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  • grid
  • Kavi Ne Kaha : Naresh Saxena
    Naresh Saxena
    190 171

    Item Code: #KGP-446

    Availability: In stock

    नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के ऐसे कवि हैं, जिनकी गिनती बिना कविता-संग्रह के ही अपने समय के प्रमुख कवियों में की जाने लगी।
    एक संग्रह प्रकाशित होते-होते उच्च माध्यमिक कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाए जाने लगे। पेशे से इंजीनियर और फिल्म निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही संगीत, नाटक आदि विधाओं में गहरा हस्तक्षेप। संभवतः यही कारण है कि उनकी कविताएँ अपनी लय, ध्वन्यात्मकता और भाषा की सहजता के कारण अनगिनत श्रोताओं, पाठकों की शुबान पर चढ़ गई हैं। वैज्ञानिक संदर्भों ने न सिर्फ उनकी कविताओं को मौलिकता प्रदान की है बल्कि बोलचाल की भाषा में उनके मार्मिक कथन, अभूतपूर्व संवेदना जगाने में सपफल होते हैं। निम्न उद्धरण इसका प्रमाण है--
    पुल पार करने से, पुल पार होता है
    नदी पार नहीं होती
    या 
    शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है
    बाद में सीखेगा भाषा
    अभी वह अर्थ समझता है
    या 
    बहते हुए पानी ने पत्थरों पर, निशान छोड़े हैं
    अजीब बात है
    पत्थरों ने, पानी पर
    कोई निशान नहीं छोड़ा
    या 
    दीमकों को पढ़ना नहीं आता 
    वे चाट जाती हैं / पूरी किताब
  • Agyey Sahachar
    Vishwanath Prasad Tiwari
    695 626

    Item Code: #KGP-1940

    Availability: In stock

    अज्ञेय सहचर
    छायावादोत्तर हिंदी साहित्य में अज्ञेय का व्यक्तित्व एक स्वाधीन चिंतक और प्रयोगधर्मी रचनाकार के रूप में अद्वितीय है। इस संदर्भ में एक-दो लेखक ही उनकी पंक्ति में बैठते हैं। उनकी सर्जनात्मक प्रयोगशीलता और नवीनता तथा अनेक कलाओं में उनकी दक्षता को देखते हुए उन्हें हिंदी का ‘रवींद्रनाथ’ कहना उपयुक्त है। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं (कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, संस्मरण, यात्रावृत्त, आलोचना और अन्य लघु विधाएँ) को अपनी प्रतिभा से समृद्ध किया है। कुछ नवीन गद्य विधाओं को जन्म देने का श्रेय भी उन्हें है, जिन्हें उन्होंने ‘अंतःप्रक्रिया’, ‘लॉग बुक’ और ‘टीप’ आदि कहा है। ये ‘डायरी’ विधा के निकट हैं, मगर उनसे भिन्न और नवीन। इस प्रसंग में मुझे यह भी कहना चाहिए कि हिंदी की साहित्यिक भाषा को जितने नए शब्द अज्ञेय ने दिए हैं, उनके किसी समकालीन लेखक ने नहीं दिए। यह एक ऐसा रेखांकित करने योग्य कार्य है, जिसे कोई महान् लेखक ही कर पाता है। वस्तुतः अज्ञेय हिंदी के एक युग-प्रवर्तक साहित्यकार हैं। उन्होंने अनेक रूपों में छायावादोत्तर हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को प्रभावित किया है तथा उसे नई दिशाओं की ओर प्रेरित और संचालित भी किया है।
    अज्ञेय का जितना बड़ा योगदान रचना और चिंतन के क्षेत्र में है, उतना ही या उससे थोड़़ा ही कम हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध करने और अपने समय में एक साहित्यिक वातावरण निर्मित करने वाले व्यक्तित्वसंपन्न लेखक के रूप में। उन्होंने न केवल स्वयं लिखा, बल्कि प्रतिभावान लेखकों की एक पूरी पीढ़ी को मंच देने और सामने लाने का प्रयास किया। 
    आज हिंदी के एक बड़े और वास्तविक पाठक-वर्ग में अज्ञेय प्रतिष्ठित हैं और उन पर लिखा भी कम नहीं गया है, जिसका प्रमाण है यह पुस्तक।
  • Hamse Hai Paryavaran
    Anku Shree
    140 126

    Item Code: #KGP-495

    Availability: In stock

    पर्यावरण के अनेक घटकों में मनुष्य भी एक है। मनुष्यरूपी बुद्धिमान प्राणी द्वारा पर्यावरण की अन्य इकाइयों का उपयोग किया जाता है। यह उपयोग ही पर्यावरण का संचालन है। इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। यह प्रभाव कुप्रभाव भी हो सकता है। इसी कुप्रभाव को हम पर्यावरण का प्रदूषण कहते हैं।
    प्रदूषण नहीं होना और उसके प्रभाव से पर्यावरण को बचाना मनुष्य का कर्तव्य है। आज का बालक की कल का मनुष्य है। इसलिए बालकों और युवाओं को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक ऐसे ही पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। हालांकि यह सभी वर्ग के पाठकों के लिए समान रूप से रुचिकर और उपयोगी लगेगी।
    पुस्तक को बाईस शीर्षकों में बांटा गया है। प्रतयेक शीर्षक अलग-अलग आलेख हैं। फिर भी कुछ बातें प्रसंगवश एक से अधिक आलेखों में आ गई हैं किंतु सारे तथ्य प्रसंगवश रहने के कारण आलेख की रोचकता में कमी नहीं आने पाई है।
    —अंकुश्री
  • Domnic Ki Vaapasi
    Vivek Mishra
    350 315

    Item Code: #KGP-9359

    Availability: In stock

    ‘डाॅमनिक की वापसी’ वर्ष 2015 के ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ से अलंकृत उपन्यास है। इसके लेखक विवेक मिश्र समकालीन हिंदी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। विवेक ने रचना के लिए सदा ऐसे कथानक चुने हैं जो समाज के किसी न किसी व्यापक सत्य को प्रकट करते हैं। इसीलिए वे लोकप्रिय रचना-पद्धतियों से अलग रास्ता तलाशते हैं। प्रस्तुत उपन्यास इसका प्रमाण है।

    इस उपन्यास के केंद्र में ‘डाॅमनिक की वापसी’ नामक नाटक है, डाॅमनिक का चरित्र निभाने वाला अभिनेता दीपांश इसका प्रेरक पात्र है। दीपांश यथार्थ और नियति के बीच झूलता अपना मार्ग तय करता है। वह उस समय रंगमंच से अदृश्य हो जाता है जब अभिनय के शीर्ष पर उसका नाम चमक रहा होता है। उपन्यास अभिनय में जीवन और जीवन में अभिनय का द्वंद्व उपस्थित करता है। प्रेम पर आधारित नाटक तो सफल होता है लेकिन जीवन में प्रेम पराजय की छायाओं से घिर जाता है।

    ‘डाॅमनिक की वापसी’ प्रेम, मानवीय संबंध, कला और जीवन की सघन बुनावट से निर्मित हुआ है। अनूठा कथानक, रचनात्मक भाषा, शिल्प सौष्ठव और दार्शनिक आभा इस रचना के उल्लेखनीय तत्त्व हैं। युवा पीढ़ी में उपन्यास रचना की सिद्धि के लिए इस उपन्यास को उदाहरणार्थ देखा जा सकता है। विश्वास है कथानक और कहन के आधार पर ‘डाॅमनिक की वापसी’ व्यापक पाठक समुदाय की प्रियता अर्जित करेगा।
  • Katha Kaho Kunti Mai
    Madhukar Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2021

    Availability: In stock

    कथा कहो कुंती माई
    "कितना खतरनाक होता है माई, मनुष्य के सपनों का मर जाना ?" सुमति ठाकुर ने सवाल की तरह पूछ लिया । "बहुत खतरनाक मेरे बेटे," छाती माई बोली, "सपने हैं तभी तो हमतुम जिंदा हैं, मनुष्य हैं। हम तभी तक जीवित है, जब तक सपने हैं । बेटे, हमारे सपने बहुत बड़े हैं, जो तुम बराबर कहते हो, या तो हम सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन । श्रमिक-किसानों का राज होगा । लडाई बहुत लंबी है सुमति, और चौतरफा भी । हमारे सपनों के हत्यारे हमारे संग-संग जिंदा हैं। इन्हें भी नहीं छोडना है ।"
    कुन्ती माई ऊपर की और दोनो बाँहें फैलाए दिखाती हैं, "अभी भी क्यों नहीं जागते तुम लोग ? पुश्तैनी पीपल-गाछ पर गाज गिरने वाली है ।" "क्या बात है माई ?" एक साथ कई पंख फस्कढाते है । "मेरे गाँव के लोग मुर्दा हैं । सभी मरे हुए हैं । बाप-दादे की पुश्तैनी गाछ को कटवाने के लिए मुदई लोग कलक्टर को बुलवाए हैं। इन्हें किस प्रकार ज़गाऊँ ?" माई का कंठ अवरुद्ध होने लगता है ।
    पीपल के निकट आते ही जेली-साथी नारे लगाते हैं, "कुन्ती माई को, लाल सलाम, लाल सलाम । इंकलाब जिदाबाद । जिदाबाद !" 
    कुन्ती माई अपनी दोनों बाँहें फैलाए उनकी ओर दौड़ पड़ती है, जैसे ममता के समुद्र में डुबो लेना चाहती है । यह डबडबाई आँखें पोंछती हुई कहने लगती हैं, "मेरे बाल-गोपालो । जुल्म बढ़ता है तो प्रतिरोध भी तेज होता है । पुलिस-प्रशासन आपका नहीं है, उन्हीं की रक्षा के लिए है । पन्द्रह मार्च को पटना गांधी मैदान को संकल्प के साथ दस लाख जनता चाहिए । मरने का संकल्प लो, तभी जिंदा रहोगे। मठ की जमीन पर हम फिर चढ़ेंगे । इस बार हम रहेंगे या मठ रहेगा ।"
    [इसी उपन्यास से]

  • Deshraag
    Vishwanath Prasad Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-9306

    Availability: In stock

    ‘देशराग’ सुविज्ञ और सुप्रतिष्ठित कवि-आलोचक-संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अध्ययन व मनन को रेखांकित करती एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। रचना के अपूर्व आयाम विकसित करने के साथ-साथ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने ‘दस्तावेज़’ जैसी उल्लेखनीय साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते हुए शब्द की संस्कृति को शिखर तक पहुंचाया है। यह पत्रिका संतुलित, सकारात्मक व संपन्न सामग्री के लिए तो प्रशंसित है ही, इसके संपादकीय प्रत्येक पाठक की अमूल्य धरोहर हैं। ‘देशराग’ में कुछ ऐसे ही विचारोत्तेजक संपादकीय संगृहीत हैं।
    राजनीति, समाज और साहित्य के विविध पक्षों पर ‘दस्तावेज़’ के इन संपादकीयों में विचार किया गया है। लेखक के शब्दों में, इन टिप्पणियों में साहित्य, संस्कृति, भाषा, समाज और व्यक्तियों के प्रति जो कुछ भी व्यक्त हुआ है, वह गहरे देशराग के ही कारण। भारत का साधरण आदमी और उच्चतर मूल्य ही इन टिप्पणियों का पक्ष रहा है और उसे संकट में डालने वाला सब कुछ विपक्ष। भाव का जो अंश रचना में ढलने से रह गया, वही इस सीधे कथन के रूप में व्यक्त हुआ।
    विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने इन लेखों के माध्यम से स्वस्थ विमर्श का उदाहरण प्रस्तुत किया है। वे ‘निर्णयात्मक’ होकर विचार नहीं करते। एक चिंतन प्रक्रिया चलती है, तर्क मुखर होते हैं, पक्ष-विपक्ष प्रकट होते हैं, व्यापक सामाजिक निहितार्थ खुलते हैं–तब कोई निर्णय उपलब्ध होता है। भाषा में वे सारे तत्त्व हैं जिनसे मिलकर ‘हिंदी जाति का तेजस्वी गद्य’ बनता है। 
    देश और उसमें गूंजने वाली प्रशस्त सामाजिकता के राग को चीन्हने के लिए ‘देशराग’ बहुमूल्य पुस्तक है।
  • Head Office Ke Girgit
    Arvind Tiwari
    300 255

    Item Code: #KGP-463

    Availability: In stock


  • Vipradas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-852

    Availability: In stock


  • Shaantidoot Shri Krishna
    Swami Vidya Nand Saraswati
    300 270

    Item Code: #KGP-644

    Availability: In stock

    भारत के इतिहास में फिर एक बार वैसा ही समय आया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक बार फिर कुछ वैसी ही स्थिति उत्पन्न हो गई। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग करके देश का विभाजन करने की मांग की। गांधी जी ने मुस्लिम लीग को देश के विभाजन से विरत करने के लिए मुहम्मद अली जिन्ना के हाथ पर कोरा चैक रखकर संपूर्ण देश पर शासन करने का अधिकार मुस्लिम लीग को दे दिया, किंतु मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान से कम पर समझौता करने से इनकार कर दिया। सन् 1999 में पाकिस्तान ने देश पर आक्रमण कर दिया। इससे पूर्व भी पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण करके देश को हथियाने का प्रयत्न किया था, किंतु इस बार पाकिस्तान से बातचीत न करके पाकिस्तान को ईंटों का जवाब पत्थरों से देकर देश की रक्षा करने मंे सफलता प्राप्त कर ली, किंतु इसे युद्ध की समाप्ति नहीं माना जाना चाहिए। पाकिस्तान की ओर से फिर भी युद्ध की स्थिति पैदा की जाती रहेगी। वस्तुतः देश की समस्या समय-समय पर होने वाले आक्रमण नहीं हैं। जब तक पाकिस्तान रहेगा तब तक युद्ध की स्थिति बनी रहेगी। महाभारत की तरह एक निर्णायक युद्ध होकर अखंड भारत की स्थापना ही इस समस्या का समाधान है।
    -इस पुस्तक के ‘गांधी जी के शांति-प्रयासों की असफलता के कारण’ अध्याय से
  • Nau Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    120 108

    Item Code: #KGP-2088

    Availability: In stock

    नौ लघु नाटक
    हिंदी में नाट्य-लेखन संस्कृत नाटय-परंपरा और लोक-नाट्य के विविध रूपों से जुड़कर विकसित हुआ हैं । बाद में उस पर ग्रीक त्रासदी, पारसी शैली  और पश्चिमी रंग-शैलियों का असर भी दिखाई देता है ।  मंचीय नाटक बनाम पाठ्य नाटक की बहस भी हिंदी  में होती रही है । इधर हिंदी नाटय-लेखक और हिंदी  रंगमंच अपनी-अपनी दर्पमंडित घोषणाओं के वावजूद एक-दूसरे के पास ही आया है। एकांकी नाटकों-लेखन के विकास के पाशर्व में जहाँ रेडियो की  भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है, वहीं स्कूलों एवं कॉलेजों की नाट्य-संस्थाओं द्वारा महसूस की जाने वाली एकांकी नाटकों की ज़रूरत भी एक कारण रही है ।
    अजब बात है कि इधर एकांकी-लेखन कम हुआ है, पर उसकी जगह लघु नाटक एव नुक्कड़ नाटक ने ली है ।
    प्रताप सहगल रंगमंच से जुड़े हुए नाटककार के रूप में विख्यात हैं । उनके नाटक 'रंग बसंती', 'मौत को रात भर नहीं जाती' तथा 'अँधेरे में' आदि के मंचन बार-बार हुए हैं। अपने पिछले नाटक 'अन्वेषक' से उन्हें विशेष ख्याति मिली है ।
    'नौ लघु नाटक' में समय-समय पर लिखे गए नौ लघु नाटक संग्रह के रूप में आ रहे हैं । प्रताप सहगल का नाट्य-लेखन परंपरा एवं प्रयोगशीलता के संतुलन बिंदु पर खडा नजर आता है । अपनी इसी छवि के अनुरूप उनके इन लघु नाटकों में भी कहीं परंपरा की गंध मिलेगी तो कहीं प्रयोगशीलता की ललक । कहीं मूल्यों का भंजक रूप मिलेगा तो कहीं चरित्रों कै भीतर सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पेठ। इनमें से अनेक नाटक कई-कई बार मंचित हुए हैं और कई एक प्रकाशित होकर अपना पाठक वर्ग बना चुके हैं ।
    छोटे-छोटे शहरों, कस्बों तथा कॉलेजों एवं स्कूलों की नाट्य-मंडलियों को अच्छे लघु नाटकों की प्राय: तलाश रहती है। इस दृष्टि से भी यह संकलन महत्त्वपूर्ण है और लघु नाटकों के विकास की दृष्टि से भी ।
  • Nahin Koi Ant
    Pratap Sehgal
    80 72

    Item Code: #KGP-1300

    Availability: In stock


  • Suno Manu
    Vishva Mohan Tiwari
    225 203

    Item Code: #KGP-537

    Availability: In stock

    सुनो मनु
    आज का युवा तेज़ी से आगे बढ़ना चाहता है, किंतु अपने माता-पिता या दादा-दादी से उचित सलाह न मिल सकने के कारण उसे शीघ्र ही भोगवादी बाज़ार के दलदल में फँस जाने का खतरा रहता है। 
    एक युवक को ऐसे खतरे से बचाने के लिए एक पिता ने होस्टल में रहने वाले अपने पुत्र को लगातार पत्र लिखे, जिससे न केवल उसे वरन् उसकी मित्रमंडली के समुचित विकास में, उन्हें जीवन में सोच-विचार कर आगे बढ़ने में सहायता मिली। 
    उन पत्रों की सफलता का रहस्य था पुत्रा एवं पिता में मित्रवत् व्यवहार। पिता में एक ओर तो अपनी जड़ों से जुड़े रहने का विवेक है तथा दूसरी ओर आधुनिकता की पर्याप्त समझ है। 
    पत्रों में पुत्र की सामान्य समस्याओं से लेकर जीवन-मूल्य संबंधी प्रश्नों पर आपस में विचार- विमर्श है। 
    इस पुस्तक में युवाओं के लिए वे संदेश हैं, जिनसे उनमें इतनी मानसिक, बौद्धिक, नैतिक शक्ति आ सकेगी कि वे भारत को और इसलिए स्वयं को सचमुच ही विश्व में सम्मानप्रद स्थान दिला सकें। 
  • Kirti Choudhary Ki Kahaniyan
    Kirti Chaudhary
    150 135

    Item Code: #KGP-9087

    Availability: In stock


  • Usane Kaha Tha Aur Anya Kahaniyan
    Shri Chandra Dhar Sharma Guleri
    150 135

    Item Code: #KGP-9078

    Availability: In stock


  • Facebook Ke Janak : Mark Zuckerberg
    M.A. Sameer
    240 216

    Item Code: #KGP-7806

    Availability: In stock

    अमरीकी युवा मार्क जुकरबर्ग ने किस प्रकार अपनी विलक्षण प्रतिभा से आधुनिक जगत में लोगों को सरलता से आपस में जुड़ने का अवसर दिया, यह एक अत्यंत रोचक विषय है। प्रस्तुत पुस्तक ‘फेसबुक के जनक: मार्क जुकरबर्ग’ उनके विलक्षण मस्तिष्क के अद्भुत कारनामे को प्रेरक रूप में सामने लाने का प्रयास है। यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठकों के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होगी और उन्हें अनेक रोचक तथ्यों से अवगत भी कराएगी।
  • Ek Aur Chandrakanta (2nd Part)
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-900

    Availability: In stock


  • Ek Sadaa Aati To Hai
    Pramod Beria
    150 135

    Item Code: #KGP-9307

    Availability: In stock


  • Hriday Ka Kaanta
    Tejrani Dixit
    250 225

    Item Code: #KGP-695

    Availability: In stock

    पंडित सूर्यनारायण जी दीक्षित, एम. ए., अपने जीवन के प्रभात-काल में हिंदी के प्रेमी रहे हैं। कुमारी तेजरानी जी उनकी सुपुत्री हैं। कुमारी जी की प्रतिभा का फल-स्वरूप ‘हृदय का कांटा’ हमारे सामने प्रस्तुत है।
    जहां तक हमें ज्ञात है कुमारी जी पहली स्त्री-रत्न हैं जिन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी में मौलिक उपन्यास लिखा है। आपसे हिंदी के पाठक एकदम अपरिचित नहीं हैं। समय-समय पर आपकी लिखी हुई कहानियां पाठकों के सामने आती रही हैं और पाठकों ने उनका आदर भी किया है। परंतु ‘हृदय का कांटा’ से कुमारी जी का स्थान साहित्य-जगत् से निश्चित और सुरक्षित हो जाता है।
    ‘हृदय का कांटा’ का प्लाट साधारण है। कई गार्हस्थ्य उपन्यासों से कथा मिलती-जुलती है। फिर भी हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि उपन्यास मौलिक है। इस प्रकार के अन्य उपन्यासों से इसमें एक विशेषता यह है कि जहां और उपन्यास आदि से लेकर अंत तक भाव-प्रधान हैं, वहां प्रस्तुत उपन्यास की धरा भाव के भंवर से कर्म के समुद्र की ओर बहती है।
    उपन्यास में सामाजिक कुरीतियों का प्रदर्शन भलीभांति किया गया है और यह दिखाने की चेष्टा की गई है कि गार्हस्थ्य जीवन की अनेक अशुभ घटनाओं का कारण सामाजिक कुरीतियां हैं।
    ‘प्रतिभा’ के चरित्र में अस्वाभाविकता की जरा सी झलक आ गई है। उसका कारण यह है कि कुमारी जी ने उपन्यास में हमारे सम्मुख स्त्री-जाति का आदर्श रखने का प्रयत्न किया है और इसी से स्त्री-जाति की अनेक मानवीय प्रवृत्तियों का दमन करना पड़ा है। परंतु जहां हम प्रतिभा के चरित्रा में कुछ अमानवीय देवीत्व पाते हैं, वहां ‘मालती’ और ‘महेश’ के संबंध का विकास और उसकी निस्सारता का चित्रण बहुत ही मर्मस्पर्शी, रोचक और स्वाभाविक है। कुमारी जी की प्रतिभा का वास्तविक परिचय हमें यहीं पर मिलता है।
    उपन्यास मंजी हुई लेखनी का लिखा हुआ न होने पर भी हमें कुमारी जी की प्रतिभा तथा वेदनापूर्ण सहृदयता का पर्याप्त परिचय कराता है। हमारा विचार है कि किसी भी लेखक या लेखिका का पहले-पहल ऐसा उपन्यास लिखना उसके लिए गौरव की बात होगी।
    हमें कुमारी जी से हिंदी साहित्य-सेवा की बहुत कुछ आशा है और विश्वास है कि आप निरंतर कुछ न कुछ लिखती रहेंगी।
    —बंशीधर, एम. ए.
    [सरस्वती (पत्रिका) : मार्च 1929 (फाल्गुन 1985), भाग 30, खंड 1, संख्या 3, पूर्ण संख्या 151, पृ. 346]
  • Plot Ka Morcha
    Shamsher Bahadur Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-588

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    200 180

    Item Code: #KGP-770

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकू' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aadhunik Bharat Main Shaikshik Chintan
    Hari Ram Jasta
    100 90

    Item Code: #KGP-9003

    Availability: In stock

    इस सत्य पर कोई सन्देह नहीं हो सकता, कि "शिक्षा सम्बन्धी समस्त प्रश्न  अन्तत: जीवन-दर्शन से सम्बन्धित प्रश्न है । अन्य विधाओं की भाँति शैक्षिक दर्शन का मूल उद्देश्य भी शिक्षा-समस्या के विषय में ज्ञान-प्रसार है और उसे सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करना है , शैक्षिक समस्याओं पर मत सब प्रकट करते हैं, पर उन्हें समझते बहुत कम लोग है । शैक्षिक चिन्तन को हम यदि एक ऐसा प्रयास कहें जिसके द्वारा मानव अनुभूतियों के सम्बन्ध में समग्र रूप से बोधगम्य बनने में समर्थ है, तो अत्युक्ति न होगी । शिक्षा दर्शन का क्रियात्मक रूप जीवन के आदर्शों को यथार्थ के धरातल पर खडा करना है ।
    मानव इतिहास में शिक्षा मानव समाज के विकास के लिए सतत क्रिया और प्रेरणा रही है । मनोवृत्तियों, मूल्यों और ज्ञान और कौशल दोनों ही क्षमताओं के विकास के माध्यम से शिक्षा लोगों की बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप बनने के लिए उन्हें शक्ति का लचीलापन प्रदान करती है, सामाजिक विकास के लिए प्रेरित करती है और उसमें योगदान देने के योग्य बनाती है ।
    भारतीय संविधान में ऐसे समाज की परिकल्पना की गई है, जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, प्रतिष्ठा और अवसर की समता पर आधारित है । इसमें समाजवाद, धर्म-निरपेक्षता और लोकतंत्र के लिए देश की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया गया है ।
    दीर्घ संघर्ष के बाद भारत स्वतन्त्र हुआ । इस दौरान स्वतंत्रता आन्दोलन के नेताओं, शिक्षाशास्त्रियों और भारतीय दार्शनिको ने दूरदर्शिता से, स्वतन्त्रता के लिए, उसके बाद उसे सुदृढ़ बनाने के लिए तथा भारत में इच्छित सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए शैक्षिक चिंतन ही नहीं किया, उसे व्यावहारिक रूप देने के लिए अपने ढंग से प्रयत्न भी किए । इस शैक्षिक चिन्तन में भारतीय नागरिकों के लिए मानव एवं भौतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग करके राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाने और समाजवादी और सहनशील समाज स्थापित करने की परिकल्पना को व्यावहारिक रूप देने के लिए दिशा-संकेत उपलब्ध है ।
  • Sahachar Hai Samay
    Ramdarash Mishra
    800 640

