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books in hindi

  • grid
  • Anant Naam Jigyasa
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-1976

    Availability: In stock

    अनंत नाम जिज्ञासा
    जाने किस-किस काल के स्मरण इंसान के
    अंतर में समाए हुए होते हैं, और जब कुदरत 
    उनको किसी रहस्य में ले जाती है, तो इस
    जन्म की जाति और मजहब बीच में हायल
    नहीं होते…
    इसी से मन में आया कि जो लोग अपनी
    आपबीती कभी नहीं लिखेंगे, उनके इतने बड़े 
    अनुभव, उन्हीं की कलम से लेकर सामने रख
    सकूँ  … 
    ओशो याद आए, जो कहते हैँ- 'अगर आप
    लोग मुझसे कोई प्रश्न न पूछते, तो मैं
    खामोश रहता, मुझे किसी को कुछ भी कहना
    नहीं था, यह तो आप लोग पूछते है, तो
    इतना बोल जाता हूँ...'
    ओशो ने जो इतना बड़ा ज्ञान दुनिया को दिया
    है, वह सब उनकी खामोशी में पड़ा रहता,
    अगर  लोग उन्हें प्रश्न-उत्तर के धरातल पर न
    ले आते... यही धागा हाथ में आया, तो मैंने
    अपनी पहचान वालों के सामने कितने ही प्रश्न
    रख दिए । बातचीत की सूरत में कुछ लिखने
    के लिए नहीं, केवल उनकी खामोशी को
    तोड़ने के लिए । इसीलिए मैं यहीं कई जगह
    अपने किसी प्रश्न को सामने नहीं रख रही,
    लेकिन जवाब में जो उन्होंने कहा, या लिखकर
    दिया, वही पेश कर रही हूँ ।
    -अमृता
  • Ratangarbha
    Shanker Shesh
    40 36

    Item Code: #KGP-2087

    Availability: In stock


  • Dust Pratinidhi Kahaniyan Ramakant
    Ramakant
    300 270

    Item Code: #KGP-9348

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां  रमाकान्त
    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से  स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार रमाकान्त की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘तेवर’, ‘उसकी लड़ाई’, ‘जिंदगी भर का झूठ’, ‘व्यतिक्रम’, ‘क्रेमलिन टाइम’, ‘पेड़ के साथ’, ‘कार्लो हब्शी का संदूक’, ‘भागमनी आएगी’, ‘सड़क, शहीद और नाम’ तथा ‘एक विपरीत कथा’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार रमाकान्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Hindi Ki Pratinidhi Kahaniyan Taatvik Vivechan
    Jayanti Prasad Nautiyal
    215 194

    Item Code: #KGP-542

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य पर अनुशीलन, साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कम ही हुआ है । कहानी साहित्य जहाँ एक ओर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है  वहीं दूसरी ओर कहानी  पाठक वर्ग बहुत विस्तीर्ण है, परंतु इतने विराट और व्यापक साहित्य पर आलोचना, समालोचना तथा तात्त्विक विवेचनपरक साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है । 
    इस पुस्तक में कथा तत्त्वों का विश्लेषण, शब्दार्थ एवं टिप्पणी खंड तथा व्याख्या खंड आदि का अनुशीलन उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम के बोर्डों, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किया गया है । 
    संक्षेप में कहें तो कह सकते हैं कि यह पुस्तक सम्पूर्ण भारत में विश्वविद्यालयों, बोर्डों, महाविद्यालयों आदि के प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, साथ ही यह पुस्तक शोधार्थियों, कथा साहित्य के गंभीर अध्येताओं, समालोचकों, समीक्षकों के लिए भी उपादेय सिद्ध होगी ।  इस पुस्तक को इस प्रकार लिखा गया है कि यदि सामान्य पाठक भी इसे पढ़ना चाहे तो उसे हिंदी कथा साहित्य की पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो ।
  • In Dinon
    Vinita Gupta
    60

    Item Code: #KGP-1909

    Availability: In stock

    इन दिनों
    ग़ज़लों में छन्द का अनुशासन काकी दूर तक दिखाई देता है । इसके साथ-साथ ग़ज़ल के मुहावरे, व्याकरण, अंदाज़े-बयां, भाषा और विभिन्न बहरों को भी अपने जीवनानुभव तथा अभ्यास से उपलब्ध करने की सफ़ल कोशिश है । ग़ज़लों में एक ओर व्यक्तिगत अनुभूतियों तथा राग-विराग की स्थितियों के प्रस्तुति है तो दूसरी ओर समष्टिगत वेदनाएं, व्यथाएँ भी अंकित हुई हैं। विनीता के पास हिन्दी मुहावरे और शब्दावली का भण्डार तो है ही, उर्दू का रंग भी देखने को मिलता है । हिंदी, उर्दू के सहीं अनुपात ने इन ग़ज़लों को और भी निखार दिया है ।
  • Yaadon Ke Galiyaare Se
    Ramesh Chandra Diwedi
    180 162

    Item Code: #KGP-9321

    Availability: In stock

    साहित्य समाज का दर्पण है। काव्य समाज का स्वरूप है। समाज के अनुरूप ही काव्य की रचना होती है। यह धारणा अनादिकाल से चली आ रही है, जो आज भी चरितार्थ है। काव्य और साहित्य का अन्योन्याश्रय संबंध है। अद्यतन कवि की रचना संसर्ग से प्रभावित होती है। चूँकि कवि भ्रमणशील होते हैं, इसलिए संसर्ग गुणों का प्रभाव उन पर पड़ता ही है। ‘संसर्गजा दोष गुणा भवंति’ यह सूक्ति सार्थक प्रतीत होती है। साथ ही आज काव्य की रचना समाज की माँग के अनुरूप होती है। कवि जब आत्मा की आवाज को सुनकर रचना करता है, तब वह हृदयस्पर्शी हो जाता है। कवि की कवित्व शक्ति अनंत होती है। यह पूर्व संस्कारों से मिलती है। ‘नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा, कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा’।
    ब्रह्मा की सृष्टि में केवल छह रस होते हैं—कटु, अम्ल,कषाण, लवण, तिक्त तथा मधुर किंतु कवि की सृष्टि में  शृंगार, हास, करुण, रौद्र, वीर, बीभत्स, अद्भुत, भयानक और शांत नौ रस होते हैं। कवि अपने संकल्प मात्र से ही किसी रस का आवाहन कर सकता है, पर ब्रह्मा के रस को प्राप्त करने के लिए अन्यान्य उपकरणों की आवश्यकता होती है। कवि का अपना एक काव्य लोक होता है। काव्य कल्पना पर आधरित है। कल्पना का आधर सत्य है। यह आधर कवि को समाज से प्राप्त होता है।
    कविता, कवि के हृदय की वह ध्वनि है, जो मुँह से अथवा लेखनी से निकलते समय कवि को भी अचेत कर देती है। सुनने के बाद ही कवि को भी पता चलता है कि उसने क्या कहा। ऐसी ही कविता काव्य लोक में समादृत होती है।
    आज शहरी सामाजिक जीवन तथा संस्कृति में सिमटा भारत गाँव की ओर उन्मुख हो रहा है। ग्रामीण भारत को शहर में लाने का प्रयास कर रहा है। सरकारी तंत्रा भी ग्रामीण विकास पर अधिकाधिक बल दे रहा है। महात्मा बुद्ध ने भी राजभवन छोड़कर शांति के लिए ग्राम और वन की ओर प्रस्थान किया था। इस सामाजिक परिवेश में रचित यह काव्य संग्रह समाज और परिवारों के उन अनछुए स्वरूप को सामने लाया है, जो बुध जन हृदय के किसी कोने में दम तोड़ रहा था।
    —रमेश चन्द्र द्विवेदी

  • Jhansi Ki Rani
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1821

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Dena Paavna
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-71

    Availability: In stock


  • Chhotoo Ustaad
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-728

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में संकलित कथाकार स्वयं प्रकाश की कहानियां आकार में छोटी हैं लेकिन प्रभाव में ‘बड़ी’। ये लघुकथाएं नहीं हैं। लघुकथा अकसर एकायामी कथ्य की वाहक होती है और एक निश्चित बिंदु पर प्रहार करती है। जबकि ये कहानियां बहुपर्ती हैं और आपकी पूरी विचार प्रक्रिया को प्रभावित बल्कि परिवर्तित कर देती हैं। मसलन ‘हत्या’ एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो जंगल के राजा शेर को सर्कस में रिंग मास्टर के इशारे पर भीत गुलामों की तरह व्यवहार करते देख रो पड़ता है तो ‘बिछुड़ने से पहले’ सड़क और पगडंडी की बातचीत के बहाने विकास के पूंजीवादी मॉडल को प्रश्नांकित करती है। रेटोरिक का इस्तेमाल जिन बहुत ही कम कहानीकारों ने हथियार की तरह किया है उनमें स्वयं प्रकाश एक हैं। ‘सुलझा हुआ आदमी’ में बहुत बोलने वाले और व्यवहार में इससे उलट आचरण करने वाले लोगों पर ‘कहता है’ के माध्यम से बड़ी तीखी गुम चोट की गई है।
    ये कहानियां किसी बड़े कलाकार--मसलन--यामिनी रॉय या मकबूल फिदा हुसैन के रेखाचित्रों की याद दिलाती हैं जिनमें न डिटेल्स की पेशकश होती है, न रंगों का पसारा, लेकिन फिर भी जिनमें कम से कम रेखाओं के माध्यम से एक अभिभूत कर डालने वाली माया का सृजन हो जाता है! और यही इन रचनाओं की सबसे बड़ी खूबी है। पाठकों को इन कहानियों को पढ़ते समय परसाई जी की या आचार्य अत्रो की या पु. ल. देशपांडे की याद आए तो इसे अपनी परंपरा में सुरभित पारिजात के नन्हे फूलों की पावन सुगंध् ही समझना चाहिए। कथाकार स्वयं प्रकाश की ये अद्भुत कहानियां पहली बार किसी संकलन में प्रकाशित हो रही हैं।
  • Mere Saakshatkaar : Manager Pandey
    Manager Pandey
    125 113

    Item Code: #KGP-541

    Availability: In stock


  • Ek Jala Huaa Ghar
    Iqbal Mazeed
    140 126

    Item Code: #KGP-1837

    Availability: In stock

    एक जला हुआ घर
    आज के पाठक को जिन चीज़ों को दुनिया में, अपने आसपास या अपने भीतर भी देखकर जो हैरत-सी होती है, यह उन्हीं हैरतों की कहानियाँ हैं।
    साहित्य को इनसान से, समाज से, जीवन से, संस्कृति और राजनीति से नए संबंध स्थापित करने पर प्रगतिशील आंदोलन ने जो ज़ोर दिया था यह उन्हीं संबंधों द्वारा जीवन के सौंदर्य, उसकी उठान और उभार को समझने का एक प्रयास है।
    कहानी का यथार्थ समाचार-पत्रों और अदालतों में प्रस्तुत किए गए यथार्थ से कैसे अलग होता है उसके लिए यह अंतर जानना, जो फिक्शन से जुड़ाव नहीं रखता, मुश्किल है। इसके अतिरिक्त कोई दावा करना या कहानियों से यह उम्मीद करना कि वह गलत होने वाली चीजों को ठीक कर देंगी, मूर्खता है; क्योंकि हर चीज़ साहित्य से ठीक नहीं की जा सकती। देखना यह होगा कि साहित्य, जिसका आधार Joy of understanding होता है, ये कहानियाँ अपने पाठक को वह आनंद कितना दे पाने में समर्थ हैं और इस काम में लेखक की ओर से डंडी तो नहीं मारी गई है। अगर इन कहानियों में उस सुंदरता और शक्ति की खोज मिल जाए, जिनको नए सांस्कृतिक मूल्यों में स्थान मिल सके तो यह लेखन सफल है।
  • Saat Rashtriya Radio Naatak
    Chiranjeet
    100 90

    Item Code: #KGP-1813

    Availability: In stock

    हमारे लिए निश्चय ही यह हर्ष का विषय है कि भारतीय स्वतंत्रता की स्वर्ण-जयंती के वर्ष में अग्रणी राष्ट्रीय नाटककार पदूमश्री बिरंजीत के सात अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि राष्ट्रीय रेडियो-नाटकों  का यह संग्रह प्रकाशित हुआ है । स्वतंत्रता-प्राप्ति के वर्ष सत् 1947 से लेकर अब तक रचित राष्ट्रीय रेडियो-नाटक साहित्य में इन सातों नाटकों का विषय-वस्तु एवं शिल्प की दृष्टि से अपना विशिष्ट स्थान है । इनमें से चार नाटक- 'नया जन्म' , 'ऊंचा पर्वत, ऊंचे लोग' , 'अपने-अपने भूचाल' और 'निहाली' आकाशवाणी के नाटकों के अखिल भारतीय कार्यक्रम के अंतर्गत हिंदी के अतिरिक्त अन्य सभी भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर आकाशवाणी के पूरे देश में फैले समस्त केद्रों से प्रसारित हुए थे और व्यापक रूप से चर्चित-प्रशंसित भी हुए थे । 'कालकूप का कालचक्र' और 'दर्पण को परछाई' आकाशवाणी, दिल्ली के अलावा अन्य केंद्रों से भी कई बार प्रसारित होकर अपार लोकप्रियता प्राप्त कर चुके है । इस संग्रह का पहला नाटक 'स्वर्णिम गौरव- गाथा' भारतीय स्वतंत्रता की स्वर्ण-जयंती के उपलक्ष्य में रचित श्री चिरंजीन का नवीनतम राष्ट्रीय  रेडियो-नाटक है । 

  • Nanhe Haath Khoj Mahan
    Hari Krishna Devsare
    190 171

    Item Code: #KGP-109

    Availability: In stock

    एक पुरानी कहावत है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात। विज्ञान के आविष्कारों में अनेक ऐसी कथाएं छिपी हुई हैं, जिनके बीज बचपन में ही पड़ गए थे। उन वैज्ञानिकों के बचपन में ही कुछ ऐसा हुआ था, जिसने आगे चलकर एक महान आविष्कार, अनुसंधान या खोज का रूप लिया। इस पुस्तक में कुछ ऐसी ही विशिष्ट कथाएं दी गई हैं, जो बाल-पाठकों को प्रेरणा देंगी कि उनका हर काम महत्वपूर्ण है। कौन जाने, उनका कौन-सा काम बड़े होने पर प्रेरणा देगा और उन्हें महानता की सीढ़ियों पर चढ़ाकर विशिष्ट बना देगा। ये कहानियां रोचक हें, ज्ञानवर्धक हैं और प्रेरक हैं। आशा है, सभी आयु के पाठक इनसे प्रेरणा लेंगे।
    —हरिकृष्ण देवसरे
  • Kamzor Pyaar Ki Kahaniyan
    Bhimsen Tyagi
    100 90

    Item Code: #KGP-1948

    Availability: In stock


  • Is Jantantra Mein
    Prabhakar Shrotiya
    980 882

    Item Code: #KGP-645

    Availability: In stock

    यह पुस्तक हमारी दुनिया के लोकतंत्र की अनेक विसंगतियों का बारीक रूपायन करती है। आज जब अनेक देशों में अखबारों का मुंह तक बंद करा दिया जाता है, आंग सान सूकी जैसी बड़ी नेता और कार्यकर्ता जेल की अनावश्यक और थोपी हुई सजा काटने को विवश होती हैं तो श्रोत्रिय जी के ये लेख बड़े प्रासंगिक लगते हैं।
    यह पुस्तक पिछले कुछ वर्षों की नहीं, बल्कि पिछली कुछ शताब्दियों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक लकीरों की पड़ताल करती है...
    –प्रांजल धर 
  • Amar Ho Gaya Magar
    Ramesh Bedi
    50

    Item Code: #KGP-1197

    Availability: In stock


  • Bimla
    Jagnnath Prabhakar
    75 68

    Item Code: #KGP-2023

    Availability: In stock

    राजा समरसिंह को उनके दीवान सतीशचन्द्र ने अपने एक विश्वस्त नौकर के उकसाने पर मरवा डाला । उनकी रानी ने उसके विरुद्ध अति भयंकर व्रत धारण किया । वह व्रत क्या था ? इन्द्रनाथ को महाश्वेता की बेटी सरला से प्रेम हो गया, पर ब्याह महाश्वेता का व्रत पूरा हुए बिना नहीं हो सकता था । इस व्रत को पूरा करने के लिये इन्द्रनाथ घर से चल पडा । महेश्वर मन्दिर में एक अद्वितीय सुन्दरी उस पर मोहित हो गयी । सुन्दरी ने अपना नाम भिखारिन बताया ।  उसने एक भिक्षा इन्द्रनाथ से सतीशचन्द्र का वध न करने की माँग ली और सतीशचन्द्र के नौकर को हत्यारा बताया । इन्द्रनाथ मुंगेर पहुँच कर राजा टोडरमल की सेना में भरती हो गया । संध्या समय वह गंगा-तट पर शत्रुओं से लड़ता हुआ बेहोश हो कर गंगा से गिर पड़ा । एक युवक! अपनी नाव से कूदा, उसे उठाकर अपनी नाव में डाल लिया । होश आने पर उसने देखा, इस युवक के भेस में वही भिखारिन थी । उधर दीवान के उसी शबित-सम्पन्न नौकर ने महाश्वेता को सरला सहित चतुर्वेष्ठित दुर्ग में कैद कर लिया था । भिखारिन उन्हें काल कोठरी से निकालकर अपने मकान में ले आयी । इधर टोडरमल ने पठानों के दुर्ग पर हमला किया । गुड़सवार नायक इन्द्रनाथ लड़ाई में घायल व बेहोश होकर गिर पडा । शात्रुओं ने उसे उठा कर दुर्ग में कैद कर लिया । भिखारिन ने वहाँ पहुँच कर उसे दुर्ग से कैसे बाहर भेज दिया और स्वय इन्द्रनाथ बन कर कैद हो गयी ? भेद खुलने पर भिखारिन को मृत्यु दण्ड देने के लिये वृक्ष के साथ बांध दिया गया । परन्तु इन्द्रनाथ ने किस प्रकार उसे बचा लिया ? इतने में दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली गयी ।  इसके बाद सतीशचन्द्र के उसी नौकर ने उन्हें मार डाला । विजेता इन्द्रनाथ अपने वचन के अनुसार निश्चित दिन सरला के पास पहुँच गया ।
    राजा टोडरमल की सभा लगी थी । सतीशचन्द्र का हत्यारा कैदी के रूप में राजा के सामने पेश किया गया । उसे मृत्यु दण्ड सुनाया गया । कैदी ने कहा, "मैं ब्राह्मण हूँ । ब्राह्यण को मृत्यु दण्ड देना शास्त्र-विरुद्ध है । धार्मिक टोडरमल सोच में पड़ गये । इतने में एक निहत्थी महिला तेजी से सभा मण्डल में घुसी और छुरी से सतीशचन्द्र के हत्यारे कैदी की हत्या कर डाली । वह महिला कौन थी और उसने छुरी कैसे प्राप्त कर ली ?
    अपने ब्याह के निश्चित दिन इन्द्रनाथ भिखारिन के पास गया और कहा, "भिखारिन । तुमने मुझे चार बार मौत से बचाया, जिसका बदला मैं चुका नहीं सकता । मेरी प्रार्थना है, तुम मेरे पास पटरानी की तरह रहो । सरला तुम्हारी सेवा करेगी ।" इस प्रकार जाने क्या-क्या स्नेह-भरी बाते कह रहा था, परन्तु वास्तव में भिखारिन वहाँ नहीं थी, था उस का प्राणहीन पार्थिव शरीर । वह इन्द्रनाथ के प्रति शाश्वत प्रेम रखती थी, उसी प्रेम की ज्वाला में वह आत्म- बलिदान कर चुकी थी । हाँ तो यह भिखारिन वास्तव में थी कौन?
    उपर्युक्त समस्त रहस्यमय प्रश्नों के उत्तर विविध रोमांचकारी विवरणों सहित यह पुस्तक प्रस्तुत कर रही है ।
  • Mahasagar
    Himanshu Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-34

    Availability: In stock


  • Sulagati Inton Ka Dhuaan
    Poonam Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-9196

    Availability: In stock

    सुलगती ईंटों का धुआं कहानीकार पूनम सिंह का नया संग्रह है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मंे प्रकाशित इन कहानियों को पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त हो चुकी है। पूनम सिंह नए बनते समाज को आलोचनात्मक दृष्टि के साथ कहानियों के कंेद्र में रखती हैं, यह एक सामान्य कथन है। यह उपयुक्त कथन है कि वे भाषा और शैली से पाठक के मन में भी खुशी और खलिश पैदा कर देती हैं। विकास के नाम पर लुटती जमीन, परंपरा और अस्मिता विमर्श से जूझती स्त्री, जिम्मेदारियों से घिरा ‘नैतिक बेरोजगार’, ग्रहों के अंधविश्वास में उलझे आधुनिक, उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़ी हुईं स्त्रियां, अकेलेपन से आक्रांत व आत्मीयता को तलाशती वृद्धवस्था और व्यवस्था के खिलाफ एकजुट जनता-इन कहानियों के यही सूत्र-संदर्भ हैं। देखा जाए तो रचनाशीलता को चारों तरफ से घेरे इन सूत्र-संदर्भों को पूनम सिंह ने अपने रचाव से विशेष बना दिया है। उनमें स्थानीयता का एक मोहक अंदाज है। यह अंदाज केवल भाषा में ही नहीं, कहानी कहने के मिजाज में भी समाया है। इन कहानियों के कई चरित्र मन में कहानी समाप्त हो जाने के बाद भी उद्विग्न रहते हैं। कहानी पाठक के मन में दुबारा-तिबारा लिखी जाती है शायद।
  • Mere Saakshaatkaar : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    190 171

    Item Code: #KGP-173

    Availability: In stock


  • Aastha Ka Raasta
    Dr. Arsu
    160 144

    Item Code: #KGP-9002

    Availability: In stock

    आस्था का रास्ता 
    हर युग की समस्याएं और संवेदना, बदलती रहती हैं । इसका असर साहित्य पर पड़ना सहज स्वाभाविक है, लेकिन बाहरी तौर की विकास योजनाएं हमेशा हमें अंतर्दृष्टि नहीं देती हैं । अंतर्दृष्टि ही आस्था की नीव है । विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के युग में साहित्य में आए परिवर्तन के स्वरूप पर साहित्यकार के मन में आशंकाएं बढ़ रही हैं ।
    आस्था का आलोक बुझ रहा है । बुद्धि-विकास के अनुपात में अनाज हृदय-विकास नहीं होता है । परंपरा, संस्कृति, साहित्य, धरोहर और विरासत का महत्त्व आज फीका पढ़ रहा है ।
    इसके कारणों-परिणामों पर सोच-विचार करने वाले अट्ठारह लेखों का संकलन ।
    मलयालमभाषी हिंदी लेखक और अनुवादक डॉ० आरसु की अद्यतन कृति । इसमें चिंतन का इंधन है । आस्था और आशंकाओं की धड़कन है ।
  • Yuva Sanchetna
    Prem Vallabh Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-9132

    Availability: In stock

    युवा संचेतना
    यह युग प्रगतिवादी युग है । उत्थान का युग है विज्ञान का युग है, नवीन चेतना और स्फूर्ति का युग है । अत: मानसिक शक्तियों के जगाने का समय है। इस युग की धारा विद्युत् गति से भी तेज बह रही है । मनुष्य जल, थल, नभ में स्वच्छन्द विचरण कर रहा है और प्रकृति, आकाश, पाताल पर दिन-रात अधिकार जमाता जा रहा है । वह शक्ति की खोज में आकाश-पातालको एक करता जा रहा है । अत: आप अपने को इन सबसे अलग रखकर प्रसन्न और सुखी अनुभव नहीं कर सकते।
    (इसी पुस्तक से)
  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain
    Kunwar Narayan
    190 171

    Item Code: #KGP-444

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।
  • Priyakant
    Pratap Sehgal
    160 144

    Item Code: #KGP-2043

    Availability: In stock

    प्रियकांत
    प्रताप सहगल उन लेखकों में से हैं, जिन्होंने अपने लड़कपन से ही दिल्ली नगर को महानगर और महानगर को सर्वदेशीय नगर (Cosmopolitan City) बनते हुए देखा है। इस बदलाव के साथ जुड़े आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक पहलुओं के बदलते रंगों को भी महसूस किया है। इन बदलते रंगों के साथ बदलते वैयक्तिक संबंधों और मूल्य-मानों पर उनकी पैनी निगाह रहती है। इसीलिए उनके लेखन में निरा वर्णन नहीं होता, बल्कि उसके साथ समय के कई सवाल जुड़े रहते हैं। कभी यथार्थ के धरातल पर तो कभी दर्शन के स्तर पर ।
    उनका नया उपन्यास 'प्रियकांत' भी कोई अपवाद नहीं है। पिछले तीस-चालीस सालों में धर्म का व्यापारीकरण और बाजारीकरण हुआ है। इसके लिए आम-जन को अपने परोसने के लिए धर्म के नए-नए मंच बने और नए-नए धर्मगुरु तथा धर्माचार्य फिल्मी सितारों की तरह चमकने लगे।
    'प्रियकांत' एक ऐसे ही धर्माचार्य के उदय और उसके साथ जुड़ी महत्वाकांक्षाओं और विसंगतियों की कथा है। पात्र पौराणिक हो, ऐतिहासिक हों या समकालीन-प्रताप सहगल की नज़र हमेशा उनके माध्यम से समय के साथ मुठभेड़ मर ही रहती है। और इस उपन्यास में भी धर्म, धर्मगुरु, ज्ञान एवं अनुभव से जुड़े कुछ सवाल ही रेखांकित होते हैं...शेखर, नीहार और गुलशन के साथ...आप पढ़ेंगे तो आपको भी लगेगा कि इस कथा में आप भी कहीं न कहीं ज़रूर हैं।
  • Bankon Mein Dvibhashi Computerikaran : Dasha Aur Disha
    Jayanti Prasad Nautiyal
    245 221

