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  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghav
    Rangey Raghav
    225 203

    Item Code: #KGP-92

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रांगेय राघव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'पंच परमेश्वर', 'नारी का विक्षोभ', 'देवदासी', 'तबेले का धुँधलका', 'ऊँट की करवट', 'भय', 'जाति और पेशा, 'गदल', 'बिल और दाना' तथा 'कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेकनीक्स'।

    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रांगेय राघव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Comprehensive English-Hindi Dictionary_495
    Bholanath Tiwari
    495 446

    Item Code: #KGP-32

    Availability: In stock

    COMPREHENSIVE ENGLISH-HINDI DICTIONARY

     The present comprehensive English-Hindi Dictionary stands as the crowning work of the four decade long effort of the well known Hindi linguist-cuin-lexicographer Dr. Bhola Nath Tiwari and Dr. Amar Nath Kapoor, a distinguished scholar of English language studies.

     The main merit of the present dictionary is its practical and explanatory character. The editors have illustrated the proper and contextual usage of each and every word, phrase, idiom and expression through sentences and this goes to make the lexicon a work of tremendous relevance for the entire gamut of bilingual activity being undertaken in the country at almost all levels of our social system, educational institutions and government departments.

     Basically meant for the average Indian reader who goes to a dictionary to find correct spelling, correct usage and the most common present meaning of all the live words of English usage, the chief function of die present dictionary is to present not only comprehensiveness, accuracy and simplicity but also to record usage as pan of a perfect language.

     Simple form and the most pragmatic approach as far as the spelling and pronunciation of words is concerned has been adopted wit‘: 2 view to make the average educated Indian use English—both written and spoken word—in such a way that the listener or the reader is able to under- stand and appreciate what is being said in its correct parlance.

  • Zane Ajeeb : Nasera Sharma
    Prem Kumar
    275 248

    Item Code: #KGP-281

    Availability: In stock

    ज़ने अजीब : नासिरा शर्मा
    अपनी मनबसी नामी-गिरामी शख़्सियतों के बारे में बहुत कुछ—ख़ूब-ख़ूब जान लेने की चाहत सबमें होती है। पसंदीदा के प्रभाव के बढ़ते-गहराते जाने के क्रम में एक बिंदु वह भी आता है, जब यह चाहत कसकता-सा एक जुनून तक बन जाती है। उस अपने मनभावन के अंदर- बाहर-आसपास से जुड़ी हर छोटी-छिपी बात जानने-सुनने के लिए हम उत्कर्ण-उत्कंठ हो उठते हैं। अगर वह मनभावन कोई कलाकार-साहित्यकार है तो स्थिति और भी विकट एवं दिलचस्प हो जाती है। उसकी रचनाओं के पात्रों, घटनाओं, चित्रों, कथनों के आधार पर हम अपनी- अपनी तरह से उसके निज—नितांत निज की दुनिया की अजब-ग़ज़ब तस्वीरें बनाने लगते हैं—बनाते रहते हैं।
    लेकिन जब कोई बड़ी शख़्सियत—नासिरा शर्मा जैसी लेखिका—अपने स्वभाव, अनुभवों, संवेदनाओं, संबंधों, मान्यताओं, विचारों, अभावों, आघातों, संघर्षों, प्राप्तियों...उससे भी अहम यह कि अपने पात्रों, सरोकारों, इरादों एवं रचित-संभावित रचनाओं के बारे में सहज, स्पष्ट, उत्सुक भाव से रचना करने की तरह कहे-बताए...तो...तो यह पाठक, रचना और साहित्य की दृष्टि से विशिष्ट, उपयोगी और मूल्यवान हो जाता है। तब और भी अधिक—जब हम नासिरा जी के पास-साथ होने के उन क़रीबी क्षणों में यह जानें-महसूस करें कि इस लेखिका के जीने-लिखने-सोचने का अंदाज़ और सोच का आसमान एकदम अलग भी है एवं व्यापक व विराट् भी।
    किसी कलाकार की सृष्टि व कलाकारिता की वीथियों-अमराइयों में उसके साथ चल, गुज़र, देख, सुन, जान पाना अपने आप में भिन्न, सुखद, अधिकतम प्रामाणिक और बेहतरीन क़िस्म का अनुभव होता है। ऐसे इस अनुभव का अहसास-भर पाठक को कराने की मुन्नी-सी एक ख़्वाहिश और कोशिश है यह—ज़ने अजीब: नासिरा शर्मा।
  • Kaali Dhar
    Mahesh Katare
    550 468

    Item Code: #KGP-KALI DHAR HB

    Availability: In stock

    जमादारिन की हवेली बीसियों साल से बंद थी। साल में एकाध बार उनका बेटा आगरा से आता। विशेषतः दीपावली से पहले आकर वह दो-चार दिन ठहरता। कलई-चूने से मंदिर की पुताई-सफाई करवाता और लौट जाता। अटारी आकर वह सेठ की हवेली में ही ठहरता। सेठ के लड़केपोते उससे छुआछूत वाला व्यवहार नहीं करते थे। अगली पीढ़ी को हवेली की आवश्यकता न थी। इस बीहड़ में कौन बसतातालों की चाबियाँ सेठ परिवार के पास थीं। हवेली में एक छोटा सा द्वार पीछे बीहड़ों की ओर भी खुलता थाजिसमें से होकर बागियों के गिरोह हफ्रतों हवेली में पड़े रहते और चौमासे अर्थात् बरसात में तो महीनों। सबको पता था। पुलिस की गश्त भी यदा-कदा सामने के द्वार पर जड़े ताले को देखती हुई निकल जाती थी। गिनती का पुलिस-दल डाकुओं से टकराने का खतरा कैसे उठाएबागी भी सामान्यजन को परेशान नहीं करते थे। उनके निशाने पर तो दुश्मनधनवान अथवा मुखबिर आता था। रसद लाने वाले को पूरा पैसा चुकाते थे बागी।

    लाला जी ने सेठ श्रीलाल के वंशजों से संपर्क किया। जमादारिन के पुत्र से अनुमति ली तो ठाकुर ने दाऊ मानसिंह को समस्या का पहलू समझाया। मानसिंह का गिरोह ही उस समय सबसे प्रभावशाली था। वह कड़ाई से बागी-धर्म के नैतिक नियमों का पालन करते थे। कुल मिलाकर आठ दिन में ऊपरी औपचारिकता पूरी हो गई एवं आठ दिन सफाई आदि के जरिये हवेली को बसने योग्य बनाने में लगे। इस तरह अम्मा ठाकुर जमादारिन की हवेली में रहवासी हो गईं। नवाब ठाकुर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लाला भभूती लाल ने कुछ विशेष व्यवस्था भी कर दी। 

    -इसी उपन्यास से। 

  • Sampurna Baal Kavitayen : Balswaroop Rahi
    Mahesh Katare
    300 270

    Item Code: #KGP-470

    Availability: In stock

    बालस्वरूप राही हिंदी के अत्यंत सम्मानित और दिग्गज बालकवि हैं, जिनकी कविताएँ कई पीढ़ियों से बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी रिझाती आई हैं। कथ्य के अनूठेपन और नदी सरीखी लय के साथ बहती उनकी कविताओं ने बाल कविता का समूचा परिदृश्य ही बदल दिया। सच तो यह है कि राही जी बच्चों के लिए लिखने वाले उन बड़े कवियों में से हैं जिनकी कविताएँ पढ़-पढ़कर एक पीढ़ी जवान हो गई, पर इन कविताओं का जादुई सम्मोहन आज भी वैसा ही है। इन कविताओं में बच्चों के मन, सपनों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को बोलचाल की बड़ी ही सीधी-सहज भाषा में ऐसी नायाब अभिव्यक्ति मिली कि आज भी हजारों बच्चे राही जी की बाल कविताओं के मुरीद हैं और उन्हें ढूँढ़-ढूँढ़कर पढ़ते हैं। खासकर ‘चाँद’ पर लिखा गया उनका एक बालगीत तो इतना प्रसिद्ध हुआ कि बच्चों के साथ-साथ बड़ों के लिए लिखने वाले साहित्यिकों में भी उसकी धूम रही और आज भी इसे बाल कविता में एक ‘युगांतकारी’ मोड़ के रूप में याद किया जाता है। चंदा मामा की पुरानी शान और ठाट-बाट यहाँ गायब है और बच्चा कुछ-कुछ ढिठाई से उसकी ‘उधार की चमक-दमक’ पर व्यंग्य करता है। यह नए जमाने के बदले हुए बच्चे का गीत है, जो चंदा मामा पर पारंपरिक ढंग से लिखे गए सैकड़ों बालगीतों से अलग और शायद सबसे मूल्यवान भी है।
    राही जी ने एक ओर बच्चों के कोमल मनोभावों और शरारतीपन पर खूबसूरत कविताएँ लिखीं तो दूसरी ओर ऐसी कविताएँ भी जिनमें खेल-खेल में बड़ी बातें कही गई हैं। उनकी कविताएँ एक अच्छे दोस्त की तरह बच्चों को हाथ पकड़कर एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं, जिसमें बड़ों की डाँट-डपट और ‘यह करो, वह न करो’ से मुक्त एक ऐसा मनोरम संसार है, जिसमें प्रकृति के एक से एक सुंदर नजारे हैं और आनंद के सोते बहते हैं। पर इसके साथ ही राही जी अपनी कविताओं में अनायास ही एक ऐसा प्रीतिकर संदेश भी गूँथ देते हैं, जो बच्चों के दिल में उतर जाता है और उन्हें सुंदर भावनाओं और संकल्पों वाला एक बेहतर इनसान बनाता है। 
    राही जी के शिशुगीतों में भी बड़े मनोहर रंगों के साथ कुछ नई और मोहक भंगिमाएँ हैं। कार पर लिखा गया उनका एक चुटीला शिशुगीत तो बार-बार याद आता है जिसमें बच्चे का गर्व देखने लायक है, ‘पापा जी की कार बड़ी है / नन्ही-मुन्नी मेरी कार / टाँय-टाँय फिस्स उनकी गाड़ी / मेरी कार धमाकेदार।’ जो कवि बच्चे का मन पढ़ना जानता हो, वही ऐसे शिशुगीत लिख पाएगा जो खेल-खेल में बच्चे की जबान पर चढ़ जाएँ। और राही जी इस मामले में उस्ताद कवि हैं, जिनकी दर्जनों कविताएँ न सिर्फ बच्चे झूम-झूमकर गाते-गुनगुनाते हैं, बल्कि वे बाल कवियों के लिए भी नजीर बन चुकी हैं।
    बाल साहित्य के शिखर कवि बालस्वरूप राही की बच्चों के लिए लिखी गई चुस्त-दुरुस्त और मस्ती की लय में ढली कविताएँ एक साथ, एक ही पुस्तक में बच्चों को पढ़ने को मिलें, यह किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं। हिंदी बाल साहित्य की यह ऐतिहासिक घटना है, इसलिए भी कि बाल कविता के इतिहास के सर्वोच्च नायकों में राही का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उम्मीद है, राही जी की संपूर्ण बाल कविताओं का यह संचयन बच्चों के साथ-साथ सहृदयजनों और हिंदी के साहित्यिकों को भी हिंदी बाल कविता के सबसे सशक्त और सतेज स्वर से रू-ब-रू होने का अवसर देगा।
  • Ai Ganga Tum Bahati Ho Kyoon
    Vivek Mishra
    180 162

    Item Code: #KGP-507

    Availability: In stock

    ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ’ युवा कथाकार विवेक मिश्र का तीसरा कहानी-संग्रह है। ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’ और ‘पार उतरना धीरे से’ कहानी संग्रहों से विवेक ने पाठकों के बीच प्रियता व प्रामाणिकता अर्जित की है। उन्होंने बहुत शाइस्तगी और रचनात्मक विनम्रता के साथ यह सिद्ध किया है कि आसपास पसरा यथार्थ हर रचनाकार के लिए समान नहीं होता। यह रचनाकार पर है कि वह ‘दिखते’ के पीछे छिपे जीवन सत्य और ‘दिखते’ में वास्तविक को कितना देख-समझ पाता है। विवेक वास्तविक और प्रायोजित का अंतर समझने वाले समर्थ कहानीकार हैं। यही कारण है कि आज जब संपादकों, संगठनों, प्रायोजकों के कंधें पर बेतालवत् सवार कुछ कहानीकार ठस व ठूँठ हो रहे हैं तब विवेक मिश्र की कहानियाँ अपना महत्त्व असंदिग्ध रूप से प्रकाशित कर रही हैं।
    विवेक मिश्र सुस्पष्ट सामाजिक सरोकारों से लैस लेखक हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ साबित करती हैं कि परिवार में बद्धमूल अप्रासंगिक धारणाओं से लेकर सामाजिक परंपराओं में घुसपैठ करती अमानवीय प्रवृत्तियों तक लेखक की पैनी नजर है। परिवेश विवेक के यहाँ एक पात्र सरीखा है। मैत्रेयी पुष्पा के बाद बुंदेलखंड का जीवन-जगत् उनके यहाँ सर्जनात्मक संदर्भ प्राप्त करता है। साथ ही, वे महानगरों की संधियाँ-दुरभिसंधियाँ भी परखते हैं।
    संग्रह में शामिल ‘घड़ा’, ‘चोरजेब’, ‘निर्भया नहीं मिली’ तथा ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं’ सरीखी कहानियाँ रेखांकित करती हैं कि लेखक मन के अतल में व्याप्त ध्वनियों को सुनने की अद्भुत क्षमता रखता है। उसके पास अर्थ को अनेक स्तरों पर वहन करने वाली भाषा है, जैसे--‘पनरबा कस्बे के किसी कागज को माचिस की तीली से जलाकर देखिएगा। शायद उससे उठती लपटों में आपको विश्रांत अनल की कुछ कहानियाँ मिलें।’ यह कहानी संग्रह वर्तमान हिंदी कहानी में मूल्यवान उपस्थिति की तरह स्वागत योग्य है।
  • Dwidhaa
    Bhairppa
    575 460

    Item Code: #KGP-646

    Availability: In stock

    कन्नड़ भाषा के यशस्वी उपन्यासकार भैरप्पा की रचनाएं पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं। उनके उपन्यास कथानक की दृष्टि से उल्लेखनीय होते हैं। वे सामाजिक संदर्भों से प्रेरित हों अथवा प्राचीन प्रसंगों को पुनः परिभाषित करते हों—अपने पाठकों को भाव व विचार की एक नई दुनिया में ले जाते हैं। भैरप्पा का नया उपन्यास ‘द्विधा’ को पढ़कर कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है।
    प्रस्तुत उपन्यास स्त्री-पुरुष के मध्य मौजूद प्रश्नों व प्रसंगों से उद्वेलित है। देह, प्रेम, सहवास, गर्भ, गर्भपात, अधिकार, पत्नी, प्रेमिका, रखैल आदि जाने कितने ऐसे प्रश्न जिनको अनेक बार भिन्न-भिन्न तरीकों से कथा-साहित्य में प्रस्तुत किया जा चुका है। ...किंतु जिस सामाजिक धरातल पर भैरप्पा ने इन्हें ‘द्विधा’ में विस्तार दिया है वह अनूठा है। शारीरिक संपर्क और स्त्री-पुरुष प्रेम के विषय में उपन्यास का एक पात्र कहता है, 
    ‘...जिन्होंने शारीरिक संबंध की मृदुता का अनुभव किया हो, वे शारीरिक संबंध को तजकर, केवल मानसिक रूप से स्नेह-संबंध बनाए रखने का प्रयत्न करेंगे, तब भी स्नेह शुष्क हो जाता है।’ उपन्यास में ऐसे उन्मुक्त विवरण एक नई बहस छेड़ते हैं।
    यह उपन्यास ‘स्त्री मुक्ति’ की जटिल व सूक्ष्म व्याख्याओं में भी ले जाता है। क्या ‘स्त्री मुक्ति’ के आधार पर प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग नहीं होता, क्या इससे परिवार नाम की संस्था को कोई खतरा नहीं प्रतीत होता; ऐसे बहुत से ज्वलंत मुद्दे हैं जिनको भैरप्पा ने उपन्यास में शामिल किया है। मानवीय दुर्बलताओं और उनसे उत्पन्न संकटों/विसंगतियों/दुष्परिणामों को भलीभांति चित्रित किया है। कथानक विस्तृत है। लेखक ने विभिन्न चरित्रों के द्वारा समकालीन समाज की प्रवृत्तियों को रेखांकित किया है। समग्रतः एक ऐसा उपन्यास जो हमारे समय की सच्चाइयों व समस्याओं का आईना है।
  • Bhartiya Sahitya Siddhant
    Dr. Tarak Nath Bali
    250 225

    Item Code: #KGP-9120

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य सिद्धांत
    हिंदी समीक्षा का आरंभ दो धाराओं के रूप में हुआ। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भारतीय साहित्य सिद्धांतों में से सहृदय की अनुभूति रस को केंद्रीय प्रतिमान के रूप में स्वीकार किया और उसी के अंतर्गत कुछ पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को समाविष्ट करने का प्रयास किया। दूसरी ओर बाबू श्यामसुन्दर दास ने पाश्चात्य समीक्षा सिद्धांतों को ही हिंदी साहित्य में आवश्यकतानुसार प्रस्तुत किया। सैद्धांतिक स्तर पर ये दोनों धाराएं आज तक हिंदी आलोचना में लक्षित होती हैं। आश्चर्य की बात है कि विविध सिद्धांतों के बीच के अंतःसंबंधों के विश्लेषण की ओर हिंदी आलोचकों का विशेष ध्यान नहीं गया। एक ओर तो भारतीय साहित्य सिद्धांतों मं से चार सिद्धांतों-अलंकार, सिद्धांत, रीति सिद्धांत, ध्वनि सिद्धांत और वक्रोक्ति सिद्धांत का संबंध प्रधान रूप से काव्य-भाषा तथा गौण रूप से काव्यवस्तु के गंभीर विश्लेषण से है तथा इन सिद्धांतों के अंतःसंबंधों के विवेचन की अपेक्षा आज भी बनी हुई है। दार्शनिक व्याख्या के कारण रस सिद्धांत प्रधान रूप से सहृदय की अनुभूति में ही केंद्रित हो गया जब कि वह वस्तुतः विभावादि के रूप में काव्य वस्तु, काव्य भाषा तथा अभिनय को अपने में समेटे हुए हैं। उधर पश्चिम में भाषा केंद्रित सिद्धांतों-शैली विज्ञान, नई समीक्षा तथा विखंडनवाद आदि को हिंदी समीक्षकों ने स्वीकार किया किंतु संभवतः संस्कृत के काव्यभाषा के सिद्धांतों के गंभीर ज्ञान के अभावत के कारण भारतीय तथा इन नवीन पाश्चात्य सिद्धांतों की तुलनात्मक समीक्षा और मूल्यांकन की ओर उनका ध्यान नहीं गया जबकि पंडितराज जगन्नाथ ने सत्राहवीं शती में ही काव्य को शाब्दिक रचना कहा था। प्रस्तुत पुस्तक इन विविध काव्य सिद्धांतों के अंतःसंबंधों और भारतीय काव्य सिद्धांतों की आधुनिक प्रासंगिकता के विश्लेषण की दृष्टि से प्रथम व्यापक प्रयास है जिसमें भारतीय साहित्य सिद्धांतों के विविध पक्षों का विवेचन है जिसके अंतर्गत प्रसंगानुसार उनकी आधुनिक प्रासंगिकता को भी रेखांकित किया गया है। इस सैद्धांतिक एंव व्यापक विवेचन को आधुनिक हिंदी कविता के उदाहरणों से स्पष्ट करने की कोशिश भी की गई है। आशा है इस प्रथम प्रयास में व्यक्त विविध स्थापनाओं एवं संकेतों को आगे विकसित करने के कार्य की ओर विद्वानों का ध्यान जाएगा। 
  • Akkhar Kund
    Padma Sachdev
    125 113

    Item Code: #KGP-1989

    Availability: In stock

    अक्खर कुंड 
    यूँ तो पद्मा सचदेव डोगरी की कवयित्री हैं, पर अनुवाद के माध्यम से जब वह प्रकट होती हैं , तो उनकी कविता में पूरे हिंदुस्तान की महक आती है । इससे सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि वह संपूर्ण भारतीय समाज और संस्कृति को शब्द देने वाली कुशल कवियत्री हैं ।
    पद्मा जी की कविता प्रकृति की कविता है और मनुष्य की संवेदना और करुणा की भी...। इनकी कविता में मिथकों की बानगी अदभुत और अलग पहचान से समृद्ध है । यहाँ वह सूक्ष्म में जाती हैं और उसे रूहानी भावों से जोड़ते हुए जो चित्रांकन करती है, वह जीवंत तो है ही, बल्कि अपनी जड़ों से जोडने का वास्तविक अहसास कराती हैं । इसलिए इनमें आत्मिक आनंद की अनुभूति भी है ।
    पद्मा जी की कविताओं में कश्मीर का बेमिसाल सौंदर्य  तो है ही, वहाँ की जातीय संस्कृति का सबल रेखांकन  भी है, यानी इनमें कश्मीरियत समूचे आकार में यहीं होती है । इन्हें शब्द-चित्रों को बनाते हुए उन्हें घाटी में बारूद की गंध भी आती है । इससे उनका संवेदनशील मन विचलित होता है, लेकिन वह इसे यूँ ही नहीं छोड़ देतीं, पीड़ितों-वंचितों को आशा और विश्वास भेंटती है । उनमें 'एक दिन लौटने का अहसास' जगाती हैं ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Gian Ranjan
    Gyanranjan
    160 144

    Item Code: #KGP-27

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ज्ञानरंजन ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'शेष होते हुए', 'पिता', 'फैंस के इधर और उधर', 'छलाँग', 'यात्रा', 'संबंध', 'घंटा', 'बहिर्गमन', 'अमरूद का पेड़' तथा 'अनुभव' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ज्ञानरंजन की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Koorha Kabaarha
    Ajeet Kaur
    220 198

    Item Code: #KGP-2058

    Availability: In stock

    कूड़ा-कबाड़ा
    इतनी भयानक दूट-फूट में से, इतनी नकारा, बेकार, बेवकूफ़ और डरी-सहमी औरत में से कैसे और कब एक निडर, बेखौफ, अपने जीवन के सभी फैसले खुद लेने की हिम्मत और हौसला करने वाली औरत पैदा हो गई, इसी ट्रांसफॉर्मेशन यानी काया- कल्प की दास्तान सुनाना चाहती हूँ आप सबको ।
    औरत, जिसे हमेशा कूड़ा-कबाड़ा समझा जाता है ।
    औरत, जो खुद भी अपने आपको  कूड़ा-कबाड़ा समझती रहती है उम्र-भर । क्योंकि यही समझकर ही तो जीवन से, जीवन की तमाम कड़वाहटों से समझौता किया जा सख्या है ।
    कि सहना, समझोता करना और अपना अस्तित्व मिटा देना, किसी भी तकलीफ की शिकायत जुबान पर नहीं लाना ही औरत का आदर्श मॉडल समझा जाता है । हर औरत को इसी आदर्श की घुट्टी दी जाती है । समाज में औरत का स्वीकृत  मॉडल यही है । कि वह निगाह नीची रखे, हर जुल्म को चुपचाप सहे, खामोश रहे बेटे पैदा कर ससुराल के खानदान का नाम जीवित रखे और वंश-परंपरा को आगे चलाए । पति के हर आदेश का पालन करे ।
    औरत, जिसे पहले माता-पिता के घर से 'पराई अमानत' समझकर पाला-पोसा जाता है । औरत, जो विवाह के बाद पति के घर की और ससुराल की 'धरोहर' यानी जायदाद होती है । औरत, जिसे उसका पिता दानस्वरूप एक अजनबी पुरुष के हाथों में सौंप देता है कि ले जा, आज से यह गाय तेरी है । इसका दूध निकाली, बछड़े पैदा करवाओ, मारो-पीटो, चाहे चमडी उधेड़ दो इसकी ।
    जा, ले जा, पाल-पोसकर तुझे दान में दी अपनी बेटी हमने । आज से इसके लिए यह घर पराया है । आज से तेरा घर ही इसके सिर छुपाने की जगह है ।
    जा बेटी, जा अपने घर । आज से ये घर तेरे लिए पराया हुआ । चावलों की मुट्ठी भरकर सिर के ऊपर से पीछे फेंक । मखानों की मुट्ठी भरकर पीछे फेंक । तेरे भाई सुखी रहें, और सुखी बसे उनका घर-परिवार । भाइयों का घर हरा-भरा रहे । दूध-पूत से भरा रहे ।
    औरत, जिसके लिए पिता का घर हमेशा पराया रहता है, और विवाह के बाद पति का घर भी अपना नहीं होता ।
    'बेटी, घर जा अपने...'
    अपने घर ।
    कौन-सा घर उसका अपना होता है ?
  • Safed Chaadar
    Jiyalal Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-1994

    Availability: In stock

    सफेद चादर
    बहुपथीन प्रतिभा के धनी श्री जियालाल आर्य की  यह कथाकृति 'सफद चादर' अनेक संदर्भों में उपन्यास-जगत् की एक अनूठी उपलब्धि है ।
    इस उपन्यास में समष्टि-हित की व्यापक दृष्टि से संपन्न एक ऐसी सशक्त और सतत संघर्षशील ग्रामीण नारी की कथा है, जो नारी-मुक्ति की संभावनाओं को सहज सम्भाव्य बनाती है । घोर कायिक और मानसिक उत्पीड़न तथा अत्याचार के बावजूद श्री आर्य की नायिका की महती मानवीय संवेदना और सामाजिक संचेतना किंचित् काले नहीं होती, अपितु भांति-भांति की कुंरीतियों-कुत्साओं के विषदंश से विमूच्छित मनुष्यता को मर्मन्तुद जर्जरता को उन्मूलित करने का उसका उत्साह उत्तरोत्तर अदम्यतर होता जाता है । मानवता के प्रति उपन्यासकार की यह मांगलिक निष्ठा इस उपन्यास को एक श्रेष्ट कृति की कोटि में प्रतिष्ठित करती है ।
    प्रज्ञापटु कथाशिल्पी श्री जियालाल आर्य के इस उपन्यास में पाठकों को बाँध लेने की अदभुत क्षमता है । अपनी हर अगली पंक्ति के लिए पाठकों का औत्सुक्य अक्षुष्ण रखने की कला में कथाकोविद श्री आर्य को पूर्ण प्रवीणता प्राप्त है । जिसके साथ में यह उपन्यास जाएगा, वह इसे अथ से इति तक पढे बिना नहीं ही छोड़ेगा, यह मेरा अनुभूत अभिमत है ।
    -डॉ० कुणाल कुमार
  • Sant Naamdev
    Hari Krishna Devsare
    120 108