    Item Code: #KGP-124

    Availability: In stock

    सहचर है समय
    रामदरश मिश्र का समय को सहचर मानना प्रकारांतर से 'स्व' और 'समय' के संबंधों की द्वंद्वात्मकता और सामंजस्य की ओर संकेत करता है । इस आत्मवृत्त से एक ओर कछार के अंचल में बीते बचपन से लेकर वाराणसी में उच्च शिक्षा, जीविका-संघर्ष, गुजरात-प्रवास, दिल्ली- आगमन, बहुआयामी रचनाशीलता और दिल्ली के साहित्यिक परिवेश से जुड़े मार्मिक प्रसंगों का जुलूस उमड़ पड़ा है, दूसरी ओर इसी के समानांतर स्वतंत्रता-पूर्व का ग्रामीण परिवेश, स्वतंत्रता और जनतांत्रिक आकांक्षाएँ, व्यवस्था के अंतर्विरोध, अध्यापन-जगत की राजनीति, भारत-पाक युद्ध, आपातकाल, इंदिरा गाँधी का निधन, सिख-विरोधी हिंसा यानी कि पचास वर्षों का जीवंत इतिहास अपनी अनेक विशेषताओं और कुरूपताओं के साथ उभरा है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक रचनाकारों और कलाकारों ने आत्मकथाएँ लिखी हैं। अधिकतर चर्चित आत्मकथाओं में काम-संबंधों की सनसनी परोसने या स्वयं को 'अतिविशिष्ट' सिद्ध करने की जो प्रवृत्ति मुखर है, 'सहचर है समय' से उसका अभाव है । अत: यह आकस्मिक नहीं कि रामदरश मिश्र का प्रस्तुत आत्मवृत्त अमृता प्रीतम, हंसा वाडेकर, दुर्गा छोटे, कमला दास और पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' आदि की आत्मकथाओं से अलग किस्म का बन पडा है ।
    'सहचर है समय' का प्रस्थान बिंदु जीवन के प्रति गहरी आस्था है । मिश्र जी ने अपने जन्म लेते ही कीड़े-मकोडों के चलते मौत के मुँह में चले जाने और पडोस की एक बुआ के हाथों बनाए जाने का उल्लेख क्रिया है। इस घटना को अर्थविस्तार देते हुए उन्होंने लिखा है :
    'मेरी जीवन-यात्रा से कीड़े-मकोड़े भी खूब मिले, लेकिन मुझे उनसे बचाने वाली शक्तियां भी मिलती ही गईं । कीड़े-मकोड़े तो सभी को मिलते हैं, किसी-किसी को तो साफ ही कर जाते हैं, उनकी जिजीविषा, उनके जीवन- मूल्य सभी को चट कर जाते हैं, लेकिन मुझे जिजीविषा मिली है । जीवन के प्रति अगाध विश्वास, निष्ठा और मूल्य मिला है इसीलिए कि कीड़े-मकोडों के बावजूद जीवनदायक कोई न कोई शक्ति, रस मुझे देर-सबेर मिलता ही रहा है ।'
    प्रारंभ से ही स्वप्नदर्शिता का जिक्र भी हैं :
    'तब कुत्ता पाला था, अब सपने पालता हूँ अपने लिए, समाज के लिए, देश के लिए । वे छीन लिए जाते हैं, छीनकर किसी और को दे दिए जाते है, या तोड़ दिए जाते हैं—अपनों द्वारा भी और दूसरों द्वारा भी। ...लेकिन न जाने क्या है कि मैं टूटा नहीं, बिखरा नहीं, मिट-मिटकर बनता हूँ। गिर-गिरकर उठता गया हूँ, भटक-भटककर रास्ते पर आ गया हूँ।'
    सपने पालना, सपनों का टूटना-बिखरना, स्वयं के टूटने की स्थिति, लेकिन जीवनदायक शक्तियों और दृढ़ आस्था के फलस्वरूप आखिरकार सँभल जाना-यही मिश्र जी की अब तक की जीवन-यात्रा है। आज के स्वार्थ-संकुल परिवेश में टूटना-बिखरना किसी संवेदनशील बुद्धिजीवी की अनिवार्य नियति है । लेकिन बिना कुंठित  और निराश हुए अंतत: परिवार के भरेपूरेपन का संतोष महसूसना सबका सौभाग्य नहीं होता ।
    मिश्र जी ने अपने आत्मवृत्त का समापन करते हुए लिखा है : 'अनेक सांसारिक अनुपलब्धियों के बावजूद परिवार का यह भरापूरापन हमें मिला है, उससे हम बहुत प्यार करते हैं । जिस किसी शक्ति के कारण हमें यह वरदान मिला है, उसके प्रति हम गहरा आभार व्यक्त करते हैं...।'
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah (Vol.-2)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    650 585

    Item Code: #KGP-603

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (2)
    (आजादी के नीतिकार)
    आँखों देखे ये वृत्तांत स्मृतियों के जीवत कालखंड भी है । इनमें राजनीतिक हलचलें हैं तो आत्मीयता यानी अपनेपन में पगी अविस्मरणीय, दुर्लभ घटनाएँ भी ।
    सूमित्रा जी साक्षी रहीं उस परिवर्तन के दौर की, इसलिए उनकी दृष्टि व्यापक एवं विस्तृत रही । उन्होंने सीमित दायरे के बावजूद असीमित परिधि को छुआ है । इसलिए गांधी जी को समझने में यह कृति हर अर्थ में सहायक सिद्ध होगी ।
    उस दौर में विश्व में क्या-क्या हुआ, उसका सहज आकलन भी इनमें दीखता है । 'जलियाँवाला बाग़' नरसंहार के दिल को दहला देने वाले दृश्य ! डेढ़ हजार से अधिक निर्दोष लोग भून दिए गए । जनरल डायर की इस दानवीय लीला ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया था ।
    'साबरमती आश्रम' गांधीवादी विचारों की प्रयोगशाला बना । चंद्रभागा और साबरमती नदी के बीच, बबूल की कँटीली झाडियों कै पार्श्व में एक नए संसार की साधना हुई-खुले आसमान के नीचे ।
    यह आश्रम कब तीर्थ बना, पता ही नहीं चला । 
    'चंपारण', 'खेड़ा सत्याग्रह', 'साइमन कमीशन’, 'नोआखली', 'बिहार को कौमी आग' अनेक प्रसंग हैं, जो अनेक अर्थों से उल्लेखनीय है ।
    सुमित्रा जी ने गांधी जी के उन पक्षों पर भी प्रकाश डाला, जो महत्त्वपूर्ण है, जिनके बारे में लोग अधिक नहीं जानते । क्योंकि उन्होंने यह सब स्वयं घटित होते देखा है, इसलिए प्रामाणिक भी कम नहीं ।
    हैदराबाद रियासत का भारत में विलय-प्रसंग भी कम रोचक नहीं । कासिम रिजवी का दिल्ली के लाल किले पर अपना झंडा फहराने का सपना सपना ही रह गया । हैदराबाद मुक्ति के पश्चात सरदार पटेल ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर दिल्ली बुलाया । लाल किले पर तो कासिम अपनी ध्वजा नहीं फहरा पाए, हाँ, लाल किले के तहखाने में कैद कर उसे अवश्य रखा गया । उन पर मुकदमा चला और आजीवन कैद की सजा मिली ।
    ऐसे अनेक प्रसंग, विचारोत्तेजक ।
    --हिमाशु जोशी
    15 अगस्त, 2009
  • Anaam Yatraayen
    Ashok Jairath
    300 270

    Item Code: #KGP-237

    Availability: In stock

    जीवन एक सफर और हमें निरंतर इस सफर में चलते रहना है । जो चलता रहा, वह जीता रहा और जो बैठ गया, सो बैठ गया । अकसर लोग यात्राओं से घबराते है । कई कारण हैं -आर्थिक अभाव साथ की कमी या वैसे ही मन नहीं करता, आलस्य में स्चा-बसा मन बस आराम करना चाहता है । हमारा शरीर 'हड्ड हराम' हैं, वह आराम चाहता है, पर जितना ही इसे माँजा जाए, उतना ही यह निखरता है ।
    हिमालयी श्रृंखलाएं, हिममंडित शिखर व्यक्ति को बार-बार बुलाते हैं । इनके ऊपर गूंजते संगीत के स्वर और लोककाथाएं आत्मविभोर कर देती हैं और इनके अजस्र जलस्रोत जहां नैसर्गिक परिवेश को जन्म देते है, वहीं पर थके हुए मन और शरीर को संबल देते है ।
    लेखक ने पश्चिमी हिमालयी सांस्कृतिक क्षेत्र व अनेक हिमानियों के साथ-साथ दूसरे दुर्गम इलाकों की साहसिक यात्राएं की हैं, जिनका विशद विवरण इस पुस्तक के रूप में पाठकों को सौंपा जा रहा है । ये यात्राएं कूमाऊं-गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय एव सांस्कृतिक क्षेत्रों से ही संबंधित हैं, मात्र द्वारकापुरी की यात्रा को छोड़कर । यात्राओं का निरंतर सिलसिला लेखक के अलमोड़ा में प्रवास के दौरान शुरू हुआ, जब सारे उत्तरांचल के साथ हिमानियों को भी ट्रेक किया गया, जहाँ हिमालियाई संस्कृति को बहुत करीब से देखकर स्वयं लेखक हिमालियाई हो आया था ।
    इन ब्योरों के साथ ही उन सभी साथियों-सहयोगियों और मार्गदर्शक का सीधा-सहज और बिना किसी लाग-लपेट के वर्णन भी दिया जा रहा है, जो इन संस्मरणों को और भी मनोरंजक और दिलचस्प बना देता है । आशा है, ये सभी संस्मरण/यात्राओं का वर्णन पाठकों को अच्छा लगेगा ।
  • Shesh Parichay
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-704

    Availability: In stock


  • Bantadhar
    Nisha Bhargva
    150 135

    Item Code: #KGP-1804

    Availability: In stock

    निशा भार्गव की कविताएँ गहरे मानवीय सरोकारों का प्रतिनिधित्व करती हैं । गम्भीरता से, सपाट भाव से किसी बात या संदेश को व्यक्त कर देना शायद हमें आसान लगे लेकिन हास्य-व्यंग्य के माध्यम से 'सर्व' को अभिव्यक्ति 'स्व' से आसान नहीं । यहीं निशा भार्गव अपनी कविताओं की भाषा-शैली और प्रवृति से भीड में अपना अलग स्थान बनाती हैं । उनकी अपनी खास शैली है जो अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ती । छंदमुक्त, इन कविताओं में एक प्रवाह होता है, गीत जैसी लयात्मकता होती है। यथा -
    "सड़क पर चक्का जाम हो गया
    ये अंजाम बहुत आम हो गया
    मीडिया भगवान हो गया
    देश का कर्णधार हो गया ।" 
    निशा भार्गव की कविताएँ सामाजिक मुददों को जीवंतता से उठाती हैं, समाधान ढूंढती हैं, व्यवस्था पर प्रहार करती हैं, लाचारी पर हँसती हैं, समाधान का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं । यथा -
    "मँहगाई ने सबका दिल तोडा
    घर-घर का बजट मरोड़ा
    फिर सबको दी सीख
    छोडो ये शिकायत ये खीझ
    समस्या का समाधान करना सीखो
    बिन बात यूँ ही मत खीझो ।"
    इसी तरह 'बंटाधार' कविता वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्थाओं पर जमकर प्रहार करती है । 'बंटाधार' ही क्यों संग्रह को अन्य कविताओं में भी अलग-अलग प्रसंग हैं, व्यंग्य की अनूठी छटा हैं । ये कविताएँ मन को लम्बे समय तक गुदगुदाने के साथ-साथ कुछ सोचने पर भी बाध्य करती हैं ।
    —डा. अमर नाथ 'अमर'
  • Charitraheen
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    400 360

    Item Code: #KGP-878

    Availability: In stock


  • Samvad
    Prabhakar Shrotiya
    200 180

    Item Code: #KGP-9116

    Availability: In stock

    इसमें संदेह नहीं कि ‘संवाद’ एक सार्थक कृति है। इसका श्रेय आलोच्य और आलोचक के बीच (सु) संवाद को तो है ही, स्वयं आलोचक की कविता की गहरी समझ, कवि के अंतरंग और रचना शक्ति की पहचान की क्षमता और निष्पक्ष तथा संतुलित भाव के आलोच्य की रचना की कमजोरियों पर उंगली रख पाने की सामथ्र्य भी इस श्रेय की भागी हैं यह एक न्यायिक जांच ही नहीं, न्यायपूर्ण जांच भी है। ये आलेख श्रोत्रिय की भाषा की कवितत्वपूर्ण भंगिमा के साथ-साथ बीच-बीच में उनकी कबीरदासी व्यंग्य मुद्रा और उनकी तेजस्विता या जिंदादिली का भी प्रमाण उपस्थित करते हैं।
    -डाॅ. आनंद प्रकाश दीक्षित, दिनमान दिल्ली
  • Khaadi Mein Polyester
    Rajendra Tyagi
    260 221

    Item Code: #KGP-144

    Availability: In stock

    यह अनायास  नहीं है कि पूरे संग्रह में कई रचनाएँ गाँधी जी पर  केंद्रित हैं । आज़ादी के बाद इस देश का जो राजनितिक अर्थशास्त्र रहा है, उसे समझने के लिए गांधी के नाम पर चले गांधीवाद के छद्म को समझना जरुरी है । गांधीवाद जीवनशैली बनने के बजाय एक ऐसी फिलॉसफी हो लिया है, जिसमें माल काटने की अब भरपूर गुंजाइश है ।
  • Buddha Ka Chakravarti Saamrajya
    Rajesh Chandra
    240 216

    Item Code: #KGP-9114

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    200 180

    Item Code: #KGP-0001

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार भीष्म साहनी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'वाङ्चू',  'साग-मीट', 'पाली', 'समाधि भाई रामसिंह', 'फूलां', 'सँभल के बाबू', 'आवाजें', 'तेंदुआ', 'ढोलक' तथा 'साये'।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार भीष्म साहनी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Meri Saras Kavitayen
    Nisha Bhargva
    200 180

    Item Code: #KGP-9365

    Availability: In stock

    मन की बात
    हम सब हमेशा कुछ कहने को उत्सुक रहते हैं, सुनते कम बोलते ज्यादा हैं। वास्तव में देश की तरक्की जनता की खुशी बढ़ाती है लेकिन समस्याएं खुशी का घेराव करके खीझ पैदा करती हैं। हम अपने-अपने सुझाव देकर समस्याओं का समाधान मौखिक रूप से ही करने का प्रयास करते हैं किंतु हमारी आवाज वहां तक नहीं पहुंच पाती जहां तक पहुंचनी चाहिए इसलिए खीझ और झल्लाहट बढ़ती है। तनाव घर कर लेता है। मन की शान्ति के बहुत तरीके हैं उनमें से एक तरीका पढ़ना और सुनना है। कविताओं का लिखना मुझे जितना अच्छा लगता है उतना पढ़ना और सुनना भी। मुझे लगता है पठन-पाठन से भी मन की शुद्धि होती है। हास्य कविताएं न केवल तनाव कम करती है बल्कि मन में सरसता पैदा करती हैं खासकर तब, जब नकारात्मक स्थितियां हमें परेशान कर रहीं हों। मेरी कविताओं को पढ़कर अगर आपके चेहरों पर मुस्कान आ जाए तो आपके साथ-साथ मुझे भी सुकून मिलेगा। 
    ‘मेरी सरस कविताएं’ पुस्तक मैंने अपनी पूर्व प्रकाशित पुस्तकों ‘उधार की मुस्कान’, ‘अच्छे फंसे’, ‘चिकने घड़े’, ‘बंटाधार’ और ‘घनचक्कर’ में से चुनी हैं। इस पुस्तक को आप पढ़ेंगे तो मुझे लगेगा आपने मेरी पूर्व प्रकाशित पुस्तकों की एक झलक प्राप्त कर ली। लेखकों और कवियों को लिखने का जितना चाव होता है उतना ही इस बात का भी कि उनकी रचनाएं पाठकों तक पहुंचे, उनकी प्रतिक्रियाएं भी मिले। मैं भी ऐसा ही चाहती हूं।
    -निशा भार्गव
  • Anuvaad Aur Bhaashik Sanskriti Hindi Ke Prayojanparak Sandarbh
    Rita Rani Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-528

    Availability: In stock

    हिंदी लंबे समय से अनुवाद कर्म करने के बावजूद हम अनुवाद को भाषायी गतिविधियों से सकारात्मक और सर्जनात्मक ढंग से जोड़ने में बहुत सफल नहीं हो पाए हैं। अनुवाद के माध्यम से हिंदी को अभिव्यक्ति की सहजता से, उसकी बोलियों की अपनी कमाई हुई शब्दावली और भंगिमाओं से, जीवन संदर्भों की निकटता से जोड़ते हुए भाषायी पैनेपन को निखार नहीं पाए हैं।
    भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर की भाषाओं के लिए कई तरह की चुनौतियां हैं। हिंदी को उन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपनी भाषिक संस्कृति को न केवल पहचानना होगा बल्कि उस भाषिक सांस्कृतिक परिवेश को कायम रखने का हर प्रयास करना होगा, जिसमें हिंदी भाषी समाज का सामूहिक अवचेतन और जातीय स्मृति संचित है; साथ ही जिसमें हिंदी भाषी समाज की मौजूदा और भावी पीढ़ियों की आशाएं, आकांक्षाएं अपना विस्तार और प्रसार पाती हैं और पाएंगी। भाषायी अस्मिता केवल बोलचाल, घरेलू व्यवहार, मनोरंजन से संचित और समृद्ध नहीं होती। उसके लिए उच्चकोटि के सर्जनात्मक साहित्य और साहित्य-विमर्श के साथ-साथ आवश्यक होती है उस भाषा में ज्ञान-संपदा की, दैनंदिन जीवन के बड़े से बड़े कार्यकलाप के संचालन, प्रयोजन और चिंतन की निरंतर और सिलसिलेवार मौजूदगी।
    प्रस्तुत पुस्तक हिंदी भाषा-संस्कृति के इन्हीं व्यापक सरोकारों से संबंधित है।
  • Yah Ant Naheen
    Mithileshwar
    500 450

    Item Code: #KGP-812

    Availability: In stock


  • Hashiye Par Harf
    Prem Bhardwaj
    400 360

    Item Code: #KGP-450

    Availability: In stock

    लक्ष्मण रेखा लांघने वाली बात मीडिया के साथ कैसे कुछ हद तक सही बैठती है, इसे भी समझने की जरूरत है। एक जमाने से पत्रकारिता को पवित्र पेशा या मिशन माना गया है। किसी लक्ष्मण ने नहीं, उससे पवित्रता की इसी जन-अपेक्षा ने लक्ष्मण रेखा न जाने कब, क्यों और कैसे खींच दी? सत्ता का यह चरित्र होता है कि वो अपने समय में पवित्र चीजों को भ्रष्ट करती है और मन को भाने वाली वस्तु या इंसान को भोग की चीज मानती है। सर्वत्र पर मालिकाना हक ही उसका स्वभाव है। लिहाजा उसे गवारा नहीं कि वो गलत है तो सामने वाला सही रहकर उसके लिए ‘गलत’ की परिधि को बरकरार रखे। खुद को इस परिधि से बाहर निकालने या अच्छाई की लकीर को मिटाने के मकसद से ही वो तरह-तरह का छल-प्रपंच करती है। कई दफा वो अपनी ताकत का जौहर दिखाकर जबरदस्ती भी करती है। जरूरत पड़ने पर ‘मायाजाल’ भी रचने से गुरेज नहीं करती। राडिया प्रकरण में कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने भी मायाजाल रचा। मीडियारूपी सीता के मन में ‘स्वर्णमृग’ (धन, संपन्नता और सुविधाएं) का लोभ जन्मा। और वह किसी को कुछ देने (एक राजा को मंत्रालय देने) की खातिर लक्ष्मण रेखा को लांघ गई। बदले में उसे क्या मिला, यह अभी सामने नहीं आया है। बहुत संभव है बाद में कुछ पता चले।
  • Aids : Tathya Evam Bhrantiyan
    Shuk Deo Prasad
    100 90

    Item Code: #KGP-9144

    Availability: In stock

    एड्स कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है कि रोगी का पारिवारिक या कि सामाजिक बहिष्कार किया जाय जैसा कि पहले कुष्ठ रोगियों प्रति किया जाता था। वैसे कुष्ठ भी अब असाध्य नहीं रहा। इस सामाजिक नजरिए में बदलाव की जरूरत है। एड्स रोगी को घृणा नहीं आपका स्नेह चाहिए। एक साथ रहने, उठने-बैठने, भोजन करने, सामूहिक स्नान गृह/शौचालय में जाने, वस्त्रों के संप्रयोग से एड्स नहीं फैलता और न ही एक दफ्तर में साथ काम करने से या कि भीड़ भरे स्थानों में, रेल-बस में साथ-साथ सफल करने से। अतः आप एच.आई.वी. संक्रमित/एड्स ग्रस्त व्यक्ति के साथ सहभागिता कर सकते हैं। ऐसी सामाजिकता से उसकी अपनी जिंदगी के प्रति रुझान बढ़ जाएगी।
    एड्स के अधिकांश मामले यौन संसर्ग के देखे गए हैं। फिर दूषित रक्ताधान, साझे ब्लेडों, सुइयों/सिरिंजों के इस्तेमाल से भी संक्रमण होता है अर्थात् शारीरिक द्रव, यौनिक द्रव इसके प्रसार के कारण हें। इन बातों को ध्यान में रखकर और इनसे परहेज करके आप रोगी के साथ मजे से गुजर-बसर कर सकते हैं। एड्स के बारे में बहुत सी भ्रांत धारणाएं समाज में व्याप्त हैं। उन भ्रांतियों का निवारण और तथ्यों की सटीक जानकारी देना ही पुस्तक का मंतव्य है। एड्स के प्रति आम आदमी की भाषा में जागरूकता जगाने के ही उद्देश्य से पुस्तक लिखी गई है।
  • Buniad Ali Ki Bedil Dilli
    Dronvir Kohli
    400 360

    Item Code: #KGP-263

    Availability: In stock

    बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली
    यह अपूर्व संग्रह 'धर्मयुग' के लोकप्रिय स्तंभ बेदिल दिल्ली में प्रकाशित लेखों का है। डॉ० धर्मवीर भारती के विशेष आग्रह पर इसे लिखा करते थे उपन्यासकार द्रोणवीर  कोहली-बुनियाद अली के छदम नाम से।
    स्तंभ में जाने वाली सामग्री के बारे में प्राय: तीखी प्रतिक्रिया होती थी। साहित्यिक गोष्टियों वाले लेखों को लेकर कुछ लेखक लाल-पीले भी होने लगते थे। ऐसी स्थिति में स्तंभ-लेखक के बारे में तरह-तरह के कयास लगाए जाते थे। लेकिन भारती जी ने लेखक की पहचान को निरंतर गुप्त रखा-इतना कि 'धर्मयुग' में उनके सहयोगी तक नहीं जान पाते थे कि इसे लिख कौन रहा है।
    डॉ. धर्मवीर भारती इस स्तंभ के बारे में इतने उत्साहित थे कि लेखक को उन्होंने अपने 4-4-81 के पत्र में यह कहकर प्रोत्साहित किया था : "स्तंभ जोरदार जा रहा है। अपने ढंग का बिलकुल अलगा "
  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    240 216

    Item Code: #KGP-235

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • Aacharya Hazari Prasad Dwivedi : Kuchh Sansmaran
    Kamal Kishore Goyenka
    500 450

    Item Code: #KGP-1571

    Availability: In stock

    हजारीप्रसाद द्विवेदी वस्तुत: हिंदी भाषा और साहित्य के आचार्य थे। पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, हिंदी और बांग्ला आदि भाषाओँ के तलस्पर्शी ज्ञान ने उनके चिंतन व सृजन को विलक्षण आयाम प्रदान किए। शातिनिकेतन से शिवालिक के बीच विस्तृत आचार्य द्विवेदी को कीर्तिकथा हिंदी का गौरव है। आचार्य द्विवेदी के जीवन और कृतित्व पर प्रभूत मात्रा में लिखा गया है। उन्हें आकाज्ञाधर्मी गुरु और व्योमकेश दरवेश कहकर सखोंधित किया गया। 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी : कुछ संस्मरण' इस संदर्भ में एक स्थायी महत्व की पुस्तक है। आचार्य द्विवेदी पर विख्यात व्यक्तित्वों द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण संस्माणों की इस पुस्तक का संपादन सुप्रसिद्ध साहित्यकार कमलकिशोर गोयनका ने किया है। पुस्तक को भूमिका में वे लिखते हैं, 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की किसी लेखक द्वारा जीवनी लिखने या उनके जीवन को जानने को जिज्ञासा जब भी पाठकों के मन में उत्पन्न होगी तब-तब ये संस्मरण उसे आत्मीय-जीवत एवं सार्थक प्रतीत होने के साथ उनको स्मृति को अक्षुष्ण बनाने में सहायक सिद्ध होगे।'
    इस पुस्तक को विशेषता यह है कि द्विवेदी जी का संस्परणात्मक मूल्याकन प्राय: सभी पक्षों से किया गया है। इस अर्थ में इसे आलोचना की आंख से भी पढा जा सकता है। समग्रत: एक विराट व्यक्तित्व और उसके कालजयी कृतित्व का समवेत संस्मरणात्मक अनुशीलन। पठनीय व संग्रहणीय पुस्तक ।
  • Mere Saakshaatkaar : Govind Mishra
    Govind Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-760

    Availability: In stock


  • Pracheen Tutan Kahaniyan
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-07

    Availability: In stock

    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Jainendra Kumar
    Jainendra Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-2070

    Availability: In stock

    जैनेन्द्र कुमार

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फांसी', 'पाजेब, 'फोटोग्राफी', 'मास्टर जी', 'अपना-अपना भाग्य', 'जाह्नवी', 'एक रात', 'साधु की हठ', 'नीलम देश की राजकन्या' तथा 'चलित-चित'  ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक जैनेन्द्र कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Swami Dayanand Ki Jeevan-Yaatra
    Jagat Ram Arya
    30

    Item Code: #KGP-9194

    Availability: In stock

    हिंदुओं में आज जो राष्ट्रीयता और जीवन की नई लहर हमें दीख पड़ती है, उसका श्रेय उस पुरुष श्रेष्ठ को है जो आर्य समाज के प्रवर्तक के नाम से प्रसिद्ध है। उसने जो आग अपने तेज और तप से जलाई, उसने हिंदुओं की लाखों वर्षों की गुलामी और गंदगी को भस्म कर दिया।
    उसने सोई हुई हिंदू जाति को ठोकर मारकर कहा-उठ, उठ, ओ महाजातियों की माता, उठ! 
    भारत का यह विख्यात विद्वान्, तपस्वी और इन्द्रिय विजय पुरुष जन्म-भर विरोधों को अपनी मुठमर्दी से कुचलता हुआ आगे ही बढ़ता चला गया। उसने उस प्राचीन दीवार को ढहा दिया जिसमें हिंदू जाति कैद थी। उसने विशुद्ध वैदिक शिक्षण संस्थाएं खोलने की प्रेरणा दी। यह पुरुष श्रेष्ठ ऋषि दयानंद थे।
  • Chaak Par Charhi Maati
    Baldev Vanshi
    200 180

    Item Code: #KGP-631

    Availability: In stock

    धरती पर माटी का अम्बार, अनेकानेक रूपों में बढ़ता जा रहा है । माटी का विस्तार संवेदना-शून्य, मरी माटी का । पांवों तले बेदर्दी से कुचली-गूंधी माटी/खेतों की/नदी-नालों के बहते पानियों की/कहाँ-कहाँ से आई बहकर / रोते हुए भूखे कण/दुविधा में दुखते क्षण/अकाल के मारे । पानी-पानी जागने/पत्थर-पत्थर सोने के/उनींदे-विदीर्ण सपनों के/कैसा लेंगे रूप? यही वर्तमान इक्कीसवीं सदी की भयसनी, भयंकर त्रासदियों की नियति है । लगता है किन्हीं अलक्ष्य ग्रहों से पीड़ाएँ इस धरती पर मृत्यु, युद्ध, हिंसा, हत्या के रूप में बरस रही हैं या इस धरती की माटी से ही उग-उगकर बाहर निकल रही हैं ।
  • Na Radha Na Rukamani
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-2103