    Item Code: #KGP-675

    Availability: In stock

    बैकों में द्विभाषी कंप्यूटरीकरण
    दशा और दिशा
    हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर पर कार्य करने हेतु उपलब्ध सुबिधाओं की अद्यतन जानकारी से युक्त यह पुस्तक विद्वान् लेखक के गत तीस वर्षों के भाषा प्रौद्योगिकी के अनुभव पर आधारित है।
    कंप्यूटर विज्ञान पर अंग्रेजी भाषा में बहुत-सी पुस्तकें है, परंतु हिंदी में कंप्यूटर जैसे विषय पर प्रामाणिक पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। इस अभाव की पूर्ति करने का विनम्र प्रयास है या पुस्तक। 
    यह पुस्तक कंप्यूटर जगत विशेषज्ञों द्वारा सामग्री को जाँच के बाद भारतीय रिजर्व बैंक, कृषि बैंकिंग महाविद्यालय की हिन्दी में मौलिक पुस्तक लेखन योजना के अंतर्गत प्रकाशित है। इसकी प्रामाणिकता और उपयोगिता का इससे बडा प्रमाण और क्या हो सकता है।
    इस पुस्तक में कंप्यूटर के माध्यम से हिंदी में तथा भारतीय भाषाओं में काम करने संबंधी उपलब्ध सुविधाओं, विभिन्न सॉफ्टवेयरों, पैकजों, उपकरणों पर प्रामाणिक एवं अद्यतन जानकारी दी गई है । इसमें नवंबर, 2007 तक हुए कंप्यूटर संबंधी समस्त विकास एवं सूचनाएँ और शोधपरक सामग्री समाहित हैं। माथ ही कंप्यूटर के भाषायी अनुप्रयोग संबंधी विभिन्न विषयों पर गभीर विवेचन है ।
    यह पुस्तक सभी बैकों के कर्मचारियों तथा अधिकारियो, उनके राजभाषा विभागो के कर्मचारियों व अधिकारियों, सभी विश्वविद्यालयों के बैंकिंग वाणिज्य व हिंदी में अध्ययनरत विद्यार्थियों व प्राध्यापकों, भारत सरकार के सभी कार्यालयों, सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों, भाषाविदों, भाषा प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों, अनुवाद विज्ञान व अनुवाद में हर स्तर के पाठयक्रम में अध्ययन-अध्यापन में कार्यरत अध्यापको एवं विद्यार्थियों कंप्यूटर निर्माण में लगे सभी सॉफ्टवेयर निर्माताओं, कंप्यूटर में नीति निर्माताओं व निरीक्षण से जुडे कार्मिकों और भाषा तथा कंप्यूटर से सरोकार रखने वाले आम पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है ।

  • Manch Andhere Mein
    Narendra Mohan
    120 108

    Item Code: #KGP-1915

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Nayee Samiksha Ke Pratimaan
    Nirmla Jain
    400 360

    Item Code: #KGP-654

    Availability: In stock

    "1930–1960 तक से समय को जॉन हॉलावे ने ‘साहित्यिक आलोचना में क्रांति’ का युग कहा है। कहना न होगा कि इस समय की सबसे महत्त्वपूर्ण और समृद्ध आलोचनात्मक प्रवृत्ति नयी समीक्षा है। प्रवृत्ति विशेष के लिए यह नाम 1941 में प्रकाशित जॉन क्रो रैंसम की इसी शीर्षक की रचना से रूढ़ हुआ।" प्रस्तुत पुस्तक ‘नयी समीक्षा के प्रतिमान’ की संपादक सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन ने भूमिका के इन शब्दों में उस समीक्षा पद्धति का उल्लेख किया जिसने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। रचना और आलोचना के अंतःकरण को संशोध्ति / परिवर्तित करने में ‘नयी समीक्षा’ के सूत्रों व समीकरणों ने ऐतिहासिक कार्य किया। दोनों विश्वयुद्धों के बीच का समय नयी समीक्षा के प्रारंभ, विकास और सिमटाव का भी समय है।
    नयी समीक्षा के अंतर्गत स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति समूह और विक्टोरियन साहित्य की नैतिकता के प्रति विरोध दर्ज हुआ। इससे जुड़े समीक्षक कविता के अध्कि शुद्ध मूल्यांकन के लिए उसको ऐतिहासिक सामाजिक विवरणों व रचनाकार की निजता से काट देना उचित समझते थे। इससे विश्लेषण का क्षेत्र रूपात्मक विलक्षणताओं तक सीमिति हो गया।
    हर आरोह का एक अवरोह होता है। ‘नयी समीक्षा’ की सीमाएं 1950 के आसपास उभरने लगीं। निर्मला जैन के शब्दों में, फ्नयी समीक्षा की सभी महत्त्वपूर्ण कृतियां पहले ही प्रकाशित हो चुकी थीं और आलोचक जैसे अपने ऐतिहासिक दायित्व को पूरा कर विराम की मुद्रा में थे। आलोचना का एक प्रमुख दौर, एक विशेष युग मानो समाप्त हो गया था।
    प्रस्तुत पुस्तक इस महत्त्वपूर्ण आलोचना युग की उल्लेखनीय विशेषताओं को मूल रचनाओं के अनुवाद द्वारा उपलब्ध कराती है। रेने वेलेक, क्लींथ बु्रक्स, आइवर विन्टर्स, टी. एस. इलियट, आई. ए. रिचड्र्स, ऐलन टेट और डब्ल्यू. के. विमसाट के लेखों का अनुवाद अजितकुमार, निर्मला जैन व चंचल चैहान ने किया है। अपने ढब की अकेली पुस्तक, जिसमें जाने कितनी बहसों के प्रस्थान अंतर्निहित हैं। पाठकों की सुविध के लिए दो परिशिष्टों में हिंदी-अंग्रेजी और अंग्रेजी-हिंदी शब्दावली भी दी गई है।
  • Chor Darvaazaa
    Jiten Thakur
    225 203

    Item Code: #KGP-292

    Availability: In stock

    जितेन ठाकुर की कहानियां यह स्थापित करती हैं कि कहानी एक निरंतर बदलने वाली विधा है जो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती क्योंकि कहानी अपने समय को यदि रूपायित नहीं करती और अपने काल की त्रसदी को नहीं पहचानती, तो उस समय और उस दौर का पाठक भी कहानी को पहचानने से इनकार कर देता है।
    जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।
    लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।
    क्या इतना बहुत नहीं है कि अपने समय के इस मित्र रचनाकार ने कहानी की विगलित और परंपरापूरक अपेक्षाओं से हटकर, अपने समय के मनुष्य का साथ दिया है?
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Savyam Prakash
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-56

    Availability: In stock

    भारतीय श्रमिक तथा वंचित वर्ग के कथा-नायकों को जो सत्कार तथा पक्षधरता स्वयं प्रकाश की कहानियों में मिली है, वैसे उजले उदाहरण समकालीन हिंदी कहानी में गिने-चुने ही हैं । इन वंचित वर्गों के स्वपनों को दुःस्वप्नों में बदलने वाली कुव्यवस्था को यह कथाकार केवल चिन्हीत ही नहीं करता, बल्कि इसके मूल में बसे कुकारणों को पारदर्शी बनाकर दिखाता है तथा उस जाग्रति को भी रेखांकित करता है जो कि अंतत: लोक-चेतना का अनिवार्य तत्त्व है । और खास बात यह है कि इस सबके उदघाटन-प्रकाशन में यहाँ लेखक जीवन के हर स्पंदन और उसके आयामों पर कहानी लिखने को उद्यत दिखाई पाता है । अर्थात् सम्यक् लोकचेतना की 'साक्षरता' इन कहानियों में वर्णित जीवन में यथोचित पिरोई गई है ।
    कहानी की कला की गुणग्राहकता से लबरेज ये कहानियां विचारधारा के प्रचार और सदेश के 'उपलक्ष्य' को मिटाकर व्यवहार के धरातल तक पाठक को सहज ही ले जाती है । पात्रों की आपबीती को जगबीती बनाने का संकल्प यहाँ प्रामाणिक रूप में उपस्थित हुआ है।
    स्वयं प्रकाश द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं-'नीलकांत का सफर', 'सूरज कब निकलेगा', 'पार्टीशन', 'क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा ?', 'नैनसी का धूड़ा', 'बलि', 'संहारकर्ता', 'अगले जनम', 'गौरी का गुस्सा' तथा 'संधान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक स्वयं प्रकाश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Na Dainyam Na Palaynam
    Atal Bihari Vajpayee
    120 108

    Item Code: #KGP-33

    Availability: In stock

    सचाई यह है कि कविता और राजनीति साथ-साथ नहीं चल सकती । ऐसी राजनीति, जिसमें प्राय: प्रतिदिन भाषण देना जरूरी है और भाषण भी ऐसा जो श्रोताओं को प्रभावित कर सके, तो फिर कविता की एकान्त साधना के लिए समय और वातावरण ही कहीं मिल पाता है । मैंने जो थोडी-सी कविताएँ लिखी है, वे परिस्थिति-सापेक्ष हैं  और आसपास की दुनिया को प्रतिबिम्बित करती हैं ।
    अपने कवि के प्रति ईमानदार रहने के लिए मुझे काफी कीमत चुकानी पडी है, किन्तु कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता के बीच मेल बिठाने का मैं निरन्तर प्रयास करता रहा हूँ । कभी-कभी इच्छा होती है कि सब कुछ छोड़-छाड़कर वहीँ एकान्त में पढ़ने, लिखने और चिन्तन करने में अपने को खो दूँ, किन्तु ऐसा नहीं कर पाता ।
    मैं यह भी जानता हूँ कि मेरे पाठक मेरी कविता के प्रेमी इसलिए हैं कि वे इस बात से खुश है कि मैं राजनीति के रेगिस्तान में रोते हुए भी, अपने हृदय में छोटी-सी स्नेह-सलिला बहाए रखता हूँ ।
    --अटल बिहारी वाजपेयी
  • Rashtra Kavi Ka Stri Vimrash
    Prabhakar Shrotiya
    150 135

    Item Code: #KGP-1543

    Availability: In stock

    स्त्री-जागरण और स्त्री-गरिमा को लेकर गुप्त जी ने जो रचनाएं लिखी, वे आज की जरूरत भी हैं, भले ही भिन्न रूप रंग-तेवर में। उन्हांने तभी महसूस कर लिया था कि स्त्री की समस्या सबसे पुरानी, सबसे जटिल लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण है। गुप्त जी ने बड़े घर की नारियों से लगाकर साधारण घर-संसार की ऐसी नारियों का सृजन और पुनर्सृजन किया जो समाज के बहुकोणीय स्वरूप को प्रकट करती हैं। उनके माध्यम से गुप्त जी ने समाज, संस्कृति और मानवीय गुणावगुण रेखांकित किए हैं। उनके स्त्री-चरित्रों की विविधता, उनके अभिप्राय और मर्मस्पर्शिता समाज को शील और आचरण का आईना दिखाती है।
    स्त्री-विमर्श और नारी-सशक्तीकरण के युग में आज यदि हम गुप्त जी के नारी-पात्रों पर विचार करते तो हमें उनके माध्यम से उस संघर्ष और विमर्श का पता चलेगा जो बीसवीं शती के दूसरे-तीसरे दशक में कवि कर रहे थे। उनकी संवेदना, उदारता, प्रगतिशीलता और समय को भरोसे में लेकर समयातीत पहल की क्षमता रेखांकित की जानी चाहिए। इससे यह भी प्रकट होता है कि खड़ीबोली हिंदी के जन्मकाल से ही सामाजिक विकास और उन्नयन का वह आंदोलन प्रारंभ हो गया था जिसे हम 70-89 साल बाद उत्तर-आधुनिक विमर्श बना रहे हैं। हमारी भाषा, हमारे संघर्ष की प्रणाली और अभिव्यक्ति-शिल्प भले बदल गया हो, परंतु चिंता के बीज लगभग वे ही हैं। इस तरह देखने पर हिंदी की जीवट और अग्रगामिता का पता चलता है।
    गुप्त जी के स्त्री-चरित्रों और स्त्री-चिंतन पर यह छोटी-सी पुस्तक दरअसल नई उपजाऊं पीढ़ी के लिए लिखी गई है।
  • Yaksha Prashn
    Shivji Shrivastva
    110 99

    Item Code: #KGP-1946

    Availability: In stock

    यक्ष-प्रश्न
    शिवजी श्रीवास्तव नवें दशक के चर्चित कथाकारों में से हैं। 'वर्तमान साहित्य' द्वारा आयोजित कृष्ण प्रताप स्मृति कहानी प्रतियोगिता में उनकी कहानियों 'जाल', 'माँद' एवं 'अजगर' ने क्रमश: 1988, 1989 एवं 1990 में लगातार तीन वर्षों तक पुरस्कार जीतकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया । उनके एक रेडियो नाटक 'ऐसे तो घर नहीं बनता मम्मी' को आकाशवाणी द्वारा आयोजित अखिल भारतीय रेडियो नाटय-लेखन प्रतियोगिता--1992-1993 में हिंदी वर्ग में द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ । यह उस वर्ष का सर्वोच्च पुरस्कार था ।
    'यक्ष-प्रश्न' में युग की विसंगतियों से जूझते ईमानदार आदमी की कहानियाँ हैं । वस्तुत: हर युग की अपनी समस्याएं होती हैं; अपने यक्ष-प्रश्न होते हैं, जो पिछले युग से भिन्न होते है । इस युग में उपभोक्तावादी संस्कृति के विस्तार, सर्वग्रासी भ्रष्टाचार, परंपराओं की जकडन, सांप्रदायिकता इत्यादि ने आदमी को नितांत अकेला कर दिया है । इस संग्रह में आदमी के इसी अकेलेपन की व्यथा-कथा की कहानियां हैं । सामाजिक सरोकारों से जुडी इन कहानियों के विषय जिंदगी के बीच से उठाए गए है इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति कहीं न कहीँ अपने को इन कहानियों में पाता है। वस्तुत: इस संग्रह की प्रत्येक कहानी अपने में एक यक्ष-प्रश्न है, जो संवेदनशील पाठक के लिए चिंतन के नए आयाम उपस्थित करती है ।
  • Daadoo Samgra (2 Vols.)
    Govind Rajnish
    1195 1076

    Item Code: #KGP-1584

    Availability: In stock

    दादू समग्र : 1
    भक्तिकाल के निर्गुण संप्रदाय में कबीर के पश्चात सबसे महत्त्वपूमृर्प सर्जनात्मक व्यक्तित्व संत दादू दयाल (दादू अवधूत जोग्यन्द्र) का है । पुरे भारत से सामाजिक, धार्मिक और दार्शनिक चेतना को जगाने तथर विराट सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने में इनकी अग्रणी भूमिका रही है । इन्होंने मनुष्य के भीतर सोए हुए विराट अनुराग को जगाने तथा ज्ञानात्मक संवेदनाओं और आध्यात्मिक अनुभवों से संपन्न करने का प्रयास किया था। इनके 'न्रिपख' दर्शन ने हिंदू और मुसलमानों की कुरीतियों, बाह्याडंबरों, जड़ताओं, रूढियों और विसंगतियों की आलोचना करते हुए, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठने का संदेश दिया था ।
    दादू महान् संत, रचनाकार, नीतिज्ञ और उपदेशक ही नहीं थे, विश्व-बोध और मानवीयता से ओतप्रोत समाज-सुधारक भी थे । इन्होंने मजहब और जाति-भेद से ऊपर उठकर मानवीय भावों को परखकर विशाल मानवीय बोध जगाया था। इनकी साधना-भूमि, काव्य-भूमि एवं भाव-भूमि अत्यंत व्यापक और संवेदना जन-मन-स्पर्शिनी थी । इन्होंने भेदों से अभेद और नानात्व में एकता का संधान तथा आत्म-बोध और जगत्-बोध को एकाकार किया था । दादू का काव्य कबीर के वैचारिक क्षितिज को व्यापक किंतु धीर-गंभीर बनाने का उपक्रम है।
    दादू अपने सहज, निश्छल भगवत्प्रेम के सोपान से ब्रह्म-द्वार की उस सीमा तक पहुंचे, जहाँ परम तत्त्व के यथार्थ स्वरूप को पहचानने और पाने का मार्ग संसार को दिखा सके । इन्होंने ऐसे व्यक्ति और समाज की रचना का प्रयास किया था, जो सच्चाई, समता, प्रेम, भाईचारे और मानवीयता से ओतप्रोत था।
    अनेक प्राचीन पांडुलिपियों के आधार पर पहली बार इनकी समग्र रचनाओं का प्रामाणिक और पूर्ण वैज्ञानिक पाठ-संपादन करके तथा पुनरावृत्ति तथा भ्रमपूर्ण पाठों का निराकरण करते हुए, दादू की मूल रचना का पाठ प्रस्तुत किया गया है । विद्वतजनों के अतिरिक्त सामान्य पाठकों को इनका सृजन सहज बोधगम्य हो सके, इसके लिए भावार्थ और शब्दार्थ भी दिए गए हैं।

    दादू समग्र : 2
    महिमामय व्यक्तित्व और रचनात्मक प्रतिभा से संपन्न निर्गुणपंथी  कवियों में कबीर के पश्चात् दूसरा स्थान संत दादू दयाल का है । स्वयं सक्रिय रचनाशील रहते हुए अपने शिष्यों की रचनात्मक प्रतिभा को आगे बढाने वाले प्रेरक के रूप से उनका विशिष्ट महत्त्व रहा है । इसी कारण से मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के समस्त संप्रदायों में सर्वाधिक रचनाकार दादू-पंथ मेँ हुए थे।
    दादू दयाल की रचनाओं का समग्र एवं प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत करना, अन्य कवियों की अपेक्षा जटिल, समय-साध्य एवं चुनौतीपूर्ण कार्य था। संत-काव्य-मर्मज्ञ डॉ० रजनीश ने 14 वर्षों की निरंतर साधना से विभिन्न स्थानों, दादू-द्वारों और सांस्थानों में जाकर, वहाँ से प्राप्त सर्वाधिक प्राचीन 29 पांडुलिपियों के आधार पर दादू-काव्य का पूर्णिया वैज्ञानिक, मूल एवं विश्वसनीय पाठ प्रस्तुत किया है।
    दादू 'जोग्यन्द्र' की अज्ञात, लुप्तप्राय और अपूर्व रचना 'आदि बोध-सिद्धांत-ग्रंथ' के साथ उनकी अन्य रचनाएँ पहली  बार इसमें दी जा रही हैं। 'समग्र' में समग्रत: पुनरावृत्ति और प्रक्षिप्त साखियों को छाँटकर पाद-टिप्पणियों या अतिरिक्त साखियों के अंतर्गत रखकर, कथ्य द्वार संदर्भ की दृष्टि से उनका उपयुक्त स्थान निर्धारित किया गया है ।
    ग्रंथ की विस्तृत भूमिका और यथार्थपरक विवेचना से अनेक लोक-प्रवादों और भ्रांत धाराओं का निराकरण करते हुए इस प्रस्तुति में दादू के जीवन और रचनाधर्मिता के बारे में नई दिशाएं दी गई हैं।
    जन-सामान्य को दादू दयाल की कविता का मर्म सहज ग्राह्य हो सके, इसके लिए साखियों और पदों के साथ भावार्थ और शब्दार्थ भी दिए गए है, जिससे यह ग्रंथ विद्वानों, सुधी पाठकों और जन-सामान्य के लिए समान रूप से उपयोगी हो गया है ।
  • Bhartiya Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-2
    Shuk Deo Prasad
    450 405

    Item Code: #KGP-9152

    Availability: In stock

    सत्तरादि के आरंभ में हिंदी और हिंदीतर भाषाओं में वैज्ञानिक कहानियां प्रभूत मात्रा में लिखी जाने लगीं। बंगला में सत्यजित राय और प्रेमेन्द्र मित्र के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इन्होंने अपनी लेखनी को विराम क्यों दिया? क्या विज्ञान कथाएं कथा की एक विधा के रूप में जनमानस में अपनी पैठ नहीं बना सकीं?
  • Trishpathga
    Irawati
    400 360

    Item Code: #KGP-2020

    Availability: In stock

    त्रिशपथगा
    साहित्य इतिहास को वाणी देता है, इसलिए इतिहास से साहित्य का संबंध बहुत पुराना है। अपने अतीत के ज्ञान की ललक प्रायः हर व्यक्ति में होती है और उनकी इस जिज्ञासा की तृप्ति इतिहास करता है; परंतु ऐसे व्यक्तियों की संख्या भी कम नहीं जो विभिन्न कारणों से इतिहास का अध्ययन पूरी रुचि से नहीं कर पाते। ऐसे लोग ऐतिहासिक तथ्यों के ज्ञान के साथ-साथ उन तथ्यों को जीवंत बनाने वाले अभिव्यक्ति-सौंदर्य के आनंद की भी इच्छा रखते हैं। अतः वे साहित्य, विशेषकर उपन्यास की ओर देखते हैं। इसी से ऐसे साहित्य की मांग सदैव बनी रहती है जो पाठकों को अतीत से परिचित कराने के साथ-साथ उनकी साहित्य-तृषा को भी तृप्त करे। 
    डॉ. इरावती के इस उपन्यास ‘त्रिशपथगा’ में इतिहास और साहित्य का मणिकांचन संयोग है। उपन्यास की पृष्ठभूमि भारतीय इतिहास का सैंधव सभ्यता काल है जो भारतीय इतिहास और संस्कृति की उन कड़ियों को अपने में समेटे हुए है जो अब हमारे मनोमस्तिष्क से विस्मृत हो चुकी हैं। उपन्यास में अतीत को पुनर्जीवित करना सरल नहीं है किंतु यह उपन्यास भारत की प्राचीनतम संस्कृति के एक प्रतीक ‘लोथल’ को केंद्र बनाकर उस युग की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, दैनिक जीवन, रीति-रिवाज और परंपराओं को जीवंत कर एक ओर हमें उसी युग में ऐसे पहुंचा देता है कि हम पात्रों के सुख-दुःख का सीधा अनुभव करने लगते हैं तो दूसरी ओर एक अत्यंत उदात्त प्रेम और त्याग की कथा सुनकर भावविह्नल हो उठते हैं। हिंदी में ऐतिहासिक उपन्यासों का अभाव नहीं है परंतु ऐसे उपन्यासकार कम रहे हैं जो इतिहास का भी यथोचित ज्ञान रखते हों और साहित्य की सरसता का भी निर्वाह कर सकें। डॉ. इरावती एक ऐसी ही उपन्यासकार हैं। अतः ‘त्रिशपथगा’ में तीन शपथों के मार्ग का अनुसरण करती नायिका वन्हि की कथा सुनाने में साहित्य की ‘मसि’ में डूब-डूबकर इरावती की इतिहास की लेखनी ने एक अत्यंत रुचिकर उपन्यास की रचना कर दी है। इस उपन्यास में सुधी पाठकों के लिए ऐसा बहुत कुछ है कि एक बार हाथ में लेकर पूरा पढ़े बिना वे इसे रख नहीं पाएंगे।
  • Hum Sab Gunahgar
    Mastram Kapoor
    350 315

    Item Code: #KGP-9027

    Availability: In stock

    हम सब गुनहगार
    लीक से हटकर सोचने वालों ने आशा को नहीं, निराशा को कर्म की प्रेरणा कहा है।
    डॉ. लोहिया ने निराश रहकर काम करते जाने को ही सबसे अच्छा कर्तव्य कहा है।
    फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक एवं दार्शनिक ज्यांपाल सार्त्र ने भी सर्वोत्तम कर्मशक्ति डिस्पेयर की परिभाषा करते हुए कहा है, ‘दि एक्ट विदाउट होप।’
    ‘मा फलेषु कदाचन’ के कथन द्वारा गीता में भी इस सत्य को ही कहने की कोशिश की गई है...
    वर्तमान निराशा के धुँधलके में भविष्य को खोजने का लघु प्रयास यह पुस्तक स्वातंतत्र्योत्तर भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विसंगतियों का भविष्योन्मुख विवेचन है।
  • Sampurna Kahaniyan Himanshu Joshi (3 Vol.)
    Himanshu Joshi
    2100 1890

    Item Code: #KGP-9345

    Availability: In stock

    संपूर्ण कहानियां: हिमांशु जोशी
    अपनी पीढ़ी के प्रतिनिधि रचनाकार हिमांशु जोशी की कहानियों  का वैविध्य देखते ही बनता है। उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल से आने वाले हिमांशु जी की कहानियां एक ओर अपनी जमीन से जुड़ने की ललक लिए हैं, तो दूसरी ओर विश्व के मनुष्य के दुःख-सुख और संवेदनात्मक पड़ताल की जरूरत के महत्त्व को रेखांकित करती हैं। छह दशक से भी अधिक के अपने कहानी लेखन में इस महत्त्वपूर्ण रचनाकार ने 167 कहानियां लिखीं। साहित्य प्रेमियों, शोधर्थियों और कहानी के अध्येताओं की सुविधा  के लिए इन कहानियों को क्रमशः तीन खंडों में प्रस्तुत किया गया है। इन्हें एक साथ पढ़ते हुए हिमांशु जोशी के कहानीकार के क्रमिक विकास की पहचान भी की जा सकती है।
    इसके पहले भाग में वर्ष 1956 से 1962 तक की कहानियां, दूसरे भाग में वर्ष 1963 से 1976 तक की कहानियां और तीसरे भाग में वर्ष 1980 से 2009 तक की कहानियां शामिल की गई हैं। उनकी इस कथा-यात्रा में अनेक कहानियां ऐसी हैं जिन्हें हिंदी कहानी के इतिहास में मील का पत्थर कहा जा सकता है। कहना अवश्य होगा कि इसीलिए आधुनिक  हिंदी कहानी के इतिहास में उनकी एक अनिवार्य उपस्थिति है। इस दृष्टि से यह एक संग्रहणीय ग्रंथ है जिसके अध्ययन से एक ईमानदार रचना-यात्रा की नई पड़ताल की जा सकती है। 
  • Sikhavan (Paperback)
    Jagdish Pandey
    40

    Item Code: #KGP-1445

    Availability: In stock

    प्रार्थना

    सुन लो भगवन विनय हमारी।
    हम सब आये शरण तुम्हारी।।

    सारे जग के रक्षक -पालक,
    हम हैं नाथ तुम्हारे बालक।
    तेरे दर के सभी भिखारी।।

    गुरु, पितु, मात, चरण अनुरागी, 
    बनें सभी ऐसे बड़भागी।
    आशीषों के हों अधिकारी।।

    विद्या पढ़ें विवेक बढ़ाएं,
    अपना जीवन श्रेष्ठ बनाएं।
    हरो ईश बाधाएं सारी।।

    शुभ कर्मों में ध्यान लगाएं,
    पर - सेवा कर नाम कमाएं।
    मातृ - भूमि के हों हितकारी।।

    हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
    रहें सदा बन भाई-भाई।
    शान तिरंगे की हो प्यारी।।
    -इस पुस्तक की ‘प्रार्थना’ कविता
  • Haitrik
    Rajesh Ahuja
    140 126

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • Uski Bhee Suno
    Bharti Gore
    320 288

    Item Code: #KGP-471

    Availability: In stock

    ‘उसकी भी सुनो’ पुस्तक की कहानियां सामाजिक रूढ़ियों, पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। इसमें समाज के सभी तबकों की स्त्रिायों की समस्याओं का गंभीर विवेचन है। सफेदपोश समाज में जीती स्त्री, बाहर से अमीर और सुखासीन लगने वाली स्त्री की अस्तित्वहीन स्थिति के साथ-साथ दलित और आदिवासी स्त्री के सदैव उपेक्षित अस्तित्व की चर्चा है। इन कहानियों की नायिकाओं की विशेषता यह है कि वे कभी हार नहीं मानतीं।
    प्रस्तुत पुस्तक की हर कहानी अपने आप में समाज में महिलाओं के प्रति घटने वाली हर घटना को या कहिए हर आयाम को बड़े ही सटीक अंदाज में पेश करती है। साहित्य ने हमेशा से हर आंदोलन को प्रभावित किया है और जन आंदोलनों ने भी हमेशा साहित्य को प्रभावित किया है। चाहे वह आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद के आंदोलन, साहित्य ने कहानी, कविताओं, गीतों के जरिए हमेशा आम जनता के आंदोलनों को एक बेहतर आवाज दी है। साहित्य के बिना समाज अधूरा है। और अगर साहित्य महिलाओं द्वारा रचा जाए तो उसकी बात ही निराली है।
    धार्मिक उन्माद का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती हैं। दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक महिलाओं के ऊपर तो इनकी दोहरी मार पड़ती है। नारी-मुक्ति की इस मुहिम को समाज के अन्य हिस्सों को साथ लेकर एक नए बदलाव की तरफ बढ़ना होगा। समाज के बदलाव में साहित्य इसी कड़ी में महिलाओं के लिए एक सशक्त रास्ता है।
  • Ek Bhaasha Huaa Karati Hai
    Uday Prakash
    140 126