    Item Code: #KGP-9324

    Availability: In stock

    नामदेव महाराष्ट्र के संतों में सबसे वरिष्ठ थे। मराठी भाषा में ‘अभंग’ नामक छंद में रचना करने वाले प्रथम संत कवि नामदेव ही थे। उनका कार्यक्षेत्र केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपनी भक्ति-रचनाओं ‘अभंगों’ के द्वारा उत्तर भारत में पंजाब तक भक्ति-मार्ग का प्रचार किया। माधव गोपाल देशमुख लिखते हैं ‘‘नामदेव एक सामासिक शब्द है और उसका अर्थ है नाम ही देव है।’’ संत नामदेव ने अपनी संपूर्ण रचना में नाम ही महिमा जितने ढंग से और जैसे वर्णन की है, वह शायद ही किसी और संत ने की हो-
    नाम में ही नारायण है। वह भक्तों के अधीन है।
    भक्ति न मांगकर। नाम में ही चारों मक्ति हैं।
    नाम न भूलो। वही स्वर्ग में निशान है।
    नामा कहते हैं ऐसे प्राणी। नारायण में जाकर समान हो जाते हैं।

    जो वाणी से नाम लेता है, उसे यमदेव वंदन करते हैं।
    कालादिक उसे समान रूप से वंदन करते हैं।
    ऐसा नाम श्रेष्ठ है सबमें वरिष्ठ है।
    (नाम के) अच्छे उच्चारण से स्वर्ग गूंजता है।
    उस नाम-महिमा का वर्णन ब्रह्मा करने गए।
    उन्हें आदि-अंत की उपमा ही नहीं सूझी
    नामा कहता है कि पाठ से, नामा की ही राह से 
    प्रत्यय प्रकट होता है विट्ठल हरि।।

    —इसी पुस्तक से
  • Janmanmayi Subhadra Kumari Chauhan
    Rajendra Upadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-180

    Availability: In stock


  • Bankon Mein Dvibhashi Computerikaran : Dasha Aur Disha
    Jayanti Prasad Nautiyal
    245 221

    Item Code: #KGP-675

    Availability: In stock

    बैकों में द्विभाषी कंप्यूटरीकरण
    दशा और दिशा
    हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर पर कार्य करने हेतु उपलब्ध सुबिधाओं की अद्यतन जानकारी से युक्त यह पुस्तक विद्वान् लेखक के गत तीस वर्षों के भाषा प्रौद्योगिकी के अनुभव पर आधारित है।
    कंप्यूटर विज्ञान पर अंग्रेजी भाषा में बहुत-सी पुस्तकें है, परंतु हिंदी में कंप्यूटर जैसे विषय पर प्रामाणिक पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। इस अभाव की पूर्ति करने का विनम्र प्रयास है या पुस्तक। 
    यह पुस्तक कंप्यूटर जगत विशेषज्ञों द्वारा सामग्री को जाँच के बाद भारतीय रिजर्व बैंक, कृषि बैंकिंग महाविद्यालय की हिन्दी में मौलिक पुस्तक लेखन योजना के अंतर्गत प्रकाशित है। इसकी प्रामाणिकता और उपयोगिता का इससे बडा प्रमाण और क्या हो सकता है।
    इस पुस्तक में कंप्यूटर के माध्यम से हिंदी में तथा भारतीय भाषाओं में काम करने संबंधी उपलब्ध सुविधाओं, विभिन्न सॉफ्टवेयरों, पैकजों, उपकरणों पर प्रामाणिक एवं अद्यतन जानकारी दी गई है । इसमें नवंबर, 2007 तक हुए कंप्यूटर संबंधी समस्त विकास एवं सूचनाएँ और शोधपरक सामग्री समाहित हैं। माथ ही कंप्यूटर के भाषायी अनुप्रयोग संबंधी विभिन्न विषयों पर गभीर विवेचन है ।
    यह पुस्तक सभी बैकों के कर्मचारियों तथा अधिकारियो, उनके राजभाषा विभागो के कर्मचारियों व अधिकारियों, सभी विश्वविद्यालयों के बैंकिंग वाणिज्य व हिंदी में अध्ययनरत विद्यार्थियों व प्राध्यापकों, भारत सरकार के सभी कार्यालयों, सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों, भाषाविदों, भाषा प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों, अनुवाद विज्ञान व अनुवाद में हर स्तर के पाठयक्रम में अध्ययन-अध्यापन में कार्यरत अध्यापको एवं विद्यार्थियों कंप्यूटर निर्माण में लगे सभी सॉफ्टवेयर निर्माताओं, कंप्यूटर में नीति निर्माताओं व निरीक्षण से जुडे कार्मिकों और भाषा तथा कंप्यूटर से सरोकार रखने वाले आम पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है ।

  • Haadase Aur Hausle
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-8001

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार हैं । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती हैं कि कहानी पाठक को आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझतीं ।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हुई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानियां ।

  • Mere Saakshatkaar : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    350 280

    Item Code: #KGP-616

    Availability: In stock


  • Satta Ke Nagaare
    Alok Mehta
    595 536

    Item Code: #KGP-229

    Availability: In stock

    लोकतंत्र में राजनीति हर ताले की चाबी मानी जाती है। राजनीति का जितना ज्ञान महानगरों में रहने वाले विश्लेषकों, कंप्यूटर पर आंकड़ों की जोड़-तोड़कर चुनावी भविष्यवाणी करने वालों, अर्थशास्त्रियों, राजनयिकों या प्रकाड पत्रकारों को होता है, उससे अच्छी व्यावहारिक समझ सुदूर गांवों में रहने वाले गरीब पिछड़े-अर्द्धशिक्षित भलेमानुष की होती है। गांव की पंचायतों में राजनीति चैपड़ की पकड़ अधिक अच्छी होती है। उन्हें मालूम है कि सत्ता के नगाड़े कब और क्यों बजते हैं। सत्ता के अनंत विस्तार को मरुस्थल भी कहा जा सकता है और अथाह सागर भी। राम राज्य रहा हो या महाभारत काल, ब्रिटिश राज रहे या अमेरिका से अभिभूत रहने वाली सत्ता-व्यवस्था राजनीति का लावा कभी ठंडा नहीं होगा।
    पत्रकारिता का दायित्व यही है कि अपने पाठकों को हर समय राजनीति के अमृत और विषय का सही आकलन करके बाता रहे। पिछले वर्षो के दौरान इस कड़वे सच को पेश करते रहने से जहां पाठकों का अधिकाधिक स्नेह और समर्थन मिला, वहीं कई राजनीतिज्ञ नाराज भी होते रहे। लेकिन हमारा कर्तव्य समाज और सत्ता की पहरेदारी करना है। इसलिए किसी की खुशी या किसी की नाराजगी की चिंता नहीं कर सकते। सत्ता के नगाड़े इस तरह बजने चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक समाज जागता रहे और अच्छे पके हुए फल उसे मिलते रहें। इस संकलन में पिछले वर्षो के दोरान सत्ता के इर्द-गिर्द चलते रहे घटनाचक्रों पर लिखी गई टिप्पणियां शामिल हैं। एक तरह से यह इतिहास के कुछ पन्नों को संजोकर रखने का प्रयास मात्र है। आज ऐसी टिप्पणियों पर चाहे जैसी खट्ठी-मीठी प्रतिक्रियाएं हों, राजनीति के दूरगामी परिणाम समझाने वालों के लिए ये सदैव उपयोगी साबित हो सकती है। 
  • Akshardveep
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    425 383

    Item Code: #KGP-2013

    Availability: In stock

    अक्षरद्वीप
    अक्षरद्वीप’ आज के मूल्यों के अंतर्गत रामकथा के ‘सुंदरकांड’ का एक पुनर्पाठ है। इस उपन्यास में वैदेही, रावण और महावीर की भूमिकाएँ जिन सीमाओं तक संघातपूर्ण हैं, वे आज के अतिरिक्त अतीत की भी पहचान हैं। यह मनुष्य का निरंतर जारी एक असमाप्य प्रयास है। अगर आज हम ‘अक्षरद्वीप’ की कथाभूमि को कुछ सीमा तक व्याख्यायित कर पाए, कथाकार शायद किसी न किसी तरह पंक्ति-दो पंक्ति तक कुछ आगे निकल गया।
    प्रणव कुमार वंद्योपाध्याय आज के तमाम हिंदी कथाकारों में कहाँ खड़े हैं, कहना कठिन होगा। फिर भी, हम कह सकते हैं कि आज के परिप्रेक्ष्य में लेखक को मनुष्य और समय की पहचान किसी सीमा तक आकर खड़ी हो गई। कल की प्रतीक्षा में। संभवतः किसी न किसी प्रकार की लाग-लपेट के बिना कथाकार अपनी खोज से उस बिंदु तक पहुँच गया, जो है संसार का आदि आख्यान। असमाप्य भी।
    अक्षरद्वीप’ किसी हद तक मनुष्य की एक यात्रा भी है। यात्रा के अतिरिक्त पृथ्वी का एक अनकहा इतिहास भी, जो प्रतिक्षण अपना सब कुछ बदल रहा है।
  • Swasthya Gyan
    Dr. Rakesh Singh
    190 171

    Item Code: #KGP-722

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य-ज्ञान
    पुस्तक में स्वास्थ्य से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर लगभग  35 लेख संकलित हैं । जो लोग यह कहते  हैं की चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम में ही पढाया जा सकता हैं, उनके लिए वे लेख चुनौती है और सिद्ध करते है कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा कै। उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को  माध्यम से पढाया जा सकता है । 
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है । इन लेखों में अधिकांशतः इस बात को ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग  दवाओं का नाय याद कर लेते है और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते है । उससे कितनी हानि हो सकती है, यह 'दवाओ के उपयोग में सावधानियाँ' शीर्षक से स्पष्ट हैं । इसी प्रक्रार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारना से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है । 'ह्रदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हदय- रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है । इसमें अधुनातन  चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है । अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-सम्पन्न है । कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्य एवं उनके सफल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतिक है ।
  • Kahani Samgra : Govind Mishra (2nd Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1582

    Availability: In stock


  • Main Aur Meri Shrimati
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    100 90

    Item Code: #KGP-7813

    Availability: In stock


  • Yahin Kahin Hoti Thi Zindagi
    Ajeet Kaur
    300 270

    Item Code: #KGP-9218

    Availability: In stock

    अजीत कौर की अपनी एक खास ‘कहन’ है, जिसके कारण उनकी कहानियां बहुत सादगी के साथ व्यक्त होती हैं और पाठकों की संवेदना में स्थान बना लेती हैं। ‘यहीं कहीं होती थी जिंदगी’ उनका नया कहानी संग्रह है। पंजाबी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां विषयवस्तु से नयापन लिए हैं और शिल्प के एतबार से पाठक को अजब सी राहत देती हैं। एक एक महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह है, न केवल पठनीयता से समृद्ध है बल्कि एक दार्शनिक वैचारिक संपदा से भी संपन्न है। अजीत कौर की रचनात्मक सुघड़ता तो सर्वोपरि है ही।
  • Ek Na Ek Din
    Rajni Gupt
    600 510

    Item Code: #KGP-220

    Availability: In stock


  • In Dinon
    Vinita Gupta
    60

    Item Code: #KGP-1909

    Availability: In stock

    इन दिनों
    ग़ज़लों में छन्द का अनुशासन काकी दूर तक दिखाई देता है । इसके साथ-साथ ग़ज़ल के मुहावरे, व्याकरण, अंदाज़े-बयां, भाषा और विभिन्न बहरों को भी अपने जीवनानुभव तथा अभ्यास से उपलब्ध करने की सफ़ल कोशिश है । ग़ज़लों में एक ओर व्यक्तिगत अनुभूतियों तथा राग-विराग की स्थितियों के प्रस्तुति है तो दूसरी ओर समष्टिगत वेदनाएं, व्यथाएँ भी अंकित हुई हैं। विनीता के पास हिन्दी मुहावरे और शब्दावली का भण्डार तो है ही, उर्दू का रंग भी देखने को मिलता है । हिंदी, उर्दू के सहीं अनुपात ने इन ग़ज़लों को और भी निखार दिया है ।
  • Su-Raaj
    Himanshu Joshi
    80 72

    Item Code: #KGP-2105

    Availability: In stock

    सु-राज
    तीन अलग-अलग उपन्यासिकाएँ होने के बावजूद, कहीं ये एक ही तसवीर में समाई तीन अलग-अलग तसवीरें हैं। रूप, रंग, भावभूमि और निरूपण, सब अलग- अलग हैं। अलग-अलग हैं इनकी पृष्ठभूमियाँ । हिमालय का कुमाऊँनी क्षेत्र है, तराई की अभिशप्त धरा और पश्चिमी नेपाल का अत्यंत पिछड़ा अंचल । अनेक अंतर्विरोध हैं, परन्तु इन भिन्नताओं के बावजूद भी कहीं घोर अभिन्नता । यों अभाव, अन्याय से उपजा मानव-मात्र का संत्रास सम्पूर्ण विश्व में सर्वत्र समान है । यंत्रणाएँ समान हैं ! रूप और आकार में अंतर हो सकता है, परन्तु मनुष्य, सर्वत्र मनुष्य ही है, उसकी वेदना भी सर्वत्र उसी की वेदना है । उसे देश, काल, रूप, रंग, धर्म, भाषा से विभाजित नहीं किया जा सकता ।
    संघर्षरत 'सु-राज' के गांगि 'का हों, या अन्याय की आग में धधकता 'अंधेरा और' का परसिया या 'काँछा' उपन्यासिका का नायक सुदूर नेपाल का अनाथ श्रमिक शिशु काँछा, अपने अस्तित्व के लिए जूझते ये पात्र, मात्र पात्र ही नहीं, तिल-तिल मरकर कहीं अपने समय के 'काल-पात्र' भी हैं ।
    साहित्य में हिमांशु जोशी ने नए-नए प्रयोग किए हैं, उनका एक उदाहरण है यह कृति, जो अतिशय द्रावक ही नहीं, दाहक भी है।
  • Kavya Shatabdi
    Anamika
    350 315

    Item Code: #KGP-789

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।
  • Computer Yaani Masheeni Dimaag
    Shuk Deo Prasad
    125

    Item Code: #KGP-1159

    Availability: In stock

    कम्प्यूटर यानी एक मशीन —'मशीनी दिमाग' (Electronic brain) , जिसके अंदर बिछा होता है अनगिनत तारों का मायाजाल। 
  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain
    Kunwar Narayan
    190 171

    Item Code: #KGP-444

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।
  • Shaayad Vasant
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    100 90

    Item Code: #KGP-1920

    Availability: In stock

    शायद बसंत
    उत्तर कोरिया सामाजिक या आर्थिक रूप में एक बहुख्यात देश तो नहीं है, लेकिन उसकी राजनीति और व्यवस्था की अपनी पहचान है । जापानी और अमेरिकी सामरिक शक्तियों के विरुद्ध रक्तिम संघर्षों ने उस देश को जख्मी जरूर किया है, लेकिन वहाँ अब स्थापित है आत्मविश्वास से भरपूर एक प्रगतिशील राष्ट्र । वहाँ सामान्य रूप में पर्यटकों के जाने को अनुमति अवश्य नहीं है, किंतु मित्र देशों के कुछ बुद्धिजीवी समय-ममय पर आमंत्रित किए जाते रहे है । ऐसे ही एक अवसर पर कवि-कथाकार प्रणवकुमार वंद्योपाथ्याय उत्तर कोरिया  की यात्रा पर जाकर वहाँ के पहाडों, दर्रों, नगरों और गाँवों में घूमते रहे । उस यात्रा की साहित्यिक फसल है शायद वसंत, जो अनौपचारिक डायरी के पन्नों से निकलकर अब प्रस्तुत है एक पुस्तक के रूप में ।
    उत्तर कोरिया पर हिंदी में यह पहली पुस्तक है, जो पाठकों को उस देश की भूमि, पहाड़, समुन्द्र और मनुष्य की आंतरिक बनावट से एक अगम्य अनुभव के साथ परिचित कराती है ।
  • Kashmkash
    Manoj Singh
    520 468

    Item Code: #KGP-846

    Availability: In stock


  • Mans Ka Dariya
    Kamleshwar
    80 72

    Item Code: #KGP-9061

    Availability: In stock


  • Bhasha-Praudyogiki Evam Bhasha-Prabandhan
    Prof. Surya Prasad Dixit
    550 495

    Item Code: #KGP-738

    Availability: In stock

    भाषा-प्रौद्योगिकी एवं भाषा-प्रबंधन
    हिंदी भाषा-साहित्य को प्रौद्योगिकी रूप में सुगठित करना और प्रबंध-विज्ञान के सहारे संपूर्ण देश में उसे कार्यान्वित करना संप्रति बहुत बड़ी चुनौती है। पहली आवश्यकता यह है कि भाषा-प्रौद्योगिकी का एक व्यावहारिक शास्त्र बनाया जाए और फिर उसकी प्रविधि तथा प्रक्रिया का परिविस्तार किया जाए। भारत की भाषा-समस्या का निराकरण विधवा-विलाप से नहीं होगा, बल्कि वह संभव होगा विधेयात्मक वैकल्पिक परिकल्पनाओं से। ऐसी ही कुछ वृहत्तर परिकल्पनाओं से उपजी है यह पुस्तक।
    इसमें हिंदी की भाषिक प्रकृति तथा संस्कृति पर विचार करते हुए भाषा के विभिन्न चरित्रों की मीमांसा की गई है। राजभाषा, संपर्क-भाषा, शिक्षण-माध्यम-भाषा, संचार-भाषा और कंप्यूटर-भाषा की शक्ति तथा सीमाओं का विश्लेषण करते हुए यहाँ लेखक ने अनुवाद, वेटिंग, अनुसृजन, पारिभाषिक शब्दावली, संकेताक्षर, दुभाषिया प्रविधि, डबिंग, मीडिया-लेखन, संभाषण-कला, रूपांतरण, सर्जनात्मक लेखन, पत्रकारिता, नाट्यांदोलन, प्रचार- साहित्य-लेखन, कोश-निर्माण, ज्ञान-विज्ञानपरक वैचारिक लेखन, देहभाषा, यांत्रिक भाषा, लोक वाङ्मय, शोध समीक्षा, प्राध्यापन, भाषा-शिक्षण, इतिहास-दर्शन, प्रकाशन, परीक्षण, विपणन, संगोष्ठी-संयोजन, लिपि के मानकीकरण, विभाषाओं के संरक्षण तथा इन विचार-बिंदुओं से जुड़े तमाम पक्षों का बारीक विश्लेषण किया है।
    प्रस्तावना, भाषा-प्रौद्योगिकी, भाषा-प्रबंधन और समाहार नामक चार स्तंभों पर आधारित यह कृति हिंदी भाषा-साहित्य का एक नया ढाँचा निर्मित करने हेतु कृतसंकल्प रही है। इसका अनुगमन करते हुए इस ढाँचे को जन-सहभागिता के सहारे भव्य प्रासाद का रूप दिया जा सकता है। यही आह्नान एक-एक अध्याय में किया गया है। अस्तु, यह मात्रा लेखन मात्रा न होकर समग्रतः एक सुनियोजित भाषांदोलन है। एक रचनात्मक महानुष्ठान !
  • Neend Se Pahale
    Soma Bharti
    195 176

    Item Code: #KGP-373

    Availability: In stock

    नींद से पहले
    सोमा भारती की कहानियां हमें उस जानी-पहचानी निम्न- मध्यमवर्गीय दुनिया में ले चलती हैं, जिनसे हम जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जिन्हें हम देखकर भी अनदेखा किए रहते हैं।
    इनके पात्र, चाहे वह ‘जस्सो मासी मर गई’ की जस्सो मासी हों या ‘नींद से पहले’ के रमापति, ‘किराये के मकान’ की पेइंग गेस्ट हो या कोई अन्य, मोमबत्तियों की तरह हवाओं में जूझते, जलते-गलते रहते हैं। वे आपसे दया की भीख नहीं मांगते, लेकिन समय, संयोग और नियति ने उन्हें जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, उसका दीदार जरूर कराती हैं कि देखो, यह मैं हूं, यह तुम भी हो सकते थे।
    सोमा ने अभिनय और एंकरिंग आदि अभिव्यक्ति के जिन मंचों पर काम किया है, उसका लाभ उनकी भाषा-भंगिमा, भाव और बोध को मिला है। कहानियों के रचाव-रसाव के लिए सोमा को किसी सायासता की जरूरत नहीं पड़ती, भाषा-शिल्प के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते, न ही चैंकाने वाले चमत्कारों के टोने-टोटके टटोलने की आवश्यकता होती है। कहानियों की सहज संवेदना ही उनकी शक्ति है, जिनकी तासीर खुद-ब-खुद आपको पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
    सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ! सोमा ने दूसरी कहानियां न भी लिखी होतीं, उनकी अकेली कहानी ‘जस्सो मासी मर गई’ ही उन्हें अमर बना सकती है।
    --संजीव
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-4)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1579

    Availability: In stock


  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Jaishankar Prasad
    Jaishankar Prasad
    180 162

    Item Code: #KGP-9158

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं जयशंकर प्रसाद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘आकाश-दीप’, ‘ममता’, ‘आंधी’, ‘मधुआ’, ‘व्रत-भंग’, ‘पुरस्कार’, ‘इंद्रजाल’, ‘गुंडा’, ‘देवरथ’ तथा ‘सालवती’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Vaigyanikon Ki Batein (Paperback)
    Shuk Deo Prasad
    50

    Item Code: #KGP-7085

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Sant Malook Granthawali
    Baldev Vanshi
    600 540

    Item Code: #KGP-119

    Availability: In stock

    संत मलूक ग्रंथावली
    संतों की दुनिया सहज, सरल, चैतन्य और प्रकाश की दुनिया है । ढोंग, दिखावा, छल, छद्म और मिट्टी की दुनिया के विपरीत उन्होंने मानवीय, संवेदनशील, जीवंत दुनिया के निर्माण में अपनी सारी सामर्थ्य  लगा दी है । कबीर, रैदास, नानक, दादू की भाँति संत मलूकदास भी आजीवन इसी पथ पर बढते रहे । मानवीयता, अध्यात्म, हिन्दू-मुस्लिम एकात्मता एवं जाति-पांती के विरुद्ध संदेश देते रहे ।
    जब हर श्वास स्वयं ही रामकाज में लग जाए, अजपा जाप चलने लगे, इसके बाद ऐसी स्थिति आती है—आराध्य और आराधक एकमेक हो जाएं । व्यक्ति मनुष्य से देवता बन जाता है । व्यक्ति-त्वांतरण हो जाता हे। मलूकदास ने यह स्थिति सहज ही उपलब्ध कर ली । अब राम उनका जप या सुमिरन कर रहे है :
    माला जपों न कर जपों, जिभ्या कहों न राम । 
    सुमिरन मेरा हरि करै, मैं पायो विस्राम॥ 
    मनुष्य की प्राकृतिक ऊर्जा, अंतर्निहित परमात्म- शक्ति-इनकी प्राप्ति से भौतिक जीवन का सुधार, यहीं महालक्ष्य है मलूक की वाणी का । यानी मानव के जीवन को सर्वांगरूप से अनुभूत्तिपूर्ण बनाना और सुधारना । एक बेहतर मानवीयता को धरती पर सुलभ बनाना ।
  • Bharat : Tab Se Ab Tak
    Bhagwan Singh
    325 293

    Item Code: #KGP-9124

    Availability: In stock

    भगवान सिंह ने कविता, कहानी, व्यंग्य, आलोचना, उपन्यास, भाषा-समस्या जिस भी विषय पर लिखा है, उसमें उनका एक नया तेवर रहा है। उनका एक उपन्यास तो हिंदी के सबसे चर्चित और विवादित उपन्यासों में आता है। परंतु इतिहास पर उनका लेखन जितना विचारोत्तेजक और क्रांतिकारी माना गया है, उसकी तुलना उनके अन्य किसी विधा में किए गए लेखन से नहीं की जा सकती। व्यावसायिक इतिहासकार न होते हुए भी उन्होंने प्राचीन इतिहास की जड़ीभूत मान्यताओं को खंडित करते हुए इसकी गहनता, व्याप्ति और दिशा सभी को बदला है और इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों और मनस्वी पाठकों के बीच उसका स्वागत हुआ है।
    प्रस्तुत संग्रह में भी इतिहास पर लिखे गए उनके कुछ ऐसे लेख हैं, जिन्होंने पाठकों और श्रोताओं को उद्वेलित और प्रेरित किया है और उनको पुनर्विचार के लिए बाध्य किया है। साथ ही कुछ ऐसे नए लेख भी हैं, जो इससे पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुए हैं। इनके कारण निबंधों का समग्र फलक बहुत व्यापक हो गया है। जहां कुछ लेखक एक ऐसे अतीत में ले जाते हैं, जहां प्रकाश की कोई अन्य किरण आज तक पहुंच नहीं पाई थी और जिससे आज के दस-बीस हजार या इससे भी पहले की मानसिक ऊहापोह पर हलका और कुछ रंगीनी-भरा प्रकाश पड़ता है, वहीं ऐसे लेख भी हैं, जो ठीक आज की समस्याओं या वर्तमान के अतीत और वर्तमान दोनों की, तीखी पड़ताल करते हैं।
  • Himanshu Joshi Rachana Sanchayan
    Himanshu Joshi
    995 896

    Item Code: #KGP-589

    Availability: In stock


  • Rangon Ki Gandh-2
    Govind Mishra
    595 536

    Item Code: #KGP-9161

    Availability: In stock

    रंगों की गंध

    यात्रा जीवन के दूसरे अनुभवों से थोड़े अलग किस्म का अनुभव है। जहां दूसरे अनुभव हमें साफ-साफ जोड़ते-तोड़ते हैं, अपनी अंतरंगता में चरमरा डालते हैं या फिर सूखा-सूखा और दूर-दूर रखते हैं...वहां यात्रा दूसरी रखते हुए भी पास लाती हे, हम अपने खोल से बाहर निकलकर संसार की व्यापकता को छूते होते हैं। व्यापकता की यह छांह दुखी व्यक्ति को टूटने से बचाती है। स्वयं से थोड़ा वैराग्य और बाहर से जुड़ना दोनों एक साथ होता चलता है। मेरे लिए जो इससे बड़ी बात है, वह यह कि यात्रा में हम चलते हैं, हर हाल में चलते रहना-यह मेरी जिद दृढ़तर करती है यात्रा।
    -गोविन्द मिश्र
  • Yuva Sanchetna
    Prem Vallabh Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-9132