    Availability: In stock

    आज हरकृष्ण को अपना वह सपना याद आया तो लगा—इंसान ने सचमुच कभी इन्सान लफ़ज़ के अर्थ के नहीं जाना, और न उसने कभी धर्म लफ़ज़ के अर्थ को जाना है—
    और उसी सांस में हरकृष्ण को अहसास हुआ कि इंसान ने अभी तक रिश्ता लफ़ज़ की भी  थाह नाते पाई है... 
    रिश्ता लहू के कौन-कौन से तार से जुड़ता है, लोगों को सगा कर जाता है, और कौन-कौन से तार से उखड़कर लोगों को पराया कर जाता है, कुछ भी हरकृष्ण  की पकड़ में नहीं आया । लेकिन जिंदगी को सुनी हुई और भुगती हुई कुछ हकीकतें थी जो उसके सामने एक खुली किताब की तरह थीं—

    -इसी उपन्यास से
  • Suraj Kiran Ki Chhanv
    Rajendra Avasthi
    100 90

    Item Code: #KGP-SKCM

    Availability: In stock


  • Bharatratna Se Sammanit Mahaan Vyaktitva
    Dr. Rashmi
    760 684

    Item Code: #KGP-519

    Availability: In stock

    भारतरत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। अति सम्माननीय एवं विशिष्ट व्यक्तियों को राष्ट्रीय सेवा हेतु प्रदान किया जाने वाला यह सम्मान संपूर्ण व्यक्तित्व व देश के प्रति समग्र समर्पण भावना का आदर करते हुए समर्पित किया जाता है। इस सम्मान से अलंकृत व्यक्ति ‘भारतीय नागरिकता की वरीयता सूची’ में सातवें स्थान पर सुशोभित होते हैं। यह आवश्यक है कि 2 जनवरी, 1954 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा स्थापित ‘भारतरत्न’ सम्मान के विषय में प्रत्येक नागरिक सुपरिचित हो। कला, साहित्य, विज्ञान, राजनीति, विचार, उद्योग, लेखन, सार्वजनिक सेवा एवं खेल आदि के क्षेत्रों में ‘भारतरत्न’ से सम्मानित विभूतियों के जीवन तथा कृतित्व से प्रेरणा पाकर कोई भी अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
    अनेक प्रेरक रचनाओं की लेखिका डा. रश्मि ने परिश्रम व निष्ठापूर्वक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पुस्तक का लेखन किया है। सम्मानित व्यक्तित्व के सभी आयामों का परिचय देते हुए उन्होंने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों को रेखांकित किया है। प्रथम बार ‘भारतरत्न’ (1954) से अलंकृत चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से लेकर 2015 में सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी एवं पं. मदन मोहन मालवीय तक सभी महान् व्यक्तित्वों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी इस पुस्तक में समाहित है।
    राष्ट्रप्रेम, जीवन मूल्य और समर्पित कृतित्व को परिभाषित करती पुस्तक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पठनीय व संग्रहणीय है। सरल-सुगम भाषा तथा प्रवाहपूर्ण शैली इसे अत्यंत रोचक बना देती है।
  • Aadhi Chutti Ka Itihas
    Raj Kumar Gautam
    140 126

    Item Code: #KGP-1844

    Availability: In stock

    आधी छुट्टी का इतिहास
    हिंदी के चर्चित कथाकार राजकुमार गौतम की कहानियाँ समकालीन जीवन-स्थितियों  का गहरी इमानदारी से  उकेरती हैं । शहरी और  कस्बाई निम्न-मध्यवर्ग उनकी कहानियों में विशेष रूप से चित्रिन हुआ है, जो न तो किताबी है और न आयातित, बल्कि ठेठ हिंदुस्तानी हैं । यही कारण है कि राजकुमार गौतम की प्राय प्रत्येक कहानी किसी भी साहित्यिक वाद-विवाद से परे सामाजिक यथार्थ के विभिन्न स्तरों की खरी पहचान कराने में समर्थ है ।
    आधी छुट्टी का इतिहास में राजकुमार गौतम की एक दर्जन कहानियाँ संगृहीत हैं । इनसे गुजरते हुए लगया कि इनका प्रत्येक कथा-चरित्र हमारे एकदम नजदीक है या शायद हमारा ही प्रतिरूप  है। इतना ही नहीं, इनमें उन निर्जीव  वस्तुओं को भी जुबान मिली है, जो हमारी रोज  की बुनियादी जरूरतों को पूरा करती  हैं और इसी बिंदु पर ये कहानियाँ मनुष्य की अभावग्रस्त जिंदगी, यातना और उसकी जिजीविषा को मार्मिक ढंग से उजागर करती  ।
    टुटे-अधटूटे पारिवारिक रिश्तों और दायित्वों का बोझ ढोते, घर-दफ्तर के बीच चक्कार काटते तथा छोटी-छोटी इच्छाओं, खुशियों और उम्मीदों की पूर्ति के  लिए दिन- दिन  कितने ही चरित्र इन कहानियों में हैं, जो हमने बोलना-बतियाना चाहते  हैं, ताकि अपने जीवन पर पड़ते विभिन्न दबावों के प्रतिरोध की ताकत बटोर और सौंप  सकें । संक्षेप में, अपने सामाजिक परिवेश, उसके यथार्थ और अपनी लडाई के निजी मोर्चों की पहचान के लिए इन कहानियों को लंबे समय तक याद किया जाएगा ।
  • Agyaat Ka Nimantran
    Amrita Pritam
    160 144

    Item Code: #KGP-1973

    Availability: In stock

    अज्ञात का निमंत्रण 

    यह कौन-सी रात है
    जो मुझे दावत देने आई है
    आर सितारों के चावल फटककर
    यह टेग किसने राँधी है... 

    आज यह चाँद की सुराही-
    कौन आया है!
    कि इस चाँदनी को पीकर
    आसमान बौरा गया है... 

    जाने खुदा वह कौन-सो रात होती है
    जो किसी सपने का मस्तक चूम लेती है
    और फिर ख़यालों के पैरों में
    एक पायल., बजने लगती है... 

    प्रेम भी ईश्वर की तरह अज्ञात का नाम है
    उसकी बात जितनी भर--
    किसी संकेत में उतरती है
    वही संकेत इस पुस्तक के अक्षरों में है...
  • Aadi Jagadguru Shankaracharya
    Chandrika Prasad Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9009

    Availability: In stock


  • Deevaar Ke Us Paar
    Shanta Kumar
    200 180

    Item Code: #KGP-1965

    Availability: In stock

    दीवार के उस पार
    इस पुस्तक से एक कैदी ने जेल से भोगे अपने मूक कष्टों को शब्द दिए हैँ। यह कैदी मेरे जीवन की आशा हैं- मेरे पति, जिन्होंने अपने जीवन से दो बार जेल की घोर यातनाएँ झेली है और अँधेरों के पार कुछ देखने की लगातार कोशिश की है । एक बार उन्हें 1953 में और दूसरी बार 1973 में जेल जाना पडा । उनका सहानुभूति-भरा हृदय और सृजनात्मक मानस उन्हें उन दिनो लिखने के लिए विवश करता रहा और उन्होंने कुछ कहानियों, उपन्यास, कविताएं  और जेल-संस्मरण लिखे ।
    ये संस्मरण जेल से उनके जीवन को दर्शन है-उसके लिए जो कभी जेल न गया हो-भगवान् ऐसा अवसर कभी दे भी न-ये अनुभव अत्यंत रोमांचक और हृदयविदारक होंगे ।
  • Antim Padaav
    Hari Yash Rai
    180 162

    Item Code: #KGP-1825

    Availability: In stock

    अंतिम पड़ाव
    आज हम समय के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें दुनिया की बढ़ती समृद्धि और वैभव की सर्वभक्षी आकांक्षा सुकून देने के बजाय बेहद डराने वाली है। इस दौर में मनुष्यता का विघटन और क्षरण इतनी तेज़ी से हो रहा है कि सारा वैभव-प्रसार, पुरानी प्रतीकात्मक मिथकीय भाषा में कहूँ तो आसुरी लगता है। यह मात्र संयोग नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध है कि ‘ताकतवर’ होते मध्यवर्ग की निगाह को पूँजी की ताकतों ने उन सवालों की ओर से फेर देने में लगभग ‘सफलता’ हासिल कर ली है, जो कभी मनुष्यता की तरफदारी में हर गली-चैराहे को अपनी आवाज़ से गुँजाते थे। गनीमत है कि ऐसे क्रूर दौर में भी कुछ लोग हैं जो साहित्य, संस्कृति, कला और राजनीति में एक ज़िद के साथ मनुष्यता, नैतिकता और न्याय के सरोकारों के पास से न हटने का हठ ठाने हुए हैं। कथाकारों की ऐसी पाँत में हरियश राय का नाम तेज़ी से उभर रहा है, जो कहानी- कला की बारीकियों की ज़्यादा परवाह न करके मनुष्यता के पक्ष में जी-जान से खड़ा है। 
    हरियश अपनी कहानियों के लिए कथा-सामग्री का चयन रोज़मर्रा की उस उपेक्षित-तिरस्कृत दुनिया के अनुभवों के बीच से करते हैं, जो अब सामान्यतया अघाए लोगों के लिए सोच-विचार तक की चीज भी नहीं रह गई है। वे लगातार कोशिश करते रहे हैं कि अपने मध्यवर्गीय जीवन की सँकरी-सिकुड़ी चैहद्दियों को छोड़कर उन किसानों की ज़िंदगी के विस्तृत मैदान में जाएँ, जहाँ आज भी सबसे बड़ा सहारा धरती, सूरज, चाँद और वर्षा का है। दुनिया के बदल जाने और एक विश्वग्राम बन जाने के कनफोड़ू शोर में कितना ठहराव है, यह उनकी कहानियाँ पढ़कर जाना जा सकता है। यह ठहराव एक वर्ग और जगह का नहीं है। यह जगह-जगह है। यह तेज़ गति से दौड़ते राजधानी-नगरों के आसपास मौजूद है। इसे वृंदावन जैसे उन तीर्थ-नगरों के भजनाश्रमों में अनुभव किया जा सकता है, जहाँ जिजीविषाओं और शवों में बहुत दूरी नहीं रह गई है। ज़रूरत है इसे देखने, जानने, शिद्दत से महसूस करने और बदलने की कोशिश में लग जाने की। कदाचित् ये कहानियाँ ऐसा कुछ कर जाने की आकांक्षा में जन्मी और बड़ी हुई हैं।    
  • Gareeb Mahilayen Udhar Evam Rozgaar
    Indira Mishra
    250 225

    Item Code: #KGP-37

    Availability: In stock

    भारत में गरीबी की समस्या प्रबल है और गरीबी की मार महिलाओं पर अधिक सीधी और तीखी होती है, क्योंकि महिलाएं परिवार के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार ठहराई जाती हैं। वे मातृत्व का भार वहन करते हुए शरीर से दुर्बल होती हैं, यद्यपि उनमें भावनात्मक इच्छाशक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। गरीबी को दूर करने के लिए केंद्रीय तथा प्रदेश सरकारें, स्वायत्त संस्थाएं तथा अन्य कई प्रकार की एजेंसियां कटिबद्ध हैं, किंतु यह समस्या अभी तक कारगर ढंग से सुलझाई नहीं जा सकी। गरीब तथा ग्रामीण महिलाएं अक्सर अचल संपत्ति-विहीन और शिक्षा के लाभ से वंचित होती हैं। फिर भी उनके अंदर रचनात्मकता तो होती ही है तथा अपनी मदद स्वयं करने के लिए भी वे सतत उत्सुक होती हैं।
    ऐसी महिलाओं की, जो स्वयं की छोटी सी दूकान खोलना या कोई अन्य छोटा-मोटा रोजगार करना चाहती हैं, कर्जे की आवश्यकता बहुत ज्यादा नहीं होती। दूसरी आजमाई हुई बात यह है कि महिला उतना ही ऋण लेना पसंद करती है जितने को किस्तों में लौटा भी सके। किंतु इस सबके बावजूद कोई भी वित्तीय संस्था एकाएक उसे कोई ऋण देने की स्थिति में नहीं होती।
    प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे विषय सामान्य नागरिकों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा बैंककर्मियों आदि के समक्ष स्पष्ट किए गए हैं।
  • Hindi Turkey Dictionary
    Sita Laxmi
    495 446

    Item Code: #KGP-2039

    Availability: In stock


  • Aakhyaan Mahila Vivashata Ka
    Harish Chandra Vyas
    140 126

    Item Code: #KGP-112

    Availability: In stock

    विगत हजारों वर्षों के इतिहास में किसी भी काल में पुरुष ने नारी की आर्थिक अवस्था की ओर कभी भी ध्यान नहीं दिया और इसी अर्थ-विवशता के कारण नारी की दशा समाज में सदैव हीन बनी रही।
    पाषाण काल से लेकर वर्तमान काल तक नारी की सामाजिक यात्रा अत्यंत दुर्गम, सामाजिक बंधनों, बर्बर अत्याचारों, मर्यादाओं और समाजशास्त्रियों द्वारा खोदी गई विशाल गहरी खाई व बिछाए गए कंटीले झाड़-झंखाड़ों में से होकर 21वीं सदी तक पहुंची है। आज उसी नारी-देह का विज्ञापन और व्यवसायीकरण धड़लले से हो रहा है। नाचने, अंग-अंग की भंगिमाएं दिखाने, मुद्राओं से, स्पर्श से, यौवन से उभार से, जरूरी हो तो सहवास से समाज में कई भयंकर विकृतियां दु्रतगति से उभरकर सामने आ रही है।
    प्रस्तुत पुस्तक के सृजन के पीछे प्रमुख उद्देश्य यह रहा है कि इस विषय पर उत्कंठा रखने वाले नागरिक तथा सामान्य जन वस्तुस्थिति का अवलोकन करें और समाज में फैल रही व्यभिचार की विभीषिका से निजात दिलवाने में अभिरुचि एवं अभिवृत्ति का विकास करें।
    —हरिश्चन्द्र व्यास
  • Himanshu Joshi Rachana Sanchayan
    Himanshu Joshi
    995 896

    Item Code: #KGP-589

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya
    Ravindra Kalia
    180 162

    Item Code: #KGP-74

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kashmir : Raat Ke Baad
    Kamleshwar
    250 225

    Item Code: #KGP-843

    Availability: In stock

    कश्मीर : रात के बाद
    हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर का कश्मीर से बहुत गहरा लगाव था । 'कश्मीर : रात के बाद' में लेखक के इस गहरे कश्मीरी लगाव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । एक गल्पकार की नक्काशी, एक पत्रकार की निर्भीकता, एक चेतस इतिहास-द्रष्टा की पैनी नज़र तथा इन सबके मूल में जन सामान्य से प्रतिश्रुत मानवीय सरोकारों से लैस यह यात्रा-वृत्तांत लेखक कमलेश्वर का एक और अप्रतिम योगदान है ।
    'कश्मीर : रात के बाद' संभवत: हिंदी में पहला ऐसा मानक प्रयास भी है जो कैमरा और कलम को एक साथ इस अंदाज़ से प्रस्तुत करता है ताकि दोनों की अस्मिता पूर्णतः मुक्त भी रहे । शायद इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा-रिपोर्ताज में कश्मीर के बर्फीले तूफानों और चट्टानों के खिसकी का शाब्दिक 'रोमांच' मात्र नहीं है बल्कि यहाँ है-इतिहास और धर्म (युद्ध) को अपनी एकल परिभाषा देने के मंसूबों को तर्क  और विवेक के बल पर ध्वस्त कर सको की सहमतिजन्य प्रतिभा । कश्मीर की राजनीति में, बल्कि कहे कि अराजक 'अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिज्' में यह लेखक मात्र पत्रकार का तटस्थ और निष्फल बाना धारण करके प्रवेश नहीं करता बल्कि वह एक ऐसे सच्चे और खरे इंसान के रूप में हस्तक्षेप करता है जो भारतीयता को जानता है और कश्मीरियत को पहचानता है । वह प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य-पाशा में बँधा, प्रकृति के अप्रत्याशित रौद्र रूप को, जान की बाजी लगाकर देखता है, तो वह आतंकवादियों के विष-की ठिकानों को भी अपने कलम और कैमरे के माध्यम से उदघाटित करता है । वास्तव में यही साहस इस यात्रा-वृतांत को अविस्मरणीयता सौंपता है ।
    इस पुस्तक में कश्मीर की कुछ खंडित यात्राएँ भी हैं जिनमें जन सामान्य के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को शब्द-दर-शब्द पढ़ा और महसूस किया जा सकता है । परवर्ती यात्रा के रूप में कमलेश्वर ने सुलगते कश्मीर की उस झुलसन को शब्द दिए है, जिसे तमाम तकनीकी विकास के बाबजूद कैमरा पकड नहीं पाता । यह किताब मुद्रित शब्द और कैमरे के आधुनिक युग की सामर्थ्य  और सीमा का भी संभवत: अनुपम दस्तावेज साबित होगी ।
  • Bistar Aur Aakaash
    Ramakant
    50 45

    Item Code: #KGP-2094

    Availability: In stock

    बिस्तर और आकाश
    रमाकांत को निम्नमध्यवर्ग के जीवन का चितेरा कहा जाता रहा है । उनकी रचनाओं में शहरी निम्नमध्यवर्ग को जितना स्थान मिला, उतना और किसी के साहित्य में दुर्लभ है ।
    समस्या नई बस्तियों में बसने आये कमजोर आय वर्ग के लोगों की हो या कस्बों से नौकरी के सिलसिले में आये लोगों की-रमाकांत ने अपनी रचनाओं में उनकी आर्थिक, मानसिक, सामाजिक स्थितियों-परिस्थितियों का बारीकी से चित्रण किया है ।
    आकस्मिक मृत्यु से पूर्व के कई वर्ष रमाकांत ने स्वतंत्र लेखन में गुजारे, और इस दौर में साम्यवाद के पतन और असफलता के कारणों की पड़ताल कर एक बृहद उपन्यास लिखा ।
    संभवत: उस बडे प्रयोजन में जुट जाने के चलते इन तीन लघु उपन्यासों को पुस्तक रूप में प्रकाशित नहीं किया जा सका । बहरहाल, बिस्तर और आकाश, मैं, अकेले में, और एक विपरीत कथा शीर्षक ये आकार से छोटे लेकिन कथा में बडे तीन उपन्यास पाठको को अपने जाने-माने रचनाकार की मकम्मल मौजूदगी का अहसास करवाएँगे ।
  • Prakaaraantar
    Madhur Shastri
    125 113

    Item Code: #KGP-1862

    Availability: In stock

    प्रकारान्तर
    वर्तमान जीवन-परिवेश की दुर्दान्त अमानवीयता के सामने पड़ने पर अस्वीकार का स्वर ही स्वाभाविक परिणति होती है एक सर्जक कवि की । मधुर शास्त्री का कवि भी मुक्त- छंद की इन कविताओं में अपना कटु अस्वीकार दर्ज करता है : 'चलो, लौट चलें पुराने दिनों की ओर/शाम झुकने लगी है/रात जाने वाली है/मुँह में भरकर झाग/लाल जीभ में है काला जहर इसके साथ है खूँख्वार अँधेरा' -प्रतीकात्मक व्यंजना में युग की विभीषिका व्यक्त है ।
    गीत के ऊँचे सृज़न-तल से बाध्यकारी जिन सीमाओं- स्थितियोंवश मधुर शास्स्त्री का गीतकार मुक्तछंद के तल पर उतरा है, वे निश्चय ही युग-यथार्थ  को रेखांकित कर रही हैं तथा जिन्होंने कवि को झेंझोड़ दिया है। अन्याय, हिंसा, हत्या के अपूर्व भयावह वर्तमान को भावोपचार  से अधिक संवेदनात्मक विचारोपचार एवं व्यंग्य-प्रहार की दरकार है ।
    समाज-जीवन की विचार-विश्लेषणमयी पहचान के बावजूद मधुर जी का गीतकार कवि अपनी मूल प्रकृति को पूरी तरह छोड़ नहीं देता । यह अच्छा हैं, क्योंकि सृजन की मौलिक चिंतन-दृष्टि ही प्रामाणिकता को सिद्ध करती है। बाहरी बाध्यताओं में घिरकर भी मधुर शास्त्री दृष्टि, भाषा, लय, तुक आदि को शिथिल नहीं होने देते तथा निराला की मुक्तछंद परंपरा में काव्य-सृजन की हरीतिमा, सरसता, संवेदना, लोकाभिमुखता, संप्रेषणीयता, सहजता की भूमि को विकसित करने में संलग्न रहते हैं । यहीं यह कह देना अप्रासंगिक न होगा कि निराला ने छंद तोड़ा नहीं था, एक नया छंद-मुक्तछंद, जोड़ा था।
  • Pratap Narayan Mishra Rachanavali (4 Volumes)
    Chandrika Prasad Sharma
    1050 945

    Item Code: #KGP-9057

    Availability: In stock


  • Sine Sitaron Ke Anchhuye Prasang
    Sheela Jhunjhunwala
    200 180

    Item Code: #KGP-69

    Availability: In stock


  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan
    Sudha Arora
    400 360

    Item Code: #KGP-909

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है।
  • Shiksha : Maanaviya Samvednayen Evam Sarokar
    Jagmohan Singh Rajput
    380 342

    Item Code: #KGP-729

    Availability: In stock

    ‘शिक्षा: मानवीय संवेदनाएँ एवं सरोकार’ में वर्ष 2011 के बाद विभिन्न आयामों पर लिखे गए लेख शामिल किए गए हैं। अधिकांश शिक्षा के विभिन्न पक्षों पर वर्तमान स्थिति तथा उसमें परिवर्तन की आवश्यकता तथा संभावित समाधानों की चर्चा करते हैं। इस संग्रह में ऐसे लेख भी रखे गए हैं जो सीधे-सीधे शिक्षा व्यवस्था से जुड़ते नहीं लगते थे। उन्हें रखा इसलिए गया था कि शिक्षा व्यवस्था को केवल विभागीय या मंत्रलय स्तर पर ही नहीं देखा जाना चाहिए। समाज के हर पक्ष तथा परिवर्तन का शिक्षा व्यवस्था से जीवंत जुड़ाव है। इसमें आर्थिक, सांस्कृतिक तथा नैतिकता के परिवर्तन भी प्रमुखता से आते हैं। राष्ट्रीयता तथा वैश्विकता के हर आयाम से शिक्षा स्पष्ट रूप से जुड़ती है। विकास और प्रगति की गति शिक्षा की गतिशीलता तथा परिपूर्णता पर ही निर्भर करती है। भारत की कृषि व्यवस्था में आई शिथिलता से लेकर सिलिकान वैली में युवा भारतीयों द्वारा नाम कमाया जाना शिक्षा की गुणवत्ता की श्रेष्ठता या कमजोरी से ही जुड़ते हैं। हिंसा, अविश्वास, शोषण, आतंकवाद, पंथिक उन्माद जैसी विभीषिकाओं ने विश्व में असुरक्षा की स्थिति पैदा की है। इसका समाधान भी शिक्षा की सुदृढ़ता, गुणवत्ता तथा नैतिकता को आत्मसात् कराने की क्षमता पर ही निर्भर करेगा।
    इसी पृष्ठभूमि में इस पुस्तक में लेखों को शामिल किया गया है। इसमें समस्याएँ वर्णित हैं, व्यक्तियों के योगदान भी निहित हैं, भाषा की बातें हैं, अध्यापकों पर विवेचन हैं, माता-पिता, संस्कारों, मूल्य शिक्षा, शिक्षा के मूल अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन की चर्चा है और प्रयास यह रहा है कि सभी महत्त्वपूर्ण पक्ष पाठक के सामने उभरकर आ जाएँ। वे अपेक्षाएँ भी उभरी हैं जो सामान्यजन की अवधारणा में शिक्षा को प्रभावित करती हैं। 
  • Hamare Jeevan Moolya-2
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1157

    Availability: In stock


  • Bhartiya Thal Sena : Badhate Kadam
    A. K. Gandhi
    380 342

    Item Code: #KGP-9308

    Availability: In stock

    अनुशासन, देशप्रेम, स्वाभिमान, सेवा, उत्सर्ग और शौर्य का प्रतीक भारतीय सेना पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। धरती, आकाश और जल मार्गों पर किसी तपस्वी की भाँति एकाग्र भारतीय सेना की गौरवगाथा जितनी लिखी जाए उतनी कम है।
    प्रस्तुत पुस्तक भारतीय थल सेना: बढ़ते कदम में ए. के. गाँधी ने इस अनूठे व अप्रतिम सैन्य संगठन के विविध पक्षों पर प्रामाणिक व रोचक ढंग से लिखा है। गाँधी स्वयं भारतीय वायु सेना में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं, इसलिए उनके विवरण में तथ्यात्मकता और सूक्ष्मता है।
    लेखक ने भारतीय थल सेना के महत्त्व को कई कोणों से विवेचित किया है। भारतीय थल सेना के गौरवपूर्ण इतिहास और उसकी उपलब्धियों  को पढ़ते हुए किसी भी भारतीय का मन गर्व से भर जाएगा। सरहद पर देश की रक्षा करने के साथ आवश्यकता होने पर देश के भीतर किसी भी प्रकार की सेवा या सहायता के लिए सेना तत्पर रहती है। राष्ट्रीय पर्वों और विभिन्न खेलों में इसका हुनर और हौसला रोमांचित कर देता है। असंभव को संभव बनाने की कला भारतीय सेना को आती है।
    प्रस्तुत पुस्तक के अध्ययन से पाठक भारतीय थल सेना के प्रति अधिक आत्मीयता का अनुभव करेगा। भारत के सबसे बड़े रोजगार प्रदाताओं में से एक होने के कारण इसमें आजीविका के अवसर भी तलाशे जाते हैं। इस प्रयोजन से भी यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि पुस्तक एक गौरवशाली संगठन में चयन की विधियों पर भी सम्यव्फ प्रकाश डालती है। 
  • Aalochna Ka Rahasyavaad
    Parmanand Shrivastva
    280 252

    Item Code: #KGP-709

    Availability: In stock

    ‘आलोचना का रहस्यवाद’ जाने-माने कवि आलोचक परमानंद श्रीवास्तव के इध्र के चुने हुए अट्ठाईस निबंधें का संग्रह है, जिनमें समय, साहित्य, रूप-वस्तु के तीखे सवाल उठाए गए हैं। अट्ठाइसवाँ निबंध रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‘लाल पान की बेगम’ का घनिष्ठ पाठ है। परमानंद श्रीवास्तव के लिए नए लेखक प्रेमचंद के बाद रेणु और अमरकांत से प्रेरणा लेते हैं। वे रूप और वस्तु में एक द्वंद्वात्मक रिश्ता मानते हैं।
    परमानंद श्रीवास्तव का प्रिय शब्द है--अँधेरा समय। एक कृति का नाम ही है ‘अँधेरे समय में शब्द’। नया लेखक इसी अँधेरे समय में रास्ता खोजता है। आज लिखने का अर्थ है--तीखे सवालों से मुठभेड़। आलोचना का भी अपना लोकतंत्रा है। मार्क्सवाद है तो उत्तरमार्क्सवाद भी है, प्रतिमार्क्सवाद भी है। ‘कफन’ का पाठ हर बार नए अर्थ देता है। कोई प्रतिमान (कैनन) काफी नहीं है। प्रतिमान धूल में शब्द की तरह है।
    आज अकादमिक आलोचना गूढ़ रहस्यात्मक है। रचना की गुत्थी तो सुलझ भी जाती है, आलोचना पल्ले नहीं पड़ती। प्रतिमान तो मुक्तिबोध् के यहाँ हैं, जैसे-- ज्ञानात्मक संवेदना, संवेदनात्मक ज्ञान। पर हर रचना, अपना प्रतिमान अपने साथ लाती है। बड़े आलोचक सवाल पूछते हैं, जैसे--कविता कौन पढ़ता है (आक्तोवियो पॉज़) या एक पृष्ठ को कैसे पढ़ें (आई.ए. रिचर्ड्स) उम्मीद है यह कृति भी आपको बेचैन व्यग्र छोड़ जाएगी।
  • Sahityasevi Rajneta : Shanta Kumar
    Hemraj Kaushik
    490 441

