति को बहुत करीब से देखा, परखा, समझा और फिर लिखा है । किन्नौर के अंतिम गांव छितकुल और नसज्ञा से लेकर चम्बा के साच दर्रे से होकर सुदूर पांगी तक पैदल यात्राओं के बाद यहाँ की अनूठी संस्कृति पर लेखनी चलाई है ।
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत तीसरे खंड में हिमाचल के किन्नौर, लाहौल स्थिति और पांगी-भरमौर जैसे दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों की संस्कृति पर अछूती सामग्री दी जा रही है ।
  • Saphalata Ka Rahasya
    Jagat Ram Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-99

    Availability: In stock

    सफलता का रहस्य
    जीवन में सफलता की चाहना सब रखते हैं, लेकिन सफल हो नहीं पाते। ऐसा न होने पर कोई भाग्य को कोसता है, कोई हालात को। जबकि सफलता हमारे अपने व्यवहार पर ज्यादा निर्भर है, न कि किन्हीं और बाह्य कारणों पर।
    सफलता के आधारभूत सूत्र हैं-शुद्ध व्यवहार, सीखने की प्रवृत्ति, आत्मनिर्भरता, संतोष तथा और भी बहुत कुछ।
    आर्य जी ने अपनी इस पुस्तक में सफलता के रहस्यों की सरल-सुबोध भाषा में व्याख्या की है। पुस्तक पठनीय तो है ही, जीवन से लिए गए सच्चे उदाहरणों के चलते संग्रहणीय भी बन पड़ी है।
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-3
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-829

    Availability: In stock


  • Mahaan Tatvagyani Ashtavakra
    Vinod Kumar Mishra
    295 266

    Item Code: #KGP-148

    Availability: In stock

    महान तत्त्वज्ञानी अष्टावक्र 
    असली ज्ञान शास्त्रों में नहीं है, बल्कि मनुष्य के अंदर है । शास्त्रों की रचना तो मनुष्य ने विभिन्न सन्दर्भों व परिस्थितियों में की है । इनमें विरोधाभास भी मिलेंगे । असली ज्ञान-शक्ति तो मनुष्य के अंदर छिपी है । यदि मनुष्य अपने आपको पहचान ले तो वह परमात्मातुल्य हो जाता है ।
    "परमात्मा किसी सातवें आसमान पर विराजमान नहीं है । यह सारी सृष्टि परमात्मा का ही दृश्य रूप है । इसकी सेवा और विकास ही ईश्वर की सच्ची आराधना है ।"
    "मोक्ष के पश्चात् व्यक्ति किसी दूसरे लोक में नहीं जाता, वह इसी संसार में करता रहता है, पर उनमें लिप्त नहीं होता ।"
    प्रस्तुत पुस्तक में अष्टावक्र के जीवन व दर्शन, जो 'अष्टावक्र गीता' के नाम से प्रसिद्ध है, का रोचक व प्रेरक वर्णन है । लेखक ने इसके वैज्ञानिक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला है ।
  • Begam Bin Baadshaah
    Rajendra Chandrakant Rai
    90