    Availability: In stock

    युवा संचेतना
    यह युग प्रगतिवादी युग है । उत्थान का युग है विज्ञान का युग है, नवीन चेतना और स्फूर्ति का युग है । अत: मानसिक शक्तियों के जगाने का समय है। इस युग की धारा विद्युत् गति से भी तेज बह रही है । मनुष्य जल, थल, नभ में स्वच्छन्द विचरण कर रहा है और प्रकृति, आकाश, पाताल पर दिन-रात अधिकार जमाता जा रहा है । वह शक्ति की खोज में आकाश-पातालको एक करता जा रहा है । अत: आप अपने को इन सबसे अलग रखकर प्रसन्न और सुखी अनुभव नहीं कर सकते।
    (इसी पुस्तक से)
  • Chhuttiyan
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-2095

    Availability: In stock

    छुट्टियाँ
    पूरी मनाली एक अनपढी पुस्तक की भांति सामने खुली थी । इसे कितनी ही बार पढ़ो, हर बार यह बिलकुल ताजी, अनछुई-सी जान पड़ेगी, विद्रोही जी ने सोचा । फिर मीरा को इशारे से बताया, “वह देख रही हो—नीचे, सामने, उधर दूर पर, वो पतली-सी सड़क । हाँ, हाँ, वही, जिस पर अभी एक मोटर आती दिखाई दी थी । वह कुल्लू-मनाली सड़क है । उसी से होकर कल शाम हम यहीं पहुँचे थे... " 
    सफ़रनामे, कहानी, कविता, फंतासी, रपट और व्यंग्य आदि विधाओं को अपने  में घुलाती-मिलाती अजितकुमार की यह प्रथम औपन्यासिक रचना 'छुट्टियाँ' उसी अर्थ में एक उपन्यास है, जिसमें अजितकुमार के लिए 'कविता के रूप में प्रस्तुत प्रत्येक रचना कविता है और वह भी कविता है जो भले ही उस रूप में न प्रस्तुत की गई हो पर किसी को कविता प्रतीत हो ।'
    साहित्यिक विधाओं की परस्पर घुसपैठ के इस युग में, जब उपन्यास की अलग पहचान गुम हो चली हो और वह ऐतिहासिक, सामाजिक, जासूसी, फुटपाथी आदि शिकंजों में फाँस दिया गया हो. 'छुट्टियां' प्रमुखत: कुतूहल पर आधारित है, बावजूद इस भय के कि हिंदी के अतिवृद्ध और अकालवृद्ध परिवेश में, उसे बालोपयोगी या किशोरोपयोगी समझ लिया जाएगा ।
  • Is Khirki Se
    Ramesh Chandra Shah
    425 383

    Item Code: #KGP-711

    Availability: In stock

    इस खिड़की से
    ‘इस खिड़की से’...यानी ‘अकेला मेला’ के ही नैरंतर्य में एक और मेला, एक और समय-संवादी आलाप...जो एकालाप भी है, संलाप भी, मंच भी, नेपथ्य भी...
    ‘अकेला मेला’ देखते-सुनते-गुनते...कुछ प्रतिध्वनियाँ ...कतिपय पाठक-समीक्षक मंचों से...अब इस खिड़की से जो दिखाई-सुनाई देने वाला है--मानो उसी की अगवानी में।
    ०० 
    डायरी-लेखन को साहित्य का गोपन कक्ष कहना अतिशयोक्ति न होगी।...काफ्का, वाल्टर बेन्यामिन जैसे कई लेखकों ने डायरी विधा के अंतर्गत श्रेष्ठ लेखन किया। मलयज या निर्मल वर्मा की डायरी उनके समस्त लेखन को समझने का उचित परिप्रेक्ष्य देती है। डायरी- लेखन की इसी परंपरा में नई प्रविष्टि है रमेशचन्द्र शाह की डायरी ‘अकेला मेला’। इस डायरी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि लेखक में कहीं भी दूसरों को बिदका देने वाली आत्मलिप्तता नहीं। 
    --हिंदुस्तान 
    शाह केवल डायरी नहीं लिखते, वे अपने समय से संवाद करते दिखाई देते हैं। उनकी डायरी की इबारतें ऐसी हैं कि एक उज्ज्वल, संस्कारी अंतरंगता मन को छूती हुई महसूस होती है।...यह डायरी एक ऐसा ‘ग्लोब’ भी बनकर सामने आती है, जो मनुष्य की बनाई सरहदों को तोड़ती हुई शब्द-सत्ता का संसार रचती है, जिसमें दुनिया के महान् रचनाकारों की मौजूदगी को भी परखा जा सकता है। डायरी में शाह ने अपने विषय में अपेक्षाकृत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है, वह एक विनम्र लेखक की शाइस्ता जीवन-शैली की ही अभिव्यक्ति है।
    --कादम्बिनी
    एक अकेला लेखक कितनी तरह के लोगों के मेले में एक साथ! कितनी विधाओं और कृतियों में एक साथ!...और कितनी आत्म-यंत्रणाओं और मंत्रणाओं में एक साथ!
    --जनसत्ता
  • Maanvadhikaron Ka Bhartiya Parivesh
    Ram Gopal Sharma 'Dinesh'
    140 126

    Item Code: #KGP-521

    Availability: In stock

    मानवाधिकारों का भारतीय परिवेश
    संसार के सभी मनुष्यों को जीवन-रक्षा, स्वतंत्रता, समानता, शिक्षा, शोषण-विरोध और न्यायगत समता का जन्मसिद्ध अधिकार है। भारत में वेद- वेदांग, काव्य, दर्शन, आचारशास्त्र आदि विभिन्न रूपों में इन अधिकारों की रक्षा का नैतिक दायित्व समाज को सौंपते रहे हैं। स्वाधीनता-प्राप्ति के पश्चात् निर्मित भारतीय संविधान में भी नागरिकों के मूल मानवाधिकारों का उल्लेख किया गया है। पाश्चात्य देशों में उपनिवेशवादी आचरण के कारण मानवाधिकारों की धारणा को ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ के माध्यम से 19 दिसंबर, 1948 ई. को कानूनी रूप मिला। उसके पश्चात् विश्व-भर में मानवाधिकार- सुरक्षा के प्रयत्न हुए। भारत में भी सन् 1993 ई. में मानवाधिकार-संरक्षण कानून बना। सन् 2006 ई. में उसमें कुछ संशोधन भी किए गए।
    स्पष्ट है कि विश्व-संगठन तथा राष्ट्रीय स्तर पर सभी भारतीय नागरिकों को समान मानवाधिकार प्राप्त हैं; किंतु उनकी जानकारी और चेतना का सर्वत्र अभाव दिखाई देता है। इस पुस्तक में उसी अभाव की पूर्ति करने का एक लघु प्रयास किया गया है। मानवाधिकारों के संबंध में ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ की घोषणा से पूर्व की ऐतिहासिक, नैतिक तथा सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं का उल्लेख एवं भारतीय जनतंत्र में उनकी वर्तमान स्थिति का आकलन पुस्तक का मुख्य अभिप्रेत है। अतः संदर्भानुसार समाज के विभिन्न वर्गों की मानवाधिकारों से संबद्ध स्थितियों पर भी प्रकाश डाला गया है तथा यह स्पष्ट करने की भी चेष्टा की गई है कि मानवाधिकार कर्तव्य-निरपेक्ष नहीं होते, उनका वैयक्तिक तथा सामाजिक नैतिकता से गहरा रिश्ता होता है।
  • Toro Kara Toro-1 (Nirman)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-1574

    Availability: In stock


  • Yugdhvani
    Bal Swaroop Raahi
    250 225

    Item Code: #KGP-807

    Availability: In stock

    लोकप्रियता की युगधवनि
    बालस्वरूप राही की ये कविताएं उस यादगार दौर की कविताए हैं, जब कविता के पाठक तथा श्रोता रसज्ञ तथा संवेदनशील हुआ करते थे और युवक-युवतियों में विशेष रूप से कविता के प्रति गहरा लगाव होता था। इन कविताओं को पढ़-पढ़ कर प्रौढ़ता की ओर अग्रसर हो रहे कविता-प्रेम भी पुन: युवा को जाया करते थे। आज को लगभग पांच दशक पहले भी राही की रुबाइयों, ग़ज़लों, गीतों तथा लम्बी कविताओं में यही खूबी थी। इन पंक्तियों के लेखक ने वह ज़माना देखा है, जब मंच से सुनाए जाने पर ये कविताएं श्रोताओं के मन-प्राण पर अंकित हो जाया करती थीं और उन की डायरियों में दर्ज हो जाती थीं। घनघोर रूप से पसन्द की जाने वाली उन की अनेक कविताएं देश- भर में काव्य-प्रेमियों को कंठस्थ है ।
    प्रसन्नता की बात है कि राही की ऐसी विविध आयामी परम लोकप्रिय कविताएं, जो अब तक उन के किसी संकलन में नहीं आई थीं और कविता-प्रेमियों  द्वारा जिन के प्रकाशन की मांग निरन्तर की जा रही थी, अब पुस्तकाकार प्रकाशित हो रही हैं।
    देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओँ में एक के बाद एक प्रकाशित होने वाली ये अविस्मरणीय कविताएं न केवल राही की लम्बी सार्थक काव्य-यात्रा में मील के पत्थर के समान हैं, वरन् पिछले पांच दशकों में हिन्दी-कविता के बदलते रूप-रंग तथा मिजाज़ की भी पुख्ता पहचान कराती हैं।
    राही का यह अनूठा काव्य-संकलन 'युगध्वनि' हिन्दी कविता की लोकप्रियता के इतिहास को समझने के इच्छाओं तथा काव्य-प्रेमियों के लिए सचमुच एक तोहफे के समान है।
  • Karmveer Pt. Sunderlal : Kuch Sansmaran
    Sudhir Vidyarthi
    125 113

    Item Code: #KGP-1964

    Availability: In stock


  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-637

    Availability: In stock

    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
  • Chunmun Aur Gopa
    Tanu Malkotia
    40

    Item Code: #KGP-1239

    Availability: In stock


  • Antim Padaav
    Hari Yash Rai
    180 162

    Item Code: #KGP-1825

    Availability: In stock

    अंतिम पड़ाव
    आज हम समय के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें दुनिया की बढ़ती समृद्धि और वैभव की सर्वभक्षी आकांक्षा सुकून देने के बजाय बेहद डराने वाली है। इस दौर में मनुष्यता का विघटन और क्षरण इतनी तेज़ी से हो रहा है कि सारा वैभव-प्रसार, पुरानी प्रतीकात्मक मिथकीय भाषा में कहूँ तो आसुरी लगता है। यह मात्र संयोग नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध है कि ‘ताकतवर’ होते मध्यवर्ग की निगाह को पूँजी की ताकतों ने उन सवालों की ओर से फेर देने में लगभग ‘सफलता’ हासिल कर ली है, जो कभी मनुष्यता की तरफदारी में हर गली-चैराहे को अपनी आवाज़ से गुँजाते थे। गनीमत है कि ऐसे क्रूर दौर में भी कुछ लोग हैं जो साहित्य, संस्कृति, कला और राजनीति में एक ज़िद के साथ मनुष्यता, नैतिकता और न्याय के सरोकारों के पास से न हटने का हठ ठाने हुए हैं। कथाकारों की ऐसी पाँत में हरियश राय का नाम तेज़ी से उभर रहा है, जो कहानी- कला की बारीकियों की ज़्यादा परवाह न करके मनुष्यता के पक्ष में जी-जान से खड़ा है। 
    हरियश अपनी कहानियों के लिए कथा-सामग्री का चयन रोज़मर्रा की उस उपेक्षित-तिरस्कृत दुनिया के अनुभवों के बीच से करते हैं, जो अब सामान्यतया अघाए लोगों के लिए सोच-विचार तक की चीज भी नहीं रह गई है। वे लगातार कोशिश करते रहे हैं कि अपने मध्यवर्गीय जीवन की सँकरी-सिकुड़ी चैहद्दियों को छोड़कर उन किसानों की ज़िंदगी के विस्तृत मैदान में जाएँ, जहाँ आज भी सबसे बड़ा सहारा धरती, सूरज, चाँद और वर्षा का है। दुनिया के बदल जाने और एक विश्वग्राम बन जाने के कनफोड़ू शोर में कितना ठहराव है, यह उनकी कहानियाँ पढ़कर जाना जा सकता है। यह ठहराव एक वर्ग और जगह का नहीं है। यह जगह-जगह है। यह तेज़ गति से दौड़ते राजधानी-नगरों के आसपास मौजूद है। इसे वृंदावन जैसे उन तीर्थ-नगरों के भजनाश्रमों में अनुभव किया जा सकता है, जहाँ जिजीविषाओं और शवों में बहुत दूरी नहीं रह गई है। ज़रूरत है इसे देखने, जानने, शिद्दत से महसूस करने और बदलने की कोशिश में लग जाने की। कदाचित् ये कहानियाँ ऐसा कुछ कर जाने की आकांक्षा में जन्मी और बड़ी हुई हैं।    
  • Kaal Chetna
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1975

    Availability: In stock

    काल चेतना
    एक बरस में सूरज के हिसाब से बारह महीने होते हैं,
    लेकिन चन्द्रमा के हिसाब से तेरह महीने होते हैं ।
    सूरज बाह्यमुखी शक्ति का प्रतीक है
    और चन्द्रमा अन्तर्मुखी शक्ति का ।
    सूर्य शक्ति मर्द शक्ति गिनी जाती है
    और चन्द्र शक्ति स्त्री शक्ति ।
    दोनों शक्तियां स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति की प्रतीक है ।
    अन्तर की सूक्ष्म चेतना, जाने कितने जन्मों से,
    इंसान के भीतर पडी पनपती रहती है ।
    यह अपने करम से भी बनती-बिगड़ती है
    और पिता-पितामह के करमों से भी ।'
    हमारे अपने देश में, कई जातियों में
    एक बहीं रहस्यमय बात कही जाती है,
    हर बच्चे के जन्म के समय,
    कि बिध माता, तुम रूठकर आना और मानकर जाना ।
    इसका अर्थ यह लिया जाता है कि बिध माता,
    किस्मत को बनाने वाली शक्ति, जब अपने प्रिय
    से रूठकर आती है, तो बहुत देर बच्चे के पास बैठती है
    और आराम से उसकी किस्मत की लकीरें बनाती 
    मैं समझती हूँ कि बिध माता की यह गाथा
    बहुत गहरे अर्थों में है कि वह जब किस्मत
    की लकीरें बनाने लगे तो साइकिक शक्ति को न भूल जाए ।
    पश्चिम की गाथा में जो तेरहवीं थाली परसने का इशारा है,
    ठीक वही पूरब की गाथा में साइकिक शक्तियों
    से न रूठने का संकेत है ।
    यह पुस्तक भी तेरहवीं थाली में कुछ परसने का यत्न है ।
    - अमृता प्रीतम
  • Antim Pankti Mein
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1900

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी की ये कविताएँ गवाह हैं कि इधर वे कविता की प्रगीतात्मक संरचना से आगे बढ़कर उसके आख्यानात्मक शिल्प की ओर आई हैं । इस प्रक्रिया में दोनों तरह की संरचनाओं के द्वंद्व और सहकार, उनकी अंत:क्रिया से ऐसा शिल्प विकसित करने में वे कामयाब हुई हैं, जो दोनों की प्रमुख विशेषताओं का सारभूत और संशिलष्ट रूप है । कविता के ढाँचे में लगातार चलती तोड़-फोड़, कुछ नया सिरज सकने की उनकी बेचैनी, प्रयोगधर्मिता के साहस और शिल्प को लेकर उनके जेहन में जारी बहस का समेकित नतीजा है ! बहुत-से कवियों की लगता है कि जीवन में जोखिम उठाना पर्याप्त है और कविता बिना जोखिम के लिखी जा अकती है। मगर नीलेश से हम कला की दुनिया का यह अनिवार्य सबक सीख सकते हैं कि जीवन से भी ज्यादा जोखिम है कला में । इसलिए वे आत्म-तत्त्व की कीमत पर साज-सज्जा में नहीं जाना चाहतीं। वह तो सच का अन्यथाकरण और अवमूल्यन है ! मानो वे स्वयं कहती हैं-जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को अरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते।
    विगत वर्षों में कुछ युवा कवियों के आख्यान की बनावट चेतना और प्रतिबद्धता के विस्तार के रूप में आकृष्ट करती रही है ! दरअसल या शिल्प कविता को चीजों का महज़ भावुक, एकांगी और सरल पाठ बन जाने से रोकता है और उसे भरसक वस्तुनिष्ठ, बहुआयामी और जटिल यथार्थ में ले जाता है ।  कवियों को 'पूरा वाक्य' लिखने की त्रिलोचन को सलाह पर अमल तो यहाँ है ही, कार्य-कारण-संबंध का विवेक भी और एक किस्म के गद्य की प्रचुरता वास्तविकता के काफी हद तक शुष्क और दारुण होने की साक्ष्य है! इसलिए रोजमर्रा की बातचीत की लय, व्याख्या और किस्सागोई का अंदाज और अनुभव का विषम धरातल-ये तत्व मिलकर इस कविता का निर्माण करते हैँ। यहाँ किसी अप्रत्याशित  सौंदर्य-लोक, कल्पना के नायाब उत्कर्ष या संवेदना की सजल पृष्ठभूमि की उम्मीद करना बेमानी है; क्योंकि इस शिल्प के चुनाव में ही कविता की पारंपरिक भूमि और भूमिका से एक प्रस्थान निहित है ! यह भी नहीं कि वह स्वप्नशील नहीं है! नीलेश रघुवंशी इस बदरंग और ऊबड़-खाबड़ दुनिया को एक खेत में बदलने और उसमें मनुष्यता को रोपने का सपना देखती हैं, मगर उसी समय यथार्थ की जटिल समस्या उन्हें घेर लेती है-एक स्वप्न है जाती हूँ जिसमें बार-बार/लौटती हूँ हर बार/मकडी के  जाले-सी बुनी इस दुनिया के भीतर !
    सच्चाई से सचेत और उसके प्रति ईमानदार होने की बुनियादी प्रतिश्रुति की बदौलत कविता किसी स्वप्निल, कोमल, वायवीय संसार में नहीं भटकती, बल्कि इच्छा और परिस्थिति के विकट द्वंद्व को साकार करती है ! नीलेश की नजर में अपने लिए किसी स्वप्न क्रो स्वायत्त करना और उसकी वैयक्तिक साधना करना गुनाह है ! उनके यहाँ सामान्य जन-जीवन ही स्वप्न की कसौटी है ! यही इस कविता का साम्यवाद है, जिसके चलते वे अपनी ही उत्साहित वस्तु से श्रमिक-वर्ग की चेतना के अलगाव और अपरिचय की विडंबना को पहचान पाती हैं-वे जो घर बनाते हैं उसके स्वप्न भी नहीं आते उन्हें !
    सवाल है कि प्रेमचंद के जिस होरी को किसान से भूमिहीन मजदुर बनने को विवश होना पड़ा और जिसकी एक दिन लू लगने से अकाल मृत्यु हुई, वह आज कहाँ है ? यह जानना हो तो नीलेश की अत्यंत मार्मिक और सांद्र कविता किसान पढ़नी चाहिए, जिसके किसी एक अंशा को उद्धृत करना कविता से अन्याय होगा ? फिर भी सारे ब्यौरे की प्रामाणिक लहजे में इस निष्कर्ष तक ले आते हैं-ये हमारे समय का किसान है न कि किसान का समय है ये । कोई पूछ सकता है कि किसान का समय था ही कब, पर कहने की जरूरत नहीं कि यह समय उसके लिए ज्यादा क्रूर और कठिन है । नीलेश साधारण जन-समाज से आवयविक रिश्ता कायम करती हैं, क्योंकि वे काव्य-वस्तु के लिए ही नहीं, भाषा और भाव के लिए भी उसके पास जाती हैं। सच है कि जो लोग सबसे अरक्षित और साधनहीन हैं, वे ही हँसते-हँसते मृत्यु की कामना कर सकते हैं । कबीर ने जिसे आकाश से अमृत निचोड़ना कहा था, उस तरह ये मृत्यु के हाथों से जिन्दगी छीन  लेते हैं । लेकिन जो मौत से डरते हैं, वे अपना सब कुछ बचाने की फिराक में जिन्दगी से ही कतराकर निकल जाते हैं । नीलेश की कविता प्रश्न करती है-क्यों खुटने से डरते हो ? हम तो रोज़ खुटते हैं ।
  • Mere Saakshaatkaar : Govind Mishra
    Govind Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-760

    Availability: In stock


  • Madhyakaleen Krishna Kavya Main Soundraya-Chetna
    Pooran Chand Tandon
    1400 1190

    Item Code: #KGP-MKKKMSC HB

    Availability: In stock

    मनुष्य की विविध अनुभूतियों में सौन्दर्यानुभूति का
    विशिष्ट महत्व है। सौन्दर्य का आस्वाद निर्वैयक्तिक
    होता है, स्व-पर की भावना से नितान्त मुक्त।
    सौन्दर्यानुभूति मनुष्य को ऐसे मानसिक धरातल पर ।
    अवस्थित करती है, जहाँ पहुँचकर उसकी
    भौतिकतावादी दृष्टि लुप्त हो जाती है तथा सम्पूर्ण विश्व ।
    के ‘शिवत्व' के साथ उसका तादात्म्य स्थापित हो जाता
    है। सौन्दर्यानुभूति में रुचि, संस्कार, शिक्षा, स्मृति और
    कल्पना आदि का योग अनिवार्य रूप से विद्यमान रहता
    है। कवि का सौन्दर्य-बोध या उसकी सौन्दर्य-चेतना का
    अनुभव उसके अन्तर्जगत की निधि होती है। यही 'बोध'
    या ‘चेतना' अनुभूति के प्रगाढ़ एवं प्रबल होने पर कवि
    के व्यक्तित्व एवं प्रतिभा द्वारा रचना-प्रक्रिया से सम्बद्ध
    होकर अभिव्यंजनात हो जाती है। मध्यकालीन
    हिन्दी साहित्य में कृष्णकाव्य प्रचुर मात्रा में लिखा गया
    है। इस व्यापक आधारभूमि से सम्पन्न काव्य की
    सूक्ष्मता और परिव्याप्ति की पकड़ सौन्दर्य-चेतना के।
    अध्ययन से ही सम्भव है। इस पुस्तक में कृष्ण साहित्य
    के इसी सत्यं, शिवं तथा सुन्दरं भाव एवं पारम्परिक
    भारतीय जीवन-दृष्टि को, मौलिक निष्कर्षों एवं
    स्थापनाओं के साथ प्रस्तुत किया गया है।
  • Haasya Vyangya Ke Vividh Rang
    Barsane Lal Chaturvedi
    160 144

    Item Code: #KGP-1808

    Availability: In stock

    बरसानेलाल चतुर्वेदी जी द्वारा सम्पादित पुस्तक "हास्य-व्यंग्य के विविध रंग"
    हास्यरस प्रधान कविताएं सैकड़ों वर्षों से लिखी जा रही हैं । आजकल हास्य-कवि सम्मेलन सर्वाधिक लोकप्रिय हैं । आज का मनुष्य इसी के अभाव में जीता है । वह इतना व्यस्त तथा त्रस्त है कि उसके पास हँसने का समय ही नहीं है ।
    हास्यरस के कवियों ने जहाँ विकृति देखी है उसी को लक्ष्य बनाकर कविता रच डाली है । तुलसीदास हो या सूरदास, बिहारी हों या  अलीमुहीब खाँ 'प्रीतम'—हास्यरस की कविताएं सभी न लिखी हैं । किसी ने दुष्टों पर लिखा है तो किसी ने कंजूसों पर, किसी ने भ्रष्ट नेताओं को अपना शिकार बनाया है तो किसी ने दलबदल की प्रवृति को अपना लक्ष्य बनाया है । भ्रष्टाचारी अफसर, मुनाफाखोर  व्यापारी, रिश्वत, मिलावट, तस्करी, कुर्सीमोह- कहने का तात्पर्य ये है कि हास्यकवियों की निगाह से कोई बच नहीं पाया ।
    यह संकलन उन व्यक्तियों तथा प्रवृतियों का सिलसिलेवार 'एलबम' है जो हास्यरस के कवियों की चपेट में आए हैं और जिनकी पोल समय- समय पर खोली गई हैं। यह आलम्बन कोश इन्हें असंगतियों पर व्यंग्यबाण चलाने वाली हास्य-व्यंग्य की कविताओं का प्रथम संग्रह हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ हास्य-काव्य का इतिहास भी प्रस्तुत करता है ।
  • Betava Bahati Rahee
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-2004

    Availability: In stock

    बेतवा बहती रही
    एक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी !
    नही-नहीं, यह अनेक उर्वशियों, अनेक मीराओं, अनेक बेतवाओं की कहानी है ।
    बेतवा के किनारे जंगल की तरह उगी मैली बस्तियों । भाग्य पर भरोसा रखने वाले दीन-हीन किसान । शोषण के सतत प्रवाह में डूबा समाज । एक अनोखा समाज, अनेक प्रश्नों, प्रश्नचिन्हों से घिरा ।
    प्राचीन रूढियां है जहाँ सनातन । अंधविश्वास हैं अंतहीन । अशिक्षा का गहरा अंधियारा । शताब्दियों से चली आ रही अमानवीय यंत्रणाएँ । फिर जीने के लिए कोई किंचित ठौर खोजे भी तो कहाँ ! हाँ, इन अंधेरी खोहों और खाइयों में कभी-कभी मुट्ठी-भर किरणों के प्रतिबिंब का अहसास भी कितना कुछ नहीं दे जाता ।
    उर्वशी का दु:ख है कि वह उर्वशी है । साधारण में भी असाधारण । इसीलिए सब तरह से अभिशप्त रही । तिल-तिल मिटती रही चुपचाप ।
    प्रेम, वासना, हिंसा, घृणा से भरी एक हृदयद्रावक अछूती कहानी ! पूरे एक अंचल को व्यथा-कथा ।
  • Vigyan Ka Itihaas
    Dyanand Pant
    300 270

    Item Code: #KGP-748

    Availability: In stock

    विज्ञान का इतिहास
    विज्ञान की अद्भुत प्रगति विश्व-भर के चिंतकों और कर्मठों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफलन है। धर्म, देश, जाति, भाषा आदि की सीमाएँ विज्ञान को बाँध न सकीं। प्रस्तुत पुस्तक में इसी सार्वभौम विज्ञान की समग्र गाथा का रोचक वर्णन है। आदि मानव से लेकर आधुनिक मानव की विलक्षण उपलब्धियों वाली इस विश्वव्यापी बौद्धिक यात्रा का लेखा-जोखा बिना पूर्वग्रहों के प्रस्तुत करने और पाश्चात्य लेखकों के पक्षपातपूर्ण प्रतिपादन का पर्दाफाश करने का लेखक का प्रयत्न सराहनीय है।
    जनसाधारण सुलभ भाषा और रोचक शैली में लिखी अपने विषय की हिंदी की यह प्रथम मौलिक पुस्तक ज्ञानवर्द्धक होने के साथ-साथ पाठक में चिंतन और तर्क की वैज्ञानिक विधि के विकास में भी सहायक होगी।
  • Preeti Katha
    Narendra Kohli
    120 108