    Item Code: #KGP-9370

    Availability: In stock

    शान्ता कुमार ने राजनीति और साहित्य के क्षेत्र में तपश्चर्या और साधना का जीवन जिया है। एक संवेदनशील साहित्यसर्जक और गंभीर, निर्भीक, सत्यनिष्ठ, मानवतावादी, निष्कलुष, निष्कलंक राजनेता के रूप में उनके व्यक्तित्व की छवि अन्यतम है। उनकी सृजनात्मक और चिंतनपरक कृतियों, उनकी जेल डायरी तथा संस्मरणात्मक कृतियों का अनुशीलन करते हुए तथा राजनीतिक जीवन के समूचे सफर को देखते हुए बराबर यह अहसास होता रहा है कि ‘आसान नहीं है शान्ता कुमार होना।’ वे उन गिने-चुने ख्यातिलब्ध राजनीतिज्ञों में से हैं जिन्होंने राजनीति और साहित्य कर्म का एक साथ निर्वहन किया है।
    प्रस्तुत पुस्तक ‘साहित्यसेवी राजनेता: शान्ता कुमार’ शान्ता कुमार के सृजन और चिंतन पर केंद्रित है। उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता, संस्मरण, डायरी, जीवनी, क्रांतिकारी वीरों की शौर्यगाथाओं का इतिहास आदि अनेक विधाओं में सृजन किया है। उनका अनुभव लोक विविधमुखी रहा है। उनका उपन्यासकार जितना जीवंत और प्रभावी है, उतना ही उनका संस्मरण लेखक और निबंधकार भी। स्वामी विवेकानंद की प्रेरणादायी जीवनी हिंदी और अंग्रेजी में लिखकर उन्होंने यह प्रमाणित किया है कि वे गंभीर अध्येता और कुशल जीवनीकार हैं। इस पुस्तक में उनके सृजन और चिंतन को उनकी समग्र कृतियों के आलोक में विश्लेषित किया गया है। उनके समग्र कृतित्व में एक साहित्य सर्जक का दायित्वबोध है और एक राजनीतिक नेता के रूप में आचरण और व्यवहार में नैतिक मूल्यों की स्थापना का आग्रह है। राष्ट्र-प्रेम, भारतीय संस्कृति की गौरव गरिमा को अन्वेषित और आत्मसात् करने की अटूट आस्था उनके चिंतन में परिलक्षित है।
    प्रस्तुत पुस्तक में शान्ता कुमार के समग्र कृतित्व को समेटने का प्रयास किया गया है। विश्वास है एक श्रेष्ठ राजनेता और सहृदय साहित्यकार को समझने में यह पुस्तक सहायक सिद्ध होगी।
  • Jalatarangon Ki Atmakatha
    Anupam
    50 45

    Item Code: #KGP-9037

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Kedar Nath Singh
    Kedarnath Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-2027

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के साक्षात्कारों की यह किताब कविता के ज़रिए समकालीन जीवन में झाँकने की एक कोशिश है । इनसे गुज़रना अपने समय की बदलती हुई सौंदर्य-चेतना के खुले-अधखुले गलियारों से गुज़रना है । विगत पच्चीस वर्षों के लंबे अंतराल में लिए गए ये इंटरव्यू कवि की विकास-यात्रा को समझने की कुंजी भी देते हैं और उन मोड़ों-घुमावों की प्रामाणिक जानकारी भी, जिनसे होकर उसकी सृजन-यात्रा अविराम चलती रही है । यह एक रचनाकार की विश्व-दुष्टि के बनने और आकार ग्रहण करने की लंबी प्रक्रिया का दस्तावेज़ है-एक ऐसा कच्चा माल, जिसमें समकालीन कविता के इतिहास के रंग-रेशे तलाशे जा सकते हैं ।
    कवि केदारनाथ सिंह की कविताएँ समय के साथ संवाद करती हुई कविताएं हैं। यही वजह है कि उनकी कविताओं में एक तरह की प्रश्नाकुलता दिखाई देती है। ऐसी प्रश्नाकुलता, जो कहीं गहरे पैठकर पाठक को बेचैन करती है। यह देखना भी एक दिलचस्प अनुभव होगा कि अपनी कविताओं में निरंतर प्रश्न उपस्थित करने वाला कवि स्वयं प्रश्नों का सामना कैसे करता है ।
    समकालीन सर्जन-परिवेश में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों के लिए एक संग्रहणीय दस्तावेज़ है यह किताब ।
  • Jaiv Praudyogiki Ke Vividh Aayaam
    Shuk Deo Prasad
    120 108

    Item Code: #KGP-9143

    Availability: In stock

    1953 में जब वाटसन, क्रिक और विलकिंस ने डी.एन.ए. अणु की दुहरी कुंडली वाला अपना सुप्रसिद्ध माॅडल डबल हेलिक्स प्रस्तुत किया तो विज्ञों ने कहा था ‘मानव ने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है’ और अब जबकि मानव या किसी भी प्रजाति के गुणों के संवाहक डी.एन.ए. अणु की अंतर्निहित संरचना ‘जीन’ के अंतस्थल का मनुष्य ने चित्रण कर लिया है और मानव कोशिकाओं में पाई जाने वाली अनुमानतः समस्त जीनों का नक्शा तैयार कर लिया है तो सहज ही ईश्वर की भूमिका के समक्ष चुनौती देने वाले प्रथम सोपान की निर्मिति आधुनिक विश्वामित्रों ने कर ली है। निस्संदेह अनेकानेक नैतिक-अनैतिक यक्ष प्रश्नों के अंबार भी उठ खड़े होंगे लेकिन यह निर्विवाद है कि यदि मानवीय विवेक का समुचित संप्रयोग किया गया तो इस नीजी नक्शे की बदौलत समग्र मानव जाति के सुखद और कल्याणकारी भविष्य हेतु एक नया गवाक्ष खुल जाएगा जो समस्त वसुधा को सुख-शांति, आमोद-प्रामदे-रंजन और रोमांच से लबरेज कर देगा।
  • Bahadur Bachche : Romanchak Ghatnayen
    Sanjiv Gupta
    90 81

    Item Code: #KGP-9292

    Availability: In stock

    पत्रकारिता के पेशे में रहते हुए बहुत बार ऐसे विषयों पर भी काम करने का अवसर मिलता है, जो व्यक्तिगत स्तर पर भी मन को छू जाते हैं। हर साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ से सम्मानित होने वाले बच्चों का विषय भी कुछ ऐसा ही था। जब इस विषय पर मैंने कई साल काम किया, बहादुर बच्चों से मिलने और उनसे बात करने का मौका मिला तो उनका सरल व्यक्तित्व, उनके बहादुरी भरे प्रेरक कारनामे मन को गहरे तक छू गए। मन में आया कि अगर हर बच्चा ऐसा ही सरल, सच्चा और बहादुर हो तो शायद हमें आने वाले कल की चिंता ही नहीं रह जाएगी।
    —संजीव गुप्ता
  • Pracheen Bharat Ki Kathayen
    Mangal Dev Upadhyaya
    60 54

    Item Code: #KGP-9108

    Availability: In stock

    ऋषि ने अश्विनी कुमार की ओर देखते हुए कहा, ‘‘कहिये, आपको क्या चाहिए?’’
    अश्विनीकुमार ने निवेदन किया, ‘‘मधु-विद्या का रहस्य।’’
    ऋषि विस्मय-चकित हो उठे। उनके मुख से विस्मय भरे स्वर में अपने आप निकल पड़ा ‘‘मधु-विद्या का रहस्य!’’
    अश्विनीकुमार ने कहा, ‘‘हां ऋषिश्रेष्ठ, मधु-विद्या का रहस्य। मधु-विद्या के रहस्य से ही हमारा दैन्य दूर हो सकता है, हमारी व्यथाग्नि शान्त हो सकती है।’’
    ऋषि विचारों में डूब गए। उन्होंने सोचते हुए कहा, ‘‘पर मैं मधु-विद्या का रहस्य किसी अन्य पर प्रकट नहीं कर सकता। यदि मै। प्रकट करूंगा तो...।’’
    अश्विनी कुमार बीच में ही बोल उठे, ‘जानते हैं ऋषिश्रेष्इ! यदि आप प्रकट करेंगे, तो देवराज के द्वारा आपको शिरोच्छेद कर दिया जाएगा।’’
    ऋषि ने सोचते हुए कहा, ‘‘हां, यही बात है इस बात को जानते हुए भी आप मुझससे मधु-विद्या का रहस्य प्रकट करने के लिए कह रहे हैं?’’
    -इसी पुस्तक से
  • Kartaar Ki Taksaal
    H. Tipperudraswamy
    1100 990

    Item Code: #KGP-828

    Availability: In stock

    धर्म, राजकीय, सामाजिक आंदोलन तथा संघटन की दृष्टि से कर्नाटक प्रदेश के इतिहास में बारहवीं शताब्दी एक महत्त्वपूर्ण काल-खंड है। इन सारे अंशों ने एक-दूसरे से घुलमिलकर तत्कालीन आंदोलन को एक संकीर्ण रूप प्रदान किया है। वे जैसे व्यक्ति-कंेद्रित चिंतन थे, वैसे समुदाय-केंद्रित चिंतन भी थे। यही कारण है कि उसे समष्टि का समवेत स्वर भी कह सकते हैं। ऐसे एक समुदाय के समर्थ प्रतिनिधि के रूप में बसवण्णा जी दिखाई देते हैं। वैसे देखा जाए तो बसवण्णा पर लिखी गई सारी कृतियां तत्कालीन अन्य शरणों पर लिखी गई कृतियां ही बन जाती हैं।
    ऐसे एक अपूर्व उपन्यास का श्रीमती शशिकला सुब्बण्णा जी ने बहुत ही सशक्त रूप में हिंदी में अनुवाद किया है। इनके इस प्रयास पर हमें आश्चर्य है। एक सर्जनात्मक कृति का उसकी सारी भावसंपदा को समेटते हुए भाषा की हर ध्वनि के साथ अन्य भाषा में अनुवाद करना एक साहस का काम है।

  • Sampurna Kahaniyan Himanshu Joshi (3 Vol.)
    Himanshu Joshi
    2100 1890

    Item Code: #KGP-9345

    Availability: In stock

    संपूर्ण कहानियां: हिमांशु जोशी
    अपनी पीढ़ी के प्रतिनिधि रचनाकार हिमांशु जोशी की कहानियों  का वैविध्य देखते ही बनता है। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल से आने वाले हिमांशु जी की कहानियां एक ओर अपनी जमीन से जुड़ने की ललक लिए हैं, तो दूसरी ओर विश्व के मनुष्य के दुःख-सुख और संवेदनात्मक पड़ताल की जरूरत के महत्त्व को रेखांकित करती हैं। छह दशक से भी अधिक के अपने कहानी लेखन में इस महत्त्वपूर्ण रचनाकार ने 167 कहानियां लिखीं। साहित्य प्रेमियों, शोधर्थियों और कहानी के अध्येताओं की सुविधा  के लिए इन कहानियों को क्रमशः तीन खंडों में प्रस्तुत किया गया है। इन्हें एक साथ पढ़ते हुए हिमांशु जोशी के कहानीकार के क्रमिक विकास की पहचान भी की जा सकती है।
    इसके पहले भाग में वर्ष 1956 से 1962 तक की कहानियां, दूसरे भाग में वर्ष 1963 से 1976 तक की कहानियां और तीसरे भाग में वर्ष 1980 से 2009 तक की कहानियां शामिल की गई हैं। उनकी इस कथा-यात्रा में अनेक कहानियां ऐसी हैं जिन्हें हिंदी कहानी के इतिहास में मील का पत्थर कहा जा सकता है। कहना अवश्य होगा कि इसीलिए आधुनिक  हिंदी कहानी के इतिहास में उनकी एक अनिवार्य उपस्थिति है। इस दृष्टि से यह एक संग्रहणीय ग्रंथ है जिसके अध्ययन से एक ईमानदार रचना-यात्रा की नई पड़ताल की जा सकती है। 
  • Tabdeel Nigahein
    Maitreyi Pushpa
    240 216

    Item Code: #KGP-396

    Availability: In stock

    तबदील निगाहें
    किसी भी व्यक्ति, विषय या कृति के संबंध में जो सिद्धांत, मान्यताएं और अवधारणाएं, वर्षों या सदियों पहले सही मान ली गई थीं, जरूरी नहीं कि हर युग में उनको उसी रूप में स्वीकार किया जाए। समय और परिस्थितियों से उपजे सवाल, उसे अपने मानकों पर कसते हैं। हालांकि सच यह भी है कि साहित्य और समाज में वर्षों से चली आ रही मान्यताओं और प्रतिमानों को खंडित करने का साहस यदा-कदा ही किया जाता है, क्योंकि बहुजन के दबाव और विरोध को सहकर अपनी बात कहने से प्रायः बुद्धिजीवी लोग बचने में ही अपनी भलाई समझते हैं। बावजूद इसके कुछ रचनाकार अपवाद रहे हैं।
    सच को पूरे साहस से कहने वाली रचनाकारों में सम्मिलित मैत्रेयी पुष्पा ने इस पुस्तक के संकलित लेखों में कुछ ऐसा ही प्रयास किया है। ‘उसने कहा था’, ‘गोदान’, ‘चित्रालेखा’, ‘धु्रवस्वामिनी’, ‘त्यागपत्र’, ‘मैला आंचल’ और ‘राग दरबारी’ जैसी अपने समय की कालजयी रचनाओं को बिलकुल अलग निगाह से देखतीं और उसके स्त्री-पात्रों के मन में सोए पड़े सवालों को उघाड़कर उन्होंने एक नई बहस को आधार प्रदान किया है। इन कृतियों के संदर्भ में लेखिका द्वारा उठाए गए सवाल, न केवल पढ़ने वाले को बेचैन कर सकते हैं बल्कि इन्हें नए तरह से तबदील निगाहों के जरिए पुनर्मूल्यांकित करने की मांग भी करते हैं। 
    कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके और कुछ अवसरों पर दिए गए इन वक्तव्यों में मैत्रेयी पुष्पा के भीतर की आलोचकीय दृष्टि भी सघन रूप से प्रकट हुई है। बनी-बनाई धारणाओं और अपनी कूपमंडूकता में आनंदित रहने वाले आलोचकों के लिए यह पुस्तक एक सबक की तरह हो सकती है।
    –विज्ञान भूषण
  • Babu Harishchandra
    Jaivardhan
    200 180

    Item Code: #KGP-9368

    Availability: In stock

    हरिश्चन्द्र का जन्म काशी के एक संपन्न अग्रवाल परिवार में हुआ। इनके पिता बाबू गोपालचन्द्र एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे, जो गिरधरदास उपनाम से लेखन कार्य करते थे। गिरधरदास नाम से लिखित ‘नहुष’ नाटक को हिंदी का प्रथम नाटक कहा जाता है। नहुष नाटक को ही पढ़कर हरिश्चन्द्र में नाटककार बनने की इच्छा जागृत हुई और हरिश्चन्द्र हिंदी रंगमंच के संस्थापक के रूप में स्थापित हो गए।

  • Khabrein Aur Anya Kavitayen
    Ganga Prasad Vimal
    175 158

    Item Code: #KGP-546

    Availability: In stock

    "खबरें और अन्य कविताएँ' एक ऐसे प्रयोगधर्मी कवि का नया प्रधान है, जो हमारे सामने पाँच दृष्टियों से एक विषय को विस्तार देकर जनोन्मुखी विषादों की गहरी सच्चाइयों से परिचय कराता है । पाँच दृष्टियाँ ही क्यों? एक सहज सवाल उभरता है । हमारे पंचेंद्रिय ज्ञान की परिसीमाओं में उनका अलग-अलग रूप क्या हो--इसे जानना भी रोचक हो सकता है, परंतु इसका परिदर्शन हम कविताओं के स्वायत्तम संसार में जाकर ही कर पाएंगे । यह बोध का परिदर्शन है, परंतु आज के समय में पाँच के कई अर्थ हैं--हम किस-किस सोपान से क्या-क्या या सकते हैं यह बहुत हम पर निर्भर करता है और यहीं से बहस शुरू हो जाती है कि कवि के पास से कविता या सृजेता के पास से सृजन उसी क्षण दूसरों की सम्मति हो जाती है जिस क्षण वह स्वांत: सुखाय की निजता से मुक्त होता है ।
  • Mera Mobile Tatha Anya Kahaniyan
    Ansuya Tyagi
    225 203

    Item Code: #KGP-601

    Availability: In stock

    दक्षिण अफ्रीका में रेल यात्रा के समय गांधी जी रस्किन का उपन्यास ‘अनटू द लास्ट’ पढ़ रहे थे। अंगूर के बाग में काम करने वाले मजदूरों के एक छोटे से कथा प्रसंग की चर्चा ‘सर्मन ऑफ़ द माउंट’ के आधार पर रस्किन ने अपने उपन्यास में की है। इस प्रसंग ने बापू को द्रवित किया। किस्सा यह है कि अंगूर के बाग में कुछ मजदूर काम के लिए बुलाए गए थे, कुछ मजदूरों को सुबह ही काम पर रख लिया गया व कुछ को तीन घंटे बाद बुलाया गया। लेकिन शाम को जब बाग के मालिक ने मजदूरी बांटी तो सबको एक बराबर पैसे दिए। पहले काम पर लगे मजदूरों को यह बात खटकी तब मालिक ने समझाया कि भले ही ये मजदूर देर से काम पर लगे, किंतु मजदूरी की आशा में ये सुबह से ही खड़े थे, मैंने इन्हें देर से काम पर लगाया, पर आखिर इनका हक तो बराबर का है।
    पारुल को यह प्रसंग याद आ गया और उसने सोचा, जब चंद्रकला मेरे यहां काम करती है तब इसके दुःख में मुझे भी भागीदार बनना चाहिए। यदि मैं अपने एक महीने की ट्यूशन की आधी कमाई इसे देकर इसके नुकसान की भरपाई कर देती हूं तब यह कितनी प्रसन्न हो जाएगी। मुझे तो अधिक अंतर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिम्मेदारियां तो सब समाप्त हो गई हैं, वैसे भी आशीष और उसे कितना चाहिए, उनका तो अब थोड़े में ही गुजारा चल जाता है। 
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘थोड़ी सी खुशी’ से)
  • Baarish Ke Baad
    Radhey Shyam Tiwari
    125 113

    Item Code: #KGP-1990

    Availability: In stock

    बारिश के बाद
    राधेश्याम तिवारी हिंदी के एक ऐसे कवि हैं, जो अपने आसपास के साधारण-सामान्य और लगभग घटनाविहीन जीवन से मार्मिकता को बड़े अचूक ढंग से पकडने की क्षमता रखते हैं। उनकी कविताओं में कल्पना की ऊँचाइयाँ हैं, लेकिन जैसा कि वे अपनी एक कविता 'बीज-मंत्र' में कहते हैं कि बीज का बाहर निकलकर भी धरती से जुडाव कम नहीं होता, उसी तरह उनकी कविता  का लगाव भी किसी भी हालत में इस धरती से, यहाँ के इंसान से, यहाँ के मौसमों से, अभावों और स्मृतियों से कम नहीं होता, बल्कि और सघन होता जाता है । उनकी हर कविता जीवन के बीच सहज ही मिलने वाला एक मार्मिक प्रसंग बन जाती है । यह मार्मिकता शब्द-क्रीड़ा से हासिल नहीं की गई है बल्कि जीवन की परिस्थितियों से प्राप्त की गई है। शहर तथा गाँव के बीच हिलगी हुई राधेश्याम तिवारी की कविता कई जगह गीतात्मक हो जाती है बल्कि कहीं-कहीं वे अपनी बात कहने के लिए गीत का सहारा भी लेते है, मगर दिलचस्प बात यह है कि यह कवि जीवन के प्रति हमेशा बहुत सकारात्मक है, कटु और कठोर नहीं । उसका लहजा शिकायत-भरा नहीं, ललक-भरा है । उनकी कविताओं से जीवन के दबावों-तनावों को दरगुजर नहीं किया गया है, अभावों की चर्चा से परहेज नहीं किया गया है, मगर विवशता की बजाय एक दार्शनिक ऊँचाई दी गई है । उनकी एक कविता है 'न्यूटन', जिसमें वह कहते हैं कि "न्यूटन ने यह तो सोच लिया कि सेब पेड़ से नीचे क्यों गिरता है, लेकिन यह नहीं सोचा कि नीचे गिरकर भी वह नीचे के लोगों को क्यों नहीं मिलता?" इतना ही नहीं, वे आगे कहते हैं कि "यह तो ठीक है कि गुरुत्वाकर्षण सबको अपनी ओर खींचता है, मगर जमीन में दबा हुआ बीज कैसे ऊपर उठ जाता है, न्यूटन ने यह नहीं सोचा ।" यहीं अभावों की चर्चा है, लेकिन यहाँ बेचैनी का स्वर और स्तर भिन्न है तथा इसी के साथ यह सकारात्मक स्वर भी है ।
    इस संग्रह में अनेक ऐसी कविताएँ हैं जैसे 'बाकी सब माया हैं, 'पुराना पता', 'सर्कस में बाघ', ‘संबंध', 'घर', 'किराए का मकान' आदि जो हमारे इस दैनिक संसार की कविताएँ हैं मगर उससे बाहर ले जाकर विचलित करने वाली कविताएँ भी हैं। ये कविताएँ सहज हैं, क्योकि मर्मभेदी हैं । वे सहज हैं, क्योंकि मनुष्य के साथ ये प्रकृति से भी सघन रूप से जुड़ती हैं। ये सहज हैं, क्योंकि इनमें हमारा सहजात मनुष्य है, उसकी मानवीयता है, उसका राग और विराग है ।
  • Satya Ke Prayog
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    350 315

    Item Code: #KGP-9055

    Availability: In stock


  • Krishan Upasika Meera
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-184

    Availability: In stock

    मीरा शाश्वत हैं
    भारतीय नारी समाज की गौरव दीप है । गिरधर गोपाल के  प्रेम में आकंठ डूबी मीरा लोक-लाज और परिजन समूह की चिंता न करते हुए मंदिरों में पद-कीर्तन गाती हुई घुँघरू बांधकर नाचती थी। वे नटनागर कृष्ण मुरारी के गीत गाती हुई वृंदावन से द्वारिका तक अपने कन्हैया को रिझाती रहती थीं ।
    विश्व-साहित्य में मीरा जैसी अन्य कोई नारी नहीं  जो लोक-लाज त्यागकर छैल-छबीले बाँके सांवरिया के रंग में रँगी थी । मीरा नारी के अतिरिक्त मात्र भाव बनकर घूमती थीं । उनकी साधना गौरवमयी थी । वे अपन कन्हैया की दीवानी थीं,  उन्हें वृंदावन की कूंज गलियों में खोजती फिरती थीं ।
    परिवार में पति के निधन के बाद  नाना प्रकार के कष्ट दिए गए ।  उन्हें पीने के  लिए विष-प्याला भेजा गया, जो अमृत बन गया ।  पिटारे में जहरीला नाग भेजा गया, जो तुलसी की मोहक माला बन गया। सोने  लिए शूली की सेज भेजी गई, जो पुष्पों की शैया बन गई ।
    सैकडों पद रचकर मीरा अंततोगत्या अपने गिरधर के चरणों में बैठकर उन्हीं में समाहित दो गई ।
    मीरा आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगी । जव तक नटनागर गिरधारी रहेंगे तब तक मीरा भी रहेंगी । और नटनागर तो शाश्वत है तो फिर मीरा भी शाश्वत हैं  ।
  • Mere Saakshatkaar : Bhawani Prasad Mishra
    Bhawani Prasad Mishra
    280 252

    Item Code: #KGP-413

    Availability: In stock


  • Phalon Ki Baagbaani
    Darshna Nand
    595 536

    Item Code: #KGP-822

    Availability: In stock

    फलों की बागबानी
    फल हमारे दैनिक आहार के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं। यह स्वास्थ्यवर्द्धक होते है और आवश्यक विटामिन, खनिज लवण और अनेक पोषक तत्वों से भरपूर रहते है । बिना फल-सब्जियों के भोजन अपूर्ण रह जाता है । वर्तमान में जबकि अपना देश कुपोषण और प्रदूषण का शिकार बना हुआ है, फलों का महत्त्व और भी अधिक बढ जाता है। बेल, जामुन, आँवला, पपीता, नीबू, अमरूद, अंजीर, हरड़, बहेडा व अन्य कुल फलों को तो यदि सीधे औषधि ही कह दिया जाए तो अनुचित न होगा ।
    वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की दशा में फलों के अंतर्गत क्षेत्रफल व फल उत्पादन बढाना नितांत आवश्यक है । आम, कटहल, केला आदि फल व आलू तथा अन्य कंद वाली सब्जियां तो भोजन के रूप में ही खाए जा सकते है । फिर भी क्षेत्रफल और उत्पादन से वृद्धि लाना केवल उसी दशा में संभव है, जबकि उद्यान-स्वामी को आम, आंवला, पपीता जैसे फलों में अफलन के कारण व समाधान का ज्ञान हो तथा फल-वृक्षों में वष्टि-व्याधियों, खाद-पानी, काट-छांट  आदि जैसी आवश्यक कर्षण क्रियाओं की वैज्ञानिक जानकारी हो ।
    इस पुस्तक की रचना लेखक द्वारा किए गए शोध-विकास कार्यों, अपने पूर्व ज्ञान, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से अध्ययनोपरांत व अन्य स्रोतों से साभार प्राप्त सामग्रियों, क्रियात्मक अनुभवों, समय-समय पर औद्यानिक राष्ट्रीय  अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठियों-संगोष्टियों में भाग लेकर प्राप्त ज्ञान के आधार पर की गई है ।
    प्रस्तुत पुस्तक विभिन्न विभागों के विभिन्न स्तर के अधिकारियो, कर्मचारियों तथा शिक्षण व शोध संस्थानों के पुस्तकालयों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। इसके साथ ही विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों हेतु धरोहर साबित होगी ।
  • Dr. Siddharth
    Kavita Surabhi
    260 234