    Item Code: #KGP-293

    Availability: In stock

    हमारे भागते-दौड़ते कठिन और तेज़ समय में जब बहुत कुछ हाशिये पर जा रहा है, जिसे पहले ज़रूरी समझा जाता था, क्या कविता के लिए कोई जगह, कोई काम बचे हैं? उदय प्रकाश की कविता के केंद्र में यही चिंता है। उनके यहाँ ‘अब हर बार हारा हुआ यह माथा है/अकेला अपनी आत्मा से लाचारी के साथ क्षमा माँगता हुआ’ और यह तीखा अहसास भी कि ‘अपनी ही भाषा और अपने ही लोकतंत्र के भीतर/हम अबुगरेब के कै़दी’ हैं। इस दुनिया में ‘कविता का एक वाक्य लिखने में दो मिनट लगते हैं/ इतनी देर में चालीस हज़ार बच्चे मर चुके होते हैं/ ज़्यादातर तीसरी दुनिया के भूख और रोग से’। ऐसी दुनिया और समय में कविता का काम मानवीय अंतःकरण को संक्षिप्त होने से बचाना, जो हो रहा है उसे खुली आँखों देखना और इस समय पर अंतःकरण की ओर से चैकसी करना है। कविता याद दिलाती है कि ‘यह एक लुटेरा अपराधी समय है/जो जितना लुटेरा है, वह उतना ही चमक रहा है और गूँज रहा है/हमारे पास सिर्फ़ अपनी आत्मा की आँच है और थोड़ा-सा नागरिक अंधकार/कुछ शब्द हैं जो अभी तक जीवन का विश्वास दिलाते हैं’। ‘आत्मा की आँच’, ‘थोड़ा-सा नागरिक अंधकार’ और ‘कुछ शब्द’ आज कविता का यही शास्त्र संभव है।
  • Bhartiya Naitik Shiksha : 4
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-267

    Availability: In stock

    नैतिक शिक्षा का प्रत्यक्ष पाठ बचपन में माता-पिता से तथा विद्यालयों में गुरुजनों के सान्निध्य में बैठकर मिलता है । धीरे-धीरे समझ विकसित होने पर धर्म और संस्कृति द्धारा भी हमें नैतिक शिक्षा का सैद्धान्तिक पक्ष स्वाध्याय के माध्यम से सीखने को मिलता है । फिर समाज और राष्ट्र के लिए किए गए सेवा-कार्यों के लिए समर्पण के प्रति हमारे मन में जो भावना निरंतर उठती रहती है, उससे हम यह जान सकते हैं कि हमारी नैतिक शिक्षा के संबंध में धारणा कितनी व्यावहारिक है।
    माता-पिता एवं गुरुजनों के प्रति बढ़ती अश्रद्धा, वैज्ञानिक दुष्टिकोण
    के नाम पर धर्म एव संस्कृति के प्रति घटती निष्ठा ने नैतिक शिक्षा को
    विवादों के घेरे में ला दिया है। सरकार द्वारा पाठयक्रम में भले ही उसे
    पढाने का संकेत दिया जाता रहा है, किन्तु ऐसे कितने शिक्षक एवं
    विधालय है जो इसके प्रति गंभीर हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव समाज एवं
    राष्ट्र में बढ़ती चोरी, लूटमारी, बेईमानी, हिंसा और भ्रष्टाचार के रूप में
    दिखाई देने लगा है।
    घर में माता-पिता को समयाभाव के कारण नैतिक शिक्षा का पाठ पढाने का समय भी नहीं मिलता । अत: विद्यालयों को ही इसका दायित्व संभालना होगा । यह ठीक है कि विद्यालयों में भी पठन-पाठन एवं परीक्षा- कार्यों की अधिकता के कारण समयाभाव रहता है, किन्तु तीन स्तरों पर यह संभव है…एक तो विषयों के पठन-पाठन के अंतर्गत ही जो नैतिक संदर्भ आते है, उन प्रसंगों का सदुपयोग कर, दूसरे, नैतिक शिक्षा के अन्य कार्यक्रम बनाकर, जैसे-प्रार्थना, पुस्तकालय, पत्रिका, संग्रह-पुस्तिका, दुश्य-श्रव्य सामग्री तथा दिनचर्या आदि सभी माध्यमों का प्रयोग करने का वातावरण  बनाकर।  तीसरे, विद्यालय की दैनिक गतिविधियों में ऐसे अवसर प्रदान कर जिससे बालको में नैतिक विचारों को व्यावहारिक रूप से अपनाने की भावना जगे ।
  • Akela Mela
    Ramesh Chandra Shah
    225 203

    Item Code: #KGP-705

    Availability: In stock

    अकेला मेला
    ‘उसी एकांत में घर दो जहाँ पर सभी आवें/मैं न आऊँ’...इस प्रसिद्ध कविता के कवि की ही तरह हर लेखक की यही आकांक्षा होती होगी कि वह अपने लेखन में एक ऐसा निर्वैयक्तिक सुर साध सके, जिसमें हर आदमी को अपने ‘हृदय की बात’ सुनाई पड़े, और, साथ ही, पृष्ठभूमि का वह कलह-कोलाहल भी, जिसके बीचोबीच वह रहता है और जिसके कारण, जिसके फलस्वरूप ही उसे वह बात अपने हृदय की बात लगती है।
    कवि-कथाकार और आलोचक रमेशचन्द्र शाह की यह पुस्तक चूँकि उनकी डायरी है--उनके लेखकीय अंतर्जीवन का अंतरंग साक्ष्य--इसलिए यहाँ ‘सब’ के साथ ‘मैं’ अनिवार्यतः गुँथा हुआ है। बगै़र इस लेखकीय ‘मैं’ की निरंतर उपस्थिति और आवाजाही के, भला इस डायरी नाम की विधा का औचित्य ही क्या ! परंतु इसके पृष्ठों से गुज़रते हुए आप देखेंगे--खुद महसूस करेंगे कि किस क़दर यह लेखक आपके अपने जीवनानुभव में घुल-मिल सकता है, किस क़दर उसके घरेलू, सामाजिक और साहित्यिक अनुभवों में आपकी पैठ सहज ही बनती चलती है; यहाँ तक कि इस लेखक के जो अनुभव या सरोकार आपकी अपनी पसंद या जानकारी के दायरे से बाहर पड़ते होंगे, वे भी अपने आप में इतने उत्तेजक हैं कि आपको पता भी नहीं चलेगा, कब कैसे उन्होंने आपको अपने घेरे के भीतर खींच लिया।  
    बेशक, इसमें ज्ञान की बातें हैं, पर कितने आपके काम की, कितना आपको रमाने वाली ?---बशर्ते आप रमना चाहें इनमें। और, भला क्यों न रमेंगे आप इनमें भी बाक़ी जगहों की ही तरह ? क्या इस ज्ञान का भी अपना, बेहद अपना रस नहीं, जो आपके भी सिर पर चढ़कर बोल सके ? देस-बिदेस, अपना- पराया सब भुलाके रख दे--ऐसी माया है इन कुछ अध्ययन-प्रसंगों की भी कि वे आपको नितांत अपने लगेंगे।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar
    Kamal Kumar
    230 207

    Item Code: #KGP-688

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Paani Kera Budbudaa
    Susham Bedi
    300 270

    Item Code: #KGP-9310

    Availability: In stock

    ‘यही कहानी थी पिया की? यह कथन है या सवाल? नहीं, कथन नहीं हो सकता। ऐसे खत्म नहीं हो सकती यह कहानी! ...शायद जिंदगी का सच यही है। कुछ भी नहीं है वहां पर हम बहुत कुछ भरकर उसी को सच मान बैठते हैं। ...पिया के मन में विरक्ति-सी हुई। सच क्या हस्ती है हमारी? कबीर के ही लफ्जों में पानी के बुलबुले जैसी!’ ये पंक्तियां ‘पानी केरा बुदबुदा’ उपन्यास का सारांश सरीखी हैं। सुप्रसिद्ध लेखिका सुषम बेदी का यह नवीनतम उपन्यास—जीवन, प्रेम, विवाह, सुख, विराग आदि शब्दों को समकालीन संदर्भ देते हुए लिखा गया है। उपन्यास विदेशी पृष्ठभूमि में लिखा गया है, लेकिन इसकी बेचैनियां सार्वदेशिक हैं।
    पिया इस उपन्यास का केंद्रीय चरित्र है। उसका वैवाहिक जीवन, विवाह विच्छेद, तलाक के बाद प्रेम को फिर विवाह में बदलने की आकांक्षा, पुत्र और उसका पारिवारिक परिदृश्य—ऐसी अनेक बातों से मिलकर इस उपन्यास की कथावस्तु निर्मित हुई है। इस निर्मिति में निशांत, अनुराग, दामोदर, रोहन आदि बहुत दिलचस्प तरीके से शामिल हैं। पिया के लिए सेक्स कोई दुराग्रह नहीं है, पर वह ‘साथ’ चाहती है। विवाह इसीलिए उसे आश्वस्त और आकर्षित करता है। लेकिन नियति या मानव स्वभाव का निर्णय कुछ दूसरा है।
    सुषम बेदी कथानक को गतिशील रखते हुए जीवन की मूलभूत चिंताओं पर बात करती हैं। स्वाभाविक रूप से स्त्री-विमर्श भी आता है। पिया के बारे में लेखिका का कथन है, ‘अनुराग ने उसके फूलों की गुलाबी रंगत ही देखी थी। पर वहां खून के थक्के भी जमे हुए थे।’ ऐसी जाने कितनी विडंबनाएं इस उपन्यास को स्त्री-जीवन का मार्मिक दस्तावेज बना देती हैं। सुषम बेदी का लंबा जीवनानुभव और जनमनोविज्ञान समझने का ढंग भाषा के अनूठे स्वरूप में व्यक्त हुआ है। बेहद पठनीय और विचारोत्तेजक उपन्यास। 
  • Jan, Samaaj Aur Sanskriti
    Vishnu Prabhakar
    35 32

    Item Code: #KGP-9141

    Availability: In stock

    वे कुछ भी क्यों न हों पर उनमें से अधिकांश के पीछे एक समान दृष्टि है । वह दृष्टि परंपरा को नकारती नहीं, बल्कि उसके मध्य से भावात्मक एकता की कल्पना की एकता-मूलक संस्कृति को समझने-पहचानने की कोशिश करती है । वह दृष्टि धर्म, समाज, संस्कृति और संप्रदाय के मोहातीत सही अर्थ जानने को भी व्यग्र है । उसमें न पूर्वाग्रह है, न विद्वत्ता का उदघोष, बल्कि जो उपलब्ध है, उसकी सहायता से खोज की, निरंतर खोज की छह है । इससे अधिक का दावा किया भी नहीं जा सकता क्योंकि सर्जक के सामने मंजिल होती ही नहीं, तलाश होती है । 
    तलाशो तलब में वह लज्जत मिली है 
    दुआ कर रहा हूँ की मंज़िल न आवे । 
  • Ved Kya Hain ?
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-8002

    Availability: In stock

    पुस्तक के प्रारम्भ में यह बताने की कोशिश की गई है कि वेद का अर्थ क्या है तथा वेदों का निर्माण कब हुआ । फिर चारों वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के बारे में अलग-अलग बताया है कि उनमें से प्रत्येक में क्या-क्या है। इसके साथ ही यह भी बताया है की प्रत्येक वेद के चार भाग हैं —संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद । फिर इन चारों भागों के बारे में विस्तृत चर्चा की गयी है।
    इसके उपरांत वेदांगों के बारे में जानकारी दी गयी है । वेदांग छह हैं — शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंदशास्त्र । इन छह वेदांगों के बारे में पुस्तक में सविस्तार चर्चा की गयी है । 
    चारों वेदों के आलावा चार उपवेद भी हैं । ये हैं—आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्व वेद तथा स्थापत्य वेद । इनके बारे में भी आवश्यक जानकारी पुस्तक में दी गयी है ।
  • Avsarvaadi Bano
    Vishv Nath Gupta
    75 68

    Item Code: #KGP-1803

    Availability: In stock

    रीति सम्प्रदाय के अनुयायी आचार्य कुन्तक ने कहा है :
    'वक्रोक्ति : काव्यस्य जीवितम' अर्थात् उक्ति की वक्रता ही काव्य का जीवन है। काव्यप्रकाश के प्रणेता आचार्य मम्मट भी व्यंजना-प्रधान रचना को ही उत्तम काव्य मानते हैं।
    वस्तुत: बात सब करते हैं किन्तु बात करने का ढंग सबका अलग-अलग होता है। एक की बात में रस की फुहार होती है किन्तु दूसरे की बात नीरस होती है। ऐसा क्यों ? क्योंकि बात को कहने की शैली अच्छी न थी। स्पष्ट है कि एक बात कई मुखों से सुनने पर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ श्रोता के मन-मस्तिष्क पर उत्पन्न करती है । जो शैली अथवा ढंग श्रोता तथा दर्शक को प्रभावित करने में अथवा रसासिक्त करने में समर्थ होती है, वही काव्य में रसोत्पत्ति करने में भी समर्थ होती है।
    निकम्मी से निकम्मी बात प्रभावोत्पादक ढंग से कही या लिखी जाने पर काव्यास्वाद का आनन्द देती है किन्तु अच्छी बात भी यदि उचित ढंग से न कही जाए तो नीरस बनकर रह जाती है। काव्य में औचित्य का महत्त्व नकारा नहीं जा सकता, तभी तो कलामर्मज्ञ क्षेमेन्द्र ने औचित्य को काव्य-स्थिरता का मापदण्ड माना है ।
    स्पष्ट है वक्रता और औचित्य के विना काव्यत्व की बात निरर्थक है। मेरे इन बीस निबन्धों के संग्रह 'अवसरवादी बनो' में उपर्युक्त दोनों तथ्यों के आत्मसात करने की भरपूर चेष्टा रही है, अत: आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी है कि 'अवसरवादी बनो' कृति सामाजिक रूढियों पर प्रहार करेगी और सामाजिकों को स्वस्थ मनोरंजन की उपलब्धि भी कराएगी । इससे अधिक की बात प्रबुद्ध पाठको पर ही छोड़ देना श्रेयस्कर होगी।
    --भरतराम भट्ट
  • Neend Se Pahale
    Soma Bharti
    195 176

    Item Code: #KGP-373

    Availability: In stock

    नींद से पहले
    सोमा भारती की कहानियां हमें उस जानी-पहचानी निम्न- मध्यमवर्गीय दुनिया में ले चलती हैं, जिनसे हम जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जिन्हें हम देखकर भी अनदेखा किए रहते हैं।
    इनके पात्र, चाहे वह ‘जस्सो मासी मर गई’ की जस्सो मासी हों या ‘नींद से पहले’ के रमापति, ‘किराये के मकान’ की पेइंग गेस्ट हो या कोई अन्य, मोमबत्तियों की तरह हवाओं में जूझते, जलते-गलते रहते हैं। वे आपसे दया की भीख नहीं मांगते, लेकिन समय, संयोग और नियति ने उन्हें जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, उसका दीदार जरूर कराती हैं कि देखो, यह मैं हूं, यह तुम भी हो सकते थे।
    सोमा ने अभिनय और एंकरिंग आदि अभिव्यक्ति के जिन मंचों पर काम किया है, उसका लाभ उनकी भाषा-भंगिमा, भाव और बोध को मिला है। कहानियों के रचाव-रसाव के लिए सोमा को किसी सायासता की जरूरत नहीं पड़ती, भाषा-शिल्प के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते, न ही चैंकाने वाले चमत्कारों के टोने-टोटके टटोलने की आवश्यकता होती है। कहानियों की सहज संवेदना ही उनकी शक्ति है, जिनकी तासीर खुद-ब-खुद आपको पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
    सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ! सोमा ने दूसरी कहानियां न भी लिखी होतीं, उनकी अकेली कहानी ‘जस्सो मासी मर गई’ ही उन्हें अमर बना सकती है।
    --संजीव
  • Samay Mein Vichar
    Prabhakar Shrotiya
    575 518

    Item Code: #KGP-830

    Availability: In stock

    समय में विचार
    ऐसी यथार्थपूर्ण, गहन, तर्कपुष्ट एवं झकझोरकर रख देने वाली अभिव्यक्ति हिंदी में कम ही हुई है। यह आश्चर्यचकित कर देने वाला तथ्य है कि शायद श्रोत्रिय जी का साहित्यिक पाठक इन आलेखों को पढ़ने के बाद सहसा विश्वास न कर सकेगा कि एक आलोचक अपने काल के प्रवहमान विचार-बिंदुओं पर भी इतनी गहराई, तन्मयता एवं राग से लिख सकता है। हमारे राष्ट्रीय जीवन की विडंबनाएं यदि यहां रेखांकित हैं तो सामाजिक जीवन की विसंगतियां भी उद्घाटित हैं। एक ओर अंतर्राष्ट्रीय जीवन की धड़कनों पर नज़र है तो दूसरी ओर वैश्वीकरण के छल-छद्म एवं राजनीतिक बिसात पर बिछे कूटनीतिक मोहरों की चालें भी लेखक की दृष्टि से नहीं बची हैं।...वर्तमान के अंतर्विरोध पर गहरी नज़र के साथ-साथ भविष्य की चिंताकुलता इन आलेखों का वैशिष्ट्य है।
    –पश्यंती
    ये निबंध जहां एक ओर पाठकों की कसौटी पर पहले से ही परीक्षित हैं, वहीं अपने समय के फलक पर वस्तुनिष्ठ चिंतन की एक ऐसी निर्मिति हैं, जिन्हें अपने समय, समाज और साहित्य के प्रति सजग एक लेखक का तत्त्व-चिंतन माना जाना चाहिए और यदि हम सुपरिचित लेखक शुकदेव सिंह के मत का आश्रय लें तो ‘ये निबंध (आज व्यक्तिवादी चित्तवृत्ति को केंद्र में लेकर लिखे जा रहे संपादकीयों के सापेक्ष) निबंधों के विकल्प के रूप में एक सात्त्विक विधा का आविष्कार हैं।’  
    –जनसत्ता, सबरंग
    श्रोत्रिय जी अकेले दम पर सच लिख रहे हैं, एक भारतीय मनुष्य के नैतिक विजन के साथ। उनकी निर्भीकता तीसरी दुनिया की मनीषा की निर्भीकता है, प्रदत्त स्थितियों और प्रयोजन की परिस्थितियों से मुठभेड़ की यह मनीषा उम्मीद जगाती है।...संरचना में आश्चर्यजनक अनुशासन का परिचय देते हुए कथ्यगत क्रांतिकारी आशय भर देना कोई श्रोत्रिय जी से सीखे। यह गद्यकला का नागर स्वभाव उन्होंने बड़ी साधना से अर्जित किया है।...यह उन रचनाकारों-आलोचकों का पथ है, जो स्वतंत्रता की बात करते हैं, आत्मा और विवेक को गिरवी नहीं रखना चाहते।...श्रोत्रिय जी जड़ सूत्रवादियों और अंध मतवादियों के उन तमाम विभ्रमों का खंडन करते हैं, जो स्वाधीनता को विचारहीनता मानते हैं। स्वाधीनता का तर्क विचारहीनता का पर्याय नहीं है, न ही हर बार अचूक अवसरवाद। स्वाधीनता व्यक्ति हो, समाज हो, राष्ट्र हो, सबसे अपना मूल्य मांगती है।...                      
    –समीक्षा
  • Gareeb Mahilayen Udhar Evam Rozgaar
    Indira Mishra
    250 225

    Item Code: #KGP-37

    Availability: In stock

    भारत में गरीबी की समस्या प्रबल है और गरीबी की मार महिलाओं पर अधिक सीधी और तीखी होती है, क्योंकि महिलाएं परिवार के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार ठहराई जाती हैं। वे मातृत्व का भार वहन करते हुए शरीर से दुर्बल होती हैं, यद्यपि उनमें भावनात्मक इच्छाशक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। गरीबी को दूर करने के लिए केंद्रीय तथा प्रदेश सरकारें, स्वायत्त संस्थाएं तथा अन्य कई प्रकार की एजेंसियां कटिबद्ध हैं, किंतु यह समस्या अभी तक कारगर ढंग से सुलझाई नहीं जा सकी। गरीब तथा ग्रामीण महिलाएं अक्सर अचल संपत्ति-विहीन और शिक्षा के लाभ से वंचित होती हैं। फिर भी उनके अंदर रचनात्मकता तो होती ही है तथा अपनी मदद स्वयं करने के लिए भी वे सतत उत्सुक होती हैं।
    ऐसी महिलाओं की, जो स्वयं की छोटी सी दूकान खोलना या कोई अन्य छोटा-मोटा रोजगार करना चाहती हैं, कर्जे की आवश्यकता बहुत ज्यादा नहीं होती। दूसरी आजमाई हुई बात यह है कि महिला उतना ही ऋण लेना पसंद करती है जितने को किस्तों में लौटा भी सके। किंतु इस सबके बावजूद कोई भी वित्तीय संस्था एकाएक उसे कोई ऋण देने की स्थिति में नहीं होती।
    प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे विषय सामान्य नागरिकों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा बैंककर्मियों आदि के समक्ष स्पष्ट किए गए हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrawan Kumar
    Shravan Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-9163

    Availability: In stock

    इस सीरीज के अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकार श्रवणकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं-‘मैं’, ‘चालाक’, ‘एक और मरजीवा’, ‘याद करो, याद करो’, ‘डायन’, ‘नहीं, यह कोई कहानी नहीं’, ‘सैलाब’, ‘मामूली लोग’, ‘दीमक’ तथा ‘मैं और तुम’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार श्रवरणकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Vipradas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-852

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhairav Prasad Gupt
    Bhairav Prasad Gupt
    200 180

    Item Code: #KGP-2066

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भैरवप्रसाद गुप्त ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'घुरहुआ', 'धनिया की साड़ी', 'कदन के नीचे', 'चाय का प्याला', 'चरम बिंदु' , 'पियानो और सोने का पिंजड़ा', 'अपरिचय का घेरा','चुपचाप', 'मंगली की टिकुली' तथा 'श्रम' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भैरवप्रसाद गुप्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bharat : Tab Se Ab Tak
    Bhagwan Singh
    325 293

    Item Code: #KGP-9124

    Availability: In stock

    भगवान सिंह ने कविता, कहानी, व्यंग्य, आलोचना, उपन्यास, भाषा-समस्या जिस भी विषय पर लिखा है, उसमें उनका एक नया तेवर रहा है। उनका एक उपन्यास तो हिंदी के सबसे चर्चित और विवादित उपन्यासों में आता है। परंतु इतिहास पर उनका लेखन जितना विचारोत्तेजक और क्रांतिकारी माना गया है, उसकी तुलना उनके अन्य किसी विधा में किए गए लेखन से नहीं की जा सकती। व्यावसायिक इतिहासकार न होते हुए भी उन्होंने प्राचीन इतिहास की जड़ीभूत मान्यताओं को खंडित करते हुए इसकी गहनता, व्याप्ति और दिशा सभी को बदला है और इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों और मनस्वी पाठकों के बीच उसका स्वागत हुआ है।
    प्रस्तुत संग्रह में भी इतिहास पर लिखे गए उनके कुछ ऐसे लेख हैं, जिन्होंने पाठकों और श्रोताओं को उद्वेलित और प्रेरित किया है और उनको पुनर्विचार के लिए बाध्य किया है। साथ ही कुछ ऐसे नए लेख भी हैं, जो इससे पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुए हैं। इनके कारण निबंधों का समग्र फलक बहुत व्यापक हो गया है। जहां कुछ लेखक एक ऐसे अतीत में ले जाते हैं, जहां प्रकाश की कोई अन्य किरण आज तक पहुंच नहीं पाई थी और जिससे आज के दस-बीस हजार या इससे भी पहले की मानसिक ऊहापोह पर हलका और कुछ रंगीनी-भरा प्रकाश पड़ता है, वहीं ऐसे लेख भी हैं, जो ठीक आज की समस्याओं या वर्तमान के अतीत और वर्तमान दोनों की, तीखी पड़ताल करते हैं।
  • Imandaari Ka Swaad
    Harish Kumar 'Amit'
    180 162

    Item Code: #KGP-9367

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro-2 (Sadhna)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-763

    Availability: In stock


  • Guftgoo : Sarhadon Ke Aar-Paar
    300 270

    Item Code: #KGP-2063

    Availability: In stock

    गुफ्तगू : सरहदों के आर-पार
    प्रेमकुमार की यह पुस्तक अपनी भिन्न विशिष्ट पद्धति और अभिव्यक्ति वाले साक्षात्कारों के माध्यम से पांच देशों के सात स्थापित-सुविख्यात साहित्यजीवियों की जिंदगी और लेखन के अनेक अनसुने-अनजाने प्रसंगों-हिस्सों से सहज-दिलचस्प ढंग से पाठक का परिचय कराती है। पांच देश-भारत, आस्ट्रिया, ईरान, पाकिस्तान और अमेरिका।  सात साहित्यजीवी--नैयर राही, आंद्रेयास वेबर, अली मुहम्मद मुअज्जनी, सलीमा हाशमी, अहमद फराज, इंतिजार हुसेन और मुनीबुरर्हमान। 
    इन बातचीतों के माध्यम से रचनाकारों के परिवेश, लेखन और लेखन-प्रक्रिया के बारे में तो आसानी और सहजता के साथ जाना-समझा जा ही सकेगा, भिन्न-भिन्न देशों व भाषाओं के पारस्परिक संबंधों, उनके बीच की सामाजिक-सांस्कृतिक समानताओँ-असमानताओँ, समस्याओं-संभावनाओं आदि को भी समझने-सुलझाने या विवेचित-विश्लेषित करने में मदद भी मिलेगी। तमाम तरह की बाडों-सीमाओं को लांघ-पारकर कोई सृजन या अभिव्यक्ति कैसे यहां-वहां सब कहीं स्वीकृत- समादृत हो पाते हैं-ऐसे कुछ सूत्रों-प्रश्नों के मूल और हल भी इन संवादों में ढूंढे-तलाशे जा सकते हैं ।
    अत्यंत अनौपचारिक, आत्मीय और विश्वासपूर्ण वातावरण में अप्रत्याशित ढंग से संभव-संपन्न हुई इन बातों- मुलाकातों का एक अहम और उल्लेख्य पक्ष यह भी है कि सात में से पांच बातचीतें सीधे-सीधे संबंधित साहित्यकारों से हुई हैं, जबकि दो रचनाकारों के जीवन-लेखन को उनके दो अत्यंत करीबी संबंधों के सोच और दृष्टि से जाना-समझा गया है। राही मासूम रजा की पत्नी नैयर राही ने अपने सर्जक-पति और फैज अहमद 'फैज' की बडी बेटी सलीमा हाशमी ने अपने रचनाकार पिता के जीने-सोचने, लिखने तथा उनके जीवन-मूल्यों, अभावों, संघर्षों आदि के बारे में बातों-बातों में बहुत कुछ समझा-बता देना चाहा है।
    निश्चय ही ये बातचीतें सुधी पाठकों, साहित्यसेवियों एवं शोधार्थियों के लिए पठनीय और उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Kashmkash
    Manoj Singh
    520 468