    Item Code: #KGP-2052

    Availability: In stock

    प्रीति-कथा 
    नरेन्द्र कोहली की प्रत्येक नई कृति उनके लेखकीय व्यक्तित्व का एक नया आयाम उदघाटित करती है । जब तक पाठक उन्हें किसी एक वर्ग अथवा धारा से जोड़कर, किसी एक घेरे  में घेरकर, देखने का अभ्यस्त होने लगता है, तब तक वे उन घेरों को तोड़कर आगे बढ जाते हैं और कुछ नया तथा मौलिक लिखने लगते है । सृज़नधर्मा व्यक्ति प्रयोग और वैविध्य की चुनौती को स्वीकार करता ही है ।
    प्रीति-कथा नरेन्द्र कोहली का नया उपन्यास है । यह एक प्रेम-कथा है । नरेन्द्र कोहली ने  प्रेम-कथा  लिखी है, यह सूचना कुछ लोगों के लिए विस्मयकारिणी भी हो सकती है; किन्तु अधिक विस्मयकारी तथ्य तो यह है कि यह प्रेमाख्यानक उपन्यास, जीवन के कुछ मूलभूत सत्यों का स्वरूप स्पष्ट करता है । कुछ लोग इसे चिंतन-प्रधान ही नहीं, दार्शनिक उपन्यास भी कहना चाहेंगे । प्रेम का विश्लेषण करते-करते ही, मनुष्य अपनी प्रकृति और ईश्वर के स्वरूप तक को पहचान पाया है । किसी भी वर्ग में रखें, किन्तु है यह उपन्यास ही, पहले से भिन्न, नया, ताजा और आकर्षक ।
  • Saleem Ke Shanidev
    Pankaj Prashar
    100 90

    Item Code: #KGP-9100

    Availability: In stock


  • Kaaveri Se Saagar Tak
    P.S. Ramanunj
    120 108

    Item Code: #KGP-1859

    Availability: In stock

    कावेरी से सागर तक
    श्री रामानुज की कविता, कविता होने की शर्त पर, संपूर्णतया सामाजिक है और कवि के निजत्व की रक्षा करती हुई भी अपने समय के समाज की चिंता को अभिव्यक्त करती हैं । निजत्व उनकी गहन अनुभूति या कुशल अभिव्यक्ति का है और समाज की चिंता मूल्यहीनता तथा आडंवर को लेकर है। ये कविताएं शोषक और शोषित, सामंतवाद और पूँजीवाद, आभिजात्य और निम्नवर्ग के बँटवारे की कविताएँ नहीं  हैं; ये मनुष्य, उसके परिवेश, उसकी बदली हुई मनोवृति और तत्परिणामी संवेदनहीनता की चिंता की कविताएँ हैं। पुराकथा, प्रचीन संस्कृति और इतिहास से शक्ति ग्रहण करती हैं और भारतीय संस्कृति तथा काव्य-परंपरा से हैं, पर अतीतजीवी, कल्पनाजीवी और पलायनवादी न होकर वर्तमान से सीधे साक्षात्कार करती हैं । जाति-वर्ग और प्रदेश को लांघकर भारतीय परिवेश का प्रतिविंवित करती हैं, अत: सच्चे अर्थ में भारतीय हैं । किसी भी धर्म-संप्रदाय के पक्ष या विपक्ष में खडी नहीं होतीं, बल्कि सीधे मानवीय धर्म को प्रकाशित करती हैं, इसलिए तत्त्वत: धर्म-निरपेक्ष  । संयत छोर शालीन है, अतएव अभिजात है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    160 144

    Item Code: #KGP-13

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', 'क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Baarish Ke Baad
    Radhey Shyam Tiwari
    125 113

    Item Code: #KGP-1990

    Availability: In stock

    बारिश के बाद
    राधेश्याम तिवारी हिंदी के एक ऐसे कवि हैं, जो अपने आसपास के साधारण-सामान्य और लगभग घटनाविहीन जीवन से मार्मिकता को बड़े अचूक ढंग से पकडने की क्षमता रखते हैं। उनकी कविताओं में कल्पना की ऊँचाइयाँ हैं, लेकिन जैसा कि वे अपनी एक कविता 'बीज-मंत्र' में कहते हैं कि बीज का बाहर निकलकर भी धरती से जुडाव कम नहीं होता, उसी तरह उनकी कविता  का लगाव भी किसी भी हालत में इस धरती से, यहाँ के इंसान से, यहाँ के मौसमों से, अभावों और स्मृतियों से कम नहीं होता, बल्कि और सघन होता जाता है । उनकी हर कविता जीवन के बीच सहज ही मिलने वाला एक मार्मिक प्रसंग बन जाती है । यह मार्मिकता शब्द-क्रीड़ा से हासिल नहीं की गई है बल्कि जीवन की परिस्थितियों से प्राप्त की गई है। शहर तथा गाँव के बीच हिलगी हुई राधेश्याम तिवारी की कविता कई जगह गीतात्मक हो जाती है बल्कि कहीं-कहीं वे अपनी बात कहने के लिए गीत का सहारा भी लेते है, मगर दिलचस्प बात यह है कि यह कवि जीवन के प्रति हमेशा बहुत सकारात्मक है, कटु और कठोर नहीं । उसका लहजा शिकायत-भरा नहीं, ललक-भरा है । उनकी कविताओं से जीवन के दबावों-तनावों को दरगुजर नहीं किया गया है, अभावों की चर्चा से परहेज नहीं किया गया है, मगर विवशता की बजाय एक दार्शनिक ऊँचाई दी गई है । उनकी एक कविता है 'न्यूटन', जिसमें वह कहते हैं कि "न्यूटन ने यह तो सोच लिया कि सेब पेड़ से नीचे क्यों गिरता है, लेकिन यह नहीं सोचा कि नीचे गिरकर भी वह नीचे के लोगों को क्यों नहीं मिलता?" इतना ही नहीं, वे आगे कहते हैं कि "यह तो ठीक है कि गुरुत्वाकर्षण सबको अपनी ओर खींचता है, मगर जमीन में दबा हुआ बीज कैसे ऊपर उठ जाता है, न्यूटन ने यह नहीं सोचा ।" यहीं अभावों की चर्चा है, लेकिन यहाँ बेचैनी का स्वर और स्तर भिन्न है तथा इसी के साथ यह सकारात्मक स्वर भी है ।
    इस संग्रह में अनेक ऐसी कविताएँ हैं जैसे 'बाकी सब माया हैं, 'पुराना पता', 'सर्कस में बाघ', ‘संबंध', 'घर', 'किराए का मकान' आदि जो हमारे इस दैनिक संसार की कविताएँ हैं मगर उससे बाहर ले जाकर विचलित करने वाली कविताएँ भी हैं। ये कविताएँ सहज हैं, क्योकि मर्मभेदी हैं । वे सहज हैं, क्योंकि मनुष्य के साथ ये प्रकृति से भी सघन रूप से जुड़ती हैं। ये सहज हैं, क्योंकि इनमें हमारा सहजात मनुष्य है, उसकी मानवीयता है, उसका राग और विराग है ।
  • Haashiye Per
    Raj Budhiraja
    100 90

    Item Code: #KGP-1963

    Availability: In stock

    हाशिये यर
    सुपरिचिन संवेदनशील लेखिका राज़ बुद्धिराजा की नवीन कृति है 'हाशिये पर' । अत्याधुनिक भारतीय प्तमाज़ ने जिस प्राचीन संस्कृति को हाशिये पर ला बैठाया है उसे  लेखिका ने शब्दों के मोतियों में पिरोकर भव्य रूप प्रदान किया है । लेखिका को पैनी और सूक्ष्म दृष्टि छोटी से छोटी और बडी से बडी बात, घटनास्थल पर आकर टिक जाती है । आज के टूटते परिवेश और बिखरते मानव-मूल्यों ने आहत होकर कभी विदेशी मित्रों और कभी पास-पडौस के माध्यम से इनकी सशक्त कलम पूरे समाज पर प्रहार करती है । प्रहार इतना तीव्र होता है कि पाठक के सामने हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं होता । धर्म, धर्म, अध्यात्प, शिक्षा, परिवार, समाज, मानवीय संबंध सभी पर लेखनी चलती चली जाती है । इनके दिल की गहराई पाठकों के पटल पर रेशमी मोती बिखेरती है और कभी पाठकों के सामने सवालिया निशान छोड़ती है । वस्तुत: उनके मन के पनीले तट पर वर्णों के संबंध आसन लगाए बैठे हैं । उन्हें तिरोहित होता देख वे पाठकों को ही कठघरे में ला खडा करती हैं । 'अब कहाँ है आनंदी', 'नमस्कार नहीं की जाती यहाँ', 'एक बेगम बादशाह बिन' ऐसे ललित संस्मरण हैं जिनमें पाठक पूरो तरह डूब जाता है और वह भी लेखिका के सुर में सुर मिलाकर कहता है 'मैं हूँ न !'
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rita Shukla
    Rita Shukla
    350 280

    Item Code: #KGP-657

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ऋता शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'प्रतीक्षा', 'छुटकारा', 'देस बिराना', 'विकल्प', 'जीवितोअस्मि…!', 'रामो गति देहु सुमति...', 'निष्कृति', 'सलीब पर चढे सूरज का सच', 'उबिठा बनाम उभयनिष्ठा...' तथा 'हबे, प्रभात हबे' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका ऋता शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Baatchit : Vishwanath Prasad Tiwari
    Vishwanath Prasad Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-666

    Availability: In stock


  • Aadhunik Bhartiya Nayee Kavita
    Krishna Dutt Paliwal
    490 441

    Item Code: #KGP-9006

    Availability: In stock

    हिंदी आलोचना में ऐसे स्मरणीय नाम अत्यल्प हैं जिन्होंने अपनी पहचान निर्मित करते हुए संदर्भित विधा को भी नई चमक प्रदान की हो। जिन्हें परंपरा में पैठना आता हो और जिनकी दृष्टि आधुनिकता के चाक-चिक्य में सार्थक आलोक को खोज लेती हो। प्रोफेसर कृष्णदत्त पालीवाल एक ऐसे ही धीर-गंभीर अध्येता रहे, जिन्होंने वैचारिक उखाड़- पछाड़ के बीच अपनी सैद्धांतिक दृढ़ता को बनाए रखा। प्रायः लोकप्रियता और छवि-निर्माण के लिए कुछ लोग जिन निराधर फार्मूलों पर भरोसा करते हैं, प्रो. पालीवाल ने उनकी ओर कभी देखा तक नहीं। पूरी निष्ठा के साथ भारतीय रचनाकारों पर आलोचनात्मक चिंतन उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता का एक प्रबल प्रमाण है।
    प्रस्तुत पुस्तक ‘आधुनिक भारतीय नयी कविता’ में प्रो. पालीवाल के आलोचक ने एक नयी छलांग लगाई है। उन्होंने अपने विशाल अध्ययन, गहन अन्वेषण और सुदीर्घ आलोचनात्मक अनुभव का निदर्शन करते हुए इस पुस्तक के आलेख लिखे हैं। इन्हें पढ़ने और बूझने के लिए सर्वप्रथम ‘भारतीयता’ की प्रशस्त अवधरणा को हृदयंगम करना आवश्यक है। अपने समस्त लेखकीय कर्म में प्रो. पालीवाल ने राष्ट्र, राष्ट्रीयता, अस्मिता, सभ्यता, संस्कृति, भारतीयता आदि पर भांति-भांति से विचार किया है। विशेषता यह है कि वे किसी भी विचार, व्यक्ति या अवधरणा से न आतंकित होते हैं, न ग्रस्त! भारतीय या अभारतीय लेखक चिंतक कितना ही नामचीन क्यों न हो, यदि उसकी तर्कपद्धति दूषित है तो पालीवाल उसे खंडित करने में क्षण भर भी देर नहीं लगाते। वे भारतीयता की सर्वमान्य विशेषताएं विश्लेषित करने के साथ-साथ उन लक्षणों का भी उल्लेख करते हैं जिन्होंने इस महादेश की मानसिकता को मनुष्यता के लिए सर्वाधिक अनुकूल बना रखा है।
    प्रो. पालीवाल जब ‘आधुनिक भारतीय नयी कविता’ पर विचार करते हैं तो वे ‘भारतीय मनीषा के प्राण तत्त्वों का अन्वेषण’ अपना लक्ष्य बनाते हैं। उनके शब्दों में, "मूलतः भारतीय सृजन का अर्थ है--भारत के रचनाशील मानस की सामूहिक चेतना...जिसका निर्माण हजारों वर्षों से संचित अनुभूतियों और विचारों की गहन संश्लिष्टता से हुआ है। एक विशेष प्रकार की सौंदर्याभिरुचियां इस सृजन के भाव एवं रूप तत्त्व में विद्यमान हैं। बाहरी प्रभावों की अनुगूंज सुनाई पड़ने पर भी यह सृजन हमारे चिंतन की मौलिकता, सत्य के रूढ़ि-मुक्त रूप की झलक और मानव गरिमा को स्वीकृति का दस्तावेज कहा जा सकता है।"
    पुस्तक दो खंडों में संयोजित है। खंड एक में आधुनिकता के प्रथम उन्मेष से ‘आधुनिक भारतीय नयी कविता’ की प्रयोगशील व प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति तक का सटीक विश्लेषण है। खंड दो भारतीय भाषाओं के शिखर रचनाकारों पर केंद्रित है। माइकेल मधुसूदन दत्त, सुब्रह्मण्य भारती, वल्लतोल, काजी नजरुल इस्लाम, मैथिलीशरण गुप्त, अज्ञेय व कुमार आशान की रचनाओं का इतना प्रमाण पुष्ट पाठ अन्यत्रा दुर्लभ है।
    समग्रतः इस कृति से गुजरते हुए एक महत्त्वपूर्ण आलोचक प्रो. कृष्णदत्त पालीवाल की व्यापक आलोचना-दृष्टि का दर्शन होता है। अपने विषय पर एक विप्लव विशिष्ट ग्रंथ। पठनीय और संग्रहणीय।
  • Haitrik
    Rajesh Ahuja
    140 126

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • NATOHAM
    Meenakshi Swamy
    500 450

    Item Code: #KGP-1555

    Availability: In stock

    लब्धप्रतिष्ठ रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का बहुचर्चित उपन्यास 'नतोअहं ' भारतभूमि के वैभवशाली अतीत और वर्तमान गौरव के सम्मुख विश्व के नतमस्तक होने का साक्षी है। यह भारतीय संस्कृति की बाह्म जगत् से आंतरिक जगत् की विस्मयकारी यात्रा करवाने की सामर्थ्य के अनावरण का अद्भुत परिणाम है।
    भारतीय संस्कृति के विराटू वैभव का दर्शन होता है—संस्कृतिक नगरी उज्जयिनी में बारह वर्षों में होने वाले सिंहस्थ के विश्वस्तरीय आयोजन में। उज्जयिनी का केंद्र शिप्रा है। इसके किनारे होने वाले सिंहस्थ में देश भर के आध्यात्मिक रहस्य और सिद्धियां एकजुट हो जाती हैं। इन्हें देखने, जानने को विश्व भर के जिज्ञासु अपना दृष्टिकोण लिए यहां एकत्र हो जाते हैं। तब इस पवित्र धरती पर मन-प्राण में उपजने वाले सूक्ष्मतम भावों की सशक्त  अभिव्यक्ति है यह उपन्यास ।
    इसमें मंत्रमुग्ध करने वाली भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म के सभी पहलुओं पर वैज्ञानिक चिंतन  है, भारतीय अध्यात्म के विभिन्न पहलुओं को खरेपन के साथ उकेरा गया है।
    उज्जयिनी अनवरत सांस्कृतिक प्रवाह की साही है। यह केवल धर्म नहीं, समूची संस्कृति है, जिसमें कलाएं हैं, साहित्य है, ज्ञान है, विज्ञान है, आस्था है,  परंपरा है और भी बहुत कुछ है। यात्रा वृत्तांत शैली के इस उपन्यास में उज्जयिनी के बहाने भारतीय दर्शन, परंपराओं और संस्कृति की खोज है जो सुदूर विदेशियों को भी आकर्षित करती है। उज्जयिनी के लोक जीवन को झांकी के साथ भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का सतत आख्यान है जो पुरा मनीषियों की मेधा का महकता प्रतीक है।
    उपन्यास के विलक्षण कथा संसार को कुशल लेखिका ने अपनी लेखनी के संस्पर्श से अनन्य बना दिया है। नायक एल्विस के साथ पाठक शिप्रा के प्रवाह में प्रवाहित होता है, डुबकी लगाता है।
    'भूभल' जैसे सशक्त उपन्यास से कीर्ति पाने के बाद बहुचर्चित रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का नवीनतम उपन्यास 'नतोअहं ' तथाकथित आधुनिकता से आक्रांत भारतीय जनमानस की अपनी जडों की ओर आकृष्ट करता है। भारतीय संस्कृति व अध्यात्म की खोज में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अप्रतिम उपहार है।
  • Sachitra Rashtriya Pratik Evam Gaurav Kosh
    GLOBAL VISION PRESS
    495 446

    Item Code: #KGP-2108

    Availability: In stock


  • Himalaya Ki Sanskritik Sampada
    Sudarshan Vashishath
    600 480

    Item Code: #KGP-371

    Availability: In stock

    आज भी हिमालय अपने में आदि संस्कृति छिपाए हुए है। आज के युग में तमाम प्रदूषण, मिश्रण और संकरण के बावजूद पर्वत कंदराओं में पुरातन संस्कृति के दर्शन हो सकते हैं। जैसे हिम ग्लेशियरों में सदियों से पानी छिपा रहता है, ठीक वैसे ही पर्वतों की गुफाओं में वे संस्कार छिपे हैं जिन्हें आधुनिकतावादी मृतप्राय समझ बैठे हैं। यह एक तथ्य है कि संस्कृति किसी भी बाहरी आक्रमण से एकदम नहीं मरा करती। वह जीवित रहती है चिरकाल तक, चाहे आक्रमणकारी यह समझें कि इसे मिटा दिया गया है। संस्कार अपने भीतर का एक अनुशासन है जो भीतर ही भीतर छिपा रहता है और चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने प्रकट होता है। बाहरी हाव-भाव, क्रियाकलाप से लेकर मन की गहराइयों तक संस्कार अपना घर बनाए रहते हैं जिन्हें जड़ से समाप्त करना किसी के लिए भी संभव नहीं।
    हिमाचल प्रदेश में किन्नौर तथा लाहौल-स्पीति, दो जिले पूर्ण रूप से जनजातीय घोषित हैं। जिला चंबा में भरमौर तथा पांगी क्षेत्र जनजातीय हैं। यहाँ संस्कृतियों का संगम भी एक विलक्षणता लिए हुए है। किन्नौर में बुशहर का राजवंश पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बाणासुर, उषा-अनिरुद्ध उपाख्यान से जुड़ा हुआ है। यहाँ उषा देवी का मंदिर है तो दूसरी ओर बौद्ध परंपरा भी विद्यमान है। किन्नौर में हिंदू मंदिर तथा गोम्पा यानी बौद्ध मठ एक ही प्रांगण में स्थापित हैं। यही संगम लाहौल से होता हुआ भरमौर तक चला गया।
    हिमालय का साक्षात्कार कराती प्रस्तुत पुस्तक संस्कृति- प्रेमियों, अनुसंधानकर्ताओं तथा पाठकों के लिए उपयोगी एवं रोचक सिद्ध होगी।
    अस्तर में: बुद्ध प्रतिमा (8वीं शताब्दी)
    परशुराम मंदिर निरमंड से ये प्रतिमाएँ 1981 में हुए ‘भुंडा उत्सव’ के अवसर पर बाहर निकाली गई थीं। ये मूर्तियाँ उत्सव के कुछ समय बाद चोरी हो गईं। पुलिस द्वारा इन प्रतिमाओं को अन्य चोरी हुई मूर्तियों सहित बरामद कर लिया गया। अब ये रामपुर के सरकारी खजाने में जमा हैं।
  • Kartavya
    Samual Smiles
    240 216

    Item Code: #KGP-280

    Availability: In stock

    कर्तव्य
    चौबीस वर्ष पूर्व मैंने ‘आत्मनिर्भरता’ (Self Help)  पुस्तक लिखी थी। तीन वर्ष उपरांत सन् 1853 में वह प्रकाशित हुई। वह पुस्तक संयोग से ही लिखी गई थी। मैंने ‘लीडस’ स्थान पर नवयुवकों के सम्मुख कुछ भाषण दिए थे। उन भाषणों में मैंने इस बात पर जोर दिया था कि उनके जीवन की प्रसन्नता व सफलता मुख्यतः उनके निरंतर आत्मसंस्कार, अनुशासन, संयम और सबसे अधिक ईमानदारी व साहस से कर्तव्यपालन करने पर निर्भर करती है। मेरे इन भाषणों का आशा से अधिक प्रभाव हुआ।
    अपने व्यवसाय से अवकाश मिलने के बाद सायंकाल का समय मैं अपनी पुस्तक के लेखन में लगाता था। पुस्तक जब पूरी हो गई, तो मैंने उसे लंदन के एक प्रकाशक के पास भेजा। क्रीमिया के युद्ध के कारण उन दिनों पुस्तकें प्रायः बहुत कम बिकती थीं। इसलिए प्रकाशक ने धन्यवाद सहित मेरी पुस्तक लौटा दी। ‘जार्ज स्टीफेंसन का जीवन-चरित्र’ छपने के बाद ही श्री मूरे की कृपा से ‘आत्मनिर्भरता’ प्रकाशित हो सकी। 
    इसके तेरह वर्ष पश्चात् मेरी पुस्तक ‘चरित्र’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में मैंने महापुरुषों के चरित्रों को चित्रित करने का प्रयत्न किया, क्योंकि नवयुवकों को संस्कार देने का यह सर्वोत्तम ढंग है। इसके पाँच वर्ष बाद मेरी पुस्तक ‘बचत’ (Thrift) प्रकाशित हुई। इसमें मैंने श्रम के महत्त्व और बचत के लाभों पर जोर दिया था। 
    इनके पाँच वर्ष उपरांत इसी क्रम की अंतिम पुस्तक ‘कर्तव्य’ प्रकाशित हो रही है। मुझे आशा है कि पिछली पुस्तकों की तरह यह भी पाठकों एवं बुद्धिजीवियों को आकर्षित करेगी। इस पुस्तक में मैंने सर्वोत्तम और साहसी स्त्री-पुरुषों के उदाहरण दिए हैं। महापुरुषों के जीवन हमें यह शिक्षा देते हैं कि हम भी उन्हीं की तरह कार्य कर सकते हैं। जो व्यक्ति कर्तव्य की उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह महान् बन जाता है।  
    —सैमुअल स्माइल्स
  • Puraskrit Bacchon Ki Prerak Sahasi Kathayen
    Sanjiv Gupta
    200 180

    Item Code: #KGP-9352

    Availability: In stock

    मित्रो, ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ प्राप्त बच्चों की कहानियों पर आधारित  शृंखला की सातवीं पुस्तक के साथ एक बार मैं फिर आपसे मुखातिब हूं। आपसे मिल रहे प्यार और प्रतिक्रिया  के बलबूते एक और किताब तैयार करने का उत्साह मिला। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह किताब भी आप सभी को पसंद आएगी। बाल पाठकों की रुचि को देखते हुए इस बार इसमें चित्रों को भी खास तवज्जो दी गई है।
    वैसे तो बहादुर बच्चों की कहानियां हमेशा ही रोमांचित और प्रेरित करती हैं, लेकिन आज जबकि समाज में संवेदना खत्म होती जा रही है तो ये और भी प्रासंगिक हो गई हैं। यह देखकर बहुत ही दुःख होता है कि किसी को विपत्ति में देखकर आज लोग पीड़ित की मदद करने की बजाय उसका वीडियो बनाने और उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने में लग जाते हैं। यह भविष्य वेफ लिए अच्छा संकेत नहीं है। हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि विपत्ति किसी  के भी साथ कहीं भी उत्पन्न हो सकती है। आज जो किसी और वेफ साथ घटित हो रहा है, कल को हमारे साथ भी हो सकता है।
    जरा सोचिए...अगर ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ पाने वाले बच्चों ने भी इसी संवेदनहीनता का परिचय दिया होता तो क्या होता! इन बच्चों ने तो दूसरों की जान बचाने  के लिए अपनी और अपनों की भी परवाह नहीं की। उम्मीद करता हूं कि वर्ष 2016 वेफ लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  के हाथों पुरस्कृत इन बच्चों की कहानियां हमारे समाज में इस संवेदना को बनाए रखने में मददगार साबित होंगी और बच्चों व युवाओं को प्रोत्साहित करेंगी।
  • Kavi Ne Kaha : Rituraj
    Rituraaj
    150 135

    Item Code: #KGP-224

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ऋतुराज
    ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही हैं । बहुराष्ट्रीय निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे हैं और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है; वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
    ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कम दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते हैं और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
    आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।
  • Urgent Meeting
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1822

    Availability: In stock


  • Aanvla Or Uski Baagbani
    Darshna Nand
    180 162

    Item Code: #KGP-7848

    Availability: In stock

    वास्तव में आंवले का ताजा फल भी सीमित मात्रा में ही खाया जा सकता है । मुरब्बे के अतिरिक्त इसके अनेक उत्पाद भी निर्माण किये जाते हैं । इसकी उपयोगिताएं अनन्य हैं । यह औषधीय गुणों का भंडार है । 
    इस विशिष्ट फल पर कोई संकलित साहित्य उपलब्ध नहीं था, जिससे इसकी वैज्ञानिक विधि से बागबानी करने और इसके उपयोग करने में सहायता मिल पाती । प्रस्तुत की पुस्तक की हिंदी में रचना करके लेखक ने इन अभावों की पूर्ति की है । 
  • Chuhiya Rajkumari Ka Svayamvar
    Vinod Sharma
    60 54

    Item Code: #KGP-931

    Availability: In stock


  • Khushboo Udhaar Le Aye
    Upendra Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-1902