    Item Code: #KGP-1950

    Availability: In stock

    डॉ० सिद्धार्थ
    'डॉ० सिद्धार्थ' लेखिका का पहला उपन्यास है। उनकी दृढ मान्यता है कि जहाँ समाज में विडंबनाएं, विसंगतियां, अपराध, पीडा, विकृतियाँ और भोगवादी  राक्षसी अपसंस्कृति है, वहीं डॉ० सिद्धार्थ जैसी निर्मापाधर्मा शक्तियां भी हैं। सच्चे, निर्मल और सात्यिक जीवन में बहुत आकर्षण है; किंतु उसे अंगीकार करने का मूल्य असाधारण है । अत: एक शाश्वत प्रश्न हमारे सामने है कि क्या कोई व्यक्ति धर्म की राह पर चलकर भी सामाजिक दृष्टि से सफल हो सकता है ?
    शिष्या  के रूप से दामिनी, अपने गुरु के स्नेह का सुख पाती हे। समय के साथ डॉ० सिद्धार्थ की बौद्धिकता, उसकी प्रतिभा को ही नहीं, उसकी आत्मा को भी सँवारती है । वह समझ पाती है कि चमक और दिव्यता में अंतर होता है । लौकिक सफलताओं की चमक हमारी आँखों को चौंधियाती है और आत्मिक विकास हमें दिव्यता से भर देता है। अध्यापक की बुद्धि से उच्च है उसका विवेक, और विवेक से उच्चतर  है उसका आचरण । आचार्य वही है, जो आचरण को शुद्ध ही नहीं दिव्य भी कर दे । डॉ. सिद्धार्थ का चरित्र इन सिद्धांतों का मूर्तिमंत रूप है ।
  • Chune Huye Nibandh
    Hazari Prasad Dwivedi
    195 176

    Item Code: #KGP-850

    Availability: In stock


  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 3
    Shrinivas Vats
    280 252

    Item Code: #KGP-567

    Availability: In stock

    तीसरा खंड लिखते समय मुझे आनंद की विशेष अनुभूति हुई। कारण, चुलबुला विष्णु कर्णपुर जो लौट आया। इस खंड को पढ़ते हुए आपको भी ऐसा लगेगा कि विष्णु की उपस्थिति हमें आव्हादित करती है। मैंने विभिन्न विधाओं में अब तक लगभग तीन दर्जन पुस्तकें लिखी हैं, लेकिन इस किशोर उपन्यास से मुझे विशेष लगाव है। भला क्यों?
    आपके मम्मी-पापा की तरह मेरे पिताजी भी मुझे डाॅक्टर बनाना चाहते थे। मैंने विज्ञान पढ़ा भी। पर जीवित मेढक, खरगोश के ‘डाइसेक्शन’ मन खिन्न हो उठा। मैंने अपनी दिशा बदल ली। मेरी अलमारी में जीवविज्ञान की जगह कालिदास, शेक्सपियर, टैगोर, प्रेचंद की पुस्तकें आ गई। साहित्य पढ़ना और लिखना अच्छा लगने लगा। सोचता हूं, भले ही मैं डाॅक्टर न बन सका, लेकिन विज्ञान और कल्पना के बीच संतुलन बनाते हुए बालकों के लिए लिखना चिकित्सकीय अनुभव जैसा ही है। संभव है चिकित्सक बनकर बच्चों से उतना घुल-मिल न पाता, जितना उन्हें अब समझ पा रहा हूं।
    सतरंगी की चतुराई ने तो मेरा मन ही मोह लिया। डाॅक्टर बनने की राह आसान हो गई। पूछो, कैसे? पढ़िए चैथे खंड में।
    -श्रीनिवास वत्स
  • Mere Saakshatkaar : Ashok Vajpeyi
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-2037

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : अशोक वाजपेयी
    देश के सर्वाधिक विवादास्पद संस्कृतिकर्मी, कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी गत तीन दशकों से हिन्दी साहित्य और संस्कृति के परिदृश्य पर छाए हुए हैं। कविता और आलोचना के साथ-साथ समय साहित्य और कलाओं के प्रति बहुलतावाद के पक्षधर श्री वाजपेयी पर अब तक जितने वैचारिक हमले हुए हैं, वे यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि उनको भूलकर स्वातंत्र्योत्तर साहित्य की बहस अधुरी रहेगी ।
    'मेरे साक्षात्कार' श्रृंखला की यह पुस्तक उन तमाम आरोपों और बहसों का एक दस्तावेज है जो गत तीस वर्षों में होती रहीं है । इनमें अशोक वाजपेयी ने बहुत सफाई से अपने पर लगाए जाते रहे आरोपों का खंडन किया है और साहित्य की सार्थक भूमिका को रेखांक्ति किया है । बातचीत में शामिल मुद्दे वहीं है जो वर्षो से साहित्यिक परिदृश्य पर उठते रहे है । इन मुद्दों में कला और साहित्य की स्वायत्तता तथा उसकी प्रजातांत्रिकता, कलादृष्टियों की लोकतांत्रिकता का सम्मान, साहित्य की समाज-सापेक्षता, कलावाद की जरूरत, कविता और विचार का द्वंद्व , उत्तर-आधुनिकता की उपादेयता और जीवन में साहित्य के सरोकार जैसे मुद्दे इस पुस्तक में बसी मुस्तैदी से उठाये गए है जिनका सटीक, सार्थक और दोटूक ज़वाब देते हुए अशोक वाजपेयी ने अपनी संघर्ष-यात्रा की सार्थकता प्रमाणित की है । पशिचमी अवधारणओं पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने वाले कथित आलोचकों को भी वे करारा झटका देते है जब कहते है कि 'उत्तर- आधुनिकता भरत में प्राक आधुनिकता है ।'
    अशोक बाजपेयी हिन्दी ही नहीं देश के दो-तीन ऐसे आलोचकों- भावकों में हैं जिनके लिए कलाओं का भी उतना ही मूल्य है जितना कि साहित्य का । पुस्तक में कई स्थलों पर संगीत, नृत्य, रूपंकर आदि कलाओँ पर बात करते हुए श्री वाजपेयी ने कलाओं की पारस्परिक्ता और मित्रता के कई ऐसे सूत्रों का भी खुलासा किया है जिनकी चर्चा हाल में अधिक मुखर हुई है । कहना चाहिए कि यह पुस्तक अपनी बेबाकी और उपादेयता के कारण उन सबको पसंद आएगी जो साहित्य को महज़ हथियार नहीं, संख्या भी मानते हैं ।
  • Nimaadi Lokokti Kosh
    Dr. Manjula Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-9189

    Availability: In stock

    निमाड़ी लोकसाहित्य में लोकोक्तियों का श्रेष्ठतम स्थान है। ये संपन्न वाचिक परंपरा की परिचायक हैं। इनमें ‘गागर में सागर’ भरने की अद्भुत क्षमता है। इन कहावतों का जन्म कब कहां और कैसे हुआ, इसके संबंध में प्रामाणिक रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। ऐसी लोकमान्यता है कि लोक मनीषा की कोख से लोकोक्तियों का जन्म हुआ। निमाड़ी जनमानस उठते-बैठते अहर्निश बात-बात पर ‘सूत्र-वाक्य’ के रूप में इन कहावतों का प्रयोग करता है। जिसे पढ़कर, सुनकर, गुनकर अच्छे-अच्छे ‘एजुकेटेड’ की बुद्धि चकरा जाती है। सीधे-सादे, भोले-भाले, सच्चे, सरल, माटी से जुड़े अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों का जीवनानुभव से जुड़ा सच, अभिव्यकित का पैनापन, अकाट्य तर्क प्रस्तुत करता है, सौ टंच (खरा सोना) है जिसे चुनौती देने का साहस हम में नहीं है।
  • Antyoday Purus : Shanta Kumar
    Satish Dhar
    195 176

    Item Code: #KGP-232

    Availability: In stock

    अन्त्योदय पुरुष : शान्ता कुमार
    शान्ता कुमार स्वच्छ छवि की भारतीय राजनीतिक परंपरा के राजनेता हैं। राजनीति के साथ-साथ शान्ता कुमार कई महत्त्वपूर्ण एवं चर्चित साहित्यिक पुस्तकों के रचयिता भी हैं ।
    ‘अन्त्योदय पुरुष : शान्ता कुमार' ऐसी पुस्तक है, जिसमें शान्ता कुमार के घर-परिवार से लेकर अभिन्न मित्रों के गरिमापूर्ण रिश्तों की सांद्रता है । पुस्तक शान्ता कुमार के जीवन-संघर्षों के कई अनछुए प्रसंगों को समेटे हुए है । शान्ता कुमार के ओजस्वी वक्तव्यों से परिपूर्ण साहित्यिक सभाओं अथवा अन्य कार्यक्रमों में की गई बेबाक टिप्पणियाँ इस महान् व्यक्तित्व की बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाती है ।
    हिमाचल प्रदेश के इस महान् सपूत ने अपनी प्रखर सोच से देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चिंतन को नई दिशा प्रदान की है। पुस्तक में राजनीति के चलते राष्ट्रीय स्तर पर शान्ता कुमार द्वारा प्रारंभ की गई लोक-हितकारी योजनाओं की बानगी भी देखने को मिलती है। यह कृति सृजनात्मकता की छौन्क के साथ-साथ राजनीतिक इतिहास का भी दस्तावेज है ।
    पुस्तक में लेखक द्वारा लिया गया साक्षात्कार शान्ता कुमार के व्यक्तित्व के कई कोने-अंतरों को खोलने में सक्षम रहा है। पुस्तक की प्रांजल व लयात्मक भाषा पाठको को अंत तक बॉंधे रखने में सक्षम है ।
  • Nadi Phir Laut Aaee
    Rajjan Trivedi
    90 81

    Item Code: #KGP-2015

    Availability: In stock

    उपन्यास
  • Gauri
    Ajeet Kaur
    125 113

    Item Code: #KGP-2050

    Availability: In stock

    गौरी धीरे-धीरे उठी। चावलों वाले कोठार के एकदम नीचे हाथ मारा और टोहकर एक छोटी-सी पोटली बाहर निकाल ली। धीरे-धीरे उसे मैले-से चिथड़े की गाँठें खोलीं। बीच में से दो बालियाद्द निकालीं, जिनमें एक-एक सुर्ख मोती लटक रहा था।
    उसने बालियाँ काँसे की एक रकाबी में रखकर चूल्हे पर रख दीं। जो भी सुबह रसोई का दरवाजा खोलेगा, उसे सबसे पहले वही दिखेंगी और उससे कहेंगी, ‘इस घर में से एक ही चीज मुझे मिली थी, तुझे पैदा करने का इनाम। तूने उस जन्म को अस्वीकार कर दिया है। तूने उसी कोख को गाली दी है, जिसने तुझे अपने सुरक्षित घेरे में लपेटकर और अपना लहू पिलाकर जीवन दिया। ले ये बालियाँ। ये मैं तुझे देती हूँ। ये गाली हैं, मेरे जन्म पर, तेरे जीवन पर। गाली भी और बद्दुआ भी। ले ले इन्हें, बेचकर दारू पी लेना। मेरे बाप को दे दिए। मुफ्त में दान में। ले मेरा दान और मेरी बद्दुआ, जो पृथ्वी के हर कोने तक तेरा पीछा करेगी।’
    गौरी ने अपनी छोटी-सी कपड़ों की पोटली भी चूल्हे के पास रख दी और बाहर निकल आई।
    पिछले आँगन का दरवाजा खोला और गली में बाहर निकल आईं।
    -इसी उपन्यास से
  • Avadh Narain Mudgal Samgra (2 Vols.)
    Mahesh Darpan
    750 675

    Item Code: #KGP-216

    Availability: In stock

    अवधनारायण मुद्गल समग्र (2 खण्डों में)
    'अवधनारायरए मुद्गल समग्र' में कवि-कथाकार  संपादक ही नहीं, एक सिद्धहस्त यात्रावृत्त लेखक, लघुकथाकार, साक्षात्कारकर्ता और अनुवादक के साथ-साथ श्री मुद्गल का विचारक रूप भी सामने आया है । आगरा, लखनऊ, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में साहित्य और पत्रकारिता के रचनाकार- संपादक के अनुभव विविधरंगी रहे हैं । अपने समय की हलचल को बड़े संजीदा ढंग से देखने वाले\ श्री मुद्गल को समय के अनेक बड़े रचनाकारों व संपादकों का सान्निध्य तो मिला ही, वह उनके साथ रहते हुए भी स्वयं को उनसे अप्रभावित रख अपनी अलग राह बना सके । इस राह को पहचानना ही इस समग्र कृतित्व से होकर गुज़रना है। यहीं दैनिक जीवन के तनाव, इतिहास से मनुष्य का संबंध, देश-काल के भीतर और पार होती दृष्टि, सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक व व्यक्तिगत प्रसंगों में भाषा का सहज आत्मीय स्वरूप और मिथकों के साथ-साथ दैनंदिन जीवन से आए प्रतीक एक नई रचना की दुनिया में ले जाते हैं, जो निरंतर  पास आने को आमंत्रित करती है । इस ग्रंथ का पाथ, एक तरह से एक विशिष्ट काल-खंड को तटस्थ दृष्टि से समझने का अवसर भी देता है । रचनाकार मुद्गल की यह सृष्टि विचार और विरार-सघर्ष की एक ऐसी दुनिया है, जिससे गुजरते हुए पाठक खुद को उसका एक सहयात्री पाता है ।

  • Kahani Samgra : Govind Mishra (3rd Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1583

    Availability: In stock


  • Chuhiya Rajkumari Ka Svayamvar
    Vinod Sharma
    60 54

    Item Code: #KGP-931

    Availability: In stock


  • Antarvartayen
    Kanhiya Lal Nandan
    240 216

    Item Code: #KGP-802

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक में सम्मिलित लगभग सभी बातचीतें किसी न किसी प्रतिष्ठित पत्रिका के माध्यम से पहले भी पाठकों के सन्मुख आ चुकी हैं, लेकिन समवेत रूप में दिनकर और अज्ञेय से लेकर कामतानाथ तक कई पीढ़ियों के रचनाकारों के अंतरंग मन में पैठा जा सके और उस पैठ के ज़रिए साहित्यिक जिज्ञासुओं की प्रश्नाकुल उत्कंठाएँ शांत हो सकें, इस दृष्टि से इस पुस्तक का विशेष महत्त्व मैं मानता रहा हूँ । फिल्मकार बासु भट्टाचार्य, चित्रकार कृष्ण हेब्बार और छायाकार रघु राय भी बातचीत के इस समवेत क्रम में सम्मिलित कर लिए गए हैं ताकि संवेदना के धरातल पर अनेक माध्यमों से जुड़े हुए लोगों की एकसूत्रता की प्रतिच्छवि भी आँकी जा सके ।
    कोई भी रचनाकार अपने युग को सिर्फ अपनी विधा के चश्मे से नहीं देखता । यह अगर कहानीकार है तो उसके साथ-साथ एक संघर्ष करता हुआ सामाजिक प्राणी भी है; जो कि ट्रेन-यात्रा में टिकट के लिए धक्के खाता भी हो सकता है, समाज में फैली किसी बुराई विशेष के प्रति एक आदमी की तरह सोच भी सकता है और उसकी प्रतिक्रिया में हिस्सेदार भी हो सकता है । रचनाकार को उसके समूचे रंगों में टटोलने की इसी जद्दोजहद से मैंने इन बातचीतों के क्रम में कुछ ऐसे ढंग से यह बार सवाल रखे हैं जो पूर्वापर संबंध के साथ असंगत दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उस बातचीत के समूचे प्रभाव में मुख्य उद्देश्य यहीं रहा है कि यह रचनाकार अपने मन के अछूते पहलुओं को पाठकों के सामने खोले; खासकर ऐसे पहलू जिन पर बहुत कम प्रकाश पड़ा है ।
    इस पुस्तक में सम्मिलित सभी रचनाकार व्यक्तित्व मुझे अंतरंग आत्मीयता प्रदान करते रहे हैं । संबंधों की यह अंतरंग आत्मीयता मेरी इन सभी बातचीतों का मूल आधार रही है । शायद इसीलिए जब-जब ये बातचीतें पहली बार प्रकाश में आई हैं, मुझे इनकी शैली के लिए पाठकों का अतिरिक्त स्नेह मिलता रहा है ।
    -कन्हैयालाल नंदन


  • Delhi
    Khushwant Singh
    400 340

    Item Code: #KGP-818

    Availability: In stock


  • Nayee Samiksha Ke Pratimaan
    Nirmla Jain
    400 360

    Item Code: #KGP-654

    Availability: In stock

    "1930–1960 तक से समय को जॉन हॉलावे ने ‘साहित्यिक आलोचना में क्रांति’ का युग कहा है। कहना न होगा कि इस समय की सबसे महत्त्वपूर्ण और समृद्ध आलोचनात्मक प्रवृत्ति नयी समीक्षा है। प्रवृत्ति विशेष के लिए यह नाम 1941 में प्रकाशित जॉन क्रो रैंसम की इसी शीर्षक की रचना से रूढ़ हुआ।" प्रस्तुत पुस्तक ‘नयी समीक्षा के प्रतिमान’ की संपादक सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन ने भूमिका के इन शब्दों में उस समीक्षा पद्धति का उल्लेख किया जिसने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। रचना और आलोचना के अंतःकरण को संशोध्ति / परिवर्तित करने में ‘नयी समीक्षा’ के सूत्रों व समीकरणों ने ऐतिहासिक कार्य किया। दोनों विश्वयुद्धों के बीच का समय नयी समीक्षा के प्रारंभ, विकास और सिमटाव का भी समय है।
    नयी समीक्षा के अंतर्गत स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति समूह और विक्टोरियन साहित्य की नैतिकता के प्रति विरोध दर्ज हुआ। इससे जुड़े समीक्षक कविता के अध्कि शुद्ध मूल्यांकन के लिए उसको ऐतिहासिक सामाजिक विवरणों व रचनाकार की निजता से काट देना उचित समझते थे। इससे विश्लेषण का क्षेत्र रूपात्मक विलक्षणताओं तक सीमिति हो गया।
    हर आरोह का एक अवरोह होता है। ‘नयी समीक्षा’ की सीमाएं 1950 के आसपास उभरने लगीं। निर्मला जैन के शब्दों में, फ्नयी समीक्षा की सभी महत्त्वपूर्ण कृतियां पहले ही प्रकाशित हो चुकी थीं और आलोचक जैसे अपने ऐतिहासिक दायित्व को पूरा कर विराम की मुद्रा में थे। आलोचना का एक प्रमुख दौर, एक विशेष युग मानो समाप्त हो गया था।
    प्रस्तुत पुस्तक इस महत्त्वपूर्ण आलोचना युग की उल्लेखनीय विशेषताओं को मूल रचनाओं के अनुवाद द्वारा उपलब्ध कराती है। रेने वेलेक, क्लींथ बु्रक्स, आइवर विन्टर्स, टी. एस. इलियट, आई. ए. रिचड्र्स, ऐलन टेट और डब्ल्यू. के. विमसाट के लेखों का अनुवाद अजितकुमार, निर्मला जैन व चंचल चैहान ने किया है। अपने ढब की अकेली पुस्तक, जिसमें जाने कितनी बहसों के प्रस्थान अंतर्निहित हैं। पाठकों की सुविध के लिए दो परिशिष्टों में हिंदी-अंग्रेजी और अंग्रेजी-हिंदी शब्दावली भी दी गई है।
  • Kavi Ne Kaha : Bhagwat Ravat
    Bhagwat Rawat
    190 171

    Item Code: #KGP-552

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : भगवत रावत
    यह कविता पर निर्भर करता है कि वह अपने पाठक को कितनी देर अपने पास बिठाए रख सकती है, अथवा पहली बार के बाद दोबारा अपने पास बुलाने को कितना विवश कर सकती है। इस तरह कविता के पास जाने की पहल तो पाठक ही करता है। इसके बाद की जिम्मेदारी कविता पर आ जाती है कि वह कितनी अपने पाठक की हो पाती है। कितनी उसके अनुभव-संसार का रचनात्मक हिस्सा बन पाती है, जो सब कुछ छोड़कर कविता के पास कुछ पाने की गरज से आता है। 
    समाज के जिस अनुभव-संसार में पाठक रहता है, उसी समाज से रचनाकार भी आता है। जीवन की तमाम अच्छाइयों, बुराइयों, समानता, असमानताओं, विसंगतियों और जटिलताओं आदि के बीच रचनाकार जो भी कुछ ऐसा देखता है जिसे प्राप्त भाषा के माध्यम से परिभाषित या अभिव्यक्त करना संभव नहीं होता, तो उसी प्राप्त भाषा को रचनाकार न, सिरे से गढ़ता है और उसके इस प्रयत्न का प्रतिफल ही उसकी रचना होती है।
  • Ek Nirvasit Maharaja
    Navtej Sarna
    425 383

    Item Code: #KGP-642

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-1
    Kamal Kishore Goyenka
    500 440

    Item Code: #KGP-57

    Availability: In stock

    मंजुल भगत : समग्र कथा-साहित्य (1)
    संपूर्ण उपन्यास
    हिंदी की प्रख्यात लेखिका मंजुल भगत को मैंने कुछ गोष्ठियों में बोलते सुना और संवाद भी किया तो पाया कि वे भारतीय स्त्री का प्रतिरूप है । उनमें भारतीय स्त्री के गहरे संस्कार थे । उनसे मिलना भारत की एक आधुनिक स्त्री से मिलना था । यह स्त्री भारत की संस्कृति और यहाँ  की मिट्टी की उपज थी, जिसमें गहरा अस्तित्व-बोध एवं  स्त्री-स्वातंत्र्य की चेतना थी । उन जैसी संस्कारवान, संकल्पशील, संघर्षरत और संवेदनाओ से परिपूर्ण लेखिका के संपूर्ण कथा-साहित्य के संकलन तथा संपादन का कार्य  करना मेरे लिए गौरव की बात है ।
    मजुल भगत की प्रमुख विधा कहानी है और इसी से वे साहित्य में प्रवेश करती हैं, परंतु उपन्यास के क्षेत्र मैं भी उन्होंने अपनी लेखन-प्रतिभा का परिचय दिया और 'अनारो' जैसे उपन्यास की रचना करके देश-विदेश में ख्याति प्राप्त की ।
    लेखिका के सभी उपन्यास-'टूटा हुआ इंद्रधनुष', 'लेडीज़ क्लब', 'अनारो', 'बेगाने घर में', 'खातुल', 'तिरछी बौछार’ तथा 'गंजी' के साथ-साथ उनके प्रकाशित कूल कहानी-संग्रहों में संकलित कहानियों को इस संकलन-द्वय से एक साथ प्रस्तुत किया गया है ।
    इस समग्र रचना-संसार को पढ़कर कहा जा सकता है  कि साहित्य के प्रति मंजुल भगत की गहरी आस्था थी । लेखिका का दृढ़ विश्वास था कि आने वाले समय में, तमाम अपसंस्कृति एवं अमानवीयकरण के बावजूद उनके उपन्यास और कहानियाँ अवश्य ही पढे जाएंगे । बीसवीं शताब्दी में भारतीय स्त्री को जानने और समझने के लिए मंजुल भगत का कथा-साहित्य एक प्रामाणिक दस्तावेज है
  • Patra-Samvad : Ageya Aur Rameshchandra Shah
    Krishna Dutt Paliwal
    240 216

    Item Code: #KGP-698

    Availability: In stock


  • Dhoop Ke Beej
    Hemant Kukreti
    225 203

    Item Code: #KGP-649

    Availability: In stock

    ‘धूप के बीज’ हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि हेमंत कुकरेती का पाँचवाँ संग्रह है। किसी अच्छे कवि के पाँचवें संग्रह का आना उसके और उसकी भाषा दोनों के लिए उल्लेखनीय होता है। नब्बे के दशक में आए हिंदी कवियों में हेमंत की कविताएँ अलग से पहचानी जाती हैं। उन्होंने अपना मुहावरा पा लिया है। इधर उनकी भाषा की त्वरा ही नहीं बदली है, उसमें निहित चुभन का पारा भी चढ़ा है। ऐसा किसी चमत्कार के कारण संभव नहीं हुआ है। यह तब संभव होता है जब कवि की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि में परिपक्वता और स्पष्टता आती है; जब उसके लगभग सभी भ्रम तिरोहित हो जाते हैं; जब वह 'मनुष्य' और 'छाया मनुष्य' का अंतर करते हुए विषाद से भर जाता है। कवि को पता है कि कुछ लोगों ने कविता को खेल और मजाक बना दिया है। ऐसे कुकवियों के लिए कविता में जीवन की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण नहीं है। हेमंत के इस संग्रह की कविताएँ इस पतनशील प्रवृत्ति का प्रतिवाद करते हुए काली रात के विरुद्ध धूप के बीज रोपने की आकांक्षा रखने और देने वाली कविताएँ हैं।
    ये कविताएँ हमारे अपने समय में संबंधें की ऊष्मा और जीवन के तापमान का पता देती हैं। ये समय के कुचक्र को परिभाषित करती हैं और हर उस ‘चाल’ पर उँगली रखती हैं जो आत्मीयता के लिहाफ के भीतर अनवरत चलती रहती है। आजकल जब कविताएँ बहुत अबूझ होती जा रही हैं तब हेमंत की साफ-सुथरी कविताएँ पढ़ना सुखद अनुभव की तरह है। हेमंत बिना किसी बनावटी गंभीरता के अपनी बात कहते हैं और कविता बनी रहती है। वे कविता में बहस नहीं करते बल्कि बहसों को कविता में लाते हैं और पाठक के मन में उतार देते हैं। उनकी कविताएँ यदि बाजार के चरित्र को बारीकी से पकड़ती हैं तो जीवन के रंग को भी। कहना चाहिए, उनकी कविता दुःख का विलोम रचना जानती है। 
    एक कवि के रूप में हेमंत स्मृतियों का महत्त्व जानते हैं। वे जानते हैं कि स्मृतियाँ मनुष्य की थाती होती हैं। जो जितना जीवंत होता है, उसके पास उतनी ही अधिक स्मृतियाँ होती हैं। 
    हेमंत के पास अपने पहाड़ की, गाँव-जवार की, दिल्ली की, प्रेम की, तमाम साथियों और घटनाओं की अपार स्मृतियाँ हैं जो उनके कवि को मित्र की तरह ऊर्जस्वित करती हैं। उनकी शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो यथास्थिति के विरुद्ध उम्मीद न जगाती हो। कहा जा सकता है कि वे नाउम्मीदी के इस कठिन समय में उम्मीद के कवि हैं।
    यह संग्रह इसका प्रमाण है कि हेमंत की कविताएँ उस ओर तीक्ष्ण निगाहों से देखती हैं, जिधर ठीक से देखा नहीं गया है। वे शहर की निस्पंद हो रही देह में सिहरन जैसी कोई चीज तलाशते हैं और पाते हैं, 'कोई सिहरन पैदा नहीं होती/शहर के जिस्म में/वह थोड़ा और मर जाता है।' इस संग्रह की कविताएँ किंतु, परंतु और लेकिन को पीछे छोड़ती हुई निष्कवच सत्य के साथ खड़ी हैं।
    हेमंत की कई कविताएँ पितृसत्ता का नया मायावी चेहरा दिखाती हैं। 'घर से चली जाती हैं जो औरतें' और 'घरों में काम करने वाली औरतें' जैसी कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं। हिंदी के समकालीन काव्य परिदृश्य पर ऐसे कितने कवियों की मौजूदगी है जो हेमंत की तरह कह सकें-'साहित्य के आलोचक चुक गए/और बन गए कवियों के निंदक।' इस संग्रह की कविताएँ यथार्थ के कई चेहरे लेकर आई हैं। बुजुर्गों के बारे में उनकी सादगी से कही पंक्तियों में छुपा घाव बहुत गहरा है।
    इसी तेज नजर के कारण हेमंत शहरी जीवन को व्यक्त करने वाले बड़े कवि हैं। इस कविता में दया दिखाने की कोई अपील नहीं है क्योंकि कवि जानता है कि पूँजी के सौंदर्यशास्त्र में दया और करुणा घिनौने शब्द हैं। बुजुर्गों पर बात करते हुए जब हेमंत इस मार्मिक पंक्ति को लिखते हैं कि 'हँसी भी एक तरह का रोना है' तो समकालीन समय का नागरिक होने पर रोना आता है। इस संग्रह की अंतिम कविता हेमंत की बड़ी रेंज का पता देती है। इस संग्रह की सभी कविताएँ कविता की स्वाभाविक जमीन पर खड़ी हैं। इनमें समाई हुई लयात्मकता इनकी ताकत है। लंबे अंतराल के बाद आया हेमंत कुकरेती का यह संग्रह समकालीन हिंदी कविता में एक सार्थक और जरूरी हस्तक्षेप की तरह है।
  • Yada-Kada
    Ramesh Chandra Diwedi
    195 176