    Item Code: #KGP-846

    Availability: In stock


  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-1
    Kamal Kishore Goyenka
    500 440

    Item Code: #KGP-57

    Availability: In stock

    मंजुल भगत : समग्र कथा-साहित्य (1)
    संपूर्ण उपन्यास
    हिंदी की प्रख्यात लेखिका मंजुल भगत को मैंने कुछ गोष्ठियों में बोलते सुना और संवाद भी किया तो पाया कि वे भारतीय स्त्री का प्रतिरूप है । उनमें भारतीय स्त्री के गहरे संस्कार थे । उनसे मिलना भारत की एक आधुनिक स्त्री से मिलना था । यह स्त्री भारत की संस्कृति और यहाँ  की मिट्टी की उपज थी, जिसमें गहरा अस्तित्व-बोध एवं  स्त्री-स्वातंत्र्य की चेतना थी । उन जैसी संस्कारवान, संकल्पशील, संघर्षरत और संवेदनाओ से परिपूर्ण लेखिका के संपूर्ण कथा-साहित्य के संकलन तथा संपादन का कार्य  करना मेरे लिए गौरव की बात है ।
    मजुल भगत की प्रमुख विधा कहानी है और इसी से वे साहित्य में प्रवेश करती हैं, परंतु उपन्यास के क्षेत्र मैं भी उन्होंने अपनी लेखन-प्रतिभा का परिचय दिया और 'अनारो' जैसे उपन्यास की रचना करके देश-विदेश में ख्याति प्राप्त की ।
    लेखिका के सभी उपन्यास-'टूटा हुआ इंद्रधनुष', 'लेडीज़ क्लब', 'अनारो', 'बेगाने घर में', 'खातुल', 'तिरछी बौछार’ तथा 'गंजी' के साथ-साथ उनके प्रकाशित कूल कहानी-संग्रहों में संकलित कहानियों को इस संकलन-द्वय से एक साथ प्रस्तुत किया गया है ।
    इस समग्र रचना-संसार को पढ़कर कहा जा सकता है  कि साहित्य के प्रति मंजुल भगत की गहरी आस्था थी । लेखिका का दृढ़ विश्वास था कि आने वाले समय में, तमाम अपसंस्कृति एवं अमानवीयकरण के बावजूद उनके उपन्यास और कहानियाँ अवश्य ही पढे जाएंगे । बीसवीं शताब्दी में भारतीय स्त्री को जानने और समझने के लिए मंजुल भगत का कथा-साहित्य एक प्रामाणिक दस्तावेज है
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amarkant
    Amarkant
    150 135

    Item Code: #KGP-2076

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अमरकान्त ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इंटरव्यू', 'जिंदगी और जोंक', 'शुभचिंता', 'लड़का-लड़की', 'फर्क', 'मित्र-मिलन', 'बहादुर', 'बउरैया कोदो', 'श्वान गाथा' तथा 'जनशत्रु'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अमरकान्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Lauh Kapaat Ke Pichhe
    Shravan Kumar Goswami
    60 54

    Item Code: #KGP-1971

    Availability: In stock

    हर जेल के आगे एक अभेद्य लौहकपाट होता है । इसके पीछे एक दुनिया होती है, जो हमारी अपनी ही दुनिया का हिस्सा होते हुए भी, इस दुनिया से बिलकुल स्वतन्त्र एक अलग ही दुनिया होती है । इसके अपने कायदे-कानून होते हैं । यहां जो कुछ भी होता है, उसकी खबर किसी को भी नहीं मिलनी । इसकी चिंता न तो खोजी पत्रकारों को सताती है और न हमारी सरकारों को । इसकी सुधि न तो विरोधी दल के लोग लेते हैं और न न्यायाधीश । 'लौहकपाट के पीछे" वास्तव में जो होता है, उसकी सही जानकारी इसके भीतर रहने वाले बंदियों को भी नहीं मिल पाती है ।
    इस पुस्तक के लेखक ने किसी की हत्या नहीं की थी, उसने किसी के साथ बलात्कार भी नहीं किया था, उसने कोई डकैती भी नहीं की थी और न उसने किसी सरकार का तख्ता पलटने का षड़यन्त्र ही किया था, फिर भी बिहार सरकार ने श्रवणकुमार गोस्वामी को अपने विश्वप्रसिद्ध हजारीबाग के केंद्रीय कारागृह में कुछ समय के लिए कैद रखा था । अपने कारावास के दौरान लेखक ने जेल-जीवन को अत्यन्त समीप से केवल देखा ही नहीं, बल्कि उसे भोगा भी है । अपने इन्हीं अनुभवों का जो विवरण लेखक ने इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है, वह केवल चौकानेवाला ही नहीं, अपितु सभ्य संसार के मुँह पर एक करारा तमाचा भी है ।
    मनोविज्ञान, अपराधशास्त्र, समाजशास्त्र तथा संस्मरण के चौराहे पर खडी यह पुस्तक एक ऐसी विरल कृति है, जो लेखक के उपन्यासों के समान ही अत्यन्त प्रवाहपूर्ण एवं रोचक है ।
    'लौहकपाट के पीछे' उन सभी व्यक्तियों की आंखें खोलने वाली एक अत्यन्त उत्तेजक, उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक है, जो 'मनुष्य और समाज' के बारे में निरन्तर सोचते हैं और मनुष्य के'कल्याणमय भविष्य' के लिए चिन्तित भी रहते हैं। 
  • Baldev Vanshi Kavita-Samagra ( 3 Vols.)
    Baldev Vanshi
    1750 1575

    Item Code: #KGP-690

    Availability: In stock

    Complete set of 3 Books.
  • Rangon Ki Gandh-1
    Govind Mishra
    530 477

    Item Code: #KGP-9160

    Availability: In stock

    रंगों की गंध

    यात्रा जीवन के दूसरे अनुभवों से थोड़े अलग किस्म का अनुभव है। जहां दूसरे अनुभव हमें साफ-साफ जोड़ते-तोड़ते हैं, अपनी अंतरंगता में चरमरा डालते हैं या फिर सूखा-सूखा और दूर-दूर रखते हैं...वहां यात्रा दूसरी रखते हुए भी पास लाती हे, हम अपने खोल से बाहर निकलकर संसार की व्यापकता को छूते होते हैं। व्यापकता की यह छांह दुखी व्यक्ति को टूटने से बचाती है। स्वयं से थोड़ा वैराग्य और बाहर से जुड़ना दोनों एक साथ होता चलता है। मेरे लिए जो इससे बड़ी बात है, वह यह कि यात्रा में हम चलते हैं, हर हाल में चलते रहना-यह मेरी जिद दृढ़तर करती है यात्रा।
    -गोविन्द मिश्र
  • Science Ki Karamaat
    Dhram Pal Shastri
    100 90

    Item Code: #KGP-9204

    Availability: In stock

    यह युग विज्ञान का युग है अर्थात् साइंस की करामात का युग। विज्ञान की नवीनतम उपलब्धियों से सारा संसार चकित है और साथ ही चिंतित भी; क्योंकि आज का विज्ञान कल्याणकारी भी है और विनाशकारी भी। विश्व-भर में वैज्ञानिक अनुसंधानों-आविष्कारों की होड़ लगी हुई है। विज्ञान की इस प्रतिस्पद्र्धा ने मानव-कल्याण के बहुत-से आयाम प्रस्तुत किए हैं, लेकिन साथ ही संपूर्ण मानव जाति को विनाश के कगार पर भी ला खड़ा किया है। विनाशकारी अणु बमों, उद्जन बमों, प्रक्षेपास्त्रों, ध्वंसक राॅकेटों तथा समुद्री पनडुब्बियों का निर्माण वैज्ञानिकों की खोज का ही परिणाम है।
    इस पुस्तक में इन सभी की प्रारंभ से लेकर अब तक की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की गई है तथा विज्ञान-क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान और उपलब्धियों पर सरल एवं रोचक शैली में प्रकाश डाला गया है। अंतरिक्ष के बारे में जिज्ञासु पाठकों के लिए यह पुस्तक निःसंदेह उपयोगी सिद्ध होगी।
  • Sapanon Ki Neeli Si Lakeer
    Amrita Pritam
    240 216

    Item Code: #KGP-1972

    Availability: In stock

    सपनों की नीली-सी लकीर
    एक वर्जित फल खाने पर 'आदम' और 'हव्वा' को जन्नत से निकाल दिया गया था । इस इतिहास को मैंने एक नज्म में लिखा : "एक शिला थी और एक पत्थर, जिन्होंने वर्जित फल खा लिया, और जब मैली जमीन पर वो पत्थरों की सेज पर सोये तो उन पत्थरों की टक्कर से आग की एक लपट-सी पैदा हुई--बदन में से आग का जन्म हो गया तो पत्थर भी कांप गया, शिला भी कांप गई । समाज की नजर का धुआं ही उनके पास था, उसी की घुट्टी उस आग को दे दी तो पवन की छाया हंसने  लगी---फिर शिला और पत्थर धरती के हवाले हुए और आग की लपट पवन के हवाले और मैं आग की लपट-सी हैरान थी कि मेरे भीतर से यह सपनों के नीली-सी लकीर कहां से निकलती है" यह उस नीली-सी लकीर का तकाजा था कि मैं हर कल्पना को धरती पर उतार लेना चाहती थी--अपनी कलम से भी और अपने कर्म से भी ।
    - अमृता प्रीतम
  • Aakhir Kab Tak
    Rajendra Avasthi
    450 405

    Item Code: #KGP-137

    Availability: In stock

    आखिर कब तक ?
    राजेन्द्र अवस्थी कथाकार और पत्रकार तो हैं ही, उन्होंने सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा सामयिक विषयों पर भी भरपूर लिखा डै । अनेक दैनिक समाचार-पत्रों तथा पत्रिकाओं में उनके लेख प्रमुखता से छपते रहे । उनकी बेबाक टिप्पणियाँ अनेक बार आक्रोश और विवाद को भी जन्म देती रहीं, लेकिन अवस्थी जी कभी भी अपनी बात कहने से नहीं चूकते । वह कहेंगे और बहुत निडर तथा बेबाक होकर कहेंगे, भले ही उनके मित्र भी उनसे अप्रसन्न क्यों न हो जाएँ । परिणामस्वरूप, उनका यह लेखन समसामयिक साहित्य का दस्तावेज बन गया । उन्होंने कई सुविख्यात व्यक्तित्व के जीवन को आधार बनाकर औपन्यासिक कृतियाँ दी हैं  और उनमें कथानायकों की विशेषताओं के साथ ही उनकी दुर्बलताओं की चर्चा भी की है । सक्रिय लेखन के दौरान बड़ी-बड़ी हस्तियों से उनका साबका तो पड़ता ही रहा । यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि कई बड़े लोगों के वह आत्मीय रहे हैं । ऐसे लेखन से उनका क्षेत्र व्यापक बना और साहित्य के रचना-प्रदेश के बाहर भी अन्य क्षेत्रों में उनकी खासी सर्जनात्मक पहचान बन पाई ।
    प्रस्तुत टिप्पणियां मूल्यवान लेखन है। लेखक का मानना है कि उन्होंने एक भी घटना न बनावटी लिखी है और न ही कभी झूठ-फरेबी पत्रकारिता को स्वीकारा । जो जैसा है, जो सही है, जो स्पंदित है, उसी पर उन्होंने लिखा है। इस दृष्टि से यह कृति अत्यंत मदृत्यपूर्ण हो उठती है ।

  • Mere Saakshaatkaar : Vidya Sagar Nautiyal
    Vidya Sagar Nautiyal
    250 225

    Item Code: #KGP-635

    Availability: In stock


  • Muhim
    Sitesh Alok
    280 252

    Item Code: #KGP-291

    Availability: In stock

    कहानियाँ किसी अन्य अनजान लोक से नहीं आतीं...हमारे बीच, हमारे आसपास ही उपजती और पनपती रहती हैं...किंतु कोई साहित्यकार ही अपनी पारखी दृष्टि से चुनकर और संवेदना से सँवारकर उन्हें शब्दों के संसार में स्थापित करता है। 
    बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. सीतेश आलोक ने गत तीन दशकों में साहित्य की अनेकानेक विधओं में अपने अवदान द्वारा एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, यात्रा-वृत्तांत, व्यंग्य, समसामयिक विषयों पर लेख आदि पर लिखी डॉ. आलोक की अनेक पुस्तकों को न केवल पाठकों ने सराहा, कई संस्थाओं ने सम्मान भी प्रदान किया। मौलिकता इनके लेखन की एक विशेषता है। इनके चरित्र एवं कथानक न तो किसी साँचे में ढलकर आते हैं और न किसी वाद से प्रभावित होकर रूपाकार ग्रहण करते हैं।
    डॉ. सीतेश आलोक उन इने-गिने लेखकों में से हैं जिनमें लीक से हटकर अनेक ऐसे विषयों पर भी लिखने का साहस है, जिन्हें अधिकांश लेखक छूने से भी कतराते हैं।
    इस संग्रह की अनेक कहानियाँ वागर्थ, साक्षात्कार, समकालीन भारतीय साहित्य, कथादेश, साहित्य अमृत, नयी धारा आदि में प्रकाशित एवं आकाशवाणी से प्रसारित हो चुकी हैं।
  • Ibne Mariyam
    Nasera Sharma
    240 216

    Item Code: #KGP-17

    Availability: In stock

    इब्ने मरियम 
    'इब्ने मरियम' की कहानियाँ निश्चय ही यह प्रमाणित करने में सक्षम हैं कि नासिरा शर्मा का रचनात्मक कैनवास व्यापक है । वह किसी भी तरह अपने दायरों में सिमटी-सिकुड़ी एकरसता में डूबी कहानियां नहीं लिखतीं । उनके पास वास्तव में एक ‘जहांनुमा' आईना है, जिसमें वह दुनिया-जहान को देखती है । उनकी कहानियों का भूगोल  किसी शहर, प्रान्त या देशों की सरहदों में कैद नहीं है, बल्कि उनके पास आर-पार और दूर-दूर तक देखने वाली दृष्टि है और यह दृष्टि सही मायनों में मानवीय है, भाईचारे का पैगाम देने वाली है । और भी कहें तो 'विश्व मानवता' का इतिहास रचने वाली है । वह इनके माध्यम से कहना चाहती हैं कि भाषा, प्रांत, धर्म, जाति, देश, सरहद, फौज, गोला-बारूद जैसा सबकुछ केवल अपनी कुंठाओं को बचाने और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के हथियार है, जो कभी भी सफल नहीं हो सकते । सर्वोपरि सिर्फ इंसान है और उसकी इंसानियत है, जिसे सात तालों में  भी कैद नहीं किया जा सकता । वह बहुत दूर तक देखती हैं और आत्मसात का अपने व्यापक कैनवास पर 'पेष्ट' करती है । इस रूप में उनके लिए सबसे अलग और सफल कथाकार होने का दावा किया जा सकता है ।
  • Boo Toon Raaji
    Padma Sachdev
    150 135

    Item Code: #KGP-60

    Availability: In stock

    बू तूँ राजी
    मैं मूलत: कवयित्री हूँ । जो बात कविता से बहुत बडी हो जाती है, वह कहानी बनकर मेरे हाथों में छोटे बच्चे की तरह कुलबुलाने लगती है । कहानी की यह मेरी दूसरी किताब है । कभी-कभी लिखती हूँ कहानियाँ, वह भी उस वक्त, जब कहानियों के पात्र मेरे आँचल का कोना पकडे-पकडे मेरी गरदन तक आकर मुझे दाब लेते है । और ये पात्र जब मेरे जीवन का हिस्सा हो जाते हैं तब में लफ्जों के दोने में इन्हें फूलों की तरह सजाकर अपने पाठकों की झोली में डाल देती हूँ फिर वे इसका हार बनाएँ, फूलों को मंदिर के आगे सजाएँ या अपनी आँखों की पतली काजल की लकीर से पिरोकर अपने गले में डालें-ये उनकी खुशी है । मेरी कहानियों के पात्र मेरे घर के सदस्यों की तरह हो जाते हैं । मैं चाहती हूँ, आप भी इन्हें अपनी बैठक में बैठने का स्वान दें ।
  • Khabar
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    1150 1035

    Item Code: #KGP-584

    Availability: In stock


  • Nikka Nimana
    Sushil Kalra
    400 360

    Item Code: #KGP-550

    Availability: In stock


  • Chandragiri Ke Kinare
    Sara Aboobkar
    75 68

    Item Code: #KGP-1958

    Availability: In stock


  • Vikalang Vibhutiyon Ki Jeevan Gaathayen
    Vinod Kumar Mishra
    700 616

    Item Code: #KGP-38

    Availability: In stock


  • Saleem Ke Shanidev
    Pankaj Prashar
    100 90

    Item Code: #KGP-9100

    Availability: In stock


  • Kartavya
    Samual Smiles
    240 216

    Item Code: #KGP-280

    Availability: In stock

    कर्तव्य
    चौबीस वर्ष पूर्व मैंने ‘आत्मनिर्भरता’ (Self Help)  पुस्तक लिखी थी। तीन वर्ष उपरांत सन् 1853 में वह प्रकाशित हुई। वह पुस्तक संयोग से ही लिखी गई थी। मैंने ‘लीडस’ स्थान पर नवयुवकों के सम्मुख कुछ भाषण दिए थे। उन भाषणों में मैंने इस बात पर जोर दिया था कि उनके जीवन की प्रसन्नता व सफलता मुख्यतः उनके निरंतर आत्मसंस्कार, अनुशासन, संयम और सबसे अधिक ईमानदारी व साहस से कर्तव्यपालन करने पर निर्भर करती है। मेरे इन भाषणों का आशा से अधिक प्रभाव हुआ।
    अपने व्यवसाय से अवकाश मिलने के बाद सायंकाल का समय मैं अपनी पुस्तक के लेखन में लगाता था। पुस्तक जब पूरी हो गई, तो मैंने उसे लंदन के एक प्रकाशक के पास भेजा। क्रीमिया के युद्ध के कारण उन दिनों पुस्तकें प्रायः बहुत कम बिकती थीं। इसलिए प्रकाशक ने धन्यवाद सहित मेरी पुस्तक लौटा दी। ‘जार्ज स्टीफेंसन का जीवन-चरित्र’ छपने के बाद ही श्री मूरे की कृपा से ‘आत्मनिर्भरता’ प्रकाशित हो सकी। 
    इसके तेरह वर्ष पश्चात् मेरी पुस्तक ‘चरित्र’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में मैंने महापुरुषों के चरित्रों को चित्रित करने का प्रयत्न किया, क्योंकि नवयुवकों को संस्कार देने का यह सर्वोत्तम ढंग है। इसके पाँच वर्ष बाद मेरी पुस्तक ‘बचत’ (Thrift) प्रकाशित हुई। इसमें मैंने श्रम के महत्त्व और बचत के लाभों पर जोर दिया था। 
    इनके पाँच वर्ष उपरांत इसी क्रम की अंतिम पुस्तक ‘कर्तव्य’ प्रकाशित हो रही है। मुझे आशा है कि पिछली पुस्तकों की तरह यह भी पाठकों एवं बुद्धिजीवियों को आकर्षित करेगी। इस पुस्तक में मैंने सर्वोत्तम और साहसी स्त्री-पुरुषों के उदाहरण दिए हैं। महापुरुषों के जीवन हमें यह शिक्षा देते हैं कि हम भी उन्हीं की तरह कार्य कर सकते हैं। जो व्यक्ति कर्तव्य की उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह महान् बन जाता है।  
    —सैमुअल स्माइल्स
  • Mataki Mataka Matkaina
    Dronvir Kohli
    100 90

    Item Code: #KGP-977

    Availability: In stock

    तुम यह जानना चाहोगे कि मैंने यह कहानी कैसे लिखी। वैसे, कुछ लेखक अपना भेद बताने से कतराते हैं। लेकिन मुझे कोई आपत्ति नहीं है सारी बात बताने में।
    मैं विदेश-भ्रमण करता रहता हूं। एक बार मैं एक देश के एक ऐसे नगर में गया जहां पतझड़ का मौसम था। सारे इलाके की शोभा देखते ही बनती थी। यह उस प्रदेश की विशेषता थी। पतझड़ के मौसम में वहां के गली-कूचे, सड़कें-पगडंडियों, घर-बाहर के लाॅन, पार्क और जंगल भांति-भांति के पेड़ों के झड़ते रंग-बिरंगे पत्तों से इस तरह ढक जाते थे कि सचमुच धरती दिखाई ही नहीं पड़ती थी। वहां के झड़ते सूखे पत्ते भी सुंदर लगते थे कि देख-देखकर हृदय बल्लियों उछलता था।
    इसके साथ ही वहां मैंने एक और अद्भुत बात देखी। वहां के रहने वाले लोग पतझड़ के पत्तों को जलाते नहीं थे क्योंकि इससे वायुमंडल दूषित होता है। वे करते यह थे कि सूखे पत्तों को बटोरकर सड़क के किनारे ढेर करते रहते थे। निश्चित दिन गाड़ी आती थी और पत्तों को समेटकर ले जाती थी।
    लेकिन इससे भी विचित्र बात वहां मैंने यह देखी कि ये सूखे पत्ते जब तक सड़क के किनारे पड़े रहते थे, तब तक बेचारी गिलहरियों की जान सांसत में आ जाती थी। सड़क के किनारे पड़े सूखे पत्तों के ऊंचे-ऊंचे अंबार फांदकर बेचारी गिहरियां आ-जा नहीं सकती थीं और गाड़ियों के नीचे आकर कुचली जाती थीं।
    संयोग से वहां मैं ऐसी बस्ती के एक घर में ठहरा था जो जंगल के सिरे पर स्थित था। मैं जब बाहर टहलने निकलता, तो सड़क पर दोनों तरफ टीलों की तरह लगे पत्तों के ढेर के साथ मरी हुई गिलहरियों को देखकर मन भारी हो जाता। बस, इन मृत गिलहरियों को देखकर ही मुझे यह कहानी लिखने की प्रेरणा मिली।
    सच पूछो तो, मैं उस शहर में न गया होता, और फिर जंगल के किनारे उस घर में न ठहरा होता, तो यह कहानी लिखी ही नहीं जा सकती थी। इसे लिखते समय मुझे अपार आनंद मिला।
    —द्रोणवीर कोहली
  • Kavi Ne Kaha : Gyanendrapati
    Gyanendrapati
    150 135

    Item Code: #KGP-163

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ज्ञानेन्द्रपति
    ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है । जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है ।  वे  कविता के नहीं, उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिसकी प्रस्तावना की थी । उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है । बेशक, यह हर बार एक नये छन्द का अन्वेषण हैं जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-द्रव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मता से सम्भव होता है । हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहां खूब बन पडा है । तदभव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है न देशज अस्मृश्य; अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक और तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जनमत भूमि पर दृढ़ता से पाँव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है । धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता-वह किसी को नहीं बख्शती । उसकी दीठ प संतप्त भूगोल है । साम्राज्यबाद के नए पैंतरों का वह पहचानती है । अभय में पगी हूई करुणा उसे विरासत में मिली है । वह एक महान् परम्परा की परिणति है ।
    स्वयं ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं ही, आयामी संग्रेहों से भी कविताएँ शामिल है, बल्कि अनेक तो पहली बार यही प्रकाशित हो रही हैं । बिला शक अपने समाज-समय को कविता को आँख से देखना-समझना चाहने वालों के लिए एक अनिवार्य-किताब नहीं-सहचर!
  • Naani
    Dronvir Kohli
    350 315

    Item Code: #KGP-522

    Availability: In stock


  • Kabir Ka Samagra Anbhai Sansar (2nd Part)
    Govind Rajnish
    1000 800

    Item Code: #KGP-489

    Availability: In stock

    संत कबीर भारतीय चेतना का ऐसा शिखर है जिसके सम्मुख शब्द और शब्दातीत नतमस्तक होते हैं। उनकी बानी ‘अनहद का अनुभव’ है। ऐसा अनुभव; जिसमें जीव, जगत् और परमात्मा की सघन अभिव्यक्ति है। कबीर की बानी साखी, सबद, रमैनी के अंतर्गत रखकर पढ़ने व विश्लेषित करने की सुदीर्घ परंपरा है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ में मर्मज्ञ आलोचक प्रो. गोविंद रजनीश ने इस परंपरा को संवधिर्त किया है।
    कबीर-काव्य के तीन स्रोत हैं—राजस्थानी, पंजाबी और पूरबी की प्राचीन पांडुलिपियाँ। इनके तुलनात्मक विवेचन द्वारा मूल व प्रामाणिक पाठ तक पैठने का यत्न किया गया है। कबीर के नाम से प्रचलित ‘बानियों’ और ‘क्षेपकों’ का तार्किक परीक्षण किया गया है। इससे कबीर-काव्य का आस्वाद दुगुना हो गया, ऐसा पाठक महसूस करेंगे।
    प्रो. रजनीश ने भावार्थ, पाठांतर और टिप्पणी के द्वारा कबीर के अनेक आयामों को उद्घाटित किया है। कबीर लोक में समाए संत-कवि हैं। उनसे संबंधित बहुतेरे तथ्य दंतकथाओं, जनश्रुतियों और अन्य शब्द-प्रपंच में ओझल होते रहे हैं। यहाँ एक प्रयास यह भी है कि ‘चिनगी’ को ‘राख’ से निकाल लिया जाए। तभी यह सिद्ध हो सका कि कबीर-काव्य समकालीन संदर्भों में एक नयी प्रासंगिकता अर्जित कर रहा है। झूठ, कपट, पाखंड के खिलाफ सदियों पहले गूँजे शब्द आज भी चुनौती और चेतावनी दे रहे हैं।
    ‘संसकिरत है कूप जल भाखा बहता नीर’ ऐसा कहने वाले कबीर की अंतरात्मा को थाहना बेहद कठिन रहा है। ‘ढाई आखर’ के बल पर पंडिताई को ललकारने वाले कालजयी कबीर के प्रामाणिक पाठ को अर्थ-विस्तार से पढ़कर पाठक निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे। शोध्कर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध पाठकों तक समानरूपेण उपयोगी। मानव जीवन के उन्नयन व परिष्कार के साथ भक्ति और अध्यात्म की रश्मियाँ बिखेरती कबीर बानी को विद्वान् लेखक ने ‘पुनः पाठ की सार्थकता’ प्रदान की है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ वस्तुतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है
  • Ushakaal
    Hari Narayan Aapte
    150 135