    Availability: In stock

    खुशबू उधार ले आए
    उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लों का 'हिन्दीपन' एक ओर 'उर्दू' की फारसीयत से अलगाता है तो दूसरी ओर गजल के व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य को सबल बनाता है, जिसका अनुकरण पाकिस्तान के ग़ज़लकार भी करते है । डॉ० शेरजंग गर्ग ने ठीक ही कहा है कि उपेन्द्र की कहन में वैविध्य है जो उन्हें बहुत-से ग़ज़लकारों से सर्वथा अलग का देता है । 
    -डॉ० गंगाप्रसाद विमल
    हबीब जालिब की तरह उपेन्द्र कुमार भी व्यवस्था से लड़ते और कारावास में डाले गए इंसान की वेदना को शिद्दत से महसूस करते है :
    वो कैदी चुप था लेकिन गुनगुनाया
    बजी जंजीर की जब इक कड़ी थी
    उपेन्द्र के पास शे'र कहने का सलीका भी है और कल्पना को इस्तेमाल करने का फन भी । 
    -ज्ञानप्रकाश विवेक
    उपेन्द्र के पास शायद किसी चालाक अनुभवी कवि का शिल्प-कौशल नहीँ है, यह अच्छी बात है अन्यथा उनकी रचनाओं में कथ्य की प्रमुखता नहीं रह पाती । अनगढ़ यथार्थ का विशाल भंडार परोसती उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लें पाठकों को अपने आसपास को सतर्कता से देखने को मजबूर करेंगी, ऐसा विश्वास है ।
    - विजय किशोर मानव
    न तो उपेन्द्र जी उर्दू ग़ज़ल की रिवायतों की रौ में बहे है और ना ही उन्होंने अपनी ग़ज़लों पर हिन्दी का ‘कवितापन हावी होने दिया है । उनकी ग़ज़लों की बुनावट और उनकी प्रकृति गीतों से अलग है । इसीलिए उनमें गजलियत की मौजूदगी का अहसास बना रहता है । सोजो-साज़ (वेदना और संगीतात्मकता) हूँ तो कविता मात्र के आधार तत्त्व माने जाते है, मगर इनके बरौर तो ग़ज़ल का काम ही नहीं चल सकता । ग़ज़ल में रोमानिया की चाशनी भी ज़रूरी है । उपेन्द्र जी ने ग़ज़ल की इन खूबियों को न केवल समझा है, बल्कि इनसे अपनी ग़ज़लों को बखूबी सँवारा भी है ।
    - बालस्वरूप राही
  • Arya, Rigved Aur Bhartiya Sabhyata
    Dr. Kripa Shanker Singh
    1100 990

    Item Code: #KGP-673

    Availability: In stock

    ऋग्वेद भारतीय संस्कृति, धर्म और सभ्यता, प्रकारान्तर से कहें तो हिन्दू संस्कृति, धर्म और दर्शन की पीठिका है। भारत आर्यों की मूलभूमि है, इस सत्य को झुठलाने की बहुत कोशिशें होती रही हैं। ‘आर्य, ऋग्वेद और भारतीय सभ्यता’ में ऋग्वेद के हर अंग की विस्तृत मीमांसा की गई है। ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ है। प्राचीनतम होते हुए भी इसकी सर्वांगीण पूर्णता और हर दृष्टि से सर्वोत्तमता को देखते हुए ऋग्वेद को अपौरुषेय भी माना जाता रहा है। अपौरुषेय मानने के पीछे धार्मिक कारण भी रहा हो सकता है। जो भी हो पर इसे मानवी मेधा की ही रचना कहना ठीक होगा।
    प्रस्तुत पुस्तक में ऋग्वेदिक संस्कृति और सभ्यता के नैरन्तर्य को दिखाया गया है। भारतीय समाज के ताने-बाने का जो ढाँचा आज है, वह ऋग्वेद से लेकर सिन्धु-सरस्वती सभ्यता से होता हुआ वर्तमान काल तक आया है। चाहे वह पारिवारिक और सामाजिक जीवन को दर्शाने वाला रूप हो या धार्मिक आस्था और विश्वास की मान्यता हो, या दार्शनिक चिन्तन-मनन की परम्परा हो, उन सभी के मूल में ऋग्वेद ही है।
    ऋग्वेद आर्यों के महान् और विलक्षण सांस्कृतिक ऋक्थ का प्राचीनतम और सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ है। वह न केवल हिन्दू दर्शन, धर्म और पारिवारिक, सामाजिक तथा शासकीय व्यवस्था को दर्शाने वाला आदि ग्रन्थ है बल्कि विश्व के प्राचीनतम और उत्कृष्टतम काव्य का गान भी है।
  • Gardish Ke Din
    Kamleshwar
    250 225

    Item Code: #KGP-794

    Availability: In stock

    गर्दिश के दिन
    ‘गर्दिश के दिन’ बारह भारतीय लेखकों के अपने आत्मकथ्य हैं--केवल उनकी अपनी भीतरी दुनिया के नहीं बल्कि बाहर की दुनिया से जुड़ने और लड़ने के दौरान जो कुछ उन्होंने अनुभव किया है और रचनात्मक संघर्ष के जिस दौर से वे लगातार गुज़रे हैं--उसी सिलसिले का एक आत्मिक और समयगत कथन इन रचनाओं का आधार है।
    इस गर्दिश से सभी गुज़रे हैं--और अभी बहुत से संघर्षशील लेखकों को इससे गुज़रना पड़ेगा, उन लेखकों को खास तौर से जो ‘ललित-लेखन’ 
    के पक्षधर नहीं हैं बल्कि दलित लेखन के लिए प्रतिबद्ध हैं।
    यह ऐसे ही भारतीय लेखकों की अपनी गर्दिश की विवरण-भरी कहानियां हैं।
    ‘सारिका’ के संपादन-काल में यह धारावाही स्तंभ प्रकाशित करना मेरे लिए अपने समकालीन लेखकों के माध्यम से समय की धड़कन को पहचानने का ‘कुतुबनुमा’ रहा है--जिससे मुझे दृष्टि भी मिलती रही है और मैं अपने समकालीनों से देश की हर भाषा की आत्मीय आवाज़ का साक्ष्य पाता रहा हूं और भारतीय युवा रचना की पहचान का जायज़ा भी लेता रहा हूं।
    --कमलेश्वर
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash
    Uday Prakash
    395 356

    Item Code: #KGP-904

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jal Sansadhan : Gaharata Sankat
    Krishna Kumar Mishra
    200 180

    Item Code: #KGP-9353

    Availability: In stock

    अगर कवि रहीम लिख गए हैं ‘बिन पानी सब सून’ तो बड़ी दूरदर्शिता के साथ पते की बात लिख गए हैं, और आगाह भी कर गए हैं कि ‘रहिमन पानी राखिए’। उनकी यह बात दिनोदिन हमें चेता रही है कि अगर पानी न बचाया, उसका संरक्षण न किया तो धरती पर पूरा जीवन संकट में पड़ जाएगा। समझदार लोग अब समझ रहे हैं कि कल अगर फिर कोई विश्वयुद्ध हुआ तो वह शर्तिया पानी के लिए होगा। और, यह हम सब देख ही रहे हैं कि दुनिया भर में पानी के लिए किस कदर त्राहि-त्राहि मचने लगी है। यह सपने में भी किसी ने कब सोचा था कि कल बोतलों और वाटर-कैनों में पानी बिकेगा। हम तो सदियों से इसे माँ प्रकृति की सौगात समझते आ रहे थे। लेकिन, सौगात भी बाजार का हिस्सा बन गई है।
    अनुभवी लेखक और वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. कृष्ण कुमार मिश्र ने अपनी इस पुस्तक ‘जल संसाधन : गहराता संकट’ में जल के इन तमाम पहलुओं का अपनी पैनी नजर से ‌विश्लेषण करके हमें गहराते जल संकट के बारे में आगाह तो किया ही है, धरती पर जीवन को बचाए रखने के लिए इसके संरक्षण के लिए चेताया भी है। इस बढ़ते संकट के प्रति लोगों को जागरूक करने का उनका यह रचनात्मक प्रयास निस्संदेह सराहनीय है। मेरा सुझाव है कि हम इस कृति को पढ़कर पानी को बचाने और उसकी फिजूलखर्ची रोकने का संकल्प लें। लेखक के इस सद्प्रयास में यह हमारा बड़ा योगदान हो सकता है। 

  • Dus Baal Naatak
    Pratap Sehgal
    240 216

    Item Code: #KGP-759

    Availability: In stock

    दस बाल नाटक
    ये नाटक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जिन कहानियों से प्रेरित हैं, उन कहानियों का समय वह समय है, जिसे हम भारत के  पुनर्जागरण और आजादी के संघर्ष का समय कहते हैं। भारत के अन्य इलाकों की अपेक्षा बंगाल में शिक्षा को व्यवस्था बेहतर थी, लेकिन आज के मुकाबले में उस शिक्षा-व्यवस्था को भी हम पिछड़ा हुआ ही कहेंगे।  ऐसे ही समय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व दुनिया को  चौका देता हैं। अपनी अन्य कलात्मक कियाओं के साथ-साथ वे बच्चों को कभी नहीं भूले। उन्होंने एक जगह कहा भी है कि बच्चा बडों का पिता होता है। यानी हम आने वाली हर पीढ़ी से कुछ सीखते हैं और कुछ सिखाते हैं।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बाल-कहानियों में सन्देश स्पष्ट हैं। ये संदेश बच्चों की अपेक्षा उनके अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अधिक हैं। अपना संदेश समाज तक पहुँचाने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर बच्चे को भी एक व्हीकल की तरह से इस्तेमाल करले हैं। कहानी का पाठक भल ही मौजूद हो, लेकिन उसका दर्शक नहीं होता। इसलिए प्रताप सहगल ने इन कहानियों को यहाँ लघु नाटकों के माध्यम से रखा है।  प्रताप सहगल हिंदी के जाने-माने कवि-नाटककार हैं। उन्हें भी अपन बहुविध लेखन के लिए जाना जाता हैं। इससे पूर्व उनके बाल-नाटकों की एक किताब 'छूमंतर' ( किताबघर प्रकाशान) प्रकाशित होकर मकबूल साबित हुई है। इसका प्रमाण उसके लगातार छपने चाल संस्करण हैं। इस बार प्रताप सहगल ने गुरुदेव की बाल-कहानियों का अपने बाल-नाट्य-लेखन का आधार बनाया है। ये नाटक जहाँ अपने समय में अवस्थित हैं, वहीं वे हमारे समय के साथ भी जुड़ जाते हैं और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इनकी उपयोगिता बनी रहेगी।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रताप सहगल-दोनों के कन्सर्न्स का जानने के लिए दस बाल-नाटकों का यह संग्रह हर बड़े और हर बच्चे के लिए एक जरूरी किताब बन जाता है।
  • Swatantra Bharat Mein Proud Shiksha
    Hiralal Bachhotia
    225 203

    Item Code: #KGP-9361

    Availability: In stock

    अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना और सबसे बढ़कर लोकतंत्र में अपनी भूमिका को समझने में एक पढ़ा-लिखा नागरिक या कम से कम एक साक्षर व्यक्ति ही कामयाब हो सकता है। स्वाधीनता आंदोलन के आयामों में हिंदी प्रचार-प्रसार, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, भाईचारा आदि समान निरक्षरता को मिटाना भी एक रचनात्मक कार्यक्रम था। बुनियादी तालीम में कार्यानुभव या करके सीखना पर पर्याप्त जोर दिया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही साक्षरता समाज शिक्षा का अभिन्न अंग बन गया।
    स्वतंत्र भारत में समाज शिक्षा का विस्तार प्रौढ़ शिक्षा के रूप में हुआ और धीरे-धीरे प्रौढ़ शिक्षा ने एक आंदोलन का रूप ले लिया। इसमें कम से कम कुछ लोगों और समर्पित समूहों के योगदान के साथ पढ़ना सिखाने की परंपरित वर्णमाला पद्धति के स्थान पर नई वैज्ञानिक पद्धति—चित्रा-वर्ण-विधि का अनुसरण कर कम समय में साक्षर बनाने का विकल्प सर्वाधिक सफल रहा और पढ़ना-लिखना सीखने-सिखाने की क्रिया को रोचक गतिविधि बनाने का प्रयत्न किया गया। दुनिया के अन्य देशों में आंदोलन के रूप में ही निरक्षरता पर चोट की गई। क्यूबा आदि के उदाहरणों से हम परिचित ही हैं—भारत में भी कमोबेश यही वातावरण निर्मित हुआ और निरक्षरता से निपटने के अनेक आयाम उद्घाटित हुए। देश में एक सकारात्मक वातावरण बना। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की 14 प्रतिशत साक्षरता केरल में तो शत-प्रतिशत ही हो गई। यह एक लंबी लड़ाई का परिणाम है जिसमें योजनाब; तरीके से आलोचनाओं के बावजूद उत्तरोत्तर उपलब्धियां प्राप्त करने में सफलता मिली। अब सभी जान गए हैं कि विकास सुफल प्राप्त करने, योजनाओं का लाभ लेने में साक्षरता का योगदान कितना जरूरी है। कमोबेश यही स्वतंत्र भारत में प्रौढ़ शिक्षा की उपलब्धता की कहानी है। इसका एक पहलू यह भी रहा कि आम आदमी साक्षरता के सहारे कुछ तो आगे बढ़ा और अपनी मंजिल को पहचान सका।
  • Tantu
    Bhairppa
    695 626

    Item Code: #KGP-158

    Availability: In stock


  • Aacharya
    Indira Dangi
    180 162

    Item Code: #KGP-1573

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    380 342

    Item Code: #KGP-9337

    Availability: In stock

    नरेन्द्र कोहली व्यंग्य साहित्य में कथात्मकता, वैचारिक उदारता और संवेदनात्मक सघनता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने विभिन्न विधाओं के साथ हिंदी व्यंग्य को भी समृद्ध किया है। उनके व्यंग्य लेखन की बहुत बड़ी शक्ति है घटना को अनुभव में रूपांतरित कर लेने की क्षमता। निजी सुख-दुःख से लेकर देश-दुनिया के जाने कितने पक्षों पर उन्होंने लिखा है। वे संप्रेषण का महत्त्व जानते हैं, इसलिए उनकी रचनाएं पाठकों में पर्याप्त लोकप्रिय हैं। कई बार वैचारिक पक्षध्रता या जड़ता एक लेखक को सीमित कर देती हैं। नरेन्द्र कोहली जड़ता को ‘रचनात्मक दृढ़ता’ से अपदस्थ करने वाले विवेकशील लेखक हैं। राजनीति से जुड़े विषयों में उनका विवेक विशेष रूप से देखा जा सकता है। वे असंगति पर आक्रमण करते हुए भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ मूल्यों को बचाने का प्रस्ताव रखते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में नरेन्द्र कोहली के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Samay Mein Vichar
    Prabhakar Shrotiya
    575 518

    Item Code: #KGP-830

    Availability: In stock

    समय में विचार
    ऐसी यथार्थपूर्ण, गहन, तर्कपुष्ट एवं झकझोरकर रख देने वाली अभिव्यक्ति हिंदी में कम ही हुई है। यह आश्चर्यचकित कर देने वाला तथ्य है कि शायद श्रोत्रिय जी का साहित्यिक पाठक इन आलेखों को पढ़ने के बाद सहसा विश्वास न कर सकेगा कि एक आलोचक अपने काल के प्रवहमान विचार-बिंदुओं पर भी इतनी गहराई, तन्मयता एवं राग से लिख सकता है। हमारे राष्ट्रीय जीवन की विडंबनाएं यदि यहां रेखांकित हैं तो सामाजिक जीवन की विसंगतियां भी उद्घाटित हैं। एक ओर अंतर्राष्ट्रीय जीवन की धड़कनों पर नज़र है तो दूसरी ओर वैश्वीकरण के छल-छद्म एवं राजनीतिक बिसात पर बिछे कूटनीतिक मोहरों की चालें भी लेखक की दृष्टि से नहीं बची हैं।...वर्तमान के अंतर्विरोध पर गहरी नज़र के साथ-साथ भविष्य की चिंताकुलता इन आलेखों का वैशिष्ट्य है।
    –पश्यंती
    ये निबंध जहां एक ओर पाठकों की कसौटी पर पहले से ही परीक्षित हैं, वहीं अपने समय के फलक पर वस्तुनिष्ठ चिंतन की एक ऐसी निर्मिति हैं, जिन्हें अपने समय, समाज और साहित्य के प्रति सजग एक लेखक का तत्त्व-चिंतन माना जाना चाहिए और यदि हम सुपरिचित लेखक शुकदेव सिंह के मत का आश्रय लें तो ‘ये निबंध (आज व्यक्तिवादी चित्तवृत्ति को केंद्र में लेकर लिखे जा रहे संपादकीयों के सापेक्ष) निबंधों के विकल्प के रूप में एक सात्त्विक विधा का आविष्कार हैं।’  
    –जनसत्ता, सबरंग
    श्रोत्रिय जी अकेले दम पर सच लिख रहे हैं, एक भारतीय मनुष्य के नैतिक विजन के साथ। उनकी निर्भीकता तीसरी दुनिया की मनीषा की निर्भीकता है, प्रदत्त स्थितियों और प्रयोजन की परिस्थितियों से मुठभेड़ की यह मनीषा उम्मीद जगाती है।...संरचना में आश्चर्यजनक अनुशासन का परिचय देते हुए कथ्यगत क्रांतिकारी आशय भर देना कोई श्रोत्रिय जी से सीखे। यह गद्यकला का नागर स्वभाव उन्होंने बड़ी साधना से अर्जित किया है।...यह उन रचनाकारों-आलोचकों का पथ है, जो स्वतंत्रता की बात करते हैं, आत्मा और विवेक को गिरवी नहीं रखना चाहते।...श्रोत्रिय जी जड़ सूत्रवादियों और अंध मतवादियों के उन तमाम विभ्रमों का खंडन करते हैं, जो स्वाधीनता को विचारहीनता मानते हैं। स्वाधीनता का तर्क विचारहीनता का पर्याय नहीं है, न ही हर बार अचूक अवसरवाद। स्वाधीनता व्यक्ति हो, समाज हो, राष्ट्र हो, सबसे अपना मूल्य मांगती है।...                      
    –समीक्षा
  • Dekho Samjho Karo
    Jagat Ram Arya
    160 144

    Item Code: #KGP-105

    Availability: In stock

    बालकों, अपने चारों ओर की दुनिया को देखो। इसमें भगवान ने हजारों वस्तुएं बनाई हैं-हवा, पानी, सूर्य, पृथ्वी, अग्नि आदि। इनमें से हर एक में सैकड़ों-हजारों शक्तियां भरी पड़ी हैं जिनमें से कुछ एक को हम-तुम जानते हैं। कइयों को हम बिलकुल नहीं जानते। कुछेक को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। अपनी दुनिया के बारे में यह हमारा अधूरा ज्ञान है। इसीलिए हम उन शक्तियों से लाभ नहीं उठा पाते। जैसे किसी निर्धन की खाट के नीचे धरती में सोने-चांदी का खजाना दबा हो, किंतु जिसका उसे पता न हो और वह भूखा नंगा रहकर दिन-रात दुख सहता हो। काश, वह उस छिपे खजाने को जान पाता और उसका प्रयोग करके सुखी बन जाता। इसी प्रकार अपने आसपास की वस्तुओं के बारे में भी हम बहुत कम जानते हें। ओर उसका कम लाभ उठाते हें। उनका पूरा लाभ हम तभी उठा सकते हैं जब उनहें अच्छी तरह जान लें। इस प्रकार वस्तुओं के ‘विशेष ज्ञान’ को ही विद्या कहते हैं।
    आज हम मोटर, हवाई जहाज, राकेट आदि के अजब अनोखे आविष्कार देखते हैं, जो विज्ञान के सहारे ही बनाए गए। बड़े-बड़े आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक भी हमारे-तुम्हारे जैसे दो हाथ, दो पांव वाले मनुष्य होते हैं। उनमें केवल तीन विशेष गुण होते हैं। वे हर वस्तु को ध्यान से देखते हैं, गहराई से समझते हैं और हाथ से करके देखते हैं। यदि हम भी विज्ञान पढ़ना चाहते हैं तो हमें भी इनहीं तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए-
    1. हम अपने प्रयोग की वस्तुओं को ध्यान से देखें।
    2. हम वस्तुओं में छिपी शक्तियों और गुणों को समझें।
    3. हम उन वस्तुओं के नित्य नए प्रयोग करना सीखें।
    इस पुस्तक में वैज्ञानिकों की सच्ची और रोचक घटनाओं के आधार पर विज्ञान के इन्हीं तीन अंगों पर बल दिया गया है। इनका प्रयोग हर बालक अपने घर और विद्यालय में कर सकता है। 
    —लेखक
  • Jalte Huye Daine Tatha Anya Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    225 203

    Item Code: #KGP-25

    Availability: In stock

    जलते हुए डैने तथा अन्य कहानियाँ
    'जलते हुए डैने' से 'इस बार' तक की कथा-यात्रा के ये अनेक पड़ाव है । अनुभव एवं अनुभूतियों के कई अक्स ! जीवन और जगत में जो हो रहा है, उसके कुछ धुँधले, कुछ उजले रेखा-चित्र ! पर रेखा-चित्रों में यथार्थ की मात्र रेखाएँ ही नहीं, कहीं-कहीं कुछ रंग भी है, जो मिट कर मिटते नहीं । घुलने के बावजूद भी घुलते नहीं । स्मृति-पटल पर ऐसे अंक्ति हो जाते है, जैसे पाषाण पर उकेरी गहरी रेखाएँ । रेखाओं की भी अपनी भाषा होती है । रेखाओं के भी अपने सुख-दु:ख, अपनी व्यथा-वेदना होती है ।  इस निखिल सृष्टि में ऐसा कुछ भी तो नहीं, जो अर्थपूर्ण न हो ! जिसकी अपनी कोई सार्थकता न हो !
    अनेक सत्यों को परिभाषित करती ये सरल, सहज, सपाट-सी कहानियाँ, कहीं कुछ न कह कर भी कितना कुछ नहीं कह जाती । असत्य का यथार्थ, सत्य के यथार्थ से सम्भवत: आज़ अधिक गहरा होता है । अधिक विस्तृत, अधिक प्रामाणिक । प्रासंगिक ही नहीं, अधिक आकर्षक भी । शायद इसलिए हर दौड़ में सत्य के पाँव, झूठ से पीछे रह जाते हैं ।  पर असत्य जीत कर भी हार क्यों जाता है ? जल में पड़ी परछाई पकड़ने की तरह आदमी कुछ चाहता है । परन्तु जो है, और जो होना चाहिए के बीच की संधि-रेखा इतनी धुँधली क्यों है ?

  • Jauhar Ke Akshar
    Santosh Shelja
    160 144

    Item Code: #KGP-9075

    Availability: In stock


  • Lok Ka Avlokan
    Suryakant Nagar
    280 252

    Item Code: #KGP-787

    Availability: In stock

    प्रस्तुत निबंध-संग्रह में कुछ निबंध सिद्धांतसम्मत, कुछ शोधपरक और कुछ मौलिक हैं । कुछ तो पत्र-पत्रिकाओं में छपे भी हैं और कुछ एकदम नए । किन्तु, सभी लोकगंगा में स्नात हैं, आकंठ डूबे भी । आंचलिकता अथवा क्षेत्रीयता के आग्रह से दूर ये निबंध अपने ढंग से लोक की बातें बयां करते हैं, फिर भी भोजपुरी वर्चस्व से नकार नहीं । लोक का ही चिंतन-मनन, लोक का ही अध्ययन-अनुशीलन और लोक के ही सुख-दुःख का निरूपण इन लोकरंगी निबंधों का वणर्य विषय है । आगे ये 'लोक का अवलोकन' पाठकों को कितना लुभा पायेगा, यह तो उनकी प्रतिक्रियाएं ही बताएंगी । 
  • Gauri
    Ajeet Kaur
    125 113

    Item Code: #KGP-2050

    Availability: In stock

    गौरी धीरे-धीरे उठी। चावलों वाले कोठार के एकदम नीचे हाथ मारा और टोहकर एक छोटी-सी पोटली बाहर निकाल ली। धीरे-धीरे उसे मैले-से चिथड़े की गाँठें खोलीं। बीच में से दो बालियाद्द निकालीं, जिनमें एक-एक सुर्ख मोती लटक रहा था।
    उसने बालियाँ काँसे की एक रकाबी में रखकर चूल्हे पर रख दीं। जो भी सुबह रसोई का दरवाजा खोलेगा, उसे सबसे पहले वही दिखेंगी और उससे कहेंगी, ‘इस घर में से एक ही चीज मुझे मिली थी, तुझे पैदा करने का इनाम। तूने उस जन्म को अस्वीकार कर दिया है। तूने उसी कोख को गाली दी है, जिसने तुझे अपने सुरक्षित घेरे में लपेटकर और अपना लहू पिलाकर जीवन दिया। ले ये बालियाँ। ये मैं तुझे देती हूँ। ये गाली हैं, मेरे जन्म पर, तेरे जीवन पर। गाली भी और बद्दुआ भी। ले ले इन्हें, बेचकर दारू पी लेना। मेरे बाप को दे दिए। मुफ्त में दान में। ले मेरा दान और मेरी बद्दुआ, जो पृथ्वी के हर कोने तक तेरा पीछा करेगी।’
    गौरी ने अपनी छोटी-सी कपड़ों की पोटली भी चूल्हे के पास रख दी और बाहर निकल आई।
    पिछले आँगन का दरवाजा खोला और गली में बाहर निकल आईं।
    -इसी उपन्यास से
  • Uski Bhee Suno
    Bharti Gore
    320 288

    Item Code: #KGP-471

    Availability: In stock

    ‘उसकी भी सुनो’ पुस्तक की कहानियां सामाजिक रूढ़ियों, पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। इसमें समाज के सभी तबकों की स्त्रिायों की समस्याओं का गंभीर विवेचन है। सफेदपोश समाज में जीती स्त्री, बाहर से अमीर और सुखासीन लगने वाली स्त्री की अस्तित्वहीन स्थिति के साथ-साथ दलित और आदिवासी स्त्री के सदैव उपेक्षित अस्तित्व की चर्चा है। इन कहानियों की नायिकाओं की विशेषता यह है कि वे कभी हार नहीं मानतीं।
    प्रस्तुत पुस्तक की हर कहानी अपने आप में समाज में महिलाओं के प्रति घटने वाली हर घटना को या कहिए हर आयाम को बड़े ही सटीक अंदाज में पेश करती है। साहित्य ने हमेशा से हर आंदोलन को प्रभावित किया है और जन आंदोलनों ने भी हमेशा साहित्य को प्रभावित किया है। चाहे वह आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद के आंदोलन, साहित्य ने कहानी, कविताओं, गीतों के जरिए हमेशा आम जनता के आंदोलनों को एक बेहतर आवाज दी है। साहित्य के बिना समाज अधूरा है। और अगर साहित्य महिलाओं द्वारा रचा जाए तो उसकी बात ही निराली है।
    धार्मिक उन्माद का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती हैं। दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक महिलाओं के ऊपर तो इनकी दोहरी मार पड़ती है। नारी-मुक्ति की इस मुहिम को समाज के अन्य हिस्सों को साथ लेकर एक नए बदलाव की तरफ बढ़ना होगा। समाज के बदलाव में साहित्य इसी कड़ी में महिलाओं के लिए एक सशक्त रास्ता है।
  • Charaiveti-Charaiveti
    Shyam Singh Shashi
    75 68

    Item Code: #KGP-1892

    Availability: In stock


  • Paarijat (Novel)
    Nasera Sharma
    695 487

    Item Code: #KGP-778

    Availability: In stock


  • Hansi Oth Per Aankhen Nam Hain
    Ramdarash Mishra
    75 68

    Item Code: #KGP-9039

    Availability: In stock

    मेरी समग्र ग़ज़लें यहाँ रचना-तिथि के क्रम से दी जा रही है । शुरू की ग़ज़लों पर मैंने रचना-तिथि नहीं लिखी थी अत: यहाँ अनुमान से उनके रचना-वर्ष का उल्लेख कर दिया गया है । कुछ पूर्व प्रकाशित ग़ज़लों को रूप की दृष्टि से फिर तराशा है ।
    ये ग़ज़लें शास्त्रीय दृष्टि से कैसी है यह तो ग़ज़ल-शास्त्री ही जाने किन्तु मुझे विश्वास है कि कविता के पाठकों को इनमें कविता जरूर मिलेगी । मुझे इनके द्वारा अपने अनुभवों को व्यक्त करने में एक अलग तरह की तृप्ति मिली है । मेरी तृप्ति यदि पाठकों क्रो तृप्ति बन सकेगी तो अधिक सार्थक होगी ।
  • Kaalchiti
    Shekhar Mallik
    350 315

    Item Code: #KGP-9320

    Availability: In stock

    यह उपन्यास है...
    उस हौसले और हिम्मत के लिए, 
    जो अपने हक के लिए लड़ती है...
    उस आदिम, जीवट, 
    अथक संघर्षशीलता के लिए...
    उस इनकलाबी भावना के लिए, 
    जो हर दौर में जिंदा होती है...
    सत्ता पोषित हिंसा के खिलाफ...
    जन-विमुख, भ्रष्ट सत्ता और 
    काॅरपोरेट गठबंधन के खिलाफ...
    उस आततायी सत्ता के खिलाफ...
    जो सोनी सोरी जैसों के खिलाफ 
    घृणित षड्यंत्र रचती है!
    निर्धन, निहत्थे, शांतिप्रिय आदिम 
    मनुष्यों का संहार करने वाली
    राजनीति के खिलाफ...!