    Item Code: #KGP-638

    Availability: In stock

    यदा-कदा
    धर्म, परंपरा और सामाजिक मूल्य-बोधों का मिश्रण पुस्तक की विशेषता है। समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और मानवीय मूल्यों के क्षरण की ओर ध्यान आकृष्ट करके लेखक ने अपने दायित्व का निर्वहन किया है। रोचक शैली में लिखी पुस्तक सामान्य पाठक और विद्वत्त समाज दोनों के लिए पठनीय है।                
    -अशोक कुमार नायक (दिल्ली विश्वविद्यालय)

    एक सहृदय लेखक की संवेदनशीलता, एक सैनिक का अगाध देशाभिमान और भ्रमणशील परिव्राजक के अनुभवों की समधुर अनुगूँज है-‘यदा-कदा’ (निमेष जी की डायरी)। आशा है, पुस्तक विद्वानों और सामान्य वर्ग के पाठकों में समुचित समादृत होगी।
    -प्रो० गिरजाप्रसाद दुबे (म० गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी  )

    सरल और स्पष्ट भाषा में पुस्तक की प्रस्तुति वास्तविकता का सुखद अनुभव है। मनुष्य की प्रकृति की विभिन्नताएँ इस रचना से रूबरू कराने में सफल हैं। शहरी और ग्रामीण जीवन का तुलनात्मक अध्ययन सुंदर है। हमारे पूर्वजों, संतों, धर्मात्माओं द्वारा प्रदत्त शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और भौतिकवादी समाज को आईना दिखाती हैं। विद्वान् लेखक से हम ऐसी ही और रचनाओं की प्रस्तुति की कामना 
    करते हैं। 
    -प्रो० पी० डी० सहारे, डॉ० गीता सहारे (दिल्ली विश्वविद्यालय)

    डायरी-लेखन की विधा पं० रमेशचन्द्र द्विवेदी (स्वामी श्रद्धानंद) द्वारा हिंदी साहित्य हेतु एक नूतन श्लाघनीय प्रयास है। यायावरी एवं जीवन के गूढ़ तत्त्वों की मीमांसा सहसा सांकृत्यायन जी की स्मृतियों को जीवंत कर देती है। सुधी जन निश्चित रूप से यदा-कदा इस ‘यदा-कदा’ का पारायण करके अपने व्यक्तित्व और राष्ट्र-निर्माण में योगदान देंगे। लेखक निश्चयतः साधुवाद के पात्र हैं। मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
    -राकेशकुमार सिंह (वरिष्ठ आचार्य, (अंग्रेजी) इलाहाबाद वि० वि०)
  • Jigyaasa
    Bhairppa
    250 225

    Item Code: #KGP-214

    Availability: In stock


  • Khushboo Udhaar Le Aye
    Upendra Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-1902

    Availability: In stock

    खुशबू उधार ले आए
    उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लों का 'हिन्दीपन' एक ओर 'उर्दू' की फारसीयत से अलगाता है तो दूसरी ओर गजल के व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य को सबल बनाता है, जिसका अनुकरण पाकिस्तान के ग़ज़लकार भी करते है । डॉ० शेरजंग गर्ग ने ठीक ही कहा है कि उपेन्द्र की कहन में वैविध्य है जो उन्हें बहुत-से ग़ज़लकारों से सर्वथा अलग का देता है । 
    -डॉ० गंगाप्रसाद विमल
    हबीब जालिब की तरह उपेन्द्र कुमार भी व्यवस्था से लड़ते और कारावास में डाले गए इंसान की वेदना को शिद्दत से महसूस करते है :
    वो कैदी चुप था लेकिन गुनगुनाया
    बजी जंजीर की जब इक कड़ी थी
    उपेन्द्र के पास शे'र कहने का सलीका भी है और कल्पना को इस्तेमाल करने का फन भी । 
    -ज्ञानप्रकाश विवेक
    उपेन्द्र के पास शायद किसी चालाक अनुभवी कवि का शिल्प-कौशल नहीँ है, यह अच्छी बात है अन्यथा उनकी रचनाओं में कथ्य की प्रमुखता नहीं रह पाती । अनगढ़ यथार्थ का विशाल भंडार परोसती उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लें पाठकों को अपने आसपास को सतर्कता से देखने को मजबूर करेंगी, ऐसा विश्वास है ।
    - विजय किशोर मानव
    न तो उपेन्द्र जी उर्दू ग़ज़ल की रिवायतों की रौ में बहे है और ना ही उन्होंने अपनी ग़ज़लों पर हिन्दी का ‘कवितापन हावी होने दिया है । उनकी ग़ज़लों की बुनावट और उनकी प्रकृति गीतों से अलग है । इसीलिए उनमें गजलियत की मौजूदगी का अहसास बना रहता है । सोजो-साज़ (वेदना और संगीतात्मकता) हूँ तो कविता मात्र के आधार तत्त्व माने जाते है, मगर इनके बरौर तो ग़ज़ल का काम ही नहीं चल सकता । ग़ज़ल में रोमानिया की चाशनी भी ज़रूरी है । उपेन्द्र जी ने ग़ज़ल की इन खूबियों को न केवल समझा है, बल्कि इनसे अपनी ग़ज़लों को बखूबी सँवारा भी है ।
    - बालस्वरूप राही
  • Kaale Kuyen
    Ajeet Kaur
    225 203

    Item Code: #KGP-18

    Availability: In stock

    काले कुएँ
    इस संग्रह की कहानी 'बाजीगरनी' से-
    वह औरत जो तमाम उम्र एक कसी हुई रस्सी पर बाजीगरनी की तरह अपने बोझ का संतुलन कायम रखने की कोशिश में सारी ताकत और समूची एकाग्रता खर्च करती हुई चलती रही थी, आज ज़मीन पर खडी थी । रस्सी के दोनों सिरे कभी उनके सास-ससुर और खाविंद के दरम्यान तने रहे थे, कभी उनके खाविंद और बच्चों के दरम्यान । बहुत बरसों से एक सिरा भाइया जी के वजूद से बँधा था और दूसरा सिरा बड़े मामा जी के साथ । भाइया जी नहीं रहे तो रस्सी कड़क करके टूट गई । भाभी जी चक्कर खाकर ज़मीन पर आ गिरी । ज़मीन पर खडे होना तो वह भूल ही गई थीं ।  लडखड़ाती, काँपती, चकराती, हिचकोले खाती वह नए सिरे से छोटे बच्चे की तरह ज़मीन पर खडी होना सीखेंगी । शायद छोटे मामा जी का हाथ पकड़कर यह पैर बढाना सीखेंगी । पर फिलहाल तो वह चारों खाने चित गिरी पडी थीं ।
    भाइया जी नहीं रहे, तो बड़े मामा जी भी चले जाएँ-चले जाएँ..
    और उन्होंने दो-दो पुरानी सोने की चूडियों अपने हाथों से उतारी । उठीं और वे चारों चूडियाँ मामा जी के कोट की जेब में डाल दी, "बस, यही है मेरे पास । इसे ले ले और चला जा । पैंशनों वाले चले गए । रोटी खत्म । चूल्हा बुझ गया । तोड़ दिया है मैंने चूल्हा । तोड़ दिया है । तूने सुना ? चूल्हा तोड़ दिया है मैंने । चला जा । ”
    हिंदी और पंजाबी में समान रूप से रचनारत, साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार की मानव-मन के सच को उकेरती कहानियों का नया संग्रह ।

  • Kavya Shatabdi
    Anamika
    350 315

    Item Code: #KGP-789

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    425 383

    Item Code: #KGP-248

    Availability: In stock

    अथर्ववेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की अन्तिम कड़ी ‘अथर्ववेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें अथर्ववेद के 120 मन्त्रों को दस शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। अथर्ववेद की विषयवस्तु अत्यन्त रोचक तथा विविधता लिए हुए है। यही नहीं--ज्ञान, शिक्षा तथा गुरु-शिष्य के सम्बन्धों पर भी यहाँ प्रकाश डाला गया है। परिवार में अतिथि की महत्ता का उल्लेख हुआ है तो अन्य पारिवारिक सम्बन्धों की समरसता का महत्त्व बताया गया है। शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य दोनों ही जीवन में रहते हैं। अथर्ववेद का यथार्थवाद दोनों का वर्णन भी करता है तथा अशुभ से, पाप से मुक्ति की राह बताता है, प्रायश्चित्त का विधान भी करता है।
    यद्यपि व्यक्तिगत सौख्य के लिए यहाँ शत्रुनाशविषयक मन्त्र भी हैं तथा कुछ जादू-टोने जैसी क्रियाएँ भी वर्णित हैं परन्तु तब भी समष्टिगत कल्याण की उपेक्षा नहीं हुई है। आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ होने के नाते यहाँ रोगों के नाम, लक्षण तथा उपचार विधियाँ वर्णित हैं। इन विधियों की विविधता व्यक्त करती है कि शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए अथर्ववेद के ऋषि कितना सजग थे। वनस्पतियों, औषधियों के नाम, उनके गुण तथा रोग-विशेष में उनके उपचारात्मक प्रयोग भी बहुधा वर्णित हुए हैं।
    राजनीति पर यहाँ विशिष्ट सामग्री उपलब्ध है। राजा, उसकी सेना, अस्त्र-शस्त्र, युद्धनीति और शत्रुनाशपरक प्रार्थनाओं का अपना महत्त्व है। विभिन्न वृक्ष, लताओं, वनादि के वर्णन तथा जल, वायु को सम्बोधित सूक्तों से पर्यावरण- विषयक चिन्तन झलकता है। ‘भूमिसूक्त’ में प्रथम बार ‘धरती माँ’ का उल्लेख है--‘माता भूमिः पुत्रोअह पृथिव्याः’--‘भूमि माता है मैं पृथिवी का पुत्र हूँ।’ यह माता-पुत्र के गहन सम्बन्ध धरती का पर्यावरण संरक्षण करता है तथा राष्ट्र की रक्षा के लिए सन्नद्ध भी करता है। सबके भीतर दिव्यता है, सब प्रेमभाव से जुड़े हैं, जुड़े रहें। विश्व संरक्षण, विश्व कल्याण के तत्त्व सत्य, ऋत, दीक्षा, ज्ञान, तप, यज्ञादि हैं। आतंक हिंसा से जूझते विश्व में अभयता का साम्राज्य हो--यही कामना व्यक्त हुई है।
    यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो ‘मन से युवा’ हैं तथा प्राचीन सभ्यता व संस्कृति को आधुनिक संदर्भों में समझना चाहते हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rita Shukla
    Rita Shukla
    350 280

    Item Code: #KGP-657

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ऋता शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'प्रतीक्षा', 'छुटकारा', 'देस बिराना', 'विकल्प', 'जीवितोअस्मि…!', 'रामो गति देहु सुमति...', 'निष्कृति', 'सलीब पर चढे सूरज का सच', 'उबिठा बनाम उभयनिष्ठा...' तथा 'हबे, प्रभात हबे' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका ऋता शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bayaan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-684

    Availability: In stock


  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    995 896

    Item Code: #KGP-580

    Availability: In stock


  • Bharatratna Dr. A.P.J. Abdul Kalam : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    240 216

    Item Code: #KGP-1570

    Availability: In stock


  • Saadat Hasan Manto Ke Natak
    Narendra Mohan
    400 360

    Item Code: #KGP-3

    Availability: In stock

    सआदत हसन मंटो के नाटक
    सआदत हसन मंटो के नाटकों से हिंदी पाठकों का उतना परिचय नहीं है जितना उनकी कहानियों से, जब कि उन्होंने उच्चकोटि के नाटक लिखे हैं । उनके नाटकों में विडम्बनापूर्ण  स्थितियों के दृश्यात्मक संयोजन के आधार पर चरमबिंदु  की रचना की गई है और फिर उसी में से उभरता है एंटी क्लाइमेक्स । कार्य-व्यापार को आलोकित करने की यह पद्धति, चरमबिंदु के साथ इस ढंग का सलूक मंटो के नाटय-कर्म का अहम हिस्सा है ।
    मंटो के नाटकों में व्यंग्य-दृष्टि और फार्स के साथ-साथ हास्य और क्रीडा का भी विधान हुआ है । इनमें मंटो की संवेदना और सोच का दायरा काफी विस्तृत है-वैयक्तिक कुंठाओं, आकांक्षाओं और सरोकारों से लेकर सामाजिक- राजनीतिक चिंताओं और विदूपताओं तक । ये नाटक श्रव्य माध्यम द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, अत: उर्दू हिंदी भाषाओं की साँझी विरासत हैं ।
    सआदत हसन मंटो के नाटक पुस्तक से मंटो के नाटकों को, उनके नाटककार रूप को पहली बार हिंदी पाठकों के सामने लाने का महत्त्वपूर्ग कार्य किया है हिंदी के जाने-माने नाटककार, कवि और आलोचक डॉ० नरेन्द्र मोहन ने । संपादकीय दृष्टि की वजह से यह मंटो के नाटकों का एक संकलन भर नहीं है, यह एक ऐसा दस्तावेज बन गया है जो पीढियों के फासले को पाटता हुआ हमसे आ जुड़ता है ।
    मंटो ने न आघुनिक्तावादी सांचा कबूल किया, न प्रगतिवादी । यह जिंदगी की जुराब के धागे को एक सिरे से पकड़कर उघेड़ता रहा और उसके साथ हम सब उधड़ते चले गए ।
  • 23 Lekhikayen Aur Rajendra Yadav
    Geeta Shree
    395 356

    Item Code: #KGP-583

    Availability: In stock

    23 लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव
    अपने ढंग की अद्भुत पुस्तक है यह '23 लेखिकाएं और  राजेन्द्र यादव' । शायद किसी भी भारतीय भाषा में अकेली । इसे गीताश्री के पत्रकार-जीवन की एक उपलब्धि भी कह सकते  हैं । यहाँ गीता ने समय-समय पर लिखे गए समकालीन महिला-रचनाकारों के इम्प्रैशन (प्रभाव-चित्रों) का संयोजन किया है । कहीं ये साक्षात्कार हैं तो कहीं संस्मरण, कहीं राजेन्द्र जी के रचनाकार को समझने की कोशिश है तो कहीँ 'हंस' के संपादकीय, को लेकर उन पर बाकायदा मुकदमे । यहाँ अगर मन्नू भंडारी, मृदुता गर्ग, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोडा, ममता कालिया, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका तथा कविता हैं तो निर्मला जैन, जयंती  रंगनाथन, पुष्पा सक्सेना, वीना उनियाल और रचना यादव भी अपने वक्तव्यों के साथ उपस्थित है । राजेन्द्र यादव अपने समय के सबसे महत्त्वपूर्ण कथाकार, नई कहानी आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तक और कथा-समीक्षा के विलक्षण व्याख्याकार हैं । इधर चौबीस वर्षों में तो 'हंस' के तूफानी विचारों ने हंगामा ही खड़ा कर दिया हैं--राजेन्द्र जी को खलनायक और माफिया डॉन या पता नहीं और क्या-क्या बना दिया । विवादास्पद होना  जैसे उनकी स्थायी नियति है--'हंस' के माध्यम से उन्होंने स्त्री-दलित और अल्पसंख्यकों के पक्ष में जो जेहादी मुहिम चलाई है उसने निश्चय ही हिंदी के यथास्थितिवादी परंपरा-पोषकों की नींद हराम कर दी है । वे तर्क से नहीं, गालियों और आक्षेपों से राजेन्द्र जी के प्रश्नों का उत्तर देते हैं । मठाधीशों के लिए यह सचमुच बैचेन कर देने वाला सत्य है कि उनके देखते-देखते दलित और स्त्री-विमर्श आज साहित्य की केंद्रीय मुख्य धाराएँ हैं ।
    राजेन्द्र यादव के इस विकट और अपने समय के सबसे जटिल व्यक्तित्व के विविध आयामों को समेटने की कोशिश करती हैं ये लेखिकाएँ गीताश्री के मंच से ।
    किताबघर प्रकाशन की एक भव्य प्रस्तुति ।
  • Toba Teksingh Tatha Anya Kahaniyan
    Saadat Hasan Manto
    180 162

    Item Code: #KGP-1941

    Availability: In stock


  • Safed Chaadar
    Jiyalal Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-1994

    Availability: In stock

    सफेद चादर
    बहुपथीन प्रतिभा के धनी श्री जियालाल आर्य की  यह कथाकृति 'सफद चादर' अनेक संदर्भों में उपन्यास-जगत् की एक अनूठी उपलब्धि है ।
    इस उपन्यास में समष्टि-हित की व्यापक दृष्टि से संपन्न एक ऐसी सशक्त और सतत संघर्षशील ग्रामीण नारी की कथा है, जो नारी-मुक्ति की संभावनाओं को सहज सम्भाव्य बनाती है । घोर कायिक और मानसिक उत्पीड़न तथा अत्याचार के बावजूद श्री आर्य की नायिका की महती मानवीय संवेदना और सामाजिक संचेतना किंचित् काले नहीं होती, अपितु भांति-भांति की कुंरीतियों-कुत्साओं के विषदंश से विमूच्छित मनुष्यता को मर्मन्तुद जर्जरता को उन्मूलित करने का उसका उत्साह उत्तरोत्तर अदम्यतर होता जाता है । मानवता के प्रति उपन्यासकार की यह मांगलिक निष्ठा इस उपन्यास को एक श्रेष्ट कृति की कोटि में प्रतिष्ठित करती है ।
    प्रज्ञापटु कथाशिल्पी श्री जियालाल आर्य के इस उपन्यास में पाठकों को बाँध लेने की अदभुत क्षमता है । अपनी हर अगली पंक्ति के लिए पाठकों का औत्सुक्य अक्षुष्ण रखने की कला में कथाकोविद श्री आर्य को पूर्ण प्रवीणता प्राप्त है । जिसके साथ में यह उपन्यास जाएगा, वह इसे अथ से इति तक पढे बिना नहीं ही छोड़ेगा, यह मेरा अनुभूत अभिमत है ।
    -डॉ० कुणाल कुमार
  • Jauhar Ke Akshar
    Santosh Shelja
    160 144

    Item Code: #KGP-9075

    Availability: In stock


  • Dushyant Kumar Rachanavali (Four Vols.)
    Vijay Bahadur Singh
    2250 2025

    Item Code: #KGP-834

    Availability: In stock

    Complete Set of 4 Volumes.
  • Aavahayami
    Ramesh Chandra Shah
    400 360

    Item Code: #KGP-9011

    Availability: In stock

    'आवाहयामि' पुस्तक में श्री जे. एल. मेहता पर लिखे गए संस्मरण में एक उद्धरण है-'कल्पना क्योंकि मूलत: भाषिक होती है इसलिए हाइडेगर का कहना है कि स्वयं भाषा ही बीजरूप में कविता है, पूर्वप्रक्षिप्त अर्थों का ऐसा आकार, जो हमारे वस्तुजगत को प्रकाशित और निर्मित करता है। इसी आधारभूमि पर चिंतक और कवि चिंतन और सृजन के नए रास्ते बनाते हैं।' यानी बड़ी से बड़ी प्रतिमा के भीतर से उपजे विचार या कविता का विस्फोट भी मात्र उसकी प्रतिभा की करामात नहीं होते बल्कि उसके पूर्वजों व तमाम पूर्ववर्ती कवि-चिंतकों द्वारा रची और बार-बार आविष्कृत की गई भाषा की देन भी होते हैं। इसीलिए नई पीढी के लिए यह जरूरी है कि वह न सिर्फ अपनी भाषा को बनाने वाली कविता व चिंतन के पास बार-बार जाए बल्कि उस समय के सरोकारों को भी भली-भांति जाने-बूझे क्योकिं तभी वह अपनी पीढ़ी व अपने समय के तनावों को भी ठीक-ठीक समझ पाएगी ।
    संस्मरणों की यह पुस्तक दरअसल ऐसा ही एक आवाहन है-एक आधुनिक, भारतीय कवि का अपने भाषिक परिवेश के पूर्ववर्ती और समवर्ती कवियों-चिंतकों से सतत संवाद करने, उन्हें और उनके माध्यम से खुद को बेहतर समझने की अदम्य इच्छा का दस्तावेज । वहीं दूसरी और यह संस्मरण एक प्रखर आलोचक को पैनी दृष्टि से देखे गए जीवन-प्रसंगों और हिंदी साहित्य में स्था-समय पर प्रकट हुई गहन चिंताओं, अनुरागों और ऊहापोहों का लेखा-जोखा भी है। इसीलिए यह पुस्तक संस्मरण के सामान्य अर्थों में उन व्यक्तित्वों, जिन पर ये लिखे गए हैं, उनके जीवन के रोचक या प्रेरणादायी घटनाओं का संपुंजन मात्र न होकर हिंदी साहित्य के एक पूरे युगबोध का सिंहावलोकन है ।
    संस्मरण-विधा की साहित्य में अहमियत 'रिक्त स्थानों की पूर्ति' करने वाली हो सकती है जो न केवल उन कवि-चिंतकों बल्कि उस घूरे समय की सर्जना एवं विचार-प्रवाहों को समझने में मदद करें, ऐसा इस पुस्तक के पाठकों को अनुभव होगा।
    ये संस्मरण जिनके बारे में लिखे गए हैं, उनके व्यक्तित्व को उजागर करने के साथ-साथ लिखने वाले की जिज्ञासाओं, अभिरुचियों, खुलेपन और संवाद करने की ललक को भी अनायास ही उजागर करते चलते हैं।
    हिंदी का जैसा लबालब, हिलोरें लेता, चौडा पाट इस पुस्तक में उजागर होता है-उसमें जैसी और जितनी सार्थक बहसें लेखक अपने समय और आपस में एक- दूसरे के लेखन-चिंतन और स्वयं अपने अंतर्द्वंद्वों से कर रहे थे यह देखना आज की पीढ़ी के लिए चकित करने वाला अनुभव हो सकता है। युवा पीढ़ी के अधिकांश लोगों ने तो हिन्दी के  इस चौडे और जीवंत पाट को जाना ही नहीं है, और एक दुबली, सतही धार जो अब सूखी, तब सूखी- भला किसी को कितना-क्या और कब तक है सकती है ?
  • Har Baar Musaphir Hota Hoon
    Pratap Sehgal
    280 252

    Item Code: #KGP-611

    Availability: In stock

    हर बार मुसाफिर होता हूं' के यात्रा-वृत्तांत निरे वृतांत नहीं हैं। निरे वृतांत कभी भी यात्रा-साहित्य का हिस्सा नहीं बन सकते। यह यात्रा-वृतांत कभी इतिहास की गलियों से गुज़रते हुए आपको अतीत के किसी पन्ने से जोड़ देते हैं तो कभी भूगोल में प्रवेश करते हुए आपको उसी जगह ले जाकर खड़ा कर देते हैं, जिस जगह का जिक्र लेखक कर रहा है। कभी आप उस जगह के लोक के रीति-रिवाजों से रू-ब-रू होते हैं, कभी वहां के सांस्कृतिक घटकों का तो कभी वहीं की प्राकृतिक संपदा और सौंदर्य का हिस्सा बन जाते हैं।
    विविध विधाओं में लेखन करने वाले लेखक प्रताप सहगल एक घुमंतू जीव भी हैं, यह जानकारी इन यात्रा-वृतांतों को पढ़कर पुख्ता होती है। वन वृत्तातों में कहीं कविता, कहीं नाटक और कहीं कथा का रंग मिलने लगना कोई अजूबा नहीं बल्कि इसे लेखक का शैल्पिक वैशिष्टय ही मानना चाहिए।
    ये यात्रा-वृत्तात इसलिए भी विशिष्ट हो जाते है कि लेखक वर्णित स्थान, समय और वहीं समाहित सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का रूपांकन किनारे या किसी सिरे पर खडा होकर नहीं करता। यह सीधे-सीधे स्थान, समय और परिवेश में दाखिल होकर उसका हिस्सा बनकर जीता है और खुद की भी वहीं शामिल कर लेता है। अपने इन्हीं अनुभवों को पाठक के साथ साझा करने की इच्छा ही लेखक को शब्द का सहारा लेने के लिए विवश करती है। और इसी बहाने और तमाम सार्थक यात्रा-वृत्तांतों की तरह से यह यात्रा-वृत्तांत भी हिंदी के वृहद यात्रा-साहित्य के द्वार पर दस्तक देते हुए आपके हाथ में है।
  • Tinku Chala Nana Ke Ghar
    Anju Sandal
    60

    Item Code: #KGP-927

    Availability: In stock


  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-4)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-895

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-1 (Nirman)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-1574

    Availability: In stock


  • Unke Hastakshar
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-2029

    Availability: In stock

    उनके हस्ताक्षर
    ० एक लम्बा रास्ता गुजर गया, जब एक उपन्यास लिखा था, डॉक्टर देव । अब चालीस साल के बाद जब मैंने उसे फिर से देखा, लगा-उसका  हिन्दी अनुवाद अच्छा नहीं हुआ है । मन में आया, अगर उसका अनुवाद मैं अब स्वयं करूँ, तो उसकी रगों में कुछ धड़कने लगेगा और यही जब करने लगी, तो बहुत कुछ बदल गया ।
    ० इसी तरह एक मुद्दत हो गई, एक उपन्यास लिखा था…'घोंसला' । प्रकाशित हुआ तो बाद में किफायती संस्करण 'नीना' नाम से चलता रहा । आज उसे देखकर लगा कि वह उस कदर पुख्ता नहीं हो पाया था, जो होना चाहिए था । और उसी को अब फिर से लिखा है, जिससे वह सघन भी हो पाया है और पुख्ता भी ।
    ० इसी तरह कभी एक कहानी लिखी थी ‘पाँच बहनें-और उस कहानी को लेकर जब किसी ने फिल्म बनाने की बात की, तो मैंने कहानी को फिर से देखा । अहसास हुआ कि इस जमीन पर जो कहा जा सकता था, वह कहानी में नहीं उतर पाया था। यह अहसास कुछ इस तरह मेरा पीछा करने लगा कि एक दिन मुझे पकड़कर बैठ गया । कुछ और मसले भी थे, जो कहानी में नहीं आ पाए थे । और उन सबको लेकर पाँच की जगह सात श्रेणियों के किरदार सामने रखे और उन सबको कागज़ पर उतार दिया । अब उसे नाम दिया है-उनके हस्ताक्षर' ।
    -अमृता प्रीतम
  • Aazaadi Mubarak
    Kamleshwar
    290 261