    Item Code: #KGP-1846

    Availability: In stock

    बेगम बिन बादशाह
    राजेन्द्र चन्द्रकांत राय तीन दशक से कहानियाँ  लिख रहे हैं । विभिन्न समयों में उनकी कहानियाँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में  प्रकाशित भी हुई हैं। उन पर चर्चा, विवाद भी हुए हैं, पर वास्तविकता यह है कि उनकी कोई भी संगृहीत किताब इसके पूर्व नहीं आ सकी है । यानी 'बेगम बिन बादशाह' उनका पहला कहानी-संग्रह होगा । राजेन्द्र चन्द्रकांत राय ने पिछली अवधि में कई कहानियों को रद्द किया, कई का पुनर्लेखन किया और संग्रह से समाविष्ट कहानियों के अलावा इस बीच कई लंबी कहानियाँ लिखीं, जो दूसरे संग्रह में आएंगी और एक भिन्न एवं बदली हुई दुनिया से पाठको को ले जा सकेंगी । चन्द्रकांत राय की रुचियाँ, आग्रह और विशेषज्ञता में वनस्पतियाँ, पशु-पक्षियों, पर्यावरण और उसके बीच लुटते हुए मनुष्य तथा सभ्यता का दर्द और विस्थापन है । उनके पास एक शैलीकार का आवेग और वैज्ञानिकता की पृष्ठभूमि है-इसी से उनके गद्य की बुनावट हुई है। यह कहानी-संग्रह उनकी गुमनामी और परिस्थिति को किंचित् तोड़ सकेगा अन्यथा आठवें दशक के कहानीकारों की सूची में अब तक वे प्रमुखता से हो सकते थे ।
    'बेगम बिन बादशाह' की कहानियों से मामूली, अदने, वंचित इंसानों का प्रवेश और चयन है, लेकिन एक बड़े फर्क के साथ । ये नाचीज पात्र मनहूस, दब्बू और पराजित नहीं हैं, वे बिना किसी अतिरेक के स्वाभाविक रूप से संघर्षशील है, जीवनमय हैं और भरोसे को खंडित नहीं करते । उनकी कहानियों में ऐसे पात्रों का वातावरण हमेशा बना रहता है, जो समाज से बहिष्कृत हैं, समाज के सीमांतों पर ठेल दिए गए हैं, पर इसके बावजूद वे हाहाकार नहीं करते, मुठभेड़ करते हैं। वे भटककर विलीन नहीं हो जाते । चरित्र की जगह पात्र शब्द का इस्तेमाल मैं इसलिए कर रहा हूँ कि चन्द्रकांत राय के चरित्र जीवन-संग्राम में अभिनय कर रहे हैं। इसी को मैं कहानी मानता हूँ । उनकी कहानियों में असंतुलित उम्मीद या रोशनी भी नहीं है । तर्क और विश्वास है । केवल व्यंग्य और वीरता का सहारा उन्होंने नहीं लिया है । स्वतंत्रता के बाद जो अवसाद हिंदी कहानी में पनपा था, यहाँ उससे आपकी मुक्ति मिलेगी । चन्द्रकांत राय की कहानियां इस प्रकार वैयक्तिक कला की उपज नहीं हैं, वे विचार के साथ आते हैं, विचार स्थूल रूप से प्रकट नहीं हैं, किस्से-कहानी-जीवन में विलीन रहते हैं। इस तरह पाठक उनके बारे में अपनी राय तय कर सकते हैं ।
  • Aadhaar
    Bhairppa
    190 171

    Item Code: #KGP-2096

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Mere Saakshatkaar : Kedarnath Agrawal
    Kedar Nath Agrawal
    200 180

    Item Code: #KGP-544

    Availability: In stock


  • Main Or Mera Man
    Dr. Sharad Nagar
    480 432

    Item Code: #KGP-7851

    Availability: In stock

    मैं और मेरा मन जीवन के एक विलक्षण साधक और रसिक की कलम से निकली हुई यादों, बातों, दास्तानों और दस्तावेज़ों का अनूठा सम्मिश्रण है। इस पुस्तक में हम मिलते हैं एक ऐसे सर्जक से जो अपनी गहरी से गहरी तकलीफें भूलने की कोशिश करता तथा तमाम जगहों और लोगों को दिए हुए अपने वायदों को निभाता हुआ उनके इतिहास और भूगोल को, उनकी बातों और वि़फस्सों को जिलाए रखने के काम में पूरे यव़फीन और मोहब्बत से जुटकर अपने जीने की ख़ुराक ढूँढ़ता है।
    डॉ. शरद नागर के मन में समाए इन लोगों और लोकों के किस्सों में हमें मिलते हैं घने पारिवारिक रिश्ते, गली-मोहल्लों के यादगार चित्रा और चरित्रा तथा अनदेखे पूर्वज। साथ ही हमें मिलती हैं बीसवीं सदी के सामाजिक इतिहास की कुछ ऐसी बारीकियाँ जिनके आज की पाठ्यपुस्तकों में पहुँचने की नौबत ही नहीं आती-जैसे, 1918 के इन्फ्ऱलूएन्ज़ा के प्रकोप की दिल को दहला देने वाली यादें; आगरा में बसे गुजराती नागरों के मोहल्लों-टोलों की भूली-बिसरी आवाज़ें; आज़ादी की जंग के दौर में मिले सृजन और सौहार्द के संस्कार; मैकॉले की नीति का शिक्षा और सामाजिक स्तरीकरण पर प्रभाव; समाज के बदलते उसूलों और खुलती-कसती बेड़ियों के बीच औरतों की स्थिति ही नहीं, बल्कि उनका श्रम, उनकी रचनात्मकता, उनकी जंग; तथा भारतीय रंगमंच के इतिहास से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ाव।
    शरद जी एक साहित्यकार और ज़िंदगी तथा समाज की तहों में गहरे उतरकर रमने वाले आराधक और कलाकार के रूप में अमृतलाल नागर के बहुत बड़े उपासक थे। इस पुस्तक में प्रस्तुत उनका लेखन अमृतलाल नागर जी को लेखक और पिता के रूप में बड़े निराले ढंग से जिलाता है। हम न केवल लेखक बनने से जुड़ी अमृतलाल नागर जी की निजी और उनके परिवार की अनेक संघर्ष यात्राओं को पहचान पाते हैं बल्कि आज़ादी के पहले के तीन दशकों में और आज़ादी के बाद के चार दशकों में साहित्य और रंगमंच समाज से किस व़फदर गुँथकर अपनी दिशाएँ खोज रहे थे, उसका अहसास भी हमें ख़ूब होता है।
  • Boomraing
    Rekha Rajvanshi
    225 203