    Item Code: #KGP-2000

    Availability: In stock

    उषाकाल
    जिस वस्तु को प्राप्त करने की अभिलाषा मन से है वह मिले नहीं, बल्कि उसका महत्त्व दिन-प्रतिदिन और अधिक बढ़ता नजर आए तो ऐसी स्थिति में उस वस्तु को प्राप्त करने की कितनी उत्सुक्ता बढ़ जाती है, इसका अनुभव हर मनुष्य को है ही । राजा की भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी । उसके मन में स्वामी रामदास के दर्शनों की उत्कट इच्छा थी । इधर बीजापुर से कोई समाचार न आया देखकर राजा का मन काफी उद्विग्न था । यह देखकर एक बार समर्थ के यहाँ परली जाने की चर्चा छेडी । राजा को स्वामी की बात पसंद आई और वे दोनों परली के पर्वतों की और चल पड़े ।
    चलते-चलते स्वामी जी ने अपना अनेक वर्षों का अनुभव राजा को बताया । दोनों एक गाँव के पास पहुंचे । गर्मी के दिन थे। धूप काफी थी, इसलिए दोनों ने मालदेव जी के मंदिर में अपना डेरा डाला । पिछली रात राजा को ज्वर काफी था । अत: डेरा डालते ही वे आराम करने लगे । मंदिर के पास ही एक नदी थी और उसके पार भी एक मंदिर था । राजा की वृष्टि उस मंदिर और उस नदी के तट की ओर गई। उन्हें एक विचित्र दृश्य देखने को मिला । यह देखते ही राजा के  क्रोध की सीमा न रही। वे एकदम अपनी जगह से उठे, मानो उनको इस बात का ज्ञान ही नहीं रहा कि पिछली रात को उन्हें ज्वर आया था । अपने कपडे उतारे और अपनी तलवार मुँह से पकड़कर पानी में कूद पड़े । [इसी उपन्यास से]

  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Shailesh Matyani (Paperback)
    Shailesh Matiyani
    120

    Item Code: #KGP-7213

    Availability: In stock

    अब वह सड़क पर था और उसकी आंखें रामचन्दर हलवाई के कारीगर के जलेबी बनाते हाथ के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थीं और भूख इतनी तीखी हो चुकी थी कि वह बदहवासी अनुभव कर रहा था। अपनी इस तरह की बदहवासी से रामखिलावन को डर लगता है। ऐसे में अक्सर उसे-चोरी सूझती है और इसी में वह कई बार बुरी तरह पिट भी चुका है।
    इस बार खाट पकड़ लेने से पहले तक उसकी मां कई घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू लगाने की नौकरी करती रही थी। कभी-कभार उसे भी साथ ले जाती वह। मौका ताड़कर घर के बच्चों की रंगीन किताबें पलटने लगता और अपनी पूर्व-स्मृति से काम लेता, जोर से पढ़ता-लौ-औ-ट-पौ-औ-ट-तो वह कैसे चोंककर देखती थी? खिलावन का यह अक्षरज्ञान उसमें एक आलोक उत्पन्न करता मालूम पड़ता था।
    फटे-पुराने कपड़ों के अलावा, बचा-खुचा खाना और त्योहारों पर कभी पूरी-मिठाई। लगभग डेढ़ महीने से मां काम पर नहीं जा पाई, ए.जी. आफिस वाले शुक्ला साहब के यहां। अकेले गया था वह। किसी बड़ीह चीज के लिए गुंजाइश नहीं रहती। दरवाजे से बाहर निकलते वक्त शुक्लाइन उसके पूरे जिस्म पर अपनी भैंगों आंखों को उंगलियों की तरह फिराती रहती हैं। बरतन धोते में सिर्फ दो छोअी चम्मचें उसने जांघिये की जेब में डाल ली थीं, हालांकि खुद उसके दिमाग में ही कुछ तय नहीं था कि उनका वह क्या उपयोग कर पाएगा। जाने की उतावली में वह ‘बहूजी, हम जाइत हैं’, की आवाज लगाने के साथ-साथ, तेजी से दरवाजे तक पहुंच गया था। तभी शुक्लाइन का चटख लाल चूड़ियों से भरा पंजा उसके जांघिये की जेब पर पड़ा था और बदहवासी में उसके मुंह से चीख निकल गई थी।
    -इस पुस्तक की ‘चील’ कहानी से
  • Viklangta : Samsyain V Samadhan
    Vinod Kumar Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-7846

    Availability: In stock

    विकलांगता : समस्याएं व समाधान 
    विकलांगता एक विश्वव्यापी समस्या है, पर विकसित देशों में इस समस्या के हल के लिए काफी उपाय किए गए हैं । दूसरी ओर विकासशील देशों में अभी बहुत कुछ करना बाकि है । पुस्तक में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तैयार किये गए दिशा-निर्देश, संयुक्त राज्य अमेरिका में लंबी अवधि में किये गए प्रयास, बनाए गए कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया और इसमें सफलता तथा भारत में 1995 में पारित किये गए कानून और इस कानून को देखते हुए विकलांगों की वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक वर्णन किया गया है, जो साफ़ दर्शाता है कि सरकार की इच्छाशक्ति, विकलांगों और उनके लिए कार्य करने वाले संस्थाओं की सजगता विकलांगता की समस्या को काफी हद तक हल कर सकती है और विकलांगों को इस लायक बना सकती है कि वे सामान्य लोगों के समान ही समाज को अपना योगदान दे सकते हैं । 
  • Naye Sire Se
    Govind Mishra
    195 176

    Item Code: #KGP-723

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti
    Hemant Kukreti
    240 216

    Item Code: #KGP-7814

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Aapad Dharm Tatha Anya Kahaniyan
    Deepak Sharma
    90 81

    Item Code: #KGP-1933

    Availability: In stock

    आपदधर्म क्या अन्य कहानियाँ
    'यह दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि हमरे समाज में विवाह केवल सामाजिक समाकलन का एक यंत्र योग है ? या किर विधिक विषयासक्ति का एक रचनातंत्र ? इसके अतिरिक्त क्या हमारे समाज में विवाह कोई तीसरा सत्व भी रखता है ?' रोहिणी एलबम का वह पृष्ट सामने ले आई जहाँ विवाह के पारंपरिक वस्त्रों एवं आभूषणों से सजे तथा विवाह संबंधी स्वाभाविक उमंगों एवं अचरजों से लदे अठारहवर्षीय मधु तथा चौबीसवर्षीय अशोक एक-दूसरे की ओर संपूर्ण समर्पण की दृष्टि से निहार रहे थे ।
    अशोक के हाथों में अपना भाग्य एवं अपना भविष्य सौंप चुकी मधु के हाथों से उस लोक का भाग्य एवं भविष्य छीनने वाली रोहिणी का उस लोक में प्रवेश क्या अतिक्रमण न था ? निषिद्ध न था ? विवाह तोड़ने की उसे लत लग गई थी क्या ?
    “बच्चे है तीसरा सत्व, रोहिणी ।"
    पहली बार गर्भवती हुई मधु के मन में बच्चों के प्रति ढेरों उत्माह रहा ।
    "द सीमेंट ? द शटल कॉक ? द प्लेइंग फील्ड ?” रोहिणी हँस पडी ।
    “मतलब ?"
    "स्ट्रिंडबर्ग र्ग के अनुसार बच्चों से माता-पिता सीमेंट का काम लेने है । हैनरी जेम्स सोचते है, माता-पिता की फूट में बच्चे बैडमिंटन को चिडिया की भांति इधर से उधर फहराए जाते हैं और नोरा एफ़रोन अपने उपन्यास "हार्टबर्न’ में लिखती हैं कि बच्चे के जन्म के साथ माता-पिता की बल-परीक्षा को एक नई क्रीड़ा-भूमि मिल जाती है... ।'
    -[इस संग्रह की एक कहानी 'स्त्रियाँ' से]
  • Satya Ke Prayog
    Mohan Das Karamchand Gandhi
    350 315

    Item Code: #KGP-9055

    Availability: In stock


  • Mahayaatra Gaatha (3 & 4) (Paperback)
    Rangey Raghav
    500

    Item Code: #KGP-23

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)

    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Barhai, Kumhaar Aur Kavi
    Ekant Shrivastva
    500 450

    Item Code: #KGP-742

    Availability: In stock

    बढ़ई, कुम्हार और कवि
    एकान्त श्रीवास्तव मूलतः कवि हैं, काल सजग कवि। यह सजगता उन्हें समय और समाज की विसंगतियों को देखने और कविता में दर्ज करने के साथ-साथ अपनी काव्य परंपरा की पड़ताल की ओर भी ले जाती है। ‘कविता का आत्मपक्ष’ के बाद यह उनकी दूसरी आलोचना पुस्तक है, जिसमें उन्होंने मुक्तिबोध से विष्णु नागर तक बाईस कवियों के संपूर्ण रचनात्मक अवदानों अथवा चर्चित कविताओं को केंद्र में रखकर आजादी के बाद की कविता पर विचार करने का उपक्रम किया है।
    इन आलेखों की विशेषता यह है कि इनमें अपने समय की रचनाशीलता को पृष्ठभूमि में रखकर निकट पूर्व के कवियों के सृजन को समझने की सार्थक कोशिश की गई है, जिससे आलोचना में केवल शैलीगत नयापन ही नहीं आया है, कुछ कविताओं के नए अर्थ भी उद्घाटित हुए हैं। इस दृष्टि से यह पुस्तक एक उपलब्धि है, क्योंकि यही वह काम है जो पेशेवर आलोचना नहीं कर पाती, जो राजेश जोशी, विजय कुमार और लीलाधर मंडलोई जैसे कवि ही कर पाते हैं। और अब इस कड़ी में एक नाम एकान्त का भी जुड़ गया है।
    नौवें दशक के कवियों के सृजन संसार से तो हिंदी के पाठक परिचित रहे हैं, लेकिन उनकी समझ के विस्तार की जानकारी देने वाली शायद यह पहली किताब है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। पुस्तक में कुछ और भी ऐसी सामग्री है जो पाठकों का ध्यान खींचेगी।
  • Chunauti
    Sudrashan Kumar Chetan
    150 135

    Item Code: #KGP-177

    Availability: In stock


  • Lohit
    Anita Sabharwal
    400 360

    Item Code: #KGP-9375

    Availability: In stock

    ‘लोहित’ उपन्यास विचारोत्तेजक कथानक और उत्कृष्ट भाषा-शैली वेफ कारण समकालीन कथा साहित्य में अनूठी संवेदना के साथ अभिव्यक्त होता है। लेखिका अनिता सभरवाल ने देश और व्यक्ति की नियति का जो सघन चित्राण प्रस्तुत किया है वह अद्भुत है। उपन्यास की कथावस्तु असम प्रदेश के परंपरागत जीवन प्रवाह के साथ वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक परिवेश को आत्मसात् कर विकसित हुई है। असम की सामाजिक कुरीतियों (विशेषकर जातिवाद) के कारण उत्पन्न पीढ़ी-संघर्ष का ज्वलंत वर्णन किया गया है। युवा वर्ग के भटकाव का यथार्थस्वरूप रचनाकार ने वहां रहते हुए देखा, अनुभव किया। हितेन और जोयमती जैसे मुख्य चरित्रों के द्वारा लेखिका ने उस रोशनी की तलाश की है जो तनाव, अवसाद, विघटन, हताशा और मोहभंग के घने अंधकार में न्याय, समानता, एकता की उम्मीद जगाती है।
    उल्लेखनीय है कि असम के जन्म से लेकर आज तक उसके प्रत्येक स्पंदन का साक्षी ब्रह्मपुत्र नद इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र है। इसे लोहित, लौहित्य, दिहांग, सियांग जैसे नामों से भी पुकारा जाता है। पौराणिक अवधारणाओं व वर्तमान वैचारिक सक्रियताओं को लोहित कथा एवं आत्मसंवाद के सहमेल से प्रस्तुत करता है। लोहित का आत्मस्वीकार है, ‘मैं क्या करूं? मैं तो कहीं जा भी नहीं सकता। ...यहां के दुःख भी मेरे, सुख भी मेरे। फर्क बस इतना है कि मेरे दुःख किसी को दिखाई नहीं देते।’ अगोचर दुःखों और संघर्षों का पठनीय वर्णन पाठकों के हृदय को छू लेगा, यह विश्वास है। यह मानो ‘असम की आत्मकथा’ ही है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Govind Mishra
    Govind Mishra
    180 162

    Item Code: #KGP-170

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार गोविन्द मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'जनतंत्र', 'फांस', 'सिर्फ इतनी रोशनी', 'सुनंदो की खोली', 'खुद के खिलाफ', 'युद्ध', 'खाक इतिहास', 'पगला बाबा', 'वरणांजलि' तथा 'मायकल लोबो' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक गोविन्द मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Indradhanush
    Vinod Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-992

    Availability: In stock

    सभ्यता के आदिकाल से ही बच्चे नानी या दादी से कहानियां सुनते आए हैं। छापेखाने के आविष्कार के बाद कहानियां पढ़ी जाने लगीं। इससे पहले कहानियां सिर्फ सुनी जाती थीं। टेलीविजन और सिनेता के जन्म के बाद तो वे देखी भी जाने लगीं। कहानी सुनने में अधिक मजा आता है या पढ़ने में या फिी देखने में; इसका फैसला तो आप स्वयं ही कीजिए। लेकिन एक बात तो निश्चित है कि कहानी पढ़ना सबसे अधिक सुविधाजनक है। दरअसल कहानी सुनने के लिए आपको दादी या नानी पर निर्भर रहना पड़ता है और देखने के लिए टी.वी. सेट पर। आप कहोगे कि यों तो पढ़ने के लिए भी पुस्तक पर निर्भर रहना पड़ता है। आपकी बात में दम तो है मगर, अगर दादी या नानी का स्वास्थ्य या मूड ठीक नहीं है तो आप तो गए काम से। और फिर उन्हें कितनी कहानियां याद रह सकती हैं? इसकी भी एक सीमा है और टी.वी. सेट तो टी.वी. सेट ठहरा। रुकावट के लिए खेद प्रकट कर देगा तो आप क्या कर लेंगे? और अगर बिजली गुल हो जाए तो? यही नहीं, अगर पिताजी खबरें सुन रहे हैं तो क्या होगा? और अगर आप किसी ऐसे गांव या हिल स्टेशन या गेस्ट हाउस में हों जहां टी.वी. में सभी या किसी एक चैनल के प्रोग्राम नहीं देखे जा सकते तो हो गया बंटाधार। और फिर टी.वी. के कार्यक्रमों की भी एक सीमा तो है ही। यों भी आजकल दूरदर्शन अधिसंख्य प्रोग्राम अमरीका, इंगलैंड या जर्मनी के ही दिखता है। मगर कहानियां तो हर देश में सुनी, पढ़ी या देखी जाती हैं।
    स्पष्ट है कि कहानी पढ़ना अधिक सुविधाजनक है। और फिर पुस्तकों में संचित ज्ञान की कोई सीमा भी नहीं है।
    —विनोद शर्मा
  • Toro Kara Toro-3 (Parivrajak)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #Kgp-1575

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nanak Singh
    Nanak Singh
    175 158

    Item Code: #KGP-437

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नानक सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कुचले हुए पुष्प', 'लक्ष्मी-पूजा', 'अंतर्ज्ञान', ‘अछूते आम', 'चक्षुहीन संत', 'जर्जर खपरैल की एक स्लेट', 'स्नोफॉल', 'इनसान-हैवान', 'लंबा सफ़र' तथा 'जब हम में 'इनसान' प्रकट होता है' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नानक सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Swami Ram Tirath Ki Shreshtha Kahaniyan
    Jagnnath Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9140

    Availability: In stock

    स्वामी रामतीर्थ की श्रेष्ठ कहानियां जहाँ अत्यंत रूचि-मोहक है, वहां उसका दामन उज्ज्वल प्रेरणाओं और सुनहले शिक्षा-तत्वों से जगमगा रहा है तथा ह्रदय व मन को आलोकित किये देता है । 
    प्रत्येक कहानी के अंत में कुछ शब्दों द्वारा कहानी में निहित शिक्षा-तत्त्व का संकेत दिया  गया है । यही ऐसा न किया जाता, तो इन कहानियों एवं स्वामी जी के उद्देश्य से न्याय नहीं हो सकता था । स्वामी जी ने प्रत्येक कहानी का उद्भावना केवल इसीलिए किया था की उसके रोचक माध्यम से अपने श्रोताओं एवं पाठकों के निकट विषय की गंभीरता तथा दुरूहता बोधगम्य व सरल हो जाये और साथ ही साथ शिक्षा के तत्त्व भी उजागर हो उठें । 
  • Vyangya Samay : Sharad Joshi
    Sharad Joshi
    380 342

    Item Code: #KGP-9347

    Availability: In stock

    शरद जोशी हिंदी व्यंग्य के सार्वकालिक महान् रचनाकार हैं। विसंगति के ड्डोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों व लोकप्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धातिक व व्यावहारिक अंतर्विरोधें पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार व अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। उनका एक वाक्य है—‘प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीबी की पीड़ा उससे भी गहरी होती है।’ यही विरल यथार्थबोध है जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है। वे महत्त्वपूर्ण संदर्भों के व्यंग्य लेखक हैं। साहित्य, पत्रकारिता, टी. वी. और सिनेमा में उनके लेखन ने कीर्तिमान बनाए हैं। ‘मासूमियत में निहित मर्म और मुस्कान’ शरद जोशी के लेखन का मूल मंत्रा है। व्यंग्य समय में शरद जोशी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
  • Puraskrit Bachchon Ki Gaurav Gathayen
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-319

    Availability: In stock

    जिस तरह हर इंसान के भीतर एक बच्चा छिपा होता है, उसी तरह हर बच्चे के अंदर भी एक जिम्मेदार नागरिक का भाव रहता है। परिस्थिति आने पर बच्चे की उम्र से परे यह भाव परिलक्षित भी हो उठता है। राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित बच्चों के भीतर भी यही जिम्मेदारी नजर आती है। बालपन में भी दूसरों के लिए अपनी जान तक की बाजी लगा देना इन बच्चों के भीतर छिपे जिम्मेदार नागरिक की पहचान ही तो है। 
    आज जबकि ‘बड़े’ अपनी जिम्मेदारियां भूलते जा रहे हैं या समय आने पर उनसे बच निकलने का प्रयास करते हैं, बच्चों में जिम्मेदारी का यह भाव न केवल सराहनीय बल्कि अनुकरणीय भी है। हमारा यह भी फर्ज बनता हे कि बच्चों के प्रयास को समाज के सामने लाएं। शायद यही वजह है कि अब तो मुझे ही साल जनवरी माह के तीसरे सप्ताह में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों से मुलाकात का इंतजार रहने लगा है। 
    इस पुस्तक को तैयार करने में सक्रिय सहयोग देने के लिए मैं अपने साले साहब विनोद गुप्ता का विशेष आभार प्रकट करना चाहूंगा। दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अपने स्थानांतरण के चलते उनके सहयोग कि बिना मेरे लिए यह पुस्तक तैयार कर पाना निस्संदेह मुश्किल था।
    —संजीव गुप्ता 
  • Hamaaraa Lakshy : Laaney Hain Leelakamal
    Dr. Ramesh Kuntal Megh
    750 675

    Item Code: #KGP-683

    Availability: In stock

    हमारा लक्ष्य: लाने हैं लीलाकमल
    चैबीसेक लेखों-आलेखों-मोनोग्राफों वाली इस किताब में समग्र ‘संस्कृति पैटर्न’ के समावेश के संग-संग सौंदर्यबोधशास्त्र, मिथक-आलेखकारी एवं (यत्र-तत्र) देहभाषा का भी मिलयन हुआ है। इसमें दोनों सरोकार शामिल हैं–क्या (लक्ष्य) हैं तथा (कला-साहित्य, समाजविज्ञान-संस्कृति के लीलाकमल) कैसे होने चाहिए! आप भी उन्हें लें तथा स्वीकारें-परखें।
    इसीलिए इसमें विभिन्न ज्ञानानुशासनों के पारिभाषिकों तथा विविधआयामी संप्रेषणों का सहारा लिया गया है, जिससे ज्ञान तथा पद्धति की नई दिशाएँ भी परिलक्षित 
    हुई हैं।
    पढ़ते हुए हम-आप मरुतों के वाक् अक्षरों के साथ ऊँचे दूर तक उड़ें, मिथक के ‘स्वप्न समय’ से आधुनिक रिनासाँ के यात्रिक बनें, प्रसाद के ‘आँसू’ की नामलुकी प्रिया-रमणियों का साक्षात्कार करें, चंपा के ‘आकाशदीप’ के साथ कथासागर में यात्राएँ करें, वागीश्वर चित्रानुरागी आचार्य शुक्ल के कई सृजन-रहस्य पहचानें, मल्लिका साराभाई के नृत्य, त्रिलोचन के व्यक्तित्व तथा तालास्थल की अजीब प्रतिभा की शिनाख्त करें, मामल्लपुरम् से लेकर मेगासिटी चंडीगढ़ के वास्तुशिल्प और नगर-निवेश का आकल्प जाँचे तथा साहित्य की समसामयिक समाजशास्त्रीय चुनौतियों का भी आगाज करें।
    इस तरह ऐसे सही प्रश्नों के सही उत्तरों का निर्णय तो आपको ही करना है—असहमति अथवा समर्थन द्वारा।
  • Ek Yug Ke Baad
    Pushpa Rahi
    40 36

    Item Code: #KGP-1891

    Availability: In stock

    एक युग के बाद
    पुष्पा राही के गीतों में सुख-दुःख, आशा-निराशा, अन्धकार-प्रकाश, संयोग-वियोग, व्यथा-वेदना, मिथ्या मोह, दम्भ, पाखंड सबका वर्णन मिलता है । कुछ गीत इतने मार्मिक और हृदयस्पर्शी हैं कि उन्हें पढते समय जीवन के अनेक तथ्य नेत्रों के सामने उदघाटित होने लगते है ।
    इन गीतो की एक विशेषता है नूतन बिम्बों का निर्माण । दर्द के मोती, रेशमी सुख, शोर की कालिख, उलझनों का झाड, नींद की कमजोर आँखे, विषमताएं रोग-सी, अंधेरे दर्द के साए, मीठी-मीठी इच्छा आदि प्रयोग गीत को संवेदन के स्तर पर बहुत मार्मिक बना देते हैं । कवयित्री अपनी अनुभूतियों और परिवेश की हलचल को ही लिखना चाहती है । दूसरों से उधार लेकर कुछ भी कहने में उसकी रुचि नहीं है ।
    एक युग के बाद में संकलित गीत उच्चस्तरीय होने के साथ काव्य की भावभूमि पर अपनी छाप छोड़ते है । कोहरेभरे प्रभात से निकालकर चन्दन वन की शीतल छाया में हमें भ्रमण का अवसर देते हैं । प्यार के वृत्त में घुमते हुए हम सन्नाटे के पार पहुँच जाते है ।
  • Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand
    Shanta Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-1865

    Availability: In stock

    देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
    स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
    विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापक विवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
    --सुभाषचंद्र बोस
  • Aadi Jagadguru Shankaracharya
    Chandrika Prasad Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-9009

    Availability: In stock


  • Agyey Sahachar
    Vishwanath Prasad Tiwari
    695 626

    Item Code: #KGP-1940

    Availability: In stock

    अज्ञेय सहचर
    छायावादोत्तर हिंदी साहित्य में अज्ञेय का व्यक्तित्व एक स्वाधीन चिंतक और प्रयोगधर्मी रचनाकार के रूप में अद्वितीय है। इस संदर्भ में एक-दो लेखक ही उनकी पंक्ति में बैठते हैं। उनकी सर्जनात्मक प्रयोगशीलता और नवीनता तथा अनेक कलाओं में उनकी दक्षता को देखते हुए उन्हें हिंदी का ‘रवींद्रनाथ’ कहना उपयुक्त है। अज्ञेय ने हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं (कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, संस्मरण, यात्रावृत्त, आलोचना और अन्य लघु विधाएँ) को अपनी प्रतिभा से समृद्ध किया है। कुछ नवीन गद्य विधाओं को जन्म देने का श्रेय भी उन्हें है, जिन्हें उन्होंने ‘अंतःप्रक्रिया’, ‘लॉग बुक’ और ‘टीप’ आदि कहा है। ये ‘डायरी’ विधा के निकट हैं, मगर उनसे भिन्न और नवीन। इस प्रसंग में मुझे यह भी कहना चाहिए कि हिंदी की साहित्यिक भाषा को जितने नए शब्द अज्ञेय ने दिए हैं, उनके किसी समकालीन लेखक ने नहीं दिए। यह एक ऐसा रेखांकित करने योग्य कार्य है, जिसे कोई महान् लेखक ही कर पाता है। वस्तुतः अज्ञेय हिंदी के एक युग-प्रवर्तक साहित्यकार हैं। उन्होंने अनेक रूपों में छायावादोत्तर हिंदी साहित्य की मुख्यधारा को प्रभावित किया है तथा उसे नई दिशाओं की ओर प्रेरित और संचालित भी किया है।
    अज्ञेय का जितना बड़ा योगदान रचना और चिंतन के क्षेत्र में है, उतना ही या उससे थोड़़ा ही कम हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध करने और अपने समय में एक साहित्यिक वातावरण निर्मित करने वाले व्यक्तित्वसंपन्न लेखक के रूप में। उन्होंने न केवल स्वयं लिखा, बल्कि प्रतिभावान लेखकों की एक पूरी पीढ़ी को मंच देने और सामने लाने का प्रयास किया। 
    आज हिंदी के एक बड़े और वास्तविक पाठक-वर्ग में अज्ञेय प्रतिष्ठित हैं और उन पर लिखा भी कम नहीं गया है, जिसका प्रमाण है यह पुस्तक।
  • Kavi Ne Kaha : Viren Dangwal
    Viren Dangwal
    190 171

    Item Code: #KGP-387

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : वीरेन डंगवाल
    वैश्वीकरण भाषाओं, संस्कृतियों और कविता का शत्रु है। उसका स्वप्न एक ऐसी मनुष्यता है जो उसी गांव में बसती है, उसी तरह रहती-सोचती- पहनती, हाव-भाव रचती और खाती-पीती है । एक रासायनिक संस्कृति-बोध से लैस इस वैश्विक  मनुष्यता का आदर्श भी अंतर्राष्ट्रीयवाद है मगर अपने मूल मानवीय अर्थ के बिलकुल उलटे अर्थ में। यह वैश्विक मनुष्य तो पारंपरिक संस्कृतियों और ज्ञान को नष्ट करने वाला और अधिनायकवादी है जो केवल बाजार और उपभोग को मान्यता देता है । यह बहुत पूंजी के प्रचंड विचार का वाहक और यथास्थिति का घनघोर पोषक है । जीवन की अनुकृति बनने वाली कविता उसे रास नहीं आती। वह तो सारे जीवन को अपनी अनुकृति बना देना चाहता है । कविता अगर हमारे समय में पाठकों का रोना रो रही है तो उसकी एक बडी वजह भी बाजार और उपभोग का सारथी वही वैश्विक मनुष्य है ।

  • Mahabharat Ka Abhiyukti
    Rajendra Tyagi
    195 176

    Item Code: #KGP-1951

    Availability: In stock


  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-2
    Kamal Kishore Goyenka
    950 808