    Item Code: #KGP-41

    Availability: In stock

    आजादी मुबारक
    मैंने देखा है कि कमलेश्वर ने कभी भी किसी 'डॉग्मा' से चालित होकर लिखना स्वीकार नहीं किया । कमलेश्वर की हर कहानी उसके जीवनानुभवों से निकली है । कमलेश्वर ने पढ़-पढ़कर संक्रांति के नहीं झेला है, बल्कि स्वय जिया है... उसकी शायद ही कोई ऐसी कहानी हो, जिसके सूत्र जिंदगी में न हों, क्योंकि वह बहुत खूबी से अपने समय के अंतर्विरोधों को पकड़ता है...  मुझे बहुत-सी वे घटनाएँ, लोग, स्थितियाँ, विचार, संदर्भ आदि याद है, जिन्होंने उसकी सशक्त  कहानियों को जन्म दिया है । कमलेश्वर इस मामले में एक बंजारा है, क्योंकि वह अनवरत यात्रा पर रहता है उसकी कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन की सादगी है शुरू होकर आधुनिकतम संचेतनाओँ और संश्लिष्टताओं का प्रतिनिधित्व करती है...  उसका स्टैमिना परिवर्तन की तेज से तेज रफ्तार में उसका सहायक होता है, इसीलिए वह कभी पिछड़ता नहीं और न प्रयत्न-शिथिल होता है...  और मैं कहना चाहूँगा कि यह कोई साधारण बात नहीं कि एक कलाकार अपनी भावभूमियों पर परिश्रमपूर्वक तैयार की गई अपनी निर्मितियों को इतनी निर्ममता से तोड़कर अलग हो जाए और नए सफल प्रयोग करने लगे । -दुष्यंत कुमार (सन् 1 966)

    कमलेश्वर की कहानियों का यहीं सच है । तमाम क्था आंदोलन  आए और गए, उनके साथ और उनके बाद भी कमलेश्वर ने अपनी निर्मिंतियों को विलक्षण रचनात्मक निर्ममता से तोड़ा से । उसी प्रयोगधर्मिता का उदाहरण हैँ-'आजादी मुबारक' संकलन की यह कहानियां
  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain
    Kunwar Narayan
    190 171

    Item Code: #KGP-444

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।
  • Mere Saakshaatkaar : Vidya Sagar Nautiyal
    Vidya Sagar Nautiyal
    250 225

    Item Code: #KGP-635

    Availability: In stock


  • Shankar Shesh Ke Naatakon Mein Sangharsh Chetna
    Hemant Kukreti
    280 252

    Item Code: #KGP-9097

    Availability: In stock


  • Guleri Rachanawali (Two Vol.)
    Manohar Lal
    1600 1440

    Item Code: #KGP-02

    Availability: In stock

    पं. चंद्रधर  शर्मा गुलेरी उन महान् रचनाकारों और मनीषियों में अग्रगण्य हैं जिन्हें ‘हिंदी का निर्माता’ कहा जाता है। खड़ी बोली हिंदी के प्रारंभिक काल में गुलेरी ने कहानी और निबंध् सहित अनेक विधओं में संवेदना व शिल्प की बुनियाद तैयार की। लेखक, पत्रकार, विमर्शकार, अनुसंधनकर्ता और शास्त्राज्ञ आदि अनेक रूपों में गुलेरी ने भाषा और साहित्य को समृद्ध किया। 
    ‘गुलेरी रचनावली’ (दो खंड) कालजयी साहित्यकार 
    पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा विरचित साहित्य का प्रामाणिक संकलन है। डाॅ. मनोहर लाल ने अत्यंत परिश्रम, विद्वत्ता व निष्ठा के साथ इस रचनावली का संपादन किया है। इसमें कहानी, निबंध्, शोध्, पांडुलिपि विवरण, संस्मरण, साक्षात्कार, पौराणिक विवेचन, लोककला, राजनीति, धर्म, साहित्य समीक्षा, पत्रकारिता, काव्य, जीवन चरित, भूमिका लेखन, भाषा विवेचन, अनुसंधन, इतिहास, पुरातत्त्व, विज्ञान, ललित निबंध्, संपादकीय, पत्र साहित्य में निहित गुलेरी की रचनाओं को संजोया गया है। उनके व्यक्तित्व का विशद विवेचन है। उनके द्वारा संस्कृत और अंग्रेजी में लिखी रचनाएं हैं।
    गुलेरी इस बात के उदाहरण हैं कि किसी लेखक की केवल एक रचना उसे अमरत्व प्रदान कर सकती है। ‘उसने कहा था’ एक ऐसी अपूर्व अविस्मरणीय कहानी, जिसने भारतीय साहित्य में गुलेरी को अक्षय कीर्ति प्रदान की। अज्ञेय के शब्दों में, ‘गुलेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं, पर उन तीनों में से एक ऐसी सर्वांग सुंदर रचना हुई कि कोई भी कहानी संग्रह उसे लिए बिना प्रतिनिध्त्वि का दावा नहीं कर सकता।’ यह कहानी है ‘उसने कहा था।’ नामवर सिंह के अनुसार, ‘गुलेरी जी हिंदी में सिर्फ एक नया गद्य या नई शैली नहीं गढ़ रहे थे बल्कि वे वस्तुतः एक नई चेतना का निर्माण कर रहे थे।’ यह उल्लेखनीय है कि गुलेरी के ‘कछुआ धर्म’ और ‘मारेसि मोहि कुठाउं’ जैसे निबंध् भी अत्यंत प्रसिद्ध  हुए। भाषाविद् और प्राचीन साहित्य के अचूक मर्मज्ञ के रूप में गुलेरी अद्वितीय सि( हुए।
    स्वाभाविक है कि डाॅ. मनोहर लाल द्वारा सुसंपादित ‘गुलेरी रचनावली’ का ऐतिहासिक महत्त्व है। पाठक, आलोचक, शोध्कर्ता—सबके लिए संग्रहणीय। पुस्तकालयों को समृद्ध  करतीं ऐसी पुस्तकें ही राष्ट्रभाषा हिंदी की पहचान हैं।
  • Sant Ka Divya Sansaar
    Deep Shikha Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-1870

    Availability: In stock

    संत का दिव्य संसार
    पारलौकिक जगत् में विचरण करते भक्तों ने देखा-एक हरा-भरा प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त पर्वत-शिखर, जिस पर सूर्य-रश्मियां बिखरी पडी थीं, स्निग्ध पवन की स्निग्धता से विभोर पर्वत-शिखर परम शति में डूबा हुआ था ।
    उस शांत, एकांत, मानवीय पदचापों एवं कोलाहल से पूर्णत: मुक्त पर्वत के उत्तुंग शिखर पर एक जर्जर शरीर- धारी तपस्वी तपस्यारत था । स्वच्छ-सुगंधित-शीतल पवन उन्मुक्त हो बह रहा था । अवरोधरहित पवन तपस्वी के शरीर से टकरा तपस्वी को अपनी प्रशंसा करने के लिए बाध्य-सा करता प्रतीत हो रहा था ।
    किंतु, तपस्वी पवन के प्रफुल्लकारी स्पर्श से पूर्णत: प्रभावहीन था । उस पर पवन की स्निग्धता का, उसकी कोमलता का, उसकी प्रफुल्लता का और उसकी शीतलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था । वह पूर्णतया नि:संग था, तटस्थ था, निर्विकार था, अचल था, स्थिर था ।
    सूर्य-रशिमयों की गरिमामयी प्रखरता भी तपस्वी में किसी भी प्रकार का विक्षोभ उत्पन्न करने में असफल-सी जान पड़ रही थी । तपस्वी अविचल समाधिस्थ बैठा हुआ था ।
    तपस्वी की स्थिर अवस्था, तपस्वी के सैकडों वर्षों से निरंतर एक ही आसन में बैठे रहने का संकेत-सी करती प्रतीत हो रही थी । संभवत: तपस्वी सदियों से एक ही मुद्रा में, एक ही आसन में, एक ही स्थान पर बैठा प्रभु से एकात्म की स्थापना का प्रयास कर रहा था ।
    उसके मुखमंडल से झरती अपूर्व शांति उसके प्रयास की सफलता का जयघोष-सी करती प्रतीत हो रही थी । कदाचित् तपस्वी अपने प्रयास में सफल हो चुका था । तभी तो उसके मुखमंडल को चारों ओर से एक विशिष्ट आभा ने घेर रखा था । वह जितेन्द्रिय-सा लग रहा था ।
  • Chunauti
    Sudrashan Kumar Chetan
    150 135

    Item Code: #KGP-177

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdarash Mishra
    Ramdarash Mishra
    200 180

    Item Code: #KGP-766

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रामदरश मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमा', 'सड़क', 'एक औरत एक जिदगी', 'खँडहर की आवाज', 'मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’, 'निर्णयों के बीच एक निर्णय', 'मुर्दा मैदान', 'अकेला मकान', 'शेष यात्रा' तथा 'दिन के साथ' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Divangat Vriksh Ka Geet
    Jagmohan Singh Rajput
    125 113

    Item Code: #KGP-1568

    Availability: In stock

    दिवंगत वृक्ष का गीत
    जीवन के कई धु्रवांतों पर अपनी बौद्धिक उपस्थिति और प्रशासनिक दक्षता रेखांकित कर चुकने के बाद अकस्मात् एक अजनबी की तरह कविता के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति जताना, प्रत्येक उस भावाकुल मन की लाचारी होगी जो मानता हो कि जीवन न तो बुद्धि-व्यवसाय है, न ही कोरा भाव-विलास ही। कविता की कला को भी काव्य-विवेक की जरूरत पड़ती है जैसे कि भावावेगों के विस्फोट को जीवन-विवेक की। इन कविताओं में यह ‘विवेक’ साफ-साफ अनुभव किया जा सकता है।
    यथार्थ, शास्त्रीय यथार्थ, पंजीकृत और सूचीबद्ध यथार्थ के पार के यथार्थ का सीधा-सच्चा बयान करती ये कविताएँ उस संवेदनशील चित्त की देन हैं जो प्रत्येक पल सचेत और भाव- प्रखर रहा है। कविता अंततः भाव-प्रखरता ही तो है। व्यक्ति, समाज, समय और राजनीति का प्रति-अक्स रचती ये रचनाएँ उस कवि की कृतियाँ हैं, जो मूलतः सर्जक होकर भी अपने इस दावे की घोषणा नहीं ही करता रहा है। हिंदी कविता के पाठक ही तय करेंगे कि दावे का यह हक उसका बनता है या नहीं।
    मेरे भरोसे की ये कविताएँ उन जीवन-सत्यों और अनुभवों से लदी-फँदी हैं, जिन्हें तमाम जाने-पहचाने समकालीन कवियों ने औसत और मामूली समझकर दरकिनार कर दिया था। या फिर उनके देखने लायक अनुभव नहीं थे ये। जगमोहन सिंह राजपूत ने ज्यादातर मनमौज में आकर कहते-कहते कुछ ऐसा कह डाला है, जिसे कविता के सिवाय और कुछ भी कहना मुश्किल है। कहने में अपनी बेइंतहा सादगी, कथ्यों में असंदिग्ध भरोसेमंदी और रूपाकार में जानी-पहचानी नैसर्गिकता के चलते ये कविताएँ न तो वाम हैं, न दक्षिण। फिर भी, अगर कहना ही पड़े तो यही कि लोकपरकता ही इनका असली चरित्र है। भाषा, उसके मुहावरे और अभिव्यक्ति में भी ये उसी लोक की हैं जो किसी को भी अपने स्पर्श से कवि बना डालता है।
  • Adher Aayuwale
    Devendra Chaubey
    50 45

    Item Code: #KGP-9094

    Availability: In stock


  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta
    Dr. Kripa Shanker Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-162

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Hansbalaka
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    675 608

    Item Code: #KGP-882

    Availability: In stock

    हंसबलाका
    ‘हंसबलाका’ हिंदी संस्मरण साहित्य को आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की अन्यतम देन है। इसका प्रथम प्रकाशन 1982 ई. में हुआ था। प्रकाशित होने पर हिंदी समाज में इसका व्यापक स्वागत हुआ। प्रसाद, निराला, जैनेंद्र, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय आदि महान् लेखकों के जीवन और साहित्य को तथा स्वयं अपने जीवन को नए ढंग से देखने का यह प्रयास अपने तरह का अकेला है। यह मात्र संस्मरण की पुस्तक भर नहीं है। यहाँ हिंदी के सांस्कृतिक गद्य का ऐसा रूप है, जिसमें हमारी परंपरा और समय दोनों अपने सबसे उदात्त रूप में प्रस्तुत हुए हैं। इन संस्मरणों में प्राचीन भारत की गूँज-अनुगूँज तो है ही, आधुनिक सांस्कृतिक जगत् की यथार्थ चेतना भी है। ‘हंसबलाका’ के संस्मरणों से गुजरते हुए हम आलोच्य व्यक्ति को तो नए रूप में देखते ही हैं, अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी सर्वथा नए रूप में पाते हैं। बिना किसी दुविधा के कहा जा सकता है कि ‘हंसबलाका’ के प्रकाशन से हिंदी संस्मरण साहित्य का सबसे पुष्ट और प्रखर रूप सामने आता है। ‘हंसबलाका’ हिंदी संस्मरण साहित्य का सर्वोच्च शिखर है।
  • Hindi Vyakaran : Paaribhaasik Shabdkosh
    Ramraj Pal Dwivedi
    600 540

    Item Code: #KGP-2056

    Availability: In stock

    हिन्दी-व्याकरण : पारिभाषिक शब्दकोश
    हिन्दी की मानकता पर विचार बहुत विलम्ब से शुरू हुआ। दशकों तक एकाधिक हिन्दियाँ चलती रहीं। व्याकरण किस ‘हिन्दी’ के आधार पर बने, किसका नियमन करे, किससे उदाहरण ले, किस रूप की संस्तुति करे—यह तनाव उसे बरसों सालता रहा। छिटपुट अपवादों को छोड़ आज हिन्दी की मानकता प्रायः थिर हो चुकी है। हिन्दी-व्याकरण की पारिभाषिक शब्दावली भी एकरूपता एवं स्थैर्य की प्रक्रिया में है। शोधों एवं अन्तरभाषीय सम्बन्धों के परिणामस्वरूप नये-नये तथ्य एवं शब्द आ रहे हैं, पुराने छीज रहे हैं। शब्दशास्त्र का नियम ही है यह। प्रस्तुत ग्रंथ में स्थिर हो चुके एवं नवागत सभी शब्द दिए गए हैं। विवेचन में, यथासम्भव, बहुमान्य शब्द लिया गया है। मूल शब्द के साथ ही भेदोपभेद भी गिना दिए गए हैं; अन्यत्र उन भेदों-प्रभेदों को भी मूल शब्द की भाँति ही विवेचित किया गया है।
    प्रस्तुत कोश को अद्यतन बनाने के लिए हिन्दी-व्याकरण की परिधि के इधर-उधर मँडराते अनेकानेक पारिभाषिक शब्दों को प्रथम बार समेटने का प्रयास किया गया है। इस प्रकार निर्धारक, भाषाभेद, मात्रा, रंजक क्रिया, विरामचिन्ह (मुख्यतः योजक चिन्ह), व्याकरणिक कोटियाँ, शून्य प्रत्यय, हिन्दी अक्षर, हिन्दी ध्वनियाँ आदि हिन्दी-व्याकरण के अनिवार्य अंग, जो अब तक दूर-दूर छिटके पड़े थे, कोश की सीमा का आदर करते हुए, एक ही जगह विवेचित किए गए हैं। हिन्दी में यह पहली बार हुआ है जो इस ‘कोश’ का वैशेष्य है।
  • Maheep Singh Rachana-Sanchayan
    Mahip Singh
    695 626

    Item Code: #KGP-718

    Availability: In stock


  • Swasthya Gyan
    Dr. Rakesh Singh
    190 171

    Item Code: #KGP-722

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य-ज्ञान
    पुस्तक में स्वास्थ्य से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर लगभग  35 लेख संकलित हैं । जो लोग यह कहते  हैं की चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम में ही पढाया जा सकता हैं, उनके लिए वे लेख चुनौती है और सिद्ध करते है कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा कै। उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को  माध्यम से पढाया जा सकता है । 
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है । इन लेखों में अधिकांशतः इस बात को ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग  दवाओं का नाय याद कर लेते है और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते है । उससे कितनी हानि हो सकती है, यह 'दवाओ के उपयोग में सावधानियाँ' शीर्षक से स्पष्ट हैं । इसी प्रक्रार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारना से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है । 'ह्रदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हदय- रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है । इसमें अधुनातन  चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है । अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-सम्पन्न है । कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्य एवं उनके सफल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतिक है ।
  • Sharat Ka Katha Sahitya
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    595 536

    Item Code: #KGP-889

    Availability: In stock

    बाँग्ला के अमर कथाशिल्पी शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में पढ़े जाने वाले शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनके कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में भी हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उसके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की। सम्भवतः वह अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फिल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी। ‘देवदास’, ‘चरित्रहीन’ और ‘श्रीकान्त’ के साथ तो यह बारम्बार घटित हुआ है। 
    अपने विपुल लेखन के माध्यम से शरत् बाबू ने मनुष्य को उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित ‘परम्पराओं’ को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की बिलख-चीख और आर्तनाद को उन्होंने परखा तथा गहरे पैठकर यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। इस षड्यन्त्र के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक ‘आम सहमति’ पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों-करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्रण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। 
    हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। हमारा प्रयास रहेगा कि किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और प्रकाश्य शरत्-साहित्य को सर्वांग तथा सर्वश्रेष्ठ होने का प्रमाणपत्र आप जैसे सुधी
  • Toro Kara Toro-3 (Parivrajak)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #Kgp-1575

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar
    Kamal Kumar
    230 207

    Item Code: #KGP-688

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Asghar Wajahat Ke Aath Naatak
    Asghar Wajahat
    450 405

    Item Code: #KGP-9001

    Availability: In stock


  • Vichaar-Yaatra : Lal Krishna Advani
    Lal Krishna Advani
    245 221

    Item Code: #KGP-860

    Availability: In stock


  • Jo Nahin Hai
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-1899

    Availability: In stock

    जो नहीं है
    यह मृत्यु और अनुपस्थिति की एक अद्वितीय पुस्तक है । राग और विराग का पारंपरिक द्वैत यहाँ समाप्त है । अवसाद और आसक्ति पडोसी है । यह जीवन से विरक्ति की नहीं, अनुरक्ति की पोथी है ।  मृत्यु मनुष्य का एक चिरन्तन सरोकार है और चूँकि कविता मनुष्य के बुनियादी सरोकारों को हर समय में खोज़ती-सहेजतो है, वह आदिकाल से एक स्थायी कवियमय भी है ।   विचार- शीलता और गहरी ऐन्द्रियता के साथ अशोक वाजपेयी ने  अपनी कविता में वह एकान्त खोजा-रचा है जिसमें मनुष्य का यह चरम प्रश्न हमारे समय के अनुरूप सघन मार्मिकता और बेचैनी के साथ विन्यस्त हुआ है
    यहाँ मृत्यु या अनुपस्थिति कोई दार्शनिक प्रत्यय न होकर उपस्थिति है । वह नश्वरता की ठोस सचाई का अधिग्रहण करते हुए अनश्वरता का सपना देखने वाली कविता है-अपने गहरे अवसाद के बावजूद वह जीने से विरत नहीं करती । बल्कि उस पर मँडराती नश्वरता की छाया जीने की प्रक्रिया को अधिक समुत्सुक और उत्कट करती चलती है
    दैनन्दिन जीवन से लेकर भारतीय मिथ के अनेक बिम्बो और छवियों को अशोक वाजपेयी ने मृत्यु को समझने-सहने  की युक्तियों के रूप में इस्तेमाल किया है । उनकी गीति-सम्वेदना यहाँ महाकाव्यात्मक आकाश को चरितार्थ करती है और उन्हें फिर एक रूढ हो गये द्वैत से अलग एक संग्रथित और परिपक्व कवि सिद्ध करती है
    यहीं किसी तरह की बेझिलता और दुर्बोधता नहीं, पारदर्शी लेकिन ऐंद्रिक चिंतन है, कविता सोचती-विचारती है पर अपनी ही ऐंद्रिक प्रक्रिया से । 
  • Baitaal Suno
    Rajendra Tyagi
    250 225

    Item Code: #KGP-123

    Availability: In stock

    बैताल सुनो 
    'बैताल सुनो' की रचनाओं का इतिहास भी अजीब है । अच्छी हास्य-रचनाएँ पाठकों को पढ़ने को मिलें, इस दृष्टि से मैंने इन्हें 'कादम्बिनी' में विशेष रूप से लिखना शुरु किया। एक संपादक के नाते मैं नहीं चाहता था कि मेरे नाम से कई रचनाएँ एक अंक में प्रकाशित हो । फिर मेरे लेखन की दृष्टि पाठकों के लिए अलग है । चाहे वे कहानियां हों अथवा 'कालचिंतन' जैसा विशिष्ट दार्शनिक स्तंभ या फिर 'आखिर कब तक' या 'समय के हस्ताक्षर' ये सब एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं । एक स्तंभ चिंतन के लिए है तो दूसरा राजनीतिक और सामाजिक अभिव्यक्ति के लिए ।
    एक गंभीर लेखक हास्य-व्यंग्य की रचनाएं भी बहुत सटीक ढंग से लिख सकता है, पाठकों के लिए यह आश्चर्य का विषय होगा । ऐसी स्थिति में, मैं यानी राजेन्द्र अवस्थी हास्य-व्यंग्य की दुनिया से जाकर 'सेवकराम ओखाडू' बन गया ।
    तो इन्हीं 'सेवकराम ओखाडू' की हास्य-रचनाएँ है इस संग्रह में ।

  • Gulaha- E- Parishaan
    A.M. Nayar
    395 356

    Item Code: #KGP-76

    Availability: In stock

    गुलहा-ए-परीशाँ 
    एक जमाने में हर पढ़ा-लिखा काव्य-प्रेमी अच्छे-अच्छे और पसंदीदा अशआर को एक बयाज (संग्रह) रखता था, जिसमें दर्ज शेर जिंदगी की कशमकश, प्रतिकूल परिस्थितियों, सुख और दु:ख  क्षणों में उसे याद आते थे और उनको दोहराकर वह अपना दु:ख घटाता या सुख में वृद्धि कर लेता था ।  आज का जीवन व्यस्ततर है और हर व्यक्ति अस्तित्व के संघर्ष में ऐसा गूँथा हुआ है कि जिंदगी की लताफ़त अब उसे आकर्षित नहीं कर पाती । ऐसे में यदि काव्य-सागर के मंथन से निकले कुछ काव्य-रत्न उसे दिए जाएं तो वह अपनी जिंदगी को कटुता और वेदना में कुछ कमी महसूस कर सकता है । इसी विचार से प्रस्तुत संकलन में तीन सौ से अधिक विषयों पर कहे गए शेर एकत्रित किए गए हैं, जिनके साथ हमारे जीवन के अनेकानेक अनुभव जुड़े हुए हैं और यह कोशिश की गई है कि तवज्जो शाइर के नाम पर नहीं, उसके द्वारा किसी विषय विशेष पर रचे हुए शेर पर ही दी गयी है ।  शेर के चयन में रदीफ-क्राफिया, कल्पना-शक्ति, उपमा-अलंकार पर इतना बल नहीं दिया गया है, जितना शाइर की आत्मा की व्याकुलता या उसकी मनोदशा की तीव्रता को मद्देनजर रखा गया है।
    उर्दू के सभी या अधिकतर शाइरों के प्रतिनिधि शेरों का यह संकलन अपने में एक अनूठा प्रयास है, जिसका हिंदी जगत् में निश्चय ही स्वागत किया जाएगा ।
  • Bhartiya Naitik Shiksha : 1
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-264

    Availability: In stock

    हम सभी इस बात से सहमत है कि समाज में गिरते हुए नैतिक मूल्य देश को, समाज को तथा संस्कृति को खोखला कर रहे हैं । प्राथमिक विद्यालय के छात्रों से लेकर उच्च महाविद्यालय के छात्रों में अनुशासनहीनता दृष्टिगोचर हो रही है। यह अनुशासनहीनता राष्ट्रीय स्तर पर भी यत्र-तत्र देखने को मिल रही है इसका एकमात्र कारण है--शिक्षण कार्य में नैतिक शिक्षा की उपेक्षा।
    भारत एक सांस्कृतिक देश है । यहाँ पर सभी धर्मों का आदर किया जाता है, अत: बालक के सर्वांगीण विकास के लिए परिवार, विद्यालय तथा समाज तीनो को अपना दायित्व संभालना होगा। बालक केवल परिवार का सदस्य नहीं है, वरन् उसे एक उत्तरदायी नागरिक भी बनना है। यदि शिक्षा और शिक्षक ने उसे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, अधिकारी, लिपिक, नेता, श्रमिक बनाकर अपनी भूमिका को पूर्ण मान लिया तो यह एक बहुत बडी त्रुटि होगी। शिक्षा की भूमिया तभी पूर्ण होगी, जब हम नैतिक शिक्षा के माध्यम से बालकों को उचित-अनुचित, अच्छा-बुरा का ज्ञान दे सकें और यह अनुभव करा सकें कि श्रम के कमाए हुए धन का मूल्य भ्रष्टाचार से प्राप्त धन की अपेक्षा कई गुना अधिक है।
    प्रस्तुत पुस्तक इस बात का प्रयास है कि बालक में परिवर्तन ताने के लिए ऐसी विषयवस्तु संकलित की जाए जो उसके नैतिक एवं चारित्रिक विकास में सहायक हो । यह तभी संभव है जब इस विषयवस्तु को बौद्धिक कसरत के रूप में न रखकर जीवन की सार्थकता के रूप में रखा जाए । जैसे जलता हुआ दिया ही दूसरे दीये को जलाता है, वैसे ही प्रखर नैतिक जीवन ही नैतिकता का संचार कर सकता है। अत: नैतिक शिक्षण की प्रभावी परियोजना तैयार कर शिक्षक-बंधु इसका शिक्षण करें।
  • Shaayad Vasant
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    100 90

    Item Code: #KGP-1920

    Availability: In stock

    शायद बसंत
    उत्तर कोरिया सामाजिक या आर्थिक रूप में एक बहुख्यात देश तो नहीं है, लेकिन उसकी राजनीति और व्यवस्था की अपनी पहचान है । जापानी और अमेरिकी सामरिक शक्तियों के विरुद्ध रक्तिम संघर्षों ने उस देश को जख्मी जरूर किया है, लेकिन वहाँ अब स्थापित है आत्मविश्वास से भरपूर एक प्रगतिशील राष्ट्र । वहाँ सामान्य रूप में पर्यटकों के जाने को अनुमति अवश्य नहीं है, किंतु मित्र देशों के कुछ बुद्धिजीवी समय-ममय पर आमंत्रित किए जाते रहे है । ऐसे ही एक अवसर पर कवि-कथाकार प्रणवकुमार वंद्योपाथ्याय उत्तर कोरिया  की यात्रा पर जाकर वहाँ के पहाडों, दर्रों, नगरों और गाँवों में घूमते रहे । उस यात्रा की साहित्यिक फसल है शायद वसंत, जो अनौपचारिक डायरी के पन्नों से निकलकर अब प्रस्तुत है एक पुस्तक के रूप में ।
    उत्तर कोरिया पर हिंदी में यह पहली पुस्तक है, जो पाठकों को उस देश की भूमि, पहाड़, समुन्द्र और मनुष्य की आंतरिक बनावट से एक अगम्य अनुभव के साथ परिचित कराती है ।
  • Desh-Videsh Ki Lokkathayen
    Vishv Nath Gupta
    250 225