    Item Code: #KGP-877

    Availability: In stock

    बूमरैंग
    इस पुस्तक की संपादक रेखा राजवंशी को आस्ट्रेलिया के प्रमुख कवियों को जोड़ने और पुस्तक-प्रकाशन का विचार तब सूझा जब कैनबरा और सिडनी में आयोजित कवि-सम्मेलनों में किशोर नंगरानी, अब्बास रजा अलवी, शैलजा चतुर्वेदी, हरिहर झा तथा सुभाष शर्मा जी से उनकी मुलाकात हुई । पर्थ के प्रेम माथुर जी व अनिल वर्मा जी की कविताएं भी उन्हें यहीं सुनने को मिली । बाद में जब वह होली के कवि-सम्मेलन में मेलबर्न गईं तो सुभाष जी से इस बारे से चर्चा हुई और उनके सहयोग तथा ई-पत्रों के माध्यम से इस विचार को आकार मिला । बाद में एडीलेड से राय कूकणा जी व पर्थ से रेनू शर्मा जी को भी इसने सम्मिलित किया गया । 
    रेखा राजवंशी के अनुसार, पुस्तक का नाम 'बूमरैंग' इसलिए रखा गया, क्योंकि 'बूमरैंग' आस्ट्रेलिया की आदिवासी देशीय जनजाति का प्रतिनिधित्व करता है । यह एक ऐसा हथियार है, जिसे किसी भी दिशा में फेंका जाए, यह फेंकने वाले के पास ही वापस आ जाता है । तात्पर्य यह कि भारतीय कवि कहीं भी रहें, उनका हृदय बार-बार अपने देश भारत की और ही वापस जाता है। यानी हर भारतीय प्रवासी चाहे- अनचाहे ही 'बूमरैंग' बन जाता है ।
  • Nidhi Maharaj
    Pradeep Anshu
    35 32

    Item Code: #KGP-2060

    Availability: In stock

    निधि महाराज
    निधि महाराज अमृता प्रीतम के उपन्यास 'कोरे कागज' के शक्ति-बिन्दु हैं । उपन्यास के सभी किरदार अपनी खोई हुई दिशा को उसी शक्ति-बिन्दु से पाते हैं ।
    लेकिन एक गीता है, जो जिंदगी के अन्याय को झेलती हुई जब गंगा की शरण ले लेती है, तो उसकी व्याकुल आत्मा उपन्यास में खामोश बनी रहती है। 
    श्री प्रदीप अंशु निधि महाराज के शक्ति-स्थल से उतरकर एक मर्म को इस तरह पा गए है कि गीता की मुक्ति के लिए भी वह निधि महाराज को ही समर्थ पाते हैं... और जहाँ काल-अंतर मिट जाता है, वहीं खडे होकर श्री प्रदीप अंशु ने  जो  अंतर-ध्वनि सुनी है--उसी का   कि ब्यौरा यह पुस्तक है--'निधि महाराज' ।
    यह लेखन की एक ऐसी विद्या  है, जो आज तक साहित्य का अंग नही बनी थी और प्रदीप अंशु इसी विद्या  को पहली बार साहित्य से लाए हैं।
  • Aavaran
    Bhairppa
    495 446