    प्रस्तुत उपन्यास अर्ध गल्प और अर्ध समकालीन यथार्थ! क्योंकि चाहे कथा और पात्रा काल्पनिक हों, कुछ घटनाएँ वास्तविकता पर आधारित हैं। पहाड़-पानी और वन एवं भूमि सहित सामान्य मनुष्यों पर बलपूर्वक अधिकार करना अनैतिक है। केवल आम जन के समसामयिक उत्पीड़न को व्यक्त करना और ऐसे हिंड्ड कृत्यों की निंदा करना ही इस रचना का एकमात्र ध्येय है। जनजातीय समुदायों, मूलवासियों और आदिम संस्कृतियों पर इस दौर में हो रहे सत्ता-पोषित दमन का प्रतिवाद करना प्रत्येक विवेकशील नागरिक का कर्तव्य है। यह गद्य-पुस्तक सर्वमान्य मानवाधिकारों, सच्चे लोकतंत्र के पक्ष में और मनुष्य की स्वतंत्रता के हनन के सभी प्रकार के कृत्यों के विरुद्ध है।
  • Isliye
    Ashok Gupta
    175 158

    Item Code: #KGP-1831

    Availability: In stock


  • Raahi Ko Samjhaye Kaun
    Bal Swaroop Raahi
    130 117

    Item Code: #KGP-523

    Availability: In stock

    बालस्वरूप राही हिंदी ग़ज़ल और गीत के एक ऐसे पुख्ताकलम रचनाकार हैं जिन्होंने गत पचास वर्षों में अपनी रचनाओं द्वारा जहाँ एक ओर हिंदी ग़ज़ल और गीत को स्तर, प्रतिष्ठा और एतबार बख्शा है, वहीं दूसरी ओर इन्होंने हिंदी के छंद-काव्य को ऐसे समय में समृद्ध करने का कार्य किया है जब वह विभिन्न काव्यांदोलनों के चलते अपनी साख खोने लगा था। स्पष्ट है कि ये दोनों कार्य अपना विशेष महत्व रखते हैं ।
    राही ने पीर, नजीर, गालिब और इकबाल का कलाम पढा है और इन शायरों के बेशुमार अशआर उन्हें कंठस्थ हैं, जिनका प्रयोग वह उचित मौकों पर करते हैं । लेकिन यदि हम राही की शायरी पर इनमें से किसी का प्रभाव तलाश करने का प्रयास करें तो सफलता मिलनी मुमकिन नहीं।  यही कारण है कि राही की गज़लें उनकी अपनी भाषा, शैली और सोच की मज़हर हैं ।
    उसकी ग़ज़लें उर्दू ग़ज़ल की परंपरा से अलग एक नई परंपरा की स्थापना करती नजर जाती हैं । निसंस्देह यह एक नई परंपरा है ।
    राही की गज़लें हिंदी साहित्य में एक खुशगवार इजाफे की हैसियत और विशेष महत्व रखती हैं ।

  • Hindi Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    150 135

    Item Code: #KGP-61

    Availability: In stock

    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उर्दू में ग़ज़ल कहने की परंपरा बहुत पुरानी है । मीर, गालिब, जौक, सौदा से लेकर जिगर, सजाना, फैज, साहिर और उनके बाद की अनेक पीढियों तक ग़ज़ल उर्दू शायरी का जरूरी हिस्सा रही है । इधर हिंदी में भी ग़ज़ल ने अपनी एक परंपरा बना ली है और निराला, प्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी, हरिकृष्णा 'प्रेमी', शंभुनाथ शेष, विजित, त्रिलोचन, शमशेर, बलवीर सिंह रंग, दुश्यंत कुमार और उनके बाद छंदबद्ध लिखने वालों की लगभग पूरी की पूरी पीढ़ी  ग़ज़ल -लेखन से जुड़ गई है। कहना ही होगा कि हिंदी ग़ज़ल  के क्षेत्र में पूरे भारत में लगभग हजार से अधिक रचनाकार अपने ढंग से, अपने रंग में, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ ग़ज़लें कह रहे हैं । असलियत यह है कि आज काव्य-मंचों पर, पत्र-पत्रिकाओं में, पुस्तक प्रकाशन में ग़ज़ल का बोलबाला है ।
    इतने व्यापक रचना-संसार में निश्चय ही बहुत-सी ग़ज़लें ऐसी है, जिन्हें काव्यपेमी बार-बार पढ़ना और अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे । प्रस्तुत 'हिन्दी ग़ज़ल शतक' में ग़ज़ल को विविध शैलियों में लिखने वाले पच्चीस ग़ज़लकारों की चार-चार ग़ज़लें दी जा रही है, जो हिंदी ग़ज़ल  के वैविध्य को निश्चय ही प्रभावकारी अंदाज में पेश करती है ।
  • Paani Ka Svaad
    Nilesh Raghuvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9089

    Availability: In stock


  • Subhash : Ek Khoj (Paperback)
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    295

    Item Code: #KGP-464

    Availability: In stock

    आज भी वह प्रश्न अपनी जगह पर है और प्रायः तब तक रहेगा जब तक उसका हल नहीं हो जाता कि सुभाषा द्वितीय विश्व समर के अंत हो जाने पर हवाई दुर्घटना में गोलोकवासी नहीं हुए तो कहां गए? क्यों शाहनवाज खां और खोसला आयोग की रिपोर्ट रद्द हुई? क्यों यह प्रश्न ठंडे बस्ते मं डालने की साजिश चलती रही? इसके पीछे कौन लोग थे और हैं? अब मैंने यह जानना चाहा है कि उन पर क्या हो रहा है? इस दृष्टि से मैंने भारत-भ्रमण किया। भारत के अनेक महानगरों, नगरों आदि का दौरा किया। उनमंे वे नगर विशिष्ट थे, जिनका संबंध आज भी नेताजी से है। अनेक स्थानों पर मेरे व्याख्यान हुए।
    अंत में प्रायः मुझसे यह प्रश्न किया गया कि क्या सुभाषा की मृत्यु हवाई दुर्घटना से जापान जाते समय हुई थी? कतिपय जगह यह थी पूछा गया कि क्यों अनेक बार नेताजी के जीवित होने और भारत में प्रकट होने का प्रसंग सुखर््िायों में रहा? इसमें कितना सत्य है? मैंने अपने व्याख्यानों में नेताजी की मृत्यु की चर्चा कहीं भी नहीं की थी। फिर भी श्रोताओं की रुचि इस प्रसंग में बराबर सामने आती रही। 
    आइए, अब इस जटिल प्रश्न पर हम और आप आमने-सामने बैठें और इस बहस को तब तक जारी रखें, जब तक किसी तह तक नहीं पहुंच जाएं। 
    —राजेन्द्रमोहन भटनागर
  • Sarak Durghatnon Se Kaise Bachen
    E.W. Saxbi
    40

    Item Code: #KGP-920

    Availability: In stock


  • Guru-Dakshina
    Sanjiv Jaiswal
    300 270

    Item Code: #KGP-784

    Availability: In stock

    गुरु-दक्षिणा
    "सर, आप चाहते थे कि मैं केवल दो रातों के लिए आपके पास आ जाऊं लेकिन आपका बेटा पूरी जिंदगी के लिए मुझे यहाँ लाना चाहता है," दीपा ने एक-एक  शब्द पर जोर देते हुए कहा ।
    सड़ाक...सड़ाक...सड़ाक...जैसे नंगी पीठ पर चाबुक पड़ रहे हों। प्रो. कुमार का सर्वांग कांप उठा। उन्होंने कभी स्वप्न में भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की थी।  दीपा ने एक झटके में उनके चेहरे का नकाब नोच डाला था। अपने बेटे के सामने ही उन्हें नंगा कर दिया था। उनका चेहरा सफेद पड़ गया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सारा रक्त चूस लिया है।
    अवाक तो प्रकाश भी रह गया था। चंद क्षणों तक तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि क्या करें। फिर उसने दीपा की बाहों को पकड़ झिंझोड़ते हुए कहा, "दीपा, तुम होश में तो हो। तुम्हें मालूम है कि तुम क्या कह रही हो?"
    "अच्छी तरह मालूम है लेकिन शायद तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे डैडी रिसर्च पूरी कराने के लिए मुझसे क्या गुरु-दक्षिणा मांग रहे थे । यदि सत्य उजागर किए बिना मैं तुमसे शादी कर लेती तब तुम्हारे डैडी जिंदगी भर मुझसे आंखें न मिला पाते । वे भले ही गुरु का धर्म भूल गए हों लेकिन मैं शिष्या का धर्म नहीं भूली हूँ। इसलिए अपनी बहू के सामने आजीवन जलील होने की जलालत से मैं उन्हें मुक्ति देती हूँ। यही मेरी गुरु-दक्षिणा होगी ।"

    -इसी संग्रह से
  • Aagaami Ateet
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-210

    Availability: In stock


  • Gopal Krishna Gokhale : Jeevan Darshan
    Gaurav Chauhan
    200 180

    Item Code: #KGP-670

    Availability: In stock

    जिस समय हमारी यह भारतभूमि अंग्रेजों के अत्याचारों, प्रताड़नाओं की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी उस समय देश के अनेक वीर सपूतों ने या तो अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश के मान-प्रतिष्ठा और स्वाभिमान की रक्षा की या जीवन भर देश के लोगों को देश की आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करते रहे। उन्हीं वीर सपूतों में से एक वीर सपूत थे—गोपालकृष्ण गोखले। गोखले जी ने उस समय न केवल इस देश के युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया बल्कि अपना संपूर्ण जीवन देश को आजादी दिलाने के प्रयासों में ही न्योछावर कर दिया।
  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 297

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Dharati Hone Ka Sukh
    Keshav
    100 90

    Item Code: #KGP-1988

    Availability: In stock

    केशव की कविताएं
    मैं/तुम्हें  ढूंढने निकला/तुम/मुझे/अफसोस कि हम/खुद को ढूंढते रहे/ एक दूसरे के मरुस्थल में । केशव की कविताएँ उस दूसरे को जानने का जुनूनी प्रयत्न हैं, इसलिए नहीं कि उसे जाने बिना संसार क्रो नहीं जाना जा सकता, बल्कि इसलिए कि उसे जाने बिना खुद को नहीं जाना जा सकता । इस यात्रा में वे अकेले हैं, संपूर्णता की असंभव चाह लिये सूक्ष्म को भेदने, जानने और पा लेने के जुनून के प्ताथ : झुर्रियां सच है/ देह क्या स्पर्श/ देहातीत/ हम दोनों/ जीवित हैं स्पर्श में/ देह में मृत । देह के उस पार जाने का यत्न, पर देह के सिवा नहीं, यह रास्ता तो  है, मंजिल नहीं वह देहातीत अवस्था, जहां मेरा-तेरा का भेद मिट जाए तू मुझमें है, मैं तुझमें हूं । आसान नहीं है किसी दूसरे को इस तरह जानना, यह छलांग पहले अपने बाहर, फिर अपने भीतर लगती है, उस दूसरे को जानना, वह दूसरा ही हो जाना है ।
    केशव की कविताएं उनके लिए हैं जो अपनी तलाश में हैं प्रेम की ऐसी नदी, जो बहती तो जीवन के बीचों-बीच है, पर दिखाई नहीं देती, बहुत कोशिश करो तो सुनाई देती है आवाज उसकी : जब तुम्हारे कान अपनी ही छाती से लगे हों । वह अवस्था कि उस दूसरे को सुनना, खुद के सुनने जैसा हो पाए, उस दूसरे को कहना, खुद को कहने जैसा । प्रेम, सत्य, जीवन, ईश्वर अकथनीय है । इसलिए हम इन्हें बार-बार कहते और इन्हें इनकी असंभव जगहों से उठाकर दुनिया में लाकर अपने लिए संभव बनाते हैं । यह केशव की कविता का दुस्साहस है । जीवन एक दुस्साहसिक यात्रा ही तो है, न कहीं से, न कहीं तक । इस यात्रा में अपनी कल्पना को अपना सच बनाना ही कविता का लक्ष्य है, संसार के बरक्स खडा एक सृजनात्मक संसार, जो उस दूसरे धरातल से कहीं जियादा साफ दिखता है... 
    वास्तविक संसार वास्तव में अधूरा ही है । केशव की कविताएं इसे पूरा करती हैं, अपने रचे एक नए काल्पनिक संसार में, जो कल्पना भी नहीं है, न सच ही । वह इन दोनों के बीच खड़ा है, जहाँ से सच इतना साफ पहले कभी नहीं दिखा, जहां से कल्पना इतनी मच कभी नहीं लगी । इन कविताओं में हम केशव की दुनिया में एक अंतरंग भाव से झांक सकते हैं, और शायद यह तय कर सकते हैं कि वे सबको यात्रा में किस  रूप में शामिल हैं । न केवल मनुष्य का भीतरी संसार, बल्कि इनकी कविताएं मनुष्य जीवन के लगभग सभी पहलुओं का स्पर्श करती हैं उसकी गहराई, ऊचाई और विडंबनाओं से एकमेक । उसके आलोक, अधिकार, खूबसूरती, दु:ख और संघर्ष में लिथडी हुई । अपनी ताजा कविताओं में केशव ने कुछ ऐसे विंध्याचल भी लांघें हैं, जिनसे समकालीन कवि प्राय: बचते रहे हैं । देश और दुनिया को बांटकर स्वार्थ-साधना में लगे लोगों को केशव के कवि ने आग्रेय नेत्रों से देखा है, क्योंकि आम आदमी यहाँ पूरी शिद्दत के साथ उपस्थित है ।
    प्रकृति भी अपनी पूरी भव्यता और उदात्तता के साथ केशव की कविताओं में मौजूद है । पहाडी परिवेश के मुंह बोलते चित्र इधर की इनकी कविताओं में बहुतायत से नजर आए हैं, जिनके जरिये हम पहाडी जीवन को बहुत गहराई और करीब से देख और जान सकते हैं । केशव प्रकृति को किसी पर्यटक की दृष्टि से नहीं देखते, जिसके पास कैमरा-आंख तो होती है पर उस जंगल में भीतर उतरने का साहस नहीं । वे उसके भीतर उतरते हैं, उसे मात्र अनावृत्त करने नहीं, बल्कि उसके रहस्यों में अपना रहस्य खोजने । इस मायने में इनकी कविताएं अपने समकालीन कवियों में सबसे अलग हैं और उनमें एक निडोंष ताजगी है गहराई है और है भीतर ही भीतर उतरते चले जाने की व्याकुलता, शायद उस उद्यम तक, जहां से जीवन निस्मृत हो रहा है...
  • Anandmay Jeevan Kaise Payen
    Swed Marten
    200 180

    Item Code: #KGP-282

    Availability: In stock


  • Kambakht Nindar
    Narendra Mohan
    350 315

    Item Code: #KGP-793

    Availability: In stock


  • Ved Kya Hain ?
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-8002

    Availability: In stock

    पुस्तक के प्रारम्भ में यह बताने की कोशिश की गई है कि वेद का अर्थ क्या है तथा वेदों का निर्माण कब हुआ । फिर चारों वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के बारे में अलग-अलग बताया है कि उनमें से प्रत्येक में क्या-क्या है। इसके साथ ही यह भी बताया है की प्रत्येक वेद के चार भाग हैं —संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद । फिर इन चारों भागों के बारे में विस्तृत चर्चा की गयी है।
    इसके उपरांत वेदांगों के बारे में जानकारी दी गयी है । वेदांग छह हैं — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंदशास्त्र । इन छह वेदांगों के बारे में पुस्तक में सविस्तार चर्चा की गयी है । 
    चारों वेदों के आलावा चार उपवेद भी हैं । ये हैं—आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्व वेद तथा स्थापत्य वेद । इनके बारे में भी आवश्यक जानकारी पुस्तक में दी गयी है ।
  • Bhartiya Bhaashaaon Ki Shreshtha Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    260 234

    Item Code: #KGP-73

    Availability: In stock

    भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कहानियां 
    प्रस्तुत संकलन में भारत की सोलह प्रमुख भाषाओं की सोलह प्रतिनिधि कहानियां समाविष्ट की गई हैं । कश्मीर से कन्याकुमारी तक का परिवेश किसी हद तक इनमें प्रतिबिंबित हुआ है । ये कहानियां हमें मात्र छूती-छेड़ती ही नहीं, बल्कि हँसाती, गुदगुदाती और कहीं-कहीं रुलाती भी हैं । साथ ही बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करती हैं ।
    इनमें भारत के स्थूल स्वरूप का प्रतिबिंबन ही नहीँ, भारत की अंतश्वेतना का स्पंदन भी मिलेगा और भारत की माटी की गंध भी ।
    क्या है भारत ? क्या है उसकी अस्मिता की पहचान ? क्या हैं उसकी खूबियाँ ? खूबियों के साथ-साथ खामियां भी। यथार्थ के धरातल पर अंकित ऐसे अनेक ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर इन जीती-जागती, बोलती-बतियाती कालजयी कृतियों में अनायास उपलब्ध हुए बिना नहीं रहेंगे ।
    इनमें अतीत या वर्तमान ही नहीं, भविष्य का अंधकार से उबरता उजास भी है । अपने समग्र रूप में एक बृहुत् समाज, जो कहीं एक देश का ही नहीं, महादेश की पर्याय  भी बन जाता है। ये साधारण-सी कहानियां अपने में  अनेक असाधारण संसार सहेजे हैं ।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : S.R. Harnot (Paperback)
    S. R. Harnot
    180

    Item Code: #KGP-7214

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Brunch Tatha Anya Kahaniyan
    Shailendra Sagar
    225 203

    Item Code: #KGP-452

    Availability: In stock

    सुपरिचित वरिष्ठ कथाकार शैलेन्द्र सागर के इस संग्रह में आज की उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते उभरती सामाजिक-सांस्कृतिक टूट-फूट के तहत जटिल विसंगतियों के दुष्चक्र में फंसे पात्रों की कहानियां दर्ज हैं। अधिकांश कहानियों में स्त्री-पुरुष की परंपरागत छवियों के बरक्स उपभोक्तावादी दौर में बुनते-घुनते संबंधें में दिनोदिन पसरते तनावों, अलगावों और नए पनपते रिश्तों की ऐसी अलक्षित सच्चाइयां पूरी प्रामाणिकता के साथ नजर आती हैं जहां पुराने समय की रूढ़ भूमिकाएं धूमिल हैं और बाजारवाद के बदलते दौर में रिश्ते पहले से ज्यादा जटिल, यथार्थपरक और अवसरवादी होते जा रहे हैं। घर-परिवार से लेकर बाहर की दुनिया में संघर्षरत पात्रों की उद्विग्नता, बेचैनी और संवेदना के क्षरित होने की दास्तां यहां पूरी बेबाकी से उकेरी गई है। सच तो यह है कि संक्रमण के इस संवेदनहीन समय में निष्प्रभ पड़ते संबंधें की बारीकी से पड़ताल करती ये कहानियां आश्वस्त करती हैं कि अचूक अवसरवाद की अंदरूनी चालों को समझने के लिए हमें संवेदना संसार में लौटना पड़ेगा जहां आपको दरारों के बीच दिखेगी मुस्कराहट, अनकही टकराहटों के बीच दिखेगी मनुष्यता और हताशा के बीच कहीं से खिल उठेंगी आशा-उल्लास की कोंपलें भी...।
    विडंबनापूर्ण स्थितियों से उबरने के लिए रिश्तों की कोमलता को बचाए रखने की मुहिम छेड़ती हैं ये कहानियां...
  • Uttar Ghaat Adhura
    Ramashankar Shrivastva
    65 59

    Item Code: #KGP-9069

    Availability: In stock


  • Sapanon Ki Neeli Si Lakeer
    Amrita Pritam
    240 216

    Item Code: #KGP-1972

    Availability: In stock

    सपनों की नीली-सी लकीर
    एक वर्जित फल खाने पर 'आदम' और 'हव्वा' को जन्नत से निकाल दिया गया था । इस इतिहास को मैंने एक नज्म में लिखा : "एक शिला थी और एक पत्थर, जिन्होंने वर्जित फल खा लिया, और जब मैली जमीन पर वो पत्थरों की सेज पर सोये तो उन पत्थरों की टक्कर से आग की एक लपट-सी पैदा हुई--बदन में से आग का जन्म हो गया तो पत्थर भी कांप गया, शिला भी कांप गई । समाज की नजर का धुआं ही उनके पास था, उसी की घुट्टी उस आग को दे दी तो पवन की छाया हंसने  लगी---फिर शिला और पत्थर धरती के हवाले हुए और आग की लपट पवन के हवाले और मैं आग की लपट-सी हैरान थी कि मेरे भीतर से यह सपनों के नीली-सी लकीर कहां से निकलती है" यह उस नीली-सी लकीर का तकाजा था कि मैं हर कल्पना को धरती पर उतार लेना चाहती थी--अपनी कलम से भी और अपने कर्म से भी ।
    - अमृता प्रीतम
  • Mahasagar
    Himanshu Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-34

    Availability: In stock


  • Dr. Ambedkar : Jeevan-Marma
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    280 252

    Item Code: #KGP-1880

    Availability: In stock


  • Shiksha : Lakshya Aur Siddhant
    Jagat Ram Arya
    60 54

    Item Code: #KGP-9128

    Availability: In stock

    भारत की आजादी के लिए लाखों लोग शहीद हुए। उनके मन में यही तमन्ना थी कि अपना राज्य आएगा और हम अपने ढंग से देश में शिक्षा-नीति का निर्धारण करेंगे, बाल एवं युवा शक्ति में चरित्र-निर्माण द्वारा नई जागृति पैदा करेंगे, राष्ट्रभाषा हिंदी को पूरा प्रोत्साहन देंगे और वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी भाषा को लागू किया जाएगा ताकि हम अपनी ही राष्ट्रभाषा में इसे तैयार कर सकें। आजादी के लिए शहीद हुए लोगों के दिलों में तड़प भी कि हम अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाकर समान विद्यालय पद्धति को अपनाएंगे। सभी वर्गों के लोगों के लिए शिक्षा के समान अवसर दिए जाएंगे। हम अपनी धरोहर संपत्ति ‘वेदों’ से नए-नए आविष्कार करेंगे जैसाकि विदेशों में जर्मनी, इटली, फ्रांस इत्यादि देशों ने संस्कृत में लिखे वेदों में से कई खोजें कीं। जर्मनी, फ्रांस, चीन और जापान ने अपनी ही भाषा में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रा में उन्नति की है तो हम भी अपनी भाषा हिंदी में ही इस शिक्षा को अनिवार्य बनाएंगे और अपनी ही भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली तैयार करके प्रत्येक क्षेत्र में अपनी ही भाषा द्वारा उन्नति करेंगे। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य के लिए हमारे पास न कोई ठोस लक्ष्य है और न कोई सिद्धांत है।
    प्रस्तुत पुस्तक में सरल व रुचिकर शैली में इन्हीं समकालीन समस्याओं का खुलासा तथा विश्लेषण किया गया है।
  • Shiksha Tatha Lok Vyavhar
    Maharishi Dayanand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1213

    Availability: In stock

    जब मनुष्य धार्मिक होता है, तब उसका विश्वास और मान्य शत्रु भी करते हैं और जब अधर्मी होता है, तब उसका विश्वास और मान्य मित्र भी नहीं करते। इससे जो थोडी विद्या वाला भी मनुष्य श्रेष्ठ शिक्षा पाकर सुशील होता है, उसका कोई भी कार्य नहीं बिगड़ता ।
    इसलिए मैं मनुष्यों को उत्तम शिक्षा के अर्थ सब वेदादिशास्त्र और सत्याचारी विद्वानों की रीति से युक्त इस ग्रंथ को बनाकर प्रकट करता हूँ की जिसको देख-दिखा, पढ़-पढाकर मनुष्य अपने और अपनी संतान तथा विद्यार्थियों का आचार अत्युत्तम करें, कि जिससे आप और वे सब दिन सुखी रहें ।
    इस ग्रंथ में कहीं-कहीं प्रमाण के लिए संस्कृत और सुगम भाषा और अनेक उपर्युक्त दृष्टान्त देकर सुधार का अभिप्राय प्रकाशित किया, जिसको सब कोई सुख से समझ अपना-अपना स्वाभाव सुधार, उत्तम व्यवहार को सिद्ध किया करें । 