    Item Code: #KGP-122

    Availability: In stock

    पाठकों से
    प्रस्तुत पुस्तक में दुनिया के देशों की लोककथाएँ संगृहीत हैं । पुस्तक अत्यंत उपयोगी है-केवल बच्चों के लिए ही नहीं बल्कि बड़ों के लिए भी ।
    लोककथाओं की रचना कोई व्यक्ति नहीं करता बल्कि तत्संबंधी देश की धरती से जुडे हुए रीति-रिवाज, सामाजिक- आर्थिक व्यवस्थाएं और वहां के लोगों का चिंतन करता है । लोककथाएँ शनै:-शनै: विकसित होती हैं-गढ़ी जाती हैं ।
    अगर ध्यान से पढा जाए तो एक लोककथा में उसका पूरा देश और समाज बोलता है ।
    इन तमाम दृष्टियों से प्रस्तुत लोककथा-संग्रह एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है ।
    -विश्वनाय गुप्त
  • Main Sadiyon Ki Pyaas
    Naresh Shandilya
    125 113

    Item Code: #KGP-1918

    Availability: In stock

    नरेश शांडिल्य और उसकी ग़ज़लों से मेरी शनासाई पिछले कुछ वर्षों से है, लेकिन बहुत पुरानी लगती है । मैंने जब-जब उसकी गज़लें पढ़ीं या सुनी, कुछ न कुछ-शे'र जरूर जी को लगे ।
    नरेश शांडिल्य ग़ज़ल-विधा और उसकी नजाकतों से खूब वाकिफ़ है । यह न केवल विभिन्न बहरों और रदीफ़-काफियों का अच्छा ज्ञान रखता है बल्कि शब्दों का भी मिजाज आश्ना है । वह अपने जज़्बात और अहसासात को अशआर के पेराए में अभिव्यक्त करने का गुर जानता है । उसकी ग़ज़लों से व्यक्ति, समाज और समय हाथ में हाथ लिए साथ-साथ चलते नजर जाते हैं ।
    मैं सदियों की प्यास नरेश शांडिल्य की ताजा ग़ज़लों  का संकलन है । मुझे यकीन है कि हिन्दी ग़ज़लों के शैदाई  इसे मुद्दतों याद रखेंगे ।
    -प्रोफेसर सादिक
    उर्दू विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
  • Dharm Ke Aar-Paar Aurat
    Neelam Kulshreshtha
    450 405

    Item Code: #KGP-310

    Availability: In stock

    धर्म के आर-पार औरत
    मानव जीवन के लिए धार्मिक आस्था व संस्कार दोनों आवश्यक हैं। स्त्रियाँ धर्म के पाखंडी व शोषक स्वरूप का विभिन्न माध्यमों से ज़ोर-शोर से विरोध कर रही हैं। इस पुस्तक में पढ़िए:
    अधिकतर धर्म कैसे पोषित होता है?
    प्रख्यात लेखिका तसलीमा नसरीन ने क्यों कहा है, ‘कुरान शुड बी रिवाइज़्ड?’
    समाज में वर्गभेद का आधार पौराणिक पृष्ठभूमि भी है। क्या उसका आधुनिकीकरण आवश्यक है?
    गीता के दसवें अध्याय में स्त्री में अपनी सात विभूतियों की चर्चा करने वाले कृष्ण स्वयं क्या थे?
    सती के चैरों व मेलों पर क्यों प्रतिबंध लगना चाहिए? लड़कियों को कैसी पुस्तकें पढ़नी चाहिए?
    दक्षिण भारत में स्त्री के गले में पहना एक पोटु (पेंडेंट) वाला मंगलसूत्र उसके शरीर तक जाने का रास्ता था।
    जैन धर्म में भी माना गया है कि पूर्वजन्म में जो कुछ बुरे कार्य करता है, वही स्त्री के रूप में पैदा होता है।
    परिवार को त्यागकर मोक्ष की चाह में भटकना अधिक कठिन है या गृहस्थी का संचालन करना?
    दुनिया को अपनी दृष्टि से देखती स्त्री क्यों स्वीकार करे पौराणिक स्त्री-चरित्रों जैसी नियति?
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar
    Ajit Kumar
    160 144

    Item Code: #KGP-419

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'अपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Robin Shaw Pushp
    Robin Shaw Pushp
    150 135

    Item Code: #KGP-2081

    Availability: In stock


  • Raashtra Aur Musalman
    Nasera Sharma
    350 315

    Item Code: #KGP-172

    Availability: In stock

    समय की छाती पर खड़ा मुसलमान आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। ‘मुसलमानों’ को लेकर इतना कुछ कहा जा रहा है कि स्वयं मुसलमान भी इस चर्चित मुसलमान के बारे में नई-नई सूचनाएं सुनने की जिज्ञासा रोक नहीं पाता है।
    वह क्या है? वह कौन था? उसका भविष्य क्या होगा? इस विषय पर वार्तालाप के द्वारा अनेक नए-नए नजरिए, खबरें और ऐतिहासिक पृष्ठीाूमि की पर्तें रोज सामने लाई जा रही हैं। बहुत कुछ छप रहा है।
    इस किताब में मुसलमान एक आम आदमी की तरह अपनी खूबी और कमजोरी के साथ मौजूद है। वह स्वयं अपनी बात कहने में सक्षम हे, इसलिए वह किसी बड़े नाम के सहारे या धार्मिक नेताओं के बल पर आगे नहीं बढ़ता है। 
    जो सच है, वह सामने है। उसको स्वीकार करना या न करना पढ़ने वालों की अपनी दृष्टि एवं सामाजिक अवलोकन पर निर्भर है। 
  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    595 476

    Item Code: #KGP-1985

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे।
  • Meri Romanchak Satyakathayen
    Kaviraj Om Prakash
    250 225

    Item Code: #KGP-648

    Availability: In stock

    मेरी रोमांचक सत्य-कथाएँ
    इस संग्रह की कहानियों के कथानक वर्तमान काल के अलावा वैदिक और पौराणिक काल के भी हैं और भारत के विभाजन से पहले के भी है । कई कहानियाँ साधु-संतों, महात्माओं और नाग आदि  देवी-देवताओं के संबंध में भी है । इनसे पता चलता है कि कविराज को भारतीय इतिहास, संस्कृति और जनजीवन की व्यापक और सही जानकारी है । यह भी पता चलता है कि वे आस्थावान हैं और भारतीय संस्कृति से बड़ी गहराई से जुडे हुए है । हस संग्रह की कहानियां कला की दृष्टि है भी उच्चकोटि की है । प्रत्येक कहानी का कथानक, विषयवस्तु और चरित्र-चित्रण मार्मिक एवं आकर्षक है । प्रत्येक कहानी  रोचक है, पाठक के मन को बाँधने वाली है और अच्छी शिक्षा देने वाली है ।
  • Yathartha Se Samvad
    B.L. Gaur
    400 360

    Item Code: #KGP-449

    Availability: In stock

    बेख़ौफ अंगारे
    साहित्य को अब रास नहीं आता निरा रस 
    उससे भी ज़रूरी है कलमकार में साहस 
    ये काम अदब का है–अदब करना सिखाए 
    उनको जो बनाए हैं हरिक काम को सरकस
    दम घुट रहा अवाम का, फनकार बचा लो
    सब मूल्य तिरोहित हुए, दो-चार बचा लो
    सच्चे की शुबां पर हैं जहां शुल्म के ताले
    हर ओर लगा झूठ का दरबार, बचा लो
    संपादकीय ऐसे हैं ऐ दोस्त, तुम्हारे
    जैसे अंधेरी रात में दो-चार सितारे
    गुणगान में सत्ता के जहां रत हैं सुखनवर
    तुम ढाल रहे शब्द में बेख़ौफ अंगारे
    मैं ख़ुश हूं बड़े यत्न से धन, तुमने कमाया
    उससे भी अधिक ख़ुश हूं कि फन तुमने कमाया
    मेरी ये दुआ है कि सलामत रहो बरसों
    सदियों रहे ज़िंदा जो सृजन तुमने कमाया।
    —बालस्वरूप राही

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hridayesh
    Hridyesh
    200 180

    Item Code: #KGP-90

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार हृदयेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'खेत', 'जो भटक रहे हैं', 'कोई एक दूसरा', 'मृगया', 'जीवन राग', 'उसकी कहानी', 'जहर', 'मनु', 'पूँजी'  तथा 'सत्तर पार का वह बूढ़ा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक हृदयेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Sahitya Vimarsh
    Jayanti Prasad Nautiyal
    195 176

    Item Code: #KGP-9098

    Availability: In stock


  • Vriksh Tha Hara-Bhara
    Surendra Tiwari
    150 135

    Item Code: #KGP-1886

    Availability: In stock

    सुश्री ममता किरण के कविता-संग्रह ‘वृक्ष था हरा-भरा’ की टंकित प्रति देख गया। उनकी कविताओं से यह मेरा पहला परिचय था। पहला प्रभाव यह पड़ा मेरे मन पर कि प्रचलित लोकप्रिय कविता और सुपरिचित समकालीन कविता के बीच से एक रास्ता निकालने की कोशिश इनके यहाँ दिखाई पड़ती है। यह कोशिश दिलचस्प है और इसलिए सहज पठनीय भी। यहाँ दो प्रकार की कविताएँ देखने को मिलीं। एक जो बाकायदे गीत की शैली में लिखी गई हैं और दूसरी वे जो मुक्त छंद को माध्यम बनाकर लिखी गई हैं।
    इस संग्रह में जहाँ जाकर मैं रुका, वह ‘संबोधन’ शीर्षक कविता थी, जिसमें ये पंक्तियाँ आती हैं--
    कंक्रीट के इस जंगल में
    एकदम अप्रत्याशित
    एक बुजुर्ग से अपने लिए
    बहूरानी संबोधन सुनकर
    जिस तरह मैं चौंकी
    उसी तरह अनायास
    श्रद्धा से झुक भी गई
    बहूरानी कहने वाले के सामने
    इन पंक्तियों में एक मानवीय संस्पर्श है जो अच्छा लगता है। कहीं-कहीं एक शुभाकांक्षा की प्रतिध्वनि भी सुनाई पड़ती है कुछ पंक्तियों में और शायद इस रचनकर्त्री की कविता का मूल स्वर भी यही है। अपने अस्तित्व से नदियों-पोखरों और झीलों को भर देने के आवेग के साथ-साथ ‘प्यार का पैगाम’ बन जाने और ‘बुझे चूल्हों की आँच’ बन जाने की स्त्रीसुलभ संवेदना भी यहाँ दिखाई पड़ सकती है। अपने इसी मूल स्वर के कारण यह संग्रह प्रेमी पाठकों तक पहुँचेगा, ऐसा मुझे लगता है।
    ---केदारनाथ सिंह
  • In Dinon
    Vinita Gupta
    60

    Item Code: #KGP-1909

    Availability: In stock

    इन दिनों
    ग़ज़लों में छन्द का अनुशासन काकी दूर तक दिखाई देता है । इसके साथ-साथ ग़ज़ल के मुहावरे, व्याकरण, अंदाज़े-बयां, भाषा और विभिन्न बहरों को भी अपने जीवनानुभव तथा अभ्यास से उपलब्ध करने की सफ़ल कोशिश है । ग़ज़लों में एक ओर व्यक्तिगत अनुभूतियों तथा राग-विराग की स्थितियों के प्रस्तुति है तो दूसरी ओर समष्टिगत वेदनाएं, व्यथाएँ भी अंकित हुई हैं। विनीता के पास हिन्दी मुहावरे और शब्दावली का भण्डार तो है ही, उर्दू का रंग भी देखने को मिलता है । हिंदी, उर्दू के सहीं अनुपात ने इन ग़ज़लों को और भी निखार दिया है ।
  • Sabha Parv
    Badiuzamma
    300 270

    Item Code: #KGP-2040

    Availability: In stock

    सभापर्व 
    जो कहानी महाभारत के 'सभापर्व' से शुरू हुई वह आज भी पूरी नहीं हुई । छोटे-से शहर गया के एक मोहल्ले से शुरू होकर ये उपन्यास इतिहास का सैकडों साल का सफर तय करता है-वह इतिहास जो न चाहते हुए भी हममें जिदा है और हमारे दिले-दिमाग पर हावी है ; वह इतिहास जो बजाहिर तो बदलता है लेकिन दरअसल सिर्फ अपने-आप को दोहराता है । सतह के नीचे सब कुछ वैसा ही रहता है जैसा कि था । धर्म बदले, सिद्धान्त बदले, सत्ता के लिए जद्दोजहद के तरीके बदले लेकिन सत्ता का बुनियादी स्वरूप नही बदला । बनी हाशिम-बनी उमय्या; शीया-सुन्नी, हिन्दू-मुस्लिम, बौद्धधर्म-ब्राह्यणवाद…संघर्ष के मुखोटे बदलते रहते हैं, इंसानी प्रवृत्ति नहीं बदलती । सैकडों साल के सफ़र के दौरान ये उपन्यास समाज के विभिन्न वर्गों का एक जायजा लेता है । घर, कबीले और मुल्क के नक़्शे, और इंसानी ताल्लुकात का बनना- बिगडना न बदलने वाली मानसिकता की पहचान है । यह ऐसी मानसिकता है जिससे हजार साल की नफ़रत, लगाव, तजूर्बात परत-दर-परत जिन्दा हैं ।  इसमें श्रीकृष्ण के कालिय दमन, महात्मा बुद्ध की धर्म विजय और सूफियों के चमत्कार-सब की याद बाकी है । 'सभापर्व' इसी मानसिकता की खोज और पहचान है ।
  • Vichardhara Naye Vimarsh Aur Samkaleen Kavita
    Jitendra Shrivastva
    500 450

    Item Code: #KGP-831

    Availability: In stock

    विचारधरा, नए विमर्श और समकालीन कविता
    इन दिनों भारतीय समाज अनेक संकटों से जूझ रहा है। आज समाज, राजनीति, साहित्य और नैतिकता को परिभाषित करने के लिए नवाचार की गंभीर जरूरत है। ऐसे में जितेन्द्र श्रीवास्तव का आलोचना-कर्म उफधर्वता और मूलगतता, दोनों ही स्तरों पर समकालीन प्रश्नों से सक्रिय व उफर्जस्वित मुठभेड़ करता है और वास्तविकता में इस कार्य की परिणति साहित्य की इयत्ता खोजने में होती है। संक्रमण के इस भयावह युग में जितेन्द्र अपने आलोचना-कर्म के माध्यम से उफधर्वता में कवियों के मूल्यांकन के साथ नई विचारधाराओं और विमर्शों के अंतर्द्वद्वों को चिन्हित करते हैं, तो दूसरी ओर अपनी मूलगामिता में साहित्य को नए मूल्यों और मौजूदा संकटों की धार पर परिभाषित भी करते हैं।
    कभी संकट और संशय के वक्त में निराला से लेकर मुक्तिबोध तक और विजयदेवनारायण साही से लेकर अस्सी के दशक तक हमारी भाषा के महत्त्वपूर्ण कवियों ने आलोचना-कर्म के लिए कलम उठाई थी। जितेन्द्र श्रीवास्तव का आलोचना-कर्म इसी परंपरा का विस्तार है। जितेन्द्र की आलोचना एक अच्छी कविता की तरह आत्मा की त्वचा का स्पर्श करती है। उसमें विद्वत्ता के प्रदर्शन की कहीं कोई अभिलाषा नहीं है। कह सकते हैं कि सृजन- विरोधी समय में यह सृजनधर्मी आलोचना का प्राणवान और विनम्र उदाहरण है। जितेन्द्र अपनी आलोचना में ‘रचना की अद्वितीयता’ का संधन करते हैं। वे ऊपर- झापर करके आगे बढ़ जाने वाले आलोचकों में नहीं हैं। रचना का गहन उत्खनन उनका अभीष्ट है।
    यहां यह कहने में कोई दुविध नहीं है कि यह पुस्तक काव्यालोचना के क्षेत्र में छाए हुए सन्नाटे को भंग करते हुए एक बड़ी कमी को पूरा करती है।
  • Bhartiya Naitik Shiksha : 3
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-265

    Availability: In stock

    पिछले कुछ वर्षों से शैक्षिक पाठ्यचर्या में नैतिक शिक्षा की आवश्यकता को अनुभव करते हुए कुछ शासकीय/अशासकीय संस्थाओं में इसके शिक्षण हेतु प्रयास किए जा रहे हैं, किंतु इसके प्रभावी परिणाम सामने नहीं आ पा रहे हैँ। देश तथा विश्व के महान् शिक्षकों-अरस्तू विवेकानन्द, अरविन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर , महात्मा गांधी आदि ने शिक्षा के इस पक्ष को व्यावहारिक आचरण के रूप से प्रस्तुत करने पर बल दिया है क्योकि किसी पर थोपे गए आचरण अथवा इस विषय की लिखित परीक्षा में पाए गए अधिकतम अड्डों से नैतिकता तथा आध्यात्मिकता का पाठ नहीं पढाया जा सकता।
    अत: शिक्षक को ही शिक्षा की धुरी होने के नाते अपने शिक्षण विषय के साथ-साथ इस विषय को उपदेशात्मक शैली में न पढाकर व्यावहारिक रूप से प्रस्तुत करना चाहिए ताकि बालकों को जीवन के विभिन्न सन्दभों में उपस्थित समस्याओं को हल करने में यह प्रभावी सिद्ध हो सके। शिक्षकगण यह भी ध्यान रखें कि आज के युवक में समस्याओं का क्षेत्र उतना ही व्यापक होता जा रहा है, जितना जीवन का मापदण्ड। 
    प्राचीन भारतीय साहित्य में नैतिकता तथा आध्यात्मिकता सम्बन्धित ज्ञान का भण्डार भरा पडा है । यदि हम बालकों के उस साहित्य को पढने के प्रति रुचि भी उत्पन्न कर दें, तो उन्हें इतनी समझ आ जाएगी कि अनैतिक एवं असंयमी व्यवहार करके हम मानवता को सुख और शान्ति का संदेश नहीं दे सकते।
    प्रस्तुत पुस्तक इसी दृष्टि से तैयार की गई है । आशा है, नैतिक शिक्षा के विभिन्न पहलुओं क्रो विविध संदभों में समझकर बालकों में निश्चित परिवर्तन होगा।
  • Tumhare Liye
    Himanshu Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-2030

    Availability: In stock

    तुम्हारे लिए
    आग की नदी!
    नहीं, नहीं, यह दर्द का दरिया भी है, मौन-मंथर गति से निरंतर प्रवाहित होता हुआ ।
    यह दो निश्छल, निरीह उगते तरुणों की सुकोमल स्नेह-गाथा ही नहीं, उभरते जीवन का स्वप्निल कटु यथार्थ भी है कहीं । वह यथार्थ, जो समय के विपरीत चलता हुआ भी, समय के साथ-साथ, समय का सच प्रस्तुत करता है ।
    मेहा-विराग यानी विराग-मेहा का पारदर्शी, निर्मल स्नेह इस कथा की भावभूमि बनकर, अनायास यह यक्ष-प्रश्न प्रस्तुत करता है-प्रणय क्या है? जीवन क्या है ? जीवन की सार्थकता किसमें है ? किसलिए ?
    ० 
    बहुआयामी इस जीवंत मर्मस्पर्शी कथा में अनेक कथाधाराएँ हैं। अनेक रूप हैं, अनेक रंग। पर ऐसा क्या है इसमें कि हर पाठक को इसके दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब दीखने लगता है ?
    ० 
    हिंदी के बहुचर्चित उपन्यासों में, बहुचर्चित इस उपन्यास के अनेक संस्करण हूए । मराठी, पंजाबी, कन्नड़, तमिल, उर्दू, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं में अनुवाद भी । दूरदर्शन से धारावाहिक रूप में प्रसारण भी हुआ । ब्रिटेन की एक कंपनी ने आडियो कैसेट भी तैयार किया, जो लाखों श्रोताओं द्वारा सराहा गया ।
  • Kabir Ka Samagra Anbhai Sansar (1st Part)
    Govind Rajnish
    1000 900

    Item Code: #KGP-689

    Availability: In stock

    संत कबीर भारतीय चेतना का ऐसा शिखर है जिसके सम्मुख शब्द और शब्दातीत नतमस्तक होते हैं। उनकी बानी ‘अनहद का अनुभव’ है। ऐसा अनुभव; जिसमें जीव, जगत् और परमात्मा की सघन अभिव्यक्ति है। कबीर की बानी साखी, सबद, रमैनी के अंतर्गत रखकर पढ़ने व विश्लेषित करने की सुदीर्घ परंपरा है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ में मर्मज्ञ आलोचक प्रो. गोविंद रजनीश ने इस परंपरा को संवधिर्त किया है।
    कबीर-काव्य के तीन स्रोत हैं—राजस्थानी, पंजाबी और पूरबी की प्राचीन पांडुलिपियाँ। इनके तुलनात्मक विवेचन द्वारा मूल व प्रामाणिक पाठ तक पैठने का यत्न किया गया है। कबीर के नाम से प्रचलित ‘बानियों’ और ‘क्षेपकों’ का तार्किक परीक्षण किया गया है। इससे कबीर-काव्य का आस्वाद दुगुना हो गया, ऐसा पाठक महसूस करेंगे।
    प्रो. रजनीश ने भावार्थ, पाठांतर और टिप्पणी के द्वारा कबीर के अनेक आयामों को उद्घाटित किया है। कबीर लोक में समाए संत-कवि हैं। उनसे संबंधित बहुतेरे तथ्य दंतकथाओं, जनश्रुतियों और अन्य शब्द-प्रपंच में ओझल होते रहे हैं। यहाँ एक प्रयास यह भी है कि ‘चिनगी’ को ‘राख’ से निकाल लिया जाए। तभी यह सिद्ध हो सका कि कबीर-काव्य समकालीन संदर्भों में एक नयी प्रासंगिकता अर्जित कर रहा है। झूठ, कपट, पाखंड के खिलाफ सदियों पहले गूँजे शब्द आज भी चुनौती और चेतावनी दे रहे हैं।
    ‘संसकिरत है कूप जल भाखा बहता नीर’ ऐसा कहने वाले कबीर की अंतरात्मा को थाहना बेहद कठिन रहा है। ‘ढाई आखर’ के बल पर पंडिताई को ललकारने वाले कालजयी कबीर के प्रामाणिक पाठ को अर्थ-विस्तार से पढ़कर पाठक निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे। शोध्कर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध पाठकों तक समानरूपेण उपयोगी। मानव जीवन के उन्नयन व परिष्कार के साथ भक्ति और अध्यात्म की रश्मियाँ बिखेरती कबीर बानी को विद्वान् लेखक ने ‘पुनः पाठ की सार्थकता’ प्रदान की है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ वस्तुतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    1200 1080

    Item Code: #KGP-607

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खण्डों में)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है।
  • Ramcharitmanas Sandarbha Samagra
    Lalit Shukla
    325 293

    Item Code: #KGP-238

    Availability: In stock

    रामचरितमानस संदर्भ समग्र
    ‘रामचरितमानस’ गोस्वामी तुलसीदास की अमर एवं अद्वितीय कृति है। प्रबंध-काव्य के गुणों से ओतप्रोत यह प्रस्तुति भारतीय संस्कृति और मानवोचित लोकानुभव की संदेशवाहिका बनी हुई है। यह अनेक प्रचलित और गूढ़ संदर्भों से युक्त है। इस रचना से उन्हीं संदर्भों को व्याख्यायित और सरलीकृत करने का प्रयत्न किया गया है। 
    हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि इस प्रस्तुति से ‘रामचरितमानस’ के अनुरागियों और अध्येताओं  को कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। लोकभाषा अवधी और देवभाषा संस्कृत के अनेक मार्मिक संदर्भों का सरल रूप यहाँ दिया गया है। 
    यह कृति न तो टीका है और न कोश है। यह अपनी पृथक् शैली की प्रस्तुति है, जो हिंदी और ‘मानस के पाठकों के सामने पहली बार आ रही है। सचमुच महाकवि की यह साहित्यिक यात्रा पाठकों का पाथेय है।’ मानस उसका अमिट स्मारक है।
  • Do Dhurva
    Anton Chekhov
    225 191

    Item Code: #KGP-614

    Availability: In stock

    दो ध्रुव 
    अन्तोन चेखोव (1860-1904) रूस के ही नहीं, वरन विश्व के सुविख्यात कथाकार और नाटककार हैं। अपनी कहानियों में उन्होंने बहुत ही सीधे-सरल शब्दों में मनुष्य के असत्य, आडंबर, चापलूसी और  असहाय व्यक्ति के शोषण के विरुद्ध संकेत कर यह संदेश दिया है कि हम अधिक से अधिक मानवीय शोर संवेदनशील बनकर बेहतर इंसान बनें। साथ ही हम संसार को भी बेहतर बनाने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि यह सब लोगों के जीने  के योग्य बन सके ।
    इन कहानियों के मंच के लिए किए गए नाटय-रूपांतर, कॉन्स्टेंट गारनेट द्वारा रूसी से अंग्रेजी में किए उनके अनुवादों के आधार पर हिंदी  में किए गए है ।
    ऐसे ही आठ नाटय-रूपांतर इस पुस्तक में संकलित किए गए । आशा है, ये पाठकों को भी, और इन छोटे-बड़े नाटकों को मंच पर खेलने वाले अभिनेताओं-निर्देशकों को भी पसंद आएंगे, दर्शकों  को भी ।
    ये नाटक थोड़े बहुत आवश्यक परिवर्तन के साथ मंच पर आसानी से खेले जा सकते है ।
  • Sikhavan (Paperback)
    Jagdish Pandey
    40

    Item Code: #KGP-1445

    Availability: In stock

    प्रार्थना

    सुन लो भगवन विनय हमारी।
    हम सब आये शरण तुम्हारी।।

    सारे जग के रक्षक -पालक,
    हम हैं नाथ तुम्हारे बालक।
    तेरे दर के सभी भिखारी।।

    गुरु, पितु, मात, चरण अनुरागी, 
    बनें सभी ऐसे बड़भागी।
    आशीषों के हों अधिकारी।।

    विद्या पढ़ें विवेक बढ़ाएं,
    अपना जीवन श्रेष्ठ बनाएं।
    हरो ईश बाधाएं सारी।।

    शुभ कर्मों में ध्यान लगाएं,
    पर - सेवा कर नाम कमाएं।
    मातृ - भूमि के हों हितकारी।।

    हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
    रहें सदा बन भाई-भाई।
    शान तिरंगे की हो प्यारी।।
    -इस पुस्तक की ‘प्रार्थना’ कविता