    Item Code: #KGP-58

    Availability: In stock


  • Poster
    Shanker Shesh
    120 108

    Item Code: #KGP-1897

    Availability: In stock


  • Dekhana Ek Din
    Dinesh Pathak
    240 216

    Item Code: #KGP-491

    Availability: In stock

    साहित्य में प्रचलित नारों और विमर्शों के शोर-शराबे से अलग अपने एकांत में रचनारत दिनेश पाठक की अधिकांश कहानियां मानव संबंधों व विभिन्न कारणों से उनमें  बनते-बदलते सरोकारों की पड़ताल करती हैं।  
    ‘देखना एक दिन’ संग्रह की कहानियों का मूल स्वर भी इसी भावभूमि के इर्द-गिर्द हैं। इस संग्रह की अधिकतर कहानियां एक विशेष परिवेश से जुड़ी दिखने के बावजूद संपूर्ण भारतीय समाज के अंतर्संबंधों को प्रस्तुत करती हैं। बहुआयामी धरातल की इन कहानियों में गांव व कस्बे का जीवन तो है ही, साथ ही उनका संघर्ष, उनका जुझारूपन, उनके सुख-दुःख, उनकी आशा-निराशा, उनके बनते- ध्वस्त होते सपने तथा मूल्य संक्रमण के कारण उत्पन्न मानसिक विचलन और इन सबसे इतर जीवन के प्रति उनकी गहन आस्था व गहरी जिजीविषा है। यही कारण है कि वे पराजित नहीं होते, पराजय के बीच से फिर-फिर उठ खड़े होते हैं। यहां ठेठ ग्रामीण जीवन से निकले पात्र भी हैं जिनके लिए जीवन सदा सोद्देश्य है, आधुनिक जीवनशैली व चकाचौंध के प्रति आसक्त चरित्र भी हैं, राजनीतिज्ञों के दुश्चक्र में फंसकर सामाजिक सरोकारों के योद्धा रूप में विकसित होते-होते अपनी संभावनाओं से भटक जाने वाले व्यक्ति भी हैं तो यहां अपनी अस्मिता को तलाशती और उसके लिए जूझती ऐसी स्त्रियां भी हैं जो अंततः विद्रोह की हद तक जा सकती हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक में कथाकार ने भाषा को किसी उलझाव में डाले बिना अत्यंत सहज-सरल भाषा-शैली में कथ्य को, परिवेश को, चरित्रों को और परिवेशगत बेचैनी व छटपटाहट को पूरी विश्वसनीयता, प्रामाणिकता तथा गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि ये कहानियां आदि से अंत तक न केवल अपने पाठकों को बांधे चलती हैं बल्कि उन्हें झकझोरने से भी नहीं चूकतीं।

  • Mere Saakshatkaar : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    350 280

    Item Code: #KGP-616

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Pooran Chandra Joshi
    Pooran Chandra Joshi
    150 135

    Item Code: #KGP-2031

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : पूरनचन्द्र जोशी
    वरिष्ठ समाजशास्वी प्रोफेरुवृर फूनचद्ध जोशी के साथ पिछले बीस वर्षों के सऊक्षात्कार इस स्थापन में पाठकों के लिए प्रस्तुत है । यह संकलन वास्तव में साक्षात्कार के माध्यम से आजादी की आधी सदी में भारतीय समाज की दूरगामी महत्त्व की प्रक्रियाओं और परिवर्तनों, उनके अंतर्सबंधों और अंतर्द्धंद्वों, उपलब्धियों और संभावनाओं, आग्रहों और अवरोधों पर प्रकाश डालता है । साथ ही बीसवीं सदी के अंत और इक्लीसवीं सदी की पूर्व संध्या पर नए गतिशील क्षितिजों और दिशाओं का भी संकेत देता है । यह अकादमिक समाज के लिए नई दृष्टि और व्याख्याएँ प्रस्तुत करता है, तो जिज्ञासु और प्रबुद्ध नागरिको के लिए भारत के बदलते परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य को भी आलोकित करता है ।
    यह संकलन यदि नई दृष्टि और जानकारी देता है तो पाठकों को अपने लिए सोचने को प्रेरित भी करता है और उनमें अपने दायित्व का बोध भी जाता है ।
    'मेरे साक्षात्कार' में योगदान उन श्रेष्ठ पत्रकारों और लेखकों का भी है जो विचारशील प्रश्चकर्ताओं के रूप में प्रोफेसर जोशी की बहुआयामी दृष्टि और वर्तमान भारत की समस्याओं पर उनकी गहरी सोच और चिंतन-प्रकिया को पाठकों तक सम्प्रेषण। में सफल हुए हैं।
    पुस्तक तीन खंडों में विभाजित है : ( 1) आधी सदी का सफर, (2) नई चुनौतियां नया एजेंडा, (3) कुछ वक्तव्य । प्रथम दो खंडों में प्रोफेसर जोशी से साक्षात्कार प्रश्न और उत्तर क्या प्रस्तुतियों के रूप में दिए गए है । तीसरे खंड में कुछ महत्त्वपूर्ण सामयिक विषयों पर प्रोफेसर जोशी के विचार कुछ वक्तव्यों के रूप में प्रस्तुत है ।
  • Sampurna Baal Kavitayen : Sherjung Garg
    Sher Jung Garg
    300 270

    Item Code: #KGP-469

    Availability: In stock

    हिंदी में सबसे चटख, चुटीली और नटखटपन से भरपूर बाल कविताएँ लिखने वाले डॉ. शेरजंग गर्ग उन उस्ताद बाल कवियों में से हैं, जो उचित ही आज बाल कविता के पर्याय बन चुके हैं। समूची हिंदी बाल कविता के ग्राफ को बदलकर उसके मिजाज में बड़ी तबदीली लाने वाले बाल कवियों की छोटी से छोटी सूची बनाएँ, तो भी उसमें डॉ. शेरजंग गर्ग का नाम जरूर होगा। वे हिंदी बाल कविता में पहली बार वह नटखटपन, चुस्ती और शरारती अंदाज लेकर आए, जिसने हजारों बाल पाठकों को रिझा लिया। उनके ‘गाय’, ‘दादी अम्माँ’, ‘गुड़िया’, ‘ईंट’, ‘चिड़िया’, ‘पवनचक्की’, ‘चूहा-बिल्ली’, ‘उल्लू मियाँ’ और ‘टीचर गुड़िया’ सरीखे खिलंदड़े और चुस्त-दुरुस्त शिशुगीत इस कदर चर्चित हुए कि बच्चों के साथ-साथ बड़े भी उनकी नटखटपन से भरी कोमल भावनाओं के साथ बहे और उनके जरिए फिर से अपने बचपन को जिया। खासकर गाय पर भी ऐसा नटखटपन से भरपूर शिशुगीत लिखा जा सकता है, यह डॉ. शेरजंग गर्ग को पढ़ने के बाद ही समझ में आ सकता है। 
    हिंदी में डॉ. गर्ग के अलबेले शिशुगीतों ने ही पहले-पहल यह करिश्मा किया कि वे बदलते समय और बच्चे के मन, सपने और इच्छाओं से जुड़े और वे हर बच्चे के होंठों पर थिरकते नजर आए। और यही बात उनकी गूँजदार लय वाली अपेक्षाकृत लंबी बाल कविताओं के बारे में कही जा सकती है। ‘खिड़की’, ‘नए साल का गीत’, ‘शरारत का मौसम’, ‘यदि पेड़ों पर उगते पैसे’ तथा ‘तीनों बंदर महाधुरंधर’ डॉ. गर्ग की बिलकुल नए शिल्प में ढली अद्भुत कविताएँ हैं, जिनका कोई जोड़ नहीं है। उनके यहाँ बात कहने का जो उस्तादाना अंदाज और सफाई है, वह देखते ही बनती है। 
    सच तो यह है कि हिंदी में भी विश्वस्तरीय बाल साहित्य मौजूद है, यह डॉ. गर्ग की कविताओं से गुजरते हुए ही पहले-पहल समझ में आता है, और यह भी कि हिंदी में मानक शिशुगीत और बाल कविताएँ कौन सी हैं, जिन्हें सामने रखकर बाल साहित्य लिखा जाना चाहिए। 
    डॉ. शेरजंग गर्ग की बेहद तराशी हुई बाल कविताओं की जादुई लय ही नहीं, उनकी कविताओं में हास्य और व्यंग्य की मीठी गुदगुदी भी बाल पाठकों को रिझाती है और वे एक बार पढ़ने के बाद, कभी उन्हें भूल नहीं पाते। उनके गीतों में जैसी पूर्णता है, वैसी कम-बहुत कम नजर आती है। इस लिहाज से वे अपनी नजीर खुद हैं और उन थोड़े से बाल कवियों में से हैं जिनका कविता पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते हैं कि यह कविता इन्हीं की है।
    डॉ. गर्ग की कविताओं का यह जादुई असर ही है कि एक पूरी पीढ़ी उन्हें गाते-गुनगुनाते हुए बड़ी हुई, तो उनके बच्चे---यानी अगली पीढ़ी भी उनकी जादुई कविताओं की उसी तरह मुरीद है। देश के किसी भी हिस्से में हम जाएँ, डॉ. शेरजंग गर्ग की कविताएँ सबसे ज्यादा बच्चों के होंठों पर नाचती नजर आती हैं। बच्चों के वे सर्वाधिक चहेते और दोस्त कवि हैं।
    डॉ. शेरजंग गर्ग सिर्फ एक बालकवि नहीं, वे बाल कविता का इतिहास रचने वाले दिग्गजों में से हैं। लिहाजा उनकी समूची बाल कविताएँ एक जिल्द में सामने आएँ, यह बरसों से बच्चों की ही नहीं, बाल साहित्य के गंभीर अध्येताओं और शोधार्थियों की भी इच्छा थी। इस पुस्तक के जरिए यह सपना पूरा हो रहा है, यह बाल साहित्य के लिए एक यादगार और ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। आशा है, बच्चे और बाल साहित्यकार ही नहीं, हिंदी के स्वनामधन्य आलोचक और सहृदय पाठक भी बाल कविता की शिखर उपलब्धियों और कलात्मक लाघव से पूर्ण इस संचयन को बड़ी रुचि से पढ़ेंगे और खूब सराहेंगे।
  • Jokhim
    Hridyesh
    395 356

    Item Code: #KGP-270

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale
    Chanderkant Deotale
    190 171

    Item Code: #KGP-549

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।
    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।
    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
  • Papa, Muskuraiye Na!
    Prahlad Shree Mali
    200 180

    Item Code: #KGP-9299

    Availability: In stock

    मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं औ वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंतके पास।
    मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।
    —इसी पुस्तक से
  • Charitraheen
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    400 360

    Item Code: #KGP-878

    Availability: In stock


  • Vrinda
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-91

    Availability: In stock

    वृन्दा
    "मैं वृन्दा के बिना अपने होने की कल्पना भी नहीं करता । अब कैसे जिऊँगा और क्यों जिऊँगा ? अब मुझे भी कोई रोक नहीं सकता---पर हाँ वृन्दा, जाने से पहले तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ--काना चाहता हूँ... "  शास्त्री जी कुछ संभलकर खडे हो गए ।
    सब उत्सुकता से उनकी और देखने लगे ।
    वृन्दा की ओर देखकर शास्त्री जी बोले--“मुझे जीवन के अंतिम क्षण तक एक दु:ख कचोटता रहेगा कि तुमने 'गीता' पढी तो सही, पर केवल शब्द ही पढे तुम 'गीता' को जीवन में जी न सकी । तुम हमेँ छोड़कर जा रही हो, यह आघात तो है ही; पर उससे भी बड़ा आघात मेरे लिए यह है कि मेरी वृन्दा 'गीता' पढ़ने का ढ़ोंग करती रही । जब युद्ध का सामना हुआ तो टिक न सकी । मुझें दु:ख है कि तुमने 'गीता' पढ़कर भी न पढी। वृन्दा ! 'गीता' सुनकर तो अर्जुन ने गांडीव उठा लिया था और तुम हमें छोड़कर, उस विद्यालय के उन नन्हे-मुन्ने बच्चों को छोड़कर यों भाग रहीं हो मुझे तुम पर इतना प्रबल विश्वास था ।  आज सारा चकनाचूर हो गया । ठीक है, तुम जाओ... जहाँ भी रहो, सुखी रहो...  सोच लूँगा, एक सपना था जो टूट गया ।"

    (इसी उपन्यास से)
  • Yatrayen
    Himanshu Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-1928

    Availability: In stock

    यात्राएँ
    कहानियों, उपन्यासों की तरह हिमांशु जोशी के यात्रा-वृत्तांतों  की भी अपनी विशेषता है। पढ़ते-पढ़ते पाठक को कहीं लगने लगता है कि इन यात्राओं में लेखक के साथ-साथ वह भी यात्रा कर रहा है । लेखक जिस तरह से इन सबको देख रहा है, जिस तरह की अनुभूति उसे हो रही है, कुछ-कुछ वैसी ही उसे भी होने लगती है । सरलता, सहजता, स्वाभाविकता हिमांशु जोशी की रचनाओं के सहज, स्वाभाविक गुण हैं । संभवत: ये ही मूल गुण किसी रचना को जीवंत बनाने में सफल होते है ।
    इन यात्राओं से कश्मीर के बर्फीले दुर्गम सीमा-क्षेत्र शामिल हैं तो पूर्व में बाँग्लादेश और भारत को विभाजित करती सुदूर हरित वंगा या इच्छामती के कूल-कगार भी । कहीं कन्याकुमारी तथा केरल की मनोरम हरित दुश्यावलियाँ हैं तो कुमाऊँ के पर्वतीय प्रदेश की अनेक अज्ञात, अछूती मनोरम झाँकियाँ भी। मॉरिशस का नीलवर्णी निर्मल स्वच्छ सागर है कहीं तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश की हिमशीतल सफेद हवाएँ भी अपने अस्तित्व का अहसास जताने लगती है । हिमांशु जोशी संभवत: वह हिंदी के पहले लेखक है, जिन्होंने विश्वविख्यात नाटककार हैनरिक इब्सन के घर सीयन की साहित्यिक यात्रा की थी । उसी तरह नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नार्वेजियन लेखक सीगरी उनसत तथा ब्यौर्नसन के घरों की तीर्थयात्राएँ भी।
    ये यात्रा-विवरण मात्र यात्रा के विवरण ही नहीं, कहीं इनमें  इतिहास भी है, भूगोल के साथ-साथ साहित्य भी । कला एवं संस्कृति की मार्मिक छुअन भी। इसीलिए ये वृतांत कहीं  दस्तावेज भी बन गए हैँ-जीए हुए अतीत के। पाठको को इनसे एक संपूर्ण जीवन का अहसास होने लगता है। एक साथ वह बहुत कुछ ग्रहण करने में सफल होता है-शायद यह भी इन वृत्तात्तों की एक सबसे बडी सफलता है ।
  • Sant Kabir
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-135

    Availability: In stock

    कबीरदास की वाणी वह लता है, जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पडने से अंकुरित हुई थी । उन दिनों उत्तर के हठयोगियों और दक्षिण के भक्तों में मौलिक अंतर था । एक टूट जाता था, पर झुकता न था; दूसरा झुक जाता, पर टूटता न था । एक के लिए समाज की ऊँच- नीच की भावना मजाक और आक्रमण का विषय थी, दूसरे के लिए मर्यादा और स्फूर्ति की । और फिर भी विरोधाभास यह कि एक जहाँ सामाजिक विषमताओं को अध्याय समझकर भी व्यक्ति को सबके ऊपर रखता था, वहाँ दूसरा सामाजिक उच्चता का अधिकारी होकर भी अपने को तृण से भी गया-गुजरा समझता था । ...एक के लिए पिंड ही ब्रह्माण्ड था तो  दूसरे के लिए समस्त ब्रह्माण्ड भी पिंड । एक का भरोसा अपने पर था, दूसरे का राम पर; एक प्रेम को दुर्बल समझता था, दूसरा ज्ञान को कठोर—एक योगी था, दूसरा भक्त ।
    -आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
  • Kahani Samgra : Govind Mishra (3rd Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1583

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Anamika
    Anamika
    150 135

    Item Code: #KGP-223

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : अनामिका
    अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करतीं ।
    भारतीय स्त्रियों के जीवन-संघर्ष तथा हास-परिहास और गीत-अनुष्ठान आदि के जरिए पीड़ा को सह पाने की उनकी परंपरागत युक्तिहीन युक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर अनामिका की कविताओं के नए अर्थ खुलते हैं, जिन तक कविता को देखने-परखने के रूढ़ ढाँचे को तोड़कर ही पहुंचा जा सकता है ।
    उनकी संवेदना का फैलाव उन वंचित जनों तक है, जिनसे एक स्त्री की करुणा सहज रूप से जुड़ जाती है । लोकभाषा के शब्द उनके यहाँ किसी गुर की तरह नहीं आते, बल्कि वे उनके अनुभव का अनिवार्य हिस्सा हैं । 'जनमतुआ' बच्चे की 'चानी' की तरह 'पुलपुल' कविताओं में परिपक्व कठोरता की विपुल संभावनाएं अंतर्निहित हैं । हिंस्र  समय के प्रतिरोध का उनका अपना ढंग है, जो भारतीय स्त्रियों की प्रतिरोध की परंपरा की गहरी समझ और संवेदनात्मक जुड़ाव से उपजा है ।
    समस्याओं और घटनाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण एक ऐसी संवेदनशील स्त्री का दृष्टिकोण है, जिसके भीतर अभी भी निष्पाप बचपन बचा हुआ है ।
  • Saundarya-Meemansa
    V.K. Gokak
    90 81

    Item Code: #KGP-9126

    Availability: In stock

    "सौंदर्य-मीमांसा" कन्नड़ के प्रतिष्ठित लेखक डॉ० वी० के० गोकाक की कन्नड़ कृति 'काव्य-मीमांसे' का हिंदी अनुवाद है । हिंदी में सौंदर्यशास्त्र पर यह अपने ढंग की पुस्तक होगी ओर निश्चय ही मोंदृवंशद्रस्व के अध्येताओं को इस पुस्तक से काफी सहायता मिलेगी । गोकाक ने विशेष भाषण-माला के अन्तर्गत सौंदर्यशास्त्र पर भाषण दिए थे । 'कला-स्वरूप', 'ध्वनि तथा प्रतिध्वनि', 'रस या जीवन-दृष्टि'–इन लेखों में लेखक ने भारतीय तथा पाश्चात्य आलोचना त्तत्वों के आधार पर विचार करके अपने मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है । डॉ. गोकाक स्वयं कन्नड़ और अंग्रेजी के कवि, उपन्यासकार और श्रेष्ठ आलोचक हैं। गोकाक के पास जीवन का व्यापक अनुभव और अंग्रेजी साहित्य का अपार पांडित्य है । दार्शनिक मनोवृति से वस्तु को तटस्थ दृष्टि से देखकर उसके सत्य को परखने की जिज्ञासा उनमें है । इन लेखों में उन्होंने साहित्या, कला, धर्म के  तत्यों के आराधक होकर सौंदर्य के तत्तवों का साक्षात्कार किया है। नि:संदेह यह कृति भारतीय काव्यशास्त्र को लेखक की अमूल्य देन है। इस अनुवाद में यदि त्रुटियाँ मिल जाएँ तो समझिए यह मेरी कमजोरी है ।
    डॉ. टी. आर० भट्ट

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rabindra Nath Thakur
    Rabindra Nath Thakur
    250 225

    Item Code: #KGP-622

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रस्तुत संकलन में जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अनधिकार प्रवेश', 'मास्टर साहब', 'पोस्टमास्टर', 'जीवित और मृत', 'काबुलीवाला', 'आधी रात में', 'क्षुधित पाषाण', 'अतिथि', 'दुराशा' तथा 'तोता-कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Hamare Prerna Srot
    Sharan
    170 153

    Item Code: #KGP-955

    Availability: In stock

    हमारे प्रेरणा-स्रोत
    प्रस्तुत पुस्तक उन महापुरुषों के श्रेष्ठ विचारों व उत्तम आचरण का जीता-जागता प्रमाण हैं, जिन्होंने उच्च विचारों के लिए सादा जीवन बिताना परमावश्यक समझा । उनका खान-पान, रहन-सहन तो सादा था, पर विचार बहुत ऊँचे थे । आचरण महान् था । वास्तव में अगर जीवन में सादगी है, छल-कपट, लोभ, मोह, झूठ और रिश्वतखोरी से हम दूर हैं तो हमारा मन-मस्तिष्क स्थिर होगा, उसमें नए-नए सुंदर व उच्च विचार पैदा होंगे । यदि हम विलासिता की ओर दौड़ेंगे तो हमारा जीवन बनावटी हो जाएगा । हम सदैव हो अनुचित ढंग से धन व पद पाने की लालसा रखेंगे । सहयोग, सहानुभूति और राष्ट्र-प्रेम की भावना का हमारे अंदर अभाव हो जाएगा । आशा है, पाठकों को यह कृति पसंद आएगी और इससे उन्हें अपना जीवन संवारने में सफ़लता मिलेगी ।

  • Hindi Natya-Kavya : Punarmoolyankan
    Hukum Chand Rajpal
    95 86

    Item Code: #KGP-856

    Availability: In stock

    हिन्दी नाट्य-काव्य: पुनर्मूल्यांकन
    प्रस्तुत आलोचना-ग्रंथ में लेखक ने ‘अंधायुग’, ‘संशय की एक रात’, ‘एक कण्ठ विषपायी’ तथा ‘एक प्रश्न मृत्यु’ सरीखी कृतियों के रूपाकार-विधा की चर्चा सविस्तार की है। ऐसी रचनाओं को एक साथ प्रबंध-काव्य, नाटक, गीति नाट्य, पद्य नाटक, काव्य नाटक तथा नाट्य-काव्य आदि नामों से विवेचित-विश्लेषित करना विचित्र प्रतीत होता है। लेखक ने नाट्य-काव्य विधा की सैद्धान्तिक चर्चा करते हुए कविता और नाटक दोनों विधाओं के सुमेल पर आधारित इस नवीन एवं सार्थक विधा की प्रतिष्ठा करने का प्रयास किया है। उनका मानना है कि ऐसी रचनाएँ कोई स्थापित कवि ही कर सकता है, जिसे नाटकीय विधान की सही समझ हो। इसमें दोनों साहित्य-विधाओं की सम्यक् एवं सहज प्रस्तुति अपेक्षित है। यही कारण है कि धर्मवीर भारती को इस विशिष्ट विधा का प्रथम सफल रचनाकार स्वीकार किया गया है। लेखक की स्पष्ट धारणा है कि ऐसी कृतियाँ एक विशिष्ट मानसिकता पर आधारित होती हैं—इनकी रचना-प्रक्रिया के अनेक सोपान एवं पड़ाव होते हैं—काव्यात्मकता इसका मूलाधार है तथा नाटकीयता इसका बाह्य विधान। ये इसे अधिक ग्राह्य एवं प्रभावोत्पादक बनाते हैं। इस ग्रंथ में पहली बार नाट्य-काव्य, संश्लिष्ट नाट्य-काव्य (लम्बी कविता) और रंग-काव्य सरीखी रचनाओं के अन्तर्सम्बन्धों को सोदाहरण रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। अपनी धारणाओं-स्थापनाओं को प्रामाणिक-तार्किक आधार प्रदान करने हेतु शोध-प्रविधि के नियमों की सटीक प्रस्तुति के साथ ही इस विधा के सभी विद्वानों की चर्चा यथास्थान की गई है। लेखक की विशिष्टता इस बात में है कि वे स्थापित समीक्षकों के साथ ही नवोदित रचनाधर्मियों का उल्लेख एवं उन्हें महत्त्व प्रदान करने में उदार रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि इस ग्रंथ से इस विवादास्पद विधा को सही धरातल पर समझने का मार्ग प्रशस्त होगा। 
  • Dinkar : Vyaktitva Aur Rachana Ke Aayam
    Gopal Rai
    425 383

    Item Code: #KGP-259

    Availability: In stock

    दिनकर: व्यक्तित्व और रचना के आयाम
    प्रस्तुत पुस्तक दिनकर को नए परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करती है। दिनकर का काव्य-संसार लगभग पाँच दशकों, 1924 से 1974 तक फैला हुआ है। बीसवीं शती के आरंभिक दशक में राष्ट्रीय आंदोलन जुझारू रुख अख्तियार करने लगा था और गांधी जी के हाथों में नेतृत्व आने के बाद तो राष्ट्रीय आंदोलन जनांदोलन के रूप में परिणत होने लगा। दिनकर की काव्य-चेतना और काव्य-चिंतन के निर्माण में राष्ट्रवादी आंदोलन के जुझारूपन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उनकी कविताओं में भारतीय किसानों का श्रम, उनकी आशाएँ और अभिलाषाएँ लिपटी हुई हैं। 
     दिनकर साहित्य में समकालीनता और सामयिकता को वरेण्य मानते हैं। वही साहित्य दिनकर के लिए काम्य है, जो दलितों, उपेक्षितों और समाज के मान्य वर्ग की दृष्टि से असभ्य लोगों का पक्षधर बनकर खड़ा हो सके। दिनकर राजनीतिक विषयों को भी महत्त्व देते हैं और मानते हैं कि राजनीतिक कविता श्रेष्ठ कविता होती है। 
    दिनकर ने अकबर इलाहाबादी का एक शे’र उद्धृत किया है जो उनके काव्य-चिंतन का निचोड़ है:
    ‘‘मानी को छोड़कर जो हों नाजुक-बयानियाँ,
    वह शे’र नहीं, रंग है लफ़्ज़ों के ख़ून का।’’
  • Sant Malook Granthawali
    Baldev Vanshi
    600 540

    Item Code: #KGP-119

    Availability: In stock

    संत मलूक ग्रंथावली
    संतों की दुनिया सहज, सरल, चैतन्य और प्रकाश की दुनिया है । ढोंग, दिखावा, छल, छद्म और मिट्टी की दुनिया के विपरीत उन्होंने मानवीय, संवेदनशील, जीवंत दुनिया के निर्माण में अपनी सारी सामर्थ्य  लगा दी है । कबीर, रैदास, नानक, दादू की भाँति संत मलूकदास भी आजीवन इसी पथ पर बढते रहे । मानवीयता, अध्यात्म, हिन्दू-मुस्लिम एकात्मता एवं जाति-पांती के विरुद्ध संदेश देते रहे ।
    जब हर श्वास स्वयं ही रामकाज में लग जाए, अजपा जाप चलने लगे, इसके बाद ऐसी स्थिति आती है—आराध्य और आराधक एकमेक हो जाएं । व्यक्ति मनुष्य से देवता बन जाता है । व्यक्ति-त्वांतरण हो जाता हे। मलूकदास ने यह स्थिति सहज ही उपलब्ध कर ली । अब राम उनका जप या सुमिरन कर रहे है :
    माला जपों न कर जपों, जिभ्या कहों न राम । 
    सुमिरन मेरा हरि करै, मैं पायो विस्राम॥ 
    मनुष्य की प्राकृतिक ऊर्जा, अंतर्निहित परमात्म- शक्ति-इनकी प्राप्ति से भौतिक जीवन का सुधार, यहीं महालक्ष्य है मलूक की वाणी का । यानी मानव के जीवन को सर्वांगरूप से अनुभूत्तिपूर्ण बनाना और सुधारना । एक बेहतर मानवीयता को धरती पर सुलभ बनाना ।
  • Mera Mobile Tatha Anya Kahaniyan
    Ansuya Tyagi
    225 203