  • Kavi Ne Kaha : Ashok Vajpayee
    Ashok Vajpayee
    190 171

    Item Code: #KGP-440

    Availability: In stock

    लगभग एक हजार लिखी गई कविताओं से कुछ चुनना स्वयं कवि के लिए मुश्किल काम है। एक अधसदी भर कविता लिखने और कविता के लिए अपने समय और समाज में थोड़ी सी जगह बनाने की कोशिश करते हुए उसकी रुचि और दृष्टि बदलती रही है। फिर अगर आप कविता लिखने के अलावा आलोचना भी लिखते हों, जो कि मैं करता रहा हूँ, तो मुश्किल और बढ़ जाती है। आपको रुचि और दृष्टि की अपार बहुलता से निपटना पड़ता है। आप कितने ही तीख़े आत्मालोचक क्यों न हों जो आपको प्रिय लगता हो वह जरूरी नहीं कि महत्त्वपूर्ण भी हो या कि वस्तुनिष्ठ ढंग से ऐसा माना जा सके। स्वयं कवि के अपनी कविता को लेकर भी पूर्वग्रह होते हैं और उनमें से कई जीवन भर उसका साथ नहीं छोड़ते। इस संचयन में वे सक्रिय नहीं होंगे इसकी संभावना नहीं है। फिर भी प्रयत्न यह है कि कई रंगों की कविताएँ उसमें आ जाएँ।
    बाकी सब तो कविताएँ ही अपने ढंग से कहेंगी: उनके बारे में कवि को संभव हो तो चुप ही रहना चाहिए। अकसर कविताएँ कवि से अधिक जानती हैं; अपने रचयिता से। इतना भर इस मुकाम पर कहा जा सकता है कि ज्यादातर एक ऐसे समय और समाज में जो कविता से कोई उम्मीद नहीं लगाता और अकसर उसकी अनसुनी-अनदेखी ही करता है, कविता में विश्वास बना रहा है।
    -लेखक
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Upendranath Ashq
    Upender Nath Ashq
    150 135

    Item Code: #KGP-2071

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पलंग', 'आकाशचारी', 'काकड़ां का तेली', 'उबाल', 'मि० घटपाण्डे', 'बैंगन का पौधा', 'डाची', 'पिजरा', 'काले साहब' और  'अजगर' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ghane Kertarutale
    N.E. Vishwanath Iyyer
    140 126

    Item Code: #KGP-9118

    Availability: In stock

    निबंधकार के रूप में लेखक का राष्ट्रीय व्यक्तित्व हर रचना में अपनी छाप छोड़ता है। यह उस सृजनधर्मी राष्ट्रीय व्यकिततव के अनुरंजक छाप की गुणवता होती है कि मोटे रूप में शुष्क समझा जाने वाला यात्रा-वर्णन सरल ललित निबंध की कलाभंगिमा में प्रस्तुत मिलता हैं
    यात्रा-वर्णन के अतिरिक्त इन निबंधों में संस्करण, स्मृति-तर्पण, वर्णन, पत्र, रिपोर्ताज और संवाद-शिल्प प्रयुक्त हुआ है। विधा कोई भी हो, लेखक का लक्षित विधेयक मूलतः एक है और वह है राष्ट्रीय समन्वयात्मक विशालता। इसके लिए व्यष्टि के छोर से समष्टि की खोज-खबर ली जाती है और साहित्य चिंतन अथवा आत्म-चिंतन से राष्ट्रीय चिंतन को संपृक्त करते हुए लेखक प्रादेशिक छवियों, रंगारंग सभ्यताओं और नए अभ्युत्थान के प्रतिष्ठानी आकर्षणों को संवेदनीय शिल्प में विस्तार के साथ रेखांकित-चित्रित करता है।
    —डाॅ. विवेकीराय
  • Jangal Ke Jeev-Jantu
    Ramesh Bedi
    450 405

    Item Code: #KGP-820

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Moldeviya Ki Lokkathayen
    Sanjiv Thakur
    275 220

    Item Code: #KGP-195

    Availability: In stock

    मोल्देविया की लोककथाएँ
    मोल्देविया (वर्तमान नाम मोलदोव (Moldova)) उक्रेन के पास एक छोटा-सा देश है। वहाँ  लोककथाओं की अच्छी-खासी परंपरा रही है। लोककथाओं के साथ-साथ वहीं लंबी-लंबी परीकथाएँ भी कही-सुनी जाती रही हैं। इस संग्रह मेँ उनमें से कुछ लोककथाएँ और परीकथाएँ प्रस्तुत की गई हैं। संग्रह में प्रस्तुत लोककथाओं में जहाँ जनजीवन से जुडी बाते है, वहीँ परीकथाओं में अदभुत कल्पनालोक दिखाई देता है । इन्हें पढ़कर मोल्देविया के सामान्य लोगों के कल्पनाशील होने का पता चलता है तो अपने समाज के यथार्थ के प्रति उनके जागरूक होने का पता भी चलता है। एक तीसरी धारा हास्य की है जो मोल्देविया के जन-मानस में बहती दिखाई देती है ।
    राजा, राजकुमारी, राजकुमार, जमींदार, पादरी, गरीब आदमी, गड़रिया, ड्रैगन, दैत्य आदि अच्छे-बुरे पात्रों के द्वारा कही गई ये कथाएँ अच्छाई, बुराई, चालाकी, दुष्टता, बुद्धिमानी, मूर्खता, शत्रुता, मित्रता जैसी चीजो से पाठकों का परिचय अनायास करवा सकती है ।
    मोल्देविया के लोक-मानस की थाह दिलाने वाली ये कथाएँ बच्चों और बडों को समान रूप से आकर्षित करने की सामर्थ्य रखती हैं ।
  • Mahayogi Gorakhnath : Sahitya Aur Darshan
    Govind Rajnish
    560 476

    Item Code: #KGP-9344

    Availability: In stock

    महायोगी गोरखनाथ: साहित्य और दर्शन एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। प्रस्तुति प्रो. गोविंद रजनीश की है, जिन्होंने इसका संपादन भी किया है। प्रो. रजनीश गूढ़-गंभीर विषयों को सुगम रूप में व्यक्त-व्याख्यायित करने के लिए जाने जाते हैं। इस पुस्तक में उन्होंने भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ मनीषियों में से एक परमयोगी गोरखनाथ के निगूढ़ साहित्य और उसमें निहित दर्शन को संयोजित किया है। गोरखबानी के साथ उसका गद्यार्थ होने से पाठकों के लिए यह सामग्री कई दृष्टियों से पठनीय और संग्रहणीय बन पड़ी है।
    प्रो. रजनीश ने ‘भूमिका के दो अध्याय’ के अंतर्गत गोरखनाथ के व्यक्तित्व और उनकी गुरु परंपरा पर विस्तार से लिखा है। एक व्यक्ति के रूप में योगी गोरखनाथ के जन्म-जाति आदि पर यह प्रामाणिक सामग्री है। प्रो. रजनीश ने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के ये वाक्य उद्ध्ृत किए हैं, ‘गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े धर्मता थे।...उनका चरित्रा स्पफटिक के समान उज्ज्वल, बुद्धि भावावेश से एकदम अनाविल और कुशाग्र तीव्र थी।’ अध्याय 2 में ‘नाथ और सिद्ध’ शीर्षक से इन महान् परंपराओं का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। साथ ही उस आभावलय को भी प्रकट किया गया जिसमें गोरखनाथ की अजेय अस्मिता चमकती है। प्रो. रजनीश के शब्दों में, ‘गोरखनाथ का काव्य दुरूह होकर भी उनके संबंध् में असंख्य दंतकथाओं, लोककथाओं और प्रवादों का जुड़ जाना उनके प्रखर और प्रभावी व्यक्तित्व का परिचायक है।’
    साखी (सबदी) और पद के अंतर्गत गोरखबानी को प्रस्तुत किया गया है। मूल के साथ सरल अर्थ भी है, जो पाठक के लिए उपयोगी है। गोरखनाथ के जीवन दर्शन को समझने के लिए इसका पाठ नितांत आवश्यक है। अनेक विद्वानों ने कबीर आदि परवर्ती संतों पर गोरखनाथ के प्रभाव का उल्लेख किया है, जो सर्वथा उचित है। 
  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta
    Dr. Kripa Shanker Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-162

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Chhota-Sa Break
    Vishnu Nagar
    300 270

    Item Code: #KGP-9242

    Availability: In stock

    छोटा-सा ब्रेक
    विष्णु नागर अपनी कविताओं के लिए जितने जाने जाते हैं, अपने व्यंग्यों के लिए भी कम नहीं जाने जाते। ‘छोटा-सा ब्रेक’ में समसामयिक घटनाओं पर छोटे-छोटे व्यंग्य संकलित हैं, जो उन्होंने (दैनिक) ‘नई दुनिया’ में प्रतिदिन ‘गरमागरम’ स्तंभ के अंतर्गत लिखे थे और जिन्हें पाठकों द्वारा बहुत पसंद किया गया था। अधिकतर पाठक तो अखबार खोलकर पहले ‘गरमागरम’ स्तंभ ही पढ़ते थे। जैसा कि आप देखेंगे, ये व्यंग्य-आलेख भले ही समसामयिक घटनाओं- चरित्रों पर हों, मगर इनमें समय की सीमा में रहकर भी उस सीमा के पार जाया गया है। एक सच्चा रचनाकार यही करता है, इसलिए ये व्यंग्य हमारा खयाल है कि कभी पुराने नहीं पड़ेंगे। इसके अलावा ये व्यंग्य उस समय-विशेष का राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज भी हैं, एक ऐसा दस्तावेज, जो सत्ताधीशों की तरफ से नहीं, बल्कि साधारण जनता की तरफ से लिखा गया है, जिसमें उसके तमाम दुःख-तकलीफ दर्ज हैं, उसका व्यंग्य-विनोद भाव अंकित है। ये व्यंग्य परसाई और शरद जोशी दोनों की परंपरा में हैं। उस परंपरा में हैं और अपनी एक अलग परंपरा भी ये बनाते हैं। इनमें शैलियों का अद्भुत वैविध्य है, भाषा की अनोखी सहजता और प्रवाह है। इन्हें पढ़कर नहीं लगता कि व्यंग्य करने के नाम पर शाब्दिक खिलवाड़ की गई है। ये असली चिंता से उपजे व्यंग्य-आलेख हैं। इन्हें पढ़कर समाज को देखने-परखने की एक नई—ऊर्जस्वित दृष्टि भी मिलती है, मात्रा हलका-फुलका मनोरंजन नहीं होता, जैसा कि सामान्यतः व्यंग्य आजकल करते पाए जाते हैं। कैसे गंभीर से गंभीर बात को, जटिल से जटिल विषय को, सहजता-सरलता और व्यंग्यात्मकता से उठाया जाए, इस बात का उदाहरण बनते हैं ये व्यंग्य। इन्हें पढ़कर लगेगा कि व्यंग्य की मौजूदा स्थिति से निराश होने की नहीं, फिर से उत्साहित होने की जरूरत है।
  • Kachche Resham Si Larki
    Amrita Pritam
    300 240

    Item Code: #KGP-9079

    Availability: In stock

    मेरे लिए जिन्दगी एक बहुत लम्बी यात्रा  का नाम है। जड़ से लेकर चेतन तक की यात्रा का नाम।  अक्षर से लेकर अर्थ तक की यात्रा का नाम। और हकीकत जो है - वहां से लेकर हकीकत  होनी चाहिए -  उसकी कल्पना और उसमें एतक़ाद रख पाने की यात्रा का नाम।  इस लिए कह सकती हूँ कि मेरी कहानियों में जो भी किरदार हैं वह सभी किरदार जिन्दगी से लिए हुए हैं। लेकिन वह लोग - जो यथार्थ और यथार्थ का फासला तय करना जानते हैं - अमृता प्रीतम
  • Aawara
    Pandey Baichain Sharma 'Ugra'
    175 158

    Item Code: #KGP-436

    Availability: In stock

    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का समाज-अध्ययन बड़ा प्रखर था। उन्होंने गरीबी में उसकी संपूर्ण भयावहता को बाल्यावस्था में ही भोगा था, अतः उग्र जी ‘आवारा’ नाटक में पूरी तरह सपफल सामाजिक नाटककार प्रतीत होते हैं। ‘उग्र’ का यह नाटक उस अभिनंदनीय योजना का पावन-प्रेरक स्मृति-चिन्ह बन आज भी विजयपताका की तरह यशगान करता पफहरा रहा है। सभ्य, समृद्ध समाज और उसमें कलाकार की दयनीय स्थिति, जमींदार की क्रूरता व जालसाजी का बिलकुल नग्न चित्रण है। 
    लाली-दयाराम की निश्छल प्लेटोनिक मनोवैज्ञानिक प्रेमगाथा को भी ‘उग्र’ ने जीवन के घिनौने पाशविक प्रेम-व्यवहारों से अलग-थलग चित्रित कर मर्मस्पर्शी और हृदयद्रावक बना दिया है।
    आलोचकों ने इस नाटक को स्वाभाविक माना था किंतु समसामयिक प्रगतिशील नाट्य रचनाओं में नई धारा और नूतन अभिव्यक्ति के अभाव का अनुभव कर उग्र ने सामाजिक जीवन में कला का स्वरूप निखारने के लिए नाटक में प्रचलित और रुचिकर शैली का अनुगमन किया है।
    ‘उग्र’ ने अपने लेखन-जीवन का आरंभ ही नाटकों से किया था। उनका पहला ही नाटक ‘महात्मा ईसा’ हिंदी का अत्यंत सफल और चर्चित नाटक रहा था।
    ‘चुंबन’, ‘गंगा का बेटा’, ‘अन्नदाता’, ‘माधव महाराज महान’ उनकी अन्य लोकप्रिय नाट्य कृतियां रही हैं। उपन्यास और भारी-भरकम संपादकीय से समय निकालकर ‘उग्र’ ने एकांकी और प्रहसन की भी रचना की है।
    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ रचित नाटक ‘आवारा’ में सामान्य सहायक पात्रों के अलावा छह पुरुष पात्र और तीन स्त्री पात्र हैं, नाटक तैंतीस दृश्यों तथा तीन अंकों 
    में समायोजित है। पहले अंक में आठ, दूसरे में अठारह व तीसरे अंक में सात दृश्य हैं। ‘नाटक’ में ‘उग्र’ द्वारा प्रणीत गीत भी समायोजित हैं जो कथानक व वातावरण को सजीव बनाते हैं। गीत-नाट्य की यह पद्धति लोक-नाट्य परंपरा की-सी है। कथानक में प्रायः जो घटनाएं मंच पर नहीं दिखाई जातीं उनकी सूचना व वातावरण की मार्मिकता को और गहन बनाए रखने के लिए या कभी-कभी उसके प्रतीकात्मक अर्थों को स्पष्ट करने के लिए गायन पद्धति उपयोगी सिद्ध होती है।
    प्रस्तुत नाटक ‘आवारा’ में बूढ़े भिखारी बुद्धूराम की बेटी लाली और क्रूर जमींदार के छोटे भाई दयाराम को प्रमुख पात्र के रूप में चित्रित कर हमारी सामाजिक मान्यताओं और परिस्थितियों पर सामयिक, तीखा और तीव्र व्यंग्य किया गया है। आज हिंदी में ‘उग्र’ नहीं रहे, न वैसे गुण-ग्राहक पाठक, मगर ‘उग्र’ का अकल्पनीय नाटक ‘आवारा’ आज भी उग्र की अपनी अद्भुत शैली ‘उग्र-शैली’  की याद दिलाता है।
  • Hindi Bhasha Prakriti, Prayog Aur Shikshan
    Hiralal Bachhotia
    200 180

    Item Code: #KGP-714

    Availability: In stock

    भाषा वह है, जिसे हम बोलते हैं। वह हमें उत्तराधिकार में मिली चीज हैं। इसलिए हम उसकी कम परवाह करते हैं। उसकी प्रकृति और प्रकार्य जानने की कोशिश भी कम ही की जाती है। लेकिन हिंदी बोलने और सीखने की इच्छा रखने वालों की संख्या विभिन्न कारणों से निरंतर बढ़ भी रही है। दुनिया-भर में इसके बोलने/सीखने वाले बढ़ रहे हैं। वह दिन भी दूर नहीं, जब हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यताप्राप्त भाषा होगी। अतः हिंदी की प्रयोग संबंधी बारीकी जानने की उत्सुकता बढ़ रही है। भाषा का मुख्य प्रयोजन संप्रेषण है। प्रभावशाली संप्रेषण के लिए भाषा के प्रायोगिक बिंदुओं, ध्वनिव्यवस्था आदि की जानकारी अपेक्षित है। वाक् (स्पीच) घटना (इवंेट) के रूप में घटित होती है। विचार या भाव शब्द का जामा पहने हैं। अतः ध्वनि या उच्चारण के ठीक रहने पर ही सही संप्रेषण घटित होता है। हिंदी भाषा की ध्वनि-व्यवस्था अत्यंत वैज्ञानिक है, जिसकी समझ सही उच्चारण में सहायक होती है। हिंदी की एक विशेषता यह भी है कि हम जैसा बोलते हैं, प्रायः वैसा ही लिखते हैं। अतः थोड़े से प्रयास से भाषा के सही प्रयोग पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है। शिक्षण द्वारा बच्चे भाषा-प्रयोग में महारत हासिल कर सकते हैं। पाठ-अध्यापन भाषा के हर तरह के प्रयोग को सीखने और अभ्यास करने का अवसर देते हैं। इसलिए भाषा की प्रकृति, प्रयोग और शिक्षण में अंतर्संबंध के परिप्रेक्ष्य में यह एक विनम्र प्रयास है।
  • Kamleshwar Rachana-Sanchayan
    Ganga Prasad Vimal
    850 723

    Item Code: #KGP-797

    Availability: In stock

    कमलेश्वर : रचना-संचयन

    कमलेश्वर हिंदी कहानी केखास तौर से बीसवीं शताब्दी केशीर्ष कथाकारों में अग्रणी हैं। उनमें हम एक साथ प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु के गुणधर्मों का विकास देख सकते हैं।उनकी ‘नीली झीलया ‘मुरदों की दुनियाजैसी बेजोड़ कहानियां को हम उनके किस्सागो होने और एक मिशनरी की मानिंद शब्दों से प्रतिरोध कायम करने के सक्षम उदाहरणों कीकड़ी का एहसास कराने वाली प्रक्रिया से लैस देख सकते हैं। कमलेश्वर सही मायनों में एक सामाजिक प्रवक्ता थे। वे बेखौफ अपनी बात कहने के लिए सृजनशील पद्धति के भीप्रणेता थे। आपातकाल के दिनों में वही पहले संपादक थेजिन्होंने ‘सारिकामें सरकारी पक्ष के बहिष्कार की एक नई पद्धति खोजी थी। उन्होंने ‘सारिकाके पन्नों के उन अंशों कोसरकारी बाबुओं द्वारा काली स्याही से ढककर सेंसर करने पर अपना प्रतिरोध ज़ाहिर किया था और ‘सारिकावैसे ही प्रतिबंधित छवि में प्रकाशित कर दी थी।

    कमलेश्वर रचना-संचयन एक तरह से स्वाधीनता के उपरांत के रचना-कर्म का संरक्षण है। स्वाधीनता के बाद के भारत की वास्तविकताओं का संसार शेष संसार से सिर्फ इस अर्थ मेंभिन्न है क्योंकि वह भारत की वास्तविकताओं का संसार है। क्योंकि शेष संसार विकसित देश भारत से अनेक अर्थों में भिन्न है। और ज़ाहिर है भारत की वास्तविकताओं का संसारइकहरा नहीं है।  उन संसारों की तरह है जहां पूंजी ने कुछ आदर्श तय कर लिए हैं।

    कमलेश्वर की कहानियों की विशेषता है कि आप किसी भी कसौटी सेकिसी भी आलोचनात्मक परिपाटी से उन्हें आंक सकते हैं। कथा सरित्सागर हो या वृहद् कथाµसभी मूल्याधारोंया पैमानों से उन्हें परख सकते हैं। बल्कि एक कदम आगे जाकर कहा जा सकता है कि कथा सरित्सागर या वृहद् कथा ने कथाओं के या गल्पों के जितने चौखटे निर्मित किए होंउनके आधारभूत सैद्धांतिक आधार पर भी कमलेश्वर की कथाओं को परख सकते हैं। कथा सरित्सागर या वृहद् कथा जैसे प्राचीन गल्प ग्रंथों ने तमाम कथा-गुण सूत्रों को प्राचीनगल्प ग्रंथों में संकलित कर यह अंकित किया कि हम किसी भी कालखंड में जान सकते हैं कि कथा का यह प्रारूप या ढांचा या चौखटा पहले रच लिया गया है। स्पष्ट है मौलिक ढांचाप्रस्तुत करना असंभव-सा रचनाकर्म है। आज जहां हम कथा-लेखकों पर ढांचोंअवधारणाओं और आविष्कृत प्रारूपों की चोरी करने का आरोप लगाते हैं वहीं यह कहने का भीदुस्साहस कर सकते हैं कि आज के अधिसंख्य कथाकार गल्प या किस्से के सृजन में वृहद् कथा से आगे बढ़ ही नहीं सके। अपितु जाने या अनजाने गल्प के पुराने प्रारूपों को हीदुहराते रह गए।

    इस संदर्भ में भी कमलेश्वर बाज़ी मार ले जाते हैं क्योंकि ‘राजा निरबंसिया’ में वे लोक-व्याप्ति से वंशहीन होने का त्रासद कोण उठा लेते हैं और उसे लोक-व्याप्ति के वृहद् फलक सेलौटाकर एक ऐसी इकाई में बिंदुबद्ध कर लेते हैं कि वह निजताभरी व्यक्ति गाथा एक सामुदायिक गाथा बन जाती है। कमलेश्वर जैसे दृष्टि-संपन्न रचनाकार के ही बूते की बात हैकि वे लोक सूचना को अधिकृत व्यक्ति सूचना के रूप में कैथरीन मैंसफील्ड की तरह फैलने देते हैं। कैथरीन मैंसफील्ड जैसे सजग कथा-सृजेता में यह वृत्ति शैल्पिक अधिक है जबकिकमलेश्वर में वह ‘वस्तु’ के अंतर्व्यापी विस्तार के रूप में ही विकसित होती है।

    (पुरोवाक् से)

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma
    Tajendra Sharma
    270 243

    Item Code: #KGP-827

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Suraj Men Lage Dhabba
    Ramesh Bakshi
    65 59

    Item Code: #KGP-9092

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sanjeev
    Sanjeev
    200 180

    Item Code: #KGP-665

    Availability: In stock

    कहानियों सें विषयों के व्यापक शोध, अनुभव के संदर्भ, समसामयिक प्रसंग और प्रश्न तथा पठनीय वृत्तांतों का संयुक्त एव सार्वजनिक संसार ही संजीव की कहानियाँ चुनता-बुनता है। इन कथाओं की सविस्तार प्रस्तुति से अभिव्यक्त समाहार का अवदान इस कथाकार को उल्लेख्य बनाता है। घटनाओं की क्रीड़ास्थली बनाकर कहानी को पठनीय बनाने में इस कहानीकार की विशेष रुचि नहीं होती बल्कि यह ऐसे सारपूर्ण कथानक की सुसज्जा में पाठक को ले जाता है, जहाँ समकालीन जीवन का जटिल और क्रूर यथार्थ है तथा पारंपरिक कथाभूमि की निरूपणता और अतिक्रमणता भी । यथार्थ के अमंगल ग्रह को, पढ़वा लेने की साहिबी इस कथाकार को सहज ही प्राप्त है, जिसे इस संग्रह की कहानियों में साक्षात् अनुभव किया जा सकता है ।
    प्रस्तुत कहानियों के कथानक सुप्त और सक्रिय ऐसे 'ज्वालामुखी' है, जो हमारे समय में सर्वत्र फैले हैं और समाचार तथा विचार के मध्य पिसते निम्नवर्गीय व्यक्ति के संघर्ष और जिजीविषा के लिए प्रेतबाघा बने हैँ। अनगिनत सुखों और सुविधाओं के बीच मनुष्य जाति का यह अधिकांश हिस्सा क्यों वंचित, शोषित छूट गया है- इस तथ्य की पड़ताल ये कहानियाँ पूर्णत: लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ करती है ।
    संजीव द्वारा स्वयं चुनी गई ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं- 'अपराध', 'टीस', 'प्रेत-मुक्ति' 'पुन्नी माटी', 'ऑपरेशन जोनाकी', 'प्रेरणास्रोत', 'सागर सीमांत', 'आरोहण', 'नस्ल' तथा 'मानपत्र' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रहीं 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कया-संग्रह को दसवें 'आर्य स्मृति साहित्य सम्मान' (16 दिसंबर, 2003) के अवसर पर विशेष सम्मान के साथ प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन से कभी भी तलाशा जा सकेगा।
  • Dehri Bhai Vides
    Rajendra Yadav
    400 360

    Item Code: #KGP-70

    Availability: In stock

    इस ग्रंथ में संकलित सभी आत्मकथांश और आत्मकथ्य किसी न किसी स्तर की प्रतिष्ठित और स्थापित, जानी-मानी लेखिकाओं का योगदान है। सत्य है कि आत्मकथा उन लोगों की अभिव्यक्ति का सीधा औजार बन चुकी है जो अभी तक हाशिए पर रहते आए हैं और स्वयं अपने इतिहास से भी अपरिचित हैं। इतिहास में दाखिल होने के लिए भाषा में अंकित होना जरूरी है। किसी भी इच्छित और आयोजित परिवर्तन के लिए इतिहास के प्रति जागरूकता और नियति के लिए चुनौती स्वयं अनिवार्य हो जाती है। जो अपना इतिहास आज रचना शुरू कर रहे हैं उनके लिए सबसे सुगम और शीघ्र तरीका स्वयं अपने जीवन को ‘कथंत’ और ‘पठंत’ में बदलना है। इस संदर्भ में आत्मकथा, अभिव्यक्ति के एक साहित्यिक प्रकार की अपेक्षा राजनीतिक-सामाजिक दस्तावेज के रूप में अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसके सहारे जूलिएट मिशेल के शब्दों में ‘पर्सनल इज पोलिटिकल’ का विमर्श रचा जाता है। यहां वह ‘व्यक्ति वैशिष्ट्यवाद’ का अगला उदाहरण नहीं, एक समूचे समुदाय के सामान्य जीवन की उन यातनाओं और यंत्रणाओं का नमूना है जो हर जीवन में समान रूप से मौजूद होने के बावजूद एक गोपनीयतारक्षी चुप्पी की साजिश के तहत हर व्यक्ति के जीवन में अलग-अलग अतः व्यक्तिगत बनी रहती है।