    Item Code: #KGP-873

    Availability: In stock


  • Safar Baavajood
    Sidhesh
    140 126

    Item Code: #KGP-1947

    Availability: In stock

    सफर बावजूद
    सिद्धेश की कहानियाँ कहानी-आंदोलन के उस दौर की उपज  हैं, जब कहानी में कलावाद की यथार्थवाद का संघर्ष चल रहा था । गुटबाजी, शिबिरबद्धता चरम पर थी । सिद्धेश  को यह शोर-शराबा पसंद न था । वे मौन भाव से सृजनरत थे । तटस्थ बने रहने का खामियाजा यद्यपि उन्हें भुगतना पडा । उनकी कहानियां फॉर्मूलाबद्ध लेखन तथा किताबी नुस्खों से मुक्त हैं । सिद्धेश ने कहानियों में शिल्पगत चमत्कार, भाषा की पच्चीकारी की जगह सहजता को महत्त्व दिया है । वे मुख्यत: नागर-मानसिकता के कहानीकार हैं, पर उनकी कहानियां सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्ध हैं।
    संग्रह की इन कहानियों से विषयवस्तु की विविधता के साथ ही मानवीय दृष्टि और संवेदना का विस्तार है । ये कहानियाँ अपने समय और परिवेश के स्पंदनों को पहचानने की कोशिश करती हैं । मानव-मन की सूक्ष्म परख की कला  में माहिर हैं सिद्धेश । वे विचारधारा से अधिक मनुष्य और उसकी संवेदनाओं को महत्व देते हैं। उनके अनुसार, "संवेदना के स्रोत में बहने के लिए अपने चारों तरफ के परिवेश, चरित्रों और घटनाओं के प्रति सजग दृष्टि रखनी पडती है ।" सृजन को सिद्धेश 'जीने के मकसद' से जोड़कर देखते  । संघर्षों, अभावों से जूझते हुए ही उन्होंने अपनी रचना-दृष्टि अजित की है।
    सहजता और सार्वज़निकता इन कहानियों का वैशिष्ट्य है। कहानी का रूप-गठन और रचना-विधान कुछ इस तरह है कि आधुनिक नागरिक जीवन के अनेक अनछुए तथा मार्मिक प्रसंगों का मनोवैज्ञानिक चित्रण बिना किसी अतिरंजना के यहाँ चित्रित हुआ है ।
  • Kavi Ne Kaha : Jitendra Shrivastava
    Jitendra Shrivastva
    240 216

    Item Code: #KGP-7818

    Availability: In stock

    पिछली सदी के आखिरी दशक में एक धमक की तरह काव्य-परिदृश्य पर उपस्थित हुए कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव आज नयी सदी की कविता के सर्वाधिक प्रशंसित और अनिवार्य कवि हैं। बाजारू प्रलोभनों से बचाकर हिंदी कविता को विश्वसनीय बनाए रखने के प्रति सर्जनात्मक सजगता जितेन्द्र को अपने समकालीनों में अलग पहचान दिलाती है। हमेशा करुणा, प्रेम और उम्मीद का पक्ष लेती हुई जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने आसपास पसरी हुई त्रासदी, अन्याय और दुःख के राजनीतिक तात्पर्यों का साहसिक उद्घाटन भी करती चलती है। जैसा कि होना चाहिए--गहन रूप से राजनीतिक होकर भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने स्वभाव में मानवीय, मार्मिक और भावनात्मक रूप से आर्द्र बनी रहती है।
    जितेन्द्र के लिए, कविता मनुष्य की नैसर्गिक संवेदनाओं को परिमार्जित करने का माध्यम है। मानवीय जिजीविषा के बहुविधि संस्तरों से साक्षात्कार के क्रम में उनकी कविता को कलात्मक मेयार की कठिनतर ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए देखा जा सकता है। नयी सदी की कविता के भाषिक और संवेदनात्मक आचरण को उदाहरणीय बनाने में जिन थोड़े कवियों का योगदान है, उनमें जितेन्द्र श्रीवास्तव अलग से ध्यान खींचते हैं।
    स्त्री, दलित, उत्पीड़ित और मार्जिनलाइज्ड समाज के तमाम अंतरंग जीवन-प्रसंगों से निर्मित जितेन्द्र की कविता का वितान बहुआयामी तो है ही, इसकी हदें इतिहास से लेकर भविष्य के अनिश्चय भरे अँधेरों तक व्याप्त हैं। जहाँ तक विमर्शों का प्रश्न है कविता में कला का सौंदर्य बचाते हुए जितेन्द्र को पूरे काव्यात्मक संतुलन के साथ, विमर्शों में कारगर हस्तक्षेप करते हुए देखा जा सकता है।
    कविता के प्रति पाठकों की घटती हुई अभिरुचि के प्रतिकूल माहौल में भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अनेक तरह के सांस्कृतिक समूहों और आर्थिक-राजनीतिक रुझानों के पाठकों में समान प्रशंसा और प्रतिष्ठापूर्वक पढ़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि उनकी कविताओं का यह चयन पाठकों की संवेदना को स्पंदित करने में सफल रहेगा।
    --कपिलदेव