    Item Code: #KGP-601

    Availability: In stock

    दक्षिण अफ्रीका में रेल यात्रा के समय गांधी जी रस्किन का उपन्यास ‘अनटू द लास्ट’ पढ़ रहे थे। अंगूर के बाग में काम करने वाले मजदूरों के एक छोटे से कथा प्रसंग की चर्चा ‘सर्मन ऑफ़ द माउंट’ के आधार पर रस्किन ने अपने उपन्यास में की है। इस प्रसंग ने बापू को द्रवित किया। किस्सा यह है कि अंगूर के बाग में कुछ मजदूर काम के लिए बुलाए गए थे, कुछ मजदूरों को सुबह ही काम पर रख लिया गया व कुछ को तीन घंटे बाद बुलाया गया। लेकिन शाम को जब बाग के मालिक ने मजदूरी बांटी तो सबको एक बराबर पैसे दिए। पहले काम पर लगे मजदूरों को यह बात खटकी तब मालिक ने समझाया कि भले ही ये मजदूर देर से काम पर लगे, किंतु मजदूरी की आशा में ये सुबह से ही खड़े थे, मैंने इन्हें देर से काम पर लगाया, पर आखिर इनका हक तो बराबर का है।
    पारुल को यह प्रसंग याद आ गया और उसने सोचा, जब चंद्रकला मेरे यहां काम करती है तब इसके दुःख में मुझे भी भागीदार बनना चाहिए। यदि मैं अपने एक महीने की ट्यूशन की आधी कमाई इसे देकर इसके नुकसान की भरपाई कर देती हूं तब यह कितनी प्रसन्न हो जाएगी। मुझे तो अधिक अंतर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिम्मेदारियां तो सब समाप्त हो गई हैं, वैसे भी आशीष और उसे कितना चाहिए, उनका तो अब थोड़े में ही गुजारा चल जाता है। 
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘थोड़ी सी खुशी’ से)
  • Paap-Punya Se Pare
    Rajendra Rao
    225 203

    Item Code: #KGP-1832

    Availability: In stock


  • Zindgi Ka Zaayaka
    Sadiq
    180 162

    Item Code: #KGP-196

    Availability: In stock

    जिंदगी का जायका 
    पिछले कई वर्षों से मैं हिंदी ही में ग़ज़लें लिख रहा हूँ। बीच में कभी-कभार यूँ भी होता है कि उर्दू में ग़ज़ल हो जाती है। 1999 की एक रात जब कुछ लिखने का मूड बना और मैंने एक ग़ज़ल लिखी जो हास्य-व्यंग्य से भरपूर थी। फिर उसी मूड में कई दिन तक ऐसी ही ग़ज़लें लिखता रहा। ये ग़ज़लें लिखकर मुझे एक अजीब-सा संतोष मिलता था और ख़ुशी होती थी। ऐसा लगता था कि मैं अपने और अपने समय के बारे में ईमानदारी, सच्चाई और निर्भीकता के साथ वह सभी कुछ लिखता जा रहा हूँ जो कि मुझे लिखना चाहिए। मैंने जब इसका ज़िक्र कमलेश्वर जी से किया तो उन्होंने ‘दैनिक भास्कर’ के रविवारीय परिशिष्ट में हर हफ्ते उनके प्रकाशन का सिलसिला शुरू कर दिया। प्रचलित ग़ज़ल से पृथक् और विशेष पहचान बनाने के लिए ‘हज़ल’ शीर्षक दिया गया और इस तरह काफी समय तक मेरी हज़लें ‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित होती रहीं और मैं उनमें प्रत्यक्ष रूप से अपने समय का इतिहास रकम करता रहा। फिर अचानक वह मूड ख़त्म हो गया। सिर्फ छपने के लिए लिखते रहना मैंने पसंद नहीं किया। कुछ समय बाद फिर मूड बना तो फिर बहुत-सी ‘ग़ज़लें’ लिख डालीं, जो ‘जिंदगी का ज़ायका’ में शामिल हैं।
    -सादिक
  • Bantadhar
    Nisha Bhargva
    150 135

    Item Code: #KGP-1804

    Availability: In stock

    निशा भार्गव की कविताएँ गहरे मानवीय सरोकारों का प्रतिनिधित्व करती हैं । गम्भीरता से, सपाट भाव से किसी बात या संदेश को व्यक्त कर देना शायद हमें आसान लगे लेकिन हास्य-व्यंग्य के माध्यम से 'सर्व' को अभिव्यक्ति 'स्व' से आसान नहीं । यहीं निशा भार्गव अपनी कविताओं की भाषा-शैली और प्रवृति से भीड में अपना अलग स्थान बनाती हैं । उनकी अपनी खास शैली है जो अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ती । छंदमुक्त, इन कविताओं में एक प्रवाह होता है, गीत जैसी लयात्मकता होती है। यथा -
    "सड़क पर चक्का जाम हो गया
    ये अंजाम बहुत आम हो गया
    मीडिया भगवान हो गया
    देश का कर्णधार हो गया ।" 
    निशा भार्गव की कविताएँ सामाजिक मुददों को जीवंतता से उठाती हैं, समाधान ढूंढती हैं, व्यवस्था पर प्रहार करती हैं, लाचारी पर हँसती हैं, समाधान का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं । यथा -
    "मँहगाई ने सबका दिल तोडा
    घर-घर का बजट मरोड़ा
    फिर सबको दी सीख
    छोडो ये शिकायत ये खीझ
    समस्या का समाधान करना सीखो
    बिन बात यूँ ही मत खीझो ।"
    इसी तरह 'बंटाधार' कविता वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्थाओं पर जमकर प्रहार करती है । 'बंटाधार' ही क्यों संग्रह को अन्य कविताओं में भी अलग-अलग प्रसंग हैं, व्यंग्य की अनूठी छटा हैं । ये कविताएँ मन को लम्बे समय तक गुदगुदाने के साथ-साथ कुछ सोचने पर भी बाध्य करती हैं ।
    —डा. अमर नाथ 'अमर'
  • Avadh Narain Mudgal Samgra (2 Vols.)
    Mahesh Darpan
    750 675

    Item Code: #KGP-216

    Availability: In stock

    अवधनारायण मुद्गल समग्र (2 खण्डों में)
    'अवधनारायरए मुद्गल समग्र' में कवि-कथाकार  संपादक ही नहीं, एक सिद्धहस्त यात्रावृत्त लेखक, लघुकथाकार, साक्षात्कारकर्ता और अनुवादक के साथ-साथ श्री मुद्गल का विचारक रूप भी सामने आया है । आगरा, लखनऊ, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में साहित्य और पत्रकारिता के रचनाकार- संपादक के अनुभव विविधरंगी रहे हैं । अपने समय की हलचल को बड़े संजीदा ढंग से देखने वाले\ श्री मुद्गल को समय के अनेक बड़े रचनाकारों व संपादकों का सान्निध्य तो मिला ही, वह उनके साथ रहते हुए भी स्वयं को उनसे अप्रभावित रख अपनी अलग राह बना सके । इस राह को पहचानना ही इस समग्र कृतित्व से होकर गुज़रना है। यहीं दैनिक जीवन के तनाव, इतिहास से मनुष्य का संबंध, देश-काल के भीतर और पार होती दृष्टि, सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक व व्यक्तिगत प्रसंगों में भाषा का सहज आत्मीय स्वरूप और मिथकों के साथ-साथ दैनंदिन जीवन से आए प्रतीक एक नई रचना की दुनिया में ले जाते हैं, जो निरंतर  पास आने को आमंत्रित करती है । इस ग्रंथ का पाथ, एक तरह से एक विशिष्ट काल-खंड को तटस्थ दृष्टि से समझने का अवसर भी देता है । रचनाकार मुद्गल की यह सृष्टि विचार और विरार-सघर्ष की एक ऐसी दुनिया है, जिससे गुजरते हुए पाठक खुद को उसका एक सहयात्री पाता है ।

  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Jaishankar Prasad
    Jaishankar Prasad
    180 162

    Item Code: #KGP-9158

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं जयशंकर प्रसाद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘आकाश-दीप’, ‘ममता’, ‘आंधी’, ‘मधुआ’, ‘व्रत-भंग’, ‘पुरस्कार’, ‘इंद्रजाल’, ‘गुंडा’, ‘देवरथ’ तथा ‘सालवती’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Grih Daah
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-753

    Availability: In stock


  • Zane Ajeeb : Nasera Sharma
    Prem Kumar
    275 248

    Item Code: #KGP-281

    Availability: In stock

    ज़ने अजीब : नासिरा शर्मा
    अपनी मनबसी नामी-गिरामी शख़्सियतों के बारे में बहुत कुछ—ख़ूब-ख़ूब जान लेने की चाहत सबमें होती है। पसंदीदा के प्रभाव के बढ़ते-गहराते जाने के क्रम में एक बिंदु वह भी आता है, जब यह चाहत कसकता-सा एक जुनून तक बन जाती है। उस अपने मनभावन के अंदर- बाहर-आसपास से जुड़ी हर छोटी-छिपी बात जानने-सुनने के लिए हम उत्कर्ण-उत्कंठ हो उठते हैं। अगर वह मनभावन कोई कलाकार-साहित्यकार है तो स्थिति और भी विकट एवं दिलचस्प हो जाती है। उसकी रचनाओं के पात्रों, घटनाओं, चित्रों, कथनों के आधार पर हम अपनी- अपनी तरह से उसके निज—नितांत निज की दुनिया की अजब-ग़ज़ब तस्वीरें बनाने लगते हैं—बनाते रहते हैं।
    लेकिन जब कोई बड़ी शख़्सियत—नासिरा शर्मा जैसी लेखिका—अपने स्वभाव, अनुभवों, संवेदनाओं, संबंधों, मान्यताओं, विचारों, अभावों, आघातों, संघर्षों, प्राप्तियों...उससे भी अहम यह कि अपने पात्रों, सरोकारों, इरादों एवं रचित-संभावित रचनाओं के बारे में सहज, स्पष्ट, उत्सुक भाव से रचना करने की तरह कहे-बताए...तो...तो यह पाठक, रचना और साहित्य की दृष्टि से विशिष्ट, उपयोगी और मूल्यवान हो जाता है। तब और भी अधिक—जब हम नासिरा जी के पास-साथ होने के उन क़रीबी क्षणों में यह जानें-महसूस करें कि इस लेखिका के जीने-लिखने-सोचने का अंदाज़ और सोच का आसमान एकदम अलग भी है एवं व्यापक व विराट् भी।
    किसी कलाकार की सृष्टि व कलाकारिता की वीथियों-अमराइयों में उसके साथ चल, गुज़र, देख, सुन, जान पाना अपने आप में भिन्न, सुखद, अधिकतम प्रामाणिक और बेहतरीन क़िस्म का अनुभव होता है। ऐसे इस अनुभव का अहसास-भर पाठक को कराने की मुन्नी-सी एक ख़्वाहिश और कोशिश है यह—ज़ने अजीब: नासिरा शर्मा।
  • Triya Hath
    Maitreyi Pushpa
    240 216

    Item Code: #KGP-82

    Availability: In stock


  • Prakaaraantar
    Madhur Shastri
    125 113

    Item Code: #KGP-1862

    Availability: In stock

    प्रकारान्तर
    वर्तमान जीवन-परिवेश की दुर्दान्त अमानवीयता के सामने पड़ने पर अस्वीकार का स्वर ही स्वाभाविक परिणति होती है एक सर्जक कवि की । मधुर शास्त्री का कवि भी मुक्त- छंद की इन कविताओं में अपना कटु अस्वीकार दर्ज करता है : 'चलो, लौट चलें पुराने दिनों की ओर/शाम झुकने लगी है/रात जाने वाली है/मुँह में भरकर झाग/लाल जीभ में है काला जहर इसके साथ है खूँख्वार अँधेरा' -प्रतीकात्मक व्यंजना में युग की विभीषिका व्यक्त है ।
    गीत के ऊँचे सृज़न-तल से बाध्यकारी जिन सीमाओं- स्थितियोंवश मधुर शास्स्त्री का गीतकार मुक्तछंद के तल पर उतरा है, वे निश्चय ही युग-यथार्थ  को रेखांकित कर रही हैं तथा जिन्होंने कवि को झेंझोड़ दिया है। अन्याय, हिंसा, हत्या के अपूर्व भयावह वर्तमान को भावोपचार  से अधिक संवेदनात्मक विचारोपचार एवं व्यंग्य-प्रहार की दरकार है ।
    समाज-जीवन की विचार-विश्लेषणमयी पहचान के बावजूद मधुर जी का गीतकार कवि अपनी मूल प्रकृति को पूरी तरह छोड़ नहीं देता । यह अच्छा हैं, क्योंकि सृजन की मौलिक चिंतन-दृष्टि ही प्रामाणिकता को सिद्ध करती है। बाहरी बाध्यताओं में घिरकर भी मधुर शास्त्री दृष्टि, भाषा, लय, तुक आदि को शिथिल नहीं होने देते तथा निराला की मुक्तछंद परंपरा में काव्य-सृजन की हरीतिमा, सरसता, संवेदना, लोकाभिमुखता, संप्रेषणीयता, सहजता की भूमि को विकसित करने में संलग्न रहते हैं । यहीं यह कह देना अप्रासंगिक न होगा कि निराला ने छंद तोड़ा नहीं था, एक नया छंद-मुक्तछंद, जोड़ा था।
  • Hindi Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    150 135

    Item Code: #KGP-61

    Availability: In stock

    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उर्दू में ग़ज़ल कहने की परंपरा बहुत पुरानी है । मीर, गालिब, जौक, सौदा से लेकर जिगर, सजाना, फैज, साहिर और उनके बाद की अनेक पीढियों तक ग़ज़ल उर्दू शायरी का जरूरी हिस्सा रही है । इधर हिंदी में भी ग़ज़ल ने अपनी एक परंपरा बना ली है और निराला, प्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी, हरिकृष्णा 'प्रेमी', शंभुनाथ शेष, विजित, त्रिलोचन, शमशेर, बलवीर सिंह रंग, दुश्यंत कुमार और उनके बाद छंदबद्ध लिखने वालों की लगभग पूरी की पूरी पीढ़ी  ग़ज़ल -लेखन से जुड़ गई है। कहना ही होगा कि हिंदी ग़ज़ल  के क्षेत्र में पूरे भारत में लगभग हजार से अधिक रचनाकार अपने ढंग से, अपने रंग में, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ ग़ज़लें कह रहे हैं । असलियत यह है कि आज काव्य-मंचों पर, पत्र-पत्रिकाओं में, पुस्तक प्रकाशन में ग़ज़ल का बोलबाला है ।
    इतने व्यापक रचना-संसार में निश्चय ही बहुत-सी ग़ज़लें ऐसी है, जिन्हें काव्यपेमी बार-बार पढ़ना और अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे । प्रस्तुत 'हिन्दी ग़ज़ल शतक' में ग़ज़ल को विविध शैलियों में लिखने वाले पच्चीस ग़ज़लकारों की चार-चार ग़ज़लें दी जा रही है, जो हिंदी ग़ज़ल  के वैविध्य को निश्चय ही प्रभावकारी अंदाज में पेश करती है ।
  • Janmanmayi Subhadra Kumari Chauhan
    Rajendra Upadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-180

    Availability: In stock


  • Chetana
    Madan Lal Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-1812

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap
    Madan Kashyap
    150 135

    Item Code: #KGP-225

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : मदन कश्यप
    'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीं रहते, उसमें पैठते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते हैं और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते हैं ।‘
    'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
    'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृजनात्मक उपयोग करते हैं ।'
    'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'
  • Samarpan
    Bhanu Pratap Shukla
    80 72

    Item Code: #KGP-1959

    Availability: In stock

    समर्पण 
    शताब्दियों से साथ-साथ रहने के बावजूद मुस्लिम मानसिकता भारतीय जीवन-दृष्टि से रच-बस क्यों नहीं सकी ? राष्ट्रीय मूल धारा के प्रवाह को और व्यापक न बनाकर उसे संकीर्ण या उससे हटकर अपनी एक अलग धारा बनाने का प्रयास क्यों चलता रहता है ? भारत में इस्लाम के मतानुयायी यहाँ की विविधता में एकता की अवधारणा के अधिष्ठान का अंग क्यों नहीं बन पाते ? हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा जितना गगनभेदी होता है, दिल की दूरियाँ और दरारें उतनी ही गहरी क्यों होती जाती है ? कैसा स्वर्णिम होगा वह दिन जब भारत के सभी नागरिक मुक्तकण्ठ से 'भारतमाता की जय' के उदघोष में ही सर्वाधिक गौरव और प्रेरणा का अनुभव करेंगे । यहीं लालसा इस पुस्तक की मूल प्रेरणा है । इस पुस्तक में उठाए गए ऐसे तमाम सवालों का बेबाक जवाब मिल जाए और खुले मन से हम उन्हें मान लें तो निश्चित ही उस दिन भारतीय जीवन का सौदर्य अपने पूरे निखार पर होगा । शताब्दियों के संताप से संत्रस्त देश के लिए सहीं, सामयिक और स्थायी विकल्प की तलाश का ही एक नाम है-समर्पण ।
  • Katha Kaho Kunti Mai
    Madhukar Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2021

    Availability: In stock

    कथा कहो कुंती माई
    "कितना खतरनाक होता है माई, मनुष्य के सपनों का मर जाना ?" सुमति ठाकुर ने सवाल की तरह पूछ लिया । "बहुत खतरनाक मेरे बेटे," छाती माई बोली, "सपने हैं तभी तो हमतुम जिंदा हैं, मनुष्य हैं। हम तभी तक जीवित है, जब तक सपने हैं । बेटे, हमारे सपने बहुत बड़े हैं, जो तुम बराबर कहते हो, या तो हम सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन । श्रमिक-किसानों का राज होगा । लडाई बहुत लंबी है सुमति, और चौतरफा भी । हमारे सपनों के हत्यारे हमारे संग-संग जिंदा हैं। इन्हें भी नहीं छोडना है ।"
    कुन्ती माई ऊपर की और दोनो बाँहें फैलाए दिखाती हैं, "अभी भी क्यों नहीं जागते तुम लोग ? पुश्तैनी पीपल-गाछ पर गाज गिरने वाली है ।" "क्या बात है माई ?" एक साथ कई पंख फस्कढाते है । "मेरे गाँव के लोग मुर्दा हैं । सभी मरे हुए हैं । बाप-दादे की पुश्तैनी गाछ को कटवाने के लिए मुदई लोग कलक्टर को बुलवाए हैं। इन्हें किस प्रकार ज़गाऊँ ?" माई का कंठ अवरुद्ध होने लगता है ।
    पीपल के निकट आते ही जेली-साथी नारे लगाते हैं, "कुन्ती माई को, लाल सलाम, लाल सलाम । इंकलाब जिदाबाद । जिदाबाद !" 
    कुन्ती माई अपनी दोनों बाँहें फैलाए उनकी ओर दौड़ पड़ती है, जैसे ममता के समुद्र में डुबो लेना चाहती है । यह डबडबाई आँखें पोंछती हुई कहने लगती हैं, "मेरे बाल-गोपालो । जुल्म बढ़ता है तो प्रतिरोध भी तेज होता है । पुलिस-प्रशासन आपका नहीं है, उन्हीं की रक्षा के लिए है । पन्द्रह मार्च को पटना गांधी मैदान को संकल्प के साथ दस लाख जनता चाहिए । मरने का संकल्प लो, तभी जिंदा रहोगे। मठ की जमीन पर हम फिर चढ़ेंगे । इस बार हम रहेंगे या मठ रहेगा ।"
    [इसी उपन्यास से]

  • Chhatrapati Shivaji
    Lala Lajpat Rai
    150 135

    Item Code: #KGP-1876

    Availability: In stock

    छत्रपति शिवाजी

    हम शिवाजी की जीवनी संक्षेप में लिख रहे है । इसे पढ़कर पाठकों को ज्ञात होगा कि शिवाजी में महान् पुरुष होने के सभी गुण विद्यमान थे । शिवाजी प्रबंध में जितने निपुण थे, संगठन की शक्ति को भी भली-भांति जानते थे । वह संगठन के सिद्धात का ज्ञान रखते थे । यदि शिवाजी आज़ होते तो वह यूरोपियनसेनापतियों और विद्वानों से बाजी मार लेते । वह युद्धविद्या में निपुण थे । शत्रु को निर्बल करने का ढंग वह भली-भाँति जानते थे । शिवाजी बहुत धैर्य वाले व्यक्ति थे । वह किसी के व्यंग्य-बाण सहन नहीं कर पाते थे । वह वीरता और बहादुरी में अद्वितीय थे । वह औरंगजेब के प्रधानमंत्री की जरा-सी बात
    पर आगबबूला हो गए और विरोध करने से जरा-सा भी भयभीत नहीं हुए । अपने धर्म में उनका अटूट विश्वास था ।  इस संबंध में वह औरंगजेब को भी मात देते थे । वह वीरों का बहुत सम्मान करते थे । अपने सदाचार के सामने किसी को नहीं टिकने देते थे । वह अदभुत व्यक्तित्व के धनी थे । इसी कारण हम उस महापुरुष की जीवन-कहानी अपने नवयुवकों को सुनाते है । आशा है, आज के नवयुवक अपने कर्त्तव्य का पालन करेंगे और सदाचारी रहकर प्रमाण प्रस्तुत करेंगे । परमेश्वर हमरि देश के लोगों के हृदय में देशभक्ति की भावना भर दे । उन्हें देश और जाति से प्रेम करना सिखाए, साथ ही शुद्ध, पवित्र आचरण एवं आदर्श जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दे । 
    --लाजपतराय 

  • Mere Saakshatkaar : Shiv Murti
    Shivmurti
    380 342

    Item Code: #KGP-745

    Availability: In stock


  • SWAPNAPAASH
    Manisha Kulshreshtha
    240 216

    Item Code: #KGP-1572

    Availability: In stock

    'स्वप्नपाश' नृत्य और अभिनय से आजीविका-स्तर तक संबद्ध माँ-बाप की संतान गुलनाज फरीबा के मानसिक विदलन और अनोखे सृजनात्मक विकास व उपलब्धियों की कथा है । समकालीन सनसनियों में से एक से शुरु हुई यह कथा हमें एक बालिका, एक किशोरी और एक युवती के उस आरिम अरण्य में ले जाती है जहाँ 'नर्म' और 'गर्म' डिल्युजंस और हैल्युसिनैशरेन का वास्तविक मायालोक है। मायालोक और वास्तविक? जी हाँ, वास्तविक क्योंकि स्वप्न-दु:स्वप्न जिस पर बीतते है उसके लिए कुछ भी 'वर्चुअल' नहीं-न सुकून , न सितम । उस पीडा को सिर्फ कल्पना की जा सकती है कि खुली दुनिया में जीती-जागती काया की चेतना एक अमोघ पाश में आबद्ध हो जाए और अधिकांश अपने किसी सपने के पीछे भागते नज़र आएँ। पाश में बँधे व्यक्ति की मुक्ति तब तक संभव नहीं होती जब तक कोई और आकर खोल न दे। मगर जब एक सम-अनुभूति-संपन्न खोलने वाले की तलाशा त्रासद हो तो? दोतरफा यातना से गुज़रने के खाद अगर कोई मिले और वह भी हौलै-हौले एक नए पाश में बंध चले तो ? अनोखे रोमांसों से भरी इस कथा में एक नए तरह की रोमांचकता है जो एक ही बैठक में पढ़ जाने के लिए बाध्य कर देती है ।
    गुलनाज़ एक चित्रकार है और वह भी 'प्राडिजी'।  ऐसे  चरित्र का बाहरी और भीतरी संसार कला की चेतना और आलोचनात्मक समझ के बगैर नहीं रचा जा सकता था। कथा में पेंटिंग  की दुनिया के प्रासंगिक नमूने और ज्ञात-अल्पज्ञात नाम ऐसे आते हैं गोया वे रचनाकार के पुराने पड़ोसी हों। आश्चर्य तो तब होता है जब हम नायिका की सृजन-प्रविधि और उसको पेंटिग्स के चमत्कृत (कभी-कभी आतंकित) कर देने वाले विवरण से गुजरते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि मनीषा कुलश्रेष्ठ मूलत: चित्रकार हैं। उनकी रचनात्मक शोधपरकता का आलम यह है कि वे इसी क्रम में यह वैज्ञानिक तथ्य भी संप्रेषित कर जाती है कि स्किजोफ्रेनिया किसी को ग्रस्त भर करता है, उसे एक व्यक्ति के रूप में पूरी तरह खारिज नहीं करता ।
    स्किजोफ्रेनिया पर केंद्रीय यह उपन्यास ऐसे समय में  आया है जब वैश्वीकरण की अदम्यता और अपरिहार्यता के नगाड़े बज रहे हैं। स्थापित तथ्य है कि वैश्वीकरण अपने दो अनिवार्य घटकों-शहरीकरण और विस्थापन- के द्वारा परिवारिक ढाँचे को ध्वस्त करता है। मनोचिकित्सकीय शोधों के अनुसार शहरीकरण स्किजोफ्रेनिया के होने की दर को बढ़ाता है और पारिवारिक ढाँचे में टूट रोग से मुक्ति में बाधा पहुँचाती है। ध्यातव्य है कि गुलनाज पिछले ढाई दशकों में बने ग्लोबल गाँव की बेटी है । अस्तु, इस कथा को एक गंभीर चेतावनी की तरह भी पढे जाने की आवश्यकता है। आधुनिक जीवन, कला और मनोविज्ञान-मनोचिकित्सा की बारीरिज्यों को सहजता से चित्रित करती समर्थ और प्रवहमान भाया में लिखा यह उपन्यास बाध्यकारी विखंडनों से ग्रस्त समय में हर सजग पाठक के लिए एक अनिवार्य पाठ है ।
  • Isliye
    Ashok Gupta
    175 158

    Item Code: #KGP-1831

    Availability: In stock


  • Sant Ka Divya Sansaar
    Deep Shikha Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-1870

    Availability: In stock

    संत का दिव्य संसार
    पारलौकिक जगत् में विचरण करते भक्तों ने देखा-एक हरा-भरा प्राकृतिक सौंदर्य से युक्त पर्वत-शिखर, जिस पर सूर्य-रश्मियां बिखरी पडी थीं, स्निग्ध पवन की स्निग्धता से विभोर पर्वत-शिखर परम शति में डूबा हुआ था ।
    उस शांत, एकांत, मानवीय पदचापों एवं कोलाहल से पूर्णत: मुक्त पर्वत के उत्तुंग शिखर पर एक जर्जर शरीर- धारी तपस्वी तपस्यारत था । स्वच्छ-सुगंधित-शीतल पवन उन्मुक्त हो बह रहा था । अवरोधरहित पवन तपस्वी के शरीर से टकरा तपस्वी को अपनी प्रशंसा करने के लिए बाध्य-सा करता प्रतीत हो रहा था ।
    किंतु, तपस्वी पवन के प्रफुल्लकारी स्पर्श से पूर्णत: प्रभावहीन था । उस पर पवन की स्निग्धता का, उसकी कोमलता का, उसकी प्रफुल्लता का और उसकी शीतलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था । वह पूर्णतया नि:संग था, तटस्थ था, निर्विकार था, अचल था, स्थिर था ।
    सूर्य-रशिमयों की गरिमामयी प्रखरता भी तपस्वी में किसी भी प्रकार का विक्षोभ उत्पन्न करने में असफल-सी जान पड़ रही थी । तपस्वी अविचल समाधिस्थ बैठा हुआ था ।
    तपस्वी की स्थिर अवस्था, तपस्वी के सैकडों वर्षों से निरंतर एक ही आसन में बैठे रहने का संकेत-सी करती प्रतीत हो रही थी । संभवत: तपस्वी सदियों से एक ही मुद्रा में, एक ही आसन में, एक ही स्थान पर बैठा प्रभु से एकात्म की स्थापना का प्रयास कर रहा था ।
    उसके मुखमंडल से झरती अपूर्व शांति उसके प्रयास की सफलता का जयघोष-सी करती प्रतीत हो रही थी । कदाचित् तपस्वी अपने प्रयास में सफल हो चुका था । तभी तो उसके मुखमंडल को चारों ओर से एक विशिष्ट आभा ने घेर रखा था । वह जितेन्द्रिय-सा लग रहा था ।
  • Ek Thi Sara
    Amrita Pritam
    240 216