    इस ‘व्यक्तिगत’ यंत्रणा के गुणनफल की सामूहिक-सामुदायिक यातना के रूप में पहचान ही परिवर्तन के लिए राजनीतिक संघर्ष की पहली सीढ़ी है।

    यहां प्रस्तुत आत्मकथांशों और आत्मकथ्यों के संकलन के पीछे यही आशा सक्रिय है, पंद्रह विशिष्ट स्त्रियों द्वारा अपने होने की दास्तान दर्ज करने की कोशिश में छिपी व्यक्तिगत यंत्रणाओं में सामुदायिक यातना की तसवीर खोज निकालने की आशा।...हिंदी में अभी तो यह एक शुरुआत भर है।

  • Shakti Se Shanti
    Atal Bihari Vajpayee
    300 270

    Item Code: #KGP-9021

    Availability: In stock

    शक्ति से शान्ति

    हम सब जानते है कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है । एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आन्दोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएँ सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रान्तिकारियों ने हँसते-हँसते फाँसी का तख्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान  दिया । हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है ।

    जाइए, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े ।

    हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है । पचास वर्षों के इस छोटे-से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी । इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है—हमारे सेना के जवानों को । अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रखकर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते है । इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते है । सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियाँ हों  या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिंद महासागर का गहरा पानी, समी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खडा है । इन सभी जवानों की जो थलसेना, वायुसेना और जलसेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित है, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और इतना ही कहता हूँ कि हे भारत के वीर जवानों । हमें तुम पर नाज है, हमें तुम पर गर्व है । [इसी पुस्तक से]
  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Atal Bihari Vajpayee
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhairav Prasad Gupt
    Bhairav Prasad Gupt
    200 180

    Item Code: #KGP-2066

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भैरवप्रसाद गुप्त ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'घुरहुआ', 'धनिया की साड़ी', 'कदन के नीचे', 'चाय का प्याला', 'चरम बिंदु' , 'पियानो और सोने का पिंजड़ा', 'अपरिचय का घेरा','चुपचाप', 'मंगली की टिकुली' तथा 'श्रम' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भैरवप्रसाद गुप्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dharm Ke Aar-Paar Aurat
    Neelam Kulshreshtha
    450 405

    Item Code: #KGP-310

    Availability: In stock

    धर्म के आर-पार औरत
    मानव जीवन के लिए धार्मिक आस्था व संस्कार दोनों आवश्यक हैं। स्त्रियाँ धर्म के पाखंडी व शोषक स्वरूप का विभिन्न माध्यमों से ज़ोर-शोर से विरोध कर रही हैं। इस पुस्तक में पढ़िए:
    अधिकतर धर्म कैसे पोषित होता है?
    प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन ने क्यों कहा है, ‘कुरान शुड बी रिवाइज़्ड?’
    समाज में वर्गभेद का आधार पौराणिक पृष्ठभूमि भी है। क्या उसका आधुनिकीकरण आवश्यक है?
    गीता के दसवें अध्याय में स्त्री में अपनी सात विभूतियों की चर्चा करने वाले कृष्ण स्वयं क्या थे?
    सती के चैरों व मेलों पर क्यों प्रतिबंध लगना चाहिए? लड़कियों को कैसी पुस्तकें पढ़नी चाहिए?
    दक्षिण भारत में स्त्री के गले में पहना एक पोटु (पेंडेंट) वाला मंगलसूत्र उसके शरीर तक जाने का रास्ता था।
    जैन धर्म में भी माना गया है कि पूर्वजन्म में जो कुछ बुरे कार्य करता है, वही स्त्री के रूप में पैदा होता है।
    परिवार को त्यागकर मोक्ष की चाह में भटकना अधिक कठिन है या गृहस्थी का संचालन करना?
    दुनिया को अपनी दृष्टि से देखती स्त्री क्यों स्वीकार करे पौराणिक स्त्री-चरित्रों जैसी नियति?
  • Sitaron Ke Sanket
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1970

    Availability: In stock

    अमृता प्रीतम द्वारा समय-समय पर देखे हुए सपनों की जो व्याख्याएँ प्रसिद्ध स्वप्न विज्ञानवेत्ता एवं ज्योतिषाचार्य श्री राज ने अमृता जी भेंटवार्त्ता के दौरान की थीं, उन्हीं का लेखा-जोखा प्रस्तुत पुस्तक 'सितारों के संकेत’ में दर्ज है। सितारों के हिसाब से और ग्रहचाल की गणनानुसार अमृता जी के सपनों 'से मम्बन्धित जन्म-कुंडलियाँ भी पुस्तक में अंकित हैं जिनमें आचार्य राज का विशाल ज्योतिष-ज्ञान उजागर होता है। अमृताजी ने आचार्य जी के साथ हुई समस्त भेंटवार्त्ताओं को अपनी चिर-परिचित भाषा-शैली में औपन्यासिक गति से लेखनीबद्ध किया है।
    भक्ति योग, साधना योग, ज्ञान योग और कर्म योग की व्याख्या में उतरते हुए आचार्य राज, सितारों के संकेत देखकर जो कहते रहे, अमृता प्रीतम की कलम से उसी का ब्योरा यह पुस्तक है। 
    साथ ही जन्म-जन्म के गाथा को भी कुछ पहचानने की कोशिश है । पूर्व जन्म को कुण्डली से भी जो संकेत मिलते हैं, वे किस तरह एक आधार-शिला बनते है, इस गहराई को लिए हुए यह पुस्तक अनंत शक्तियों के दर्शन में उतरती है।

  • Khaamoshi Se Pahale
    Amrita Pritam
    120 108

    Item Code: #KGP-1848

    Availability: In stock

    अज़ल का वह वीर आया था 
    और मुझे—
    एक किरण का तावीज़ दे गया 
    वह तावीज़ पहन लेती हूँ 
    तो सारे आसमान पर 
    उसकी दरगाह देखती हूँ 
    और इश्क़ की शीरनी लेकर 
    दरगाह पर जाती हूँ.... 
  • Alikhit Adikhat
    Ganga Prasad Vimal
    125 113

    Item Code: #KGP-1860

    Availability: In stock

    अलिखित-अदिखत
    कविताएँ शब्दों से बनती हैं, किन्तु शब्दों से परे वे एक दूसरी दुनिया ही का अहसास कराती है । एक अर्थ में महत्तम कविताएं अर्थ से परे बिंबन की एक अलग पद्धति विकसित करती हैं । इस मायने में वे न सिर्फ शब्दों को विचलित करती है, बल्कि गढ़े गए ढाँचों को तोड़ती हैं और भाषागत प्रतीतियों से घोर असहमति द्योतित करती है । मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि सृजन की तमाम विधाओं में कलाओं की तरह कविताएँ एक नया ही वस्तुरूप प्रस्तुत करती है । ऐसा नहीं कि सभी कविताएँ यह काम करती हों-हमारे समाजों में परंपरागत शिल्प की, खुद को दोहराने वाली कविताओं का ज़मावड़ा ज्यादा होता है-पर कभी-कभी परंपरागत शिल्प से भी सृजन के आगामीपन की दस्तक मिलती है। निष्कर्ष यह कि कविता चाहे जिस शिल्प में रची जा रही है, अगर वह प्रचलित रूपों को तोड़ती चलती है तो उसमें वह भावी आहट, धीमे ही सही, सुनाई देती है, जो भाषा और व्याकरण के लिए जाती बनकर सामने जाती है ।
    अलिखित-अदिखत की कविताएं पाठकों काव्य-रसिकों में कुछ ऐसी ही अपेक्षाएं जाग्रत करने की अनुगूँज ध्वनित करती है, जिन्हें सृजन की जोखिम-भरी टकराहट के बीच महसूस किया जा सकता है...
  • Saahasi Bachche : Anokhe Karname
    Sanjiv Gupta
    250 225

    Item Code: #KGP-243

    Availability: In stock


  • Roshni Mein Chhipe Andhere
    Gurudeep Khurana
    250 225

    Item Code: #KGP-485

    Availability: In stock

    शुभ्रा उसकी आंखों में देखते हुए धीरे से बोली, "नहीं दीप, ऐसी बात तुम्हारे मुंह से अच्छी नहीं लगती। अगर हालात ऐसे बने हैं तो इसमें शहर का क्या दोष। ऐसे दया भाई तो कहीं भी हो सकते हैं। कब, कहां ऐसा जहर भर दें, कुछ नहीं कह सकते। बहुत दिन नहीं ठहरेगा यह जहर। देखना, जल्दी सब नार्मल हो जाएगा।"
    "मुझे तो लगता है इस दौरान नफरत के जो बीज बो दिए गए हैं उनका असर पुश्तों तक चलेगा।"
    "यह तो है। नफरत फैलाने में घड़ियां लगती हैं और मिटाने में सदियां।"
    "बिलकुल ठीक।"
    "वैसे मैं एक बात और भी कहना चाहती हूं...कह दूं?"
    "जरूर!"
    "देखो दीप, घृणा केवल वही नहीं जो दया भाई जैसे लोग फैला रहे हैं...घृणा वो भी है जो तुम्हारे मन में पल रही है दया भाई के प्रति।"
    "कहना क्या चाह रही हो?"
    "यही कि वह घृणा भी कम घातक नहीं। मैं तो सोचती हूं...उन लोगों के बारे में भी घृणा से नहीं, प्यार से भरकर सोचो। आखिर वे कोई अपराधी तत्त्व नहीं। अपनी तरफ से वे जो भी कर रहे हैं राष्ट्रहित में कर रहे हैं। बस, दिशा भटक गए हैं। बहके हुए लोग हैं वे।..."
    —इसी पुस्तक से

  • Pata Nahin Kal
    Pravesh Chaturvedi
    80 72

    Item Code: #KGP-1850

    Availability: In stock

    पता नहीं कल क्या गाऊँगा
    जैसे-जैसे हम सभ्य होते गए, नए-नए शब्दों से हमारी भाषा का विकास होता गया । हम समझदार होते गए-डॉक्टर-इंजीनियर-एडमिनिस्ट्रेटर, नेता-अभिनेता और पता नहीं क्या-क्या । 
    पहले जो दिल कहलाता था वह हार्ट कहलाने लगा हार्ट एनलार्जमेंट यानी बड़ा दिल । सो बड़े दिल वाला, जिसका हार्ट एनलार्ज हो गया हो।
    उसी भाषा में लाल रंग यानी इमरजेंसी !
    हम दिल की भाषा से दिमाग की भाषा बोलने लगे, लेकिन हमारा दिल तो दिमाग की जगह फिट हो गया है। इसीलिए हम दिल की बात सुनते हैं और दिल की बात कहते हैं ।
    अब नाम तो 'प्रवेश' है सो जहाँ भी अंतरंग प्रदेशों में जाना होगा वहीं मैं तुम्हारे सफल प्रयास का पहला द्वार होऊँगा-
    बिना मुझसे मिले तुम भीतर नहीं जा सकोगे!
    एक प्रयास असफल तो दूसरा 'प्रवेश द्वार' !
    यानी आशा के दीप से उजियारा !
    यह तो मुझे भी पता नहीं के कल क्या गाऊँगा
    लेकिन अपना अंतरंग सखा मैं
    भरी भीड़ में अकेला मिल जाऊँगा
    तब हम दोनों साथ-साथ कहेगे-सुनेंगे-
    कहाँ-कहाँ की लनतरानियाँ
    झुठी-सच्ची कुछ कहानियाँ। 

    -प्रवेश चतुर्वेदी
  • Naajaayaz
    Salam Azaad
    100 90

    Item Code: #KGP-1827

    Availability: In stock

    नाजायज
    भारतीय मुसलमानों की परवर्ती पीढ़ी, जिसकी आबादी बाँग्लादेश की कूल जनसंख्या से लगभग दुगनी है, कैसे अपना जीवन जी रही है ? खास तौर पर भारत की मुस्लिम महिलाएँ, जो शरा के क्रानून की चक्की में हर पल घिसती रहती हैं, क्योंकि 'भारत के मुस्लिम नेताओं ने शरीयत से जुड़े कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बहाने इस देश की मुस्लिम महिलाओं को मध्य युग के घुप्प अँधेरे में बंद कर रखा है ।
    लगातार तीन वर्ष तक दिल्ली में निर्वासित जीवनयापन के दौरान इन मुस्लिम महिलाओं के प्रति इस घोर अमानवीय और शरा कानून की दुहाई देकर मुल्लाओं द्वारा ढाए गए इन जुल्मों को सलाम आजाद ने बहुत नज़दीक से देखा है । उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान दिल्ली ही नहीं, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, केरल, पश्चिम बंग और कश्मीर के साथ अन्यान्य प्रदेशों में इस भयावहता को महसूस किया है। उन्होंने यह भी पाया है कि इस्लाम के नाम पर इन तमाम इलाकों की मुस्लिम महिलाएँ पुरुषशासित समाज-व्यवस्था द्वारा कितनी विषम वंचनाओं और यंत्रणाओं की शिकार है । पति के क्रोध और उत्तेज़ना के चलते स्त्री को तलाक कहने पर इस्लाम द्वारा तलाक को भले ही स्वीकृति नहीं मिली हो, लेकिन भारत का शरापसंद मुस्लिम समाज इसे तलाक के तोर पर मानने को मजबूर करता है । इस्लाम और मानवाधिकारवादी इस तलाक के समय स्त्री यदि गर्भवती हो तो जन्म-ग्रहण के बाद उस संतान को वैध नहीं माना जाता है।  उस निष्पाप, निष्कलंक मानव शिशु को 'नाजायज़' ठहराया जाता है ।
    भारत के मुसलमानों को केंद्र में रखकर इस समस्या पर छिटपुट लेखादि अवश्य प्रकाशित हुए है, लेकिन अपनी अच्छी देखकर और 'फील्ड वर्क' को आधार बनाकर 'नाजायज' जैसे विषय पर एक पूरी पुस्तक लिखने की परिकल्पना पहली बार बाँग्लादेश के इस लेखक द्वारा हुई है ।

  • Shesh Parichay
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-704

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar
    Ramdhari Singh Diwakar
    250 225

    Item Code: #KGP-8006

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    रामधारी सिंह दिवाकर

    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिछड़ेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न होता है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भी दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।

    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।

    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार', 'खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानी', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पुल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।

    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Gitanjali : Rabindranath Thakur
    Rabindra Nath Thakur
    300 270

    Item Code: #KGP-908

    Availability: In stock


  • Prerana Dene Wale
    Ishan Mahesh
    120 108

    Item Code: #KGP-1801

    Availability: In stock

    प्रेरणा देने वाले
    ईशान महेश बड़े, सचेत और संचेत्य
    व्यक्ति हैं, तनिक भी किसी से कुछ
    उनके पत्र का उत्तर न देने की
    या उनका समय व्यर्थ
    करने की कोई भूल हुई,
    उन्हें बड़ी चोट पहुँचती है । 
    ऐसा मन ही गूंगी पर
    संवेदनशील प्रकृति का मर्म
    भली-भाँति समझता है ।
    मुझे उनको रचना आद्योपांत 
    पढकर अच्छा लगा ।
    किशोर मन इससे उत्साहित
    होगा और उसी के उत्साहित
    होने से आज्ञा भी है ।"
    -पं ० विद्यानिवास मिश्र

  • Mere Saakshatkaar : Kedar Nath Singh
    Kedarnath Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-2027

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के साक्षात्कारों की यह किताब कविता के ज़रिए समकालीन जीवन में झाँकने की एक कोशिश है । इनसे गुज़रना अपने समय की बदलती हुई सौंदर्य-चेतना के खुले-अधखुले गलियारों से गुज़रना है । विगत पच्चीस वर्षों के लंबे अंतराल में लिए गए ये इंटरव्यू कवि की विकास-यात्रा को समझने की कुंजी भी देते हैं और उन मोड़ों-घुमावों की प्रामाणिक जानकारी भी, जिनसे होकर उसकी सृजन-यात्रा अविराम चलती रही है । यह एक रचनाकार की विश्व-दुष्टि के बनने और आकार ग्रहण करने की लंबी प्रक्रिया का दस्तावेज़ है-एक ऐसा कच्चा माल, जिसमें समकालीन कविता के इतिहास के रंग-रेशे तलाशे जा सकते हैं ।
    कवि केदारनाथ सिंह की कविताएँ समय के साथ संवाद करती हुई कविताएं हैं। यही वजह है कि उनकी कविताओं में एक तरह की प्रश्नाकुलता दिखाई देती है। ऐसी प्रश्नाकुलता, जो कहीं गहरे पैठकर पाठक को बेचैन करती है। यह देखना भी एक दिलचस्प अनुभव होगा कि अपनी कविताओं में निरंतर प्रश्न उपस्थित करने वाला कवि स्वयं प्रश्नों का सामना कैसे करता है ।
    समकालीन सर्जन-परिवेश में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों के लिए एक संग्रहणीय दस्तावेज़ है यह किताब ।
  • Kya Haal Sunaavaan
    Narendra Mohan
    390 351

    Item Code: #KGP-696

    Availability: In stock


  • 1128 Mein Crime 27
    C. J. Thomas
    100

    Item Code: #KGP-1817

    Availability: In stock

    1128 में क्राइम 27
    '1128 में क्राइम 27' थॉमस का दूसरा नाटक है । उसकी समस्या सार्वदेशीय है । उन्होंने मौत को एक विशेष प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है । नाटक में जिंदगी और मृत्यु के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है । कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सिनिक है, क्योंकि उनका यह नाटक सिनिसिज्म की सृष्टि है।... 
    तत्कालीन रंगमंच पर जमी हुई हास्य रूढियों के प्रति विद्रोह, प्रबोधन की शक्ति पर विश्वास रखकर संसार का उद्धार करने की मूर्खता आदि पर भी उन्होंने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। असली जिंदगी और जीवन की व्याख्या करने वाले नाटक टेकनीक के वैभवों क द्वारा उनकी असली भिन्नताओं को उसी तरह रहने देकर रंगमंच पर प्रस्तुत करने का उनका कौशल आश्चर्यजनक ही है। जिंदगी मिथ्या है, यह दार्शनिक आशय दर्द-भरी हँसी के साथ वे मंच पर प्रस्तुत करते हैं। नाटक चलाने वाला और नाटक की व्याख्या करने वाला गुरु एक तरफ़, नाटक खेलने वाले, नेपथ्य, प्रोप्टर, स्टेज मैनेजर आदि का एक ढेर दूसरी तरफ, अखबार का दफ्तर, संपादक, चक्की आदि का एक ढेर तीसरी तरफ।  इन सबके सम्मुख गुरु के लिए जब चाहे तब इशारा कर सकने वाला एक प्रेक्षक समूह । इस प्रकार नाटक और जिंदगी को उनके असली रूप में अपने-अपने व्यक्तित्व से युक्त एक ही स्टेज पर एक साथ इस नाटक में प्रस्तुत करता है । नाटकीय प्रभाव एवं आंतरिक संघर्षों की दृष्टि से यह नाटक अत्यंत सफल है।
  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-1)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-630

    Availability: In stock


  • Aastha Ka Raasta
    Dr. Arsu
    160 144

    Item Code: #KGP-9002

    Availability: In stock

    आस्था का रास्ता 
    हर युग की समस्याएं और संवेदना, बदलती रहती हैं । इसका असर साहित्य पर पड़ना सहज स्वाभाविक है, लेकिन बाहरी तौर की विकास योजनाएं हमेशा हमें अंतर्दृष्टि नहीं देती हैं । अंतर्दृष्टि ही आस्था की नीव है । विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के युग में साहित्य में आए परिवर्तन के स्वरूप पर साहित्यकार के मन में आशंकाएं बढ़ रही हैं ।
    आस्था का आलोक बुझ रहा है । बुद्धि-विकास के अनुपात में अनाज हृदय-विकास नहीं होता है । परंपरा, संस्कृति, साहित्य, धरोहर और विरासत का महत्त्व आज फीका पढ़ रहा है ।
    इसके कारणों-परिणामों पर सोच-विचार करने वाले अट्ठारह लेखों का संकलन ।
    मलयालमभाषी हिंदी लेखक और अनुवादक डॉ० आरसु की अद्यतन कृति । इसमें चिंतन का इंधन है । आस्था और आशंकाओं की धड़कन है ।
  • Himalaya : Aitihaasik Evam Pauranik Kathayen
    Padamchandra Kashyap
    200 180

    Item Code: #KGP-1932

    Availability: In stock

    हिमालय ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाएँ
    एक समय आया जब भारतीय संस्कृति के अजस खोट स्त्रोत  देवात्मा पुण्यात्मा नगाधिराज़ हिमालय के मानव को  असंस्कृत, प्लेच्छ, वृषल कहकर मुख्य धारा से बाहर हाशिये पर ला बिठा दिया गया । वह सच्चाई जानता था, अविचल रहा । पाषाण युग से आरंभिक वैविध्यपूर्ण अतीत के इस उत्तराधिकारी का सच और झूठ मापने का निजी पैमाना था । वह न कभी विजेता से भयभीत हो उसके आगे नतमस्तक हुआ और न पराजित को दुत्कारा, भुलाया । उसने इंद्र का सम्मान किया किंतु सहानुभूति वृत्र को दी और उसे भी देवता माना । पांडवों की जीत स्वीकार की, पर 'उद्दंड’ कहकर उन्हें दुर्दैव के हवाले कर दिया । 'शालीन' कौरवों को सराहा तथा 'मामा विष्णु' का प्यार दिलाया । महाभारत का कारण साग-सब्जी की वाटिका थी, तो सीता-हरण के पीछे उसका पकाया हुआ बड़ा' । सनुद्र-मंथन से निकला अमृत कहीं छलका, महाप्रलय के बाद मनु की नाव कहाँ उतरी और पुनः कृषि के लिए बीज कौन लाया, इसकी नई जानकारी दी । उसने मनुष्य को देवता बनते देखा और स्वयं देवता को मनुष्य बना, उसे खिलाव-पिलाया, नचवाया, साथ चलाया, चाकरी करवाई और दंडित भी किया, भले ही वह बडा देव विष्णु हो या महादेव शिव । महात्मा बुद्ध को देवराज इंद्र, अनाम राज्य की एक सनाम रानी को  परशुराम माता रेणुका तथा यमुना नदी को द्रोहणी घोषित किया ।
    सहज, सरल, बातचीत की भाषा में, हलके-फुलके रोचक ढंग से हिमालय संतति की देखी-सुनी बताता है लघु कथाओं का यह संग्रह, जिसमें वेद है, इतिहास-पुराण भी । इसमें तथ्य है, कथ्य है, विद्वता का दबाव नहीं ।
  • SWAPNAPAASH
    Manisha Kulshreshtha
    240 216

    Item Code: #KGP-1572

    Availability: In stock

    'स्वप्नपाश' नृत्य और अभिनय से आजीविका-स्तर तक संबद्ध माँ-बाप की संतान गुलनाज फरीबा के मानसिक विदलन और अनोखे सृजनात्मक विकास व उपलब्धियों की कथा है । समकालीन सनसनियों में से एक से शुरु हुई यह कथा हमें एक बालिका, एक किशोरी और एक युवती के उस आरिम अरण्य में ले जाती है जहाँ 'नर्म' और 'गर्म' डिल्युजंस और हैल्युसिनैशरेन का वास्तविक मायालोक है। मायालोक और वास्तविक? जी हाँ, वास्तविक क्योंकि स्वप्न-दु:स्वप्न जिस पर बीतते है उसके लिए कुछ भी 'वर्चुअल' नहीं-न सुकून , न सितम । उस पीडा को सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि खुली दुनिया में जीती-जागती काया की चेतना एक अमोघ पाश में आबद्ध हो जाए और अधिकांश अपने किसी सपने के पीछे भागते नज़र आएँ। पाश में बँधे व्यक्ति की मुक्ति तब तक संभव नहीं होती जब तक कोई और आकर खोल न दे। मगर जब एक सम-अनुभूति-संपन्न खोलने वाले की तलाशा त्रासद हो तो? दोतरफा यातना से गुज़रने के खाद अगर कोई मिले और वह भी हौलै-हौले एक नए पाश में बंध चले तो ? अनोखे रोमांसों से भरी इस कथा में एक नए तरह की रोमांचकता है जो एक ही बैठक में पढ़ जाने के लिए बाध्य कर देती है ।
    गुलनाज़ एक चित्रकार है और वह भी 'प्राडिजी'।  ऐसे  चरित्र का बाहरी और भीतरी संसार कला की चेतना और आलोचनात्मक समझ के बगैर नहीं रचा जा सकता था। कथा में पेंटिंग  की दुनिया के प्रासंगिक नमूने और ज्ञात-अल्पज्ञात नाम ऐसे आते हैं गोया वे रचनाकार के पुराने पड़ोसी हों। आश्चर्य तो तब होता है जब हम नायिका की सृजन-प्रविधि और उसको पेंटिग्स के चमत्कृत (कभी-कभी आतंकित) कर देने वाले विवरण से गुजरते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ मूलत: चित्रकार हैं। उनकी रचनात्मक शोधपरकता का आलम यह है कि वे इसी क्रम में यह वैज्ञानिक तथ्य भी संप्रेषित कर जाती है कि स्किजोफ्रेनिया किसी को ग्रस्त भर करता है, उसे एक व्यक्ति के रूप में पूरी तरह खारिज नहीं करता ।
    स्किजोफ्रेनिया पर केंद्रीय यह उपन्यास ऐसे समय में  आया है जब वैश्वीकरण की अदम्यता और अपरिहार्यता के नगाड़े बज रहे हैं। स्थापित तथ्य है कि वैश्वीकरण अपने दो अनिवार्य घटकों-शहरीकरण और विस्थापन- के द्वारा परिवारिक ढाँचे को ध्वस्त करता है। मनोचिकित्सकीय शोधों के अनुसार शहरीकरण स्किजोफ्रेनिया के होने की दर को बढ़ाता है और पारिवारिक ढाँचे में टूट रोग से मुक्ति में बाधा पहुँचाती है। ध्यातव्य है कि गुलनाज पिछले ढाई दशकों में बने ग्लोबल गाँव की बेटी है । अस्तु, इस कथा को एक गंभीर चेतावनी की तरह भी पढे जाने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन, कला और मनोविज्ञान-मनोचिकित्सा की बारीरिज्यों को सहजता से चित्रित करती समर्थ और प्रवहमान भाया में लिखा यह उपन्यास बाध्यकारी विखंडनों से ग्रस्त समय में हर सजग पाठक के लिए एक अनिवार्य पाठ है ।
  • Nikka Nimana
    Sushil Kalra
    400 360

    Item Code: #KGP-550

    Availability: In stock