    Item Code: #KGP-1978

    Availability: In stock

    एक थी सारा

    मेरी तहरीरों से कई घरों ने मुझे थूक दिया है
    लेकिन मैं उनका जायका नहीं बन सकती
    मैं टूटी दस्तकें झोली में भर रही हूँ
    ऐसा लगता है पानी में कील ठोक रही हूँ
    हर चीज़ बह जाएगी—मेरे लफ्ज, मेरी औरत
    यह मशकरी गोली किसने चलाई है अमृता !
    जुबान एक निवाला क्यूँ कुबूल करती है ?
    भूख एक और पकवान अलग-अलग
    देखने के लिए सिर्फ 'चाँद सितारा' क्यूँ देखूँ ?
    समुंदर के लिए लहर ज़रूरी है
    औरत के लिए जमीन जरूरी है
    अमृता ! यह ब्याहने वाले लोग कहाँ गए ?
    यह कोई घर है ?
    कि औरत और इजाजत में कोई फर्क नहीं रहा... 
    मैंने बगावत की है, अकेली ने,
    अब अकेली आंगण में रहती हूँ
    कि आजादी से बड़ा कोई पेशा नहीं
    देख ! मेरी मज़दूरी, चुन रही हूँ लूँचे मास
    लिख रहीं हूँ
    कभी मैं दीवारों में चिनी गई,
    कभी बिस्तर से चिनी जाती हूँ... 
    [इसी पुस्तक से]

  • Kartaar Ki Taksaal
    H. Tipperudraswamy
    1100 990

    Item Code: #KGP-828

    Availability: In stock

    धर्म, राजकीय, सामाजिक आंदोलन तथा संघटन की दृष्टि से कर्नाटक प्रदेश के इतिहास में बारहवीं शताब्दी एक महत्त्वपूर्ण काल-खंड है। इन सारे अंशों ने एक-दूसरे से घुलमिलकर तत्कालीन आंदोलन को एक संकीर्ण रूप प्रदान किया है। वे जैसे व्यक्ति-कंेद्रित चिंतन थे, वैसे समुदाय-केंद्रित चिंतन भी थे। यही कारण है कि उसे समष्टि का समवेत स्वर भी कह सकते हैं। ऐसे एक समुदाय के समर्थ प्रतिनिधि के रूप में बसवण्णा जी दिखाई देते हैं। वैसे देखा जाए तो बसवण्णा पर लिखी गई सारी कृतियां तत्कालीन अन्य शरणों पर लिखी गई कृतियां ही बन जाती हैं।
    ऐसे एक अपूर्व उपन्यास का श्रीमती शशिकला सुब्बण्णा जी ने बहुत ही सशक्त रूप में हिंदी में अनुवाद किया है। इनके इस प्रयास पर हमें आश्चर्य है। एक सर्जनात्मक कृति का उसकी सारी भावसंपदा को समेटते हुए भाषा की हर ध्वनि के साथ अन्य भाषा में अनुवाद करना एक साहस का काम है।

  • Naani Amma Maan Jao
    Krishna Agnihotri
    495 446

    Item Code: #KGP-2053

    Availability: In stock

    नानी अम्मा मान जाओ
    इस उपन्यास  में चार पीढ़ियों को कहानी के माध्यम से बाल विवाह से लेकर आधुनिक दौर को स्थितियों का चित्रण है।  चूँकि उपन्यास का कालखंद बहुत बढा है, इसलिए बहुत सारी समम्याएँ टुकड़ों-टुकडों में देखने को मिलती हैं । इसमें पारिवारिक बिखराव, राजनितिक भ्रष्टाचार, सेक्स के प्रति खुलापन, विकृत सेक्स, अति आधुनिकता,  नई पीढ़ी के द्वंद्वआदि का  चित्रण है । 
    अगली पीढ़ी तथा पिछली पीढ़ी के टकराव के साथ कहानी आगे बढ़नी है । कहानी बातचीत की शैली में कही गई है तथा कहानी में सिनेमाई दृष्टिकोण लक्षित होती है । 
     इसमें बताया गया है कि एक पीढ़ी का सेक्स के प्रति खुला रवैया है तो एक पीढी सेक्स के प्रति शुचिता की बात करती हैं लेकिन भीतर ही भीतर वह घुटती है । बाद में उसे अपना यह रवैया बदलना पड़ता है । यह रवैया नानी अम्मा बदलती है।
  • Hindi Ke Srijankarmi
    Sushil Kumar Phul
    495 446

    Item Code: #KGP-532

    Availability: In stock


  • Davanal
    Balshauri Reddy
    80 72

    Item Code: #KGP-2101

    Availability: In stock

    दावानल
    प्रस्तुत ऐतिहासिक उपन्यास पलनाडु-युद्ध पर आधारित है । पलनाडु जिला गुंटूर का एक प्रदेश है । यह युद्ध 12वी शती में पलनाडु के राजाओं के बीच राज्य बंटवारे का लेकर कारंपूडि रणक्षेत्र में हूआ था, जो आपस में भाई-भाई थे। इस युद्ध की तुलना महाभारत-युद्ध से की जाती है।  कुरुक्षेत्र की भाँति कारंपूडि रणक्षेत्र का भी सामरिक दृष्टि से उतना ही महत्त्व है । आंध्र के विद्वान् इसे 'पलनाडु महाभारत' की संज्ञा देने में संकोच नहीं करते । यद्यपि यह संग्राम आंध्र में घटित हुआ था, तथापि इसमें सार्वदेशिकता की झलक मिलती है। पलनाहु के इस युद्ध ने आंध्र के कवि, नाटककार, लेखक और इतिहासकारों पर ऐसा प्रभाव डाला कि इसे इतिवृत्त बनाकर उन्होंने दर्जनों काव्य,  नाटक, उपन्यास, वीर गीत, गद्य काव्य और गीति काव्य लिख डाले । साथ ही इस पर अनेक फिल्में भी बन गईं ।

    (उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत)
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Alamshah Khan
    Aalam Shah Khan
    270 243

    Item Code: #KGP-744

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार आलमशाह खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पराई प्यास का सफर', 'आवाज की अरथी', 'मुरादों भरा दिन है', 'दंड-जीवी', 'मेहंदी रचा ताजमहल', 'लोहे का खून', 'तिनके का तूफान', 'पग-बाधा', 'किराए की कोख' तथा 'पंछी करे काम' । संपादक द्वारा लिखी गई पुस्तक की भूमिका के माध्यम से आलमशाह खान की समग्र कथा-यात्रा और उसके महत्त्व से भी सहज ही परिचित हुआ जा सकता है।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक आलमशाह खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Maansik Svasthya Aur Manahchikitsa
    Asha Rani Vhora
    160 144

    Item Code: #KGP-1095

    Availability: In stock

    मानसिक स्वास्थ्य और मन:चिकित्सा 
    विसंगतियों और विद्रूपताओं, भागदौड़ और आपाधापी के संघर्ष और तनाव के माहौल में व्यक्ति या तो भीड़ का अंग होकर रह गया है या फिर आत्मकेंद्रित हो अकेले जूझने के लिए विवश हो गया है । आज लगभग हर व्यक्ति को अपना मानसिक संतुलन कायम रखने में कठिनाई आ रही है । यही संतुलन अधिक गडबडा जाने पर वह अनेक मानसिक आधियों-व्याधियों से घिरने लगता है । अधियां, यानी मानसिक समस्याएँ और व्याधियां, यानी मानसिक रोग । लेकिन दूर मानसिक रोग पागलपन नहीं होता, न ही लाइलाज, जबकि हमारे समाज में फैली अनेक भ्रांतियों के कारण एक ओर लोग सामान्य मानसिक रोगों को भूत-प्रेत-बाधा मान लेते हैं और झाढ़-फूँक के चक्कर में बिना इलाज रोग को और बढा लेते हैं, दूसरी और मामूली मानसिक समस्या के समाधान के लिए भी मानसिक विशेषज्ञ के पास जाने पर व्यक्ति को संदेह की वृष्टि से देखा जाने लगता है । एक स्वस्थ समाज की रचना के लिए पहले व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक होना चाहिए । अत: मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, सभी स्तरों पर अपेक्षित है । इसी अपेक्षा, आकांक्षा, आवश्यकता-पूर्ति की दिशा में एक सदप्रयास है प्रस्तुत पुस्तक ।

  • Lalachi Brahman
    Dharmpal Gupta
    50

    Item Code: #KGP-1188

    Availability: In stock


  • Media Aur Hindi Sahitya
    Raj Kishore
    250 225

    Item Code: #KGP-303

    Availability: In stock

    मीडिया और हिंदी साहित्य
    मीडिया और साहित्य का रिश्ता बिगड़ चुका है। इसमें संदेह नहीं कि आदर्श या लक्ष्य की दृष्टि से दोनों की मूल संवेदना एक है। दोनों का लक्ष्य मनुष्य को शिक्षित करना और सभ्यता के स्तर को ऊँचा उठाना है। दोनों भाषा में ही काम करते हैं, जो एक सामाजिक घटना है। इसके बावजूद आज मीडिया और साहित्य के बीच गहरी होती हुई खाई दिखाई देती है। यह खाई चिंताजनक इसलिए है कि मीडिया की पैठ और लोकप्रियता अधिक होने के कारण जनसाधारण के संस्कारों और रुचियों का सम्यक् विकास नहीं हो पाता। दूसरी तरफ, साहित्य की दुनिया संकुचित होती जाती है और उसकी संवेदना का सामाजिक विस्तार नहीं हो पाता। इस तरह, संस्कृति की दुहरी क्षति होती है।...
    जहाँ तक साहित्य और मीडिया के रिश्ते का सवाल है, हिंदी का मामला न केवल कुछ ज्यादा निराशाजनक है, बल्कि ज्यादा पेचीदा भी है। साधारण जनता से सीधे जुडे़ होने के कारण हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की सामाजिक जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। संस्कृति की दृष्टि से हिंदी का संसार एक विकासमान संसार है। हिंदी प्रदेशों में साक्षरता का स्तर हाल ही में बढ़ा है और पढ़ने तथा जानने की भूख जगी है। मीडिया का काम इस भूख को सुरुचि-संपन्नता के साथ तृप्त करना है और व्यक्ति के सामाजिक तथा सांस्कृतिक सरोकारों को मजबूत करना है। कुछ समय पहले तक स्थिति जैसी भी थी, बहुत अधिक असंतोषजनक नहीं थी। मीडिया में लेखकों का मान था और साहित्य के लिए कुछ सम्मानजनक स्थान हमेशा सुरक्षित रहता था, लेकिन आज नौबत यह है कि दोनों के बीच अलंघ्य दूरी पैदा हो चुकी है। ऐसे में सामाजिक दबाव का रास्ता ही असरदार हो सकता है। 
  • Jeevan Hamara
    Bebi Kambley
    120 108

    Item Code: #KGP-2099

    Availability: In stock

    जीवन हमारा
    मराठी लेखिका बेबी कांबले दलित साहित्य की प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । दलित लोगों के विपन्न, दयनीय और दलित जीवन को आधार बनाकर लिखे गए इस आत्मकथात्मक उपन्यास ने मराठी साहित्य में तहलका मचा दिया था। महाराष्ट्र के पिछडे इलाके के सुदूर गाँवों में अस्मृश्य माने जाने वाले आदिवासी समाज ने जो नारकीय, अमानवीय और लगभग घृणित जीवन का जहर घूँट-घूँट पिया उसका मर्मांतक  आख्यान है यह उपन्यास । शुरु से अंत तक लगभग सम्मोहन की तरह बाँधे रखने वाले इस उपन्यास में दलितो के जीवन में जड़ें जमा चुके अंधविश्वास पर तो प्रहार किया ही गया है, उस अंधविश्वास को सचेत रूप से उनके जीवन में प्रवेश दिलाने और सतत पनपाने वाले सवर्णो की साजिश का भी पर्दाफाश किया गया है । इस उपन्यास को पढ़ना महाराष्ट्र के डोम समाज ही नहीं वरन् समस्त पददलित जातियों के हाहाकार और विलाप को अपने रक्त में बजता अनुभव करना है । शोषण, दमन और रुदन का जीवंत दस्तावेज है यह उपन्यास, जो बेबी कांबले ने आत्मकथात्मक लहजे में रचा है ।


  • Agyaat Ka Nimantran
    Amrita Pritam
    160 144

    Item Code: #KGP-1973

    Availability: In stock

    अज्ञात का निमंत्रण 

    यह कौन-सी रात है
    जो मुझे दावत देने आई है
    आर सितारों के चावल फटककर
    यह टेग किसने राँधी है... 

    आज यह चाँद की सुराही-
    कौन आया है!
    कि इस चाँदनी को पीकर
    आसमान बौरा गया है... 

    जाने खुदा वह कौन-सो रात होती है
    जो किसी सपने का मस्तक चूम लेती है
    और फिर ख़यालों के पैरों में
    एक पायल., बजने लगती है... 

    प्रेम भी ईश्वर की तरह अज्ञात का नाम है
    उसकी बात जितनी भर--
    किसी संकेत में उतरती है
    वही संकेत इस पुस्तक के अक्षरों में है...
  • Mere Saakshatkaar : Kedarnath Agrawal
    Kedar Nath Agrawal
    200 180

    Item Code: #KGP-544

    Availability: In stock


  • Sansaar Ki Shreshtha Kahaniyan
    Gyanchand Jain
    300 270

    Item Code: #KGP-813

    Availability: In stock

    संसार की श्रेष्ठ कहानियां
    कहानी-लेखन विश्व की प्राय: सभी भाषाओं में प्रचुर परिमाण में होता आया है । उसने विश्व-साहित्य के इतिहास से अपनी एक खास जगह बनाई है। कहानी चाहे राजा-रानी के ऐश्वर्य और विलासितापूर्ण जीवन पर रची गई हो या शासन-सत्ता की बनती-बिगड़ती छवि को अंकित करती हो, वह घोर अराजकता और  असामाजिकता का चित्रण करती हो या भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के गर्त में दूबे हुए राजनीतिज्ञों का नग्न चित्र उतारती हो; देश-काल की व्यथा-कथा कहती हो या उसकी खुशहाली बयान करती हो-अंतत: होती वह आईने की तरह निर्दोष है । एकदम यथार्थ और कटु सत्य ।
    कहानियां चाहे मार्क टूवेन, जेम्स ज्वाएस, मैन्सफील्ड ने लिखी हों या बालज़क, मोपासां ने; लियो टाल्सटाय, चेखव, गोर्की ने लिखी हों या लुई जी पिरानडेलो, मारिसन, ए०ई० कोपर्ड ने; अनातोले फ्रांस, रोमानोफ  ने लिखी हों या एडवर्ड डेक्कर, हरमैन हेजरमैन्स ने, जेसिंन्टो पिकोन, कारेल कापेक, वानगी पामर ने लिखी हो या जेकब वासरमैन, मिक्सजथ, इमानोव ने; बजार्न्सन, आइजक पेरेज, लू शुन ने लिखी हो या प्रेमचंद, गुलेरी और मंटो ने-सबने अपने इर्द-गिर्द के समाज का और स्वयं भोगे हुए यथार्थ का अंकन किया है ।
    प्रस्तुत संकलन में ऊपर चर्चित अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विश्व-भर के लेखकों की तीस चुनिंदा कहानियां सम्मितित हैं। ये कहानियां अपने-जपने देश-काल की सामाजि- कार्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों की अंतरंग झाँकियाँ प्रस्तुत करती हैं । ये विश्व की प्राय: सभी भाषाओं में पढी गई और इन्होंने लोकप्रियता के उच्चतम शिखरों को छुआ । संकलन की अंतिम चार कहानियों (एक चीनी, दो हिंदी, एक उर्दू) के अतिरिक्त शेष सभी का रूपांतरण हिंदी के वरिष्ट साहित्यकार श्री ज्ञानचंद जैन ने अत्यंत सरल और सहज ग्राह्य भाषा- शैली में किया है।
  • Vichaar-Yaatra : Lal Krishna Advani
    Lal Krishna Advani
    245 221

    Item Code: #KGP-860

    Availability: In stock


  • Meri Saras Kavitayen
    Nisha Bhargva
    200 180

    Item Code: #KGP-9365

    Availability: In stock

    मन की बात
    हम सब हमेशा कुछ कहने को उत्सुक रहते हैं, सुनते कम बोलते ज्यादा हैं। वास्तव में देश की तरक्की जनता की खुशी बढ़ाती है लेकिन समस्याएं खुशी का घेराव करके खीझ पैदा करती हैं। हम अपने-अपने सुझाव देकर समस्याओं का समाधान मौखिक रूप से ही करने का प्रयास करते हैं किंतु हमारी आवाज वहां तक नहीं पहुंच पाती जहां तक पहुंचनी चाहिए इसलिए खीझ और झल्लाहट बढ़ती है। तनाव घर कर लेता है। मन की शान्ति के बहुत तरीके हैं उनमें से एक तरीका पढ़ना और सुनना है। कविताओं का लिखना मुझे जितना अच्छा लगता है उतना पढ़ना और सुनना भी। मुझे लगता है पठन-पाठन से भी मन की शुद्धि होती है। हास्य कविताएं न केवल तनाव कम करती है बल्कि मन में सरसता पैदा करती हैं खासकर तब, जब नकारात्मक स्थितियां हमें परेशान कर रहीं हों। मेरी कविताओं को पढ़कर अगर आपके चेहरों पर मुस्कान आ जाए तो आपके साथ-साथ मुझे भी सुकून मिलेगा। 
    ‘मेरी सरस कविताएं’ पुस्तक मैंने अपनी पूर्व प्रकाशित पुस्तकों ‘उधार की मुस्कान’, ‘अच्छे फंसे’, ‘चिकने घड़े’, ‘बंटाधार’ और ‘घनचक्कर’ में से चुनी हैं। इस पुस्तक को आप पढ़ेंगे तो मुझे लगेगा आपने मेरी पूर्व प्रकाशित पुस्तकों की एक झलक प्राप्त कर ली। लेखकों और कवियों को लिखने का जितना चाव होता है उतना ही इस बात का भी कि उनकी रचनाएं पाठकों तक पहुंचे, उनकी प्रतिक्रियाएं भी मिले। मैं भी ऐसा ही चाहती हूं।
    -निशा भार्गव
  • Sannate Se Muthbher
    Ganga Prasad Vimal
    60 54

    Item Code: #KGP-1884

    Availability: In stock

    'सन्नाटे से मुठभेड़' में गंगाप्रसाद विमल की नई कविताएँ संकलित हैं।
    इन कविताओं में समकालीन कविताओं से जो भिन्नता है , उसे रेखांकित करना आसान है । समकालीन कविताओं की एक धारा में पूर्ववर्ती परम्परा का अनुगमन है तो दूसरी धारा में कथन का चमत्कार । इन दोनों धाराओं में ‘भाषा के नये गणित की वह विरल उपस्थिति नहीं है जो सहजता के गुण से अलंकृत 'सन्नाटे से मुठभेड़' में है ।
    केवल शब्दों के संयोजन में कविता पाना आसान नहीं है । अर्थों के सुनियोजित क्रम में भी उसका अनुभावन दुष्कर है । एक सही काव्य विवेक अर्थों के भीतर उपजाने वाले प्रतिसंसार की प्रतीति में है । बाहर की चिंताओं से उपजने वाले त्रास या प्रताड़ में मामूली किस्म का वास्तव अंकित होता है । बीसवीं शताब्दी के हाहाकार को उन विमानवीय स्वरों में ही पहचाना जा सकता है जिसके लिए समकालीन कविताएँ  वास्तविकता की अदेखी धुरियों को अनावृत करने में लगी हैं । बल्कि कहना होगा, अर्थवान कविताएँ अपने समकाल से इसी मायने में विग्रहरत्त है कि वे आद्य जिज्ञासाओं से लेकर वर्तमान की अन्तर्धाराओँ में हस्तक्षेप करती है ।
  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-637

    Availability: In stock

    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
  • Har Baar Musaphir Hota Hoon
    Pratap Sehgal
    280 252

    Item Code: #KGP-611

    Availability: In stock

    हर बार मुसाफिर होता हूं' के यात्रा-वृत्तांत निरे वृतांत नहीं हैं। निरे वृतांत कभी भी यात्रा-साहित्य का हिस्सा नहीं बन सकते। यह यात्रा-वृतांत कभी इतिहास की गलियों से गुज़रते हुए आपको अतीत के किसी पन्ने से जोड़ देते हैं तो कभी भूगोल में प्रवेश करते हुए आपको उसी जगह ले जाकर खड़ा कर देते हैं, जिस जगह का जिक्र लेखक कर रहा है। कभी आप उस जगह के लोक के रीति-रिवाजों से रू-ब-रू होते हैं, कभी वहां के सांस्कृतिक घटकों का तो कभी वहीं की प्राकृतिक संपदा और सौंदर्य का हिस्सा बन जाते हैं।
    विविध विधाओं में लेखन करने वाले लेखक प्रताप सहगल एक घुमंतू जीव भी हैं, यह जानकारी इन यात्रा-वृतांतों को पढ़कर पुख्ता होती है। वन वृत्तातों में कहीं कविता, कहीं नाटक और कहीं कथा का रंग मिलने लगना कोई अजूबा नहीं बल्कि इसे लेखक का शैल्पिक वैशिष्टय ही मानना चाहिए।
    ये यात्रा-वृत्तात इसलिए भी विशिष्ट हो जाते है कि लेखक वर्णित स्थान, समय और वहीं समाहित सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का रूपांकन किनारे या किसी सिरे पर खडा होकर नहीं करता। यह सीधे-सीधे स्थान, समय और परिवेश में दाखिल होकर उसका हिस्सा बनकर जीता है और खुद की भी वहीं शामिल कर लेता है। अपने इन्हीं अनुभवों को पाठक के साथ साझा करने की इच्छा ही लेखक को शब्द का सहारा लेने के लिए विवश करती है। और इसी बहाने और तमाम सार्थक यात्रा-वृत्तांतों की तरह से यह यात्रा-वृत्तांत भी हिंदी के वृहद यात्रा-साहित्य के द्वार पर दस्तक देते हुए आपके हाथ में है।
  • Moh-Bandh
    Indu Rashmi
    50 45

    Item Code: #KGP-9066

    Availability: In stock


  • Jinavar
    Chitra Mudgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1998

    Availability: In stock


  • Mans Ka Dariya
    Kamleshwar
    80 72

    Item Code: #KGP-9061

    Availability: In stock


  • Pratidin (3 Vols.)
    Sharad Joshi
    1350 1215

    Item Code: #KGP-859

    Availability: In stock

    प्रतिदिन (तीन खंड)
    शरद जोशी के व्यंग्य कॉलम 'प्रतिदिन' पर लिखते हुए बहुत- सी बातें मेरे मन मैं हैं ।
    सबसे पहले मेरे मन से वे दिन आ रहे हैं, जब ‘नवभारत टाइम्स' के आखिरी पन्ने के कोने में, शरद जोशी की फोटो के साथ बमुश्किल तमाम दस-पंद्रह पंक्तियों से लेकर पच्चीस- तिस पंक्तियों तक का छोटा-सा व्यंग्य कॉलम लगभग रोज आता था । इस छोटे-से कोने ने तब देश में अखबार पढ़ने के तरीके बदल दिए थे । हम जैसे तमाम लोग पिछले पन्ने से अखबार शुरू करने लगे थे । उत्सुकता रहती थी कि शरद जोशी ने आज किस विषय पर कैसा, क्या लिखा होगा? किस कोण से ? क्या उठाया ? तुमने पढा ? वाह यार !
    शरद जोशी ने सात सालों तक रोज एक नया विषय उठाया, उसे एकदम नईं दृष्टि से देखा और फिर उसे एकदम नई भाषा-शैली के प्रयोग से ऐसा बनाया कि उन दिनो 'नवभारत टाइम्स' का वह कोना मानो फैलकर 'पूरे अखबार पर छा गया था । और अखबार पर ही क्यों, यह तो मानो पाठको की पूरी कायनात पर छा गया था । ऐसा व्यंग्य कॉलम न तो पहले लिखा गया था, न सोचा ही गया था । कुछ ही दिनो से वह इतना लोकप्रिय हो गया था कि यह अफवाह रहती थी कि एक जमाने में शरद जोशी का पेमेंट राजेन्द्र माथुर (जो अखबार के संपादक थे) से ज्यादा हो गया था । उसकी लोकप्रियता के चलते 'टाइम्स आँफ इंडिया' से उसके अंग्रेजी अनुवाद देने की कोशिश भी की गई । तब यह बात और भी विहित से सामने आई कि शरद जोशी जैसे जमीनी लेखक की मुहावरेदार और स्थानीय गमक से समृद्ध भाषा का अनुवाद करना लगभग असंभव बात है ।
    आज सालों के अंतराल के बाद 'प्रतिदिन' में लिखी ये अद्भुत व्यंग्य रचनाएं जब एक साथ इस संकलन से जा रही हैं-तब इनका पुनर्पाठ आपको शरद जोशी की ऐसी विलक्षण प्रतिभा से साक्षात्कार कराता है, जिसकी याद उसके जाने के बाद व्यंग्य में उत्पन्न और व्याप्त बियाबान में और भी शिद्दत से आ रही है। -ज्ञानचतुर्वेदी
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Hari Shankar Parsai
    Hari Shankar Parsai
    200 180

    Item Code: #KGP-9305

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    हरिशंकर परसाई

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित दिवंगत कथाकारों की कहानियों के चयन के लिए उनके कथा-साहित्य के प्रतिनिधि एवं अधिकारी विद्वानों तथा मर्मज्ञों को संपादन-प्रस्तुति हेतु आमंत्रित किया गया है। यह हर्ष का विषय है कि उन्होंने अपने प्रिय कथाकार की दस प्रतिनिधि कहानियों को चुनने का दायित्व गंभीरता से निबाहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार हरिशंकर परसाई की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘भोलाराम का जीव’, ‘सुदामा के चावल’, ‘तट की खोज’, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’, ‘आमरण अनशन’, ‘बैताल की छब्बीसवीं कथा’, ‘एक लड़की, पांच दीवाने’, ‘चूहा और मैं’, ‘अकाल उत्सव’ तथा ‘वैष्णव की फिसलन’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार हरिशंकर परसाई की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।